Monday, 2 June 2025

 

आलेखों की सूची-भाग-2

------------------------------------------------------------------------------------------1.    1      आदिवासी-संस्कृति और पर्यावरण

2.      ईश्वरीय सत्ता का सानिद्दय प्राप्त् करने के लिए भगत्गीता

3.      एक अबुजी प्यास है फ़ागुन तेरो नाम

4       .एक आइडिया:- जो आपकी जिन्दगी बदल देगा.

5.      कथा साहित्य में मध्यप्रदेश का योगदान    

6.      कविता की दुनिया :  दुनिया की कविता.

7.      कार्तिक मास का महत्व      

8.      अंधेरे में मुक्ति के रास्ते खोजता मुक्तिबोध  

9.      गणगौरिया लाखा री बधाई  

10.    गोवर्धन-पूजा का रहस्य

11      ज्योतिषशास्त्र में श्रीलक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के उपाय

12.    डाकघर -_ इतिहास के झरोखे से

13.    प्रभु श्रीराम की अगवानी में मनाई गई  पहली “दीपावली”

14.    देशभक्त वीरांगनाएँ

15.    कर्मयोगी श्रीकृष्ण

16.    नागपंचमी महोत्सव  

17.    भारतीय नाटक की उत्पत्ति व विकास

18.    नृत्य, जब महारास में बदल जाये.

19. परम्परा और आधुनिकता

20. लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना.

21.    बंधन राखी का.

22.    पातालकोट-धरती पर एक अजूबा           

23. फ़ागुनी-गीत      

24.    बुढ़ापा खुद एक समस्या है. 

25.    बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ

26.    भारतीय नाटक की उत्पत्ति व विकास

27.    अपने समय को लिखते हुए          

28.    वनगमन- यात्रा का ही पर्याय है.

29.    वनगमन- मेरी नजरों में

30.    लोक व्यवहार में राम एवं विविध निबंध.

31.    राम का वनगमन एक अद्भुत घटना थी.

32.    विश्व-साहित्य का सुंदरतम प्रसंग है राम- वनगमन

33.    वन गमन-  एक अनुभूति\

34.     फ़ूलों की घाटी (उत्तराखण्ड)

35.     मत्स्य पुराण के अनुसार भारत के भूभाग से निकलने वाली नदियों का वर्णन

36.    यूनिवर्सल पोस्टल युनियन   

37.    सार्थक सांस्कृतिकता बनाम रामदेव धुरंधर.

38.    बाइसवीं पावस व्याख्यानमाला (एक रपट) 

39.    सुहागिनों के अखण्ड सौभाग्य का रक्षक—हरितालिकाव्रत(तीज) 

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                                                                                                                                                                                                .                                                           http://4.bp.blogspot.com/-P3gsVZTKfz4/TvMimzV27JI/AAAAAAAAAxk/EpcwvHsjknE/s320/DSCN4103.jpg                  

            

              आदिवासी-संस्कृति और पर्यावरण.

                                          

भारत में करीब तीन हजार की संख्याँ में विभिन्न जातियों और उप-जातियाँ निवास करती है. सभी का रहन-सहन, रीति-रिवास एवं परम्पराएं अपनी विशिष्ट विशेषताओं को दर्शाती है. कई जातियाँ (**)मसलन गोंड- भील- बैगा- भारिया आदि जंगलॊं मे आनादिकाल से निवास करती आ रही है. सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति जंगलो से होती है. इन जातियों की सामाजिक-आर्थिक-राजनितिक एवं कुटुम्ब व्यवस्था की अपनी अलग पहचान रही है. इन लोंगो में वन-संरक्षण करने की प्रबल वृत्ति है. अतः वन एवं वन्य-जीवों से उतना ही प्राप्त करते हैं,जिससे उनका जीवन सुलभता से चल सके और आने वाली पीढ़ी को भी वन-स्थल धरोहर के रुप में सौप सकें. इन लोगों में वन संवर्धन, वन्य जीवों एवं पालतू पशुओं का संरक्षण करने की प्रवृत्ति परम्परागत है. इस कौशल दक्षता एवं प्रखरता के फ़लस्वरुप आदिवासियों ने पहाड़ों, घाटियों एवं प्राकृतिक वातावरण को संतुलित बनाए रखा. स्वतंत्रता से पूर्व समाज के विशिष्ट वर्ग एवं राजा-महाराजा भी इन आदिवासी क्षेत्र से छॆ-छा नहीं किया करते थे. लेकिन अग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों की परम्परागत व्यवस्था को तहस-नहस कर डाला, क्योंकि यूरोपीय देशों में स्थापित उद्योगों के लिए वन एवं वन्य-जीवों पर कहर ढा दिया. जब तक आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक वातावरण में सेंध नहीं लगी थी, तब तक हमारी आरण्यक-संस्कृति बरकरार बनी रही. आधुनिक भौतिकवादी समाज ने भी कम कहर नहीं ढाया. इनकी उपस्थिति से उनके परम्परागत मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों का जमकर ह्रास हुआ है. साफ़-सुथरी हवा में विचरने वाले, जंगल में मंगल मनाने वाले इन भॊले-भाले आदिवासियों का जीवन में जहर सा घुल गया है. आज इन आदिवासियों  को पिछड़ेपन, अशिक्षा, गरीबी, बेकारी एवं वन-विनाशक के प्रतीक के रुप में देखा जाने लगा है. उनकी आदिम संस्कृति एवं अस्मिता को चालाक और लालची उद्योगपति खुले आम लूट रहे हैं. जंगल का राजा अथवा राजकुमार कहलाने वाला यह आदिवासी-जन आज दिहाड़ी मजदूर के रुप में काम करता दिखलायी देता है. चंद सिक्कों में इनके श्रम-मूल्य की खरीद-फ़ारोख्त की जाती है और इन्हीं से जंगल के पेड़ों और जंगली पशु-पक्षियों को मारने के लिए अगुवा बनाया जाता है. उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी कि पीढ़ी दर पीढी से वे जिन जंगलों में रह रहे थे, उनके सारे अधिकारों को ग्रहण लग जाएगा. विलायती हुकूमत ने सबसे पहले उनके अधिकारों पर प्रहार किया और नियम प्रतिपादित किया कि वनॊं की सारी जिम्मेदारी और कब्जा सरकार की रहेगी और यह परम्परा आज भी बाकायदा चली आ रही है.                                                                                                                              

वे अब भी “झूम खेती” करते है. पेड़ों कॊ जलाते नहीं है,जिसके फ़लों की उपयोगिता है. महुआ का पॆ इनके लिए किसी कल्पवृक्ष” से कम नहीं है. जब इन पर फ़ल पकते हैं तो वे इनका संग्रह करते हैं और पूरे साल इनसे बनी रोटी खाते है. इन्हीं फ़लों को सड़ाकर वे उनकी शराब भी बनाते हैं. शराब की एक घूंट इनमें जंगल में रहने का हौसला बढ़ाती है.                           

देश की स्वतंत्रता के उपरान्त पंचवर्षीय योजनाओं की स्थापनाएं, बुनियादी उद्योगों की स्थापनाएं एवं हरित क्रांति जैसे घटकों के आधार पर विकास की नींव रखने वाले तथाकथित बुद्दिजीवियों ने हबड़ाहट में “कानामी” एवं “कालाजी” के सह-संबंधों को भूल जाने अथवा जानबूझकर “इगनोर” करने की प्रवृति के चलते, हमारे सम्मुख पारिस्थितिकी की विकट समस्या पैदा कर दी हैं. समझ से परे है कि विकास के नाम पर आदिवासियों को विस्थापित कर उन्हें घुम्मक की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया है और द्रुतगति से वनों की कटाई करते हुए बड़े-बड़े बांधों का निर्माण करवा दिया है.. यदि आदिवासियों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को भी दृष्टि में रखकर इन सभी योजनाओं का क्रियान्वित किया जाता, तो संभव है कि पर्यावरण की समस्या विकट नहीं होती और न ही प्रकोप होता, जैसा कि अभी हाल ही में आए प्राकृतिक प्रकोप ने “उत्तराखण्ड” को खण्ड-खण्ड कर दिया, बचा जा सकता था. यह भी सच है कि हमें विश्व संस्कृति के स्तर पर देश की अर्थव्यवस्था को  सुदृ बनाते हुए समानान्तर स्तर पर लाना है, लेकिन “अरण्य़ संस्कृति” को विध्वंश करके किये जाने की परिकल्पना कालान्तर में लाभदायी सिद्ध होगी, ऎसा सोचना कदापि उचित नहीं माना जाना चाहिए.

हमें अपने परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक परम्पराओं का विनाश न करते हुए आदिवासियों की  वन एवं वन्य-जीव संस्कृति को बगैर छे-छा किए संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए. एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापन, न तो आदिवासियों को भाता है और न ही वन्य जीव-जन्तुओं को, लेकिन ऎसा बडॆ पैमाने पर हो रहा है, इस पर अंकुश लगाए जाने की जरुरत है. अगर ऎसा नहीं किया गया तो निश्चित जानिए कि वनों का विनाश तो होगा ही, साथ ही पारिस्थितिकी असंतुलन में भी वृद्धि होगी. अगर एक बार संतुलन बिगड़ा तो सुधारे सुधरने वाला नहीं है.                                                             

संविधान में आदिवासियों को यह वचन दिया गया है कि वे अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हुए राष्ट्र की विकासधारा से जु सकते हैं. अतः कड़ा निर्णय लेते हुए सरकार को आगे आना होगा, जिससे उनकी प्राकृतिक संस्कृति पर कोई प्रतिकूल असर न पडॆ.                        

हम सब जानते हैं कि उनकी भूमि अत्यधिक उपजाऊ नहीं है और न ही खेती के योग्य है. फ़िर भी वे वनों में रहते हुए वनॊं के रहस्य को जानते हैं और “झूम”पद्दति से उतना तो पैदा कर ही लेते हैं, जितनी कि उन्हें आश्यकता होती है. यदि इससे जरुरतें पूरी नहीं हो सकती तो वे महुआ को भोजन के रुप में ले लेते हैं या फ़िर आम की गुढलियों कॊ पीसकर रोटी बनाकर अपना उदर-पोषण कर लेते हैं, लेकिन प्रकृति से खिलवा नहीं करते., फ़िर वे हर पौधे-पेड़ों से परिचित भी होते हैं, कि कौनसा पौधा किस बिमारी में काम में आता है, कौनसी जड़ी-बूटी किस बिमारी पर काम करती है, को भी संरक्षित करते चलते हैं.                                                                                                                                                               

विंध्याचल-हिमालय व अन्य पर्वत शिखर हमारी संस्कृति के पावन प्रतीक हैं.. इन्हें भी वृक्षविहीन बनाया जा रहा है.,क्योंकि वनवासियों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा सके. इन पहाड़ियों पर पायी जाने वाली जड़ी बूटियां, ईंधन, चारा एवं आवश्यकतानुसार इमारती लकड़ी प्रचूर मात्रा में प्राप्त होती रहे.. आदिवासियों को जंगल धरोहर के रुप में प्राप्त हुए थे, वे ही ठेकेदारों के इशारे पर जंगल काटने को मजबूर हो रहे हैं.. यद्दपि पर्वतीय क्षेत्रों में अनेकों विकास कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं लेकिन उनका प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरुप से उन्हें फ़ायद होने वाला नहीं है.,                     

आदिवासियों को संरक्षण प्राप्त नहीं होने से केवल वन संस्कृति एवं वन्य-जीव सुरक्षा का ही ह्रास नहीं हो रहा है बल्कि देश की अखण्डता को खंडित करने वाले तत्व अलग-अलग राज्यों की मांग करने को मजबूर हो रहे हैं. इन सबके पीछे आर्थिक असंतुलन एवं पर्यावरण असंतुलन जैसे प्रमुख कारण ही ज में मिलेंगे.                                                                                                                                                         

हमारे देश की अरण्य संस्कृति अपनी विशेषता लिए हुए थी, जो शनैः-शनैः अपनी हरीतिमा खोती जा रही है. जहा-कहीं के आदिवासियों ने अपना स्थान छोड दिया है,वहा के वन्य-जीवों पर प्रहार हो रहे हैं ,बल्कि यह कहा जाए कि वे लगभग समाप्ति की ओर हैं, उसके प्रतिफ़ल में सूखा पने या कहें अकाल पने जैसी स्थिति की निर्मिति बन गई है..फ़िर सरकार को करोड़ों रुपया राहत के नाम पर खर्च करने होते हैं. लाखों की संख्या में बेशकीमती पौधे रोपने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन उसके आधे भी लग नहीं पाते. यदि लग भी गए तो पर्याप्त पानी और खाद के अभाव में मर जाते हैं. जब शहरों के वृक्ष सुरक्षित नहीं है तो फ़िर कोसो दूर जंगल में उनकी परवरिश करने वाला कौन है? हम अपने पड़ौस के देशो में जाकर देखें, उन्होंने प्रभावी ढंग से सफ़लतापूर्वक अनुकरणीय़ कार्य किया है और पेड़ों की रक्षा करते हुए हरियाली को बचाए रखा है.                                                                                                                                               

जब आदिवासियों से वन-सम्पदा का मालिकाना हक छीनक्रर केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों के हाथॊ में चले जाएंगे तो केवल विकास के नाम पर बड़े-बड़े बांध बांधे जाएंगे और बदले में उन्हें मिलेगा बांधो से निकलने वाली नहरें और नहरों के आसपास मचा दलदल और भूमि की उर्वरा शक्ति को कम करने वाली परिस्थिति और विस्थापित होने की व्याकुलता और जिन्दगी भर की टीस, जो उसे पल-पल मौत के मुंह में ढकेलने के लिए पर्याप्त होगी.                                                                                                                                

आदिवासी क्षेत्रों में होने वाले विध्वंस से जलवायु एवं मौसम में परिवर्तन द्रुत गति से हो रहा है. कभी भारत में ७०% भूमि वनों से आच्छादित थी, आज घटकर २०-२२ प्रतिशत रह गई है. वनो के लिए यह चिंता का विषय है. वनों की रक्षा एवं विकास के नाम पर पूरे देश में अफ़सरों और कर्मचरियों की संख्यां में बेतरतीब बढ़ौतरी हुई हैं, उतने ही अनुपात में वन सिकोड़ रहे हैं. सुरक्षा के नाम पर गश्ति दल बनाए गए हैं, फ़िर भी वनों की अंधाधुंध कटाई निर्बाधगति से चल रही है. कारण पूछे जाने पर एक नहीं, वरन अनेकों कारण गिना दिए जाते हैं.,उनमे प्रमुखता से एक कारण सुनने में आता है कि जब तक ये आदिवासी जंगल में रहेंगे, तब तक वन सुरक्षित नहीं हो सकते. कितना बडा लांझन है इन भेले-भाले आदिवासियों पर, जो सदा से धरती को अपनी मा का दर्जा देते आए हैं. वे रुखा-सूखा खा लेते हैं, मुफ़लिसी में जी लेते हैं, लेकिन धरती पर हल नहीं चलाते, उनका अपना मानना है कि हल चलाकर वे धरती का सीना चाक नहीं कर सकते.

 

                 कुहरें में लिपटा आदिवासी अंचल-पातालकोट (छिन्दवाड़ा)

भारत का हृदय कहलाने वाले मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा जिले से 62 किमी. तथा तामिया विकास खंड से महज 23 किमी.की दूरी पर, समुद्र् सतह से 3250 फ़ीट ऊँचाई पर तथा भूतल से 1200 से 1500 फ़ीट गराई में  “कोट” यानि “पातालकोट” स्थित है. जिसमें आज भी आदिवासियों के बारह गाँव सांस लेते हुए देखे जा सकते हैं. यहाँ के आदिवासियों को धरती-तल पर बसाने के लिए कई प्रयत्न किए गए,लेकिन वे इसके लिए कतई तैयार नहीं होते. अतः दोषरोपण मढना कि अदिवासियों की वजह से वन सुरक्षित नही है, एक मूर्खतापूर्ण लांछन है 

    http://1.bp.blogspot.com/-L4kU9nNWlZU/TvMhd5sTmqI/AAAAAAAAAxE/_pycuoVSv04/s320/DSCN4015.jpg  http://t0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQB_MzODLiFWqpgOD480RKmt9MmIgUdHd1acd5jxOBryzlPE7DV

   पातालकोट- एक आदिवासी आराम की मुद्रा में  (२)  पातालकोट का एक विहंगम दृश्य

,अतः सच्चाई का दामन पकड़ना होगा. यदि आदिम लोगो की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए तथा उनकी सक्रीय भागीदारी सुनिश्चित करते हुये उन्हें विकास की योजनाओं के साथ जोड़ दिया जाए तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि आदिम क्षेत्र में पर्यावरण के साथ अन्य भागों कॊ भी सुरक्षित रखा जा सकता है, स्वस्थ पर्यावरण पर सारे राष्ट्र का अस्तित्व एवं भविष्य सुरक्षित रह सकता है और वह प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है.                                                                                                                                                                                                                                                         https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcTQ2qqB96zDO2XWuo3qXh_j7apfPXNOnSEuhIgUhzKRhxgmG-9gyg              http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/0/0b/Farmer_adivasi_with_turban%2C_Umaria_district%2C_M.P.%2C_India_-_cropped.jpg/76px-Farmer_adivasi_with_turban%2C_Umaria_district%2C_M.P.%2C_India_-_cropped.jpg              http://library.ups.edu/gateway/compsoc/csoc230/bushmen.jpg                                http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/9b/Young_Baiga_women%2C_India.jpg/120px-Young_Baiga_women%2C_India.jpg  http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/9/96/Villageois%2C_Bathpura%2C_district_Gwalior.jpg/120px-Villageois%2C_Bathpura%2C_district_Gwalior.jpg         https://encrypted-tbn0.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQOF9HuhcjaKN_uHMH4BXGPAVM99TWJMJFB07K7B3R6yLIg87iekA                                                                                                                                                                                                           

 अन्य जातियां जो जंगलॊं में रहती है.                                                                         

    चित्र १ से ३-गोंड, (४) बैगा औरतें (५) सहरिया (६) कोरकू

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                                           ईश्वरीय सत्ता का सानिद्दय प्राप्त् करने के लिए भगत्गीता                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           गीता अध्ययन करने की अनेक दृष्टियां हैं. सरल मन के व्यक्ति के सामने ईश्वरीय सत्ता किस प्रकार अपने आपको उदघाटित कर रही है.-गीता को समझने के लिए एक दृष्टि यह भी है-भगवान श्रीकृष्ण गीता के उपदेश के माध्यम से अर्जुन के सामने, अपने आपको धीरे-धीरे अनावृत कर रहे हैं. श्रीकृष्ण कहते हैं-अर्जुन ! जो ज्ञान आज मैं तुम्हें दे रहा हूँ, वही ज्ञान सृष्टि के प्रारंभ में मैंने सूर्य को दिया था. अर्जुन को आश्चर्य होता है- वह कहता है-“ हे भगवन ! यह कैसे संभव है ?.आप अत्यन्त ही अर्वाचीन हैं,जबकि सूर्य बहुत ही प्राचीण. तो श्रीकृष्ण कहते हैं-“ अर्जुन, मेरी सत्ता सनातन है. मैं हर समय रहता हूँ. तुम भी हर समय रहे हो ,परन्तु तुमको उसका स्मरण नहीं है और मुझे सब याद है. वे कहते हैं-मैं ही प्रकाश हूँ और मैं ही अन्धकार. ज्ञान भी मैं ही हूँ और अज्ञान भी. मैं ही संपूर्ण सृष्टि का अध्यक्ष, रचयिता और नियंता हूँ. मुझसे परे कुछ भी नहीं है. श्रीकृष्ण में अर्जुन का विश्वास दृढतर होता जाता है और वह निवेदन करता है कि प्रभु, मैं आपको विराटता और विभूतियों के साथ देखना चाहता हूँ. श्रीकृष्ण कहते हैं-मेरे शरीर में संपूर्ण चराचर जगत को देखो. दिव्य आभूषणॊं और गंधों से युक्त अनेक नेत्रों और मुखों वाले मुझ सीमा रहित को देखो. अर्जुन को कुछ भी दिखलाई नहीं पडता. तब  श्रीकृष्ण कहते हैं-  “इन सामान्य नेत्रों से तुम मेरी विराटता देख नहीं सकते. इसके लिए मैं तुम्हें दिव्य प्रदान करता हूँ.” सचमुच्-ईश्वरीय सत्ता, ईश्वरीय विराटता को भौतिक नेत्रों से नहीं, ज्ञान के नेत्रों से ही देखा जा सकता है. अर्जुन के सामने अपना विराट स्वरुप प्रकट कर देने के बाद श्रीकृष्ण का अपने को उदघाटित करने का प्रयोजन पूर्ण हो जाता है.                                                                                                                                                                                                                                  

श्रीकृष्ण का विराट रुप देख लेने के बाद अर्जुन के मन में श्रीकृष्ण के प्रति स्वाभाविक भक्ति जागृत होती है. अब वह वस्तुतः श्रीकृष्ण से निकटता प्राप्त करना चाहता है,परन्तु परमसत्ता की निकटता प्राप्त करने के लिए कुछ प्रयत्न अपनी ओर से करना पडता है. ईश्वर का प्रिय बनने ले लिए हमें अपने व्यक्तित्व में कुछ विशेषताएं धारण करनी पडती है. गीता के बारहवें अध्याय में श्लोक 13 से 20 तक उन मानवीय गुणॊं का वर्णण है,जो व्यक्ति को ईश्वरीय सत्ता का प्रेमपात्र बना देते हैं. द्वेषभावनाहीन, मैत्रीपूर्ण, दयालु,आसक्तिरहित,अहंकारविहीन,सुख-दुख में सम, पक्षपात रहित, मान-सम्मान-अपमान में सम, निंदास्तुति मे सम तथा स्थिर बुद्धि का होना आदि ऐसे गुण हैं,जिन्हें धारण करने वाला व्यक्ति श्रीकृष्ण को प्रिय है. जो व्यक्तिध  हर्ष, शोक, ईर्ष्या, भय और उद्वेग से मुक्त है,वही परमात्मा की निकटता प्राप्त कर सकता है. जो व्यक्ति अन्दर-बाहर से पवित्र् है, अपने कार्य में प्रवीण है,कोई भी जीव जिससे व्यथित नहीं होता और न ही वह कभी किसी जीव से व्यथित होता है, ऐसा व्यक्ति श्रीकृष्ण का प्रेमपात्र बनता है. स्पष्टतः ये महान मानवीय गुण है. श्रीकृष्ण ने इन गुणॊ, की सूची में किसी से द्वेष न करने को पहला स्थान दिय है.

              अद्वेष्टा सर्वभूतानाम- अगर आप किसी से द्वेष करते हैं तो पहला नुकसान आप स्वयं अपने आप का करते हैं. आप बैठे-ठाले अपने मनोवैज्ञानिक उर्जा का क्षरण कराते हैं. मन की शांति नष्ट करते हैं तथा अपने स्वास्थ्य को खराब करते हैं. बरहवें अध्याय के बीसवें शोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति निष्काम –प्रेमभाव से अनुचिन्तन करेगा, वह मुझे अतिशय प्रिय् होगा.

              अतः श्रेष्ठ गुणॊं पर ध्यान एवं दृष्टि रखने से वे गुण व्यक्ति को प्राप्त हो जाते हैं. श्रेष्ठ लोगों के साथ रहने से आदमी की श्रेष्ठता की ओर बढता है. अच्छा साहित्य व्यक्ति को अच्छा बनने की प्रेरणा प्रदान करते हैं. अतः श्रेष्ठ गुणॊं का चिंतन, श्रेष्ठ व्यक्तियों का संग और श्रेष्ठ साहित्य को ही पढना चाहिए.   

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                             41                        एक अबुजी प्यास है फ़ागुन तेरो नाम                                                                                                                    ------------------------------------                                                                                                                                                                                                                                                                                             वसंत-पंचमी के बाद से ही गाँवों में फ़ाग-गीत गाए जाने की शुरुआत हो जाती है .साज सजने लगते हैं और महफ़ीलें जमने लगती हैं. रात्रि की शुरुआत के साथ ढोलक की थाप और झांझ-मंजीरों की झनझनाहट के साथ फ़ाग गाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है. हर दो-चार दिन के अन्तराल के बाद फ़ाग गायी जाती है और जैसे-जैसे होली निकट आती जाती है,लोगों का उत्साह देखते ही बनता है.                                                                                                                                                                             

              अब न तो वे दिन रहे और न ही वह बात रही. तेजी से बढते शहरीकरण और दूषित राजनीति के चलते आपसी सौहार्द और सहयोग की भावना घटती चली गई और आज स्थिति यह है कि फ़ाग सुनने को कान तरसते हैं.                                                                                                                                                                      

              फ़ाग की बात जुबान पर आते ही मुझे अपना बचपन याद हो आता है. बैतुल जिले की तहसील मुलताई,जहाँ से पतीत-पावनी सूर्यपुत्री ताप्ती का उद्गम स्थल है,मेरा जन्म हुआ, और जहाँ से मैंने मैट्रीक की परीक्षा पास की, वह पुराना दृष्य आँखों के सामने तैरने लगता है. जमघट जमने लगती है, ढोलक की थाप, झांझ-मंजीरों की झनझनाहट ,टिमकी की टिमिक-टिन, से पूरा माहौल खिल उठता है. फ़िर धीरे से आलाप लेते हुए खेमलाल यादव फ़ाग का कोई मुखडा उठाते हैं और उनके स्वर में स्वर मिलने लगते है. दमडूलाल यादव,दशरथ भारती, सेठ सागरमल, फ़कीरचंद यादव,श्यामलाल यादव, सोमवार पुरी गोस्वामी, गेन्दलाल पुरी खूसटसिंह, पलु भारती,लोथ्या भारती, भिक्कुलाल यादव (द्वय )और उनके साथियों का स्वर हवा में तैरने लगता हैं. बीच-बीच में हंसी-ठिठौली का भी दौर चलता रहता है. शाम से शुरु हुए इस फ़ाग की महफ़िल को पता ही नहीं चल पाता कि रात के दो बज चुके हैं. फ़ाग का सिलसिला यहाँ थम सा जाता है,अगले किसी दिन तक के लिए.    

              जिस दिन होलीका -दहन होना होता है, बच्चे-बूढे-जवान मिलकर लकडियाँ जमाते हैं. गाय के गोबर से बनी चाकोलियों की माला लटका दी जाती है. रंग-बिरंगे कागजों की तोरणें टंगने लगती है. लकडियों के ढेर के बीच ऊँचे बांस अथवा बल्ली के सिरे पर बडी सी पताका फ़हरा दी जाती है. बडी गहमा-गहमी का वातावरण होता है इस दिन. बडॆ से सिल पर भाँग पीसी जा रही होती है. कोई दूध औटाने के काम के जुटा होता है. जितने भी लोग वहाँ जुडते हैं, सभी के पास कोई न कोई काम करने का प्रभार होता है.                                                                                                                                                                                

              जैसे-जैसे दिन ढलने को होता है,वैसे-वैसे काम करने की गति भी बढती जाती है. साझं घिर जाने के साथ ही एक चमकीला चाँद आसमान पर प्रकट होता है और चारॊं ओर दुधिया रंग अपनी छटा बिखेरने लगता है. अब होलीका दहन वाले स्थान के पास बडी दरी बिछा दी जाती है और लोगों का जमावडा होना शुरु हो जाता है. टिमकी,ढोलक,झांझ,मंजीरें,करताल बजने लगते हैं. फ़ाग गायन शैली सामूहिक गायन के रुप में होता है. फ़ाग गायन की विषय वस्तु द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बृज ग्वालबालों एवं गोपियों के साथ हास-परिहास की शैली प्रच्चलित है.सबसे पहले श्री गणेश का सुमरन किया जाता है. फ़िर कान्हा और राधा के बीच खेली जाने वाली रंग-गुलाल-पिचकारी के मद्धुर भावों को पिरोती फ़ाग गायन की शुरुआत होती है.-                                                                                                                                                                                                                                        

(१)         “चली रंग की फ़ुहार,पिचकारियों की मार                                                                                                                   कान्हा तू न रंग डार, काहे सताए रंग डार के

              राधा पडॆ तोरे पैयां गिरधारी न तू मारे भर-भर पिचकारी                                                                                                 भींगी चुनरी हमार काहे दिया रंग डार                                                                                                                          मैं तो गई तोसे हार,काहे सताये रंग डार के”                                                                                                  

(२)      सारी चुनरी भिंगो दी तूने मोरी                                                                                                                                    मेरे सर की मटकिया फ़ोडी                                                                                                                                        कहूं जा के नंद द्वार तोरो लाला है गंवार                                                                                                       

              करे जीना दुश्वार,काहे सताये रंग डार के” 

(३)         सारे बृज मे करे ठिठौली                                                                                                                                                           लेके फ़िरे सारे ग्वालों की टॊली                                                                                                                                  किन्हे गाल मोरे लाल                                                                                                                                                              डाला किस-किस पे गुलाल                                                                                                                                         मैया ऎसा तेरा लाल,काहे सताये रंग डार के.”         

              फ़ाग गायन का क्राम चलता रहता. स्त्री-पुरुष-बच्चे घरों से निकल आते पूजन करने. फ़िर देर रात होलिका-दहन का कार्यक्रम शुरु होता. बडा बुजुर्ग लकडी-कंडॆ के ढेर में आग लगात्ता और इस तरह होलिका दहन की जाती. पौराणिक मान्यता के अनुसार” हिरणाकश्यप” द्वारा अपने भक्त पुत्र प्रहलाद को “होलिका” में जलाने के प्रयास के असफ़ल हो जाने पर तत्कालीन समाज द्वारा मनाए गए आंदोलन से इसे जोडा जाता है. होलिका दहन के बाद लोग अपने-अपने घर की ओर रवाना हो जाते, इस उत्साह के साथ कि अगले दिन जमकर रंग बरसाएंगे.                                                                                                                                               

सुबह से ही सारे मुहल्ले के लोग बाबा खुसट के यहाँ इकठ्ठे होते. फ़ाग गाने का क्रम शुरु हो जाता. फ़िर आती रंग डालने की बारी. सुबह से ही लोग टॆसू के फ़ूलों का रंग उतारकर पात्रों में जमा कर लेते. इसी रंग से सभी रंग कर सराबोर हो जाते. फ़िर सभी को कुंकुम-रोली लगाई जाती. ठंडाई का दौर भी चल पडता. इस अवसर पर बने पकवानों का भी लुफ़्त उठाया जाने लगता.                                             

              फ़ाग-गायन मंडली हंसी-ठिठौली करती बाबा दमडूलाल के घर जा पहुँचती.वहाँ पहले से ही टॊली के स्वागत-सत्कार की व्यवस्था हो चुकी होती है.एक दिन पहले से ही आंगन को गोबर से लीपकर तैयार कर दिया जाता है. इस दिन बिछायत नहीं की जाती. लोग घेरा बनाकर बैठ जाते. फ़ाग उडती रहती. रंग-गुलाल बरसता रहता. ठंडाई का दौर चलता रहता. पकवानों का रसास्वादन भी चलता रहता. घर का प्रमुख लोगों के सिर-माथे पर तिलक-रोली करता और इस तरह फ़ाग के राग उडाती टॊली आगे बढ जाती. सबसे मिलते-जुलते, रंग –गुलाल में सराबोर होती टोली के सदस्य, अपने –अपने घरों की ओर निकल पडते.                           

              नहा-धोकर लोग चार बजे के आसपास होलिका-दहन वाले स्थान पर आ जुडते. फ़ाग उडने लगती. फ़िर मंडली गाते-बजाते मेघनाथ-बाबा के दर्शनार्थ के लिए बढ जाती.वहाँ उस दिन अच्छा खासा मेला लग जाता. इस तरह सारे गांव की मंडलियां वहाँ जुडने लगती है. लोग एक दूसरे को गले लगाते हैं. 

              इस तरह प्रेम-सौहार्द की भावना से ओतप्रोत यह त्योहार सम्पन होता.                                                                                                                                                                                               

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42.

                                            एक आइडिया:- जो आपकी जिन्दगी बदल दे

 

                             अगर यह कहा जाए कि आदमी विचारों का पुलिन्दा है, तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता. कभी-कभी एक साथ कई-कई विचार साथ चलते रहते है. उसे रोक सकना आदमी के वश में नहीं है. जब कोई विचार या सोच, a thought अथवा कल्पना विस्फ़ोटक बन जाए तो क्रान्तिकारी परिणाम देखने को मिल सकते है. एक उदाहरण हमारे सामने है महात्मा गांधीजी का. हम जैसे साधारण इन्सान ही थे वे ,लेकिन उनके अन्दर जब एक विचार का विस्फ़ोट हुआ तो उसने उनकी दिशा ही बदलकर रख दी. वे एक बरिस्टर की हैसियत से साउथ अफ़्रीका,अपने मुवक्किल का केस लडने के लिए गये हुए थे. उनके पास रेल्वे का प्रथम श्रेणी का टिकिट था, एक अंग्रेज अफ़सर उस कम्पार्ट्मेन्ट में आया और उसने एक भारतीय को उस कोच में सफ़र करते देखा और आगबबुला हो उठा. उसने गांधीजी का सामान बाहर फ़ेंक दिया और उन्हे उतरवा दिया. गांधीजी ने इस बात का विरोध किया .फ़लस्व्ररुप उनके अन्दर एक विचार ने जन्म लिया और उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ़  मोर्चा खोल दिया. परिणाम आप सब जानते हैं. ईस्ट इंडिया कंपनी का सूरज, जो कभी अस्त नहीं होगा, ऎसा माना जाता था ,अस्त हुआ. एक दूसरा उदाहरण हमारे सामने है. आईजक न्युटन बागीचे में बैठा हुआ था, तभी एक सेव नीचे टपक पडा. एक विचार का विस्फ़ोट हुआ और वह यह सोचने पर मजबूर हुआ कि वह नीचे क्यों गिरा ? वह तो ऊपर आसमान में भी जा सकता था. एक जुनून की हद पार करते हुए आखिर उसने एक ऎसा सिद्धांत खोज निकाला और उन्होंने दुनिया को गुरुत्वाकर्शण और गति के नियम दिए. प्रकाश संबंधी सिद्धांत खोजे और पहली परावर्तित दूरबीन बनाई. केल्कुलस की उनकी खोज विज्ञान के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुई. ऎसे एक नहीं अनेको उदाहरण दिए जा सकते है,जो यह सिद्ध करते है कि आदमी ने अपने भीतर की शक्ति को जगाया और नई इबारत लिखी. यह बात अलग है कि हर किसी को एक जैसी स्थितियाँ नहीं मिलती. किसी को दुनिया ने पहले दिन लायक ही नहीं माना और किसी को हर बार हताश किया. कुछ ही ऎसे थे जिन्हें सनकी या नाकाम होने के लिए बने बताया गया.           

                                एक गरीब किसान परिवार में जन्में फ़ोर्ड को बचपन से ही मशीने बनाने का जुनून था. अपने जीवन के सोलहवें बरस मे इन्होंने स्टीम इंजिन और घडियां सुधारने का काम किया .बाद मे कई व्यवसाय किए लेकिन उन्हें सफ़लता नहीं मिली. सहसा फ़ोर्ड के मन में एक विचार आया कि क्यों न एक ऎसी कार का निर्माण किया जाए जिसका उत्पादन और उपयोग बडे पैमाने पर हो और वह आम आदमी के पहुँच मे भी हो. उन्होंने आठ सिलेन्डर वाला एक इंजन बनाया. वे लगातार इस प्रयोग में जुटे रहे .अंततः वे इसमे सफ़ल हो सके. आज उनकी बनाई कारों पर दुनिया चलती है.                                                                                                                           

                                  सैम जाँन्सन के पिता किताबें बेच कर घर चलाते थे. बचपन में बीमारी की वजह से इनका चेहरा विकृत हो गया और एक आंख खराब हो गई. लेकिन पढने के धुन के पक्के सैम  १९-२० बरस की उम्र मे आँक्सफ़ोर्ड पढने गए, लेकिन पैसों की तंगी की वजह से बिना डिग्री लिए वापस लौट आए. सन १७३६ मे एक स्कूल खोला, लेकिन नही चल पाया. वे लंदन आ गए और पत्रकारिता करने लगे. दूसरों के नाम से किताबें लिखीं. यश-प्रतिष्ठा तो  मिली लेकिन पैसा नहीं. लगातार आठ साल तक कडी मेहनत के बाद उन्होंने अंग्रेजी भाषा की डिक्शनरी तैयार की और देखते ही देखते प्रसिद्धि पर जा पहुँचे. १० वीं शताब्दी के प्रख्यात आलोचक,लेखक,पत्रकार और कवि के रुप मे वे जाने जाते है. अंग्रेजी भाषा उनके शब्दकोश के लिए सदैव ऋणी रहेगी.                                                                                                                                                                                                                                                               क्रिस्टोफ़र कोलंबस की जुनून भारत को खोजने की थी. इस विचार को सुनने के बाद से वे कई बार हंसी के पात्र बने .लेकिन धुन के धनी कोलंबस का मानना था कि यदि पृथ्वी गोल है तो वे उसे खोज निकालेंगे. उस समय उनकी उम्र महज सतरह साल की थी. उन्होंने जी तोड मेहनत की,लेकिन सफ़लता अभी कोसॊं दूर थी. उन्होंने स्पेन की महारानी से जहाज मांगे. जहाज तो मिल गए पर सनकी समझे जाने वाले कोलंबस को किसी ने साथ नहीं दिया. अंततः उन्होने ८८ कैदियों को साथ लिया और यात्रा पर निकल गए. भारत तो वे खोज नहीं पाए लेकिन अमेरिका को खोज निकाला.

                             कार्ल मार्कस का भी जीवन संघष में बीता. पिता ने व्यावसायिक हित साधने के लिए यहूदी धर्म छोडकर ईसाई धर्म अपना लिया. इसका व्यापक प्रभाव उन पर पडा और धर्म के नाम पर चिढ पैदा हो गई. उग्र विचार और क्रान्तिकारी गतिविधियों के चलते उन्हे जर्मनी फ़िर बेल्जियम और फ़ांस से निर्वासित किया गया. पैसों की तंगी तो थी ही. उसी समय उनके पुत्र का देहावसान हुआ तो कफ़न तक के पैसे उनके पास नहीं थे. इन तमाम परेशानियों के चलते उन्होंने दास केपिटल लिखा ,जिसने दुनिया की तस्वीर ही बदलकर रख दी. पहला साम्यवाद का पाठ उन्होंने दुनिया को पढाया.

                             जार्ज वाशिंगटन की शुरुआत एक सैनिक के रुप में हुई.  सैन्य प्रमुख के पद तक पहुँचे जार्ज की प्रेरणा और नेतृत्व की वजह से साधनहीन सेना ने अंग्रेजी सेना पर जीत दर्ज कर लोकप्रिय हुए. जब उनका चुनाव राष्ट्रपति पद के लिए हुआ तो पडॊसी अमीर से ६०० डाँलर का कर्ज लेना पडा. हकलाहट के बावजूद चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने. राजनीति के अलावा साहित्य,इतिहास और सैन्य अभियानों पर लिखी किताबॊं की वजह से उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला .किंगस्टीफ़न को सिंड्रेला की तर्ज पर एक अलौकिक शक्तियों वाली एक लडकी की कहानी लिखने का विचार आया. कुछ लिखने के बाद विचार आया कि यह लोकप्रिय नहीं होगा तो उन्होंने उसे रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया लेकिन पत्नि के प्रोत्साहन ने उन्होंने उसे पूरा किया.: “कैरी” नाम से प्रकाशित यह उपन्यास १९७३ मे प्रकाशित हुआ और उन्हें चार सौ डाँलर मिले. उस उपन्यास के पैपरबैक संस्करण की रिकार्ड तोड बिक्री हुई और सफ़लता की उंचाइयों तक जा पहुँचे. वे पहले लेखक थे जिनकी तीन पुस्तकें एक साथ न्यूयार्क टाइम्स की बेस्टसेलर लिस्ट में थी. पांच उपन्यास लिख चुके जाँर्ज बनार्ड शाँ ने असफ़लता से निराश होकर नाटक लिखे और अंततः सफ़लता का स्वाद चखा. इसी तरह ग्राहम बेल, बाँस्टन यूनिवर्सिटी मे बधिरों की भाषा सिखाते थे. सिखाते-सिखाते उन्हें एक लडकी से प्रेम हो गया. वह कानॊं से बहरी थी. वे कोई ऎसा यन्त्र बनाना चाहते थे  जिसकी मदद से उनकी प्रेमिका सुन सके. और उन्होने टेलीफ़ोन का अविष्कार कर डाला. कभी लकडहारे बने तो कभी सर्वेयर ,तो कभी छोटे से गांव के पोस्ट्मास्टर रहे अब्राहम लिंकन अमेरिका के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति हुए.

                             बिडला समूह के संस्थापक श्री घनश्याम दास बिडला की शिक्षा महज पांचवी तक ही हुई थी. लेकिन उनके मन में एक सफ़ल उद्धॊगपति बनने का जज्बा था. उन दिनों अंग्रेज जूट का व्यापार करते थे .उन्होंने बिडलाजी को ॠण देने से मना कर दिया. मशीने भी दूगनी कीमत मे खरीदनी पडी ,लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और संघर्‍षॊं से लडते हुए मंजिल की ओर बढते रहे. १९८३ में अपनी मृत्यु के समय बिडला समूह की २०० कंपनियों और २,५०० करोड की संपत्ति के मालिक थे.

                             माननीय अब्दुल कलाम आजाद को कौन नही जानता. गरीब मछुआरे के बेटे अब्दुल कलाम ने बचपन में अखबार बेचे. आर्थिक तंगी के बीच उनकी पढाई हुई. अपनी कल्पनाशीलता के कारण ही उन्होंने भारत की प्रोद्दोगिकी के क्षेत्र में अनेक सफ़लताएं हासिल की और वे भारत के राष्ट्रपति भी bbबने. आज वे मिसाइल पुरुष के नाम से जाने जाते है. धीरुभाई अंबानी, लक्षमी मित्तल, नारायणमूर्ति सहित कई नामी गिरामी व्यक्ति हुए जिन्होने  अपनी सफ़लता के झंडे गाडे. प्रमुखता से यहाँ अमिताभ बच्चन को याद करना प्रासंगिक होगा. सदी के महानायक के रुप मे विख्यात अमितजी ने भी कम पापड नहीं बेले. अभिनेता बने अमितजी ने अपनी कंपनी ए.बी.सी.एल का गठन किया और करोडॊं  के कर्जदार हो गये. लेकिन उन्होंने कभी हौसला नहीं हारा और आज प्रसिद्धि की बुलंदियों पर खड़े हुए है.  प्रसिद्ध कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी जी से उन्होंने विरासत में संघर्ष करने और कभी न हार मानने का जो गुरुमंत्र दिया था, उसके बल पर चलते हुए उन्होंने यह कमाल कर दिखाया है. द्विवेदी जी की यह कविता यहाँ उल्लेखित है जो हारे हुए मन को संयम तथा कडे परिश्रम का पाठ पढाती है.. वे लिखते हैं

              हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती//लहरों से डरकर नैय्या पार नहीं होती//नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है//चढती दीवारों पर सौ बार फ़िसलती है//मन का विश्वास रगो में साहस भरता है//चढकर गिरना, गिरकर चढना न अखरता है//आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती// कोशिश करने वालों की हार नहीं होती//डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है// जा-जाकर खाली हाथ लौट आता है//मिलते न सहज ही मोती पानी में//बढता दूना उत्साह इसी हैरानी में//असफ़लता एक चुनौती है,स्वीकार करो//क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो// जब तक न सफ़ल हो, नींद चैन की त्यागो तुम// संघ‍र्ष करो, मैदान छॊडकर मत भागो तुम// कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती// हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती//                                 

              बच्चॊं...इस लेख में कुछ ऎसे लोगों की चर्चा की गई है जिन्होनें कडी मेहनत के बल पर सफ़लताऎं अर्जित ही थी .हमें भी इन्हीं राहों पर चलना होगा. याद रखें..जीवन संघर्षमय है. कभी सफ़लता तो कभी असफ़लता हमें मिलती है. सफ़ल हो जाओ तो अभिमान मत करो ,बल्कि अपने साथी को भी आगे बढने के लिए उत्प्रेरित करो. असफ़ल हो जाओ तो पीछे मुड कर देखो और खोजो कि वे क्या कारण थे कि मैं असफ़ल क्यों हुआ. गलतियों में सुधार करो और उसी गति और उत्साह से पथ-निर्माण में लग जाओ. तुम देखोगे कि सफ़लता तुम्हारा कभी से इंतजार कर रही थी. दुनियां में आज जितनी विलासिता की सामग्री पडी मिलती है, यह जान लो कि कहीं ये तुम्हारे पांव की बेडियां न बन जाये. फ़िसलन बहुत है. होशियारी से कदम बढाये जाने की जरुरत आज ज्यादा है .कोर्स की किताबे तुम्हें परीक्षा में पास जरुर करवा देगीं, लेकिन केवल चार अक्षर पढ लेने मात्र से जीवन नहीं चलता .जहाँ से भी हमें अच्छी-अच्छी बातें पढने को मिले,उन्हें भी आत्मसात  करते चलो. कोई भी ऎसा काम मत करो, जिससे तुम्हारे अभिभावकॊं का सर शर्म से झुक जाए. और अंत में एक जरुरी बात. और वह यह कि खुद के लिए तो हर कोई जीता है, लेकिन औरों के लिए भी जीना सीखॊ.

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                                कथा साहित्य में मध्यप्रदेश का योगदान                                                                                                                                                                                                            

तकरीबन ढाई-तीन दशक तक कविता की कुंज-वाटिका में रमण करते रहने के बाद मैंने कहानी जैसी कठोर भूमि पर चलने का दुस्साहस किया था. यह अनायास नहीं बल्कि सायास हुआ था. होता यह था कि वरिष्ठ होने के कारण किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अथवा अध्यक्ष बना दिया जाता. काव्यपाठ में सहभागिता करने वाले मित्रगण अपनी कविता सुनाते और फ़िर लघुशंका का इशारा करते हुए अपनी जगह से उठ खडॆ होते. और एक बार कमरे के बाहर कदम रखते तो फ़िर दुबारा लौटकर नहीं आते. एक तो यह कारण था और दूसरा यह कि उस समय तक मैं छॊटी-मोटी पत्र-पत्रिकाओं में शान से छप रहा था. मन में तरंग उठी कि किसी बडी पत्रिका में अपना भाग्य आजमाऊँ. मैंने एक आलादर्जे के संपादक के नाम, जो मेरे आदर्श रहे हैं, कुछ कविताएँ भेजी कि इसे अपनी पत्रिका में स्थान दें. जब उनसे प्रत्यक्ष भेंट हुई तो उन्होंने कहा कि अब इस तरह की कविताओं के दिन फ़िर गए हैं, यदि कोई अकविता लिखी हो तो भेजे, उसे स्थान जरुर मिल जाएगा. आपको शायद याद होगा कि यह वह समय था जब कविता औरअकविता के बीच एक अघोषित युद्ध चल रहा था. मैंने उसमे हाथ आजमाया लेकिन मैं उसमें सफ़ल नहीं हो पाया. ऎसा भी नहीं है कि मैंने उस तरह की कविताएं नहीं लिखी. लिखी जरुर लेकिन वे विष्णु खरे, लीलाधर मंडलोई, चन्द्रकांत देवताले, अथवा मोहन डहेरिया जैसी लिखी तो बिल्कुल भी नही गई थी. मेरे लिए एक निराशा का समय था यह. फ़िर मैंने कहानी लिखने का मानस बनाया. मेरी पहली कहानी” एल मुलाकात” जो शुरु से ही एक रहस्य लिए हुए होती है जो अंत तक रहस्यमयी बनी रहती है. इसका नायक “समय” होता है, से अचानक मुलाकात होतीहै. वह मेरे बारे में सब कुछ जानता है और मुझसे कहता है कि मैं  तेरा बचपन का साथी हूँ. लंबे समय तक साथ  बने रहने के बाद भी मैं उसे पहचान नहीं पाता हूँ. कहानी के अंत में एक अप्रत्याशित घटना घटती है और वह सारे रहस्यों पर से पर्दा उठाता है. यह कहानी “कहानी” के क्षेत्र में अत्यंत सफ़ल कहानी रही. मुझे काफ़ी प्रशंसाएं मिली और अनेकानेक पत्र पाठकों से प्राप्त हुए. इस कहानी के सफ़लतापूर्वक लिखे जाने के बाद से मेरे मानस पटल पर छाया कुहासा छटने लगा था. इसके बाद मैंने पीछे मुडकर नहीं देखा. मेरा पहला कहानी संग्रह “ महुआ के वृक्ष” पंचकुला हरियाणा से प्रकाशित हो कर आया. उस संग्रह पर लगभग पैंसठ समीक्षाएं मुझे प्राप्त हुईं. पाठक मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भोपाल से मेरे कथाकार मित्र श्री मुकेश वर्मा, श्री बलराम गुमास्ता श्री बलराम गुमास्ता, श्री मोहन सगोरिया, नागपुर से श्रीमती इंदिरा किसलय ने आकर उसे ऊँचाइयाँ दी. सभाग्रह में करीब ढाई सौ मित्रों की उपस्थिति रही. दूसरा संग्रह “तीस बरस घाटी” वैभव प्रकाशन रायपुर से प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन भोपाल के मंत्री-संयोजक सम्मानीय श्री कैलाशचन्द्र पंतजी ने दो शब्द लिखे और इस संग्रह का विमोचन देश के प्रख्यात कवि-मंत्री-सांसद सम्मानीय श्री बालकवि बैरागीजी के हस्ते “हिन्दी भवन”भोपाल में हुआ. यह मेरे लिए अब तक की सबसे बडी सफ़लता थी. तीसरा कहानी संग्रह “ आसमान अपना-अपना” शैवाल प्रकाशन गोरखपुर में प्रकाशाधीन है. इसी बीच लगभग सौ लघुकथाएं भी मैंने लिखी है और इसे पुस्तकाकार होने में समय लग सकता है. इस लघुकथाओं पर भी माननीय श्री पंतजी ने अपना आशीर्वाद दो शब्द लिखकर दिया है. मेरी प्रायः सभी रचनाएं देश-प्रदेश की हर बडी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं  है. इससे लाभ यह हुआ कि मेरे हर प्रांत में मित्र्रों की फ़ौज खडी हो गई हैं. जगह-जगह से मुझे आमंत्रित किया जाता है और इस तरह करीब अठारह संस्थाओं ने मुझे सम्मानीत किया है. इसका सारा श्रेय मैं पंतजी को देना चाहता हूँ. अगर मेरा जुडाव राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से न हुआ होता तो शायद ही मैं इतनी ऊँचाइयाँ छू नहीं सकता था.

              मित्रों, मैंने अब तक करीब तीस समीक्षाएं लिखी है. जब कहानी लिखने का मन नहीं होता है तो विभिन्न विषयों पर लेख-आलेख लिखता रहता हूँ. आज इन्टर्नेट का जमाना है, विभिन्न ईमेल पत्रिकाओं में  इनका प्रकाशन होता रहता हैं. अब तो कुछ विदेशी ईमेल पत्रिकाओं में भी मेरी कहानियाँ, लघुकथाएँ लेख-आलेख प्रकाशित होते रहते हैं.

              देश के ख्यातनाम कहानीकारों की कहानियों के अलावा प्रदेश के अनेक कहानीकारॊं को पढने का सुअवसर मिला है.पद्मश्री मान.श्री रमेशचन्द्र शाहजी, श्रीमती ज्योत्सना मिलन, गोविन्द मिश्रजी, रमेश दवेजी,श्रीमती मेहरुन्निसा परवेज जी,महेश अनघ, सूर्यकांत नागर,शशांक, भालचन्द्र जोशी, ए असफ़ल, राजेन्द्र दानी, ज्ञानरंजनजी, हरिभटनागर, तरुण भटनागर, अजीत हर्षे, स्वाति तिवारी ,उर्मिला शिरीष, उदयन बाजपेयी, युगेश शर्माजी, मालती शर्माजी, मालती जोशीजी,  उदयप्रकाश, रामचरण यादव, .रामसिंह यादवजी, डा.पुन्नीसिंहजी, अमरनाथजी, नवल जायसवालजी, प्रभु जोशीजी, ध्रुव शुक्लजी, छिन्दवाडा के श्री हनुमंत मनघटेजी, दिनेश भट्टजी,  राजेश झरपुरेजी, स्व. मनीषरायजी, आदि-आदि ,फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी हो सकती है. ये सारे कथाकार अपनी लेखनी के बल पर पूरे देश में जाने जाते हैं. इन सबकी कहानियाँ जहाँ अपने काल का अक्स प्रस्तुत करती हैं वहीं वे समाज की विकृतियों को दूर करने का आगाह भी करती है. या यह कहें   कि समग्र अर्थों में अपने युग की कडवी सच्चाई को प्रस्तुत करने का सफ़ल कार्य कर रही हैं. माननीय रमेशचन्द्र शाहजी की कहानी “ अभिभावक” पश्चिमी माडल पर आधारित आज की शिक्षा प्रणाली, अभिभावकों की दोहरी मानसिकता और उच्च आकांक्षाओं के बीच पिसते बच्चो के बचपन का मार्मिक विवेचन करती है. आपकी लेखनी का जादू पाठक के दिल-दिमाक पर गहरा असर डालती है, वहीं आपकी शब्द संपदा, शब्द सामर्थ्य, चिंतन बोध, भाषायी सुचिता की बानगी देखते ही बन पडती है. निःसंदेश यह आपके धीर-गंभीर लेखन का परिणाम है. ज्योत्सना मिलनजी की कहानी “चीख के उस पार” प्रभावशाली है. उर्मिला शिरीष की कहानी “तमाशा” एकदम नए विषयवस्तु पर लिखी समाज की सच्चाई को बयां करती महत्वपूर्ण कहानी है. सम्मानीय श्री रमेश दवे की कहानी  “भुल्लकड”  रिटायरमेंट पर लिखी कहानी है, उसी तरह आपकी एक कहानी “खबरें”आज के अखबारों में पसरी मानसिक उदासी को प्रस्तुत करती है. कि अब अखबार पढने की चीज नही रह गयी है. कहानी का नायक अपनी पत्नि गायत्री से कहता है—नहीं-नहीं गायत्री अब खबरे नहीं पढी जाती-अच्छा तो कल से अखबार बंद कर दो” काफ़ी गहरा असर पाठकों के दिल-दीमाक पर छोडती है. मालती जोशी की कहानी “विषपायी” बेटी-बेटे के बीच दृष्टिभेद पर लिखी मार्मिक कहानी है, जिसने समाज का बेडा गर्क कर दिया है. मेहरुन्निसा परवेज की कहानी “ अपने होने का अहसास” अंधविश्वास पर लिखी कहानी है. सूर्यकांत नागर की कहानी “विभाजन” तथा बेटियां” प्रभावकारी है.श्री ज्ञानरंजनजी की कहानी “पिता” पिता पर लिखी अब तक की तमाम कहानियों पर भारी पडती है. मंगला रामचन्द्रण की कहानी “मिन्नी बडी हो गई”-“भावनाएं अपाहिज नही होतीं,” “हम होंगे कामयाब”, श्री मुकेश वर्मा की कहानियां खेलणपुर, साक्षात्कार, होली, न्यायाधीश, रात, अन्ना, कस्तवार प्रभावशाली है. इस पर मैंने समीक्षा भी लिखी थी.

                            साहित्य समाज का दर्पण तो है ही साथ ही वह एक ऎसा प्रकाश स्तंभ भी है जो समाज को दिशा दिखाने का कार्य भी संपादित करता है. उसका कारण यह है कि साहित्य में जहाँ एक ओर जीवन के लिए आदर्शों की प्रस्तुति की गुंजाइश होती है, तो दूसरी ओर वह समाज में व्याप्त               आनियमितताओं, विकृतियों, प्रतिकूलताओं रोजमर्रा की कशमकशताओं, उसमें बिंधी इच्छाएं,               आकांक्षाएं, विस्मृतियों, विडम्बनाओं, उत्पीडन, तथा अन्यान्य बुराइयों पर प्रहार करने का माद्दा भी होता है.                                         

                             जहाँ तक समकालीन कहानियों का प्रश्न है तो इस समय की कहानियां समग्र अर्थों में अपने युग की कडवी सच्चाई को प्रस्तुत करने का सफ़ल कार्य कर रही है, वह आम आदमी के पक्ष में खडी दिखाई देती है. वर्तमान समय में जहाँ चारों ओर भ्रष्टाचार ताडंव कर रहा है, जहां बलात्कार मामुली सी चीज बन कर रह गई है, जहां भूख, कराह और विसंगतियों का माहौल है, समकालीन लेखकों द्वारा अधिकारपूर्वक कलम चलाई जा रही है.आज की समकालीन कहानिया जहां एक ओर साम्प्रदायिकता के विरुद्ध शंखनाद छेडॆ हुए है. वहीं वह ‌ईष्या, द्वेष, झूठ ,छल, फ़रेब, राजनीति में अपराधिकरण, जनप्रतिनिधियों का चारित्रिक पतन ,गिरते जीवन मूल्यों, आहत होती भावनाओं पर जमकर लिखा जा रहा है.

                             उपरोक्त उदाहरणॊ से यह बात स्पष्ट होती है कि आज के कथाकार अपने दायित्वों का निर्वहन बडी शिद्दत के साथ कर रहे हैं अतः यह कहा जाना की आज की कहानियों में समकालीनता बोध का किंचित भी अभाव है,तो यह सर्वथा अनौचित होगा. यह बात निर्विवादरुप से कही जा सकती है कि आज की कहानियां युगानुरुप है, बल्कि वर्तमान की आवश्यक्ताओं के अनुकूल भी है.

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कविता की दुनिया :  दुनिया की कविता.

 

कविता की दुनिया:- कवियों द्वारा निर्मित एक ऎसे अनोखी  और विराट दुनिया, जिसमें पूरा अखिल ब्रह्मांड समाया हुआ है. यहाँ वह सब कुछ है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. तभी तो किसी ने कहा है कि- जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि. प्रश्न उठना जालमी है कि आखिर कविता होती क्या है, इसका जन्म कहाँ, कब और कैसे हुआ?. कहते हैं कि कविता का जन्म महर्षि वाल्मिक के समय में हुआ था. एक समय वे तमसा नदी से स्नान कर वापिस लौट रहे थे. इसी बीच एक क्रौंच पक्षी का जोड़ा मैथुन क्रिया में निमग्न था. पक्षी के वध के लिए घात लगाए बहेलिये ने उन पर बाण का संधान किया, जिससे एक क्रौंच पक्षी मारा गया. और दूसरा अपने प्रिय के वियोग में क्रंदन करते हुए विलाप करने लगा. महर्षि ने इसे देखा और तत्काल श्राप दे दिया. श्राप देते समय उनके मुख से ये श्लोक निकले.

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।

निषाद, त्वम् शाश्वतीः समाः प्रतिष्ठां मा अगमः, यत् (त्वम्) क्रौंच-मिथुनात् एकम् काम-मोहितम् अवधीः

हे निषाद, तुम अनंत वर्षों तक प्रतिष्ठा प्राप्त न कर सको, क्योंकि तुमने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से कामभावना से ग्रस्त एक का वध कर डाला है । 

उपरोक्त वाक्य जो आठ-आठ अक्षरों के चार चरणॊं, कुल बतीस अक्षरों से बना था. इस छंद को श्लोक नाम दिया गया. यही श्लोक काव्य-रचना का आधार बना.

साहित्य के पुरोधा आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है. सृष्टि के पदार्थ या व्यापार विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष, नेत्रों के सामने नाचने लगते है. उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने से बुद्धि से काम लेने की जरुरत नहीं पड़ती. कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते है.

आचार्य विश्वनाथ कहते हैं कि “वाक्यम रसात्मकं काव्यम” अर्थात रस की अनुभूति कर देने वाणी काव्य है. पंडितराज जगन्नाथ का मत है कि- “लोकोत्तरानन्ददाता प्रबंध काव्यानाम यातु” यानि लोकोत्तर आनंद देने वाली रचना ही काव्य है. आचार्य श्रीपति के शब्दों में-“ शब्द अर्थ बिन दोष गुण अंहकार रसवान : ताको काव्य बखानिए श्रीपति परम सुजान”.

महर्षि वाल्मिक के प्रसंगानुसार कविता में केवल एक ही रस “करूणा” का नहीं रहता बल्कि उसमें श्रृंगार, हास्य, रौद्र, वीर, भयानक, विभत्स, अद्भुत और शांत रस भी अन्तरनिहित होता है. अतः आचार्य विश्वनाथ जी का कथन ““काव्यम रसात्मकं काव्यम”-सही साबित होता है.

काव्य की इस रहस्यमय दुनिया में प्रवेश करते हुए मुझे देशज कवियों के अलावा विश्व के अनेकानेक कवियों की कविताओं को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. प्रायः सभी की कविताओं में घर परिवार, अनिश्चितताएं, अनिर्णय, दुनिया की जरुरतें, साहस, विफ़लताएं, स्वपन-प्रेम, आत्मग्लानियां, हताशाएं, सुख-दुख, निर्ममता, इंसानियत, हैवानियत, खूंखार दरिन्दों के जुल्म आदि के पुट देखने को मिलते है. यह सब पढ़ते हुए मुझे नीदा फ़ाजली जी का एक शेर याद आता है. वे कहते हैं- इन्सान में हैवान यहाँ भी है, वहाँ भी, अल्लाह निगहबान, यहाँ भी है, वहाँ भी है, खूंखार दरिन्दों के फ़कत नाम अलग है, शहरों में बयाबान, यहाँ भी है, वहाँ भी है. रहमान की कुदरत हो, या भगवान की मूरत, हर खेल का मैदान, यहाँ भी है, वहाँ भी है, हिन्दू भी मजे में हैं, मुसलमां भी मजे में है, इन्सान परेशान, यहाँ भी है, वहाँ भी है, उठता है दिलोजां से धुँआ दोनों तरफ़ ही, ये मीर का दिवान, यहाँ भी है, वहाँ भी है.

प्रकृति ने हर इन्सान को कवि हदय बनाया है. यह बात अलग है कि हर कोई कविता नहीं लिख सकता. फ़िर कविता लिखना इतना आसान भी नहीं है कि हर कोई उसमें निष्नात हो जाए. शायद इन्हीं भावनाओं को रेखांकित करती हुई चेकोस्लाविकी कवियत्री ने एक जगह लिखा है-: फ़िर फ़ूलदान में मैंने एक गुलाब लगाया...एक मोमबत्ती जलाई...और अपनी पहली कविताएँ लिखना शुरु किया...जागो, मेरे शब्दों की लपट...ऊपर उठो...चाहे जल जाएं मेरी उँगलियाँ.

इस आलेख में मैंने विश्व के कुछ चुनिंदा देशों के कवियों के साथ-साथ यहाँ के कुछ कवियों का भी चुनाव किया है. इन कविताओं को पढ़कर आपको यह महसूस होगा कि समूचे विश्व में एक से हालात हैं, जिनसे विरुद्ध खड़े होकर उसने अपने स्वर मुखरित किए हैं.

 

हंगरी             कवि          --           अत्तिला योजेफ़ (1905-1937)

लोग मुझे चाहेंगे. - अच्छे और बुरे को लेकर मैं मथापच्ची नहीं करता  / काम करता हूं और खटता हूं, बस / बनाता हूं मैं पंखे से चलने वाली नावें, चीनी मिट्टी के प्याले-प्लेटें / बुरे वाक्तों में बुरी तरह, औसत वक्तों में अच्छी तरह / अनगिनत हैं मेरे कारखाने,सिर्फ़ मेरी प्यारी / उनकी फ़िक्रमंदी करती है, उनका हिसाब-किताब रखती है. / मेरी प्यारी ही उस सबका हिसाब-किमाब करती है / उसमें विश्वास है, लेकिन पंथ और सौगंध के सम्मुख वह चुप रहती है./ मुझे दरख्त बनाओ, यकीनन कौआ, तभी मुझ पर घोंसला डालेगा / जब आसपास और कोई दरख्त न हो

फ़िनिश       कवि    -           आउलिक्की ओकसानेन

दूसरा पल --कहीं है दूसरा पल, / दूसरी तरह की जलवायु, / दूसरा समुद्र, दूसरा द्वीपसमूह / कुछ ऎसा, जिसे जीते हुए अनुभव किया जाता है / जब गहराइयों का पानी परावर्तित होता है / तरंगों में गोता लगा गए शुष्क मेघ / कहीं है दूसरा भ्रमण / अज्ञात पक्षियों की दुनिया / हल्का सा सरकंडे का पुल ग्रीष्मों और पक्षियों के घोंसलों के ऊपर से, / शांत आकाश, सुखद संध्या, / देश जहाँ गीत सो रहे हैं  /  नक्षत्रों के किनारों पर, अप्रत्याशित से भयभीत हुए बिना,

               कवि-२          किर्सी कुन्नास ( अनुवाद:सईद शेख)

पेड़ ढोते हैं प्रकाश---पेड़ ढोते हैं प्रकाश / लेकिन मौन एक हल्का सा पक्षी / उड़ता है पानी के ऊपर से / पेड़ ढोते हैं प्रकाश / लेकिन धूसर पंख उठता है पानी और आकाश से / मौन, हल्का सा पक्षी / बैठ जाता है पेड़ों पर और सुलगा देता है अपना घोंसला, / आग के रूप में प्रकाश उठता है आकाश की ओर / न ही ढो सकता है कोई भी अपने हृदय को हल्केपन से / क्योंकि प्रेम होता है पीड़ामय / ठीक जैसे पक्षी का एकमात्र गीत.

कोरिया    कवि.    -                 रा.हीदुक ( Ra Heeduk) (अनुवाद-दिविक रमेश)

एक और पत्ता.     अपना दर्द छिपाने को / तोड़ती रही हूं पत्ते / इसीलिए नंगे हैं वृक्ष / और इसीलिए इतना थोड़ा पक्षी-गीत / पर कैसे छिपा सकती हूं सूखे पत्ते से / सीमेंट के फ़र्श का भद्दापन ? / कैसे खत्म कर सकती हूं कोलाहल / पक्षी-गीत से भरी गली का ? तब भी नहीं थमेंगे मेरे होंठ हिलने से / सो करती हूं इकठ्ठा पत्ते और पक्षी गीत / एक और पत्ता गिरता है मेरे पैर पर / उड़ जाता है वह पक्षी जिसकी आवाज खो गई थी.

यूनान       कवि.                             कंस्तान्तिन कवाफ़ी (अनुवाद-अनिल जनविजय)

दिसम्बर 1903 …..     जब मैं बात नहीं कर पाता अपने उस गहरे प्यार की / तेरे बालों की, तेरे होंठों की, आंखों की, दिलदार की / तेरा चेहरा बसा रहता है मेरे दिल के भीतर तब भी / तेरी आवाज गूंजा करती है, जानम, मेरे मन में अब भी / सित्म्बर के वे दिन सुनहले, दिखाई देते हैं सपनों में / मेरी जुबान तो ओ प्रिया, बस गीत तेरे ही गाती है / रंग-बिरंगा रंग देती है तू मेरी सब रातों को अपनों में / कहना चाहूं जब कोई बात, बस, याद तू ही तू आती है.

फ़्रांस       कवि              लुई आरागों. ( अनुवाद हेमन्त जोशी    

पूर्वाग्रह…          मैं चमत्कारों के बीच नाँचता हूं / हजारों सूर्य रंगते हैं आकाश / हजार दोस्त, हजार आंखें या एक चश्म / अपनी निगाहों से मुझे देते हैं आकार / राहों पर जैसे रोया हो तेल / सायबान के बाद से खोया है खून / ऎसे मैं कूदता हूं एक दिन से दूसरे तक / बहुरंगी गोल और खूबसूरत / जैसे धनुष का जाल हो या रंगों की आग / जब लौ का रंग है हवा-सा / जीवन ओ ! शांत स्वचलित वाहन / और आगे दौड़ने का आनन्दमायी संकट / मैं जलूंगा रोशनी की आग से.

                      कवि-२                  (२) पाल एल्युआर.

मेरे नयन / शांत कभी थे ही नहीं / सागर के उस विस्तार को देखते हुए / जिसमें मैं डूब रहा था / अंततः सफ़ेदे झाग उठा / भागते कालेपन की ओर / सब मिट गया.

रुस        कवि                        युन्ना मोरित्स. (अनुवाद-शीतांशु भारती.)

वहां है- हवा,सूरज,तारे और चाँद / वहां है-हवा, पत्तियों की डालियाँ / तारों में आसमान / वहाँ है-हवा, ऊंचाइयाँ लम्बाइयाँ / और गहराइयाँ. / वहाँ है प्रेम, वहाँ है-हवा, हवा, हवा / वहाँ है सब जो मैं आपको देना चाहती हूं. // बाकी आप सुन लीजिए / गाने वाली चिड़ियों से, फ़ुर्तीली छिपकलियों से / विवश हो जाएं कहने को / चीतल, हाथी, चमगादड़ / घोंघें संग ततलियां . /और बाबा आदम के जमाने की / समुद्री मछलियाँ // बात कीजिए / छुड़मुड़यों से, गुल्बहारों से / सुनिए, इन्हें भोर से सांझ तक. / पर मैं न दूँगी आपको / किसी भी घोर यातना के डर से / किसी पुनरजन्म के वादों पे / किसी अनोखी खुशी के बदले / मैं नहीं दुँगी वो रोशनी / जो भाईचारे के इस बंधन को कस के बाँधती है / जो एक दूसरे से प्रेम करना सिखाती है.

ब्रिटिश  कवि-          हैराल्ड पिंटर ( अनुवाद व्योमेश शुक्ल)

लोकतंत्र ....कोई उम्मीद नहीं / बड़ी सावधानियां खत्म / ये दिख रही हर चीज की मार देंगे / अपने पिछवाड़े की निगरानी कीजिए. (२) बम- ...और कहने के लिए शब्द बाकी नहीं है / हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम है / जो हमारे सरों पर फ़ट जाते हैं / हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम है / जो हमारे खून की आखिरी बूंद तक सोख लेते हैं. / जो कुछ छॊड़ा है सब बम है / जो मृतकों की खोपड़ियां चमकाया करते हैं.

क्यूबा    कवि.                         निकोलस गियेने. (अनुवाद श्रीकांत)

कविता पहेलियां.       दातों में, सुबह,/ और रात चमड़ी में / कौन है, कौन नही / नीग्रो / उसके एक सुन्दर स्त्री न होने पर भी / वही करोगे, जो उसका हुक्म होगा / कौन है, कौन नहीं / भूख / गुलामों का गुलाम / और मालिक के संग जुल्मी / कौन है, कौन नहीं ./ गन्ना /  छुपा लो उसे एक हाथ से / ताकि दूसरा कभी जाने भी नहीं / कौन है, कौन नहीं / भीख / एक इंसान जो रो रहा है / एक हंसी के साथ जो उसने सीखी थी / कौन है, कौन नहीं.

चीन     कवि               छाओ-छाओ - ईसवी सन 155-20 (अनुवाद- त्रिनेत्र जोशी)

कब्रिस्तान का गीत.-          दर्रे के पूरब में शूरवीर / सशत्र तैयार गद्दारों को दंडित करने के लिए / पहले मंगचिन में एकत्र होते हैं / लक्ष्य है श्येनयांग / पर सहयोगी टुकड़ियों मे आपस में ठनी है / अनिर्णय की स्थिति-मुर्गावियों जैसी अपनी तू-तू-मैं-मैं / ताकत और जीत को बेताब, होते हैं परास्त / और एक दूसरे के खून के प्यासे / हवाइ के दक्षिण में एक नौजवान हथिया लेता है राजसी पद्वी / उत्तर में एक राजा बना लेता है अपनी अलग मोहर / शस्त्रों से लेस लोग चलते हैं भड़भड़िये / मौते बेहिसाब / चारों तरफ़ फ़ैलती हैं बेरंग पड़ रही हड्डियां छितर-बितर / हजारों ली तक भी नहीं सुनाई पड़ती कुक्कुट की बांग / प्रति सैकड़ा बच पा रहे हैं एकाध / सोचने भर से दरक उठते है दिल.

   लैटिन  कवि                   पाब्लो नेरुदा (अनुवाद-वंदना देवेन्द्र.)

मैं कुछ चीज समझता हूँ.     तुम पूछोगे: वे नीले फ़ूल कहां गए? और / अहिपुष्प पंखुरियों का तत्व विज्ञान और / अपनी शब्दावली दुहराती रन्ध्रों, / चिड़ियों को सबक सिखाती बरसात ? / मैं तुम्हें सभी सूचनाएं दुँगा, / मैं एक उपनगर में रहा, मेड्रिड के एक घण्टियों, / घड़ियों और पेड़ों के उपनगर में, / वहाँ से आप मध्य स्पेन का खुश्क चेहरा देख सकते हैं: एक चमड़ा समुद्र जैसा कुछ / मेरा घर फ़ूलों का घर कहा जाता था / क्योंकि इसके हर एक कोने-आंतरों में जेरेनियम फ़ूलते थे: / यह बच्चों और कुत्तों से बसा एक बढ़िया आवास था / कुछ याद है राउल / / तुम्हें रफ़ेल ? /  फ़ेड्रेको, क्या तुम्हें याद है / मेरे छज्जों पर जून की रोशनी / फ़ूलों को तुम्हारे कंठ में उतार देती थी?

( ii )  आज की रात लिख सकता हूँ- ( अनुवाद-  मधु शर्मा ) --लिख सकता हूं आज की रात / सबसे उदास पंक्तियाँ / लिखूँ, जैसे-“ रात है तारों भरी, / तारे हैं नीले, टिमटिमाटे कहीं दूर / रात को हवा चक्कर काटती है, आकाश में और गाती है / आज की रात लिख सकता हूँ , सबसे उदास कविताएँ. / मैंने प्यार किया उसे, कभी-कभी उसने भी किया मुझे प्यार / आज की रात जैसी उन रातों में, बाँहों में थामे होता था उसे मैं / कितनी ही बार चूमा उसे मैंने, इस अन्तहीन आकाश तले / उसने मुझे प्यार किया कभी-कभी मैंने भी किया उसे प्यार / कोई कैसे न करता उसकी बड़ी-बड़ी शांत आँखों से प्यार / आज की रात लिख सकता हूँ सबसे उदास कविताएँ / सोचते हुए कि नहीं है वह मेरे पास

इस्ताम्बुल     कवि       नाजिम हिकमत  (अनुवाद- चन्द्रबली सिंह)

पाल रोबसन से  …….      वे हमें अपने गीत नहीं गाने देते है, रोबसन / ओ गायकों के पक्षिराज नीग्रो बन्धु, / वे चाहते हैं कि हम अपने गीत न गा सकें / डरते हैं, रोबसन / वे पौ के फ़टने से डरते हैं / देखने / सुनने / छूने से / डरते हैं./ वैसा प्रेम करने से डरते हैं / जैसा हमारे फ़रहाद ने प्रेम किया (निश्चय ही तुम्हारे यहां भी तो कोई फ़रहाद हुआ, रोबसन, नाम तो उसका बताना जरा?) / उन्हें डर है / बीज से / पृथ्वी से / पानी से / और वे / दोस्त के हाथ की याद से डरते हैं / जो हाथ कोई डिसकाउंट, कमीशन या सूद नहीं मांगता / जो हाथ उनके हाथों से किसी चिड़िया-सा फ़ंसा नहीं / डरते है, नीग्रो बन्धु / वे हमारे गीतों से डरते हैं, रोबसन

कजाकिस्तान       कवि     ऎवे कुनानावेव ( अनुवाद-महाश्वेता देवी.)

मनुष्य मल से भरा बोरा है- / जब तुम मरते हो, मल से भी अधिक दुर्गन्ध तुम से आती है / तुम्हें गर्व है कि तुम मुझसे ऊपर हो / किन्तु यह तुम्हारे अन्धकार का चिन्ह है / कल तुम बालक थे / किन्तु अब तुम्हारे ढलते दिन हैं / तुम्हें विश्वास हो गया कि तुम समान स्थिति में नहीं रह सकते / जीवों से प्यार करो / और ईश्वरीय रहस्य को समझो / इस जीवन में इससे अधिक विस्मय / और क्या हो सकता है.

(२) मैंने तुम्हें पिल्ले से कुत्ता बना दिया / और जब वह मेरे पैर में काटता है / मैंने किसी को लक्ष्य-भेद करना सिखाया / और उसने चतुराई से मुझे ही निशाना बनाया.

पोलिश        कवि-      विस्वावा शेम्बोर्स्का. (अनुवाद-अब्दुल बिस्मिल्लाह)

वियतनाम- ....तुम्हारा नाम क्या है औरत? मैं नहीं जानती / तुम कब पैदा हुई, कहाँ घर है तुम्हारा ?- / मैं नहीं जानती / तुमने धरती पर गढ्ढा क्यों खोदा? - मैं नहीं जानती / तुम कब से यहाँ छिपी हुई हो ? मैं नहीं जानती / तुमने दोस्ती की डोर क्यों तोड़ दी ? मैं नहीं जानती / क्या तुम नहीं जानती, कि हम तुम्हें, कोई नुकसान नहीं पहुँचाएंगे?~ मैं नहीं जानती / तुम किसके पक्ष में हो? मैं नहीं जानती / यहाँ तो युद्ध हो रहा है, तुम्हें चुन लेना चाहिए अपना पक्ष !- मैं नहीं जानती / क्या तुम्हारा गाँव अब भी बचा है?  मैं नहीं जानती / क्या ये बच्चे तुम्हारे है? / हाँ.

अफ़्रीका        कवि      जोफ़्रे रोचा ( अनुवाद-राजा खुगशाल)

जेसा मेंडेज से अंतिम बातचीत (लंबी कविता के कुछ अंश) ....मैं जानता था जेसा / जानता था कि तुम पैदा हुए थे / कांति के साथ कदम बढ़ाने के लिए / सच्चे और गहरे अर्थों में वीर थे तुम / तुम सच्चे अर्थों में प्यार थे संघर्ष के / मैं अच्छी तरह जानता हूं जेसा / विप्लव और प्रेम की कौंध थे तुम / स्वतंत्र चेता और मुक्त हृदय /. पूरी तरह समर्पित थे अपने कर्म के प्रति / शांति से सोओ योद्धा, ओ योद्द्धा / जब खत्म करुँगा मैं इन अनाश्वयक बातों को / जो महज एक बाधा है / तुम्हारी वीरतापूर्ण नींद में / इस देश की मिट्टी में / जहाँ दुश्मन की बंदूकों से धराशायी हुए तुम / शांति से सोओ / अब कभी नहीं सनसनाओगे तुम / उन सतहों पर / जिन्हें उघाड़ने की कोशिशें की तुमने / निश्वय ही विजय की ओर बढ़ रहा है / क्रांति का परचम / जबकि मुझे दुख है सिर्फ़ अपना / मैं नतसिर हूं / उस महान की महानता के सन्मुख / अलविदा जेसा मेंडेज / हमेशा के लिए अलविदा.

