Kahani Saangrah- Bepar Aawajen
KAHANI SNGRAH-2. बेपर आवाजें
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क्रमांक.
1 फ़ांस
2. रेत के घरौंदे
3.` धनिया
4. तीस बरस घाटी
5.` जीवन के रंग हजार.
6 वंश वृक्ष
7. बेपर आवाजें
8. रुपांतरण
9 अतीत और वर्तमान के समानांतर चलते हुए.
10 सगुन चिरैया.
11. भेड़िया.
12. शेर दिल औरत
13. पुष्पा दी.
14. चन्द्रमुखी.
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1
फांस
निन्नी का
मन तो उस दिन से अशांत था। फांस ही ऐसी थी, जो शायद अब पूरी जिंदगी चैन नहीं लेने देगी। इस हादसे के बाद से, उसका दिमाग ऐसा सुन्न कर दिया गया था कि वह कुछ भी सोच नहीं पाई थी।
रह-रहकर एक बवण्डर सा उठता। कोई बात याद आती। फिर एक-एक करके सब कुछ उभरने लगता
था।
अपने किचन में व्यस्त थी निन्नी, तभी टेलीफोन की
घंटी घनघना उठी। बार-बार आ रहे टेलीफोन से वह पहले से ही परेशान थी। घंटी सुनते ही
उसका सिर भन्नाने लगा। जी में आया टेलीफोन ही अब उठाकर फेंक दिया जाना चाहिए।
स्टोव को सिम करते हुए वह टेलीफोन तक पहुँच ही पाई थी कि घंटी बजना बंद हो गई। पैर
पटकते हुए वह किचन की ओर बढ़ रही थी कि फिर घंटी बज उठी। अब उसका गुस्सा सातवें
आसमान पर चढ़ आया था। बुदबुदाते हुए वह फिर लौटी। रिसीवर उठाया। उस तरफ भैया थे।
भैया का स्वर डूब सा रहा था, बोलते-बोलते वे रुक भी जाया
करते थे। शंका-कुशंका के भंवर में वह फंसती जा रही थी। बड़ी मुश्किल से वे सिर्फ
इतना ही कह पाए- '' माँ सीरियस है
निन्नी, जितनी जल्दी हो सके चली आओ। " इसके बाद उन्होंने क्या कुछ कहा उसे नहीं मालूम। खबर सुनकर ऐसा भी लगा
जैसे शरीर को काठ मार गया हो। कान से टेलीफोन चिपकाए वह बड़ी देर तक खड़ी रही। उसे
तो यह भी भान नहीं रहा कि टेलीफोन कभी का डिस्कनेक्ट हो चुका है। कुछ नार्मल होते
ही फफक कर रो पड़ी थी निन्नी।
हड़बड़ाहट में उसने सूटकेस पैक किया। नौकरानी को आवश्यक निर्देश दिए।
बच्चों को कुछ खिला देने को भी कहा। सूटकेस पैक करते समय उसे नरेन्द्र और मांजी की
बराबर याद आ रही थी। काश इन दोनों में से कोई एक, उसके पास
होता तो वह अपना दु:ख शेअर कर सकती थी और उनके कंधे पर सिर रखकर थोड़ी देर ही सही-
रो तो सकती थी। रुलाई के बाद थोड़ा मन का बोझ तो हल्का हो जाता।
गैराज से गाड़ी निकालकर वह गेट पर रुककर बच्चों का इंतजार करने लगी थी।
बच्चों को आता देख उसने गेट खोल दिया। बच्चों को बिठाया। सूटकेस रखवाया और आगे बढ़
ली।
गाड़ी चलाते समय माँ की याद घनी हो आती। कैसी होगी मां। जिंदा है अथवा चल
बसी। नहीं जानती। पर माँ की याद उसे रुला जाती। डेढ़-दो सौ किलोमीटर का सफर कब और
कैसे तय हो गया, पता ही नहीं चल पाया।
गाड़ी रोकते हुए उसने स्पीड से गेट खोला और जूतियां खटखटाते हुए सरपट भाग
निकली। बच्चों को भी उतारना है यह उसे याद नहीं रहा। सीधे वह माँ के कमरे में
पहुंची। माँ को देखा। सन्न रह गई। महीना भर पहले तो ठीक थी माँ। अचानक यह क्या हो
गया। उसने मन ही मन अपने आपसे कहा था।
दो सफेद चादरों के बीच माँ का जिस्म पड़ा था। माँ का हाथ थामे भैया,
सिर झुकाए बैठे थे। भाभी भी उदास-गमगीन, पांयते
बैठी थी। देखते ही लगा, खेल खत्म हो गया है। कलेजा मुँह को
हो आया। रुलाई फूट पड़ी। अब वह माँ के शरीर से लिपटकर जार-जार रोए जा रही थी। क्या
हो गया भैया माँ को? कब से बीमार पड़ी थी। पहले सूचना क्यों
नहीं दी। किसी अच्छे डाक्टर को दिखलाया था। अस्पताल में भर्ती क्यों नहीं करवाया।
तरह-तरह के प्रश्नों की बौछार लगा दी थी निन्नी ने। भैया बार-बार पीठ पर हाथ फिराते
रहे। समझाते रहे। बड़ी मुश्किल से वह अपने आप पर काबू पा सकी थी।
उसने महसूस किया कि माँ का शरीर अभी गर्म है। उंगलियों के पोर नाक के पास
ले जाकर देखा। हल्की-हल्की सांसें चल रही हैं। उसने नब्ज टटोली। वह भी धीमी गति से
चल रही है। यह जानकर प्रसन्नता सी हुई कि माँ अब तक जिंदा है। माँ के शीघ्र स्वस्थ
हो जाने के लिए वह ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना करने लगी। वह न जाने अब तक कितने
ही देवी-देवताओं को नवस चुकी थी।
एक-एक पल भारी लग रहा था। कब क्या घट जाए कहा नहीं जा सकता। तीनों एक
दूसरे के चेहरे की ओर देखते। मन से मन की बात होती। नजरें अनायास ही झुक जातीं।
सभी गंभीर मन। मन में समाए डर से आतंकित।
घड़ी ने रात के चार बजाए। एक हल्की सी कराह, माँ के
मुंह से निकली। सभी की नजरें मां के निस्तेज चेहरे पर आकर केन्द्रित हो गईं। सभी
उसे ध्यान से देखने लगे। निर्जीव पड़े शरीर में हल्की-सी हरकत हुई। ओंठ फडफ़ड़ाए।
शायद वे कुछ कहना चाह रही होंगी। अधीरता के साथ निन्नी ने माँ-माँ कहा, कुछ शरीर को हिलाया-डुलाया भी। फिर वे अचेत हो गईं। सारे लोगों के दिल एक
बार फिर भय के साथ धड़के थे। सारी रात आंखों ही आंखों में कैसे कट गई, पता ही नहीं चल पाया।
सुबह होते तक सब कुछ सामान्य होने लगा था, सभी ने
ईश्वर को मन ही मन धन्यवाद दिया।
माँ के गिरते स्वास्थ्य को लेकर उसने भाभी से कुछ बातें कीं। प्रश्न सुनते
ही भाभी चमक उठी और अर्र-सर्र, जो मुंह में आया बकने लगी।
हालांकि उसने कोई ऐसी बात नहीं की थी जिससे उसके सम्मान को ठेस पहुंचे। सभी बातें
सामान्य सी ही थीं।
भाभी की बातें सुनते ही निन्नी का मन बुझ सा गया। अंदर सब कुछ क्षत-विक्षत
था। इसके बाद कहने-सुनने को बचा ही क्या था। उसने कितना भला समझा था भाभी को। कुल
खानदान से भी ठीक थी। शक्ल-सूरत की बुरी नहीं थी। पर उस दिन तो उन्होंने हद ही कर
दी। ऐसी कड़वी जुबान की तो उसने कल्पना तक नहीं की थी। तमतमाते हुए उन्होंने तो
यहाँ तक कह डाला था कि अगर इतना ही हेमटा बतलाना है तो, ले
जाओ अपनी माँ को अपने साथ और जो चाहो सो करो।
भाभी की बातें अंदर उतरकर कलेजा छलनी कर रही थीं। उसका माथा चकराने लगा
था। उसने तब यह सोचा भी नहीं था। मगर जब उसने भैया की ओर देखा। समझ गई। उनका चेहरा
झुका हुआ था। वे एक शब्द भी नहीं बोले थे। सब कुछ शायद पहले से ही तय था और वह हो
भी रहा था।
उसने सूटकेस उठाया। बच्चों को साथ लिया और ओपल में आ बैठी। गाड़ी स्टार्ट
की और वापिस हो ली। घर से निकलते समय उसे ऐसा लगा कि भाभी अथवा भैया ही उसे आगे
बढ़कर रोकेंगे। कुछ दिन और ठहर जाने को कहेंगे अथवा अपने कहे पर खेद प्रकट करेंगे।
पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वे उसे सूटकेस ले जाता देखते रहे। किसी के भी मुंह से एक
शब्द नहीं निकला था। एक बार ही सही वे रुकने को तो कहते। इससे बड़ा अपमान और क्या
हो सकता था। उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा था।
घर आकर वह सीधे बिस्तर पर पसर गई। रह-रहकर पिछली बातें याद आती रहीं। आँखों
की कोर भीग उठीं। नरेन्द्र और मांजी को वह आज बहुत मिस करने लगी थी।
मन के किसी कोने से एक प्रश्न उभरता। " निन्नी, तूने ठीक
नहीं किया वापिस आकर? तुझे और कुछ दिन रुक जाना चाहिए था। कम
से कम माँ के ठीक होने तक ही सही। झगड़ा-झांसा किसके घर में नहीं होता। ननद-भौजाई
के बीच अक्सर ऐसी नोंक-झोंक तो होती ही रहती है। तरह-तरह के प्रश्न मन को उद्वेलित
करते रहे। उसे तो ऐसा भी लगने लगा कि वह प्रश्नों के जंगल में घिर गई है।
सारे प्रश्नों को दरकिनार करते हुए वह अपने आपको समझाइस देने लगी थी। उसने
ठीक ही किया है वापिस होकर। वह वहां रुककर करती भी तो क्या करती। माँ-बाप की नजरों
में बेटा ही सब कुछ होता है। बेटियों की तो कोई अहमियत होती ही नहीं है। बेटी
लाख-से-लाख जतन करे, पर वैतरणी तो बेटा ही तारता है न! बस
इसी एक सोच के चलते वे सारे दुख उठा लेते हैं, मुँह से उफ्ï
तक नहीं करते, भले ही वे इस लोक की चिंता न
करें, पर परलोक सुधारने के चक्कर में पड़े रहते हैं। भैया ने
आखिर दिया ही क्या है मां को, सिवाय दु:ख, परेशानी, कुण्ठाओं के और वे दे भी क्या सकते थे। इन
सबके बावजूद भी वे धन-जायदाद के स्वामी बने ही रहेंगे, समाज
के कर्म-धर्म समाज के नियम कायदे बनाने वालों ने कितनी चतुराई से पत्ते फांटे
होंगे, उसे उबकाई सी आने लगी थी। मां बेटे के नाते भैया का
क्या यह फर्ज नहीं बनता कि वह उनकी प्राणवचन से सेवा करते। वे तो वही कहते करते
देखे गए जो बीवी ने कह दिया। अरे उसकी अपनी भी तो सास है। वह तो उनके साथ ऐसा
बर्ताव नहीं करती।
वह सोचती, इन पांच-छ: सालों में समय चक्र कितना घूम
गया है। वक्त बदला या आदमी। मगर अब इतना जरूर जानने लगी है कि माँ ने धीरेन्द्र
भैया को जो संस्कार दिये- माहौल दिये- अपने जीवन का अर्क निचोड़ कर जिंदगी का अर्थ
दिया, सब बेकार गया। ये पांच-छ: साल इतने ताकतवर हो गए कि
इन्होंने एक लंबा इतिहास ही धो डाला।
एक ही बात, नये-नये रूप में आकर उसे उद्वेलित कर
जाती। ऐसा भी लगा कि बार-बार उसी बात को सोचते रहने में, संभव
है दिमाग की नसें ही फट जाएं। अब वह सो जाना चाहती थी ताकि दिमागी आराम मिल सके।
पर नींद भी दुश्मनी साधे बैठी थी, जो लाख पुचकारने के बाद भी
नजदीक नहीं आ रही थी।
अनमनी सी उठ बैठी वह और सिढ़िय़ाँ चढ़ते हुए छत पर आकर दीवार का सहारा लेकर
धम्म से बैठ गई।
सामने एक पीपल का पेड़ था। देशी-परदेशी पखेरुओं ने उसकी मजबूत शाखों पर
अपने घोंसले बना लिए थे। इस समय नवजात शिशुओं को छोड़कर एक भी परिन्दा पेड़ पर
नहीं था। सभी दाना-चुग्गा की जुगाड़ में निकल चुके थे। एक स्तब्ध खामोशी छाई हुई
थी। पीपल की टहनी से एक पतंग आकर अटक गई थी। जब तेज हवा का झोंका आता पतंग
चक्करघिन्नी खाने लगती। पल भर को लगा कि वह भी एक पतंग की तरह ही है जो न तो आसमां
की हो सकी, न जमीन की। बीच में ही अटकी पड़ी है। उसकी इस
दुर्दशा को देखकर पत्ते भी तालियां बजाने लगे थे।
जब अलग-अलग जाति के, अलग-अलग प्रजाति के मूक पखेरू
आपस में तालमेल बिठाकर रह लेते हैं तो भला आदमी क्यों नहीं रह पाता। अगर भाभी भी
थोड़ा सा सामंजस्य बिठा लेती तो शायद माँ की यह दुर्दशा न हुई होती और न ही उन्हें
असमय अपनी मौत की याचना करनी पड़ती। वह अपने आप में सोचने लगी थी।
भाभी की याद आते ही लगा कि तूफान फिर सक्रिय होने लगा है। वह सब कुछ भूल
जाना चाहती है पर एक-एक कर सब याद आने लगता था। अब वह अपने आपको समझाईस देने लगी
थी और नार्मल होने की कोशिश करने लगी थी।
देखा सूर्यास्त होने को है। पक्षियों के समूह वापिस होने लगे हैं।
पक्षियों का कलरव सुनकर बूढ़े पीपल के शरीर में उत्साह का संचरण होने लगा है।
चहल-पहल से भर उठता है पीपल का घर आँगन। पीपल के पत्तों के बीच में ललछौटी किरणें
बहने लगी थीं, धीरे-धीरे संवलाने लगी थीं। आकाश में जब तक
लटका अंधियारा नीचे उतरकर जमीन पर लोटने लगा था। थोड़ी देर बाद चांद आकाशपटल पर
मुस्कराने लगा था। सारा दिन उसने चुप्पी साधे छत पर ही बिता दिया था। अब वह सीढिय़ाँ
उतर कर नीचे आने लगी थी।
नीचे उतरते ही उसे पंकज व ऋचा की याद हो आई। पूरा दिन लगभग यूं ही बीत
गया। उसने उन दोनों की सुध ही नहीं ली। बाहर निकलकर देखा। दोनों नौकरानी को घेरे
बैठे हैं और वह उन्हें नई कहानियां सुनाने में मगन थी। नौकरानी की मन ही मन वह
प्रशंसा करने लगी थी। वह भी अब उनके बीच आकर कहानियों के मजे लेने लगी थी।
बच्चों को मैं अब कहानियां सुनाती हूं-तब तक तू खाना पका ले। भूख बहुत
जमके लगी है। नौकरानी को समझाईस देते हुए उसने प्याज के कुरकुरे पकौड़े, पराठे, भरंवा भटे, दही का
रायता, पापड़ सलाद बनाने को कहा। पकौड़ों के साथ इमली की
चटनी मिल जाए तो मजा आ जायेगा। उसने मन ही मन कहा था। इमली की चटनी याद आते ही
मुंह में खट्टापन तिर आया था।
खाना पक जाने की सूचना मिलते ही वह उठ खड़ी हुई। खाना खाने से पहले नहाने
की सूझी। आज दिन भर से वह बैठी ही तो रही है। उसने आज न तो मुँह ही धोया था और न
ही नहाया ही था। वह सीधे बाथरूम में घुस पड़ी। बाथरूम में घुसने से पहले उसने टेप
ऑन किया। लता का कैसेट फँसाया। गायिकाओं में उसे लता ही प्रिय थी।
जी-भर के नहाने के बाद वह भोजन पर टूट पड़ी। बड़े दिनों बाद वह आज लजीज
खाना खा रही थी।
देर रात तक वह लता को सुनती रही और बच्चों के साथ कभी चाईनिज चेकर खेलती
रही तो कभी सांप-सीढ़ी। साँप-सीढ़ी खेलते समय उसकी गोटी अचानक बड़े साँप के मुंह
पर आ गई। साँप के मुँह से घिसरती हुई वह पूंछ पर आकर अटक गई थी। पल भर को लगा कि
वह साँप, साँप न होकर भाभी हो और गोटी की जगह वह स्वयं बैठी
हुई है। मुँह के पास आते ही उसने उसे निगलना शुरू कर दिया था। और वह सरसराती हुई
साँप के जिस्म में गहरे तक उतरती चली जा रही थी। साँप ने अब अपने जिस्म को मोडऩा
शुरू कर दिया था। पलभर को लगा कि उसकी हड्डी-पसलियां चरमरा गई हैं। एक सहज कल्पना
से वह सिहर उठी थी। पलभर को तो यूं लगा कि उसका वजूद ही नेस्तनाबूद हो गया है।
अब वह आगे नहीं खेल पाई। उसने बोर्ड हटा दिया और पीठ को पलंग का सहारा
देते हुए लंबे पैर पसार कर छत की ओर टकटकी लगाए देखने लगी थी। बच्चों ने कब लाईट
ऑफ किया और वे कब सो गए, उसे भान ही नहीं रहा। होश तो उसे तब आया जब उसने अपने आपको गहरे अंधकार
में कैद पाया। उसने चाहा भी कि नाईट लैम्प जला ले पर अंधकार में ही घिरे रहना उसे
अच्छा लग रहा था। अंधेरे को छेदते हुए उसकी नजरें अब भी छत से चिपकी हुई थीं।
ऐसा लगा कि कुछ किरणें इकठ्ठी हो रही है। एक अस्पष्ट चित्र सा उभरने लगा
था। तस्वीर अब साफ होने लगी थी। माँ की तस्वीर थी। अगल-बगल में दो बच्चे। एक
व्यक्ति पीछे खड़ा दिखलाई दिया। तस्वीर और भी स्पष्ट नजर आने लगी थी। पीछे खड़ा
हुआ व्यक्ति मामाजी थे। दो बच्चों में एक वह स्वयं थी दूसरे धीरेन्द्र भैया थे।
मामाजी की तस्वीर देखकर पुराने बातें याद हो आईं।
काफी छोटे थे दोनों भाई-बहन। पिता का साया सिर से हट चुका था। मां खेतों
में कड़ी मेहनत करती और दोनों की अच्छी परवरिश करती। ताऊजी की नियत खेल-खलिहान के
साथ जेवरात आदि हड़पने की थी। वे अपनी ओर से बिसातें बिछाते। माँ शायद हर बिसात की
काट जानती थी। अपनी स्कीम को फेल होता देख ताऊजी खिसियाते गए थे। अब उन्होंने अपने
तरकश से अंतिम अस्त्र का संहार करने की ठानी।
पुआल का ढेर मकान के पीछे जमाया जाने लगा। उस दिन सारे हौद खाली कर दिए गए
और गाँव की बिजली भी ठप्प कर दी थी। अमावस की रात थी। खेतीबाड़ी पशुधन सम्हालने के
साथ ही माँ उतना ही भक्तिभाव से गीता रामायण भी बांचती थी। शायद कान्हा साथ दे रहे
थे। वह जान चुकी थी कि उसका घर आज लाक्षागृह की तरह धू-धू कर जल उठेगा। समय पूर्व
वह लोगों की आंख बचाकर पिछवाड़े से भाग निकली और तब तक ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर
दौड़ती रही, चलती रही जब तक मामाजी का घर नहीं आ गया था। घर
से निकलते समय वह पीछे पलट-पलट कर देखती रही थी। पूरा घर अग्नि की भेंट चढ़ चुका
था।
मामाजी ने हमारा भरपूर स्वागत ही नहीं किया बल्कि ठहरने खाने तक का पुख्ता
इंतजाम भी किया। इन्हीं मामाजी की बदौलत आज एक आलीशान बंगला और खेतीबाड़ी हमारे
पास थी।
धीरे-धीरे यह तस्वीर धुंधलाती चली गई। एक दूसरी तस्वीर उभरकर आंखों के
सामने आने लगी। इस तस्वीर में हम तीन के अलावा दो जन भी जुड़ जाते थे। पहले
नरेन्द्र यानि पति और दूसरी तस्वीर रेखा भाभी की थी। कुल मिलाकर हम पांच लोगों का
छोटा-सा पारिवारिक समूह था।
भैयाजी और रेखा, साथ ही, एक
क्लास में पढ़ते थे। भैया ऑल राउण्डर होने के साथ-साथ मेधावी छात्र भी रहे हैं।
इनका दिल आ गया होगा भैया पर। अपना चक्कर चलाने के लिए इन्होंने मुझे मोहरा बनाया।
दोस्ती गांठी। कॉलेज जाते समय अक्सर साथ जाती। फिर धीरे-धीरे घर में प्रवेश करने
लगी और देखते ही देखते उन्होंने वह मुकाम पा ही लिया जिसके लिए उन्होंने भगीरथ तप
किया था।
कॉलेज से निकलते ही दोनों जॉब भी पा चुके थे और पास ही के शहर से रोजाना
अप-डाउन भी करते थे।
मैं कॉलेज में गोल्ड मेडलिस्ट रही। अत: प्राध्यापक की नियुक्ति भी जल्दी
ही मिल गई। नौकरी लगने के छ: माह बाद शादी भी हो गई। सो मैंने अपना ट्रांसफर भी ले
लिया। अब तक सब कुछ ठीक ठाक चल ही रहा था कि नियति ने अपने क्रूर हाथों से इस
तस्वीर को तीन टुकड़ों में काट रख दिया था। पहले टुकड़े में मैं और नरेन्द्र अलग
कर दिए गए । दूसरा और तीसरा टुकड़ा कटकर भी इस तरह जुड़ा दिखाई देता रहा जैसे काटा
ही नहीं गया हो। पर माँ की तस्वीर भैया-भाभी की तस्वीर से काटकर अलग की जा चुकी
थी।
चार-पांच छ: साल बीत गए। भैया को संतान सुख नसीब नहीं हुआ। अब वे इस घर को
बेचकर अन्यत्र चले जाना चाहते थे पर माँ ऐसा नहीं होने देना चाहती थी। वे बार-बार
कहा करती थी कि जिस घर में तूने साँस ली— जहां तू पला-बड़ा हुआ और जिस शहर ने तुझे
तमीज सिखाई-मान दिया- पहचान दिया- उसे तू क्यों बेचने पर तुला हुआ है। उसने यह भी
सलाह दी थी कि ऋचा को गोद ले ले। मन रम जायेगा। फिर आखिर तेरी बहन की ही तो लड़की
है। पर भाभी अपनी बहन की लड़की को गोद लेने का मानस बना चुकी थी।
विचारों की टकराहट बढ़ती ही चली जा रही थी। बात सुलझने का अंत ही नजर नहीं
आ रहा था। अब क्या था। माँ की उपेक्षा की जाने लगी। कभी या तो खाना बनाया ही नहीं
जाता था या बना भी लिया तो पर्याप्त बचाया ही नहीं जाता था ताकि माँ भरपेट न खा
सके।
माँ के बुढ़ाते शरीर में भले ही कृष्ण खड़े रहे हों पर मन का अर्जुन तो
गहरे तक हार मान चुका था। लड़ता भी तो किससे लड़ता और किसके लिए। गांडीव एक कोने
में रख देना ही उसने उचित समझा था।
विचारों की
तंद्रा के चलते नींद ने उसे कब अपने आगोश में ले लिया था, पता ही नहीं चल पाया।
वह जब सोकर उठी तो सूरज बहुत ऊपर चढ़ आया था। जागने के साथ ही उसने महसूस
किया कि शरीर में ऐंठन के साथ-साथ पोर-पोर में आलस भी रेंग रहा है।
जमुहाते हुए वह उठ बैठी। बाथरूम जाने से पहले उसने फिर से लता का कैसेट
लगाया। पूरा वाल्यूम खोला और बाथरूम में समा गई।
आदमकद आईने के सामने खड़ी वह ब्रश कर रही थी। मुँह धोने के बाद अब वह लता
के स्वर में स्वर मिलाने लगी थी। उसने निर्णय ले लिया था कि अब वह अपने आपको और
व्यथित नहीं करेगी। नियति को जो मंजूर होना है, वह होकर ही
रहेगा। उसने अपने चेहरे को, आईने के और नजदीक ले जाकर गौर से
देखा। आंखों के नीचे स्याह निशान घर बनाने लगे थे। वह चौंक उठी। अपने आप में डूबकर
जीने का संकल्प उसने लिया और अब वह पूरी गति से थिरकती हुई लता के स्वर में स्वर
मिलाने लगी थी।
एक थिरकन के साथ खुश्बू का एक तेज झोंका उसके बदन से आ चिपका। पल भर को यह
लगा कि शरीर एक मीठी अग्नि में जलने लगा है। उसने कपड़े उतार फेंके और शॉवर आन कर
दिया। उसकी कोमल हथेलियां अब उसके नाजुक बदन पर यहाँ-वहाँ दौडऩे लगी थीं। सहसा यह
भी लगा कि नरेन्द्र की हथेलियाँ उसके शरीर पर फिसलती जा रही हैं। कभी-कभी नरेन्द्र
यूं ही बाथरूम में घुस आया करता था और...। नरेन्द्र की याद आते ही लगा कि वह यहां
स्वयं उपस्थित है— उसके ही साथ है। वह आँखें बंद किए अपने कल्पना संसार में तब तक
डूबी रही, जब तक शॉवर की आखिरी बूंदें समाप्त नहीं हो गईं।
शॉवर के बंद हो जाने के बाद ही उसकी चेतना वापिस लौटी थी।
उसने आईने पर नजर डाली। आंखें शराबी, गाल गुलाबी और
ओंठ लजीले हो आए थे। अपने इस परिवर्तित रूप को देखकर उसे शर्म सी आने लगी थी।
तन पर साड़ी लपेटते हुए वह बाहर निकली। ड्राईंग रूम से निकलकर वेटिंग रूम
में आई तो अखिलेश को असमय देखकर सकपका सी गई। अखिलेश और इस समय! क्योंकर आया होगा
वह इस वक्त। ढेरों सवाल मन में रेंगने लगे थे।
अखिलेश, नरेन्द्र का सहपाठी ही नहीं अपितु वह
फैक्टरी में भी बराबर का हकदार है। अक्सर वह घर पर आता ही रहता है। आज वह पहली बार
ऐसे समय पर आया है जबकि उसे इस समय फैक्टरी में रहना चाहिए था। फैक्टरी आवर में वह
कभी भी अनुपस्थित नहीं रहा है। आज अचानक उसकी उपस्थिति संदेह पैदा कर रही थी।
अपनी झेंप मिटाते हुए उसने इतना भर कहा था कि अखिलेश भैया, इस समय और आप यहाँ ?. वह वाक्य पूरा भी नहीं बोल पाई थी कि अखिलेश ने कहना
शुरू कर दिया था कि वह काफी देर से टेलीफोन पर संपर्क करने के लिए प्रयासरत था ।
आखिर आप थीं कहां इतने लंबे समय से।
प्रश्न तो उसके सीधे-सादे थे पर इनका उत्तर उसके पास था ही नहीं। क्या वह
यह बतलाती कि वह बाथरूम में बंद थी और क्या वह यह भी बतलाती कि वह उसके दोस्त के
साथ काल्पनिक रूप से मस्ती मार रही थी। वह अपने आपमें इतनी गुम थी कि उसे
दीन-दुनिया का होश ही नहीं था।
निन्नी की चुप्पी इस बात का संकेत दे रही थी कि उसके पास इस छोटे से
प्रश्न का समाधानकारक उत्तर नहीं था। उसे चुप देखकर उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा,
'भाभी- माँजी आईं थीं और यह पैकेट दे गई हैं। उन्होंने यह भी बतला
देने को कहा था कि वह स्वयं घर आईं थीं। दरवाजा अंदर से बंद था। काफी देर तक
खटखटाते रहने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो यह पैकेट मुझे सौंपते हुए कहा
था कि निन्नी को याद से दे देना और वे तुरंत वापिस भी हो गईं थीं।"
आश्चर्य- महान आश्चर्य! माँ आईं थीं। यह कैसे हो सकता है। उनसे तो एक कदम
भी चला नहीं जाता। भला वे इतनी दूर आ भी कैसे सकती हैं। ढेरों सारे प्रश्न एक साथ
दिमाग को मथने लगे थे।
कांपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। पत्र माँ के ही हाथ का था लिखा था- ये
चंद कागजात महज कागज न होकर एक छोटी-सी फांस है जिसने हमारे सभी के दिलों में छेद
कर दिए हैं। मकान खरीदते समय इस बात का कभी ध्यान ही नहीं आया कि एक दिन यही फांस
विवाद का कारण बन सकती है और सभी को तकलीफ पहुंचा सकती है। सच कहती हूं निन्नी
इसमें किसी का भी, कहीं भी दोष नहीं है। बच्चे तो मुझे दोनों
ही प्रिय रहे हैं। दोनों ही आँखों के तारे रहे हैं पर तुम सबसे लकी मानी जाती रही
हो। तुम मामा की भी अति प्यारी रही हो। अतएव मकान की रजिस्ट्री तुम्हारे नाम से
करा ली गई थी क्योंकि हम जानते थे कि इसमें बंटवारे की कभी बात ही नहीं होगी। ये
सारे कागजात तुम्हें सौंपे जा रही हूं। उचित-अनुचित जो भी जान पड़े वैसा आगे कदम
उठाना।
... तुम्हारी माँ ।
अखिलेष
मात्र एक कागज का टुकड़ा हाथ में थमाकर लौट चुका था, पर उसे लगने लगा था कि वह मात्र एक कागज का टुकड़ा न
होकर एक जीवित बम है। आशंका और कुशंकाओं के जहरीले नाग उसके मन के आँगन में
यहां-वहां विचरने लगे थे। एक ख्याल आता तो दूसरा तिरोहित हो जाता था।
उसका दिल सहज रूप से यह स्वीकार करने लगा था कि संभवत: माँ आई होगी।
उन्होंने आवाज दी होगी। दरवाजा भी खटखटाया होगा और प्रत्युत्तर न पाकर सारे कागजात
अखिलेष को सौंपकर लौट भी चुकी होगी। पर उसका अपना मस्तिष्क इस बात को मानने के फिर
कत्तई तैयार नहीं था। वह खुद भी मां को
देखकर आ चुकी थी। मां एक पिंजड़ बनकर रह गई थी। केवल सांसों का क्रमसंचय उसके
जीवित होने का प्रमाण था। वे स्वयं होकर न तो उठकर बैठ ही सकती थी और न ही करवट ले
सकती थी। ऐसी दशा में उनका यहां आना सहज ही नहीं, अपितु
असंभव ही था।
जीवन में ऐसी चित्र-विचित्र घटनाएं अक्सर घटती ही रहती है। जब दिल उसे
मानने के लिए तैयार हो जाता है तो वहीं मस्तिष्क उसे पहले ही सिरे से खारिज कर
देना है। दिल का संबंध मात्र भावनाओं से जुड़ता है। जब मन और मस्तिष्क में द्वंद्व
चल रहा होता है, तब ही आदमी शंकाओं और कुशंकाओं के पाटों के
बीच पिसता रहता है।
काफी देर तक तो वह मन और मस्तिष्क के बीच चल रहे द्वंद्व-युद्ध को तटस्थ
भाव से देखती रही थी। दिल की भावनाओं को
खारिज करते हुए उसने भैया से टेलीफोन पर संपर्क साधकर वस्तुस्थिति की जानकारी लेने
का निर्णय ले लिया था।
तेज कदमों से चलते हुए वह अंदर आई। टेलीफोन का रिसीवर उठाया और नंबर डायल
करने लगी।
दूसरी तरफ भैया थे। उनका स्वर डूबा हुआ था। दिल एकबारगी जोरों से धड़का।
लगभग फफकते हुए उन्होंने बतलाया कि पंद्रह मिनट पूर्व माँ हमें छोड़कर चल बसी है।
माँ के चले जाने और कागजात सौंपे जाने के बीच केवल पाँच मिनट का अंतर रहा
था। आज तक इस प्रश्न का उत्तर अनुत्तरित है कि क्या वे हवा पर सवार होकर आईं थीं?
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2.
रेत के घरौंदे
बारिश के
थमते ही बच्चे घर से निकलकर एक जगह इकठ्ठा होकर हो- हल्ला मचाते, पोखर में जमे पानी में उछलते-कूदते या फिर
पैरों से पानी उछालकर किसी की नेकर या फ्रॉक भिगो देते । पानी जब निथर जाता तो शेष
रह जाती ढेर सारी रेत— गीली रेत। बच्चे रेत को अपनी कोमल हथेलियों से खींचकर पैरों
पर जमाते-थपथपाते फिर धीरे से पैर खींच लेते। गीली रेत का एक घरौंदा बनकर तैयार हो
जाता। फिर उसे लकड़ी के टुकड़े से कुरेद कर दरवाजे बनाते। तालियां पीट-पीटकर अपने
खुशी का इजहार करते।
मुझे न जाने क्यों मीतू के साथ खेलना, घरौंदे बनाना
बड़ा अच्छा लगता। हम बच्चों की भीड़ से हटकर अपना बड़ा सा घरौंदा बनाते। पौधों की
छोटी-छोटी टहनियां तोड़कर बगीचा बनाते, कभी खाली माचिस को
आपस में जोड़कर रेलगाड़ी बनाते। घरौंदे के दोनों तरफ बने बड़े-बड़े छिद्रों से उसे
आर-पार कराते। मीतू भी बड़ी तन्मयता से खेलकर पूरा-पूरा साथ देती।
बादलों के छंटते ही बहुत सारा उजाला हो जाता। सूरज चमकने लगता और
इन्द्रधनुष अपनी छटा बिखेरने लग जाता।
मैं अपनी उंगली उठाकर उसकी ओर इंगित करके कहता— ''मीतू
देखो-देखो-इन्द्रधनुष देखो। " तो वह झट से मेरा हाथ पकड़कर धकेल देती और कहती,
'' इन्द्रधनुष को उंगली नहीं दिखाते- पाप पड़ता है। " मैं कभी
इन्द्रधनुष की ओर देखता तो कभी मीतू के शांत भावनात्मक चेहरे की ओर।
प्रकृति में बदलाव आ चला था। जमीन हरी-हरी घासों से पट गई थी। पौधों में
नई-नई कोपलें व फूल उग आए थे। रंग-बिरंगी तितलियाँ यहां-वहां फुदकती दिखाई पड़ती।
मैं सरपट दौड़ पड़ता और तितलियों को पकड़कर मीतू को दिखाता। वह तितलियों को मुझसे
मांग लेती और हवा में फुर्र से उड़ा देती।
क्रोध आना स्वाभाविक था। मैं शिकायत भरे लहजों में उससे कहता ये तुमने क्या किया,
बड़ी मेहनत के बाद ये पकड़ में आई थी और तुमने उसे यूँ ही उड़ा
दिया। जाओ मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलता। आज से तुम्हारी हमारी कट्टी। उसकी आँखें
डबडबा जातीं और वह अपनी कोमल-कोमल हथेलियों से अपना चेहरा ढंक लेती। उसकी इस
स्थिति पर मैं खिलखिलाकर हंस पड़ता और कहता— अरे मैं तो मजाक कर रहा था और तुम हो
कि बस बात-बात में रो पड़ती हो।
तुम सच कह रहे हो न। बड़ी मासूमियत से कहकर वह मेरा हाथ थाम लेती। मैं
विद्या माता की सौगंध खाकर उसे फौरन विश्वास में ले लेता। फ्रॉक के छोर से आंसू
पोंछते हुए वह मुस्कराने लगती।
आंगन में चटाई डालकर मैं पढऩे बैठ जाता तो वह भी अपना बस्ता पट्टी लेकर आ
जाती। रट्टु तोते की तरह हम दो एकम दो, दो-दूनी चार, दो तिया छ: चिल्ला चिल्लाकर दोहराते ताकि वह हमें कण्ठस्थ हो जाएं।
बीच-बीच में वह पट्टी पर कलम से एक आलिशान बंगला बनाती, लॉन
बनाती, बड़े-बड़े पेड़ बनाती या फिर मकान के पीछे बड़ा-सा
पहाड़ बनाकर झरना बना डालती। बड़ी-बड़ी आँखों वाली मीतू सहज भाव से मुझे ये सब
दिखाती और कहती कि हम भी एक ऐसा ही बंगला बनाएंगे जहां पहाड़ हो, नदी हो, या फिर कोई बड़ा-सा झरना। मैं भी उसकी बातों
में हामी भरकर उसकी बात का समर्थन करता।
समय पंख पसारे उड़ता चला जा रहा था। अब हमारी लंबाई भी बढ़ चली थी। कुछ
हल्की सी मूंछें भी उग आई थीं और मीतू बिल्कुल गोलमटोल सी गुडिय़ा लगने लगी थी।
उसकी देह मांसल व लुभावनी हो चली थी। हॉफ पेंट की जगह अब मैं फुलपेंट और वह साड़ी
बांधने लगी थी। लड़के लड़कियों का स्कूल अलग-अलग तो था नहीं अत: हम साथ-साथ पढ़ते।
स्कूल आना-जाना भी प्राय: साथ ही होता। जब भी किसी भी विषय में उसे अड़चन पड़ती या
उसकी समझ में नहीं आता तो वह कूदती-फांदती मेरे कमरे में आ धमकती। कुर्सी खींचकर
पास बैठ जाती और अपनी समस्याएं हल कर ले जाती।
परीक्षाएं सिर पर थीं। हमने बड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई जारी रखी। सारे
पेपर अच्छी तरह से हल किए। कुछ समय पश्चात परिणाम घोषित हुए। मुझे कक्षा में सबसे
ज्यादा नंबर प्राप्त हुए थे। दोनों परिवार खुशी में नहा उठे। जमकर मिठाइयां बांटी
गईं। सभी के चेहरों पर खुशियाँ नाच रही थीं।
गर्मियों की छुट्टी में मीतू की बड़ी माँ बड़े पिताजी बच्चों सहित आ धमके।
हमारे बातचीत के तौर तरीके, उठना बैठना खिलखिलाकर हंस पडऩा
यथावत्ï था। परंतु न जाने क्यों मीतू की बड़ी माँ के चेहरे
पर आते-जाते भावों को देखकर हम सहमे से रह जाते। एक दिन बड़ी बूढिय़ाँ आँगन में
बैठी बतिया रही थीं। मीतू की बड़ी माँ ने, मीतू की मम्मी को
टोका और मेरे साथ उठने-बैठने, आने-जाने पर आपत्तियाँ उठाईं।
बेटी अब जवान हो चली है। इस तरह उसका हँसना-बोलना अब ठीक नहीं लगता। अरे हाँ ....मीतू
की बात मैंने एक जगह चलाई है और वे लोग मीतू को देखने आने वाले हैं। श्याम से कहे
कि अब वह मीतू के साथ इस तरह घूमना-फिरना बंद करे। मीतू की बड़ी माँ, मीतू की मम्मी से कह रही थी। पास वाले कमरे में बैठा मैं अखबार पलट रहा
था। मीतू की बड़ी माँ के एक-एक शब्द खौलते हुए तेल की भांति मेरे जिस्म में गहरे
उतरते चले जा रहे थे। मीतू शायद वहीं बैठी थी शरमाकर भाग खड़ी हुई थी। मैं तैश में
आकर उठकर अपने घर चला आया। मीतू को भी ये सुनकर काफी गुस्सा आया था पर लिहाज के
मारे वह कुछ भी नहीं कह पाई थी। मीतू जब मुझसे मिली तो वह फूटफूटकर रोई। मैंने उसे
ढांढ़स बंधाया और कहा कि बड़े हमारी भलाई की ही बात हमेशा सोचते हैं। हमें इस तरह
भावावेश में नहीं आना चाहिए आदि-आदि। शाम को मैं जब खाना खा रहा था तो माँ ने बात
बढ़ाते हुए मुझसे कहा कि अब मीतू के साथ उठना बैठना बंद कर दो। अब तुम सयाने हो
चले हो, फिर दो-चार दिन बाद लड़के वाले मीतू को देखने आने
वाले हैं।
रोटी का कौर मुँह में जाए उससे पहले मेरा हाथ वहीं रुक गया। अजीब कड़वाहट
से मेरा गला भी भर आया। बिना कुछ बोले मैंने झट से हाथ धोया और बाहर निकल आया। मां
आवाज देती रही पर मैंने कोई कान ही नहीं दिया।
घर से नदी काफी दूर थी। मुझे समय का पता ही नहीं चला कि मैं नदी के तट पर
आ पहुँचा हूं। एक पत्थर पर जहां मैं और मीतू अक्सर बैठा करते थे बचपन में, आकर बैठ गया। विचारों का सिलसिला ऐसे चल रहा था जैसे मैं कोई फिल्म देख
रहा हूंगा। पता ही नहीं चला कि सूरज कब चढ़ा और कब डूब गया। अंधेरा काफी घिर आया
था। पखेरू अपने-अपने गंतव्य की ओर उड़े चले जा रहे थे। झींगुर की टिर-टिर नीरवता
को बार-बार भंग कर रही थी। उदास मन लिए मैं घर लौट आया।
माँ ने काफी मिन्नतें कीं, फिर भी मुझसे एक निवाला
भी न खाया गया और पलंग पर आकर पसर गया। विचारों की तंद्रा टूटने का नाम ही नहीं ले
रही थी। पता नहीं कब पूरी रात ऐसे ही कट गई। सुबह उठा तो आँखें लाल हो आई थीं। मां
ने टोका भी कि रात भर सोया नहीं। पर मेरे मुँह से हां या नहीं भी नहीं निकल पा रहा
था। मुँह धोकर जैसे तैसे मैं खिड़की के पास खड़ा हुआ। मीतू के घर की तरफ नजर बढ़ी
तो देखता हूं कि मीतू छिपने का प्रयास करने लगी थी। शायद वह मुझसे नजर चुरा रही
थी। अन्यथा वह वहाँ से खड़े-खड़े ही हाथ हिलाकर सुबह का अभिवादन देती थी।
अप्रत्याशित घटना ने हमें तोड़कर रख दिया। कुछ ऐसा सा लगने लगा कि वक्त
आकर ठहर गया है जो काटे नहीं कटता था।
जब भी मैं उसके सामने पड़ जाता वह दुबककर एक ओर हट जाती। मेरे यहां उसका
आना एकदम बंद-सा हो गया था। उसके चेहरे की भाषा को मैंने कई बार पढऩा चाहा पर वह
थी कि एक बार भी सामने ठहर नहीं पाती।
दो-चार दिन बाद उसके यहां मेहमान आने वाले थे। घर को बड़ी अहमियत से
सजाया-संवारा जा रहा था। पर्दे ठीक किए जा रहे थे। सोफे के सेट बदल दिए गए थे।
मीतू के बाबूजी बड़े करीने से चीजों को यहां-वहां सजा रहे थे। मैंने आगे
बढ़कर उनके काम में हाथ बटाना चाहा। बाबूजी अनमने से अपने काम में लगे रहे। अपने
को संयत रखकर मैंने उनसे दबी जुबान में पूछा कि बाबू जी ये सब क्यों हो रहा है?.
