यात्रा (12)
( ताल में ताल भोपाल का
ताल )
हिन्दी का
महातीर्थ-- हिन्दी भवन भोपाल.
हिन्दी भवन भोपाल
में लगभग पूरे वर्ष साहित्यिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं. इन आयोजनों के बारे में
जानने के साथ ही, हम हिन्दी भवन की स्थापना तथा अन्य आयोजनों के बारे में,
संक्षिप्त जानकारी भी प्राप्त करते चलें, तो उत्तम होगा.
मध्यप्रदेश की
राजधानी भोपाल, जहाँ वह अपने विशाल ताल के लिए जगप्रसिद्ध है. इसके अलावा यहाँ
बहुत कुछ है देखने के लिए-. जैसे लक्ष्मीनारायण मन्दिर, मोती मस्जिद,
ताज-उल-मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, पुरातात्विक संग्रहालय, भारत भवन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भीम-बेटका, भोजपुर.
इनके अलावा श्यामला हिल्स पर स्थित गांधी भवन, मानस भवन और इन दोनो भवनों के बीच स्थित
है,राष्ट्रभाषा हिन्दी को समर्पित साहित्य का महातीर्थ हिन्दी भवन.
संभवतः भारत का यह
एक मात्र ऎसा स्थान है जहाँ होली के पावन पर्व पर शहर के तथा बाहर से आए हुए
साहित्यकार एकठ्ठे होकर रंग-बिरंगे त्योहार को सौहार्द के साथ मनाते हैं. यह वह
स्थान है जहाँ दीपवाली जैसे त्योहार पर सभी साहित्यकार इकठ्ठा होकर दीपपर्व मनाते
हैं. यह वही स्थान है
जहाँ पर ऋतुओं के अनुसार पावस व्याख्यानमाला, शरद व्याख्यानमाला, वसन्त
व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा हिन्दी दिवस पर साहित्यिक आयोजन
आयोजित किए जाते हैं. हिन्दी से इतर जो साहित्यकार अपनी साहित्य-साधना कर रहे हैं,
उन्हें भी यहाँ आमंत्रित कर उनका सम्मान किया जाता है. अतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भवन भोपाल देश का एकमात्र ऎसा स्थान है जहाँ पूरे वर्ष भर साहित्यिक आयोजन बडॆ पैमाने पर आयोजित किए जाते है. शायद ही कोई ऎसा साहित्यकार होगा, जो यहाँ न आया हो. सभी ने अपनी उपस्थिति से
इस भवन के प्रांगण को गुलजार बनाया है. पावस व्याख्यानमाला अपने आपमें एक ऎसा
अनूठा आयोजन है, जिसमें भारत के कोने-कोने से साहित्यकार आकर अपनी उपस्थिति दर्ज
कराते हैं और अपने आपको अहोभागी मानते हैं.
स्वाधीनता संग्राम
के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम स्वाधीन भारत के लिए परिकल्पना
दी थी कि-“ एक राष्ट्र, एक राष्ट्रभाषा हो.” इसी परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए
सन १९३६ में उन्होंने वर्धा ग्राम में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की थी.
संस्था का उद्देश्य राष्ट्रभाषा का प्रचार-प्रसार और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना
था. कार्यवाही पंजी में हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों में निम्नलिखित सदस्य थे’-
१.
महात्मा गांधी
२.
डा.राजेन्द्रप्रसाद
३.
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन
४.
सेठ श्री जमनालाल बजाज
५.
श्री काका कालेलकर
६.
श्री ब्रिजलाल बियाणी
७.
श्री हरिहर शर्मा
८.
श्री वियोगी हरि
९.
श्री शंकर राव देव
१०.
श्री बाबा राघवदास.
दक्षिण के चार प्रांतों (केरल, तमिलनाडू,आंध्र और कर्नाटक) को छॊड़कर समिति का
कार्यक्षेत्र पूरे भारत में स्वीकृत किया गया. उसी संदर्भ में वर्ष १९५४ से पहले
मध्य-भारत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गठित की गई और सीतामऊ के महाराजकुमार
रघुवीरसिंह इसके अध्यक्ष बने.
एक नवम्बर १९५६ को नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और पं.रविशंकर
शुक्ल प्रथम मुख्यमंत्री बने. वर्धा महाराष्ट्र के अंतरगत रहा. मध्यप्रदेश का गठन
होने के बाद समिति को म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में परिवर्तत कर प्रांतीय
कार्यालय इन्दौर से भोपाल स्थान्तरित किया गया.