जापान     कवि         ओना नो कोमाची. ( अनुवाद-मधु शर्मा)

(एक) यदि वह एक सपना था / फ़िर से देखुंगी मैं तुम्हें / क्यों छॊड़ दिया जाए अधूरा ही / जागा हुआ प्रेम (दो) कोई तरीका नहीं उसे देख पाने का / चाँद के बिना इस रात में / पड़ी हूं मैं जागती हुई अच्छा में जलती / दौड़ती है आग सीने में / दिल धड़कता है. (तीन) साँझ के धुंधले उजाले में / गाती है चिड़िया मेरे पहाड़ी गाँव की / कोई नहीं आएगा आज की रात / इस सुर को बचाने. (चार.) कितने अदृष्य तरीके से / बदला करते हैं रंग / इस दुनिया में / इंसानी दिल के फ़ूल.

श्रीलंका      कवि       डब्ल्यू ए. अबेसिंधे ( अनुवाद- रमेश चन्द्र शाह )

जंगल में बुद्ध-  बज्रकठोर पर्वत हुआ / मुलायम पंखुड़ी सा / विकराल चेहरा चट्टान का /जगमगा उठा है जीवित रक्त माँस से / रेशम से भी स्निग्ध जिस का स्पर्ष / शिलीभूत तमिस्रा / प्रपात बन फ़ट पड़ी प्रकाश का / बोधि का किरणॊं से नहलाते जग-जग को / कब से अधमुंदे नयन / बुलबुलों की तरह वर्षो-शताब्दियों को / मेटते महाकाल में / इस गहन कान्तार के निर्जन में / करुणामय...ध्यानलीन...हे महाबुद्ध / इस पुरातन वृक्ष तले जाने कब से बैठे हुए / अपनी मैत्री और विश्व-प्रेम के साथ / आओ हमारे इस मनुष्य-लोक के बीचोबीच / दुःखों से दग्ध इस धरा को-नहलाओ हे महाभिषग / बोओ बीज मैत्री के / हमारे दिलों के / बंजर बियाबान में.

वियतना   कवि         दियु न्हान-  (अनुवाद-प्रेम कपूर / कुसुम जैन.)

जन्म-.....जन्म, बुढ़ापा, रोग, मृत्यु / ऎसा ही होता आया है हमेशा से / इनसे जितना भी दूर जाने का प्रयास करो / कसती ही जाएगी इसकी गाँठ / इस प्रकार अज्ञान ले जाएगा तुम्हें बुद्ध की ओर / और कठिनाइयाँ ध्यान की ओर / न ही ध्यान की ओर / शांत रहो / शब्द तो कोरी बातें हैं

       कवि (२)       न्युएन त्राइ

स्वपन भंग........स्वर्णिम स्वप्न से जागने पर नहीं रहता शेष / लगता है सब कुछ हो जैसे रिक्त / अच्छा होगा पहाड़ पर बनाएं एक कुटी / उसमें रहें, पढ़ें, प्राचीन ग्रंथ और हों संतुष्ट / जंगल में खिलते फ़ूलों को सुनते हुए

     कवि(३)        वान हान्ह....

.मानव जीवन--   क्षणभंगुर है मानव-जीवन विद्युत की तरह / आज जन्म है तो कल मृत्यु / वसन्त के हरियाले वृक्ष / हो जाते हैं पत्रहीन शरद में / अतः उत्थान या पतन की क्या चिंता / ओस की बूंद सी है उन्नति व अवनति / जो घास पर मोती जैसी लगती है.

कवि(४)            न्गुएन फ़ि रवान्ह

यदि प्रेम है मुझसे तो भी / सोचो अपने देस के बारे में / न सहने दो अन्याय / अपनी पितृ-भूमि को

जापान    कवि.   -    ककिनोमोतो हितोमारो    ( अनुवादक:प्रमोद पाण्डॆ)

उलझे शैवाल से / एक गहन प्रेम में / मैं और मेरी प्रेम-परी / सोया करते थे साथ-साथ / लिपटे-सिकुड़े-सिमटे / लेकिन कितनी कम रातें थी हमें मिली / जब हम दोनों थे साथ-साथ / दूर-दूर तक गया अनवरत / मेरा काला अश्व मुझे ले गया / दिग-दिगंत छोड़ता पीछे / मुझको वह ले गया प्रिया तीर / आह ! / हे रक्तिम पर्ण वृक्ष में पल के / पतझर में झर रहे पहाड़ी पर / क्षण भर रोको झरता यह पत्तों का / ताकि / मैं देख सकूं / अपनी प्राण प्यारी का निवास.

       कवि-२      ओनो नो कोमाची.

प्रिय मेरा मुझको नहीं मिला ! / मिलन की विह्वलता / यह अमानिशा / है बढ़ा रही / मेरे वक्षस्थल से होकर जाती है अग्नि-शिखा / करती है भस्मीभूत हृदय को / जब उसका चिन्तन करती हूं / जो शायद यह कल्पना करे / उसका चेहरा देख रही हूं. / अगर जानती / बस यह था इक स्वपन / मैं कभी न जागी होती...

 

क्यूबा   कवि       -       जोस मार्ती. ( अनुवाद प्रमोद पाण्डे )

ग्वाटेमाला की लड़की.--  आह ! कह लेने दो मुझको, वह मधुर कथा / उस छाया में, मैं खड़ा जहाँ इस समय / यह कथा उसी ग्वाटेमाला की लड़की की, / जिसने त्यागे थे प्राण / प्रेम की वेदी पर / उसके शव पर थे हार, / कुमुदिनी पुष्पों की / सब सुरभि रूप वे पुष्प / चमेली जिनके चारों ओर गुंथी / हमने था उसको दफ़नाया / रेशम के उस ताबूत में / उसने अपने प्रेमी को / दी थी छॊटी सी शीशी / थी जिसमें मधुर सुगंध भरी , पर / लौटा वह विवाह करके बस / तभी प्राण त्यागे थे उसने, / जिसकी हूँ मैं कथा कह रहा / वे कांधों पर ले गए उसे / सब पंडित और पुजारी थे / आए थे कितने युगल, उसे श्रद्धांजलि देने, / चढ़ा- चढ़ाकर पुष्प हार / धीरे-धीरे / जब सांझ ढली, / उस कब्र खोदने वाले ने / था मुझे बुलाया / और कहा. देख लो / यही अन्तिम अवसर / वह ग्वाटेमाला की लड़की / जिसने त्यागे थे प्राण / प्रेम की बेदी पर.

 

जर्मन     कवि       -        मे.आयिम ( अनुवाद- अमृत मेहता.)

विदा.----   क्या हों अन्तिम शब्द / सुखी रहो फ़िर मिलेंगे / कभी न कभी कहीं न कहीं / क्या हो अंतिम कारज / एक अन्तिम पत्र एक अंतिम फ़ोन-वार्तालाप / एक गीत मंद स्वर में? / क्या हो अंतिम इच्छा / माफ़ करना / भूलना नहीं मुझे/ प्यार करता हूं तुझे ? / क्या हो अंतिम विचार? / धन्यवाद? / धन्यवाद.

हंगरी     कवि-   -        फ़ेरेंत्स यूहास. ( अनुवाद- सुरेश सलिल )                         

  सोना.---औरत अपने छीजते जाते बालों के जूड़े में / सधे हाथों सहेजती हुई / फ़िर एक चम्मच और पाव रोटी का एक एक गुम्मा / गिरा देते है उनके फ़ेले, मैले कुचैले हाथों में / हँसते हुए / उनकी सींकिया-सुर्ख घींचों का घेरा / भफ़ाती रकाबियों पर झुकता है / पवित्र जल पर गुलाब के फ़ूलों की भाँति / और सुर्ख गुलाब खिल उठते हैं / मसालेदार कुहासे में / चमक उठती है उनकी आँखों की पुतलियाँ. जैसे दस दुनियाएँ अपनी खुद की रोशनी में / अकबका गई हों / तिरने लग जाते हैं शोरबे में / आहिस्ता-आहिस्ता चक्कर लगाते / प्याज के सुनहरे छल्ले.

चेक      कवि      -         मिरोस्लाव होबुल

            हठधर्मिता का सिंड्रोम--- हवा में खड़ा है एक दैत्याकार वायुयान / पूँछ झुकाए / शहर के ऊपर / इतना भारी कि भर न पाए उड़ान / किसी सगर्भा व्याध पतिंगा की भाँति / अपने रहस्यमय निकास-मार्ग से / छतों को तोड़ता हुआ अपने मुर्दे / ऊपर जो घटित है / देखकर भी हम उसकी अनदेखी करते हैं / पेशियों की ऎंठन में कैसी तो हठधर्मिता है / हम से ऊपर मूर्तिवत हो गए हैं हम / संभव नहीं है कि अपनी गर्दने / पाँच डिग्री दायें या बांयें भी मोड़ सकें / राजनेताओं के रवैये की तरह / शहर के ढंग-ढर्रे से / पोशीदातौर पर चकित हैं हम /’ कि, देखिए, किस तरह ढेर होती जा रही है /  जागते रहने की शहर की कोशिशें

आईसलैण्ड    कवि.    -   सिगुरदुर पालसन ( अनुवाद कुसुम जैन)

(१) शीशे के भीतर दिखते हैं बड़े / वे आंसू, जिन्हें दिखना नहीं चाहिए / बाहर तनी पर टंगी चादरें / अब और नहीं बिछेगीं.

(२) जीवन और भी है /  जो जिये जाते हैं / शुभकामनाएं और भी हैं / दी जाती हैं औरों को /  याद नहीं अब / चाँद की वे किरणें / दिखाई देती थीं / जो बर्फ़ के आर-पार / सुबह की निस्तब्धता में बैठ / पी रहा हूं गर्म काफ़ी / कुछ अलग है यह चाँद / जिसे पहले कभी नहीं देखा / नया है इसका फ़ीकापन / जैसे दुकान से रोटी खरीदती औरत / मुझे नहीं जानती.

जर्मन        कवि  -        बर्तोल्त ब्रेख्त (अनुवाद-अनिल पेटवाल)

जनरल तुम्हारा टैंक बड़ा शक्तिशाली है / ये जंगलों को तबाह करता है / और सैकड़ों लोगों को रौंद सकता है / मगर इसमें एक कमी है, / ये बिना चालक के काम नहीं कर सकता / तुम्हारे पास बड़े शक्तिशाली बम बरसाने वाले जहाज हैं. / ये तूफ़ानों से ज्यादा तेज उड़ सकते हैं / कई हाथियों को अपने भीतर ले जा सकते हैं / मगर इनमें एक कमी है / ये बिना मैकेनिक किसी काम के नहीं / जनरल, आदमी बड़े काम की चीज है /  वो उड़ सकता है, और बड़ी आसानी से मार भी सकता है / मगर उसमें एक कमी है / वो सोच सकता है.

 पुर्तगाल     कवि     जार्ज डे लिमा ( 1893-1953)  (अनुवाद-पियूष दईया)

दिन उतरा नहीं है / मैंने देखा जहाजों को जाते और आते / मैने देखा दुर्दशा को जाते और आते / मैंने देखा चर्बीले आदमी को आग में / मैंने देखा सर्पीलाकारों को अंधेरे में / कप्तान, कहां है कांगो ? / कहा है संत ब्रैडानक  टापू? / कप्तान कितनी काली है रात ! ऊँची नस्लवाले कुत्ते भौंकते हैं अंधेरे में / ओ ! अछःऊतों, देश कौन सा है / कौन सा है देश जिसकी तुम इच्छा रखते हो ? / मैंने लिया वनस्पतियों से जंगली शहद / मैंने लिया नमक पानियों से, मैणे रोशनी ली आकाश से / मेरे पास केवल काव्य है, तुम्हें देने को / बैठ जाऒ, मेरे भाइयों.

रुमानिया     कवि-        लूसीयन बलागा  (1895-1961) (अनुवाद – पियूष दईया)

मैं नहीं पेरुंगा संसार की पिंजूलियां अजूबों को / और मैं नहीं मरुंगा / तर्कणा से / रहस्यों को जिन्हें मैं मिलता हूं अपने मार्ग के साथ साथ / फ़ूलों, आंखों, ओठॊं और कब्रों में / दूसरों की रोशनी / डुबोती है छिपे हुए गहरे जादू को / अथाह अंधेरे में / मैं बढ़ाता हूं संसार की पहेली / अपनी रोशनी के संग / जैसे चांद अपनी धवल शहतीरों संग / बुझाता नहीं बल्कि बढ़ाता है/ रात के झिलमिलाते रहस्यों को. मैं समृद्ध करता हूं गहराते क्षितिज को / महान राज की कंपकपियों से / वह सब जिसे जानना कठिन है / बन जाता है एक अरूझा बुझौवल / ऎन मेरी आंखों तले / क्योंकि बराबर प्यार करता हूं मैं / फ़ूलों, ओठों, आंखों और कब्रों को.

इराक       कवि   (१)        टून्या मिखाइल ( अनुवाद-गीत चतुर्वेदी ) 

 ( I )  मैं हड़बड़ी में थी--- कल मैंने एक देश खो दिया  / मैं बहुत हड़बड़ी में थी / मुझे पता ही नहीं चला / कब मेरी बाहों से फ़िसल कर गिर गया वह / जैसे किसी भुल्लकड़ पेड़ से गिर जाती है / कोई टूटी हुई शाख ( लंबी कविता का अंश)

( ii ) मोची—एक हुनरमंद मोची  / अपनी पूरी उम्र / ठोंकता है कील / और चमकाता है चमड़े को /                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         भांत-भांत के पैरों के लिए / पैर जो चलते हैं / पैर जो मारते हैं ठोकर / पैर जो लगाते हैं छलांग / पैर जो करते हैं अनुसरण / पैर जो दौड़ते हैं / पैर जो शामिल होते है भगदड़ में / पैर जो भहरा जाते हैं / पैर जो उछलते हैं / पैर जो यात्रा करते हैं ./ पैर जो शांत पड़े रहते हैं./ पैर जो कांपते हैं / पैर जो नाचते हैं / पैर जो लौटते है / जीवन मोची के हाथ में पड़ी / कुछ कीलें ही तो हैं.  

कवि(२)                  सादी यूसुफ़       (अनुवाद- अशोक पांडॆ)    ( लंबी कविता का अंश)                             अमेरिका, अमेरिका से..... हम बंधक नहीं है, अमेरिका /  हम ईश्वर के सैनिक नहीं तुम्हारे सिपाही / हम निर्धन लोग हैं, हमारी है धरती वह जिसके देवता डुबा दिये गए हैं /  बैलों के देवता / आगों के देवता / दुःखों के देवता, जो मिट्टी / और रक्त को गीत में गूंथ देते हैं / हम निर्धन लोग हैं, हमारा देवता है निर्धन / जो उभरता है किसानों की पसलियों से भूखा और चमकीला और ऊँचा उठाता है अपना सिए / अमेरिका हम मृतक हैं ./ आने दो अपने सिपाहियों को / जो भी एक मनुष्य का वध करे, उसे करने दो उसका उद्धार / हम डूबे हुए हैं, प्यारी लेडी ! / हम डूबे हुए लोग हैं / आने दो पानी को.

ईरान-डेनमार्क मूल की कवि- शीमा काल्बासी ( अनुवाद अशोक पांडॆ) 

अफ़गान की स्त्रियों के लिए- मैं टहल रही हूं काबुल की गलियों में / रंगी हुई खिड़कियों के पीछे / टूटॆ हुए दिल और टूटी हुई स्त्रियां हैं. /  जब उनके परिवारों में कोई पुरुष नहीं बचा / रोटी के लिए याचना करतीं वे भूख से मर जाती हैं / एक जमाने की अध्यापिकाएं., चिकित्सिकाएं  और प्रोफ़ेसर / आज बन चुकीं चलते-फ़िरते मकान भर / चन्द्रमा का स्वाद लिए बगैर / वे साथ लेकर चलती हैं, अपने शरीर, कफ़न सरीखे बुर्कों में ( लंबी कविता के अंश) 

इजरायल     कवि-  (१)   आमीर ओ”र      ( अनुवाद अशोक पांडॆ) 

भाषा कहती है- भाषा कहती है : भाषा के पहले / एक भाषा होती है, वहीं के धिसे हुए निशान होती है भाषा / भाषा कहती है: सुनो, अभी / आप सुनते हैं / गूंजता है कुछ / खामोशी ले लो और खामोश हो रहने का जतन करो / शब्द ले लो और बोलने की कोशिश करो / भाषा के परे, भाषा का एक घाव है / जिसमें से बहता जाता है, बहता जाता है संसार / भाषा कहती है : है, नहीं है, हैं / नहीं है, भाषा कहती है: मैं / भाषा कहती है चलो तुम्हें बोला जाए,/ चलो तुम्हें छुआ जाय, आ के बोलो ना,/ तुम बोल चुके हो.

           कवि (२)      येहूदा आमीखाई  ( अशोक पांडॆ)  ( लंबी कविता का अंश)

हिब्रू और अरबी भाषाएं लिखी जाती हैं पूर्व से पश्चिम की तरफ़ / लैटिन लिखी जाती है पश्चिम से पूर्व की तरफ़ / बिल्लियों जैसी होती हैं भाषाएं / आपको चाहिए कि उन्हें गलत तरीके से न सहलाएं / बादल आते हैं समुद्र से / रेगिस्थान से गर्म हवा / पेड़ झुकते हैं हवा में / और चारों तरफ़ हवाओं में पत्थर उड़ते हैं / चारों हवाओं तलक वे पत्थर फ़ेंकते हैं / इस धरती को फ़ेंकते है एक दूसरे पर / लेकिन धरती वापस गिरती है धरती पर. 

तुर्की      कवि      आकग्यून आकोवा ( अनुवाद गीत चतुर्वेदी) ( लंबी कविता का अंश)

शांति क्या है मेरी जान---तुम जानती हो मेरी जान / शांति क्या होती है / क्या यह कोई पुल है जो एक परछाई पड़ते ही भहरा जाता है / कोई कंपनी है जो दिवालिया हो जाती है / इससे पहले कि उसके शेयर लोगों तक पहुंचे / क्या यह दो युद्धों के बीच का चायकालीन अवकाश है या / लोहार के सामने कहे गए उस बच्चे के आखिरी शब्द / जिसकी साइकिल खराब हो गई हो. / बताओ मेरी जान / शांति क्या वह खत है जो आईंस्टीन ने रूजवेल्ट को लिखा था / लाउसेन से मुस्तफ़ा कमाल के नाम आया टेलीफ़ोन है / या वह गली है जिसका कूड़ा / बुहार ले गया विज्ञान. ( लंबी कविता.) 

     कवि(२)         नाजिम हिकमत  

इस तरह से  मैं खड़ा हूं बढ़ती रोशनी में, / मेरे हाथ भूखे, दुनिया सुन्दर / मेरी आंखे समेट नहीं पातीं पर्याप्त पेड़ों को / वे इतने उम्मीद भरे हैं, इतने हरे / एक धूप भरी राह गुजरती है शहतूतों से होकर, / मैं जेल-चिकित्सालय की खिड़की पर हूं / सुंधाई नहीं दे रही मुझे दवाओं की गंध / कहीं पास ही में खिल रहे होंगे कार्नेशन्स / यह इस बात की तरह है / गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है / खास बात है आत्म समर्पण न करना.

चेकोस्लोवाकिया   कवि - येरोस्लाव साइफ़र्त. ( अनुवाद- अशोक पांडॆ)

गीत.   बिदा के समय / हम हिलाते हैं रुमाल ./ हर रोज कोई चीज खत्म हो रही है / कोई सुन्दर चीज खत्म हो रही है / हवा को फ़ड़फ़ड़ाता है / लौटता हुआ हरकारा कबूतर / हम हमेशा लौट रहे होते हैं / उम्मीद के साथ या उसके बिना / जाओ, आँसू सुखा लो अपने / और मुस्कुराओ, अलबत्ता जल रही है अब भी तुम्हारी आँखें / हर रोज कोई चीज खत्म हो रही है / कुछ सुन्दर चीज खत्म हो रही है.  

स्वीडिश     कवि  - टामस ट्रांसट्रामर  ( अनुवाद- किरण अग्रवाल)

            सीमा के पीछे मित्रों को.— (१) मैंने तुम्हें इतनी होशियारी से लिखा / लेकिन जो मैं नहीं कह सका / भर गया और बड़ा हो गया गरम हवा के बैलून की तरह / और अन्ततः रत्रि आकाश से होकर दूर उड़ गया. (२) अब मेरा पत्र सेंसर के पास है  / वह अपना दीपक बारता है / इसकी चमक में मेरे शब्द कूदते हैं / जैसे तार जाल में बंदर / इसको खड़खड़ाते हुए, अपने दांतों को अनावृत करने के लिए रुकते हुए.      

सीरिया   कवि       अली अहमद सईद.   ( अनुवाद- सुरेश सलिल)

              मैं भौंचक हूं, मेरी वतन / हर बार मुझे तुम एक मुख्तलिफ़ शक्ल में नजर आते हो / अब मैं तुम्हें अपनी परेशानी पर ढो रहा हूं / अपने खून और अपनी मौत के दरमियान / तुम कब्रिस्तान हो या गुलाब ? / बच्चों जैसे नजर आते हो तुम मुझे, अपनी अंतड़ियां घसीटते / अपनी ही हथकड़ियों में गिरते-उठते / चाबुक की हर सटकार पर एक मुख्तलिफ़ चमढ़ी ओढ़ते / एक कब्रिस्तान या एक गुलाब ? / तुमने मेरा कत्ल किया, मेरे नग्मों का कत्ल किया / तुम कत्लेआम हो या इंकलाब ? / मैं भौंचक हूं मेरे वतन / हर बार तुम मुझे मुख्तलिफ़ शक्ल में नजर आते हो..    

पाकिस्तान      कवि     अंजुम सलीमी (अनुवाद- प्रेम कपूर)

           अधूरा आदमी हूं मैं.../ पूरा चांद मुझे समुंदर बना देता है / आंखें हजूम से सोहबत करती है , और मैं? / मुझे तनहाई ने बनाया है / रफ़ाकतें मुझे तोड़ देती है / मैं जमा हो रहा हूं / वक्त मुझे मिलने आयेगा / मैंने अपनी सरगोशियां दीवारों में रख दी है / खाली कमरा मुझ से भरा हुआ है / मुझे अभी दस्तक मत दो.

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मारीशस       कवि            राज हीरामन                                                                              

चाचा रामगुलाम---- ..चाचा थे, अब तुम चाचा न रहे /  देश के तुम अब दादा बन गए  / पिता तुम सिर्फ़ नवीन के थे / देश के अब राष्ट्रपिता बन गए / देश तो जंजीरों में थी बंधी / तुम ने एक-एक कड़ी थी तोड़ी / तुमने सबको आजाद किया / देश को तुमने आबाद किया. 

(२) किस हवा में दम है-  किसमें इतना दम है / जो इस दीप को बुझा सके /अमावस्या में यह जन्मा है / आंधियों से यह खेला है / तूफ़ानों में यह पला है / दिवाली में यह जला है / किसमें इतना दम है / जो इस दीप को बुझा सके.    

न्यू जर्सी अमेरिक     देवी नागरानी.  

धीरे-धीरे शाम चली आई / भीनी-भीनी खुशबू छाई / इण्द्रधनुषी रंग मेरे मन का / मैं उसकी परछाइ.,छाई / धीरे-धीरे शाम चली आई / बूँद पड़े बारिश की सौंधी / महक मिट्टी की भाई,भाई / धीरे-धीरे शाम चली आई / भीगी मेरे मन की चादर / प्यास पर न बुझ पाई, पाई / धीरे धीरे शाम चली आई / कल तक जो बीज थे मैंने बोये / हरियाली अब छाई, छाई / आँगन में कुछ फ़ूल खिले हैं / रँगत मन को भाई, भाई / धीरे धीरे शाम चली आई / सुर से सुर मिल राग यह मालकौंस रस बरसाई / धीरे धीरे शाम चली आई / सातरँगों की सरगम कारी / कोयल ने है गाई, गाई / धीरे धीरे शाम चली आई / महकाए मन मेरा देवी / भोर न ऎसी आई.   

             भारतीय कवि  

कवि प्रदीप ( रामचन्द्र द्विवेदी.)

/ तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी / आज सभी के लिए हमारा यही कौमी नारा है. आज हिमाचल की चोटी से फ़िर हम ने ललकरा है / दूर हटो ऎ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है. / जहां हमारा ताजमहल है और कुतुब-मीनारा है / जहां हमारे मन्दिर मस्जिद सिखों का गुरुद्वारा है / इस धरती पर कदम बढ़ाना अत्याचार तुम्हारा है / शुरु हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठॊ हिन्दुस्तानी

सुभद्रा कुमारी चौहान.

आ रही हिमालय से पुकार / है उदधि गरजता बार बार / प्राची पश्चिम भू नभ अपार / साब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त / वीरों का कैसा हो वसंत / फ़ूली सरसों ने दिया रंग / मधु लेकर आ पहुंचा अनंग / वधु वसुधा पुलकित अंग अंग / है वीर देश में किन्तु कंत / वीरों का कैसा हो वसंत / भर रही कोकिला इधर तान ./ मारु बाजे पर उधर गान / है रंग और रण का विधान / मिलने को आए आदि अंत / वीरों का कैसा हो वसंत / गलबाहें हों या कृपाण / चलचितवन हो या धनुषबाण / हो रसविलास या दलितत्राण / अब यही समस्या है दुरंत / वीरों का कैसा हो वसंत

 संपतराव धरणीधर.           

कुछ ऎसा होने वाला है / धरती का बेटा  अब फ़सल चांद पे बोने वाला है./  सूरज के गर्वीले घोड़े अब अंतरिक्ष तक/ सिमित न रह पायेंगे / गांव-गांव और गली गली ये ऊर्जा से लादे जाएंगे./ पीठ पर अपने हम सब तक आएंगे जाएंगे / तुम देखोगे,बंजारे से ये जो घूम रहे हैं / सर पर अपने झिलमिल तारे/ये बुध ये शुक्र शनि / गढ़ने वाले हैं कल धरती की धानी चूनर पर / सलभे गोट किनारे. / कालिदास के मेघ अब गीत प्रणय के त्याग-अमन की बात सुनाने वाले हैं / बेकस मजलूमों का संदेश नया / इंद्रासन तक पहुंचाने वाले हैं / कि धन वैभव ये सारा का सारा / अब कुबेरों के महलों तक संचित रहना मुश्किल है./ क्योंकि राम गिरि की कुटिया में / वो बीमार यक्ष ज्यों का त्यों पीढ़ित है / पातालों से लेकर गहन व्योम के शिखरों तक / ये मेदिनी पुत्र वीर,एक नया धर्म / एक नया कर्म. एक नया विश्व / अपने लघु कंधो पर ढोने वाला है.

विष्णु खरे.  लालटेन जलाना.  (लंबी कविता के कुछ अंश)---

-लालटेन जलाना उतना आसान बिल्कुल नहीं है / जितना उसे समझ लिया गया है / अव्वल तो चीन-चार संकरे कमरों वाले छोटे-से मकान में / कम से कम, तीन लालटेन की जरुरत पड़ती है / और रोज किसी को भी राजी करना मुश्किल है कि / वह तीनों को तैयार करे / और एक ही आदमी से हर शाम / यह काम करवा लेना तो असंभव है / घर में भले ही कोई औरत न हो / सिर्फ़ एक बाप और तीन संताने हों तो भी न्यायोचित ढंग से/ बारी-बारी तीनों से लालटेन जलवाना कठिन नहीं / यह जरुर है कि जब दिया-बती की बेला आए / तो यह न मालूम हो के लालटेन पीपे या शीशी में तेल नहीं है. / और शाम को साढ़े छः बजे निकलना पड़े मिट्टी के तेल के लिए.

 चंद्रकांत देवताले. 

 माँ पर नहीं लिख सकता कविता. ---माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता / अमर चूँटियों का एक दस्ता / मेरे मस्तिस्क में रेंगते रहता है / मां वहाँ हर रोज चुटकी-दो चुटकी आटा डाल देती है /जब भी मैं सोचना शुरू करता हूं / यह किस तरह होता होगा / घट्टी पीसने की आवाज / मुझे घेरने लगती है./और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनियां में ऊँघने लगता हूं./जब कोई भी मां छिलके उतारकर / चने,मूंगफ़ली या मटर के दाने / नन्हीं हथेलियों पर रख देती है /तब मेरे हाथ मेरी जगह पर/ थरथराने लगते हैं /मां ने हर चीज के छिलके उतारे मेरे लिए / देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे / और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया /मैंने धरती पर कविता लिखी है / चन्द्रमा को गिटार में बदला है / समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया / सूरज पर कभी कविता लिख दूंगा / मां पर नहीं लिख सकता कविता.          

स्व. डा.हुकुमपाल सिंह “ विकल “

अनकहती कहती नदी.( लंबी कविता के कुछ अंश)----पानी पा सूखी जाती है / मुझमें बहती हुई नदी / सच कहने से कतराती है / सच-सच कहते हुई नदी / परम चिरन्तर थी जो नदी / अन्तस में गंगा सी बहती / घाट-घाट से प्राण बोध की / हरी भरी कविता सी कहती  / आज वही नदिया पानी में / भूली पानी के छन्दों को / लगी तोड़ने पानी में ही / पय पानी से अनुबन्धों को / नेह और विश्वास किनारे जब से / अपने को बिखरा पाती है / अनकहती कहती नदी. / घाट घाट बैठे मछुआरे / सारे मर्यादाएं खोते / घाट घाट का पीकर पानी / पानी में वह पानी बोते / जो पानी अपने पानी को / पानी में ही आग लगाता / पानी लगे पानी मांगने पानी / पानी में वह प्यास उगाता / पानी के द्वारा पानी को / होते देख इस तरह पानी / पानी पानी हो जाती है / पानी रहती हुई नदी                                                                          

चंद्रसेन विराट  \

गंगाजल अपमानित होता है—  यदि आसूं को तुम पानी कहते हो / तो गंगाजल अपमानित होता है / पीड़ा ब्रह्मा की आदि-भावना है / आसूं ही उसका पहला बेटा है / वह अंतरात्मा से धावित पोषित / उसने प्रभु का आशीष समेटा है / यदि भरी आंख पर मुस्कुराते हो तुम / सागर का दिल अपमानित होता है / सौंदर्य नयन से पी लो कब रोका / लेकिन तुम उसको मांसल परस न दो / लजवन्ती का अंकुर न मुरझ जाये / निरखो केवल छूले की हाविस न हो /. यदि दृष्टि वासनामय रखते हो तुम / दृग का काजल अपमानित होता है.   

स्व, भगवत रावत.\

 चोर की चोरी / साहूकारी साहूकार की / दासता दास की / और अफसर का अफसरी / बेईमानी बेईमान की / दरिद्रता स्वाभिमानी की / ग़रीब की ग़रीबी / और तस्कर की तस्करी / दिन दूनी रात चौगुनी / फल फूल रही / कमाई कुकरम की / और अजगर की अजगरी / मज़े में हैं यहाँ सब / हे बाबा तुलसीदास / कविताई ससुरी अब / कहाँ जाय का करी।

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45.

                                      कार्तिक मास का महत्व.                                                                                                                                                                                                                                                                                 

कार्तिक-मास के कृष्णपक्ष की द्वादशी को “गोवत्सद्वादशी”, त्र्योदशी को “धनतेरस” तथा धन्वन्तरि जन्मोत्सव, चतुर्दशी को नरकचतुर्दशी तथा अमावस्या को दीपावली व्रत, दूसरे दिन गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट मनाए जाने की परम्परा है. अतः यह कहा जा सकता है कि कार्तिक मास अन्य मासों से उत्तम है.स्कन्दपुराण (१/१४) में उल्लेखित है कि---

“मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः**तीर्थं नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ” अर्थात भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थ के समान ही कार्तिकमास को श्रेष्ठ और दुर्लभ कहा गया है. कार्तिक मास कल्याणकारी मास माना गया है. स्कान्दपुराण(३६-३७) के एक श्लोक १/३६-३७ के अनुसार

-“न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम* न वेदसदृशं शास्त्र न तीर्थ गंगाया समम.” सामान्यरुप से तुलाराशि पर सूर्यनारायण के आते ही कार्तिक मास प्रारम्भ हो जाता है.इस मास का महात्म पद्मपुराण तथा स्कान्दपुराण में बहुत विस्तार से उपलब्ध है.                                                                                   

गोवत्सद्वादशी के दिन गोमाता का पूजन किया जाता है.        इस दिन किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके व्रत का संकल्प करना होता है. इस व्रत में एक समय भोजन किया जाता है, परन्तु भोजन में गाय के दूध या उससे बने पदार्थ तथा तेल में पके पदार्थ नहीं खाया जाना चाहिए. सांयकाल गाएं जब चरकर वापस आएं तो बछडे सहित गौ का गंध, पुष्प, अक्षत, दीप, उडद के बडॊं के साथ पूजन करना चाहिए.                     

एक कथा के अनुसार महर्षि मृगु के आश्रम में भगवान शंकर के दर्शनों की अभिलाषा से करोडॊ मुनिगण तपस्या कर रहे थे. भगवान प्रसन्न हुए और उन्होंने एक लीला रची. वे एक बूढे ब्राह्मण के रुप में, और मां भगवती गाय के प्रकट हुईं और भृगु से कहा कि वे स्नान करके लौटेंगे तब तक आप हमारी गाय की रक्षा करें. ऎसा कहकर वे चल दिए. थॊडी देर बाद वे एक व्याघ्र के रुप में प्रकट होकर गाय को डराने लगे. सामने शेर देखकर गाए कांपने लगी और जोरों से रंभाने लगी. मुनि ने ब्रह्मा से प्राप्त घंटॆ को बजाना शुरु किया,जिससे व्याघ्र तो भाग गया और उसके स्थान पर स्वयं शिव प्रकट हो गए. ब्रह्मवादी ऋषि ने उनका पूजन किया. जिस दिन शिव ने यह लीला की थी,उस दिन कार्तिकमास की कृष्णपक्ष की द्वादशीथी, इसीलिए यह व्रत ”गोवत्सद्वादशी “ के रुप में मनाया जाने लगा.                                     

एक अन्य कथा के अनुसार राजा उत्तानपाद ने पृथ्वी पर इस व्रत को प्रचारित किया. उनकी रानी सुनीति इस व्रत को किया करती थी, जिसके प्रभाव से ध्रुव जैसा पुत्र उन्हें प्राप्त हुआ. आज भी माताएं पुत्र -रक्षा और संतानसुख के लिए इस व्रत को करती हैं.                                             

              कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी” धनतेरस” कहलाती है. यह यमराज से सम्बन्ध रखने वाला व्रत भी है. ऎसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन जो दीपदान करता है,उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होती. इसी त्र्योदशी तिथि को धन्वन्तरि का प्राकट्य माना जाता है. क्षीरसागर का मन्थन करते समय भगवान धन्वन्तरि संसार में समस्त रोगों की औषधियों को कलश मे भरकर प्रकट हुए थे. इस दिन उनका पूजन करके लोग दीर्घ जीवन तथा आरोग्यलाभ के लिए मंगलकामना करते हैं.                                                     

              चतुर्दशी को” नरकचतुर्दशी” के नाम से भी जाना जाता है. एक कथा के अनुसार वामनावतार में भगवान श्रीहरि ने सम्पूर्ण पृथ्वी नाप ली. बलि के दान और भक्ति से प्रसन्न होकर वामनभगवान ने उनसे वर मांगने को कहा. उस समय बलि ने प्रार्थना की कि कार्तिक कृष्ण त्र्योदशी सहित इन तीन दिनों में मेरे राज्य का जो भी व्यक्ति यमराज के उद्देश्य से दीपदान करेगा उसे यमयातना न  हो और इन तीन दिनों में दीपावली मनानेवाले का घर लक्ष्मी कभी न छोडॆ. भगवान ने कहा-“एवमस्तु”. जो मनुष्य इन तीन दिनों में दीपोत्सव करेगा, उसे छोडकर मेरी प्रिया लक्ष्मी कहीं नहीं जाएगी.” जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमावस्या को दीपावली के रुप में यह पर्व अपने ही देश में नहीं वरन अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है. इस पर विस्तार से लिखने की आवश्यकता नहीं है.                                                                      अन्नकूट-महोत्सव- कार्तिकमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट-महोत्सव मनाया जाता है. इस दिन गोवर्धन की पूजा-अर्चना करने             की परम्परा है. प्रातःकाल घर के द्वारदेश माने आंगन में गौ के गोबर का गोवर्धन बनाकर,वृक्षा-शाखादि से संयुक्त और पुष्पों से सुशोभित कर पूजा की जाती है. अनेक स्थानों में इसे मनुष्य के आकार का भी बनाते है.पूजा-अर्चना के बाद यथासामर्थ्य भोग लगाया जाता है.                    

इस महोत्सव की कथा इस प्रकार है- द्वापर में व्रज में अन्नकूट के दिन इन्द्र की पूजा होती थी. श्रीकृष्ण ने गोप-ग्वालों को समझाया कि गाएं और गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः तुम्हें इनकी पूजा करनी चाहिए,क्योंकि इन्द्र को कभी दिखाई ही नहीं देते और न ही आप लोगों के द्वारा चढाया गया अन्न ही गृहन करते हैं. फ़लस्वरुप उनकी प्रेरणा से सभी व्रजवासियों ने गोवर्धन का पूजन किया. स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन का रुप धारण कर उस पकवान को ग्रहण किया.                                             

जब इन्द्र को यह बात ज्ञात हुई तो वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर प्रलयकाल के सदृश मुसलाधार वृष्टि करने लगे. यह देखकर श्रीकृष्णजीने गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण किया, उसके नीचे सब व्रजवासी, ग्वालबाल, गाएं, बछडॆ आदि आ गए. लगातार सात दिनों तक वर्षा होती रही, लेकिन व्रज पर कोई प्रभाव नहीं पडा. ब्रह्माजी ने जब इन्द्र को श्रीकृष्ण के परमब्रह्म परमात्मा होने की बात बतायी तो लज्जित इन्द्र ने व्रज आकर श्रीकृष्णजी से क्षमा मांगी. इस अवसर पर ऎरावत ने आकाशगंगा के जल से और कामधेनु ने अपने दूध से भगवान का अभिषेक किया,जिससे वे “गोविन्द” कहे जाने लगे.                                

गर्गसंहिता में इस बात का उल्लेख मिलता है. अवतार के समय भगवान ने राधा से साथ चलने को कहा. तो राधाजीने कहा कि वृंदावन, यमुना और गोवर्धन के बिना मेरा मन पृथ्वी पर नहीं लगेगा. यह सुन श्रीकृष्णजी ने अपने ह्रदय की ओर दृष्टि डाली थी,जिससे तत्क्षण एक सजल तेज निकलकर “रासभूमि” पर जा गिरा था और वही पर्वत के रुप में परिणत हो गया था. यह रत्नमय पर्वत सुन्दर झरनों, कदम्ब आदि वृक्षों और कुओं से सुशोभित था. यह देखकर राधाजी बहुत प्रसन्न हुईं.                                         

इस संदर्भ में एक और कथा मिलती है. भगवान की प्रेरणा से शाल्मलीद्वीप मे द्रोणांचल की पत्नि से गोवर्धन का जन्म हुआ. भगवान के जानु से वृन्दावन और उनके वामस्कन्ध से यमुनाजी प्रकट हुईं. गोवर्धन को भगवदरुप जानकर सुमेरु, हिमालय आदि पर्वतों ने उसकी पूजा की और उसे गिरिराज बना उसका स्तवन किया.                                                                                                                                                    

एक समय तीर्थयात्रा के प्रसंग मे पुलस्त्यजी वहां आए. गोवर्धन को देखक्रर वे मुग्ध हो उठे और द्रोण के पास जाकार उन्होंने कहा- “मैं काशीनिवासी हूँ. एक याचना लेकर आपके पास आया हूँ. आप अपने इस पुत्र को मुझे दे दें. मैं इसे काशी मे स्थापित कर तप करुंगा. द्रोण उनके अनुरोध को ठुकरा नहीं पाए. तब गोवर्धन ने मुनि से कहा- “मैं दो योजन ऊँचा और पांच योजन चौडा हूँ. आप मुझे कैसे ले चल सकेंगे?” मुनि ने कहा कि मैं तुम्हें अपने हाथ पर उठाए चला चलुंगा.                                                                      

गोवर्धन ने कहा-“महाराज ! एक शर्त है. यदि आप मार्ग में मुझे कहीं रख देंगे तो फ़िर मैं उठ नहीं सकूंगा”. मुनि ने शर्त स्वीकार कर लिया और उसे उठाकर काशी के लिए प्रस्थान करने लगे. मार्ग में व्रजभूमि मिली, जिस पर गोवर्धन की पूर्वस्मृतियां जाग उठी. वह सोचने लगा कि भगवान श्रीकृष्ण राधाजी के साथ यहीं अवतीर्ण होकर बाल्य और कैशोर आदि की बहुत सी लीलाएं करेंगे और मैं इस अद्भुत और रसमयी लीला के बगैर रह न सकूंगा. मन  में ऎसा विचार आते ही उसने अपना भार बढाना शुरु कर दिया. इधर मुनि को लघुशंका की प्रवृत्ति हुई. उन्होंने उसे उसी स्थान पर रख दिया और जब वापिस लौटे तो वे उसे हिला भी न सके. इस बात पर मुनि को क्रोध हो आया और उन्होंने उसे श्राप दे दिया कि तुम प्रतिदिन तिल-तिल घटते जाओगे. उसी शाप से गिरिराज गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता ही जा रहा है.                                                                                                                                                                  

एक कथा और भी पढने को मिलती है. एक ब्राह्मण अपना ऋण वसूलने के लिए मथुरा आ रहा था. लौटते समय उसने एक गोल पत्थर उठाकर अपने झोले में रख लिया. मार्ग में एक राक्षस मिला और उसे खाने दौडा. मरता क्या न करता. उसने उस पत्थर से राक्षस पर प्रहार कर दिया. पत्थर लगते ही  नीच योनि से  उसे छुटकारा मिल गया और उसकी काया दिव्य हो उठी. उसी समय आकाश से एक दिव्य विमान आया और वह गोलोक में चला गया.                                                                                                                                                                                                                 

यमद्वितिया(भैयादूज)-  कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की द्वितिया”यमद्वितिया” या “भैयादूज” कहलाती है. इस दिन यमुना-स्नान, यम पूजन और बहन के घर भाई का भोजन करने का विधान है और शास्त्रीय मतानुसार मृत्यु देवता यमराज की पूजा होती है.                                                                                            

कथा- यम और यमुना भगवान सूर्य की संतान है. दोनों भाई-बहनों मे अतिशय प्रेम था. परंतु यमराज यमलोक की शासन-व्यवस्था में इतने व्यस्त रहते थे कि यमुना के घर ही नहीं जा पाते थे. एक बार यमुना यम से मिलने आयीं. बहन को आया देख यमदेव बहुत प्रसन्न हुए और बोले-“ बहन मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे जो भी वरदान मांगना चाहो मांग लो. यमुना ने कहा-“ भैया ! आज के दिन जो मुझ में स्नान करेगा उसे यमलोक न जाना पडॆ.”.यमराज ने कहा-“ बहन ! ऎसा ही होगा.”. उस दिन कार्तिक मास की शुक्ल द्वितिया थी. इसीलिए इस तिथि को यमुनास्नान का विशेष महत्व है.                  

\कार्तिक मास  की शुक्लपक्ष की द्वितिया तिथि को यमुना ने अपने घर अपने भाई को भोजन कराया . इसीलिए इस तिथि का नाम “यमद्वितिया” पडा.                                                                                           

कार्तिक मास की शुक्ल ‍षष्ठी पर “सूर्यषष्ठी-महोत्सव”, शुक्ल अष्टमी को गोपाष्टमी-महोत्सव,, नवमी को अक्षयनवमी, शुक्ल एकादशी को देवोत्थापनी एकादशी, तथा तुलसी-विवाह, शुक्ल चतुर्दशी को बैकुण्ठचतुर्दशी तथा पूर्णिमा को कार्तिक-पूर्णिमा के नाम         से समारोहपूर्वक पर्व मनाए जाने का महात्म्य पढने को मिलता है.                                                                                                                                                               

मित्रों—दीपावली के पर्व के बारे में आप सब कुछ जानते हैं और उसे भव्यता के साथ मनाते भी आ रहे हैं. उससे जुडी कथाएं भी आप जानते ही हैं,फ़िर भी यहां उद्दृत करने का आशय सिर्फ़ इतना है कि आप उसमे छिपी बातों को गहराई से परखें-देखें और समझे. उपरोक्त बातों की गहराई में हम जब उतरते हैं तो पाते हैं उसमे गाय है, जंगल हैं, ऋषिमुनि हैं, जंगली जानवर है, नदियां है, पहाड है, और इन सबके बीच हम अपनी चिर-परिचित संस्कृति-धर्म आदि का निर्वहन करते हुए लोकजीवन भी हैं. लोकजीवन और लोक साहित्य के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं की झांकिया आज भी हमें दृष्टिगोचर होती है. इन परम्परागत लोक-जीवन प्रक्रियाओं पर ही हमारी संस्कृति टिकी हुई है.

              प्रारंभ में हमारी जीवन प्रक्रिया सरल-सहज थी. प्रकृति की तरह निश्छल और पवित्र थी. आदिम मनुष्य के लिए कुदरत में चारों ओर सुख की सृष्टि थी. चिडियों की चहचहाहट, फ़ूलों की मुस्कान, बादलों की रिमझिम, नदियों की कल-कल, इन्द्रधनुषी रंगों की छटा,कुलमिलाकर ये सब प्रकृति को मनुष्य से जोडते थे. इनमें आनन्द के सभी मूल स्त्रोत थे--ध्वनि, रंग, दृष्य बिंब, क्रिया और गतिशीलता आदि सब कुछ. लेकिन आज परिदृष्य बदल गया है. प्रकृति की घोर उपेक्षा हो रही है. विकास के नाम पर विनाश परोसा जा रहा है और हम मूक दर्शक की तरह सब कुछ देखने, सुनने और सहने के लिए विवश हैं.                  

मोहनदास करमचंद गांधीजी ने कहाथा कि यदि भारत से गाय, गंगा और गांव हटा दें, तो कुछ भी नहीं बचता है. बात कुछ ज्यादा पुरानी नहीं हैं लेकिन उस समय कहा गया आज सामने दिखलायी दे रहा है. गाय की रक्षा-सुरक्षा, मां मानकर की गई होती तो आज बच्चे कुपोषण का शिकार होने पर मजबूर न होते. गाय होती तो बेहतरीन खाद खेतों में पडती और स्वस्थ बीज हम आज खा रहे होते .फ़र्टिलाइजर की जरुरत ही न पडती. घी तो आज पांच सौ रुपया देने के बाद भी असली मिल पाएगा इसमें,शक होता है.. छोटी-मोटी पहाडियां तो कभी की विकास के नाम पर बलि चढ गईं. अब विकास के नाम पर जंगल काटकर सडके बनाई जा रही हैं, जिससे वन्यजीवों के विलुप्त होने का खतरा मंडाराने लगा है. नदियां आज जरुरत से ज्यादा प्रदुषित हो गई हैं. उनका पानी पीने योग्य नहीं बचा. फ़लस्वरुप बहुत सी ज्ञात –अज्ञात बिमारियां सिर उठा रही है.                                                                                                                 

              यह सब देखकर हमें कृष्ण याद आते हैं. और याद आना भी चाहिए. केवल कृष्णजन्म मनाने और आरती उतारने से भला होने वाला नहीं है. हमें आज उनकी सीख को जीवन में उतारना होगा और उनके द्वारा बतलाए मार्ग का अनुररण करना होगा. कृष्णजी ने खेल-खेल में उन गूढ रहस्यों को हम सब पर काफ़ी पहले उजागर कर दिया था. उस पर विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि आज उन रास्तों पर चलने और आगे बढने का संकल्प लेना होगा.

                                           यदि हम ऎसा कर पाए तो स्वर्ग, धरा पर उतरा पाएंगे.                                                                                                                                                                                                                      

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46.

                                                                                                                                                                                           46                                       अंधेरे में मुक्ति के रास्ते खोजता मुक्तिबोध

 

https://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/e/e2/Gajanan_Madhav_Muktibodh_(1917-1964).jpg     गजानन माधव मुक्तिबोध     ( १३ नवम्बर १९१७ * ११ सितम्बर १९६४ )

 

 

मैंने न तो गजानन मुक्तिबोध को देखा है और न ही कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचन्दजी को. हाँ इनको पढने का सुअवसर मुझे लगातार प्राप्त होता रहा है.  इसे संयोग ही कहें कि मुझे प्रमोशन मिला और मैं छत्तीसगढ स्थित कवर्धा में पोस्टमास्टर होकर २००२ में पदस्थ हुआ. कवर्धा का रास्ता राजनांदगांव होकर ही जाता है. यह वह समय था जब मैं मुक्तिबोध की स्मृतियों को संजोते हुए दिग्विजय कालेज पहुंचा था, राजा दिग्विजय दास ने किला कालेज को दान कर दिया था. सन १९५८ में मुक्तिबोध यहाँ अध्यापक होकर आए थे. शहर में कुछ दिन किराये के मकान में गुजारा करने के बाद उन्हें किले के पिछले हिस्से में स्थित सिंहद्वार के बगल में रहने को जगह दी गई थी. इसी तरह सन २०१५ में मुझे मुंशी प्रेमचन्दजी के गांव लमही जाने का सुअवसर मिला. संयोग से यह यात्रा लमही से काठमांडू तक थी.  साहित्य के दो दिग्गज हस्तियों को श्रद्धासुमन चढाने का अनायस ही अवसर मुझे मिला

दिग्विजय कालेज के पिछले हिस्से में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बलदेवप्रसाद मिश्र के साथ मुक्तिबोध की प्रतिमा स्थापित कर इस स्थान को “त्रिवेणी” नाम दिया गया है. मुक्तिबोध के घर की पहचान उसका चक्करदार जीना है जो उनके काव्य-संसार में एक “मोटिफ़” की तरह प्रकट हुआ है. यह चक्करदार जीना ही तो है जो अब मुक्तिबोध के घर होने की याद दिलाता है, लेकिन रंग-रोशन होने व मरम्मत के बाद यह स्थान अब पूर्व की तरह जगमगाने लगा है. वह भुतहा कमरा लगभग गायब हो गया है, जहाँ आज से चार दशक पहले एक कवि रहा करता था, .मरम्मत से पहले इस कमरे में मकड़ी के जाले लगे रहे होगे, जहाँ धूल भरी रही होगी और बरसात के बाद सीलन भरी घुटन भी समायी रही होगी.. यदि यहाँ चक्करदार जीना न होता तो शायद ही कोई जान पाता कि यह कवि का घर रहा होगा. ड़ड़कमरे में बडी-बडी खिडकियां जरुर अपनी जगह स्थित हैं लेकिन वह दृष्य धुंधला सा गया है, जो मेरी स्मृति में बरसों-बरस छाया रहा था.. इन खिडकियों से झांकते हुए  मुझे अपनी स्मृतियों में वह दृष्य जरुर दिखाई दिया था, जो कभी सचमुच में रानीसागर के पास मौजूद था. पास ही में वह श्मशान भूमि भी थी, जहां कभी बच्चों की मौत होने के बाद दफ़ना दिया जाता था.. बारिश में रानीसागर समुद्र की तरह लहराता रहा होगा, सूख चुका था. दूसरी खिडकी से झांकने पर बस्ती का फ़ैलाव साफ़ नजर आता है. चक्करदार जीने से चढकर उस कमरे तक मैं सांस रोके पहुंचा था. मन में अब भी कई तरह के विचार  आकार ले रहे थे. उनकी कविता के धुंधले बिंब बन-बिगड़ रहे थे. किले में छाया घुप्प-घना अन्धकार ,सामंती प्रतीकों, और डरावाने रूपाकारॊं के बीच कवि ने इसी रास्ते पर अपने समूचे अन्धकार, तमाम तरह के प्रतीकों और रूपाकारों को साथ लिए आता है और अपनी कविता में जस का तस उतार देता है.

 

मुक्तिबोध का आवास एक किला है. किला तो फ़िर किला ही होता है, चाहे वह किसी भी भू-भाग में स्थित क्यों न हो. किले की भव्यता और साज-सज्जा को देखकर दर्शक खुश होकर अपने को धन्यभाग महसूसता होगा. लेकिन मुझे यह सब देखते हुए उसका  अत्तीत आंखों के सामने घूमने लगता है. घूमने लगते हैं उन तमाम सैनिकों के चेहरे जिसने अपनी राजा की इच्छा को पूरा करने के लिए अपने प्राणॊं की बाजी लगा दी थी.. मुझे घोड़ॊ के हिनहिनाने की आवाज, हाथियों के चिंघाढ़ने की आवाज सुनाई देने लगती है. जिसे आमतौर पर सेना कहा जाता है. फ़िर हर किले का अपना इतिहास होता है और वह इतिहास रक्त-रंजित घटनाओं से भरा पड़ा है. किला है तो फ़िर एक राजा जरुर ही होगा, उसमे दिग्विजय की कामना भी होगी. समय-समय पर युद्ध भी लड़ॆ गए होगे. केवल एक कामना को पूरा करने के लिए न जाने कितने निरपराधियों को अपनी जाने गवांनी पड़ी होगी. किले के सुरक्षा के लिए न जाने कितने जतन भी किए जाते रहे होगे .किले के अन्दर अनगिनत ‍षडयंत्र भी रचे जाते रहे होगे. जरा-जरा सी बात पर न जाने कितने नागरिकों को राजा की सनक पर मौत के घाट उतार दिया जाता रहा होगा. युद्ध/ संघर्ष के दिनों में किसानों के घर-खेत जला दिए जाते थे, मजदूरों का शोषण किया जाता था,  राजा अपने बचाव के लिए न जाने कितने ही गुप्त रास्ते,बनवाकर रखता था ताकि, उनका उपयोग आसन्न संकट को देखकर पलायन कर सके.

 

मुक्तिबोध किले में रहते हुए महल के वैभव को नहीं देखते, उन्हें तो बस दिखाई देता रहा होगा, उस किले का रक्त-रंजित इतिहास. बेमौत मारे गए और ब्रह्मराक्षस बन चुके लोग, वे अन्धेरी सुरंगे, जिनमें से दिल दहला देने वाली आवाज रह-रह कर गूंजती है. रंग-रोशन के बाद सारा परिदृष्य तो बदल दिया गया,लेकिन जो अतीत में घट चुका, उसे कैसे बदला जा सकता था? इन अन्धेरों ( पाखण्ड)  को उजागर करने के लिए मुक्तिबोधजी ने अन्धेरों को आधार बनाया और कविता उतरती चली गयी..

मुक्तिबोध द्वारा रचित “अंधेरे में” जिन्हें-आठ भागों में कलमबद्ध किया गया है.इसमें शायद ही कोई कविता ऎसी होगी,जिसमें “अन्धकार” का प्रयोग न हुआ हो.यानी हर कविता अन्धेरे में गुंथी गई है. यथा=

 

१.     जिन्दगी के...कमरों के अंधेरे...लगाता है चक्कर...कोई लगातार.

२.     बाहर शहर के, पहाडी के उस पार...अंधेरा सब ओर.

३.     अरे,अरे तालाब के आसपास अंधेरे में वन वृक्ष.

४.     किसी काले डैश की  घनी पट्टी ही आंखों में बंध गई

५.     सूनापन सिहरा...अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे....शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की...मेरे ही डर पर धंसती हुई सिर...छटपटा रही है शब्दों की लहर.

६.     प्रोशेसन ?..नरतब्द्ध नगर के मध्य रात्रि अंधेरे में सुनसान...किसी दूर बैण्ड की दबी हुई क्रमागत ताल-धुन

७.     किंतु वे उद्यान कहां है...अंधेरे में पता नहीं चलता...मात्र सुगन्ध है सब ओर... पर, उस महक-लहर में...कोई छिपी वेदना, कोई गुप्त चिन्ता...छटपटा रही है.

८.     भूमि की सतहों के बहुत-बहुत नीचे...अंधियारी एकान्त...प्राकृत गुहा एक...विस्तृत खोह के सांचले तल में

९.     भयानक सिपाही जाने किस थकी हुई झोंक में...अंधेरे में सुलगाता सिगरेट अचानक...तांबे से चेहरे की ऎंठ झलकती...पथरीली सलवट.

 

हिन्दी साहित्य में सवाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार,समीक्षक,स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे. उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का सेतु भी माना जाता है. तारसप्तक के वे पहले कवि थे, जिसे अज्ञेय एक विशिष्ठ स्थान देते हैं. मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार “ तार सप्तक” के माध्यम से ही आयी थी, लेकिन कोई स्वंतत्र काव्य-संग्रह उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हुआ. मृत्यु से पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी “ एक साहित्यिक की डायरी” प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण “भारतीय ज्ञानपीठ” से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ..सन चौसठ में नागपुर के “विश्वभारती” प्रकाशन ने नयी कविता तथा अन्य निबन्ध प्रकाशित किए. भारतीय ज्ञानपीठ से “काठ का घोडा”, लघु उपन्यास “विपात्र” प्रकाशित हुए. सन अस्सी में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन “भूरी भूर खाक घूल” तथा राजकमल ने छः खण्डॊं में “मुक्तिबोध रचनावली” पेपरबैक में प्रकाशित की.

 

इसके बाद तो जैसे मुक्तिबोध की किताबें धडाधड प्रकाशित की जाने लगीं. “ मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया” अशोक चक्रधर द्वारा १९७५ में प्रकाशित,, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्दति को विकसित और समृद्ध करने, साहित्यिक की डायरी, कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्य शास्त्र, भारत का इतिहास और संस्कृति इतिहास, काठ का सपना तथा सतह से उठता आदमी कहानी संग्रह.

 

बार-बार नौकरियां छोडने वाले इस शख्स ने पत्रकारिता के अलावा शिक्षिकी भी की थी. उनके सहपाठियों में वीरेन्द्रकुमार जैन, प्रभाग शर्मा ,रमाशंकर शुक्ल आदि थे जिन्होंने उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित करने का काम किया.

 

श्री नेमीचंद जैन, प्रभाकर माचवे ने शुजालपुर में बैठकर “तार-सप्तक” की परिकल्पना की थी, जो सन १९४३ में अज्ञेय के सम्पादन में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में मुक्तिबोध प्रथम स्थान पाते हैं, माने तारसाप्तक की शुरुआत इन्ही से होती है. १९४५ के लगभग मुक्तिबोध बनारस गए और त्रिलोचन शास्त्रीजी के साथ “हंस” के सम्पादन में शामिल हुए.. उन्हें काशी रास नहीं आयी. भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचन्द्र जैन ने उन्हें कलकत्ता बुलाया,लेकिन कोई बात नहीं बनी. हारकर वे जबलपुर चले आए और हितकारिणी हाई स्कूल में अध्यापक हो गए.  मुझे उस समय बडा आत्मगौरव सा महसूस हुआ था, जब मुझे यहाँ नौकरी करते हुए कई बार आने के सुअवसर प्राप्त हुए थे.

 

१९५८ में वे राजनांदगांव के दिग्विजय कालेज में प्राध्यापक होकर आए और मृत्यु पर्यन्त तक यहीं रहे. मुक्तिबोध की स्मृतियों को अक्षुण्य बनाने के लिए छत्तीसगढ राज्य सरकार ने इसे “स्मारक” घोषित कर दिया. आश्चर्य इस बात पर कि तत्कालीन सरकार दक्षिणपंथी विचारधारा की थी, जबकि मुक्तिबोध वामपंथी विचारक थे.

 

डा. नामवरसिंह मुक्तिबोध के बारे में लिखते हैं=” नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है जो छायावाद में निराला की थी. निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के साथ ही उनकी सीमा को चुनौती देकर उस सर्जानात्मक विशिष्ठता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका है.

 

शमशेर बहादुर सिंह लिखते हैं” मुक्तिबोध हिन्दी संसार की एक घटना बन गए. कुछ ऎसी घटना जिसकी ओर आँख मूंद लेना असम्भव था. उनका एकनिष्ठ संघर्ष, उनकी अटूट सच्चाई, उनका पूरा जीवन सभी एक साथ हमारी भावनाओं के केन्दीय मंच पर सामने आए और सभी ने उनके कवि होने को नई दृष्टि से देखा. कैसा जीवन था वह और ऎसे उसका अंत क्यों हुआ. और वह समुचित ख्याति से अब तक वंचित क्यों रहा?.”

 

 

मुक्तिबोध पर मित्र जयप्रकाश लिखते हैं-“ महलनुमा घर और किले के वातावरण में रहने के बोझ ने मुक्तिबोध की निम्नवर्गीय आत्मचेतना को दबा नहीं डाला बल्कि किले के इतिहास और उसकी स्मृतियों को अपने वर्गीय आत्मबोध के प्रतिमानों पर परखने को विकलता से भर दिया था. इस इतिहास और स्मृति के भीतर किसानों का संघर्षऔर जुझारू योद्धाओं का बलिदाब था. उनके प्रहारों से अंततः किले के ढह जाने की नियति थी सच पूछा जाए तो सामंती अंहकार और मिथ्यागर्व के ढह जाने का विश्वास एक सुसंगत इतिहास-बोध से उपजा था. मुक्तिबोध यदि लिख सके कि “ अपनी मुक्ति के रास्ते/अकेले में नहीं मिलते” तो इसलिए के वे गौरव-प्रतीकों के जर्जर होकर गिर पडने की अनिवार्यता को और उसके पीछॆ सक्रिय कारणॊं को- जनता के सामूहिक संघर्ष की शक्ति को- पहचान रहे थे. वे पूरे मन से उसके साथ थे.”

 

 “अंधेरे में” तथा “ब्रह्मराक्षस” मुक्तिबोध की ऎसी गूढ कविताएं हैं, जिन्हें पढकर मुझे लगता है कि मुक्तिबोध का कवि इस गहरे तनाव के दवाब से मुक्त होने के लिए नहीं,बल्कि उन बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से, उन अनसुलझे प्रश्नों को सामने लाना चाहते थे, जो उन्हें अन्दर से बैचैन और व्यथिथ करते रहे हैं. ब्रह्मराक्षस द्वारा अपनी देह को बार-बार मलते हुए मैल छूडाने की बात से इसे समझा जा सकता है. देह का मैल तो एक बारगी छूट भी जाएगा,लेकिन आत्मा पर पडॆ मैल को किस तरह धो पाएंगे?

 

ब्रह्मराक्षस

बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य 
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है, 
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज, 
हड़बड़ाहट शब्द पागल से। 
गहन अनुमानिता 
तन की मलिनता 
दूर करने के लिए प्रतिपल 
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात 
स्वच्छ करने-- 
ब्रह्मराक्षस 
घिस रहा है देह 
हाथ के पंजे बराबर, 
बाँह-छाती-मुँह छपाछप 
खूब करते साफ़, 
फिर भी मैल 
फिर भी मैल!! (ब्रह्मराक्षस)

मुक्तिबोध नागपुर से राजनांदगांव हडबडी में आए थे, मानों अपना बचा हुआ जीवन,जितनी जल्दी हो सके,जी लेना चाहते थे. उनकी मनोदश पर शरद कोठारी ने विस्तार से लिखा है. अपनी मनोदशा को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था” पार्टनर मेरे पास समय बहुत कम है और मैं अपना सारा काम पूरा कर लेना चाहता हूँ”

शायद उन्होंने अपना होम-वर्क पूरा कर लिया था. लेकिन उनकी निगाहों में सामंती सत्ता के भग्न प्रतीकों और स्वतंत्र भारत के औदयोगिक विकास के केंद्रों के बीच उभरते जन-संघर्षो- हडताल, जुलूस, नारेबाजी-घेराबंदी और फ़िर दनादन गोलियां उगलती बंदूकों की ओर थी. भारत का वर्तमान आज भी उन यक्ष प्रश्नों से बाहर कहां निकल पाया है? आने वाले समय में जो सपना मुक्तिबोध की आँखों ने संजोया/देखा था, क्या वह निकट भविष्य में साकार हो पाएगा?.

 

 

47.

 

                                           गणगौरिया लाखा री बधाई                                                                                            

                                                                                                                                                                                                          राजस्थान की प्रृष्ठभूमि पुरातनकाल से ही समृद्ध रही है. यहाँ की सांस्कृतिक एवं सामाजिक परम्पराएँ देखते ही बनती है. इस भूमि को वीरप्रसविनी भी कहा जाता है. यहाँ के रणबाकुँरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए हंसते –हंसते अपने प्राणॊ का उत्सर्ग किया है. यहाँ के समाज में अनेक व्रत एवं पर्वोत्सव प्रचलित है, जिसमें गणगौर-महोत्सव का महत्वपूर्ण स्थान है. वसन्त-ऋतु की वासन्ती बयार डोलने पर फ़ागुन के सरस एवं मधुर होली-गीतों का अवसान भी नहीं हो पाता कि पूर्णिमा के पश्चात नगर-नगर, ग्राम-ग्राम में गणगौर व्रत रखने वाली सुकुमारियां एवं सधवा युवतियां के कण्ठों से गणगौर के मधुर गीतों की सरिता बहने लगती है, जिसमें श्रद्धा एवं प्रेम के साथ गणगौर पूजन का सुन्दर आव्हान उनके द्वारा किया जाता है.

              खोल ए गणगौर माता, खोल ए किंवाडी बारै  ऊभी   थारी    पूजन     हाली                                                                     राई सी भौजाई दे कान कँवर सो  वीरो.                                                                                                                                                                                                                                                                                                    नवयौवनाएँ इस गीत में अपने लिए श्रीकृष्ण जैसा सुन्दर, सलोना, वीर भाई तथा स्नेहिल भौजाई पाने की कामना करती हैं. कुमारियाँ नगर एवं ग्राम के बाहर स्थित मदिरों में विराजमान गण (ईश्वर-शिव) तथा गौर (माता पार्वती) की पूजा करती हैं और कामदेव-सा सुन्दर मनभावन वर पाने की कामना करती है.

              कुमारियों एवं नवविवाहिताएँ फ़ाल्गुन पूर्णिमा के पश्चात चैत्र कृष्णपक्षभर-शुक्लपक्ष प्रतिपदा या तृतीया तक पन्द्रह दिन व्रती रहकर शिव-पार्वती का प्रतिदिन पूजन करती हैं. इस व्रत में होली की राख से पिण्ड भी बनाए जाते हैं तथा जौ के अंकुरों के साथ इसका विधिवत पूजन होता है. कुमारियाँ फ़ूलों एवं दूर्वापत्रों से कलश सजाकर मधुर गीत गाती हुई अपने घर ले जाती हैं. इस अवसर पर इन गीतों के माध्यम से उनके द्वारा चूडा और चूँदडी की अक्षयता अथवा सौभाग्यसूचक श्रृंगार पाने की कामना की जाती है. इस अवसर पर वे गा उठती हैं-

              “गणगौरिया लाखा री बधाई ढोला मै मोया जी                                                                                                            म्हारी कुण मनावै गणगौर ..                                                                                                                                       माथा ने भवर गढाओ जी, रखडी रतन जडाओ जी                                                                                         गणगौरिया लाखा री बधाई ढोला मै मोया जी                                                                                                                   म्हारी कुण मनावै गणगौर..”

              पावन प्रातः-वेला में पूजनस्थल पर कुमारियाँ, सौभाग्यवती युवतियाँ पूजा सामग्री सहित सिर पर तीन या सात पुष्पसज्जित कलश लिए हुए जब गणगौर का पूजन करने के लिए जाती हैं तो उनके कण्ठ से यह मधुर गीत मुखरित होने लगता है.

              गौर-गौर गणपति ईसर पूजे पार्वती                                                                                                                              पार्वती का आला गीला, गौर का सोने का टीका.                                                                                                          टीका टमका दे, राजा-रानी बरत करे                                                                                                                            करता-करता आस आयो, मास आयो खेरे खारे लाडु लायो                                                                                            लाडु मनै बीरा को दियो बीरा न चूँदड दीनी,                                                                                                        चूँदड मनै गौर को उढाई, गौर ने म्ही सुहाग दियो.......

              सामान्यतः गणगौर व्रत एवं शिव-पार्वती के रुप में ईसरजी और ईसरीजी की प्रतिमाओं के पूजन द्वारा सम्पन्न होता है. राजस्थान में ऎसी मान्यता है कि इस उत्सव का आरम्भ पार्वतीजी के गौने या पिता के घर पुनः लौटने और उनकी सखियों द्वारा स्वागत-गान को लेकर आनन्दावस्था में हुआ था. इसी स्मृति में आज भी गणगौर की काष्ठप्रतिमाएँ सजाकर मिट्टी की प्रतिमाओं के साथ किसी जलाशय पर ले जायी जाती है और घूमर-जैसे नृत्य तथा लोकगीतों की मधुर ध्वनि से मिट्टी की प्रतिमाओं का विसर्जन कर काष्ठप्रतिमाओं को लाकर पुनः पूजार्थ प्रतिष्ठित किया जाता है.

              यह व्रत-उत्सव आज भी जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, कोटा आदि संभागों में बडी धूमधाम से कुमारियों एवं सधवा युवतियों द्वारा मनाया जाता है, जिसमें स्वयं राज्य के राजा तथा राज्याधिकारी कर्मचारी सवारी के साथ सम्मिलित हुआ करते थे. कोटा में तो अनेक जातियों की स्त्रियाँ भी इसमें शामिल होती थीं तथा राजप्रासाद के प्रांगण में आकर घूमर नृत्य किया करती थीं. उदयपुर में मनाए जाने वाले गणगौर-पर्व पर सवारी का कर्नल टाड ने बडा ही रोचक वर्णन किया है, जिसमें सभी जाति की स्त्रियाँ, बच्चे और पुरुष रंग-रंगीले वस्त्राभूषणॊं से सज्जित होकर अट्टालिकाओं पर बैठकर गणगौर की सवारी देखते थे. यह सवारी तोप के धमाके से और नगाडॆ की ध्वनि से राजप्रासाद से आरम्भ होकर पिछौला झील के गणगौर-घाट तक बडी धूमधाम से पहुँचती थी तथा नौकाविहार एवं आतिशबाजी के प्रदर्शन के पश्चात समाप्त होती थी.

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48.         http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/7/70/Krishna_Holding_Mount_Govardhan_-_Crop.jpg/170px-Krishna_Holding_Mount_Govardhan_-_Crop.jpg                  गोवर्धन-पूजा का रहस्य                  

                                                                                                           

            हमारे जीवन की सबसे बडी समस्या है, मन पर नियंत्रण का न होना.. मनुष्य अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रित न रख पाने के कारण  इधर-उधर भटकता रहता हैं और जीवन में बड़ी-बड़ी उलझने पैदा कर लेता हैं. यदि इस अनियंत्रित मन के किसी कोने में अहंकार के बीज पड़ जाएं तो वह आदमी को पतन की गहराइयों की ओर घसीटता जाता है और उसे पता ही नहीं चल पाता. इसी क्रम में देवताओं के राजा इन्द्र भी इस अहंकार की चपेट में आ गए थे. परिणाम यह हुआ कि उन्होंने अन्य लोगों को तुच्छ समझना शुरु कर दिया था. इस तरह देवराज में असुरता के बीज अहंकार का स्तर अत्यंत ही उग्र होता चला गया.                                                                                                  

भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के इस रोग की चिकित्सा करनी चाही. और दूसरी ओर गोवर्धनगिरि की “चिन्मयता” व्यक्त कर देने की उनकी इच्छा हुई. उन्होंने नन्दबाबा से अनुरोध किया कि हमें इन्द्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए,जो हमें अप्रत्यक्षरुप से मदद करते हैं, हमारे पशुओं को वहाँ हरा भरा-चारा और नदियों के माध्यम से हमें पानी भी उपलब्ध कराते हैं. श्रीकृष्ण कि यह योजना आशुतोष शंकरजी को बहुत अच्छी लगी और वे दल-बल के साथ इस गिरिपूजन में सम्मिलित हुए.                                                                                                 

गोवर्धन पूजा का यह औचित्य राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, देवताओ और सिद्धों से भी न छिपा था. वे भी बडी प्रसन्नता के साथ इस समारोह में उपस्थित हुए थे. देवगिरि सुमेरु और नगाधिराज हिमालय के लिए भी गोवर्धनगिरि कि चिन्मयता” व्यक्त की थी, इसलिए उनमें जातिगत द्वेष नही जागा और वे भी बड़ी प्रसन्नता के साथ इस पूजा समारोह में उपस्थित हुए थे.

              पूजन के समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने विशाल रुप धारण कर अपने को “गोवर्धन” घोषित किया और इस तरह उन्होंने गोवर्धनगिरि से अपनी “अभिन्नता” प्रकट की. देवता ही नही वरन मनुष्य भी इससे कम प्रसन्न नहीं हुए. उन्होंने फ़ूलों और खीलों की मुक्तहस्त वर्षा प्रारंभ कर दी. उधर देवरज इन्द्र का अहंकार का पर्दा इतना घना हो चुका था कि वे गिरिराज की भगवतरुपता तनिक भी नहीं आंक पाए. वे क्रोध और द्वेश की आग में जलने लगे. उन्होंने प्रलयकारी मेघों को आज्ञा दी कि वे पूरे व्रज को ध्वंस कर दें. इतना ही नहीं वे स्वयं अपने ऎरावत पर सवार होकर मरुद्गणॊं की सहायता में आ डटे. त्राहि-त्राहि सी मच गई थी उस समय व्रज में. देखते ही देखते जलप्रलय ने लोगों के घर-बार उजाड़ने शुरु कर दिया. चारों तरफ़ अरफ़ा-तरफ़ी मची हुई थी. श्रीकृष्णजी ने तत्काल गोवर्धन-पर्वत को एक हाथ में उठा लिया और लोगों को उसके नीचे आकर शरण लेने को कहा. इस तरह पूरा व्रज उस पर्वत के नीचे आ इकठ्ठा हुआ. भगवान ने मन ही मन श्री शेषजी को और सुदर्शन को आज्ञा दी. वे तत्क्षण ही वहाँ आ उपस्थित हुए. चक्र ने पर्वत के ऊपर स्थित हो जलसम्पात पी लिया और नीचे कुण्डलाकार हो शेषजी ने सारा जलप्रवाह रोक लिया.

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              इन्द्र ने जब अपनी सारी शक्तियाँ झोंक दी, बावजूद इसके वे वहाँ कुछ नहीं बिगाड़ पाए, तब जाकर उनको वस्तुस्थिति का बोध हुआ और अहंकार जाता रहा. अब वे अपने आपको एक अपराधी की तरह महसूस करने लेगे. केवल और केवल एक अन्तिम विकल्प बचा था उनके पास कि जाकर श्रीकृष्णजी से माफ़ी मांगी जाए. वे तत्काल धरती पर आए और श्रीचरणॊं में आकर गिर गए. उन्होंने अपने कृत्य के लिए क्षमा याचना की. श्रीभगवान ने उन्हें क्षमा कर दिया. इन्द्र ने आकाश-गंगा के जल से श्रीकृष्णजी का अभिषेक किया. इस प्रकार गोकुल की की गयी रक्षा से कामधेनु भी प्रसन हुईं और उसने अपनी दुग्धधारा से श्रीभगवान का अभिषेक किया. इन अभिषेकों को देखकर गिरिराज गोवर्धन के हर्ष का ठिकाना न रहा और वह द्रवीभूत हो बह चला. तब श्रीभगवान ने प्रसन्न होकर अपना करकमल उस पर रखा, जिसका चिन्ह आज भी दीखता है. यथा- “तध्दस्तचिन्हमद्दापि दृश्यते तदगिरि नृप” 

            श्री गोवर्धन की चिन्मयता का स्पष्टीकरण गर्गसंहिता ( गिरिखण्ड ४/१२) में हुआ है. अवतार के समय भगवान ने राधाजी से साथ चलने को कहा था. उस पर श्रीराधाजी ने कहा कि वृंदावन, यमुना और गोवर्धन के बिना मेरा मन पृथ्वी पर नहीं लगेगा. यह सुनकर श्रीकृष्णजी ने अपने हृदय की ओर दृष्टि डाली, जिससे एक सजल तेज निकलकर “रासभूमि” पर आ गिरा और वहीं पर्वत के रुप में परिणत हो गया. यह रत्नमय शृंगों, सुन्दर झरनों, कदम्ब आदि वृक्षों एवं कुंजों से सुशोभित था. उसमें अन्य नाना प्रकार की दिव्य सामग्रियाँ उपस्थित थीं, जिसे देखकर राधाजी बहुत प्रसन्न हुईं.

              इस संदर्भ में एक कथा और है. भगवानश्री के प्रेरणा से शाल्मलीद्वीप में द्रोणाचल की पत्नि से गोवर्धन का जन्म हुआ. भगवान की जानु से वृन्दावन और उनके वामस्कन्ध से यमुना प्रकट हुईं. गोवर्धन को भगवदरुप जानकर ही सुमेरु, हिमालय आदि पर्वतों ने उनकी पूजा की और गिरिराज बना उसका स्तवन किया.                                 

              एक समय तीर्थ यात्रा के प्रसंग में पुलस्त्यजी वहाँ आए. वे गिरिराज को देखकर मुग्ध हो उठे और द्रोण के पास जाकर उन्होंने कहा:-“मैं काशीवासी हूँ. एक याचना लेकर आया हूँ. आप अपने इस पुत्र को मुझे दे दें. मैं इसे काशी में स्थापित कर वहीं तप करुँगा”. इस पर द्रोण पुत्र के स्नेह से कातर हो उठे, पर वे ऋषि की मांग ठुकरा न सके. तब गोवर्धन ने मुनि से कहा:-“ मैं दो योजन ऊँचा और पाँच योजन चौड़ा हूँ. आप मुझे कैसे ले चल सकेंगे?”. मुनि ने कहा:-“मैं तुम्हें हाथ पर उठाए चला चलूँगा.”.                        