सूखा गला साफ करके उन्होंने बताया कि आज मीतू को देखने मेहमान आने वाले
हैं। सहजता से मैंने उनसे कहा कि बहुत अच्छी बात है। मेहमानवाजी में मैं भी आपका
साथ दूंगा। मेहमानों को किसी भी प्रकार से कष्ट नहीं होना चाहिए। इस बात पर पलट कर
बाबूजी ने अपनी कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
नियत समय पर मेहमान आए। मीतू को खूब सजाया-संवारा गया
था। उसके जूड़े में मोगरे की वेणी गूंथ दी गई थी, भौंहों को करीने से संवार कर पाउडर, लिपिस्टिक आदि लगाकर इतना सुन्दर मेकअप किया था कि बस देखने वाला देखते ही
रह जाए। एक सोफे पर मीतू की मां, उसके बाबूजी, दूसरे पर लड़के की माँ, उसके पिताजी व वह लड़का
विराजमान था। एक तीसरे सोफे पर मेरी माँ और पिताजी बैठे थे।
मीतू की माँ ने कांपते होंठों से मीतू को आवाज लगाई। वह गुडिय़ा सी
सहमी-सहमी सी चाल चलते हुए, हाथ में नाश्ते व चाय की ट्रे
लिए हुए कमरे में आई। उसकी चाल को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे हिरनी किसी सिंह के
पास जा रही हो। ट्रे का बैलेन्स गड़बड़ा-सा गया जो मुझसे देखा नहीं गया और मैंने
लपककर ट्रे सम्हालकर टेबिल पर जमा दिया। मीतू को चाय व नाश्ता लगाने के लिए उसकी
माँ ने कहा। कांपते हाथों से मीतू नाश्ता लगाने लगी। माँ ने अपनी लड़की की तारीफ
में पुल बांधने शुरू कर दिये— " ये सारा नाश्ता मीतू ने ही खुद बनाया है।"
कांपते हाथों से मीतू ने नाश्ते की प्लेट
मेहमानों की ओर बढ़ायी पर नजर उठाकर आगन्तुकों की ओर पल भर भी नहीं देखा। वह सब
यंत्रवत करती रही जैसा कि उसे दो-चार दिन पहले से ही घुट्टी देकर पढ़ाया गया था।
लड़के की माँ ने बड़ी देर बाद मुँह खोला, 'बहन जी
हमें आपकी लड़की पसंद है। कितनी सुंदर जोड़ी बनेगी हमारे श्याम से। " मीतू की हालत देखने लायक थी। वह बड़ी हिम्मत
जुटाने के बाद भी अपनी नजरें ऊपर नहीं उठा पायी और उठकर अंदर चली गई।
मुझसे भी ये सब नहीं देखा जा रहा था। मैं भी उठकर घर आ गया। माँ पिताजी
मेहमान आदि बातों में निमग्न हो गए। पता नहीं उनमें क्या बातें होती रहीं।
बाद में पता चला कि लड़का एयरफोर्स में किसी ऊँचे पद पर है। अच्छी खासी
तनख्वाह व बंगला भी उसे मिला है और भी तरह-तरह की बातें। परंतु न जाने क्यों इन
बातों से मुझे मितली सी आ रही थी। घंटे दो घंटे बाद मेहमान अभिवादन कर विदा मांगने
लगे और अपनी फिएट में बैठकर रवाना हो गए। मीतू का घर खुशियों से भर गया। दो चार
बड़ी बूढिय़ां व पास-पड़ोस की औरतें जम गईं और ढोलक की थाप उठने लगी। मंजीरे
घनघनाने लगे।
पता नहीं कैसे, क्या हुआ मीतू को अचानक तेज बुखार ने
जकड़ लिया। तेज बुखार में न जाने क्या-क्या वह बड़बड़ाती रहती। डाक्टर पर डाक्टर
बुलाए गए पर बुखार भी जबरदस्त था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।
वह कई दिन तक बीमार पड़ी रही। लोग कह रहे थे कि शायद इसे डिप्थेरिया हो
गया है। मैं भी उसे देखने बार-बार जाता। जब भी वह पीड़ा से छटपटाती मेरा मन भय से
कांप जाता। उसने एक बार आंख खोली और मुझे सामने पाकर न जाने क्या सोचने लगी। उसकी
बड़ी-बड़ी आँखों से आंसू बहकर कनपटी पर बहने लगे। उसने बड़ी मुश्किल से अपनी हिचकी
को सम्हाला और होंठ भींचकर आँखें बंद कर लीं।
काफी निदान के बाद पता चला कि मीतू की जबान हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गई
है। वह गूंगी हो गयी है। ये खबर पाकर उसके परिवार का सब्र का बांध टूट गया। किसी
के कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब कैसे एकदम घटित हो गया। समय खुद एक बहुत
बड़ा वैद्य होता है जो समय-असमय, वक्त बेवक्त पर बड़े-बड़े
घाव पैदा करता है और भर भी देता है। बड़ी-बड़ी मुसीबतें बनकर सामने खड़ा होता है
फिर उसका निदान भी निकाल देता है।
मीतू अब एकदम ठीक हो गयी थी पर उसकी जबान हमेशा के लिए बंद ।
एक अंतराल के बाद मीतू के पिता ने अपने होने वाले समधी को पत्र डालकर अवगत
कराया। वैसे मीतू के स्वास्थ्य के बारे में मीतू के पिताजी ने अपने समधी को पत्र
लिखा था परंतु पत्र का जबाव नहीं आया। ऐसा हादसा घट जाने के बाद मीतू के पिताजी ने
एक पत्र फिर डाला जिसमें मीतू के गूंगी हो जाने के बारे में विस्तृत जानकारी थी।
वे खुद तो नहीं आए पर उनकी तरफ से दो टूक जवाब वाला एक पत्र आया जिसमें
उन्होंने इस रिश्ते को इंकार करते हुए लिखा कि वे अपने इकलौते लड़के की जिंदगी
किसी गूंगी अपाहिज से जोड़कर सत्यानाश नहीं कर सकते और इस रिश्ते को वे
हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाने को कहा।
एक बड़ा आघात तो वे ये सोचकर सह गए थे कि मीतू की बात तय हो चुकी थी और इस
सबके बाद भी वे रिश्ता नहीं तोड़ेंगे। परन्तु इस अप्रत्याशित आघात को वे दोनों सहन
नहीं कर पाए और सिसक-सिसक कर रो पड़े। मीतू भी जोर-जोर से रो पड़ी थी।
जी में आया कि ऐसे लोगों की जबान ही काट लेनी चाहिए या फिर कंधे से हाथ जो
किसी को न तो सांत्वना की बात ही कह पाते हैं, न दिलासा भरी
बातें ही लिख पाते हैं। क्रोध का भयानक चक्रवात मेरे अंदर उठा और शांत हो गया यह
सोचकर कि सचमुच मैं उनका कौन होता हूं जो अकारण इन सब बातों में अपना क्रोध
उतारूं।
समय बीतता गया। वक्त मरहम लगाता रहा और एक अन्तराल बाद आया तूफान कुछ शांत
सा हुआ। सामान्य सी स्थिति बनी। मीतू के माँ- बाप अपनी बेटी के इस दुख को चुपचाप
पीते रहे। वे अब उसके सन्मुख नहीं आ पाते थे और न ही उसके सामने अपने दु:ख का
इजहार कर पाते थे।
समय बदला, गर्मी बीती, बारिश
आई। आसमान बादलों से पटा पड़ा था। बड़ी जोर से बिजली कड़की और तेज बारिश शुरू हो
गई। पानी इतनी तेजी से बरस रहा था कि लगता था कि समूची धरती बहा ले जायेगा। कुछ
देर बाद बारिश थमी। बच्चों का एक जुलूस चिल्ल-पों मचाता हुआ अपने-अपने घर से
निकला। डोबरे में थमे पानी में उछलकूद शुरू हुई। कोई पैर से पानी उछालता तो कोई
अलग ढंग की शरारत करता। एक जगह काफी रेत इकठ्ठी हो गई थी। बच्चे मिलकर अपने-अपने
घरौंदे बना रहे थे तो कोई बाग-बगीचा तो कोई छक-छकाकर रेलगाड़ी इस बोगदे से निकालकर
उस बोगदे में ला-ले जा रहा था।
बारिश के थमते ही मैं अपनी खिड़की में जाकर खड़ा हो गया। सामने देखता हूं
कि मीतू भी खड़ी बच्चों के खेल को देखकर अपनी बीती बातें याद कर रही थी। शायद वह
भी बड़ी देर से खड़ी होगी पर मुझे तो वह बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ी शायद तेज बारिश व
कुहरे के कारण ये संभव हो सकता है। कुहरा छंट चुका था उसने मेरी ओर देखा मैंने
उसकी ओर देखा। उसने घरौंदे बनाते हुए बच्चों की ओर इशारा करते हुए इंगित किया कि
हम भी कभी ऐसे ही घरौंदे बनाया करते थे।
मेरे अंदर एक प्रकाश-सा कौंधा। मैं लपककर मीतू के घर दौड़ पड़ा और आकर
उससे लिपट फूट फूटकर रोने लगा। मीतू भी रो पड़ी, और मुझसे
आकर लिपट गई। जैसे कोई बेल किसी पौधे से लिपट जाया करती है। मैं खुद भी नहीं जानता
ये सब कैसे क्या हो गया। रोने की आवाज सुनकर उसकी माँ बाबूजी भी आ गए।
एक दूसरे को आलिंगनबद्ध पाकर वे सकुचा से गए होंगे। एक आहट सी पाकर हम
छिटक गए। मैंने तुरंत ही जाकर मां और बाबूजी के चरणस्पर्श करते हुए मीतू की भीख
मांगी, और कहा कि वह मुझे निराश नहीं करेंगे।
दोनों बिना किसी संवाद के एक दूसरे को देखते रहे और फिर मुझे उठाकर अपनी
छाती से चिपका लिया बाबूजी ने। स्वीकृति की मुहर उन्होंने सिर हिलाकर हमें दी।
उनकी आँखों से आंसू झरे जा रहे थे। शायद वे खुशी के आँसू थे।
बाहर आसमान एकदम साफ था। नहाए हुए सूरज की चमक अपनी छटा बिखेर रही थी।
इन्द्रधनुष उग आया था। मैंने फिर अनजाने में
ऊँगली उठाकर मीतू को बताना चाहा पर उसने मेरे उठते हुए हाथों को बीच में ही
रोक लिया। शायद वह कहने जा रही थी इन्द्रधनुष को ऊँगली मत दिखाओ, पाप पड़ेगा।
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3
धनिया
भिनसारे उठ
बैठती धनिया और बाउण्ड्री वाल से चिपकर खड़ी हो जाती। उसकी खोजी नजरें, पहाड़ों की गहराइयों में अपना गाँव खोजने में
व्यस्त हो जातीं। गहरे नीले-भूरे रंग के धुंधलके की चादर ताने, जंगल अब तक सो रहा था। इक्का-दुक्का चिडिय़ा फरफरा कर इस झाड़ से उड़ती और
दूसरी पर जा बैठती। सोचती, आज तो कड़ाके की ठंड है। पंखों को
फुलाकर वह अपने शरीर को गर्माने लगती।
काफी देर बाद सूरज उगा। उनींदा सा। अलसाया सा। थका-थका सा। पीलापन लिए
हुए। जंगल में अब भी कोई हलचल नहीं हो रही थी। चारों तरफ सन्नाटा, मौत की सी खामोशी लिए पसरा पड़ा था।
सूरज अब थोड़ा ऊपर उठा। उसकी किरणों में अब तीखापन आने लगा था। धुंधलका अब
पिघलने सा लगा था। तिस पर भी गांव दिखलाई नहीं पड़ा। नजरें गड़ाकर उसने यहां वहां
चलने का प्रयास किया तभी धुएं की एक पतली सी रेखा आसमान की ओर उठती दिखलाई पड़ी,
उसने सहज ही अन्दाजा लगा लिया कि वहीं कहीं आसपास उसका अपना गाँव
होगा, तभी एक बड़ी सी चील सरसराती हुई उसके करीब से गुजरी और
देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गई।
उसे अपनी माँ की याद हो आयी। गर्मी के दिनों में महुआ खूब फलता था। साल भर
खाने पुरता इकठ्ठा कर लेती वह। फिर आँगन में फैलाकर सुखाती और फिर एक बड़े से
मंधुले में भरकर रख देती। जब चारों ओर मूसलाधार बारिश हो रही होती तो वह मिट्टी की
हांडी में पकाती। बापू को दारू पीने का बड़ा शौक था, एक बड़े
से मटके में महुआ सड़ाता। फिर आग पर चढ़ाकर पोंगली लगाता। गरमागरम बूंदें नली से टपाटप
टपकने लगतीं। जब ढेर सारी इकठ्ठी हो जाती तो देवी-देवताओं के नाम चढ़ाना कभी नहीं
भूलता।
सांझ के गहरा जाने के साथ ही चांद भी निकल आया। सब लोग धीरे-धीरे एक जगह इकठ्ठा
होने लगे। बापू आले में से मटका उठा लाता। एक दोना भर दारू उसने देवता पर उड़ेला।
फिर बारी-बारी से सभी स्वाद चखने लगे। बूढ़े-मरद, औरतें,
यहाँ तक कि बच्चे भी दारू गटकते। जब सिर पर अच्छा खासा नशा सवार हो
जाता तो वह टिमकी उठा लाता। कोई झांझर उठा लाता तो कोई तुरही। बापू टिमकी गजब की
बजाता है। बीच-बीच में दोहरे डाले जाते और टिमकी की टिमिक-टिमिक पर सभी औरत-मर्द
एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरकने लग जाते। वासना से कोसों मील दूर जनजातियां
इसी तरह के उत्सव मनाया करते रहती हैं।
एक दिन माँ आंगन में बैठी, महुआ सुखा रही थी,
तभी बच्चों का एक हुजूम हो-हल्ला मचाता हुआ उधर से आ निकला। मां को
अकारण ही क्रोध आ जाता है। वह बच्चों को मारने दौड़ पड़ी. इस अप्रत्याशित घटना से
भीड़ बिदक गई.। बच्चे तितर-बितर होकर पहाड़ उतरने लगे । धनिया भी भला, पीछे रहने वाली कहां थी। वह भी भीड़ का हिस्सा बनी पहाड़ उतरने लगती है।
पहाड़ उतरते समय उसे ऐसा लगता है कि वह चील बनी आकाश में उड़ रही है, उसके दोनों हाथ दाएं-बाएं फैल जाते हैं। अपने डैनों को विभिन्न मोड़ देते
हुए वह पहाड़ उतरने लगती है और एक विशेष प्रकार की आवाज निकालने लगती है।
भीड़ देनवा के तट पर आकर ठहर जाती है। दूर-दूर तक फैली रेत पर बच्चे पसर
जाते हैं और थकान मिटाने लगते हैं। कल्लू को पता नहीं क्या सूझा। उसने अपनी कोपिन
उतार फेंकी और गहरे पानी में छलांग लगा दी। फिर क्या था देखा-देखी सब वैसा ही करने
लगे।
जी भर कर तैरते-उतराते रहने के बाद लग आती भूख। दो-दो, तीन-तीन की टोलियां बनाई जातीं। टोलियां अब चारों ओर बिखर जातीं। जब वापिस
होतीं तो किसी के हाथ में कंदमूल-फल होते, तो कोई महुआ ही
बीन लाती। ढेर सारी खाने की चीजें एकठ्ठी हो जातीं। तब लकड़ी-कण्डा बीनने लग जाते।
जब अच्छा-खासा ढेर इकठ्ठा हो जाता तो चकमक से आग पैदा की जाती और ढेर में लगा दी
जाती। लाल-लाल दहकते अंगारों पर चीजें भूनी जाने लगतीं। भुने हुए महुए की मादक गंध
से भूख और करारी हो उठती। आग खूर-खूरकर दोनों हाथों से बंदरों की तरह खाने भिड़
जाते। जब हलक तक पेट भर जाता तो प्यास सताने लगती। टिंगरा-टिंगरा पानी में उतर कर,
पसो से पानी पीने लग जाते। खेल ही खेल में पता नहीं चल पाता कि सूरज
सिर पर चढ़ आया है . अब घर की याद सताने लगती। भीड़ अब अपने घरों को लौट पड़ती।
धनिया ने एक वृक्ष की ओर देखा। मां बाहर ही बैठी हुई है। लकड़ी का टुकड़ा
अब भी पास पड़ा था। आज जमकर धुनाई होगी, उसने मन ही मन सोचा।
एक डर गहरे तक उतर आया जिसने उसे लगभग कंपा ही दिया। घर तो पहुँचना ही पड़ेगा,
चाहे पिटाई ही क्यों न हो जाए। यह सोचते हुए वह आगे बढ़ती रही। मां
ने उसे लौटते देखा। अपनी टोकनी उठाई और आगे बढ़ गई।
धनिया को मालूम है कि माँ इस वक्त कहां जायेगी। वह सीधे खेत पहुंचेगी जहां
बापू और दादू उसका इंतजार कर रहे होंगे। वह बड़ी सुबह ही खेत चले जाते हैं,
खेत यही कोई ढाई तीन एकड़ का होगा, जिसमें वे
हल-बख्खर चलाकर बोआई के लिए तैयार करेंगे। बापू इस बीच लकडिय़ां काट लेता है,
कभी-कभी चार-चारोली भी इकठ्ठी कर लेता है। हाट के दिन वह इन्हें
बेचेगा। धनिया भी बापू के पीछे-पीछे हाट जाती है। जब भी वह हाट जाती है, गोलू हलवाई की दुकान से गुड़ की जलेबियाँ खाना नहीं भूलती। रकम अच्छी मिली
तो चूड़ी कंघा-रिबिन का भी सेजा जम जाता है अथवा एकाध फ्राक व्राक का भी। गुड़ की
जलेबी की याद आते ही उसके मुँह में मीठास घुलने लगी।
दोनों को दूर से आता देख वे खेत से निकलकर एक सघन वृक्ष के नीचे बैठकर
सुस्ताने लगते हैं। मां धीरे से अपनी पोटली खोलती है। ज्वार-बाजरा अथवा महुआ की मोटी-मोटी
रोटी सभी के हाथ में पकड़ाते जाती है फिर उस पर टमाटर की चटनी अथवा बेसन या फिर
प्याज हरी मिर्च व नमक रख देती है। हौले से निवाला तोड़कर वे मुँह में भरकर चबाने
लगते हैं। जब पेट भर जाता है तो नारियल की नरेटी से पानी लेकर अपनी प्यास बुझाते
हैं। धनिया को भूख तो थी नहीं, अत: वह ना-नुकुर करने लगती
है। उसकी नजरें तो मचान से चिपकी हुई थीं, पलक झपकते ही वह
मचान पर जा चढ़ी और बंदरों की सी हरकतें करने लगी। दादू ने एक मचान बना रखा था खेत
में। फसल जब लहलहा रही होती है तो दादू उस पर बैठकर जागली करता है। गोफन भी चलाता
है। गोफन से छूटा पत्थर बड़ी तेजी के साथ सूअर के थूथने पर पड़ता है तो वह भयंकर
चीख के साथ भाग खड़ा होता है। जंगली सूअर से खेतों को ज्यादा ही नुकसान होता है।
शाम ढलने से पहले सभी घर लौट आते। बैलों को कोठे में बांधकर बापू उनको चारा-पानी
डालता है। फिर बाप-बेटे दोनों ओसारी में बैठकर बतियाने लगते हैं। बतियाते हुए
धुक-धुक करके बीड़ी का धुआं भी उगलते जाते हैं। वैसे दादू को चिलम पीना कुछ ज्यादा
ही अच्छा लगता है।
माँ आले में रखा भपका जला देती है। पीली-पीली रोशनी से झोंपड़ी नहा उठती
है। अब वह चूल्हा जलाकर आटा रांधने लगती है। खाना खा चुकने के बाद सभी अपनी
कथड़ी-गोदड़ी में दुबक जाते हैं। माँ भपका बुझा देती है। भपके के बुझते ही
काला-कलूटा अंधियारा झोंपड़ी में घुस आता है। माँ के पास ही सोती है धनिया। सोते
समय खुरदरी हथेलियों से सिर को सहलाती और बालों में ऊँगलियाँ चलाती रहती। बीच-बीच में किसी जंगली
जानवर का गुरगुराना तो कभी जंगल के राजा का दहाडऩा सुनाई दे जाता। शेर की दहाड़
सुनकर वह माँ के सीने से चिपक जाती। माँ के धड़कते दिल की आवाज उसे साफ-साफ सुनाई
पड़ती। जब आदम जात का सोने का वक्त होता है जो जंगली जानवर के जागने का वक्त हो
जाता है। जंगली जानवर रात में शिकार पर निकल पड़ते हैं। उनींदे से हो आए लता-वृक्ष
शेर की दहाड़ सुनकर चौंक-चौंक पड़ते हैं। डरे सहमे से ये वृक्ष शायद ही अच्छी नींद
में सो पाते होंगे। शेर जब ऊपर मुँह करके दहाड़ता है तो डाल पर बैठा मोर अथवा बंदर
मारे डर के टपक पड़ता है। और शेर का शिकार हो जाता है। बापू ने झोंपड़ी के चारों
ओर कांटों का सघन बाढ़ लगा दिया था ताकि कोई जानवर अंदर न घुस आए। बाड़ी के उस पार
कभी किसी जंगली जानवर की गोल-गोल कंचे की सी आँखें चमकती दिखलाई दे जातीं। आँखें
ऐसी चमकतीं जैसे अंधेरी रात में कोई हीरा जगमगा रहा हो। मां उसे हिम्मत बंधाने की
गरज से यह सब दिखाने की कोशिश करती। पर वह उसके सीने से जोर से चिपट जाया करती।
पूरा परिवार सूरज की पहली किरण के साथ ही जाग जाता। जम्हाते हुए धनिया उठ
बैठती और आंखें मलते हुए प्रकृति का नजारा देखने लग जाती। लाल-पीले सुनहरे रंग से
जंगल मुस्कराने लगता। पहाड़ों की ऊँचाइयों से उतर रही देनवा का पानी ऐसे लगता जैसे
सोना पिघलकर बहा जा रहा हो।
खुशनुमा सुबह नहीं थी आज की। भयमिश्रित मातमी एकांत में भीगी हुई थी। दादू
को तो जैसे काठ मार गया था। माँ के अंदर गहरे तक मोम ही जम आई थी। दादू से
गिड़गिड़ाते हुए उसने कारण जानना चाहा तो उसकी बूढ़ी आँखों से टपाटप आँसू बह निकले
और जब वह माँ के पास पहुँची कारण जानने, तो बजाय कुछ कहने के
उसने उसे सीने से चिपका लिया और फफक कर रो पड़ी। वह लगातार रोए जा रही थी। शंका और
कुशंकाओं के जहरीले नाग उसके कोमल मन में, आंगन में, यहां वहां विचरने लगे थे। जब माँ ने जी भर रो लिया और बतलाया कि उसका बापू
पहाड़ी के उस पार गया, लौटकर नहीं आया। लगता है कि किसी
चुड़ैल ने उसे फंसा लिया है। चुड़ैल तक तो बात ठीक थी पर 'चुड़ैल
ने फंसा लिया है. यह जुमला उसकी समझ में
नहीं आया। उसने फंसाने का अर्थ माँ से पूछा, तो उसने एक ही
उत्तर दिया कि जब बड़ी हो जायेगी, तो खुद-बखुद समझ जायेगी कि
फंसाना क्या होता है। अपनी सहेलियों एवं मित्रों से उसने इस गुत्थी को सुलझाना
चाहा, पर असफलता ही हाथ लगी थी, वह
बार-बार सोचती कि बापू पहाड़ी के उस पार क्या करने गया होगा।
तभी उसे
ध्यान आया कि एक दिन दादू ने कहानी बतलाते हुए कभी बतलाया था कि पहाड़ी के उस पार
किसी रानी का राज है। वहां मरद नाम का कोई प्राणी नहीं रहता। उसकी फौज-फटाका में
भी औरतें ही रहती हैं। यदि कोई मरद धोखे से उस ओर चला गया तो जिन्दा वापिस नहीं
लौटा है। यह ठीक है कि बापू वहां चला गया होगा, रानी ने बापू को फंसा लिया होगा। पर फंसाया किस चीज से होगा, उसकी समझ में नहीं आया। अब वह माँ के कथन के अनुसार बड़ी होने की सोचने
लगी। धनिया अब सुबह-शाम माँ के पल्लू से ही चिपकी रहती। अंदर से बरफ की- सी ठंडी
हो चुकी माँ की उसे अब ज्यादा ही चिन्ता रहती। बापू वापिस आ जाये, इस वास्ते उसने न जाने कितने ही देवी-देवताओं की मिन्नतें मांगी थीं। पर
बापू जो गया तो लौटकर नहीं आया। एक दिन वह ओझा के घर जा पहुँची।
ओझा के घर में घुसने से पहले एक तीखी-बदबूदार गंध उसकी नाक से आ टकराई।
इससे पहले उसने ऐसी गंध नहीं सूंघी थी। अंदर प्रवेश करते ही उसने देखा कि चारों
तरफ जानवरों की खालें एवं ढांचे लटके पड़े थे। ओझा एक ऊंचे से चबूतरे पर बैठा हुआ
था और उसके ठीक सामने, एक धूनी जल रही थी, तथा पास ही इंसान की खोपड़ी व हड्डियां पड़ी थीं। लाल-पीले-काले रंग से
उसने अपने चेहरे को और भी वीभत्स बना डाला था। मां को देखते ही उसने बड़बड़ाना
शुरू कर दिया और आंय-बांय बकते हुए, उसने मुठ्ठी में कुछ
उठाया और आग पर दे मारा । एक काला बदबूदार धुँआ ऊपर-ऊपर तक उठ आया। डर के मारे
उसकी तो घिग्घी ही बंध गई थी। उसने माँ की ओट लेते हुए बचने का प्रयास किया। माँ
अब जमीन पर बैठ गई और अपना दुखड़ा सुनाने लगी। वह बार-बार हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती
और कहती, जो भी मांगोगे दूंगी, पर
धनिया के बापू को वापिस बुला लो।
ओझा, अब अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही, जोर-जोर से उछलकूद करने लगा। पता नहीं, क्या-क्या
अर्र-सर्र बकता जाता। धनिया ने गौर से देखा कि उसकी कामुक नजरें माँ के जिस्म से
बुरी तरह चिपकी हुई हैं। माँ के शरीर पर भरपूर गोश्त था। सिर के बाल जमीन से छू
रहे थे। वक्ष उन्नत व कठोर थे। साड़ी से कमर तक ढंकने के बाद, उसने शेष साड़ी से पीठ और वक्ष ढक रखा था। इतनी गोरी-चिट्टी थी माँ कि
उसके जैसी दूसरी कभी देखने में नहीं आई। हमारी जाति में औरत, मरद सभी काले कलूटे रहते हैं। बापू उसे प्यार से गोरी-कबूतरी जो कहा करते
थे। ओझा ने हूँ-हाँ-हूँ-हाँ बकते रहने के बाद उसे रात में आने को कहा और यह भी कहा
कि इस लौंडिया को साथ लेकर न आए। कुछ विशेष जतन करना होगा, तीसरे
दिन तेरा मरद वापिस आ जायेगा। रात में बुलाने का मतलब कुछ-कुछ उसकी समझ में आ रहा
था। फिर भला माँ को तो अच्छी तरह समझ में आ ही गया होगा। माँ दुबारा पलटकर वहाँ
नहीं गई और न ही उसने कभी जाने का मानस ही बनाया।
बापू के जाने के बाद से, माँ में एक कठोरता घर कर गई
थी, जो उसके व्यवहार से साफ झलक भी आया करती थी। अंदर तक वह
इतने क्रोध में भरी हुई होती थी कि जब वह किसी लकड़ी के लठ्ठे पर, कुल्हाड़ी का भरपूर वार करती तो वह फक से दो टुकड़ों में बंट जाता था। एक
दिन वह लकड़ी काटने जंगल में घुसी तो आदमखोर के हत्थे चढ़ गई। लोगों ने जंगल की
खाक छान मारी, पर माँ का कहीं भी पता नहीं चला। कुछ दिन बाद
उसके शरीर का पिंजड़, एक ऐसी जगह मिला, जहां आम आदमी का पहुँच पाना संभव नहीं था।
माँ और बापू के इस तरह चले जाने के बाद से दादू और व्यथित सा रहने लगा।
उसके मन में अब एक ही आस बची थी कि वह किसी तरह उसके हाथ पीले कर दे और चैन से मौत
को गले लगा ले। पर क्या वह उसके बस में था। समय पंख लगाकर उड़ता रहा। दादू के
कलेजे में लगे जख्म शायद ही भर पाए होंगे। इसका अहसास उसे भी बराबर बना रहता। वह
खुद भी दोनों के वियोग में कितना तड़पती रहती है, यह तो उसका
अपना दिल ही जानता है।
दादू की देखरेख करते, घर का कामकाज सम्हालते,
उसे पता ही नहीं चल पाया कि बचपना रेंगकर कब जवानी की देहलीज पर आ
पहुँचा। बूढ़ी हड्डियाँ कब तक जोर मारतीं। एक बार वह बिस्तर से जा लगा, तो दुबारा उठ न पाया।
दिन पर दिन गिरती उसकी हालत को देखकर चिन्तित हो उठी वह। अगर उसका दादू
यूं ही चल बसा तो उसका क्या होगा। यह ख्याल उसे बेचैन कर देता। अपने दादू के लिए
वह कुछ भी करने को तैयार थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। बिस्तर पर पड़ा दादू
हिचकियाँ ले रहा था। जब वह सांस लेता तो खर्र-खर्र की आवाज आती जो दूर तक सुनाई
पड़ती। असह्ïय दर्द से वह बीच-बीच में चीख भी पड़ता था।
धनिया के जी में आया कि दौड़कर ओझा को बुला लाए। शायद उसका जन्तर-मन्तर
कुछ काम आ जाए और दादू बच जाये, तभी उसको पिछली घटना याद हो
आई। माँ भी तो गई थी ओझा के पास। बापू को वापिस लिवा लेने के लिए। माँ के गदराए
जिस्म को देखकर वह किस प्रकार की हरकतें करने लगा था। उसे आज भी याद है। तभी उसकी
नजर अपने समूचे जिस्म पर दौड़ पड़ी। माँ ही के जैसी तो दिखती है वह भी। उसने उसके
ही जैसा जिस्म पाया है, जो कपड़े में नहीं समा पा रहा है।
फिर साड़ी तो चिन्दी-चिन्दी हो आयी है और फटी जगह से उरोज बाहर तक उचक आए हैं।
क्या ऐसी हालत में उस दरिन्दे के समीप जाना उचित होगा उसका। तरह-तरह के प्रश्नों
के पहाड़ खड़े हो गए थे उसके सामने जिसके उस पार जाने की वह न तो हिम्मत जुटा पाई
और न ही उसमें उतनी सामथ्र्य थी। असमंजस की स्थिति में उसे डाक्टर का ध्यान हो
आया। आशा की एक किरण कौंधी और बारिश के थमते ही वह सरपट दौड़ पड़ी डाक्टर को लिवा
लाने। घिर आई सांझ में उसके मन में न तो किसी हिंसक पशु के खौफ का ही डर समाया और
न ही कंटीली ऊबड़-खाबड़ रास्तों की चुभन। वह सरपट बिना रुके ही चली आई थी, डाक्टर को लिवा लाने। वह तब तक दौड़ती रही जब तक डाक्टर का मकान नहीं आ
गया।
अजीब खब्ती किस्म का था यह डाक्टर। शहरों की चकाचौंध से दूर वह इस बीहड़
में चला आया था। शोषित-पीडि़त-अज्ञानी आदिवासियों की सेवा करने का जुनून सवार था
उसके सिर पर। चढ़ती दोपहरी तक वह अपने दवाखाने में इलाज करता फिर पहाड़ों की तलहटी
में बसे गाँवों में घुस पड़ता। ऊबड़-खाबड़ रास्तों के बीच चलता। कभी उसका वास्ता
जंगली जानवरों से भी पड़ता। पर वह निर्भीक अपनी ही धुन में रमा रहता। दिन में
दो-चार गाँवों की फेरी लगा लेना उसकी आदत सी बन गई थी। पत्नी-बच्चे और मां भी उसने
ऐसे ही पाये थे जिन्हें आदिवासी जनजीवन से गहरा लगाव था।
अपने ही विचारों की तंद्रा में खोई थी धनिया। तभी उसकी नजर बाउण्ड्री वाल
से ठीक सटकर, पहाड़ों के उतार में उतर रही पगडण्डी पर पड़ी।
उसने सहज में ही अंदाजा लगा लिया कि यह वही पगडण्डी है, जिस
पर चलकर वह यहाँ दूसरी बार आई थी। पहली पहल जब, उसका दादू
सख्त बीमार पड़ गया था और दूसरी बार वह डाक्टर के साथ चली आई थी सदा-सदा के लिए
दुबारा वापिस न लौटने के लिए।
दादू के मरने की खबर प्राय: आसपास के सभी गांवों में फैल गई थी। आहत ओझा
ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाने की सोची। अपने दो-चार लग्गू-भग्गूओं के साथ वह आ
धमका था। क्रोध से भरा हुआ वह थर-थर कांप भी रहा था। प्राय: सभी के हाथ में कोई न
कोई हथियार था। आते ही उसने डाक्टर को घेर लिया और उपस्थित समुदाय को उसके विरुद्ध
भड़काने लगा। उसका अपने हक में ऐसा किया जाना भी शायद अनिवार्य था क्योंकि उसका
फलता-फूलता धंधा एकदम चौपट जो हो गया था। आदिवासी लोग अब उसके पास न जाकर, सीधे डाक्टर के पास चले जाया करते थे। बीमार पडऩे पर वहां उन्हें दवा-दारू
भी मिलती और वे शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ पा लेते थे। डाक्टर की पत्नी आदिवासी
बच्चों को पढ़ाती थी। शायद यही कारण था कि इस दम्पति के आने के बाद से इनके जीवन
स्तर में अच्छा खासा परिवर्तन आ गया था। इस बात को रेखांकित करना भी लोग नहीं भूले
थे। शायद यही कारण था कि उसके भड़काऊ भाषण का किसी पर भी असर नहीं पड़ा था बल्कि
लोगों ने उसके विरुद्ध मुँ खोलना भी शुरू कर दिया था। अपने ही समाज में, जहाँ उसे सिर आंखों पर बिठाया जाता था आज बेइज्जत किया जाने लगा था।
डाक्टर के बढ़ते प्रभाव व अपनी घटती इज्जत से वह बुरी तरह बौखला सा गया था और अंदर
गहरे तक आहत भी हो उठा था।
सारे क्रियाकर्म निपट जाने के बाद वह डाक्टर के साथ हो ली थी। दादू की
स्वयं की भी यही इच्छा थी कि वह डाक्टर के साथ चली जाए। दादू के मन में एक अज्ञात
भय ने घर कर लिया था कि वह अकेली इस बीयावान में कैसे रह पायेगी। अत: मरने से पहले
उसने लडख़ड़ाती जबान से डाक्टर से अनुनय किया था कि वह उसे अपने साथ ले जाये— रूखा-
सूखा जो भी इसे मिलेगा खाकर रह लेगी और घर के कामकाज कर देगी। आश्वस्त होने के बाद
ही बुड्ढे ने अपने प्राण त्याग दिए थे। डाक्टर जब उसे अपने साथ लिवा लेने लगा तब
भी ओझा ने खासा विरोध किया परन्तु उसे असफलता ही हाथ लगी थी। बदला लेने की
प्रतिज्ञा के साथ ही वह जंगल में समा गया था।
ओझा के रौद्र रूप का ख्याल आते ही वह आशंकित हो उठी थी। उसकी आशंका कुछ
ज्यादा ही बलवती हो चली थी कि ओझा, डाक्टर से भी बदला जरूर
लेगा। अत: डाक्टर को भी चाहिए कि वह अकेला घाटी में न उतरे बल्कि अपने साथ किसी न
किसी को लेकर अवश्य चला करे।
पहाड़ों की गहराई में नजरें झुकाए धनिया अपने अतीत के भंवर में गोते खा
रही थी। पता नहीं, वह और कितनी देर पाषाणी प्रतिमा बनी बैठी
रहती यदि दादी आकर उसे झकझोर न देती।
जब तक अपने ठाकुर जी की पूजा पाठ और रामायण का एक मास पारायण नहीं कर लेती
दादी तब तक वह अनाज का एक दाना भी हलक के नीचे नहीं उतारती थी। पूजा पाठ समाप्त कर
उन्हें भूख भी लग आई होगी और उन्होंने मुझे ढूँढऩा शुरू किया होगा। जब पूरा घर छान
मारा उन्होंने और मुझे कहीं नहीं पाया होगा तो वे चिन्तित अवश्य हो उठी होगी और
मुझे यहाँ खड़ा पाया तो चली आई लेने। धनिया ने अपने आप से कहा। दादी को सामने पा
वह मुस्कराने लगी। दादी ने नीचे झाँककर देखा। एक गहरी निस्तब्धता कुण्डली मारे
बैठी थी, उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में बोलते हुए पूछा~ -
''क्यों री तू रोज यहां खडी होकर क्या देखती है-?. मुझे तो कुछ भी
दिखाई नहीं पड़ रहा है। " धनिया की
समझ में नहीं आया कि वह दादी को क्या और कैसे समझाए कि उसका अपना अतीत इन्हीं
गहराईयों में कहीं दफन हो चुका है और आज वह भूत बनकर उसका पीछा कर रहा है। जवाब न
देते हुए वह दादी को बांहों का सहारा देते हुए घर की ओर लौट पड़ी।
गहरी नींद में सो रही धनिया। चर्र-मर्र चर्र-मर्र की आवाज सुनकर वह जाग
गई। उसने ध्यान से उस आवाज को पहचानने की कोशिश की— अरे- ये तो बैलगाड़िय़ों की चलने
की आवाज है। याने कि कल हॉट भरेगा। उसने सहज में अंदाज लगा लिया।
पहाड़ों के कंधों पर से एक सर्पाकार सड़क रेंगते हुए आती है और इस गाँव को
छूते हुए दूर निकल जाती है। सड़क कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है उसे नहीं
मालूम, पर वह इतना जरूर जानती है कि व्यापारी लोग दूर-दूर से
अपनी-अपनी गाडिय़ों में माल लादे रातभर चलते हैं और सुबह यहाँ अपनी दुकान सजाते हैं
और माल बेचते हैं। सड़क के उस पार मैदानी इलाका है, जहां यह
गाँव बसता है, यहाँ अस्पताल है, गेस्ट
हाउस है, रेस्ट हाउस है, रिहायशी मकान
भी हैं। अब तो जगह-जगह होटलों ने भी अपने पैर पसार लिए हैं। दूरदराज से सैलानी
अक्सर यहाँ आते हैं, होटलों की शरण में रात बिताते हैं और पौ
फटते ही जंगलों में उतर जाते हैं। पहाड़ों की तहलटी में जलप्रपात है, पुराने महलों के भग्नावशेष हैं, प्रकृति यहां नित्य
नूतन शृंगार करती है। हिरण-बारहसिंगा, लोमड़ी-बायसन और भी न
जाने कितने रंग बिरंगे पक्षी यहां डेरा डाले रहते हैं। सामने वाली काली पहाड़ी पर
से सूर्योदय व सूर्यास्त का नजारा देखने लायक होता है। लोग-बाग यहां बड़े-बड़े
कैमरे लेकर आते हैं और नयनाभिराम दृश्यों को कैद करके ले जाते हैं। इन्हीं
तलहटियों में सैकड़ों आदिवासी गांव अपनी धरोहरों एवं परम्पराओं को जीवित रखते हुए,
तिल-तिल करके मर रहे हैं। पल-पल मुसीबतों का सामना करते हुए
नंगे-अधनंगे रहते हुए, घास-पास की झोंपड़ी में सिर छिपाते
हुए भूखे-नंगे आदिवासी जन आज भी अपनी ही लीक पर चलने को मजबूर हैं। विकास के नाम
पर करोड़ों की राशि अधिकारियों व अफसरों द्वारा डकार ली जाती है। इन्हें कुछ भी
पता नहीं होता। यदि जान भी जाए तो इन्हें कोई शिकवा-शिकायत नहीं और न ही ये अपना
दुखड़ा लेकर किसी के पास जाते हैं। जो कुछ भी सहज-सुलभ उपलब्ध है उसी में जिंदगी
काट देते हैं। उदासी-लाचारी-मजबूरी जैसे घटिया शब्द शायद इनकी डिक्शनरी में लिखे
ही नहीं गए हैं। जो भी करते मिलजुल कर करते हैं। सुख तो इनके नसीब में लिखा ही
नहीं है। अक्सर सुख बाँटने के चक्कर में ही झगड़े-फसाद मचते हैं। सुख है भी कहाँ
जिसे बराबर-बराबर बांटा जा सके। हिस्से में सभी के आते हैं दुख-तकलीफें। तो वे सब
हिलमिल कर बांट ले जाते हैं। दुख मिटाने का उपाय भी जानते हैं ये लोग। कड़वी घूंट
हलक के नीचे उतरी नहीं कि पांव थिरकने लग जाते हैं। समूची देहराशि नाच उठती है।
औरत मरद एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, घेरा बनाए घंटों
नाचते रहते हैं। टूटे-फूटे शब्दों में गीत भी मुखरित हो उठते हैं। क्या मजाल कि
कभी किसी के मन जरा सा खोट भी आ जाए। कभी-कभार कोई टंटा खड़ा हो भी जाए तो पंचायत
बैठ जाती है और फैसला हो जाता है। मन में गांठ बांधकर रहने की इनकी आदत ही नहीं
है। पलभर को तकरार फिर गले में हाथ डाले-हंसने बोलने लगते हैं। चार-चारोली,
महुआ-लकड़ी गोंद न जाने कितनी ही वनोपज लेकर ये हॉट आते हैं,
इन्हें बेचकर मिट्टी का तेल व नमक खरीदना नहीं भूलते। कभी-कभार अगर
गंडे ज्यादा मिल गए तो अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदी जातीं।
लगभग सम्पन्नता की सोपानों पर चढ़ते हुए भी, व्यापारी
लूट-खसोट की परम्पराओं को बरकरार रखे हुए, हॉट में टूट पड़ते
हैं। औने-पौने में माल खरीदकर लाखों कमा लेते हैं। आदिवासी जन जानते हैं कि उन्हें
लूट लिया गया है फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक दिखलाई नहीं पड़ती। जानते हैं वे
अपनी हद और सरलता की हल्की फुल्की सी मुस्कान ओढ़े रहने की जैसे इनकी आदत ही बन गई
है।
सप्ताह में एक दिन भरता है हॉट। तरह-तरह की चीजें यहां सजने लगती हैं।
गांव के बहुत सारे लोग हॉट में आएंगे। आएंगे शब्द की कल्पना मात्र से वह रोमांचित
हो उठी। सतिया, सलोजी, सोमत, झीनी, बसंती, कल्लू, भीमा, माखन इन सारे संगी साथी में से कोई न कोई हॉट
में मिलेगा। मिलते ही गले लग जाएंगे फिर एक कोने में बैठकर गपियाएंगे। संभव हुआ तो
गोलू हलवाई कीदुकान से जलेबी अथवा मूमपट्टी अवश्य ही खाई जायेगी। जलेबी की याद आते
ही मुँह में मिश्री सी घुलने लगी। वह चट से उठ बैठी और सीधे बाथरूम में जा घुसी।
उसे मालूम है कि इस वक्त चुन्नु-मुन्नु मांजी स्कूल के लिए जा चुके होंगे। डाक्टर
अपनी क्लीनिक के पास पहुंच चुके होंगे। दादी या तो पूजाघर में बैठी गुरिया सटका
रही होगी या घर में अस्त-व्यस्त फैले सामानों को करीने से सजा रही होगी। फिर उसे
खाना भी तो पकाना है। यदि पूजा समाप्त हो गई हो तो सीधे ठाकुरजी के भोग के लिए कुछ
मांगेगी। बिना नहाए-धोए चौके में घुसना यहां वर्जित सा है।
बाथरूम में घुसकर उसने अपने कपड़े उतारे और नहाने बैठ गई। शरीर को सुंगधित
साबुन से मलमल कर नहाने के बाद उसने कपड़े बदलने शुरू किए। बाथरूम में टंगे आईने
में उसने अपने शरीर को देखा तो बस देखते ही रह गई। मैली-कुचैली सी रहने वाली धनिया
का रूप रंग कितना खिल गया है, उसने मन ही मन निहारते हुए कहा
और आईने के और करीब खिसक आई। जरूरत से ज्यादा विकसित हो आए उरोजों को उसने छूकर
देखा। छूते समय उसकी ऊँगलियों के पोर, घुण्डियों से जा
टकराए। एक अजीब सी सनसनी और मादकता से उसका पोर-पोर थरथरा गया। लगा पूरा शरीर ही
झंकृत हो उठा है। सुर्ख हो आए लरजते ओंठ, उभरे हुए गालों पर
एक छोटा तिल, शराबी सी हो आई आँखें देखकर खुद अपने आपको रोक
नहीं पाई और उसने आगे बढ़कर अपने अक्स को चूम ही डाला। अपने ही होंठों पर होंठ
टिकाते समय उसने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि वह किसी अन्य लोक में पहुँच गई है।
आहट पाकर वह चौंक पड़ी। उसकी नजरें पुन: आईने से जा चिपकीं। देखा, ओझा उसे घूर रहा था। उसका माथा ठनका। ओझा और यहां। हो सकता है वह बदला
लेने के लिए यहां आ धमका हो। उसने पलटकर देखा। सचमुच ओझा सामने खड़ा अपनी वीभत्स
मुस्कान बिखेर रहा था। और बार-बार अपनी जीभ ओठों पर फेर रहा था। उसका शरीर डर के
मारे पीपल के पत्ते के मानिंद थरथर कांपने लगा। पता नहीं कितनी देर से खड़ा वह
उसकी नग्न देह को घूर रहा होगा। उसने तत्काल लपककर साड़ी उठानी चाही। साड़ी के
उठाते ही बघनखा एक ओर लुढ़क पड़ा। उसने उसे उठाया और बचाव की मुद्रा में खड़ी हो
गई। अब वह आक्रमण करना ही चाहती थी। जैसे ही उसने अपना हाथ हवा में उछाला और उसकी
ओर लपकी, वार खाली गया। वहाँ तो कोई भी नहीं है। बुदबुदाते
हुए उसने अपने आप से कहा। चारों ओर नजरें घुमाकर भी देखा। सचमुच वहां कोई भी नहीं
था। उसे अपने आप पर ही क्रोध हो आया। बघनखे को कमर में खोंसकर उसने साड़ी लपेटी और
बाहर आ गई। बाहर आकर उसने एक-एक कोना छान मारा कोई भी नहीं था वहां। उसने बाउण्ड्री
वाल के उस पार भी झांककर देखा। पहाड़ अपनी अनन्त गहराईयाँ लिए हुए दूर-दूर तक पसरा
पड़ा था और हवा साँय-साँय करके बह रही थी। उसने इत्मिनान से लंबी गहरी साँस ली और
अपने आपको संयत करने लगी। उसके अपने हाथ पुन: कमर के इर्द-गिर्द घूम गए। बघनखा
बंधा हुआ पाकर उसने फिर एक गहरी सांस ली। तभी उसे माँ के ये शब्द अक्षरत: याद हो
आए, '' बेटी- इसे अपने से कभी भी अलग मत करना। जरूरत पडऩे पर
ये काम आयेगा।." कितने विश्वास के साथ कहा था माँ ने। तभी उसे एक पुरानी घटना
याद हो आई।
माँ के ही साथ गई थी धनिया महुआ बीनने। इस बार भी महुआ गजब का फूला था। माँ
महुआ बीन रही थी। तभी एक भालू उधर से आ निकला। एक वृक्ष की आड़ लेकर बचाव की
मुद्रा में खड़ी हो गई मां। भालू ने झपट्टा मारा। पर दुर्भाग्य से उसका वार खाली
गया। भालू के दोनों पंजे तने से बाहर निकल आए। माँ ने पलटकर फुर्ती से उसके दोनों
पैर पकड़ लिए और पूरी ताकत से उसे अपनी ओर खींचा। भालू का सीना तने से टकराया और
वह बुरी तरह से चीख उठा। तने पर एक पैर टिकाते हुए माँ ने उसे परे ढेला फिर ताकत
से अपनी ओर खींचा। रस्साकशी का ये खेल काफी देर तक चलता रहा, जब तक भालू निढाल होकर गिर नहीं पड़ा। भालू के गिरते ही माँ ने कमर में
लिपटा बघनखा निकाला और उसका पेट चीर दिया। एक भयंकर चीख के साथ वह ढेर हो गया। माँ
की बहादुरी का नमूना उसने अपनी आँखों से देखा था। उसे गर्व हो आया था अपनी माँ पर।
एक बड़ी-सी चट्टान पर बैठकर अपनी तेज हो आई सांसों पर नियंत्रण करने लग गई थी।
संयत होते ही उसने इसी बघनखे को उसकी कमर में बांध दिया था तथा चलाने का प्रशिक्षण
भी दे दिया था। काश यह बघनखा माँ के पास उस समय होता, जब शेर
ने उस पर आक्रमण कर दिया था तो वह अपने आपको शायद बचा ले आती, पर होनी को कौन टाल सकता है। उसने अपने आपसे कहा।
चुन्नु-मुन्नु और मांजी स्कूल से लौट चुके थे। चारों ने मिलकर खाना खाया।
खाना खा चुकने के बाद वे गिल्ली-डंडा खेलने में व्यस्त हो गए। मांजी का अब बाजार
जाने का वक्त था। उन्होंने थैलियाँ उठाईं और जाने को उद्धत हुईं। तभी उन्होंने
धनिया से भी हॉट चलने को कहा। धनिया तो कभी की तैयार थी। बस उसे इशारे भर की जरूरत
थी।
आधा-एक फर्लांग की दूरी पर भरता है हॉट। रास्ता चलते समय उसकी नजरें आने
जाने वालों के चेहरों से जा चिपकतीं। इन अजनबी चेहरों में वह अपने स्वजनों को
खोजने का प्रयास करती। जब कोई परिचित मिल जाता तो रास्ता चलते चटर-पटर करने लगती।
पूरे सप्ताह की चीजें खरीदती जाती मांजी और धनिया को पकड़ाती जातीं। सारी
खरीददारी निपटाने के बाद वे वापिस होने को हुई तो धनिया ने मासूमियत के साथ थोड़ी
देर रुककर आगे आने को कहा क्योंकि वह जानती थी कि हॉट से थोड़ा हटकर आदिवासी जन
बैठकर बतियाते हैं। उसे उम्मीद थी कि कोई न कोई परिचित उसे जरूर मिल जायेगा। बहुत
दिन हो गए सबसे मिले हुए। यही कोई छह महीना अथवा साल भर अथवा इससे भी ऊपर ठीक से
याद नहीं उसने सोचा।
व्यग्रता से वह हाट (बाजार.) के उस पार जाना चाहती है। अपने स्वजनों से
मिलने की आतुरता में उसकी चाल दोहरी हो उठती है। उसने दूर से ही देखा। लोग घेरा
बनाए बैठे बतिया रहे थे। अपने स्वजनों से भेंट करने एवं खबरों का आदान-प्रदान करने
के लिए हाट से बढ़कर और क्या हो सकता है? उसकी नजरें फुर्ती के साथ सभी के चेहरों पर फिसलने लगीं। उसने सतिया को बैठे
देखा। फुर्ती से बढ़कर उसने थैला एक ओर रखा और उसे अपनी बांहों के घेरे में
आलिंगनबद्ध कर लिया। इस अप्रत्याशित घटना से सतिया घबरा सी उठी। धनिया उसे पूरी
ताकत के साथ अपने सीने से चिपकाती तो कभी उसके गालों पर चुम्बन जड़ देती। उसने उसे
परे ढेलने की कोशिश की पर धनिया की पकड़ काफी मजबूत थी। लोग-बाग दो सहेलियों के
मिलन को देखकर गदगद हुए जा रहे थे। फिर
दोनों सहेलियां वार्तालाप में निमग्न हो गईं तभी उसकी नजर चट्टान पर बैठे एक बांके
छैला पर पड़ी जो घेरे से दूर बैठा, न जाने किन विचारों में गुम बीड़ी धुनक रहा था। सिर पर पगड़ी, रौबदार चेहरा, चेहरे पर नुकीली मूंछें, कुर्ता बंडी व घुटने-घुटने तक धोती बांधे शांत भाव से इन्हें ही घूर रहा
था। धनिया ने इशारे से पूछा तो सतिया ने बतलाया कि यह और कोई नहीं बल्कि उसका
कल्लू है। अरे वही कल्लू जो अक्सर तुझसे ही ज्यादा तकरार किए रहता था और तुझसे ही
चिपका डोलते रहता था। याद है तुझे, देनवा के गहरे पानी में
ये मुआ नंग-धड़ंग कूद पड़ा था और तैरते हुए मुझे ही सता रहा था। बचपन की छेड़छाड़
की याद आते ही उसके गाल लाल हो उठे।
उसकी मनभावन सुगठित देह यष्टि देखकर उसके मन में कुछ-कुछ होने लगा। जी में