समिति के कार्य को स्थायित्व देने के लिए मध्यप्रदेश शासन
ने भूखण्ड दिया और शासन के तथा जनता के सहयोग से हिन्दी भवन का निर्माण हुआ. समिति
के संस्थापक मंत्री संचालक स्वर्गीय श्री बैजनाथप्रसाद दुबे जी थे. २८ नवम्बर १९८८
को उनके निधन के बाद यह दायित्व श्री कैलाशचन्द्र पंत को सौंपा गया.
इस अवधि में समिति के अध्यक्ष पद को निम्नलिखित महानुभावों ने सुशोभित किया.
१.श्री महाराज कुमार रघुवीरसिंह १९५४-१९६६
तक
२.श्री सौभाग्यमल जैन १९६६-१९८२
तक
३.श्री तनवीरसिंह कीर १९६२-१९९१
तक
४.श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा १९९१०१९९३
तक
५. श्री तनवीरसिंह कीर १९९३-२००१
तक
६.श्री वीरेन्द्र तिवारी २००१-२००६
तक
७.श्री रमेश दवे २००६-२०१३ तक
८.श्री सुखदेव प्रसाद दुबे २०१३-
सन १९५७ से १९६६ तक निम्न महानुभावों ने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में समिति
को नेतृत्व प्रदान किया
१. सुश्री महारानी पद्मावती देवी
२.श्री नारायणप्रसाद शुक्ला
३.श्री चन्द्रप्रभाष शेखर
४.श्री सूरजमल गर्ग
संस्था के उद्देश्य
·
हिन्दी को राष्ट्रभाषा और विश्वभाषा बनवाने में सहयोग करना.
·
हिन्दी भाषा में साहित्येतर ज्ञान-विषय़ों पर पुस्तकों का लेखन एवं प्रकाशन
·
राष्ट्रभाषा प्रेम के साथ राष्ट्रीयता की भावनाओं में वृद्धि करना
·
लोकभाषाओं का संवर्धन और प्रकाशन
·
भारतीय भाषाओं के मध्य अन्तर्संवाद स्थापित कर भाषायी सद्भाव बढ़ाना
·
समाज के साहित्यिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक विकास की दिशा में आयोजन करना
·
हिन्दी हित संवर्धन ही संस्था का मुख्य उद्देश्य है
·
हिन्दी परीक्षाओं का संचालन कर हिन्दी का प्रचार और भाषा ज्ञान में प्रावीण्य
प्रदान करना.
इन्दौर से भोपाल स्तानांतरित होने के साथ ही समिति के कार्य को गति मिलती गई.
यह पं.रविशंकर जी शुक्ल (तत्कालीन मुख्य मंत्री, म.प्र.शासन) के हिन्दी प्रेम का अनुपम उदाहरण है कि
उन्होंने हिन्दी भवन के लिए राजधानी में सवा एकड़ भूमि आवंटित की. कालान्तर में जो
भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री आए उन सबका म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति को
अपेक्षानुसार स्नेह और सहयोग मिलता रहा. शनैः-शनैः हिन्दी प्रेमी लोग भी समिति से
जुड़ते गए और समिति आत्मनिर्भर होती गई. आज जिस विशाल स्वरूप में म.प्र.राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति और उसका हिन्दी भवन खड़ा है वह राष्ट्रभाषा के हित में उठे उदार
हाथों, हिन्दी प्रेमियों और साहित्यकारों के अथक प्रयासों का ही प्रतिफ़ल है. नगर,
प्रदेश और देश में फ़ैले हजारों हाथ ही समिति की ताकत भी है और गौरव भी. हिन्दी भवन
का निर्माण पूरा हो जाने पर म.प्र.रा.भा.प्र.समिति की व्यवस्थापिका सभा ने
सर्वानुमति से प्रस्ताव पारित कर पं.रविशंकर शुक्ल हिन्दी भवन न्यास का गठन किया.
इस न्यास के पंजीयन पत्र पर प्रारंभिक हस्ताक्षरकर्ताओं के रूप में निम्नलिखित
व्यक्तियों के नाम सम्मिलित हैं
१.
महामहिम राष्ट्रपति श्री के.सी.रेड्डी
२.
श्री श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री
३.
श्री सौभाग्यमल जैन.