              गोवर्धन ने कहा:-“ महाराज ! एक शर्त है. यदि आप मुझे मार्ग में कहीं रख देंगे तो मैं उठाए उठ न सकूँगा.” मुनि ने यह शर्त स्वीकार कर ली. तत्पश्चात पुलस्त्य मुनि ने हाथ पर गोवर्धन उठाकर काशी के लिए प्रस्थान किया. मार्ग में व्रजभूमि मिली, जिस पर गोवर्धन की पूर्वस्मृतियाँ जाग उठीं. वह सोचने लगा कि भगवान श्रीकृष्ण राधा के साथ यहीं अवतीर्ण हो बाल्य और कैशोर आदि की मधुर लीला करेंगे. उस अनुपम रस के बिना मैं रह न सकूँगा. ऎसे विचार उत्पन्न होते ही वह भारी होने लगा, जिससे मुनि थक गए. इधर लघुशंका की भी प्रवृत्ति हुई. उन्होंने पर्वत को एक जगह रख दिया. लघुशंका से निवृत्त हो उन्होंने पुनः स्नान किया और गोवर्धन को उठने लगे, लेकिन वह टस से मस न हो सका. उसने बड़े विनीत भाव से मुनि को शर्त की याद दिलाई. इस पर मुनि को क्रोध आ गया और उन्होंने श्राप दे दिया कि तुमने मेरा मनोरथ पूरा नहीं किया, इसलिए तुम प्रतिदिन तिल-तिल घटते जाओगे. उसी श्राप की वजह से गोवर्धन आज भी तिल-तिल घटता ही जा रहा है.                                                          

              इसी क्रम में एक कथा और है कि एक ब्राह्मण अपना ऋण वसूलने के लिए मथुरा आया. लौटते समय उसने गिरिराज का एक गोल पत्थर अपने साथ रख लिया. मार्ग में उसे एक भयंकर राक्षस ने घेर लिया. राक्षस को सामने देख वह कांप उठा. ब्राह्मण को तत्काल कुछ न सुझाई दिया. उसने अपनी झोली में से उस पाषाणखण्ड को निकाला और राक्षस की तरफ़ उझाल दिया. उस पाषाण के अद्भुत प्रभाव से उस राक्षस को नीच योनि से छुटकारा मिल गया और उसकी काया दिव्य हो गयी. उसी क्षण एक विमान आकाशमार्ग से उतरा, जिस पर आरुढ होकर वह “गोलोक” चला गया.                                                                                

              शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि गन्धमादन की यात्रा अथवा नाना प्रकार के पुण्यों एवं तपस्याओं का जो फ़ल प्राप्त होता है, उससे भी कोटिगुण अधिक फ़ल गोवर्धन के दर्शन मात्र से होता है. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाए जाने वाले इस पर्व अर्थात गोवर्धन पूजन के दिन पवित्र होकर गोवर्धन तथा गोपेश भगवान श्री कृष्णजी का पूजन करना चाहिए. यदि आपके यहाँ गौ और बैल हों तो उनको वस्त्राभूषणॊं तथा मालाओं से सजाना चाहिए. पूजन करते समय इस मंत्र का उच्चारण जरुर करें                                 

                             गोवर्धन धराधर गोकुलत्राणकारक / विष्णुवाहकृतोच्छाय गवां कोटिप्रभो भव

            अर्थात :-पृथ्वी को धारण करने वले गोवर्धन ! आप गोकुल की रक्षक हैं. भगवान श्रीकृष्ण ने आपको अपनी भुजाओं पर उठाया था. आप मुझे करोडॊं गौएँ प्रदान करें.,

              दूसरी बात यह है कि इस समय तक शरद्कालीन उपज परिपक्व होकर घरों में आ जाती है. भण्डार परिपूर्ण हो जाते हैं. अतः निश्चिंत होकर लोग नयी उपज के शस्यों से विभिन्न प्रकार के पदार्थ बनाकर श्रीमन्नारायण को समर्पित करते हैं. गव्य पदार्थों को भी इस उत्सव में सजा-सँवारकर निवेदित किया जाता है. गोमय का गोवर्धन अर्थात पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है.

              अनन्तकाल से भारतीय आज भी अपने घरों में “गोवर्धन” की पूजा-अर्चना करते हैं. और अपने और अपने परिवार की समृद्दी के लिए प्रार्थना कर अपने को धन्य मानते हैं.

             

                             (पत्नी  श्रीमती शकुन्तला यादव-- गोवर्धन की पूजा-अर्चना करते हुए.)

 

              इस अवसर पर गाए जाने वाले परम्परा गीत की बानगी देखिए.                                                                         --------------------------------------------------------------

              मैं तो गोवर्धन को जाउँ, मेरो वीर नाय मानै मेरो मनवा                                                                                                   नाय चहिये मोहे पार-पडौसन, इकली-दुकली धाऊँ मेरो वीर                                                                            

              सात कोस की दऊँ परकम्मा,शान्तनु कुंड में नहाऊँ मेरो वीर                                                                             

              चकले सुर के दरसन करिके, मानसी गंगा नहाऊँ मेरो वीर                                                                                               सात सेर की करी कढ़ैया, संतन न्योत जिमाऊँ मेरो वीर                                                                                                  गिरि गोवर्धन देव हमारो,  पल-पल सीस नवाऊँ मेरो वीर                                                                                                     प्रेम सहित गिरिराज पुजाऊँ,मनवांछित फ़ल पाऊँ मेरो वीर.

(२)         श्री  गोवर्धन  महाराज तेरे माथे  मुकुट  विराज रहा                                                                                         

              तोपे पान चढ़े, तोपे फ़ूल चढ़े और चढ़े दूधन की धार                                                                                                     तोरे कानन कुंडल सोह रहे,  तोरी ठोडी पे हीरा लाल                                                                                                    

              तोरे गले में कंठा सोने को,तेरी झाँकी बनी है विशाल                                                                                      

              तोरी सात कोस की  परकम्मा, चकलेश्वर है  विश्राम.                                                                                      

              श्री गोवर्धन महाराज,     तोरे माथे मुकुट विराज रहा

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49.

 


                            
  ज्योतिषशास्त्र में श्रीलक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के उपाय

                *   प्रातः काल उठते ही मानसिक रूप से 21 बार "श्री" का उच्चारण कर अपनी माता के चरण स्पर्श करे अथवा घर में जो वृद्ध स्त्री हो, उनके चरण स्पर्श करे। श्री वृद्धि होगी।
                *  
अपने निवास में कुछ कच्चा स्थान अवश्य रखे। घर के मध्य में हो तो अच्छा है यदि वहाँ तुलसी का पौधा लगाकर नित्य प्रति जलाभिषेक से पूजा करे तो बाधित पूर्ण होंगे।
               *  
किसी भी प्रथम शुक्रवार को सफ़ेद रुमाल में सवा सौ ग्राम मिश्री बांधकर लक्ष्मीनारायण मंदिर में अर्पित कर दे। तीन शुक्रवार तक करने मात्र से आपको इसका प्रभाव दिखाई देने लगेगा। शुभ समाचार या धनागमन हो सकता है।
               *    
प्राण प्रतिष्ठित अभिमंत्रित घोड़े की नाल को अपने घर के मुख्य द्वार पर लगावे।
               *    
प्रत्येक शुक्रवार को माँ लक्ष्मी का स्मरण करके कोई भी सफेद प्रसाद कन्याओ को बांटे। लक्ष्मी प्रसन्न रहेगी।
               *    
प्रत्येक मंगलवार को रोटी पर गुड रखकर और शनिवार को सरसो का तेल लगाकर रोटी पर गुड रखकर कुत्तो को दे। माँ लक्ष्मी की कृपा रहेगी।
              *     
प्रत्येक शनिवार अमावस्या को आठ इमरती कुत्तो को देवे। आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।
              *     
मंगलवार को हनुमानजी को 11 रूपये के गुड चने का भोग लगाए। फिर पान के पत्ते पर माखन और सिन्दूर रखकर 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करे। यह प्रयोग तीन मंगलवार तक करे। चमत्कार महसूस करेंगे। अचानक खर्चो में रूकावट आकर आपके पास धन स्थिर होने लगेगा।
              *     
घर में नियमित पूजा करते समय दीपक में रुई की बाती के स्थान पर मौली की बाती का प्रयोग करे, क्योकि माँ लक्ष्मी को रक्त वर्ण सर्वाधिक प्रिय है।
              *     
किसी भी श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर परिसर में शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को 9 वर्ष से कम की 11 कन्याओ को खीर के साथ मिश्री का भोजन कराये तथा उपहार में लाल वस्त्र दे। यह उपाय प्रथम शुक्रवार से आरम्भ करके लगातार 6 शुक्रवार तक करना है। आर्थिक लाभ उतरोतर बढ़ने लगेगा।
             *      
प्रत्येक शुक्रवार को श्रीसूक्त या बीज युक्त श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ करे यह प्रयोग प्रतिदिन नियमित रूप से भी हो सकता है। श्री सूक्त के पाठ का प्रभाव सात शुक्रवार के पाठ से ही दिखने लगेगा और जो व्यक्ति श्री सूक्त का नियमित पाठ करता है उसके घर में धन वृद्धि के साथ-साथ उस व्यक्ति की अपमृत्यु भी नहीं होती है।


                                              
लक्ष्मी प्राप्ति के सामान्य सूत्र        
                
               *      
सुगढ़ ग्रहणी को दैनं दिन कार्यो में बहुत ध्यान रखना चाहिए। अधोलिखित सूत्र प्रत्येक गृहस्थी के लिए माननीय है, करणीय है। ये सूत्र देवी लक्ष्मी प्राप्ति के स्वर्णिम सूत्र है।
               *      
याचक को दान देहरी के अंदर से ही करे, उसे घर की देहरी के अन्दर नहीं आने दे।
               *      
यदि नियमित रूप से घर की रोटी गाय को तथा अंतिम रोटी कुत्तो को जो लोग देते है तो उनके उतरोतर वृद्धि होती है, वंश वृद्धि होती है।
              *       
घर में कभी भी नमक खुले डिब्बे में न रखे। क्षार बंद ही होना चाहिए।
              *       
प्रातः उठकर सर्वप्रथम गृहलक्ष्मी यदि मुख्य द्वार पर एक गिलास अथवा लोटा जल डाले तो माँ लक्ष्मी के आने का मार्ग प्रशस्त होता है।
              *       
नित्य पीपल के पेड़ में जल डालने से भी आर्थिक सम्पन्नता रहती है।
              *       
यदि घर में सुख शांति चाहते है तो घर में कबाड़ न रखे। प्रत्येक अमावस्या को घर की पूर्ण सफाई कर फालतु के सामान को कबाड़ी को बेच दे, या बाहर फेंक दे। सफाई के बाद पांच अगरबत्ती पूजागृह में करे।
              *     
यदि हमेशा गेंहुँ शनिवार के दिन पिसवावे तथा गेंहुँ में एक मुठ्ठी काले चने डालकर पिसवावे तो आर्थिक वृद्धि होती है।
              *     
किसी बुधवार के दिन यदि आपके सामने हिंजड़ा आ जाये तो उसके मांगे बिना ही उसे पैसा अवश्य दे। यदि आप आर्थिक रूप से समस्या ग्रस्त है तो 21 शुक्रवार तक 9 वर्ष से कम आयु की पांच कन्याओ को खीर व मिश्री बांटे।
             *      
घर में जितने भी दरवाजे हो, उनमे समय-समय पर तेल डाले रखे जिससे बंद करते वक्त रगड़ से आवाज न आवे।
             *      
आर्थिक समस्या का निदान करने के लिए पांच शुक्रवार तक किसी सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री का दान करे। सुहाग सामग्री आपकी क्षमतानुसार होनी चाहिए।
             *      
जब भी बैंक या ए.टी.एम. में से पैसे निकाले तब मन ही मन कोई भी लक्ष्मी मन्त्र का जाप अवश्य करे। बड़ा मंत्र याद न हो तो बीज मंत्र "श्री" का ही जाप कर ले।
             *      
संध्याकाल एवं प्रातः काल में किसी को उधार न दे। अन्यथा पैसे वापिस मिलने में मशक्कत करनी पड़ सकती है।
            *       
शुक्रवार को किसी सुहागिन को लाल वस्त्र अथवा सुहाग सामग्री दान करने का मौका मिले तो जरुर करे। माँ लक्ष्मी के आपके घर में आगमन का संकेत है।
             *      
यदि अचानक आर्थिक हानि हो रही है, या सट्टे में पैसे डूब गये है तो सात शुक्रवार को सात सुहागिनों को अपनी पत्नी के माध्यम से लाल वस्तु उपहार में दे। उपहार में इत्र का प्रयोग भी करे। हानि बंद होना लगेगी।
          *         
यदि गमन मार्ग पर मोर नृत्य करता दिखाई दे तो तुरंत उस स्थान की मिट्टी उठाकर जेब या पर्स में रखकर घर आवे तथा धूप दीप दिखाकर मिट्टी को चाँदी के ताबीज या लाल रेशमी वस्त्र में रखकर अपने धन रखने के स्थान पर रख दे।
          *         
यदि किसी शुक्रवार को कोई सुहागिन स्त्री अनायास बिन बुलाये आपके घर आती है तो उसका सम्मान कर जलपान कराये।
          *         
यदि धनतेरस के दिन घर में छिपकली के दर्शन होते है तो यह तय है कि पूरा वर्ष शुभ रहेगा। अगर संयोग से दिखाई दे जाये तो यह स्मृति में रखे कि आज छिपकली दर्शन एक विशेषश्शगुन है। तुरंत छिपकली को प्रणाम करे सम्भव हो तो छिपकली की कुमकुम के छींटे उछाल कर मंगल कामना करे। कहा भी है- धनतेरस को छिपकली दर्शन को तरसे। गर दिख जाय तो छप्पर फाड़कर धन बरसे।


                             
फेंगशुई द्वारा सौभाग्यशाली बनने के सरल उपाय 

               *    
घरो में मंगल तथा शुभ चिन्हो का प्रयोग करे। प्राचीन काल से ही लोग भाग्यवान बनने के लिए मांगलिक लिपियों एवं प्रतिको का प्रदर्शन करते आए है। घरो में त्रिशूल, ॐ और स्वस्तिक चिन्ह होना ही चाहिए इनका प्रयोग एक साथ करना विशेष लाभप्रद माना गया है मांगलिक चिन्ह कई मुसीबतो से बचाते है।बैठक के दक्षिण-पश्चिम दिशा के कोने में परिवार के सदस्यो की प्रसन्न मुद्रा वाली छाया चित्र लगाना चाहिए। पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम उतरोतर बढ़े इसके लिए शयनकक्ष के दक्षिण-पश्चिम दिशा वाले कोने में दोनों की प्रसन्नचित मुद्रा वाला छाया चित्र लगाना चाहिए।
               *    
दरवाजे के ठीक सामने कभी नहीं सोना चाहिए। सदैव यह ध्यान रखे कि प्रवेश द्वार की ओर पैर करके न सोए। सोये समय यह ध्यान रखे कि आपका सिर अथवा पैर सीधे दरवाजे के सामने न हो, इसलिए अपना पलंग दरवाजे के दायी ओर या बायीं ओर खिसका देना चाहिये।
             *      
झाड़ू सदा छिपाकर रखे। खुले स्थान पर झाड़ू रखना अपशकुन मन जाता है। यदि आप अपने घर के बाहर मुख्य द्वार के सामने झाड़ू उलटी करके रखते है तो यह घुसपैठियों से घर रक्षा करती है, किन्तु यह कार्य केवल रात को किया जा सकता है। दिन के समय झाड़ू छिपाकर रखे, ताकि वह किसी को नजर न आए। भोजन कक्ष में झाड़ू को भूलकर भी न रखे। इससे अन्न व आय के साफ होने का डर रहता है।
            *       
अलमारी सदैव बंद रखे। पुस्तके पढ़ने का शौक अच्छा है किन्तु घर के पुस्तकालय की अलमारी को बंद रखे एवं नकारात्मक ऊर्जा से बचे।
            *       
दर्पण को शयनकक्ष में नहीं लगाना चाहिए। पलंग के सामने आईना पति-पत्नी के वैवाहिक सम्बन्धो में तनाव पैदा कर सकता है। यदि दर्पण है तो उसे ढककर रखे। कमरे की छत पर भी आईना न लगावे। पलंग पर सो रहे पति-पत्नी को प्रतिबिम्ब करने वाला आईना तलाक का कारण बन सकता है, इसलिए रात्रि के समय आईना दृष्टि से ओझल हो या ढंका हुआ हो।
             *      
सूखे फूलो को घर से बाहर फेंक दे। पौधे एवं ताजे पुष्प फेंगशुई के उपयोगी शस्त्र है। ताजा फूल लगाये जा सकते है। तजा फूल जीवन के प्रतीक है जब कि सूखे फूल मृत्यु के सूचक है। फूलो के पौधे शयनकक्ष के बजाय बैठक अथवा भोजन कक्ष में रखना शुभ है। मुरझाने पर उन्हें हटा देना चाहिए। ताजा फूलो के बजाय कृत्रिम फूलो का उपयोग कर सकते है।
            *       
शुभ परिणामो के लिए दरवाजे के पास पानी रखे। यह उत्तर, पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर के दरवाजो के लिए उपयोगी है। पानी से भरे पात्र को दरवाजे के पास केवल बांयी ओर रखना चाहिए। अर्थात जब आप घर में खड़े हो और बाहर देखे तब आपके बांयी ओर पानी का पात्र हो। इसके तहत लघु मछली घर या पानी में स्थित डॉल्फिन का चित्र भी हो सकता है। दरवाजे के दांयी तरफ पानी रखने से व्यक्ति किसी दूसरी महिला प्रेमपाश में बद्ध हो सकता है अतः दरवाजे के दांयी तरफ पानी खराब परिणाम होता है।
            *       
फेंगशुई के अनुसार भी भाग्य वृद्धि के लिए घोड़े की नाल को मुख्य द्वार के ऊपर दरवाजे के फ्रेम के बाहर लगा सकते है। इसके दोनों सिरे नीचे की तरफ हो। घोड़े की नाल घातु तत्व है, इसलिए पूर्व और दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर वाले दरवाजो पर इसका प्रयोग न करे। 

                                                                                                                                               

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50

 

                                                         डाकघर _ इतिहास के झरोखे से                                                                                                                                                                                                                                                                            आत्यानुधिक डाकघर भवन में जहां मरकरी लाइट की चकाचौंध आंखों को चुंधिया रही हो, जहाँ कम्युटर अपना कार्य पूरी दक्षता के साथ  संपन्न कर रहें हों, जहां से सेटेलाइट मनीआर्डर भेजे जा रहे हों, जहां मशीनें चिट्ठियों की सार्टिंग बडी बारिकी से कर रही हों, ऐसे सुसज्जित भवन में,आज की सदी में पैदा हुए किसी नौजवान को  ले जा कर खडा कर दिया जाए तो वह कौतुहल से उन्हें नहीं देखेगा,क्योकि वह आज वे सारी चिजों को अपने लैप्टाप में अथवा कम्प्युटर पर स्वय़ं देख-सुन रहा है,मोबाइल सेट उसकी अपनी जेब में है, वह बटन दबाते ही अपने किसी मित्र से रोज बात करता रहता है,उसे तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा.और न ही वह यह जानना चाहेगा कि यह किस प्रकार काम करते है और इसके पीछे उसका अपना क्या इतिहास रहा होगा.                                                                     

             यदि कोई उससे कहे कि क्या वह यह जानता है कि आज से सैकडॊं वर्ष पूर्व ये सारी व्यवस्था नहीं थी,तब आदमी        अपना काम कैसे चलाता होगा? कैसे अपना संदेशा अपने सुदूर बैठे मित्र अथवा परिवार के सदस्यों को भेजते रहा होगा? तो निश्चित तौर पर वह यह जानना चाहेगा,कि अभावों के बीच भी उसके पूर्वज कैसे काम चलाते रहे होंगे. सबसे बडी कमी आज हमारे बीच में यही है कि हम न तो उसे अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी नहीं देते.जबकि हमारा यह उत्तरदायित्व बनता है कि हम अपनी विरासत, अपनी भावी पीढी को देते चले. जब तक हमे उसके बारे में कुछ भी पता नहीं होगा,हम आखिर गौरव किस बात पर करेगें?                                                                                                                                                                                                                                                              डाकघर का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है. वह न सिर्फ़ हमें चमत्कृत करता है, बल्कि एक ऐसे भावालोक में भी ले जाता है, कि कठिन परिस्थितियों में हमारे पूर्वजों ने उसे इस स्थिति तक लाने में कितनी मेहनत की थी.                                                                                                                                                                                                                            इतिहास को टटोलें तो हमें ज्ञात होता है कि राजघरानॊं में कभी कबूतर पाले जाते थे और उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण भी दिया जाता था और सामने वाले की पहचान भी बतलानी होती थी कि पत्र प्राप्तकर्ता कैसा है ? इसके लिए उसे उसका छाया-चित्र दिखलाया जाता था और उसके पैरों में संदेशा/पत्र आदि बांध दिया जाता था और वह वहां जाकर उसी व्यक्ति को पत्र देता था,जिसकी पहचान उससे करवा दी गई थी. राजकुमार अकसर अपने प्रेम-संदेशे अपनी प्रेयसी को इसी के माध्यम से भिजवाते थे.                                                                                                                

              यह एक श्रमसाध्य कार्य था और इसमे कई बात धोका भी हो जाता था. उस समय भारतवर्ष में कै छोटे-बडे राज्य होते थे. राजा को कहीं पत्र भेजना होता था तो वह पत्र लिख कर उस पर राजमोहर चस्पा कर उसे घुडसवार के माध्यम से पहुंचता था. कई राजा- महाराजाऒं ने एक निश्चित दूरी तय कर रखी थी. घुडसवार उस दूरी तक जाता और वहां तैनात दूसरे घुडसवार को वह पत्र सौंप देता था. इस तरह डाक लंबी दूरी तक पहुंचायी जाती थी. यह व्यवस्था केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित थी. आमजन इस व्यवस्था को जुटा नहीं पाता था.                                                                                                                                                                                                                          

              डाक व्यावस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिए प्रयास चलते रहे. फ़िर डाक व्यवस्था हुई जो आमजन के लिए सुलभ थी. विश्व को अचंभित कर देने वाली मोर्स प्रणाली का आविष्कार हो चुका था. टेलीग्राफ़ लाइनें बिछाई जाने लगी थी. इस तरह संचार व्यवस्था में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया और आवश्यकतानुसार चीजें जुडती चली गयीं.             

                                                                                                                                                                                           * सन 1825 में पहला टिकिट सिंध से कराची से जारी किया गया.                                                                                  * सन 1830 में इंगलैण्ड और भारत के मध्य डाक संबंध स्थापित हुए.                                                                                   * सन 1851में कलकत्त्ता एवं डायम्ण्ड हार्वर के बीच पहला सरकारी तार लाइन की व्यवस्था हुई.                                     * सन 1854 में पूरे भारत के लिए डाक टिकिट जारी की गई.                                                                                              * सन 1865 की 27 तारीख को भारत और इंग्लैण्ड के बीच तार व्यवस्था स्थापित हुई.                                                     * सन 1877 में व्ही.पी.प्रणाली जारी                                                                                                                          * सन 1880 में मनीआर्डर व्यवस्था. जारी                                                                                                                                 * सन 1885 में रकम जमा करने” बचत बविंक” का शुभारंभ.

* 1907 में १५ नवम्बर को पहला इंटर्नेशनल रिप्लाई कूपन जारी किया गया.

              * सन 1911 में इलाहाबाद से नैनी जंक्शन तक पत्र लेकर पहले विमान ने उडान भरी. यह वह समय था जब लोगों ने आकाश में उडता हुआ देखा था . पास से देखने एवं उडान भरते हुए नजदीक से देख पाने का सौभाग्य केवल उसी दिन मिला था. अतः नजदीक से देखने वालों की भीड का अंदाज आप स्वयं लगा सकते हैं बेहिसाब भीड के बावजूद वहां गजब की शांति थी क्योंकि लोग आश्चर्य में डूबे हुए थे. एक डच विमान जिसका नाम बंबर-सोभंर था और जिसके चालक का नाम हेनरी पिके,जो फ़ांसीसी था, अपना विमान फ़ांस से लेकर आया था. इसके बाद अलग-अलग देशो में हवाई डाक सेवा प्रारंभ की.  प्रथम उडान इटली के ब्रिंडस्ट नामक स्थान से अलबानिया के बेलोना नामक स्थान के मध्य हुई परन्तु नागरिक हवाई डाकसेवा को आरम्भ करने का गौरव आस्ट्रिया को प्राप्त हुआ. इस सेवा के अंतर्गत यह सुविधा सर्व प्रथम आस्ट्रिया के वियेना नगर तथा रूस के कोव नगर के मध्य प्रचलन में आयी.           

              * वायुयान से डाक लाने और ले जाने से पूर्व गैस से भरे गुब्बारों को प्रयोग में लाया गया. इस व्यवस्था अंजाम में लाने वाले व्यक्ति का नाम जान वाईस था,जिसने 35मील की उडान भरी थी. जानवाईस के सम्मान में अमरीका ने एक विशेष डाक सेवा प्रारंभ की एवं उस गुब्बारे का सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया.                                                                                                                                                                                                                                                    

* 1917 मे सर्वप्रथम अधिकृत हवाई डाक टिकिट का प्रचलन आरम्भ हुआ.6 नवम्बर को पहला समाचार पत्र”केप-टाउन”जो केप्टाउन में छापा गया था. इसे पोर्ट- एलिजाबेथ: नामक हवाई जहाज से भेजा गया था.

              * 1918 में यू.एस.ऎ ने हवाई टिकिट का प्रचलन आरम्भ हुआ. तथा टिकिटॊं पर हवाई जहाज के चित्र भी प्रकाशित किए गए.

              * 1928 में “न्यूयार्क हेराल्ड ने अपने नियमित हवाई डाक संस्करण का प्राकाशन प्रारंभ किया था.

              *1929 को भारत ने कामनवेल्थ हवाई डाक टिकिट जरी किए गए.

              * 1930  को एक्सप्रेस डिलिवरी सर्विस जारी की गयी.                                                                                                                * 1932 में अमेरीका ने हवाई डाक लिफ़ाफ़े का प्रचलन शुरु किया.गया.                                                                                     * 1946  में विश्व का पहला हवाई तार भेजा गया.                                                                                                            

                             “ डाक “ क्रे इतिहास में एक नही वरन अनेक ऐसी रोचक जानकारियां हैं कि उन्हें अगर विस्तार दिया गया तो एक किताब ही लिखी जा सकती है. जिज्ञासु व्यक्ति को चाहिए कि वह इन दुर्लभ ऐतिहासिक जानकारी का संकलन करे एवं अन्य लोगों को भी प्रेरित करे,

                             युवा कवि-कहानीकार,लेखक, संपादक एवं कुशल प्रशासक डाक विभाग में कार्यरत आई.पी.एस. अधिकारी श्रीयुत कृषणकुमार यादव ने डाक विभाग के एक सौ पचास साल के गौरवशाली इतिहास को अपनी किताब” इन्डिया पोस्ट. 150 ग्लोरियस इअरस” में कडे परिश्रम से तैयार किया है, जो न सिर्फ़ रोचक है,बल्कि ज्ञानवर्धक भी है. आज भी कई ऐसे लोग हैं जो डाक-टिकिटों का तथा समय-समय पर प्रकाशित होने वाले” फ़ोल्डरों का तथा फ़र्स्ट डे कवर्स” का कलेक्शन करते हैं,उन्हें इस किताब को खरीदकर अपने संग्रह में रखते हुए उसे और भी बहुमूल्य बना सकते हैं.

              3 मार्च 1847 कॊ अमेरिका मे एलेक्जंडर ग्राहम बेल नाम के बालक ने जन्म लिया,.जिसके पिता का नाम एलेक्जॆंडर मेल विले बेल और माता का नाम इलिजा ग्रेस था.. एलेक्जंडर बचपन से मेधावी, और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. इनकी मां बहरी थी. संयोग से जब इनकी शादी माबेल विले बेल से हुई तो वह भी बहरी ही थी. अपने मन की बात जब इनसे कहना होता तो उन्हें काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पडता था. शायद यह वही कारण था कि वे आगे चलकर टेलीफ़ोन का आविष्कार कर पाए.

              एडिनबर्ग युनिवर्सिटी और युनिवर्सिटी कालेज लंदन से अपनी पढाई पूरी कर वे बोस्टन युनिवर्सिटी मे आविष्कारक, वैज्ञानिक,इंजिनियर,प्रोफ़ेसर रहे. वे बधिरों के शिक्षक थे.  बचपन से ही इन्हें ध्वनि विज्ञान में गहन रुचि थी. 23 साल की उम्र मे  उन्होंने पहला प्यानो बनाया था. वे स्पीच टेक्नोलाजी विषय के शिक्षक रहे थे, अतः ऐसा यंत्र बनाने में सफ़ल हुए जो न केवल म्यूजिक्ल नोट्स भेजने में सक्षम था बल्कि आर्टिकुलेट स्पीच भी दे सकता था. यह टेलीफ़ोन का सबसे पुराना माड्ल था.             \

              एलेक्जंडर ग्राहम बेल न सिर्फ़ टेलीफ़ोन के आविष्कारक थे बल्कि मेटल डिटेक्टर की खोज का श्रेय भी उन्हें ही जाता है.          बाद में वे डायबिटिक हो गए थे. २ अगस्त १९२२ के दिन उनका निधन हो गया.            http://www2.iath.virginia.edu/albell/Images/abphoto1.gif                                                                                          टेलीफ़ोन के माडल जो समय और आवश्यकता के अनुसार बदलते रहे..( 1से 8)                      --------------------------------- ऊपर  एलेक्झंडर ग्राहम बेल का चित्र.

                                                                                    http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/8/8d/Samuel_Morse_1840.jpg/220px-Samuel_Morse_1840.jpg                                                                                                       सेमुअल एफ़.बी. मोर्स (27 अप्रैल 1791-2अप्रैल 1872                                                                                    टेलीग्राफ़ सिस्टम के                                                                                                                    आविष्कारक

http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/1/15/Morse_tegraph.jpg/220px-Morse_tegraph.jpg[Telegraph]                                                                                                                           

                 तार भेजने वाला यंत्र जो मोर्स के नाम से जाना गया.

                                                                                                      

        सेमुअल फ़िनाले ब्रीज मोर्स का जन्म अमेरिका के चार्ल्स टाउन( मेसाचुसेट्स) को २ अप्रैल १७९१ में हुआ था, जिन्होने एकल-तार टेलीग्राफ़ी प्रणाली एवं मोर्स कोड का निर्माण किया था. वे भूगोल- वेत्ता और पादरी जेविडिया मोर्स की पहली संतान थे.                                                                                    

 

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दीवाली51

             

 

 

प्रभु श्रीराम की अगवानी में मनाई गई  पहली “दीपावली”

 

ऎसी मान्यता है कि प्रभु श्रीराम अपनी पत्नि सीता तथा अनुज श्री लक्ष्मण जी के साथ चौदह बरस के बनवास के बाद अयोध्या लौट आने की खुशी में मनाई गई थी. श्रीराम संपूर्ण अयोध्या में सबके लाड़ले थे. जब पुरवासियों ने सुना कि उन्हें चौदह साल का बनवास महारानी कैकई के वर मांगने पर दिया गया है. इस खबर को पाकर पूरे अयोध्या में सन्नाटा पसर गया था. लोग बिलख-बिलख कर रोने लगे थे. एक गहरी उदासी ने पूरी आयोध्या को अपने आगोश में ले लिया था. शायद उस दिन के बाद से लोग अपनी सुध-बुध खो बैठे थे. सब दुखी थे. श्रीराम के वन गमन के बाद यह पहली खबर श्री हनुमानजी के द्वारा श्री राम जी के मित्र निषादराज को फ़िर श्री भरतजी को मिली थी कि श्रीराम वनवास के बाद अयोध्या लौट रहे हैं. इस समय श्री भरत नन्दीग्राम में आश्रम बनाकर और श्रीराम की पादुकाएं लेकर निवास कर रहे थे. एक तरह से उन्होंने भी चौदह वर्षों के लिए अयोध्या छोड़ दिया था.

महर्षि वाल्मिक जी चुंकि श्री रामजी के समकालीन थे. उन्होंने ने ही सबसे पहले रामायण की रचना की थी. उन्हीं के शब्दो में हम जानने की कोशिश करेंगे. वे लिखते हैं-

अयोध्यां त्वरितो गत्वा शीघ्रं प्लव्गसत्तम*जानीही कश्चित कुशली जनो नृपतिमन्दिरे* श्रृंगवेरपुरं प्राप्य गुहं गहनगो चरम,निषादाधिपतिं ब्रूहे कुशलं वचनान्मम* श्रुत्वा तु मां कुशलिनमरोगं विगतज्वरम, भविष्यति गुहः प्रीतः स ममात्मसमः सखा* अयोध्यायाश्च ते मार प्रवॄत्तिं भरतस्य च, निवेदायिष्यति प्रीतो निषादाधिपतिर्गुहः*भरतस्तु त्वया वाच्यः कुशलं वचनान्मम, सिद्धार्थं शंस मां तस्मै सभार्यं सहलक्ष्मणम

अर्थात-  श्री रामजी ने श्री हनुमानजी से कहा कि- “कपिश्रेष्ठ ! तुम शीघ्र ही अयोध्या जाकर पता लो कि राजभवन में सब लोग सकुशल तो हैं न ?,* श्रृंग्वेरपुर में पहुंचकर वनवासी निषादराज गुह से भी मिलना और मेरी ओर से कुशल कहना. * मुझे सकुशल, नीरोग और चिंतारहित सुनकर विषादराज गुह को बड़ी प्रसन्नता होगी, क्योंकि वह मेरा मित्र है. मेरे लिए आत्मा के समान है.* निषादराज गुह प्रसन्न होकर तुम्हें अयोध्या का मार्ग और भरत का समाचार बताएगा* भरत के पास जाकर तुम मेरी ओर से उनका कुशल पूछना और उन्हें सीता एवं लक्ष्मण सहित मेरे सफ़ल मनोरथ होकर लौटने का समाचार बताना.

.* एवमुक्त्वा महातेजाः सम्प्रह्रष्टतनूरुहः*उत्पपात महावेगाद वेगवन्विचारयन-(युद्धकांड—२५)                                        

निषादराज को शुभ समाचार से अवगत कराने के बाद श्री हनुमानजी वेग से आगे उड़ चले.

·      तं धर्ममिव धर्मज्ञं देहबन्ध्मिवापरम* उवाच प्राजंलिर्वाक्यं हनूमान मारुतात्मजः *वसन्तं दण्डकारण्ये यं त्वं चीरजटाधरन, अनुशोचसे काकुत्स्थं स त्वां कौशलमब्रवीत, प्रियमाख्यामि ते देव स्स्स्शोकं त्यज सुदारूणम, अस्मिन मुहूर्ते भ्राता त्वं रामेण सह संगतः (युद्ध कांड-३५-३६-३७)

·      अर्थात- मनुष्यदेह धारण करके आये हुए दूसरे धर्म की भांति उन धर्मज्ञ भरत के पास पहुंचकर पवनकुमार हनुमानजी हाथ जोड़कर बोले- “देव ! आप दन्डकारण्य में चीर-वस्त्र और जटा धारण करके रहने वाले जिन श्रीरघुनाथजी के लिए निरन्तर चिन्तित रहते हैं, उन्होंने आपको अपना कुशल-समाचार कहलाया है और आपका भी पूछा है. अब आप इस अत्यन्त दारूण शोक को त्याग दीजिए. मैं आपको बड़ा प्रिय समाचार सुना रहा हूं. आप शीघ्र ही अपने भाई श्रीराम से मिलेंगे.

·      श्री हनुमानजी से शुभ समाचार पाकर प्रसन्न वदन श्री भरतजी ने आज्ञा दी....

·       

*दैवतानि च सर्वाणि चैत्यानि नगरस्य च.सुगन्धमाल्वैर्वदित्त्रैरर्चन्त्य शुचयो नराः.*सूताः स्तुतिपुराणज्ञाः सर्वे वैतालिकास्तथा.सर्वे वादित्राकुशला गणिकाश्चैव सर्वशः.राजादारस्तथामात्याः सेन्याः सेनांगनागणाः.ब्र्हाह्मणाश्च सराजन्याझ श्रेणीमुख्यास्तथा गणाः.अभिनिर्यान्तु रामस्य द्रष्टुं शशिनिभः मुखम* भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्न परवीरहा.विष्टीरनेकसाहस्त्रीश्चोदयामास भागशः.समीकुरुत निम्नानि विषमाणि समानि च.* स्थानानि च निरस्यन्तां नन्द्दिग्रामादितः परम,सिंचिन्तु पृथ्वीं कृत्स्नां हिमशीतेन वरिणा* ततो S भ्यवकिरन्त्वाआन्ये लाजैः पुष्पै सर्वतः.समुच्छरितपताकास्तु रथ्याः पुरवारोत्तमे* शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति. स्त्रग्दाममुक्तपुष्पैश्च सुवर्णैः पंचवणकैः* राजमार्ग्मसम्बाधं किरन्तु शतशो नराः. ततस्तच्छासनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य मुदान्विताः.

 

अर्थात- शुद्धाचारी पुरुष कुलदेवताओं का तथा नगर के सभी देवस्थानों का गाजे-बाजे के साथ सुगन्धित पुष्पों द्वारा पूजन करे.* स्तुति और पुराणॊ के जानकार सूत, समस्त वैतालिक (भाट), बाजे बजाने में कुशल सब लोग, सभी गणिकाएं, राजरानियां, मंत्रीगण, सेनाएं, सैनिकों की स्त्रियां, ब्राहमण, क्षत्रिय तथा व्यवसायी-संघ के  मुखियालोग श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र का दर्शन करने के लिए नगर से बाहर चलें.* भरतजी की बात सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले श्त्रुघ्न कई हजार मजदूरों की अलग-अलग टोलियां बनाकर उन्हें आज्ञा दी- “तुम लोग ऊँची-नीची भूमियों को समतल बना दो:.अयोध्या से नन्दिग्राम तक का मार्ग साफ़ कर दो, आसपास की सारी भूमि पर बर्फ़ की तरह ठंडॆ जलका छिड़काव कर दो.* तत्पाश्चात दूसरे लोग रास्ते में सब लोग लावा और फ़ूल बिखेर दें. इस श्रेष्ठ नगर की सड़कों के अगल-बगल ऊँची पताकाएं फ़हरा दो.* कल सूर्यदय तक लोग नगर के सब मकानों को सुनहरी पुष्पमालाओं, घनीभूत फ़ूलों के छॊटॆ गजरों, सूत के बन्धन रहित कमल आदि के पुष्पों से सजा दें.*राजमार्ग पर ज्यादा भीड़ न हो, इसकी व्यवस्था के लिए सैकड़ों मनुष्य सब ओर लग जायें. शत्रुघ्न का वह आदेश सुनकर सब लोग बड़ी प्रसन्नता के साथ उसके पालन में लग गए.

वाल्मिकी रामायण के अलावा संत श्री तुलसीदासजी ने बहुत ही सुन्दर ढंग से इसे लिखा है

 

              कंचन कलस बिचित्र संवारें. सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे                                                              

              बंदनवार पताका केतू. सबन्हि बनाए मंगल हेतू                                                                                               बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं.गजमनि रचि बहु चौक पुराई                                                                                   नाना भांति सुमंगल साजे. हरषि नगर निसान बहु बाजे

              जहँ तहं नारि निछावरि करहीं* देहेइं असीस हरष उर भरहीं                                                

              कंचन थार आरती नाना* जुबतीं सजे करहिं सुभ गाना                                                                     

              करहिं आरती आरतिहर के* रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें                                           

              पुर सोभा संपति कल्याना. निगम सेष सारदा बखाना                        

 (उत्तरकांड-९)

स्वर्ण कलशों को विचित्र ढंग से संभाल कर और सजाकर सबने अपने-अपने द्वारों पर रख दिए. सब ने मंगल के लिए बन्दनवार, ध्वजाएं और पताकाये, लगाईं. सब गलियाँ सुगन्धि से सींचीं गई, गजमुक्तों से रचकर बहुत से चौक पूराए गए. नाना प्रकार के सुमंगल साज सजाए गए और हर्ष  से नगर में बहुत से डंका बजने लगे. जहां-तहां स्त्रियां निछावर करती हैं तथा हर्ष परिपूर्ण हृदय से आशिषे दे रही हैं. बहुत सी युवतियां स्वर्ण-थालों में अनेकों आरती सजाकर शुभ मंगल गान गाती  है. वे दुखहारी रघुकुल रुपी कमल-वन के सूर्य, श्रीरामजी की आरती करती हैं. नगर की शोभा सम्पत्ति और कल्याण का बेद, शेषजी और सरस्वती बखान करते है. वे भी इस चरित्र को देखकर ठगे से रह जाते हैं.

श्रीरामजी का स्वागत-सत्कार सूर्योदय के पश्चात किया गया था. अतः इस बात का उल्लेख वाल्मिक रामायण में नहीं मिलता की दीपों की रोशनी की गई थी. दिन में दीपों की रोशनी की भी नहीं जाती है. हां , भारतीय संस्कारों के अनुसार जब किसी का स्वागत-सत्कार किया जाता है तो थाली में कुम्कुम-अक्षत (चांवल) और जलता हुआ दीपक रखा जाता है. इसी थाली से पाहुने को तिलक लगाकर रोली लगाने का प्रचलन रहा है. इसके बाद उसकी आरती उतारी जाती है.

जब पूरा नगर ही श्रीराम जी को तिलक लगाकर, आरती उतारकर अपने जीवन को धन्य करना चाहते हैं. चुंकि भरतजी की आज्ञा थी कि रास्ते में भीड ज्यादा न हो. इस बात से निश्चित रूप से यह अनुमान लगाया जा सकता था कि नन्दीग्राम से राजमहल तक आते-आते प्रभु श्रीराम को रात ही हो गई हो. इस समय तक सभी नर-नारियों की थलियों में दीप जलते रहे थे. श्रीरामजी का स्वागत न केवल उनकी माताओं ने किया बल्कि नगर की सारी नारियों ने किया था, जिनकी थालियों में दीप प्रज्जवलित किए हुए थे.

उपरोक्त भक्त कवियों की रचना को देखकर निश्चित ही कहा जा सकता है कि दीपावली का यह पावन पर्व उस दिन से ही शुरु हुआ, जिस दिन श्रीराम प्रभु अपनी पत्नि सीताजी और अनुज लक्ष्मण जी के साथ चौदह बरस का बनवास बीताकर अयोध्या लौटे थे. इस धरती पर वे पहले पुरुष थे, जिनके आगमन पर इतना भव्य स्वागत किया गया और दीप प्रज्जवलित कर उनकी अगवानी की गई. इतिहास में ऎसी घटना और कहीं नहीं देखी-पायी गई और न ही लिखी गई. 

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              52                                                                                                                                                                                                                                                देशभक्त वीरांगनाएँ

                                                                                                                        गोवर्धन यादव.

              सन 1857 से 1947 तक स्वाधीनता की अलख जगाने और इस संग्राम में अपने प्राण की बाजी लगाने वालों में केवल पुरूष-वर्ग ही शामिल नहीं हुआ था, बल्कि अनेकानेक महिलाओं ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया था. लखनऊ की बेगम हजरतमहल, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, लखनऊ की तवायफ़ हैदरीबाई, ऊदा देवी, आशा देवी, नामकौर, राजकौर, हबीबा, गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इन्द्रकौर, कुशल देवी, रहीमी गुर्जरी,, तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी, अवध की बेगम आलिया ,अवध के सलोन जिले के सिमरपहा के तालुकदार वसंतसिंह बैस की पत्नी और बाराबंकी के मिर्जापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर, सलोन जिले में भदरी की तालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर, मनियापुर की सोगरा बीबी , धनुर्विद्या मे माहिर झलकारीबाई, कानपुर की तवायफ़ अजीजनबाई, अप्रतिम सौंदर्य की मल्लिका मस्तानीबाई, नाना साहब की मुंहबोली बेटी मैनावती, मुज्जफ़रपुर के मुंडभर की महावीरी देवी, अनूप शहर की चौहान रानी, रामगढ की रानी अवन्तीबाई, जैतपुर की रानी, तेजपुर की रानी चौहान, बिरसा मुंडा के सेनापति गया मुण्डा की पत्नी माकी, मणिपुर की नागा रानी गुइंदाल्यू, कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राएं-शांति घोष तथा सुनीता चौधरी, मध्य बंगाल की सुहासिनी अली, रेणुसेन, क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नि दुर्गा देवी बोहरा (दुर्गा भाभी), सुशीला दीदी, भारत कोकिला सरोजनी नायडु, कमलादेवी चट्टॊपाध्याय, अरूणा आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी, ऊषा मेहता, कस्तुरबा गांधी, सुशीला नैयर, इन्दिरा गांधी, श्रीमती विजयालक्षमी पंडित, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, ले.मानवती आर्या सहित लन्दन में जन्मी एनीबेसेन्ट, भारतीय मूल की फ़्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा, आयरलैण्ड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मारग्रेट नोबुल(भगिनी निवेदिता), इंग्लैण्ड के ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल की पुत्री मैडेलिन, ब्रिटिश महिला म्यूरियल लिस्टर और भी न जाने कितनी ही अनाम महिलाओं ने भारत की आजादी के लिए अपने प्राणॊं का उत्सर्ग कर दिया था. इन वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता  और गौरवमयी बलिदान का इतिहास एक जीवन्त दस्तावेज है. हो सकता है उनमें से कईयों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया हो, पर लोकचेतना में वे अभी भी मौजूद हैं. ये वीरांगनायें प्रेरणा स्त्रोत के रूप में राष्ट्रीय चेतना की संवाहक है और स्वतंत्रता संग्राम में इनका योगदान अमूल्य एवं अतुल्य है.

झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई को याद करते हुए.

रानी झांसी

 

               संसार के इतिहास में कदाचित विरले ही उदाहरण इस तरह की स्त्रियों के मिलेंगे, जिन्होंने अपनी छॊटी सी उम्र में अलौकिक वीरता और असाधारण युद्ध-कौशल के साथ किसी भी देश की स्वाधीनता के लिए युद्ध किया हो और अपने आदर्शॊं के लिए लडते-लडते युद्ध क्षेत्र में प्राण त्याग दिए हों, निःसन्देह वह नाम महारानी लक्ष्मीबाई का है. उनका व्यक्तिगत जीवन जितना पवित्र और निष्कलंक था, उसकी मृत्यु भी उतनी ही वीरोचित थी.

              अंग्रेजों की हड़प नीति के तहत डलहौजी ने झांसी को हड़पने का प्रयास किया. उसने रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को रियासत का कानूनी उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया. रानी ने इसके खिलाफ़ लंदन में अपील की और जो कदम उठाया वह बेमिसाल था. वह मुकदमा हार गयीं, लेकिन उस समय भारत के ब्रिटिश शासक उनके “धृष्टतापूर्ण व्यव्हार” के लिए उन्हें सबक सिखाना चाहते थे. उन्होंने रियासत के आभूषण जब्त कर लिए और उनके पति के कर्ज की रकम को सालाना पेंशन में से काटना शुरु कर दिया. उन्हें झांसी का किला छोडकर झांसी शहर के रानी महल में जाने का आदेश दिया गया. लेकिन रानी झांसी लक्ष्मीबाई ने तो आखिरी दम तक लोहा लेने की ठान ली थी. उन्होंने जिन शब्दों में अपने फ़ैसले की घोषणा की वे अमर हो गये हैं. उन्होंने कहा;- मी माझी झांसी नहीं देहनार ( मैं अपनी झांसी देने वाली नही हूँ.)

              सन 1857 में हिंसा भडकने के साथ ही झांसी विद्रोह का केन्द्र बन गया था. रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ करने के प्रयास शुरू कर दिये और स्वयंसेवकों की सेना खड़ी कर दी. यह बात ध्यान देने की है कि उनके अंगरक्षक बडॆ निष्ठावान मुसलमान सैनिक थे. सैकडॊं स्थानीय लोग स्वेच्छा से शाही सेना में शामिल हुए. पुरुषॊं के साथ-साथ महिलाओं को भी सेना में भर्ती किया गया और सैन्य प्रशिक्षण दिया गया. महिला टुकड़ी की एक अफ़सर झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई की जान बचाने के लिए अपना जीवन बलिदान कर अद्वितीय वीरता का परिचय दिया. बहादुरी से दुश्मन का सामना करते हुए लक्ष्मीबाई कालपी पहुंची और उन्होंने तात्या टॊपे तथा नाना साहब के भतीजे राव साहब की सेनाओं के साथ अपनी सेना को नये सिरे से संगठित किया.  उनकी साझा सेना ने अंग्रेजों की सेना से जमकर लोहा लिया. उन्होंने ब्रिटिश सेना के ठिकानों पर बडी तेजी और जोश से हमले किये. लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया. 4  अप्रैल 1858 को कालपी पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया. जून के मध्य तक ब्रिटिश सेनाओं का ग्वालियर पर फ़िर से नियंत्रण हो चुका था और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने रणभूमि मे लडते हुए वीरगति प्राप्त की. लेकिन लोकगाथाओं और भारत के देशभक्ति के साहित्य में वे सदा अमर रहेंगी. कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने उनका बखान अपनी कविता में इस प्रकार किया है.

                                           चमक उठी सन सत्तावन में                                                                                                                           वह तलवार पुरानी थी                                                                                                                                 बुंदेले हरबोलों के मुंह                                                                                                                             हमने सुनी कहानी थी.                                                                                                                                खूब लडी मरदानी, वह तो                                                                                                                           झांसी वाली रानी थी.

                                                         

                            

 

 

 

53

                           (जन्माष्ठमी के पावन पर्व पर विशेष)

http://4.bp.blogspot.com/-eu0K8APWSS4/UI68iwZYspI/AAAAAAAAIfw/qOGjNmzLXzY/s400/127.jpg                कर्मयोगी श्रीकृष्ण                  

                                          

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एकदम निराला-अद्भुत और अनूठा है. देवताओं और अब तक हुए अवतारों की परम्परा में वे अन्यतम व्यक्ति हैं. उन्होंने जीवन को गहराई से उतरकर, उसको समग्रता मे देखा और जिया.  जहाँ राम मर्यादापुरुषोत्तम के रुप में जाने गए, बुद्ध करुणा के सागर कहलाए, लेकिन उन्हें पूर्णावतार न कहकर अंशावतार ही कहा जाता है. क्योंकि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं में बंधे रहे,जबकि श्रीकृष्ण ने किसी बंधन को स्वीकार नहीं किया. इसलिए वे पूर्णावतार कहलाए. उन्होंने मनुष्य जीवन को भरपूर उत्साह के साथ जिया. अतः वे कभी अप्रांसगिक नहीं हो सकते.                                                                              

श्रीकृष्ण ने जीवन को उसके समस्त यथार्थ के रुप में देखा और विभिन्न परिस्थितियों से स्वयं गुजरते हुए उसे हमारे सन्मुख प्रस्तुत किया. दूसरी ओर इन्होंने  कभी भी मौतिक जीवन का न तो निषेध किया और न ही बचने की बात की. कभी वे कालियादह में उतरकर कालिया से जा भिडते हैं, तो कभी गोपियों के सिर पर रखी दूध-दही-माखन की मटकियां को फ़ोड देते हैं और तो और वे अपने ही घर में, ऊँचे सींकचें पर रखी माखन की मटकी उतार अपने ग्वाल-बाल मित्रों को खिलाते हैं. अखाडॆ में उतरकर अच्छे-अच्छे सूरमाओं को धूल चटाते हैं, तो कभी कुंज-गलियों में बांसुरी बजाकर अपने से अधिक उमर की गोपियों के संग रास रचाते हैं. जरुरत पडने पर उन्हीं के हाथों से निकला सुदर्शनचक्र मानवता के शत्रुओं की गर्दन उतारने में देर नहीं लगाता, तो कभी वे गोवर्धन पर्वत उठाकर अभय का प्रतिरुप बन जाते हैं, अपने भाई बलदाऊ के साथ वे निशंक मथुरा में प्रवेश करते हैं और दुष्ट कंस को यमलोक पहुँचाते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं. वे पाडवॊं के शांतिदूत हैं,वहीं वे संघर्ष की प्रेरणा देने वाले कर्मनिष्ठ भी हैं..बडॆ-से बडॆ संकट से घिर जाने जाने पाण्डवों के मन में धीरज बंधाते हैं, अभिमन्यु, घटोत्कच की मृत्यु पर वे जिस सहानुभूति और संवेदना का परिचय देते हैं और हतोत्साहित  पांडवों की मुरझाई चेतना में नया उत्साह-नया जोश भरते हैं..अपने बुआ के लडके शिशुपाल द्वारा उनका घोर विरोध करने और अपमानित करते रहने पर भी, वे जिस धैर्य और अनुशासन का प्रदर्शन करते है, यह हमें एक संदेश और सबक देता है. उस जमाने में सारथी को हेय दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन धर्म की संस्थापना के लिए उन्होंने अपने बाल सखा अर्जुन का सारथी बनने में तनिक देर नहीं लगाई. उनके लिए लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में अपमानजनक कुछ भी नहीं था. पांडव भी इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि बिना कृष्ण के वे महाभारत जीत नहीं सकते. उन्होंने उनके विश्वास को बनाए रखा और अपनी कूटनीति की अनूठी प्रतिभा का परिचय देते हुए, उन्हें विजयी बनाया. युद्ध में शस्त्ररहित रहने का वचन देते हैं तो वहीं दूसरी ओर वे शस्त्र धारण करके अपनी प्रतिज्ञा तो बेहिच तोड भी देते हैं. युद्ध के पश्चात वे पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ में किस तरह कुशल संयोजक की भूमिका का निर्वहन करते हैं, और स्वयं अपने लिए काम की तलाश करते हुए अतिथियों की जुठी पत्तलें उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करते. हम सभी जानते है. यही एक मात्र कारण है कि आज पांच हजार साल बीत जाने के बाद भी, वे हमारे जीवन के प्रतिनिधि बने हुए हैं और बने रहेंगे.

              हम उनके द्वारा रची गई लीलाओं को केवल चमत्कार की श्रेणी में न रखते हुए, उसे अपने जीवन से जोडकर देखें तो ज्ञात होता कि उनका जीवन अपने समय से बहुत आगे का था. उनके चरित्र की हर बात हमें अपने वर्तमान का प्रतिनिधित्व करती दिखलायी पडती है. बकासुर, कागासुर,धेनुकासुर आदि का वध करने के पीछे का प्रमुख कारण यह था कि वे फ़सल, बाग-बगीचों पर अपना आधिपत्य जमाए हुए थे और जनता का शोषण कर रहे थे. अतः इन आततायियों को मार गिराना जरुरी था. कलिया-मर्दन के पीछे जो सूत्र काम कर रहा था, वह यह था कि उसने यमुना का सारा जल प्रदुषित कर रखा था. आज ठीक इससे उलट हो रहा है. हम आज बडी ही बेशर्मी से सारा गंधा जल नदियों में प्रवाहित कर रहे हैं और प्रदूषण फ़ैला रहे हैं. हमें श्रीकृष्ण की इस लीला से सीख लेने की जरुरत है. गाय चराने वन में जाना, ग्वालबालों के साथ वनभोजन करना और बंसी बजाने के पीछे उस सत्य को खोजना होगा कि आखिर एक राजकुमार को यह सब करने की जरुरत ही क्या थी? लेकिन उन्होंने वह किया और हमें संदेश दिया कि गाय का महत्व एक माँ से कम नहीं होता. उसका दूध पीकर, घी खाकर हम अच्छा स्वास्थ्य अर्जित कर सकते हैं. उनसे प्राप्त गोबर की खाद बनाकर उन्नतवार खेती की जा सकती है. पर आज क्या हो रहा है, यह किसी से  छिपा नहीं है. पशुधन अब बूचडखाने में भेजे जा रहे हैं. खेतों में अब गोबरखाद की जगह यूरिया जैसी घातक खाद को प्रयोग में ला रहे हैं,जो खेत को बंजर बनाने का काम कर रही है. दुधारु गाय के न रहने पर आज हमारे शिशुओं को नकली दूध पीना पड रहा है. गोवर्धन पर्वत को धारण करने  की कथा के द्वारा श्रीकृष्ण पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं. अपने बचपन के मित्र सुदामा के आने की खबर पाकर वे दौडे चले आते हैं  उन्होंने उनका स्वागत-सत्कार ही  नहीं किया बल्कि .अपने सिंहासन पर बैठाया और बडॆ प्रेम से अपनी पत्नियों के साथ उनके चरण पखारते रहे थे.और बिदाई के समय उन्हें अकूत धन-दौलत भी दी. क्या हम और हमारे मित्रों के बीच इतने प्रगाढ संबंध सुरक्षित बच पा रहे हैं? कंस के मारे जाने के बाद, महल में रह रही सोलह हजार कन्याओं के साथ उन्होंने विवाह रचाकर उन्हें ससम्मान समाज में जीवन यापन कर सकने का हक प्रदान किया.  

द्रौपदी ने उन्हें रक्षासूत्र बांधते हुए अपना भाई बनाया था. वह दृष्य तो आपको याद ही होगा कि जब दुर्योधन ने दुशासन को भरी सभा में निवस्त्र करने का आदेश दिया था, तब उन्होंने अपनी बहन की लाज बचाने के लिए दौडकर आना पडा था. क्या हो गया है आज के भाईयों को कि उनकी बहनों की इज्जत सरेआम लूटी जा रही है और वे एक ओर खडॆ तमाशा देख रहे है.? महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद जब वे शोकसंतप्त धृतराष्ट्र और गांधरी को सांत्वना देने पहुँचे तो गांधारी के श्राप से बच नहीं पाए थे और उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे स्वीकार किया था.                                                                                                                                                                                                                    

कभी किसी ने उन्हें गोपाल कहकर पुकारा, किसे ने माखनचोर कहा,किसी ने घनश्याम.नन्दलाल, गोपीवल्लभ, गोपबंधु,राधावल्लभ तक कहा. वे सारे नाम- उपनाम को सहर्ष स्वीकारते हुए, सबके दुलारे, सबके चहेते बने रहे. यही सारी खूबियाँ उन्हें पूर्णावतार का रुप देती है और लोक में अनश्वर बनाती है एवं अभिनव समकालीनता प्रदान करती है. उनकी लोकचेतना को यदि हम अपने जीवन के साथ जोडकर देखें तो पाते हैं कि वे बिल्कुल अकेले और अनोखे हैं. जब कर्म ही ईश्वर है और मेहनत ही पूजा है तब  पग-पग पर श्रीकृष्ण कर्मयोगी सन्यासी की तरह यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढता के साथ खडॆ दिखाई देते हैं, बिना किसी अलौकिकता के साथ.

हम आज चाहे जितने मन्दिर बना लें,और उसमें अपने राधामोहन को प्रतिष्ठित कर सुबह-शाम घंटॆ-घडियाल बजा-बजा कर उनकी पूजा अर्चना करते रहें, तब भी बात कुछ बनती दिखाई नहीं देती,जब तक की हम उनकी खूबियों को अपने चरित्र में उतारकर उसका अनुसरण नहीं करते, तब तक उस विराट व्यक्तित्व के स्वामी की सच्ची सेवा नहीं हो सकती.

                                                                                                                                                                                          

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- नागपंचमी महोत्सव

 

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नागपंचमी महोत्सव.

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अनन्तं वासुकि शेषं पद्मनाभं च कम्बलम

शंखपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा

एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम

सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः

तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत

देवी भागवत में नौ नागों के होने का उल्लेख मिलता है. उनके नाम इस प्रकार है. (१) अनन्तनाग (२)वासुकि (३) शेषनाग (४)पद्मनाभ. (५) कम्बलं (६) शंखमाल (७)धार्तराष्ट्र ( ८)तक्षक तथा (९) कालियानाग. इन नौ नागों के बारे में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति शाम के समय, विशेषकर प्रातःकाल इनका स्मरण करता है, उसे विषबाधा नहीं होती और वह सर्वत्र विजयी होता है. उत्सवप्रियता भारतीय जीवन की प्रमुख विशेषता है. देश में समय-समय पर अनेक पर्वों एवं त्योहारों का भव्य आयोजनों का होना, इस बात का प्रमाण है. श्रावनमास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का त्योहार नागों को समर्पित है. इस त्योहार पर व्रतपूर्वक नागों का अर्चन-पूजन किया जाता है. इस दिन नागों का चित्रांकन किया जाता है अथवा मृत्तिका से नाग बनाकर पुष्प, गन्ध, घूप-दीप एवं विविध नैवेद्दों से नागों का पूजन करने का विधान है. पूजन करते समय निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करते हुए उन्हें प्रणाम किया जाता है.

सर्वे नागाः प्रीयन्तां में ये केचित पृथ्वीतले

ये च देलिमरीचिस्था येSन्तरे दिवि संस्थिताः

ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः

ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः

अर्थात;- जो नाग पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग, सूर्य की किरणॊं, सरोवरों, वापी, कूप तथा तालाब आदि में निवास करते हैं, वे सब हम पर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार प्रणाम करते हैं

नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से माना गया है. नागों का मूलस्थान पाताललोकप्रसिद्ध है. पुराणॊं में नागलोक की राजधानी भोगवतीपुरी विख्यात है. संस्कृत कथा -साहित्य में विशेषरुप से कथासरित्सागरनागलोक और वहाँ के निवासियों की कथाओं से ओतप्रोत है. गरुडपुराण, भविष्यपुराण, चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, भावप्रकाश आदि ग्रंथों में नाग संबंधी विविध विषयों का उल्लेख मिलता है. पुराणॊं में यक्ष, किन्नर और गंधर्वों के वर्णण के साथ नागों का भी वर्णन मिलता है. भगवान विष्णु की शय्या शोभा नागराज शेष करते हैं. भगवान शिव और गणेश के अलंकरण में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है. योगराज सिद्धि के लिए कुण्डली शक्ति जाग्रत की जाती है, उसको सर्पिणी कहा जाता है. पुराणॊं में भगवान सूर्य के रथ में द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है, जो क्रमशः प्रत्येक मास में उनके रथ के वाहक बनते हैं. इस प्रकार अन्य देवताओं ने भी नागों को धारण किया है. नागदेवता भारतीय संस्कृति में देवरुप में स्वीकार किए गए

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कश्मीर के जाने-माने कवि कल्हण ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक राजतरंगिणीमें कश्मीर की सम्पूर्ण भूमि को नागों का अवदान माना है. वहाँ के प्रसिद्ध नगर अनन्तनाग का नामकरण इसका ऎतिहासिक प्रमाण है. देश के पर्वतीय प्रदेशों में नागपूजा बहुतायत से होती है. यहाँ नागदेवता अत्यन्त पूज्य माने गए हैं. हमारे देश के प्रत्येक ग्राम-नगर में ग्रामदेवता और लोकदेवता के रुप में नागदेवताओं के पूजास्थल हैं,.

देवी भागवत में प्रमुख नागों का नित्य स्मरण किया गया है. हमारे ऋषि-मुनियों ने नागोपासना में व्रत-पूजन का विधान किया है. श्रावणमास की शुक्ल पक्ष की पंचमी, नागों को अत्यंत आनन्द देने वाली नागानामानन्दकरी भी कहा जाता है. नागपूजा में उनको गो-दुग्ध से स्नान कराने का विधान है. कहा जाता है कि एक बार मातृ-शाप से नागलोक जलने लगा. इस दाह-पीडा की निवृत्ति के लिए गाय का दूध उन्हें शीतलता प्रदान करता है, वहीं भक्तों को सर्पभय से मुक्ति भी देता है. इनकी कथा श्रवण करने का बडा महत्व बतलाया गया है. इस कथा के प्रवक्ता सुमन्त मुनि थे तथा श्रोता पाण्डवंश के राजा शतानीक थे. कथा इस प्रकार से है;- एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन द्वारा चौदह रत्नों में उच्चैःश्रवा नामक अश्व-रत्न प्राप्त हुआ. यह अश्व अत्यंत श्वेतवर्णी था. उसे देखकर कद्रू नागमाता तथा विमाता विनता में अश्व के रंग के संबंध में वाद-विवाद हुआ. कद्रू ने कहा कि अश्व के केश श्यामवर्ण के हैं. यदि मैं अपने कथन में असत्य सिद्ध होऊँ तो तुम्हारी दासी बनूँगी अन्यथा तुम मेरी दासी बनोगी. कद्रू ने नागों को बालों के समान सूक्ष्म बनाकर अश्व के शरीर में आवेष्ठित होने का निर्देश दिया, किंतु नागों ने अपनी असमर्थता प्रकट की. इस पर क्रुद्ध होती हुई कद्रु ने नागों को शाप दिया कि पाण्डववंश के राजा जनमेजय नागयज्ञ करेंगे, उस यज्ञ में तुम सब जलकर भस्म हो जाओगे. नागमाता के शाप से भयभीत, नागों ने वासुकि के नेतृत्व में ब्रह्माजी से शापनिवृत्ति का उपाय पूछा तो उन्होंने निर्देश दिया कि यायावरवंश में उत्पन्न तपस्वी जर्तकारु तुम्हारे बहनोई होंगे. उनके पुत्र आस्तीक तुम्हारी रक्षा करेगा. ब्रह्माजी ने पंचमी तिथि को नागों को वरदान दिया तथा इसी तिथि पर आस्तीकमुनि ने नागों की रक्षा की. अतः नागपंचमी का यह व्रत ऎतिहासिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. नागों की अनेक जातियाँ और प्रजातियाँ हैं. भविष्यपुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरुप एवं जातियों का विस्तार से वर्णण मिलता है. मणिधारी तथा इच्छाधारी नागों का भी उल्लेख इसमें मिलता है.

सभी प्राणियों में भगवान का वास होता है. यही दृष्टि जीवमात्र- मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंगों आदि सभी में ईश्वर के दर्शन कराती है. जीवों के प्रति आत्मीयता और दयाभाव को विकसित करती है. अतः नाग हमारे लिए पूज्यनीय और संरक्षणीय हैं. प्राणिशास्त्र के अनुसार नागों की असंख्य प्रजातियाँ हैं, जिसमें विषभरे नागो की संख्या बहुत कम है. ये नाग हमारी कृषि-सम्पदा की, कृषिनाशक जीवों से रक्षा करते हैं. पर्यावरणरक्षा तथा वनसंपदा में भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है.नागपंचमी का यह पर्व नागों के साथ जीवों के प्रति सम्मान, उनके संवर्धन एवं संरक्षण की प्रेरणा देता है.

 

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                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  (o) भारतीय नाटक की उत्पत्ति व विकास(0)                                                                                                           ------------------------------------                                                                                                                                                                                                                                                                         

 इस बात के प्रमाणिक हैं हमारे वेद कि विश्व में सर्वप्रथम नाटक की उत्पत्ति तथा विकास भारत में ही हुआ था. ऋगवेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, और पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं. विद्वान लोग इन संवादों को नाटक के विकास का चिन्ह पाते हैं. अनुमान किया जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर नाटक की रचना की गई थी.

नाट्यकला दैवीय उत्पत्ति भी मानी जाती है. ऎसा कहा जाता है कि सतजुग के बीत जाने के बाद, त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं ने मंत्रणा की और यह अनुभव किया कि सतजुग में सर्वत्र सुख की वर्षा होती रही लेकिन त्रेता में, दुख के संकट भी घिरने लगेंगे. अतः इससे निजाद पाने के लिए किसी ऎसे ग्रंथ की रचना की आवश्यकता महसूस की गई जिसका अनुशीलण करने से, आदमी राहत महसूस कर सके. सारे देवता ब्रह्मलोक गए और उन्होंने ब्रह्मदेव से प्रार्थना की कि कोई ऎसी कला प्रकट करें जिससे श्रवणशक्ति और आँखों की रोशनी बढे, मन आनन्दित हो. वह पाँचवा वेद हो, मगर उन चारों वेदों की तरह न हो. उससे लाभ पाने का हक, हर जाति, हर वर्ग, हर धर्म के लोगों को हासिल हो. ब्रहमाजी ने ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से नगमा यानि संगीत,, यजुर्वेद से स्वांग(अभिनय) और अथर्ववेद से जज्बातनिगारी(रस) जैसे कलाओं के तत्वों को मिलाकर नाटक का प्रणयन किया. शिव ने ताण्डव(नृत्य) और पारवती ने लताफ़त(नरमी) की बुदतरी की, विश्वकर्मा को हुक्म दिया गया कि वह निगारखाने(नाट्यमंच) बनाए. फ़िर इसे भरत मुनि के हवाले किया गया ताकि वो जमीन पर आकर उडते रंग-रुप में पेश करें. इस् तरह भरतमुनि को इस  खुदाई फ़न, अर्थात नाट्य-शास्त्र के रचियता होने का श्रेय हासिल हुआ.                                                                                                                                                                             

अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि इस कला का प्रादुर्भाव सबसे पहले भारत में हुआ.  कुछ इतिहासकार, भरतमुनि के इस काल को ४०० ई.पू. के निकट मानते हैं. इस अद्भुत ग्रंथ में संगीत, नाटक, अभिनय के नियमों का आकलन भर नहीं है,बल्कि अभिनेता, रंगमंच और प्रेक्षक,इन तीन तत्वों की पूर्ति आदि तथ्यों का विवेचन किया गया है. ३७ अध्यायों में मुनि ने रंगमंच, अभिनेता, अभिनय, नृत्य  गीत, वाद्य , रसनिस्पत्ति आदि का विवेचन किया था.

इस ग्रंथ की सर्वाधिक प्रामाणिक और विद्वत्तापूर्ण टीका, श्री अभिनव गुप्तजी ने सन १०१३ में किया था. जिसमे विषय वस्तु, पात्र, प्रेक्षागृह, रसवृत्ति, अभिनय, भाषा, नृत्य, गीत, वाद्ययंत्र,,पात्रों के परिधान, प्रयोग की जाने वाली धार्मिक क्रिया,,नाटक के अलग-अलग वर्ग, भाव, शैली, सूत्रधार,  विदूषक, गणिका, नायिका आदि पात्रों में किस प्रकार की कुशलता अपेक्षित है-विचार किया गया है.                                                        

संस्कृत साहित्य में अनेक उच्चकोटि के नाटक लिखे गये. साहित्य में नाटक लिखने की परिपाटी संस्कृत से होते हुए हिन्दी में आयी. संस्कृत के अलावा पालि के ग्रंथॊं में भी नाटक लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं. अग्निपुराण, शिल्परत्न, काव्यमीमांसा तथा संगीत -मार्तण्ड में राजप्रसाद के नाटकमंडपों के विवरण प्राप्त होते हैं. इसी तरह महाभारत मे रंगशाला के उल्लेख मिलते हैं. हरिवंशपुराण में रामायण के नाटक खेले जाने का वर्णण मिलता है. पाश्चयात विद्वानो की धारणा है कि धार्मिक कृत्यों से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ. इससे रंगस्थली की कल्पना की जा सकती है. दर्शकों के बैठने की उत्तम व्यवस्था थी.                    

संस्कृत नाटक रस प्रधान होते हैं. संस्कृतकाव्य परम्परा मे,नाटक काव्य का ही एक प्रकार है. इसमे दर्शक को अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने का भी रसास्वादन मिलता है. अतः इससे सहज जुडाव भी होता है. कहा गया है-“काव्येषु नाटकं रम्यम.”  इन नाटको में, लेखन से लेकर प्रस्तुतिकरण तक कई कलाएं,, भावों, अवस्थाओं से युक्त, क्रियायों के अभिनय, कर्म द्वारा संसार को सुख-शांति देने वाले होने के कारण नाट्य हमारे यहां विलक्षण कृति माने गए हैं. कहा गया है-“न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला/नासौ योगो न तत्कर्म नाट्योSस्मिन्यत्र न दृष्यते”

संस्कृत नाटक के प्रमुख नाटककार कालिदास, भास, शुद्रक आदि की गणणा प्रमुख रुप से की जाती है.                                                                                                                                                                                

हिन्दी में नाटक-

              परिभाषा—“नाटक काव्य का ही एक रुप है,जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु, दृष्टि द्वारा भी दर्शक के हृदय में रसानुभूति कराती है. उसे नाटक या दृष्यकाव्य कहते है.                                                          

२.नाटक में श्रवण काव्य से अधिक रमणीयता होती है.                         

३.श्रवणकाव्य होने से लोकचेतना से अधिक घनिष्ठता होती है.

४.नाट्यशास्त्र में लोकचेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है.                                   

नाटक के प्रमुख तत्व.-                                                                                                                                                           

१.कथावस्तु—पौराणिक, ऎतिहासिक, काल्पनिक या सामाजिक हो सकती है.                                   

२-पात्रों का सजीव और प्रभावशाली चरित्र, नाटक की जान होती है. कथावस्तु के अनुरुप नायक धीरोदात्त, धीर, ललित होना चाहिए.                                                                                                                         

३.रस-नाटक मे नवरसों में से केवल आठ का ही परिपाक होता है. इसमें शांत रस निषिद्द माना गया है. वीर रस या श्रृंगार-रस में से कोई एक नाटक का प्रधान रस होता है.                                            

४. अभिनय- (१)आंगिक अभिनय (२) वाचिक अभिनय (३)आहार्य--वेषभूषा-मेकअप-स्टेज विन्यास,तथा भरपूर प्रकाश व्यवस्था होना आवश्यक होता है.                                                                                                          

 ५)सात्विक अभिनय---पात्र जब डूबकर अपना अभिनय करता है तो वह नाटक में जान डाल देता है.                                 

              लोकनाट्य अथवा नाटक का लोकजीवन से घनिष्ट संबंध है. लोकनाट्य का मंचन उत्सवों, मांगलिक कार्यों अथवा विवाह आदि के अवसर पर किया जाता है. लोकनाट्य की भाषा अत्यन्त ही सरल, सीधी-सादी और रोचकता लिए हुए होती है. नटॊं के द्वारा भी लोकनाट्य रचे जाते हैं. नटॊं द्वारा खेले जाने वाले लोकनाट्यों में कथानक, ऎतिहासिक, पौराणिक अथवा सामाजिक आधार वाले होते है, अभिनीत किए जाते हैं .इसके लिए कोई विशेष मंच बनाने की आवश्यकता नहीं पडती. नट के आसपास ,कुछ दूरी बनाकर दर्शक बैठकर अथवा खडॆ रहकर, उसके द्वारा रचे जा रहे अभिनय को निहारते है,और आनन्दित होते है..                                                                                                                                                                                                      \

बंगाल का लोकनाट्य” जात्रा” के नाम से जाना जाता है. बंगाल के अलावा “जात्रा”, उडिसा तथा पूर्वी बिहार में भी  आयोजित किए जाते है. इसमे धार्मिक आख्यान होते हैं. राजस्थान में अमरसिंह राठौर की ऎतिहासिक गाथा का अभिनय किया जाता है. केरल में लोकनाट्य “यक्षगान” के नाम से जाना जाता है. उत्तरप्रदेश में रामलीला –रासलीला का मंचन किया जाता है. मध्यप्रदेश के मालवांचल में “मांच(मंच का अपभ्रंश), महाराष्ट्र में “तमाशा”, गुजरात में “भवई”,कर्नाटक में “यक्षगान”, तमिलनाडु में” थेरुबुडु”, बुंदेलखंड में” भंडैती”, “रहस”,कांडरा”,स्वांग, गोवा का अनोखा नाट्य-“त्रियात्र”, हरियाना का सांग, उत्तराखंड की केदार घाटी में-“चन्क्रव्यूह”, हिमाचल की निचली तराई- बिलासपुर में स्वांग, मंडी में बांठना, सिरमौर और शिमला में करियाला,, चांबा में हरण, ऊना और सोलन मे-धाजा, बिहार में बिदेसिया, अवध में रामायण, छत्तीसगध में नाचा-तथा करमा,  केरल में मूडीयेटटु आदि लोकनाटिका का मंचन किया जाता है. लोकनाट्य  को लेकर राजस्थान के तीन क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं (१)उदयपुर, डूंगीपूर, कोटा, झालावाड,सिरोही (२)जोधपुर, बीकानेर, शेखावट, जयपुर(३) राजस्थान का पूर्वांचल जिसमें शेखावट, जयपुर भरतपुर, धौलपुर प्रांत आते हैं.यहाँ नाटक कई रुपों में मंचित किए जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि संपूर्ण भारतवर्ष में नाटक मंचित किए जाने के प्रमाण मिलते हैं ,भले ही वे अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं.                                                                                                                                                                                                                                                                   

पाश्चात्य रंगमंच-                                                                                                                                                     

प्राचीन सभ्यता में चौथी शती ई.पूर्व यूनान और रोम के रंगमंच आकार ले चुके थे. इतिहास प्रसिद्ध डयोनीसन का थिएटर एथेंस में आज भी उस काल की याद दिलाता है. एक अन्य थिएटर है “एपोडारस “जिसका  नृत्यमंच   गोल आकार में है. ३६४ ई.पू. रोमवाले इट्रस्कन अभिनेताओं की मंडली अपने नगर लाए और उनके लिए “सर्कस कैक्सियस”  में पहला रोमन रंगमंच तैयार किया.  इस तरह रंगमंच प्रारंभिक रुप मे आया. सीजर तथा आगस्टस ने रोम को बहुत उन्नत किया. पांपेई का शानदार थिएटर तथा एक अन्य(पत्थर का) थिएटर उसी के बनवाए बताए जाते हैं.                                                              

प्रथम चरण-           

              १/-रोमीय परम्परावाल विसेंजा रंगमंच(१५८०-८५)जिसमें बाद में दीवार के पीछे वीथिकाएं जोडी गई .

              २)सैवियोनेटा में स्कमोजी ने इन विथिकाओं को मुख्य रंगमंच से मिला दिया(१५८८ई)                                      

३)इमिगो जोंस ने बाद में इन्हें रंगमंच ही बना दिया.                                                                                       

४)  १६१८-१९ में परमा थिएटर में, रंगमंच पीछे हो गया और पृष्ठभूमि की चित्रित दीवार आगे आ गई.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

              लगभग दूसरी शती ईसवीं में रंगमंच कामदेव का स्थान माना जाने लगा. ईसाइयत के जन्म लेते ही पादरियों ने नाट्यशाला को हेय मान लिया. गिरजाघरों ने थिएटर का ऎसा गला घोटा कि वह आठ शताब्दियों तक पनप न सका.. उन्होंने रोमन साम्राज्य का पतन का मुख्य कारण थिएटर को ही माना. रोमन रंगमंच का अंतिम संदर्भ ५३३ ई. का मिलता है. बावजूद इसके चोरी-छिपे नाटक खेले जाते रहे. इतालवी पुनर्जागरण के साथ वर्तमान रंगमंच का जन्म हुआ. चौदहवीं शताब्दी में फ़िर से नाट्यकला का जन्म हुआ और लगभग १६वीं शताब्दी में उसे प्रौढता प्राप्त हुई. कई उतार-चढाव के बाद १८वीं-१९वीं शती में रंगमंच के विकास का आदर्श माना गया.