आया कि दौड़कर गले लगा डाले और जड़ दे ढेर सारे चुम्बन। बचपन में यह सब संभव था।
क्या आज वह इस उमर में और सबके सामने ऐसा कर पायेगी? विचारों के आते ही उसे लाज
-सी भी हो आई थी। उसकी नजरें अब भी उसके इर्द-गिर्द ही घूम रही थीं और वह बांका
छोरा भी कनखियों से उसे ही देख रहा था। शायद न देखने का बहाना बनाते हुए अपनी
सहेली से बातों में उलझी धनिया ने पुन: पलट कर देखना चाहा तो वह अपनी जगह पर नहीं
था। 'कहां चला गया होगा कल्लू?. उसने अपने आपसे प्रश्न किया।
उसका मन कल्लू को देखने के लिए बेताब हो उठा और वह चारों ओर नजरें घुमाकर उसे
खोजने का प्रयास करने लगी।
तभी उसने देखा। वह लौट रहा है और उसके हाथ में कुछ दिखलाई भी पड़ रहा है।
न जाने क्या ला रहा होगा? उसने अपने आपसे कहा। तब तक कल्लू
लंबे डग भरता हुआ वहां आ पहुँचा। उसके हाथों में गरमागरम जलेबी से भरा दोना था।
सतिया ने फुर्ती से दोना छुड़ाकर अपने कब्जे में कर लिया फिर एक जलेबी उठाकर धनिया
के मुंह में ठूंस दिया फिर कल्लू के मुंह में। हास-परिहास-ठिठौली के इस खेल को
देखकर प्राय: सभी ठहाका मार कर हंस पड़े। मुँह में मिठास पड़ते ही धनिया को याद हो
आया कि बचपन में जब भी वह बापू के साथ हाट आती थी। कल्लू और वह हलवाई की दुकान में
सरपट भागकर जाते थे और जलेबी अवश्य खाते थे। आज कल्लू स्वयं आगे बढ़कर जलेबी उसके
लिए लाया है। यह देखकर वह आनन्द से विभोर हो उठी।
अब उसे आने वाले हाट की प्रतीक्षा रहती। हाट वाले दिन वह अपने आपको खूब
सजाती संवारती और माँ के साथ हो लेती। आज कुछ हाट ज्यादा ही भरा था। लगुन-सरा का
मौसम जो था। उसने कल्लू को यहां वहां ढूँढ़ा पर कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ा। तरह-तरह
के प्रश्न मन में आते जो उसे छलनी कर जाते। किसी अंदेशे के चलते उसका दिल धड़कने
लगा। काफी खोज खबर के बाद सतिया मिली तो उसने बतलाया कि ओझा ने उन दोनों को मिलते
देख लिया था। उसने कल्लू को रोकना चाहा पर कल्लू के सिर चढ़ी जवानी कहां मानती।
फिर क्या था। ओझा के दो-चार लग्गु-भग्गु उस पर टूट पड़े और तब तक पीटते रहे,
जब तक वह बेदम नहीं हो गया।
कल्लू के साथ घटित घटना को सुनते ही वह चीत्कार कर उठी। आंखों से आंसू
टपटपाकर बह निकले। वह जानती थी कि ओझा इसे बर्दाश्त नहीं कर पायेगा और वह नीच,
कुछ भी कर बैठेगा। हुआ वही, जिसका उसे अंदेशा
था। उसके जी में आया कि घाटी उतरकर सरपट दौड़ पड़े और अपने कल्लू को बचा ले। उसने
गांव जाने की जिद ठानी तो लोगों ने उसे समझाया कि वह ऐसा न करे क्योंकि यह भी संभव
है कि अकेली दुकेली पाकर, वह उसे भी घायल कर दे। संयोग से
डाक्टर भी हाट पहुँच गए थे। जब उन्होंने इस हृदय विदारक घटना को सुना तो एक अच्छा
खासा जत्था लेकर घाटी में उतर गए और जब लौटे तो गंभीर हालत में पड़े कल्लू को उठा
लाए और अस्पताल में दाखिला देते हुए उसका इलाज शुरू कर दिया। किसी चाकरी की तरह
सेवा करती रही धनिया। कुछ दिन बाद वह पूर्णरूपेण स्वस्थ हो गया। स्वस्थ होते ही वह
घर जाने की जिद करने लगा। हालांकि धनिया चाहती थी कि यहीं रुक जाये, पर ऐसा कर पाना उसके लिए संभव नहीं था।
अब आए दिन ओझा के उत्पात बढ़ते ही चले गए। कभी वह अस्पताल आकर डाक्टर को
धमकी दे जाता तो कभी धनिया को। कभी-कभी तो वह पूरे परिवार को जादू-मंतर से मार
डालने की धमकी दे जाता। डाक्टर के परिवार को आतंकित करने के लिए वह आटे का पुतला
बनाता। हल्दी कुमकुम से उसे लाल-पीला कर देता और डाक्टर की चौखट पर धर आता। कभी
नींबू में कीलें कोंच देता और दरवाजे पर बांध आता। यह काम वह बड़ी सफाई से देर रात
करता ताकि कोई उसे आता-जाता न देख पाए। आखिरकार तंग आकर डाक्टर ने पुलिस में रपट
दर्ज करवा डाली।
शायद पुलिस वालों की यातना के भय से अथवा किसी अन्य कारण के चलते वह
दुबारा उस गाँव में दिखलाई नहीं पड़ा और न इस बीच आतंक ही मचाया। लगा कि सब कुछ
एकदम शांत हो गया है।
दोपहर का यही कोई तीन अथवा चार बजा रहा होगा। परिवार के सभी सदस्य आँगन
में बैठे बतिया रहे थे। तभी कल्लू आता दिखलाई पड़ा। धनिया का मन कल्लू को देखकर
प्रसन्नता से नाच उठा। वहीं शंका-कुशंकाओं के चलते निराशा से भर उठा। पता नहीं
कल्लू क्यों आ रहा होगा- क्या बात होगी- कारण क्या है उसका इस वक्त आने का।
तरह-तरह के प्रश्न उसके जेहन में उतर कर उसे अशांत कर देते। वह जानती थी कि
बड़े-बूढ़ों के समक्ष वह उससे बात नहीं कर पायेगी और न ही उससे आँख मिला पायेगी।
किसी काम का बहाना बताकर वह अन्दर चली गई और दीवार की ओट लेते हुए सुनने का प्रयास
करने लगी।
कल्लू ने आते ही शिष्ठता से अपने दोनों हाथ जोड़े और फिर परिवार के सभी
सदस्यों को सतिया के विवाह में आने का निमंत्रण देने लगा। धनिया ने जब सतिया के
विवाह की बात सुनी तो वह प्रसन्नता से नाच उठी। कितने दिन बीत गए वह अपने गाँव
नहीं जा पाई थी। अब वह सतिया की शादी में जायेगी तो झूमझूम कर नाचेगी-गायेगी। सारे
लोगों से उसकी भेंट भी होगी। दीवार की ओट में खड़ी धनिया कल्पना लोक में विचरने
लगी थी।
परिवार के प्राय: सभी सदस्यों ने शादी में आने का वादा किया। आश्वस्त
कल्लू अब वापिस होने को था। उसकी नजरें धनिया को बराबर खोज रही थीं। जब उसने उसे
कहीं नहीं पाया तो वह उद्विग्न मन से लौट पड़ा। आगे बढ़कर उसने गेट खोला। बाहर
निकला, गेट लगाया और उतार में उतरने लगा। पच्चीस-पचास कदम ही
चल पाया होगा कि उसने धनिया को सामने खड़ी पाया। कहाँ से आ गई धनिया। उसने अपने
आपसे प्रश्न किया और लपककर उसने धनिया का हाथ पकड़ लिया । एक सघन वृक्ष की छाँव
तले बैठते हुए काफी देर तक बतियाते रहे और सहज प्यार के चलते अपना भविष्य तलाशते
रहे। जब कल्लू ने अंदाज लगा लिया कि यहां बैठे काफी देर हो गई है तो शादी में आने
का पुन: वादा करवाते हुए उसने धनिया से विदा मांगी और पहाड़ी की गहराईयों में
उछलता-कूदता आगे बढ़ गया। धनिया तब तक खड़ी उसे निहारते रही जब तक वह आंखों से ओझल
नहीं हो गया। जब वह लौटी तो उसके ओठों पर कोई सुरीला प्यार भरा गीत मुखरित हो रहा
था।
अब उसे आने वाले हॉट का बेसब्री से इंतजार था। घर का कामकाज सम्हालते,
दादी से नोंकझोंक करते रहने में पूरा सप्ताह यूं ही बीत गया जैसे
कोई कल ही की बात रही हो।
दोपहर बाद वह मांजी के साथ हॉट पहुँची। रास्ता चलते उसकी खोजी आंखें अपने
स्वजनों को ढूँढ़ती। जब कोई राह चलते मिल जाता, चटर-पटर करती
चलती। एक मनीहारी की दुकान के सामने जाकर ठहर गई। मांजी ने कालीपोत की माला-ढेरों
सारे टिकुली के पैकेट-आईना-कंघा-रिबिन और न जाने कितनी ही चीजें खरीदीं। धनिया
बार-बार सोचती भला क्यों खरीद रही होंगी मांजी। शायद उसके लिए अथवा सतिया के लिए
जिसका अगली पूरनमासी पर ब्याह जो होना था। यंत्रवत धनिया खरीदी गई वस्तुएं करीने
से झोले में रखती जाती। फिर गोटा-चांदी के दुकान में रुकते हुए
हंसली-दोहरी-कंगन-पायल-बाजूबंद और न जाने कितनी ही वस्तुएं खरीदीं। ''मांजी, ये सब किसके लिए हैं? लगभग
मध्यम स्वर में धनिया ने पूछा।
''कुछ तो तेरे लिए और कुछ तेरी सहेली सतिया के लिए।"
''कितना प्यार करती हैं आप हम आदिवासियों से।" धनिया ने सहजता से
कृतघ्नता प्रकट करते हुए कहा।
''हां, ये बात तो सच है कि दिल में तुम लोगों के प्रति
हमेशा से ही प्यार का ज्वारभाटा मचलता रहता है, फिर ये हमारा
ही नहीं बल्कि सभी लोगों के मन में भी इस तरह की भावनाएं होनी चाहिए। चल अब घर
चलें।" मांजी ने कहा।
''मैं अगर थोड़ी देर ठहर कर आऊं तो आप बुरा न मानेंगी न?" धनिया ने अहिस्ता से कहा। मांजी जानती थीं कि धनिया का मन कल्लू का
सानिध्य पाना चाह रहा होगा तभी तो लजाते हुए उसने रुक जाने का मन बनाया था।
''अच्छा जल्द ही लौट जाना" " कहती हुई वे आगे बढ़ गईं।
बाजार से थोड़ा हटकर पुरुष-महिलाएं घेरा बनाए हुए बतिया रहे थे। धनिया की
चाल में एक अलग ही किस्म का आवेग था। तितली बनी उड़ती डोलती सी वह मस्तानी चाल में
उड़ी चली जा रही थी। दूर से जब उसने अपने स्वजनों को बैठा पाया तो उसकी प्रसन्नता
का पारावार देखने लायक था। सतिया से मिलते हुए उसने अपने सीने से चिपका लिया और न
जाने किस आवेश के चलते उसके गाल पर अनेक चुंबन जड़ दिए। सतिया भी परेशान सी हो उठी
कि आज धनिया को हो क्या गया है। फिर एक ओर बैठते हुए बतियाने लगी। बातों ही बातों
में उसने उसके लिए क्या-क्या खरीदा है सब उगल दिया। अनायास ही सतिया की आंखें
डबडबा आईं। शायद इस सोच के चलते कि दोनों पति-पत्नी आदिवासी जनजीवन से कितना
जुड़ाव रखते हैं। सप्ताह भर पहले आ जाने का वादा करते हुए धनिया वापिस हो ली।
आए दिन गए ओझा कोई न कोई षडयंत्र अवश्य रचता। कभी डराने की गरज से तो कभी
भय पैदा करने की गरज से वह आटा का पुतला बना लाल पीले रंग में रंगता और अंधियारा
गहरा जाने के साथ ही डाक्टर के आवास के सामने रख आता। कभी नींबू पर कीलें गड़ा कर,
उस पर सिंदूर अथवा कुमकुम डालकर रख आता। उसकी दिली इच्छा थी कि ऐसा
करने पर डाक्टर डर जायेगा और फिर घाटी में उतरने की हिम्मत नहीं करेगा। सारे धतकरम
करने के बाद भी डाक्टर ने अपनी हिम्मत नहीं हारी और वह अब प्राणपन से अपने काम को
अंजाम देता रहा।
सतिया की शादी में सप्ताह भर पहले जाने की जिद धनिया करने लगी। डाक्टर तो
यह चाहता था कि शादी के दिन सभी जाएंगे इकठ्ठे और वापिस भी हो लेंगे। पर धनिया
अपनी ही जिद पर अड़ी रही। डाक्टर यह भी जानता था कि ओझा अपनी सीमाएं तोड़ बैठेगा
और अकेली दुकेली जान धनिया को शारीरिक नुकसान भी पहुँचा सकता था। धनिया के मन में
कहीं डर न बैठ जाए शायद इसके चलते वह खुलकर बोल नहीं पा रहे थे। जब धनिया नहीं
मानी तो उन्होंने एक आदमी को साथ लेकर जाने के लिए कहा। डाक्टर चाहता था कि वह
आदमी उसे सही सलामत सतिया के यहाँ तक छोड़ आए। थोड़ी दूर तक तो वह भेजे गए आदमी के
साथ चलती रही फिर उसे वापिस हो जाने के लिए प्रार्थना करती रही। अब एक आजाद
परिन्दे की तरह वह फुदकती-इठलाती-गुनगुनाती पहाड़ी उतरने लगी।
ढेरों सारे सामान की गठरी लादे जब वह सतिया के घर पहुंची तो वहाँ का
उत्साह देखने लायक था। हर कोई अपने आप में मगन था। धनिया को अपने बीच पाकर शायद
उनका आनन्द द्विगुणित हो गया था। देर रात तक गीतगारी होती। मटकों से दारू उतारी
जाती और औरत-मरद साथ बैठकर गटकते। बच्चे भी भला पीछे रहने वाले कहां थे। वे भी
नजरें चुराकर दोना दो दोना गटक जाते। हास-परिहास ठिठोली में दिन कब बीत जाता,
पता ही नहीं चलता। सखी-सहेलियों के आग्रह पर उसने भी चढ़ा रखी थी।
फिर कल्लू भी तो चाहता था कि धनिया के साथ रात भर ठुमका लगाता रहे। देर रात तक
नाचना-गाना-बजाना चलता रहा।
धनिया की आंख खुली तो देखा सूरज सिर पर ऊपर तक चढ़ आया है। आंखें मटमटाते
हुए उसने महसूस किया कि सारे लोग उदासी ओढ़े बैठे हैं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था
कि अचानक हो क्या गया। जब उसने कारण जानना चाहा तो पता चला कि सतिया रात में घर से
भाग गई। सारे लोग उसे खोज-खोज कर थक गए। पर वह मिल नहीं पा रही है। धनिया ने पूरा
किस्सा सुना तो उसके होंठ गोल हो आए। बनावटी उदासी का कारण उसकी समझ में भलीभांति
आ चुका था। वह जानती थी कि शादी से पहले लड़की घर से भाग जाती है। वह साथ में अपने
होने वाले खाविन्द को भी लेकर रफू-चक्कर हो जाती है। जंगल में छिपकर वे कहाँ रहते
होंगे, ये सभी जानते हैं। पर भाग जाने पर शोक जरूर मनाते
हैं। दो-चार दिन तक ये नाटक चलता रहता है। औरत मरद का जत्था जंगल का पत्ता-पत्ता
छान डालने का ढोंग करता जाता है। साथ ही गीत-गारी का भी कार्यक्रम जारी रहता है।
फिर शादी से एक दिन पहले दोनों को पकड़ लिया जाता है। रस्सी से बांधकर वे दोनों को
घर ले आते हैं। फिर दोनों को आमने-सामने किसी वृक्ष के तने से टिकाकर खड़ा कर देते
हैं। दोनों के बीच अलाव जलता रहता है ताकि ठंड का उन दोनों पर कोई असर न पड़े।
अलाव के चारों ओर औरत मरद घेरा बनाकर बैठ कर गपियाते हैं, औरतें
गीत गाने लगती हैं। कोई दारू से भरी मटकी उठा लाता है तो कोई टिमकी-तुरही अथवा
अन्य कोई वाद्य। टिमकी की टिमक-टिमक के बीच दोना भर-भर कर दारू बांटी जाती है। जब
अच्छा खासा नशा सवार हो जाता है तो औरत मरद एक दूसरे की कमर में हाथ डाले रात भर
थिरकते। मस्ती मारते। हो-हल्ला मचाते। दूसरे दिन दोनों की रस्सी खोल दी जाती है।
एक तरफ दुल्हन का साज सिंगार होता है तो दूसरी तरफ दूल्हे को खूब सजाया संवारा
जाता है। सूरज की पहली किरण के साथ ही नगाड़ों की गूंज से जंगल मुस्कराने लगता है।
ढेरों सारी रस्मों को पूरा कराता रहा ओझा। दोनों को आमने सामने बिठा आंय-बांय न
जाने क्या-क्या बकता। ये तो वही जाने। फिर एक दोना दारू बुलवाई जाती। आधी दुल्हन
पीती तो उसी दोने में बची आधी दूल्हा। दोना खाली होते ही हो जाता दूसरा नेंग।
जामुन की एक हरी डाली तोड़कर लाई जाती। उस डाली को जमीन में गड्ढा खोद कर लगा दिया
जाता। फिर दूल्हा-दुल्हन उसके चार-पांच चक्कर लगाते। इस तरह दो जान एक हो जाते।
धनिया को मालूम है कि सतिया और भद्दू इस समय कहाँ छुपे होंगे। अगर वह चाहे
तो एक मिनट में दोनों को पकड़ कर ला सकती है। पर वह जानती है कि सामाजिक परम्पराओं
को निबाहने के लिए ही ये सब किया जाना आवश्यक है। उसका मन तो कल्लू को ढूंढऩे के
लिए उतावला हुआ जा रहा था।
अलाव के चारों ओर बैठे मरद और औरतें चुहलबाजियाँ कर रहे थे। यही तो मौका
होता है शादी विवाह में, जब दोनों पक्ष बैठकर हास-परिहास
करते हैं। मन नहीं लग रहा था धनिया का, वहां बैठने को। नजरें
बचाकर वह उठ बैठी और अभी आती हूँ कहकर चल पड़ी। जानती थी वह कि झरने के किनारे
कल्लू बैठा उसका इंतजार कर रहा होगा।
पहाड़ की चोटी से उतरते हुए देनवा अपनी अधिकतम गति से शोर मचाती हुई आती
है और फिर एक बड़ी-सी पहाड़ी पर से झरना का आकार लेते हुए गहराईयों में छलांग लगा
जाती है। तेजी से नीचे गिरती हुई जलराशि, एक अट्टहास पैदा
करते हुए झाग उगलने लगती है। साथ ही चारों ओर धुँआ-सा भी उठ खड़ा होता है। नदी में
बनते भंवरों ने पहाड़ में जगह-जगह सुराख-से भी बना डाले थे। यह प्रक्रिया एक दो
दिन की नहीं बल्कि बरसों से सतत चल रही प्रक्रिया का नतीजा था। आदमी एक सुराख में
पूरा समा जाए इतनी गहराईयां तो बन चुकी थीं। वह एक दर्रे से घुसता तो दूसरे से जा
निकलता।
धनिया नजरें बचाती हुई उस ओर बढ़ी चली जा रही थी। चांद अपने पूर्ण यौवन पर
था। झरने के किनारे पहुँची तो लगा कि चांदी पिघल कर बही जा रही है। उसे मालूम था
कि यहीं कहीं कल्लू बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। दूर से ही उसने एक परछाई को
घूमता देखा, फिर वह आँखों से ओझल हो गया। धनिया को लगा कि
कल्लू ने उसे देख लिया होगा और अब वह छुप जाने का उपक्रम कर रहा होगा। शायद उसे
चखाने के लिए।
मन में एक विशेष उमंग लिए धनिया आगे बढ़ती चली गई। वह उस ओर निर्भीकता से
बढ़ी चली जा रही थी, जहां उसने एक परछाई को अभी-अभी डोलते
देखा था। जब वह वहां पहुँची तो देखा, वहाँ कोई नहीं था। दिल
धक से धक-धक करने लगा। कहां चला गया होगा कल्लू, उसने अपने
आपसे प्रश्न किया। सफेद झक प्रकाश में उसकी नजरें अपने प्रियतम को खोज रही थीं।
कभी उसकी नजरें पहाड़ की गहराईयों में जा समातीं तो कभी किसी झुरमुट में।
उसे तत्क्षण ऐसा लगा कि कल्लू इसी चट्टान के पीछे छुपा होगा। उसने आहिस्ता
से बढ़ते हुए उस ओर जाना चाहा। तभी किसी की मजबूत बांहों ने उसे अपने शिंकजे में
कैद कर लिया। उसने सहज में ही अंदाजा लगाया कि हो न हो कल्लू ही होगा। पर बांहों
का कसाव कल्लू का न होकर किसी और का हो सकता है क्योंकि उसके कसाव से स्वत: ही
स्पष्ट था कि वह प्यार की गरज से लिपटे हुए हाथ नहीं थे, बल्कि
उसके शरीर के पुर्जे-पुर्जे को तोड़ डालने के लिए कसे गए थे। हड़बड़ा उठी धनिया।
उसने अपने आपको उस चुंगल से छुड़ाना चाहा। पर कसाव लगातार बढ़ता ही चला जा रहा था।
चीख उठी धनिया और कसाव से मुक्त होने के लिए हाथ पाँव मारने लगी। काफी छीना-झपटी
के बाद वह मुक्त हो पाई थी। मुक्त होते ही उसने पलटकर देखा।
ओझा अपनी वीभत्सता के साथ अट्टहास कर रहा था। पसीना-पसीना हो
आई धनिया। साक्षात्ï मृत्यु को सामने पाकर
वह हड़बड़ा उठी और किसी तरह अपनी जान बचाने की सोचने लगी। ओझा अपनी मस्ती में चूर
उसकी ओर एक-एक कदम आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ा रहा था। किंकत्र्तव्यविमूढ़ धनिया पीपल के
पत्ते के मानिंद थर-थर कांप रही थी। हड़बड़ाहट में उसके हाथ बघनखे से जा टकराए।
बघनखा हाथ में आते ही उसे लगा कि बचाव का उपाय हाथ आ गया है। बचाव की मुद्रा लेते
हुए उसने बघनखे को तत्क्षण अपने पंजे में फंसाया और ओझा के अगले कदम की प्रतीक्षा
करने लगी। जैसे ही वह झपटने की मुद्रा में आगे बढ़ा, धनिया
ने लपककर वार कर दिया। पल भर में उसने बघनखा उसके पेट में गहरे तक धंसा दिया और
झटके से बाहर खींच लिया। एक चीख के साथ ओझा धरती पर जा गिरा। उसके गिरते ही उसने
पलटकर जगह-जगह से उसका मांस नोंचना शुरू कर दिया। रणचण्डिका बनी धनिया तब तक वार
करती रही जब तक वह बेजान होकर एक ओर लुढ़क नहीं गया। धनिया जैसे-जैसे वार करती
जाती, ओझा भयंकर गर्जना के साथ चीखता-चिल्लाता। जब धनिया ने
देखा कि वह निष्प्राण हो गया है तो उसने उसे पूरी ताकत के साथ घसीटा और देनवा में
फेंक दिया।
उसने नीचे झांककर देखा। चांद के प्रभाव में चांदी सा हो आया जल सुर्ख लाल
हो उठा था।
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तीस
बरस घाटी
आखिर करें भी तो क्या
करें बिसेस्सर। किसे सुनाए अपने दिल का दुखड़ा? अपनी
पत्नि को? बच्चों को?
अपने मित्रों को या फिर पड़ोसियों को? सब की सब
कन्नी काट जाते हैं। सबके पास अपने-अपने बहाने हैं।
वह आखिर चाहता क्या है?
किसी को जानने की उत्सुकता नहीं है। वह क्यों, रात जागकर गुजार देता है ?
उसके कलेजे में छायी दुःख भरी बदली क्यों गरजते-बरसते रहती
है ? किसी के पास
फुर्सत हो तब न ! कितना व्यस्त हो गया है आज का आदमी। उसके पास यदि कोई कमी है तो
वह समय की कमी है। कितना टोटा हो गया है समय का, आदमी के
पास। सामने से आते दोस्त भी उसे आता देखकर, अपना रास्ता बदल
लेते हैं। ऐसे कठिन समय में , आखिर करें भी तो क्या करें
बिसेस्सर !
एक दिन उसकी पत्नि ने
उसकी ऑंखों में ऑंखें डालते हुए तथा अपनी नर्म-नाजुक उॅंगलियों से बालों को सहलाते
हुए, उसकी पीड़ा को जानने की कोशिश की थी। बड़ा अच्छा लगा था
उसे उस वक्त। कोई तो है, उसके दिल का हाल पूछने वाला. सोचते
हुए वह भावुक हो गया था और उसके सीने से चिपक गया था। उसके कलेजे में, वर्षों से जमें हिमखण्ड पिघल कर बहने लगे थे।
चालीस-बयालिस साल का वह
अधेड़, एकदम बच्चा बन गया था, उस समय।
अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए वह अपने अतीत की तीस बरस घाटी उतरने लगा था और उसके
चारों ओर स्मृतियों का बीहड़ जंगल ऊग आया था।
सारी बातों को गंभीरता
से सुन चुकने के बाद उसकी पत्नि ने अफसोस जताते हुए कहा था-तीस बरस का समय कम नहीं
होता। यदि वे जीवित होते तो अब तक लौट आते अथवा चिट्ठी-पत्री से अपना कुशलक्षेम
लिख भेजते। आदमी इतना पत्थर-दिल नहीं होता कि उसे अपनी जन्मभूमि याद न आए। मेरी
मानो तो आप बच्चों को लेकर गयाजी चले जाओ। उनका पिण्ड-दान करा आओ। उनकी आत्मा को
शांति मिलेगी और आपकी भी।
पत्नि की सपाट बयानी पर
उसे बेहद क्रोध आया था। सुनते ही वह उबलने लगा था। उसका चेहरा तमतमाने लगा था। पैर
पटककर यह कहते हुए उठ खड़ा हुआ था- "
तुम भी औरों की तरह सोचती हो। मेरा भाई जिंदा है। देखना-एक दिन वह लौट आएगा।
"
टोह लेने की गरज से एक
दिन, अपने दोनों बेटों को बुलाया। पास बिठाया और पूछा कि वे
क्या सोचते हैं। बेटे जानते थे कि पिता अपने भाई के बारे में वह सब कुछ सुनना नहीं
चाहेंगे, जो वे कहना चाहते हैं। जवाब तो आखिकार उन्हें देना
ही था। शब्दों को तौलते हुए बड़े बेटे ने कहा- " पिताजी... अतीत को अतीत ही
रहने दें और वर्तमान को जिएं। " जो पीछे छूट गया, सो
छूट गया। अब, हम सबके बारे में सोचिए जो आपका वर्तमान तो है
ही और भविष्य भी। " ऐसा कहते हुए उसने अपना नन्हा. सा बेटा उसकी गोद में डाल
दिया था।
शब्दों की जादूगरी वह
समझ रहा था। वह यह भी समझ रहा था कि उसका मंतव्य क्या है।
निराशा भरी नजरों से
उसने अपनी मिचमिचाती ऑंखों से आसमान को देखा। हमेशा की तरह निर्मल-शांत और अपना
नीलापन लिए आसमान एकाएक मटमैला हो गया था। हवा का चलना एकदम बंद हो गया था और
आसमान में उड़ रही गिद्ध-चीलें अधर में लटक गए थे।
निराशा और हताशा के बीच
की एक पतली सी सुराख के बीच से गुजरते हुए, आखिरकार उसने एक
ऐसे व्यक्ति को खोज निकाला जो न तो भाग सकता था, न जिसे भूख
सताती है न ही प्यास और न ही वह पेशाब जाने का बहाना बताकर रफुचक्कर हो सकता था।
उसने एक आदमकद आईना
खरीद लिया और अपने शयन-कक्ष में लगा लिया था। वह आईने के पास बैठकर सामने बैठे
व्यक्ति से अपनी पीड़ा उजागर कर देता था। जानता है ! वह उसका अक्स है ! उसकी
प्रतिच्छाया ! लेकिन कोई तो है उसकी सुनने वाला ! अपनी बात पूरी तरह कह चुकने के
बाद वह पूरी तरह, अंदर से खाली हो जाता ! ऐसा करते हुए वह प्रसन्नता से भरने लगता था।
उसे अब भी याद है। भैया
रामेस्सर के इस तरह चले जाने के बाद उसके वृद्ध माता-पिता पर क्या गुजरी थी। मॉं
तो जैसे विक्षिप्त सी हो गई थी। वह कुछ बोलती-बतियाती नहीं थी और हमेशा रोती ही
रहती थी। वह अक्सर कहती-मेरे राम-लक्ष्मण की जोड़ी बिछुड़ गई। पिता कहते-मेरी अजोध्या
राम के बगैर सूनी हो गई। बावजूद इसके वे मॉं को समझाने का प्रयास करते। मॉं कहती-
कैसे भूल जाऊॅं? कैसे कह दूॅं कि वह मेरे शरीर का हिस्सा
नहीं था। कैसे भूल जाऊॅं कि मैंने उसे अपनी कोख में नहीं पाला।
कुछ दिन बाद पिता ने
अपने आपको एक कमरे में कैद कर लिया था। वियोग के विषधर की फुंसकार से उनका गोरा
बदन काला पड़ गया था।
पिता अक्सर यह कहते
सुने गए थे शरीर एक बार बिगड़ जाए तो उसे सुधारा जा सकता है। एक से बढ़कर एक डॉक्टर
मौजूद हैं इस देश में। अगर मन एक बार दबका खा जाए, तो उसे
सुधारना बहुत मुश्किल है। कहते हैं कि इसकी दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी।
सबको सीख देने वाले पिता का मन भी दबका खा गया था।
बिसेस्सर जब भी गहरी
नींद में होता है, वह तीस साल पुरानी घटना, सपना बनकर ऑंखों के सामने घूमने लगती है, ठीक सिनेमा
की रील की तरह। एक-एक पल, एक-एक क्षण जीवन्त हो उठते हैं।
कभी जब वह अचेतन अवस्था में रहता है, तब उसे कुछ भी याद नहीं
रहता। यदि नींद खुल गयी तो जागती ऑंखों से वह सब देखता-सोचता रहता है क्योंकि यही
तो वह क्षण होते हैं जब भाई की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है।
उसके सपने में उभरता है
एक गॉंव। गॉंव के किनारे बहता चमारनाला, जहॉं उसके पूर्वज
मरे ढोरों के शरीर से चमढ़ा उतारा करते थे। उसके परदादा एक कुशल चर्मकार थे।
उन्होंने उस समय के तत्कालीन जमींदार को एक ऐसी अनोखी जूती बनाकर दी थी जिसे जरूरत
पड़ने पर कागज की तरह मोड़कर जेब में भी रखा जा सकता था। उसकी कलात्मक नक्काशी और
बेलबूटे बनाने में पूरे छैः मास लग गए थे।
जमींदार ने खुष होकर
चमारनाले से लगी भूमि बक्षीस में देते हुए कहा था कि वह यह देखना चाहता है कि एक
कलाकार उस अभिषप्त एवं उजाड़भूमि को अपने कौषल से किस तरह संवारता है। उसके परदादा
ने न सिर्फ कड़ी मेहनत की थी, बल्कि अपने परिश्रम से उसे खेती
लायक भी बना डाला था। उस समय से वह भूमि उनके अधिकार में थी।
देश आजाद हुआ। गॉंव एक
औद्योगिक नगर में तब्दील होने लगा। जमीन की कीमत आसमान छूने लगी। अब जमींदार के
वंषज लाठी व रूतबे के दम पर वह जमीन हथियाना चाहते थे।
गर्मी के दिन थे। गेहूँ
कटाई के बाद खलिहानों में रख दिया गया था। उड़ानी होनी बाकी थी। खेत खाली थे। बच्चे
गिल्ली-डण्डा खेलने में व्यस्त थे। उचित अवसर जान लठैतों ने उसके पिता को घेर लिया
और खेत छोड़कर भाग जाने की धमकी दी। बात जब नहीं जमी तो खलिहानों में आग लगा दी गई।
लाठियॉं बरसायी जाने लगी। आग की लपटों व चीत्कार की आवाज सबसे पहिले बिसेस्सर ने
देखा था। वह इतना ही कह पाया था-" भइया... रामेस्सर आग!. " आग की लपटें
अपने विकराल रूप में थी।
रामेस्सर बिसेस्सर से
मात्र चार साल बड़ा था लेकिन अल्पवय के बावजूद वह कद्दावर था और बलिष्ठ भी। उसकी
चाल में चीते की सी छलांग थी। पलभर में वह वहॉं जा पहुँचा । उसने देखा। जमींदार का
पोता उसके पिता को भद्दी-भद्दी गालियॉं देकर लात-जूतों से पीट रहा है। देखते ही
उसका खून खौल उठा । उसने निशाना साधकर एक बड़ा सा पत्थर उसकी ओर उछाल दिया. पत्थर निशाने पर पड़ा था और वह जमीन पर गिरा तड़पने
लगा । शायद उसकी खोपड़ी चटक गई थी। फिर उसने एक लठैत से लाठी छीनकर वार करना शुरू
कर दिया था। कुछ तो भाग खड़े हुए थे। कुछ जमीन की धूल चाट रहे थे। इस बीच पुलिस भी
आ गई थी। इस बार भी बिसेस्सर चीखा था-भइया पुलिस और वह भाग खड़ा हुआ।
स्मृति के बतौर यह वही
घटना है, जिसे उसने अपनी ऑंखों से देखा था और अंतिम बार अपने
भाई की सूरत। वह बार स्मृतियों में इस घटना को दोहराता है ताकि भाई की वह छवि देख
सके।
एक लम्बे मुकदमे को वह
जीत चुका था। आज उस जमीन की वजह से उसके पास आलीषान बंगले-मोटर गाड़ियॉं, बैंक-बैलेंस व नौकर-चाकरों की फौज है। बावजूद इसके नाथ होते हुए भी अनाथ ।
माँ-बाप को तो वह खो ही चुका था। एक भाई की आस थी। वह भी दुनिया की भीड़ में न जाने
कहाँ खो गया था। तीस बरस बीत गए। न तो वह लौटा, न ही उसकी
कोई चिट्ठी-पत्री आयी। उसे अब भी विष्वास है कि एक दिन वह लौट आएगा।
एक सुबह! वह जल्दी उठ
बैठा और अपने बागीचे में चला आया था। भोर की उजास अभी फैलना बाकी थी।
उसने देखा! एक व्यक्ति
लंगड़ता हुआ उसकी ओर आ रहा है। नजदीक आते ही उसने ऊॅंची आवाज में कहा- "भइया बिसेस्सर-देख तेरा भाई लौट आया है।
" खून ने खून को पहचान लिया था। सपना टूटा और एक धूमिल बिम्ब स्पष्ट होता जा
रहा था।
वह लौट आया था।
दोनों भाई एक-दूसरे में
लिपटे रहे। ऑंसुओं की धारा बहती रही और मौन संवाद चलता रहा।
आशाओं का मृतप्रायः
जंगल लहलहाने लगा था तथा मधुमास की मादक गंध फैलने लगी थी। चौदह साल से दो गुणा
वनवास काट कर राम, अपनी अजोध्या में लौट आए थे। परिवार का हर
छोटा-बडा प्राणी, अपने दादाजी के चरणों में नतमस्तक था।
देर रात तक बिसेस्सर
अपनी तीस साला कहानी दुहरा रहा था। जमीन के प्रकरण से लेकर अपने माता-पिता के
करूण-अंत तक की कहानी, उसने एक सांस में कह सुनायी थी।
अब रामेस्सर की बारी
थी। घर छोड़ने से घर बसाने तक की दास्तान उसने कह सुनाया था। सारा कुनबा अपने दादा
की बातों को परीलोक की कहानी की भॉंति सुन रहा था।
सारी राम-कथा सुनने के
बाद बिसेस्सर ने, अपने भाई से कहा कि वह अपनी सीता-सी भाभी व
बच्चों को लेकर यहॉं आ जाए। बात आगे बढ़ाते हुए उसने यह भी कहा कि जमीन-जायजाद में
आज भी उसका हिस्सा है।
सारी रात दोनों भाई
बातें करते रहे और रात मोमबत्ती की तरह सुलगती और पिघलती रही।
आठ-दस दिन कैसे बीत गए।
पता ही नहीं चला।
रामेस्सर अब लौट जाना
चाहता था। उसे अपनी-बीवी और बच्चों की याद सताने लगी थी। वह तो उतावली में बिना
बताए ही घर से निकल गया था। उसके भाई ने उसके बिछोह में तीस साल कैसे बिताए होंगे ?
कल्पना मात्र से वह सिहर उठा था। चूंकि वह मर्द था, आघात सहता रहा लेकिन एक औरत अपने पति के वियोग में तो तत्काल जान ही दे
देगी। बच्चों का क्या होगा ? रामेस्सर के मन में एक विचित्र
ऑंधी सक्रिय होने लगी थी। वह हर हाल में लौट जाना चाहता था।
बिसेस्सर जिद लगाए बैठा
था कि अब वह किसी भी कीमत पर उसे जाने नहीं देगा। उसने कोर्ट से स्टॉम्प-पेपर खरीद
लाया था और चाहता था कि भाई को उसका हिस्सा सौंप कर, शेष
जीवन निःश्चिन्तता से बिताएगा।
रात का सन्नाटा पसरा
पड़ा था। रामेस्सर खर्राटें भर कर सो रहा था। बिसेस्सर के बड़े बेटे ने धीरे से बगल
में सोते अपने पिता को जगाया और कमरे में ले आया, जहॉं उसकी
मॉं-छोटा भाई व बहुएँ पहले से ही बैठे हुए थे।
बिसेस्सर का दिमाक ठनका
था। इतनी रात गए, इस तरह बुलाने का मतलब ? शंका-कुशंका की घनी बेलें उसके
शरीर में तेजी से लिपटने लगी थी और चिन्ता की मकड़ी, उसके
चेहरे पर जाल बुनने लगी थी।
एक कुर्सी में धंसते
हुए उसने धड़कते दिल से पूछा कि इतनी रात गए, इस तरह बुलाने
का मतलब ? सभी के म्लान चेहरों पर नजरें घुमाते हुए उसने
पूछा था।
बड़े बेटे ने पहल करते
हुए कहा। कहते हुए उसके चेहरे पर तनाव की परछाई स्पष्ट देखी जा सकती थी। वह तैश
में था। वह तल्खी के साथ बोला था। बोलते समय उसका शरीर कांप भी रहा था।
" पिताजी ... यह क्या पागलपन मचा रखा है आपने?
क्या जरूरत है उन्हें हिस्सा देने की? लाखों-करोड़ों
की जमीन आप मुफ़्त में दे देंगे ! इस जमीन को लेकर आपने कितने कष्ट सहे हैं। हफ्तों
भुखमरी की मार झेली है। इन्होंने किया ही क्या था? सारी
मेहनत तो आपने की है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर आपने लगाए हैं और आप इतनी बड़ी जायजाद
तश्तरी में रख कर अपने धोखेबाज भाई के चरणों में रखने जा रहे हैं। हम चुप नहीं
बैठेंगे। हम अपने जीते-जी ऐसा होने नहीं देंगे।
जली-कटी बातें सुनकर
बिसेस्सर को लगा कि असंख्य बर्र-मक्खियों ने उस पर हमला बोल दिया है और दंशों के
निशान पूरे शरीर पर उभर आए हैं। उसे ऐसा भी लगा कि उसके कपड़े जबरिया उतार दिए गए
हैं ओर उसे तपती रेत पर लिटा दिया गया है और आसमान से उतरकर चीलें और गिद्ध उसके
शरीर से मांस-पिण्ड नोंच रहे हैं।
उसका दम घुटने लगा था।
वह वहाँ और ज्यादा देर तक रूक नहीं सका था। तेजी से पलटते हुए वह उस कमरे में चला
आया था, जहॉं उसका भाई सो रहा था।
उसकी ऑंखें फटी की फटी
रह गई। वह हैरान व हतप्रभ था, देखकर कि उस कमरे में उसका भाई
मौजूद नहीं है। उसे बिस्तर पर न पाकर उसका कलेजा धौंकनी सा धड़कने लगा था।
उसने बारी-बारी से सभी
कमरों की तलाष कर डाला। वह वहॉं नहीं था। पागलों की तरह चीखता हुआ- " भैया तुम कहाँ हो? " " भैया तुम कहाँ हो."वह बाहर निकल आया था।
रात्रि अपने अन्तिम पहर
की बची-खुची साँसे ले रही थी। दुर्गम-गहन अंधकार की परतों से टकरा कर उसकी आवाज
लौट आयी थी।
" भैया राम....तुम
इस स्वार्थ से भरी स्वर्ण-नगरी में कैसे रह सकते थे. " बुदबुदाते हुए वह
वापिस लौट आया।
स्मृतियों का बीहड़ जंगल,
तेजी के साथ फैलता जा रहा था।
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5.
जीवन
के रंग हजार
अब कैसी है जानकी?
किस वार्ड में भर्ती है? डॉक्टर ने क्या बताया?
आप दोनों के बीच कोई कहा-सुनी तो नहीं हुई? क्या
शहर में टेलीफोन का टोटा हो गया था? गली-गली में बूथ खुल गए
हैं, कहीं से भी टेलीफान कर खबर दे सकते थे? क्या आपने हमें पराया समझ लिया है, तभी तो खबर नहीं
दी?
वे क्रुद्ध सिंहनी की
तरह दहाड़ रही थीं, दहाड़ सुनकर उनकी घिग्गी बंध गई थी। कुछ
प्रश्न तो ऐसे भी थे, जिन्हें सुनकर वे तिलमिला भी गए थे।
प्रतिवाद न करते हुए, चुप रहना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
वे चाहते तो अपने जवाब
में बहुत कुछ कह सकते थे। शब्दों का उनके पास अक्षय भण्डार था। शब्दों की
अर्थवत्ता के नए-नए प्रतिमान देने वाले सिद्धहस्त प्राचार्य के लिए यह कोई दुष्कर
कार्य नहीं था।
जानते थे वे कि सामने
खड़ा शख्श कोई और नहीं बल्कि उनकी भाभीजी थीं। वे सदा से ही उन्हें सम्मान देते आए
हैं। मुँह लगकर बात कैसे कर सकते थे?. फिर उन्हें यह हक बनता था कि वे उन्हें डाटें-फटकारें।
वे चाहते थे कि हर हाल में उनका सम्मान बना रहे।
वे ये भी जानते थे कि
विपरीत परिस्थितियों में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। फिर यह जरूरी नहीं कि वह
जो भी बोलें, वह ठीक ही हो। अक्सर ऐसे समय में जबान धोखा दे
जाती है, वह बोलना कुछ चाहता है और बोल कुछ जाता है।
बोलते समय उनका चेहरा
तमतमाया हुआ था। शब्दों में तल्खी थी। वे कुछ ज्यादा ही तेज सुर में, बोल भी रही थीं।
सारा गुस्सा एक बार में
उगल देने के पश्चात् वे एकदम शांत हो गईं थीं। तेज बोलने के कारण अथवा सीढ़ियॉं
चढ़ने के कारण, वे हॉंफ रही थीं।
जयश्री के साथ सीढ़ियॉं
चढ़ते हुए देख, वे सीट से उठ खड़े हुए और पास चले आए थे। वे
जानते थे कि भाभीजी इस समय क्रोध में आविष्ठित हैं। आते ही वे सारा गुस्सा उनपर
उतार देगी। शेरनी के सामने खरगोश बनकर जाना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
उनका चुप हो जाना,
उनके लिए एक शुभ-लक्षण था। यदि वे आई.सी.सी.यू वार्ड के समक्ष खड़ी
होकर जोर-जोर से बोलतीं, तो संभव है कि ऐसा किया जाना मरीजों
के हित में नहीं होता और न ही वहॉं के प्रचलित नियमों के अनुरूप।
अब वे बड़े इतमीनान के
साथ अपनी बात कह सुनाना चाहते थे। सूखे हलक को थूक से गीला करते हुए वे कुछ कह
पायें, इसके पूर्व ही जयश्री का आक्रोश फूट पड़ा था।
" मम्मीजी... आप
भी कैसे-कैसे ऊल-जुलूल प्रश्न लेकर बैठ गईं? क्या आप भूल गईं
कि इस समय अंकलजी कितनी भीषण मानसिक यंत्रणाओं के दौर से गुजर रहे हैं? क्या आज और अभी प्रश्न पूछना जरूरी है? पत्नि कोमा
में पड़ी हैं । बेटा विदेश में है। ऐसे कठिन समय में इन्हें सवालों की नहीं बल्कि
कोमल-कोमल शब्दों में पगे सहानुभूति के मरहम की जरूरत है। ऐसे शब्द जो इनका ढाढस
बंधा सके। "
उनका मन ही मन खुश होना
स्वाभाविक था। वे सोचने लगे थे। जो काम माँ नहीं कर पाई, उसे
बेटी ने पूरा कर दिखाया। जयश्री को अपने पक्ष में खड़ा पा, वे
अपने दुःखों को कुछ हद तक भूल गये थे।
जो होना था, हो चुका लेकिन जयश्री के इस तरह दलील देने से कहीं मॉं का दिल आहत न हो
गया हो। कहीं वे अपने आपको अपमानित महसूस न करने लगी हों। संभव है, बाद में दोनों के बीच तकरार न हो। उनकी दिली इच्छा थी कि मॉं का सम्मान भी
बना रहे और बेटी को उसके हक की शाबासी मिल जाए।
बातों का सम्मानजनक
संतुलन बनाते हुए उन्होंने कहा- जयश्री... तुम भूल रही हो कि इस समय तुम्हारी मां के मन में कितनी पीड़ा है? उन्होंने
सदा से ही हमें अपनापन दिया है। वे हमें अपनों से अलग नहीं मानती और तो और वे
जानकी को अपनी छोटी बहन मानती है। तुम्हीं बताओ... एक बहन... अपनी दूसरी बहन को
मौत के कगार पर खड़ा कैसे देख सकती है? अतः इनका क्रोधित होना
स्वाभाविक है। मैं कसूरवार हूँ कि इन्हें समय पर सूचना नहीं दे पाया। "
" बड़े गर्व के साथ
मैं एक बात और कहना चाहता हूँ । अगर तुम वक्त पर साथ नहीं होती तो जानकी शायद ही
बच पाती। इस बुढ़ाते शरीर में अब पहले जैसा न जोर है, न ही
जोश। मैं भला कितनी दौड़-भाग कर सकता था। जयश्री... तुमने अपना फर्ज निभाया और मुझ
पर कर्ज चढ़ा दिया है। मैं तुम्हारा कर्जदार हूँ ।"
शब्दों की जादूगरी ने
अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। दोनों की नम ऑंखें देखकर, वे
भी अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाए थे। उनकी भी ऑंखें भींग गई थी।
बोझिल वातावरण को सरस
बनाने की पहल करते हुए जयश्री ने कहा- " अंकलजी... हम आपके लिए टिफिन लेती
आईं हैं। कृपया समय पर खाना जरूर खा लीजिएगा। हम घर जाकर ईश्वर से प्रार्थना
करेंगी कि अण्टीजी को होश आ जाए और वे पहले की तरह भली-चंगी हो जाएं। "
आश्वस्ती और सद्भावना
से भींगी फुवारों से उनके दग्ध-हृदय को शीतलता मिलने लगी थी। कृतघ्नतावश उनके हाथ
जुड़ आए थे और वे उन्हें जाता हुआ देखते रहे।
बरामदे में लटके बल्ब
से झरती पीली-बीमार रोषनी को चीरते हुए उनकी नजर बेंचों पर बैठे मरीजों के
अभिभावकों के चेहरों पर जा टिकीं। सभी के म्लान, पीले-पके आम
की तरह लटकी सूरतें और चेहरों पर चिंता की मकड़ियों के बुने घने जालों को देखकर वे
सिहर गए थे। पीली मिट्टी से पुती दीवारें उनके भय को और बढ़ाने लगी थी।
वे मन ही मन अपने
इष्ट-देव के नाम का जाप करते और मनौती मांगते रहे कि जानकी जल्दी ही ठीक हो जाए।
तभी वार्ड के दरवाजे
में हल्की सी हलचल हुईं। दरवाजा खुला। एक नर्स अपनी सैंडिल खटखटाते हुए बाहर
निकली। यंत्रवत वे उठ खड़े हुए और उसके पीछे हो लिए।
उन्होंने बड़े
अनुनय-विनय के साथ अपनी जानकी के हाल जानना चाहा। तमकते हुए उसने कहा-"..
बाबा... तुम लोग भी चैन से नई बैइठता ... न हम लोगों को चैन से काम करने देता।
कित्ती बार हम तुमको बोला ... हमको नई मालुम । ".कहते हुए वह दूसरे वार्ड में
जा घुसी थी।
चेहरा लटकाए वे अपनी
जगह पर आकर बैठ गए। पूरे आठ घंटे बीत जाने के बाद भी वे कोई समाचार प्राप्त नहीं
कर पाए थे। मन अब बैचेनी में घिरने लगा था। उटपटांग ख्याल उन्हें और व्यथित करने
लगे थे।
बेंच पर बैठे-बैठे
उन्हें कोफ्त होने लगी थी। वे अपनी सीट से उठ खड़े हुए और बरामदे में चहल-कदमी करने
लगे। लोगों की नजरें बचाकर वे आहिस्ता से खिड़की के पास जाकर सटकर खड़े हो जाते और
जगह-जगह से खुरचे कांच में से भीतर झांक कर देखने का प्रयास करते। अंदर कुछ भी
दिखलाई नहीं पड़ा। वे वहॉं से हट जाते। फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाते।
टेबल पर पड़े
टिफिन-कैरियर को देख उन्हें जयश्री के कहे वाक्यों की अनुगूंज सुनाई देने लगी वे
भाव विव्हल होने लगे थे। मन पर छाए निराषा के बादलों में आद्रता बढ़ने लगी थी। वह कहीं
बरस न जाए, इससे पहिले ही वे टिफिन लेकर सीढ़ियां उतरने लगे
थे।
सीढ़ियां उतरते हुए वे
मन नही मन कह उठे। कितना ध्यान रखती है जयश्री उनका। बिटिया जानती है कि मैं समय
का कितना ध्यान रखता हूँ। तभी तो वह जाते समय, भोजन कर लेने
की बात कहती गई थी।
भूख तो उन्हें जोरों की
लगी थी। लेकिन मन साथ नहीं दे रहा था फिर अस्पताल का रूग्ण-वातावरण उन्हें ऐसा
नहीं करने दे रहा था।
एक भिखारी को खाना देकर
वे वापिस लौट आए थे। रात के ग्यारह बज चुके थे। नींद अब भी ऑंखों से कोसों दूर थी।
खाली बेंच पर पैर
फैलाकर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाते हुए
सिर के नीचे रख लिया और ऑंखें बंद कर ली थी। पलकों के बंद होते ही बीती बातें
एक-एक करके याद आने लगी थीं।
दोपहर का एक बजा था। वे
अपने डाइनिंग-टेबल पर बैठकर खाना खा रहे थे। यह उनके रोज का खाना खाने का समय था।
खाना खाते हुए समाचार-पत्रों के पन्ने पलटना उनकी दिनचर्या का आवष्यक अंग बन गया
था। हालॉंकि वे सारे अखबार सुबह ही बांच चुके होते हैं।
जानकी इस समय रसोई-घर
में व्यस्त थी। उसका बेटा अजय बाहर से घर लौट रहा था। वह भी कितने सालों बाद। अजय
उनका भी बेटा है लेकिन माँ का हक कुछ ज्यादा ही था।
बेटे के आने की खबर
पाकर वह बेहद ही खुश थी और व्यंजन तैयार करने में लगी थी। वह चाहती थी कि उसके आने
के पूर्व, वे सारी चीजें बनकर तैयार हो जाने चाहिए जो उसे
सर्वाधिक प्रिय है। याद कर-करके वे चीजें बनाती जाती, फिर
उसे कांच के मर्तबान में करीने से जमाकर रखती जातीं थीं।
इस समय वह खोवा की
करंजियां सेंक रही थी। कढ़ाई से उठ रही मीठी-मीठी गंध से समूचा वातावरण धमधमा रहा
था। हाथ चलाते हुए वह गुनगुनाती भी जा रही थी। उसका कण्ठ अब कुछ ज्यादा खुल गया था
और गीतों के बोल हवा की पीठ पर सवार होकर उन तक आ रहे थे। मीठे बोल सुनकर वे झूमने
लगे थे। उन्हें ऐसा भी लगने लगा था कि वे किसी दिव्य लोक में जा पहुँचे हैं। तभी
जयश्री की हास्य-मिश्रित खनकदार आवाज सुनकर वे उस लोक से लौटने लगे थे।
उसने बड़े ही मनोहारी
ढंग से थाली में करंजी परोसते हुए कहा-" अंकलजी... इसे भी तो चखकर देखिए... कैसी बनी है?
कहीं कोई कोर-कसर तो बाकी नहीं रह गई?