प्रारंभिक न्यासियों में निम्नलिखित महानुभाव रखे गए-
प्रथम न्यास मंडल
१.श्री सौभाग्यमल जैन, अध्यक्ष
२.श्री बैजनाथप्रसाद दुबे, मंत्री-संचालक
३.महामहिम डा.सत्यनारायण सिंह, राज्यपाल
४.पं.श्यामाचरण शुक्ल
५.श्री मोहनलाल भट्ट, प्रधान मंत्री रा.भा.प्र.समिति वर्धा
६.श्री लक्ष्मीनारायण जोशी, शिक्षा आयुक्त
७.पं.अम्बिका चरण शुक्ल, रायपुर
८.श्री महाराज कुमार, डा.रघुवीर सिंह, प्रतिनिधि, आजीवन
सदस्य
९.श्री समीरमल डफ़रिया, प्रतिनिधि, सम्मानित सदस्य.
वर्तमान न्यासी
१.श्री सुखदेव प्रसाद दुबे, अद्ध्यक्ष म.प्र.रा.भा.प्र.समिति
२.श्री कैलाशचन्द्र पन्त, मंत्री-संचालक
म.प्र.रा.भा.प्र.समिति
३.महामहिम राज्यपाल म.प्र.
४.श्री माननीय मुख्य मंत्री म.प्र.शासन
५.प्रधान मंत्री रा.भा.प्र.समिति वर्धा.
६.श्री शिक्षा सचिव म.प्र.
७. श्री शुक्ल परिवार का एक सदस्य
८.श्री अनुविभागीय अधिकारी एवं रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट
९.श्री कैलाश अग्रवाल
१०.श्री रघुनन्दन शर्मा, सांसद
११.श्रीमती कमला सक्सेना
१२.श्री किशन पन्त.
१३.स्थान रिक्त
१४.स्थान रिक्त.
समिति की
सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने प्रदेश के पहले साहित्यकार निवास का निर्माण पूर्ण
करने में सफ़लता प्राप्त की. मध्यप्रदेश पहला राज्य है जहाँ अशासकीय स्तर पर इतना
भव्य और सुन्दर साहित्यकार निवास जन-सहयोग से निर्मित हुआ. साहित्यकार निवास का
द्वितीय चरण सामिति एवं न्यास द्वारा अपने साधनों से किया गया है.
इस भवन में कुल तेरह (१३) कक्ष हैं जिन्हें श्री
माखनलाल चतुर्वेदी, आचार्य श्री विनयमोहन शर्मा, श्री भवानी प्रसाद मिश्र, श्री
रामेश्वर शुक्ल “अंचल”, डा.शिवमंगलसिंह सुमन, डा चन्द्रप्रकाश वर्मा, श्री
बालकृष्ण शर्मा “नवीन”, श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान, श्री जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द,
श्री हरिकृष्ण प्रेमी तथा श्री कृष्ण सरल की स्मृतियों को समर्पित किया गया है.
( साहित्यकार निवास )
इसके
अतिरिक्त एक वातानुकूलित सेमिनार कक्ष और एक सामान्य संगोष्ठी कक्ष भी उपलब्ध है.
भोपाल आने वाले लेखकों तथा शोधकर्ताओं के अलावा हिन्दी प्रचारकों को भी साहित्यकार
निवास में रहने के लिए राजधानी में कम दरों पर सुविधा दी जा रही है.
पंडित
मोतीलाल नेहरु स्मृति पुस्तकालय
पं.
रविशंकर शुक्ल हिन्दी भवन भवन न्यास म.प्र.शासन के स्कूल शिक्षा विभाग एवं नगर
निगम भोपाल के सहयोग से वर्ष १९७२ से हिन्दी भवन में संचालित है. पुस्तकालय में
लगभग छब्बीस हजार पुस्तकें हैं.