              पुनर्जागरण का दौर सारे यूरोप में फ़ैलता हुआ एलिजाबेथ काल में इंग्लैंड जा पहुँचा. सन १५७४ तक वहां एक भी थिएटर नहीं था. लगभग पचास वषों में यह अपने चरम पर जा पहुंचा.और फ़िर इटली, फ़ांस, स्पेन तक जा पहुंचा. १५९०-१६२० का काल शेक्सपियर का काल रहा. रंगमंच विशिष्ट वर्ग का न होकर, जनसामान्य के मनोरंजन का साधन बना.                                                                                                          
आधुनिक रंगमंच
                                                                                                                                     

              रंगमंच                                                                                                                                                                                   रंगमंच यानि थिएटर,वह स्थान है,जहाँ नृत्य, नाटक, खेल आदि हों. रंगमंच शब्द रंग और मंच दो शब्दों की युति से बना शब्द है. रंग इसीलिए प्रयुक्त हुआ कि दृष्य को आकर्षक बनाने के लिए दीवारों, छ्तों और पर्दों पर विषेश प्रकार की और विविध प्रकार की चित्रकारी की जाती है और अभिनेताओं की वेषभूषा तथा सज्जा में भी विविध रंगों का प्रयोग होता है और मंच इसीलिए प्रयुक्त हुआ कि दर्शकों की सुविधा के लिए रंगमंच का तल फ़र्श से कुछ ऊँचा रहता है. दर्शकों के बैठने के स्थान को प्रेक्षागार और रंगमंच सहित समूचे भवन को प्रेक्षागृह, रंगशाला या नाट्यशाला कहते हैं. पश्चिमी देशों में इसे थिएटरया आअपेरा नाम दिया जाता है.

              आधुनिक रंगमंच का वास्तविक विकास १९ वीं शती के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ और एक भव्यतम रुप सामने आया.लेकिन यह स्वरुप ज्यादा दिन न टिक सका. विज्ञान के नए-नए अविष्कारों ने जन -जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला. मूक सिनेमा, फ़िर सवाक सिनेमा ने जनमानस को अपनी ओर तेजी से आकृष्ट किया. थिएटर से कुछ मोह भंग हुआ और सिनेमा का आकर्षण बढता गया. क्योंकि इसमे ग्लैमर और पैसा दोनो है.                                                                                                                                                                 

स्वतंत्रता पश्चात १९५१ में आयोजित एक कला सम्मेलन नई दिल्ली में, विचार किया गया कि नृत्य,नाटक और संगीत की राष्ट्रीय अकादमियाँ खोली जाए. ३१ मई १९५२ में तत्कालिन शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अब्दुल्द कलाम आजाद की उपस्थिति में अकादमी की नीव रखी गई, २८ जनवरी १९५३ को डा.राजेन्दप्रसादजी ने इस अकादमी को विधिवत उद्घाटित किया.                                                                                                 

भारतीय नाट्य परम्परा को नित नई उँचाइयाँ देने में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,,जयशंकरप्रसाद,कमलेश्वर, जगदीशचन्द्र मथुर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश, स्वदेश दीपक, नाग बोडस, हरिकृष्ण प्रेमी ,धर्मवीर भारती, नंदकिशोर आचार्य, आदि विद्वानों ने बेहतरीन नाटकों की रचना की. उनके द्वारा लिखे गए नाटकों की सर्वत्र सराहना हुई और आज भी वे जगह-जगह मंचित किए जा रहे हैं.                                कई दिग्गज फ़िल्म -अभिनेता तो आज अपने चर्मोत्कर्ष पर हैं, सबके सब स्टेज कलाकर रह चुके हैं.कुछ तो सिनेमा में इतने व्यस्त हो गए हैं कि इन्हें स्टेज(रंगमंच) पर जाने का समय ही नहीं मिल पाता, बावजूद इसके उनके मन में अब भी रंगमंच को लेकर अगाथ श्रद्धा और समर्पण का भाव मौजूद है.                                                                                                                                                                                                          

नाटकों की बात हो और नुक्कड नाटक पर बात न की जाए तो शायद अधुरा सा लगेगा. समय के साथ नुक्कड नाटक भी कलाकारों द्वारा खेले गए. इसमे किसी थिएटर अथवा किसी नाट्यगृह की आवश्यक्ता नहीं पडती. कलाकार जिसमे पात्रों की संख्या कम से कम “एक” या आवश्यकतानुसार कुछ ज्यादा भी हो सकती है, द्वारा गली-गली में जाकर अपने अभिनय से दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाते है, जिसे हम नुक्कड भी कह सकते हैं, वे अपनी प्रस्तुति द्वारा समाज में फ़ैल रही विसंगतियों पर कडी चोट करते हैं अथवा कोई ऎसा संदेश देना चाहते हैं जो समाज के लिए उपयोगी हो,के विषय के मूल में जाकर छिपे संदेश को जन-जन तक पहुँचाते है. इसमे कोई तामझाम नहीं करनी पडती और न ही कोई विशाल मंच बनाने की जरुरत ही पडती है. इससे यह फ़ायदा हुआ कि जो लोग नाटकों से जुड नहीं पाए अथवा समयाभाव के कारण मंच तक नहीं भी जा पाए तो उन्हें घर बैठे इसका आनन्द उठाने को मिल जाता है. अतः कहा जा सकता है कि नाट्यविधा का भविष्य आगे भी सुरक्षित रहेगा और आए दिन नए-नए नाटक मंचित किए जाते रहेंगे.                          

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56.

                                           नृत्य, जब महारास में बदल जाये.            

 

              प्रत्येक पर्व एवं त्योहार हमारी जीवन-यात्रा के लिए कुछ न कुछ प्रकृति प्रेम का संदेश लेकर आता है..भारत में मेलों और उत्सवों का उदय भी इसी का क्रमबद्ध रुप था और ये मेले और उत्सव प्रकृति की गोद में ,नदी के किनारे या खेती से प्राप्त लाभ की उमंग के रुप में उदय हुए और सामूहिक रुप से इकठ्ठे होकर, मनोरंजन के साधन तथा सामाजिक मेल-मिलाप के माध्यम भी बन गया

 

              त्योहारॊं की श्रृखंला में एक ऎसा ही मनभावन त्योहार है दीपावली. इस त्योहार को पूरे देश मे बडी ही श्रृद्धा एवं उल्ल्हास के साथ मनाया जाता है .दीपावली से दो दिन पूर्व से ही  धनतेरस, नरक चौदस, दीपावली,अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजन मनाए जाने की परंपरा है. दीपावली पूजन के ठीक दूसरे ही दिन अहीरों की टोली अपनी पारम्परिक वेषभू‍षा में नृत्य करते देखे जा सकते है .ढोलक की थाप पर एवं बांसुरी की तान पर, आप इन्हें मस्ती में नाचते-गाते देखते हैं. यह सब क्यों होता है, और क्यों किया जा रहा है,,इसे जानने के लिए हमें थोडा इतिहास में जाना होगा.                                                                                                                                                                                

              कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है. इस दिन गोवर्धन की पूजा कर अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है. इससे भगवान वि‍ष्णु की प्रसन्नता प्राप्त होती है.

 

                                           " कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत !

                                             गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीवि‍ष्णुः  प्रीयतामिति.!!

 

              इस दिन प्रातःकाल घर के द्वार देश में गौ के गोबर का गोवर्धन बनाकर तथा उसे शिखरयुक्त बनाकर वृक्ष-शाखादि से संयुक्त और पु‍ष्पों से सजाया जाता है..इसके बाद गन्ध पु‍ष्पादि से गोवर्धन भगवान का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है.तथा यथा सामर्थ्य भोग लगाया जाता है. मन्दिरों में विविध प्रकार के पकवान, मिठाइयां नमकीन और अनेक प्रकार की सब्जियाँ, मेवे फ़ल आदि भगवान के समक्ष सजाए जाते हैं तथा अन्नकूट का भॊग लगाकर आरती होती है फ़िर भक्तों में प्रसाद वितरण किया जाता है .काशी, मथुरा,वृंदावन,गोकुल,बरसाना, नाथद्वारा आदि भारत के प्रमुख मन्दिरों में लड्डुऒं तथा पकवानों के पहाड(कूट) बनाए जाते है,

 

              द्वापर में वृज में अन्नकूट के दिन इन्द्र की पूजा होती थी. श्रीकृ‍ष्णजी ने गोप-ग्वालों को समझाया कि गाएं और गोवर्धन प्रत्यक्ष देवता हैं. अतः इनकी पूजा होनी चाहिये,क्योंकि इन्द्र तो यहाँ कभी दिखायी नहीं देते और न ही आप लोगों के द्वारा बनाये गये पकवान ही ग्रहण करते है. भगवान की प्रेरणा से वृजवासियों ने गोवर्धन पर्वत का पूजन किया और स्वयं गोवर्धन का रुप धारणकर पकवानों को ग्रहकिया.

              जब इन्द्र को  इस बात का पता चला तो वे अत्यन्त ही क्रोधित हुए और प्रलयकाल के सदृश मुसलाधार वृ‍ष्टि कराने लगे. यह देख श्रीकृ‍ष्णजी ने गोवर्धन पर्वत को अपनी अँगुली पर धारण किया ,उसके नीचे सब वृजवासी,ग्वालबाल, गायें-बछडे आदि आ गये. लगातार सात दिन तक वर्षा होती रही ,लेकिन वे कुछ नहीं बिगाड पाये. इन्द्र को इससे बडी ग्लानि हुई. तब ब्रह्माजी ने इन्द्र को श्रीकृ‌‌ष्ण के परब्रम्ह परमात्मा होने की बात बतलायी, तो लज्जित हो इन्द्र ने वृज आकर क्षमा मांगी.वृजवासियों ने मिलकर मांगलिक गीत गाये और जमकर नृत्य किया. अहीरों के नृत्य करने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है.  

                          

              श्रीकृ‍ष्णजी का जन्म ऎसे समय में हुआ था,जब धरती कंस के अत्याचार से कांप रही थी. जन्म के साथ ही एक-एक असुरों कॊ मारना,वन में गौवें चराने जाना,दधी-माखन के बेचे जाने का विरोध कर, मटकियों का फ़ोडना, माखन चुराकर खाना ,ग्वालबालाओं के साथ नृत्य करना ,कालियादह से कालिया नाग को वहाँ से मार भगाना आदि-आदि घटनाओं पर यदि हम विचार करें तो भगवान श्रीकृ‍ष्णजी की पर्यावरण के प्रति सजगता एवं उनके रक्षण एवं संवर्धन की दृ‍ष्टि को समझा जा सकता है. आज विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश होते हुए हम देख रहे हैं और भयावह परेशानियों के दौर से गुजर भी रहे हैं. अगर हमारा यह क्रम जारी रहा तो दुर्दिन आने में वक्त नहीं लगेगा. अहीरॊं के नृत्य के पीछे, इस प्रकृति- प्रेम की भावना को समझा जाना चाहिए.

 

              श्रीकृ‍ष्ण व्यावहारिक दार्शनिक थे. जन्म की पहली रात से जीवन की अंतिम घडी तक, वे पूर्ण परिपक्व बने रहे. वि‍शे‍षताओं के रत्नाकर, श्रीकृ‍ष्ण के जीवन के, जिस भी पक्ष को हम छुएं,वह मणि की तरह चमकदार ही दिखता है. आज का समय  la?k’kZ का युग है  la?k’kZ को सामान्य रुप से विपरीत काल, प्रतिकूल स्थितियां ,परेशानियों तथा, संकट का दूसरा रुप माना जा सकता है. श्रीकृ‍ष्ण ने la?k’kZ को इनसे निकालकर,  एक ऎसी जीवन शैली का रुप दिया, जो वर्तमान के लिए सबक का वि‍षय है.

       बचपन में लीलाओ का वैचित्र्य, जवानी में द्वारकाधीश का पराक्रम, प्रौढावस्था में योगेश्वर का चिन्तन तथा वृद्धावस्था में श्रीकृ‍ष्ण के विवादास्पद निर्णय,अधिक नए-नए विचार देने वाले रहे. इस अद्भुत समाधानकारी व्यक्तित्व को, सदैव प्रश्नॊं के घेरे मे खडा किया गया .दो सवाल आज भी    हमें उलझनॊं मे डालने के लिए पर्याप्त है कि उन्होने बचपन में महारास और बाद की आयु मे महाभारत क्यों कराया ?.क्या कभी आपने इस वि‍षय पर गंभीरता से विचार किया है ? मेरा अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार मेरा अपना मत है कि बचपन में बालकॊं का हृदय स्वच्छ-साफ़ और सरल होता है. यदि वे मिलकर नृत्य करते है तो उसमे कृत्रिमता कहीं नहीं होती,.क्योकि वे जो कुछ भी सोचते और करते हैं उसमें हृदय प्रमुख होता है. उसमे बुध्धि का कहीं भी योगदान नहीं रहता. अतः उनके द्वारा किया गया हर कार्य, भले ही वह नृत्य ही क्यों न हो, उसमे बनावटीपन नहीं होता .उनके नृत्य में वे कोमल भाव सदैव उपस्थित रहते है. यहाँ cqf)  का प्रयोग नहीं के बराबर है .बच्चा जब जवान होने लगता है तो उसकी बाल- सुलभ हरकतॊं मे अन्तर आने लगता है. वह हर कार्य दिल से न करते हुए बुध्धि से करने लगता है और उसमे कृत्रिमता आने लगती है .फ़िर बाललीलाओं में मधुरता का चरम जो होता है. अतः श्रीकृ‍ष्णजी ने बचपन में महारास लीलाएं कीं. उनके नाचने के साथ केवल बृज ही नही नाचा बल्कि विश्व भी उनके साथ नृत्य करने लगा था. युवावस्था में प्रवेश करते ही बुद्धि अपना काम करने लगती है. उसमें इतनी समझ विकसित हो जाती है कि वह अच्छे और बुरे मे फ़र्क महसुस करने लगता है. पाप क्या है और पुण्य क्या है ,इसे समझने लगता है .कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उसकी बुद्धि, निर्णय करने की क्षमता विकसित हो चुकी होती है..उन्होने देखा कि कौरव, पाण्डवों के साथ सही न्याय नहीं कर रहे हैं ,तब उन्होंने इसका फ़ैसला युद्ध के जरिये करने  का विकल्प खोज निकाला. ऎसा भी नहीं था कि पूरी प्रजा को उन्होने युद्ध मे झोंक दिया. युद्ध से पहले वे स्वयं शांतिदूत बनकर गये और सभी पहलुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी. मैं समझता हूँ कि बढती उम्र मे नृत्य नहीं, बल्कि महाभारत ही हो सकता है .यह बात हमें ध्यान मे रखना होगा. इसी महाभारत. के नेतृत्व  के कारण हम उन्हें एक विशि‍ष्ट स्थान पर खडा पाते है. मित्रों,बात स्प‍ष्ट है कि जब नृत्य अपने चरम पर जा पहुँचता है तो वह महारास मे तब्दील हो जाता है. आज की तिथि में हमें नृत्य को उस चरम तक पहुँचाना है, जो महारास मे बदल जाए. केवल हम ही नहीं नाचें, बल्कि हमारे साथ समूचा विश्व नाचने लगे और नाचने लगे जड-चेतन भी. इस बात पर भी हमें गंभीरता से सोचना होगा.

 

              जमुना के तट पर बैठ कर  बासुंरी बजाना, गाय चरना, भोली-भाली गोपियों के साथ नाचना ,बडे-बडे सुरमाओं को धूल चटाते कृ‍ष्ण को समझ पाना यदि कठिन नहीं है, तो सरल भी नहीं है. आज अपने आपको श्रीकृ‍ष्ण के वंशज होने का दावा करने वाले सभी यदुवंशियों को इस बात पर गहनता से अध्ययन करना होगा, कि क्या वे उस दिव्यता का एक अंश भी अपने जीवन में उतार पाने में कहाँ तक सफ़ल हो पाए हैं ? हम थोडा यहाँ उन्हें समझते चलें. ग्यानक्रांति के उदघो‍षक के रुप में वे गीताकार हैं. उनके ग्यान की इस प्रखर और प्रबल धारा का लोहा सारा संसार मानता है. नैतिकक्रांति ,भावनात्मक नवनिर्माण के लिए वे भक्तिरस के संचारक हैं. उनकी भक्तवत्सल, लोकहित के लिए समर्पित भाव को कोई नकार नहीं सकता.  सामाजिक क्रान्ति-नायक के रुप में, वे वृज में गोरस सत्याग्रह से लेकर, महाभारत तक का संचालन किया. इन सबके पीछे उनके दु‍ष्प्रवृत्ति-उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति-संवर्धन का ,युगधर्म की स्थापना का, सुदृढ संकल्प कार्य करता दिखाई देता है. सामाजिक कार्यक्रमॊं के रुप में उन्होंने अनेक अभियान चलाए ,उन्हें यहाँ आज समझने की ज्यादा जरुरत है.

                            

                             श्रीकृ‍ष्णजी के अग्रज बलराम हलधर कहलाए तथा वे स्वयं गोपाल कहलाए.  इस संबोद्धन के पीछे उनकी विशे‍ष मंशा झलकती है. भारत कृ‍षिप्रधान देश है. यहाँ की उपजाऊ भुमि में अन्न,फ़ल से लेकर औ‍षधियों,वनस्पतियों की अटूट संपदा उपजती है  इसी संपदा को विकसित कराने की साधना का नाम कृ‍षि और उक्त साधना मे नि‍ष्ठापूर्वक लगे रहने वाले साधक का नाम कृ‍षक.है. कृ‍षक याने हलधर. गोपाल के बगैर हलधर और हलधर के बगैर गोपाल की कल्पना कैसे की जा सकती है ?आज स्थूल पर्यावरण एवं सूक्ष्म मानवीय संवेदना, दोनो के संरक्षण  एवं विकास के लिए गोपालवृत्ति आवश्यक हो गयी है. हम आज गोपाल के गूढ अर्थ को भूल गये है तथा पहले दूध व्यापार और फ़िर मांस व्यापार से सम्पन्न बनने के क्रूर प्रयास करने लगे.  इस भ्रम में हम पशुधन के प्रति तो क्रूर बने ही, पर्यावरण और मानवीय संवेदनॊं के हनन में भी हमें संकोच नहीं रह गया है.

                             गोरस आंदोलन:-भगवान श्रीकृ‍ष्ण ने धन के लोभ मे गोरस बेचे जाने के विरुद्ध, वृज में सबसे पहले सत्याग्रह छेडा था. धन के लोभ में बछ्डॊं और बालकों को गोरस से वंचित करके उसे राक्षसों को उपलब्ध कराने का कडा विरोध किया था. मटकी फ़ोड उसी आन्दोलन का एक अंग था. गॊपूजन जैसी भावभरी परिपाटियाँ उन्होनें चलायीं थीं. आज की परिस्थितियों में, हमें उसी तथ्य को समझना तथा समझाना होगा .फिर आज देश में, ऊर्जा की बडी समस्या है. पशुधन से प्राप्त गोबर से उपयोगी बायोगैस तथा कीमती खाद का भली- भांति उपयोग में लेने का क्रम बना लिया जाय, तो उससे पर्यावरण बिगडने के स्थान पर, पर्यावरण-संवर्धन का लाभ उठाया जा सकता है. गोबर, गोमूत्र में खरपतवार को जैव खाद मे बदलने की अद्भुत क्षमता होती है. वह अपने से १० गुने खरपतवार को उपयोगी उर्वरक के रुप मे बदल सकता है. गाय के दूध, दही ,घृत से लेकर गोबर, गोमूत्र, चर्म और हड्डियों तक में औ‍षधीय गुण पाये जाते है. यदि हम इनका महत्व समझ लें तो देश के पर्यावरण, आर्थिक-स्वावलम्बन, आरोग्य,कृ‍षि विकास तथा मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण-संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं.

 

                             हमने आपने दीपावली के समय टी.वी पर देखा है कि करोडों मन खोया ,जो नकली दूध से बनाया गया था,अधिकारियों ने जमीन मे दफ़न किया और हजारों लीटर नकली दूध, नालियों में बहाया गया. कभी सोचा है आपने कि हम केवल धन कमाने की लालच मे कितना आगे बढ गये है कि हमे अपने ही देशवाशियों की जान की परवाह नही है.? पशुधन की स्थिति भी आज किसी से छिपी नहीं है. आज सबसे ज्यादा जबाबदारी उस समाज की है जो अपने आपको गोपालक- अथवा अहीर कहलाने पर गर्व महसूस करता है.और गर्व महसूस करता है कि वह श्रीकृ‍ष्ण का वंशज है, एक श्वेत कान्ति लाने मे उसे आगे आना होगा.

             

                             अपने मन की पीडा मैं यहाँ उजागर करना चाहूँगा कि वर्तमान समय में जो नर्तक दल अपनी पारम्परिक वे‍षभू‍षा मे गली-गली घूमता है,वह मुझे प्रीतिकर नहीं लगता.लोगों के मन में अब वह सम्मान नहीं रह गया है जो पहले कभी देखने को मिलता था .अतः स्थानीय समिति को चाहिए कि वह नृत्यमंडलियों के बीच स्पर्धा का आयोजन करवाये और पुरस्कार में उन्हें नगद राशि के अलावा भेंट मे सुखसागर-गीता या अन्य ग्रंथ जो श्रीकृ‌ष्ण की लीलाओं को विस्तार से बतलाता हो, दिया जाना चाहिए.

 

                             इस दिशा में हमने एक प्रयोग यहाँ छिन्दवाडा में किया. छ्ट के दिन मढई मेले मे जिले के आसपास की नृत्य मंडलियों को आमंत्रित किया. उनके बीच स्पर्धा करवाई गई और उन्हें पुरस्कृत किया. हालांकि ऎसे आयोजन पूर्व में भी होते रहे है.लेकिन इस साल हमने इस  जिले के प्रख्यात जनलोकप्रिय सांसद एवं शहरी विकास मंत्री माननीय श्री कमलनाथजी को आमंत्रित किया. उन्होने इस मढई मेले में, सिर्फ़ शिरकत ही नहीं की बल्कि अहीरॊं के पारम्परिक पो‍षाक को भी पहना और घो‍षणा की कि आने वाले समय में इसे और भी भव्य रुप मे मनाने और शरीक होने का आश्वासन भी दिया. श्रीकॄ‍ष्ण मंदिर निर्माण में वे काफ़ी समय पूर्व, पाँच लाख की राशि भी प्रदत्त कर चुके हैं. एक विशाल मंदिर की आधारशिला रखी जा चुकी है जिसके निर्माण में वे अपना पूरा सहयोग देने के लिए भी तत्पर है ,इसकी उन्होने घो‍षणा वे कर चुके हैं.

 

              भगवत गीता का घर- घर में पाठ हो,लोगों में नैतिकता का प्रकाश फ़ैले, लोग सदाचारी बनें,और श्रीकृ‍ष्ण के अनुयायी बनें ,इस विचार धारा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए यहाँ गीता प्रति‍ष्टान्न नामक संस्था का गठन किया गया. श्रीयुत केशवप्रसाद तिवारी,पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने इस पुनीत कार्य के लिए अध्यक्ष का पदभार ग्रहण किया और विगत पाँच साल से यह संस्था नियमित रुप से प्रति रविवार ,दिन के नौ बजे से गीता पाठ करवाती है. इसमें बडी संख्या में लोग इकठ्ठे होते हैं और अपने जीवन कॊ धन्य बनाते हैं. जल्दी ही यहाँ गीता मन्दिर का निर्माण भी होने जा रहा है. श्री काबराजी ने मन्दिर निर्माण में भूमि दान में दी है .इसी तरह अन्य जिलों तथा गाँवो में इसका विस्तार किया जाना, मैं आवश्यक समझता हूँ.

 

                             मंदिर तो बनते रहेगे ,लेकिन हमे अपने मन में एक ऎसे मन्दिर को भी आकार देना होगा, जिसमें हमारे जगदीश्वर आकर विराजें. जब मन में ईश्वर का वास हो जाता है,तो भय दूर भाग खडा होता है. अतः हम ऎसा कार्य  नहीं करे जिससे हम खुद ही अपनी नजरों में गिर जाएं .देर सबेर कृ‍ष्ण आप में उतरेगे, लेकिन इसके लिए हमारे मंदिर का हर कोना पवित्र एवं सुवासित होना जरूरी है .वह हमे दिखाई भी पडेगें, बशर्ते हमारी दृ‍ष्टि, उस अर्जुन की तरह होनी चाहिए. यह दृ‍ष्टि अर्जुन को तब मिली थी जब उसने उन पर भरोसा किया. जिस दिन हमें उन पर इतना भरोसा हो जाएगा, सच मानिए हमें यह कहने की जरुरत ही नहीं पडेगी कि"बडी देर भई नन्दलाला". तब नंदलाल हमारे साथ होगे, हर पल, हर संकट में.

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57.

 

 

                                                          परम्परा और आधुनिकता.                                                                                                      

                            परम्परा पर चर्चा करने से पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि परम्परा क्या होती है? इसकी स्थापना की जरुरत आखिर क्यों समझी गई? क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है ? क्या इसके करने और न करने पर कोई अनिष्ट होने की संभावना है? क्या परम्पराएँ कोई दकियानुसी विचारधारा है, या फ़िर इनका कोई ठोस आधार भी है? क्या राष्ट्रीयता को लेकर भी कोई परम्परा विकसित हुई है?. क्या परम्परा का प्रभाव गायन,/नृत्य/चित्रकला/ साहित्य /नाटक/संगीत पर भी देखा जा सकता है? आदि-आदि. एक नहीं,बल्कि अनेक प्रश्न इस दिशा में उठ खडॆ होते हैं.

                             यदि हम इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करें तो पाते हैं कि परम्पराऎं जीवन जीने की एक शैली का नाम है. अब यह आदमी के विवेक पर निर्भर करता है कि वह पशुवत जीवन जिए, जिसमें कोई सामाजिक बंधन नहीं है. न ही कोई आदर्श हैं, और न ही कोई नियम कायदे हैं. चुंकि आदमी एक सामाजिक प्राणी है, अतः समाज की एक इकाई होने के नाते, उसके कुछ कर्तव्य बनते हैं, कि समाज में किस तरह शांति का वातावरण बना रहे. बडॆ-बुजुर्गों के प्रति उसका कैसा व्यवहार हो. घरों की स्त्रियों के प्रति उसका क्या नजरिया हो.  बच्चों के प्रति उसके क्या कर्तव्य होने चाहिए. फ़िर समाज में एक ही जाति के ,एक ही संप्रदाय के लोग नही रहते. उसमे अलग-अलग धर्मों के लोग भी रहते हैं, उनके प्रति उसका क्या दायित्व बनता है,? प्रकृति और पर्यावरण से उसके कैसे संबंध होने चाहिए?, यह भी उसे ध्यान में रखना होता है. इन सब बातों की शिक्षा वेदों-पुराणॊं में अथवा धार्मिक ग्रंथॊं में पढने को मिलती हैं.  इन वेदों और पुराणॊं के रचियता और कोई नहीं बल्कि हमारे ऋषिगण थे,जिन्होंने सुक्तियों के रुप में ऋचाएं लिखी- श्लोक लिखे, ताकि आदमी इन नियमों का पालन करे और अपने जीवन में उतारे.  यहाँ यह बात ध्यान में रखना अति आवश्यक होगा कि वे कथाकथित ऋषि और कोई नहीं, बल्कि समाजशास्त्री ही  थे,जिन्होंने एक मर्यादा-रेखा खीचीं, उस पर धर्म का हल्का सा मुल्लमा चढाया और उसे अमल में लाने की सीख दी. उन्होंने जो भी नियम-कायदे बनाए, उन सभी का अपना ठोस आधार है साथ ही वैज्ञानिक आधार भी.               

              प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त अर्थात सूर्योदय से प्रायः डेढ घंटा पूर्व उठकर जाग जाने की बात कही गई है. यह भी कहा गया है कि ऎसा करने से उत्तम स्वास्थ्य, धन विध्या, बल और तेज बढता है. जो सूर्य उगने के समय तक सोया रहता है उसकी आयु घटती है. उन्होंने उसे एक सूत्र में व्याख्यायित करते हुए लिखा-

                             “कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती--करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम.”       

              अर्थात;--हथेलियों के अग्र भाग में लक्ष्मी निवास करती है, मध्यभाग में सरस्वती और मूल में ब्रह्माजी निवास करते हैं. अतः प्रातः हथेलियों के दर्शन करना आवश्यक है. भगवान देवव्यास ने करोपल्ब्धि को मानव का परम लाभ माना है. इस् विधान का आशय यह है कि प्रातःकाल उठाते ही सर्वप्रथम दृष्टि और कहीं न जाकर अपने करतल में ही देवदर्शन करे, जिससे वृत्तियां भगतचिन्तन की ओर प्रवृत्त हों. भगवान का स्मरण और ध्यान करने से सुबुद्धि बनी रहे. शरीर तथा मन से शुद्ध सात्विक कार्य किया जा सके. जब आदमी सुबह से ही इस बात को अपने जहन में उतार लेता है तो निश्चित जानिए कि वह फ़िर कोई बुरे काम की ओर प्रवत्त नहीं होगा. यदि बुरे काम नहीं करेगा तो उसका फ़ायदा तो उसे मिलेगा ही, साथ में वह समाज के लिए भी अप्रत्यक्षरुप से लाभदायी होगा..                                                                  इसी तरह बिस्तर छोडने से पहले और शय्या से नीचे उतरने से पूर्व उसे धरती माता का अभिवादन करना चाहिए और उन पर पैर रखने की विवशता के लिए क्षमा मांगते हुए निम्नलिखित शलोक का पाठ करना चाहिए                                                                                                                                                                                                                  “ समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले//विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं क्षमस्व में”                                                                                                                                                                                                                                   

आप ऎसा करें अथवा न करें,इससे धरती को कोई फ़र्क नहीं पडता. आप चाहें खाट पर रहें अथवा नीचे उतर आएं, धरती पर उतना वजन निश्चित तौर पर रहना ही रहना है, लेकिन इसके पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण काम कर रहा होत्ता है. धरती के स्पर्ष करने मात्र से आपके भीतर एक चुंबकीय शक्ति उत्पन्न होती है,जिसका अनुभव आप दिन भर महसूस कर सकते है. मात्र इस छोटे से टोटके से क्या आप दिन भर उर्जावान बने रहना नहीं चाहेंगे? फ़िर वैज्ञानिक भी मानते है कि धरती एक विशाल चुंबक है. इस बात से भला आप इनकार कैसे कर पाएंगे.?

              इसी प्रकार घर में स्नान करने से पूर्व निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए लोगों देखा-सुना जा सकता है.

              “गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती//नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेSस्मिन संनिधिं कुरु”

              इस देश में नदियों को माँ का दर्जा दिया गया है. गंगा-यमुना-सरस्वती, नर्मदा ताप्ति आदि नदियों को देवी का दर्जा दिया गया है और उनकी अनेकानेक महिमा गायी गई है. नहाने से पूर्व आदमी इस भाव से भर उठता है कि वह नदी में उतरकर स्नान कर रहा है. यह भाव-पक्ष है. कहा गया है कि जैसा भाव आप मन में लाएंगे,वैसी ही अनुभूति आपको होने लगेगी. ऎसा किए जाने से मन प्रसन्नता से भर उठता है और वह पूरे दिन अपने आपको तरोताजा पाता है.

              एक ही तरह की लोकाभिव्यक्ति या लोक तत्व लंबे समय तक अभिव्यक्त होता रहे तो कालान्तर में परम्परा बन जाता है. और उसकी अभिव्यक्ति लोक परम्परा के अन्तरगत होने लगती है. और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अभिव्यक्ति भी पाती हैं. यथा गीतों में, नृत्यों में, वाध्यों में, कथाओं में, कहावतों में, और लोकोक्तियों में रुप पाकर संचारित होती हैं. साथ ही लोक-व्यवहार, उठने-बैठने,  पहनने-ओढने,  हँसने-रोने, तथा बातें करने में भी परिलक्षित होती हैं.

              इस प्रकार स्पष्ट है कि इन परम्पराओं में भिन्न-भिन्न चीजों पर जोर है,किन्तु उनमें परस्पर मेल मिलाप भी होता है. शास्त्रीय संगीत और नृत्य शास्त्रीय परम्परा के ज्वलन्त उदाहरण है, जो लोक संस्कृति के स्वरुपों लोक-गीत- जैसे बिरहा, चैता, कहरवा, पंडवानी----लोकनाट्य में नौटंकी विदेशिया,तथा माचा, -लोकनृत्य में छउ बीहू, गर्भा----लोक चित्रकला में -मधुबनी, जादोपटिया आदि भिन्न हैं क्योंकि शास्त्रीय संगीत और नृत्य प्रायः कुछ घरानों  और राजदरबारों तक सीमित रहे.( दरभंगा, बनारस घराना, जयपुर घराना, लखनऊ घराना,आगरा घराना, ग्वालियर घराना, गया घराना, कर्नाटक संगीत, हिन्दुस्थानी संगीत) वहीं दूसरी ओर र्लोकगीत, लोकचित्रकला, लोकनृत्य आदि समूची जनता के लिए खुले है और वह गुरु-शिष्य परम्परा तक सीमित और संकुचित नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि दोनो पम्पराओं के मिलने से अर्धशास्त्रीय संस्कृति का विकास हुआ.

              जो भी है, यह तो मानना पडॆगा कि भारत में सांस्कृतिक बहुलता का वजूद है. न केवल धर्मों में और पंथों में अलग-अलग उप-सांस्कृतिक परम्पराएं है, और यह परम्परा इतिहास से भी प्रभावित है, जिसके कारण अद्भुत “सामाजिक संस्कृति” विकसित हुई, जिसमें ’भिन्नता में एकता के साथ-साथ “एकता में भिन्नता” भी है और यही इसकी खूबसूरती एवं निरंतरता की वजह है.

              लोक परम्पराएं अपने बुनियादी चरित्र के समानधर्मी होते हुए किसी अंचल विशेष में अपनी विशिष्टता की पहचान अलग लिए भी हो सकती है .उसको समझने के लिए उस अंचल के उद्भव, विकास, और निरंतरता, भौगौलिक परिस्थिति तथा सामाजिक दबाव आदि को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है. जन्म संस्कार ,छटी, नामकरण संस्कार, सगाई, विवाह आदि में अपनायी जाने वाली परम्पराएं, मृत्यु के अवसर पर किए जाने वाले संस्कारो में, पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है. यही नहीं, एक ही जाति के लोगों में भी उनकी लोक-परम्पराओं में भिन्नता मिलती है. यद्दपि बुनियादी तौर पर एकरुप होते हुए भी विभिन्न अंचलों की परम्पराएं भी लगभग एक ही तरह की होती है और उनके गतिशीलता का पैमाना भी एक सा ही हुआ करता है.

              गतिवान और विकासशील परम्पराएं कब संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन जाती है, पता ही नहीं चल पाता. शाब्दिक अर्थों में “संस्कृति” शब्द “संस्कार” का ही रुपान्तरण है. और कालान्तर में संस्कारों का परिमार्जन ही संस्कृति का आकार ग्रहण करता हुआ जीवन भर साथ चलता है, जिसे हम बाद में इन्हीं संस्कृति और संस्कारों को भावी पीढी को सौंप जाते हैं.

              लोक व्यवहार के कुशल चितेरे, मानस मर्मज्ञ तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में परम्प्रराओं और संस्कारों की विशद व्याख्या ही नहीं की है,बल्कि उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उतारकर उसे जन-जन तक पहुंचाया भी है-

                                           १/-“प्रातकाल उठि के रघुनाथा* मातु पिता गुरु नावहिं माथा”

                                           २/-“करि दंडवत मुनिहिं सनमानी*निज आसन बैठारेहि आनी

                                           ३/-“जननी भवन गए प्रभु*चले नाइ पद सीस”

                                           ४/-“लागे पखारन पाय पंकज*प्रेम तन पुलकावली”

                                           “५/- कंबल,बसन विचित्र पटॊरे*भांति-भांति बहु मोल न थोरे

                                           ६/-गज रथ तुरग दास अरुदासी*धेनु अलंकृत कामदुहा सी”

                                           ७/-“सनमानि सकल बरात आदर, दान बिनय बडाइ कै

                                           प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे,पूजि प्रेम लडाइ कै          

                                           ८/-“बृंदारका गन सुमन बरिसहिं,राउ जनवासेहि चले

                                           ९/-दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ, नगर कौतूहल भले

                                           १०/-तब सखी मंगल गान करत, मुनीस आयसु पाइ कै

                                           ११/-दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि, चली कोहबर ल्याइ कै”

                                           “पुनि जेवनार भई बहु भाँती, पठए जनक बोलाइ बराती”

                                           १२/-“आसन उचित सबहिं नृप दीन्हे, बोलि सूपकरी सब लीन्हे

                                           १३/-सादर लगे परन पनवारे. कनक कील मनि पान सँवारे”

                                           जेवँत देहि मधुर धुनि गारी, लै लै नाम पुरुष अरु नारी’            

                            सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम करना, अपने से बडॆ-बूढे, माता-पिता तथा गुरु को उचित सनमान देना, शादी-विवाह के समय वधु को दहेज में अनेकानेक चीजों का दिया जाना. बरात का आदरपूर्वक सम्मान करना, स्त्रियों का मंगल गान गाना, दुल्हे के लिए लहकोर लेकर आना,और खिलाना, सारे बारातियों को भोजन करने के लिए बुला भेजना, उचित सनमान देते हुए आसन देना, भोजन करने का आग्रह करना, भोजन करते समय स्त्रियां, मधुर ध्वनि से पुरुषों व स्त्रियों के नाम ले लेकर गालियाँ देने का रिवाज आदि का वर्णण गोस्वामीजी ने मानस में किया है

                             परम्पराओं का सांचा-ढांचा कुछ इस तरह विकसित किया गया था कि वह सकल समाज को भी साथ लेकर चलती है.. इस उदाहरण से काफ़ी हद तक उसे समझा जा सकता है. मसलन किसी परिवार में शादी-विवाह होना है. मंढा बनने और तोरण सजाने के लिए उसे बांस-बल्लियों की आवश्यक्ता होती थी तो वह बसोड से संपर्क साधता था. खाम्ब बनाने के, लिए बढई, मिट्टी के पात्र जैसे कलश-और दीप प्रज्जवलित करने के लिए दीया चाहिए तो वह कुंभकार से संपर्क साधता था. शादी की रस्में करवाने के लिए किसी योग्य ब्राहमण की तलाश करना, हर घर तक मांगलिक कार्यों की सूचना अथवा बुलावा भेजने के लिए लिए नाई को इस काम में लगाना, वाद्द-यंत्र बजाने के लिए बसोड, मंगल गीत गाने और भी व्यवहारिक रीत निभाने के लिए मोहल्ले-पडौस की महिलाओं की आवश्यकता होती थी. रिश्ते-नाते के लोगों के अलावा पूरा समाज इस आयोजन में अपनी भागीदारी का निर्वहन करता नजर आता था.

              यह परम्परा आज भी चली आ रही है, लेकिन इस बदले माहौल में काफ़ी कुछ बदल गया है. इस आधुनिकता के दौर के चलते अब लोग देर तक बिस्तर में घुसे रहते हैं. गुरुजनो एवं वयोवृद्ध कितना सम्मान पा रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. संबंध तय होने से पहले मांग-लिस्ट थमा दी जाती है.,मंगल गान गाने और सुनने की कल्पना अब नहीं की जा सकती. “चिकनी चमेली” जैसे बोल वाले गानों पर युवा-युवतियाँ थिरकते नजर आते हैं. अब कोई आपको  मनुहार करते हुए खाना परस कर नहीं खिलाता. उसकी जगह अब “बफ़े” ने ले ली है. बफ़े लेने के अपने अपने नियम कायदे हैं लेकिन लोग भोजन पाने के लिए गिद्द की तरह टूट पडते हैं., बच्चों का जन्मदिन भी अब पाश्चात्य तरीके से मनाया जाता है. उसकी उम्र के अनुसार, उतनी मोमबत्तियां जलाई जाती है और फ़िर “  हेप्पी बर्थ डॆ टू यू” कहकर तालियां बजती हैं और फ़िर बच्चा उस मोमबत्ती को फ़ूंककर बुझा देता है, जबकि भारतीय पद्दति में दीप जलाने की शिक्षा दी जाती है.

                             “दीपोज्योतिः परब्रह्म दीपोज्योतिर्जनार्दनः/दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप नमोSतु ते

                        शुभं करोतु कल्याण आरोग्यं सुखसम्पदम/शत्रु बुद्धि विनाशाय च दीपज्योर्नामोsतु ते “

              हमारी भारतीय परम्परा में दीप प्रज्जवलित करने के महत्व को प्रतिपादित किया गया है, न कि दीप बुझाने को. यह पाश्चात्य संस्कृति की देन को हम अंगिकार करके गौरवान्वित होने तथा आधुनिक होने का भ्रम पालकर, प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं, यह सीधे-सीधे भारतीयता पर कलंक है.

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                                           लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना.                                                                                                                                                                   .             लोकसाहित्य पढाने-लिखने में एक शब्द है, पर वह वस्तुतः यह दो गहरे भावों का गठबंधन है. “लोक” और “साहित्य”एक दूसरे के संपूरक, एक दूसरे में संश्लिष्ट. जहाँ लोक होगा, वहाँ उसकी संस्कृति और साहित्य होगा. विश्व में कोई भी ऎसा स्थान नहीं है, जहाँ लोक हो और वहाँ उसकी संस्कृति न हो.       

              मानव मन के उद्गारों व उसकी सूक्ष्मतम अनुभूतियॊं का सजीव चित्रण यदि कहीं मिलता है तो वह लोक साहित्य में ही मिलता है. यदि हम लोकसाहित्य को जीवन का दर्पण कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. लोक सहित्य के इस महत्व को समझा जा सकता है कि लोककथा को लोक साहित्य का जनक माना जाता है और लोकगीत को काव्य की जननी. लोक साहित्य मे कल्पना प्रधान साहित्य की अपेक्षा लोकजीवन का यथार्थ सहज ही देखने में मिलता है.                                                                                                       

लोकसाहित्य हम धरतीवासियों का साहित्य है,क्योंकि हम सदैव ही अपनी मिट्टी, जलवायु तथा सांस्कृतिक संवेदना से जुडे रहते हैं. अतः हमें जो भी उपलब्ध होता है वह गहन अनुभूतियों तथा अभावॊं के कटु सत्यों पर आधारित होता है, जिसकी छाया में वह पलता और विकसित होता है. इसीलिए लोक साहित्य हमारी सभ्यता का संरक्षक भी है.                                                                                                                                                                                          

साहित्य का केन्द्र लोकमंगल है. इसका पूरा ताना- बाना लोकहित के आधार पर खडा है. किसी भी देश अथवा युग का साहित्यकार इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता. जहाँ अनिष्ठ की कामना है,वहाँ साहित्य नहीं हो सकता. वह तो प्रकृति की तरह ही सर्वजनहिताय की भावना से आगे बढता है.                                                                                                 

संत शिरोमणि तुलसीदास की ये पंक्तियां” कीरत भनित भूरिमल सोई-सुरसरि के सम सब कह हित होई” अमरत्व लिए हुए है. गंगा की तरह ही साहित्य भी सभी का हित सोचता है. वह गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमय है, वह धरती को जीवन देता है...श्रृंगांर देता है और सार्थकता भी. प्रकृति साहित्य की आत्मा है. वह अपनी मिट्टी से, अपनी जमीन से जुडा रहना भी साहित्य की अनिवार्यता समझता है. मिट्टी में सारे रचनाकर्म का” अमृतवास´ रहता है. रचनाकर उसे नए-नए रुप देकर रुपायित करता है. गुरु-शिष्य परम्परा हमें प्रकृति के उपादानॊं के नजदीक ले आती है. जहाँ कबीर का कथन प्रासंगिक है-´गुरु कुम्हार सिख कुंभ गढी-गढी काठै खोट- अन्तर हाथ सहार दे बाहर वाहे खोट” संस्कारों से दीक्षित व्यक्ति सभी प्रकार के दोषॊं-खोटॊं से मुक्त रहता है. इसमें लोकहित की भावना समाहित है. मलूकदास भी इन्सानियत की परिभाषा अपने शब्दों में यूं देते हैं-“मलुका सोई पीर है,जो जाने पर पीर-जो पर पीर न जानई,सो काफ़िर बेपीर.” दूसरों की पीडा समझने वाला इन्सान पशु-पक्षी का भी अहित नहीं सोच सकता. उसे वनस्पति के प्रति मैत्री का वह विस्तार साहित्य ही तो है.

              जिज्ञासु व्यक्ति कुछ न कुछ सोचने की चेष्टा करता है. इस प्रकृति के सहचर्य से उसने बहुत कुछ सीखा है. उस काल के वेदज्ञ ब्राहमण चौदह विद्दाओं का  अध्ययन करना अपना अभीष्ठ  मानते थे. सोलह कलाओं और चौदह विधाओं के अलावा वे संगीत, सामुद्रिक, ज्योतिषि, वेदाध्ययन काव्य, भाषाशास्त्र, पशुभाषा ज्ञान, तैरना,धातु विज्ञान, रसायन, रत्न परख, चातुर्य एवं अंग विज्ञान आदि अनेक विषयों में गहरी रूचियाँ रखते थे.इस बात के साक्षी है पुरातन भारतीय- ग्रंथ जो समय की सीमा को पार कर चुके हैं .मनुष्य के संचित ज्ञान और अनुभव के पहले पुस्तकाकार स्वरुप की याद आते ही दृष्टि स्वमेव ही वेदों की ओर चली जाती है. वेद वे वाड.मय जो ज्ञान कोष के रुप में सदियों से हमारा साथ देते आए हैं. ऋगवेद को सृष्टि विज्ञान की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है. जल, अग्नि, वायु, मृदा, चारों वेदों की रचना के पीछे ये ही तत्व प्रमुख रुप से काम करते हैं. ऋगवेदे मे अग्नि के रुपान्तरण कार्य और गुणॊं की व्याख्या है., तो यजुर्वेद में विविध रुपों और गुण धर्मों की. सामवेद का प्रधान तत्व जल है, तो अथर्वेवेद पृथ्वी( मृदा) पर केन्द्रित है. पांचव तत्व आकाश तत्व है. सृष्टि की रचना करने वाले उस महान कुंभकार ने इन्हीं पांचों तत्वों के कच्चे माल को मिलाकर एक ऐसी ही रचना की ,जो बेजोड है.

              हमारी धरती के अस्तित्व का जो आधार है जिसे भारतीय मेधा ने भूमि माँ कहकर अभिनन्दन के स्वर अर्पित किए_”माताभुमिः पुत्रोव्है पृथिव्या”. अर्चन-अभिनन्दन के इन् स्वरों में बहुत ही सार्थक भावभीना स्वर है. यह वैदिक पृथ्वी समूह मां पृथ्वी की स्तुति का पावन सूत्र,प्रकृति प्रेम की अद्भुत मिसाल,पर्यावरण विमर्श का महत्वपूर्ण घोषणा-पत्र,पर्यावरण प्रतिष्ठा का सारस्वत अनुष्ठान और उसके संरक्षण के लिए समर्पित शिव संकल्प, आसुरी वृत्तियों के अस्वीकार तथा दैवी वृत्तियों के स्वीकार का घोषणा-पत्र है. यह पृथ्वी की समस्त निधियों के विवेक सम्मत प्रयोग का आग्रही है. यह प्रेम के लिए नहीं, श्रेय के लिए समर्पित शोध का पक्षधर है. यह सामाजिकता,मंगलमयता में लीन हो जाने का आव्हान है. आज के पर्यावरण संकट की समस्त युक्तियों का एक सूत्रिय समाधान है. बीस कांडॊं, इकतीस सूत्रों और पांच हजार नौ सौ इकहत्तर मंत्रों का महाकोष है. व्यक्ति सुखी रहे, दीर्घायु प्राप्ति करे. सदनीति पर चले, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं जीव जगत के साथ साहचर्य रहे,इन्हीं कामनाओं से ओत-प्रोत यह अद्भुत ग्रंथ है.

              लोक चेतना तो संस्कृति और साहित्य की परिचालक शक्ति मानी जाती है.किन्तु वर्तमान मशीनी और कम्प्युटरी समाज से लोक चेतना शून्य होती जा रही है. आज जरुरी है कि साहित्य का मूल्यांकन लोकजीवन, लोक संस्कृति की दृष्टि से किया जाना चाहिए. जो लोकसाहित्य लोकजीवन से जुडा होगा वही जीवन्त होगा. माना भूमिः प्रयोग है पृथीव्याः अथर्ववेद कि ऋचा का महाप्राण है. लोकजीवन इस ऋचा के आशय का प्रतिनिधित्व युगों से करता आ रहा है.यही लोक साहित्य की आधार शिला है. लोकसाहित्य परम्परा पर आधारित होता है. अतः अपनी प्रकृति मे विकाश- शील है. इसमें नित्यप्रति परिवर्तन की संभावना बनी रहती है. इसका सृजन युगपीडा एवं सामाजिक दवाब को भी निरन्तर महसूस करता रहता है.                                                                                  सांस्कृतिक परिस्थितियों का निर्वहन ही सभ्यता कहलाती है. कुछ विद्वान सभ्यता और र्संस्कृति को एक ही मानते हैं और उसके विचार में सभ्यता और संस्कृति का विकास समान रुप से होता है. काफ़ी गहराई से चिंतन करें तो सभ्यता का ज्यों-ज्यों विकास होता है,त्यों-त्यों संस्कृति का ह्रास होता है. खान-पान, पहनावा सब बदलता जाता है और उसका प्रत्येक पर प्रभाव पडता है.

              लोकसाहित्य में लोककथा-लोकनाटक तथा लोकगीतों के रखा जा सकता है. जिसमें जनपदीय भाषाओं का रसपूर्ण-कोमल भावनाओं से युक्त साहित्य होता है. भारतीय लोक साहित्य के मर्मज्ञ आर.सी टेम्पुल के मतानुसार लोक साहित्य कि साहित्यिक दृष्टिकोण से विवेचना करना उसी सीमा तक करना उचित होगा, जिस सीमा तक उसमें निहित सुन्दरता और आकर्षण को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे. यदि लोक साहित्य की वैज्ञानिक विवेचना की जाती है तो मूल विषय नीरस और बेजान हो जाएगा. लोक के हर पहलू में संस्कृति के दिव्य दर्शन होते हैं. जरुरत है तीक्ष्ण दृष्टि और सरल सोच की. लोक साहित्य के उद्भट विद्वान देवेन्द्र सत्यार्थी ने साहित्य के अटूट भंडार को स्पष्ट तौर पर स्वीकार करते हुए कहा था-“ मैं तो जिस जनपद में गया, झोलियां भरकर मोती लाया.    परलोक की धारणाएँ भी इन्हीं से जुडी है. सभी कर्मकाण्ड,पूजा-अनुष्ठान तथा उन्नत सांस्कृतिक समाज में मनुष्य के आचरण का निर्धारण इसी लोक में होता है. लोक हमारी सामाजिकता की गंगोत्री है और सभ्यता का प्रवेश द्वार भी. भारतीय जनमानस को श्रीमद भगवद्गीता ने जितना प्रभावित किया उतना शायद किसी अन्य पुस्तक ने नहीं किया. वैष्णवी तंत्र ने गीता की जो व्याख्या की है, उसमें प्रतीक के रूप में पशु जीवन का महत्व प्रतिपादित होता है.

                            सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः                                                                                         पार्थो वत्स सुधीर्भॊक्ता दुग्धं गीतामृतं महत.!

              अर्थात उपनिषद गाय है ,कृष्ण उनको दुहने वाले है, अर्जुन बछडा है और गीता दूध है. गीता मे प्रकृति को ईश्वर की माया के रूप में दर्शाया है. गीता के कुछ स्लोकों को ( अर्थ) रेखांकित किया जा सकता है. जो तेज सूर्य और चन्द्रमा में है, उसे मेरा ही तेज मानों. मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी भूत-प्राणियों के धारण करता हूँ. चन्द्रमा    बनकर औषधियों का पोषण करता हूँ. जठ-राग्नि बनकर प्राणियों की देह मे प्रविष्ठ हूँ. प्राणवायु- अपानवायु से संयुक्त होकर चारों प्रकार से भोजन किए हुए प्राणियों के अन्न को पचाता हूँ. संपूर्ण भूतों (प्राणियों) के ह्रदय क्षमता में निवास                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       करता हूँ.( अध्याय.१५)         

              श्रीकृष्ण ने अपनी प्रकृति को अष्टकोणी बताया है. इसमें पृथ्वी, जल,अग्नि,वायु एवं आकाश के साथ-साथ मन-बुद्धि एवं अहंकार की गणणा कि गई है. अपनी बाल-लीलाओं के माध्यम से उन्होंने जो दिव्य संदेश दिया उसका व्यापक प्रभाव लोकजीवन तथा लोकपरम्पराओं पर पडा. उस दिव्य संदेश के पीछे तात्पर्य यह था की वनस्पति,नदियां,पहाड,पशु-पक्षी,गौवें,जलचर और मनुष्य सभी इस प्रकृति के अंगीभूत स्वरुप हैं.और सबका रक्षण,पोषण और विकास जरुरी है.                      

पर्व और त्योहारों के इतिहास में हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास सृष्टि वस्तुतः सारे त्योहार ऎसे हैं जो प्रकृति की गोद में और प्रकृति के संरक्षण में मनाए जाते हैं. जैसे गोवर्धन पूजा, आवंला पूजन, गंगा सप्तमी, माह कार्तिक मे तुलसी पूजन आदि. ये सभी पर्व हमें अपनी प्राकृतिकता से सह संबंधो की परम्पराओं की याद दिलाते हैं .ऎसे पर्व जो प्रकृति के विभिन्न घटकॊं को पूजने के दिन के रुप में मनाए जाते है, उसी पर्व के अवसर पर सम्पन्न क्रिया –कलाप और समारोह प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का नया वातावरण हमें प्रदान कर पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उत्प्रेरित करते हैं. प्रकृति घटकों के सहसम्बन्ध हमें नई उमंग और प्रकृति प्रेम के नए उत्साह का अनुभव कराता है. भौतिक ,सांस्कृतिक एवं लोभ मानसपटल पर नहीं होंगे तो स्वार्थमय भौतिक संस्कृति जैसे प्रदूषण प्रकट नहीं होंगे और पर्यावरण शुद्ध बना रहेगा.

              विभिन्न तथ्यों एवं लोकजीवन की शैली के आधार पर ‍निष्कर्ष में कह सकते हैं कि वृक्ष हमारी संस्कृति के विभिन्न अंग रहे हैं .भारत कृषि प्रधान देश है. अतः मृदा का संरक्षण आवश्यक है. प्राकृतिक अवस्था में मैदानी एवं पहाडी स्थानों पर लगे वृक्षॊं की जडॆं जमीन को पकडॆ रहती है,जिससे पानी का प्रवाह एवं हवा संतुलित रहती है. वृक्षॊं के अभाव में हवा एवं पानी पर नियंत्रण नहीं रहने से भूमि के रेगिस्थान में परिवर्तन होने की प्रबल संभावनाएं बनती जा रही है. वनों की कटाई न करने के प्रति जन चेतना फ़ैलाने के उद्देश्य से आंदलनॊं को शुरु किया जाना चाहिए.

              मनुष्य की प्रदूषित मानसिकता प्रकॄति को किसी न किसी रुप में प्रदुषित करती है. अस्तु प्रकृति के प्रदूषण को रोकने के लिए संस्कृति की आत्मा,जिसमें प्रकृति की गूँज है,से अनुप्राणित होकर शिक्षा प्रदान करनी चाहिए. अतः शिक्षण संस्थाओं में अध्ययनरत बालक-बालिकाओं को परम्परागत भारतीय शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.                                                                                                

पूर्व की पीढियों ने अपने समय में प्रकृति का पूर्ण विकास कर उनको भौतिक संपत्ति के रुप में बदलकर अगली पीढियों को प्रदान किया जाना है और यह माना है कि आने वाली पीढी उन पूर्वजों का उपकार मानेगी, लेकिन वर्तमान पीढी की तो भावी मानव के लिए जटिल समस्याएं और प्रकृति के विध्वंस का आधार छॊड कर जाने की संभावनाएं बन रही है. आज रेगिस्थान बढ रहे हैं. जीव-जंतुओं की बहुत सी प्रजातियां लुप्त हो रही है. प्रकृति के वर्तमान दोहन के भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर ही अपनी योजनाओं का निर्माण करना चाहिए

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                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         बंधन राखी का.                                                                                                                                                                                                                                                                                             बंधन का शाब्दिक अर्थ तो बंध जाना, कैद हो जाना, जकडा जाना होता है, बंधना भला कोई चाहेगा भी क्यों कर.? लेकिन हर कोई बांधना चाहता है. यदि बंधने वाले के मन में कोई प्यारी सी ललक जगे और बांधने वाले के मन में कोई रस की निष्पत्ति हो तो कोई भी बंध जाना चाहेगा.  

              मछली क्या जाल में बंधकर उलझना चाहेगी ? कदापि नहीं,लेकिन जाल के साथ बंधा चारा उसे अपने सम्मोहन में बांध देता है और वह बेचारी उसमें जा फ़ंसती है. चारा यहां उसके मन में एक लालित्य जगाता है. बस उसी लालच में वह बंध जाती है. यह तो रही मछली की बात. कोई रुपसी भी भला किसी के जाल में क्योंकर बंध जाना चाहेगी?.उत्तर होगा कदापि नहीं. लेकिन वह भी प्यार के महिन बंधनों में बंध जाती है. कृष्ण ने सभी जीव-जन्तुओं को,सभी नर-नारी सहित समूचे विश्व को अपने सम्मोहन में बांधकर रखा था. वे भला क्या मां यशोदा के बंधन मे आसानी से बांधे जा सकते थे.? यहां वह मां का प्यार था, दुलार था,और भी बहुत कुछ था कि कृष्ण ने उन्हें अपने आपको बांधे जाने के लिए प्रस्तुत कर दिया.                            

              दरअसल, दूसरों को बांधने में एक निर्वचनीय सुख मिलता है,वहीं बंध जाने में भी एक सुख की निष्पत्ति होती है एक रस बांधने में आता है,वहीं एक रस बंध जाने में भी आता है. बंधने की प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है. स्त्री किसी पुरुष से, बच्चा अपनी मां से, बहन अपने भाई से,पुत्र अपने माता-पिता से एक अटूट बंधन में बंधे होते है लेकिन इसका पता न तो बंधने वाले को चल पाता है और न ही बांधने वाले को चल पाता है और इस तरह एक पडौसी दूसरे पडौसी से, पूरा एक गांव और संपूर्ण राष्ट्र एक सूत्र में बंधता चला जाता है. यह क्रम आज से नहीं, अनादिकाल से चला आ रहा है.                                              

              एक बहन अपने प्रिय भाई की कलाई में राखी बांधती है . राखी क्या है?. वह भी तो एक धागा ही है न ! जिससे वह उसे बांधती है. बहन के मन में अपने भाई के प्रति अनन्य प्रेम होता है,एक अटूट विश्वास होता है, एक ऐसा विश्वास कि वह आडॆ दिनों में उसकी रक्षा करेगा. कोई संकट यदि आ उपस्थित हुआ तो वह अपने प्राणी, की बाजी तक लगा देगा और अपनी बहन की रक्षा करेगा, उसके कठिन दिनों में एक संबल बन कर खडा हो जाएगा. भाई जब इस कच्चे सूत्र से बंधता है तो उसके मन में भी एक हिलोर पैदा होती है, एक गर्व का भाव पैदा होता है, एक आत्मविश्वास पैदा होता है,एक अपरिमेय शक्ति उसके मन में जागती है कि वह ऎसा कर सकेगा. राखी का शुद्ध शाब्दिक अर्थ भी तो यहां रक्षा भाव का जाग्रत होना होता है.

              पूजन के समय किसी पात्र में पानी भर दिए जाने के बाद उसका भाव ही बदल जाता है. उस पात्र को कच्चे सूत से लपेटा जाता है. ऐसी मान्यता है कि उसमे वरुण देवता का समावेश हो गया है.जो कि हमें समृद्धि और ऎश्वर्य प्रदान कराते हैं. वस्तुतः यह जुडाव ,प्रकृति के जुडाव से भी अपने आप जुड जाता है. वटसावित्री के दिन भी सुहागन स्त्रियां, पेड के तने में कच्चा सूत लपेटतीं हैं. सभी जानते हैं कि वट वृक्ष में देवताओं का वास होता है और आयुर्वेद के अनुसार उसका कितना महत्व है. भगवत्गीता में वट वृक्ष को लेकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अध्याय १०.श्लोक २६ मे कहा है  ”अश्वत्थःसर्ववृक्षाणां.....मुनिः! .वासुदेव कृष्ण अश्वस्थ यानि वट वृक्ष हैं, जाहिर है कि कृष्ण को कच्चे सूत्र में बांधकर वे अपने लिए अखंड सौभाग्य का वरदान मांगतीं हैं.

              रक्षाबंधन को मनाए जाने के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है.                                                                             

देवताऒं और राक्षसों के बीच युद्ध हो रहा था. यह युद्ध बारह वर्षॊं तक चलता रहा. इसमें देवताऒं की पराजय हुई. और असुरों ने देवलोक पर आधिपत्य जमा लिया. दुखी,पराजित और चिन्तित इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास गए और कहने लगे कि इस समय न तो मैं यहां सुरक्षित हूँ और न ही यहां से कहीं निकल सकता हूँ. ऎसी दशा में मेरा युद्ध करना ही अनिवार्य है,जबकि अबतक के युद्ध में हमारा पराभव ही हुआ है. इस वार्तालाप को इन्द्राणी भी सुन रही थी. उन्होंने कहा कि कल श्रावण शुक्ल पूर्णिमा है, मैं विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार करुंगी, उसे आप स्वस्ति-वाचनपूर्वक ब्राह्मणॊं से बंधवा लीजिएगा. इससे आप अवश्य ही विजयी होंगे.

              दूसरे दिन इन्द्र ने रक्षाविधान और स्वस्तिवाचनपूर्वक रक्षा बन्धन कराया. पहले रक्षासूत्र का विधि विधान से पूजन किया गया. फ़िर ब्राह्मणॊं ने रक्षासूत्र बांधते समय इस दिव्य मन्त्र को पढा-“ येन  बद्धौ बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः//तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल//. रक्षासूत्र के प्रभाव से उनकी विजय हुई. तब से यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को रक्षाबन्धन पर्व के रुप में मनाया जाने लगा.                                          

              भारतीय पर्व-परम्परा में भाई-बहन के मिलन का अनोखा त्योहार है रक्षाबंधन. इस दिन बहन अपने भाई की कलाई में राखी बांधतीं हैं और मंगलकामना करतीं हैं कि उसकी आयु लम्बी हो.                                         

              प्राचीन समय अथवा वर्तमान में भी ऎसा  देखा जाता है कि भाई को साहस देने, हिम्मत देने का कार्य बहन ही करती है. बहन का आशीर्वाद पाकर भाई वीरता का प्रदर्शन करता है. राष्ट्र पर जब भी आपत्ति आती है तो बहनों ने ही भाइयों को स्नेहरुपी आशीर्वाद देकर राष्ट्र की सुरक्षा परम कर्तव्य है,ऐसा उपदेश देते हुए धीरता,वीरता का परिचय दिया है.                                                                                                         

              ऎसे एक नहीं अनेको उदाहरण है जिनको पढकर यह जाना जा सकता है कि एक कच्चा धागा जब स्नेह से किसी की कलाई से बंधता है तो उसके कितने सुखद परिणाम निकले, देखने को मिलते हैं. सभी जानते हैं कि भगवान  श्रीकृष्ण अपनी बहन द्रौपदी से कितना स्नेह रखते थे और उन्होंने एक नहीं अनेकों बार अपनी बहन के कष्टॊं का निवारण किया था.           

              भरी सभा में जब दुर्योधन ने अपने भाई दुशासन को आदेश दिया था कि वह उसे घसीट लाए और उसका चीर हरण करे.यह तब का दृष्य है जब पांडवॊं ने जुए में अपना सर्वस्व लुटा दिया था. द्रौपदी ने चीख-चीख कर सभी रथी-महारथियों को,यहां तक धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह तक से अनुरोध किया था कि एक नारी की रक्षा की जानी चाहिए. जब कोई उसकी सहायता को आगे नहीं बढा तो उसने अपने भाई श्रीकृष्ण को याद किया. पल भी नहीं बीता था कि उन्होंने प्रकट होकर अपनी बहन की लाज की रक्षा की थी.

              एक दूसरा उदाहरण भी यहां देखने को मिलता है कि पांडवों के बनवास के समय सूर्य ने द्रोपदी को एक अक्षय पात्र दिया था. उसकी यह विशेषता थी कि वह दिन में एक बार             में इतना भोजन उपलब्ध करवा देता था कि हजारों का पेट भरा जा सकता था. दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करते हुए अनुरोध किया था कि वे एक बार जाकर वहां भोजन करें,जब द्रौपदी  भोजन कर चुकी हो और वह दिव्य पात्र धो  दिया गया हो.जिन्होंने इस कथा को पढा है वे जानते है कि कृष्ण को जब इस बात की भनक लगी तो वे वहां गए और थाली से चिपके अन्न के दाने को स्वयं खाकर ऋषियों को तृप्त कर दिया था.                          

              इस रक्षाबंधन सूत्र के प्रभाव से केवल हिन्दु ही परिचित होंगे, ऎसी बात नहीं है. इसका प्रभाव अन्य समुदाय के लोगों पर भी पडा और उन्होंने समय आने पर इस सूत्र की प्रतिष्ठा को आगे बढाया है.                          रक्षा का यह सूत्र बरसों पुरानी शत्रुता को भी खत्म कर देता है. इतिहास में ऐसे एक नहीं कई उदाहरण पढने को मिल जाएंगे. केवल एक प्रसंग पर हम यहां चर्चा करना चाहेंगे.                                              

              राजा मानसिंह ने अपने युवा पुत्र को अपनी सेना का प्रमुख बनाकर सम्राट अकबर की सहायता करने के लिए दक्षिण भेज दिया था. इसी बीच गुजरात के सुल्तान फ़िरोजशाह ने मौका देखकर नागौर पर चढाई कर दी. किले को शत्रु सेना ने घेर रखा था. इस् स्थिति ने राजा मानसिंह को बहुत चिन्ता और परेशानी में डाल दिया था. वे जानते थे कि कुछ सैनिकों के भरोसे वे उसे हरा नहीं पाएंगे. अपने पिता के माथे पर घिर आए चिन्ताओं की लकीरों को पुत्री पन्ना ने पढ लिया था. उसने अपने पिता को सलाह दी कि पास की बनी अरिकन्द पहाडी पर उम्मेदसिंह नामक राजपूत राज्य करता है. उससे मदद मांगी जा सकती है. चुंकि दोनो परिवारों के बीच किसी मामले को लेकर विवाद हुआ था और तभी से शत्रुता चली आ रही थी. मानसिंह ने अपनी पुत्री से कहा कि शत्रुता के चलते वह मदद को आगे नहीं आएगा.                             

              तभी पन्ना ने एक उपाय खोज निकाला. उसने अपने विश्वस्त और वफ़ादार युवक बेनीसिंह को बुलाया और सोने के तारों से सुन्दर मोहक राखियां, जो उसने तैयार कर रखी थी,भिजवाया. राखी के साथ एक पत्र भी था. उसने पत्र में लिखा;-“ तुम्हारी धर्म-बहिन पन्ना तुम्हें राखी भेज रही है. बहिन की राखी भाई के लिए उत्सव भी है और आमंत्रण भी. बहिन के द्वारा भेजा गया राखी का घागा भाई के लिए शौर्य और साहस की परीक्षा  की कसौटी होने के साथ ही आदर्शों के लिए, सनतन धर्म की मर्यादा के लिए समर्पित होने  हेतु व्रतबंध भी है.  यह पवित्र धागा तुम्हारी बहिन , वीरता और पराक्रम का आव्हान कर रही है. तुम्हें बर्बर और नृशंस आतताइयों के विरुद्ध जूझने के लिए रण निमंत्रण भेज रही है. नारी का अस्तित्व एवं अस्मिता आज खतरे में है.धर्म की सनातन मर्यादाएं आज रौंदी जा रही है. अपनी संस्कृति को विदेशी और विधर्मी कुचलने के लिए तत्पत हैं. तुम्हें अपनी संस्कृति, अपने धर्म एवं बहिन की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे बढना है. मुझे अपने भैया पर पूरा यकीन है. विश्वास है तुम्हारे कदम आगे बढे बिना न रहेंगे.”-तुम्हारी बहिन पन्ना.                                                                                                          

              पत्र को पढकर युवा उम्मेदसिंह के चेहरे पर वीरता का ओज चमकने लगा और उसने उस पत्र को अपने माथे से लगाया. राखी को अपनी कलाई में बांधा और अपनी सेना लेकर वहां जा पहुंचा और देखते ही देखते उसने शत्रु सेना के लोगों को गाजर-मूली की तरह काट फ़ेंका.                                                             

              शत्रु सेना को पराजित कर वह अपनी बहिन पन्ना से मिलने महल के भीतर प्रवेश किया. बाहर पन्ना आरती का थाल सजाए खडी थी. उसने आगे बढकर अपने भाई के माथे पर कुमकुम तिलक किया,आरती उतारी और कहने लगी:-“ भैय्या ! हिन्दुस्थान की हर बहिन को तुम्हारे जैसा भाई मिले”.                

              राखी का यह विशिष्ठ त्योहार अपने आपमें कितनी ही पवित्रता का भाव, ओज का भाव लिए हमारे सामने आ उपस्थित होता है. अतएव हर भाई का यह परम कर्तव्य हो जाता है कि वे अपनी बहनों का समुचित ध्यान रखे. उसकी अस्मिता की रक्षा करे. बहनॊं का भी यह परम कर्तव्य हो जाता है कि वे अपने भाइयों के मन में देशप्रेम के बीजॊं का अंकुरण करवाए और उन्हें  अपने कर्तव्यों का जब-तब बोध करवाते जाए. इस तरह जब समूचा देश एकता की डोर में बंध जाएगा तो क्या मजाल है कि शत्रु देश आपकी ओर आंख उठाकर देख सके.         

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गगनचुंबी इमारतें, सडकों पर फ़र्राटे भरती रंग-बिरंगी-चमचमाती लक्जरी कारें,मोटरगाडियां और न जाने कितने ही कल-कारखाने, पलक झपकते ही आसमान में उड जाने वाले वायुयान, समुद्र की गहराइयों में तैरतीं पनडुब्बियाँ, बडॆ-बडॆ स्टीमर,-जहाज आदि को देख कर आपके मन में तनिक भी कौतुहल नहीं होता. होना भी नहीं चाहिए,क्योंकि आप उन्हें रोज देख रहे  होते हैं,उनमे सफ़र कर रहे होते  हैं. यदि आपसे यह कहा जाय कि इस धरती ने नीचे भी यदि कोई मानव बस्ती हो,जहाँ के आदिवासीजन हजारों-हजार साल से  अपनी आदिम संस्कृति और रीति-रिवाज को लेकर जी रह रहे हों, जहाँ चारों ओर बीहड जंगल हों, जहाँ आवागमन के कोई साधन न हो, जहाँ विषैले जीव जन्तु, हिंसक पशु खुले रुप में विचरण कर रहे हों, जहाँ दोपहर होने पर ही सूरज की किरणें अन्दर झांक पाती हो, जहाँ हमेशा धुंध सी छाई रहती हो, चरती भैंसॊं को देखने पर ऐसा प्रतीत है,जैसे कोई काला सा धब्बा चलता-फ़िरता दिखलाई देता हो, सच मानिए ऐसी जगह पर मानव-बस्ती का होना एक गहरा आश्चर्य पैदा करता है.

              जी हाँ, भारत का हृदय कहलाने वाले मध्यप्रदेश के छिन्दवाडा जिले से 62 किमी. तथा तामिया विकास खंड से महज 23 किमी.की दूरी पर स्थित “पातालकोट” को देखकर ऊपर लिखी सारी बातें देखी जा सकती है. समुद्र् सतह से 3250 फ़ीट ऊँचाई पर तथा भूतल से 1200 से 1500 फ़ीट गराई में यह कोट यानि “पातालकोट” स्थित है.                                                                                     

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हमारे पुरा आख्यानों में “पातालकोट” का जिक्र बार-बार आया है.”पाताल” कहते ही हमारे मानस-पटल पर ,एक दृष्य तेजी से उभरता है. लंका नरेश रावण का एक भाई,जिसे अहिरावण के नाम से जाना जाता था, के बारे में पढ चुके हैं कि वह पाताल में रहता था. राम-रावण युद्ध के समय उसने राम और लक्ष्मण को सोता हुआ उठाकर पाताललोक ले गया था,और उनकी बलि चढाना चाहता था,ताकि युद्ध हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए. इस बात का पता जैसे ही वीर हनुमान को लगता है वे पाताललोक जा पहुँचते हैं. दोनों के बीच भयंकर युद्ध होता है,और अहिरावण मारा जाता है.उसके मारे जाने पर हनुमान उन्हें पुनः युद्धभूमि पर ले आते हैं.   

                             पाताल अर्थात अनन्त गहराई वाला स्थान. वैसे तो हमारे धरती के नीचे सात तलॊं की कल्पना की गई है-अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल,तथा महातल के नीचे पाताल.. शब्दकोष में कोट के भी कई अर्थ मिलते हैं=जैसे-दुर्ग, गढ, प्राचीर, रंगमहल और अंग्रेजी ढंग का एक लिबास जिसे हम कोट कहते है. यहाँ कोट का अर्थ है-चट्टानी दीवारें, दीवारे भी इतनी ऊँछी,की आदमी का दर्प चूर-चूर हो जाए. कोट का एक अर्थ होता है-कनात. यदि आप पहाडी की तलहटी में खडॆ हैं,तो लगता है जैसे कनातों से घिर गए हैं. कनात की मुंडॆर पर उगे पॆड-पौधे, हवा मे हिचकोले खाती डालियाँ,,हाथ हिला-हिला कर कहती हैं कि हम कितने ऊपर है. यह कनात कहीं-कहीं एक हजार दो सौ फ़ीट, कहीं एक हजार सात सौ पचास फ़ीट, तो कहीं खाइयों के अंतःस्थल से तीन हजार सात सौ फ़ीट ऊँची है. उत्तर-पूर्व में बहती नदी की ओर यह कनाट नीची होती  चली जाती है. कभी-कभी तो यह गाय के खुर की आकृति में दिखाई देती है.                               पातालकोट का अंतःक्षेत्र शिखरों और वादियों से आवृत है. पातालकोट में, प्रकृति के इन उपादानों ने, इसे अद्वितीय बना दिया है. दक्षिण में पर्वतीय शिखर इतने ऊँचे होते चले गए हैं कि इनकी ऊँचाई उत्तर-पश्चिम में फ़ैलकर इसकी सीमा बन जाती है. दूसरी ओर घाटियाँ इतनी नीची होती चली गई है कि उसमें झांककर देखना मुश्किल होता है. यहाँ का अद्भुत नजारा देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो शिखरों और वादियों के बीच होड सी लग गई हो. कौन कितने  गौरव के साथ ऊँचा हो जाता है और कौन कितनी विनम्रता के साथ झुकता चला जाता है. इस बात के साक्षी हैं यहाँ पर ऊगे पेड-पौधे,जो तलहटियों के गर्भ से, शिखरों की फ़ुनगियों तक बिना किसी भेदभाव के फ़ैले हुए हैं.

                             पातालकोट की झुकी हुई चट्टानों से निरन्तर पानी का रिसाव होता रहता है. यह पानी रिसता हुआ ऊँचें-ऊँचे आम के वृक्षॊं के माथे पर टपकता है और फ़िर छितरते हुए बूंदॊं के रुप में खोह के आँगन में गिरता रहता है. बारहमासी बरसात में भींगकर तन और मन पुलकित हो उठते है.                                         

 

 

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              अपने इष्ट, देवों के देव महादेव, इनके आराध्य देव हैं. इनके अलावा और भी कई देव हैं जैसे-मढुआदेव,हरदुललाला, पनघर, ग्रामदेवी, खेडापति, भैंसासर, चंडीमाई, खेडामाई, घुरलापाट, भीमसेनी, जोगनी, बाघदेवी, मेठोदेवी आदि को पूजते हुए अपनी आस्था की लौ जलाए रहते हैं, वहीं अपनी आदिम संस्कृति, परम्पराओं ,रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों मे गहरी आस्था लिए शान से अपना जीवन यापन करते हैं. ऐसा नहीं है कि यहां अभाव नहीं है. अभाव ही अभाव है,लेकिन वे अपना रोना लेकर किसी के पास नहीं जाते और न ही किसी से शिकवा-शिकायत ही करते हैं. बित्ते भर पेट के गढ्ढे को भरने के लिए वनोपज ही इनका मुख्य आधार होता है. पारंपरिक खेती कर ये कोदो- कुटकी, -बाजरा उगा लेते हैं. महुआ इनका प्रिय भोजन है .महुआ के सीजन में ये उसे बीनकर सुखाकर रख लेते हैं और इसकी बनी रोटी बडॆ चाव से खाते हैं. महुआ से बनी शराब इन्हें जंगल में टिके रहने का जज्बा बनाए रखती है. यदि बिमार पड गए तो तो भुमका-पडिहार ही इनका डाक्टर होता है. यादि कोई बाहरी बाधा है तो गंडा-ताबीज बांध कर इलाज हो जाता है. शहरी चकाचौंध से कोसों दूर आज भी वे सादगी के साथ जीवन यापन करते हैं. कमर के इर्द-गिर्द कपडा लपेटे, सिर पर फ़डिया बांधे, हाथ में कुल्हाडी अथवा दराती लिए. होठॊ पर मंद-मंद मुस्कान ओढे ये आज भी देखे जा सकते हैं.  विकास के नाम पर करोडॊ-अरबॊं का खर्चा किया गया, वह रकम कहां से आकर , चली जाती है, इन्हें पता नहीं चलता और न ही ये किसी के पास शिकायत-शिकवा लेकर नहीं जाते. विकास के नाम पर केवल कोट में उतरने के लिए सीढियां बना दी गयी है,लेकिन आज भी ये इसका उपयोग न करते हुए अपने बने –बनाए रास्तों-पगडंडियों पर चलते नजर आते हैं. सीढियों पर चलते हुए आप थोडी दूर ही जा पाएंगे,लेकिन ये अपने तरीके से चलते हुए सैकडॊं फ़ीट नीचे उतर जाते हैं.  हाट-बाजार के दिन ही ये ऊपर आते हैं  और इकाठ्ठा किया गया वनोपज बेचकर, मिट्टी का तेल तथा नमक आदि लेना नहीं भूलते. जो चीजें जंगल में पैदा नहीं होती, यही उनकी न्यूनतम आवश्यकता है.                                                                                    

एक खोज के अनुसार पातालकोट की तलहटी में करीब 20 गाँव सांस लेते थे, लेकिन प्राकृतिक प्रकोप के चलते वर्तमान समय में अब केवल 12 गाँव ही शेष बचे हैं. एक गाँव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते. जिन बारह गांव में ये रहते हैं, उनके नाम इस प्रकार है-रातेड, चमटीपुर, गुंजाडोंगरी, सहरा, पचगोल, हरकिछार, सूखाभांड, घुरनीमालनी, झिरनपलानी, गैलडुब्बा, घटलिंग, गुढीछातरी तथा घाना. सभी गांव के नाम संस्कृति से जुडॆ-बसे हैं. भारियाओं के शब्दकोष में इनके अर्थ धरातलीय संरचना, सामाजिक प्रतिष्ठा, उत्पादन विशिष्टता इत्यादि को अपनी संपूर्णता में समेटे हुए है.