मुँह में करंजी रखते ही
वे वाह-वाह कह उठे थे। अपनी शान में काढ़े गए कसीदों को सुनकर, जानकी के गाल लाल हो उठे थे।
सुस्वाद भोजन का
रसास्वादन करते हुए वे जानकी के तरफ देखना नहीं भूलते थे। अनायास ही नजरें आपस में
मिलतीं और वह शरमा कर दूसरी तरफ देखने लग जाती थी।
विगत तीन-चार दिनों से
विभिन्न-विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जा रहे थे।
खाना खाते हुए वे सोचने
लगे थे। बेटे के आगमन की खुशी ने जानकी को पागल बना दिया है। सच भी है, बेटे के आगमन की खबर पाकर कौन मां खुश नहीं होगी । खबर पाते ही मॉंओं के
हृदय-कमल खिल-खिल जाते हैं।
ममता की कुम्हलाई
लतिकाएं हरियल होने लगती है। उनका पोर-पोर आनन्द की लहरियों में हिलोरें लेने लगता
है। मन-मयूर थिरकने लगता है। पैर तो जैसे उनके जमीन पर ही नहीं पड़ते हैं। वे फिरकी
की तरह घूम-घूमकर अपने समूचे परिवेश को सजाने-संवारने में लग जाती है।
जयश्री भी बड़ी सुबह से
जानकी के कामों में अपना हाथ बंटा रही थी। वह उनके जिगरी दोस्त गोविंद की इकलौती
बेटी है। दोनों ही परिवारों के बीच गहरी अंतरंगता है। दूध में घुले बताशे की तरह।
अजय के आगमन की सूचना पाकर वह भी बेहद उत्तेजित है, दोनों ही
बचपन से साथ-साथ खेले-कूदे, पले-बढ़े हैं। अजय से वह मात्र पांच
साल छोटी है। एक-दूसरे के यहॉं आने-जाने में कभी भी समय का बंधन नहीं रहा।
आने को तो वह रोज ही
आती है, लेकिन जब से उसने स्थानीय कॉलेज में
सहायक-प्राध्यापक का पदभार ग्रहण किया है, तब से समय में
थोड़ा फेरबदल अवश्य हुआ है।
अपने बेटे के आगमन की
खुशी को यादगार बनाने के लिए उन्होंने कुछ योजनाएं भी बना डाली थीं। वे इस खुशी
में एक शानदार पार्टी देना चाहते थे। कहाँ शामियाना लगेगा। झूमरें कहॉं-कहॉं
लगेगी। आवासीय भवन में किस तरह की विद्युत साज-सज्जा की जाएगी आदि चीजों पर बारीकी
से मनन कर लिया था और ठेकेदार को उसका आर्डर भी दे दिया था।
वे चाहते थे कि अति
विशिष्ट स्वजनों, अतिथियों और रिश्तेदारों की उपस्थिति में
अजय और जयश्री की मंगनी की भी घोषणा कर दी जानी चाहिए। गोविंद उनका दोस्त ही नहीं
बल्कि एक सच्चा दोस्त और हमदम भी है। उन्हें पक्का यकीन है कि वह इस रिश्ते से
इनकार नहीं करेगा। उनकी दिली इच्छा थी कि दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदल जाना
चाहिए।
अतिगोपनीयता बरतते हुए
उन्होंने पूजा-ज्वेलर्स के यहॉं से वेडिंग-रिंग भी बनवाकर रख ली थी।
वे सोचने लगे थे "
अजय को आने में अभी कल का पूरा दिन बाकी है। वह कल सुबह पुणे से पहली फ्लाईट पकड़कर,
एक घंटे की छोटी उड़ान के बाद नागपुर पहुँचेगा फिर कार द्वारा यहॉं
के लिए प्रस्थान करेगा। उसे यहॉं आते-आते, शाम ही क्या,
रात ही हो जाएगी। झिलमिल-झिलमिल झिलमिलाती रोशनी में उसका स्वागत
करने में मजा आ जाएगा। "
कल्पनाओं के रंग-बिरंगे
बादल झमझमाकर बरस रहे थे और वे उसमें भींग भी रहे थे। तभी टेलीफोन की घंटी घनघना
उठी। शायद ओवरसीज काल थी। जानकी ने अति-उत्साहित होते हुए रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ
अजय ही था।
बातचीत का क्रम जारी
था। वह हॅंस-हॅंसकर बतिया रही थी। प्रसन्नता से लकदक चेहरा और फुलझड़ी से झरते
हास्य को देख-सुनकर वे भी प्रसन्न हो रहे थे।
पता नहीं, अचानक क्या हुआ, उसका दिपदिपाता चेहरा बुझने लगा था।
वह कांतिहीन होने लगी थी। मुक्त हास्य व मुस्कान की जगह तनाव घिरने लगा था। उसकी
मुट्ठियॉं कसने लगी थीं। वे कुछ समझें, वह ही कुछ बोल पाए,
रिसीवर क्रेडल पर रख पाए, इसके पूर्व ही वह
गीली मिट्टी की दीवार की तरह भरभरा कर गिर पड़ी थी।
" हे भगवान ! ये
क्या हो गया? "
पास आकर देखा, नब्ज टटोली,
समझ में कुछ नहीं आया। वे बुरी तरह से घबरा गए थे। सोचने समझने की
बुद्धि को जैसे काठ मार गया था। धड़कनें बढ़ गई थी, लेकिन
जयश्री ने अपनी हिम्मत और बुद्धि की डोर कसकर साध रखी थी। बिना समय गंवाए वह तीर
की तरह बाहर निकल गई और पास-पड़ोस के लोगों को मदद के लिए गुहार लगाने लगी थी।
उस घटना की कल्पना
मात्र से, वे सिहर उठे थे। दिल जोरों से धड़कने लगा था। वे
अपनी सीट से उठ खड़े हुए और चहल-कदमी करते हुए अपने को सामान्य बनाने का उपक्रम
करने लगे थे।
काफी देर तक यहॉं-वहॉं
का चक्कर काटने के बाद वे अपनी सीट पर आ बैठे। दहशत का असर अब भी उन पर जारी था।
जमीन पर और अलग-अलग
बेंचों पर पड़े मरीजों के अभिभावकों-शुभ-चिन्तकों को गहरी नींद में खुर्राटे भरते
देख वे सोच में पड़ गए कि इन्हें सुख की नींद कैसे आ गई होगी।
उन्होंने घड़ी की ओर
देखा। सुबह के पॉंच बज रहे थे। उनकी पूरी रात ऑंखों ही ऑंखों में कट गई थी।
वे अपनी इस सोच को लेकर
खुश हो रहे थे कि जानकी अब पहले से बेहतर होगी, अन्यथा इसकी
सूचना उन्हें अब तक मिल जाती।
वे सोच रहे थे- "
जानकी अब जो जीवन जिएगी निःसंदेह वह जयश्री का दिया हुआ जीवन ही जिएगी। सचमुच में
वे उसके अहसानमंद हैं। इस अहसान के बदले में वे, अपने जीवन
का जो भी सर्वश्रेष्ठ होगा, वे उसे उपहार में दे देंगे।
"
वे नहीं जानते, अजय की उसकी अपनी क्या सोच है। क्या वह जयश्री को पसंद करता है और जयश्री
भी अजय को? इसका पता तो उसके आने के बाद ही चल पाएगा।
अजय तीन
सालों से परदेश में है। संभव है, वह किसी गौरांग-बाला के जुल्फों
के व्योमपाष में न उलझ गया हो। वहाँ की युवतियाँ जानती हैं कि यहॉं का दूल्हा सबसे
टिकाऊ होता है।
अजय सुंदर है, स्मार्ट है, उसके तीखे नाक-नक्ष, शरीर शौष्ठव को देखकर कोई भी युवती उसकी ओर सहज ही आकर्षित हो सकती है,
जवानी होती भी तो अंधी है, पैर फिसलने में देर
ही कितनी लगती है ! ज्ञानी-ध्यानी परम तपस्वी विश्वामित्र भी तो मेनका की मादक
अदाओं के सामने कहॉं टिक पाए थे। ऐसे एक नहीं, अनेकों उदाहरण
देखे जा सकते हैं।
संभव है, शायद उसने, अपने इसी आशय की सूचना अपनी मॉं को
टेलीफोन पर दी होगी। अपने रंग-बिरंगे सपनों के रंगमहल को धूल-धूसरित होता देख उसका
हृदय कांप उठा होगा और सुनते ही वह गश्त खाकर गिर पड़ी। हर मॉं अपने बच्चों को लेकर
ख्बाब बनातीं हैं। अगर वे उन्हें पूरा होता हुआ नहीं देखतीं तो सदमें को गले से
लगा बैठती हैं।
उन्हें अब भी विश्वास
है कि अजय ने ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं किया होगा। संस्कृति-लोकमर्यादा और संस्कारों
की घुट्टी जिसे बचपन में ही घोंटकर पिला दी गई हो, उसके
बहकने के कम ही चांस होते हैं। आज हवा का रूख ही बदल गया है। अतः वे यकीनन तौर पर
कुछ भी नहीं कह सकते।
आधारहीन बातों को
सोच-सोचकर वे अपना दिमाक खराब करना नहीं चाहते थे। फिर उन्हें मालूम था कि अजय को
आने में अभी बीसो घंटे बाकी है। जब सामने होगा तो सारी बातों का खुलासा हो जाएगा।
वे उठकर छत पर चले आए
थे। भोर होने में अभी थोड़ा समय बाकी था।
छत पर पहुँचते ही
उन्हें शीतल हवा के झोंकों ने अपनी लपेट में ले लिया था। शीतल हवा का स्पर्श पाकर
वे चैतन्य होने लगे थे।
हल्का सा उजाला फैल गया
था। चिड़ियों की चहचहाट से समूचा वातावरण संगीतमय हो उठा और देखते ही देखते अनेक
रंगों की छटा से आकाश रंगीन हो उठा था। रंगों का अद्भुत संयोजन देखकर दंग रह गए
थे। रात अपनी सलमा-सितारों वाली काली-कमली उतारकर रंगों के सागर में उतरकर डुबकी
लगाने लगी थी। सहसा उन्हें कविवर प्रसाद की ये पंक्तियॉं याद हो आईं, जो उन्होंने प्रकृति की इस अनुपम सुंदरता और दृश्यों को देख कर लिखी
होंगी।
बीती विभावरी जाग री।
अंबर पनघट में डुबो रही। ताराघट उषा नागरी।
खगकुल-कुल सा बोल रहा।
किसलय का अंचल डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई।
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
ऑंखों में राग अमंद
पिये। अलकों में मलयज बंद किए।
तू अब तक सोई है आली।
ऑंखों में भरी विहाग री।
कवि की पंक्तियों को
गुनगुनाते हुए वे मानव जीवन में बिखरे रंगों के बारे में सोचने लगे थे।
परमपिता परमेश्वर ने
आदमी को मन-मस्तिष्क और ऑंखें उपहार में महज इसलिए दी है कि वह हर रस से उत्पन्न
होने वाले विभिन्न भावों से उत्पन्न रंगों की छटाओं को देख सके।
मन-मस्तिष्क और ऑंखें
मिलकर एक ऐसा त्रिकोण (केलेडेस्टकोप) का निर्माण करती है...उन्हें आकर्षक बनाती
है। हर रस की अनुभूतियों को अपनी शक्ति और सामर्थ्य से देख सकने वाले इन्सान को वे
अलग-अलग रंग-रूप व छटा दिखाती है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने
अपने तप और ज्ञान के बल पर यह खोज निकाला कि मानव शरीर के अंदर भी रंगों का अद्भुत
संयोजन हुआ है। इन रंगों के तालमेल में, जरा सा भी परिवर्तन
उसके आरोग्य पर गहरा प्रभाव डालता है।
क्राउनचक्र (सहस्त्रार
चक्र) में बैंगनी, पिय्यूटरीचक्र (आज्ञाचक्र) में गहरा नीला,
थायराइड (विशुद्ध चक्र) में हल्का नीला, थाईमस
(हृदयचक्र) में चमकदार हल्का हरा, सोलर प्लेक्सस (मणिपुर)
तीव्र पीला, स्वाधिष्ठान चक्र अथवा हारा चक्र में
गुलाबी-नारंगी एवं रूटचक्र (मूलाधारचक्र) में लाल रंग समाहित है।
उजाला फैलने लगा था।
भुवन-भास्कर अपने दिव्य-रथ पर आरूढ़ होकर निकल चुके थे। उनका रथ सहस्त्रों-किरणों
की आभा में जगमगा रहा था।
उन्होंने सिर झुकाकर
नमन किया और जानकी के शीघ्र रोगमुक्त होने की मंगल कामना के लिए प्रार्थना की और
सीढ़ियॉं उतरने लगे थे।
वे सीढ़ी के अंतिम
पायदान पर आकर खड़े हुए ही थे कि नर्स ने उन्हें सूचना दी कि जानकी को होश आ गया है
और अब वे उससे मिल सकते हैं।
खबर सुनते ही उन्हें
लगा कि खुशियों के हजारों-हजार रंग-बिरंगे दीप एक साथ जल उठे .
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6
वंश
वृक्ष
सुबह से ही उसकी बॉंयी ऑंख फरक रही
थी। जब जब भी उसकी बॉंयी ऑंख फरकी है, तब-तब उसे शुभ
समाचार सुनने को मिले हैं। तभी उसे डाकिया आता दिखा। उसने सहज रूप से अंदाज लगाया
कि आज वह उसके बेटे की चिट्ठी जरूर लेकर आयेगा। वह प्रसन्नता से भरने लगा था।
पोर-पोर से रोमांच हो आया था। उसका मृगी-मन कुलाचें भरने लगा था। बुझा चेहरा फिर
दिपदिपाने लगा था। सूखी देह फिर हरियल होने लगी थी। इसी दिन का उसे बेसब्री से
इंतजार था।
विगत चार माह से दिनेश का पत्र नहीं
आया था, उसी कारण वह पगलाया सा रहने लगा था। खाने-पीने में
उसे अरूचि होने लगी थी। रात की नींद व दिन का चैन छिन गया था। एकांत क्षणों में
उटपटांग विचार आते, जो दिल और दिमाग को मथ जाते। वह हमेशा
बेचैनी से भरा रहता था।
एक दिन तो वह डाकघर भी जा पहुँचा था
और अपनी चिट्ठियों के बारे में पूछताछ करता रहा था। डाकिये ने जब इंकार की मुद्रा
में अपनी भारी-भरकम गर्दन हिला दिया था, तो वह भी अंदर तक
हिल गया था। उसका शरीर पीपल के पत्ते की तरह कांप गया था। तरह-तरह के प्रश्न उसके
दिल में सालबोरर की तरह छेद करते रहे थे। अगरबत्ती की तरह वह दिन-रात सुलगता रहा
था।
ऐसा भी विचार मन में आया कि वह खुद
शहर चला जाये और अपनी ऑंखों से सभी को देख आए। चाहकर भी वह वैसा नहीं कर पाया था।
एक तो बुढ़ाती देह, उपर से कमजोर ऑंखों की वजह से वह हिम्मत ही नहीं
जुटा पाया था।
हॉं! एक बार वह शहर गया था। चिंटू का
जन्म-दिन था। संयोग से दिनेश भी साथ था। हवा से बातें करती मोटर में बैठ कर उसे
लगा कि वह हवा में उडा जा रहा है। बस से उतरते ही उसकी घिग्गी बंध गई थी। अनगिनत
वाहनों को बेलगाम दौडता देख वह डर सा गया था। ठगा सा रह गया था, गगनचुंबी इमारतों को देखकर। उसे तो इस बात पर भी आश्चर्य हो रहा था कि शहर
का आदमी चलता कम है और दौडता ज्यादा है। वह सोचने लगा था। आदमी की शक्ल में घोडे
दौड रहे हैं। भीड देखकर वह असहज हो उठा था। उसकी बुद्धि चकराने लगी थी। वह अकेला
जा पायेगा, इसमें संदेह होने लगा था। पहली बार में ही हिम्मत
जवाब दे गई थी।
दिनेश पत्र नहीं लिख पाया। इसका कारण
तो समझ में आता है सूरज की पहली किरण के साथ वह उठ बैठता है। दैनिक क्रिया-कर्म से
निजात पाकर वह बगल में टिफिन दबाये वह घर से निकल पडता है। उसे रास्ते में बस भी
बदलनी पडती है। अगर पहली बस नहीं पकडी जा सकी, तो दफ्तर समय पर
पहुॅंच पाना संभव नहीं। उसका कार्यालय भी तो उसके घर से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूरी
पर है। अतः समय का पाबंद होना बहुत जरूरी है, उसके लिए ।
अति-उत्साहित होते हुए दिनेश ने
बतलाया था कि वह दफ्तर से लोन लेकर मोटर सायकिल खरीदने की सोच रहा है। सुनते ही वह
बमक गया था। उसने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि बुरा ख्याल तत्काल मन से बाहर
निकाल फेंके।
बेलगाम भागते वाहनों को वह देख ही
चुका था। वह यह भी देख चुका था कि आदमी, आदमी की तरह सडक
पर चल भी कहॉं पाता है। सभी स्पीडमें होते हैं। सभी आगे निकल जाना चाहते हैं। आगे
निकल भागने की खतरनाक प्रवृत्ति के चलते वह गफलत का शिकार हो जाता है और असमय ही
मौत को गले लगा बैठता है। अपने अल्प प्रवास में वह कई दर्दनाक हादसे देख भी चुका
है।
शहर की न तो अपनी कोई तमीज होती है, न ही इंसान के मन में दया-ममता-सहानुभूति ही। हादसों को देखकर वह आगे बढ़
जाता है। मानो कुछ हुआ ही न हो। कोई रूकना नहीं चाहता। कोई पलटकर नहीं देखता।
हमदर्दी नहीं जतलाता। वह नहीं चाहता कि उसकी अपनी इकलौती संतान कभी दुर्घटना का
शिकार बने। उसने समझा दिया था कि बस से आने-जाने में ही फायदा है। समय बचाना यहॉं
जरूरी नहीं है। जान बचाना आवश्यक है। जान है तो जहान है। अंत में अपना फैसला
सुरक्षित रखते हुए उसने आदेश दिया था कि वह भूलकर भी मोटर सायकिल नहीं खरीदेगा और
न ही वह इसके लिए इजाजत ही देगा।
दिनेश की बात तो समझ में आती है कि
उसके पास दम मारने को फुर्सत नहीं है। जब फुर्सत ही नहीं है तो क्या खाक वह पत्र
लिख पाएगा। बहूरानी करती भी क्या है दिनभर! दिनेश ऑफिस चला जाता है। चिंटू अपने
स्कूल चला जाता है। फुर्सत ही फुर्सत रहती है उसके पास। वह चाहे तो एकाध
पोस्टकार्ड अपने बूढे ससुर के नाम लिख सकती है। पर महारानी लिख पाए तब न। निपट
देहाती-अनपढ-गंवार बहू बिहा लाता तो बात दूसरी थी। वह तो शहर की कॉलेज पढ़ी लड़की को
बहू बनाकर लाया था। ऐसा भी नहीं कि उसे पत्र लिखने का सउर नहीं होगा। सब कुछ जानती
होगी। पता नहीं... वह पत्र नहीं लिखती। दिनभर टीवी-फीवी से चिपकी रहती होगी। सच
है। समय कहॉं है, उसके पास। उसे रजनी पर क्रोध हो आया था।
अतीत के गर्त में उतरकर वह लहूलुहान
होता रहा। वह कुछ और सोच पाता, डाकिए ने पत्रों के बण्डल में
से एक पत्र छॉंटकर उसके हाथ में थमा दिया था। वह अपने विचारों की तन्द्रा की खोल
में से पूरी तरह से निकल भी नहीं पाया था कि डाकिया जा चुका था। उसे अपनी भूल का
अहसास होने लगा था।
पत्र हाथ में आते ही लगा कुबेर का
खजाना हाथ लग आया है। उसके पूरे शरीर में... प्रसन्नता की लहर दौडने लगी थी। उसने
लिफाफे को उलट-पलटकर देखा। पत्र पर लिखी इबारतदिनेश के हाथ ही की थी। वह दिनेश की
लिखावट अच्छी तरह से पहचानता था। प्रसन्नता के साथ उसे अफसोस भी होने लगा था। वह
सोचने लगा था- काश वह पढा-लिखा होता तो अब तक पत्र पढ जाता। समाचारों से अवगत हो
चुका होता। पता नहीं। दिनेश ने पत्र में क्या लिख भेजा है। मजमून जानने के लिए वह
उतावला हुआ जा रहा था। उसे गोपाल की याद हो आयी। उसने झट से पैरों में जूते डाले
और घर से निकल पडा। रास्ता चलते उसे होश आया कि वह बण्डी-धोती में ही घर से निकल
पड़ा है। कुर्ता पहनना तो वह भूल ही गया था। ष्गॉंव में सब चलता हैष् यह कहते हुए
व्यग्रता से आगे बढ चला था।
रास्ता चलते कई विचार भी साथ चलने
लगे। गोपाल घर में मिलेगा भी अथवा नहीं? वह खेलने-कूदने न
निकल गया हो! संभव है, वह खेत पर निकल गया हो। खैर! वह कहीं
भी होगा, वह उसे ढूँढ निकालेगा।
" बडा प्यारा बच्चा है गोपाल ।
फिर पूरी ट्यूनिंग भी तो मिलती है उससे । जहां भी मिलता है, दादाजी प्रणाम अथवा दादाजी पायलागू कहना नहीं भूलता। कोई भी काम बतलाओ,
फौरन कर डालता है। पढ़ने को कहो। झट तैयार हो जाता है। उसके पढ़ने का
ढंग भी निराला है। ऐसे बांचता है मानो ऑंखों देखा हाल सुना रहा हो। लिखने की कहो।
फौरन दवात-कलम उठा लाता है। लिखता भी क्या गजब का है, मानो
कागज पर मोती टांक रहा हो।
उसने दूर से ही देख लिया था। शायद वह
कहीं जाने की तैयारी में था। देखते ही वह उॅंची आवाज में बोल उठा- " गोपाल.......
दिनेश का पत्र आया है। " इसके आगे वह कुछ भी बोल नहीं पाया था। बोलने को बचा
भी क्या था। अब उसकी चाल में गेंद की सी उछाल थी। लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ वह आगे
बढ़ चला था।
" दादाजी-पायलागू " कहता
हुआ वह उसके पैरों तक झुक आया था। उसने उसे उठाते हुए अपने सीने से लगा लिया था।
उसे सीने से चिपकाते हुए उसे लगा, ममता का एक सोता अंदर बह
निकला है। भाव-विह्वल होते हुए उसके नेत्र सजल हो उठे थे।
गोपाल ने उसके हाथ से लिफाफा ले लिया
और ओटले पर बैठते हुए उसे खोलने लगा। वह भी उससे सटकर बैठ गया। विस्फारित नजरों से
वह उसे लिफाफा खोलते देखते रहा। अपनी सारी शक्तियों को समेटकर वह अपना ध्यान वहॉं
केन्द्रित करने लगा था। पत्र की तहें ठीक करते हुए अब वह पत्र पढने लगा था।
पिताजी...
पिताजी सुनते ही लगा कि किसी ने
मिश्री घोलकर उसके कानों में उडेल दिया हो। उसकी देह गन्ने की सी मीठी होने लगी
थी। उसे ऐसा भी लगने लगा था कि दिनेश सामने प्रत्यक्ष रूप से बैठकर बातें कर रहा
हो।
" आनंदपूर्वक हूँ । ऑफिस की
व्यस्तताओं की वजह से पत्र लिखने में काफी विलंब हुआ। पत्र न मिलने से आपको कितनी
मानसिक पीडाओं के बीच से गुजरना पड़ा होगा, आपपर कैसी,
क्या बीती होगी! इस दर्द का मुझे अहसास है। कृपया माफ करने की कृपा
करें। "
" पिताजी... मैंने कितनी ही बार
आपसे विनती की है कि आप यहॉं आकर हमारे साथ रहें। आपको लेकर मैं अक्सर चिंताओं से
घिरा रहता हूँ । आप गॉंव में निपट अकेले रहते हैं। आपको कहीं कुछ हो गया तो मैं
सहन नहीं कर पाउंगा, मेरी भी आखिर कोई जवाबदारी है आपके प्रति। आप
भलीभॉंति जानते ही हैं कि दफ्तर से बार-बार छुट्टियां लेकर मैं गॉंव नहीं आ सकता।
आप आना नहीं चाहते। मैं बार-बार नहीं आ सकता। ऐसे में कैसे काम चलेगा। आप के न आ
सकने का कारण मैं जानता हूँ । आप खेती-बाडी, मकान और मवेशियों
की वजह से वहॉं फॅंसे रहते हैं। मैं पूर्व में भी निवेदन कर चुका हूँ कि इन सबको
बेच डालिए। अच्छी-खासी रकम मिल जाएगी। हम या तो यहॉं बना-बनाया मकान खरीद सकते हैं
अथवा प्लॉट लेकर मकान बनवा सकते हैं। आप-हम-सब साथ रहेंगे। आपको चिंटू का भी साथ
मिल जायेगा। वह भी दादाजी-दादाजी की रट लगाए रहता है, उसे
आपका साथ मिल जायेगा। आप ही तो कहते हैं ष्मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है।ष्
अपने किसी निजी काम से गोविंद शहर आया
था। मुझसे उसकी मुलाकात हुई थी। मैंने ही पहल करते हुए उससे कहा था कि कोई
अच्छा-सा ग्राहक बताए । खेत-बाडी न बेचने की वह भी कह रहा था। मेरी ही जिद देखकर
वह सभी कुछ खरीदने को तैयार हो पाया है। वह यह भी कह रहा था कि तय कीमत के अलावा
भी वह पॉंच-पच्चीस ज्यादा देने को तैयार है। वह यह भी कह रहा था। घर की चीज घर में
ही रहेगी।
फैसला अब आपको करना है। इतना अच्छा
क्रेता कहॉं मिलेगा। आप अपनी सहमति-असहमति के बारे में लिख भेजें। मैं समय पर आ
जाउंगा ताकि रजिस्ट्री वगैरह करा ली जाये।
शेष
शुभ
आपका
दिनेश
एक-एक शब्द वह ध्यानपूर्वक सुन रहा
था। खेत-बाड़ी-घर बेच देने की बात सुनते ही वह बमक गया था। उसके चेहरे पर क्रोध की
परछाईयां छाने लगी थी। वह तनाव में घिरने लगा था। उसकी ऑंख क्रोधाग्नि में भड़कने
लगी थी। वह दॉंत भी पीसने लगा था। उसे ऐसा भी लगा कि असंख्य बर्र मक्खियों ने उस
पर अचानक धावा बोल दिया है। पूरे शरीर में दंश के निशान उभर आए हैं। शब्द अंदर
उतरकर विस्फोट करने लगे थे। अंदर सब क्षत-विक्षत था। वह तमतमाकर उठ खड़ा हुआ। गोपाल
के हाथ से लगभग पत्र छीनते हुए उसने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और हवा में उछालते
हुए घर की ओर लौट पड़ा।
गोपाल ने संभवतः आज पहली बार दद्दा को
इस तरह भड़कते देखा था। दद्दा का रोद्ररूप देखकर वह घबरा सा गया था। एक डर मन की
गहराईयों तक उतर आया था, विस्फारित नजरों से वह उसे जाता देखता रहा।
घर आकर वह कटे हुए लाठ के लट्ठे की
तरह बिस्तर पर गिर पड़ा था। वह आवेश में उबल रहा था। उसका दिमाग अब भी भिन्ना रहा
था। दिनेश की लिखी बातें रह-रह कर याद आती। शब्द कलेजे को छलनी कर रहे थे। इतना
होने के बावजूद उसकी सोचने-समझने की बुद्धि बराबर काम कर रही थी। उसे दिनेश की
बुद्धि पर तरस आने लगा था। वह सोच रहा था-" दिनेश अभी बच्चा है, अकल का कच्चा है। तभी तो वह एैसी-वैसी बातें सोच पाया। उसने कैसे अनुमान
लगा लिया कि दद्दा ऐसा कुछ कर सकता है। निश्चित ही गोविन्द ने उसे भड़काया होगा। वह
किसी अन्य काम से शहर नहीं गया था बल्कि वह अपने मनोरथ लेकर दिनेश से मिला होगा।
जब वह अपना दांव दद्दा पर नहीं लगा पाया तो उसने दिनेश को अपना मोहरा बनाया और वह
बेवकूफ उसके झांसे में आ गया। "
" गोविन्द पल्ले दर्जे का लंपट
है, बदमाश है, धूर्त है, चालबाज है, हरामी है। आये दिन वह गाँव में भी कोई न
कोई बखेड़ा करता रहता है। प्रपंच रचना उसकी फितरत है। उसकी गिद्ध दृष्टि हमेशा
दूसरों की जायजाद पर गड़ी ही रहती है। दाना डालकर तमाशा देखने की उसकी आदत है। साला
हरामी, हरामखोर, बदमाश। कुत्ते का
पिल्ला है." और भी न जाने कितनी ही
गालियॉं वह बुदबुदाते हुए देता रहा।
गोविन्द का नाम जुबान पर आते ही
लगा-मुंह का स्वाद कसैला-कड़ुआ हो आया है। उसका जी मिचलाने लगा था। आक-थू करते हुए
उसने गला साफ किया और खेतों की ओर बढ़ चला था।
हरी-भरी, लहलहाती फसलों को देखकर उसका चेहरा कमल की भॉंति खिलने लगा था। ऑंखों में
ठंडक भरने लगी थी। शीतल हवा के झोंकों ने बदन से लिपटते हुए शीतलता की लेपन चढ़
दिया था। तपते बदन को राहत मिलने लगी थी। शरीर पर उभर आये दंश के निशान मिटने लगे
थे।
खेत की मेढ़ों से चलते हुए वह वृक्ष की
टहनियॉं को हाथ में लेकर हिलाता चलता मानो वह अपने मित्र से हाथ मिला रहा हो। कभी
वह पेड़ों के तनों पर अपनी हथेली से हल्की-सी थाप देता। मानो वह उकी पीठ सहला रहा
हो, ऐसा करते हुए वह प्रसन्नता से भरने लगा था। ऐसा कुछ
करते हुए उसने अपने पिता को देखा था। बाल सुलभ जिज्ञासा के चल उसने पूछा था कि वे
ऐसा क्यों करते हैं? प्रश्न सुनकर पिता गंभीर हो गये थे। वे
आकाश की ओर सर उठाकर देखने लगे थे। शायद आकाश में फैले शब्दों के संजाल समेटने की
कोशिश कर रहे थे।
देर तक मौन रहने के बाद वे बोल पाए
थे। शब्दों के गहन-गंभीर शब्दार्थ छिपे हुए थे। शब्द क्लिष्ट नहीं थे। सीधे-सादे
शब्द थे। सरल और आसान, जिसे आसानी से समझा जा सके। इतने आसान कि अल्पज्ञ भी
समझ ले। उन्होंने जो कुछ भी कहा, सुनकर आश्चर्य एवं कौतूहल
होना स्वाभाविक था। उनके कहने का अंदाज कुछ-कुछ दार्शनिक की तरह था। कम शब्दों में
काफी कुछ कह गए थे। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए बतलाना शुरू किया।
" जानते हो मन्नू...! ईश्वर ने
धरती की उत्पत्ति के ठीक बाद पेड़-पौधे लगाए । फिर असंख्य जीव-जन्तु पैदा किए ।
बादल-बिजली-पानी वे पहले ही बना चुके थे। ईश्वर जानते थे कि कितना भू-भाग छोड़ा जाए
कितना नहीं। उन्होंने एक भाग धरती, तीन भाग पानी भर
दिया ताकि किसी जीव-जन्तु को पानी की कमी न पड़ जाए। धरती का खूब साज-सिंगार करने
के बाद उन्होंने मानव की उत्पत्ति की। "
" ईश्वर जानते थे मनुष्य की
फितरत को और उसकी नेक-नियति को भी। दिमाग का भरपूर उपयोग करने वाला वह पहला प्राणी
था। ईश्वर यह भी जानते थे कि एक दिन वह धरती में छेद करके पाताल तक पहुँचेगा ।
समुद्र को चीर कर वह नागलोक और आसमान में सुराख करके वह स्वर्गलोक तक आ धमकेगा और
उसे ही धता बतलाने लगेगा। जहॉं एक ओर वह साइंस और टेक्नालॉजी में परचम लहराकर अपनी
बुद्धि कौशल्य से नयी-नयी इबारतें लिखेगा तो वहीं एक दिन वह धरती के विनाश का कारण
भी बनेगा। "
" जिस धरती को ईश्वर ने स्वयं
अपने हाथों से दुल्हन की तरह सजाया-संवारा वह भला धरती का विध्वंश होते कैसे देख
सकता है ? । ईश्वर की फिर अपनी भी मजबूरी थी। यदि वह आदमी की उत्पत्ति नहीं करता
तो कौन बताता ईश्वर कैसा है ?. उसका स्वरूप कैसा है?. ईश्वर के मन में भी मानव को
लेकर कुछ लालसायें थीं। सारी क्रियाशीलता के गुण तो उसने केवल मनुष्य में ही डाले
थे। ईश्वर की मजबूरी कहें अथवा कुछ भी कह लें। उसे आदमी को धरती पर भेजने का
निर्णय लेना ही पड़ा था। "
" जानते हो मन्नू ! इन्हीं
पेड़-पौधों ने आदमजात को खाने को मीठे-मीठे फल खाने को दिए तो वही तन ढंकने को अपनी
खाल। इन्हीं पेड़ों की छाल पहिनकर तो वह सभ्य कहला पाया। अपनी नंगाई ढक पाया। ये
बात अलग है कि आदमी ने बदले में इन्हें क्या दिया। आज वह निर्ममता से उनके विनाश
में जुटा हुआ है। सच मानो मन्नू। ये ही असली धरती-पुत्र है। ये एक पल के लिए भी
धरती का साथ नहीं छोड़ते। वृक्षों को ऋषि भी कहा गया है। ऋषि सदा से ही कुछ न कुछ
देते आए हैं। भले ही मनुष्य इनकी कितनी ही प्रताड़ना क्यों न करें। "
" मन्नू....! एक पते की बात और
सुनो। आदमजात का कोई भी उत्सव हो। तीज -त्यौहार हों, बिना
वृक्ष अथवा वृक्षों की प्रजाति के उपस्थिति के संपन्न नहीं होते, यहॉं तक आदमी जब प्राण त्यागता है तो वृक्ष ही उसका साथी साबित होता है,
वह भी उसके तन के साथ जलता हुआ अपना अस्तित्व मिटा देता है। "
" आदमजात जब प्रसन्नता से इनसे
मिलता है तो ये बेहद खुश हो जाते हैं, वे भी प्रसन्नता
से नाच उठते हैं। वे इठलाने लगते हैं। कोई उन्हें गले लगाए अथवा टहनी पकड़कर हिलाऐं
सो ये प्रसन्न होने लगते हैं। हवा इनसे मिलकर सारी प्रसन्नता दूर-दूर तक फैला देती
है। पूरा वातावरण ही प्रसन्नता से भर उठता है। यदि इन्हें क्रोध में धारदार हथियार
दिखलाओ तो सिहर उठते हैं। इन्हें भी भय सताने लगता है। मेरे पिता ने केवल इतना ही
समझाया था। उसमें प्रेम का दर्शन छिपा हुआ है। "
" फिर धरती। धरती तो मां होती है, हम लोगों की । बिना मां के बच्चों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। वह अपनी
जमीन को एक निष्प्राण टुकड़ा नहीं मानता। जितनी उसके पास है वह उसे सम्पूर्ण रूप
में मां ही मानता आया है। वह अपनी मां को बेचने की कैसे सोच सकता है। एक पुत्र
अपनी मां को कैसे बेच सकता है?. उसे क्या अधिकार है कि वह ऐसा कर सके?. इसी धरती
पर, इसी जमीन पर उसका वंश-वृक्ष विस्तार लेता आया है। दस
पीढ़ी, बीस पीढ़ी अथवा इससे कुछ ज्यादा। वह नहीं जानता। उसे
अपनी पिछली सात-आठ पीढ़ी के बुजुर्गों के नाम कण्ठस्थ याद हैं। वह कदापि अपनी जड़ों
से नहीं कटना चाहता । जड़ों से कटने का परिणाम क्या हो सकता है, वह यह भली-भॉंति जानता है। वह किसी भी कीमत पर अपनी जड़ें छोड़कर कहीं नहीं
जाएगा और न ही जमीन किसी और को बेचेगा। वह गोविन्द के मिशन को सफल नहीं होने देगा।
कदापि नहीं। "
उसने खेत से अंजुली भर मिट्टी उठायी।
अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए वह भावुक हो उठा था। उसके नेत्रों से अश्रु बहने
लगे थे। अपनी मां के प्रति उमड़ आयी प्रेम की सरिता उसकी समूची देह में हरहराकर
विस्तार लेने लगी।
मनोहर को अपनी भूल का अहसास होने लगा
था। उसे याद आया। उसे कभी दिनेश को इस रहस्य से परिचित नहीं करवाया। दिनेश ने भी
कभी कुछ पूछा ही नहीं। वह रह भी कहां पाया । भले ही वह पूछ न पाया हो। यह उसका
कर्तव्य बनता है कि वह उसे बतलाए । एक पीढ़ी, आने वाली पीढ़ी को
बताते चले यह क्रम बना ही रहना चाहिए ।
वह दिनेश को समझायेगा कि वह नौकरी
छोड़कर चला आए । क्या रखा है शहर में। भीड़भाड़, चीखते-चिल्लाते,
भागते-शोरमचाते वाहन। शोर-शराबा। यही तो है शहर में। वहॉं प्राणदायक
वायु कहां ?. सॉंस लेना भी मुश्किल । रहने को तंग-अंधेरी खोलियॉं, जहॉं चार लोग भी न बैठ सके। खाने-पीने की सभी चीजें मिलावटी । पग-पग पर
डेरा डाले बैठी मौत । जन-जीवन को निगलने के लिए तत्पर बैठी है।
सुरसा की तरह बदन फैलाते जा रहे शहरों
को सुनकर वह हतप्रभ था। जब से पास वाले शहर ने अपना विस्तार लेना शुरू किया है, तब से उसने गाँवों की खुशहाल जिंदगी को निगलना शुरू कर दिया है। गॉंवों से
पढ़े-लिखे नवयुवक मेहनत मजदूर-मिस्त्रियों को शहर के आकर्षण ने गॉँव छोड़ने पर मजबूर
कर दिया है । गाँ वों में बचे रह गये हैं वे लोग जो खेती-बाड़ी छोड़कर नहीं जा सकते,
वे लोग जो अपाहिज हैं, लाचार हैं, बीमार हैं। वे ही बचे रह गये हैं, बाकी सभी को शहर
ने अपने में समेट लिया है।
उसे गॉंधीजी की याद हो आयी। गॉंधीजी
कभी इसी गॉंव में आये थे। जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कभी कहा था। गॉंवों
में ही हिन्दुस्तान बसता है। अतः सरकार को चाहिए कि वह सारी योजनाऐं गॉंव से ही
बननी चाहिए। पहिले गॉंवों का विकास हो, तब जाकर समग्र
देश खुशहाल हो सकेगा। आजादी के बाद गॉंधी बाबा की बात जैसे भुला ही दी गई। शहर,
नगरों में और नगर-महानगरों में विस्तार लेते चले गए। गॉंव कंगले और
उपेक्षित होते चले गए।
उसे मालूम है, दिनेश की कितनी पगार मिलती है। वह यह भी जानता है कि सामान्य परिवार को
जीवन-यापन करन के लिए कितने रूपयों की जरूरत पड़ती है। वह यह भी जानता है कि उसे
माह दो माह अथवा चार माह में कुछ रकम भी भेजनी पड़ती है। तब जाकर शहर का खर्च उठा
पाता है। वह दिनेश को समझाएगा और बतलाएगा भी कि वह उतनी राशि तो नौकरों में बॉंट
देता है। फिर क्या जरूरत है शहर में रहकर समय बरबाद करने की। अगर वह एक नौजवान को
समझाने में सफल हो गया तो अपने आपको धन्य मानेगा। वह गर्व से यह तो कह सकेगा कि
बाबा को वह भले ही सम्पूर्ण रूप से नहीं भी जी पाया तो क्या हुआ, एक भटके हुए आदमी को रास्ते पर ला तो सका है।
विचारों की श्रृंखला रूकने का नाम ही
नहीं ले रही थी। उसने देखा। सूरज अस्ताचल की ओर बहा चला जा रहा है। देखते ही देखते
सुरमई अंधियारा गहराने लगा था। जड़-चेतन सब एकाकार होने लगे थे।
बैलों के गले में बंधी घण्टियों के
मद्दम स्वर उसके कानों से आकर टकराने लगे । उसने अनुमान लगाया कि पड़ोसी किसान घर
लौट रहा होगा। कौन होगा? वह यह नहीं जानता।
घण्टियों के स्वर अब स्पष्ट हो चले थे
पास से गुजरने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि गोविंद ही था।
मेढ़ पर बैठकर उसने टेर लगायी- " कौन
गोविन्द. "
" हाँ दद्दा मैं गोविन्द हूँ."
" आज बड़ी देर कर दी तैने । जरा
एक बात तो सुन। मइने सुनौ हों... तू खेत बारी सबै कुछ बेचन बारो है। का कीमत धरी
है तैने । कीमत जो भी धरो होवे, वो से पच्चीस-पचास जादा
दूंगो। फिर घर की चीज घरई में रहनी बी चाहिये, जा में भलाई
भी है। "
गोविन्द को उसने माकूल जवाब दे दिया
था। गोविन्द को मौन पाकर वह मुस्कुरा उठा था। गोविन्द के पास कोई जवाब नहीं था। रह
भी कहाँ सकता था। बिना प्रत्युत्तर दिये वहॉं से खिसक जाना ही श्रेयस्कर लगा था
उसको। सुना-अनसुना करते हुए वह तेजी से आगे बढ़ गया ।
थोड़ी देर के बाद । गहन अंधकार के गर्भ
को चीरता हुआ चांद, आकाश-पटल पर चमचमाने लगा था।
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7
बेपर
आवाजें
सूरज के उदय होने के साथ ही माहौल
गरमाने लगता। जैसे-जैसे सूरज उपर उठता, पारा भी
उॅंचाइयॉं छूने लगता और दोपहर होते ही आसमान से आग बरसने लगती। सांय-सांय, के सायरन बजाती हवा, पुलिसिया अंदाज में
सड़कों-गली-कूचों में गश्त लगाने लगती। घरों और दुकानों के पट बंद हो जाते। लोग
घरों में दुबके रहते। जानवर, दीवालों की ओट ले लेते अथवा
वृक्षों की छॉंव तलाष कर ठहर जाते। वाहनों के काफिले, थम से
जाते। सारा नजारा देखकर ऐसा लगता कि शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया हो।
सूरज शहर का माहौल बिगाड़ दे, इसके पूर्व हरीश अपने सुबह के काम निपटाकर कार्यालय जा पहुँचता है। ऑफिस
का वर्किंग-अवर ग्यारह बजे से शुरू होता है और इस समय सिवाय चौकीदार के वहॉं कोई
भी नहीं होता।
चौकीदार उसे आया देख मुस्कुराता है और
अदब के साथ सलाम लेता है। वह भी होले से मुस्कुराता है और सलाम के जवाब में
नमस्कार कहता है और अपने कैबिन में जा समाता है। पूरा कार्यालय एअर-कंडिशन्ड है।
वह या तो अपना पेन्डिंग कार्य निपटाने लगता है या फिर ड्राज से कोई साहित्यिक-पत्रिका
निकालकर पढ़ने बैठ जाता है।
हरीश को यहॉं आए हुए, एक बरस से उपर हो चुका है और वह अब तक अपने पड़ोसियों से खास जान-पहचान
नहीं बना पाया है। उसने पहल करते हुएा अपने पड़ोसी से बात करना चाहा था। नतीजा सिफर
निकला। उसे वह देर तक अजनबियों की तरह घूरता रहा फिर बुरा सा मुॅंह बनाते हुए अपने
दड़बे में जा घुसा। उसकी इस हरकत पर उसे क्रोध आया। ष्बड़ा अजीब आदमी हैष् मन ही मन
बुदबुदाते रह गया था वह। उसके हाथ जुड़े के जुड़े रह गए थे।
उसके कार्यालय का भी लगभग वही हाल था।
हाय-हैलो के अलावा बात आगे बढ़ नहीं पायी थी। वह यह सोचकर चुप हो जाता कि शायद इस
शहर का, कुछ ऐसा ही दस्तूर होगा।
उसे अपने गॉंव की याद हो आती। गाँव की
याद आते ही उसका मन-मयूर थिरक उठता और वह यादों में खोता चला जाता।
उॅंची-नीची पहाड़ियों के मध्य, कमल-सा खिला एक गाँव । गॉंव के चारों तरफ फैली सघन अमराइयॉं। पेड़ों से
झरती ठंडी-ठंडी हवाएं , कल-कल, छल-छल,
के स्वर निनादिन करती, पहाड़ों से उतर कर बहती
अल्हड़ नदी। लम्बे-चौड़े खेत। खेतों में लहलहाती फसलें। आसमान के सुराख से फूटती
रंग-बिरंगी रोशनी। पेड़ों की शाखाओं पर धमा-चौकड़ी मचाते शाखा-मृग। चिंचियाती
चिड़ियों का समूह। हर छोटी-बड़ी चीजों में भरे होते जादुई रंग। नारी कण्ठों में इतनी
लोच होती कि कोयल भी शरमा जायें। चारों तरफ से मानों सपनों की बरसात होती रहती।
तितलियों सा फुदकता उसका मन, कहीं भी एक जगह ठहरना नहीं
चाहता।
घर में मॉं-पिताजी है। दो छोटे-भाई
बहन है। छोटे से घर में मानो स्वर्ग सिमट आया हो। मॉं-बाप का प्यार और आशीर्वाद
पाकर वह निहाल हो उठता। गॉंव में जितने भी घर हैं, वे सारे
की सारे उसके अपने हैं। किसी में मामा-मामी हैं। किसी में चाचा-चाची। किसी में
फूफा-फूफी। किसी में भाई-भौजाई रहते हैं। गफूर चच्चा तो जैसे उस पर जान ही छिड़कते थे।
बाबा रामदीन को वह अक्सर यह कहते हुए
सुनता था। " जननी-जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसी " और भी न जाने
क्या-क्या। शब्दों में गहरे अर्थ भरे होते। सुनने में अच्छे तो लगते थे लेकिन उनका
अर्थ वह उस समय समझ नहीं पाया था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया और किताबों से जुड़ता
गया, उन बातों का अर्थ, उनका मर्म,
उनकी गहराईयों से परिचित होता चला गया। सच ही कहा करते थे बाबा-"
गाँवों में स्वर्ग बसता है। "
गाँव में रहकर उसने मैट्रिक की
परीक्षा पास की और पास वाले शहर से कॉलेज की पढ़ाई । उसने कभी सपने में नहीं सोचा
था कि उसे पढ़-लिखकर बित्तेभर पेट के गढ्ढे को भरने के लिए दूसरे शहर भी जाना पड़
सकता है।
विकास की अचानक आयी ऑंधी ने गॉंव की
गॉंव उजाड़ दिये। गॉंवों में अब बूढ़े और अपाहिजों के अलावा कोई नहीं रहता। वे लोग
रहते हैं जो खेती-बाड़ी से जुड़ें हैं या फिर निठल्ले। विकास की अवधारणा से, गाँव रहने लायक नहीं बचे और शहर बसने लायक।
गाँव की मिट्टी की सोंधी- सोंधी महक
और अपने स्वजनों-परिजनों की याद आते ही उसकी देह गन्ने की सी मीठी होने लगी थी।
गुजरे हुए दिनों की पगडंडियों पर वह
देर तक चहल-कदमी करता रहा और शीघ्र ही अतीत की भूल-भुलैया से वर्तमान में लौट आया
था।
ऑफिस में बैठे-बैठे उसे अपने मित्र
जगदीश की याद हो आयी। उसकी खोजी नजरें, ऑफिस की खिड़की के
उस पार उतर कर, उसे खोजने का उपक्रम करने लगती।
उस दिन का दिन, यादगार दिन था उसके लिए । जब वह इस शहर में, पहली
बार आया था, तो उसने एक लॉज को अपना अस्थायी ठिकाना बनाया
था। फिर उसकी जिंदगी, एक बने बनाए ढर्रे पर चल निकली थी। "
होटल में खाना और मस्जिद में सोना." जैसे मुहावरे का अर्थ, अब उसकी समझ में आया था।
शीघ्र ही वह अपने एकाकी जीवन से उबने
सा लगा था। उसे एक मित्र की तलाश थी। एक ऐसा मित्र जिससे वह अपने मन की बात कह सके
और अपने सुख-दुःख बॉंट सके। शीघ्र ही उसकी खोज पूरी हुई। जगदीश को मित्र रूप में
पाकर वह बेहद खुश हुआ था।
जगदीश की जिन्दा-दिली, उसके बात करने का अंदाज, होंठों पर खेलती-ठिठककर ठहर
जाती हॅंसी, ये सब देखकर वह बेहद प्रभावित हुआ था और उसने
मित्रता स्थाति करने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया था। जगदीश आज उसका मित्र ही नहीं
अपितु भाई से बढ़कर है।
जगदीश ने ही बताया था कि यह शहर सहसा
किसी पर विश्वास नहीं करता। विश्वास करने की इसने बड़ी-बड़ी कीमतें चुकाई है और जब
से विश्वास अर्जित हो जाता है, तो वह सर ऑंखों पर बिठाने में
पीछे नहीं रहता।
जगदीश के कहने पर उसने, लॉज की चौहद्दी छोड़कर, एक मकान किराये पर उठा लिया
था तो वह किराये का मकान, जिसे वह अपना तो कह ही सकता था।
घर-गृहस्थी की चीजें जोड़ी जाने लगी
थी। अब वह घर पर ही खाना पकाने लगा था। शुरू में खाना पकाकर खाने में मजा तो आ रहा
था, लेकिन जल्दी ही उसका मन उचाट सा गया। बहुत सारा समय,
खाना पकाने, खाने और बर्तन मलने में जाया हो
जाता था। उसे पढ़ने का बेहद शौक था और वह उसके लिए समय नहीं निकाल पा रहा था।
अंततोगत्वा उसे फिर होटलों की शरण में जाना पड़ा और शीघ्र ही वह पेट का मरीज बन
बैठा।
जगदीश ने सलाह दी कि वह एक खाना पकाने
वाली महाराजन रख लें। उसे सुबह-शाम ताजा खाना मिलेगा और घर की समुचित साफ-सफाई भी
होती रहेगी। सुझाव अच्छा था लेकिन वह उसे तत्काल क्रियान्वित करने के पक्ष में
नहीं था। वह एक लम्बे अरसे से घर नहीं जा पाया था। उसकी दिली इच्छा थी कि वह एक
बार घर हो आए और अपने नवजात पुत्र को देखता भी आए।
कार्यालय सप्ताह में पॉंच दिन लगता
था। सोम व मंगल की छुट्टियॉं थी। उसने एडवांस में तीन दिन के आकस्मिक अवकाश के लिए
आवेदन प्रस्तुत कर दिया था और रेल्वे से सीट भी आरक्षित करवा ली थी।
निर्धारित समय से पूर्व वह अपने बॉस
के चेम्बर में जा पहुँचा और छुट्टियॉं प्रदान करने की विनती करने लगा। बॉस ने उसका
निवेदन ठुकराते हुए, लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया। " हरीश इस समय मैं
तुम्हें छुट्टी नहीं दे सकता। तुम्हें मालूम ही है कि आधे से ज्यादा स्टॉफ छुटटी
पर है। कोई मेडिकल पर है तो कुछ के यहॉं शादी-ब्याह सम्पन्न होने हैं। ऐसे
क्रिटिकल पोजीशन में छुट्टी नहीं दी जा सकती। जैसे ही ऑफिस की पोजीशन नार्मल होती
है, तुम चले जाना। "
बात सुनकर उसका मन कसैला हो उठा था।
वह तर्क और कुतर्क में फॅंसना नहीं चाहता था। जानता था कि इससे घातक परिणाम ही हो
सकते हैं। वह मन मसोसकर रह गया था। फिर उसका घर भी इतना दूर था कि वह चार दिन में
लौटकर नहीं आ सकता था।
गरमी अपने चरम पर थी और उसे हर हाल
में, घर पर ही रहना था। घर में निठल्ले बैठे रहने की
अपेक्षा अच्छे-अच्छे नॉवल पढ़ना, उसे ज्यादा श्रेयस्कर लगा
था। उसने ऑफिस की लायब्रेरी से तीन किताबें आबंटित करा ली थी। उसमें एक थी
कमलेश्वर की " कितने पाकिस्तान." मन्नु भंडारी की- " मैं हार गई." और
तीसरी मैत्रेत्री पुष्पा की- "अल्मा कबूतरी." उसे अपनी पढ़ाकू-शक्ति पर
पूरा भरोसा था कि वह चार दिन में तीनों किताबें पढ़ लेगा।
साहित्य जगत के लब्धप्रतिष्ठ, बहुआयामी सृजनशील रचनाकार, पत्रकार, लेखक कमलेश्वर के उपन्यास की प्रसिद्धि के बारे में उसने काफी कुछ सुन रखा
था। लेकिन यह उसका अपना दुर्भाग्य था कि वह किताब खरीद नहीं पाया था। उपन्यास
हाथों-हाथ बिक रहा था। उसे पढ़ना चाहने वालों के सिर पर जुनून इस कदर हावी था कि
अनुल्पधता की दशा में फोटो-प्रतियॉं प्राप्त कर अपनी मानसिक भूख मिटा रहे थे और
जैसे ही उसकी नजर बुक सेल्फ में रखे उपन्यास पर पड़ी, बिना
देरी किए उसने उसे बुक करवा लिया था।
किताब हाथ लगते ही उसका सारा तनाव दूर
होने लगा था।
घर आकर उसने अपने कपड़े बदले। गर्मी के
मारे बुरा हाल था। पसीने की चिपचिपाहट और दुर्गंध से और भी बुरा हाल था और वह अब
नहाना चाहता था। उसने शॉवर ऑन किया और देर तक उसके नीचे खड़ा रहा। हालॉंकि पानी में
उतनी ठंडक नहीं थी, जितनी कि होनी चाहिए थी। बावजूद इसके उसे अच्छा लग
रहा था।
यहॉं-वहॉं समय न गॅंवाते हुए उसने
उपन्यास उठा लिया।
कमलेश्वर की विलक्षण लेखनी का जादू, उस पर छाने लगा। रूमाल से बात होते हुए अदीब तक जा पहुँची थी। वह उसका
परिचय नयी-नयी सभ्यता से करवा रहा था। लेखक की कलात्मक सोच, गहरी
समझ पिरो देने की अद्भुत क्षमता व नूतन प्रयोगों से वह बेहद प्रभावित हुआ था।
उपन्यास पढ़ने में वह इतना खो चुका था कि उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि गला
सूख आया है और उसे पानी पीना है।
टेबिल पर रखी पानी की बोतल उठाते समय
उसकी नजरें अनायास ही दीवार घड़ी पर जा टिकी। रात के दो बज चुके थे। पानी पीकर उसने
गले को तर किया और फिर पढ़ने लगा। वह कब तक पढ़ता रहा, यह तो उसे
याद नहीं, लेकिन जब उसकी नींद खुली तो उसने अपने आप को टेबिल
पर सिर टिकाए, सोता हुआ पाया था।
नींद खुलने के साथ ही वह पलंग पर आकर
लेट गया। उपन्यास में वर्णित सारे घटनाक्रम उसकी ऑंखों के सामने, सिनेमा की रील की तरह चलायमान हो रहे थे। देर रात तक जागते रहने से
उत्पन्न होने वाला आलस्य नहीं था और न ही शरीर में ऐंठन-वैठन जैसी कोई चीज। वह
अपने आप को एकदम तरोताजा सा महसूस कर रहा था।
देर तक यूँ ही पड़े रहने के बाद उसे
नहाना एकदम जरूरी सा लगा। उठते हुए वह बाथरूम में जा समाया।
दोपहर हो चुकी थी। गरमी अपने चरम पर
थी। कूलर नकारा सिद्ध हो रहा था। उसने एक तौलिए को भिगोया और पीठ पर डाल लिया। ऐसा
करते हुए उसे अच्छा लग रहा था।
उपन्यास में खोया हुआ था वह। तभी उसे
मेन गेट पर होने वाली चर्र-मर्र की कर्कश आवाज सुनायी दी। कौन हो सकता है इस वक्त? ऐसी कड़ी धूप में बाहर निकलने की किसने जुर्रत की? सोचते
हुए उसके माथे पर बल पड़ने लगे।
कुर्सी पर से उठते हुए उसने खिड़की पर
पड़े मोटे पर्दे को थोड़ा सा हटाया। देखा बाहर तेज धूप थी। सड़क सूनी पड़ी थी और एक
महिला गेट पार कर सीढ़ियॉं चढ़ रही थी। उसने एक हाथ से रेलिंग पकड़ रखी थी और दूसरे
से घुटने पर दबाव बनाए हुई थी।
देखते ही वह समझ गया। आने वाला और कोई
नहीं बल्कि महाराजन बाई थी, जिसके बारे में जगदीश ने उसे विस्तार से बता दिया
था। वह कुछ और सोच पाता, दरवाजे पर दस्तक की आवाज सुन,
वह दरवाजा खोलने आगे बढ़ा।
दरवाजा खुलते ही एक तेज गरम हवा के
झोंके ने उसे अपनी लपेट में ले लिया। ऑंखें चुंधियाने लगी। ऑंखों के सामने हथेली
की ओट बनाते हुए उसने, उससे कहा- " इतनी कड़ी धूप में आने की क्या
जरूरत थी। आना ही था तो शाम को चली आती या सुबह आ जाती। क्या तुम्हें मरने से डर
नहीं लगता?. जल्दी...जल्दी से अंदर आ जाओ, वरना तलुओं में फफोले पड़ जाएंगे."..