पुस्तकालय
के अन्तर्गत एक वाचनालय भी संचालित है, जिसमें १७ स्थानीय और चार राष्ट्रीय
समाचार-पत्र प्रतिदिन पढ़ने के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं. युवा पाठकों की विशिष्ट
आवश्यता के ध्यान में रखते हुए रोजगार केन्द्रीत साप्ताहिक “रोजगार समाचार” तथा
“रोजगार निर्माण’ भी वाचनालय में उपलब्ध रहते हैं. इसके अलावा विभिन संस्थानों
द्वारा प्रकाशित पत्रिकाएं रखी जाती है,जो शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध हुई
है. पठनवृत्ति को प्रोत्साहित करने तथा पाठकों की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से
वर्ष २०११ में सर्वश्रेष्ठ पाठक सम्मान भी प्रारंभ किया है. पुस्तकालय में हिन्दी
साहित्य, गांधी दर्शन एवं विचार, धर्म एवं संस्कृति, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र
तथा बालोपयोगी साहित्य के अलावा अनेक स्वनाम धन्य लेखकों-की समग्र रचनावली उपलब्ध
है. इन लेखकों में--सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी,
मुक्तिबोध, गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, विष्णुप्रभाकर, विनायक दामोदर सावरकर,
वृंदावनलाल वर्मा, शिवमंगलसिंह सुमन, शिवचन्द्र नागर, धर्मवीर भारती, माखनलाल
चतुर्वेदी अटलबिहारी वाजपेयी (संसद के तीन दशक) तथा समग्र गांधी वांग्मय भी उपलब्ध
है.
प्रकाशन
श्रेष्ठ
हिन्दी साहित्य के माध्यम से व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को सही दिशा बोध कराने वाले
चिन्तन को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाकर हिन्दी साहित्य की ओर आकर्षित करने के
उद्देश्य से समिति प्रकाशन योजना भी संचालित कर रही है.
वर्ष २०००
से समिति ने “सृजन-यात्रा” नाम से रचनाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर
केन्द्रीत प्रकाशन माला प्रारम्भ की है. इसके अन्तर्गत श्री गोविन्द मिश्र, श्री
नरेश मेहता, श्री शैलेन्द्र मटियानी, डा.शिवमंगलसिंह सुमन, डा.रायकमल राय और पद्मश्री
रमेशचन्द्र शाह पर पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. इसके अतिरिक्त पावस
व्याख्यानमाला के विमर्श पर आधारित “संवाद और हस्तक्षेप” नामक प्रकाशन के बीसों
खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं. इसी प्रकार शरद और वसंत व्याख्यानमाला में दिए गए
व्याख्यानों पर आधारित “मंथन” पुस्तिका भी प्रकाशित की जाती हैं.
श्री
कैलाशचन्द्र पंत द्वारा लिखित “शब्द और विचार”, “धुंध की आर-पार”,एवं “कौन किसका
आदमी” भी प्रकाशित किए हैं. “मालवांचल में कूर्मांचल”, “चिन्ता और चिंतन” तथा
मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के परिचय ग्रंथ का भी प्रकाशन हुआ है.
आंचलिक
बोलियों के हितार्थ प्रयास एवं प्रकाशन
समिति की
मान्यता है कि हिन्दी की प्रगति में आंचलिक बोलियों की और आंचलिक बोलियो
की प्रगति में हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसी समन्वयकारी भावना के
अनुरुप समिति मालवी, बुंदेली और निमाड़ी बोलियों के संबंध में क्रमशः उज्जैन, ओरछा,
और खंडवा में संगोष्ठियां आयोजित कर चुकी है, जिसमें सुप्रसिद्द साहित्यकारों एवं
विद्वानों ने भागीदारी की. इन संगोष्ठियों के विमर्श पर आधारित दो दस्तावेज “मालवी
की उपबोलियां और उनका संस्कृतिक परिवेश” और “बुंदेली के विभिन्न आयाम” समिति
द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित किए गए हैं. निमाड़ी के दस्तावेज का प्रकाशन प्रक्रिया
चल रही है. शीघ्र ही लोक गाथाऒं की पुस्तक प्रकाशित करने की योजना है.