ये आदिवासीजन अपने रहने के लिए मिट्टी तथा घास-फ़ूस की झोपडियां बनाते है. दिवारों पर खडिया तथा गेरू से पतीक चिन्ह उकेरे जाते हैं .हँसिया-कुल्हाडी तथा लाठी इनके पारंपरिक औजार है. ये मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग करते हैं. ये अपनी धरती को माँ का दर्जा देते हैं. अतः उसके सीने में हल नहीं चलाते. बीजों को छिडककर ही फ़सल उगाई जाती है.. वनोपज ही उनके जीवन का मुख्य आधार होता है.                                                                                                                

पातालकोय़ में उतरने के और चढने के लिए कई रास्ते हैं. रातेड-चिमटीपुर और कारेआम के रास्ते ठीक हैं. रातेड का मार्ग सबसे सरलतम मार्ग है, जहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है. फ़िर भी संभलकर चलना होता है. जरा-सी भी लापरवाही किसी बडी दुर्घटना को आमंत्रित कर सकती है.             

पातालकोट के दर्शनीय स्थलों में ,रातेड, कारेआम, चिमटीपुर, दूधी तथा गायनी नदी  का उद्गम स्थल और राजाखोह प्रमुख है. आम के झुरमुट, पर्यटकॊं का मन मोह लेती है. आम के झुरमुट में शोर मचाता- कलकल के स्वर निनादित कर बहता सुन्दर सा झरना, कारेआम का खास आकर्षण है. रातेड के ऊपरी हिस्से से कारेआम को देखने पर यह ऊँट की कूबड सा दिखाई देता है. राजाखोह पातालकोट का सबसे आकर्षक और दर्शनीय स्थल है. विशाल कटॊरे मे मानिंद ,एक विशाल चट्टान के नीचे 100 फ़ीट लंबी तथा 25 फ़ीट चौडी कोत(गुफ़ा) में कम से कम दो सौ लोग आराम से बैठ सकते हैं. विशाल कोटरनुमा चट्टान, बडॆ-बडॆ गगनचुंबी आम-बरगद के पेडॊं, जंगली लताओं तथा जडी-बूटियों से यह ढंकी हुई है. कल-कल के स्वर निनादित कर बहते झरनें, गायनी नदी का बहता निर्मल ,शीतल जल, पक्षियों की चहचाहट, हर्रा-बेहडा-आँवला, आचार-ककई एवं छायादार तथा फ़लदार वृक्षॊं की सघनता, धुंध और हरतिमा के बीच धूप-छाँव की आँख मिचौनी, राजाखोह की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है. और उसे एक पर्यटन स्थल विशेष का दर्जा दिलाता हैं. नागपुर के राजा रघुजी ने अँगरेजों की दमनकारी नीतियों से तंग आकर मोर्चा खोल दिया था, लेकिन विपरीत परिस्थितियाँ देखकर उन्होंने इस गुफ़ा को अपनी शरण-स्थली बनाया था, तभी से इस खोह का नाम “राजाखोह” पडा. राजाखोह के समीप गायनी नदी अपने पूरे वेग के साथ चट्टानों कॊ काटती हुई बहती है. नदी के शीतल तथा निर्मल जल में स्नान कर व तैरकर सैलानी अपनी थकन भूल जाते हैं.                                                                                                

पातालकोट का जलप्रवाह उत्तर से पूर्व की ओर चलता है. पतालकोट की जीवन-रेखा दूधी नदी है, जो रातेड नामक गाँच के दक्षिणी पहाडॊं से निकलकर घाटी में बहती हुई उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती हुई पुनः पूर्व की ओर मुड जाती है. तहसील की सीमा से सटकर कुछ दूर तक बहने के , पुनः उत्तर की ओर बहने लगती है और अंत में नरसिंहपुर जिले में नर्मदा नदी में मिल जाती है.

                             पातालकोट का आदिम- सौंदर्य जो भी एक बार देख लेता है, वह उसे जीवन पर्यंत नहीं भूल सकता. पातालकोट में रहने वाली जनजाति की मानवीय धडकनों का अपना एक अद्भुत संसार है,जो उनकी आदिम परंपराओं, संस्कृति,रीति-रिवाज, खान-पान, नृत्य-संगीत, सामान्यजनों के क्रियाकलापॊं से मेल नहीं खाते. आज भी वे उसी निश्छलता,सरलता तथा सादगी में जी रहे हैं.

                             यहाँ प्राकृतिक दृष्यों की भरमार है.यहाँ की मिट्टी में एक जादुई खुशबू है, पेड-पौधों के अपने निराले अंदाज है, नदी-नालों में निर्बाध उमंग है, पशु-पक्षियों मे निर्द्वंद्वता है ,खेत- खलिहानों मे श्रम का संगीत है, चारो तरफ़ सुगंध ही सुगंध है, ऐसे मनभावन वातावरण में दुःख भला कहाँ सालता है?. कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी यहाँ आकर नतमस्तक हो जाती है                                

              सूरज के प्रकाश में नहाता-पुनर्नवा होता- खिलखिलाता-मुस्कुराता- खुशी से झूमता- हवा के संग हिचकोले खाता- जंगली जानवरों की गर्जना में कांपता- कभी अनमना तो कभी झूमकर नाचता जंगल,  खूबसूरत पेड-पौधे, रंग-बिरंगे फ़ूलों से लदी-फ़दी डालियाँ, शीतलता और ,मंद हास बिखेरते, कलकल के गीत सुनाते, आकर्षित झरने, नदी का किसी रुपसी की तरह इठलाकर- बल खाकर, मचलकर चलना देखकर भला कौन मोहित नहीं होगा ?. जैसे –जैसे सांझ गहराने लगती है,और अन्धकार अपने पैर फ़ैलाने लगता है, तब अन्धकार में डूबे वृक्ष किसी दैत्य की तरह नजर आने लगते है और वह अपने जंगलीपन पर उतर आते हैं. हिंसक पशु-पक्षी अप्नी-अपनी मांद से निकल पडते हैं, अपने शिकार की तलाश में. सूरज की रौशनी में, कभी नीले तो कभी काले कलूटे दिखने वाले, अनोखी छटा बिखेरते पहाडॊं की श्रृंखला, किसी विशालकाय राक्षस से कम दिखलाई नहीं पडते. खूबसूरत जंगल ,जो अब से ठीक पहले,  हमे अपने सम्मोहन में समेट रहा होता था, अब डरावना दिखलायी देने लगता है. एक अज्ञातभय, मन के किसी कोने में आकर सिमट जाता है. इस बदलते परिवेश में पर्यटक, वहाँ रात गुजारने की बजाय ,अपनी-अपनी होटलों में आकर दुबकने लगता है, जबकि जंगल में रहने वाली जनजाति के लोग, बेखौफ़ अपनी झोपडियों में रात काटते हैं. वे अपने जंगल का, जंगली जानवरों का साथ छॊडकर नही भागते. जंगल से बाहर निकलने की वह सपने में भी सोच नहीं बना पाते. “जीना यहाँ-मरना यहाँ” की तर्ज पर ये जनजातियां बडॆ सुकून के साथ अलमस्त होकर अपने जंगल से खूबसूरत रिश्ते की डोर से बंधे रहते हैं.

              अपनी माटी के प्रति अनन्य लगाव, और उनके अटूट प्रेम को देखकर एक सूक्ति याद हो आती है.” जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरियसी”= जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी महान होती है” को फ़लितार्थ और चरितार्थ होते हुए यहाँ देखा जा सकता है. यदि इस अर्थ की गहराइयों तक अगर कोई पहुँच पाया है, तो वह यहाँ का वह आदिवासी है, जिसे हम केवल जंगली कहकर इतिश्री कर लेते है. लेकिन सच माने में वह “:धरतीपुत्र” है,जो आज भी उपेक्षित है.                                                                                                                                                                                            

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                                                          फ़ागुनी-गीत                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      फ़ागुनी-गीत, लोक साहित्य की एक महत्वपूर्ण गीत विधा है, जो लोक हृदय में स्पंदन करने वाले भावों, सुर, लय, एवं ताल के साथ अभिव्यक्त होता है.  इसकी भाषा सरल, सहज और जन- जीवन के होंठॊं पर थिरकती रहती है. इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है. फ़ागुन के माह में गाए जाने के कारण हम इसे फ़ागुनी-गीत कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.                                                                                                                                 

              वसंत पंचमी के पर्व को उल्लासपूर्वक मनाए जाने के साथ ही फ़ागुनी गीत गाए जाने की शुरुआत हो जाती है. फ़ागुन का अर्थ ही है मधुमास. मधुमास याने वह ऋतु जिसमें सर्वत्र माधुर्य ही माधुर्य हो. सौंदर्य ही सौंदर्य हो. वृक्ष पर नए-नए पत्तों की झालरें सज गई हों, कलिया चटक रही हों, शीतल सुगंधित हवा प्रवहमान हो रही हो, कोयल अपनी सुरीली तान छेड रही हो. लोकमन के आल्हाद से मुखरित वसंत की महक और फ़ागुनी बहक के स्वर ही जिसका लालित्य हो. ऎसी मदहोश कर देने वाली ऋतु में होरी, धमार ,फ़ाग,की महफ़िलें जमने लगती है. रात्रि की शुरुआत के साथ ढोलक की थाप और झांझ-मंजिरों की झनझनाहट के साथ फ़ाग-गायन का क्रम शुरु हो जाता है.       

              वसंत मे सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है. फ़ल-फ़ूलों की नई सृष्टि के साथ ऋतु भी अमृतप्राणा हो जाती है, इसलिए होली के पर्व को मन्वन्तरारम्भ भी कहा गया है.   मुक्त स्वच्छन्द परिहास का त्योहार है यह. नाचने, गाने हँसी, ठिठौली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी भी इसे कहा जा सकता है. सुप्त मन की कन्दराओं में पडॆ ईष्या-द्वेष, राग-विराग जैसे निम्न विचारों को निकाल फ़ेकने का सुन्दर अवसर प्रदान करने वाला पर्व भी इसे हम कह सकते हैं.                                                                        

              रंग भरी होली जीवन की रंगीनी प्रकट करती है. होलिकोत्सव के मधुर मिलन पर मुँह को काला-पीला करने का जो उत्साह-उल्लास होता है, रंग की भरी बाल्टी एक-दूसरे पर फ़ेंकने की जो उमंग होती है, वे सब जीवन की सजीवता प्रकट करते है. वास्तव में होली का त्योहार व्यक्ति के तन को ही नहीं अपितु मन को भी प्रेम और उमंग से रंग देता है. फ़िर होली का उल्लेख हो तो बरसाना की होली को कैसे भूला जा सकता है जहाँ कृष्ण स्वयं राधा के संग होली खेलते हैं और उसी में सराबोर होकर अपने भक्तों को भी परमानंद प्रदान करते है.                                                                                                                                    

              फ़ाग में गाए जाने वाले गीतों में हल्के-फ़ुल्के व्यग्यों की बौछार होंठॊं पर मुस्कान ला देती है. यही इस पर्व की सार्थकता है.  लोकसाहित्य में फ़ाग गीतों का इतना विपुल भंडार है, लेकिन तेजी से बदलते परिवेश ने काफ़ी कुछ लील लिया है. आज जरुरत है उन सब गीतों को सहेजने की और उन रसिक-गवैयों की, जो इनको स्वर दे सकें.                                                                                                                                       

जैसा कि आप जानते ही हैं कि इस पर्व में हँसी-मजाक-ठिठौली और मौज-मस्ती का आलम सभी के सिर चढकर बोलता है. इसी के अनुरुप गीतों को पिरोया जाता है. फ़ाग-गीतों की कुछ बानगी देखिए.

मैं होली कैसे खेलूंगी या सांवरिया के संग                                                                                                     

कोरे-कोरे कलस मंगाए,  वामें घोरो रंग                  

भर पिचकारी ऎसी मारी,सारी हो गई तंग  //

मैं नैनन सुरमा.दांतन मिस्सी,  रंग होत बदरंग                                                                                                                

मसक गुलाल मले मुख ऊपर,बुरो कृष्ण को संग       //

मैं तबला बाजे,सारंगी बाजे और बाजे मिरदंग                                                                                                              

कान्हाजी की बंसी बाजे राधाजी के संग//मैं                                                                                                                 

चुनरी भिगोये,लहंगा भिगोये,भिगोए किनारी रंग                                                                                                           

सूरदास को कहाँ भिगोये काली कांवरी अंग//मैं       

(२)         मोपे रंग ना डारो सांवरिया,मैं तो पहले ही अतर में डूबी लला                                                                          

कौन गाँव की तुम हो गोरी,कौन के रंग में डूबी भला                                                                                       

नदिया पार की रहने वाली,कृष्ण के रंग में डूबी भला                                                                                      

काहे को गोरी होरी में निकली, काहे को रंग से भागो भला                                                                              

सैंया हमारे घर में नैइया,उन्हई को ढूंढन निकली भला                                                                                                   

फ़ागुन महिना रंग रंगीलो,तन- मन सब रंग डारो भला                                                                                                    

भीगी चुनरिया सैंइयां जो देखे,आवन न देहें देहरी लला                                                                                                 

जो तुम्हरे सैंया रुठ जाये,रंगों से तर कर दइयो भला.                                                                                       

              (३) आज बिरज मे होरी रे रसिया                                                                                                                                                  होरि रे रसिया बर जोरि रे रसिया

              (४)ब्रज में हरि होरि मचाई                                                                                                                                        होरि मचाई कैसे फ़ाग मचाई

                             बिंदी भाल नयन बिच कजरा,नख बेसर पहनाई

                             छीन लई मुरली पितांबर          ,सिर पे चुनरी ओढाई                                                                                                                   लालजी को ललनी बनाई.-(ब्रज में............)                        

              हँसी-ठिठौली पर कुछ पारंपरिक रचनाएँ 

(१)मोती खोय गया नथ बेसर का, हरियाला मोती बेसर काअरी

 ऎ री ननदिया नाक का बेसर खोय गया                               

मोहे सुबहा हुआ छोटे देवर का,हरियाला मोती बेसर का                                                                                               

(२)अनबोलो रहो न जाए,ननद बाई, भैया तुम्हारे अनबोलना                                                            

अरे हाँ....... भौजी मेरी रसोई बनाए,नमक मत डारियो..                                                                                                               अरे आपहि बोले झकमार                                                                                                                                         अरे हाँ ननद बाई,अलोने-अलोने ही वे खाए .....                                                                                                          अरे मुख्न से न बोले बेईमान                  

             

(३) कहाँ बिताई सारी रात रे...सांची बोलो बालम                                                                                                        

 मेरे आँगन में तुलसी को बिरवा, खा लेवो ना तुलसी दुहाई रे                                                                          

काहे को खाऊँ तुलसी दुहाई, मर जाए सौतन हरजाई रे...                                                                                               

सांची बोलो बालम..........

(४) चुनरी बिन फ़ाग न होय, राजा ले दे लहर की चुनरी...(आदि-आदि)                                                          

                             हँसी की यह खनक की गूंज पूरे देश में सुनी जा सकती है. इस छटा को देखकर यही कहा जा सकता है कि होली तो एक है,लेकिन उसके रंग अनेक हैं. ये सारे रंग चमकते रहें-दमकते रहें-और हम इसी तरह मौज-मस्ती मनाते रहें. लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि कोई कारण ऎसा उत्पन्न न हो जाये जिससे यह बदरंग हो जाए. याद रखें--इस सांस्कृतिक त्योहार की गरिमा जीवन की गरिमा में है. होली के इस अवसर पर इस् तरह गुनगुना उठें                                          

              लाल-लाल टॆसू फ़ूल रहे फ़ागुन संग                                                                                                                            होली के रंग-रंगे, छ्टा-छिटकाए हैं.                                                                                                                             वहाँ मधुकाज आए बैठे मधुकर पुंज                                                                                                                            मलय पवन उपवन वन छाए हैं  .                                                                                                                                  हँसी-ठिटौली करैं बूढे औ बारे सब                                                                                                                   देख-देखि इन्हैं कवित्त बनि आयो है.                                                                                                                                                                                                                 

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                                           बुढ़ापा खुद एक समस्या है.

 

यदि हम अपने शरीर की तुलना किसी किले से करें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. जिस तरह से एक नव-निर्मित किला मजबूत होता है कि वह हर तरह के मौसम की मार झेल सकता है. भीषण बरसात को सह सकता है. कड़कड़ाती बिजली का झटका सह सकता है. यह सब एक निर्धारित सीमा के भीतर ही होता है. जैसे-जैसे किला पुराना होता चला जाता है, उसका आधार भी कमजोर होने लगता है. पलस्तर झड़ने लगता है. फ़िर ईंटे खिसकने लगती है. बरसात का पानी जगह-जगह समाने लगता है और एक समय ऎसा भी आता है कि उसका एक-एक हिस्सा गिरने लगता है और एक दिन वह जमींदोज हो जाता है.

ठीक इसी तरह हमारे शरीर का किला भी एक दिन कमजोर होने लगता है. शरीर के कमजोर होते ही अनेकानेक समस्याएं उठ खड़ी होती है. आदमी जानता है कि अधिक समय तक वह युवा बना नहीं रह सकता. एक न एक दिन बुढ़ापा आएगा ही. यह निश्चित है. अकाट्य सत्य है. जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. जानने-बूझने के बावजूद वह लापरवाह बना रहता है और एक समय ऎसा आ जाता है कि वह असहाय बन जाता है. हड्डियां गलने लगती हैं. याददाश्त कमजोर होने लगती है. कानों से सुनाई देना कम हो जाता है. कभी-कभी तो कुछ भी सुनाई नहीं देता. आँखें कमजोर होने लगती है. दिखाई देना कम होने लगता है. शारीरिक परेशानियों को झेलते-झेलते वह बात-बात पर झुंझलाने लगता है. उसका स्वभाव चिड़चिडा होने लगता है. शक करने की बिमारी भी आ घेरती है.

इस असहाय अवस्था में लोग साथ देना बंद करने लगते है. परिवार के लोग भी उसकी हरकतों को कुछ दिन तक तो झेलते हैं फ़िर वे भी उससे परेशान से- खींचे-खींचे से रहने लगते है. सबसे बड़ी समस्या तो उस समय होती है जब वह बिस्तर ही पकड़ लेता है. सबसे भीषण और दुखदाई यदि कोई स्थिति है तो वह यही है. कौन कब किस स्थिति में होगा, उसे कौन-कौन से दुख झेलने होंगे ?, आदमी इन्हें नहीं जानता, लेकिन इन हालातों से उसे कभी न कभी गुजरना ही होता है. बचने का कोई उपाय नहीं. आप कितनी ही शक्तिशाली औषधियों का इस्तेमाल कर लें, कितना ही फ़िट रहने की जुगाड़ कर लें, बचाव का कोई रास्ता नहीं है.

हाँ. सभी जानते हैं कि बचने के कोई रास्ते है ही नहीं. यदि ध्यान पूर्वक सोचा जाए तो अनेक ऎसे छोटे-छोटे उपायों को खोजा जा सकता है, जिसके अपनाने से कुछ राहत पायी जा सकती है. यदि उन उपायों को अपनाया जाए, तो निश्चित ही बुढ़ापा, जिसे हम एक आभिशाप समझ बैठे हैं, आसानी से काटा जा सकता है. सबसे पहले तो हमें अपनी आदतें बदलनी होगी. यदि आप शुरु से पेठू रहे हैं तो आपको उतना ही भोजन करना चाहिए, जो आसानी से पच सके. सुबह-शाम खुली प्रकृति में घूमने-टहलने की आदत बना लेनी चाहिए. ताजी हवा जहाँ आपको तरोताजा कर देती है, वहीं वह आपके फ़ेंफ़ड़ों को मजबूती प्रदान करती है. रक्त का संचरण ठीक तरह से होने लगेगा. एकाकी बने रहने की आदत को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए. आप ऎसे मित्रों के बीच उठिए-बैठिए जो ऊर्जावान है, गतिशील है, ठोस और सही निर्णय लेने में सक्षम हैं, जिनकी सकारात्मक सोच हो, उनका साथ पकडिए. नकारात्मक सोच वालों से दूरी बना कर रखिए.

 हम मनुष्य जाति पर परम पिता परमेश्वर की बड़ी असीम कृपा है कि उसने हमारे शरीर में कुछ अतिरिक्त अंग दे रखे हैं. मसलन- दो दिमाक, दो आँखे, दो कान, दो नथुने, दो लंग्स, पेट में दो आँतें, दो किडनी, दो पैर आदि. मतलब एकदम स्पष्ट है कि यदि एक अंग किसी कारणवश खराब हो जाए, तो दूसरे अंग से वह काम चलता रहेगा. अब यह हम पर निर्भर है कि हम उन्हें किस तरह तंदुरुस्त बनाए रखते हैं.

चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक “लाओत्से” जिसने “ताओ” धर्म का प्रतिपादन किया है, वह इशारों- इशारों में काफ़ी कुछ रहस्यमय बातों के माध्यम से मनुष्य को चेताते रहते हैं. एक जगह उन्होंने शरीर को कंप्युटर से तुलना करते हुए कहा कि आदमी का दिमाक भी किसी कम्प्युटर से कम नहीं है. हम उसमें अनेकानेक नेगेटिव विचार डाल देते हैं, जो अपना काम बखुबी करते रहते हैं और उसी के अनुसार परिणाम भी देते रहते हैं. यदि आपने उसमें पाजिटिव विचार डाल दिए हों तो तदानुसार अपना काम करते रहते हैं और आपको हरदम अतिरिक्त ऊर्जा से भर देते हैं. वे आगे कहते हैं कि हमें समय-समय पर प्रोग्रामिंग करते रहना चाहिए. नेगेटिव विचारों को हटाते रहना चाहिए. एक बड़ा सूत्र वे हमें दे गए हैं. और भी कई ऎसी बातें वे संकेतों में कह गए हैं जो हमारे काम की हैं, अतः उस पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि हमारे ऊर्जा और शक्ति बनी रहे और शरीर स्वस्थ बना रहे.

जरुरी नहीं कि किसी मन्दिर में जाकर घण्टा बजाने की सोचें, गीता-रामायण-भागवत पढ़ने की सोचें. सोचना और करने में जमीन-आसमान का फ़र्क है. यह आपसे नहीं हो सकेगा क्योंकि आपने अपने बाल्यावस्था में अथवा युवावस्था में कभी इन्हें छूने की जरुरत ही नहीं समझी. यह आपकी आदत का कभी हिस्सा ही नहीं रहा..लेकिन अब समय ही समय है आपके पास. रामायण- भागवत-गीता जरुर पढें, लेकिन ऎसा पढें कि उसमें डूब जाएं. खूब डूबकर पढें. ऎसा पढें कि आँखों के सामने सारा दृष्य चलायमान हो उठे. सदा प्रसन्न बने रहने की चेष्टा करें. खुश रहें और दूसरों को भी खूश रखें. दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहें.

अच्छे मित्र और अच्छी किताबों से जुड़ें, जो आपको खुश रहने के रास्ते तलाशने में मददगार सिद्ध हो सकते हैं. देशाटन की आदत बनाएं. जिन्दगी भर तो आप दौड़-धूप करते रहे. कभी घर से बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला. यह वह समय होता है जब आपके बेटा-बेटी की शादियां हो चुकी होती है. आप पर घर की कोई जिम्मेदारी बचती नहीं है. एक बार बैठकर प्लान बना लीजिए और निकल पड़िए घर से. आपके नजरों के सामने नया संसार होगा. नए-नए लोग होंगे, नयी-नयी बातें सुनने को मिलेगीं. साथ तलाशने की जरुरत नहीं. आपकी पत्नि से बढ़्कर और कौन साथी हो सकता है? उन्हें भी बाहर की दुनिया दिखाइए. जेब मजबूत हो तो विश्व-भ्रमण पर निकल जाइए.

हम भारतवासी अन्य देशों की तुलना में बड़े भाग्यशाली है कि उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक अनेकानेक तीर्थ स्थल स्थापित हैं. आप अपने बजट के अनुसार यात्रा का ड्राफ़्ट तैयार कीजिए और घर से निकल पड़िए. फ़िर भारत सरकार ने वृद्धावस्था वालों के लिए रेल भाड़े में काफ़ी छूट दे रखी है, उसका फ़ायदा उठाइए. रेल्वे ने पूरे देश को अनेक जोनों में बांट रखा है. सुविधानुसार आप अपनी यात्रा कर सकते हैं. इसके अलावा केन्द्रीय योजना के अंतर्गत कुछ प्रमुख तीर्थस्थलों के लिए “भारत दर्शन” नामक स्पेशल ट्रेन भी चलाई जा रही हैं, जो एक स्टेशन से रवाना होकर आपको उसी स्टेशन तक छोड़ देती है. किराया के नाम पर काफ़ी कम रकम में कई स्थानों का भ्रमण आप कर सकते हैं. इन स्पेशल ट्रेनों में किराये की रकम में ही सुबह की चाय-नाश्ता, दोपहर और शाम का भोजन दिया जाता है. तीर्थ-स्थल तक जाने-आने के लिए लक्जरी बसों की उत्तम व्यवस्था भी इसी में शामिल है.

 

 

मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्य मंत्री माननीय श्री शिवराज चौहान जी ने वृद्ध लोगों के लिए निःशुल्क रेल यात्रा का प्रबंध कर रखा है. अब तक लाखों लोगों ने इसका फ़ायदा उठाया है. आप भी इस योजना का फ़ायदा उठा सकते हैं. अगर आपके परिवार में कोई ऎसा सदस्य नहीं है जो आपकी यात्रा में सहयात्री बन सकता है, तो विकल्प के रूप में आप किसी मित्र अथवा सगे-संबंधी को अपना सहायक बनाकर यात्रा कर सकते हैं.

विधाता ने प्रकृति को इतनी सुघड़ता और सुन्दरता से गढ़ा है कि आपकी आँखें खुली रह जाएगी. आप चमत्कृत हो उठेंगे. हर समय, हर क्षण कुछ नया करने की सोचें. यह विचार मन में न लायें कि अपने से कम उम्र के लोगों से कुछ जानने, पूछने में आपकी बेइज्जती हो जाएगी. इस नकारात्मक सोच को तुरंत ही झटक दीजिए. हो सके तो आप कंप्युटर से अथवा ऎंड्राइड फ़ोन से जुड़ जाइए. एक क्लिक करते ही पूरा विश्व आपके सामने उपस्थित हो जाएगा. आप अपनी मन मर्जी से हर छॊटी-बड़ी जानकारियों के अलावा काफ़ी कुछ हासिल कर सकते हैं. मन के अंधकारमय बंद कमरों में लगी खिड़कियों को खोलिए और नित नूतन पुनर्नवा होती दुनिया को नयी नजर से देखिए. बुढ़ापा आएगा, उसे कोई नहीं रोक सकता. रोका भी नहीं जा सकता. बस खुश और प्रसन्न रहने का एकमात्र उपाय यही है और यह सोच में भी बना रहना चाहिए कि आप मन-मस्तिस्क से हमेशा सक्रीय बने रहें. आप खुद महसूस करेंगे कि आपसे सुखी और प्रसन्न कोई नहीं हो सकता.

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बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ.                   

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा, भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने हरियाणा की विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए दिया था. अपने भाषण में उन्हें यह कहने की आखिर जरुरत क्यों पड़ी कि हमारी मानसिकता १८ वीं सदी की है, जबकि हम २१ वीं सदी में जी रहे है. हमें २१ वीं सदी का नागरिक कहलाने का कोई अधिकार नहीं है. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी कहा- बेटे और बेटियों के बीच भेदभाव को खत्म करना चाहिए. ऎसा करके ही कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सकता है. यह हमारी सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है वरना हम न केवल मौजूदा पीढ़ी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भयानक संकट भी आमंत्रित कर रहे हैं. देश के डाक्टरों को कड़ी फ़टकार लगाते हुए उन्होंने यह कहा कि मेडिकल शिक्षा का उद्देश्य जीवन बचाना है, न कि बेटियों की हत्या करना है.

उनका यह कोरा भाषण मात्र नहीं था, बल्कि एक समृद्ध होते देश को एक खुली चेतावनी भी थी. निश्चित रूप से हमें इसकी गहराई में जाकर पड़ताल करने की आवश्यकता पड़ेगी कि उन्हें आखिर ऎसा क्यों बोलना पड़ा ? २१ वीं सदी में जब हम अन्तरिक्ष में कदम बढ़ा चुके हैं, देश-विदेशों में हमारी धाक बनी है, हम नित नूतन आविष्कार करते हुए भारत को गौरव प्रदान कर रहे हैं, ठीक ऎसे समय में देश के प्रधानमंत्री जी को आखिर यह प्रश्न क्यों कर उठाना पड़ा?

प्रधानमंत्री जी कहते, न भी कहते, लेकिन यह आज की कड़वी सच्चाई है कि बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण की धड़ल्ले से हत्या की जा रही है. उन्हें कोख में ही मार दिया जाता है. शायद इसके पीछे यह मुख्य कारण यह हो सकता है कि बेटी होगी तो उसका लालन-पोषण करना पड़ेगा, उसे लिखाना-पढ़ाना होगा और एक दिन उसकी शादी भी करनी पड़ेगी. निश्चित ही इन कार्यों मे एक मोटी रकम का खर्चा भी होगा. अभिभावक यह भी जानता है कि बेटी आखिर होती ही है पराया धन. फ़िर इस पर इतनी रकम खर्च करने की क्या आवश्यकता है ? बेटी पर किया गया खर्च लौटकर आने वाला नहीं है. अतः उस पर भारी रकम क्यों खर्च की जाए? इस प्रकार की सोच निरन्तर बलवती होती चली गई. वे यह भी सोचते हैं कि अगर इतना पैसा बेटों पर खर्च करेंगे, तो वह धन कमा के लाएगा, जिससे हमारा ऎश्वर्य बढ़ेगा, समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा. स्टेटस बढ़ेगा. इसी संकीर्ण सोच के चलते समाज का ढांचा लड़खड़ा गया.

ऎसी सोच वाला आदमी यह नहीं सोच पाता कि वह आखिर बहू लाएगा भी तो कहां से, क्योंकि सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उनके यहाँ बेटी पैदा न हो. यदि इस प्रकार की सोच को मैं घटिया मानसिकता कहूं, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. इसी घटिया सोच के चलते न जाने कितनी कन्याएँ भ्रूण गर्भ में ही मार दी जाती हैं. यदि किसी कारणवश नहीं मारी जा सकी तो उसे किसी गन्दे नाले में या कूड़ाघर में फ़ेंक दिया जाता है, गला घोंट कर मौत के हवाले कर दिया जाता है. बहू को लगातार कन्या ही पैदा हो रही हो, तो उसकी क्या गत बनती है परिवार में, यह भी हमसे छिपा नहीं है. सास तो सास, बेटा भी अपनी पत्नि पर जुल्म ढाने में पीछे नहीं रहता. शायद वह यह नहीं जानता या जानना नहीं चाहता कि इसमें उसकी पत्नि का तनिक मात्र भी दोष नहीं है. लेकिन सारा दोष बहू पर लाद दिया जाता है और उस पर अनगिनत अत्याचार होने लगते हैं.

गर्भ में लड़का पल रहा है या लड़की इसकी जांच के लिए मशीनें इजाद की गई हैं, जिससे यह पता चल जाता है कि लड़की होगी या फ़िर लड़का. लड़की होने की पुष्टि होते ही उसे मार डालने का ‍षड़यंत्र शुरु हो जाता हैं. डाक्टर जानता है कि इस प्रकार का कृत्य कानूनन अपराध है, लेकिन मोटी रकम पाने की लालसा उसे ऎसा करने के लिए बाध्य कर देती है.

बरसों से चल रही इस मानसिकता के चलते समाज में विसंगतियां पैदा होने लगी है. लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या तेजी से घट रही है. लड़किया ढूंढे मिल नहीं पाती है फ़िर दहेज का दानव चीतकार कर रहा होता है. जिसके घर बेटी है, जरुरी नहीं कि वह दौलतमंद ही होगा. वह दहेज में मोटी रकम नहीं दे सकता. फ़लस्वरूप होता यह है कि लड़की मां-बाप पर बोझ बनती चली जाती है और उन्हें न जाने कितनी ही मानसिक आघातों को झेलना होता है. कुल मिलाकर स्थिति यह बन पड़ती है कि लड़के तो लड़के, लड़कियां तक कुंवारी रह जाने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं.

लड़कियाँ अब मां-बाप का बोझ नहीं बल्कि उनका सहारा बनकर आगे आ रही हैं. एक जमाना था जब उन्हें अनेकानेक पाबंदियों से होकर गुजरना पड़ता था. घर का सारा काम-काज निपटाते रहने के बावजूद, लिंग-भेद का तनाव झेलने के बाद भी बेटियां वे समय में से समय चुराकर अपनी पढ़ाई कर लेती हैं और अच्छे नम्बरों से पास ही नहीं होती,बल्कि लाड़ले लड़कों को काफ़ी पीछे धकेल देती हैं. परीक्षा-फ़ल पर नजर डालें तो सच्चाई देखी जा सकती है.

बेटियां किसी से कम नहीं होती. कभी अभावों के बीच से गुजरते हुए, तो कभी विषम परिस्थितियों के बीच से गुजरते हुए बेटियों ने सफ़लता की मंजिलों को न सिर्फ़ छूया है बल्कि विश्व-रिकार्ड भी बनाया है. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इनके अभिभावकों ने बेटियों को बेटी न मानते हुए उनका लालन-पालन एक लड़के की तरह किया और उसका परिणाम हम सबके सामने है. आइए, हम उन असाधारण बेटियों की बात करें,जिन्होंने आगे चलकर इस देश का नाम रोशन किया.

उपकुलपति-हंसा मेहता,          विधायक....   डा.मुत्तुलक्ष्मी (१९२६) ,न्यूज रीडर..येशन मेनन, आई.ए.एस..अन्ना राजम जार्ज, इंगलिश चैनल पार करने वाली ..आरती साहा, एशियाई खेलों में प्रथम स्वर्ण विजेता-कंवलजीत कौर संधू( ५७.३५..४०० मीटर), इंडियन नेशनल कांग्रेस की महिला अध्यक्ष-विजय लक्ष्मी पण्डित,स्काउट गाईड की मुख्य आयुक्त        -माणिक बर्सले,महिला टेस्ट में एक पारी में सात विकेट लेने वाली...एन.डेविड, अशोक चक्र से सम्मानित-नीरजा मिश्रा ..हाकी, प्रथम मिसेस वर्ल्ड -अदिति गोवित्रिकर...२०००, दाँतों से विमान खींचने वाली -सीमा मढोश्रया..(दतिया), एशिया की सबसे तेज दौडने वाली महिला तैराक. कावेरी ठाकुर, प्रथम महिला विदेश सचिव-श्रीमती बोथिला अय्यर, सबसे कम उम्र की महापौर-पंचमार्थी अनुराधा (विजयवाडा-२६ वर्षीय), प्रथम महिला प्रधानमंत्री-श्रीमती इन्दिरा गांधी, राज्यसभा की प्रथम जनरल सेक्रेटरी-बी.एस.रमादेवी (१-७-९३),प्रथम महिला मेयर-सुलोचना मोदी, प्रथम महिला राजदूत -विजयलक्ष्मी पण्डित (रूस १९४७-४९), संयुक्त राष्ट्र की प्रथम महिला अध्यक्ष-विजयलक्ष्मी पण्डित (१९५३),भारत रत्न से सम्मानित-श्रीमती इंदिरा गांधी (१९७५), प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश-लीला सेठ (हिमाचल ९१),सुप्रीम कोर्ट की प्रथम महिला जज-मीरा साहिबा फ़ातिमा बीवी,फ़िंगरप्रिंट की प्रथम महिला चीफ़ एक्सपर्ट-वारथाम्बल (मद्रास १९५२),राज्यसभा की प्रथम महिला उपसभापति-मार्गरेट अल्वा, गिनीज बुक आफ़ रिकार्ड्स में सर्वाधिक नाम दर्ज कराने वाली..भुवनेश्वरी (स्क्वाश खेल),ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली-आशापूर्णा देवी,साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाली-अमृता प्रीतम, फ़िल्म स्क्रीन पर आने वाली प्रथम महिला-दुर्गाबाई और उनकी पुत्री कमलाबाई(मोहिनी भस्मासुर), स्क्रीन पर आने वाली बालिका कलाकार दादा फ़ाल्के की पुत्री मन्दाकिनी(१९१८), प्रथम महिला भारत केसरी-मास्टर चन्दीराम की पुत्री सोनिका, भारत में प्रथम महिला शासक-रजिया सुल्तान,मंत्रीमंडल में प्रथम राजकुमारी-अमृतकौर (कपूरथला),प्रथम महिला मंत्री-श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित (१९३७),प्रथम महिला मुख्यमंत्री-श्रीमती सुचेता कृपलानी, एअर बस की प्रथम महिला पायलट-दुर्गा बनर्जी, प्रथम महिला जिलाधिकारी-के.श्रीनिवास (मद्रास), एशियाई खेलों में सर्वाधिक स्वर्ण पदक विजेता  पी.टी.ऊषा,समुद्री यात्रा द्वारा विश्व का चक्कर लगाने वाली- उज्जवला राय (१९८८),प्रथम महिला डीजल इंजिन ड्राइवर   -मुमताज कथावला (१९८८),प्रथम महिला जिसके विमान पर ध्वज लहराया गया-विजयलक्ष्मी पण्डित, प्रथम मिस युनिवर्स-सुष्मिता सेन(२१-११-९४),प्रथम विश्व सुंदरी-रीता फ़ारिहा (१९६६), चुनाव लडने वाली प्रथम महिला-कमलादेवी चट्टॊपाध्याय,प्रथम पुलिस महानिदेशक-श्रीमती कंचन चौधरी भट्टाचार्य, कस्टम एण्ड एक्साइज आयुक्त-कौशल्या नारायण, प्रथम दस्यु सुन्दरी-पुतलीबाई, अन्डर वर्ल्ड की पहली महिला शूटर-प्रिया चन्द्रकला राजपूत,पद्मश्री की उपाधि पाने वाली पहली महिला-नर्गिस दत्त (१९५८), बी.जे.पी सरकार की प्रथम महिला मुख्यमंत्री-श्रीमती सुषमा स्वराज, प्रथम महिला बस ड्राइवर-वसन्तकुमार (कन्याकुमारी),संघ लोकसेवा आयोग की अध्यक्षा-रोज मियिन मैथ्यूज, योजना आयोग की अध्यक्ष-श्रीमती इंदिरा गांधी, प्रथम महिला चिकित्सक-मेजर जनरल जी.ए.एम.राम, प्रथम महिला बैंक मैनेजर-शांताकुमार(सिंडिकेट बैंक बंगलोर), प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी--हर्षा (१९८६), सेना में उच्चतम पद पर पहुंचने वाली-मेजर जनरल पी.एस. सरस्वती(आर्मी नर्सिंग सेवा ),चित्रपट की प्रथम नायिका-देविका रानी प्रथम पोस्टमास्टर जनरल- श्रीमती सुशीला चौरसिया (१९७९), प्रथम महिला चीफ़ इंजीनियर--पी.के.त्रेसिया नागूंली, टेनिस का डब्ल्यू टी.ए. खिताब जीतने वाली- सानिया मिर्जा (२००३ हैदराबाद).

जमाना बदल गया है लेकिन मानसिकता अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पायी है. मुझे तो बेसब्री से उस दिन की प्रतीक्षा है जब बेटी को दुर्भाग्य नहीं बल्कि सौभाग्य की तरह माना जाएगा. कहावत है कि बेटी एक-साथ दो कुलों को तारती हैं.... एक बेटी अगर साक्षर होती है...उन्नति की देहलीज पर जा खड़ी होती है तो वह न सिर्फ़ मां-बाप के गौरव में श्रीवृद्धि करती है,अपितु अपने ससुराल पक्ष का भी नाम रौशन करती है. अपने को एक सभ्य और सुसंस्कृत मानने वाले हर उस व्यक्ति की जवाबदारी बनती है कि वह अपने पास-पड़ौस के नासमझ लोगों को जागृत करे ..उन्हें समझाएं और एक समतामूलक समाज का निर्माण करे जिसमें बेटियों और बेटॊं के बीच के भेद-भाव को समाप्त किया जा सके.

 

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                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  (o) भारतीय नाटक की उत्पत्ति व विकास(0)                                   गोवर्धन यादव                                                                                 ------------------------------------                                                                                                                                                                                                                                                                           इस बात के प्रमाणिक हैं हमारे वेद कि विश्व में सर्वप्रथम नाटक की उत्पत्ति तथा विकास भारत में ही हुआ था. ऋगवेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, और पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं. विद्वान लोग इन संवादों को नाटक के विकास का चिन्ह पाते हैं. अनुमान किया जाता है कि इन्हीं संवादों से प्रेरणा ग्रहण कर नाटक की रचना की गई थी.

.                            नाट्यकला दैवीय उत्पत्ति भी मानी जाती है. ऎसा कहा जाता है कि सतजुग के बीत जाने के बाद, त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं ने मंत्रणा की और यह अनुभव किया कि सतजुग में सर्वत्र सुख की वर्षा होती रही लेकिन त्रेता में, दुख के संकट भी घिरने लगेंगे. अतः इससे निजाद पाने के लिए किसी ऎसे ग्रंथ की रचना की आवश्यकता महसूस की गई जिसका अनुशीलण करने से, आदमी राहत महसूस कर सके. सारे देवता ब्रह्मलोक गए और उन्होंने ब्रह्मदेव से प्रार्थना की कि कोई ऎसी कला प्रकट करें जिससे श्रवणशक्ति और आँखों की रोशनी बढे, मन आनन्दित हो. वह पाँचवा वेद हो, मगर उन चारों वेदों की तरह न हो. उससे लाभ पाने का हक, हर जाति, हर वर्ग, हर धर्म के लोगों को हासिल हो. ब्रहमाजी ने ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से नगमा यानि संगीत,, यजुर्वेद से स्वांग(अभिनय) और अथर्ववेद से जज्बातनिगारी(रस) जैसे कलाओं के तत्वों को मिलाकर नाटक का प्रणयन किया. शिव ने ताण्डव(नृत्य) और पारवती ने लताफ़त(नरमी) की बुदतरी की, विश्वकर्मा को हुक्म दिया गया कि वह निगारखाने(नाट्यमंच) बनाए. फ़िर इसे भरत मुनि के हवाले किया गया ताकि वो जमीन पर आकर उडते रंग-रुप में पेश करें. इस् तरह भरतमुनि को इस  खुदाई फ़न, अर्थात नाट्य-शास्त्र के रचियता होने का श्रेय हासिल हुआ.                                                                                                                                                                             

अतः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि इस कला का प्रादुर्भाव सबसे पहले भारत में हुआ.  कुछ इतिहासकार, भरतमुनि के इस काल को ४०० ई.पू. के निकट मानते हैं. इस अद्भुत ग्रंथ में संगीत, नाटक, अभिनय के नियमों का आकलन भर नहीं है,बल्कि अभिनेता, रंगमंच और प्रेक्षक,इन तीन तत्वों की पूर्ति आदि तथ्यों का विवेचन किया गया है. ३७ अध्यायों में मुनि ने रंगमंच, अभिनेता, अभिनय, नृत्य  गीत, वाद्य , रसनिस्पत्ति आदि का विवेचन किया था.   

इस ग्रंथ की सर्वाधिक प्रामाणिक और विद्वत्तापूर्ण टीका, श्री अभिनव गुप्तजी ने सन १०१३ में किया था. जिसमे विषय वस्तु, पात्र, प्रेक्षागृह, रसवृत्ति, अभिनय, भाषा, नृत्य, गीत, वाद्ययंत्र,,पात्रों के परिधान, प्रयोग की जाने वाली धार्मिक क्रिया,,नाटक के अलग-अलग वर्ग, भाव, शैली, सूत्रधार,  विदूषक, गणिका, नायिका आदि पात्रों में किस प्रकार की कुशलता अपेक्षित है-विचार किया गया है.                                                        

संस्कृत साहित्य में अनेक उच्चकोटि के नाटक लिखे गए.साहित्य में नाटक लिखने की परिपाटी संस्कृत से होते हुए हिन्दी में आयी. संस्कृत के अलावा पालि के ग्रंथॊं में भी नाटक लिखे जाने के प्रमाण मिले हैं. अग्निपुराण, शिल्परत्न, काव्यमीमांसा तथा संगीत -मार्तण्ड में राजप्रसाद के नाटकमंडपों के विवरण प्राप्त होते हैं. इसी तरह महाभारत मे रंगशाला के उल्लेख मिलते हैं. हरिवंशपुराण में रामायण के नाटक खेले जाने का वर्णण मिलता है. पाश्चयात विद्वानो की धारणा है कि धार्मिक कृत्यों से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ. इससे रंगस्थली की कल्पना की जा सकती है. दर्शकों के बैठने की उत्तम व्यवस्था थी.                    

संस्कृत नाटक रस प्रधान होते हैं. संस्कृतकाव्य परम्परा मे,नाटक काव्य का ही एक प्रकार है. इसमे दर्शक को अपनी आंखों से देखने और कानों से सुनने का भी रसास्वादन मिलता है. अतः इससे सहज जुडाव भी होता है. कहा गया है-“काव्येषु नाटकं रम्यम.”  इन नाटको में, लेखन से लेकर प्रस्तुतिकरण तक कई कलाएं,, भावों, अवस्थाओं से युक्त, क्रियायों के अभिनय, कर्म द्वारा संसार को सुख-शांति देने वाले होने के कारण नाट्य हमारे यहां विलक्षण कृति माने गए हैं. कहा गया है-“न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला/नासौ योगो न तत्कर्म नाट्योSस्मिन्यत्र न दृष्यते”                                         संस्कृत नाटक के प्रमुख नाटककार कालिदास, भास, शुद्रक आदि की गणणा प्रमुख रुप से की जाती है.                                                                                                                                                                                     हिन्दी में नाटक-

              परिभाषा—“नाटक काव्य का ही एक रुप है,जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु, दृष्टि द्वारा भी दर्शक के हृदय में रसानुभूति कराती है. उसे नाटक या दृष्यकाव्य कहते है.                                                          

२.नाटक में श्रवण काव्य से अधिक रमणीयता होती है.                                                                                                  ३.श्रवणकाव्य होने से लोकचेतना से अधिक घनिष्ठता होती है.                                                                        ४.नाट्यशास्त्र में लोकचेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है.                                        नाटक के प्रमुख तत्व.-                                                                                                                                                            

१.कथावस्तु—पौराणिक, ऎतिहासिक, काल्पनिक या सामाजिक हो सकती है.                                   

२-पात्रों का सजीव और प्रभावशाली चरित्र, नाटक की जान होती है. कथावस्तु के अनुरुप नायक धीरोदात्त, धीर, ललित होना चाहिए.                                                                                                                         

३.रस-नाटक मे नवरसों में से केवल आठ का ही परिपाक होता है. इसमें शांत रस निषिद्द माना               गया है. वीर रस या श्रृंगार-रस में से कोई एक नाटक का प्रधान रस होता है.                                                        

४. अभिनय- (१)आंगिक अभिनय (२) वाचिक अभिनय (३)आहार्य--वेषभूषा-मेकअप-स्टेज विन्यास,तथा भरपूर प्रकाश व्यवस्था होना आवश्यक होता है.                                                                                                           ५)सात्विक अभिनय---पात्र जब डूबकर अपना अभिनय करता है तो वह नाटक में जान डाल देता है.                                       

              लोकनाट्य अथवा नाटक का लोकजीवन से घनिष्ट संबंध है. लोकनाट्य का मंचन उत्सवों, मांगलिक कार्यों अथवा विवाह आदि के अवसर पर किया जाता है. लोकनाट्य की भाषा अत्यन्त ही सरल, सीधी-सादी और रोचकता लिए हुए होती है. नटॊं के द्वारा भी लोकनाट्य रचे जाते हैं. नटॊं द्वारा खेले जाने वाले लोकनाट्यों में कथानक, ऎतिहासिक, पौराणिक अथवा सामाजिक आधार वाले होते है, अभिनीत किए जाते हैं .इसके लिए कोई विशेष मंच बनाने की आवश्यकता नहीं पडती. नट के आसपास ,कुछ दूरी बनाकर दर्शक बैठकर अथवा खडॆ रहकर, उसके द्वारा रचे जा रहे अभिनय को निहारते है,और आनन्दित होते है..                                                                                                                                                                                                     

              बंगाल का लोकनाट्य” जात्रा” के नाम से जाना जाता है. बंगाल के अलावा “जात्रा”, उडिसा तथा पूर्वी बिहार में भी  आयोजित किए जाते है. इसमे धार्मिक आख्यान होते हैं. राजस्थान में अमरसिंह राठौर की ऎतिहासिक गाथा का अभिनय किया जाता है. केरल में लोकनाट्य “यक्षगान” के नाम से जाना जाता है. उत्तरप्रदेश में रामलीला –रासलीला का मंचन किया जाता है. मध्यप्रदेश के मालवांचल में “मांच(मंच का अपभ्रंश), महाराष्ट्र में “तमाशा”, गुजरात में “भवई”,कर्नाटक में “यक्षगान”, तमिलनाडु में” थेरुबुडु”, बुंदेलखंड में” भंडैती”, “रहस”,कांडरा”,स्वांग, गोवा का अनोखा नाट्य-“त्रियात्र”, हरियाना का सांग, उत्तराखंड की केदार घाटी में-“चन्क्रव्यूह”, हिमाचल की निचली तराई- बिलासपुर में स्वांग, मंडी में बांठना, सिरमौर और शिमला में करियाला,, चांबा में हरण, ऊना और सोलन मे-धाजा, बिहार में बिदेसिया, अवध में रामायण, छत्तीसगध में नाचा-तथा करमा,  केरल में मूडीयेटटु आदि लोकनाटिका का मंचन किया जाता है. लोकनाट्य  को लेकर राजस्थान के तीन क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं (१)उदयपुर, डूंगीपूर, कोटा, झालावाड,सिरोही (२)जोधपुर, बीकानेर, शेखावट, जयपुर(३) राजस्थान का पूर्वांचल जिसमें शेखावट, जयपुर भरतपुर, धौलपुर प्रांत आते हैं.यहाँ नाटक कई रुपों में मंचित किए जाते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि संपूर्ण भारतवर्ष में नाटक मंचित किए जाने के प्रमाण मिलते हैं ,भले ही वे अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं.                                                                                                                                                                                                                                                                    पाश्चात्य रंगमंच-     

                                                                                                                                               

प्राचीन सभ्यता में चौथी शती ई.पूर्व यूनान और रोम के रंगमंच आकार ले चुके थे. इतिहास प्रसिद्ध डयोनीसन का थिएटर एथेंस में आज भी उस काल की याद दिलाता है. एक अन्य थिएटर है “एपोडारस “जिसका  नृत्यमंच   गोल आकार में है. ३६४ ई.पू. रोमवाले इट्रस्कन अभिनेताओं की मंडली अपने नगर लाए और उनके लिए “सर्कस कैक्सियस”  में पहला रोमन रंगमंच तैयार किया.  इस तरह रंगमंच प्रारंभिक रुप मे आया. सीजर तथा आगस्टस ने रोम को बहुत उन्नत किया. पांपेई का शानदार थिएटर तथा एक अन्य(पत्थर का) थिएटर उसी के बनवाए बताए जाते हैं.                                                               प्रथम चरण-           

              १/-रोमीय परम्परावाल विसेंजा रंगमंच(१५८०-८५)जिसमें बाद में दीवार के पीछे वीथिकाएं जोडी               गई .

              २)सैवियोनेटा में स्कमोजी ने इन विथिकाओं को मुख्य रंगमंच से मिला दिया(१५८८ई)                                       ३)इमिगो जोंस ने बाद में इन्हें रंगमंच ही बना दिया.                                                                                         ४)१६१८-१९ में परमा थिएटर में, रंगमंच पीछे हो गया और पृष्ठभूमि की चित्रित दीवार आगे आ गई.                                                                                                                                                                                                               लगभग दूसरी शती ईसवीं में रंगमंच कामदेव का स्थान माना जाने लगा. ईसाइयत के जन्म लेते ही पादरियों ने नाट्यशाला को हेय मान लिया. गिरजाघरों ने थिएटर का ऎसा गला घोटा कि वह आठ शताब्दियों तक पनप न सका.. उन्होंने रोमन साम्राज्य का पतन का मुख्य कारण थिएटर को ही माना. रोमन रंगमंच का अंतिम संदर्भ ५३३ ई. का मिलता है. बावजूद इसके चोरी-छिपे नाटक खेले जाते रहे. इतालवी पुनर्जागरण के साथ वर्तमान रंगमंच का जन्म हुआ. चौदहवीं शताब्दी में फ़िर से नाट्यकला का जन्म हुआ और लगभग १६वीं शताब्दी में उसे प्रौढता प्राप्त हुई. कई उतार-चढाव के बाद १८वीं-१९वीं शती में रंगमंच के विकास का आदर्श माना गया.

              पुनर्जागरण का दौर सारे यूरोप में फ़ैलता हुआ एलिजाबेथ काल में इंग्लैंड जा पहुँचा. सन १५७४ तक वहां एक भी थिएटर नहीं था. लगभग पचास वषों में यह अपने चरम पर जा पहुंचा.और फ़िर इटली, फ़ांस, स्पेन तक जा पहुंचा. १५९०-१६२० का काल शेक्सपियर का काल रहा. रंगमंच विशिष्ट वर्ग का न होकर, जनसामान्य के मनोरंजन का साधन बना.                                                                                                          

आधुनिक रंगमंच                                                                                                                                                    

रंगमंच                                 

              रंगमंच यानि थिएटर,वह स्थान है,जहाँ नृत्य, नाटक, खेल आदि हों. रंगमंच शब्द रंग और मंच दो शब्दों की युति से बना शब्द है. रंग इसीलिए प्रयुक्त हुआ कि दृष्य को आकर्षक बनाने के लिए दीवारों, छ्तों और पर्दों पर विषेश प्रकार की और विविध प्रकार की चित्रकारी की जाती है और अभिनेताओं की वेषभूषा तथा सज्जा में भी विविध रंगों का प्रयोग होता है और मंच इसीलिए प्रयुक्त हुआ कि दर्शकों की सुविधा के लिए रंगमंच का तल फ़र्श से कुछ ऊँचा रहता है. दर्शकों के बैठने के स्थान को प्रेक्षागार और रंगमंच सहित समूचे भवन को प्रेक्षागृह, रंगशाला या नाट्यशाला कहते हैं. पश्चिमी देशों में इसे थिएटरया आअपेरा नाम दिया जाता है.

              आधुनिक रंगमंच का वास्तविक विकास १९ वीं शती के उत्तरार्ध में आरंभ हुआ और एक भव्यतम रुप सामने आया.लेकिन यह स्वरुप ज्यादा दिन न टिक सका. विज्ञान के नए-नए अविष्कारों ने जन -जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला. मूक सिनेमा, फ़िर सवाक सिनेमा ने जनमानस को अपनी ओर तेजी से आकृष्ट किया. थिएटर से कुछ मोह भंग हुआ और सिनेमा का आकर्षण बढता गया. क्योंकि इसमे ग्लैमर और पैसा दोनो है.                                                                                                                                                                 

              स्वतंत्रता पश्चात १९५१ में आयोजित एक कला सम्मेलन नई दिल्ली में, विचार किया गया कि नृत्य,नाटक और संगीत की राष्ट्रीय अकादमियाँ खोली जाए. ३१ मई १९५२ में तत्कालिन शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अब्दुल्द कलाम आजाद की उपस्थिति में अकादमी की नीव रखी गई, २८ जनवरी १९५३ को डा.राजेन्दप्रसादजी ने इस अकादमी को विधिवत उद्घाटित किया.                                                                                                 

              भारतीय नाट्य परम्परा को नित नई उँचाइयाँ देने में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,,जयशंकरप्रसाद,कमलेश्वर, जगदीशचन्द्र मथुर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रामकुमार वर्मा, मोहन राकेश, स्वदेश दीपक, नाग बोडस, हरिकृष्ण प्रेमी ,धर्मवीर भारती, नंदकिशोर आचार्य, आदि विद्वानों ने बेहतरीन नाटकों की रचना की. उनके द्वारा लिखे गए नाटकों की सर्वत्र सराहना हुई और आज भी वे जगह-जगह मंचित किए जा रहे हैं.                                       

              कई दिग्गज फ़िल्म -अभिनेता तो आज अपने चर्मोत्कर्ष पर हैं, सबके सब स्टेज कलाकर रह चुके हैं.कुछ तो सिनेमा में इतने व्यस्त हो गए हैं कि इन्हें स्टेज(रंगमंच) पर जाने का समय ही नहीं मिल पाता, बावजूद इसके उनके मन में अब भी रंगमंच को लेकर अगाथ श्रद्धा और समर्पण का भाव मौजूद है.                                                                                                                                                                                                                   

              नाटकों की बात हो और नुक्कड नाटक पर बात न की जाए तो शायद अधुरा सा लगेगा. समय के साथ नुक्कड नाटक भी कलाकारों द्वारा खेले गए. इसमे किसी थिएटर अथवा किसी नाट्यगृह की आवश्यक्ता नहीं पडती. कलाकार जिसमे पात्रों की संख्या कम से कम “एक” या आवश्यकतानुसार कुछ ज्यादा भी हो सकती है, द्वारा गली-गली में जाकर अपने अभिनय से दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाते है, जिसे हम नुक्कड भी कह सकते हैं, वे अपनी प्रस्तुति द्वारा समाज में फ़ैल रही विसंगतियों पर कडी चोट करते हैं अथवा कोई ऎसा संदेश देना चाहते हैं जो समाज के लिए उपयोगी हो,के विषय के मूल में जाकर छिपे संदेश को जन-जन तक पहुँचाते है. इसमे कोई तामझाम नहीं करनी पडती और न ही कोई विशाल मंच बनाने की जरुरत ही पडती है. इससे यह फ़ायदा हुआ कि जो लोग नाटकों से जुड नहीं पाए अथवा समयाभाव के कारण मंच तक नहीं भी जा पाए तो उन्हें घर बैठे इसका आनन्द उठाने को मिल जाता है. अतः कहा जा सकता है कि नाट्यविधा का भविष्य आगे भी सुरक्षित रहेगा और आए दिन नए-नए नाटक मंचित किए जाते रहेंगे.     

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71.                                                                  

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                                                          अपने समय को लिखते हुए.

 

प्रेम करने के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती. ठीक इसी तरह कविताएँ-कहानियाँ लिखने के लिए भी उम्र का बंधन नहीं होता. प्रख्यात उपन्यासकार थामस हार्डी आजीवन उपन्यास लिखते रहे. उन्होंने अस्सी वर्ष की उम्र में कविताएँ लिखना शुरु किया था.

यदि मैंने तीन दशक से कुछ अधिक समय तक कविताएँ लिखने के बाद कहानियाँ, लघुकथाएँ, लेख-आलेख, यात्रा वृत्तांत तथा उपन्यास लिखना शुरु किया, तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगता.

अपने जीवन के अठहत्तर (78) वे मोड़ पर आते-आते मेरे दो नए कहानी संग्रह ( पूर्व में चार संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.), लगभग पाँच लेख-आलेखों का संग्रह, तथा रामकथा पर उपन्यास प्रकाशित होने जा रहे है. रामकथा पर आधारित उपन्यास तीन खण्डॊं में लिखा जा रहा है. प्रथम खण्ड-"वनगमन", दूसरा-"दण्डकारण्य की ओर" और तीसरा और अन्तिम खण्ड "लंका की ओर" है. "वनगमन" प्रकाशित हो चुका है. इस प्रथम खण्ड की भूमिका डा.राजेश श्रीवास्तव (निदेशक रामायण केंद्र भोपाल एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी, म.प्र.तीर्थ एवं मेला प्राधिकरण, अध्यात्म मंत्रालय, म.प्र.शासन,भोपाल) तथा डा. श्री दीपक पाण्डॆय ( सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार नई दिल्ली ) ने लिखी है. दूसरे खंड-" दंडकारण्य़ की ओर" पर मारीशस के प्रख्यात उपन्यासकार/लघुकथाकार श्री रामदेव धुरंधर एवं साहित्य अकादमी भोपाल के निदेशक श्री.विकास दवे जी ने भूमिका लिखी है. दूसरा खंड प्रेस में है. शायद इसी माह उसके प्रकाशित होकर आने की संभावना है. तीसरे  खण्ड पर लेखन कार्य जारी है.

कभी कंप्युटर की शक्तियों को नकारते हुए या कहें अज्ञानतावश मैंने उसे सीखने (आपरेट) में रुचि नहीं दिखाई, जबकि यह घर में उपलब्ध था. बावजूद इसके मैंने उसे कभी छूने तक की कोशिश भी नहीं की. यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे कालान्तर में, उम्र के पैसठवें पड़ाव पर थाईलैंड जैसे अपरिचित-अनचिन्हें देश में भ्रमण करने का सुअवसर मिला. मैंने देखा, मेरे अधिकांश सहयात्री लैपटाप में दर्ज अपनी  रचनाएं सुनाते, जबकि मुझे डायरी के पन्ने पलटने पड़ते थे.

इस घटना ने मुझे अंदर तक झझकोर दिया . ऐसा होना स्वभाविक भी था. मैंने निर्णय लिया कि अब इसे सीखकर ही रहूँगा. परिणाम यह हुआ कि अब मेरा सारा काम कंप्युटर पर ही होता है. डाक से भेजी जाने वाली रचनाएँ, जहाँ हफ़्ते-दस दिन में अपने गंतव्य पर पहुँचा करती थीं, अब पलक झपकते ही विश्व के किसी भी कोने में पहुँच जाती हैं. इंटरनेट के माध्यम से मेरी रचनाओं को एक बड़ा आकाश मिला.तथा देश-परदेश की पत्र-पत्रिकाओं में स्थान मिलने लगा.

आज, अपने जीवन के अठहत्तरवें मोड़ पर, लेखनी के दरिया किनारे बैठकर, जब मैं लहरों को गिनता हूँ तो मुझे बरबस ही मुझे अपना बचपन याद हो आता है.

 17-07-1944 (सतरह जुलाई सन उन्नीस सौ चौवालिस) को मेरा जन्म पुण्य-सलीला माँ ताप्ती के उद्गम स्थल मुलताई (जिला बैतुल) में हुआ. सदियों से यह स्थान धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक चेतना का संगम-स्थल रहा है.

माँ भगत्भक्त थीं. वे बड़े ही अनन्य भाव से रामचरित मानस, सुख सागर, शिवपुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों को नियमित रूप से बांचती थीं. कभी स्वास्थ ठीक नहीं है का बहाना बनाकर, वे मुझसे कहतीं, आज तुम पढ़कर सुनाओ. मैं भी उसी लय में पढ़ने की कोशिश करता. पिता को भी पढ़ने में गहरी रुचि थी. वे किताबें खरीद कर लाया करते थे. विशेषकर गीता प्रेस से प्रकाशित छोटी-छोटी पुस्तकें ( पाकिट बुक्स.) मेरे लिए खरीद कर लाते, ताकि मेरा जुड़ाव किताबों से हो सके. गीता प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों का कोई अधिक मूल्य भी नहीं होता था. एक पैसे से दसों रुपयों तक की पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हो जाया करती थीं. फ़िर घर की आलमारी में चंद्रकांता संतति, सुखसागर सहित अनेक कृतियाँ रखी हुईं होती थीं मुझे पढ़ने का अवसर मिला. कहूँ कि किताबों को पढ़ने का शौक, मुझे अपने घर की पाठशाला में रहते हुए ही मिला है, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

कक्षा चौथी का विद्यार्थी था मैं उन दिनों. श्री सुंदरलाल देशमुख नए-नए शिक्षक होकर आए थे. उनके आगमन के साथ ही शाला की दीवारों पर स्वनाम धन्य महापुरुषों के चित्र, तथा उनके उपदेशॊं से रंगी जाने लगी. मुख्य सभागार में एक बड़ा-सा आर्च था, जिसमें पं जवाहरलाल नेहरू तथा महात्मा गांधी से चर्चा में निमग्न बनाए गए थे. मैं एक ओर तटस्थ भाव से खड़ा रहकर उन्हें चित्र बनाता देखता था.इसी तरह कक्षा पाँचवी में हमारे कक्षा शिक्षक श्री नाथूलाल पवांर भी चित्रकारी करने में दक्ष थे. कक्षा पांच में ड्राईंग एक विषय था. वे चित्र बनाना सिखाते थे. इस तरह मेरी रुचि चित्रकारी की ओर भी जाग्रत हुई.

कक्षा नौंवीं का विद्यार्थी था मैं. उम्र यही चौदह-पंद्रह के आसपास रही होगी, मैं कविता लिखने लगा था. तब शायद मै नहीं जान पाया था कि कविता आखिर होती क्या है?. बस ,मन में जो भी विचार उत्पन्न होते,उन्हें जस-की-तस कागज पर उतार लिया करता था.

उन दिनों मुलताई में केदारनाथ भार्गव हाई स्कूल, जिसका संचालन म्युनिसिपल किया करती थी, सरकारी स्कूल बन गया था. श्री एस.व्ही.पौराणिक नए-नए प्राचार्य होकर आए थे. वे कवि हृदय थे. उनके आते ही स्कूल की सारी गतिविधियाँ में व्यापक परिवर्तन आया. प्रतिदिन, प्रार्थना के बाद विद्यार्थियों को "सुविचार" कहने के लिए बुलाया जाता और उसे ब्लैक बोर्ड पर भी लिखने को कहा जाता था.

वे जानते थे कि विद्यार्थियों में किस तरह साहित्य के प्रति उत्सुकता जगाई जानी चाहिए,. अतः उसी वर्ष से, सेशन के अंत में हर शाला से एक हस्तलिखित स्मारिका तैयार की जाने लगी, जिसमें उस कक्षा में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की अपनी स्वयं की लिखी बाल-कहानी, कहानी, कविता, संस्मरण आदि का समावेश होता था. इतना ही नहीं उन्होंने साहित्य के हर क्षेत्र का वर्गीकरण करते हुए सचिवों का चुनाव भी कर दिया था. प्रत्येक कक्षा का एक सचिव होता था. मुझे भी साहित्य-सचिव बनाया गया था. कक्षा शिक्षकों को उपाध्यक्ष बनाया गया और वे स्वयं इसके अध्यक्ष बने. प्रत्येक शनिवार को शाला के विशाल सभाग्रह में साहित्यिक कार्यक्रम बिना किसी रुकावट के होने लगे.

उस सभाग्रह में ही एक लायब्रेरी हुआ करती थी. शीशा जड़ी आलमारियों में बंद पुस्तकों और लेखकों के नाम पढ़कर, मेरे कोमल मन में, एक विचार ने जन्म लिया कि मैं भी लेखक बनूँगा और एक दिन मेरे नाम की लिखी पुस्तकें भी एक दिन यहाँ होगी. साहित्य-सचिव चुने जाने के साथ ही इस बात का उल्लेख करना मुझे जरुरी लगता है, वह यह कि श्री.एनलाल जैन हमें संस्कृत पढ़ाया करते थे. वे भी कवि-हृदय थे. कापी की जाँच करते समय उन्हें पृष्ठ भाग पर लिखी कविता दिखाई दीं. उन्होंने केवल उसे पढ़ा ही नही, बल्कि मुझे प्रोत्साहित करते हुए लगातार लिखते रहने को कहा. इस तरह कविता से मेरा रिश्ता कभी नहीं टूटा, बल्कि कविता से मेरा रिश्ता साल-दर-साल गाढ़ा और दिनो-दिन अधिक आत्मीय होता गया.

भारतीय अस्मिता के साहित्यकार कवीन्द्र रवीद्रनाथ ठाकुर को पढ़ते हुए एक सूत्र हाथ लगा. वे अपनी कविताओं के साथ चित्र बनाकर उसमें प्राकृतिक रंग भरा करते थे. मैं भी कविता के साथ चित्र बनाता और उसमें रंग भरने लगा. उस समय की बनाई गई डायरी आज भी मेरे पास एक धरोहर के रूप में सुरक्षित है. जब भी मैं उसके पन्ने पलटता हूँ तो उन दिनों की दिव्य स्मृतियाँ मानस-पलट पर थिरकने लगती है.

मनुष्य का सब कुछ बदलता रहता है. उसी प्रकार, कविता भी बदलती रहती है. उसकी कुछ चीजें नहीं बदलती और वह है उसकी भीतरी शक्ति...उसकी आत्मा..उसकी  निजता...उसकी पहचान,,उसका कवितापन. और उसकी धड़कने.

उस काल-खंड में मेरे द्वारा लिखी गई कविताएँ और बाद में लिखी गईं कविताओं में जमीन-आसमान का अंतर अवश्य है, लेकिन उसकी भीतरी शक्ति और माधुर्य आज भी देखे जा सकते हैं. नागपुर नवभारत समाचार पत्र में जब पहली बार मेरी कविता प्रकाशित हुई, वह दिन मेरे लिए अद्भुत दिन था. प्रसन्नता से लकदक भरा दिन.. पैर तो जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे. मित्रों से बधाइयाँ अलग मिल रही थी. सबसे ज्यादा प्रसन्नता माता-पिता को हो रही थी.वे खुश थे.बेहद खुश.

मैंने दो विषयों में दक्षता के साथ, मैट्रीक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की थी. प्रथम श्रेणी में आने वाले मेरे अन्य मित्रों में श्री अशोक जैन, लक्ष्मीकांत ठाकुर, विजय पाटिल तथा अरुणाचलम मुदालियार थे. मुझे छोड़कर प्रायः सभी ने कालेज में एडमिशन ले लिया था. गाँव छोड़कर शहर में जाकर पढ़ाई के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है. उसे उस समय मेरा परिवार उठाने में असमर्थ था. नागपुर मेरी ननिहाल है. रहने की व्यवस्था तो वहाँ हो गई थी. मैंने धनवटे नेश्नल कालेज में एडमिशन ले लिया और पार्ट-टाईम जाब की तलाश करने लगा. संयोग से मुझे जल्दी ही धंतोली स्थित एक  रेफ़्रीजिरेटर सुधार करने वाली दुकान पर तीस रुपया माह से जाब मिल गया. मुझे करना कुछ नहीं होता था. बस फ़ोन अटेण्ड करना, बिगड़े रेफ़्रीजिरेटरो के आवक-जावक को नोट करना और साथ ही मैकनिकों पर सुपरविजन रखना होता था. दुकान दिन के ग्यारह बजे के बाद खुलती और मेरा कालेज सुबह की शिफ़्ट में लगता था. इस तरह पढ़ाई चल निकली.

बी.ए.( फ़ाइनल) में आते ही मेरा चयन डाक विभाग में हो गया. यह मेरे लिए खुशी का समय था. डाक घर में चयन होने के बाद मुझे देश की चर्चित और गौरवशाली परंपरा की धनी नगरी, जबलपुर में पोस्टिंग मिली. यह मेरा सौभाग्य ही है कि जहाँ मुलताई में मुझे माँ ताप्तीजी का और यहाँ आकर मुझे माँ नर्मदा जी का पावन तट मिला. बड़ौदा पोस्टल ट्रेनिंग से लौटकर मैंने  15 पन्द्रह फ़रवरी सन् 1965 में जबलपुर के प्रधान डाकघर में ज्वाईनिंग दी थी.

 

उन दिनों केन्द्र सरकार में नौकरी पाना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. एक सौ दस  रुपया मासिक सेलरी के अलावा उस पर मिलने वाला डी.ए. मिलाकर मुझे अपनी पहली तन्खाह पर एक सौ चालिस रुपया पचास पैसे मिले थे. सरकारी नौकरी में इतनी बड़ी सेलेरी और किसी अन्य विभाग में नहीं थी. डाक-विभाग में नौकरी पाकर जहाँ एक ओर मैं प्रसन्नता से लकदक हो रहा था, तो वहीं दूसरी ओर मेरे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाली और जीवन को खुशियों से भर देनी वाली बहुत बड़ी खुशी मेरी प्रतीक्षा कर रही थी.

मेरे माता-पिता ने मेरा विवाह छिन्दवाड़ा निवासी श्री श्रीमती चंपाबाई + श्री बुटूलाल यादव जी की सुश्री शकुन्तला यादव के संग होना सुनिश्चित हुआ. इस दिन वसंत पंचमी का पावन पर्व था. 5 मार्च सन् 1965 दिन शुक्रवार को हमारा पाणिग्रहण संस्कार हुआ. मेरे जीवन में वसंत का प्रवेश तो उसी दिन हो चुका था, जिस दिन हमारे विवाह की बात वसंत पंचमी के दिन पक्की की गई थी. सुंदर-सुगढ़-सुशील और संस्कारी पत्नी को पाकर मैं बहुत खुश था. बेहद खुश.

घर-गृहस्थी को सुचारु रूप से संचालित करने के साथ ही उसे गीत-संगीत में गहरी रुचि थी. पारंपरिक गीतों को सहेज कर रखना और गाना उसकी रुचियों में एक था. गायन के अलावा कविताएं लिखना, लेखादि लिखना और पढ़ना उसकी आदत का एक अभिन्न हिस्सा रहा. उसकी कई कविताएं-लेखादि विभिन्न पत्र-पत्रिकाऒ में प्रकाशित हुए हैं. इसके साथ ही उसके स्वयं के लिखे  गीत आकाशवाणी छिन्दवाड़ा से समय-समय पर प्रसाधित होते रहे.हैं.

प्रधान डाकघर में कार्य की अधिकता के कारण साहित्यिक गतिविधियाँ कुछ धीमी गति से चलने लगी थीं. बावजूद इसके समय-समय पर होने वाले कवि-सम्मेलनों तथा देश के ख्यातिनाम साहित्यकारों जैसे सेठ गोविन्ददास, आचार्य रजनीश, व्यंग्य शिल्पी हरिशंकर परसाई आदि को सुनने और मिलने का अवसर हाथ से जाने नहीं देता था. उस समय के ख्यातनाम गीतकार-संपादक नई दुनिया श्री राजकुमार सौमित्र जी (नई दुनिया ) में प्रकाशित होने वाले स्तंभ " राही निकुंज" में मेरी कविताएं समय-समय पर प्रकाशित होती रहती थीं.

जबलपुर रीजन लायब्रेरी का सदस्य और लायब्रेरियन से पनपी दोस्ती के कारण किताबें पढ़ने का शौक बराबर बना रहा. रांघेय राघव मेरे सर्वाधिक पसंदीदा लेखक रहे हैं.

संयोग से मुझे म्युचल ट्रांसफ़र मिल गया और मैं छिन्दवाड़ा संभाग के अंतरगत आने वाले जिला बैतुल में आ गया. यहाँ आने के बाद मेरी लेखनी की नदी, जो कार्य की अधिकता के कारण ठहर-सी गई थी, बह निकली.

बैतुल के कवि-मित्रों के साथ आए-दिन काव्य-गोष्ठियाँ आयोजित होतीं. मैं उसमें उत्साह से भाग लेता. कवि मित्रों के अलावा मेरे एक अभिन्न मित्र थे श्री शंकर प्रसाद श्रीवास्तव थे. वे बैतुल के जे.एच कालेज में हिंदी विभागाध्यक्ष थे, वे एक जाने-माने संगीतज्ञ थे. एक बार उन्होंने प्रख्यात नृत्यांगना सितारा देवी जी का कार्यक्रम आयोजित किया. उन्होंने उझे अपना सहयोगी बनाया.इस तरह मैं पूरे एक सप्ताह का अवकाश लेकर उनसे जुड़ा रहा. कार्यक्रम आशातीत सफ़ल रहा. इस आशातीत सफ़लता के बाद हम किसी अन्य कार्यक्रम के निर्धारण की सोच ही रहे थे, कि मेरा तबादला मेरे जन्म स्थान मुलताई में हो गया. यह मेरे लिए सर्वाधिक खुशी का विषय था. मैं यहाँ पूरे चार साल रहा.