उसकी आवाज में क्रोध उतर आया था।
हालात ही कुछ ऐसे थे, क्रोध हो आना स्वाभाविक था। वह अपने पर नियंत्रण
नहीं रख पाया था।
भीतर आकर वह दीवार का सहारा लेकर फस्स
से नीचे बैठ गई और अपनी असामान्य हो आयी सॉंसों को सामान्य बनाने में लग गई । वह
भी अपनी कुर्सी पर आकर धॅंस गया। क्रोध और विवेक, कभी भी,
एक साथ, रह नहीं सकते।
एक समय में, कोई एक ही रह सकता है। क्रोध जा चुका था और उसका विवेक लौट आया था। उसे अब
अपने कहे पर पछतावा होने लगा था।
कुर्सी की बेक से सिर टिकाते हुए वर
उपर देखने लगा। छत सपाट व भावशून्य थी। पंखा अपनी जगह खड़ा, चकरघिन्नी काट रहा था। देर तक उसे घूरते रहने के बाद अपनी ऑंखें मींच ली
थी। शायद वह अपने मन के भीतर उतर का परिस्थितियों का आंकलन करने लगा था। जगदीश के
द्वारा बतलाई गई बातें उसके दिमाग में टेप की तरह बजने लगी थी।
सुखी परिवार था उसका अपना। शहर से लगी
हुई उनकी अपनी जमीन थी। अच्छी कास्त होती थी। उन दोनों के अलावा उनकी अपनी एक बेठी
थी। बेटी सयानी हो चली थी। उन दोनों का एक ही सपना था। बेटी के हाथ पीले हो जाए।
बड़े अरमानों से वे उसका लालन-पालन, पोषण करते थे।
उन्हें पता ही नहीं चला कि कब और कितने नामालूम ढंग से दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा
है।
शहर अपना आकार बढ़ा रहा था। जमीन के
दाम आसमान छू रहे थे। एक बिल्डर गिद्ध की तरह उनके सुखों पर झपट्टा मारने के लिए
अपने पर तौल रहा था। वह मुँह-मॉंगी कीमत देने को तैयार था लेकिन वे अपनी जमीन
बेचना ही नहीं चाहते थे। बिल्डर अब नीचता पर उतर आया था। कभी वह खड़ी फसलों में आग
लगवा देता, तो कभी उन पर हमला करवा देता। वह जब नहीं माना तो
उसकी बेटी अगवा करा दी गयी। पति इतने दारूण दुःख नहीं झेल पाया और एक दिन... वह
दुनिया से ही रूखसत हो गया। वह खून के ऑंसू बहाती, गुहार
लगाती लेकिन कौन सुनने वाला था? किसको इतनी फुरसत थी। बिल्डर
ने मुखौटा लगा रखा था। एक तरफ वह उसका हितैषी दिखायी देता तो दूसरी तरफ कुचक्र
चलाता रहता था।
धोके से कागजों पर लगाए गए अॅंगूठे के
निशानों की वजह से वह बेघर करा दी गई। उसने कई बार आत्महत्या तक का प्रयास किया
लेकिन उसे जीना था हर हाल में, दुःख उठाते रहने के लिए ।
वह और ज्यादा सुन नहीं पाया था। उसने
जगदीश से बात बदल देने की प्रार्थना भी की थी। जगदीश ने उसे यह भी बतलाया था कि
यदि वह मकान बदली नहीं करता, तो शायद ही वह उसे काम से बंद
करता। जिस जगह उसका अपना मकान है, वह काफी दूर है और वह इतनी
दूरी तय नहीं कर सकती थी। दोनों की अपनी मजबूरियॉं थी ।
वर्तमान में लौटते हुए उसने, उस अधेड़ महिला की ओर देखा। चेहरा भाव-शून्य व सपाट था। वक्त की मकड़ी ने,
उसके चेहरे पर सघन जाले चुन दिए थे। उसकी ऑंखें अंदर तक धॅंसी हुई
थी।
उसकी दुर्दशा देख हरीश के दिल और
दिमाग में दूर-दूर तक दुःख का एक समन्दर फैलता चला गया और उसकी भयानक चीख चारों
तरफ गूंजने लगी थी । घबराकर उसने अपनी नजरें, उसके चेहरे परसे
हटा ली।
वह उठ खड़ा हुआ। किचन में गया। फ्रिज
खोला और एक लोटा पानी गटागट पी गया। पानी के कुछ छींटे चेहरे पर मारे। ऐसा करते
हुए उसे कुछ राहत सी मिलने लगी थी।
लौटकर उसने अपनी पेंट की जेब से कुछ
रूपये निकाले और उसकी झुर्रियों से भरी हथेली पर रखते हुए कहा- " ये कुछ रुपये
हैं, इन्हें रख लो।
सबसे पहले अपने लिए नयी चप्पलें खरीदना और दो साड़ियॉं भी और कल से काम पर आ जाना."
वह इतना ही बोल पाया था।
पैसों को उसकी हथेली पर रखते हुए, उसने गौर से देखा था। उसकी हथेलियॉं कॉंप गई थी। शायद प्रसन्नता की कोई
किरण फूटी थी उसके भीतर। ढेरों सारे आशीष देते हुए वह उठ खड़ी हुई। उसे सुनते हुए
ऐसा लगा कि उसके कलेजे के कोटर में बैठा कोई नन्हा परिंदा चहका हो। तार-तार हो आयी
साड़ी के पल्लू से ऑंसुओं को पोंछते हुए उसके हाथ जुड़ आये थे और अब वह बाहर निकल गई
थी।
हरीश की ऑंखें, उसका पीछा कर रही थी लगातार। वह सीढ़ियॉं उतर रही थी। गेट पार कर वह अपने
घर की ओर बढ़ चली थी। उसने एक बार पीछे पलटकर देखा। उसकी पनियानी ऑंखों में आशा के
सैकड़ों दीप झिलमिलाते दिख रहे थे।
दूसरे दिन वह ठीक समय अपने काम पर आ
गयी, उसके पैरों में नयी चप्पलें थी और उसने नयी साड़ी भी
पहन रखी थी। उसकी उदास ऑंखों में अब झिलमिल मुस्कुराहट थी।
चौके में कोई खास सामान तो था नहीं।
जो था वह एक अकेले आदमी के लिए पर्याप्त था। गैस-स्टोव्ह पर उबले हुए दूध, चाय की मोटी परतें जमी थी, जो सूख कर बदरंग हो गई
थी। जूठे बर्तन सिंक में बेतरतीब पड़े थे और फर्श पर सिगरेट के जले-अधजले चुट्टे
बिखरे पड़े थे। चौका देखकर वह मुस्कुराए बगैर न रह सकी थी।
वह काम में जुट गई। हरीश अपने कमरे
में आ गया। उसका मन अब किताबों से जुड़ नहीं पा रहा था। शायद उसका मन कॉंटों में
उलझ गया था। उलझन इस बात को लेकर थी कि वह उसे किस नाम से बुलाए। बाई कहकर वह एक
महिला जाति की बेइज्जती नहीं करना चाहता था। उसे हर हाल में एक महिला के सम्मान की
रक्षा करना था।
उसकी कद-काठी देखकर उसे अपनी मॉं की
याद हो आयी। मॉं के उम्र की तो होगी वह भी। यही कोई चालीस-पैंतालीस के आसपास की।
सोचते हुए उसने निर्णय ले लिया था कि वह उसे अम्माजी कहकर ही पुकारेगा।
ऐसा निर्णय लीते हुए उसे प्रसन्नता का
अनुभव हुआ था, प्रसन्न बदन वह किचन में आया। देखा, सारी चीजें करीने से जमा दी गई थी, फर्श चमचमा रहा
था।
उसे संबोधित करते हुए उसने कहा "
अम्माजी... खाना दो लोगों के लिए बनेगा, आप भी यहॉं भोजन
कर लिया करना। "
सुनते ही उसकी ऑंखों की कोर भींग आयी
थी। उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था। शायद वह अपने बहते ऑंसू उसे नहीं
दिखाना चाहती थी। खुशी के ऑंसू थे वे, जिन्हें वह
पोंछना नहीं चाहती थी।
ज्यादा देर तक वह, वहॉं खड़ा नहीं रह सका था।
दिन पर दिन और इस तरह पूरा साल किस
तरह बीत गया, पता ही नहीं चल पाया। जब वह टेलीफोन पर बातें करता,
अपनी मॉं और बाबूजी से, उसके बारे में बतलाता
जरूर। उसका मित्र जगदीश भी प्रसन्न हुआ था, यह देखकर कि उसका
खोया हुआ स्वास्थ्य लौट आया है।
एक दिन मॉं-बाबूजी, सुनीता और कनिष्क को साथ लेकर चले आए। कनिष्क पूरा एक साल का हो गया था।
वह अब शरारतें भी करने लगा था। कनिष्क को पाकर वह भी खिल सी उठी थी। एक मधुर संगीत
सा बजने लगा था उसके भीतर। घर के सारे काम निपटाकर वह कनिष्क के संग हो लेती। उसकी
शरारतों में रस लेती। कभी झूठी डॉंट भी पिलाती। अपने सीने से लिपटा लेती। कनिष्क
भी खुश था। वह भी खुश थी। एक मौसम खिल उठा था उसके भीतर। रूठे हुए परिन्दे
लौट-लौटकर आने लगे थे। उसके चेहरे का रेशा-रेशा मखमली हो उठा था और प्राणों में
मीठी सी गंध भर गयी थी।
सुनीता के पौ-बारह हो गए थे। आराम के
बहाने वह पलंग तोड़ते रहती।
पन्द्रह-बीस दिन रहकर मॉं और बाबूजी
गॉंव लौट गए । बार-बार के आग्रह के बावजूद, वे अब एक दिन भी
ज्यादा ठहर जाने भी तैयार नहीं थे। उन्हें अपने खेतों की चिंता सताने लगी थी। यह
वह समय था जब खेतों को अगली फसल के लिए तैयार करना होता है और वे इस समय को खोना
नहीं चाहते थे।
मौसम कभी एक सा नहीं रहता। एक बदलाव आ
रहा था चुपके-चुपके हमारे अपने घर में। एक मनहूस क्षण, बिल्ली की तरह दबे पॉंवों से चलता हुआ, कब हमारे घर
के भीतर घुस आया, पता ही नहीं चला। छोटी-छोटी खुशियों के
तिनकों को जोड़-जोड़कर बनाया गया घोंसला, उसकी उछाल में,
जमीन पर आ गिरा। घोंसले में दुबके पखेरू, चिंचियाते
हुए, फुर्र से दूर जा उड़े।
पखेरूओं की चहचहाट की जगह अब कर्कश
स्वरों ने ले ली थी। घर, एक अच्छे खासे हंगामों से भर उठा था।
कनिष्क के गले की सोने की चैन, कहीं ढूंढे नहीं मिल रही थी। आरोपों की जद में अम्माजी थी। वह भयभीत हिरणी
की तरह कॉंप रही थी और सुनीता, सिंहनी सी गरज रही थी। एक
गहरी सांझ उसके मन में उतर आयी थी। उसके मन के ऑंगन में, चिड़ियों
की चहचहाट की जगह, अब उल्लुओं की भयानक चीखों ने जगहें बना
ली थी। उसके इंकार करते रहने के बावजूद, सुनीता उससे इकरार
करवाना चाहती थी। उसके चेहरे पर एक नीला अवसाद फैलने लगा था। उसका धीरज नाम का
पर्वत दरक गया था। उसके भीतर से एक ऑंधी गुजर रही थी, जिसने
आशाओं के झिलमिलाते दीपों से रोशनी छीन ली थी।
उसकी ऑंखों की झील में इतना पानी बचा
ही कहॉं था। कितना ही पानी तो उसने अपनी प्यारी बच्ची के गम में तथा पति के असमय
मौत में रो-रोकर बहाया था । वह विक्षिप्त सी मौन खड़ी आरोपों को झेल रही थी।
अपने बचाव में, उसके पास शब्द नहीं थे। वह केवल इनकार की मुद्रा में अपने हाथ हिलाती रही
थी। बेगुनाह होने का इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता था, लेकिन
सुनीता समझ पाती, तब न!
वह एक ही रट लगाये हुए थी। श्कनिष्क
पूरे दिन तो तुम्हारी गोद में चढ़ा रहता है। तुम्हें चेन का पता होना चाहिए। जब
तुमने नहीं निकाली तो क्या धरती खा गयी या आसमान ने निगल लिया।श् वह बार-बार थाने
में रपट दर्ज कराने को कहती।
वह जितनी भी समझाईशें देता, सब व्यर्थ जातीं, उसकी क्रोधाग्नि की लपटें, उतनी ही विकराल हो उठती।
उसने पुनः समझाते हुए कहा- सुनीता... बंद करो
अपनी बकवास । किसी पर आरोप मढ़ने से पहले, ठंडे दिमाग से
सोचो । घर का कोना-कोना छान मारो । हो सकता है, चेन यहीं
कहीं पड़ी होगी । अरे... जिसने जिन्दगी भर धोके खाये हों, वह
भला किसी को क्या धोका दे सकता है। "
सुनीता अब उसके साथ वाक-युद्ध पर उतर
आयी थी। पूरा घर युद्ध-भूमि में तब्दील हो चुका था।
युद्ध की परिणति हमेशा से ही त्रासद
और भयावह होती है, चाहे वह जिस भी पृष्ठभूमि पर लड़ा गया हो। युद्ध के
बाद की शांति किस तरह की होती है, कृष्ण और युद्धिष्ठिर से
अच्छा भला कौन जान सकता है।
सुनीता समझाए नहीं समझ रही थी। बातें
निष्प्रभावी हो रही थी। उसका गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। उसने दो-चार चॉंटें
उसके गाल पर जड़ दिये।
गुस्सायी सुनीता ने सूटकेस पैक किया
और शाम की ट्रेन से घर लौट गई । नन्हा कनिष्क भौंचक्का देख रहा था सब कुछ। उसमें
इतनी समझ और सामर्थ्य कहॉं था कि वह अपनी मॉं को रोक पाता।
सुनीता जा चुकी थी, फिर निकट भविष्य में लौट आने के लिए, लेकिन वह जा
चुकी थी, फिर कभी न लौटने के लिए।
कहॉं-कहॉं नहीं ढूंढा उसने उसे।
चिलचिलाती धूप और उमस भरे माहौल में वह बदहवास भटकता रहा था लेकिन वह नहीं मिली, तो फिर नहीं मिली।
उसे अब हर हाल में थाने में रपट दर्ज
करवाना ही था। उसके अपने मोबाईल में कनिष्क के साथ वाली कई तस्वीरें कैद थी। एक
गुमशुदा को तलाशने के लिए, फोटो सहायक सिद्ध हो सकती थी।
शाम घिर आयी थी। अपने कॉंधों पर गहरी
उदासी का लबादा डाले वह लौट रहा था और बेपर आवाजें उसका पीछा कर रही थी लगातार।
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8
रुपान्तरण.
छोटे-मोटे नेगदस्तूर
निपटाते-निपटाते, कब सुबह से शाम, फिर
शाम से रात घिर आई, पता ही नहीं चल पाया, पास-पड़ोस की महिलाएं, अपने-अपने घरों को चलीं गईं
थीं और वह अब तक जाग रही थी।
काफी देर तक तो वह, ओरती की दीवार से, अपनी पीठ टिकाए खड़ी रही, फिर धीरे से नीचे बैठते हुए उसने, अपने दोनों पैरों
को सामने की ओर फैला दिए थे। दोनों हाथों को कॉंधे से झुला दिया था और दीवार से
सिर को टिकाते हुए, मण्डप में लटक रहीं रंग-बिरंगी
झूमर-झालरों को एकटक देखती रहीं।
दरअसल वह नाचते-नाचते बेहद थक गई थी
और अब थोड़ी देर बैठकर सुस्ताना चाहती थी।
जब आदमी निहायत ही अकेला होता है, अक्सर ऐसे समय में वह या तो भविष्य को लेकर सुनहरे सपने बुनने लगता है
अथवा अतीत की ठहरी हुई नदी में गहरा उतरकर, उन नायाब मोतियों
की तलाश करने लगता है, जो जाने- अनजाने में उसकी मुट्ठियों
से फिसल कर जा गिरे होते हैं।
राधा जानती है, उसका अपना अतीत कभी भी सुनहरा नहीं रहा। बहुत छोटी सी उमर में उसने अपनी मां
को खो दिया था। सौतेली मॉं के आने के बाद के कुछ दिनों तक तो ठीक रहा, लेकिन बाद में उसे दुत्कार, गालियॉं झिड़कियॉं और मार
के अलावा कुछ नहीं मिला। न तो वह खुलकर हॅंस सकती थी और न ही रो सकती थी। बाप के
चेहरे पर लटकी बेबसी और उदासी देखकर सहम सी जाती। उसे डर था कि कहीं वह अपने पिता
को भी न खो दे। वह चुप्पी साधे रहती । जवानी की देहलीज पर आ खड़ी हुई ही थी कि उसकी
शादी एक अय्याश, बिगड़े दिल ओर और शराबी युवक से करा दी गई।
अपने भविष्य को लेकर वह ज्यादा उत्साहित
और आशान्वित भी नहीं थी। उसे मालूम है कि आज खुशियों के जो दो नायाब मोती मिली हैं, वे भी कम्मो भौजी की वजह से मिले हैं। वह यह तो नहीं जानती कि उसने अपने
पिछले जन्म में कभी कोई पुण्य का काम किया था। संभव है कि अनजाने में उसने उस पर
कोई अहसान कर दिया हो, तभी तो वह इस जन्म में अपना कर्जा,
मय-ब्याज के उसे लौटा रही है।
वह नहीं चाहती कि ऐसे समय में, जब खुशियॉं उसके ऑंगन में पाहुन बनकर खड़ी है, वह
अपने अतीत के बारे में सोचे।. उसे सोचना भी नहीं चाहिए । वह अपने आपको समझाईश देने
लगी थी।
सारी व्यर्थ की बातों पर से ध्यान
हटाते हुए वह वर्तमान में लौटने लगी थी।
शहनाईयों की मीठी-सुरीली आवाज, ढोलक की ढम्मक-ढम, मंजीरों की खनक और औरतों के
सम्मिलित स्वरों की गूंज, उसके कानों में अनुगुंजित होने लगी
थीं। गहराईयों के साथ अब वह स्वरों के तिलिस्म में प्रवेश करने लगी थी।
सुबह से ही उसके ऑंगन में भीड़ जुड़ने
लगी थी। मण्डप छाया जाने लगा था। मण्डप के छा जाने के बाद, एक ओर कुर्सियॉं डाल दी गई थीं। मोहल्ले के बड़े-बूढ़े कुर्सियों में धॅंसे
या तो बीड़ी का धुँआ उड़ा रहे थे अथवा आपस में बतिया रहे थे। बच्चे भी अपनी
धींगा-मस्ती पर उतर आए थे। कोई उस ओर से दौड़ लगाता आता और दूसरे छोर पर जा पहुँचता
था।
अब खाम गड़ाए जाने का दस्तूर किया जा
रहा था। खाम के गड़ने के पश्चात्, एक कलश पर दीप प्रज्जवलित कर
दिया गया। औरतों का दल खांभ के पास बैठा बन्नी गाने लगा था।
भीतर जाकर भौजी कंचन को साथ लिवा लाई
और उसे पटे पर बिठा दिया। महिलाएं अब बारी-बारी से उसकी कंचन सी काया में
हल्दी-चंदन का लेप चढ़ाने लगी थी।
मंगल-गीत गाए जा रहे थे। ढोलक ढमकाई
जाने लगी थी। मंजीरे खनकाए जा रहे थे। मण्डप के बाहर बैठा, बाजा बजाने वालों का दल वाद्य-यंत्र बजाने लगा था।
शहनाईयों की मीठी-सुरीली आवाज, ढोलक की ढम्मक-ढम, मंजीरों की खनक और महिलाओं के
सम्मिलित स्वरों की गूंज के साथ ही सारा वातावरण रसमय हो गया था। चारों तरफ उत्सव
का सा माहौल था।
ढोलक ढमकाते, बन्नी गाते, कम्मो भौजी उठ खड़ी हुई और ठुमक-ठुमककर
नाचने लगी। नाचते हुए वह चुहलबाजी करने से भी बाज नहीं आ रही थी। भौजी को नाचता
देख, अब बाकी औरतें भी बारी-बारी से अपने नृत्य-कौशल दिखाने
लगी थी।
अपनी मोहक अदाओं से सभी को रिझाने
वाली भौजी ठुमकते हुए उस तक चली आई और उसका हाथ पकड़कर, महिलाओं के दल के बीच ला खड़ा कर दिया और उसे नाचने के लिए उकसाने लगी थी।
इस समय वह दूर खड़ी, सारे नेग-दस्तूरों को होता हुआ देखकर मगन
हो रही थी।
बेटी की शादी हो अथवा बेटे की, कौन मां भला नाचना नहीं चाहती। उनका मन प्रसन्नता से भर उठता है। पोर-पोर
में रोमांच हो आता है। वे मतवाली हो उठती है। देह उनकी जैसे वृंदावन बन जाती है और
सॉंस-प्रवास में जैसे बॉंसुरी बज उठती है। पैर तो उनके जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ते
हैं। वे तितली बनी उड़ती-डोलती फिरती है। संतान के पैदा होने के साथ ही, मांओं के मन में अरमान मचलने लगते हैं और वे उन्हें दुल्हा अथवा दुल्हन
बना देखना चाहती है। बरसों इंतजार के बाद उसके यहॉं ऐसा शुभावसर आया था। वह सचमुच
में बेहद खुश थी।
उसका मन भी नाचने-नाचने को हो रहा था
लेकिन नाच भी पायेगी अथवा नहीं, इसमें सन्देह होने लगा था।
थोड़ी सी ना-नुकर और मान-मनौवल के बाद वह नाचने लगी थी। वह तब तक नाचती रही थी,
जब तक वह थककर चूर नहीं ले गई थी। उसकी सॉंसें फूल रही थी और और
कलेजा जोरों से धड़कने लगा था।
अपनी मॉं को इस तरह नाचता और बेतहाशा
खुश होता हुआ देखकर कंचन भी हतप्रभ थी। आज पहली बार वह अपनी मॉं के बदले हुए
स्वरूप को देख रही थी।
कल्पना में सुख के बादल झमझमाकर बरस
रहे थे और वह उसमें सराबोर भी हो रही थी कि ठोकों की आवाज सुनकर वह वर्तमान में
लौटने लगी थी।
रात पारी में तैनात किसी पुलिस-कर्मी
ने थाने के आहते में लटक रहे घण्टे पर चोट की थी। उसने एक के बाद एक बारह ठोके
लगाए थे।
दरवाजा बंद कर वह भीतर आकर अपने
बिस्तर पर लेट गई। वह अब थोड़ी देर सो जाना चाहती थी। लेकिन नींद जैसे गौरैया
(चिड़िया) हो गई थी। उसे पकड़ने के लिए वह अपना हाथ, आहिस्ता
से बढ़ाती। हाथ उस तक पहुँचे, इसके पूर्व वह फुर्र से उड़ जाती
थी।
वह सोचने लगी थी। उसे नींद भी कैसे आ
सकती है? वह सोना चाहे तब भी नहीं। एक मॉ, चैन की नींद कहॉं सो पाती है। अपनी बेटियों को जवानी की देहलीज पर खड़ा देख,
उनकी नींद गायब हो जाती है। उनकी ऑंखें तो जैसे बेटियों के पीठ से
ही जा चिपकती है। वे उठते-बैठते-सोते- जागते, अपनी बेटियों
को पीछा करने लगती है। वे नहीं चाहती कि उनकी बेटियॉं गलत राह पर चल पडें। वे समय-समय
पर उन्हें फिसलन भरी राहों के बारे में बतलाना भी नहीं भूलती। वे उन्हें
रीति-रिवाजों और परम्पराओं के बारे में भी बताती चलती है। इस समय वे लड़कियों की
मॉं ही नहीं बल्कि दोस्त बन जाती है। चैन की नींद तो वे उस समय ही ले पाती हैं,
जब बेटियॉं डोली में बैठकर अपने ससुराल चली जाती है।
उसे अनायास ही अपनी मॉं की याद ताजा
हो आई। वह सोचने लगी थी- " काश! वह जिन्दा होती तो शायद ही उसकी दुर्गति
होती।" मॉं का चित्र अभी पूरी तरह से बन भी नहीं पाया था कि सौतेली मॉं का
रौद्ररूप उसकी ऑंखों के सामने ताण्डव करने लगा था।
विमाता से जुड़ी उन तमाम बातों को वह
एक बारगी भूल भी सकती थी लेकिन दो बातें ऐसी थीं कि वह भूलना चाहे, तब भी भूल नहीं पाती थी।
बातों के दौरान एक बार उसके पिता ने
उसे स्कूल में दाखिला दिला देने की बात की थी। सुनते ही वह भड़क गई थी। उसके द्वारा
कहे गये एक-एक शब्द उसे आज भी अक्षरशः याद है। " का कही तैने? राधा को पढ़ाने है ? का कर लोगे पढ़ा-लिखा के ।
घर-गिरस्थी के बातें सीखन दो, जो जिनगी भर काम आवेंगे। फिर
चपरासी की बेटी कलक्टर बनने से रही।" पिता के चेहरे पर उड़ती हवाई और डबडबाई
ऑंखों को देखकर वह रो पड़ी थी।
एक बार धोके से, उसके हाथ से कॉंच का ग्लास टूट गया था। उसके क्रोध का ज्वालामुखी फट गया
था। उसने चूल्हे में जलती लकड़ी से उसका हाथ जख्मी कर दिया था। अनायास ही उसकी
उंगलियों के पोर वहॉं जा पहुँचे, जख्म तो मिट गया था लेकिन
दर्द आज भी उतनी ही तीव्रता के साथ चिलक रहा था।
उसे आज भले ही अक्षर ज्ञान नहीं है
लेकिन उसने अपने जीवन की पाठशाला में पढ़ते हुए यह जान लिया था कि मॉं का जीवित
रहना बच्चे के लिए कितना महत्वपूर्ण है। उसके न रहने से बच्चे अनाथों की तरह पलते
हैं । मॉं के बगैर बच्चों के सुखी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
एक दिन ऐसा भी आया जब उसके भाग्य का
सूरज एक बार डूबा तो फिर नहीं उगा । उसका पति एक रात उसे सोता छोड़, अपनी खूबसूरत प्रेमिका के साथ भाग गया। वह कामी-लम्पट उसकी गदराई देह से
जोक की तरह तो चिपका रहता लेकिन सूरत देखते ही तिलमिला उठता था। उसने कई बार आइने
के सामने बैठकर अपनी सूरत को गौर से देखा लेकिन कहीं भी खामी नजर नहीं आई। सीरत
में तो वह एकदम फिट भी लेकिन सूरत के मामले में थोड़ा पीछे थी, बावजूद इसके उसे बदसूरत नहीं कहा जा सकता था।
अपने पैसों के बल पर उसने कई नाजायज
संबंध भी बना लिए थे। उसने कभी भी इस बात पर न तो अपना आक्रोश दिखाया और न ही मुँह
खोला था। एक दिन वह रूप का रसिया उसकी कोख में बीज डालकर चलता बना। फिर उसने
दोबारा पलटकर भी नहीं देखा कि वह किन हालातों से गुजर रही है।
असहाय अवस्था में पड़ी वह केवल ऑंसू ही
बहा सकती थी। उसने कई बार आत्महत्या करने की ठानी लेकिन दूधमुंही बच्ची का चेहरा
देख, वह ऐसा नहीं कर पाई।
उसकी गदराई देह देखकर, मॉंद में छिपे भेड़िए बाहर निकल आए थे। वे उसे चीथ डालने के लिए अपनी
डरावनी सूरतें और नुकीले दॉंत दिखाने लगे थे। वह शहर ही छोड़ देना चाहती थी लेकिन
जाती भी कहॉं? उसे मालूम था कि वह जहॉं भी जाएगी, उसे भेड़िए मिलते ही रहेंगे।
संयोग से उसकी भेंट कम्मो से हो गई।
वह भी कभी इन्हीं हालातों से होकर गुजरी थी। एक दर्द ने अपने सजातीय दर्द को पहचान
लिया था। दूरियॉं नजदीकियों में बदल गई थी और अनजानापन एक गहरे रिश्ते में।
कम्मो जानती थी कि रास्ते में पड़े
कॉंटों को किस तरह दूर किया जा सकता है। उसने कॉंधे पर हाथ रखते हुए और ऑेखों में
ऑंखें डालते हुए उससे कहा- " मैम बोली ना तेरे कु, डरने का नइ , कोई हरामी का पिल्ला ऑंख दिखाए तो अपुन
के भाई का नाम बताना । बोलना... भाई से बतायेगी। वो तेरी क्या दुर्गत बनायेगा...
तू जान. " कम्मो ने उसे एक शाबर-मंत्र दे दिया था। उसने शब्दों की ताबीज
बनाकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया था।
उस दिन के बाद से वह किसी की भाभी है।
किसी की बहन, किसी की बहू अथवा बेटी है। भाई की छत्र-छाया में वह
निर्भय जीवन जीने लगी थी। भौजी ने जहॉं उसे जीवन जीने की लालसा जगाई थी, वहीं उसे रोजगार भी मुहैया करवा दिया था। आज वह एक चर्चित भोजनालय की
मालकिन है।
अपने विचारों की तंद्रा में खोई राधा
को नींद ने कब आपने आगोश में ले लिया, उसे पता ही नहीं
चल पाया। जब वह सोकर उठी तो एक नया सूरज आसमान में चमचमा रहा था।
छोटे-मोटे कामों को निपटाने के अलावा
जनवासे में भी समुचित व्यवस्था की जानी थी। वह नहीं चाहती थी कि किसी भी प्रकार की
कोई कसर बाकी रह जाए। हालॉंकि अभी बारात के आगमन में काफी समय बाकी था।
सुबह से ही कारीगर अपने काम को अंजाम
देने में जहुट गए थे। आठ-दस घण्टों की कड़ी मेहनत के बाद एक भव्य राजमहल खड़ा हो गया
था। जगह-जगह झाड़-फानूस, रंग-बिरंगी झालरों और झूमरों को देख, उसका मृगी मन कुलाचे भरने लगा था।
शाम घिर आई और बारात के आने का भी समय
हो चला था। बाहरी व्यवस्थाओं को पूर्णता की ओर बढ़ता देख, वह अंदर चली आई।
उसने देखा। कंचन अपनी सखी-सहेलियों के
बीच घिरी बैठी है। कोई उसके साज-सिंगार में लगी है तो कोई उसकी हथेलियों में
मेंहदी से सुन्दर-सुन्दर आकृतियॉं उकेर रही हैं। अपनी बेटी को दुल्हन के रूप में
सजा देखकर वह अपनी सुधबुध खोने लगी थी।
देर तक टकटकी लगाए देखते रहने के बाद
वह वहॉं से यह सोचकर हट गई कि कहीं उसे नजर न लग जाए।
पटाखों की गूंज से आकाश कॅंपाती, आधुनिक वाद्ययंत्रों की धुन पर थिरकते युवक-युवतियों के दल के साथ बारात
उसके द्वार पर खड़ी थी। सुंदर पोषाकों में लिपटी युवतियॉं अपने सिरों पर मंगल-कलश
लिए बारात के स्वागत में चल पड़ी थीं। वह भी हाथ में कुमकुम-रोली की थाली लिए सबको
साथ लेकर चल रही थीं।
द्वारचार की पारम्परिक औपचारिकता को
पूरा करते हुए अपने दामाद की ऊँगली पकड़कर स्टेज पर ला बिठाया।
कंचन अपनी सखी-सहेलियों से घिरी, हाथ में वरमाला लिए, अपनी नजरें नीची किए, लोकलाज और संकोच के साथ गजगामिनी की सी चाल में चलते हुए आगे बढ़ रही थी।
अब वर-वधू स्टेज पर आमने-सामने खड़े
थे। हाथ में माईक लिए पण्डितजी मंगलाचरण का सस्वर पाठ कर रहे थे। इशारा पाकर वधू
ने वरमाला वर के गले में डाल दी थी। अब वर की बारी थी। उसके वरमाला डालते ही हजारों-हजार
हाथ एक साथ तालियॉं बजाने लगे । वाद्य-यंत्र पूरी रफ्तार के साथ बज उठे थे। इस
अनुपम व अद्भुत दृष्य को देखकर वह गदगद हो रही थी। उसे ऐसा भी लग रहा था मानो धरती
पर स्वर्ग उतर आया हो।
तोहफा देने और फोटो खिंचवाने को आतुर
लोग स्टेज पर जाते। शान से फोटो खिंचवाते और मुस्कुराते हुए नीचे उतर आते। बाकी के
लोग भोजन पर टूट पड़े थे । चारों तरफ गहमा-गहमी का माहौल था।
मण्डप के नीचे अब खास-खास लोग ही रह गए
थे, जिनका वहॉं रहना आवश्यक था और वे जो अपनी ऑंखों से इस मंगल-काज को होता हुआ
देखना चाहते थे।
चढ़ावे की रस्म पूरा होते ही अब भॉंवर
की तैयारी की जाने लगी थी। पण्डितजी पूरी तन्मयता के साथ मंत्रोच्चारण कर रहे थे।
अपनी रौ में बोलते हुए वे बोल उठे- "अब कन्यादान के लिए पिता को बुलवाइये."
सुनते ही वह धक से रह गई थी। कलेजा मुँह
को आ गया था। वह सोचने लगी थी- " पिता तो है नहीं। जल्दबाजी में वह पण्डितजी
को वास्तविकता से परिचित नहीं करा पाई थी।
इस उद्घोषणा के साथ ही उसने देखा- दूर
बैठा एक व्यक्ति अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और कछुआ चाल में चलता हुआ उस ओर आने लगा ।
उसकी मरियल चाल को देखकर यह कहा जा सकता था कि वह कई दिनों से बीमार चल रहा होगा।
उसे चलने में भी कष्ट हो रहा था। वह एक-एक कदम बड़ी ही सावधानी के साथ आगे बढ़ा रहा
था।
औरत सब कुछ भूल सकती है लेकिन अपना
पहला प्यार और पति को कदापि नहीं भूलती। ईश्वर ने भेंट स्वरूप उन्हें अपनी ओर से
एक अलग से ज्ञानेन्द्रिय दे रखी है जो एक ही नजर में संभावित खतरों और अपने
दुश्मनों को पहिचान लेती हैं।
उसने पहिचानने में तनिक भी भूल नहीं
की थी। वह तत्काल ही पहचान गई, आने वाला उसका ही पति है। वह
लौट भी रहा है तो पूरे पच्चीस बरस बाद ।
श्वह कैसे आ धमका? उसे किसने निमंत्रण-पत्र भेजा? उसके यहॉं आने का
क्या प्रयोजन है? उसकी हिम्मत कैसे हुई यहॉं आने की? क्या वह यहॉं आकर कोई बखेड़ा तो खड़ा करना नहीं चाहता?श्
सैकड़ों प्रश्न उसके जेहन में फन उठाए, यहॉं-वहॉं डोलने लगे
थे।
संभावित खतरा देखकर जिस तरह हिरणी
अपने शावकों को अपनी ओट में लेकर चौकन्नी दृष्टि से चारों दिशाओं का मुआयना करने
लगती है और अपने लम्बे कानों को खड़ा कर, आहटों को पकड़ने
की कोशिश करती है। ठीक उसी तरह वह भी चौकस हो गई थी और संभावित खतरे से बचने के
लिए गहराई से सोचने लगी थी।
उसका इस तरह अचानक प्रकट हो जाना, न तो उसके लिए शुभकारी है और न ही उसकी बच्ची के लिए। उसे आना ही था तो
बहुत पहिले आता और देखता कि वह किस तरह जी रही थीं। उसे याद आया। कंचन अपनी
तुतलाती जुबान में अपने पिता के बारे में पूछती थी। उसका इस तरह पूछना उचित भी था।
उसे अधिकार है कि वह अपने पिता के बारे में जाने। प्रश्न सुनते ही वह उलझन के
चक्रव्यूह में घिर जाती। समझ नहीं पड़ता, क्या जवाब दे। सच
बतानेकी उसमें हिम्मत नहीं थी और न ही झूठ बोलने का साहस। उसका मन पेण्डुलम की तरह
दोलायमान होने लगता था।
वह किस मुँह से बताती कि तेरा बाप
किसी छिनाल के साथ भाग गया है, वह यह कैसे बताती कि तेरे बाप
के कितने अवैध संबंध थे। वह यह भी कैसे बताती कि तेरे बाप को जुऑं-दारू का भी
चस्का लग गया था। जानती थी वह कि उसके कोमल मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
कंचन उस समय छोटी थी। अकल की कच्ची
थी। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी जीवन भर कड़वे-सच को लेकर अपना जीवन धूल-धूसरित
कर दे। सच को सफाई के साथ झुठलाते हुए उसने अपने जवाब में इतना भर कहा था- ष्वे
भगवान के घर चले गये हैं।ष् इतना ही कहना, उसके लिए
पर्याप्त था।
तीर की तरह अकड़कर चलने वाली उसकी देह, कमान बन गई थी। दौलत की चमक से दिपदिपाता उसका चेहरा निस्तेज हो गया था।
वह समझ गई। अपनी उन्मुक्तत, देह और रूप के बली पर जादू जगाने
वाली औरतें ऐसे आदमियों को अपने जाल में फॅंसा लेती हैं वे ठीक उस मकड़ी की तरह
होती हैं जो शिकार के फॅंसते ही उन्हें पूरी तरह से चूस जाती है। गन्ने की तरह
चूसने के बाद वे उन्हें सड़कों पर फेंक देती है। इसके साथ भी वही सब कुछ हुआ होगा,
तभी तो यह वापिस आने और कन्यादान के बहाने पुनः प्रवेश लेना चाहता
है। वह ऐसी औरतों को हर हाल में दोषी भी नहीं मानती। उसका अपना मत है कि यह कोई
नई-प्रक्रिया नहीं है। यह तो लूटने वाला और लुटाने वालों का खेल अनादिकाल से अनवरत
होता चला आया है।
उसे तत्काल उस घटना की भी याद हो आई।
जब अनिरूद्ध के पिता, कंचन का संबंध तय करने के लिए उसके यहॉं पधारे थे।
वह अपनी ओर से अपनी पृष्ठभूमि के बारे में सब कुछ बतला देना चाहती थी तो विनम्रता
से उन्होंने उसके प्रस्ताव को अमान्य करते हुए कहा था- " मैं किसी के जातीय
मामले में झॉंकना नहीं चाहता और न ही जात-पात को ही मानता हूँ."। बातों को
आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तो यह भी कहा था कि वह रूपवान-गुणवान और संस्कारित लड़की को
अपनी पुत्र-वधु बनाना चाहते हैं। कंचन सिर्फ अनिरूद्ध की ही नहीं बल्कि उनकी अपनी
भी पसंद है, फिर दोनों एक साथ काम भी करते हैं। उन्होंने यह
भी वचन दिया था कि वे कंचन को पिता की कमी महसूस नहीं होने देंगे।
उसका दिमाक इस समय मीटर की गति से घूम
रहा था। चंद मिनटों में ही उसने निर्णय ले लिया था कि वह इसके बढ़ते कदमों को वहीं
रोक देगी। वह कदापि भी नहीं चाहती थी कि वह यहॉं आकर बखेड़ा खड़ा करे अथवा उसकी
उपस्थिति को लेकर कोई और बखेड़ा खड़ा हो।
" पण्डितजी...
बस पॉंच मिनट रूकिये । मैं अभी आई। "
कहते हुए वह तेज चाल चलते हुए उस तक
जा पहुँची। अब तक वह केवल आधा ही रास्ता तय कर पाया था।
उसने मजबूती के साथ उसका हाथ पकड़ा और
लगभग घसीटते हुए वह उसे मण्डप के बाहर ले आई।
बाहर आते ही वह बिफर पड़ी- "
क्यों आए हो तुम, हम मां-बेटी के जीवन में जहर घोलने? मैं तुम्हारा मकसद कभी पूरा नहीं होने दूंगी। जैसे आए हो वैसे ही लौट जाओ।
कहाँ थे उस समय तुम, जब हमें तुम्हारे सहारे की जरूरत थी?
अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है।"
वह इस समय सिंहनी की सी गरज रही थी।
बरसों से कलेजे में सुप्त पड़ा ज्वालामुखी धधकने लगा था और लावा, शब्दों की शक्ल में ढलकर बह निकाला था।
कमजोर होते हुए भी उसने उसका हाथ झटक
दिया था और तेजी से वह वापिस मुड़ने को हुआ। उसने भी पूरी मजबूती के साथ उसे रोकते
हुए उसके गाल पर तीन-चार चांटे रसीद कर दिये। ठीक उसी समय एक ऑटो-रिक्शा पास से
गुजर रहा था। उसने उसे रोका और अंदर जबरन ठेलते हुए ऑटो-चालक से कहा " इसे
कहीं दूर जाकर उतार देना।" उसने तत्काल ऑटो-चालक के हाथ में पचास रूपये का
नोट थमा दिया.
अपनी
गर्वीली और सधी हुई चाल में चलते हुए वह वापिस लौटने लगी थी।
वह
सचमुच में, पॉंच मिनट के भीतर लौट आई थी।
...................................................................................................................................
9
अतीत और वर्तमान
के समांतर चलते हुए
गली-कूचों में
अफवाहों की तितलियॉं उड़ रही थी। बेखौफ। कभी वे अखबारों के पन्नों में लिपटकर तो
कभी खिड़की-दरवाजों की सुराखों में से फलांगकर घरों में प्रवेश पा जाती थी।
निशा इन सब बातों से अनजान थी। वह
नहीं जानती थी कि उसके खिलाफ कौन षडयंत्र रच रहा है?। वह तो यह
भी नहीं जानती थी कि उसका मकसद क्या है? वह तो अपने आप में
व्यस्त थी। अपने में खोई हुई, दीन-दुनिया से बेखबर, मीरा की तरह, अनिरूद्ध के नाम का इकतारा बजाती हुई।
अभी पन्द्रह दिन पहले ही तो वह गोवा
की ट्रिप से वापिस लौटी थी और आते ही बिस्तर से जा लगी थी।
कॉलेज के प्राचार्य ने उसका नाम
प्रपोज करते हुए, आदेश पारित कर दिए थे कि वह लड़कियों के ग्रुप की
इंचार्ज होगी। लड़कों के ग्रुप का प्रतिनिधित्व अनिरूद्ध कर रहा था। उसे जब इस बात
की जानकारी मिली तो उसने सानुनय इस प्रस्ताव के विरूद्ध अपनी असहमति दर्ज करा दी
थी।
उसकी सोच के केंद्र में अनिरूद्ध था।
उसके प्रति बढ़ती आसक्ति और बाद में मिलने वाली बदनामी के डर से, उसने वहाँ जाने से मना कर दिया था। पूरे पन्द्रह दिन की एक्सजर्सन ट्रिप
थी वह कॉलेज की तरफ से।
अनिरूद्ध से उसकी पहली मुलाकात बड़ी ही
अजीबो-गरीब परिस्थितियों में हुई थी। वह किसी अन्य कॉलेज से स्थानांतरित होकर आया
था, जहॉं वह स्वयं सहायक प्राध्यापक थी।
कॉमनरूम में प्रवेश करते ही उसकी नजर
अनिरूद्ध पर जा पड़ी, वह वहीं ठिठककर खड़ी हो गई। वह उस समय स्टॉफ के अन्य
सदस्यों के बीच घिरा बैठा बतिया रहा था। उसे देखते ही वह भय-मिश्रित आश्चर्य से
घिने लगी थी ष्कौन है यह नवयुवक? उसकी शक्ल तो हू-ब-हू अजय
से मिलती-जुलती है, वही नाक-नक्श, वही
तराश हुआ चेहरा, शरीर-शौष्ठव, कद-काठी
और बातें करने का अंदाज भी तो मिलता-जुलता है। उसकी नीली-भूरी ऑंखें और हॅंसने का अंदाज
भी तो अजय से मिलता है।
वर्तमान में रहते हुए वह अतीत की
सीढ़ियॉं उतरने लगी थी।
एम.ए. प्रीवियस की छात्रा थी वह उन
दिनां। शाम के यही कोई चार-साढ़े चार बजे रहे होंगे। यह वह समय होता है जब परिवार
के सारे सदस्य एक साथ बैठकर चाय पीते हैं। वह किचन में चाय बनाने में व्यस्त थी।
तभी मॉं ने कमरे में प्रवेश करते हुए उससे तीन प्याली चाय और बढ़ा देने को कहा।
उसने सुना-अनसुना करते हुए लापरवाही से अपनी गर्दन को झटकते हुए अंदाजा लगाया कि
पापा के दोस्त-वोस्त आ धमके होंगे। किचन से लौटते समय मॉं यह भी कह गई थीं कि चाय
के साथ कुछ खारा-मीठा और बिस्कुटें भी लेती आए।
एक बड़ा-सा ट्रे हाथ में उठाए वह
बैठक-कक्ष में पहुँची। वहॉं पापा के दोस्त नहीं थे... कोई अन्य भद्र-पुरूष बैठे
दिखलाई दिये। वह समझ गई। आने वाले निश्चित ही उसे देखने आए होंगे। उसने सहज ही
अंदाज लगाया था। तभी पापा के कहे शब्द याद हो आए ...जब तक तेरी पढ़ाई पूरी नहीं हो
जाती, हम शादी की बात नहीं करेंगे। पापा का वचन याद आते ही
वह आश्वस्त हो चली थी।
नजदीक पहुँची ही थी कि पापा ने लगभग
चहकते हुए कहा ....ये रही हमारी बिटिया निशा...और निशा.... ये हैं मिस्टर अजय...