अक्षरा
हिन्दी भवन
की प्रगति-यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि द्वैमासिक साहित्यिक पत्रिका “अक्षरा” है. यह
पत्रिका लगातार बत्तीस वर्षों से प्रकाशित हो रही है. इसकी यशस्वी यात्रा
मार्च-अप्रैल २०१६ के अंक के साथ १४३ वें अंकों तक पहुंच गई है. आज अक्षरा की गणना
देश की श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में होती है. देश
पद्मश्री रमेशचन्द्र शाह जी डा.प्रभाकर श्रोत्रिय जी श्री कैलाशचन्द्र पन्त जी
और विदेश
के प्रतिष्ठित लेखक “अक्षरा” में छपने को अपने लिए गौरव की बात मानते हैं. पत्रिका
को अपनी इस प्रकाशन यात्रा में प्रख्यात साहित्यकार डा.प्रभाकर श्रेत्रिय तथा
गोविन्द मिश्र जैसे सुप्रसिद्द विद्वानों का संपादकीय सहयोग मिला है. पद्मश्री
रमेशचन्द्र शाहजी के लेख-आलेख तथा ज्ञान-विषयों पर आलेख” शबद निरन्तर “स्थायी
स्तंभ में प्रकाशित किए जा रहे हैं. यहां यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा के
“अक्षरा” अब मात्र एक साहित्यिक पत्रिका नहीं रह गई है अपितु प्रखर अग्रलेखों और
अन्य आलेखों के कारण एक वैचारिक आंदोलन का रुप ले चुकी है और सोये हुए समाज तथा
राष्ट्र को जगाने एवं राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए सन्नद्द होने हेतु मानसिक
रुप से तैयार कर रही है. पत्रिका पर प्राप्त होने वाली व्यापक पाठकीय
प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि “अक्षरा” की आवाज बहुत दूर तक जाती है. प्रसन्नता की
बात है कि उसकी अंतर्ध्वनि सुनाने-गुनने वालों की संख्या भी दिनोंदिन बढ़ रही है.
वैचारिक जड़ता को तोड़ने का जो आंदोलन हिन्दी भवन चला रहा है, “अक्षरा” अब उसमें
प्रभावी भूमिका निभाने लगी है. इस यात्रा में अक्षरा के कई विशेषांक भी प्रकाशित
हुए जो संग्रहणीय हैं.
हिन्दी भवन
की गतिविधियाँ
पावस
व्याख्यान माला-
म.प्र.राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति द्वारा साहित्यिक अनुष्ठान के श्रृंखला वर्ष १९९४ से आरम्भ हुई. इस
व्याख्यानमाला को प्रारंभ करने की प्रेरणा संस्कृति मंत्री डा.विजयलक्ष्मी साधौ ने
दी थी और अपने विभाग से पचास हजार रुपये का विशेष अनुदान भी स्वीकृत किया था.
म.प्र.संस्कृति विभाग द्वारा यह सहयोग निरंतर मिलता आया है. यह साहित्यिक
निरन्तरता, संवादहीनता के परिवेश में एक जोरदार दस्तक है.
इस आयोजन
को नगर, प्रदेश के उदारमना नागरिकों, बैंक तथा अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का भी
भरपूर सहयोग और प्रोत्साहन प्राप्त है.
शरद
व्याख्यानमाला
समिति की
मान्यता है कि हिन्दी भाषा की समृद्धि के लिए साहित्यिक रचनाओं के अतिरिक्त
साहित्येतर ज्ञान-विषयों पर अधिक से अधिक लेखन की आवश्यकता है. इसी विचार से
प्रेरित होकर विख्यात कवि एवं कलाकार स्वर्गीय श्री नरेश मेहता की स्मृति में सन
२००१ में वांगमय पुरस्कार स्थापित किया गया. ज्ञान विषयों और मौलिक लेखन को
प्रेरित करने और उन पर गहन चिन्तन की प्रक्रिया प्रारंभ करने के उद्देश्य से शरद
व्याख्यानमाला सन २००३ से प्रारम्भ की गई. शिक्षा, समाज, संस्कृति, काल चिंतन,
विज्ञान, इतिहास, राजनीति जैसे गंभीर विषयों पर विचार का सर्वथा नया प्रवाह प्रारम्भ
करने के समिति के प्रयास को विद्वत जगत से मिली सराहना ने शीघ्र ही राष्ट्रीय
परिदृष्य पर स्थापित कर दिया. नरेश मेहता स्मृति वांगमय पुरस्कार को भी सन २००३ से
व्याख्यानमाला में देने का निर्णय पुरस्कार और व्याख्यानमाला के अन्तर्सबंधों को
स्पष्ट करने में सहायक हुआ. इस व्याख्यानमाला में दिए गए व्याख्यानों को मंथन
शीर्षक से पुस्तक के रुप में प्रकाशित क्या जाता है.
वसंत
व्याख्यान माला.