मुलताई में कवियों की संख्या बहुत तो थी,लेकिन कोई मंच नहीं था. तत्कालीन डाकपाल श्री एस.डी.श्रीवास्तवजी भी एक कवि थे. हमने आपस में परामर्श किया और सबका सहयोग लेकर "मुलताई साहित्य समिति" का गठन किया.यह संस्था आज भी सक्रीय है. वर्तमान में मित्र श्री विष्णु शंकर मंगरुलकरजी इसके अध्यक्ष हैं. संस्था के गठन के बाद होने वाले खर्चों का उत्तरदायित्व तत्कालीन तहसीलदार सुंदरलाल मुद्गल जी ने उठाया. प्रधानपाठक श्री रामेश्वर खाड़े जी ने स्कूल का हाल उपलब्ध करवाया. इस तरह संस्था सुचारु रुपेण चलने लगी. मित्र सूरजपुरी, रामचंद्र देशमुख, श्री एनलाल जैन "स्वदेशी", श्री नरेन्द्रपाल सिंह, श्री बृजमोहन शर्मा "ब्रजेश" श्री विष्णु मंगरुलकर एवं अन्य कवि गोष्ठियोंमें उत्साह से भाग लेते. प्रख्यात कवि चंद्रसेन विराट भी यहाँ रहे हैं, वे भी अपनी उपस्थिति एवं सहयोग बनाए रखते थे. मानस के रचियता संत तुलसीदास जी की जयंती पर हमने एक बड़ा कार्यक्रम रखा जिसमें मानस मर्मज्ञ, मूर्धन्य विद्वान, मनीषी, चिंतक एवं प्रख्यात साहित्यकार श्री बलदेव प्रसाद मिश्र जी को आमंत्रित किया था.समिति का यह अयोजन पिछले अन्य कार्यक्रमों से सबसे बड़ा और अभूतपूर्व  था.

शहर मुलताई के गौरव- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री रामजीराव पाटिल, श्री बलवंत खन्नाजी, श्री सोम्मार पुरी गोस्वामी, डाक्टर श्री भोजराज खाड़े, समाजसेवी श्री पर्वतराव खाड़े जी का भरपूर सहयोग समिति को मिला करता था. इसी तरह  गायकी में विशेष दक्षता रखने वाले श्री खेमलाल यादव, काका फ़कीरचंद यादव, भिक्कुलाल यादव ( भाई), श्री भिक्कूलाल यादव (पिताश्री.) सागरमल ओसवाल, श्री गेन्दपुरी आदि की टोली थी, जिनकी मण्डली आए दिन भजन की शानदार प्रस्तुति दिया करती थी और होली के पावन पर्व पर इनके द्वारा विशेष रूप से गायी जाने वाली फ़ाग समूची बस्ती में धमाल मचाया करती थी, को सुनने के अनेक अवसर आए. इस तरह मैं आंचलिक गीतों और लोकगीतों से परिचित हो पाया.

मुलताई निवासी तथा फ़िल्मों में काम करने वाले कलाकार श्री पी.कैलाश (फ़िल्म अभिनेता दिलीपकुमार के साथ फ़िल्म "आदमी" में जानदार अभिनय के लिए जाने जाते थे ). श्री शैल चतुर्वेदी जी (हास्य कवि ) इस शहर की एक खास सख्सियतियों में से एक थे. इस समय वे काका हाथरसी के साथ मंचों पर धमाल मचा रहे थे. बाद में शैलजी ने अनेक फ़िल्मों में हास्य अभिनेता के रूप में काम किया. पी.कैलाश और शैलजी का जब भी मुलताई आगमन होता, वे कैलाश शर्मा, शंभु प्रधान, शर्मा मास्साब, सुंदरलाल यादव (बड़े भाई) तथा सूरजपुरी के साथ मिलकर थियेटर किया करते थे.

इस बीच मेरा चयन अंग्रेजी मोर्स के लिए हो गया और मैं प्रदेश की राजधानी भोपाल आ गया. भोपाल में रहते हुए मुझे दो बार आकाशवाणी से अपनी कविताओं के प्रसारण का अवसर मिला. मोर्स के प्रशिक्षण के समापन अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम आयोजित किया गया,जिसकी अध्यक्षता पोस्टमास्टर जनरल श्री वेलणकर जी भोपाल कर रहे थे. मैंने मोर्स पर आधारित कविता- "नदी के डैश-डाट", पढ़ी. कविता से प्रभावित होते हुए उन्होंने  मुझे पुरस्कृत किया और प्रशस्ति-पत्र भी दिया था.

प्रशिक्षण के बाद मेरी पोस्टिंग छिन्दवाड़ा हो गयी. छिन्दवाड़ा शुरु से ही राजनीति और साहित्य का केंद्र रहा है. प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री गंगाधरराव थोरात जी (प्राचार्य) के मकान के ठीक सामने मैंने अपने लिए मकान किराए पर उठाया था. पड़ौस में  कवि बाबा संपतराव धरणीधर, कहानीकार श्री हनुमंत मनगटे, श्री मनोहर घाटे ( इतिहास विशेषज्ञ-इन्साइक्लोपिडिया ) कवि श्री केशरीचंद चंदेल " अक्षत" जी एवं श्री लक्ष्मीप्रसाद दुबेजी का निवास था. इनके रहते हुए ’बरारीपुरा" शहर छिन्दवाड़ा में अपनी एक विशेष पहचान बना चुका था. या यह कहें, वह उस समय का स्वर्णिम काल था. आए दिन साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित होते रहते. गजलों के बेताज  बादशाह श्री गोपाल कृष्ण सक्सेना " पंकज" अपने अंदाज में हिंदी में गजलें कहते. वयोवृद्ध साहित्यकार/गीतकार पं.रामकुमार शर्माजी अपने मधुर कंठ से बेहतरीन गीत सुनाया करते थे. इनके अलावा सलीम जुन्नारदेवी, गीतान्जलि "गीत", राजेन्द्र मिश्रा "राही", प्रमोद उपाध्याय,, रत्नाकर "रतन", शिवशंकर शुक्ला, शिवराम विश्वकर्मा "उजाला, मन्नुलाल जैन "झकलट", ओमप्रकाश नयन, राजीव मोघे, सुश्री कमला वर्मा आदि सहित अनेक कवियों से गहरा जुड़ाव होता गया. आए दिन गोष्ठियां होती रहतीं. राजेन्द्र मिश्रा" राही" एक उमदा कवि होने के साथ-साथ अच्छा मंच-संचालक भी है. इसी बीच हमने एक संस्था "चक्रव्यूह" का गठन किया. शीघ्र ही इस मंच ने जिले में अपनी विशिष्ठ पहचान बना लिया था. मैं इस संस्था का दो साल साहित्य- सचिव भी रहा.

देश और परदेश में छिन्दवाड़ा को विशेष ख्याति दिलाने वाले और इसी माटी में जन्में  प्रख्यात साहित्यकार (स्व.)  श्री विष्णु खरे जी के योगदान को कैसे विस्मृत किया जा सकता है?. आपने कई महाविद्यालयों में अध्यापन का कार्य किया और अनेकों देशों की यात्राएं की थीं. मात्र सोलह वर्ष की आयु में ही आप कविताएं लिखने लगे थे. कम उम्र में ही आपने विश्व विख्यात कवि " टी.एस.एलियट" की कविताओं का अनुवाद किया. महान हंगरी कवि " अत्तिला योजेफ़ " की रचनाओं का अनुवाद और हंगरी के ही नाटककार" फ़ेरेन्त्स करिन्थी "के नाटक "पियानो" पर समीक्षा आलेख लिखा. आपकी कई रचनाओं का अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. अनेक सम्मानों से सम्मानित खरेजी नवभारत टाईम्स आफ़ इण्डिया, नई दिल्ली में प्रधान संपादक भी रहे.

मेरी पत्नी श्रीमती शकुन्तला यादव जी के हार्ट का आपरेशन एम्स में होना था. इस दौरान आपसे (खरे जी) सौजन्य भेंट हुई, जो उत्तरोत्तर प्रगाढ़ और आत्मीय होती गई. नवभारत टाईम्स अपार्टमेंट के अपने आवास पर आपने हम पति-पत्नी को भोजन पर भी आमंत्रित किया था. जब भी उनका छिन्दवाड़ा आगमन होता, अपने आने की सूचना वे मुझे देना नहीं भूलते थे. एक बार तो सपत्नीक आपका आगमन हुआ. आप मेरे आवास पर भी आए. वे अपनी पुस्तक लेखन का अधिकांश कार्य छिन्दवाड़ा में रहते हुए ही किया करते थे. आपने मुझे अपनी बिटिया सुश्री अनन्या ( सिने-टीवी कलाकार) के विवाह समारोह में आने के लिए आमंत्रण-पत्र भिजवाया था. इस समारोह में मेरी मुलाकात प्रख्यात साहित्यकार अशोक वाजपेयी जी, हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव आदि साहित्यकारों से हुई थी.

इसी तरह छिन्दवाड़ा के गुड़ी में जन्में श्री लीलाधर मंडलोई जी ने भी साहित्य-जगत में अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई है. आप आकाशवाणी के निदेशक तथा दूरदर्शन के निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं.अनेक साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित श्री मंडलोई जी की दर्जनों पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं.

चक्रव्यूह  संस्था के बैनर तले मैंने एक कार्यक्रम प्रमुख डाकघर छिन्दवाड़ा में " पाति" विषय को लेकर आयोजित किया. अपनी चोंच में चिठ्ठी दबाए कबूतर का चित्र बनाया. कार्यक्रम आशातीत सफ़ल हुआ. कार्यक्रम में हर एक प्रतिभागी को इस चित्र की छाया-प्रति सौजन्य भेंट में दी गई.

किन्ही कारणों से "चक्रव्यूह" को बंद करना पड़ा. तदनन्तर "हिन्दी साहित्य सम्मेलन" का गठन हुआ". अपनी सक्रीय भागीदारी का निर्वहन करते हुए मुझे उपाध्यक्ष भी बनाया गया. मेरी रचनाएं समाचार-पत्रों, देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ ही डाक-विभाग से निकलने वाली पत्रिका "डाक-तार" में नियमित रुप से प्रकाशित होते रहे. डाक विभाग ने अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया.उसमें मेरी कहानी "रजनीगंधा" ने प्रथम स्थान पाया. यात्रा संस्मरण में मेरा एक आलेख-" दक्षिण भारत की सुरम्य यात्रा" पुरस्कृत हुई.

कविता के अनन्त प्रवाह में अनुशासन एक बेड़े की तरह होता है. जिसे एक काल-खण्ड और मंजिल पार करने के बाद छोड़ देना पड़ता है. आगे की यात्रा के लिए दूसरी नाव और मंजिल तलाशनी होती है. मेरे साथ जाने-अनजाने में यह हुआ और मैं कहानी लेखन की ओर मुड़ गया. तीन दशक से कुछ ज्यादा समय से मैं कहानियाँ लिख रहा हूँ.

प्रदेश तथा देश की स्तरीय पत्रिकाओं- यथा- रुपांबरा (कोलकाता), कथा-बिंब(मुंबई), झंकृति (धनबाद.), दुनिया (नागपुर), पूर्वा (नागपुर.), पंजाबी-संस्स्कृति (हिसार), प्रगतिशील- आकल्प (मुंबई), इरावती( धर्मशाला.), द्वीप लहरी ( पोर्ट ब्लेयर.) आलाप (बैकुंठपुर.), अक्षर-खबर (कैथल), साहित्य -संपर्क ( कानपुर) नागरिक उत्तरप्रदेश (लखनऊ), सीनियर इण्डिया ( दिल्ली), खनन-भारती (नागपुर), सामर्थय ( कानपुर), अहल्या (हैदराबाद.), सरस्वती-सुमन (देहरादून), पृथ्वी और पर्यावरण (ग्वालियर.), तूलिका (भोपाल), समरलोक (भोपाल), कृति परिचय (भोपाल), अक्षर-शिल्पी (भोपाल), तथा साहित्य जनमत (गाजियाबाद) में तथा अन्य पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित हुईं. वर्तमान में सात सौ से अधिक पत्रिकाओं में मेरे लेख, आलेख, लघुकथाएं, यात्रा-संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं. इतना ही नहीं विभिन्न  विषयों पर एक सौ अस्सी से अधिक आलेख शीघ्र ही पुस्तकाकार में आने वाले हैं.

मेरी कहानी जूती, फ़ांस और जंगल पुरस्कृत हुईं. धनिया नामक कहानी जो करीब तीस-पैतीस पृष्ठों में फ़ैली है, आल इंडिया प्रतियोगिता में उसे दूसरा स्थान मिला. इतना ही नहीं मुझे इस कहानी पर तीन हजार रुपया नगद पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुए. मैंने करीब पच्चीस पुस्तकों पर समीक्षा आलेख भी लिखे हैं. प्रायः मेरे लेख-आलेख. कविता, लघुकथा और कहानियों पर अठारह ई-बुक्स भी बन चुकी हैं

सन 2002में मुझे पदोन्नति मिली और मैं छतीसग्ढ़ के कवर्धा पोस्टआफ़िस में (H.S.G.1).पोस्टमास्टर पदस्थ हुआ. एक डाक सहायक के पद से पोस्टमास्टर के पद तक की यह यात्रा रोमांचित करती है. कवर्धा में रहते हुए देशबंधु समाचार पत्र के संपादक /लेखक/पत्रकार श्री ललित सुरजन जी सहित अनेक कथाकारों,और कवियों से मेरी सौजन्य भेंट होती रही. उस समय "हरिभूमि" अखबार बिलासपुर से प्रकाशित होता था. उसमें मेरी चार माह में पांच कहानियाँ प्रकाशित हुई. संपादक महोदय ने मेरी कहानियों को अखबार का पूरा पृष्ठ दिया था.

अपनी यात्रा के इस सफ़लतम पड़ाव पर पहुँचकर मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेने का मानस बना लिया.पारिवारिक जिम्मेदारियां लगभग समाप्त हो चुकी थीं. बड़ा बेटा डा.आलोक कुमार ने सागर विश्वविद्यालय में एम.काम में प्राविण्य सूची (टाप पोजिशन) में स्थान पाया और लोक सेवा आयोग की परीक्षा में उत्तीर्ण होकर महिला पोलिटेक्निक कालेज में व्याखाता के पद पर पदस्थ हो गया था वर्तमान में वह प्राचार्य के पद पर पदस्थ है. उसकी लिखित दो पुस्तकें "माडर्न आफ़िस मैनेजमेंट" पर तथा हिंदी में एक पुस्तक "टैली" पर प्रकाशित हो चुकी है. बड़ी बहू श्रीमती सुशीला यादव डाकघर में पदस्थ है. छोटा बेटा रजनीश " गुडविल अकाउन्ट्स अकादमी" का संचालक.है, जहाँ वह बच्चो को "टैली" का प्रशिक्षण देता है. छोटी बहू श्रीमती शैली यादव शिक्षिका है. बेटी अर्चना आई.टी.आई में व्याख्याता के पद पर पदस्थ है. दामाद श्री पप्पु यादव का अपना व्यवसाय है और साथ ही वह नगराध्यक्ष भी है. पत्नी श्रीमती शकुन्तला यादव को लोकगीतों-भजनों में महारथ हासिल हैं. उनके लोकगीत आज भी आकाशवाणी से प्रसारित होते हैं. उन्होंने महिलाओं का एक संगठन भी खड़ा किया था, जो समाजसेवा को समर्पित था.

यह अवसर मेरे लिए सर्वथा उचित था कि मुझे सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य-साधना में जुट जाना चाहिए. दो वर्ष पूर्व मैंने सेवा-निवृत्ति ले लिया. नौकरी करते हुए जहाँ समय का अभाव था. आज समय ही समय है. जमकर पढ़ने और लिखने और भ्रमण करने में और पूरे प्राणपन से लगा रहता हूँ.

सेवानिवृत्ति के ठीक तीन माह बाद मेरा पहला कहानी संग्रह-"महुआ के वृक्ष" पंचकूला हरियाणा से प्रकाशित होकर आया. प्रख्यात कवि डा.शिवकुमार "मलय" के मुख्य आतिथ्य और पंडित रामकुमार शर्माजी की अध्यक्षता तथा पाठक मंच के संयोजक मित्र श्री ओमप्रकाश सोनवंशी "नयन" के संचालन में इस संग्रह का विमोचन हुआ. इस संग्रह पर मुझे स्थानीय साहित्यकारों के सहित देश के नामचीन साहित्यकारों की ओर से लगभग पैसठ समीक्षाएं प्राप्त हुईं थी.

शहर छिन्दवाड़ा के ऐतिहासिक टाउन-हाल के विशाल सभाग्रह में प्रख्यात साहित्यकार/कहानीकार श्री हनुमंत मनगटे जी की अध्यक्षता में, तथा ओमप्रकाश "नयन" के कुशल संचालन में समीक्षा-गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें स्थानीय रचनाकारों, बुद्धिजीवियों सहित अनेक गणमान्य नागरीकों ने बड़ी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज की थी. इस समीक्षा गोष्ठी में भोपाल के वरिष्ठ कथाकार मित्र श्री मुकेश वर्मा, वरिष्ठ कवि श्री बलराम गुमास्ता, कवि मित्र श्री मोहन सगोरिया और नागपुर से सुश्री इंदिरा "किसलय" जी की गरिमामय उपस्थिति ने इस गोष्ठी को भव्यता प्रदान की थी.

सन 2007-08 मेरे लिए बेशकीमती सौगातें लेकर आया. मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन भोपाल  में होने वाली "चौदहवीं पावस व्याख्यानमाला" का आयोजन-" महयसी महादेवी वर्मा जी", " श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी जी" तथा " श्री हरिवंश राय बच्चन जी" की जन्म शताब्दी पर केन्द्रीत था, होने जा रहा था. इस आशय का पत्र मित्र श्री (स्व.) प्रमोद उपाध्यायजी लेकर मेरे आवास पर आए और उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मुझे भी इस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए जाना चाहिए था. यह वह समय था जब मैं मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन में उपाध्यक्ष पद से त्याग-पत्र देकर स्वतंत्र लेखन कर रहा था. आग्रह इतना जबरदस्त था कि मैं उपाध्याय जी का प्रस्ताव अस्वीकार नहीं कर पाया और उनके साथ भोपाल गया.

वहाँ जाकर मुझे देश के लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकारों को सुनने और मिलने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ. द्विमासिक पत्रिका के संपादक तथा  हिंदी भवन भोपाल के मंत्री-संचालक माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंतजी से भेंट हुई. आपने मुझसे छिन्दवाड़ा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की जिला इकाई खोलने का आग्रह किया. यह केवल मेरे लिए आग्रह ही नहीं था, बल्कि यूं कहे वह मेरे लिए एक तरह से आदेश ही था, जिसे मैं अस्वीकार नहीं कर सका.

आपकी प्रेरणा से मैंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जिला इकाई छिन्दवाड़ा का गठन किया. 28-10-2007 को वयोवृद्ध साहित्यकार/गीतकार पं.श्री रामकुमार जी शर्मा की अध्यक्षता में एवं मान.श्री कैलाशचंद्र पंतजी के मुख्य आतिथ्य  एवं नगर के गणमान्य नागरिकों,साहित्यकारों तथा स्वजनों की गरिमामयी उपस्थिति में राष्ट्रभाषा पचार समिति,जिला इकाई छिन्दवाड़ा की विधिवत स्थापना हुई. तब से लेकर आज तक, हमारी समिति अनेक सफ़ल कार्यक्रम संपन्न कर चुकी है. हिंदी भवन से जुड़ाव और दादा पंतजी से आशीर्वाद पाकर फ़िर मैंने पीछे पलटकर नहीं देखा और प्रगति के सोपान लगातार चढ़ता चला गया. बड़े विनय भाव से मैं इस सफ़लता का श्रेय यदि किसी को देना चाहूँगा तो वह स्व,श्री प्रमोद उपाध्याय जी को देना चाहूँगा कि उन्होंने अनायास ही मुझ जैसे साधारण कोच को, सुपर-फ़ास्ट राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन से जोड़ दिया था..

मेरा दूसरा कहानी संग्रह "तीस बरस घाटी" का प्रकाशन हुआ. इस कृति का विमोचन हिंदी भवन भोपाल में देश के चर्चित गीतकार/कवि/ सांसद मान. श्री बालकवि बैरागी जी के हस्ते विमोचित हुआ.

वर्धा के मित्र श्री नरेन्द्र ढंढारे जी ने "मारीशस यात्रा" का कार्यक्रम बनाया और मुझसे आग्रह किया कि मैं भी इस यात्रा में शामिल होऊँ. प्रख्यात लेखक गिरिराज किशोर जी ने मारीश्स की पृष्ठभूमि पर एक उपन्यास लिखा है "-पहला गिरमिटिया".जिसे मैं पढ़ चुका था और पढ़ने के बाद मानस बना कि कभी ऐसा मौका मिला, तो मैं एक बार मारीशस जरुर जाऊँगा. कल्पना वर्षों कल्पना ही बनी रही. लेकिन एक ऐसा सुअवसर भाई ढंढारे ने उपलब्ध करा दिया था, उसे मैं खोना नहीं चाहता था.

हिंदी भवन भोपाल में एक मिटिंग में मुझे जाना था. मिटिंग में मैंने अपनी ओर से एक लिखित प्रस्ताव दिया और उसमें उल्लेख किया कि हिंदी समिति वर्धा ने मारीशस की यात्रा का टूर प्रोग्राम बनाया है. यदि हिंदी भवन से हमें आर्थिक सहायता मिल जाए, तो हम कुछ हिंदी के संयोजक उस देश की यात्रा पर जा पाएँगे. प्रस्ताव स्वीकृत हुआ कि पांच संयोजकों को हिंदी भवन न्यास ने पच्चीस-पच्चीस हजार रुपया देना स्वीकार किया है. इसके साथ ही तीन शर्ते भी जोड़ दी गईं. पहली शर्त यह थी कि किसी भी सदस्य को नगद राशि नहीं मिलेगी. दूसरी शर्त यह थी कि जिनके पास-पासपोर्ट बन चुके होंगे, वे ही राशि पाने के हकदार होंगे. और तीसरी शर्त यह थी कि यात्रा से लौटने के बाद ही उक्त राशि उनके खाते में ट्रांसफ़र कर दी जाएगी. मेरा पासपोर्ट पहले ही बन चुका था. मुझे मिलाकर बुरहानपुर के मित्र श्री संतोष परिहार, खण्डवा के मित्र श्री शरद जी जैन, श्रीमती वीणा जैन, जबलपुर से श्री राजकुमार "सुमित्र" जी के नाम तय किए गए. किन्हीं कारणों से सुमित्र जी  अपना पासपोर्ट का  रिनिवल नहीं करवा पाए. अतः उनका जाना नहीं हो पाया. इस तरह हम चार मित्र मारीशस की यात्रा पर गये. मुझे जाता हुआ देखकर श्री नर्मदा प्रसाद कोरी ने भी तत्काल पासपोर्ट बनाया और हमारे साथ हो लिए.

मुझे यह बतलाते हुए अत्यन्त ही प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है कि मारीशस की यात्रा, मात्र यात्रा नहीं थी, बल्कि यह यात्रा मिनि भारत कहलाने वाले मारीशस की यात्रा थी. यहाँ आकर हमें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हम किसी पराए देश में आ गए हैं.

इस यात्रा के पड़ाव में मुझे अभिन्न मित्र के रूप में मारीशस के प्रख्यात उपन्यासकार/ लघुकथाकार श्री रामदेव धुंरंधर जी से  बड़ी आत्मीयता के साथ मुलाकात हुई.  साथ ही अनेक साहित्यकारों से भी मुलाकत हुई. उनसे मित्रवत व्यवहार आज भी कायम है. यहाँ से लौटकर मैंने मारीशस की यात्रा पर एक लंबा यात्रा-वृत्तांत भी लिखा है. मित्रता के इसी सिलसिले में आगे चलकर मैंने श्री धुरंधरजी का साक्षात्कार लिया है, जिसे कई पत्र-पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया है.

राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को और अधिक विस्तार देने के लिए हमने 23 मार्च 2008 को छिन्दवाड़ा की तहसील सौसर में समिति की एक शाखा की आधारशिला रखी. सुश्री अनु कामोने जी ने संयोजक का त्तथा साहित्य-सचिव का पदभार श्री एस.आर शेंदे जी ने ग्रहण किया. सौंसर शाखा का विधिवत उद्घाटन 23 जनवरी 2008 को हुआ था, इस दिन सुभाषचंद्र बोस की पावन जयन्ती थी. इसी तरह दादा श्री पंत जी अनुसंशा और सहमति पाकर मैंने कालान्तर में मुलताई, बैतुल, सिवनी,अमरवाड़ा, लोधीखेडा में रा.भा.प्र.समिति की इकाइयां खोली.

माह फ़रवरी मे 2008 को मुझे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की कर्मभूमि सेवाग्राम (वर्धा) जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ. यहाँ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा द्वारा दो दिवसीय कार्यक्रम अयोजित किया गया था. ":हम भारतीय अभियान" के अंतर्गत. देश-प्रदेश के अनेक गणमान्य तथा विदेशों से भी हिंदी प्रेमी उपस्थित हुए थे. संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मान.श्री मधुकर राव चौधरी जी ने हिंदी के उत्थान तथा उन्नयन के साथ-साथ देशप्रेम की भावनाओं से ओतप्रोत " सप्तपदी" का निर्माण किया था. इस सप्तपदी में वृक्षारोपण को भी शामिल किया गया था.

जैसा कि मैंने पूर्व में ही इस बात का उल्लेख किया है कि मुझे चित्रकारी का बहुत शौक रहा है. इस शौक के चलते मैं पोस्टकार्ड पर अपने मित्रों के जन्म-दिन पर कोई सुंदर-सा चित्र बनाकर उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित किया करता था. खासकर र्दीपावली के पावन अवसर पर एक प्रज्ज्वलित दीपक की आकृति बनाकर, करीब-करीब पांच सौ साहित्यकार मित्रों को शुभकामनाएं प्रेषित करता था. यह क्रम करीब बीस वर्षों से कुछ अधिक समय तक चलता रहा. फ़िर अन्य कारणॊं से मैंने ग्रिटींग-कार्ड बनाना बंद ही कर दिया था. दीपावली के दिन प्रख्यात गीतकार/ सांसद कवि बालकवि बैरागी जी का फ़ोन जरुर आता और वे कहते "गोवर्धन भाई...मुझे पता है कि तुमने ग्रिटींग कार्ड बनाना बंद जरुर कर दिया है, लेकिन मैंने तुम्हारे नाम दीपावली ग्रिटींग कार्ड डाक से लिख भेजा है." बैरागी जी का हस्त-लिखित अंतरदेशीय पत्र प्राप्त होता, जिसमें दीपावली पर मनभावन कविता लिखी होती. उनसे प्राप्त होने वाले सभी अंतरदेशीय पत्र आज भी मेरे पास, एक अमूल्य-निधि के रूप में सुरक्षित रखे हैं. भीलवाड़ा के मित्र श्री फ़तहसिंह लोढ़ाजी (यतीन्द्र साहित्य सदन) ने मेरे द्वारा भेजे गए ,कई वर्षों पुराने ग्रिटिंग कार्डों को अपने पास सुरक्षित रखा है.

मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मेरी रचनाधर्मिता का मूल्यांकन करते हुए करीब पैतीस साहित्यिक संस्थाओ ने मुझे सम्मानित किया है. हिंदी के उन्नयन और प्रचार प्रसार के लिए मैंने कई यात्राएं की हैं. चुंकि  घुम्मकड़ी मेरे स्वभाव में है. इसी के चलते मैंने भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक की यात्राएं की हैं. यात्रा के क्रम में थाईलैण्ड, मारीशस, इंडोनेशिया, मलेशिया, बाली, नेपाल, भुटान आदि देशों की यात्राएं की हैं. इसी घुम्मकड़ स्वभाव के चलते मेरी मुलाकत प्रो.श्री राजेश्वर अनादेव जी से हुई. चालिस देशों की यात्राएं आप कर चुके हैं. मेरा अपना मानना है कि इनके पैर एक जगह कभी नहीं टिकते. वे निरन्तर यात्रा में ही बने रहते हैं. इनके साथ भी मैंने अनेक यादगार यात्राएं की हैं.

रायपुर (छ.ग.) की यात्रा को मैं भुलाए नहीं भूल सकता. सृजनगाथा सम्मान मंच के संयोजक श्री जयप्रकाश मानस जी ने मेरे नाम एक पत्र लिखा. पत्र दिसंबर 2007 को लिखा गया था. पत्र में लिखा गया था कि रायपुर (छ.ग) में  दो दिवसीय कार्य्रक्रम 16-17 फ़रवरी 2008  को "अंतरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन- 2008" का आयोजन किया गया है, जिसमें मुझे सम्मानित किया जाएगा. पत्र पाकर प्रसन्नता तो बहुत हुई थी,लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि मानस जी से इससे पूर्व न तो कभी मुलाकात हुई थी और न ही कोई पत्र-व्यवहार ही हुआ था. वे मुझे कैसे जानते-पहिचानते हैं"?. ऐसे अनेक प्रश्न मेरा पीछा करते रहे. एक दिन मैंने उन्हें फ़ोन लगाया. बात हुई और मैने जानना चाहा कि मेरा चुनाव आपने किस आधार पर किया है?. इस समय वे फ़ोरव्हील ड्राईव कर रहे थे, मेरे प्रश्न के जवाब में उन्होंने इतना ही कहा कि अपने बेटे रजनीश से कहें कि वह कंप्युटर पर "सृजनगाथा डाट काम" खोले. सब पता चल जाएगा. मैंने "सृजनगाथा डाट काम" का पोर्टल खुलवाया. देखकर आश्चर्य हुआ कि मेरी दसों कहानियाँ उस पोर्टल पर दर्ज है. कहानियों के माध्यम से मुझे "मानस" एक जौहरी के रूप में मिले.

अपने साहित्यिक मित्र श्री राजेन्द्र यादवजी के साथ मैं रायपुर गया. देश-विदेश से अनेक रचनाधर्मियों का वहाँ मेला लगा हुआ था. यहाँ रहते हुए मेरा परिचय अनेक साहित्य-धर्मियों से हुआ. इस क्रम में "छतीसगढ़ समग्र के संपादक डा.श्री सुधीर शर्मा जी, नारी प्रधान पत्रिका "नारी का संबल" की संपादिका सुश्री शकुन्तला तरार, न्यु जर्सी अमेरिका की प्रख्यात लेखिका सुश्री देवी नागरानी जी, तथा युगीन काव्या पत्रिका के सम्पादक श्री हस्तीमल हस्ती  से अविस्मरणीय मुलाकातें हुई. इनकी पत्रिकाओं में मेरी कहानियां,लेख-आलेख समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.

सुश्री देवी नागरानीजी को मैंने अपना कहानी संग्रह-" तीस बरस घाटी" भेंट में दी थी. वे न्यु जर्सी अमेरिका से यहाँ पहुँची थीं. यहीं से उनसे मेरी मित्रता प्रगाढ़ हुई. मेरे कुछ कविताएँ, लघुकथाओं को आपने अपनी सिंधी भाषा में, न केवल अनुवाद किया बल्कि निकट भविष्य में उन्होंने अपने प्रकाशित होने वाले संग्रहों में उन्हें स्थान भी  दिया है. मैंने भी उनकी पाँच-छः कृतियों पर समीक्षा आलेख लिखे है. सुश्री देवीजी ने कंप्युटर के माध्यम से मेरा साक्षात्कार भी लिया है, जिसे यहाँ की कई पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया है. अभी हाल ही में आपका एक संग्रह-"तेरी मेरी बात" का प्रकाशन हुआ है, इस संग्रह में आपने मेरे एक आलेख को स्थान दिया है. वर्तमान समय में भी आपसे पत्र-व्यवहार बना हुआ है.

साहित्य सृजन की इस यात्रा में "युनाईटॆड किंगडम" की प्रख्यात कवयित्रि /कहानीकार तथा इंद्रजाल पत्रिका की संपादक सुश्री शैल अग्रवाल से आत्मीय परिचय हुआ. इन्द्रजाल पत्रिका "लेखनी" में मेरी रचनाएं अनवरत प्रकाशित हो रही हैं. दुबई से पूर्णिमा वर्मन जी से सौजन्य भेंट भोपाल में हुई थी. वे भी वहाँ से इन्द्रजाल पत्रिका " अभिव्यक्ति" का प्रकाशन कर रही हैं. कनाड़ा से सुश्री स्नेह ठाकुर, केनेड़ा से ही सुश्री सुधा ओम ढिंगरा से भी साहित्य-लेखन के माध्यम से परिचय हुआ. सुश्री शैलजी के दो कहानी संग्रह- "सुर-ताल" तथा " मेरी चयनित कहानियाँ" पर मैंने समीक्षा आलेख लिखे है. ब्रिटेन की प्रख्यात लेखिका सुश्री दिव्या माथुर जी का कहानी संग्रह -" पंगा तथा अन्य कहानियाँ", अमेरिका की सुश्री इला प्रसाद जी का कहानी संग्रह " "आधी अधूरी रोशनी का पूरा सच", सुश्री स्नेह ठाकुर जी के उपन्यास-"कैकेयी"-चेतना शिखा" उपन्यास मुझे मेल के माध्यम से प्राप्त हुए हैं. घनघोर व्यस्तताओं के चलते मैं अभी इन पुस्तकों पर समीक्षा आलेख नहीं लिख पाया. आशा है, इन पुस्तकों पर मैं शीघ्र ही समीक्षा-आलेख लिख लूँगा.

जीवन में सदा सुख-ही-सुख मिलेगा, यह जरुरी नहीं है. कभी दुःख की काली छाया के भीतर से भी प्रवेश करना होता है. सन् 2020 के माह अप्रैल की 27 तारीख को कुछ ऐसा ही दिन आया, जब मुझे मेरी जीवन-संगनी श्रीमती शकुन्तला से सदा-सदा के लिए विछोह की असह्य वेदना को झेलना पड़ा. शाम के चार बजे वे अनंत-यात्रा पर प्रस्थान कर गयीं. एक वसंत जो मेरे जीवन में आज से पचपन वर्ष पूर्व अवतरित हुआ था, बहुत दूर जा चुका था, फ़िर कभी वापिस न आने के लिए. अब पतझर का मौसम है. ईश्वर का विधान समझना नश्वर मनु‍ष्य के वश की बात नहीं है. उनकी मर्जी के आगे कभी किसी का वश नहीं चलता.

विछोह के इस पीड़ा-दायक पथरीले मार्ग पर चलते हुए मुझे इस बात पर, यह सोच कर संतो‍ष मिलता है कि भले ही आज वह आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके गाए गए गीत ,जिनकी रिकार्डिंग करके मैंने सुरक्षित रख लिया था, सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह, यहीं-कहीं आसपास है. आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले गीतों को सुनकर लगता है कि वह स्टूडियों में बैठीं रिकार्डिंग करवा रही होगी. कुछ विडियोज जो बच्चों के रिकार्ड कर रखे हैं, देखकर उनकी उपस्थिति का अहसास होने लगता है. वह मेरी बड़ी प्रेरणा-स्त्रोत रही हैं. यही कारण है कि मैं अपनी सृजन-धर्मिता का निर्वहन अच्छी तरह से कर पाया. दिव्य स्मृतियों को नमन.

उम्र के अठहत्तरवें ( 78) वर्ष में प्रवेश करते हुए मेरे दो कहानी संग्रह -" खुशियों वाली नदी" तथा " बेपर आवाजें" प्रकाशन के लिए प्रेस में हैं. पहले संग्रह "खुशियों वाली नदी "पर दिल्ली के मित्र श्री जगदीश व्योमजी तथा बड़ौदरा की कहानीकार श्रीमती रानु मुखर्जी, तथा "बेपर आवाजें" पर सिडनी (आस्ट्रेलिया) के प्रो. श्री राय कोकणा जी तथा रायपुर के प्रख्यात साहित्यकार- मित्र श्री जयप्रकाश रथ "मानस" भूमिका लिख रहे है. आशा है दोनों संग्रह फ़रवरी-मार्च तक प्रकाशित हो जायेंगे.

इन अठहत्तर (78) वर्षों की धूप-छांह, तो कभी मटमैले समय में, मैं जो कुछ भी लिख पाया, वह सब आपके सामने है. सब कुछ तो आसानी से लिखा जा सका, लेकिन "अपने समय को लिखते हुए" में मैंने जाना और महसूस किया कि कितना कठिन होता है, अपने स्वयं के बारे में लिखना.

समय के इस चक्र-चाल में यह जरुरी नहीं है कि आप कितना जिये. यहाँ जरुरी यह है कि आपने कितनी सार्थक जिंदगी जी. आपने इस समाज को क्या दिया? इस देश को क्या दिया?.आदमी के पैदा होने के साथ ही हमारे ऊपर मातृ-ऋण, पितृ ऋण, समाज और देश का ऋण होता है, आपने अब तक कितने ऋणों की भरपाई की?.

मैं जानता हूँ कि इस सेतु-बंध में मेरी भूमिका वीर हनुमान तथा कुशल इंजिनियरों- नल-नील की-सी भले ही नहीं रही हो. लेकिन मैं सदा से ही अपनी उपस्थिति, उस गिलहरी के तरह पाता हूँ, जो अपने शरीर को पानी में भिंगोती, रेत में लोट-पोट होती और शरीर से लिपटी रेत के कणॊं को समुद्र में डुबकी लगाकर छोड़ आती थी. इस छोटे-से जीव के रूप में मैं जो कर पाया, यह मेरे लिए परम संतोष एवं आत्म-संतुष्टि के लिए पर्याप्त है.

अंत में मैं यह बताने से भी अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूँ कि मैं अब भी सब कुछ नहीं जानता और यही न जानना मुझमें अनंत-स्फ़ूर्ति भर देता है. मैं यह तो नहीं जानता कि जो बातें मेरे लिए बेहद जरुरी और महत्वपूर्ण थीं और हैं.उसे लिखना मेरे लिए बहुत जरुरी था. मेरे अंतस में उठते उद्गार भले ही अत्यन्त साधारण प्रतीत लगते हों, लेकिन उनमें अभिमान/अहं का भाव नाम मात्र को भी नहीं है.

मैं क्षमा प्रार्थी हूँ. क्षमा प्रार्थी इसलिए कि मैंने अपने बारे में कुछ ज्यादा ही लिख दिया है, यदि नहीं लिख पाता तो शायद बात अधुरी रहती.

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72.

                                                          वनगमन- यात्रा का ही पर्याय है.

 

"वनगमन"दरअसल यात्रा का ही पर्याय है. घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर प्रकृति के अनूठे सौंदर्य के दर्शन करना. खिलतामौसम, खिलखिलाता जीवन, नदियों का गूंजता स्वर, पहाड़ियों का एकांत, समुद्र की पछाड़, दमकता सूरज, घने वनपठारों का विस्तार, कितने ही रंग और रूप बदलते आसमान के नीचे, कितने ही रुपों में बसता लोक-जीवन, जहाँ सभी ओर प्रकृति का अनूठा राग बज रहा होता है, देखने और समझने का अवसर प्रदान करता है. यदि माता कैकेई राम को वन जाने का आदेश नहीं देतीं, तो शायद ही राम प्रकृति से इतना घनिष्ठ तादात्म्य स्थापित कर पाते.

"वनगमन"का तात्पर्य तो देश को जानना भी है. इसका मतलब देश की ऊर्जा और उस जीवनशक्ति को जानना है, पहचानना है, जो हजारों साल से सकारात्मक रुप से रची-बसी थी.लेकिन किन्हीं कारणॊं से वह नकारात्मकता से घिर गई थी. राम को वनगमन का आदेश देने के पीछे माता कैकेई की दूरदृष्टि का ही सुपरिणाम था कि वे शोषित-पीढ़ित और वंचितजनों की आवाज सुन पाए. उनके दुःख दूर कर पाए और उन्हेंघोर निराशा के अंधकार से बाहरनिकाल पाए. अगर माता कैकेई राम को वन नहीं भेजतीं तो, राम केवल जीवन भर के लिएअयोध्या के शासकभर बने रहते. वे राम के शौर्य को, उनके पराक्रम को जानती थीं. वे जानती थीं कि राम ही एक ऐसा अकेला व्यक्ति है, जो रावण-राज के अस्तित्व को सदा-सदा के लिए मिटा सकता है.

"वनगमन"एक अन्य अर्थ में ऊर्जा का "विस्फ़ोट"होना भी हुआ. अपनी यात्रा के समय जो व्यक्ति,राग-द्वे‍षसे जितना दूर होगा,  उतना ही उसके चेहरे पर प्रसन्नता का भाव आएगा.

यात्रा एक आंतरिक संतुलन भीस्थापित करती है और जब वह स्थापित हो जाती है,तो सारी आंतरिक शक्तियाँ जागृत होकर बाहर आने को छटपटाने लगती हैं. इस असाधारण विस्फ़ोट को हम अद्भुत चमत्कार, अलौकिक या फ़िर जादू जैसा नाम भी दे सकते हैं.

"वनगमन"- एक मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक और अध्यात्म से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है. जब हमारी अपनी मूल प्रकृति पर हमारा आधिपत्य होने लगता है तो एक विलक्षण सृजनात्मकता का उदय होता है. इस तरह श्रीराम अपनी मूल प्रकृति तक पहुँचे.

राम किस तरह निखरेंगे, वेकिस तरह वे अपनी स्वभाविक प्रवृत्ति से जन-नायक बनेंगे,कैकेईजी बखूबी जानतीथीं. यही कारण थे कि वे जन-नायक कहलाए. इसका सारा श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह केवल माता कैकेई जीको हीजाता है.

वे स्वयं क्षत्राणी थीं. वे कई बार महाराज दशरथ जी के साथ युद्ध के मैदान में गईं थीं. एक कुशल रथ संचालनसे लेकर,शस्त्र चलाने में भीवे पारंगत थी. इतना ही नहीं, वे राजकाज के संचालन में सहयोगी तो थी ही थी. लेकिन उनकी दूरदृष्टि समूचे आर्यावृत्त पर भी टिकी रहतीथी. युद्ध के मैदान में उन्होंने अनेक दानवों को मार गिराया था, लेकिन समूल नष्ट नहीं कर पायी थीं. इसका दुःख तो उन्हें बराबर बना रहा. वे बराबर इस प्रयास में निरत रहती थीं कि भारत की संस्कृति को, भारत के सनातन धर्म को कैसे बचाया जा सकता है?. उनकी पारखी नजरों ने राम को पहचान लिया था. अपना सुख, वैभव यहाँ तक कि अपने सुहाग को भी दांव पर लगाकर, उन्होंने राम को वन जाने की आज्ञा दीथी. चौदह बरस का बननास तो दिया ही दिया,साथ में एक कड़ी शर्त औरजोड़ दी कि राम को इस चौदह वरस की अवधि में "विशेष उदासी"बन कर रहना होगा.

इस "विशेष उदासी"के पीछे गहरा भाव यह था कि राम,किसी भी गाँव या नगर में प्रवेश नहीं करेंगे., संकेत स्पष्ट है कि उस समय भी अनेक राजा-महाराजा तो रहे ही होंगे, लेकिन किसी ने भी रावण के बढ़ते अत्याचार के विरुद्ध,न तो आवाज उठाई और न ही शस्त्र. वे कदापि नहीं चाहती थीं कि ऐसे अकर्मण्य़ राजाओं का साथ राम को लेना पड़े..अतः उसे स्वयं की शक्ति अर्जित करनी होगी और रावण-राज को समूल नष्ट करके,अयोध्या की गौरव-गाथा का गान अमर करना होगा..

वे राम के व्यक्तित्व से संसार को परिचित करवाना चाहती थीं. वे जानती थीं कि व्यक्तित्व के गढ़ने का प्राकृतिक नियम है प्रकृति के बीच जाकर, वहाँ संघर्ष करके, जूझकर अपने व्यक्तित्व को गढ़ना. रामजी ने अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में जाकर अल्पकाल में सारी विद्याएं प्राप्त कर ली थीं. ज्ञान तो मिल गया था, लेकिन व्यक्तित्व नहीं बन पाया था. राम स्वयं इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते थे कि ज्ञान के बल पर राज्य तो चलाया जा सकता है, लेकिन उसे बनाया या बचाया नहीं जा सकता.

राम का व्यक्तित्व संघर्षशील है.श्रम-प्रधान है. इसीलिए उनका रंग सांवला है. उनकी देह महलों के सुरक्षित और सुगंधित वातावरण में नहीं पनपती. वह प्रकृति के खुले में बरसात की बूंदों का आघात सहती हैंऔर सब सह-सहकर ही अपना निर्माण करती है. माथे पर आयी पसीने की बूंदे,जहाँ अभिनंदनीय है, पूज्यनीय हैं वहीं वे सामंतीय चेतना के खिलाफ़ विद्रोह का शंखनाद भी है. उस सामंतीय चेतना के विरुद्ध, जो श्रम को दुत्कार कर, विश्राम को महिमा-मंडित करती है.

जब विश्वामित्र जी आकर दशरथ जी से राम और लक्ष्मण को मांगते हैं तो पिता के कहने पर राम चल देते हैं. यह भविष्य के चौदह वर्ष के वनवास की पूर्व कीतैयारी थी.उसका पूर्वाभ्यास था. उन्होंने पिता की आज्ञा मानी और चुपचाप चल दिए. लेकिन बाद के वर्षों में वे वनवास क्यों गए? क्या उन्हें पिता ने आज्ञा दी थी?. नहीं. पिता ने तो वनगमन के लिए कहा ही नहीं था. केवल माता कैकेई के वचनों को उन्होंने पिता की आज्ञा मानी और वन जाने का निश्चय कर लिया.

"वनगमन"एक अर्थ में इस बात की प्रत्याभूति (गारंटी)भी था कि राम,न सिर्फ़ उन आक्रमणकारी दानवों से ऋषि, मुनियों, तपस्वियों के प्राणॊं को बचाएंगे, जो घने जंगलों के बीच रहकर, न केवलयज्ञादि करते हैं अपितु शस्त्र और शास्त्र का निर्माण भीकर रहे होते हैं, जिन्हें दानव आकर नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे.. वे कोई साधारण ‍ऋषि-मुनि नहीं थे,बल्कि एक असाधारण वैज्ञानिक भी थे. "वनगमन"के बाद राम उन तक पहुँचे. वहाँ पहुँचकरवह केवल ज्ञान ही अर्जित नहीं करेंगे, बल्कि शस्त्रों से भी परिचित होतेचलेंगेऔररावण कीसत्ता को चुनौतीदेंगे..

"वनगमन"एक साधारण घटना मात्र नहीं है. यह घटना एक शासक के द्वारा, एक राजकुमार को दिए गए आदेश से जुड़ी हुई है,न कि एक पिता के द्वारा एक पुत्र को दिए गए आदेश से. इस घटना से स्पष्ट है कि राजा ने वन-गमनके आदेश पर अपने हस्ताक्षर किए ही नहीं थे,तो फ़िर आदेश का पालन करने का प्रश्न ही नहीं उठता था, लेकिन राम ने उसे आदेश मान लिया, जबकि वह था ही नहीं. जब उन्होंने अपना उद्देश्य निर्धारित कर लिया, तो उस उद्देश्य को पाने के लिए उन्होंने निर्ममता तथा अवज्ञा की सीमा से परे जाने में संकोच भी नहीं किया. वे स्वयं भी जानते थे कि वन जाने के बाद, पिता शायद ही जीवित रहेंगे. उनकी तीनों माताएं विधवा हो जाएंगी.

कैकेई जी भी स्वयं जानती थी कि उनके इस निर्णय से अयोध्या में भूचाल आ जाएगा. राम के वन जाते ही उन्हें वैधव्य जैसे आघात को सहना पड़ेगा. पता नहीं,लोगउनके विरुद्ध कितनी ही बाते बनाएंगे. कोई उन्हें घरफ़ोडू, कोई खलनायिका जैसे संबोधनों से संबोधित करेगा.सगा बेटा घृणा की दॄष्टि से देखेगा और तो और, निकट भविष्य में कोई परिवार, अपनी बेटियों का नाम "कैकेई"रखना पसंद करेगा. इतनासब कुछ जानने और समझने के बाद भी,वे अपने निर्णय पर अडिग रहती हैं और राम को वन जाने को कहती हैं. यदि वे राम को वन नहीं भेजतीं तो,रामकेवल राम ही बने रहते.एक शासक से बढ़कर और कुछ भी नहीं हो सकते थे.लेकिन विमाता कैकेई ने उन्हें अयोध्या की सीमा से निकालकर,समूचे आर्यावर्त के घरों-घर तक पहुँचादिया.

खलनायिकाएँकेवल घर के दो टुकड़े करवा सकती है. मन-मुटाव पैदा करवा सकती हैं. वे कभी भी ऐसा अद्भुत इतिहास सृजित नहीं कर सकतीं. अतः माता कैकेई को खलनायिका कहकर उनकाअपमान नहीं किया जा सकता.

राम कथा पर "रामायण"तीन सौ से लेकर एक हजार तक की संख्या में विविध रुपों में लिखी जा चुकी है, जिसमें वाल्मीकि रामायण सबसे प्राचीन मानी जाती है. इस गौरव ग्रंथ के कारण वे दुनिया के आदि कवि माने जाते हैं. राम कथाएं अन्य  भारतीय भाषाओं में लिखी गयी हैं. हिंदी में 11,  मराठी में 8, बांगला में 25,  तमिल में 12,  तेलुगु में 12, तथा उड़िया मे 6रामायणें मिलती हैं. लेकिन अवधि (हिंदी)में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत "रामचरित मानस"ने अपना विशेष स्थान बनाया है. कई देशों के अलावा अन्य कई भाषाओं में राम कथाएं लिखीं गईं हैं. इनके अलावा और भी रामायणेंलिखी गई हैं, लेकिन अब तक 28की ही खोज की जा सकी हैं.

"वनगमन उपन्यास"में मैने कुछ प्रयोग भी किए हैं.. जैसे कि महाराज दशरथजी का कानों के पास सफ़ेद हो चुके बालों को देखना और रामजी के राज्याभिषेक करने का निर्णय लेना. निर्णय लेने से पूर्व वे अपने चारों बेटों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं. (२)श्रीराम और सीता माता द्वारा एक "आभासीय दुनिया"का निर्माण करते हुए माता कैकेई जी के पास जाना और महाराज दशरथजी से दो वर मांगने का अनुरोध करना. (३) एक जनश्रुति के अनुसार- महाराज दशरथजी का अचानक सामना बाली से होता है और वह उन्हें युद्ध के लिए ललकारता है.बाली को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था कि उसे सामने वाले की आधी शक्ति प्राप्त हो जाएगी. घनघोर युद्ध के बाद महाराज की हार होती है.युद्धजीतने पर बाली ने दो विचित्र शर्त रखी कि वे रघुकुल की शान यानि अपना मुकुट मेरे सामने रख जाएं या फ़िर कैकेई को छोड़ जाएं.अंततोगत्वामहाराजअपना मुकुट विजेता बाली को सौंप देते है.

चुंकि रानी कैकेई जी भी एक वीर योद्धा थीं,.किसी भी वीर योद्धा को यह कैसे सुहाता कि उन्हें मुकुट छॊड़कर आना पड़े. उन्हें बहुत दुःख हुआ कि रघुकुल का गौरव मुकुट उनके बदले रख छोड़ा गया है. उन्हें मुकुट को वापस लाने की चिंता हर समय लगी रहती थी. इसलिए भी उन्होंने रामजी के राजतिलक के समय रामजी के लिए वनवास मांगा था. उन्होंने श्रीरामजी से कहा था- तुम्हें उस मुकुट को लेकर आना होगा. मैं उसी मुकुट से तुम्हारा राजतिलक करूँगी.

उपरोक्त तीनों प्रसंग उपन्यास को और अधिक रोचक बनाने में सहायक बन पड़े हैं. ऐसा मेरा अपना मानना है.

रामजीअसीमित शक्तिशाली, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ जैसे दिव्य गुणॊं की खान हैं. मैं, न तो बुद्धि के बल पर, न ही चेतना के स्तर पर और न ही स्तुति के सहारे आपकी त्रिगुणात्मक शक्तियों को समग्रता के साथ समझ पाने में समर्थ हूँ. फ़िर भी मैं आपके द्वारा निर्मित मायावी संसार में आपके दर्शन के लिए तीर्थयात्राएं करता हूँ.

आप सर्वत्र उपलब्ध हैं, आप चेतना और ध्यान से परे है फ़िर भी मैं आपका ध्यान करता हूँ. आप शब्दों में नहीं बांधे जा सकते फ़िर भी मैं  आपके गुणॊं का वर्णन करता हूँ. मेरेप्रयासों से हुए इन तीनों अपराधों को कृपया करके क्षमा करेंगे ऐसी मेरी विनम्र प्रार्थना है.         

उपन्यास लेखन के इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए मेरा प्रयास रहेगा कि अगला उपन्यास जो दण्डकारण्य में रामनाम से प्रकाशित होगा.

मेरा अपना मानना है कि वनगमन से पूर्व उनके पास कोई रोडमैपनहीं था और न ही कोई पथ-प्रदर्शक. वे किसी एक ऋ‌षि या मुनि के पास जाते, और वे उन्हें किसी अन्य के पास जाने का परामर्श देते हैं. इस तरह उनकी यात्रा अनवरत जारी रहती है.

यात्रा के पड़ाव पर मिलने वाले ऋ‌षि या मुनि के नामों का उल्लेख तो हमें पढ़ने को मिलता है,लेकिन उनका न तो कोई परिचय मिलता है और न ही विस्तार से जानकारी. मेरी सतत कोशिश रहेगी कि मैं उनका परिचय देता चलूं.

हरि अनंत हरि कथा अनंता

रामजी एक हैं लेकिन उनकी कथाएं अनंत है. आपकी महति कृपा से मैंने अपने प्रथम उपन्यास वनगमनलिखने का सायास प्रयास किया है. मैं नहीं जानता कि इसमें मैं कितना सफ़ल हो पाया हूँ?. जो कुछ भी मैं लिख पाया हूँ. यह सब आपकी ही कृपा और आशीर्वाद का सुफ़ल है.

मेरे इस उपन्यास लेखन में मित्र (प्रो).श्री राजेश्वर अनादेव, श्री सुरेन्द्र वर्मा, श्री लक्ष्मण प्रसाद डेहरिया तथा श्री रणजीत सिंह परिहार का अथक सहयोग प्राप्त हुआ है. मैं आप तीनों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ.

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           गोवर्धन .

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73.                                    वनगमन- मेरी नजरों में

श्री गोवर्धन यादव 78 वर्षीय ऐसे कलमधर्मी हैं, जो अपनी ताजगी के जरिये हमेशा अपने पाठकों को तरोताजा बनाए रखने के लिए अपनी रचनाओं के "चयवनप्राश" का प्राशान करवाते रहते हैं.

हम-आप भली भांति जानते हैं, च्यवनप्राश की शक्तिवर्द्धता पुरानी जड़ी-बुटियों से ही मिलती है, इसीलिए इस बार यह ऊर्जा और शक्ति-प्रदाता औषधी "उपन्यास" के कलेवर में हमें परोसी गयी है. कथानक हमारी चिरंजीव नित्य-प्रेरक "रामकथा" है. पर रामकथा ही क्यों?

सदियों से कही जा रही इस "रामकथा" में चरित्र वे ही होते हैं, परन्तु तत्कालीन समय की अस्त-व्यस्तताओं की मांग मार्गदर्शी पैमानों के लिए गुजरी सदियों से नितांत भिन्न हुआ करती है. बाबा तुलसी का अभिप्रेत यानी इरादा या नीयत, उस समय के बिखराव को समेटने के लिए "रामराज्य" था, एक न्यायपूर्ण सुसंगत "सुशासन". ज्यादा दूर क्यों देखें?, पिछली बीसवीं शताब्दी में मैथिली शरण गुप्त के महाकाव्य  के केन्द्रीय चरित्र उर्मिला और कैकेई थे. इन चरित्रों ने तत्कालीन नारी-विमर्श को नयी दृष्टि दी. आचार्य चतुरसेन के "वयं रक्षामः" ने रावण के माध्यम से प्रतिभा का खलनायक में रुपांतरण, तो नरेन्द्र कोहली साहब ने रामकथा की श्रृंखला से राम को तत्कालीन सन्दर्भ में जन-नायक बनाकर सामान्य-जन की आवश्यकताओं के अनुरूप खड़ा किया.

इक्कीसवीं सदी में राम के माध्यम से तीन औपन्यासिक-सृजन विमर्श में उपस्थित हुए हैं. तीनों के प्रस्थान बिंदु क्रमशः परंपरा के "अतीत, वर्तमान और संभावना" हैं.

मैं "संभावना" से  शुरु करता हूँ.  संभावना से मेरा तात्पर्य भविष्य-भाव से भी एक हद तक है. बहुत-चर्चित, बहु-पठनीय अमीश त्रिवेदी की कलम से अंग्रेजी और हिंदी में रामकथा के पात्रों पर उपन्यासों की ऐसी श्रृंखला हैं, जिसमे कथा लेखन की अद्भुत लेखकीय स्वतंत्रता से परिचय होता है. कथानक में विश्वामित्र एक पात्र और विदुर एक पूर्वकालिक विचारक की तरह प्रस्तुत हैं. आशय यही है कि वेद-उपनिषद-पुराण के चरित्र उसी समय के नहीं हैं, जैसा हम मान बैठे हैं, बल्कि पूर्व स्थापित विचार-पीठों के उत्तराधिकारी हैं, जो सार्वकालिक होने का आभास रोचक और ठोस ढंग से पाठकों में पैदा करते हैं. वर्तमान की दृष्टि से ख्यात फ़िल्म अभिनेता, कवि, लेखक आशुतोष राना के हिंदी उपन्यास के विमर्श में शीर्ष पर "रामराज्य" है. रामराज्य में हमारे वर्तमान की मांग के अनुकूल पात्रों की गरिमा का विस्तार है. जैसे  शूर्पणखा की लक्ष्मण द्वारा नाक काटे जाने की घटना को उसका अपना "प्रपंच" करार दिया गया है, क्योंकि लक्ष्मण जैसे  सुसंस्कृत व्यक्ति द्वारा किसी दुष्ट स्त्री का वध तो संभव है, परन्तु नासिका जैसा असभ्य भीरुतापूर्ण बिलकुल संभव नहीं है. राम लक्ष्मण को सर्वकालिक गरिमा देने में लेखक सफ़ल हुए हैं. अतीत को अपने अंदाज, अपनी भाव-भंगिमा में लेकर अतीत की अर्थपूर्ण तारतम्यता की ताकतवर मौजूदगी "वनगमन" में दर्ज करवा रहे हैं- " गोवर्धन यादव".

वनगमन की प्रस्तुति में कैकेयी प्रसंग कई बातों को उजागर करता है- सच्चा अभिजात्य, ज्ञानमय शालीनता, स्त्री-पुरुष का समभाव. घटना है- राम सीता का  एक साथ जाकर मां कैकेई को "वनगमन" के लिए अनुनय-विनय से पिता दशरथ से राजाज्ञा हासिल करना. इस प्रसंग के सारे पात्र अभिजात्य के वे कुलीन पात्र नहीं हैं, जो शासन की सत्ता में, उस मुठ्ठीभर श्रेष्ठिवर्ग के हितपोषण को सत्ता का अभीष्ट बनाते हैं, बल्कि जन-साधारण को, हर तरह के अन्याय, तिरस्कार और उत्पीड़न से मुक्ति के लिए सत्ता से बाहर रहकर भी सार्थक कर्म करना जानते हैं. इन पात्रों की शालीनता, भद्रता के रुढ़िवाचक कायदों से बंधी हुई नहीं है. स्त्री-पुरुष का समभाव ओठों का विलास नहीं है.

पुस्तक में वर्तमान एक अनोखे ढंग से प्रवेश करता है. कैकेई को वनगमन की आज्ञा का प्रभावी माध्यम बनाने का निर्णय अकेले राम का नहीं , बल्कि सीता उसमें बराबरी से भागीदार है. यह नारी विमर्श की मुँहतोड़ जवाब इसलिए है कि नारी का बराबरी का दर्जा सिर्फ़ सुविधा केन्द्रीत नहीं होता, वरन असुविधाओं, चुनौतियों और लोक-कल्याण की चिंताओं व समाधानों में भी बराबरी का हक अपेक्षित है. सीता के साथ राम द्वारा माँ कैकेई से मंत्रणा लेखक की नवोन्मेषी समीचीन आधुनिक मनोभूमि का प्रमाण है और जो अन्य लेखकों से इन्हें अलग रखता है. राजाज्ञा के लिए कैकेई के चरित्र के स्त्री-हठ का सामाजिक मानसिकता का संकुचन मिथक तोड़ना, लेखक का साहसी प्रयास है, ऐसा प्रयत्न आशुतोष राना का भी है, पर गोवर्धन यादव का यह यत्न इसे अधिक विश्वसनीय इसलिए बना देता है कि ‍किष्किन्धा नरेश बालि और दशरथ के युद्ध में पराजित दशरथ का मान-मर्दन हुआ था. इस क्षेपक में बालि ने दो शर्तें रखीं थीं.-या तो कैकेई को उसके सुपुर्द किया जाए या राजसी मुकुट उसके हवाले किया जाए. दशरथ ने राजमुकुट कैकेई पर न्योछावर कर दिया. इस अपमानजनक पीड़ा में राम को भागीदार बनाना कैकेई की वनगमन सहमति को नारी सुलभ व्यवहारिकता प्रदान करता है, यह सह-कथा पाठकों का भरोसा जीतती है.

उपर्युक्त लेखक-त्रय की भावमयता की टंकार पाठकों में अलग-अलग ध्वनि आंदोलित करती है. एक रुपक से अपनी बात कहूं तो एक बाल्टी में  पेंदी से ऊपर एक चौथाई से काफ़ी कम जमा पानी की कल्पना कीजिए. अब उसमें नल की मध्यम तीव्रता की स्थित गति पर धार छोड़िए. पानी को हल्का हिला कर आवाज सुनिए. यह दोनों पानी की टकराहट वाली आवाज मधुर है, जो चित्त को शांत करेगी. यह गोवर्धन यादव का चितचन्दन है. बाल्टी के पानी को जोर से हिलाइए, सुनिए- यह अमीश त्रिवेदी का मनखंजन है यानी मन का उत्खननन. कहने का मतलब बाल्टी में हिलता पानी समाज की मनोदशा है. तीनों लेखकों ने वर्तमान समाज की अपनी भांपी हुई बेचैनी को अपनी-अपनी बुनावट दी है.

अमीश त्रिवेदी और आशुरोष राना की भारतीय बुनावट से गोवर्धन यादव का तानाबाना इसलिए भी अलग है कि इनका राम भारतीय उपमहाद्विपीय राम है. थाईलैंड, मारिशस, इंडोनेशिया, मलेशिया, भूटान और नेपाल की यात्राओं में वहाँ के जनमानस में बैठे राम से भी उतनी ही घनिष्ठता है, जितनी जन्मभूमि के राम में आत्मीयता है. यह उपमहाद्विपीय राम उन देशों की परंपरा और स्थानीय पारंपरिक राम का "फ़्यूजन" है. मारिशस कवि अभिमन्यु "अनत" की कविता है- " खून की बूंदे गिरीं / पानी में / पानी खून न हुआ / खून पानी हो गया". वैसे ही मैं कहूँगा- "स्याही के छीटें गिरे / राम में / राम स्याही न हुए / स्याही राम हो गयी".

इस पुस्तक के विन्यास में एक विलक्षण उल्लेखनीय बात पाता हूँ कि इसको पढ़ते हुए सरकती, गुजरती दृष्यावली में पाठक एक सफ़र में है, जहाँ उसका हमसफ़र लेखक है. ऐसा इसलिए होता है कि पृष्ठभूमि का नामजद उल्लेख इसे कभी यात्रा-वृत्तांत, तो कभी पात्रों की मनोदशा के भावेगमय वर्णन को पाठकों की अमिट स्मृतियों में बदलकर उसे "यात्रा-संस्मरण" के तौर पर कीलित करता है. यह व्याकरण के " वृत्तांत" और "संस्मरण" के शास्त्रीय अंतर का भाषायी मिश्रण नहीं, रोचक यौगिक है. यह निश्चित ही लेखक की घुमक्कड़ी का सार्थक परिणाम है.

पात्रों के अंतर्द्वंद्व पाठको को वर्तमान में अपनी पारिवारिक  विनमता यानि मनमुटाव सरीखे लगते है, जो कलेवर को प्रासंगिक बनाते हैं. लेखक की बिनाई (विजन) को उस आक्षेप से भी बचा ले जाते हैं कि पौराणिक कथ्य से समीचीनता के विग्रह (संघर्ष) की प्रस्तुति में सदा अतीत का मूल्य-बोध ही पैमाना बनता है.

यह उपन्यास सादी भाषा में तमाम पौराणिक प्रतीकों की दुर्गमताओं को समतल करते हुए "रामकथा " के मार्मिक अध्याय "वनगमन" की हृदयस्पर्शिता को हमारे भीतर जगा पाने में शत-प्रतिशत सफ़ल होता है. अर्थात अपना आखर-आखर संप्रेषित करता है, प्रकारांतर में पाठक का पुनीत कथा-स्नान हो जाता है. 

इसी श्रृंखला में शेष रामकथा के पटन का लालच भी सर उठा रहा है. गोवर्धन यादव जी से विनम्र आग्रह है कि हमारे चटोरेपन को शांत करने का उद्यम जारी रखेंगे.

 

भोपाल- 17-08-2022                                                                                  लक्ष्मीकांत जवणे

पी.टी.5, फ़ार्च्यून एन्क्लेव, कोलार रोड, भोपाल (462042)                                                                          

9993622228, 798937913                                                                                                                 

laxmikantjawney@gmail.com    

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74                       लोक व्यवहार में राम एवं विविध निबंध.

                                                                                                                       

मित्र श्री सुरेन्द्र वर्मा किसी अतिरिक्त परिचय के मोहताज नहीं है. आप नीतिवान, निष्ठावान शिक्षक रहे हैं जिन्होंने सदा से ही अनैतिकता के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की है. शिक्षक के पद पर रहते हुए आपने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं और प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात भी अपनी कलम का लोहा मनवाते आ रहे हैं. आप एक अच्छे अध्येता के लिए जाने जाते हैं. समय की चाल के अनुरुप जब-अब आपको अपनी बात मुखर करना होता है तो आप  "शेरों-शायरी " को बखूबी प्रयोग में लाते हैं.

आपका पहला खण्ड-काव्य "ऎषा पंचवटी" अभी हाल में दिल्ली के साहित्यभूमि प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है. पंचवटी में घटित होने वाले प्रसंगों को आपने सूक्षमता के साथ उकेरा है, जिसे पढ़कर पाठक के मन में जहाँ उत्सुकता जाग्रत होती है, वहीं वह अतिरेक आनंद में खोता चला जाता है. इस खण्ड काव्य में कुल चार सौ से अधिक चतुष्पदियां हैं, इसे पढ़कर लेखक/कवि के आत्मजगत को पहचाना जा सकता है. नए विचारों की प्रतिस्थापना और उन विचारों को गहनता प्रदान करना, इस सिद्धहस्त कवि की अपनी विशेशता है.

साहित्यभूमि प्रकाशन दिल्ली से उनका दूसरा संग्रह " लोक व्यवहार में राम तथा विविध निबंध" शीघ्र ही प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुँचेगा. निबंध-कला में विशेष दक्षता रखने वाले  लेखक ने हिंदी के विशेष योगदान से लेकर प्रख्यात कवियों- यथा- मैथिलीशरण गुप्त, मुक्तिबोध, राम, रहीम, शेक्सपीयर से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों- सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, डा. राजेन्द्रप्रसाद, वीर सावरकर जी के सहित महर्षि अरविन्द, शंकराचार्य, स्वामी रामतीर्थ, तुलसी, महा कवि भवभूति, कालीदास पर ओजस्वी निबन्ध लिखे हैं. साथ ही आपने भारत के पावन तीज-त्योहार एवं पर्वों पर भी विद्ववत्तापूर्ण निबंध लिखे हैं.

"लोक व्यवहार में राम" - विषय में जाने से पूर्व "लोक"को जानना अति आवश्यक है. लोक का शाब्दिक अर्थ "संसार" प्रतिध्वनित होता है. एक ऐसा लोक जिसमें मनुष्य समाज का वह अभिजात्य वर्ग है, जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और  पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित है. "लोक"  शब्द आधुनिक काल में महत्त्वपूर्ण विमर्श का आधार रहा है., क्योंकि उसका संबंध संस्कृति एवं परंपरा से है. लोक शब्द वास्तव में अंग्रेजी के "फ़ोक" का पर्याय है जो नगर तथा ग्राम की समस्त साधारण जन का द्योतक है. आचार्य हजारी प्रसाद के अनुसार-"लोक" शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम नहीं है.

इस लोक में रहते हुए प्रभु श्रीराम जानते थे कि किसके साथ कैसा व्यवहार हो. गुरु से, माता-पिता से, भाई से, मित्र से, यहाँ तक की अपने शत्रु से भी उनका व्यवहार अनुकरणीय है. इसीलिए कहा जाता है कि "रामकथा" लोक व्यवहार की आचार संहिता है. "रामकथा" विविध मानव संबंधों और आदर्शों की कथा है. यही इसके लोकजीवन में समाहित होने का रहस्य है. विविध मानव संबंधों का सजीव, साकार एवं सक्रीय रूप ही लोक जीवन है. ऐसी दशा में लोकजीवन में रामकथा की परिव्याप्ति सहज और स्वाभाविक है. रामकथा से बढ़कर जीवन्त परम्परा और क्या हो सकती है?.

मनुष्य के बालकाल, युवावस्था एवं वृद्धावस्था के कार्यकलाप रामकथा में विद्यमान है. पारिवारिक जीवन का मोह-ममत्व, ईर्ष्या-द्वेष, छल-प्रपंच, विवशताएं एवं उलझने, आंतरिक भावनाओं के द्वंद्व एवं संघर्ष ,विक्षोभ, धैर्य,चातुर्य, शील, निष्ठा, विश्वास,समर्पण, दृढ़ता, वात्सल्य, सुकुमारता, कर्कशता, त्याग, एवं सहनशीलता राम कथा की जीवन-धारा में लहरों की भांति तरंगित होते रहते हैं. ठीक इसी प्रकार जीवन के विविध स्पन्दन एवं लोक-जीवन की अशेष संवेदनाएं रामकथा में स्थान पाती हैं. यह जीवन की मार्मिक कथा भी है, यथार्थ की भूमि भी है और आदर्श का आकाश भी.

लोकजीवन  के चार प्रमुख आधार स्तंभ है- (१) निजी वैयक्तिक जीवन (२) पारिवारिक संबंधो का जीवन (३) सामाजिक व्यवहारों का जीवन और (४) राष्ट्रीय कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का जीवन. रामकथा में सभी पक्ष उज्ज्वल स्वरूप में उभर कर सामने आते हैं.

प्रभु श्री रामजी लोक व्यवहार में कुशलता प्राप्त हैं. महाराज दशरथ रामजी के राज्याभिषेक की विधिवत घोषणा करते हैं, जब यह बात उन्हें पता चलती है तो बजाय प्रसन्न होने के उनके मन में विस्मय होता है-

 

                             जनमे एक संग सब भाई: भोजन सयन केलि लरिकाई                                                                                                                   करनबेध उपबीत विआहा: संग संग सब भए उछाहा                                                                                                                    विमल बंस यहु अनुचित एकू: बंधु बिहाई बड़ेहि अभिषेकू                                                                                                                 प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई : हरउ भगत मन कै कुटुलाई.

कि मुझे ही क्यों राजा बनाया जा रहा है, जबकि हम सब भाइयों का जन्म, खान-पान, रहन-सहन, कर्णछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह एक साथ हुआ, फ़िर अन्य भ्राताओं को छोड़कर मेरे अकेले का राज्याभिषेक होने जा रहा है. रघुंवंश कि यह अनुचित प्रथा है. अपने अनुजों के प्रति कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए, रामजी इसे भली-भांति जानते थे. न जानते होते, तो फ़िर पछतावा होता ही क्यों?

राज्याभिषेक न होकर उन्हें वनवास दे दिया गया, वह भी चौदह वर्षों के लिए. जब उन्हें  यह बात पता चलती है, तब भी उनके मन में कोई दुःख नहीं होता और वन जाने से पूर्व वे अपने पिता से कहते हैं कि इतनी छोटी-सी बात के लिए आपने कितना कष्ट पाया. मुझे पहले ही बता दिया गया होता कि मेरी जगह अनुज भरत का राज्याभिषेक होगा. यह तो मेरे लिए अत्यन्त ही प्रसन्नता की बात होती.

अपनी माता कौशल्या जी को धीरज बंधाते हुए वे यह नहीं कहते कि विमाता ने मुझे वनवास दे दिया है. बड़ी प्रसन्नता के साथ वे माता कौशल्या जी से कह्ते है-"पिता दीन्ह मोहि कानन राजू"- राम के लिए क्या राजमहल, क्या जंगल?.सब उनके लिए समान ही है. लक्ष्मण जी की व्यवहार कुशलता भी देखिए -"मोरें सबै एक तुम्ह स्वामी: दीनबंधु अंतरयामी. वे रामजी से कहते हैं कि आप ही मेरे सब कुछ हैं .मैं आपको अकेला वन नहीं जाने दूंगा, मैं भी साथ चलूंगा. इसी तरह भरत का भी हम लोकव्यवहार देखें कि वे भी उतने ही कुशल हैं, उतने ही लोक-व्यवहारिक हैं. जितने की रामजी थे. वे अयोध्या में रामजी को न पाकर  कहते हैं-" देखें बिनु रघुनाथ पद, जिय कै जरनि न जाइ" उनके सामने राजपाट, धन-वैभव-ऐश्वर्य, अधिकार आदि सब तुच्छ हैं. वे राजसिंहान को ठुकरा कर अपने ज्येष्ठ भ्राता प्रभु रामजी को वापिस अयोध्या लौटा लाने के लिए निकल पड़ते हैं.

महाराज दशरथ संपूर्ण आर्यव्रत के चक्रवर्ती सम्राट हैं. वे उच्च कुल के है. श्रीराम के वनगमन में उनकी भेंट निषादराज गुह से होती है, जिसे निम्न जाति से संबंध रखता है. प्रभु राम केवल उससे मिलते ही नहीं है, अपितु आगे बढ़कर उसका आलिंगन भी करते हैं. वे उसे अपना सखा कहकर संबोधित करते हैं. " अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम: पद्भ्यामभिगमाश्चैव स्नेहसंदर्शनेन च" ( वाल्मीकि रामा श्लोक 40 अयो.कांड) सखे ! तुम्हारे यहाँ तक पैदल आने और स्नेह दिखाने से हमारा सदा के लिए भली-भाँति पूजन-स्वागत- सत्कार हो गया.

ब्राह्मण,संत-मुनि, महामुनि, ऋषि-महर्षियों को वे आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं. क्योंकि वे आदरनीय हैं, पूज्यनीय है. वे केवल प्रणाम ही नहीं करते हैं, बल्कि नतमस्तक होकर प्रणाम करते हैं.( सोSत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः(श्लोक 5वाल.सप्तदशः सार्ग-. अपनी वन यात्रा में वे महामुनि अत्रि के आश्रम में पहुँचकर उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम करते हैं). इसी तरह अनेक ऋषि-मुनियों से भेंट कर जब वे महात्मा अगस्त्य जी के आश्रम में पहुँचते है तो उनके चरणॊं में दण्डवत प्रणाम करते हैं. जग्राहापततस्त्स्य पादौ च रघुनन्दनः (वा.श्ल.24द्वादशः सर्ग). हमें एक चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र की महानता और विनम्रता के यहाँ दर्शन होते हैं. इसी तरह उनकी भेंट जटायु से होती है. अपनी प्रथम भेंट में  वे  रामजी को अपना परिचय देते हुए बतलाते हैं कि मैं महाराज दशरथ का मित्र हूँ..यह जानकर वे अति प्रसन्न होते हैं और उनका यथोचित आदर-सत्कार करते हैं. एक अन्य प्रसंग में- जब वे रावण के द्वारा सीताजी का अपहरण कर ले जाता हुआ देखते हैं , तब उनका रावण के साथ भीषण युद्ध होता है, जिसमें वे मरणासन्न स्थिति में पहुँच जाते हैं, मरनासन्न जटायु को वे न केवल आलिंगन करके विलाप करते हैं, बल्कि उनके प्राण त्याग देने पर स्वयं अपने हाथों से अंतिम संस्कार भी करते है. श्रीराम जी के दलित-पीढ़ित वर्ग के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा हमें यहाँ देखने को मिलती है.

आगे की वनयात्रा में उनकी भेंट शबरी से होती है, जो शबर जाति से संबंध रखती थी. वे न केवल उससे मिलते हैं बल्कि उसके जूठे बेर भी बड़े प्रेम से खाते हैं. इसी तरह उनकी भेट वानरश्रेष्ठ हनुमानजी से,फ़िर सुग्रीव से होती है. उन दिनों वानर -ऋक्ष आदि जाति से संबंध रखने वालों को भी समाज में उच्च स्थान प्राप्त नहीं था. राम न केवल इनसे मिलते हैं बल्कि उनका आलिंगन करते है, मित्रता स्थापित करते हैं और मित्रता को स्थापित करने के लिए सुग्रीव का राज्याभिषेक भी कर देते हैं. यानि उसे ऊँचा स्थान देने में राम आगे आते हैं. इसी तरह विभीषण, जो दैत्य वंश से संबंध रखता था, मित्रता कायम करते हैं,अपनी शरण में लेते हैं और मित्रता के धर्म की स्थापना करते हुए उसका राज्याभिषेक भी कर देते हैं. इस तरह हम अन्यान्य संदर्भों में प्रभु श्रीराम के आदर्श लोकजीवन की झांकी देख सकते हैं.

भारतीय चिंतन में एक अत्यंत ही अद्भुत, सर्वज्ञात और लोकप्रिय शब्द है "परमात्मा" यानि कि आत्मा का वह परम रूप, आत्मा का वह सर्वोत्तम रूप, आत्मा का विशुद्धतम रूप. हम सभी में आत्मा है. फ़िर भी हम बहस में पड़ जाते हैं कि ईश्वर का कोई अस्तित्व है या नहीं. लेकिन इस विवाद से अलग बड़ी बात यह है कि मानव विकास की लंबी यात्रा में, ईश्वर एक आवश्यक अवधारणा के रूप में सदैव मौजूद रहा है. और सारे धर्मग्रंथ सिर्फ़ उपदेश ही नहीं देते, बल्कि अपने मूल स्वरूप में किसी न किसी दर्शन को प्रतिपादित करते हैं.