कॉलेज में सहायक प्राध्यापक हैं और ये इनके माता-पिता। उंगलियॉं नचाते हुए
उन्होंने सभी का परिचय करवा दिया था।
ट्रे अब भी हाथ में ही था। उसने
शिष्टाचारवश अपनी गर्दन को झुकाकर सभी का अभिवादन किया। ट्रे को सेन्टर टेबिल पर
रखते हुए वह मॉं के करीब सटकर बैठ गई थी।
चाय की प्याली बढ़ाते हुए उसने अजय को
देखा, तो बस देखते ही रह गई थी वह। अब एक अजीब किस्म की
बेचैनी में घिरने लगी थी। दिल जोरों से धड़कने लगा था। सांसें बेकाबू हो गई थी। अजय
की नीली-भूरी ऑंखों के समन्दर में, जो एक बार डूबी तो फिर
उबर न सकी थी।
बात पक्की हो, इससे पूर्व ही उसने अपना मंतव्य कह सुनाया कि वह आगे भी पढ़ना चाहेगी। अजय
की स्वीकृति की मुहर लग जाने के बाद, वह उसे और भी सुन्दर
दिखाई देने लगा था।
और इस तरह वह अजय के साथ शादी के बंधन
में बंधकर ससुराल चली आई थी।
मॉं-बाबूजी का आशीर्वाद और अजय का
प्यार पाकर वह निहाल हो गई थी। दिन सुनहरे और रात मतवाली हो उठी थी। चारों तरफ
खुशियों के बादल बरस रहे थे और वह उसमें सराबोर भी हो रही थी।
पर ये खुशियां ज्यादा दिन तक नहीं टिक
पाई। नियति के क्रूर हाथों ने, उसके माथे पर लगे सिंदूर को
बड़ी ही बेरहमी के साथ पोंछ डाला था। वह सधवा से विधवा बना दी गई थी। फूलों की सेज,
कॉंटों में बदल गई थी। उसके सपनों का रंग-महल धूसर-कॅंटीला हो गया
था और वह एक मर्मान्तक पीड़ा के दौर से गुजरने लगी थी।
मॉं और बाबूजी का बुरा हाल था। वे
विक्षिप्त से रहने लगे थे। अपने इकलौते बेटे के गम ने उन्हें पगला सा दिया था।
उनका हॅंसता-खेलता आशियाना जैसे जलकर खाक हो गया था।
अहिल्या की सी बुत बनी निशा ने अपनी
पीठ पर हल्का सा स्पर्श पाकर पीछे पलटकर देखा। वहॉं कोई और नहीं, बाबूजी खड़े थे। उनकी शून्य में झॉंकती निस्तेज निगाहों को देखकर वह भय के
मारे कॉंपने लगी थी और अब फबक कर रो ही पड़ी थी।
देर तक चुप्पी ओढ़े रहने के बाद
उन्होंने अपना मौन तोड़ा था। बड़ी ही संजीदगी के साथ। शब्द जैसे दुःख के कीचड़ में
सने थे और बोलते समय उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी।
" बेटा... अजय जहॉं तुम्हारा पति
था, वहीं वह हमारा बेटा भी था। जितना दुःख तुम्हें है,
उतना हमें भी है। दुःख आखिर दुःख ही होता है। वह न तो बड़ा होता है
और न छोटा। वह तो आदमी के कमतर अथवा तीव्रतर अनुभव अथवा आघात के आधार पर छोटा-बड़ा
हो सकता है। फिर जाने वाले के पीछे जाया भी तो नहीं जा सकता। न तो कभी कोई गया है
और न ही यह संभव है। सभी को अपनी-अपनी उमर की फसल यहीं काटनी होती है।"
मेरा इशारा उस आने वाले कल की तरफ है, जहॉं हमें या तो मर-मर के जीना है अथवा जीते-जी मर जाना है। आने वाला कल
सुखभरा हो... बस मेरी यही कामना है। मेरा क्या है... बुझता हुआ चिराग हूँ। नहीं
जानता... मेरे दीये में कितना तेल बाकी बचा है। आज नहीं तो कल बुझ ही जाउंगा।
तुम्हें अभी जीना है, फिर तुम्हारी अभी उमर ही कितनी है।
मैं नहीं जानता, तुम अपनी बात कहकर भूल चुकी हो अथवा नहीं। लेकिन मुझे अब भी याद है। तुमने
कहा था कि तुम शादी के बाद भी पढ़ना चाहती थी। याद आया? तुम
मेरी मानो तो कल से ही कॉलेज ज्वाईन करो। एम.ए. करो और परीक्षा की तैयारी में जुट
जाओ। तुम्हें उस खाली जगह को भरना है, जिसे अजय छोड़ गया है।
बाबूजी की बातें सुनकर वह हतप्रभ भी।
इसव उम्र में भी इतना जोश और जोश वाली बातें और भविष्य में झॉंक सकने वाली
दूर-दृष्टि देखकर उसने भी अपनी हिम्मत की ढहती दीवारों की मरम्मत करनी शुरू कर दी
थी और इस तरह वह एक सहायक प्राध्यापक बनकर उसी कॉलेज में चली आई थी, जहॉं अजय था। अजय के द्वारा खाली किए गए जगह में अपने-आपको पाकर वह गदगद
हो उठी थी।
दो मिनिट से भी कम समय में उसने अपने
अतीत के गहरे समन्दर को खंगाल डाला था। वह और न जाने कितनी ही देर यूँ ही खड़ी रहती, अगर उसे अपनी सहकर्मी मेडम पॉल ने झकझोर कर बाहर न निकाला हो ...निशाजी...
आज बाहर ही खड़े रहने का इरादा है क्या? अंदर नहीं चलेंगी?
अपने अतीत की दुनिया को पीछे छोड़ते
हुए वह बाहर तो आ गई थी लेकिन अब भी सामान्य नहीं हो पाई थी। दिल पूर्ववत ही जोरों
से धड़क रहा था और सॉंसें फूली हुई थी। वह जैसे-तैसे अपने-आपको उस कमरे में ठेल पाई
थी।
औपचारिक परिचय के बावजूद वह उससे
मिलने अथवा बात करने से अपने- आपको बचाती रही थी। वह जितना भी बचने का प्रयास करती, वह उतना ही पास आता चला गया था। वर्तमान और अतीत के समान्तर चलते हुए वह
अपने-आपको असहजता की स्थिति में ही पाती थी।
प्राचार्य के आदेश पाने के बाद के दो
दिनों तक वह सो न सकी थी। उठते-बैठते-टहलते उसे एक ही ख्याल आ घेरता, वह कैसे जा सकेगी? उसे जाना ही नहीं चाहिए। पूरे पन्द्रह
दिन तक अजय का और उसका साथ रहेगा। स्वाभाविक है... बातें भी करनी पड़ेगी। समय-समय
पर सलाह-मशविरे भी करने पड़ेंगे अथवा देने पड़ेंगे। वह अपने-आपको कब तक बचाती
फिरेगी। क्या वह अनिरूद्ध से यह कह पाएगी कि उसकी सूरत, उसके
अजय से हू-ब-हू मिलती है और वह उसमें अपने पति अजय की छबि को ही पाती है। कैसे कह
सकेगी वह? फिर एक विधवा को आज का क्रूर और दकियानूसी समाज,
यह सब कैसे करने देगा? तरह-तरह की बातें बनाई
जाने लगेगी। संभव है कि सहज होते हुए भी कोई ऐसी-वैसी हरकतें कर बैठी तो भला वह
लड़कियों की नजरों से अपने को कैसे बचा पाएगी? वे कंधे
उचका-उचका कर यहॉं-वहॉं कहतीं फिरेगी कि एक विधवा को यह सब कहॉं करना कहॉं तक उचित
है। उसकी बदनामी तो होगी ही, साथ में बाबूजी का सिर भी शर्म से
झुक जाएगा। वह किस-किस के मुँह पर ढक्कन लगाती फिरेगी।
ढेरों सारे प्रश्नों का जवाब
देते-देते वह थक सी गई थी। अंत में उसने निर्णय ले लिया था कि वह ट्रिप में जाने
से मना ही कर देगी। बाबूजी को जब इस बात का पता प्राचार्य महोदय से मिला तो वे खुष
नहीं हुए थे। उनकी मान्यता थी कि प्रकृति का संग अच्छे से अच्छे जख्मों को भी भर
देता है। समझाईष देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि वे अपने विचार उस पर लाद नहीं
रहे हैं बल्कि सलाह दे रहे हैं कि चारदीवारी के भीतर घुट-घुटकर जीने के बजाय, प्रकृति की गोद में जाना चाहिए, जहॉं हर चीज खुली
होती है। जहॉं खिड़की-दरवाजे नहीं होते, वहॉं ही ईष्वर का
वरदान बरसता है।
बाबूजी के विचार किसी तपोनिष्ट साधु
पुरूष के जैसे थे, उनके एक-एक शब्द में जादू भरा सम्मोहन तो था ही,
साथ ही एक दिव्य-दृष्टि भी थी, जो अंधेरे को
भेदकर दूर तक जाती थी।
प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वह
बाबूजी के आदेश को टाल नहीं सकी थी। उनकी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए वह वहॉं जाने
की तैयारी करने लगी थी।
औरंगाबाद, पुणे, नासिक और मुंबई होते हुए ट्रिप गोवा पहुँची
थी। कॉलेज की ओर से प्रायोजित यह एक्सकर्सन ट्रिप पूरे पन्द्रह दिनों की थी।
गोवा की हसीन वादियों में कदम रखते ही
वह पुनः अजय की यादों में खोने लगी थी। वह जहॉं भी जाती, अजय की यादें उसका बराबर पीछा करती रही थी।
अपनी शादी के बाद हनीमून मनाने वह
गोवा ही तो आई थी। उन यादगार पलों को वह भूल भी कैसे सकती थी। उसने मन ही मन
निर्णय ले लिया था कि अब वह अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं होने देगी जो बदनामी का कारण
बने। इस निर्णय के साथ ही वह ट्रिप का इन्जॉय करने लगी थी।
अजय के व्यक्तित्व की वह शुरू से ही
कायल रही है, लेकिन वर्तमान में साथ-साथ रहते हुए उसने उसके अंदर
छिपे अन्य विशिष्ट गुणों को भी जॉंच-परख लिया था। अजय के व्यवहार में कहीं भी
बनावटीपन नहीं था। उसके नैसर्गिक गुणों के कारण ही तो वह एक जगमगाते हीरे की तरह
था। दूरियॉं अब नजदीकियों में बदलने लगी थी और मौन, मुखर
होने लगा था।
शाम का समय हो चला था। सभी
छात्र-छात्राएँ पहाड़ी की चोटी पर बैठे सुर्यास्त का दिलचस्प और अद्भुत नजारा देख
रहे थे।
एक बड़ा सा सिंदूरी गोला, आसमान और समुद्र के मध्य लटक रहा था। हवाएं तेज चलने लगी थी और समुद्र की
उद्याम लहरें किनारों से आकर टकराने लगी थी। समुद्री पक्षियों का झुण्ड आसमान में
अपने करतब दिखला रहे थे। उनकी चहचहाटों से समूचा वातावरण संगीतमय हो उठा था।
सिंदूरी गोला आहिस्ता-आहिस्ता नीचे की
ओर उतरने लगा था। समूचे आसमान और समुद्र का पानी सिंदूरी रंग में बदल गया था।
इस अनुपम और अद्भुत नजारे को देखते
हुए निशा, पुनः अजय की यादों में घिरने लगी थी। उसे ऐसा महसूस
हुआ कि अजय उससे सटकर बैठा है और उसकी विशाल बाहें उसकी कमर के इर्द-गिर्द लताओं
की सी लिपटीं हुई हैं।
अजय तो खैर अब इस दुनिया में नहीं था, लेकिन यादों के झरोखों से वह अब भी झॉंक रहा था। उसकी निकटता से उत्पन्न
ताप और स्पर्श की उष्मा, वह अब भी महसूस कर रही थी।
देखते ही देखते वह सुनहरा गोला समुद्र
में पूरी तरह उतर चुका था। चारों तरफ सुरमई अॅंधियारा घिरने लगा था और अब वह
गहराने भी लगा था।
अपने वर्तमान में लौटते हुए वह वापिस
लौट जाने के लिए उठ खड़ी हुई थी। पूरे इत्मीनान के साथ अपने कदमों को आगे बढ़ाते वह
पहाड़ी उतरने लगी थी। सारी सावधानियों के बावजूद उसका पैर बुरी तरह से फिसला और वह
एक चीख के साथ नीचे जा गिरी थी। उसके घुटने, हथेलियॉं जख्मी
हो गए थे और बॉंए पैर की हड्डी संभवतः चटक गई थी।
अनिरूद्ध उससे कुछ फासला बनाकर चल रहा
था। उसे गिरा हुआ देख और आवाज सुनकर वह पास आ गया और मदद के लिए छात्र-छात्राओं को
आवाज देने लगा था। लेकिन पास में कोई भी नहीं था। शायद उसकी आवाज उन तक नहीं
पहुॅंची थी। उसे मदद देने के लिए अब स्वयं आगे बढ़ने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।
उसने उसे अपनी बाहों में भरकर उठा लिया और अब वह धीरे-धीरे पहाड़ी उतरने लगा था।
किसी पर-पुरूष के सामीप्य का वह पहली
बार अनुभव कर रही थी। दर्द का सैलाब अपने चरम पर था। बावजूद इसके वह एक निर्वचनीय
सुख का भी अनुभव कर रही थी।
तत्काल ही उसे हॉस्पिटल ले जाया गया
था।
सारी जॉंच के बाद डॉक्टर ने पैर में
फैक्चर होना बताया था और अब एक बड़ा-सा प्लास्टर उसकी टॉंग पर चढ़ा दिया गया था।
ट्रिप का सारा मजा ही इस दुर्घटना के
बाद किरकिरा हो गया था। एक दिन पूर्व ही समापन की घोषणा के साथ ही छात्र-छात्राएं वापिस
लौटने की तैयारी करने लगे थे।
उदासी की चादर ओढ़े अनिरूद्ध, अपने कमरे में बैठा निशा के बारे में ही सोच रहा था। दरअसल आज वह अपने मन
की गॉंठ उस पर उजागर कर देना चाहता था लेकिन वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाया था।
अपने विचारों की खोल से वह बाहर भी
नहीं आ पाया था कि दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक सुनकर उसने लापरवाही से उसे अंदर आने
को कहा। उसकी अपनी सोच थी कि कोई छात्र अपनी समस्या को लेकर उसके पास आया होगा।
उसकी ऑंखें फटी की फटी ही रह गई थीं।
आने वाला कोई छात्र नहीं बल्कि एक छात्रा थी, उर्वशी। उसने
झीने कपड़े पहन रखे थे। पारदर्शी कपड़ों के भीतर से उसका गदराया यौवन झॉंक रहा था।
उर्वशी को भला कौन नहीं जानता। अपनी
धींगा-मस्ती और खुलेपन के लिए वह सदा ही सुर्खियों में बनी रहती थी। अपने कॉलेज
ज्वाइन करने के दिनां से वह भी उसे जानने लगा था।
अंदर आते ही वह बुलबुल की सी चहकने
लगी थी।
" हाय हैण्डसम... किस गम में डूबे हुए हो? "
" ओह तुम... क्यों
आई हो इस समय... और वह भी इतनी रात गए ? "
" क्या करती सर
... दिल मान ही नहीं रहा था... सो चली आई...
उसकी बेशर्मी-भरी बातों को सुनकर उसे
क्रोध हो आया था। मन में आया कि उसे खूब जलील करे और तत्काल बाहर निकल जाने की कह
दे, लेकिन वह कह नहीं पाया था। मुँह से कोई भी बात
निकालने के पहिले वह उस बात को तौल लिया करता था, तब अपना
मुँह खोल पाता था। यह उसकी अपनी आदत थी, वह सोचने लगा था कि
ऐसा करने से कहीं दॉंव उल्टा भी पड़ सकता है। ऐसी लड़कियॉं अक्सर अपने बचाव को लेकर
तरह-तरह के दॉंव-पेंचों को निर्धारित करने में माहिर होती हैं। वे जानती हैं,
कब-कहॉं-कौन सा दॉंव लगाना चाहिए। यदि वह उल्टे उसी पर इल्जाम मढ़
देगी तो वह कहॉं-कहॉं अपनी सफाई देता फिरेगा। बातों को गम्भीरता से सोचते हुए उसने
निर्णय लिया कि इस खूबसूरत बला को, यहॉं से किसी तरह टाल
देने में ही भलाई है।
उसने बड़ी ही अजीजी के साथ कहा-ष्देखिए
मैडम... इस समय में काफी डिस्टर्ब हूँ.. जो भी बातें आप कहना चाहती हैं... उसे कल
के दिन में भी कही जा सकती है। कृपया मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए और आप यहॉं से
तशरीफ ले जाने की कृपा करें।
अपनी मादक अदाओं को बिखेरती और गोल-गोल
ऑंखें नचाते हुए उसने कहा- " सर जी... मैं आई तो थी ही इस इरादे से कि आज की
रात इसी कमरे में बिताऊँगी... वह भी आपके साथ, लेकिन...
जानेमन... जाने की कह रहे हैं। मैं चली जाऊँगी... बेशक चली जाऊँगी... लेकिन मेरी
भी तो कुछ सुन लीजिए। क्यों लट्टू हो रहे हैं आप निशा मेडम पर ? क्या रखा है, खास उसमें, जो
हममें नहीं है। सिर से पॉंव तक एकदम फिट... खूबसूरती से भरा जिस्म। नाप भी
34-24-34 का है। नाप कर देख लीजिए। इतना
कहते ही उसने अपने उपर का टॉप उतारकर फेंक दिया था। कमर से उपर का धड़, एकदम नंगा था, विवस्त्र।
उसकी इस निर्लज्ज हरकतों को देखकर वह
दंग रह गया था। सच ही सोचा था उसने कि वह किसी भी पायदान पर उतर सकती है। उसकी
पेशानी पर पसीना छूने लगा था। दिल एक अजीब सी जकड़न में कसने लगा था। वह कब यहॉं से
बाहर जाती है, वह इसकी बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करने लगा था।
उर्वशी शायद अपना होश खो बैठी थीं उसका
पूरा शरीर उत्तेजना में कांप-सा रहा था। ऑंखें नचाते हुए उसने कहा- " देखा आपने, मैंने कहा था न!
निशाजी से बीसा ही पड़ूँगी। "
" मैं एक खिला हुआ फूल हूँ, जिसमें चटक रंग है... खुशबू है... मकरंद है... अपनी शोखियॉं भी है,
वह आपको एक कदम आगे बढ़कर खुला निमंत्रण दे रहा है और आप हैं कि बासी
फूल पर मंडरा रहे हैं। कैसे भॅंवरे हैं आप?."
" शायद आप नहीं जानते। आपको यह
बताना भी जरूरी है कि वह एक जूठन है... उतरा हुआ कपड़ा है। समझ रहे हैं न आप...
मेरे कहने का मतलब है कि वह किसी की विधवा है। मुझे आपकी सोच पर अफसोस ही नहीं हो
रहा है, बल्कि तरस भी आ रहा है।?.
" मैं जा रही हूँ । हाँ मैं जा रही हूँ, लेकिन
मेरी बात कान खोलकर सुन लीजिए, मेरा नाम उर्वशी है। उर्वशी
के रूप-सौंदर्य के सामने जब विश्वामित्र भी नहीं टिक पाए थे तो आप कहॉं लगते हैं?
उर्वशी जब कोई चीज ठान लेती है ते करके भी बताती है। उसका मन जिस
चीज पर भी आ जाता है, वह उसे प्राप्त करके ही दम लेती है। जब
मेरा दिल आप पर आ ही गया है ते आपको पाकर ही रहूँगी... बाई हुक या क्रुक... समझे
आप? किसी ने कहा है कि प्यार में जोर-जबरदस्ती नहीं की जाती।
मैं आपको अपने राह पर ले ही आउंगी एक दिन । " कहते हुए उसने जमीन पर पड़े टॉप
को उठाया, पहना और जूतियॉं खटखटाती बाहर निकल गई।
दरवाजा धड़ाम से बंद हो गया था।
उस खूबसूरत बला को वह गुस्से
में जाता देखता रहा। दरवाजे की धड़ाम सी आवाज सुनते ही उसका दिल भी जोरों से धड़कने
लगा था। वह सोचने लगा था- उर्वशी जाते-जाते उसे खुली धमकी दे गई है। गुर्राहट से
साफ झलकता है कि वह चैन से नहीं बैठेगी। वह कोई भी हरकत कर सकती है। आने वाले दिन
उलझनों से भरे मिलेंगे... यह तय है। एक घायल नागिन और एक अतृप्त-आत्मा अपना बदला
लेने के लिए उस समय तक घात लगाए बैठे रहते हैं, जब तक वे
अपना बदला नहीं भंजा लेते। उसे अब हर कदम पर सावधानी बरतनी होगी।
वह यह भी सोचने लगा था- कैसी
नादान व बेवकूफ लड़की है उर्वशी। शरीर से वह भले ही एक सम्पूर्ण औरत के जिस्म में
ढल गई है, लेकिन उसका बचपना अभी भी नहीं गया है। अकल से भी
कच्ची लगती है... वह यह नहीं जानती कि दिल कोई ऐसी-वैसी फालतू चीज तो नहीं कि जब
मन में आया, किसी को भी उठाकर दे दिया। वह क्या जाने दिल और
दिल की भाषा। लापरवाही से सिर झटकते हुए उसने अपने आप से कहा था।
जाने को वह चली तो गई थी लेकिन एक शांत झील में वह एक बड़ा-सा पत्थर जरूर
उछाल गई थी। उसका मन भी किसी झील की तरह अशांत हो उठा था। विचारों की असंख्य लहरें,
तट पर आकर टकराने लगी थी।
पूरी रात वह चैन की नींद नहीं सो
पाया था।
सुबह होने के साथ ही सामान
गाड़ियों पर लादा जाने लगा था।
वापिस लौटने के साथ ही निशा
बिस्तर पर जा टंगी थी।
वह न तो चल-फिर ही सकती थी और न
ही कोई काम ही कर सकती थी। कभी वह तकिया का सहारा लेकर बैठी रहती अथवा मैग्जीन के
पन्ने पलटती रहती या फिर अपनी ऑंखें बंदकर अपनी पलकों में मीठे हसीन सपनां को
सजाती रहती। समय था कि काटे नहीं कट रहा था।
वह इन बातों से सर्वथा अनभिज्ञ
थी कि बाहर कहॉं, क्या हो रहा है। वह तो यह भी नहीं जानती थी
कि कौन उसके खिलाफ विष-वमन कर रहा है। सोते-जागते-उठते-बैठते वह अनिरूद्ध के बारे
में ही सोचती रहती थी।
उसकी ऑंखों के सामने गोवा की हसीन
वादियॉं, उॅंची-नीची पहाड़ियॉं, लहलहाता
समुद्र तैरते रहते और उन सबके बीच होता अनिरूद्ध।
अनिरूद्ध को पाकर उसके दिल की
मुरझाई कलियॉं फिर से मुस्कुराने लगी थीं। चारों तरफ वसंत का सा माहौल छाने लगा
था। शरीर का रोम-रोम सितार की तरह झंकृत हो रहा था। उसे तो ऐसा भी लगने लगा था
जैसे वह किसी परीलोक में चली आई है।
मीठे-हसीन सपनों को देखती हुई वह
सो रही थी कि अचानक दर्द का एक सैलाब आया और उसके सारे सपनों को बहाकर ले गया। एक
तीखे दर्द के अहसास ने उसे रोने पर मजबूर कर दिया था।
दर्द से निजात पाने के लिए उसने
सिरहाने पड़े दवा का रैपर उठाया, एक गोली निकाली, जीभ पर रखी और पानी के घूँट के साथ ही उसे हलक के नीचे उतार लिया।
दर्द अब भी पूरी रफ्तार के साथ चिलक रहा था।
थोड़ी देर बाद उसे राहत मिलने
लगी थी। वह पुनः अपने खयालों में खोने लगी थी।
उसे इस ख्याल ने लगभग चौंका ही
दिया था कि वह क्यों अनिरूद्ध को चाहने लगी है? क्या उसे ऐसा
करने का अधिकार है? क्या आज का दकियानूसी समाज उसे ऐसा करने
की इजाजत देगा? वह कभी किसी की अमानत रही है, उसे वह अपना दिल की क्या शरीर भी सौंप चुकी थी। क्या वह उसके प्रति
विश्वासघात नहीं होगा? जिस दिल में उसने अजय को जगह दी थी,
अब क्या वह उसे निकाल बाहर फेंकेगी और अनिरूद्ध को बसने की जगह
देगी। क्या वह इतनी आसानी से उसे भूल पाएगी? अजय को एकदम से
भुला पाना उतना आसान नहीं है।
यह ठीक है कि उसके मन में
अनिरूद्ध को लेकर एक प्यार का पौधा अंकुरित हुआ है। वह उसे चाहने लगी है। वह सिर्फ
एक-तरफा प्यार है। क्या अनिरूद्ध के मन में भी इसी तरह का प्यार पनप रहा है? क्या वह भी उसे चाहने लगा है?
मेरे अपने बारे में सब कुछ जानते-बूझते हुए वह क्या ऐसा कर पायेगा?
उसने अपनी ओर से कभी भी इस बात को उजागर नहीं किया है। यह टीक है कि
वह रोज़ उसे देखने आता है। इसका आशय तो यह कदापि नहीं लगाया जा सकता कि वह केवल
प्यार जताने ही आ रहा है। एक सहकर्मी होने के नाते भी तो वह आ सकता है।
प्रश्नों के चक्रव्यूह में वह बुरी तरह
फॅंस गई थी और बाहर निकल जाने के रास्तों के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी।
समय का बहाव अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाता
है। उसने अपने जीवन की नौका को समय के बहाव के साथ खुला छोड़ देने का मानस बना लिया
था। वह यह नहीं जानती कि उसकी नाव किस घाट पर जाकर लगेगी अथवा उद्याम लहरों के
थपेड़ां में चूर-चूर होकर, सदा-सदा के लिए समुद्र के गर्भ में समा जाएगी।
प्रेम-प्यार-समर्पण जैसे शब्दों को
बलाए-ताक पर रखते हुए, वह उस घड़ी का इंतजार करने लगी थी, जो भविष्य की मुट्ठियों में कैद थीं।
उर्वशी चुप बैठने वालों में से नहीं थी। वह
चुप बैठी ही कहॉं थी। आने के साथ ही वह इस उधेड़बुन में लगी रही थी कि वह किस तरह
से अनिरूद्ध को पा सकती थी। सारे हथकण्डे अपनाने के साथ ही वह उन्हें समाज में
बदनाम करने की भी योजना बना चुकी थी।
खबरों को सनसनीखेज बनाते हुए वह उसे कागजों
पर उतारती और अखबारों के पन्नों के बीच रखवाकर उन्हें घरों-घर पहुँचवाने लगी अथवा
खिड़की-दरवाजों की सुराखों से अंदर डलवा देती। शुरू-शुरू में लोगों ने उसे महज एक
एड का पुर्जा समझकर रद्दी की टोकरियों के हवाले कर दिया तो कभी उसे यूंही फाड़कर
फेंक दिया। फिर अचानक ही ये खबरें लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलने लगी। बद्रीविशाल
के विशाल व्यक्तित्व के चलते लोगों की हिम्मत उनके सामने मुँह खोलने की तो नहीं
हुई, लेकिन दोनों के प्रेम-प्रसंगों की चर्चाएं आम हो गई
थी।
अपने मिशन को असफल होता देख वह क्रोध में
भरने लगी थी। असफल होने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी थी। अब वह कॉलेज परिसर
में ही नए-नए हथकण्डे अपनाती और अनिरूद्ध को रिझाने की कोशिश करती। अनिरूद्ध भी कम
होशियार नहीं था। वह उसकी हर चाल को शिकस्त देता चलता था।
अनिरूद्ध निशा से मिलने और हाल-चाल जानने
के लिए सुबह समय नहीं निकाल पाता था। हॉं, शाम को वह कॉलेज
से छूटते ही वहॉं जा पहुँचता था।
आने के साथ ही वह सीधा बाबूजी के कमरे में
जा पहुँचता था। निशा के हाल-चाल पूछता, फिर यहॉं-वहॉं की
बातें करता हुआ, वह वापिस हो लेता था। उसने कभी-भी भूलकर
सीधे निशा के कमरे में जाने की जहमत नहीं उठाई थी। उसकी अपनी शालीनता, आत्म-सजगता और कुशल-व्यवहार से सभी का दिल जीत लिया था। बाबूजी भी उसमें
अपने बेठे का स्वरूप देखकर उसे पुत्रवत् स्नेह भी करने लगे थे। निशा भी उसके
कर्तव्यबोध की सराहना करते नहीं थकती थी।
दो माह बाद वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई थी।
हड्डियॉं जुड़ गई थी और अब वह चल-फिर भी सकती थी।
कॉलेज जाने के लिए अपनी गाड़ी न निकालते हुए
उसने पैदल ही जाने का निश्चय किया। दरअसल वह यह देखना चाहती थी कि कहीं कोई
कोर-कसर बाकी तो नहीं रह गई है।
हाथ में किताबों को उठाए वह कॉलेज की ओर बढ़
रही थी। बाहर आते ही उसे लगा कि इस बीच पूरी दुनिया ही बदल गई है।
उसे देखते ही औरतों और पुरूषों की भीड़
इकट्ठी होने लगी थी। वे आपस में खुसुर-फुसुर भी करते जा रहे थे। उन्हें ऐसा करता
हुआ देख, वह असहज होने लगी थी। उसे आश्चर्य इस बात पर हो रहा
था कि पूर्व में ऐसा कभी नहीं हुआ था।
जब
वह अपने क्लास-रूम में पहुँची तो ब्लैक-बोर्ड पर अपनी और अनिरूद्ध की तस्वीरें बनी
देखकर वह सन्न रह गई थी। कमरे में सन्नाटा पूरी तरह से पसरा हुआ था। छात्र-छात्राएं
टकटकी लगाए उसके चेहरे पर पड़ने वाले प्रभावों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे।
वह समझ गई। उसे समझने में ज्यादा देर भी
नहीं लगी थी। उसके सोच के केंद्र में उर्वशी थी। वह जानती थी कि वह कुछ भी कर सकती
है। गोवा की ट्रिप में भी वह यह ऐसी-वैसी हरकतें कर चुकी थी लेकिन तब वह माहौल को
गड़बड़ होता नहीं देखना चाहती थी, लेकिन पानी अब सर पर से उॅंचा
बहने लगा था।
वह यह भी जानती थी कि इस समय थोड़ा-सा भी
आक्रोश दिखाने से मामला खटाई में पड़ सकता है। संभव है कि वह बाजी भी हार जाए और
लोगों के बीच तमाशा बनकर रह जाए।
अपने धैर्य और संयम को बचाए रखते हुए उसने
अपने ओंठों पर एक विस्मित भरे हास्य को बिखेरा, जैसे कुछ हुआ ही
न हो। उसने डस्टर उठाया और बोर्ड साफ करते हुए उसी तन्मयता से पढ़ाने लगी, जैसे वह पहले भी पढ़ाती आई थी।
अपना पिरीयड पूरा करने के बाद उसने उर्वशी
से मुखातिब होकर कहा कि वह उससे अलग से बात करना चाहती है, एकांत में।
उसे अब उर्वशी का इंतजार था। एक पेड़ के
नीचे खड़े रहकर वह उसके आने का इंतजार कर रही थी।
उर्वशी को आता देख उसने संतोष से गहरी
सॉंसें ली और अब वह उसके साथ आगे बढ़ने लगी थी।
रास्ता चलते उसने मौन ओढ़ रखा था। उर्वशी
हतप्रभ थी कि कि मेडम उसे कहॉं और क्यों ले जाना चाहती है।
रास्ता कट गया और कब घर आ गया, पता ही नहीं चल पाया। उर्वशी भी बिना कुछ बोले उसके पीछे-पीछे यंत्रवत्
चलती रही थी।
अपने कमरे में प्रवेश करने के साथ ही निशा
ने अपनी तर्जनी उठाकर उस ओर इशारा किया जहॉं अजय की तस्वीर लटक रही थी और उस पर एक
माला भी लटक रही थी। उसने कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा- " ये
मेरे स्वर्गवासी पति अजय की फोटो है। "
उर्वशी की नजरें चकराने लगी थी। वह सोचने
लगी थी...अरे... इसकी सूरत तो हू-ब-हू अनिरूद्ध से मिलती है। ऐसे कैसे हो सकता है? उसने अपने आप से कहा था
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10
सगुन चिरैया
आकाश से उतरकर अंधेरा, ऊंचे-ऊंचे
दरख्तों की शाखों पर झूल रहा था। पास ही के पेड़ पर पक्षी कलरव कर रहे थे, शायद वे संध्या-गान गा रहे थे। दिन भर से अपने कमरे में कैद स्वामीजी
अलसाया मन लेकर अपने आश्रम से निकले, पुरानी आदत के मुताबिक
उन्होंने एक मटके में से मुठ्ठी भर अनाज निकाला और पास ही बने चबूतरे पर बैठ गए।
उनकी नजर पेड़ के आस-पास उड़ रहे पखेरुओं पर पड़ी। दूर-ऊंचाईयों पर श्वेत कबूतर
हवाई करतब दिखा रहे थे। स्वामी जी ने उन्हें बड़े-लाड-प्यार से पाला था। दाना जमीन
पर बिखेरते हुए वे कबूतरों को दाना चुगाने के लिए आमंत्रण दे रहे थे। ऑव-ऑव की
शब्द-ध्वनि उनके मुंह से बराबर निकल रही थी। कबूतरों का झुण्ड अपनी मस्ती में मस्त
था। बार-बार बुलाने पर भी एक भी कबूतर ने जमीन की ओर रुख नहीं किया। पता नहीं
उन्हें आज क्या हो गया था। अन्यथा वे स्वामीजी को बाहर निकलता देख, कंधों पर आकर बैठ जाया करते थे। कभी-कभी तो वे सिर पर भी आकर बैठ जाया
करते थे।
बुत बने स्वामीजी के
अंदर अचानक एक विशाल वृक्ष उग आया और उस पर बैठे यादों के पखेरू फडफ़ड़ाकर अतीत के
आकाश में चक्कर लगाने लगे।
एक मरियल पिद्दी सा
लौण्डा, जिसकी पीले पके आम की तरह सूरत लटकी हुई थी, आंखें अंदर तक धंसी हुई थीं। जिस्म के मामले में वह नीरा हड्डियों का
ढांचा मात्र था। लडख़ड़ाती चाल चलता हुआ वह, कलेक्ट्रोरेट की
ओर जा रहा था।
जब वह वापस लौटा तो
उसकी चाल में एक अजीब सा दीवानापन था। उतार में उतरता हुआ वह, डाकघर की ओर बढ़ रहा था। जब वह लौटा तो उसके हाथ में सौ-सौ के नोट थे। वह
नोटों को बार-बार गिनता, तह में जमाता और फिर गिनने लग जाता।
न जाने कितनी ही बार वह नोटों को गिन चुका था।
अब वह फुर्ती से चलता
हुआ बीकानेर मिष्ठान की सीढिय़ां चढ़ गया। वहां जाकर उसने मिठाईयां खाईं और नीचे
उतरते हुए सीधे पान के ठेले की ओर बढ़ गया। अनगढ़ हनुमान मंदिर के समीप ही एक पान
का ठेला है। मुन्नाभाई बड़ा गजब का पान लपेटते हैं। उसने पान मुंह के हवाले किया।
फिर सिगरेट लेकर ओठों में दबाया, तीली चमकाया और सिगरेट
जलाकर गहरे कश लगाते हुए धुआं उगलने लगा। सिगरेट के धुएं को उड़ाता हुआ वह मस्त
चाल में चला जा रहा था। उसकी चाल-ढाल और सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाने की स्टाईल
देव आनन्द की-सी लग रही थी। शायद उसके ओठों पर वही पुराना चिर-परिचित गीत 'हर गम को धुएं में उड़ाता चला गयाÓ खेल रहा था।
भूख से गल चुके
सिद्धार्थ ने जब कटोरी भर खीर का स्वाद चखा तो उनके अंदर सोया हुआ बुद्ध जाग गया
था ठीक इसी तरह, तरह-तरह की मिठाईयां जब उसके पेट में
पहुंचीं तो उसे भी बुद्ध ज्ञान प्राप्त हुआ और उसने तत्क्षण निर्णय लिया कि नारकीय
जीवन से छुटकारा पाकर ही रहेगा।
तेजी से चलता हुआ वह
शर्मा भोजनालय पहुंचा। भरपेट खाना खाकर फिर वह हनुमान मंदिर के बाजू वाले रास्ते
से चलता हुआ एक सिंधी की दुकान पर पहुंचा। वहां से 10-15 हाथ
का एक मजबूत रस्सा खरीदा और बंडल बगल में दबाते हुए नागपुर रोड पर बढ़ चला।
चार-छ: फर्लांग चलने के
बाद वह बोदरी नदी के किनारे-किनारे चलने लगा। टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुए
उसने एक सुनसान जगह पा ही लिया। ऊंचे पेड़ की मजबूत शाखा पर उसने फंदा बनाया और दो
पत्थरों का सहारा लेकर वह फंदे के पास पहुंचा और फन्दा गले में डालकर झूलने ही
वाला था कि किसी के गाने की आवाज सुनकर वह अंदर तक कांप गया। फंदे को गले से उतारकर
उन पत्थरों पर आ बैठा जिनके सहारे अभी-अभी वह फंदे तक पहुंचा था।
एक पारधी पहाड़ी गीत
गाता हुआ उछलता-कूदता पहाड़ से उतर रहा था। उसके गले में लोच था। अत: गीत में
माधुर्य छलक उठता था। गीत तो उसका अपनी पहाड़ी भाषा में था।
जब वह सांझ ढले पहाड़
उतर रहा होता है तभी एक सगुन चिरैया शाख पर बैठी दिखाई दी। उसने फुर्ती से लपककर
चिडिय़ा को पकड़ लिया। रंग-बिरंगी चिडिय़ा को पाकर वह बहुत खुश हुआ। उसने ईश्वर को
लाख-लाख धन्यवाद दिया और फिर उसी अक्खड़ चाल से कूदता-फांदता पहाड़ उतरने लगा।
एक अजनबी को सुनसान जगह
में बैठा पाकर उसके पैरों में अचानक ब्रेक लग आए। सरसरी निगाह डालते ही उसकी समझ
में सारा माजरा आ गया। उस अजनबी को लगभग झकझोरते हुए उसने कड़क आवाज में पूछा कि
वह यहां किस प्रयोजन से आया है। जिंदगी से निराश, परेशान
व्यक्ति ने बहेलिए की कड़कदार आवाज सुनी तो वह अंदर तक कांप उठा। और दहाड़ मारकर
रोने लगा। काफी देर तक रो चुकने के बाद अब वह नार्मल हो चला था।
पारधी ने बड़े प्यार से
उसके सिरपर हाथ फिराते हुए और लगभग पुचकारते हुए कहा- " 'बेटा, मैं
समझ चुका हूं कि तू यहां क्या करने आया है। तू आत्महत्या करना चाह रहा था न?
क्या मिलेगा तुझे आत्महत्या करने पर। अरे ये मानव तन बड़ी मुश्किल
से मिलता है। अत: इसका उपयोग सही दिशा में करना चाहिए। जितना भी हो सके किसी का
भला करने की सोचते रहना चाहिए। मन की आदत है कि वह न तो स्वयं सीधा बैठता है और न
ही आदमी को बैठने देता है। बड़ा फितरती होता है मन। मन की आदत है कि वह यहां-वहां
भटकता रहता है। और मौका मिलने पर अनर्थ ही करवाने लगता है। अत: इसे ईश्वर के
श्रीचरणों से जोड़कर रखना चाहिए। यदि वह परमात्मा से जुड़ जाता है तो बुद्धि भी
निर्मल होने लगती है। आदमी अच्छा खासा कार्य करने लग जाता है। एक ईश्वर ही तो है
जो सबकी सुनता है... तेरी भी सुनेगा। ईश्वर चाहे तो रंक को राजा और राजा को पल भर
में कंगाल बना सकता है। उसने करोड़ों, खरबों जीव बनाए हैं
उसे सभी की चिंता है। "
उस पारधी के सांत्वना
भरे शब्दों को सुनकर अब वह चैतन्य हो चला था। वह बतलाने लगा, 'भैया गरीबी से तंग आकर वह आत्महत्या करने के उद्देश्य से वहां आया था। उसके
शब्दों को बीच में ही काटते हुए पारधी ने कहा- " 'देख, मेरी
तरफ देख, क्या तुझे मैं धन्ना सेठ लगता हूँ ? शरीर पर कपड़े के नाम पर मात्र एक लंगोटी है। सिर ढकने को एक फटा गमछा है।
रहने को न कहीं ठौर न ठिकाना। जहां रात हुई वहीं सो लिए और पौ फटते ही निकल पड़े
जंगल में। सुबह से ही जंगल-जंगल भटकता रहता हूं। कोई न कोई शिकार हाथ लग ही जाता
है। कभी खाने को मिला तो ठीक अन्यथा दिन ऐसे ही गुजर जाता है। जहां तक मैं समझता
हूं तू अकेला सांड है। फिर मेरे तो लुगाई लड़का भी है। गरीबी से तंग आकर, मेरे मन में कभी भी ख्याल नहीं आया कि आत्महत्या कर लूं। ध्यान से सुन जब
तक जीना है तब तक सीना है। अत: मर्द बन और अपनी जिंदगी जी। अरे हां-मैंने ये सगुन
चिरैया पकड़ी है। यह आदमियों की तरह बोलती-बतियाती है, भूत,
भविष्य, वर्तमान सब कुछ बताती है तू चाहे तो
इसे ले ले। लोगों के भूत-भविष्य बांचना। दो जून की रोटी का इन्तजाम हो जायेगा। मैं
अगर चाहूं तो यह धंधा कर सकता हूँ । पर मुझे जंगल ही प्रिय है। मैं इसी में पैदा
हुआ और इसी में मर जाना चाहूंगा। तू चाहे तो इसे खरीद ले। " इतना कहते हुए
पारधी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
चिडिय़ा को आदमी की तरह
बात करता देखकर उसे कौतुहल होने लगा। उसकी जेब में अब भी कुछ रुपए पड़े थे। उसने
एक सौ का नोट पारधी की ओर बढ़ाया और चिडिय़ा लेकर शहर की ओर लौट पड़ा।
बुधवारी बाजार पहुंचकर
उसने एक पिंजरा खरीदा। चिडिय़ा को पिंजरे में डालने के बाद वह पेन्टर जी.एच.अली की
दुकान पर जा पहुंचा और भविष्य बांचने वाला एक बोर्ड बनवाया और म्युनिसिपल कार्यालय
के सामने फुटपाथ पर बैठ गया। कभी वह प्रमुख डाकघर के सामने भी बैठ जाता।
जब भी कोई अपना भविष्य
जानने के लिए आता, पांच-दस का नोट जेब के हवाले करते हुए वह
चिडिय़ा से उसका भविष्य जानता। चिडिय़ा जिस गूढ़ भाषा का प्रयोग करती उस गूढ़ भाषा
का वह अकेला जानकार जो था। वह उसका तर्जुमा कर सुना देता। बात सौ आना खरी उतरती।
देखते ही देखते वह एक नामी-गिरामी भविष्यवक्ता बन गया।
जब भी कोई व्यक्ति बड़ा
बन जाता है तो वह किसी महानगर की ओर जाने की सोचने लगता है। काफी सोच समझकर उसने
दिल्ली जाने का मन बनाया। दिल्ली एक ऐसा शहर है जहां सफल होने पर कोई कवि अथवा
लेखक अथवा नेता पहुंचना चाहता है। फिर वहां जाकर अपने पैर फैलाता है? और फिर शेष भारत पर अपना शासन चलाता है। अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वह
दिल्ली की ओर कूच करता है। दिल्ली उसका दिलोजान से स्वागत करती है।
उसके वहां पहुँचते ही
लोकसभा के चुनाव होना घोषित हो गया। अब उसके पास अपना भविष्य जानने राव, उमराव, नेता, अभिनेता, अरबपति, करोड़पति आने लगे। वे मुंहमांगी रकम देते और
अपना भविष्य जानते।
चुनाव का मौसम बीतते ही
उसने अपना एक विशालकाय-सुसज्जित आश्रम यमुना के किनारे बनवाना शुरू कर दिया। आश्रम
के चारों ओर लॉन समेत आलीशान बगीचा, चलित फव्वारे, स्वीमिंग पुल, इंगलिश स्टाईल के काटेजेस, गाडिय़ां पार्क करने के लिए भी अच्छी व्यवस्थाएं कीं। कामकाज को सुचारू रूप
से चलाने के लिए उसने पर्सनल-असिस्टेंट भी नियुक्ति किए। कई रूपसियों को भी उसने
आश्रम में जगह दी जो विदेशियों का मन मोह सकें।
अब देश-विदेश से लोग
स्वामी जी के पास आने लगे। वे अपनी समस्याओं का तत्क्षण निराकरण करवाते और बदले में
मनचाही दक्षिणा अर्पण कर जाते। अब तो स्थिति यहां तक आन पड़ी थी कि लोगों को अपना
भविष्य जानने के लिए महीनों ही नहीं, वर्षों तक वेटिंग लिस्ट
में डाले रहना होता था।
दिन भर की चख-चख से
थककर चूर हो चुके स्वामी जी पलंग पर आकर पसर गए। पूरा शरीर दर्द के मारे जकड़ सा
गया था। उन्होंने वहीं से पसरे-पसरे अपने सेवकों को आवाज दी। पल भर में कई
दास-दासियां इकठ्ठे हो गए। कोई तलवे
सहलाता, तो कोई पिण्डलियां दबाता, तो
कोई सिर में मसाज करने लग गया। वे जानते थे, इन सबसे कुछ
नहीं होगा। फिर उन्होंने अपने नीति सेवक से कहा कि वह चिलम भर लाए। पलंग से लगभग
टिके हुए उन्होंने दस पांच गहरे कश खींचे और बकबक करके धुआं उगलने लगे। बीच-बीच
में वे बम-बम महादेव भी चिल्लाते जाते। गांजे की कली अब सिर पर चढ़कर बोलने लगी
थी। तभी एक असिस्टेंट ने आकर सूचना दी एक विदेशी आया हुआ है और आप से अभी और इसी
वक्त मिलना चाहता है। उसने तो यह भी कह भेजा है कि वो अपना काम हो जाने पर एक
करोड़ तक सहर्ष देने को तैयार है।
" जाओ... जाओ...
उसे तत्काल ले आओ। " स्वामीजी ने आदेश दिया।
एक सूटेड-बूटेड विदेशी
नमस्ते-नमस्ते कहता हुआ स्वामीजी के चरणों में आकर लोटने लगा। स्वामी जी ने आंखों
से इशारा किया। कमरा अब पूरी तरह से खाली हो चुका था। सभी सेवक कमरे से बाहर जा
चुके थे। स्वामीजी ने सगुन चिरैया से भविष्य बतलाने को कहा, परन्तु
चिडिय़ा कुछ नहीं बोली, बार-बार मिन्नतें करने के बाद भी जब
चिडिय़ा नहीं बोली तो भूल समझ में आई। नशे के चलते आज वह गलती हो गई जिसे नहीं होनी
चाहिए थी।
विदेशी को फिर कभी आने
का कहकर उन्होंने उसे चलता किया। दरवाजे की चटखनी चढ़ाकर लौटे और चिडिय़ा के आगे
मिन्नतें मांगते रहे, गिड़गिड़ाते रहे। अब तो वे फफककर रोने
भी लगे थे।
चिडिय़ा ने अंतिम बार
बोलते हुए कहा- " रे मूर्ख, तू भूल गया कि हमारे बीच कुछ शर्तें हुई थीं। तुमने सभी शर्तों का उल्लंघन
किया है। मैंने तुम्हें पहले ही बतलाया था कि मुझे तीखी गंध से सख्त परहेज है और
दूसरी मुझे लफ्फाजी बिल्कुल भी पसंद नहीं है। बोलो, कहा था न?
गांजे के नशे में तुम इतने धुत्त थे कि जब सर्वोदयी नेता प्रमोद
उपाध्याय आए तो तूने समझा कि कादर खान आए हैं और जब बंबई से शक्ति कपूर आए थे तो
तुम उन्हें कमलनाथ समझकर पकपक करते रहे। और जब एक चिम्पाजी अपना भविष्य जानने आया
तो तुम उसे राव साहब समझने लगे। इस तरह तुमने नशे की हालत में मेरा उपहास ही
करवाया है और तुमने इस तरह सभी शर्तों का घोर उल्लंघन किया है। अत: आज से मैं मौन
धारण कर रही हूँ । "
इतना कहकर चिडिय़ा खामोश
हो गई। चिडिय़ा के खामोश हो जाने के बाद स्वामी जी अनमने से बैठे रहे और फिर बाहर
आकर चबूतरे पर बैठ गए।
सांझ का अंधियारा आकाश
में लटक रहा था। धीरे से उतरकर वह शाखों पर आकर झूलने लगा। स्वामीजी ने तनिक गर्दन
ऊपर करके देखा। कबूतर अपनी मस्ती में मस्त थे। रोजमर्रा की तरह उन्होंने मटके में
से अनाज निकाला और ऑव-ऑव की आवाज निकालते हुए उन्हें बुलाना शुरू किया। काफी
मिन्नतें करने के बाद एक भी चबूतरे के नीचे नहीं उतरा।
अंधियारा अब जमीन पर
आकर लोटने लगा और देखते ही देखते पूरा शहर अंधकार में डूब चुका था।
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11.
भेड़िया.
“तड़ाक.”
उसने एक
जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया.
तमाचा जड़ने
के साथ ही उसका पूरा शरीर क्रोध में कांप रहा था. आंखों में अंगारे दहक रहे थे.
उसकी आवाज में बिजली-सी कौंध रही थी. वह किसी भेड़िए की तरह गुर्रा रहा था. अपनी कर्कश आवाज में
वहलगातार चीख-चिल्ला रहा था- “कहाँ है मेरा शेरु.... उसे तुम्हारे हवाले किया था
और कहा था कि उसका ध्यान रखना, उसे समय पर खाना खिलाना...पानी पिलाना और उसे
बागीचे में टहला लाना. बोलो कहा था न !, तुम इतना सा भी काम नहीं कर सकी? आखिर तुम
करती क्या हो बैठे-बैठे... मलाईदार माल खा-खाकर मुटिया रही हो. बताओ...कहाँ है मेरा
शेरु....और न बतला पाई तो........?
वह “तो” पर
आकर अटक गया था. अटक गई थी उसकी जुबान. वह क्या कुछ नहीं कर सकता ?कल्पना
मात्र से उसके शरीर में कंपकंपी सी होने लगी थी. वह जानती है कि वह नीचता की सारी
हदें पार कर सकता है, वह आदमी से हैवान हो सकता है...उसकी दुर्गति कर सकता है. आए
दिन वह अपनी नीचता पर उतर आता है और उसकी इतनी जमकर पिटाई कर देता है कि लाख दवा
लगाने और सिंकाई करने के बाद भी जिस्म से दर्द नहीं जा पाता.
“
जी.....मुझे नहीं पता...वह अचानक कहां चला गया. खूब ढूंढने की कोशिश की..लेकिन उसे
ढूंढ नहीं पायी”
“ बकवास करती
है साली..हरामी....अगर वह नहीं मिला तो समझ लेना.....मुझसे बुरा और कोई नहीं
होगा”. कहते हुए वह भारी कदमों से चलता हुआ शीघ्रता से बाहर निकल गया.