सन २००३
में सम सामयिक विषयों पर विचार की परंपरा को अधिष्ठित करने के उद्देश्य से वसंत
व्याख्यान माला का आयोजन प्रारंभ किया गया. इसका शुभारंभ सर्वोच्च न्यायालय के
तत्कालीन न्यायमूर्ति श्री रमेशचशन्द्र लाहोटी ने किया. समिति के इन आयोजनों से
जहां भोपाल के प्रबुद्ध वर्ग को देश के विख्यात विचारकों को सुनने का अवसर मिला,
वहीं उन विचारों का विश्लेषण कर स्वयं निष्कर्ष निकालने का मौका मिला. इस तरह
हिन्दी भवन विचारों की अभिव्यक्ति का मुक्त मंच बन गया और समाज के सामने चिंतन के
लिए ऎसे विषय प्रस्तुत किए गए जिनकी उपेक्षा की जाती रही है.
हिन्दीतर
भाषी हिन्दी सेवी सम्मान
भारतीय
भाषाऒं में पारस्परिक सद्भाव एवं सार्थक संवाद बनाए रखने के उद्देश्य से वर्ष १९९४
से प्रारंभ यह सम्मान समारोह म.प्र. के महामहिम राज्यपाल महोदय की गरिमामय
उपस्थिति में संपन्न होता है, जिसमें प्रत्येक भारतीय भाषा के एक हिन्दी सेवी को
हिन्दीतर भाषा लेखकों की हिन्दी में लिखी गई श्रेष्ठ कृतियों को भी पुरस्कृत किया
जाता है. इस अवसर पर प्रदान किए जाने वाले पुरस्कारों का विवरण निम्नानुसार है-
१.
हिन्दीतर भाषी हिन्दी सेवियों
को सम्मान (सभी भारतीय भाषाओं को)
२.
हिन्दी सेवी संस्था सम्मान,
सम्मान पटल एवं ५,०००/- की राशि( देश के विभिन्न अंचलों में हिन्दी का
प्रचार-प्रसार करने वाली संस्था को
३.
अम्बिका प्रसाद दिव्य
पुरस्कार ५,०००/-
४.
हरिहर निवास द्विवेदी
पुरस्कार ३,०००/-
५.
सैयद अमीर अली मीर
पुरस्कार २,५००/-
ये तीनों पुरस्कार हिन्दीतर
भाषी लेखकों की चयनित हिन्दी कृतियों को प्रदान किए जाते हैं.
६.
महिला समाज सेवी सम्मान (तीन)
७.
श्रीमती सतीश बालकृष्ण ओबेराय
महिला पुरस्कार २,१००/-
८.
स्व.हजारीलाल जैन स्मृति
वांगमय पुरस्कार ५,०००/-
९.
प्रदेश का समाजसेवी
सम्मान
१०. स्व.प्रकाश
कुमारी हरकावत नारी लेखन पुरस्कार ५,०००/-
११.
सर्वश्रेष्ठ पाठक पुरस्कार १,१००/-
१२. श्रीमती
रक्षा सिसोदिया शिक्षक सम्मान १,१००/-
( भोपाल नगर की प्रा.मा.शाला
के चयनित श्रेष्ठ शिक्षक को)
१३. रामायण
गार्गी मेधावी विध्यार्थी पुरस्कार (भोपाल नगर में कक्षा १२ वीं बोर्ड परीक्षा में
सर्वाधिक अंक लाने वाले छात्र को) २,१००/-
१४. रामचन्द्र
श्रीवल्लभ चौधरी मेधावी विध्यार्थी पुरस्कार ( भोपाल नगर में कक्षा १० वीं बोर्ड
परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले छात्र को) २,१००/-
विविध प्रतिष्ठित
सम्मान/पुरस्कार.
श्री नरेश मेहता वांगमय
पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त
श्री नरेश मेहता की अपेक्षा के अनुरुप साहित्येतर लेखन और चिंतन को प्रोत्साहित
करने के प्रयोजन से श्रीमती महिमा मेहता द्वारा नरेश जी की स्मृति में २१,०००/- के
पुरस्कार की स्थापना की गई थी. वर्ष २००५ में इस राशि को बढ़ाकर ३१,०००/- कर दी गई
है.
श्री शैलेश मटियानी स्मृति
चित्रा-कुमार कथा पुरस्कार.
समिति युवाओं की अधिक से अधिक
भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु प्रयासरत है. इस दिशा में युवा कथाकारों के प्रथम
कहानी संग्रह के लिए विख्यात कथाकार स्व. शैलेश मटियानी की स्मृति में ५,०००/-
रुपयों का एक पुरस्कार प्रारंभ किया है. इस हेतु यू.के. की गीतांजलि संस्था के
संस्थापक अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार ने पुरस्कार के संचालन के लिए समिति को एक लाख
रुपया की राशि का चेक प्रदान किया. सन २००८ से पुरस्कार राशि बढ़ाकर ११,०००/- कर दी
गई है.