प्रख्यात विचारक डा.राम मनोहर लोहिया श्रीराम और कृ‍ष्ण की व्याख्या करते हुए कहते हैं-" राम और कृ‍ष्ण, वि‍ष्णु के दो मनु‍ष्य रूप हैं, जिनका अवतार धरती पर धर्म का नाश और अधर्म के बढ़ने पर होता है. राम धरती पर त्रेता में आए, जब धर्म का रूप इतना न‍ष्ट नहीं हुआ था. वह आठ कलाओं से बने थे, इसलिए मर्यादित पुरु‍ष थे. कृ‍ष्ण द्वापर में आए, जब अधर्म बढ़ती पर था. वे सोलह कलाओं से बने थे और इसलिए वे संपूर्ण पुरु‍ष थे. राम का जीवन उद्दात मानसिक आचरणों से देवोपम बनने की कहानी है, जबकि कृ‍ष्ण पहले ऐसे देवता हैं, जो निरंतर मनु‍ष्य बनने की कोशिश करते रहे और अनुभव कराते रहे कि देवता बनने से कहीं अधिक कठिन है मनु‍ष्य बनकर रहना." रामजी ने जितनी भी लीलाएं कीं वे सभी मनुष्य बने रहकर ही की हैं. इसका गहरा प्रभाव न केवल भारत की संस्कृति पर पड़ा बल्कि समूचे विश्व पर भी उसका गहरा प्रभाव पड़ा.    

निबन्ध लेखन के बारे में संक्षिप्त जानकारी-

निबंध - गद्य लेखन की एक विधा है, लेकिन इस शब्द का प्रयोग किसी विषय की तार्किक और बौद्धिक विवेचना करने वाले लेखों के लिए भी किया जाता है. निबंध के पर्याय रूप में सन्दर्भ, रचना और प्रस्ताव का भी उल्लेख किया जाता है. लेकिन साहित्यिक आलोचना में सर्वाधिक प्रचलित शब्द " निबंध" ही है. इसे अंग्रेजी के कम्पोज़ीशन और एस्से के अर्थ में ग्रहण किया जाता है. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार संस्कृत में भी निबंध का साहित्य है. प्राचीन संस्कृत साहित्य के उन निबंधों में धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों की तार्किक व्याख्या की जाती थी. उनमें व्यक्तित्व की विशेषता नहीं होती थी. किन्तु वर्तमान काल के निबंध संस्कृत के निबंधों से ठीक उलटे हैं. उनमें व्यक्तित्व या वैयक्तिकता का गुण सर्वप्रधान है.

इतिहास-बोध परम्परा की रूढ़ियों से मनुष्य के व्यक्तित्व को मुक्त करता है. निबंध की विधा का संबंध इसी इतिहास-बोध से है. यही कारण है कि निबंध की प्रधान विशेषता व्यक्तित्व का प्रकाशन है.निबंध की सबसे अच्छी परिभाषा है-

निबंध, लेखक के व्यक्तित्व को प्रकाशित करने वाली ललित गद्य-रचना है.

 

इस परिभाषा में अतिव्याप्ति दोष है. लेकिन निबंध का रूप साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा इतना स्वतंत्र है कि उसकी सटीक परिभाषा करना अत्यंत कठिन है.

सारी दुनिया की भाषाओं में निबंध को साहित्य की सृजनात्मक विधा के रूप में मान्यता आधुनिक युग में ही मिली है. आधुनिक युग में ही मध्ययुगीन धार्मिक, सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति का द्वार दिखाई पड़ा है. इस मुक्ति से निबंध का गहरा संबंध है.

हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- "नए युग में जिन नवीन ढंग के निबंधों का प्रचलन हुआ है वे व्यक्ति की स्वाधीन चिन्ता की उपज है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है:" निबंध लेखक अपने मन की प्रवृत्ति के अनुसार स्वच्छंद गति से इधर-उधर फूटी हुई सूत्र शाखाओं पर विचरता चलता है. यही उसकी अर्थ सम्बन्धी व्यक्तिगत विशेषता है. अर्थ-संबंध-सूत्रों की टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ ही भिन्न-भिन्न लेखकों के दृष्टि-पथ को निर्दिष्ट करती हैं. एक ही बात को लेकर किसी का मन किसी सम्बन्ध-सूत्र पर दौड़ता है, किसी का किसी पर इसी का नाम है. एक ही बात को भिन्न दृष्टियों से देखना. व्यक्तिगत विशेषता का मूल आधार यही है. इसका तात्पर्य यह है कि निबंध में किन्हीं ऐसे ठोस रचना-नियमों और तत्वों का निर्देश नहीं दिया जा सकता, जिनका पालन करना निबंधकार के लिए आवश्यक है. ऐसा कहा जाता है कि निबंध एक ऐसी कलाकृति है जिसके नियम लेखक द्वारा ही आविष्कृत होते हैं. निबंध में सहज, सरल और आडम्बरहीन ढंग से व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है.

निबंध लिखने में विशेष दक्षता रखने वाले वर्माजी का यह द्वितीय खण्ड -"लोक व्यवहार में राम तथा विविध निबंध" पाठकों को सौंपते हुए मुझे अत्यंत ही प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है. राम के अनन्य सेवक होने के कारण लेखक पर प्रभु रामजी का कितना प्रभाव पड़ा है, यह इस बात से स्वयं प्रमाणित हो जाता है कि उन्होंने सर्वप्रथम रामकथा पर आधारित" ऐषा पंचवटी" पर कुशलता के साथ अपनी लेखनी को धन्य किया है. वहीं दूसरे क्रम में आपका -"लोक व्यवहार में राम तथा विविध निबंध" नाम से द्वितीय खंड का प्रकाशन होने जा रहा है. इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं.

              मुझे विश्वास है कि सुरेन्द्र वर्मा जी के इस द्वितीय खण्ड " लोक व्यवहार में राम तथा विविध `              निबंध. संग्रह को पढ़कर, पाठक न केवल लाभान्वित होंगे, बल्कि वे अनेक अछूते प्रसंगों से भी               क्रमशः तादात्म्य स्थापित करते चलेंगे..

             

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75                                       राम का वनगमन एक अद्भुत घटना थी.

                                                                                                                                                 

रामकथा को गद्य में कहना सदैव एक बड़ी चुनौती रहाअ है. संभवतः यही कारण है कि रामायणकारों ने रामकथा की भावाभिव्यंजना के लिए काव्य को ही प्रमुख आधार चुना है. ऐसे में जबकि रामकथा पर विपुल साहित्य  उपलब्ध है. गोवर्धन यादव का उपन्यास "वनगमन" का सामने आना एकबारगी चौंकाता भी है किंतु राम के वनगमन की मधुर गाथा का वाचन, श्रवण जिस्स तरह भी जितनी बार भी, जिस किसी विधा में भी किया जाए, सदैव मनोहर है.

वनगमन का सम्पूर्ण सौंदर्य राम की मुस्कान में अन्तर्निहित है जिसे वे अयोध्या  की सीमा में प्रसारित करते है और माता कौशल्या से भी चहककर कहते हैं

 

              जँह सब भांति मोर बड़काजू                                                                                                                                                     पिता दीन्ह मोहि कानन राजू..                                                                                                       

और यह भी कि   

              मुनिगन मिलनु विसेस वन सबहिं भाँति हित मोर.

वन में तो  बहुत कुछ है करने को. भील, कोल और तपस्वी मुनिगण भी तो वन में ही निवास करते हैं वहाँ तो ऋ‍षियों का निवास है, वन में मुनियों और ऋ‍‍षियों का सत्संग मिलेगा, यह विचार ही राम को स्स्फ़ूर्ति से भर देता है. राम का वनगमन एक अद्भुत घटना थी. और एकदम अचानक हुई. जैसे कोई कहे कि कल से तुम साधु हो जाओ. युगान्तकारी घटनाएँ अचानक ही हुआ करती हैं और युगपुरु‍ष उसे सदैव समभाव से ग्रहण करते हैं. राम अके वनगमन का दृ‍ष्य ठीक इसी प्रकार का रहा होगा, इसमें संदेह किया जा सकता है किन्तु इस कथा से जुड़ी रामराज्य की अवधारणा पर कोई संदेह न होगा. अनेक युगों से मानव मन का संवर्धन करती आई रामकथा के साथ हमारा जीवन सम्पृक्त है. वही हमारी संस्कृति का आधार है. राक्षसी प्रवृत्ति को ठीक समझने ऋ‍षियों के आचार-विचार और सत्संग का ज्ञान भी राम के वनगमन के कारण ही संभव हो सकता है.

वन का अर्थ एकांत नहीं होता, निर्जन नहीं होता. अनेक प्रकार के पंछी-पखेरु अपने कलरव से वन को सदैव गुंजायमान रखते हैं. सरित कलकल, मेघगर्जन, पर्वतरोर, वृक्षनर्तन वन को जीवन प्रदान करते हैं. निर्जन तो जंगल होता है. जहाँ सब जड़ हो, जहाँ पशु प्रवृत्ति प्रभावी होती हो, वही तो जंगल है. वन जीवंत होता है. वन में जड़-चेतन का समन्वय होता है.\

प्राचीन काल में लोकनिर्माण की गतिविधियों के संचालन का उत्तरदायित्व साधु-ब्राह्मण, वानप्रस्थों पर ही था. वे अपनी शक्ति और युक्ति से धर्म, कर्त्तव्य और सदाचार का वातावरण बनाने हेतु तत्पर रहते थे. राम भी ऐसे ही तापसी वनवासी हुए.   

वन निर्जन कहाँ हैं. वान को किस त्रह परिभाषित किया जाता रहा होगा, यह भी विचारणीय प्रश्न है? दण्ड्कवन या किषिकन्धा नगरीय क्षेत्र नहीं है. ये वन ही हैं. यहाँ वन संस्कृति विद्यमान है. राक्षस जाति के वीरों को इन वनक्षेत्रों का अधिकारी बनाया जाता था. वे इन वनों के स्वामी हुआ करते थे. यदि कॊई इनकी अनुमति के बिना इनके वनक्षेत्र में प्रविष्टः हुआ तो इनका शत्रु. छत्तीसगढ़ का बस्तर और कर्नाटक का तुंगभद्रा किनारे बसी हम्पी इसी वनसंस्कृति के दुर्गम क्षेत्र थे. ऋष्यमूक पर्वत के चतुर्दिक दण्डक वन के निवासियों को ही वानर कहा जाता ह्हो ऐसी संभावना है.

जरा वनवासी को और समझ लें. वनवासी सभ्यता का अपना प्रथक परिचय है. नागरी सभ्यता से दूर असुविधाओं और अशिक्षा की बीच अनेक जातियाँ निवास करती ही थी. उनके अपने ग्राम थे वह वन नहीं है, किन्तु आश्रम वन ही की परिधि में आते थे. इसीलिए राम ग्राम-नगर की सीमा में नहीं गए किन्तु आश्रमों में गए और स्वयं भी आश्रम बनाकर रहे. वनवासी का जीवन बिना अस्त्र के संभव नहीं. इसीलिए राम के पास भी अस्त्र थे. वनवासी का अर्थ ही है कि अपनी सुर्क्षा स्वयं करने की भावना.

तब वन में जीवन यापन की सारी सुविधाएं थीं. आज की तरह वन नहीं थे. आज के वन में जीवन उतना सुविधाजनक नहीं है. लेकिन राम वन के सभी संसाधनों से परिचित थे.

पत्तों से  कुटी (पर्णकुटी ) बन जाती थी. कुश और पत्तों की सुन्दर साथरी ( बिछौना), कन्द, मूल और फ़ल का नित्य आहार उपलब्ध थे. वनवासी इनका उपयोग करते हैं. धनुर्विद्या और अस्त्र-शस्त्र संचालन में तो राम लक्ष्मण निपुण थे ही ( उन्हें दिव्य अस्त्र भी प्राप्त थे.) 

कैकेई ने जो दो वर मांगे उनकी भाषा और अर्थ विचित्र थे. यह जो राम के लिए राज्याभिषेक की तैयारी की गई है, इसी अभिषेक सामग्री द्वारा मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाए और दूसरा- घीर स्वाभाव वाले श्रीराम तपस्वी वेष में वल्कल तथा मृगचर्म धारण करके चौदय वर्षों ताक दण्डकारण्य़ में जाकर रहें. भरत को आज ही निष्कंटक युवराज पद प्राअप्त हो जाए. आज ही राम को वन जाता देखूँ. वाल्मीकि की कैकेयी बहुत हठी और निष्ठुर है. वह कहती है-धर्म की अभीष्ठ फ़ल की सिद्धि के लिए तथा मेरी प्रेरणा से आप अपने पुत्र श्रीराम को घर से निकाल दीजिए. मैं अपने इस कथन को तीन बार दुहराती हूँ.

प्रवाज्य सुतं राम त्रि खलु त्वां ब्रहीम्यहम

दशरथ को बहुत क्रोध आया. उन्होंने कहा-वनवास उसको दिया जाता है जिसके बहुत से दोष सिद्ध हो चुके हों.

ब्रवीपि दोषान गुणनित्यसम्मते.

उन्होंने कहा-पापिनी...मैंने अग्नि के समीप वैदिक मंत्र का पाठ करके तेरे जिस हाथ को पकड़ा था, उसे आज छोड़ रहा हूँ. साथ ही तेरे और अपने द्वारा उत्पन्न हुए तेरे पुत्र का भी त्याग करता हूँ.

यस्ते मंत्रकृत पाणिरग्नौ पापे मयधृतः : सत्यंजामि स्वजं चैव तव पुत्रं सहत्वया.  ( 2 / 14 /14 )

दशरथ ने यह भी कहा-यदि भरत को भी श्रीराम का वन में जाना प्रिय लगता हो तो मेरी मृत्यु के बाद वे मेरे शरीर का दाहसंस्कार न करें.

वरदान के बारे में दशरथ और कैकेयी के अतिरिक्त कोई नहीं जानता किंतु इस प्रसंग को राम चित्रकूट में जिस तरह भरत से साझा करते हैं उससे लगता है कि उन्हें वरदान की यह बात मालूम थी.

पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्धहन : मातामहे समाश्रीशीद राज्यशुल्कमनुत्तमम .

( भाई, जब हमारे पिता का विवाह माता से हुआ था तब तुम्हारे नाना ने  हमारे पिताजी से यह वचन लिया था कि तुम्हारी माता के पुत्र को ही वे राज्य देंगे.) पिता की आज्ञा तो बहुत बड़ी बात है. राम पिताकी अनकही बात का सम्मान करते हैं.

कैकेयी अपनी जय चाहती है. वह राम के मुक उदासी देखना चाहती है. उदासी भी सामन्य नहीं विशेष उदासी. इस विशेष उदासी के अर्थ को कौन जानता है. कैकेयी जानती होंगी या राम. तभी तो राम मुस्कुरा पड़ते हैं. राम का मूल स्वभाव ही प्रसन्नता है. वास्तव में राम पांच देवताओं के स्वरूपों, अंशों और गुणों को धारण किए हुए हैं- अग्नि का प्रताप, इन्द्र का पराक्रम, सोम की सौम्यता, यम का दण्ड और वरुण की प्रसन्नता. वन में मुनियों और ऋषियों का सत्संग मिलेगा. यह विचार ही राम को स्फ़ूर्ति से भर देता है- *मुनिगन मिलनु विसेस, वन साबहिं भाम्ति हित मोर*.           वनगमन की सूचना मिलने पर भी राम प्रसन्न हैं. वनगमन कोई दण्ड नहीं हैं.

कैकेयी को मंथरा ने उकसाया जरुर था किन्तु वह तो उस दासी का धर्म ही था. अपनी स्वामिनी को सर्पोपरी देखना और उसके हित साद्धना- इसमें अनुचित क्या ? कौशल्या और सुमित्रा के प्रति उसकी संवेदनाओं की सीमा स्वभाविक है. स्वामिनी कैकेय़ी को पटरानी के रूप में देखने इच्छा तो पूर्ण न हो सक्की किन्तु उसे राजमाता के रुप में स्थापित करने में वह कुछ योगदान तो दे सकती है. उसे पूर्ण विशास है कि तनिक भी विवेक से काम लिया जाए तो भरत को अयोध्या का राजा बनाया जा सकता है. इस विवेक में थोड़ी चतुराई और थोड़ी कूटनीति आवश्यक है-वह इसी दिशा में तो कार्य कर रही है.

कैकेयी को मंथरा की बात एकदम जंच गई. यह विचारणीय प्रशन है. कुछ न कुछ तो उसके मन में पहले से भी चल रहा अहोगा. राम को वनवास भेजने का उद्देश्य भरत को गद्दी देने की इच्छा मात्र नहीं हो सकता. दशरथ को यह अंदेशा तो था ही कि कैकेयी को दिये गए वरदान और उसके पिता को दिया गया वचन अभी प्रासंगिक है. कैकेयी पुत्र को ही राजा बनाया जाएगा यह वचन उन्होंने उस स्थिति में दिया था, जब वे संतान प्राप्ति की समस्त संभावनाओं के प्रति निराश हो चले थे. किंतु अब स्थितियां बदल चुकी है. दशरथ ने राम का अभिषेक तुरंत करने का विचार बनाया.

मंथरा ने कैकेयी को अपने सामर्थ्य भर उकसाने का प्रयास किया था. इतनी तियारी चल रही है पखवाडए से और तुम्हें तनिक भी संज्ञान नही,

भयउ पाख दिन सजत समाजु : तुम्ह पाइ सुधि मोहि सन आजू.

मंथरा पूर्वाजन्म में दुंदुभि नामक एक गंधर्व कन्या थे. उसके अवचेतन में भविष्य की दृष्टि भी वास करती है. उसकी योजना का प्रबल पक्ष भरत को राजा बनाना नहीं हो सकता. राम के वनवास में उसकी रुचि है. उसने कैकेयी को स्पष्ट रुप से कहा-
सुतहिं राजु, रामहिं वनवासु : देहु लेहु सब सवति हुलासु

और कैकेयी ने भी वर किस तरह माँगे

सुनहुँ प्रानप्रिय भावत जी का : देहुँ एक वर भरतहुँ टीका

उसे ज्ञात था भरत को राज्य देने में राजा दशरथ को तनिक भी संकोच नहीं होगा. किन्तु दूसरे वर के बारे में संशय था.

माँगउ देसर वर कर जोरी : पुरवहुँ नाथ मनोरथ मोरी

हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरे इस मनोरथ को पूर्ण कर दीजिए.

तापस वेष बिसेषि उदासी : चौदह बरस राम वनवासी.

राम को यह वनकाल तपस्वी के वेष में बिताना ह्गा और वह भी विशेष उदास भाव से.

राम की वनयात्रा के अनेक पक्ष हैं किंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य और ध्येय यह है कि वे अपनी वनयात्रा को दूसरों ( विशेषकर ऋषियों तथा वन नागरिकों ) की रक्षा तथा सेवा के लिए अर्पित कर देते हैं.

तापसी वेष में राम, लक्ष्मण और सीता का वनगमन चौदह वर्ष के लिए एक तरह का वानप्रस्थ आश्रम ही है. पुराणकारों ने वानप्रस्थ आश्रम को दोद्द रुपों-तापस और सांन्यासिक में विभाजित किया है. माना जाता है कि जो व्यक्ति वन में रहकर हवन, अनुष्ठान और स्वाध्याय (वेद और स्वयं का अध्ययन ) करता है. वह तापस वानप्रस्थी कहलाता है और जो साधक क्ठोर तप करता तथा ईश्वर आराधना में निरन्तर लगाअ रहता है उसे सांन्यासिक वानप्रस्थी कहते हैं. ये  तापसी वानप्रस्थी अपने उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर सामाजिक तथा परमार्थिक कार्यों में लगा देते हैं.

राम के सम्पूर्ण कथा को दो खंडों में रखते हुए लेखक गोवर्धन यादव के उपन्यास का यह पहला खंड है. इस उपन्यास को लिखने से पहले उन्होंने मानस के साथ-साथ वाल्मीकि रामायण का भी भली-भांति अध्ययन मनन किया है जिसका प्रमाण वे सम्पूर्ण उपन्यास में देते चलते हैं.(यथा- धर्म के दस लक्षण- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रीय निग्रह, विद्या, सत्य और आक्रोध) दशरथ जी के सभी मंत्रियों  के नाम -धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमंत्र.) दो पुरोहित-वशिष्ठ और वामदेवजी. अन्य योग्य मंत्री-सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, कात्यायन आदि.

 गोवर्धन यादव की शैली सपाट किंतु गहरी है. वे तथ्यों के अन्वेषण करने, प्रसंगों की तारतम्यता, तर्क, प्रश्न और समाधान उनकी शैली का महत्वपूर्ण लक्षण है. राज्य संचालन, राज्य वैभव, सैन्य विशेषताओं तथा नागरिक संहिता को भी वे अपने विचार तर्क, तथ्य एवं गंभीर कल्पनात्मक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करते हैं. राम की वंशावली को भी उन्होंने पसंगवश समाहित किया है.

उपन्यास में कथा के प्रसंगों को स्पष्ट करने हेतु छोटे-छोटे शीर्षकों में विभाजित किया गया है. कथा का विस्तार राजा दशरथ की पुत्रैच्छा से लेकर राम के चित्रकूट पहुँचने तक विस्तार लिए हुए है. दशरथ जी को अपने श्वेत बाल दिखाई देने से अपने वंश एवं राज्य के उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है और उसमें नवीनता यह कि अपने प्त्रों को राज्य सौंपने के विकल्पों में वे सबसे पहले शत्रुघ्न के नाम पर विचार करते है. उसके पश्चात लक्ष्मण, भरत और अंत में राम के बारे में चिन्तन करते हैं.

दशरथ जी अपने पूर्वजों को प्रणाम कर पिता अज का स्मरण भी करते हैं. वे कुलगुरु वशिष्ठजी के आश्रम पर स्वयं ही राम अके राज्याभिषेक का प्रस्ताव लेकर  पहुँचते हैं. रामा के राज्याभिषेक की तैयारी का भव्य चित्रण उस औपन्यासिक कृति को गौरव प्रदान करने वाला है. ज्योतिष गणना तथा मुहूर्त की प्रचलित परम्परओं का लेख भी शोधपरक है.

जो प्रश्न संभवतः प्रत्येक रामकथा प्रेमी पाठक के मन में मुपजते हैं उन्हें भी गोवर्धन यादव ने तर्कपूर्ण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. जैसे- राम विचार करते हैं कि- जैसा कि मुझे विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि महाराज ने समस्त आर्यावर्त के राजाओं को विशेषा दूतों के माध्यम से निमंत्रण भी भिजवा दिया है लेकिन जानबूझकर या फ़िर किसी विशेष कारण के चलते उन्होंने भरअत के मामाजी और मेरी ससुराल जनकपुरी में निमंत्रण नहीं भिजवाया है. इन दो राज्यों को निमंत्रण नहीं भेजे जाने के पीछे महाराज की क्या मंशा है, इसे जानना भी मेरे लिए जरुरी है.

राम के वनगमन के कारणों तथा प्रतिफ़लन के अनेक पक्षों पर सूक्ष्मता से विचार किया गया है. रामकथा से सुभिज्ञ पाठकों के मन में भी यह विज्ञासा बनी रहती है कि लेखक अब किस प्रसंग पर ठहरकर नए विचार हमारे सामने रखने वाला है. अस्तु यह कौतुहल बनाए रखना रामकथा के संदर्भ में लेखक की बड़ी उपलब्धि है.

श्री गोवर्धन्यादव एक प्रतिष्ठित कथाकार हैं. अनेक कहानी संग्रहों के माध्यम से उनकी साहित्य के क्षेत्र में विशेष पहचान है. कथा के कहन को वे बहुत सुन्दर तरह से साधते है. इसलिए रामकथा और उसके पात्रों को नए सिरे गढ़ते-विचारते अपनी अलग पहचान छोड़ जाते हैं. उपन्यास का दूसरा खंड भी अत्यन्त रोचक एवं शोधपरक होगा इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है.

उपन्यास वनगमन के लिए बहुत शुभेच्छा के साथ आशा करता हूँ कि पाठकों को इसमें नवीनता के साथ महत्वपूर्ण एवं शोधपरक सामग्री लक्षित होगी तथा नए लेखकों और शोधार्थियों के लिए भी यह उपन्यास मील का पत्थर सिद्ध होगा. जय श्रीराम.

                                                                                                                                  डा. राजेश श्रीवास्तव

                                                                                                                                 निदेशक रामायण केन्द्र भोपाल                                                                                                                                                             मुख्य कार्यपालन अधिकारी                                                                                                                                                     म.प्र.तीर्थ एवं मेला प्राधिकरण                                                                                                                                                  आध्यात्म मंत्रालय म.प्र, शासन भोपाल.

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76.                                                                                                                                                                     

                           विश्व-साहित्य का सुंदरतम प्रसंग है राम- वनगमन

समीक्ष्य कृति- 'वन-गमन'

 लेखक- श्री गोवर्धन यादव

 प्रकाशक- साहित्यभूमि,नई दिल्ली                                     

 समीक्षक- अवधेश तिवारी

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 यशस्वी लेखक श्री गोवर्धन यादव की बहुचर्चित कृति 'वन गमन' को लेकर मेरे मन में कुछ अनूठी जिज्ञासाएँ थीं। पहली जिज्ञासा तो स्वाभाविक रूप से यही थी कि छिंदवाड़ा की उर्वरा माटी का यह सृजन कैसा होगा ? दूसरी बात, चूँकि छिंदवाड़ा का सतपुड़ा-अंचल एक दृष्टि से दंडकारण्य के उसी क्षेत्र का सीमांत भाग है जिसे श्रीराम ने चतुर्दश वर्षों के लिए अरण्य-प्रवास हेतु चुना था,अतः इस कृति के माध्यम से मैं दंडकारण्य की गाथा भी पढ़ने का अभिलाषी था । तीसरी और सर्वप्रमुख बात यह थी कि राम- वनगमन का प्रसंग विश्व-साहित्य का सुंदरतम प्रसंग है। इस प्रसंग को प्रमुखत: तुलसी के रामचरितमानस में पढ़कर मैं कई बार गहरी संवेदनाओं से सराबोर होता रहा हूँ।  वनगमन के एक-एक घटनाक्रम ने जैसे मुझे हृदय की गहराइयों तक मथ डाला है। रामकथा के इस प्रसंग को पढ़कर बार-बार मेरी आँखें भींगती रही हैं। मैंने अपने जीवन को आज तक जितना समझा है, उसका बहुत कुछ श्रेय मानस के  इसी प्रसंग को है। तो मैं 'वनगमन' के अध्ययन के माध्यम से इस प्रसंग को पुनः आत्मसात करना चाहता था ताकि यादव जी की कृति के साथ-साथ अपने आपको भी पढ़ सकूँ।

      मुझे प्रसन्नता है कि श्री गोवर्धन यादव की यह कृति उपरोक्त तीनों कसौटियों पर मुझे काफी हद तक आनंद और संतोष प्रदान करती रही। इस पुस्तक के पृष्ठों को पढ़कर मैं सदैव इस आनंद के साथ उठा  कि आज कुछ नया और अच्छा पढ़ने को मिला। सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखक ने अपने आरंभिक प्रतिवेदन में ही एक बात स्पष्ट कर दी है कि राम के अरण्यवास का यह आयोजन उनके व्यक्तित्व को अधिक समुन्नत,व्यापक और विस्तृत बनाने का नियति का अनूठा आयोजन था।  प्रकृति नहीं चाहती थी कि राम अयोध्या के राजा बनकर केवल अयोध्या के राजा ही रह जाऍं। यदि वे केवल अयोध्या तक सीमित होकर रह गए होते तो दक्षिण से उत्तर तक सनातन-संस्कृति को नष्ट- भ्रष्ट करने के लिए उन दिनों फैल रहे रक्ष-संस्कृति के आतंकवाद को कौन निर्मूल करता? फिर दुर्धर्ष रावण का अंत कैसे होता?  फिर कौशल से लेकर मिथिला, किष्किंधा, रामेश्वरम और लंका तक स्वच्छंद बिखरी राजसत्ताओं को सर्वप्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में एक सूत्र में बाँधने की पृष्ठभूमि कैसे तैयार होती? और ऐसा न होता तो फिर अखंड, अतुल्य भारत का स्वप्न कैसे साकार होता ?

राम के वन-गमन का वास्तविक अर्थ था उन्हें प्रासादों की चारदीवारी से बाहर निकालकर प्रकृति के सानिध्य में ले जाना, जहॉं वे खिलता मौसम, खिलखिलाता जीवन, नदियों का गूँजता स्वर, पहाड़ियों का एकांत, समुद्र की पछाड़, दमकता सूरज, घने वन, पठारों का विस्तार और कितने ही रंग और रूप बदलते आसमान के नीचे जहाँ प्रकृति का अनूठा राग बज रहा होता है, देखने और समझने का अवसर पा सकें। इन सभी उद्देश्यों को मूर्त करने के लिए ही वनगमन प्रकृतिदेवी का ऐतिहासिक आयोजन बना। लेखक ने यहाँ एक और नई बात ये भी कही है कि वनगमन राम की ऊर्जा के विस्फोट का भी आयोजन था। राम के व्यक्तित्व में प्रकृति  शक्तियों का ऐसा जागरण निर्मित करने की तैयारी कर रही थी जिससे एक ऐसा आंतरिक संतुलन बन सके,जो सचमुच किसी चमत्कार या जादू के खेल जैसा हो।

लेखक कहते हैं, सुपात्र मनुष्य को मनोवैज्ञानिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक धाराओं से जोड़कर प्रकृति उसके मार्ग में एक विलक्षण सृजनात्मकता की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए जानबूझकर कुछेक कठोर संघर्षों का विधान करती हैं। इन्हीं संघर्षों को पार करके कोई राष्ट्रनायक या जननायक बनता है ।  यद्यपि राम को गुरुगृह में सारी विद्याएँ अल्पकाल में ही प्राप्त हो गईं थीं  (अल्पकाल विद्या सब पाई.. (मानस)  जो अयोध्या का राज्य चलाने के लिए पर्याप्त था, किंतु उस समय की आवश्यकता केवल राज्य चलाना ही नहीं थी राज्य को बनाना और बचाना उससे भी उच्चतर उद्देश्य था।

लेखक लिखते हैं, श्रम-प्रधान व्यक्तित्व के धनी राम साँवले रंग के थे। सॉंवले रंग के माध्यम से नियति उनसे यह कहना चाहती थी कि तुम्हारा जन्म केवल राजमहल के कोमल-कमनीय वातावरण में जीने के लिए ही नहीं हुआ है, तुम कठोर संघर्षो से दो-चार हाथ करने के लिए पैदा हुए हो । प्रासादों के वैभवपूर्ण और सुरक्षित वातावरण में तो तुम मुरझाकर रह जाओगे । तुम्हारे माथे के पसीने की बूँदें वंदनीय और अभिनंदनीय हैं लेकिन याद रखो, उन्हें सामंती चेतना के ख़िलाफ़ विरोध का शंखनाद भी बनना है... राम! तुम्हें श्रम करना है, विश्राम नहीं..

इसके अलावा लेखक लिखते हैं, उन दिनों वनों में अनेक जातियाँ और जनजातियाँ निवास करती थीं, जिनमें अघरिया गोंड, कँवर, हलवा, भतरा, सबरा, कमार, बैगा,पहाड़ी, कोरबा दलित, अतिदलित, कोरकू, बैगा, भारिया,कोल, किरात आदि जनजातियों का विवरण मिलता है।वे  संगठित होकर रहना नहीं जानते थे।अतः राम अपने वन- प्रवास की अवधि में उन्हें संगठित होना सिखाऍंगे,यह अपेक्षा की जा रही थी। इसके अलावा लेखक ने एक भौगोलिक तथ्य का भी दिग्दर्शन कराया है कि दक्षिण का प्रदेश केवल घने जंगलों के लिए नहीं जाना जाता था, बल्कि वहाँ की धरती में लोहा,ताँबा, पीतल आदि अनेक खनिज पदार्थ भी मिलते थे, जिनसे हथियार बनाए जा सकते हैं। राक्षसों के पास अत्याधुनिक हथियार होने की वजह से जनजातियाँ उनसे लोहा नहीं ले पाती थीं और डरी-सहमी रहती थीं। राम का काम था कि उन जनजातियों के बीच जाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाएँ और उन्हें युद्धकला में प्रशिक्षित करें तथा उनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार करें। तो शोषित,पीड़ित वंचित और दलितों को नए सिरे से चैतन्य करके राष्ट्र का पुनर्निर्माण करने के लिए नया आत्मविश्वास पैदा करना भी राम- वनगमन के  उद्देश्य थे।"

         तो सचमुच लेखक की कुछेक ऐसी अनूठी स्थापनाऍं हैं जो कृति को और रोचक बना देती हैं। लेखक कहते हैं राम ने प्रकृति के इन संकेतों को शिरोधार्य करके अयोध्या के राज्य के स्थान पर,  "पिता दीन्ह मोंहि कानन राजू.." कहकर वनगमन को राज्याभिषेक का पर्याय बना दिया। उनका मन ये सोचकर आनंदित हो रहा था कि अरण्य में ज्ञानी-विज्ञानी ऋषि-मुनियों से भेंट होगी तथा सत्संग और ज्ञान- प्राप्ति के निरंतर अवसर मिलेंगे। वन जाने से पिता का संकल्प भी पूरा होगा और माता कैकेयी की सम्मति का सम्मान भी हो जाएगा। सचमुच, वनगमन से लाभ-ही-लाभ हैं," यह सोचकर राम का मन आनंद से कुछ इस तरह उछालें भरने लगा, जैसे किसी नए जन्मे हस्ति-शावक की ज़ंजीरे खुल गई हों और उसे वन में भागने का अवसर मिल गया हो। उन क्षणों में उसके मन में जो प्रसन्नता होती है,उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता-

 

                            नवगयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।                                                                                                       छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।    (मानस-२/५१)

 

               माता कौशल्या कहती हैं, "बेटा! जाओ। वन के देवी-देवता माता-पिता की तरह तुम्हारी रक्षा करेंगे। उधर उसी समय सुमित्रा लक्ष्मण से कहती हैं, यदि राम और सीता वन में जा रहे हैं तो फिर अयोध्या में तुम्हारा क्या काम है? मुझे तो कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि राम तुम्हारे सौभाग्य के कारण ही वन जा रहे हैं । उनके साथ रहकर तुम उनकी सेवा कर लो। लक्ष्मण! जहाँ सूर्य होता है न, वहीं प्रभात हो जाता है। जहाँ राम होंगे वही अयोध्या भी रहेगी।"

               सुमित्रा राम की विमाता हैं लेकिन फिर भी वो अपने पुत्र लक्ष्मण को जिस तरह भाई- भाभी की सेवा का संदेश दे रही हैं वह स्तुत्य है। माता से मिलने के बाद लक्ष्मण शंकित ह्रदय से अपनी पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर जाते हैं। लेकिन यह देख कर आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता में डूब जाते हैं कि उर्मिला लक्ष्मण के वनगमन में बाधक बनने के बजाय प्रवेश-द्वार पर पहले से ही एक थाल सजाकर खड़ी है। थाल में कुछ फूल, एक माला, चंदन और रोली हैं तथा दीप प्रज्वलित हो रहा है। उर्मिला लक्ष्मण के मस्तक पर तिलक,रोली और अक्षत लगाती हैं, माला पहनाती हैं फूलों की वर्षा करते हुए आरती उतारती हैं और चरणस्पर्श करते हुए कहती है., " हे आर्य! वन जाने का आपका निर्णय बहुत सुंदर है। इस निर्णय में मुझे सहयोगी समझें। यदि आप भ्राता के साथ जाने का निर्णय न लिए होते तो मैं अपनी ओर से स्वयं कहती कि आपको जाना चाहिए। विपत्ति की इस घड़ी में यदि भाई भाई के काम न आ सका तो उसका जीना बेकार है।"

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 लेखक की अनूठी संकल्पना-  कैकेयी का आभासी संसार

 श्री यादव जी की इस कृति में एक बात  मुझे सामान्य से कुछ हटकर लगी। सामान्यतया विभिन्न रामकथाओं में रामवन- गमन का कारण पुत्रमोह में कैकेयी का हठ बताया गया है। यद्यपि कैकेयी राम को भरत से भी अधिक स्नेह देती थी, किंतु चूँकि देवताओं ने भगवान से प्रार्थना करके रामवन-गमन के लिए कैकेयी की बुद्धि में विचलन पैदा करने की प्रार्थना की थी, अतः इसी बुद्धि-विपर्यय के कारण उसे न चाहते हुए भी राम के लिए वनगमन का प्रस्ताव रखना पड़ा ।

               लेखक ने इसी प्रसंग के आलोक में यहाँ एक नए आभासी संसार का भी निर्माण किया है, जो पौराणिक आख्यानों के प्रकाश में उनकी अपनी मौलिक संकल्पना है। तो एक आभासी भावभूमि में लेखक पहुँचता है और वहॉं कल्पना- जगत का मायिक चलचित्र आरंभ हो जाता है...  तब दिखाई देता है कि कैकेयी अपने प्रासाद में विराजमान है..वो आसमान की ओर ताक रही है.. दीपक का हल्का प्रकाश कक्ष में फैला हुआ है.. तभी..तभी उन्हें राम और सीता अपनी ओर बढ़ते दिखाई पड़ते हैं... राम और सीता उन्हें प्रणाम करके बैठ जाते हैं और सादर निवेदन करते हैं,  "माँ! पिताश्री कल मेरा राज्याभिषेक करने जा रहे हैं। आप भली-भाँति जानती हैं कि मेरा मन इन सभी बातों में नहीं रमता.. मैं पिता की आज्ञा का उल्लंघन तो नहीं कर सकता लेकिन आपसे साधिकार एक प्रार्थना अवश्य कर सकता हूँ। आपको पिताजी ने कभी दो वरदान देने की इच्छा की थी, जिन्हें अपने भविष्य के लिए सुरक्षित रख लिया था.. मैं आप से यह प्रार्थना करने आया हूँ कि आप मेरे लिए चतुर्दश वर्षों का वनवास और भरत के लिए राज्याभिषेक माँगे लें...."

                "क्या..कैकेयी आश्चर्यचकित होकर अपने आभासी जगत में ही जैसे धड़ाम से गिर पड़ती है, "राम ! यह क्या कह रहे हो तुम ?...तुमने कैसे सोच लिया कि मैं ऐसा कर सकती हूँ... क्या तुम्हें मालूम नहीं कि मैं तुम्हें भरत से भी अधिक चाहती हूँ... क्या मैं सत्ता के लालच में इतना गिर सकती हूँ राम कि तुम्हें अपनी पुत्रवधू के साथ वनवास भेज दूँ ?? मैं इतनी कठोर नहीं हो सकती राम.. नहीं हो सकती.. यह जंगल दिन में जितने सुहावने दीखते हैं न,रात में उतने ही डरावने हो जाते हैं.  बड़े-बड़े खूँखार जानवर रहते हैं वहाँ.. भला मेरा सुकुमार राम जंगली जानवरों से लड़ने-भिड़ने के लिए वहाँ जाएगा ? नहीं-नहीं ऐसा जघन्य अपराध मैं कभी नहीं कर सकती, नहीं कर सकती.... और अपने ऑंसू अपने उत्तरीय से पोछते हुए कैकेयी बिलख पड़ी..

              किंतु राम ने विनम्रता से उत्तर  दिया, "माँ! एक सामान्य मनुष्य भी यही सोचेगा जैसा आप सोच रही हैं। लेकिन याद रखें, कल न मैं रहूँगा न आप रहेंगी न पिताश्री रहेंगे। हम सब इतिहास का हिस्सा बन जाऍंगे। कोई बचा रहेगा तो केवल हमारा सनातन धर्म.. और धर्म की स्थापना के लिए ही मैंने रघुकुल में जन्म लिया है माँ.. रावण के बढ़ते अत्याचार से पृथ्वीदेवी कंपित हो रही है।  सनातन-धर्म का नाश हो चला है । यदि समय रहते दानवों को नियंत्रित नहीं किया गया तो भारत में अनर्थ हो जाएगा... हमें भारत की इस पुण्यमयी वसुधा को बचाना है माँ... आपके इन्हीं वरदानों में इस देश का कल्याण छुपा है। अतः आप भले ही वरदान न माँगना चाहें किंतु आपका पुत्र राम आपसे ऐसा वरदान माँगने के लिए आपके चरणों में विनत होता है ..."

              कैकेयी ने हताश होकर कहा-" राम! मैं क्या करूँ, समझ नहीं आता.. यद्यपि तुम्हारे जन्म का उद्देश्य हर हाल में पूरा होना ही चाहिए.. मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है वत्स.. मैं हृदय को कठोर करके यह वरदान माँग लूँगी लेकिन चौदह वर्षों तक हर पल तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा भी करती रहूँगी.. सनातन-धर्म की रक्षा हेतु मैं अपना योगदान देने के लिए स्वयं को तैयार करने की कोशिश करती हूँ पुत्र.. हाँ,प्रसंगवश एक और बात मुझे याद आ रही है राम, वह भी तुम्हें बता ही देती हूँ। "

              "क्षत्राणी होने के नाते मैंने कभी हार नहीं मानी वत्स, लेकिन एक बार रणक्षेत्र में बाली के हाथों हमें जो अपमानजनक पराजय मिली, उसकी आग मेरे दिल में अभी तक धधक रही है ।  यदि तुम वनवास जा ही रहे हो तो तुम्हें हमारी उस हार और अपमान का भी बदला लेना है... दुर्धर्ष बाली के समक्ष जो भी जाता था, अपने पिता ब्रह्मा के वरदान से वह सामनेवाले का आधा बल ले लेता था। तुम्हारे पिताश्री से भी उसने आधा बल ग्रहण कर उन्हें पराजित कर दिया और पराजित करने के बाद एक विचित्र शर्त रखी कि या तो वे मुझे बाली के पास छोड़ जाएँ या रघुकुल का गौरव अपना मुकुट वहाँ छोड़ दें। तुम्हारे पिता बड़े असमंजस में थे। मुझे बाली को सौप देते तो पुरुषार्थ कहाँ रह जाता? अंततः उन्होंने अपना मुकुट बाली को देना स्वीकार किया जो कि आज तक उसी के पास है."

" राम! मैं चाहती  कि तुम बाली को पराजित करके उससे अपने पिता का मुकुट वापस लाओ और हमारे अंदर पराजय की धधकती आगको शांत करो ।  मैं चाहती हूँ,हमारा असली मुकुट जो पीढ़ी- दर-पीढ़ी रघुकुल की धरोहर के रूप में हमें मिलते आया है और आज जो दुष्ट बाली का गौरव बढ़ा रहा है,उसी  से तुम्हारा राज्याभिषेक हो ।’

              "मुझे पूरा भरोसा है कि तुम बाली को मार कर अपना किरीट वापस लेते आओगे।अब सचमुच हम तुम्हारा राज्याभिषेक केवल उसी मुकुट से करेंगे राम.. जाओ, यशस्वी बनो..." इतना कहकर कैकेयी ने अपने दोनों हाथ बढ़ाते हुए राम को अपनी भुजाओं में भर लेना चाहा, लेकिन.. यह क्या.. यहॉं तो कोई नहीं है.. न राम न सीता... हे देव तो क्या मैं सपना देख रही थी??? किस भ्रम के भँवर में पड़ गई थी  मैं..लेकिन अभी- अभी तो राम से बातें की है मैंने.. वह यह सब क्या है.. यह क्यों हो रहा है..  और कैकेयी के ऑंसू किसी निर्झर की तरह बहने लगे...

              अचानक उसे फिर धक्का लगा, उसे ऐसा अनुभव हुआ कि अभी-अभी तो राम और सीता सचमुच आए थे और उनसे सारा वार्तालाप हुआ है। वो उन्मत्त-सी अपने मन के इन संकल्प-विकल्पों पर गहराई से विचार करने लगी..।

     इस तरह यह आभासी संसार लेखक की अपनी एक अनूठी संकल्पना है। अब देवताओं ने यह देखा कि लोहा गरम है अतः हथौड़े की चोट करने के लिए वे देवी सरस्वती के पास पहुँच कर "शुक्लां ब्रह्मविचारसार परमाद्या..." आदि विशेषणों से उनकी स्तुति करने लगे।

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    तो इस तरह भारतवर्ष के सनातन मूल्यों को लेखक गोवर्धन यादव ने बहुत अच्छी तरह जानने और समझने की कोशिश की है। उन्होंने वाल्मीकि रामायण और मानस का गहन अनुशीलन करके उनके सुंदरतम मार्मिक प्रसंगों को बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है। अनेक स्थानों पर वाल्मीकि तथा तुलसी द्वारा रचित प्रसंगों की तुलनात्मक प्रस्तुति भी है,जो मन मोह लेती है।


              वाल्मीकि का ऋतु-वर्णन भी लेखक की कलम से महक- महक उठा है। ऋतु- वर्णन में तो अनेक स्थानों पर सुंदर सुरभित फूल खिले हुए महसूस होते हैं। इसके अतिरिक्त मानस की अर्धालियों को विभिन्न अनुच्छेदों का शीर्षक बनाकर विवरण प्रस्तुत करना भी एक अच्छा प्रयोग है। अभिधा
, लक्षणा तथा व्यंजना के साथ ओज, माधुर्य और प्रसाद गुण यथास्थान पाठक के मन का स्पर्श करता रहता है। पाठकों के चरित्र के  अनुरूप उनकी भूषा, भाषा और भाव में संपूर्ण सामंजस्य है। वाल्मीकि-रामायण से लिए गए संस्कृत-काव्यांशों की भी यथोचित सुंदर प्रस्तुति की गई है। भावपक्ष और कलापक्ष का भी यथाप्रसंग निर्वाह करने का अच्छा प्रयास किया गया है।

               अस्तु।  "सो जानहिं जेहि देहि जनाई".. .. राम का काम वही कर सकता है, जिससे राम  करवाना चाहते हों। लोहे का गोला आग में तपकर स्वयं भी आग बन जाता है । साधक अपनी साधना में डूब कर स्वयं भी राममय न हो जाए, यह कैसे संभव है ? अतः अपने शब्दों को विराम देते हुए मैं श्री गोवर्धन यादव जी यशस्विनी कृति  'वनगमन' को,  राम-नाम से पुनीत  उनकी लेखनी को और कृति की रचना के लिए उन्होंने अपनी जितनी श्वास-प्रश्वास समर्पित की हैं, उनमें प्रभु श्री राम की पावन उपस्थिति का दर्शन करके बार-बार उनका अभिनंदन करता हूँ। वे मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

             

                                            जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।                                                                                                                           बंदउँ सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।

                                                                                                                                          = अवधेष तिवारी =

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वन गमन-  एक अनुभूति

 

साहित्य भूमि प्रकाशन नई दिल्ली से 2022 में प्रकाशित वन गमन श्री गोवर्धन यादव का संभवतः प्रथम वृहत संग्रह है , जिसने 171 पृ‍ष्ठों में विस्तार पाया है.  जिनमे दो भूमिका आलेख एवं  लेखकीय प्रतिवेदन सम्मिलित है. वन गमन- भगवान् राम की कथा है और उन्होंने एक पत्नी व्रत लिया था, इस नाते श्री गोवर्धन यादवजी द्वारा अपनी स्वर्गीय पत्नी श्रीमती शकुन्तला यादवजी को पुस्तक समर्पित करना निःसंदेह उनकी भावनाओं की श्रेष्ठ एवं सुन्दर अभिव्यक्ति है, जो बेहद खुबसूरत एवं प्रशंसनीय है .

जहां एक ओर भगवान् राम अवतारी मानव थे तो वहीं भगवान् कृष्ण को भी यही दर्जा प्राप्त है. वन गमन भगवान् राम के जीवन के एक कालखंड को चित्रित करती है और चित्रण करने वाले स्वयं गोवर्धन (कृष्ण का पर्यायवाची नाम) और उस पर सोने पे सुहागा यादव हैं तो कौन कथा की सुगमता, सरलता,सच्चाई ,ईमानदारी ,विश्वास और दृष्टिकोण पर प्रश्न चिन्ह लगाएगा? . भगवान् राम का जितना पारदर्शी व्यक्तित्व है, उतना ही गोवर्धन यादवजी का सीधा एवं सरल प्रस्तुतीकरण संप्रे‍षणीयता में इसे और सुगम बनाता है .

वन गमन, सर्वविदित वही पृ‍ष्ठभूमि  है जिसमें भगवान के राज्याभिषेक की तैयारी के साथ घटते घटनाक्रम समाहित हैं .जिसकी परिणिति भगवान के अयोध्या से गमन और चित्रकूट पहुँचने तक की  रोचक प्रस्तुति है. परिवर्तन जीवन का अभिन्न अंग हैं और उस होने वाले परिवर्तन को जान पाना साधारण मानव के वश में नहीं, लेकिन भगवान राम तो स्वयं अवतारी मानव थे. पृथ्वी पर अवतरण उनका सहज नहीं सोद्धेश्य  था. ऐसे में होनेवाले सभी धटनाक्रम एक सुनियोजित योजना का हिस्सा लगते हैं जिनका सफल एवं कुशल संचालन विधाता द्वारा किया जा रहा था और भगवान इससे अनभि‍ज्ञ हो ऐसा मानना लघुतम सोच को परिलक्षित करता है. पुस्तक में गोवर्धन यादवजी इस लघुतम सोच का परित्याग करते दिखते हैं. वे बलपूर्वक अपनी असहमति दर्शाते हैं कि मंथरा जैसी दासी की समझ एवं पहुँच के बाहर की यह बात है कि वे कैकेई  जैसी वीरांगना की मतिभ्रष्ट कर सके.कथावस्तु का आधार यही है या यूँ कहें कथा का यही केंद्र बिंदु है.

यूँ तो विभिन्न घटनाक्रम को समाहित किये हुए यह पुस्तक चित्रकूट पर विश्राम करने लगती है, लेकिन मुझे लगता है की पूरी पुस्तक में केवल एक रात की ही कथा है. वह रात, जिसमें समय का ऐसा चक्र चला जिसने एक अनोखा इतिहास रचा, जो अमर हो गया. एक रात में होने वाले व्यवस्था के परिवर्तन पर  आधारित  सुप्रसिद्ध लेखक चाणक्य सेन का उपन्यास "मुख्यमंत्री" याद  आ गया, जिसमें एक मुख्यमंत्री को दूसरे दिन अपना बहुमत सिद्ध करना है और उस रात जो जोड़तोड़, राजनीति एवं हठधर्मिता का चित्रण चाणक्य सेन ने किया है, लगभग उसी तरह गोवर्धन यादव ने भी एक रात के उन रहस्यों को अपने अनोखे अंदाज में उजागर करने का प्रयास किया है, जिसमें तात्कालिक स्थितियों और उनसे उपजे सभी प्रश्नों की प्रस्थापना एवं समाधान के लिए किये गए राजनैतिक और कूटनीतिक क्रियाकलाप सम्मिलित हैं.

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण हो या गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस दोनों का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा है. महर्षि वाल्मीकि समकालीन होने के कारण उनकी प्रस्तुति में स्वाभाविकता एवं वास्तिविकता की सुन्दर अभिव्यक्ति है, जबकि तुलसीदासजी भगवान राम के अनन्य उपासक एवं भक्त थे, तो स्वाभाविक रूप से उनकी प्रस्तुति में श्रद्धा भक्ति की प्रचुरता है. रामजी की वाल्मीकि जी से भेंट का लेखक ने प्रस्तुत पुस्तक में उल्लेख किया है. चित्रकूट में प्रवेश के बाद भगवान राम महर्षि वाल्मीकिजी से जो कहते हैं वह देखने में तो साधारण वार्तालाप लगता है, लेकिन जाने कितने अर्थों को अपने आप में समाहित किये हुए है. रामजी वाल्मीकिजी से कहते हैं- " हे महाभाग ! आपने तो काफी समय पूर्व ही मेरे लिए पटकथा लिख दी है. राम उसके अनुसार सफल अभिनय भी कर रहा है . मैं  आपके इस पवित्र पावन पर्णकुटी से कुछ दूरी पर रहकर निवास करना चाहता हूँ . वसंत ऋतु के चलते चित्रकूट इस समय मुझे बड़ा ही मनभावन लग रहा है. इस स्थान पर आकर मै अपने सारे संताप भूल चुका हूँ. अतः आप मुझे यहीं निवास करने की आज्ञा प्रदान करें"  (पृष्ट क्रमांक 159)

भगवान् राम के विराट व्यक्तित्व एवं चरित्र की थाह पाना मानव मात्र के लिए संभव नहीं है. व्यक्तित्व की सरलता जितनी उल्लेखनीय है वहीं उसकी विशालता हर किसी को अचंभित कर देती है. इसीलिए मानव मात्र को यह अटूट श्रद्धा से भर देता है. विभिन्न भाषाओं में अनेकानेक ग्रन्थ, टीकाएँ , आलेख आदि जाने कितना ही विपुल भण्डार उपलब्ध है. न जाने कितने कथा वाचक राम महिमा का बखान प्रति दिन करते हैं. इन सब के होते हुए वन गमन के रूप में एक और प्रस्तुति लेकर आना  श्री गोवर्धन यादव का निश्चित ही एक सराहनीय, प्रशंसनीय या यूँ कहें की साहसिक कदम है .

एक स्वाभाविक प्रश्न पाठकों के मन में उठता है कि जब इतना प्रचुर साहित्य भगवान राम की महिमा में उपलब्ध है, तो ऐसा क्या है जो वन गमन के माध्यम से लेखक पाठकों तक पहुँचाना चाहता हैं?. निसंदेह यह विचारणीय है. देखा जाए तो आज विभिन्न माध्यमों ( दृश्य एवं श्रव्य ) से जितनी भी कथाएँ हम तक पहुँच रही हैं, मुझे लगता है उन सब में आधारभूत ग्रन्थ रामायण, राम चरित्र मानस और उत्तर रामायण ही हैं ."हरी अनंत हरी कथा अनंता" कोई यदि आधार माने तो हर लेखक जब अपनी प्रस्तुति देता है तो निश्चित ही दृष्टिकोण का अंतर, वैचारिक पृष्ठभूमि, प्रस्तुति में विभिन्नता हर प्रस्तुति को नया स्वरुप प्रदान करती है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण होता है पाठकों की स्वीकार्यता. लेखक की सफलता पाठकों की स्वीकार्यता पर निर्भर करती है और जो पाठक  को रोचक प्रस्तुति से आकर्षित करता है. पाठक की पसंद भी वही बनता है. गोवर्धन यादवजी  का  यही प्रयास वनगमन में घनीभूत होते दिखता है. चिरपरिचित घटनाओं की अनुभूति का यह बदलाव पाठक को निसंदेह पसंद आयेगा.

पुस्तक को पढ़ते समय मुझे दो बातें विशेषरूप से उल्लेखनीय लगीं. पहली- वृहत एवं तार्किक विश्लेषण साथ ही दूसरी- तब के वातावरण,  प्रकृति  की नेसर्गिकता और उनका तत्कालीन स्थितियों पर पड़नेवाला प्रभाव. इस सबमें लेखक की परिमार्जित सोच एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने इसे ज्यादा प्रभावी एवं उल्लेखनीय बना दिया है.  सुक्ष्तम विश्लेषण में जब भगवान् राम, लक्ष्मणजी एवं सीताजी को चित्रकूट में महर्षि, देवर्षि , ऋषि ,मुनि ,संत, महात्मा, साधू , योगी और सिद्ध की परिभाषा को स्पष्ट करते हैं तो यह पूरा संवाद महत्वपूर्ण बन पड़ता है . यह निश्चित ही युवा पाठकों के ज्ञानवर्धन में उपयोगी साबित होगा (पृ‍ष्ठ क्रमांक 152-153). यहाँ लेखक का गहन अध्ययन भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है .

लेखक का मानना है की वन गमन एक यात्रा है. यात्रा का पर्याय है और यह यात्रा अकारण नहीं सोद्देश्य  है, जिसमें देश को जानना,  देश को पहचानने की आकांक्षा की प्रमुखता दृष्टिगोचर होती है .यात्रा की विशेषता यह है कि इसमें लक्ष्य का निर्धारण करने के बाद, नीति निर्धारण किया गया और उसे व्यवस्थित करने लिए यह दर्शाया गया कि जैसे सब कुछ अव्यवस्थित है, जबकि वास्तिविकता इस दर्शाए गए चित्र से सर्वथा परे थी और यही परिस्थिति की सुन्दरता थी या यूँ कहें की सौन्दर्यपूर्ण पारिस्थितिक अभिव्यक्ति एवं क्रियान्वयन का अनूठा उदाहरण जन-जन तक पहुँचाने की चेष्टा लेखक द्वारा की गई है . 

गोवर्धन यादवजी ने जिस तरह तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ घटनाक्रम में धार्मिक, आध्यात्मिक , वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश किया है, वह प्रशंसनीय है. पुस्तक का प्रारम्भ ही उन्होंने अयोध्या के वैभव से किया, लेकिन इसकी अक्षुणता के लिए उन्हें अयोध्या के भविष्य की भी चिंता ने आ घेरा .कान के पास आये सफ़ेद बालों की झलक एक युग की समाप्ति का संकेत देने लगे तथा नए युग को अभिलेखित करने की प्रेरणा भी. मुझे लगता है यदि इसे सही अर्थों में समझा जाए  तो यह केवल सता का हस्तांतरण नहीं बल्कि दशा एवं दिशा का निर्धारण भी था. चक्रवर्ती राजा को लगने लगा कि यही उपयुक्त समय है, जब सत्ता का हस्तांतरण उचित है. शायद यही सोच केंद्र में हो कि परिवर्तन विकास के नए मानदंड स्थापित कर सकता है. दरअसल महाराज दशरथ की उस समय की सोच भावी राजनैतिक परिदृश्य के लिए एक दिशा निर्धारण थी. लेकिन समय कहीं कुछ और ही अपने अंतर में छुपाये हुए था.  तभी तो तमाम तुलनात्मक अध्ययन के बाद निर्णीत भगवान् राम को होने वाले पारिस्थितिक एवं चारित्रिक परिवर्तन ने  प्रभावित कर दिया,  क्या इसे बदला जा सकता था?. यदि हाँ तो फिर यह संभव क्यों नहीं हुआ और यदि नहीं बदला जा सकता था तो यह नियति थी और नियति चक्र जिसके निर्देशों से संचालित एवं नियंत्रित होती है उसका नाम है "विधाता". कहते हैं होनी को टाला नहीं जा सकता. केवल उसके प्रतिकूल प्रभाव को  कम ही किया जा सकता है, जिस तरह इस संसार में जो भी आया है उसका प्रारब्ध सुनिश्चित है. वह उसे भोगना ही पड़ेगा. अच्छे कर्म केवल उसकी तीव्रता को कम करते हैं और उस प्रारब्ध को सहन करने की शक्ति प्रदान करते हैं. .इसलिए यदि देखा जाए तो हम भगवान् राम को अवतारी मानव से परे साधारण मानव भी समझें, तो यह उनका प्रारब्ध ही होगा, जिसने उन्हें राजपाट से दूर वन गमन करा दिया .लेखक ने यही स्पष्ट करने का प्रयास किया है की यह वन गमन जन कल्याण, सामाजिक उत्थान की भावना से किया गया सुनियोजित प्रयास है, क्योंकि यदि यह नहीं होता तो फिर शोषित वर्ग की मुक्ति कैसे होती? .लेखक का निश्चित रूप से इस हेतु ये एक सफल प्रयोग है .

राम कथा में हमेशा यह प्रश्न उठाता है कि कैकई जैसी माता, जिसने हमेशा भरत से ज्यादा राम पर अपना वात्सल्य छलकाया. वह अचानक इतनी निर्दयी, निष्ठुर कैसे हो सकती है? जिसे न जन-भावना का ख्याल होगा, ना ही पारिवारिक परिस्थितियों का . कहते हैं त्रिया चरित्र को भगवान भी नहीं समझ पाए, तब भी सामान्य सोच इस बात पर सहमत नहीं होगी की बिना किसी पूर्व पृष्ठभूमि के कैकेई की समझ इतनी विध्वंसक कैसे हो गई?. कोई परिवर्तन अकस्मात् नहीं आता, लेकिन राम के वन गमन की घटना अकस्मात् ही सामने आती है. सुबह राज्याभिषेक है और रात्रि के अंतिम प्रहर में यह निर्णय होता है कि राम वन गमन करेंगे. कहीं ना कहीं सहज और स्वाभाविक रूप से ग्राह्य नहीं होता. ऐसी क्या बात थी जिसने कैकेई को खलनायिका का स्वरुप पाने में भी असहज नहीं किया . मुख्य रूप से यही वह घटनाक्रम था जिसने गोवर्धन यादवजी को मजबूर किया कि वे इस विषय पर अपने ढंग से घटनाक्रम के उस पक्ष पर अपनी लेखनी चलायें, जिसे सामान्य रूप से अभिव्यक्त नहीं किया गया .जैसे-जैसे यादवजी की कलम इस घटनाक्रम का सर्वथा अलग चित्रण करते हुए आगे बढती है, उनकी लेखनी की सच्चाई पर विश्वास मजबूत होते जाता है .

दो महान ग्रन्थ रामायण और महाभारत जिसमें दो विशिष्ट चरित्र थे जिनको वास्तव में वो सम्मान नहीं दिया गया जिनके वे हकदार थे. रामायण में कैकई और महाभारत में कर्ण. सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिवाजी सावंत नें अपने बहुचर्चित उपन्यास मृत्युन्जय में कर्ण की सर्वथा अलग एवं तार्किक प्रस्तुति दी. मुझे लगता है की वन गमन में गोवर्धन यादवजी ने कैकेई का भी ऐसा ही चरित्र चित्रण किया है, जिसे पढ़ते हुए लगता है की कैकेई कितनी महान थी, जिन्होंने यह जानते हुए कि जो कुछ उन्हें करने के लिए कहा जा रहा है, यदि उन्होंने किया तो कोई उन्हें माफ़ नहीं करेगा. उनका अपना पुत्र उनका विरोधी हो जाएगा.  इतिहास उन्हें सदैव स्वार्थी, निर्दयी, निष्ठुर के रूप में कलंकित करेगा.  फिर भी उन्होंने ऐसा किया.  यह चित्रण बरबस उस दूरदृष्टि को केंद्र में रख कर किया गया प्रतीत होता है,जहां जन कल्याण पर निहित स्वार्थ की भावना सर्वोपरि लगती है और खूबसुरती यह कि दिखे स्वार्थ पर अंतर्निहित हो जनकल्याण .

राम कैकेई संवाद को तथ्यात्मक रूप से लेखक ने इस पुस्तक में जिस तरह से प्रस्तुत किया है ,वह उनकी लेखकीय श्रेष्टता को प्रदर्शित करती है, जहां उन्होंने राम द्वारा एक आभासी संसार का निर्माण करते हुए अपने मंतव्य से माता कैकई को ना केवल अवगत कराया बल्कि सहमत भी कराया .लेखक कहते हैं “ माते मैं आपकी शरण में आया हूँ. कृपाकर आप मुझे इस चक्रव्यूह से बाहर निकालें. केवल और केवल आप ही यह उपक्रम कर सकती हैं दूसरा कोई नहीं.” ( पृष्ट 44 ).

“माते आप मेरे लिए चौदह साल का वनवास और भरत के लिए राज्याभिषेक का वर मांग लीजिये ....बस यही एकमेव रास्ता बचता है मेरे लिए – राम ने कैकई से कहा.” ( पृष्ट क्रमांक 45 )

कैकेई ने इसे सहज स्वीकार नहीं किया उन्होंने भी इसका विरोध किया था जिसका सामान्यतः  उल्लेख नहीं मिलता है- “राम ये क्या कह रहे हो तुम –तुमने ये कैसे सोच लिया की कैकई ऐसा भी कर सकती है ? क्या वह सत्ता के लालच में इतना गिर सकती है ? जिस राम को उसने अपने बेटे से ज्यादा स्नेह दिया लाड़-प्यार  दिया, दुलार दिया, उसके लिए यह सब कैसे मांगे .”( पृष्ट क्रमांक 45 )

कोई  भी माँ अपनी संतान के लिए यह सब नहीं कर सकती और शायद यही कैकेई का प्रतिरोध भी  था लेकिन जब राम ने यह कहा की यह आवश्यक है. इसमें जगत कल्याण छुपा है तो ही कैकई ने अपनी सहमति दी. लेखक कहता हैं “ माते एक सामान्य मनुष्य भी यही सोचेगा जैसा की आप सोच रही  हैं , राम की माता होने के नाते आप को इतना छोटा नहीं सोचना चाहिये . हम जो इस चलते फिरते संसार को देख रहे हैं यह मात्र एक सपने के सद्रश्य है . समय बदलते ही द्रश्य भी बदल जाते हैं .हम सब इतिहास का हिस्सा बन जायेंगे हम आज हैं कल कोई और रहेगा. यदि कोई बच रहेगा तो केवल देश और सनातन धर्म ही बच रहेगा.”( पृष्ट क्रमांक 46 ) प्रसंगवश आगे राम कहते हैं  - “ रावण के बढ़ते अत्याचार से धरती काँप रही है. सारे देवगण उसके आतंक से भयभीत होकर यहाँ वहां छिपकर रहने के लिए विवश हैं .यदि उस दुष्ट का संहार नहीं हो सका तो इस धरती पर दानव ही दानव होंगे – मानवता समूल नष्ट हो जायेगी आपके इन दो वरदानों में संसार का कल्याण छिपा है . अतः माते अपने मन मस्तिष्क से क्षुद्र विचारों को बाहर निकाल दें और जनकल्याण की भावना से आगे आयें" .” ( प्रष्ट क्रमांक 46 )

लेखक ने एक अंधियारे पक्ष को अपनी लेखनी के माध्यम से प्रकाशवान किया है, जिसमें कैकई के सर्वविदित चरित्र को एक अलग स्वरुप प्रदान किया, जो इस वन गमन के माध्यम से चारित्रिक विशेषता के वास्तिविक रूप को जन-मानस तक पहुँचाने का सघन प्रयास है. जिस घटनाक्रम ने  इतिहास बना दिया, जिसने कैकई जैसी माता को कलंक के अंधियारे पथ में धकेलकर बदनाम कर दिया, उसी कैकई के चरित्र के उजले पक्ष को जन-जन तक पहुँचाने का प्रशंसनीय कार्य लेखक ने किया है. लेखक ने अपने बुद्धिचातुर्य का प्रदर्शन करते हुए जब उन्होंने, राम के द्वारा आभासी संसार सृजित कर, कैकई- राम संवाद के माध्यम से, इस पूरे सांसारिक मायाजाल की रचना की , यह तात्कालिक परिस्थितियों में समय की मांग थी, वरना संसार का स्वरुप कुछ और ही होता, जो शायद सृष्टी का सर्वाधिक दुरूह काला अध्याय होता जिसमें सृष्टि से सभी सद्गुणों का समापन हो जाता.  .

वन गमन की रचना के पीछे लेखक श्री गोवर्धन यादवजी का जो मंतव्य मुझे समझ में आया कि वह इस बात को आम जन तक पहुँचाना चाहते थे कि कैकई दरअसल विधाता  द्वारा रचित योजना के क्रियान्वयन की सशक्त माध्यम थी, लेकिन जिस ढंग से परिस्थिति की अनिवार्यता थी, कैकई ने सहज तमाम दुरुहता , दुर्गमता , एवं अपमान के साथ इसे स्वीकारा. उनकी इसी चारित्रिक विशेषता की तमाम अपमानजनक कालिख को पोंछकर उसे उज्जवल बनाने का प्रयास लेखक ने किया है.. लेखक की इसी सोच ने इस चरित्र को परिमार्जित कर उज्जवल एवं उत्कृष्ट बना दिया. उज्जवल बनाने की प्रबल इच्छाशक्ति के अंतर्गत किया गया लेखक का यह प्रयास उल्लेखनीय है .

यदि भगवान् राम दोनों वरदान लागू ना करवाते तो वे  सीमित दायरे में कैद हो जाते. एक राजा के रूप में अयोध्या ही उनका कार्यक्षेत्र बन जाता जो उनके अवतारी होने के प्रमुख उद्धेश्य को ही समाप्त कर देता . इन दो वरदानों ने, जो कैकेई ने हठपूर्वक लागू करवाये उसने ही राम को उन्हें इतना वृहत केनवास प्रदान किया. दुसरे शब्दों में कहा जाए तो जनमानस की नज़रों में राम को राम बनाने का कार्य इसी माध्यम से पूर्ण हुआ. ल्रेखक ने  इसी भावना का वन गमन में  खुलकर समर्थन किया ,जिसने उनकी विकेन्द्रित दृष्टि को हर पहलू,  हर घटना के साथ न्याय करने हेतु उत्साही बनाए रखा .

पुस्तक की एक विशेषता और है जो पाठक को हर क्षण, हर घटना से जोड़े रखने में सफल हो पाती है, वह है स्थिति के साथ उस समय के वातावरण का मनभावन चित्रण, प्रकृति की सुन्दर मनभावन प्रस्तुति, काल परिवेश से सीधे पाठक को जोड़ देती है. लेखक ने प्रकृति का जो सुन्दर चित्रण किया है वह इस प्रकार है  “ सूर्यास्त का समय हो चला था. आकाश में घिरा कुहासा अब धीरे धीरे छटने लगा था.  शीतल पवन मंद-मंद गति से प्रवाहमान होने लगी थी. पौधों पर ऊग आईं  कलियाँ जो अब तक लाज के मारे घूँघट काढ़े  हुई थीं, अपनी मादक सुगंध को बिखराते हुए खिलने लगी थीं. भ्रमर जो अब तक अलसाया पड़ा था, आनंद मगन हो, मकरंद चुराने के लिए निकल पडा था . सरोवर का जल जो अब तक ठहरा हुआ था हिलोरें लेने लगा था.चिड़ियों के समूह और अन्य पक्षियों के दल अपनी-अपनी बोलियों में चह्चहाते हुए तथा ऊँची ऊँची उड़ान भरते हुए सामूहिक गाने गाकर, अपने आराध्य सूर्यदेव की अगवानी में निकल पड़े थे .शाखामृग कब पीछे रहने वाले थे. वे कभी इस डाली से उस डाली पर, तो कभी किसी अन्य डालियों पर उछल-कूद मचाने लगे थे. दाना पानी की तलाश में बगुलों के दल निकल पड़े थे. सारी सृष्टि जो अबतक अलसाई-सी सोई पड़ी थी,  प्रमुदित होकर मुस्कुराने लगी थी .” (प्रष्ट क्रमांक 25)

एक और बानगी इस तरह ” चित्रकूट पर्वत पर बड़ा ही रमणीय स्थल है इस  पर्वत पर लंगूर, वानर और रीछ निवास करते हैं.  बहुसंख्यक फल-मुलों से संपन्न. बड़ी संख्या में हिरणों के झुण्ड यहाँ वहां विचरते ,उछलते कूदते देखे जा सकते हैं . वहां पवित्र मन्दाकिनी नदी, अनेकानेक जल स्त्रोत ,पर्वत शिखर ,गुफाएं, कंदराएं तथा छल-छल के स्वर निनादित करते मन भावन झरने भी देखने मिलिंगें.जमीन पर घोंसला बनाकर रहने वाला पक्षी टिटहरी (टिट्टिभ या कुररी) , पिविटीया (हरी चिड़िया भी कहते हैं) और स्वर साधिका कोकिला के मधुर कूक भी मनोरंजन करेंगे (पृष्ट क्रमांक 154 )

पुस्तक पर विहंगम दृष्टि डालते हुए यदि समग्रता पर केन्द्रित करें, तो निसंदेह यह गोवर्धन यादवजी की एक उत्तम कृति है जिसमें सम्पूर्ण राम चरित्र मानस के एक अंश ,वन गमन पर केन्द्रित होकर उस विलक्षण घटना के मूल में छिपे उन गूढ़ार्थों को उजाकर करने का सफल प्रयास किया गया है,  जिसके द्वारा राम को सृष्टि उद्धारक के अनूठे रूप में प्रस्तुत कर उन्हें सर्वमान्य अलौकिक स्वरुप क्यों मिला उसका तार्किक चित्रण उसे सारगर्भित प्रासंगिकता से जोड़ देता है. क्यों राम आज भी पूजनीय एवं प्रासंगिक है इसमें स्वेच्छा से वन गमन भी एक अभीष्ट कारण बन गया. पुस्तक में कैकेई के चरित्र का  अनूठा चित्रण जिसने कैकेई के चरित्र पर लगे सभी कलंकों को हटाकर, उनके महान व्यक्तित्व की अविस्मरणीय छवि प्रस्तुत की है .देखा जाए तो शायद यही वास्तिविकता भी थी क्योंकि कैकई यदि अपने आप को उस परिस्थिति में कलंकित ना करवाती, तो शायद रामायण सम्पूर्णता को प्राप्त ना हो पाती. कैकेई के उल्लेख तथा कालखंड के बिना वन गमन संभव नहीं था और तब राम की चारित्रिक विशेषता भी इस लोक के लिए कल्पना मात्र ही होती. इस नाते कैकई ने ही राम के द्वारा "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" के जन कल्याणकारी कार्य में प्रमुख सूत्रधार की भूमिका को अभिमंचित किया.

वन गमन पुस्तक में श्री गोवर्धन यादवजी की लेखनी एवं सोच के विभिन्न पहलुओं से साक्षात्कार होता है. धार्मिक आस्था, सामजिक समदृष्यता, मत विभिन्नता के बावजूद ,जनकल्याणकारी सर्वोच्चता , चारित्रिक उत्थान विशेष पर कैकई की राजकीय एवं व्यक्तिगत प्रतिबद्धताएँ , परिस्थितियों के विश्लेषण की वैज्ञानिकता, मनोविज्ञानिक एवं दार्शनिक धरातल पर सोच एवं परिस्थितियों का अन्वेषण, विश्लेषण एवं समावेशन ने पुस्तक को विशिष्ट बना दिया है. यही वजह है की वन गमन एक प्रभावी उपन्यास के रूप में सामने आता है .

लेखन की उच्च परम्पराओं का निर्वाह करते हुए श्री गोवर्धन यादवजी ने वनगमन के साथ पूर्ण न्याय किया है. धार्मिक प्रसंगों में होने वाले जोखिम को परे रखते हुए उन्होंने पुस्तक में सभी स्थितियों, परिस्थितियों को सहज एवं स्वाभाविक प्रस्तुतीकरण द्वारा इसे विवादित होने से बचाया है. जाने- पहचाने प्रसंगों को नए स्वरुप में पुनः पाकर पाठकों को यह रुचिकर लगेगा. ताजगी एवं प्रवाह इसे अंत तक पढ़ने हेतु पाठकों को उत्साहित करते रहेगा.

पाठकों के लिए पुस्तक निसंदेह उत्साहवर्धक रहेगी, खासतौर पर राम के राम बनने की प्रारम्भिक स्थितियां, कैकई का सर्वथा विलक्षण चरित्र चित्रण, वातावरण के अनुकूल प्राकृतिक स्थितियों का चित्रण उपन्यास की उल्लेखनीय  विशेषता है. .कथ्य और शिल्प  में गोवर्धन यादवजी ने अपनी श्रेष्टता को बनाए रखा है.  हाँ, प्रकाशकीय भूल के अंतर्गत कहीं-कहीं प्रूफ की गलती से शब्दों के संयोजन में बाधाएं आती हैं, लेकिन उनसे अर्थों में बदलाव नहीं होने से ज्यादा परेशान नहीं करती. फिर भी अगले संस्करण में सुधार अपेक्षित है. बावजूद इसके उल्लेखनीय है की पुस्तक का कलेवर अच्छा बन पड़ा है.

वन गमन यद्यपि श्री गोवर्धन यादवजी के उपन्यास के प्रथम रूप में हम तक पहुँचा है किन्तु इसमें भी उन्होंने अपनी पूर्वस्थापित लेखकीय प्रतिभा का परिचय देते हुए इसे भी श्रेष्ट प्रस्तुति बना दिया है, जो निश्चित ही पाठकों को अपनी रूचि के अनुकूल ही लगेगी और इसे वे  अपनी परिमार्जित अभिरुचि का  हिस्सा बनायेंगें. छोटे-छोटे शीर्षकों के माध्यम से की गई रचना रोचक बन पड़ी है. हर शीर्षक अपने आपमें हर घटनाक्रम को पूर्णतः समाहित किये हुए है, जिससे पाठक आसानी से सामंजस्य स्थापित कर लेता है. कथावस्तु  पाठक तक सहजरूप में पहुँचने में सफल है और इसे पाठक की स्वीकार्यता भी प्राप्त होगी .

 श्री गोवर्धन यादवजी को उनकी इस उत्कर्ष रचना के लिए साधुवाद एवं शुभकामनाएं .आने वाले उपन्यास ,जो इस प्रस्तुति की दूसरी कड़ी है "दंडकारण्य की ओर " तथा "लंका की ओर" भविष्य की उन समस्त रचनाओं के लिए, जो साहित्य जगत में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करेंगी. "दंडकारण्य की ओर"  तथा "लंका की ओर" का हम सभी को इंतज़ार रहेगा.

                                                          बहुत बहुत बधाई .

प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ,   

डी -303 , सिग्नेचर रेजीडेंसी ,

कोलार रोड , भोपाल -

चलित- 7974040119

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       फ़ूलों की घाटी (उत्तराखण्ड)

 

यॊं तो रंग-बिरंगे पुष्प सर्वत्र पाए जाते हैं, पर नन्दन वन के प्राकृतिक पुष्पोद्दान की छटा ही निराली है. इस उद्दान को लेकर महाभारत में एक प्रसंग आता है. एक बार अर्जुन ने द्रोपदी को कुछ देने की कामना की. कुछ न कुछ लेने के लिए जब अर्जुन जिद करने लगा तो द्रोपदी ने कहा-“ यदि आप कुछ लाकर देने की जिद में ही पड़े हैं तो मुझे नन्दन-वन से पारिजात का पुष्प ला दें, जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तुरी-मृग से भी मादक होती है, जिसका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है.”

अर्जुन चले और नन्दन वन पहुंचे. वहां के रक्षक से उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा, तब कहीं एक फ़ूल दौपदी के लिए ला सके.

महाभारत की यह कथा संभवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो, किन्तु यह कल्पना नहीं आश्चर्यजनक रहस्य है कि ऎसा नन्दन वन आज भी इसी भारतभूमि में वैसे ही विध्यमान है जैसी महाभारत में कथा आती है. समुद्र सतह से 13,200 फ़ीट ऊँचा यह हिमालय की गोदी में स्थित आज भी “फ़ूलों की घाटी” के नाम से विश्व विख्यात है.