वह किसी कटे
हुए वृक्ष की तरह बिस्तर पर गिर पड़ी और देर तक आंसू बहाती रही थी. देर तक रोते
रहने के बाद वह उठ बैठी और वाशरुम में धंस गई और दीवार पर टंगे आईने में अपना
चेहरा देखने लगी. रो-रोकर उसकी आंखें सूज आयी थीं. एक हसीन चेहरे पर विकृति की
परछाईयां साफ़-साफ़ देखी जा सकती थी. गाल पर अब भी पांचों उंगलियों के निशान मौजूद
थे. उसने नल खोला. शीतल जल के छींटे चेहरे पर डाले. दहकते हुए गालों पर शीतल जल की
बूंदों के पड़ते ही उसे राहत सी मिलने लगी थी. वह देर तक ऎसा करती रही.
वाशरुम से
निकलकर वह एक सोफ़े में धंस गई. एक विशाल कक्ष में वह थी और उसकी तनहाईयां थी. सफ़ेद
हंस की तरह उजले बीते दिनों की याद आती, तो उसकी आंखे मुस्कुरा उठती. और वर्तमान
में बीत रहे कष्टदायी दिनों की याद करते ही,उसकी आंखों से पुनः गरमा-गरम
आंसू टप-टपाकर झरने लगते. देर तक अनमनी सी बैठी रहने के बाद वह उठ खड़ी हुई और छत
पर निकल आयी.
शीतल पवन के झंकोरों ने उसे अपने में
आलिंगनबद्ध कर लिया. सुखद शीतल हवा के झोंकों में झूलते हुए उसे अच्छा लगने लगा
था. दिन भर का थका-हारा सूरज, पहाड़ी के उस पार उतरकर अपने घर जाने की तैयारी में
था. शाम को छत पर बैठी कांता सूरज को अस्ताचल में जाता देखती रही थी. ललछौंही
किरणॊं से पीपल के पत्ते संवलाने लगे थे. पक्षियों के दल लौटने लगे थे. वे अपने
मुँह में दाना-चुग्गा भर लाई थे,अपने शिशुओं के लिए. दाना-चुगा खिला देने के बाद
वे आपस में बतियाने लगे. दूर-दूर तक उड़ कर जाते, फ़िर वापस लौट आते. शायद वे अपना
कौशल दिखा रहे थे. सारे पक्षी उसकी बिदाई में सांध्य गीत गा रहे थे. बूढ़े पीपल के
देह में झुरझुरी सी भर आयी थी. वह भी तालियाँ बजा-बजाकर पक्षियों का उत्साहवर्धन
कर रहा था..
सूरज अपनी अंतिम किरणॊं
का जाल समेटे पहाड के पीछे छिप गया और आसमान में हल्का-सुरमई अंधियारा घिरने लगा,
जो क्रमशः धीरे-धीरे गहराता जा रहा था. अपने से बेखबर कांता दीवार से पीठ टिकाए
प्रकृति के नित-नूतन बदलते रुप को देख रही थी. पंछियों का सामुहिक गान और अपने
बच्चों के प्रति उमड़ आए स्नेह को देखते ही उसे अपनी दोनों बेटियों प्रभा एवं
प्रिती और एकलौते पुत्र अभिजीत की याद हो आई. कहने को तो वे उसके पुत्र और
पुत्रियां हैं, लेकिन समय की प्रचण्ड गति से चलती आधुनिक हवा उन्हें दूर उड़ा ले गई
है. प्रभा अपने बाय-फ़्रेण्ड के साथ डेटिंग पर चली गई है, बिना बतलाए और सूचना दिए.
प्रिती का कुछ अता-पता नहीं है, शायद वह भी अपने किसी आशिक के साथ रंग-रेलियां
मनाने निकल गई हो और अभिजीत अमेरिका की सड़कों पर गटरमस्ती कर रहा होगा.इन तीनों
में से कोईउसके पास होता तो वह उसके कांधे पर सिर टिकाकर रो तो सकती थी...अपना जी
हल्का तो कर सकती थी. लेकिन समय की प्रचण्ड आंधी ने उसका सब कुछ उजाड़ दिया था. अब
करे भी तो क्या करे कांता....किसे सुनाए अपने दिल का दुखड़ा...किसे दिखाए अपने तन
पर लगे जख्मों को.? किसे बतलाए कि राजेश अब पहले जैसा नहीं रह गया है... और बच्चे
उससे छिटककर दूर जा चुके है और वह निहायत अकेली नारकीय जिन्दगी जी रही है. रेत पर
पड़ी मछली की तरह छटपटाती कांता अपने अतीत के गलियारों में उतरकर चक्कर काटने लगी.
यादों के पखेरु कभी पकड़ाई में आते तो कभी हाथ आते-आते फ़ुर्र से उड़ जाते.
बहुत खुश थी कांता अपनी छोटी सी
दुनिया में. एक पतली सी तंग गली में उसका अपना छोटा सा आशियाना था. वह थी, तीनों
बच्चे थे और संग था राजेश, जो उसके सपनों की दुनिया को नए-नए रंगों से रंगीन बनाता
था, उसे हंसाता, खुद हंसता, गुदगुदाता और रोम-रोम में तरुणाई जगा जाता था. जीवन के
कठोर रास्ते पर चलने के पहले उसने इसी तरह का सपना पाल रखा था कि उसका अपना एक
छोटा सा आशियाना होगा, प्यारे-प्यारे बच्चे होंगे और होगा एक प्यारा सा
राजकुमार,जो उसे अपनी बाहों के हिंडोलों में झुलाता रहेगा.
उसके सारे सपने हकीकत में बदलने लगे
थे. उसे राजेश जैसा आदर्श पति जो मिल गया था. उसे पाकर वह निहाल हो गई थी. राजेश
जंगल विभाग में स्टेनों के पद पर कार्यरत था. एक सीमित आय थी उसकी. बावजूद इसके
उसकी घर-गिरस्थी बड़े आराम से चल रही थी. उसके जीवन में वह क्षण भी आ उपस्थित हुआ,जब वह
मां बनने जा रही थी. शीघ्र ही वह एक बेटी की मां बन गई. राजेश के अनुपस्थिति में
उसका सारा समय प्रभा के देखरेख और साज-संभार में निकल जाता. फ़िर आई दूसरी बेटी
प्रिती. जैसा नाम वैसे ही सीरत-सूरत. अपनी प्यारी-प्यारी बेटियों के संग वह जी भर
के बतियाती, उन्हें संस्कारित करती और समय-समय पर नेक सीख देना नहीं भूलती. दो-दो
बेटियों के होने के बावजूद उसे लगता कि एक पुत्र और हो जाए, तो वह निहाल हो उठेगी.
सपना सच हुआ और अभिजात का उसके जीवन में पदार्पण हुआ.इस तरहबहुत खुश थी कांता अपनी
इस छोटी सी गिरस्थी में.
राजेश भी व्यस्त रहता अपने कार्यालयीन
कामों में. वह हर काम चुटकी बजाते हल कर ले आता. दिन भर का थका-मांदा होने के
बावजूद भी उसके चेहरे पर हंसी खेलती रहती. कार्यालय के सभी अधिकारी, यहाँ तक की
स्टाफ़ का हर छोटा-बड़ा कर्मचारी उसके व्यवहार से खुश रहता था. यही सब कारण था कि वह
सबका चहेता बना हुआ था. शाम के ठीक छः बजे वह अपना केबिन बंद कर सीधे घर चला आता.
कांता और बच्चों के संग हो लेता. बेहद-बेहद खुश थी कांता अपनी छोटी से दुनिया में,
जिसमें कई-कई इंद्र्धनुष एक साथ ऊग आए
थे. कभी वह एक रंग से खेलती, तो कभी दूसरे से, कभी तीसरे से.
राजेश का भाग्य करवटें ले रहा था. वह
अचानक एक ऎसी तिलिस्मी दुनिया में प्रवेश करने जा रहा था जिसकी कि उसने कल्पना तक
नहीं की थी. उसके इलाके के आदिवासी नेता के देहावसान के बाद विधायक का पद खाली था.
उस स्थान की भरपाई के लिए एक ऎसे योग्य और होनहार व्यक्ति की तलाश थी, जो पढ़ा-लिखा
होने के साथ-साथ वाकपटु हो, मिलनसार हो, विनम्र हो और हर छोटी-बड़ी समस्याओं को
चुटकी बजाते हल कर लेने वाला हो. प्रदेश के सांसद महोदय भी ऎसे व्यक्ति की तलाश
में थे.
एक दिन. जंगल विभाग के बड़े आला अधिकारियों
सहित, प्रदेश के सांसद और वन मंत्री वार्षिक अधिवेशन में भाग ले रहे थे. बातों ही
बातों में कन्जर्वेटर साहब ने अपने कार्यालय में कार्य कर रहे राजेश के बारे में
विस्तार से सांसद महोदय को बतलाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक उस जैसा कर्मठ
कर्मचारी नहीं देखा है. यदि उससे त्याग-पत्र लेकर विधायक के पद पर चुनाव लड़वा दिया
जाए तो आपको एक बेहतर केंडिडेट मिल सकता है. आफ़ीसर की बातों में दम था और उन्हें
एक लंबे समय से ऎसे योग्य उम्मीदवार की तलाश भी थी.
सांसद महोदय ने उसे अपने कार्यालय में
बुलवाकर अपना मंतव्य सुनाया. सुनते ही राजेश सकते में आ गया था. उसने सपने में भी
नहीं सोचा था कि एक दिन वह विधायक भी बन सकता है. सुनते ही उसके शरीर में रोमांच
हो आया था. खुशी के मारे वह अन्दर ही अन्दर उछलने लगा था. मन गदगद हो उठा था.
चाहतें पंख पसार कर उड़ने लगी थीं पूरे वेग से. उसे इसी क्षण निर्णय लेना था. हां
कहने मात्र से वह फ़र्श से अर्श तक जा सकता था और ना कहने पर उसे बाबू का बाबू ही
बने रहना था. काफ़ी सोचने और विचार करने के बाद उसने हामी भर दी थी.
आज वह विधायक ही नहीं अपितु एक खास
विभाग का मंत्री भी बन गया था. बाबू से मंत्री बना राजेश अपने भाग्य पर इतराने लगा
था. जिसके पास कभी दो लोग इकठ्ठा नहीं होते थे, आज उसके इर्द-गिर्द भीड़ जमी रहती
है. फ़टीचर सायकिल में चलने वाले राजेश के पास उसकी अपनी बेशकीमती फ़ोरव्हील गाड़ी
है. अब वह टपरेनुमा कमरे में नहीं रहता. आज उसके पास एक आलीशान बंगला है और नौकर-चाकरों
की भीड़. जब वह सफ़र में होता है तो पांच-दस गाड़ियां उसके आगे-पीछे चलती है. उसका
अपना बाडिगार्ड है. आज क्या नहीं है राजेश के पास? धन-दौलत, रुतबा, पैसे-धेले,
नौकर-चाकर. किसी चीज की कमी नहीं है उसके पास. सफ़लता के नशे में मदहोश रहने लगा था
वह.
बहुत खुश थी कांता भी. उसने कभी
अनुमान तक नहीं लगाया था कि वह आम से खास बन जाएगी. आम से खास बनी कांता नित नूतन
सपने देखती और राजेश उन सपनों में रंग भर देता. टपरा टाईप स्कूल में पढ़ने वाली
उसकी बेटियां और बेटे अब शहर के नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ने जाते है. सभी के पास अपने-अपने
व्हिकल हैं. सबके अपने रौब हैं, रुतबें हैं.
समय कभी एक सी चाल में नहीं चलता. वह
सीधी चाल में चलता हुआ कब उलटी चाल में चलने लगेगा, कोई नहीं जानता. एक मनहूस
क्षण, बिल्ली की सी दबी चाल में चलता हुआ कांता के घर में कब घुस आया, पता ही नहीं
चल पाया. छोटी-बड़ी खुशियों के तिनकों को जोड़कर बनाया घोंसला अब बिल्ली की उछाल में
जमीन पर आ गिरा था और घोंसलें में सिर छिपाए खुशियों के पखेरु, चिंचियाते हुए
फ़ुर्र से दूर जा उड़े थे.
एक दिन की बात है. राजेश अपने दल-बल
के साथ एक बिहड़ में से गुजर रहा था. तभी उसकी नजर एक कुतिया पर पड़ी जो आराम से सो
रही थी और उसका नन्हा पिल्ला दूध चूस रहा था. गाड़ी की आवाज सुनकर कुतिया उठ खडी
हुई और जंगल में समा गई. राजेश के इशारे पर गाड़ी रोक दी गई. नवजात शिशु भाग नहीं
पाया. राजेश ने उस पिल्ले को गौर से देखा. उस पिल्ले को देखते ही उसके मन में दया
आ गई. पिल्ला था भी बड़ा सुन्दर. चमकीला रंग, भूरी-भूरी आंखें और जबड़े से झांकते
नुकिले दांत. उसके मन में आया कि इसे अपने बंगले पर होना चाहिए. इसके रहते उसका घर
सुरक्षित रहेगा, ऎसा विचार करते हुए उसने उसे अपने साथ ले आया.
राजेश के पी.ए. ने बतलाया कि वह कुतिया
का बच्चा नहीं बल्कि भेडिया का बच्चा है. लेकिन राजेश ने उसके तर्क को बोथरा करते
हुए, यह मानने से इनकार कर दिया कि वह भेड़िया का वशंज है.
घर में प्रवेश करते हुए उसने कांता को
बुला भेजा और हिदायत देते हुए कहा कि वह इस नवजात पिल्ले का विशेष ध्यान रखेगी. उसे
समय पर दूध पिलवाया करेगी और उसका समूचित रख-रखाव भी करती रहेगी. कांता ने उस
पिल्ले को गौर से देखा. लम्बा मुँह, झब्बेदार पूँछ, आँखों से टपकती चालाकी. देखते
ही समझ गई कि वह कुतिया का नहीं बल्कि भेड़िया का बच्चा है. उसने अपनी ओर से राजेश
को समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि जैसा वह समझ रहा हैं, वैसा नहीं है. उसने सलाह
देते हुए कहा भी कि उस पिल्ले को फ़िर से जंगल में छुड़वा देना चाहिए. राजेश किसी भी
तरह उसके तर्कों से सहमत नहीं था. उसका एक
ही कहना था कि वह कुतिया का पिल्ला है, अतः उसे वह किसी भी कीमत पर अपने बंगले पर
ही रखेगा.
दिन के शुरुआत भी बड़ी अजीब तरीके से
होती. दिन निकलते ही उसके चमचों की भीड़ बंगले पर जमा हो जाती. चाय-पानी-नाश्ते के
बाद वह अपने क्षेत्र के दौरे पर निकल जाता. वह घर कब लौटेगा, कोई नहीं जानता. कभी
रात के दस, तो कभी बारह बजे वह घर लौटता. उसके लौटने का वह बेसब्री से इन्तजार
करती रहती. इन्तजार करते-करते कभी-कभार उसकी आंख लग जाती, तो वह तूफ़ान उठा लेता और
अर्र-सर्र बकने लगता. उसकी बहकी-बहकी चाल देखकर वह समझ जाती कि श्रीमान महुआ चढ़ाकर
घर लौटे हैं. शराब और कबाब से दूर रहने वाला उसका राजेश अब पूरी तरह बदल गया था.
एक दिन वह भी था जब वह आफ़िस से थका-हारा घर लौटता था. थका-मांदा होने के बावजूद वह
उसे अपनी बाहों के घेरों में कस लेता और जी भर के प्यार-दुलार दिया करता था. लेकिन
अब ऎसा नहीं होता. प्यार के दो शब्दों की जगह अब घिनौनी गालियों ने ले ली थी. वह
समझ नहीं पा रही थी कि इस बदलाव का क्या कारण है?
. पिल्ला अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था.
जैसे-जैसे वह बढ़ता गया, उसकी खुराक भी बढ़ती चली गई. उसे अब दिन में दो बार मीट
खिलाया जाता. मीट खा-खाकर वह मुटियाने लगा था. उसके शरीर का भूरा-काला रंग और चटख
हो आया था. पूंछ और झबरीली घनी हो गई थी. उसके नूकुले दातॊं को देखकर भय लगता.
कूं..कां करने वाला युवा होता पिल्ला अब गुर्राने लगा था. उसके गले से निकलने वाली
आवाज भी दिल को दहला देने के लिए काफ़ी थी. लेकिन इन सब बातों से बेफ़िकर राजेश उससे
चिपका रहता. ऎसा करते देख उसे घिन होने लगती. वह समझाने की कोशिश करती लेकिन राजेश
की घूरती आंखों को देखकर वह सहमी रह जाती. शब्द गले में अटके रह जाते.
राजेश के इस
बदले रूप को देखकर वह सहम जाती. वह समझ रही थी कि इस तरह का बदलाव अचानक नहीं आया
है. यह बदलाव उस भेड़िए के आने के बाद से ही शुरु हुआ है. नशे में चूर राजेश भेड़िए
के साथ खेलता, खुद मीट खाता और उसे भी खिलाता जाता. खेल-खेल में उसका झूठा खाना भी
खा लेता. ऎसा करते हुए देखकर उसे घिन आने लगती. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी,
सिवाय देखते रहने के. राजेश के व्यव्हार में आए परिवर्तन की वजह वह पूरी तरह समझ चुकी
थी कि नार्मल रहते हुए वह अचानक क्यों भड़क उठता है, उसकी आवाज में कर्कशपन क्यों
उतर आता है, उसके लक्षणॊं को देखकर निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि राजेश के
शरीर में भेड़िए का प्रवेश हो चुका है, तभी तो वह इतना आक्रमक हो उठता है.
सुबह से ही
घर में काफ़ी चहल-पहल थी. शायद कहीं टूर पर जाने का प्रोग्राम बन चुका था. राजेश के
चमचों की उपस्थिति देखकर तो यही कहा जा सकता था. बाद में पता चला कि उसे
मुख्यमंत्रीजी का बुलावा आया है और वह दो-चार दिन के लिए शहर से बाहर रहेगा. सारी
तामझाम के बाद उसका काफ़िला रवाना हुआ. जाने से पहले उसने कांता के कमरे में प्रवेश
करते हुए कहा कि वह दो-चार दिन के लिए बाहर जा रहा है. उसकी अनुपस्थिति में शेरु
का ध्यान रखना. उसको समय पर खिलाया-पिलाया करना. उसके रख-रखाव में किसी भी प्रकार
की कमी नहीं रहनी चाहिए.
कांता के मन
में आया कि पलटकर जवाब देना चाहिए और यह पूछना चाहिए कि एक हिंसक पशु की इतनी
ज्यादा चिंता करने के बजाय उसे अपने बेटा-बेटी की भी तो सुध लेनी चाहिए. उसे इस
बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि वे कहां है और कब घर लौटेगें? लेकिन नहीं, केवल
उसे तो सिर्फ़ फ़िक्र है बस शेरु की. मन में उमड़ते-घुमड़ते सवाल होंठॊं तक आकर रुक
जाते. वह हिम्मत नहीं जुटा पायी थी कि पलटकर जवाब दे दे. इससे पहले भी उसने इस बात
का जिक्र किया था तो उसने टका सा जवाब देते हुए कहा था कि बेचारे अभी बच्चे हैं,
उम्र के कच्चे हैं. यही तो दिन है उनके खाने-खेलने के. एक मंत्री के बेटा-बेटी को
किस तरह से रहना..घूमना..फ़िरना चाहिए, तुम देहाती औरत क्या समझोगी. आ जाएंगे,जहां
भी गए होंगे, तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है. उसकी सपाटबयानी सुनकर
हक्का-बक्का रह गई थी वह. चुप रहने के अलावा और कर भी क्या सकती थी बेचारी. एक
आंधी सी गुजरने लगी थी उसके भीतर.
शेरु के लिए
एक आदमी अलग से तैनात कर रखा था राजेश ने. वह ही उसे नहलाता-धुलाता, खिलाता-पिलाता
और घुमाने ले जाता. घुट्टा शेरु कभी बकरी पर हमला कर देता तो कभी मुर्गियों के
बाड़े में घुस कर दो-चार मुर्गियां चट कर जाता. उसकी इस हरकतों से परेशान होकर उसके
गले में एक मोटी सी जंजीर बांध दी गई थी. जीभ लपलपता शेरु जब दड़बे से बाहर लाया
जाता, तो संभाले नहीं संभलता था. वह उसे खींचकर संभालने की कोशिश करता, लेकिन शेरु
उसे घसीटता हुआ दूर तक चला जाता था. कई बार तो ऎसा भी हुआ है कि उसने जंजीर तोड़कर
भाग जाने की कोशिश भी की थी.
एक सुबह.
शेरु के अटैण्डेंट ने उसे बाहर घुमाने के लिए दड़बे के बाहर निकाला. गुर्राहट के
साथ, जीभ लपलपाता शेरु जैसे ही दरवाजे की चौखट से बाहर निकला, पूरी ताकत के साथ
उसने चेन छुड़ा ली और जंगल की ओर भाग खड़ा हुआ. अटैण्डेंट चिल्लाता रहा, उसे पुकारता
रहा लेकिन उसने पलट कर नहीं देखा.जब शेरु उसकी पकड़ से बाहर हो गया तो उसने कांता
से अपना दुखड़ा रोते हुए उसके भाग जाने की सूचना दी. कांता जानती थी कि राजेश लौटने
के बाद पहले शेरु के बारे में ही पूछताछ करेगा. जब उसे यह सुनने को मिलेगा कि उसका
प्रिय पात्र शेरु भाग गया है, तो उस पर कितना जुल्म ढाया जाएगा, जिसकी कल्पना
मात्र से उसके शरीर में सिहरन होने लगी थी. दिल बैठने लगा था. उसने अटैण्डॆंट को
आज्ञा दी कि वह उसकी खोजबीन में तत्काल निकल जाए.
दो दिन की
खोज-खबर के बाद भी शेरु पकड़ा नहीं गया था. राजेश घर लौट रहा है, इस बात की खबर उसे
मिल गई थी. यदि इस बीच शेरु पकड़ा नहीं गया तो वह क्या जवाब देगी? इस चिंता में
उसका दिल बैठा जा रहा था. उसने अपने नौकरों को आज्ञा दी के वे अपने साथ जाल साथ
लेकर जायें. साथ ही उसने सक्त हिदायत भी दी कि उसे हर हाल में पकड़कर ले आना है.
बाहर गेट पर
हो-हल्ला सुनकर वह बाहर निकली. उसने देखा. रस्सी के जाल में बंधा शेरु, जिसे एक
लठ्ठ के सहारे दो आदमी टांगकर अन्दर आ रहे है और उनके पीछे पच्चीसों लोगों की भीड़
भी चली आ रही है. शेरु मिल गया, यह जानकर उसने राहत की सांस ली. लेकिन अटैण्डॆंट
को देखते ही सारा माजरा उसकी समझ में आ गया कि शेरु ने उस पर भयानक तरीके से हमला
किया होगा जिससे उसके कपड़े जगह-जगह से फ़टे हुए थे और खून रिसकर उसके पूरे कपड़ों
में फ़ैल रहा था. वह बुरी तरह से जख्मी हो गया था और थर-थर कांप भी रहा था. उसे
तत्काल मेडिकल ऎड दिए जाने की जरुरत है. अगर समय पर ऎसा नहीं किया गया तो उस
बेचारे की जान भी जा सकती है. उसने आगे बढ़कर मेडिकल कालेज के डाक्टर को फ़ोन किया
और तत्काल एम्बुलेंस भेजने का अनुरोध किया.
जाल में फ़ंसा
शेरु पूरी ताकत के साथ जोर लगाकर आजाद होना चाहता था. पूरी जोर अजमाईश के साथ वह
बुरी-बुरी आवाज निकालते हुए जोरों से गुर्रा रहा था. कोई भी आदमी उसके पास जाने की
हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. शायद कोई ऎसा कर पाता तो निश्चित ही वह उसके चीथड़े
मचा देता.
कांता के मन
में खलबली मची थी कि ऎसी विकट परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए?. एक मन हुआ कि
इसे तत्काल गोली मार दी जानी चाहिए. यदि वह ऎसा कर सकी तो निश्चित ही एक भेड़िए से
छुटकारा पाया जा सकता है, जो उसकी जान का दुश्मन बना बैठा है. परिणाम से भी वह
वाकिफ़ थी कि इसका अन्जाम क्या हो सकता है. उसका मन घड़ी के पेण्डुलम की तरह
दोलायमान हो रहा था. वह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए.
दोलायमान
होते मन को उसने किसी तरह काबु में किया और निर्णय लिया कि शेरु के अभी तत्काल
गोली मार देनी चाहिए.
निर्णय लेने
के साथ ही उसने अपने कमरे में टंगी रिवाल्वर उठा लायी और धड़कते दिल से फ़ायर कर
दिया. एक के बाद एक उसने तीन गोलियां उसके जिस्म में उतार दी. गोली लगने के साथ ही
वह जाल सहित काफ़ी ऊपर तक उछला, जोरों से गुर्राया और निर्जीव होकर धरती पर आ गिरा.
उसके धरती पर
गिरने के साथ ही राजेश ने प्रवेश किया. आंगन में जमा भीड़ देखकर सारा माजरा उसकी
समझ में आ गया था कि उसका शेरु मारा गया है. कभी वह आंखें तरेर कर अपने मरे हुए
शेरु को देखता तो कभी साक्षात दुर्गा बनी कांता को. देर तक घूरते रहने के बाद वह
भारी कदमों से चलता हुआ बंगले में घुस गया.
कांता
के मन में अपरिमेय संतोष उतर आया था कि उसने अपने जीवन को नरक बना देने वाले एक
भेड़िए को तो मार गिराया है और अब उसे यह देखना है कि दूसरा भेड़िया उसके साथ किस
तरह का व्यवहार करता है ?.
12.
शेर दिल औरत
आदमी अपना काम समय पर पूरा करे अथवा न
भी करे, तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन प्रकृति अपना काम समय पर ही करती है. यदि वह
अपने काम में थोड़ी सी भी ढील दे दे तो सारा चक्र गड़बड़ा जाएगा और पृथ्वी पर तरह-तरह
के संकट मंडराने लगेंगे.
आकाश में मंडराते बादलों को देखकर
रोहित सोचने लगा था. अभी कुछ समय पहले तक आकाश एकदम साफ़ था, किसी कोरी स्लेट की
तरह और देखते ही देखते समुचे आकाश पटल पर बादलों के धमाचौकड़ी शुरु हो गई थी. वह
अपने घर से आफ़िस जाने के लिए तैयार ही बैठा था. सुबह के साढ़े आठ बज चुके थे. आराम
से मोटर साईकिल चलाते हुए उसे दफ़्तर पहुंचने में लगभग एक से सवा घंटा लग जाता है.
यदि वह इस समय तक नहीं निकला तो आफ़िस समय से नहीं पहुंच सकता. फ़िर दिल्ली के सड़कों
पर मोटर साईकिल चलाना कोई आसान काम भी तो है नहीं. पता नहीं कहां जाम लग जाए ? पता
नहीं कब कोई आकर भिड़ जाए, और आपको स्वर्गलोग की टिकिट थमा दे... कुछ भी नहीं कहा
जा सकता.
बारिश होने के अभी कोई चांस नहीं थे,
फ़िर भी उसने अपनी मोटर साईकिल में बरसाती रख लिया था. बस उसे इन्तजार था अपनी
पत्नि का कि कब वह टिफ़िन लेकर रसोई घर से बाहर निकलती है. उसे ज्यादा इन्तजार नहीं
करना पड़ा. वह कुछ और सोचे इससे पहले वह मुस्कुराती हुई बाहर आयी और उसने टिफ़िन
उसके हाथ में थमा दिया.
रोहित ने अपनी मोटर साईकिल स्टार्ट की और चल पड़ा. मोटर
साईकिल के शीशे में उसने पत्नि को देखा जो हाथ हिला रही थी. घर से निकलते समय
सुनन्दा उसे मुस्कुराते हुए बिदा करती है. कभी-कभी बच्चों अथवा माताजी की अनुपस्थिति में वह उसके
गाल पर चुम्बक भी जड़ देती है. पूरा दिन कब गौरैया की तरह फ़ुर्र से उड़ जाता है, पता
ही नहीं चलता. शाम तो घर लौटने पर भी वह उसी तरह मुस्कुरा कर उसका स्वागत करती है.
रोहित अपने घर की गली से मुड़ गया. आगे
बस स्टाप था. इस समय तक वह खाली था. शायद कुछ देर पहले बस सवारियों को भर कर ले गई
थी.
वह कुछ आगे बढ़ ही पाया था कि रेड
सिगनल देखकर उसे अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी. कुछ देर इन्तजार करने के बाद ग्रीन लाईट
होते ही वह आगे बढ़ने वाला ही था, तभी एक बदहवास-सी औरत उसके पास आयी और
बोली-“ प्लीज एक्सक्य़ूज मी ....मेरी बस
निकल गई है. क्या आप मुझे ग्रीन पार्क तक लिफ़्ट दें सकेंगे?.
रोहित की खोजी नजरों ने कुछ ही पलों
में उसके सिर से लेकर पांव तक का मुआयना कर लिया था. गजब की खूबसूरत थी वह महिला.
लगता है कि विधाता ने उसे फ़ुर्सद के क्षणॊं में बनाया होगा. मांग में सिन्दूर और
माथे पर मैरुन रंग की बिंदिया देखकर सहज ही अन्दाजा हो जाता है कि वह शादी शुदा
है. फ़िर उसके कपड़े पहिनने का ढंग और बोलचाल से ही साफ़ पता चल जाता है कि वह किसी
संभ्रात परिवार से ताल्लुक रखती है. उसने सोचा.
“ बैठिए” कहते हुए उसने मोटर साईकिल
आगे बढ़ा दी .
“ आपको कैसे पता कि मैं उधर ही जा रहा
हूँ “ उसने विस्मय से कहा.
“ मैने आपको कई बार उधर ही जाता देखा
है” वह औरत बोली.
“
अच्छा तो आप आते-जाते लोगों पर नजर रखती हैं तभी तो ! लेकिन मुझे इस बात पर
ताज्जुब हो रहा है कि आपको केवल और केवल मेरी ही सूरत याद रही जबकि इस रास्ते न
जाने कितने ही लोग गुजरते होंगे?
“ जी नहीं....आपका यह कहना सरासर गलत
है कि मैं आते-जाते मर्दों पर नजर रखती हूँ. इस भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में भला किसको
इतनी फ़ुर्सद है कि वह किसी पर नजर रख सके और उसे याद भी रखे”.
“मान गया कि आप सच कह रही हैं,लेकिन
हजार सूरतों मे केवल मेरी ही सूरत आपको याद रही. यह कैसे हो सकता है?”
“ इसका उत्तर एकदम सीधा-सादा सा है.
आफ़िस से निकल कर इसी जगह पर खड़े रहकर मुझे बस का इन्तजार करना पड़ता है और इसी जगह
पर मैंने आपको प्रतिदिन पान के खोके पर सिगरेट पीते देखा है. आप जिस मस्ती के साथ
सिगरेट के धुएं के छल्ले बना कर उड़ाते हैं, उसे देखते रहना मुझे अच्छा लगा था.
शायद यही कारण था कि आपकी सूरत मुझे याद रह गई, वरना कौन किसको याद रखता है”. उसने कहा.
“ चलिए...किसी खास अंदाज की वजह से
आपको मेरी सूरत याद रही. इसके लिए धन्यवाद. फ़िर भी मैं आपसे जानना चाहता हूँ एक
अंजान और अपरिचित व्यक्ति से लिफ़्ट मांगते समय आपको डर नहीं लगा? आपने कैसे अंदाज
लगा लिया कि मैं निहायत ही शरीफ़ आदमी हूँ ?”.
“ किसी पराए मर्द के साथ मोटरसाइकिल
पर जाने के लिए बड़ा दिल चाहिए जनाब. मैं एक औरत हूँ और कोई औरत पराए मर्द के साथ
बैठे, बड़ा हिम्मत का काम है. शायद आप जानते ही होंगे कि ईश्वर ने औरत जात को एक
छटी इंद्रिय भी दी है जो आदमी के देखने मात्र से समझ जाती हैं कि उसके मन में किस
तरह की उथल-पुथल हो रही है. इस बीच वह अपने बचाव का रास्ता तलाश लेती हैं”
“ मान गए आपको और आपकी पारखी नजरों
को. खैर जो भी हो ..मुझे इस बात को जानकर खुशी हुई कि मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ तभी तो
एक अपरिचित महिला ने मुझ पर विश्वास किया. लेकिन आपने अब तक नहीं बताया कि आप
ग्रीन पार्क क्यों जाना चाहती हैं. क्या वहाँ आपका फ़्लैट है अथवा कोई सगा-सम्बन्धी
वहां रहता है? उसने पूछा.
“ नहीं...नहीं ऎसा-वैसा कुछ नहीं है.
दरअसल मैं वहाँ एक गारमेन्ट फ़ैक्टरी में सुपरवाईजर हूँ.”
“जानकर खुशी हुई. अब कृपया अपना नाम
भी बतला दें ?(कुछ हंसते हुए)..वैसे मैंने ही कब आपको अपना नाम बतला दिया. ?.
जी..मेरा नाम रोहित है और मैं महरौली में एक ऎड कम्पनी में सी.ई.ओ के पद पर काम
करता हूँ”..
“
जी... तीन अक्षरों का मेरा छॊटा सा नाम
है “माधुरी”. अपना नाम बतलाने के ठीक बाद उसने सहमते हुए कहा-“ थोड़ा धीरे
चलाईए न गाड़ी... तेज रफ़्तार से मुझे डर लगता है.”
“ थोड़ा आसमान के तरफ़ भी देखिए...बादल
गरजने लगे हैं..यदि बारिश शुरु हो गई तो हमारे पास बचने का कोई साधन नहीं है”.
“ ठीक कह रहे हैं आप, लेकिन सड़क का
हाल भी तो देखिए...जगह-जगह गड्ढे हैं..कहीं बैलेंस गड़बड़ा गया तो हाथ-पैर टूटना तय
है. मैं रोज ही एक्सीडेन्ट के केसों को देखती आ रही हूँ ...स्पीड के चक्कर में लोग
दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं और चार छः महिने के लिए बिस्तर से लग जाते हैं .
कितना कष्टप्रद होता है बिस्तर पर पडे रहना. शायद आपने इसकी कल्पना तक नहीं की
होगी “?.
“ बिलकुल ठीक कहा आपने... हार्दिक
धन्यवाद आपका” कहते हुए उसने स्पीड कम कर दी थी.
“ आपने अपने पति के बारे में कुछ नहीं
बताया”.
“ जी...कई खूबियां हैं उनमें...साथ ही
वे एक अच्छे आर्टिस्ट के साथ फ़ोटोग्राफ़र भी है. उनका अपना स्टुडियो भी है.”
“ तब तो उन्होंने आपके पोट्रेट भी खूब
बनाये होंगे”.
“ सीधी सी बात है. जब बीबी हसीन हो तो
उसे ड्राईंग शीट पर उतारना कौन नहीं चाहेगा. कभी घर तशरीफ़ लाइयेगा. आप स्वयं जब
अपनी आंखों से देखेगें तो देखते रह जाएंगे”.
“ मैं जितने भी आर्टिस्टों को जानता
हूँ, वे सभी मस्त तबियत के लोग होते हैं. उनमें एक खासियत यह भी होती है कि (जरा
झिझकते हुए) कि वे ड्रिंग्स के बड़े शौकीन होते हैं”
“इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है.
शराबनोशी कोई बुरी चीज नही है, बशर्ते वह अपनी मर्यादा में रहे”
“ खैर... मुझे तो अब तक इसकी लत लग
नहीं पायी. अब आपसे मुलाकात हो ही गई है. मैं एक बार जरुर आपके आर्टिस्ट से मिलने
कभी भी आ धमकूंगा.”
“जी....जरुर तशरीफ़ लाईए.
“ अच्छा खासा कमा भी लेते होंगे?”.
“हाँ...इतना तो वो कमा ही लेते कि
घर-गृहस्थी आराम से चल जाती है”.
“ फ़िर तो आपको नौकरी करने की जरुरत ही
नहीं होनी चाहिए”
“ आपने ठीक फ़र्माया. लेकिन वे इन
दिनों बिमार चल रहे हैं. स्टुडियो भी बंद पड़ा है. आमदनी नहीं के बराबर है. ऎसे में
घर खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था. यह अच्छा ही हुआ कि शादी से पहले मैंने ड्रेस
डिजाईनर का कोर्स कर लिया था जो आज काम आ रहा है.
“ यह सुनकर बड़ा दुख हुआ. मैं आपके
किसी काम आ सकूं तो कृपया मुझे बतलाइयेगा अवश्य. जितना भी संभव हो सकेगा मैं आपकी
सच्चे मन से मदद करुंगा”. (कुछ देर तक खामोश ओढ़े रहने के बाद उसने कहा) पति बिमार
पड़े हैं और आप उनको अकेला छोड़कर नौकरी पर निकल जाती हैं तो उनकी देखभाल कौन करता
होगा? बच्चे भी तो होंगे आपके?”.
“ जी हाँ..एक बेटा और एक बेटी है.
मयंक टेंथ में है और ऋचा सिक्स्थ में. दोनों बच्चे बड़े समझदार हैं. उन्हें कुछ
बतलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती....अपना काम खुद कर लेते हैं. सुबह मैं उनके लिए
टिफ़िन तैयार कर देती हूँ. स्कूल की बस आ जाती है, वे उससे निकल जाते हैं. दोनों
शाम को घर लौटते हैं. रही उनकी बात तो आफ़िस से निकलने से पहले मैं उनकी सारी
आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती हूँ. वे अब इस लायक तो हो ही गए हैं कि छोटा-मोटा
काम वे खुद कर लेते हैं. मेरे एबसेन्ट में टीव्ही उनका साथ देती है, किसी तरह उनका
समय पास हो जाता है....
“ जिसकी बीबी इतनी खूबसूरत हो और वह
एक लंबे समय तक घर से बाहर रहे तो पति के मन में शंका-कुशंका के बीज भी तो पनपते
ही होंगे कि कहीं वह किसी के साथ फ़्लर्ट तो नहीं कर रहीं ?.”
“ संभव है, ऎसा भी हो
सकता है....और नहीं भी हो सकता है.... शरीर से बिमार आदमी मन-मस्तिस्क से भी बिमार
हो, यह जरुरी नहीं, फ़िर भी सच तो यही है कि आदम जात ने आज तक अपनी जीवन संगनी पर
भरोसा ही कब किया है? वह खुद चाहे जितना गिरा हुआ क्यों न हो, लेकिन वह अपनी बीबी
को लेकर शंका-कुशंकाओं को अपने मन में पाले रहता है. खैर... मैं इसकी चिंता नहीं
करती..और मुझे करनी भी नहीं चाहिए. जब एक औरत घर से निकलती है तो यह जरुरी नहीं कि
उसका सामना किसी दरिंदे से ही होगा.. उसे अच्छे-भले लोग भी तो मिलते हैं, जैसे की
आप.”
“ एक बात बतलाईए....आपकी छुट्टी कब
होती है?
“ छुट्टी तो छः बजे होती है,लेकिन
निकलते-निकलते साढ़े छः तो बज ही जाते है. आखिर ये सब क्यों पूछ रहे हैं आप?
“ बस यूंहि...इसी समय तक मेरी भी
ड्यूटी आफ़ हो जाती है, आप चाहें तो इसी जगह पर मेरा इन्तजार कर सकती हैं. मुझे अच्छा
लगेगा कि आप मेरे साथ ही लौटें”.
“ मुझे ऎसा लगता है कि आप मुझमें कुछ
ज्यादा ही इंट्रेस्ट लेने लगे हैं.” उसने कहा.
“ नहीं...नहीं. ऎसा कुछ भी नहीं है
शायद आपने मेरे कहने का गलत मतलब निकाल लिया है. मेरा आशय और कुछ नहीं था, दरअसल
मैं नहीं चाहता कि आप बस से सफ़र करें.. यह वह वक्त होता है जब सारे कार्यालय बंद
होने को होते हैं. सभी जल्दी ही घर लौटना चाहते हैं और यही कारण है कि शाम के वक्त
बसों में कुछ ज्यादा ही भीड़ हो जाती है. कुछ मजनू टाईप के लोग भी इसमें सफ़र कर रहे
होते हैं. किसी खूबसूरत युवती के जिस्म से चिपकने का इससे अच्छा मौका उन्हें कब
मिल पाता है? मैं नहीं चाहता कि आप उस भीड़ का हिस्सा बनें.
बात अभी पूरी भी नहीं हो पायी थी कि
कब ग्रीन पार्क आ गया, पता ही नहीं चल पाया.
“ जी बस यहीं रुक जाइये ” उसने अजीजी से कहा.
मोटर साईकिल से उतरकर वह सामने आ गई.
होंठॊं पर मुस्कान ओढ़ते हुए उसने कहा “आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. शाम को फ़िर मिलते
हैं. मैं आपका इसी जगह पर इन्तजार करुंगी.”. उसके इस अंदाज में यकीन और अपनापन साफ़
झलक रहा था.
“ जी बहुत अच्छा. अब मैं चलता हूँ”.
उसने अपनी मोटर साइकिल आगे बढ़ाते हुए हाथ हिलाते हुए कहा.
मोटर साइकिल के शीशे में उसका अक्स
दिख रहा था. वह अब भी हाथ हिलाकर उसका अभिवादन कर रही थी.
रोहित के जेहन में दिन भर माधुरी की
मदहोश कर देने वाली सूरत तैरती रही.
दिन कैसे कट गया, पता ही नहीं चल
पाया. आफ़िस से निकलकर वह उस स्थान पर आकर खड़ा हो गया, जहां उसने उसे सुबह के समय
छोड़ा था. उसे ज्यादा देर तक इन्तजार करने की जरुरत नहीं पड़ी. वह ठीक छः पच्चीस पर
वहां पहुंच गई थी. उसने आगे बढ़कर रोहित का मुस्कुरा कर अभिवादन किया और मोटरसाइकिल
पर सवार हो गई. मोटरसाइकिल स्टार्ट करने से पहले उसने अपना विजिटिंग कार्ड थमाते
हुए कहा- “इसे रख लीजिए, कभी भी जरुरत पड़ सकती है”.
उस दिन के बाद से वह ठीक समय पर उस
जगह पर खड़ी मिलती, जहां रोहित से वह पहली बार मिली थी. इसी तरह शाम को भी वह उसी
जगह पर खड़ी रहकर उसकी प्रतिक्षा करती रहती. कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा.
रोहित अपने घर से निकला. गली के उस
छोर पर वह नहीं मिली. बस स्टाप या तो खाली होता या फ़िर 9 बजे
जाने वाली बस के इंतजार में 4-6 लोग खड़े दिखाई देते. वह
सोचता, शायद उसे कोई दूसरा लिफ़्ट देने वाला मिल जाता हो और वह उसके साथ निकल जाती
हो. फ़िर वह सोचता, “ऎसा नहीं हो सकता”.
एक-एक करके काफ़ी दिन बीत गए, पर वह
नही मिली. बावजूद इसके वह छोर वाले बस स्टाप के पास अपनी गाड़ी धीमी कर लेता कि
शायद वह खड़ी हो. शाम को भी यही क्रम दोहराता, लेकिन निराशा ही हाथ लगती.
मोटरसाइकिल चलाते समय उसके जेहन में
माधुरी की मधुर स्मृतियां तैरती रहती. कभी-कभी तो वह उससे बातें भी करने लगता था
लेकिन जल्दी ही उसे इस बात का भान हो जाता कि वह अब उसके साथ नहीं है. अक्सर
माधुरी की कही बातें उसके कानों में गूंजने लगती-“ किसी पराए मर्द के साथ
मोटरसाइकिल पर जाने के लिए बड़ा दिल चाहिए जनाब. मैं एक औरत हूँ और कोई औरत पराए
मर्द के साथ बैठे, बड़ा हिम्मत का काम है.
“ईश्वर ने हम औरतों को अलग से छटी इंद्री दी है जो आदमी को देखते ही समझ
जाती हैं कि उसके मन में क्या पाप पल रहा है”. कभी-कभार जब उसकी गाड़ी की स्पीड
ज्यादा हो जाती तो वे सारे शब्द उसके कानों में गूंजने लगते-“मुझे स्पीड से डर
लगता है, थोड़ा धीरे चलाएं” और वह अपनी स्पीड कम कर लेता.
दिन पर दिन गुजरते चले गए,लेकिन वह
दुबारा नहीं मिली. इस बीच यमुना से काफ़ी पानी बह चुका था. समय भी कब किसके लिए
रुका है जो उसके लिए रुकता. अब वह सेवानिवृत हो चुका था. जिस रास्ते पर चलते हुए
उसने अपने जीवन के सैतीस साल गुजार दिए थे, उस रास्ते पर फ़िर कभी उसका जाना न हो
सका,लेकिन माधुरी की याद उसके मन में जस की तस बनी रही.
‘उसके बेटे ने फ़ोर व्हीलर खरीद ली थी,
जिसके लिए गैराज में कुछ ज्यादा जगह की आवश्यकता पड़ती थी. उसने एक दिन अपने पापा
को सलाह देते हुए कहा कि अब उन्हें मोटरसाइकिल बेच देनी चाहिए. सुनते ही वह भड़क
गया था. उसने ऎसा करने से साफ़ मना कर दिया था. वह किसी भी कीमत पर उसे बेचने को
तैयार नहीं था, क्योंकि उस मोटरसाइकिल से माधुरी की मधुर स्मृतियां जुड़ी हुई थी.
टेलीफ़ोन की घंटी बज रही थी लगातार,
जिसे उसके पोते ने उठाया, जो उस समय पास ही खेल रहा था. एक आवाज उभरी-“ क्या
रोहितजी घर पर हैं, जरा उनसे बात करवाइये”. उसने वहीं से अपने दादाजी को आवाज देते
हुए कहा-“ दद्दुजी..आपका फ़ोन”.
“ कौन हो सकता है इस समय.”..सोचते हुए उसने
क्रैडल उठाया. एक सुरमई आवाज सुनकर वह चौंक पड़ा था. वह आवाज माधुरी की थी. सुनते
ही अवाक रह गया था वह.” माधुरी तुम.....कहां थीं अब तक तुम. मैं बरसों तक तुम्हारे
आने का इंतजार करते रहा..लेकिन तुम न जाने कहां खो गई थीं... वह कुछ और कह पाता कि
दूसरी ओर से आवाज उभरी-“ सारे शिकवे-शिकायत बाद में सुनूंगी रोहितजी... पहले ये
सुनिए कि कल ठीक ग्यारह बजे आप प्रगति मैदान पहुंच जाएं, देश के महामहिम
राष्ट्रपति जी मुझे सम्मानित करेगें. आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है. यदि आप नहीं
पहुंचे तो शायद मैं सम्मान ग्रहण नहीं कर पाउंगी. मैंने रिसेप्शन काउन्टर पर आपके
लिए गेटपास का इन्तजाम करवा दिया है. फ़्रंट वाली सीट नम्बर आठ आपके लिए आरक्षित
है. सीट नम्बर आठ...ध्यान रखियेगा”. इतना कहकर उसने टेलीफ़ोन काट दिया.
रोहित के बूढ़े शरीर में एक नया जोश,
एक नयी उमंग का संचार होने लगा था. इस अतिरेक आनन्द से वह सराबोर हुआ जा रहा था.
उसकी समझ में नहीं आ रहा थी कि कल ऎसा कौन-सा विशेष दिन है, जब वह राष्ट्रपतिजी के
हाथों सम्मानित होगी. उसने कैलेण्डर को ध्यान से देखा. समझ गया था कि कल
“अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस” है. यह वह दिन होता है जब किसी विशिष्ट कार्य के
संपादित किए जाने पर उस महिला का सम्मान किया जाता है.
उसके जेहन में केवल प्रश्नों की भरमार
थी,जिसके उत्तर वह खोजने का असफ़ल प्रयास करता रहा था, लेकिन किसी नतीजे पर पहुंच
नहीं पाया था.
दूसरे दिन वह समय से पहले ही घर से
निकल गया था. काउन्टर पर पहुंचते ही उसे गेटपास दे दिया गया था. इस समय पूरा हाल
खचाखच भरा हुआ था. चारों तरफ़ भीड़ ही भीड़ थी. भीड़ को चीरता हुआ वह अपनी सीट पर जा
कर बैठ गया. अब उसे इन्तजार था उस क्षण का, जब वह अपनी आंखों से माधुरी को
सम्मानित होते हुए देखेगा. प्रसन्नता की लहरें उसके मन में हिलोरे ले रही थीं.
महामहिम पधार चुके थे. उनके
स्वागत-सत्कार के बाद सम्मान देने का कार्यक्रम शुरु हुआ. हर उस महिला के नाम की
घोषणा होती,जिन्हें सम्मानित किया जाना था. तीसरे क्रम में माधुरी के नाम की घोषणा
हुई. मंच पर वह किसी चमकदार हीरे की तरह अपनी चमक बिखेरते हुए आयी. आगे बढकर उसने
महामहिम से सम्मान प्राप्त किया और प्रसन्न बदन उपस्थित जन समुदाय का झुककर
अभिवादन किया.
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद उसकी
भेंट माधुरी से हुई. मिलते ही उसने उसे सम्मानित होने के लिए बधाइयां और
शुभकामनाएं दीं और उसके रहस्यमय तरीके से गायब हो जाने के बाबत जानकारी जाननी
चाही. .
माधुरी ने ध्यान पूर्वक सुना और
विनम्रता पूर्वक बोली-“ रोहितजी...अतीत में जाकर क्या करेगें? अतीत को अतीत ही
रहने दें, तो अच्छा हे”.
" मतलब साफ़ है कि तुम मुझसे कुछ
छिपाना चाहती हो. सच है....आखिर मैं होता भी कौन हूँ तुम्हारा...मात्र एक प्रशंसक
और क्या? ”.
“ नहीं ऎसी बात नहीं है रोहितजी...
सुनकर भी क्या करेगें...केवल दुख ही होगा आपको..”.
“ दुख और सुख की बात नहीं है
माधुरी.... मैं तो केवल इतना भर जानना चाहता हूँ कि यदि तुम्हें शहर छोड़ कर जाना
ही था तो मुझे बतला तो दिया होता. तुम्हारे इंतजार में मैंने मन के कितने आघात सहे
हैं, क्या तुम इसकी कल्पना कर सकती हो?. एक दिन तो मैं तुम्हारी फ़र्म का पता
लगाते-लगाते वहां तक जा पहुंचा था. जाकर पता चला कि तुमने नौकरी छॊड़ दी है. नौकरी
छॊड़ने का कोई कारण भी नहीं बतलाया गया. यदि घर का पता तुमने दिया होता तो वहां भी
मै जाकर पता लगाता. न तो मेरे पास तुम्हारा मोबाईल नंबर ही था. हमारी मुलाकातें
मात्र चंद महिनों की थी, लेकिन तुम इतनी अजीज हो जाओगी, इसका मुझे गुमान तक न था.
फ़िर तुम्हारी बसी-बसाई गिरस्थी थी...बच्चे थे..क्या तुम उन्हें साथ ले गई थीं या
फ़िर उन्हें छोडकर चली गई थीं ? बोलो-....बोलो माधुरी...तुम्हें मेरे प्रश्नों का
उत्तर देना ही होगा. मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ तुम्हारे बारे में”. रोहित ने मन
के आंगन में फ़न फ़ैलाए बिलबिलाते शिकायती नागों का पिटारा खोल दिया था.
प्रश्नों का आघात इतना तीव्र था कि
उसके आंखों से आंसू झरकर बहने लगे. किसी तरह अपने पर संयम रखते हुए उसने कहा-“
रोहितजी मैं आपके मन की पीड़ा को समझ रही हूँ. फ़िर आपका अधिकार भी बनता है मेरे
बारे में जानने का...लेकिन यह स्थान इसके लिए उपयुक्त नहीं है. मैं “सैण्ड एंड सन”
होटल में रुकी हुई हूँ. आप कृपया वहां आ सकेगें तो मेहरबानी होगी. मैं आपको अपना
वर्तमान और अतीत सभी के बारे में विस्तार से कह सुनाउंगी.
“ ठीक है...मैं कल ग्यारह बजे के
आसपास आ रहा हूँ .” उसने कहा और वापस अपने घर की ओर बढ़ गया.
कालबेल बजते ही दरवाजा खुल गया. शायद
वह उसी का इन्तजार कर रही थी.
सारी औपचारिकताओं के बाद वह एक कुर्सी
पर धंस गया. ठीक उसके सामने वह कुर्सी लगाकर बैठ गई थी. देर तक छत की ओर टकटकी
लगाकर देखते रहने के बाद उसने मुंह खोला, शायद वह अपने अतीत को समेटने में लगी थी.
“ रोहितजी.....शुरु से ही मैं मेधावी
छात्रा रही हूँ. ड्रेस डिजाइनिंग कोर्स के साथ ही मैंने कालेज ज्वाईन कर लिया था.
एक बार कालेज में रोमियो-जुलियट नाटक खेला जाना था. प्रो. सिन्हा इस प्ले को
डायरेक्ट करने वाले थे. उन्हें जुलियट के लिए उपयुक्त पात्र की तलाश थी. रोमियो का
चुनाव वे पहले कर चुके थे. आडिशन में मेरा स्लेक्शन हुआ. इस तरह मैं घ्रुव के
संपर्क में आयी. हमने नाटक प्ले किया. नाटक बेहद सफ़ल रहा. इस प्ले के बाद से कालेज
के स्टुडेंट हमे रोमियो-जुलियट कहकर बुलाते. ध्रुव से मुलाकातें होती रहीं. उसमें
एक नहीं अनेक गुण समाए हुए थे,साथ ही वह एक सुलझे हुए व्यक्तिव का धनी भी लगा
मुझे. उसमें एक सफ़ल नाटककार के गुणॊं के अलावा गीत-संगीत में गहरी रुचि थी. गायकी
में वह बेजोड़ था. गीत-गजल भी वह लिखा करता था और माडर्न आर्ट में तो वह पारंगत था
ही. यही सब कारण थे कि मैं मन ही मन उसे चाहने लगी थी. रोमियो-जुलियट का नकली जीवन
तो हम जी ही रहे थे. अब हमने फ़ैसला कर लिया था कि इसे हकीकत में बदल देंगे, लेकिन
हमारे बीच ऊँच-नीच की एक अभेद्य दीवार खड़ी हो गई. इस दीवार को तोड़ने की हिम्मत तो
हममें थी नहीं, सो हमने घर छोड़ देने का फ़ैसला किया. भाग कर विवाह किया और इस तरह
घर-गिरस्थी की गाड़ी चल निकली.
ध्रुव ने टाप-टेन में पोस्ट-ग्रेजुएशन
किया था. उसे नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ा और वह एक कालेज में सहायक प्राध्यापक हो
गया. मुझे भी एक गार्मेन्ट फ़ैक्टरी में ड्रेस डिजाइनर के पद पर नियुक्ति मिल गई.
इस बीच हमारे एक बेटा और एक बेटी पैदा हुए. इनके बारे में मैं आपको पहले ही बता चुकी
हूँ.
अच्छे हंसते-खाते-पीते परिवार को न
जाने किसकी नजर लग गई. एक रात घ्रुव को सिवीयर अटैक आ गया. स्कार्ट में उसका
आपरेशन हुआ. इसमें करीब तीन लाख खर्च हुए. उस समय इतनी बड़ी रकम हमारे पास तो थी
नहीं. जैसे-तैसे रकम का इन्तजार भी कर लिया गया. लेकिन कुछ दिन बाद वह पैरेलाइज्ड
हो गया. एक मुसीबत से निकली भी नहीं थे कि दूसरी आ धमकी. जैस-तैसे उसको संभाला ही
था कि वह फ़ोबिया का शिकार हो गया. उसके मन में एक फ़ांस घर कर गई कि मेरे किसी अन्य
से नाजायज संबंध है. लाख समझाने के बाद भी उसे मुझ पर यकीन नहीं हुआ. नारकीय जिन्दगी
बन चुकी थी मेरी. मैंने कड़ा फ़ैसला लेते हुए निर्णय कर लिया था कि उसे अब उसके हाल
पर छॊड़ दिया जाना चाहिए. उसका अब जो होना है सो हो लेकिन मैं अपने बच्चों का जीवन
बर्बाद करना नहीं चाहती थी. एक रात मैंने घर छोड़ दिया और बच्चों को लेकर अपने शहर
चली आयी. मेरे पास मेरा अपना हुनर था. जल्दी ही मैंने पड़ौस की औरतों को सिलाई-कढ़ाई
सिखलाई, उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाया और इस तरह मेरा अभियान सफ़लता के कदम चूमने लगा.
यह काम यहीं तक नहीं रुका, बल्कि गांव-देहातों तक जा पहुंचा. हजारों- हजार महिलाएं
इससे लाभान्वित हुईं. स्कुल भी खोले गए.
इस तरह मैंने गांव की अनपढ़-गवांर समझी जाने वाली महिलाऒं के जीवन-स्तर को ऊँचा
उठाने के लिए अपना जीवन होम कर दिया. इस बात की चर्चा तो पूरे देश भर में होना था,
सो हुई भी और यह खबर दिल्ली भी जा पहुंची. शायद इसी का परिणाम है कि मुझे इस देश
के महामहिम के हस्ते सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ.
अपने अतीत और वर्तमान को सुनाते हुए
वह फ़बक कर रो पड़ी.
रोहित ने आगे बढ़कर उसे शाबासी देनी
चाही तो माधुरी उसके सीने से चिपक गई. वह जार-जार रोए जा रही थी. उसने उसकी पीठ
थपथपाते हुए कहा- “ अरे पगली...इसमें रोने की क्या बात है. तुम तो शेर दिल औरत
हो... शेर दिल. अच्छा ही किया तुमने जो ध्रुव से समय रहते किनारा कर लिया वरना
लांछन के बौछार से तुम घुट-घुटकर मर जातीं. मैं ही क्या... कोई और भी इस बात तो
सुनता कि तुमने कितनी ही विरान जिदंगियों में आशा की किरण जगाई है..उन्हें नया
जीवन दिया है और उनका आंचल खुशियों से भर दिया है..वरना आज की इस स्वार्थी दुनिया
में भला कौन किसके लिए जीता है. तुम धन्य हो माधुरी...धन्य हो”.
झरते आंसूओं से उसकी शर्ट भीगी जा रही थी. वह अब तक यह समझ नहीं पाया था कि वे पश्चाताप
के आंसू थे अथवा खुशी के.
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13.
पुष्पा दी
पुष्पा दीदी का घर बस स्टैण्ड से उतनी
ही दूरी पर है, जितना की रेल्वे स्टेशन से. यदि कोई रिक्शा वगैरह न भी लेना चाहे
तो बडे आराम से पैदल चलते हुए वहाँ पहुँच सकता है. लेकिन रिक्शा लेना मेरी अपनी
मजबूरी थी.
‘ पिछली घटना को मैं आज तक भूला नहीं
पाया हूँ. एक दिन ऐसे ही किसी कार्यक्रम में मुझे दीदी के यहाँ जाने का अवसर आया.था.
बस से उतरते ही, मैंने अपना बैग पीठ पर टांगा और यह सोचते हुए पैदल ही चल
निकला कि इतनी सी दूरी के लिए क्यों दस_पन्द्रह रुपया खर्च किया
जाएं. गॆट पर पहली मुलाकात दीदी की सास से हुई. मैं शिष्ठाचारवश हाथ जोडकर नमस्ते
कह पाता और उनके चरणॊं में अपना सिर नवा पाता,कि वे बरस पडी;”-कैसे उठाईगिर जैसे
चले आते हैं ?,क्या दस-पांच रुपट्टी का रिक्शा भी नहीं लिया जाता तुमसे ? पता नहीं
कैसे-रिश्तेदारों से पाला पडा है.”कहते हुए उन्होंने अपना नाक-मुँह सिकोडा था.
सुनते ही तन-बदन में आग सी लग गई थी,लेकिन वे दीदी की सास थी, और पता नहीं बाद में
वे उन्हे कितनी खरी-खोटी सुनाती. यह सोच कर मैंने कोई जबाब देना उचित नही समझा और
चुपचाप वहाँ से खिसक जाना ही श्रेयस्कर लगा था मुझे. उस घटना के बाद से शायद ही
कोई ऐसा अवसर आया हो और मैंने रिक्शा न लिया हो.
रिक्शा अपनी गति से भाग
रहा था. लगभग उससे दूनी रफ़्तार से मेरा दिमाक दौड रहा था. रिक्शा मोटर स्टैण्ड से
पहला मोड लेते हुए वह उस चौराहे से गुजरेगा,जहाँ दाहिनी ओर पंकज टाकीज और बायीं
तरफ़ कमली वाले बाबा की मजार है.वह वहाँ से बाय़ीं तरफ़ मुड जाएगा फ़िर दायीं ओर. और
तीर की तरह सीधा चलते हुए एक पतली सी गली में मुडेगा. उसी पतली सी गली में पुष्पा
दीदी का ससुराल है,जहाँ वह पिछले दस साल से कैद है.
पुष्पा
दी की शादी के बाद से मेरा वहाँ चौथी बार जाना हो रहा है. पहली बार तो पिताजी के
साथ लिवावट में जाना हुआ था. दूसरी बार जब उसके बेटा पैदा हुआ था, तब माँ ने
पिटारा भर सोंठ- मेथी के लड्डू जिसमें काजू,बादाम और भी न जाने कितने मेवे डले हुए
थे और पांच किलो घी के डिब्बे के साथ मुझे भेजा था. तीसरी बार दीदी के देवर की
शादी थी और चौथी बार मुझे उनकी ननद की शादी मे शरीक होना था. जब-जब भी मुझे वहाँ
जाने का हुक्म हुआ,तब-तब मैंने साफ़ जाने से इनकार कर दिया था. इनकार करने के पीछे
भी अपने ठोस कारण थे. पहला तो यह कि मुझे आने-जाने की टिकिट के अलावा गिनती के
पैसे दिए जाते.और साथ में ढेरों सारी हिदायतें कि मुझे जाते ही सबसे पहले दीदी के
सास-ससुर के पैर छुने हैं और उनके हाथ में कुछ नगद राशि भी भेंट में देना है. फ़िर
हारे हुए जुआरी की तरह उनके सामने बैठे रहना है.जब तक वे यह आदेश न दे दें कि जा
अपनी दीदी से मिल आ, तब तक वहाँ से हिलना मत.और तब तक इधर-उधर तांक-झांक भी मत
करना. माँ और पिताजी मेरी आदत जानते थे कि मैं जरुरत से ज्यादा बतियाने लगता हूँ,
सो यह हिदायत भी घुट्टी की तरह पिला दी गई कि ज्यादा बात मत करना. जितना वे कहें ,केवल उनकी बातों में हाँ में
हाँ मिलाते रहना. अपनी तरफ़ से कुछ भी मत कहना .यदि वे हमारे बारे में पूछें कि वे
क्यों नहीं आए तो कोई भी बहाना बतला देना. कहना माँ की तो बडी इच्छा थी लेकिन दमे
के चलते वे न आ सकीं और बापू के बारे में पूछें तो बतला देना कि वे किसी जरुरी काम
से बाहर गए हुए हैं.
दीदी के यहाँ जब भी जाने की बात होती
है, सब कन्नी काट जाते हैं और मुझे ही बलि का बकरा बना दिया जाता है. मैंने इस बात
के विरोध में अपना मन्तव्य दिया ही था कि पिताजी
ने एक जोरदार तमाचा मेरे बाएं गाल पर जड दिया और उस कमरे से बाहर निकल
गए.थे. मुझे इस बात का तनिक भी अंदेशा नहीं था कि मेरे न कहने पर इतनी बडी सजा मिल
सकती है. चांटा पडते ही मेरा दिमाक झनझना गया था और आँखे बरसने लगी थी .मन में एक
चक्रवाती तूफ़ान उठ खडा हुआ था ,जो देर तक सक्रीय बना रहा था..मेरे अपने जीवन की यह
पहली यादगार घटना थी.
मैं सिर नीचे किए देर तक सुबकता रहा था
कि अचानक पीठ पर हल्का सा स्पर्ष पाकर मेरी चेतना लौटी. मैंने पीछे पलटकर देखा.
माँ थीं. देखते ही मैं उनसे लिपट्कर रो पडा. थोडी देर तक चुप रहने के बाद वे मुझसे
मुखातिब हुई और उन्होंने मुझे समझाते हुए
कहा:-“ विजय...तुम इस घर के बडॆ हो, समझदार हो. तुम्हारे अलावा है भी कौन जिसे
भेजा जाए.? यदि इस घर से कोई नहीं गया तो बडा अनर्थ हो जाएगा और वे लोग पुष्पा को
टेच-टेच के लहुलुहान कर देगे. उसे दोहरे आंसू रुलाएंगे. क्या तुम चाहोगे कि ऎसा
हो? नहीं न! फ़िर क्यों तुम जाने से मना कर रहे हो. हम दोनों में से कोई वहाँ जाने
की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते हैं ,क्या यह तुम जानना नहीं चाहोगे.? सुनॊ- घर के
हालात तुमसे छिपे नहीं है. केवल एक अकेले तुम्हारे बाबूजी कमाने वाले हैं और दस
लोग बैठ्कर खाने वाले हैं. घर का खर्च किस तरह चलता है यह भी तुम्हें बतलाने की
आवश्यकता नहीं है.फ़िर हमारे पास बाप-दादाओं की जमा पूंजी भी नहीं है. चूंकि उस घर
में हमारी बेटी बिहाई है तो हमें वहाँ के सभी छोटे-बडे कर्यक्रम में जाना जरुरी हो
जाता है और वहाँ के नियमों के तहत उस प्रकार से नेंग-दस्तूर भी करने पडते हैं. तुम
जानते ही हो कि पुष्पा का परिवार करोडपति परिवार है और हमें उनके स्टेट्स के
मुताबिक व्यवहार करना होता है,जिसकी हमारी हैसियत नहीं है. यदि हम में से कोई वहाँ
जाए और ह्ल्का-पतला व्यवहार ले जाए तो भरे समाज में हमारी किरकिरी होती है. कोई कहे,
न कहे ,हम अपनी ही नजरों में गिर जाते हैं. बेटा हममें इतनी हिम्मत नहीं है कि हम
वहाँ थोडी देर भी रुक पाएं. तुम्हारे जाने से उन्हें यह कहने का मौका नहीं मिलेगा
कि हमारे यहाँ से कोई नहीं आया. दूसरे तुम्हारी गिनती लडकॊं में आती है. अतः कोई
तुम्हें उलहाना भी नहीं देगा. समझ रहे हो ना तुम मेरी बात को गहराई से !” माँ इतना
कह कर चुप हो गईं थीं .मैंने नजरे ऊपर उठा कर देखा, उनकी आँखों में आंसू झर रहे
थे. लगातार झर रहे आसुऒं को देखकर मेरा धीरज डोल उठा था. अब कहने सुनने लायक कुछ
बचा ही नहीं था .बावजूद इसके एक प्रश्न लगातार मेरा पीछा कर रहा था. मैंने हिम्मत
बटोरकर पूछा:”-माँ..संबंध हमेशा अपने बराबरी वालों से किया जाता है,फ़िर आपने
पुष्पा दीदी का संबंध इतने बडे घराने में क्यों कर दिया.? “
जवाब देने की बारी अब माँ की थी. एक
लंबी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा:- हाँ..हमें यह सब पता था और पता था इस बात का भी
कि हम अपनी हैसियत से बाहर यह काम करने जा रहे हैं. पुष्पा सयानी हो चली थी. उसके
रूप-गुण की चर्चाएँ यहाँ-वहाँ, जब-तब होती रहती थी जमाना कितना खराब चल रहा है यह
भी तू जानता है..हमें रात-दिन एक ही चिन्ता खाए जा रही थी कि उसकी शादी किसी अच्छे
घराने में हो जाए.और हम चैन की नींद सो सकें. मैंने इस बात का जिक्र अपने भैया से
किया था. उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा “जिज्जी मेरी नजरों मे एक अच्छा सा
लडका है. पढा-दिखा है और देखने-परखने मे नम्बर एक .किसी बैंक-वैंक मे नौकरी कर रहा
है. घर से करोडपति है. उसके माता-पिता को एक निहायत ही खूबसूरत लडकी की तलाश है.
मुझे पक्का यकीन है कि पुष्पा देखते ही पसन्द कर ली जाएगी. मैंने उन्हें तुम लोगॊ
के बारे में विस्तार से बतला दिया है. लडके के पिता का कहना है कि वे दहेज लेकर
शादी नहीं करेगे. यदि उन्हें लडकी पसन्द आ गई तो हम चट मंगनी-पट शादी का इरादा
रखते हैं. संभव है कि वे अगले सप्ताह तुम्हारे यहाँ पहुँचने वाले हैं. मैं भी साथ
रहूँगा,अतः चिन्ता कराने की जरुरत नहीं है.”
जैसा तुम्हारे मामाजी ने कहा था,वे
पुष्पा को देखने चले आए, और उसे देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. हमसे भी जितना बन
पडा,दहेज में हमने सभी आवश्यक चीजें दी .पुष्पा अपने घर में मजे में है .एक
मां-बाप को और क्या चाहिए कि उनकी बेटी राजरानी की तरह रह रही है. चुंकि उनके घर
में किसी प्रकार की कमी नहीं है ,अतः वे दिल खोलकर खर्च करते हैं. पिछली बार जब हम
उनकी बडी बेटी की शादी में गए थे,तो दहेज में उन्होंने पचास तोले सोने के जेवर
अपनी बेटी को दिए थे और साथ में एक मारुति गाडी. टीके मे उन्होंने एक लाख नगद भी
दिया था. अब तुम्हीं बताओ विजय, हम उनकी पासंग में कहाँ बैठते हैं ?”.
माँ की बात जेहन में उतर गई थी और मैं
जाने के लिए तैयार हो गया था.
काफ़ी समय पहले पिताजी ने प्लाइ का बना
सूटकेस खरीदा था, जो वर्षॊं से पडा धूल खा रहा था. मैंने आहिस्ता से उसे नीचे
उतारा. उस पर पडी धूल को साफ़ किया अपने कपडॆ रख ही रहा था, तभी माँ ने कमरे में
प्रवेश किया. उनके हाथ में प्लास्टिक का एक बैग था. बैग मुझे थमाते हुए उन्होंने
कहा कि जाते बराबर इसे पुष्पा को दे देना.और ये दो सौ रुपए हैं,जो आने-जाने की
टिकिट और नेग-दस्तूर के लिए हैं. इसे सोच -समझ कर खर्च करना.
बस से उतरते ही मुझे रिक्शे वालों ने
घेर लिया. तत्काल मुझे पिछली बातें याद हो आयी. रिक्शा न लेने पर दीदी की सास के
द्वारा दिया गया उलहाना किसी टेप की तरह मेरे कानों में बजने लगा.था. मैंने अब की
रिक्शे से न जाकर आटॊ से जाने का मन बनाया. बडॆ मुश्किल से एक आटॊ वाला बीस रुपए
में जाने को तैयार हुआ. मैंने बडी शान से अपना सामान आटॊ में रखा और वह चल पडा.
रास्ता चलते मेरी आँखों के सामने दीदी की सास का चेहरा दिखलाई पडता. मैं सोचने लगा
था कि जाते बराबर ही वे मुझे दरवाजे पर बैठी मिलेगी और मैं उनके सामने आटो से
उतरते दिखुंगा तो उनके कहने के लिए कुछ नहीं बचेगा और न ही वे मुझे जलील कर
पाएगीं.
आटॊ अब उनके दरवाजे के ठीक सामने जाकर
रुका.. मैंने देखा कि दरवाजे पर कोई भी नहीं है. मेरा मन बुझ सा गया था और एक
पछतावा भी होने लगा था कि मैंने नाहक ही इतने सारे पैसे खर्च किए. यदि मैं पैदल भी
चला आता तो यहाँ देखने और कहने वाला कौन था ? खैर, अब जो हो चुका उसके लिए क्या
पछताना. प्रवेश द्वार को पार करते हुए मैं काफ़ी अन्दर तक चला आया था लेकिन वहाँ भी
कोई मौजूद नहीं था. मेरी व्यग्रता बढती जा रही थी कि आखिर सब कहाँ चले गए, जबकि
शादी वाले घर में तो भीड-भाड रहती ही है. मेरी नजरें अब दीदी को खोजने लगी थीं.
लगभग पूरे घर को लांघते हुए मैं
पिछवाडॆ तक चला आया था. घर के ठीक पीछे बडा सा बाडा था,जो मुख्य सडक से जा मिलता
है. वहाँ जाकर मैंने देखा कि पुष्पा दी के ससुर कुर्सी में विराजमान है. मैंने जाते ही सूटकेस को नीचे रखते हुए उन्हें
प्रणाम किया और उनके चरण स्पर्ष किए. मुझे देखते ही उन्होंने कहा”- अरे विजय..कबे
आए ? थूक से हलक को गीला करते हुए मैंने कहा:-बस, मैं चला ही आ रहा हूँ.” वाक्य
समाप्त भी नहीं हुआ था कि उन्होंने दूसरा प्रश्न उछाल दिया:-काहे..मास्टरजी नहीं
आए”. तो मैंने कहा:-बाबूजी का मन तो इस बार आने का था और उन्होंने छुट्टी भी ले
रखी थी लेकिन अचानक स्वास्थ्य गडबड हो जाने की वजह से नहीं आ पाए. वे और कोई दूसरा
प्रश्न दाग पाते ,मैंने आगे बोलते हुए अम्माजी के न आ सकने का कारण भी कह सुनाया
कि उन्हें अस्थमा ने बुरी तरह से परेशान कर रखा है,अन्यथा उनका इस बार आना तय था.
काफ़ी देर तक चुप्पी साधे रहने के बाद
उन्होंने मौन तोडते हुए कहा:”-विजय...तुम्हारे बाबूजी क्यों नहीं आए इसका कारण मैं
समझ सकता हूँ. पर उन्हें इस बार आना चाहिए था क्योंकि मेरे घर की यह आखिरी शादी
है. इसके बाद जब भी कोई शादी होगी तो वह हमारे पोते की ही होगी. खैर.” उन्होंने
लंबी सांस लेते हुए मुझसे कहा:-“ विजय, मुझे लगता है कि इस समय घर में कोई नहीं
होगा. तुम्हारे जीजाजी और जिज्जी सभी पूजा प्लस में मिलेगे. बारात शाम को
लगेगी,शायद उसी की तैयारी में वे लोग लगे होगें. तुम ऎसा करो, अपना सामान अपनी
जिज्जी के कमरे में रख दो और मुँह-हाथ धोकर फ़्रेश भी हो लो और जब लौटकर आओ तो साथ
बैठकर चाय पीते हैं, फ़िर हम भी वहीं चले चलेगें.”
दादाजी की बाते सुनकर मैं थोडा सहज हुआ
था. दादी होतीं तो पता नहीं कितनी खरी-खोटी सुनाती .इससे पहले भी मैं यहाँ आया हूँ
तो हर बार उन्हीं के साथ बैठकर बाते करता रहा हूँ. वे भी मेरी तरह ही बडबोले हैं.
हमारी बातें सुनकर वे चिढ भी जाती थी और उल्हाना देकर कह उठती थी कि दोनो मिलकर
क्या उलटी-सुलटी बातें करते रहते हो .कभी-कभी तो वे यहाँ तक भी कह जातीं कि बुढा
गए हो लेकिन छोकरों की जैसी बातें करते तुम्हें शर्म नहीं आती. थोडा उमर का भी तो
ख्याल किया करो. दादी कि जली-कटी बातें सुनकर वे तैश में आ जाते और लगभग डांटते
हुए कहते” तुम चुप बैठॊ जी, हमारे और विजय के बीच अपना मुँह मत खोलो. यदि सुनना
अच्छा नहीं लगता है तो किसी दूसरे कमरे में चली जाओ”.
प्रत्युत्तर में केवल”जी” कहता हुआ मैं
वहाँ से सीधे दीदी के कमरे में चला आया.अपना सामान रखते हुए मैंने मुँह-हाथ धोये.
सफ़र में कपडॆ गंदे हो गए थे,सो उन्हें बदला और छैला बाबू बनकर दादाजी के पास आ
गया. मुझे आया देख उन्होंने पास ही पडी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और हांक लगाते हुए अपने नौकर रामू से चाय लाने को
कहा. थोडी ही देर में वह चाय बनाकर ले आया था. हम दोनों ने साथ मिलकर चाय पी. चाय
के समाप्त होते ही उन्होंने अपनी छडी उठाई और बोले “चलो चलते हैं.”
लाँन की साज-सज्जा देखकर मैं अभिभूत
हुआ जा रहा था. स्वागत-द्वार मिट्टी के दो बडे हाथी अपनी सूंड में भारी-भरकम माला
लिए स्वागत की मुद्रा में खडे थे. बाउन्ड्री- वाल के किनारे लगे पेडॊं पर बल्बों
की झालरें लहरा रही थीं,जिनसे रंग-बिरंगी रोशनी झर रही थी. दो स्प्रे मशीने
सुगन्धित इत्र का छिडकाव कर रही थी .गेट से लेकर मंच तक कारपेट बिछा दी गयी थी. अन्दर
लान में दांए-बांए अप्सराओं की आदमकद मूर्तियां बनी थी,जो लान की सुन्दरता मे चार
चांद लगा रही थीं. मण्ढप मे जगह-जगह फ़ानूसें लटक रही थी. लान इस समय किसी राजमहल
से कम दिखाई नहीं दे रहा था. दादाजी के साथ अन्दर प्रवेश करते ही मेरी नजरें
जीजाजी और जिज्जी को खोजने लगी थी. जीजाजी तो मुझे दिखाई दे गए. वे इस समय नौकरों
को आवश्यक दिशा निर्देश दे रहे थे. लेकिन वहाँ जिज्जी नहीं थीं .शायद अन्यत्र कहीं
व्यस्त होगीं. मैंने दादाजी का साथ छोडकर अपने कदम उस ओर बढाए जहाँ जीजाजी खडे थे.
पास पहुँच कर मैंने उनके चरण स्पर्ष किए. गले लगाते हुए उन्होंने मेरी तथा परिवार
की कुशल क्षेम पूछे और मुझसे कहा कि मैं अपनी दीदी से मिल आऊँ,जो इस समय रसोई घर
में वहाँ की व्यवस्था देखने गई हुई हैं.
मैं अपनी दीदी से मिलने को ललायित था.
सो आदेश पाते ही मैंने उस ओर दौड लगा दी. पलक झपकते ही मैं उनके सामने खडा था.
मैने झट उनके चरण स्पर्ष किए. उन्होंने मुझे गले लगा लिया और देर तक मुझे अपने से
लिपटाए रखा. मैं अपनी दीदी से कई बरस बाद जो मिल रहा था. पल-दो पल बाद जब मैं उनसे
अलग हुआ तो देखा कि उनकी आँखों से अश्रु झर रहे थे. दीदी के दिल पर इस समय क्या
बीत रही होगी,इसे मैं समझ सकता हूँ. उन्हें रोता देख मैं भी अपने आपको रोक नहीं
पाया था.और मैं भी रो पडा था. हम अत्यन्त ही पास-पास खडॆ थे,लेकिन हमारे बीच मौन
पसरा पडा था. देर तक अन्यमस्क खडे रहने के बाद उनका मौन मुखर हो उठा. उन्होंने
मेरी पढाई-लिखाई के बारे में ढेरों सारी जानकारियाँ ली और माँ-बाबूजी के हालचाल
पूछे. कई अन्य जानकारियाँ लेने के बावजूद उन्होंने माँ-बाबूजी के न आने के बारे
में कुछ भी नहीं पूछा. शायद वे इसका कारण भली-भांति जानती थी. मैं इस समय उस बोझिल माहौल को और भी बोझिल बनाना
नही चाहता था .सो मैंने उनसे कहा “जिज्जी..फ़िर बाद में बैठकर बाते करेगें. अभी मैं
जाकर जीजाजी की सहायता में लग जाऊँ”. और मैं वहाँ से खिसक लिया था.
अभी दिन के तीन बजे थे और बारात
रात के करीब नौ बजे के आसपास लगनी थी.
जीजाजी और पुष्पादी चारों तरफ़ घूम-धूम कर बारीकी से हर काम का मुआयना कर रहे थे.
ताकि बाद में परेशानी न उठानी पडॆ.
इसी बीच नेग-दस्तूर का कार्यक्रम शुरु
हो गया था. हमें खबर दी गई. मैं,जिज्जी और जीजाजी सभी वहाँ पहुँच गए थे. महिलाएँ
बारी-बारी से आतीं, दादाजी और दादी को हल्दी लगाती और भेंट में लाए कपडॆ देती और
अपनी जगह पर जा बैठतीं. मैं एक कुर्सी पर धंसा यह सब देख रहा था कि जो भी महिला उस
दस्तूर को करने के लिए आगे बढ रही थी, उन्होंने दादी के लिए कीमती साडी तथा दादाजी
के लिए बेहतरीन कपडे लाए थे. तभी मुझे याद आया कि घर से चलते समय माँ ने जो कपडॊं
का गठ्ठर दिया था उसे तो मैं जिज्जी के कमरे में ही छोड आया था. उसमें कितने कीमती
कपडॆ होंगे, यह तो मैं नहीं जानता,लेकिन मुझे इतना मालुम है कि माँ ने वे सारे
कपडॆ फ़ेरी वाले से किस्तों में खरीदे थे और वे कितने उमदा किस्म के होंगे, यह मैं
समझ सकता हूँ. मेरे मन में एक द्वंद उठ खडा हुआ था कि मैं उस गठ्ठर को लेने जाउँ
या नहीं.?
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14,
चन्द्रमुखी
'' चन्द्रमुखी.! "............. ' ' देव ने पुकारा।
वह विचारों की गहरी
अंधेरी गुफा में उतरकर अपने प्रश्नों के उत्तर खोज रही थी। यही कारण था कि वह
उत्तर नहीं दे पाई। अपनी पीठ पर एक शीतल-सुखद स्पर्श पाकर उसकी चेतना लौटी और उसने
पीछे मुड़कर देखा। देव मुस्करा रहे थे। उसने अभिवादन करना चाहा पर पीठ पर हथेली का
तनिक अधिक दबाव इस बात का इशारा था कि वह यथावत्ï बैठी रहे।
'' चन्द्रमुखी ! .....
ये क्या हाल बना रखा है। तुम्हारा शरीर तप रहा है, चेहरा
निस्तेज हो आया है तथा तुम्हारे केश-कुन्तल बुरी तरह से आपस में उलझे हुए हैं,
पारिजात के सुवासित पुष्पों से अपना सिंगार भी नहीं किया है।
बात-बात में खिलखिला कर हंस देने वाली सुमुखी ... तुम्हें अचानक क्या हो गया है? ' देव ने कहा।
'' क्षमा करें देव,
आज न जाने क्यों मेरा मन अशान्त हो उठा है। भोगविलास हास-परिहास सब
व्यर्थ से जान पड़ रहे हैं। "
चन्द्रमुखी ने कहा।
'' सुमुखी .... जब तक
तुम अपने मन की पीड़ा मुझे नहीं सुनाओगी, तब तक तो उसका
निदान संभव नहीं, नि:संकोच होकर अपने मन की व्यथा कथा सुनाओ।
"
'' फुर्सत के क्षणों में
हम सब सखियां विलास बाग में इकठ्ठी हुईं, शांत झील के किनारे
बैठी हम सब बतिया रही थीं। एक सहेली को न जाने क्या सूझा उसने अपने वस्त्र उतार
फेंके और झील में जा उतरी। बड़ी देर तक वह जलक्रीड़ा करती रही और फिर अंजुली भर-भर
कर अन्य सहेलियों पर उछालने लगी। फिर क्या था। हम सभी ने अपने-अपने वस्त्र उतार
फेंके और पानी में उतर पड़ी। बड़ी देर तक चुहलबाजियां चलती रहीं। मदांध देवी
तिलोत्तमा ने तो हद कर दी। उन्होंने पुरुषोचित्त हरकतें शुरू कर दीं और अन्यों के
अंग-प्रत्यंगों से छेड़छाड़ करने लगी। यौवनजनित क्रीड़ाओं में प्राय: सभी ने खुलकर
भाग लिया। काफी देर तक मदनोत्सव का सा माहौल बना रहा। जब हम थककर चूर हो गए तो एक
विशाल वृक्ष के नीचे हरी-हरी मखमल सी दूब के कालीन पर आकर पसर गए। "
'' फिर .... फिर क्या
हुआ देवी?. "
'' देवी तिलोत्तमा ने हास-परिहास अब भी जारी रखा
था। वे मेरी कमर में हाथ डाले निर्वसन पड़ी थी। अपनी बातों का रुख धरती के इंसानों
की तरफ अचानक मोड़ते हुए कहने लगी थी— 'सखी, हम चौबीसों पहर भोग-विलास की मस्ती में मस्त रहती हैं। अपने आपको खूब
सजाती संवारती हैं और स्वर्ग में रह रहे देवों को अपने यौवन की अग्नि में पिघलाती
रहती हैं। इस कार्य में मैं कोई नवीनता भी नहीं देखती हूँ। यहाँ रहने वालों को न
तो भूख सताती है और न ही प्यास, हर पल, हर जगह उजाला ही उजाला बिखरा पड़ा रहता है। शारीरिक-मानसिक परिताप भी नहीं
होता। भविष्य की न तो चिंता है और न ही अतीत को लेकर कोई उलझन। बस हरदम, हर घड़ी भोग-विलास में आकंठ डूबी रहो। इस उद्यान के न तो फूल झरते हैं,
न ही खिलते हैं, सब चित्र लिखे से दिखाई देते
हैं। न तो यहां आँधी आती है और न ही तूफान, न यहां तेज गरमी
पड़ती है और न ही ठंड सताती है। मंद-मंद समीर चौबीसों घंटे चलायमान रहता है। धरती
पर ऐसा नहीं होता। वहाँ कल-कल करती नदियाँ उछलते-कूदते रहती हैं। साल में तीन बार
मौसम बदलता है। वर्षा होती है, ठंड पड़ती है और उसके बाद
भीषण गर्मी भी। खुलकर भूख लगती है और प्यास भी। आदमी अपनी प्रियतमा का काफी ख्याल
रखते हैं। उन्हें सुख भी प्राप्त होता है और दुख भी, पर वे
आपस में बराबर-बराबर बांट लेते हैं। भावपक्ष वहां प्रधान होता है।
सेवा-दया-प्रेम-करुणा-त्याग-धैर्य-परोपकार-लाड़-दुलार पृथ्वीवासी खूब जानते हैं।
सभी जनों के हृदय में नवरसों का संचार बराबर होता रहता है। जबकि हम केवल एक ही रस
में डूबी रहती हैं। तिलोत्तमा बराबर बोलती ही चली जा रही थी।
मैंने बीच में टोकते हुए पूछ ही लिया—
" दीदी इतना सब आप उन लोगों के बारे में कैसे जानती हो?. इतनी
अच्छी और इतनी गहरी बातें तुम्हें किसने बताईं? क्या तुम कभी
धरती पर गई थीं? क्या तुमने मनुष्य जाति से संसर्ग किया था?. " तरह-तरह के प्रश्नों का पहाड़ मैंने उनके आगे खड़ा कर दिया था।
तो और भी गंभीर होकर बताने लगी।
'' हाँ - चन्द्रमुखी !-
एक बार की बात है। धरती पर विश्वामित्र नामक एक तपस्वी तपकर रहे थे। उनका मनोरथ
स्वर्ग पर आरूढ़ होना नहीं था। वे तो जनकल्याण के लिए कड़ा तप कर रहे थे।
देवेन्द्र को तो तुम अच्छी तरह जानती हो। स्वर्ग में भी वे कुछ न कुछ षड्ïयंत्र रचते ही रहते हैं। उनके अवचेतन मन में शंका का एक बीज उग आया सो
उन्होंने मेनका को आदेश दिया कि वह धरती पर जाए और विश्वामित्र का तप भंग कर दे।
गर्वीली मेनका धरती पर उतरी। उसका साथ प्राय: सभी ने दिया। जिस जगह पर ऋषि तप कर
रहे थे, वहां का माहौल अति कामुक बना दिया गया। हम अप्सराओं
ने वस्त्र पहने अथवा नहीं क्या फर्क पड़ता है। मेनका ने ऋषि के मन में कामना जगा
दी। उसे उस समय तक केवल इतना ही ध्यान था कि ऋषि की तपस्या भंग होनी चाहिए।
देव-प्रमुख का मनोरथ पूरा होना चाहिए। उनकी तपस्या तो खैर भंग हो गई पर देवी मेनका
धरती से वापिस न आ पाई। वह वहीं की होकर रह गई। "
'' वो कैसी दीदी? "मैंने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
'' हम अप्सराओं को देवों से मिलने वाला परिरंभन
कल्पना मात्र होता है। मन में कामना की नहीं कि उसकी पूर्ति हो गई। न तो उससे कोई
विशेष भाव जागता है और न ही कभी विद्यमान रहता है। पर मृत्युलोक में ऐसा नहीं
होता। मन में चाहत की एक तड़प पैदा होती है। अपने प्रिय को देखकर अनेकानेक भावनाएं
मन को गुदगुदाने लगती हैं। पिया मिलन की कल्पना न जाने कितने दिवास्वप्न दिखा जाती
है। मिलन के अलावा जुदाई भी होती है, जो दोनों को तिल-तिलकर
जलाती है। "
" यौवन जब मचल जाता है तो अपने
प्रिय का सामीप्य पाने के लिए वह अपना सर्वस्व न्यौछावर भी कर देता है। जब सब कुछ
समर्पित हो जाता है तो शेष रह जाता है शुद्ध-प्यार, दिल की गहराइयों से भी
गहरा प्यार और यही प्यार मेनका के मन में भी अंगड़ाई लेने लगा। जब वह ऋषि की
बांहों में समाई तो भूल गई स्वर्ग को, हम सभी को, फिर मेनका ने कभी भी स्वर्ग की कामना नहीं की। उसे ऐसा लगने लगा था जैसे
वे कभी स्वर्ग से आई ही नहीं थी। ":
" काफी समय बीत गया, मेनका स्वर्ग नहीं
लौटी। देवराज को ज्ञात हो गया था ऋषि की तपस्या भंग की जा चुकी है। उनका मनोरथ
पूरा हो गया। जब उन्हें यह पता चला कि मेनका अब तक वापस नहीं लौटी है तो वे बेचैन
हो उठे। उन्होंने अपने दूत धरती पर भेजे और कहा कि वे उनकी ओर से मेनका को प्यार
जताएं और कहें कि वह स्वर्ग लौट आए। इन्द्र अपने दूतों की वापसी का बड़ी बेसब्री
से इंतजार कर रहा था। जानती हो क्या हुआ। दूत खाली हाथ वापिस लौट आए। मेनका ने आने
से इंकार कर दिया। स्वर्ग में खलबली-सी मच गई। कई दिनों तक मातम छाया रहा। "
'' देव, सखी तिलोत्तमा की
कहानी सुनकर ही मेरा ये हाल हुआ है, यदि आप बुरा न मानें तो
मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि हम भी धरती पर चलें। उस स्थान को मैं देखना
चाहती हूँ जहां देवी मेनका ने अपना घर बसाया था तथा जिन अलौकिक सुखों का बयान
तिलोत्तमा ने किया है, मैं उनका उपभोग करना चाहती हूँ। यहां
की ठहरी हुई जिंदगी में कुछ हलचल जगाना चाहती हूँ, मुझे पूरा
विश्वास है कि आप मेरी याचना पर विशेष ध्यान देंगे। "
'' प्रिये~ ! जानती हो तुम क्या कह रही हो। और मुझसे क्या
अपेक्षाएँ रख रही हो। तुम भली-भांति जानती हो कि मैं तुम्हें प्राणपण से चाहता हूँ,
तुम्हारा तनिक-सा भी वियोग मुझे कितना कष्टकारक लगता है। यदि तुम
धरती पर गई तो फिर वापिस न आने पाओगी, तब मेरा यहां क्या हाल होगा तनिक सी कल्पना
तो करो। "
'' देव, आप विश्वास रखें मैं भी आपके बगैर पल भर जीवित नहीं रह सकती। हम साथ ही
धरती पर जाएंगे, धरती के कथित सुखों का उपभोग करेंगे और फिर
वापिस आ जाएँगे। हमारी ये यात्रा गोपनीय ही रहेगी। किसी को कानोंकान पता नहीं
चलेगा कि हम धरती पर गए थे। "
'' देवी तुम जानती हो,
उन सुखों का उपभोग तुम यूं ही नहीं उठा पाओगी। तुम्हें उनके जैसा ही
बनना पड़ेगा। यह योनि तुम्हें छोडऩी पड़ेगी तब जाकर तुम वहां के कथित सुखों का
उपभोग कर पाओगी। तुम्हें अपना सर्वस्व खोना पड़ेगा चन्द्रमुखी। "
'' देव मेरे प्यार का
विश्वास रखें। आप चाहें तो क्या नहीं कर सकते। आपमें असीम शक्ति है। होनी को
अनहोनी और अनहोनी को होनी में बदल सकते हैं। यह सामथ्र्य आपमें है। आप खुद नहीं तो
मुझे ही मनुष्य योनि दे दें। मैं उस योनि में रहकर कुछ समय व्यतीत करूंगी और जब मन
भर जायेगा तो लौट पड़ूंगी या फिर आप जब चाहें अपना वरदान वापिस ले लें। मैं पुन:
अप्सरा के रूप में प्रकट होऊंगी और आपके साथ वापिस हो लूंगी। "
'' देवी, तुम्हारी इस याचना ने मुझे अन्दर तक झंझोड़ दिया है। यदि तुम्हारा कहना न
मानूं तो तुम्हारा दिल टूट जायेगा और यदि मान लूं तो मेरा। बड़ी विचित्र परिस्थिति
पैदा कर दी है तुमने। मैं निर्णय नहीं ले पा रहा हूं कि मुझे क्या करना चाहिए और
क्या नहीं करना चाहिए। एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ बावली। यदि कहीं देवराज को पता
चल गया तो खैर नहीं। धरती पर बिखरे पड़े नौ रसों के आस्वादन करने की तुम्हारी
प्रबल इच्छा ने इतना अंधा बना दिया है कि तुम्हें आने वाली विपत्ति का तनिक भी भय
नहीं लग रहा है। "
'' देव ! मुझे
तनिक भी परवाह नहीं है। इसका मात्र एक कारण है कि मेरे मन में इन रसों का आस्वादन
करने के लिए, इनका उपभोग करने के लिए उद्दाम कामनाएं हलचल
मचा रही हैं। "
'' देवी ! यह सच है कि मुझमें इतनी शक्ति तो है कि
मैं तुम्हें देव योनि से मनुष्य योनि में भेज सकता हूँ, फिर
भी मैं चाहूँगा कि तुम इस शक्ति का गलत प्रयोग करने के लिए नहीं कहोगी। "
(निराश होकर) '' एक काम करें देव । धरती पर केवल
नौ रस ही तो हैं। मुझे केवल नौ मास तक ऐसा करने की अनुमति दे दें। ठीक दसवें माह
मैं वापिस हो लूंगी। हम धरती पर चलते हैं। अपनी पसंद के किसी युवक के साथ रहूंगी
और एक निश्चित समय तक उसका उपभोग करूँगी। अब तो ठीक है न! "
'' ठीक है। इस शर्त पर
मैं तैयार हूँ । "
स्वर्ग की अनन्त ऊँचाइयों
से होते हुए, दो दिव्य आत्माएँ धरती की ओर उतर चलीं। अनेकों
भूभागों को एवं आश्चर्यजनक दृश्यावलियों को देखकर अप्सरा चन्द्रमुखी गदगद हो उठी।
धरती पर रह रहे अनेकानेक मानवों के विभिन्न रीति-रिवाजों को भी उन्होंने जाँचा
परखा और फिर अंत में उन्होंने अपना रुख भारत की ओर मोड़ा। नगाधिराज हिमालय
गंगा-मेकलसुता से होकर कन्याकावेरी तक एवं गुजरात से कलकत्ता तक की यात्राएं कीं
और अंत में ऋषि विश्वामित्र की वह तपस्थली भी खोज निकाली जहां कभी स्वर्ग से उतरकर
मेनका ने रहना अंगीकार किया था।
वनों से आच्छादित
पर्वतश्रेणियों के समीप ही एक सुंदर शांत झील पर नजर पड़ी। झील के किनारे एक
नवयुवक कठोर पाषाण पर छेनी-हथौड़ी से मूर्तियां गढ़ रहा था। छेनी पर पड़ती हथौड़ी
की चोट से एक विशेष नाद पैदा होता। साथ ही उसकी बलिष्ठ एवं कसी हुई भुजाओं में एक
आकर्षण था। उसे देखकर चन्द्रमुखी ने अपना निर्णय देव को कह सुनाया कि अब वह इसी
युवक के साथ नौ मास रहेगी।
देव की असीम कृपा से
अपना निज खोते हुए उसने मनुष्य योनि में प्रवेश किया। नौ माह तक नौ रसों का
आस्वादन करते हुए उसने महसूस किया कि देवी तिलोत्तमा के कथन में कितनी सच्चाई थी।
निर्धारित समय से पूर्व
उसने उस युवक से कहा- '' आर्य इतने लंबे समय तक मैं आपके सानिध्य में रही। तुम्हारी सहायता से
मैंने नौ रसों का भरपूर उपभोग किया जो स्वर्ग में सर्वथा अनुपलब्ध थे। समर्पण में
कहाँ क्या नहीं मिलता ?. मैं अपना रहस्य अब तुम पर उजागर करती हूँ । दरअसल मैं एक
सामान्य स्त्री न होकर स्वर्ग में रहने वाली अप्सरा हूँ , इस
धरती के रहस्यों को, यहाँ के निवासियों के त्याग, आश्चर्य, सेवा, दया, प्रेम, करुणा, परोपकार एवं
दुलार से ओतप्रोत भावनाओं को नजदीक से देखने के लिए, उन्हें
समझने के लिए अपनी जिद के कारण अपना मूल रूप छोड़कर एक सामान्य स्त्री के रूप में
आकर और तुम्हारा सामीप्य पाकर उन सभी सुख दुखों को भोगा है। अब मैं कुछ समय पश्चात
अप्सरा के रूप में परिवर्तित हो जाऊँगी। "
उस्ने आगे बोलते हुए कहा- "
स्वामी ! अपने धाम को वापिस जाने से पूर्व
मेरा एकमात्र निवेदन है कि हमने जो कुछ भी यहां भोगा है, उन
सभी को अपनी छेनी-हथौड़ी के माध्यम से इन शिलाखण्डों पर उकेरो। मेरे स्वर्ग चले
जाने एवं तुम्हारे स्वयं के स्वरूप को खोने के बाद एक शून्य एक महाशून्य उपस्थित
हो जायेगा। कोई भी नहीं जान पायेगा कि कभी चन्द्रमुखी तुम्हारे प्यार में पागल हुई
थी। तुम्हारे और समर्पण पाने को मैं कभी स्वर्ग से धरती पर आई थी। अपनी
छेनी-हथौड़ी से तुम जो गढ़ोगे वह हमारे प्यार के अमिट हस्ताक्षर होंगे।
युगों-युगों तक लोग यहां खिंचे चले आएंगे और हमारे प्यार के मंदिर को देखकर अपने
को कृतार्थ समझेंगे। "
चन्द्रमुखी के लौट जाने
के बाद उस युवक के मन में तनिक भी विषाद नहीं हुआ और न ही उसने अपना विवेक खोया।
अपनी कुटिया में आकर वह छेनी-हथौड़ी उठा लाया और पत्थरों पर प्यार की इबारत लिखने
लगा।
उसने एक विशाल चबूतरे
का निर्माण किया। उसने चबूतरे के पत्थर पर हाथियों की श्रृँखला, कहीं कमलदल तो कहीं वाद्य बजाते वृंदजनों को उकेरा।
चबूतरे पर फिर प्यार के
मंदिर का स्वरूप रचने लगा। वाद्य यंत्र बजाती चन्द्रमुखी, तो
कहीं श्रृँगार करती तो कहीं अपने प्रिय के
साथ आलिंगनबद्ध, तो कहीं नूपुर झंकारती, कभी आईना देखती, कभी अपने पाँवों में माहुर रचाती,
तो कहीं अपने प्रिय के साथ विभिन्न मुद्राओं में मैथुनरत। कलाकार ने
अपनी कला का भरपूर उपयोग किया। मंदिर के कंगूरों तक में विभिन्न-विभिन्न मुद्राओं
में उसने अपने प्रेयसी को ला उतारा।
जब मंदिर का निर्माण
पूरा हो गया तो उसने छेनी-हथौड़ी एक तरफ रख दिया। अपनी कुटिया में गया और बांसुरी
उठा लाया। शांत झील के समीप ही एक विशाल खण्ड पर बैठ गया और तन्मय होकर बांसुरी से
खेलने लगा।
बांसुरी की मधुर तान
सुनकर चन्द्रमुखी ऊँचाइयों से उतर कर नृत्य करने लगती, विभिन्न
मुद्राओं में नृत्य करती चन्द्रमुखी थककर चूर हो जाती तो वह उसके पास उसी शिलाखण्ड
पर आकर बैठ जाती। अपने प्रिय को अपनी बांहों में समेट लेती। वह आँखें बंद किए अपनी
साधना में तल्लीन रहता । अपनी प्रेयसी का सामीप्य पाकर जब वह आँख खोलता तो
चन्द्रमुखी शर्माती, लजाती और जब वह उसे बाँहों में भरने को
आतुर होता तो वह छिटककर फिर मंदिर के कलशों पर जाकर बैठ जाती।
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