प्रतिवर्ष हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि 10-15 मील क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र पुष्पों को किसने रौंपा ?. सारे संसार में ऎसा कोई भी स्थान नहीं जहाँ प्राकृतिक तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्णॊं के पुष्प खिलते हों.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फ़ूल प्रकृति की उतनी देन नहीं है जितना इस बात की सम्भावना कि यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित तरीके से विकसित किए गए हों. सम्भव है यह जो राजोद्दान रहा हो, यह भी सम्भव है कि यहाँ कभी किसी महर्षि का तपोवन रहा हो. जो भी हो- महाभारत काल के बाद यह स्थान उन सैंकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा जिनके लिए प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने का प्रयत्न करते हैं.

जहाँ अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाए हुए खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का यह कथन है कि हिमालय की प्रत्येक वनस्पति औषधि है. जहाँ धार्मिक अग्नियाँ स्थापित हैं, ऎसे-ऎसे गुप्त आश्रम हैं, जहाँ अर्ध-सहत्र आयु के संत-महात्मा समाधिस्थ हैं, वहाँ पर्वतरोहियों ने हिममानव की कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पदचिन्ह भी देखे हैं. आदि साधना भूमि होने के कारण यह विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृष्य तरंगे, वह ज्ञान अब भी विद्ध्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की संपूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धांतों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है. “पुष्प घाटी” ऎसे-ऎसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है.

इस स्थान की खोज सबसे पहले ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के एक कप्तान ने की थी. उसने यहाँ के सैकड़ों प्रकार के फ़ूलों के बीज एकत्र कर इंग्लैण्ड भेजे. एक पुस्तक भी लन्दन में प्रकाशित की गई, जिसमें इस फ़ूलों की घाटी को प्रकृति का अद्भुत चमत्कार कहकर पुकारा गया. तब से अनेक विदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे. पर इंग्लैण्ड की श्रीमती जान लेग को दुबारा यह स्थान फ़िर मिल गया. उन्होंने यहाँ से लगभग 500 फ़ूलों के बीज इकठ्ठे कर लन्दन भेजे. अब तो वहाँ पहुंचने के की तमाम सुविधाएं हो गई हैं इसलिए कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे हिमालय में ऎसा बहुत कुछ है जहाँ तक हम जा सकते. हवाँ जा सके होते और उसके अनन्त रहस्यों में से कुछ का भी पता लगा सके होते तो देखते कि जिन वस्तुओं के लिए हम विदेशों के आश्रित हैं, दूसरों का मुँह ताकते है वह और उनसे श्रेष्ठ वस्तुएँ हम अपने ही भीतर से निकाल सकते हैं.

तीर्थ-यात्रा और आत्मकल्याण के लिए साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य़ स्थान बचा है. वहाँ चित्ताकर्षक शांति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है. उसमें जो एक बार इस पुष्प घाटी को देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं.

पुष्प घाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना होता है. वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट पर उतरना पड़ता है. यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरिया तक की सात मील की दूरी को पार करने के लिए पूरा एक दिन लग जाता है.

घाघरिया से कुल एक घंटे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं. उसकी दाहिनी ओर  “कुबेर भण्डार” पर्वत और आगे “कामेट चोटी” है. बाईं ओर सप्राष्टांग पर्वतों की चोटियाँ हैं. कामेट झरना सामने ही बहता हुआ मिल जाता है. म्यूण्डर ग्राम पर पहुँचते ही यह “पुष्प घाटी” मिल जाती है और अनेक प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुलदाऊदी, सिलपाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, बेला, जुही और कुछ फ़ूल तो ऎसे हैं जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना कठिन है. अंग्रेजों ने इनके नाम “बड आफ़ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड हिबिस्टकम आदि रख लिए हैं. कथीड के सफ़ेद व बैंगनी फ़ूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते हैं. बुरांस फ़ूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात कर देता है. जब यह बुरांस पूरी तरह अपनी ऋतु में फ़ूलता है तो यह वन नन्दन वन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है. कितना ही देखो-- न तो आँखें थकती हैं और न ही वहाँ से हटने का ही जी करता है. वर्ष भर इसी तरह किसी न किसी फ़ूल की शोभा बनी ही रहती है. 3000 से अधिक विभिन्न फ़ूल विभिन्न समय में फ़ूलते-खिलते ही रहते हैं.

   

ब्रह्म-कमल

ब्रह्म कमल भी यहीं पाया जाता है. कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या बंधन ?. उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगाकर दिखा दिया है कि उसकी सत्ता सर्वशक्तिमान है. यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऎसी जादू भरी होती है कि हल्की-सी महक से ही अनन्त सुख और शांति का आभास होता है. इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है. इसे पाकर ही द्रोपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी.

फ़ूल कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है. जो लोग अपने घरों के आस-पास थोड़े-से भी फ़ूलों के पौधे लगा देते हैं तो वह स्थान इतना अच्छा और आकर्षक लगने लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, फ़िर एक ऎसे प्रदेश में पहुँचकर जहाँ 10 इंच से लेकर 28 इंच ऊँचाई के पौधे केवल फ़ूलों से ही आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य का वर्णन ही क्या किया जा सकता है. यह स्थान तो ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिसके इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति तो हो सकती है, अभिव्यक्ति नहीं.

 

           

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                             मत्स्य पुराण के अनुसार भारत के भूभाग से निकलने वाली नदियों का वर्णन

 

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                                                                                                                                                (गोवर्धन यादव.)

 

सृष्टी के आरंभ में ब्रह्माजी ने केवल एक पुराण की रचना की थी, जिसमें एक अरब श्लोक थे. अपनी विशालता के चलते इसे पढ़ने में कठिनाइयां होती थी. अतः इस पुराण को सरल तरीके से समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास ने इस विशाल पुराण को १८ पुराणॊं में विभक्त करते हुए इसे आसान बना दिया.

अठारह पुराणॊ के नाम तथा उनमें लिखे गए श्लोकों की संख्या निम्नानुसार हैं.

(१)ब्रह्मपुराण- दस हजार (२) पद्म पुराण-५५ हजार (३) विष्णु पुराण-२३ हजार (४) शिव पुराण-२४ हजार (५) भागवत पुराण-१८ हजार (६) नारद पुराण-२५ हजार (७) मार्कण्डेउ पुराण-९ हजार (८) अग्नि पुराण- १५ हजार चार सौ (९) भविष्य पुराण- १४ हजार पांच सौ (१०) ब्रह्मवैवर्त पुराण- १८ हजार (११)लिंग पुराण-११ हजार (१२) वराह पुराण-२४ हजार (१३) स्कंद पुराण-८१ हजार एक सौ (१४)वामन पुराण-१० हजार(१५) कुर्म पुराण-१७ हजार (१६) मत्स्य पुराण- १४ हजार (१७) गरुड़ पुराण-१९ हजार (१८) ब्रह्माण्ड पुराण-१२ हजार.

इस तरह मत्स्य पुराण सोलहवां पुराण है जिसमें २९० अध्याय तथा १४ हजार श्लोक हैं. इस ग्रंथ में मत्स्य अवतार की कथा के अलावा तालाब, बागीचा, कुआं, बावड़ी, पुष्करिणी, देव मन्दिर की प्रतिष्ठा, वृक्ष लगाने की विधि, भूगोल का विस्तृत वर्णन, ऎरावती नदी का वर्णन, हिमालय की अद्भुत छटा का वर्णन, कैलाश पर्वत का वर्णन, गंगा जी की सात धाराओं के वर्णन के साथ ही राजा पुरुरवा की रोचक कथा भी शामिल है..

 पुराण शब्द “पुरा” एवं “अण” शब्दों की संधि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है-पुराना अथवा प्राचीन, अनागत वा अतीत. “अण” शब्द का अर्थ होता है- कहना या बतलाना अर्थात जो पुरातन है अथवा अतीत के तथ्यों, सिद्धांतों, शिक्षाओं, नीतियों, नियमों और घटनाऒं का विवरण प्रस्तुत करना. माना जाता है कि सृष्टि के रचियता ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम जिस प्राचीनतक धर्मग्रंथ की रचना की, उसे पुराण के नाम से जाना जाता है. हिन्दू सनातन धर्म में, पुराण सृष्टि के प्रारम्भ से माने गए हैं, इसलिए इन्हें सृष्टि का प्राचीनतक ग्रंथ मान लिया, किंतु ये बहुत बाद की रचना है. सूर्य के प्रकाश की भांति पुराण को ज्ञान का स्त्रोत माना जाता है, जैसे सूर्य अपनी किरणॊं से अंधकार हटा कर उजाला कर देता है, उसी प्रकार पुराण अपनी ज्ञानरुपी किरणॊं से मानव के मन का अंधकार दूर करके सत्य के प्रकाश का ज्ञान देते है. सनातनकाल से ही जगत पुराण की शिक्षाओं और नीतियों पर आधारित है.

विषयवस्तु-   प्राचीन काल से पुराण देवताओं, ‌ऋषियों, मनुष्यों-सभी का मार्गदर्शन करते रहे हैं. पुराण मनुष्य को धर्म नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देते हैं. पुराण मनुष्य के कर्मों का विश्लेषण कर दुष्कर्म करने से रोकते हैं. पुराण वस्तुतः वेदों का विस्तार हैं, वेद बहुत ही जटिल तथा शुष्क भाषा शैली में लिखे गए हैं. वेदव्यास जी ने पुराणॊं की रचना और पुनर्रचना की. कहा जाता है “पूर्णात पुराण” जिसका अर्थ है, जो वेदों का पूरक हो अर्थात वेदों की जटिल भाषा में कही गई बातों को सरल भाषा में समझाया गया है. पुराण-साहित्य में अवतारवाद को प्रतिष्ठित किया गया है. निर्गुण-निराकार की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना करना इन ग्रंथों का विषय है. पुराणॊं में अलग-अलग देवी देवताओं को केन्द्र में रखकर पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म और कर्म-अकर्म की कहानियां हैं. प्रेम, त्याग, भक्ति, सेवा, सहनशीलता ऎसे मानवीय गुण हैं, जिनके अभाव में उन्नत समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. पुराणॊं में देवी-देवताओं के अनेक स्वरुपों को लेकर एक विस्तृत विवरण मिलता है. पुराणकारों ने देवताओं की दुष्प्रवृत्तियों का व्यापक विवरण दिया है लेकिन मूल उद्देश्य सदभावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है.

पुराणॊ की रचना वैदिक काल के काफ़ी बाद की है. इनमें सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विषद विवरण दिया गया है. इन्हें मनुष्य के भूत, भविष्य और वर्तमान का दर्पण भी कहा जा सकता है. सरलतम शब्दों में कहा जा सकता है कि भूत में जो हुआ, वर्तमान में जो कुछ हो रहा है और भविष्य में क्या कुछ होने वाला है---इसका दिग्दर्शन कराना ही पुराणॊं का मकसद रहा है. यदि मनुष्य अपने अतीत में झांककर देखे तो वह अपने सुखद वर्तमान का निर्माण आसानी से कर सकता है. इनमें देवी-देवताओं का और पौराणिक मिथकों का बहुत रोचक तरीके से वर्णन दिया गया है.

भागवत पुराण और शिव पुराण को विस्तार से सुनने का मौका मुझे मिला है. बाकी के पुराणॊं के बारे में केवल जानकारियां भर है. गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित “मत्स्य पुराण” घर में किसी अनुपयोगी वस्तु की तरह पड़ा हुआ था. अकस्मात उसके पन्ने पलटने का मौका मिला. ११४ वें अध्याय में नदियों के उद्गमस्थलों की, नदियों के आसपास में बसे जनपदों के बारे में बतलाया गया है. इनमें से अनेक नाम ऎसे हैं,जिन्हें बारे में न कभी सुनने का और न जानने का मौका मिला. ये नाम सर्वथा नए हैं. जिनके बारे में विस्तार से खोजबीन की जानी चाहिए कि वे आज भी उस स्थान पर बने हुए हैं या उनके नाम बदल दिया गए है. कुछ देशों के नामों का उल्लेख भी इसमें आया हुआ है ( जो आज स्वतंत्र रुप से अपना कार्य कर रहे हैं) को पढ़कर लगता है कि प्राचीन समय में वे भारत का ही हिस्सा रहे हों? अध्याय ११४ के कुछ श्लोकों और उनके अर्थों को मैंने लिपिबद्ध करते हुए यहाँ प्रस्तुत किया है, जिसे पढ़कर आपको भारत के भू-भागों और नदियों के बारे में पढ़ने को मिलेगा.

            अध्याय—११४ ( मतस्यपुराण से उदृत)

 

सप्त चास्मिन महावर्षे विश्रुताः कुलपर्वताः * मेहेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि            विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपर्वताः 

* तेषां सहस्त्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपतःआभिशातास्ततश्चान्ये विपुलाश्चित्रसानवः

 * अन्ये तेभ्यः परिशाता ह्र्स्वा ह्रस्योपजीविनः            तैर्विमिश्रा जानपदा आर्या मलेच्छाश्च सर्वतः*

 पीयन्ते यैरिमा नद्धो गंगा सिन्धुः सरस्वती शतद्रुश्चन्द्रभागा च यमुना सरायूस्तथा    *

 इरावती वितस्ता च विपासा देवेका कुहूःगोमती धूतपापा च बाहुदा च दृषद्वती

कौशिकी च तृतीया च निश्चीरा गण्डकी तथा* चाक्षुर्लौहिता इत्येता हिमवत्पादनिःसृताः                                    वेदस्मृतिर्वेत्रवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च *  पर्णाशा चन्दना चैव सदानीरा मही तथा                                                पारा चर्मण्वती यूपा विदिशा वेणुमत्यपि * शिप्रा ह्यवन्ती कुन्ती च पारियात्राश्रिताः स्मृताः(१७-२४)

इस महान भारतवर्ष में सात विश्वविख्यात कुलपर्वत हैं- महेन्द्र ( उड़ीसा के दक्षिणपूर्वी भाग का पर्वत), मलय, सह्य, शुक्तिमान ( यह शक्ति पर्वत है, जो रायगढ़ से लेकर मानभूम जिले की डालमा पहाड़ी तक फ़ैला है), ऋक्षवान ( यह विन्ध्य-पर्वतमाला का पूर्वी भाग है), विन्ध्य, और पारियात्र ( यह विन्ध्यपर्वतमाला का पश्चिमी भाग है)-- ये कुलपर्वत हैं. इनके समीप अन्य हजारों पर्वत हैं. इनके अतिरिक्त अन्य भी विशाल एवं चित्र-विचित्र शिखरों वाले पर्वत हैं तथा दूसरे कुछ उनसे भी छॊटॆ हैं, जो निम्न (पर्वतीय) जातियों के आश्रयभूत हैं. इन्हीं पर्वतों से संयुक्त जो प्रदेश हैं, उनमें चारो ओर आर्य एवं मलेच्छ जातियां निवास करती हैं, जो इन आगे कही जाने वाली नदियों का जल पान करती हैं. जैसे गंगा, सिन्धु, सरस्वती, शतद्रु (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाव) यमुना, सरयू, इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), देविका, कुहू, गोमती, घूतपापा (धोपाप), बाहुदा, दृष्यद्वती, कौशिकी (कोसी), तृतीया, निश्चीरा, गण्डकी, चक्षु, लौहित- ये सभी नदियां हिमालय की उपत्यका (तलहटी) से निकली हुई है. वेदस्मृति, वेत्रवती (बेतवा), वृत्रघ्नी, सिन्धु, पर्णासा, चन्दना, सदानीरा, मही, पारा, चर्मवती, यूपा, विदिशा, वेणुमती, क्षिप्रा, अवन्ती तथा कुन्ती- इन नदियों का उद्गमस्थल पारियात्र पर्वत है.(१७-२४)

                              शोनो  महानदी चैव नर्मदा सुरसा क्रिया                                                                मन्दाकिनी, दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च * तमसा पिप्पली श्येनी करतोया पिशाचिका                                                                      विमला चंचला चैव वंजुलोआ वालुवाहिनी                                                                   शुक्तिमान्ती शुनी लज्जा मुकुटा हृदिकापि च * ऋक्षवन्तप्रसूतास्ता नध्योSमलजलाः शुभाः                            तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या क्षिप्रा च निषधा नदी* वेणवा वैतराआआअणी चैव विश्वमाला कुमुद्वती              तोया चैव महागौरी दुर्गा चान्तःशिला तथा * विन्ध्यपादप्रसूतास्ता नद्दः पुण्याजलाः शुभाः                                                             गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी च वंजुला                                                                तुंगभद्रा सुप्रयोगा वाह्या कावेर्यथापि च * दक्षिणापथनद्दस्ताः सह्यपादाद विनिःसृता.                               कृतमाला ताम्रपर्णी पुण्यजा चोत्पलावती * मलयान्निःसृता नद्दः सर्वा शीतजलाः शुभाः                                 त्रिषामा ऋषिकुल्या च इक्षुला त्रिदिवाचला * लांगलिनी वंशधराः महेन्द्रतनयाः स्मृताः                                 ऋषीका सुकुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी * कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः                                    सर्वाः पुण्यजलाः पुण्या सर्वाश्चैव समुद्रगाः * विश्वस्य मातरः सर्वा सर्वपापहराः शुभाः( २५-३३)

शोण, महानदी, नर्मदा, सुरसा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्रकूटा, तमसा, पिप्पली, श्येनी, करतोया, पिशाचिका, विमला, चंचला, वालुवाहिनी, शुक्तिमन्ती, शुनी, लज्जा, मुकुटा और हृदिका- ये स्वच्छ सलिला कल्याणमयी नदियां ऋक्षवन्त (ऋक्षवान) पर्वत से उद्भूत हुई हैं. तापी, पयोष्णी (पूर्णा नदी या पैनगंगा), निर्विन्ध्या, क्षिप्रा, निषधा, वेण्या, वैतरणी, विश्वमाला, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा तथा अन्तःशिला- ये सभी पुण्यतोया मंगलमयी नदियां विन्ध्याचल की उपत्यकाओं से निकली हुई हैं. गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, वंजुला (मंजीरा), कर्नाटक की तुंगभद्रा, सुप्रयोगा, वाध्या (वर्धा नदी) और कावेरी- ये सभी नदियां दक्षिणापथ में प्रवाहित होने वाली नदियां हैं, जो सह्यपर्वत की शाखाओं से प्रकट हुई हैं. कृतमाला (वैगईन नदी) ताम्रपर्णी, पुष्पजा (पेन्नार नदी) और उत्पलावती- ये कल्याणमयी नदियां मलयाचल से निकली हुई हैं. इनका जल बहुत शीतल होता है. त्रिषामा, ऋषिकुल्या, इक्षुला, त्रिदिवा, अचला, लांगालिनी और वंशधारा – ये सभी नदियां महेन्द्र पर्वत से निकली हुई मानी जाती है. ऋषीका, सुकुमारी, मन्दगा, मन्दवाहिनी, कृपा और पलाशिनी- इन नदियों का उद्गम शुक्तिमान पर्वत से हुआ है. ये सभी पुण्यतोया नदियां पुण्यप्रद, सर्वत्र बहने वाली तथा साक्षात या परम्परा से समुद्रगामिनी हैं. ये सब-की-सब विश्व के लिए माता-सदृश हैं तथा इन सबको कल्याणकारिणी एवं पापहारिणि माना गया है.(२५-३३)

सह्यास्यानन्तरे चैते गोदावरी नदी * पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स्स प्रदेशो मनोरम, (३७) यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः * रामप्रियार्थम स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधी (३८)

इनकी सैकडॊं-हजारों छॊटी-बड़ी सहायक नदियां भी हैं, जिनके कछारों में दुरु, पांचाल, शाल्व, सजागंल, शूरसेन, भद्रकार, बाह्य, सहपटच्चर, मत्स्य, किरात, कुन्ती, दुन्तल, काशी, कोसल, आवन्त, कालिंग, मूक और अन्धक-ये देश अवस्थित हैं, जो प्रायः मध्यदेश के जनपद कहलाते हैं. ये सह्यपर्वत के निकट बसे हुए हैं, यहां गोदावरी नदी प्रवाहित होती है. अखिल भूमंडल में यह प्रदेश अत्यन्त ही मनोरम है. तत्पश्चात गोवर्धन, मन्दराचल और श्रीरामचन्द्रजी का प्रियकारक गन्धमादन पर्वत है, जिस पर मुनिवर भरद्वाज जी ने श्रीरामजी के मनोरंजन के लिए स्वर्गीय वृक्षों और दिव्य औषधियों को अवतरित किया था. इन्हीं मुनिवर के प्रभाव से यह प्रदेश पुष्पों से परिपूर्ण होने के कारण मनोमुग्धकारी हो गया था. बाल्हीक (बलख), बाटधान, आभीर, कालतोयक, पुरन्ध्र, शूद्र, पल्लव, आत्तखण्डिक, गान्धार, यवन, सिन्धु (सिंध) सौवीर (सिंध का उत्तरी भाग), मद्रक (पंजाब का उत्तरी भाग), शक, द्रुह्य( द्रुह्यु का उत्तरी भाग--पश्चिमी पंजाब), पुलिन्द, पारद, आहारमूर्तिक, रामठ, कण्ठकार, कैकेय और दशनामक- ये क्षत्रियों के उपनिवेश हैं तथा इनमें वैश्य, शूद्र कुल के लोग निवास करते हैं. इनके अतिरिक्त कम्बोज (अफ़गानिस्तान), दरद( पाकिस्तान ) बर्बर, अह्लव( ईरान), अत्रि, भरद्वाज, प्रस्थल, कसेरक, लम्पक, तलगान असुर जांगल सहित सैनिक प्रदेश- ये सभी उत्तरापथ के देश हैं. अब पूर्व दिशा के देश--- अंग(भागलपुर), वंग (बंगाल), मग्दुरक, अन्तर्गिरे, बहिर्गिरे, मातंग, यमक, मालवर्णक, सुह्य (उत्तरी असम), प्रविजय, मार्ग, वागेय, मालव, प्राग्ज्योतिष (आसाम का पूर्वी भाग), पुण्ड्र (बंगलादेश), विदेह(मिथिला), ताम्रलिप्तक (उड़ीसा का उत्तरी भाग), शाल्व, मागध और गोनर्द---ये पूर्व दिशा के जनपद हैं.

दक्षिणापथ के देश- पाण्ड्य, केरल, चोल, कुल्य, सेतुक, मूषिक, कुपथ, वाजिवासिक, महाराष्ट्र, माहिषक, कालिंग(उड़ीसा का दक्षिनी भाग), आभीर, सहैषीक, शबर, पुलिन्द, विन्ध्यमुलिक, वैदर्भ (विदर्भ), दण्डक, कुलीय, सिराल, अश्मक (महाराष्ट्र का दक्षिण भाग), भोगवर्धन ( उड़ीसा का दक्षिण भाग), तैत्तिरिक, नासिक्य तथा नर्मदा के अन्तःप्राय में स्थित अन्य देश---- ये दक्षिणापथ के देश हैं.  भारुकच्छ, माहेय, सारस्वत, काच्छीक, सौराष्ट्र, आनर्त और आर्बुद---ये प्रदेश अपरान्त प्रदेश हैं. अब जो विन्ध्यवासियों के प्रदेश हैं, वे इस प्रकार है---मालव, कुरूष, मेकल, उत्कव्ल, औंड्र (उड़ीसा), माष, दशार्ण, भोज, किषिकन्धक, तोशल, कोसल( दक्षिण कौसल), त्रैपुर, वैदिश(भेलसा राज्य), तुमुर, तुम्बर, नैषध, अरूप, शौण्डिकेर, वीतेहोत्र, तथा अवन्ति---ये सभी प्रदेश विन्ध्यपर्वत की वादियों में स्थित बतलाए जाते हैं.

१,९६,०८,५३,११० वर्ष बीत चुके हैं. यह ७ वें मन्वन्तर का २८ वां कलयुग चल रहा है. इसकी शुरुआत महाभारत के समय श्रीकृष्णजी के देवगमन के बाद हुई है. इस घटना को लगभग ५५०० वर्ष बीत चुके हैं. कलयुग का समय ४,३२,००० वर्ष होता है और द्वापर के लिए कलयुग से दुगना, त्रेता के लिए तिगुना तथा सतयुग के लिए कलयुग की सीमावधि का चार गुना होता है. जैसा की आलेख के शुरुआत में ही इस्स बात को स्पष्ट कर दिया गया है कि “पुराण” की रचना सृष्टि के प्रारंभ में स्वयं ब्रह्माजी ने की थी. चुंकि यह इतना विशद था कि इसे पढ़ पाना आसान नहीं था. वेदव्यासजी ने इसे आसान बनाते हुए अठारह पुराणॊं की रचना की. इन पुराणॊं में “मत्स्य पुराण” की गिनती सोलहवें नम्बर पर आती है. इससे स्पष्ट होता है कि लाखों साल पहले इसे लिख दिया गया था.

इतने अधिक पुराने पुराण में भूगोल की सटीक जानकारी किस तरह इकठ्ठी की गई होगी? किस तरह इतने बड़े भूभाग का भ्रमण किया गया होगा? इसको लेकर अनेकानेक प्रश्न मन-मस्तिस्क को मथने के लिए काफ़ी हैं. पहला सवाल तो यही उठ खड़ा होता है कि क्या उस समय इस ग्रंथ के रचियता के पास अत्यधिक विकसित साधन उपलब्ध थे, जिसकी सहायता से वे ऎसा कर पाए? क्या उस समय विज्ञान इतना उन्नत था कि उन्होंने इतने कम समय में १८ पुराणॊं का सम्पादन-लेखन किया, जबकि कोई प्रेस उन दिनों उपलब्ध नहीं थे? उपरोक्त आलेख में अनेकानेक नदियों के नाम, स्थानों के नाम आदि का इसमें उल्लेख किया गया है, कुछ स्थानों के नाम तो भारत भूमि के बाहर के भी आए हैं, क्या वे सबकी सब भारत के अन्तर्गत आते थे? कुछ ऎसे भी नाम आते हैं,जिनके बारे में काम ही सुनने में आता है,क्या वे आज भी इस भूभाग में अवस्थित हैं या फ़िर उनके नाम परिवर्तित कर दिए गए, इस पर भी गहनतम शोध की आवश्यकता है.

 

                                                                                                                                                                                                                                               यूनिवर्सल पोस्टल युनियन                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन को अन्तर्राष्ट्रीय डाक संघ के नाम से भी जाना जाता है. क्या आप बता सकते हैं कि इसका जन्म कब, कहां, कैसे और किसके द्वारा हुआ?. निःसंदेह आपके पास इसका उत्तर शायद ही होगा. आइये मैं इसकी विस्तृत जानकारी आपको उपलब्ध करवा रहा हूँ.

यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की नींव मे एक नाम दबा पडा है. वह नाम है “हाईनरिश फ़ान स्टेफ़ान” का. आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य भी होगा कि ये महाशय एक डाककर्मी थे.                                                                                                                                          

हाईनरिश फ़ान स्टेफ़ान का जन्म 7 फ़रवरी 1831 को पोमेरानिया में हुआ था. वे अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा के उपरांत 17 वर्ष की आयु मे प्रशियन डाक सेवा में भर्ती हुए थे. फ़ान अपने चुने हुए व्यवसाय में द्रुतगति से मंजिल दर मंजिल पार करते हुए कोलोन जा पहुँचे,जो राइन प्रदेशों की महानगरी तथाजर्मन, पश्चिम यूरोप एवं समुद्रपारीय देशों के बीच डाकसेवाओं का केन्द्र बिंदु थी. तत्पश्चात उनका अगला कदम कोलोन से प्रशिया की बर्लिन स्थित सर्वोच्य डाक प्रशासनिक संस्था मे पहुंचना था. जब सन 1870 में जनरल डाक निदेशक ( जर्मनी के डाक प्रशासन का अध्यक्ष) का पद रिक्त हुआ तो फ़ान को उनकी दूर-दूर तक फ़ैली ख्याति तथा असाधारण योग्यताओं के कारण उक्त पद हेतु चुना गया.                                                                                                                                                                                                                                                                                                     

फ़ांस-जर्मन युध्द के पश्चात फ़ान अपने जीवन के महानतम कार्य” अन्तर्राष्ट्रीय डाक संघ” की स्थापना में जुट गए. सन  1869 में उत्तरी जर्मन सरकार ने यूरोपीय राष्ट्रों के बीच डाक संबंन्धों मे समानता एवं सामान्य डाकसंघ की स्थापना पर विचार-विमर्श हेतु डाक कांग्रेस आमंत्रित करने के लिए फ़ांस सरकार से एक समझौता किया. यह तभी संभव हो सका जबकि 1 जुलाई 1873 को जर्मन सरकार ने स्टेफ़ान द्वारा तैयार किया गया सामान्य डाक समझौते का प्रारुप यूरोपीय एवं अमरीकी सरकारों के समक्ष प्रस्तुत किया. 15 सितम्बर 1874 को दोनों गोलार्धॊं के 22 राष्ट्रॊं के प्रतिनिधियों ने बर्न (स्विटजलैण्ड) में राष्ट्रीय सीनेट के प्राचीन ऎतिहासिक भवन में हुए कांग्रेस सम्मेलन में भाग लिया. कांग्रेस ने फ़ान स्टेफ़ान को समझौता प्रारुप की जांच हेतु स्थापित आयोग का  अध्यक्ष नियुक्त किया. यह उनकी पहल शक्ति, कूटनीतिक चातुर्य तथा डाक मामलों के अंतरंग ज्ञान का ही परिणाम था कि सामान्य डाक समझौते पर 24 दिन की अल्पावधि में ही 9 अक्टूबर 1874 को हस्ताक्षर हो गए तथा इस प्रकार “ सामान्य डाक संघ” का जन्म हुआ.                                                                                                                                    

अब स्टेफ़ान ने अन्तर्राष्ट्रीय डाक संघ (यू.पी.यू) जैसा कि बाद में इसका नाम पडा के प्रसार कार्य में अपने आपको समर्पित कर दिया. उनका एकमात्र लक्ष्य था यू.पी.यू. की एकता, विवादों को रफ़ादफ़ा करने में उन्होंने अपनी वाकपटुता, दृढ इच्छा शक्ति, विश्वास की उर्जा तथा तर्क-शक्ति का प्रयोग किया.                                                         

यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन के संस्थापक फ़ान स्टेफ़ान का देहान्त 8 अप्रैल 1897 मे हो गया. आज भी इन्हीं के दिखाए मार्ग पर समूचा विश्व डाक प्रक्रिया मे जुडा हुआ है. 

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                          सार्थक सांस्कृतिकता बनाम रामदेव धुरंधर.

 

               

                            

कुछ व्यक्ति इतने प्रगाढ़ और व्यापक होते हैं कि उन्हें शब्दों में बांध पाना मुश्किल होता है. कर्म जब लोकव्यापी होता है तो व्यक्तित्व भी शब्दातीत हो जाता है. रामदेव धुरंधर का अर्थ, शब्दों की अनेक पर्यायवाची संज्ञाएँ रचकर ही ढूँढा जा सकता है. एक अध्यात्म-आस्तिक, निष्ठा, एक तपोवनी तेजस्विता और साधना, सुरुचि से संपन्न एक सार्थक सांस्कृतिकता का नाम है रामदेव धुरंधर. उनमें एक गहन गंभीरता भी है और भगीरथ गंगा की तरह गतिमय प्रवाह की तेजी भी,

समय का पंछी  कभी भी एक क्षण कहीं नहीं ठहरता. वह फ़ुर्र्र करके तत्क्षण उड़ जाता है और अपनी ढेर सारी यादों को पीछे छोड़ जाता है. रामदेव जी से मेरी मुलाकात न तो बहुत पुरानी है और न ही इसे नई भी नहीं कहा जा सकता. सन 2014 को मारीशस के “कालोडाईन सूर मेर होटेल” के भव्य सभागार में मेरी पहली मुलाकात सत्ताईस मई को हुई थी. यह वह समय था जब हम मारीशस की यात्रा ( 24-28 मई 2014 )  पर  “अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा के बैनर तले हम पर्यटक के रूप में पहुँचे थे और हमने तय कर रखा था कि मारीशस के सभी साहित्यकारों को, जो हिन्दी के लिए प्रचार-प्रसार और उन्नयन के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं, मुलाकातें करेंगे और उन्हें संस्था की ओर से सम्मानीत करेंगे. इस सम्मान समारोह में विश्व हिन्दी सचिवालय के तत्कालीन डिप्टी सेक्रेटरी जनरल श्री सुकलाल जी, महात्मा गांधी संस्थान मारीशस की निदेशक डा.श्रीमती व्ही.डी.कुंजल जी, कला एवं संस्कृति मंत्री श्री मुखेश्वर चुनीजी, कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार श्री राजनारायण गुट्टीजी, श्री रामदेव धुरंधर जी, श्री राज हीरामन जी, श्रीमती अलका धनपत जी सहित अनेक नामचीन साहित्यकार उपस्तिथ थे.

मारीशस के बारे में स्व. गिरिराज किशोर के जग-प्रसिद्ध उपन्यास “गिरमिटिया” के कुछ अंश मुझे पढ़ने को मिले थे. इसके इतर यह भी जानकारी मिली थी कि “प्रवासी घाट” को एक यादगार स्मारक बना दिया गया है, जहाँ पर कभी भारतीय लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर लाया जाता था. मारीशस लाए जाने वाले सभी भारतीय थे और अपनी भारतीयता की पहचान को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए वे अपने साथ गीता, रामायण,भागवत पुराण, हनुमान चालीसा, आल्हा आदि भी साथ लेते गए थे. और साथ लेते गए थे टिमकी, ढोलक, मंजीरे, खड़ताल आदि ताकि गा-बजाकर अपने गम को कुछ हल्का कर सकेंगे. इतना ही नहीं, वे अपने साथ मड़का-हांडी तथा अन्य खाना पकाने के सामान भी साथ लेते गए थे. उन्हें रह-रहकर याद आता भारत और भारत में प्रवाहित होती भगीरथ गंगा जी की, सो उन्होंने परी तालाब में भारत से गंगाजल लाकर डाला और उसे गंगा की तरह मान्यता दी. फ़िर याद आते रहे भोले भंडारी, तो उन्होंने इसी गंगा तालाब के तट पर शिव लिंग की स्थापना कर डाली और उसे तेरहवें ज्योतिर्लिंग के रुप में मान्याता दी.

तभी से मन में एक इच्छा बलवती हो उठी थी कि कभी अवसर मिला तो एक बार वहाँ जरुर जाऊँगा. जिस अवसर की मैं लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहा था, वह अवसर भी शीघ्र ही आया. अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा के मित्र श्री नरेन्द्र दंढारे जी ने हिन्दी के प्रचार और उन्नयन को लेकर मारीशस यात्रा पर जाने का कार्यक्रम बनाया और मुझे आमंत्रित किया. इस समय मैं भोपाल स्थित हिन्दी भवन में आयोजित होने वाली मिटिंग के दौरान उपस्तिथ था. यात्रा को लेकर मन में हिलोरें उठ रही थी. मैंने अधीरता के साथ इस शुभ समाचार को हिन्दी भवन न्यास के मंत्री और मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के संचालक मान, श्री कैलाशचन्द्र पंत जी को कह सुनाया. वे मारीशस की यात्रा पूर्व में कर चुके थे. उन्होंने न सिर्फ़ इस समाचार को सुना बल्कि यह घोषणा भी कर दी कि न्यास पाँच लोगों को पच्चीस हजार- पच्चीस हजार का अनुदान भी देगी. निश्चित ही यह खुशी की बात थी कि हिन्दी भवन आगे बढ़कर हमें वहाँ जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.

तेईस मई 2014 को हमने मुम्बई के छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उडान भरी और अलसुबह हम मारीशस के “रामगुलाम अंतर्राष्ट्रीय एअर पोर्ट” पर थे, जहाँ से हमे टैक्सी द्वारा होटेल “कालोडाईन सूर मेर” ले जाया गया. इसी होटेल के सभा कक्ष में मेरी पहली मुलाकात श्री धुरंधरजी से हुई थी. मुलाकात क्या थी महज चार-पांच घंटे का साथ था. यही साथ, औपचारिकता के बाद दोस्ती में तबदील हुआ, जो आज भी बदस्तूर जारी है.

दूसरी मुलाकात भोपाल में हुई थी. भारत आने से पूर्व उन्होंने मुझे मेल से सूचित किया कि दिल्ली मे आयोजित कार्यक्रम में उन्हें “इफ़्को” सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है. इस सम्मान में ग्यारह लाख रुपया और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है. धुरंधर दंपत्ति को संस्था की ओर से आने और जाने के लिए एअर टिकिट भी. मेरे लिए यह खुशी की बात थी. बधाइयां और शुभकामनाएं देने के उपरान्त, मैंने भारत में प्रायोजित होने वाले अन्य कार्यक्रमों के बारे में जानना चाहा, तो आपने बतलाया कि वे 6 फ़रवरी को भोपाल आने वाले है और दो दिन अर्थात 7 और 8 तक रुकेंगे.. इस सूचना को पाकर मैं बेहद ही उत्साहित था कि मेरे मित्र भोपाल आ रहे हैं. मैंने दादा पंत जी को इस समाचार से अवगत कराया. उन्होंने सहर्ष उन्हें हिन्दी भवन के साहित्यकार निवास में ठहरने और एअरपोर्ट से लिवा लाने का इन्तजाम किया था.

आपने मेल द्वारा भारत आने की सूचना मुझे `16  नवम्बर को दे दी थी, जबकि उनका सम्मान 31 जनवरी को होना था. मैंने उन्हें मेल करते हुए निवेदन किया कि अभी आपके आगमन में काफ़ी समय है, क्यों न इस बीच आपका साक्षात्कार ले लिया जाए. मेरे प्रस्ताव को उन्होंने स्वीकार किया. यह वह समय था जब वे अपने बहुचर्चित उपन्यास “पथरीला सोना” का छटा और अन्तिम खण्ड लिख रहे थे. समय में से समय को चुराते हुए आपने मेरे प्रश्नों का गहनता और गंभीरता के साथ उत्तर दिए. इस साक्षात्कार को भोपाल की ई- पत्रिका “रचनाकार”, और यूके की ई-पत्रिका “लेखनी” तथा बिलासपुर की पत्रिका “पाठ”, हरिद्वार की पत्रिका “सृजन सरिता”, रायपुर की पत्रिका “छत्तीगढ़ मित्र”, हल्द्वानी की पत्रिका-“आधारशिला” और देहरादून की पत्रिका “ सरस्वती सुमन” ने इसे प्रकाशित किया है.

हिन्दी भवन में धुरंधर दंपत्ति तीन दिन तक रुके थे. हिन्दी भवन ने आपके शुभागमन को लेकर एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया और उन्हें सम्मानित किया. धुरंधरजी अपने साथ अपना साहित्य भी लेकर आए थे, सो उन्होंने उसे हिन्दी भवन के वाचनालय के लिए भेंट में दिया. उन्होंने अपना व्यंग्य संग्रह “चेहरे के झमेले” और “बंदे, आगे भी देख” और एक उपन्यास “ विराट गली के वासिंदे” मुझे भेंट में दिया था. मारीशस के कवि श्री सूर्यदेव सिबोरत का कविता संग्रह “एक फ़ूल गन्ने का” और नाटक “ प्रजाराज रासो”, अभिमन्यु अनत द्वारा संपादित हिन्दी कहानियों का संग्रह- “मारिशसीय हिन्दी कहानियां”, मारीशस के नौ हिन्दी कवि, डा.हेमराज सुंदर का काव्य संग्रह “चुनौती” तथा धुरंधर जी का तीन सौ लघुकथाओं का संग्रह “ यात्रा साथ-साथ “ मैंने मारीशस से खरीद किया था. हिन्दी भवन के इतर भोपाल स्थित “दुष्यंत संग्रहालय” के निदेशक मित्र श्री राजुरकर राज जी ने भी आपका वहाँ आत्मीय स्वागत किया और उन्हें सम्मानित किया.

“चेहरे के झमेले” और “बंदे, आगे भी देख” “जनम की एक भूल, कलजुली कर्म-धर्म, कपड़ा जब उतरता है, मैं और मेरी लहुकथाएं दो भागों में,(प्रत्येक में 707 लगुकथाएं ),पापी स्वर्ग, ढलते सूरज की रोशनी तथा उपन्यासों में पथरीला सोना ( 6 खंडों में), छॊटी मछली-बड़ी मछली, चेहरों का आदमी, पूछॊ इस माटी से, बनते-बिगड़ते रिश्ते तथा सहमें हुए सच प्रकाशित हो चुके हैं. अभी-अभी आपने सूचित किया कि वे एक नए उपन्यास पर काम भी शुरु कर चुके हैं.

मैंने आपका साक्षात्कार लेते हुए पहला प्रश्न ” विस्थापन के दर्द” को लेकर ही किया था, जिसका उत्तर निम्नानुसार है.

लगभग देढ़-दो सौ साल पहले बिहार से कुछ लोगों को बतौर ठेके पर/मजदूर बनाकर मॉरिशस लाया गया थासंभवतः आपकी यह चौथी अथवा पांचवीं पीढी होगीक्या विस्थापन का दर्द आज भी आपको सालता है?

उत्तर- भारतीय मज़दूरों का पहला जत्था सन् 1834 में मॉरिशस लाया गया था. मेरे पिता का जन्म - वर्ष 1897 था। प्रथम भारतीयों का मॉरिशस आगमन [1834] और मेरे पिता के जन्म के बीच 63 सालों का फासला है। तब भी भारत से लोगों को इस देश में लाया जाना ज़ारी था। इस दृष्टि से मेरे पिता मेरे लिए इतिहास के सबल साक्षी थे। भारतीयों को लाकर गोरों की ज़मींदारी के झोंपड़ीनुमा घरों में बसाया जाता था। तब भारतीयों के दो वर्ग हो जाते थे। एक वर्ग के लोग वे होते थे जिन्हें जहाज़ से उतरने पर गोरों की ओर से बनाये गये झोंपड़ीनुमा घरों में रखा जाता था। वे गोरों के बंधुआ जैसे मज़दूर होते थे। दूसरे वर्ग के लोग वे हुए जो भारत से सब के साथ जहाज़ में आते थे, लेकिन काट-छाँट जैसी नीति में पगे होने से वे गोरों के खेमे में चले जाते थे। वे सरदार और पहरेदार बन कर अपने ही लोगों पर कोड़ों की मार बरसाते थे।

विस्थापन का दर्द तो उन अतीत जीवियों का हुआ जो इस के भुक्तभोगी थे। मैं उन लोगों के विस्थापन वाले इतिहास से बहुत दूर पड़ जाता हूँ। परंतु मैं पीढ़ियों की इस दूरी का खंडन भी कर रहा हूँ। कहने का मेरा तात्पर्य है उन लोगों का विस्थापन मेरे अंतस में अपनी तरह से एक कोना जमाये बैठा होता है और मैं उसे बड़े प्यार से संजोये रखता हूँ। इसी बात पर मेरा मनोबल यह बनता है कि मैं भारतीयों के विस्थापन को मानसिक स्तर पर जीता आया हूँ। यहीं नहीं, बल्कि मैं तो कहूँ अपने छुटपन में मैं अपने छोटे पाँवों से इतिहास की गलियों में बहुत दूर तक चला भी था।

 

प्रश्न—2… कहावत है कि धरती से एक पौधे को उखाड़ कर दूसरी जगह लगाया जाता है तो उसे पनपने में काफ़ी समय लगता है / कभी पनप भी नहीं पाता. शायद यही स्थिति आदमी के साथ भी होती है कि उसे विस्थापन का असह्य दर्द झेलना पडता है और अनेक कठिनाइयों / अवरोधों के बाद वह सामान्य जिंदगी जी पाता हैउन तमाम लोगो के पास वह कौनसा साधन था कि वे अपने को जिंदा रख पाए और अपनी अस्मिता बचाए रख सके?

उत्तर- जहाज़ में तमाम उत्पीड़न झेलते ये लोग मॉरिशस पहुँचे थे। अपना जन्म देश पीछे छूट जाने का दर्द इन के सीने में सदा के लिए रह गया था। इस देश में आने पर सब से पहले इन की महत्त्वाकाक्षाएँ ध्वस्त हुई थीं इसलिए विस्थापन इन्हें बहुत सालता रहा होगा। बहुत से लोग तो बंदरगाह में डाँट-फटकार और तमाम शोषण जैसी प्रवृत्तियों से टूट कर रोने लगते थे और उन के ओठों पर एक ही चीत्कार होता था मुझे मेरे देश वापस भेज दिया जाए। यह मान्यता अब भी मॉरिशस में पुख्त ही चलती आई है कि भारतीयों को इस ठगी से लाया गया था वहाँ पत्थर उलाटने पर सोना पाओगे। उन लोगों की महत्त्वाकाक्षाओं में से यह एक रही हो, लेकिन इस का विखंडन तो तभी शुरु हो गया होगा जब वे जहाज़ में सवार होने पर अत्याचार से चिथड़े हो रहे होंगे। ओछी मानसिकता के बंधन में यहाँ आने पर कौन याद रखता. क्या - क्या पाने इस देश में आए थे। बल्कि जो मन का संस्कार था, इज्ज़त आबरू का अपना जो अपार पारिवारिक वैभव था सब दांव पर ही तो लगते चले गए थे। तब तो दर्द यहाँ ज्यों-ज्यों गहराता होगा विस्थापन की आह प्रश्न बन कर ओठों पर छा जाती होगी --अपनी मातृभूमि छोड़ने की मूर्खता भरी अक्ल किस स्रोत से आई होगी?

भारत से विस्थापित लोगों का 1834 के आस पास मॉरिशस आगमन शुरु जब हुआ था तब उन में ऐसे लोग तो निश्चित ही थे जो भारतीय वांङ्मय के अच्छे जानकार थे। उन्हीं लोगों ने तुलसी मीरा कबीर तथा अन्यान्य कवियों की कृतियों का यहाँ प्रचार किया था। शादी के गीत, भक्ति काव्य और इस तरह से भारतीय कृतियों और संस्कृति का इस देश में विस्तार होता चला गया था। जो साधारण लोग थे उन के अंतस में भी समाने लगा था कि अपने भारत की इतनी सारी धरोहर होने से हम इस देश में अपने को धन्य पा रहे हैं। कालांतर में भोलानाथ नाम के एक सिक्ख सिपाही ने सत्यार्थ प्रकाश ला कर यहाँ के लोगों को उस से परिचित करवाया। इस देश में यथाशीघ्र आर्य समाज की लहर चल पड़ी थी। यह सामाजिक चेतना की कृति थी। इस की आवश्यकता थी और यह सही वक्त पर लोगों को उपलब्ध हुई थी।

प्रश्न-३- मॉरिशस गन्ने की खेती के लिए मशहूर रहा है. निश्चित ही आपके पिताश्री भी गन्ने के खेतों में काम करते रहे होंगे. वे बीते दिनों की तकलीफ़ों के बारे में आपको सुनाते भी रहे होंगे कि किस तरह से उन्हें पराई धरती पर यातनाएं सहनी पड़ी थी.?

उत्तर-- मेरे किशोर काल में मेरे पिता मुझे इस देश में आ कर बसे हुए भारतीयों की वेदनाजनित कहानियाँ सुनाया करते थे। अपने पिता से सुना हुआ भारतीयों का दुख-दर्द मेरी धमनियों में बहुत गहरे उतरता था। यह तो बाद की बात हुई कि मैं लेखक हुआ। परंतु कौन जाने मेरे पिता अप्रत्यक्ष रूप से मुझे लेखन कर्म के लिए तैयार करते थे। वे मेरे लिए अच्छी कलम खरीदते थे। पाटी, पुस्तक और पढ़ाई के दूसरे साधनों से मानो वे मुझे माला माल करते थे। मेरे पिता अनपढ़ थे, लेकिन उन्हें ज्ञात था सरस्वती नाम की एक देवी है जिस के हाथों में वीणा होती है और उसे विद्या की देवी कहा जाता है। मेरे पिता ने सरस्वती का कैलेंडर दीवार पर टांग कर मुझ से कहा था विद्या प्राप्ति के लिए नित्य उस का वंदन करूँ। वह एक साल के लिए कैलेंडर था, लेकिन उसे मूर्ति मान कर हटाया नहीं जाता था। वर्षों बाद हमारा नया घर बनने के बाद ही किसी और रूप में मेरे जीवन में सरस्वती की स्थापना हुई थी।

प्रश्न-  -निश्चित ही उनकी उस भयावह स्थिति की कल्पना मात्र से आप भी विचलित हुए होंगे और एक साहित्यकार होने के नाते आपने उस पीड़ा को अपनी कलम के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की है?

उत्तर- मैंने बहुत सी विधाओं में लेखन किया है और अपने देश से ले कर अंतरसीमाओं तक मेरी दृष्टि जाती रही है। यहाँ मेरे पूर्वजों के विस्थापन का संदर्भ अपने तमाम प्रश्नों के साथ मेरे साथ जुड़ जाने से मैं अपने उसी लेखन की यहाँ बात करूँगा जो विस्थापन से संबंध रखता है।

मैंने ‘इतिहास का दर्द’ शीर्षक से एक नाटक  [1976 ] लिखा था जो पूरे देश में साल तक विभिन्न जगहों में मंचित होता रहा था। यह पूर्णत: भारतीयों के विस्थापन पर आधारित था। मेरे लिखे शब्दों को पात्र मंच पर जब बोलते थे मुझे लगता था ये प्रत्यक्षत: वे ही भारतीय विस्थापित लोग हैं जो मॉरिशस आए हैं और आपस में सुख-दुख की बातें करने के साथ इस सोच से गुजर रहे हैं कि मॉरिशस में अपने पाँव जमाने के लिए कौन से उपायों से अपने को आजमाना ज़रूरी होगा।

अपने लेखन के लिए मैंने भारतीयों का विस्थापन लिया तो यह अपने आप सिद्ध हो जाता है मैंने उन के सुख - दुख, आँसू, शोषण, गरीबी, रिश्ते सब के सब लिये। मैंने लिखा भी है मैं आप लोगों के नाम लेने के साथ आप की आत्मा भी ले रहा हूँ। मैं आप को शब्दों का अर्घ्य समर्पित करना चाहता हूँ, अत: मेरा सहयोगी बन जाइए। उन से इतना लेने में हुआ यह कि मैं भी वही हो गया जो वे लोग होते थे। किसी को आश्चर्य होना नहीं चाहिए अपने देश के इतिहास पर आधारित अपना छ: खंडीय उपन्यास पथरीला सोना लिखने के लिए जब मैं चिंतन प्रक्रिया से गुजर रहा था तब मैं उन नष्टप्रायभित्तियों के पास जा कर बैठता था, जिन भित्तियों के कंधों पर भारतीयों के फूस से निर्मित मकान तने होते थे। जैसा कि मैंने ऊपर में कहा ये मकान उन के अपने न हो कर फ्रांसीसी गोरों के होते थे। उन मकानों में वे बंधुआ होते थे। मैंने उन लोगों से बंधुआ जैसे जीवन से ही तारतम्य स्थापित किया और लिखा तो मानो उन्हीं की छाँव में बैठ कर। बात यह भी थी कि भारतीयों के उन मकानों या भित्तियों का मुझे चाहे एक का ही प्रत्यक्षता से दर्शन हुआ हो, अपनी संवेदना और कल्पना से मैंने उसे बहुत विस्तार दिया है। तभी तो मुझे कहने का हौसला हो पाता है मैंने उसे भावना के स्तर पर जिया है। पर्वत की तराइयों के पास जाने पर मुझे एक आम का पेड़ दिख जाए तो मेरी कल्पना में उतर आता है मेरे पूर्वजों ने अपने संगी साथियों के साथ मिल कर इसे रोपा था। मेरे देश में तमाम नदियाँ बहती हैं जिन्हें मैंने मिला कर मनुआ नदी नाम दिया है। इसी तरह पर्वत यहाँ अनेक होने से मैंने बिंदा पर्वत नाम रख लिया और आज मुझे सभी पर्वत बिंदा पर्वत लगते हैं। मैंने सुना है दुखों से परेशान विस्थापित भारतीयों की त्रासदी ऐसी भी रही थी कि पर्वत के पार भागते वक्त उन के पीछे कुत्ते दौड़ाये जाते थे। कुआँ खोदने के लिए भेजे जाने पर ऊपर से पत्थर लुढ़का कर यहाँ जान तक ली गई हैं। बच्चे खेल रहे हों और कोई गोरा अपनी घोड़ा बग्गी में जा रहा हो तो आफ़त आ जाती थी। यह न पूछा जाता था स्कूल क्यों नहीं जाता। कहा जाता था बड़े हो गए हो तो खेतों में नौकरी करने क्यों नहीं आते हो। पर ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में यह लिखित मिलने की कोई आशा न करे,क्योंकि लिखने की कलम उन दिनों केवल फ्रांसीसी गोरों की होती थी।

 

और भी कई ज्वलन्त प्रश्न थे जिन्होंने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया था. एक सचेत कहानीकार/उपन्यासकार/ व्यंग्यकार/लघुकथाकार/युगदृष्टा समाज के बनते-बिगड़ते रिश्ते को लेकर इतना सजग और चौकन्ना होगा, इसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी. सही कहा गया कि जब भी किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व में रुपातंरण होता है तो ऐसा व्यक्ति विशिष्ट होकर अन्वेषनीय हो जाता है. समाज एक ऐसी रचना है जिसमें अनेक प्रकार की मूच्छाएँ होती हैं. समाज को चैतन्य रखने के लिए उन मूच्छाऑं को तोड़ना आवश्यक होता है. एक क्रियाशील और उपलब्धि-बोध से युक्त समाज तभी बनता है. जब समाज जड़ताओं से मुक्त हो, अन्ध-आस्थाओं से मुक्त हो और संवादहीनता के शून्य से मुक्त हो. जीवन धर्मी समाज को चेतनाधर्मी समाज बनाने के लिए समाज में निहित अनेक छद्म पहचानने होंते हैं, अनेक वर्जनाओं के विरुद्ध विश्वसनीय रणनीति तैयार करनी होती है. और संस्कारों, मूल्यों एवं मर्यादाओं की एक सतत श्रृंखला रचनी होती है. इसके कई माध्यम हो सकते हैं. रामदेव धुरंधर जी ने काफ़ी हद तक जाकर पर्वत-सी पीर/समस्याओं की जड़ों को न सिर्फ़ टटोला बल्कि उस पर कभी व्यंग्य के माध्यम से तो कभी अपने उपन्यासों के माध्यम से अपने अंतस में समाए दुख-दर्दों को कोरे कागजों पर जस का तस उतार दिया है.

श्री धुरंधरजी के इस दुर्घष प्रयास को, जिसे जिद कहें तो ज्यादा उचित होगा कि चाहे जितनी शारीरिक, मानसिक थकान का सामना उन्हें करना पड़ा हो, चाहे जितना श्रम करना पड़ा हो, उन्होंने अपने अंतस की पीड़ा को जगजाहिर किया है. यह उनकी जिद का ही परिणाम है कि हमें एक-से बढ़कर-एक उपन्यास, लघुकथाएं आदि पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. उन्हें हृदय से आभार-साधुवाद. साधुवाद इसलिए भी कि उन्होंने हिन्दी के खजाने को अक्षुण्य बनाने में बड़ी भूमिका का निर्वहन किया है. उनके इस अथक प्रयास को र्रेखांकित करते हुए  ”येरोस्लाव सइफ़र्न” की कविता बरबस ही मुझे याद हो आयी. वे लिखती हैं..

                                           फ़िर एक फ़ूलदान में मैंने एक गुलाब लगाया                                                                                                                              एक मोमबत्ती जलाई                                                                                                                                                               और अपनी पहली कविताएं लिखना शुरु किया                                                                                                                             “जागो मेरे शब्दों की लपट                                                                                                                                                      ऊपर उठो ! “                                                                                                                                                                        चाहें जल जाएं मेरी उँगलियाँ

 

                               बाइसवीं पावस व्याख्यानमाला                                                                                                                                             एक रपट

            

हिन्दी भवन भोपाल में आयोजित बाईसवीं पावस व्याख्यानमाला में, हिन्दी साहित्य के गौरव कवि प्रदीप एवं डा.शिवमंगल सिंह “सुमन” की जन्मशताब्दी समारोह पर केन्द्रीत त्रि-दिवसीय समारोह ( 17से 19 जुलाई2015) विशाल जनसमूह की उपस्थिति में, अपनी संपूर्ण भव्यता और गरिमा के साथ सानन्द संपन्न हुआ. यह वह अवसर था जब स्वयं देवराज इन्द्र अपने अनुचरों (मेघों) की उपस्थिति में जल बरसा रहे थे. भीषण गर्मी और उमस से आतप्त तन और मन दोनों खिल से जाते हैं. मौसम खुशनुमा हो उठता है.

 इस प्रतिष्ठा समारोह में कवि प्रदीप की सुपुत्री मितुल प्रदीप, सुमनजी के सुपुत्र कर्नल अरूणसिंह सुमन, धर्मयुग के संपादक रहे प्रख्यात साहित्कार स्व. धर्मवीर भारतीजी की पत्नि श्रीमती पुष्पा भारतीजी, रमेशचन्द्र शाहजी, डा प्रभाकर श्रोत्रियजी ,डा.प्रमोद त्रिवेदी, डा दामोदर खडसे, ध्रुव शुक्ल, डा विजय बहादुर सिंह,,डा श्रीराम परिहार आदि एवं महिला कथाकारों सहित देश के लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार-लेखक-कवि-चित्रकार-संपादक एवं पत्रकार बडी संख्या में उपस्थित थे

विगत बाईस वर्षों से अनवरत आयोजित की जा रही पावस व्याख्यानमाला के अलावा शरद-व्याख्यानमाला, वसन्त व्याख्यानमाला तथा अन्य होने वाले साहित्यिक अनुष्ठानों की अनुगूंज देश के कोने-कोने में सुनी जा सकती है. यदि इस नगरी को साहित्य का महातीर्थ की संज्ञा से अलंकृत किया जाए तो आतिशयोक्ति नहीं होगी.

हिन्दी भवन भोपाल में लगभग पूरे वर्ष साहित्यिक अनुष्ठान आयोजित होते रहते हैं. इन आयोजनों के बारे में जानने के साथ ही, हम हिन्दी भवन की स्थापना तथा अन्य आयोजनों के बारे में, संक्षिप्त जानकारी भी प्राप्त करते चलें, तो उत्तम होगा.

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल, जहाँ वह अपने विशाल ताल के लिए जगप्रसिद्ध है. इसके अलावा यहाँ बहुत कुछ है देखने के लिए-. जैसे लक्ष्मीनारायण मन्दिर, मोती मस्जिद, ताज-उल-मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, पुरातात्विक संग्रहालय,भारत भवन,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भीम-बेटका, भोजपुर. इनके अलावा श्यामला हिल्स पर स्थित है गांधी भवन, मानस भवन और इन दोनो भवनों के बीच स्थित है साहित्य का महातीर्थ हिन्दी भवन.

संभवतः भारत का यह एक मात्र ऎसा स्थान है जहाँ होली के पावन पर्व पर शहर के तथा बाहर से आए हुए साहित्यकार एकठ्ठे होकर रंग-बिरंगे त्योहार को सौहार्द के साथ मनाते हैं. यह वह स्थान है जहाँ दीपवाली जैसे त्योहार पर सभी साहित्यकार इकठ्ठा होकर दीपपर्व मनाते हैं.यह वही स्थान है जहाँ पर ऋतुओं के अनुसार पावस व्याख्यानमाला, शरद व्याख्यानमाला, वसन्त व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा हिन्दी दिवस पर साहित्यिक आयोजन आयोजित किए जाते हैं. हिन्दी से इतर जो साहित्यकार अपनी साहित्य-साधना कर रहे हैं, उन्हें भी यहाँ आमंत्रित कर उनका सम्मान किया जाता है.अतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भवन भोपाल देश का एकमात्र ऎसा स्थान है जहाँ पूरे वर्ष भर साहित्यिक आयोजन बडॆ पैमाने पर आयोजित किए जाते है. शायद ही कोई ऎसा साहित्यकार होगा, जो यहाँ न आया हो. सभी ने अपनी उपस्थिति से इस भवन के प्रांगण को गुलजार बनाया है. पावस व्याख्यानमाला अपने आपमें एक ऎसा अनूठा आयोजन है, जिसमें भारत के कोने-कोने से साहित्यकार आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और अपने आपको अहोभागी मानते हैं.

 पावस व्याख्यानमाला एक ऎसी अनूठी व्याख्यानमाला है जो प्रत्येक वर्ष के माह जुलाई में आयोजित की जाती है. यह वह समय होता है जब समूचा आकाश बदलॊं से अटा पडा होता है या बादलों का जमघट होना शुरू होता है. बादल तो खूब आते हैं,लेकिन बरसते नहीं हैं. शायद उन्हें इस बात का इन्तजार रहता होगा कि कब व्याख्यानमाला शुरू होती है? जैसे ही इसकी शुरूआत होती है, वे जमकर बरस उठते हैं. भीषण गर्मी और उमस के चलते जहाँ प्राण आकुल-व्याकुल हो रहे होते हैं, बादलों के बरसते ही राहत मिलना शुरू हो जाती है. मन प्रसन्नता से झूम उठता है.

जैसा कि आप जानते ही हैं कि एक नवम्बर 1956 को नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और पं रविशंकर शुक्ल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. ठीक इसी समय समिति का कार्यालय जो इन्दौर में स्थित था, भोपाल स्थानांतरिक हुआ और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यों में गति मिलती गई. हिन्दी के प्रति उत्कट प्रेम रखने वाले पंडितजी ने हिन्दी भवन के लिए सवा एकड भूमि आवंटित कर दी.

 कालांतर में म.प्र. के जो राज्यपाल और मुख्यमंत्री आए, उन सबका स्नेह और सहयोग मिलता गया. दानदाता भी पीछे कहाँ रहने वाले थे, उन्होंने ने भी इस के निर्माण में तन-मन-धन से सहयोग दिया. फ़लस्वरूप हिन्दी भवन का निर्माण पूरा हुआ और हिन्दी प्रचार समिति की व्यवस्थापिका सभा ने सर्वानुमति से प्रस्ताव पास कर पं.रविशंकर शुक्ल हिन्दी भवन न्यास का गठन किया.वर्तमान में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्री सुखदेव प्रसाद दुबेजी, मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पन्तजी, महामहिम राज्यपाल, मान.मुख्यमंत्री म.प्र.शासन, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के प्रधानमंत्री सहित अन्य गणमान्य नागरिक इस न्यास के न्यासी हैं.

“रामकाज किए बिना मोहे कहाँ विश्राम” की तर्ज पर चलने वाले मान.श्री कैलाशचन्द्र पंतजी आखिर चुप कैसे बैठ सकते थे ?. नयी-नयी योजनाएं आपके मन के भीतर आकार लेती चलती हैं.

                      

उसी का सुपरिणाम है कि इस पावन भूमि पर एक भव्य और सुन्दर साहित्यकार-निवास ने आकार ग्रहण किया. इसी भवन में निर्मित तेरह कमरे, देश के मुर्धन्य साहित्यकार –(१)श्री माखनलाल चतुर्वेदी,(२) आचार्य श्री विनयमोहन शर्मा, (३)श्री भवानी प्रसाद मिश्र, (४)श्री रामेश्वर शुक्ल “अंचल”, (५)डा.शिवमंगलसिंह सुमन, (६)डा.चन्द्रप्रकाश वर्मा, (७)श्री बालकृष्ण शर्मा “नवीन”, (८)श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान, (९)श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द (१०)श्री हरिकृष्ण प्रेमी तथा (११)श्रीकृष्ण सरलजी की पावन स्मृतियों को समर्पित किया गया. इसके अलावा एक वातानुकूलित सेमिनार कक्ष और एक सामान्य संगोष्ठी कक्ष का भी निर्माण किया गया, जिनका उपयोग साहित्यिक आयोजनो के लिए किया जाता है. यहाँ एक पुस्तकालय भी संचालित किया जाता है, जिसमें अनेकानेक विषयों की करीब छब्बीस हजार पुस्तकें पाठकों के लिए उपलब्ध हैं. सन 1972 से इस पुस्तकालय का संचालन म.प्र.शासन के स्कूल शिक्षा विभाग एवं नगर निगम भोपाल के सहयोग से किया जा रहा है. साहित्य की बेजोड द्वैमासिक पत्रिका “अक्षरा” का प्रकाशन विगत तीस वर्षॊं से हो रहा है.आज इसकी गणना देश की श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में होती है. म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पन्तजी इस पत्रिका के प्रधान सम्पादक और डा.सुनीता खत्रीजी सम्पादक हैं. अपनी श्रेष्ठ सम्पादकीय और पद्मश्री रमेशचन्द्र शाहजी के आलेख”शब्द निरन्तर”इस पत्रिका के प्राण होते हैं,जिन्हें पढकर आप चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकते. वक्ताओं के व्याख्यानों की आडियो-विडियो बनाकर उसे संरक्षित करना और “संवाद और हस्तक्षेप” का प्रकाशन कराना,कोई सरल काम नहीं है. इसी क्रम में “हिन्दी भवन संवाद” का मासिक अंक प्रकाशित होता है, जिसमें प्रदेश की साहित्यिक खबरें प्रमुखता से स्थान पाती हैं. हिन्दी भवन प्रदेश में संचालित समितियों के माध्यम से “प्रतिभा प्रोत्साहन प्रतियोगिताएँ” का आयोजन माह सितम्बर में करवाती है. इसमें कक्षा नौ से लेकर बारहवीं तक अध्ययनरत छात्र-छात्राएं भाग लेती है. देश भक्ति पर आधारित प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का मुखाग्र पाठ, साहित्यिक अंत्याक्षरी, लोकगीत गायन प्रति.तथा वाद-विवाद प्रतियोगिताएं होती है और इसमें विजेताओं को स्मृति-चिन्ह, प्रमाणपत्र, तथा नगद राशि प्रदत्त किए जाते है. इन प्रतियोगिताओं के आयोजन के पीछे बच्चों को देशप्रेम के अलावा अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति ललक जगाना होता है.

शरद व्याख्यानमाला का शुभारंभ 2003 में हुआ था. इसका उद्देश्य ज्ञान आधारित तथा मौलिक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया . विख्यात कवि एवं कथाकार स्व.श्री नरेश मेहताजी की स्मृति में वांगमय पुरस्कार स्थापित किया गया. इसी वर्ष (2003), सम-सामयिक- सामाजिक विषयों पर विचार करने की परम्परा को स्थापित करने के लिए, सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति श्री रमेशचन्द्र लाहोटीजी के गरिमामय उपस्थिति में बसन्त व्याख्यानमाला की शुरुआत हुई. यात्रा सिर्फ़ यहीं आकर नहीं रूकती नहीं. निर्बाध गति से बहती यह यह पुण्यसलिला अपने प्रवाह में अनेकानेक कीर्तिमान स्थापित करती हुई, अनेकों पडावों को स्पर्श करती हुई, आगे बढती रही है. इन्ही अनूठे आयोजनों में प्रतिष्ठित पुरस्कारों की भी स्थापना की गई. श्री नरेश मेहता वांगमय सम्मान 31000/-रू., श्री शैलेश मटियानी स्मृति चित्रा-कुमार कथा पुरस्कार 11000,रू.,श्री वीरेन्द्र तिवारी स्मृति रचनात्मक पुरस्कार 21000/-,रू. श्री सुरेश शुक्ल “चन्द्र” नाट्य पुरस्कार 11000/-रू.,श्रीमती हुक्मदेवी स्मृति प्रकाश पुरस्कार 5000/-,रू, इन पुरस्कारों के अलावा अन्य चौदह पुरस्कार दिए जाने की यहाँ व्यवस्था है. जिनमें हिन्दीतर भाषी हिन्दी सेवियों(सभी भारतीय भाषाओं के) को प्रदेश के महामहीम राज्यपाल द्वारा प्रदत्त किए जाते हैं.

प्रथम सत्र

 शुक्रवार,17 जुलाई 2015 ....प्रथम सत्र 10  से 1.30      विषय-कवि प्रदीप :  व्यक्ति और रचना संसार.

 

                                

                   श्रीमती पुष्पा भारती जी                                                               श्रीमती मितुल प्रदीप

   

 अध्यक्षता     श्रीमती पुष्पा भारतीजी                                                                                                          

 वक्ता -      डा प्रमोद त्रिवेदी, सुश्री मितुल प्रदीप, डा,दामोदर खडसे, ध्रुव शुक्ल, डा. विजयबहादुर सिंह                                                                                          संचालन-       डा.सुनीताजी                       .

 

 द्वितीय सत्र.                          अपरान्ह 3  से 6-00                                          

  विषय”-  डा.शिवमंगलसिमः सुमन : व्यक्तित्व एवं कृतित्व.

              अध्यक्षता     डा.प्रभाकर श्रोत्रिय                                                                                                                                वक्ता         श्री सुधाकर शर्मा, डा.शैलेन्द्र कुमार शर्मा, डा श्रीराम परिहार, प्रो.रमेश  दवे,श्री प्रयाग शुक्ल, श्री अरूणसिंह सुमन                                                                                       .

          

       संचालन        श्री नरेन्द्र दीपक

शाम सात बजे से सांस्कृतिक संध्या के अन्तरगत प्रदीपजी एवं सुमनजी के गीतों की  संगीतमय प्रस्तुति. * दोनो कवियों के जीवन पर वीडियो प्रदर्शन.

शनिवार : 18  जुलाई 2015   तृतीय सत्र. प्रातः 10  से 1-3o विषय “हिन्दी कहानियाँ   : नये आयाम                                       

                                                        

                              

अध्यक्ष-                 श्री रमेशचन्द्र शाहजी.                                                                                  

 वक्ता-  प्रो.स्मृति शुक्ला,  डा. उर्मिला शिरीष, श्री हारिसुमन बिष्ट, डा.सुधा  अरोडा, श्री मुकेश वर्मा, श्री सूर्यकान्त   नागर,                    

 संचालन                   डा. ललिता त्रिपाठी.

              चतुर्थ सत्र- अपरान्ह 3  से 6.30                                                                                                   विषय- महिला कथाकारों द्वारा नये रास्ते की तलाश                                                   

 

                            

 

     अध्यक्षता-          श्री प्रयाग शुक्ल                                                                                                                       

              वक्ता- श्रीमती स्वाति तिवारी, अल्पना मिश्र, डा.शरदसिंह, डा. मीनाक्षी जोशी,  डा.कमलकुमार,                                                          संचालन -                  डा.राजकुमारी शर्मा.                                                                                                                               हस्तक्षेप-                   सुश्री शीला मिश्रा (२) विद्या गुप्ता.                                                                                                                               

    पंचम सत्र- दिन रविवार 19  जुलाई 2015 प्रातः 10 से  1.30 विषय:विश्व हिन्दी सम्मेलन से अपेक्षाएं   

                     

                                          

             

अध्यक्षता -    श्री अच्युतानंद मिश्र.                                                                                                            

मुख्य अतिथि-   श्री मनोज श्रीवास्तव                                                                                                         

वक्ता-   डा. जवाहर कर्नावट, डा. विशेष गुप्ता, डा देवेन्द्र दीपक, डा. विपिन बिहारी  कुमार, डा. विजयकुमार मल्होत्रा, डा. अमरनाथ, संचालन- श्रीमती रक्षा सिसोदिया     

      इस महत्तवपूर्ण और अन्तिम सत्र में देश के हृद्य स्थल स्थित एवं गौरवशाली प्रदेश भोपाल में आयोजित होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन के बारे में मंच पर उपस्थित विद्वतजनों ने अपने विचार रखे रखे, जो हिन्दी की दशा और दिशा को नए आयाम दे सके.                                                            

और अन्त में.   

                             दादा का आशीर्वाद तो सदा मेरे साथ रहा है और रहेगा

                            

 

              हिन्दी भवन से मेरा जुडाव विगत दस वर्षों से है. इससे पूर्व मैं अन्य समितियों से जुड़ा रहा,लेकिन वहाँ साहित्य कम और राजनीतियाँ ज्यादा थी. शय और मात का खेल भी इनमें बराबर चलता रहता था. हम आपस में मिलते-जुलते तो थे,लेकिन आत्मीयता का अंश मात्र भी कहीं देखने को नहीं मिलता था. संयोग से मित्र स्व.प्रमोद उपाध्यायजी ने मेरी भेंट दादा से करवायी. ( सम्मा.पन्तजी को सभी इसी संबोधन से पुकारते हैं.).यह भेंट मेरे लिए वरदान स्वरूप सिद्ध हुई. और आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, वह केवल इसी जुड़ाव और दादा के आशीर्वाद की वजह से फ़लित हुआ है, संस्था से जुड़ते ही मैंने महसूस किया था कि यह वह स्थान है,जिसकी मुझको वर्षों से तलाश थी.

 हिन्दी भवन के प्रति गहरा समर्पण और लगाव रखने वाले श्री श्यामसुन्दर शर्माजी, युगेश शर्माजी, डा.सुनीता खत्रीजी, श्रीमती रक्षा सिसोदिया,रामचन्द्र चौधरी,ओम मालवीय,उषा जायसवाल, कमला सक्सेना, शुभा तिवारी, सीमा नेमा, महेश सक्सेनाजी,ओम मालवीय अथवा दिलीप तिवारी, लक्षपति अथवा नारायण सभी की मिलनसारिता और आत्मीय प्रेम देखने और महसूस करने वाला होता है.                                       .

     

                                                                           

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                                 सुहागिनों के अखण्ड सौभाग्य का रक्षक—हरितालिकाव्रत(तीज)                                                                                                                                                                                           (श्रीमती शकुन्तला यादव)

 

                                                                                                                                                                                           मध्यप्रदेश, पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और झारखण्ड आदि प्रांतों में भाद्रपद शुक्ल तृतीया को सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने अखण्ड सौभाग्य की रक्षा के लिए बडी श्रद्धा, विश्वास और लगन के साथ हरितालिकाव्रत(तीज) का उत्सव मनाती हैं. जिस त्याग-तपस्या और निष्ठा के साथ वे व्रत रखती हैं, वह बडा ही कठिन होता है. इसमें न तो वे फ़लाहार-सेवन करती हैं और न ही जल गृहण करतीं हैं. व्रत के दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात व्रतपारायण स्त्रियाँ सौभाग्य-द्रव्य एवं वायन छूकर ब्राह्मणॊं को दान देती है. उसके बाद ही जल पीकर पारण करती हैं. इस व्रत में मुख्यतः शिव-पार्वती तथा श्री गणेश की पूजा की जाती है,                                                                                                                                                                                                                             इस व्रत को सर्वप्रथम गिरिराजकिशोरी उमा ने किया था, जिसके फ़लस्वरुप उन्हें भगवान सदाशिव वर के रुप में प्राप्त हुए थे. इस दिन स्त्रियाँ वह कथा सुनती हैं,जिसमें पार्वतीजी के त्याग, संयम, धैर्य तथा एकनिष्ठ  पातिव्रत-धर्म पर प्रकाश डाला गया है,जिससे सुनने वाली स्त्रियों का मनोबल ऊँचा उठता है.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     कहते हैं , दक्षकन्या सती जब पिता के यज्ञ में अपने पति शिवजी का अपमान न सहकर योगाग्नि में दग्ध हो गयी थीं, तब वे मैना और हिमाचल की तपस्या के फ़लस्वरुप उनकी पुत्री के रुप में पार्वती के नाम से जन्मी थीं. इस नए जन्म में भी उनको पूर्व की स्मृतियाँ अक्षुण्य बनी रही थी और वे नित्य ही भगवान शिव के चरणॊं में भक्तिभाव से निमग्न रहती. जब वे वयस्क हो गयीं तब पिता की आज्ञा से शिवजी को अपने मनोकूल वर की प्राप्ति के लिए तपस्या करने लगॊ. उन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर बडी कठोर साधनाएं कीं. जब उनकी तपस्या फ़लोन्मुख हुई, तब एक दिन देवर्षि नारद हिमवान के यहाँ पधारे. हिमवान ने अपना अहोभाग्य माना और उनकी बडी श्रद्धा के साथ आथित्य-सत्कार किया. कुशलक्षेम के पश्चात नारदजी ने कहा -“भगवान विष्णु आपकी कन्या का वरण करना चाहते हैं, उन्होंने मेरे द्वारा यह संदेश कहलवाया है. इस सम्बन्ध में आपका जो विचार हो उससे मुझे अवगत कराएं. नारदजी ने अपनी ओर से भी प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया. हिमवान राजी हो गए, उन्होंने स्वीकृति दे दी. देवर्षि नारद पार्वती के पास जाकर बोले-“ तुम्हें तुम्हारी कठोर तपस्या का फ़ल मिल गया है. तुम्हारे पिता ने भगवान श्री विष्णु के साथ तुम्हारा विवाह पक्का कर दिया है”.इतना कहकर नारदजी अन्तर्ध्यान हो गए. उनकी बात पर विचार करके पार्वती के मन में बडा कष्ट हुआ. और वे तत्काल मूर्छित होकर गिर पडीं.                                                                                                             

              सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने शिव को वर के रुप में चुन लिए जाने का अपना मंतव्य कह सुनाया. इस बात को सुनकर सखियों ने कहा;-“तुम्हारे पिता तुम्हें लिवा जाने के लिए आते ही होंगे. जल्दी चलो, किसी दूसरे गहन वन में जाकर हम छुप जाएँ.” ऎसा ही हुआ. उस वन के एक पर्वतीय कन्दरा के भीतर पार्वतीजी शिवलिंग बनाकर उपासानापूर्वक उनकी अर्चना-पूजन आरम्भ की. कठोर तपस्या से शिव का सिंहासन डोल उठा और वे पारवतीजी के समक्ष प्रकट हुए और उन्होने उसे पत्नि के रुप में वरण करने का वचन देकर अन्तर्ध्यान हो गए. तत्पश्चात अपनी पुत्री का अन्वेशण करते हुए हिमवान भी वहाँ आ पहुँचे और सब बातें जानकर उन्होंने पार्वतीजी का विवाह भगवान शंकर से साथ कर दिया.

              देवी पार्वतीजी ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के हस्त नक्षत्र में यह आराधना की थी, इसलिए इस तिथि को कुवारी कन्याएं अपने भावी वर की प्राप्ति की कामना से व्रत करती हैं. तथा सुहागन स्त्रियाँ अपने पति के दिर्घायु होने के लिए व्रत करती चली आ रही हैं.                                                                                                                                                                                                               “आलिभिर्हरिता यस्मात तस्मात सा हरितालिका” अर्थात सखियों के द्वारा हरी गयीं- इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्रत का नाम “हरितालिका” हुआ. इस व्रत के करने से नारी को अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है.                                                                                                                                                                                                                (श्रीमती शकुन्तला यादव)                                                                                                                                                                                                     

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