श्री वीरेन्द्र तिवारी स्मृति
रचनात्मक पुरस्कार.
गांधीवादी विचारों के अनुरुप
हिन्दी में लेखन और कार्य करने वाले विद्वान को यह पुरस्कार दिया जाता है. इसकी
राशि २१,०००/- रुपया है.
श्री सुरेश शुक्ल “चन्द्र”
नाट्य पुरस्कार.
अखिल भारतीय स्तर पर प्रकाशित
मौलिक हिन्दी नाटक/ एकांगी संग्रह या कविता कृति के रचनाकार के लिए यह पुरस्कार
वर्ष २०१३ से आरंभ किया गया. इसकी राशि ११,०००/- है.
श्रीमती हुक्मदेवी स्मृति
प्रकाश पुरस्कार.
किसी अहिन्दी भाषी
लेखक/लेखिका द्वारा हिन्दी में लिखित पुस्तक एवं प्रकाशित रुपक/ निबंध/ समीक्षा/
व्यंग्य/ रेखाचित्र/ पत्र विधा की पुस्तक ( जो कम से कम ८० पृष्ठों की हो ) पर यह
पुरस्कार वर्ष २०१४ से आरंभ किया गया है. इसकी राशि ५,०००/- है. यह साहित्यिक
पुरस्कार अहिन्दी भाषी हिन्दी सेवी सम्मान समारोह के अवसर पर दिया जाता है.
पूरे विश्व को अनूठा संदेश
देने वाले पर्वों जैसे दीपावली और होली पर म.प्र.रा.भा.प्रचार समिति एवं
हिन्दी भवन न्यास के संयुक्त प्रयास से आयोजन समारोह पूर्वक मनाया जाता है. इस
आयोजन का मुख्य उद्देश्य भारतीय परम्पराओं के प्रति लोगों की आस्था पुष्ट करना है.
दीपावली मिलन समारोह में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ समाज के गौरवान्वित करने
वाले वरिष्ठ साधकों को सम्मानित किया जाता है. इसका उद्देश्य समाज के वरिष्ठ जनों
के प्रति सम्मान भाव विकसित करना है.
होली मिलन कार्यक्रम समिति का
अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम है. इस रंगारंग आयोजन में प्रदेश व देश के आंचलिक होली
गीतों की प्रस्तुति के साथ हास्य व्यंग्य की फ़ुहारें भी समाहित होती हैं
हिन्दी दिवस और विश्व हिन्दी
दिवस.
प्रतिवर्ष १४ सितम्बर को
हिन्दी दिवस के माध्यम से हिन्दी के पक्ष में वातावरण बनाने एवं हिन्दी की बात
जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से कार्यक्रम आयोजित किया जाता है एवं हिन्दी में
कार्य/हस्ताक्षर करने की शपथ दोहराई जाती है. हिन्दी पखवाड़े में ही
प्रतिभा-प्रोत्साहन प्रतियोगिता व समापन पर हिन्दीतर भाषी सेवी सम्मान समारोह
आयोजित किए जाते हैं. इसी प्रकार १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस पर भी व्याख्यान
एवं संगोष्ठी आयोजित की जाती है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य विश्व मंच पर हिन्दी को
प्रतिष्ठित करने के विचार को शक्ति प्रदान करना है.
प्रतिज्ञा- पत्र
प्रतिज्ञा इस प्रकार दुहराई
जाती है.
१. हम अपना
प्रतिदिन का कार्य मातृभाषा अथवा राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही करेंगे.
२. हिन्दी को
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गौरवशाली भाषा बनाएंगे.
३. राष्ट्रभाषा
हिन्दी और देवनागरी लिपि का संदेश घर-घर पहुंचाकर राष्ट्रीय एकता की भावना को
सुदृढ़ करेंगे.
४. राष्ट्रभाषा
हिन्दी और प्रादेशिक भाषाऒं के विकास को एक –दूसरे का पूरक मानकर दोनों का विकास
करेंगे.
५. “ एक हृदय
हो भारत जननी “ के मूल मंत्र को राष्ट्रभाषा के प्रचार द्वारा सफ़ल बनाएंगे.
राष्ट्रीय
संगोष्ठियां
विगत
छः-सात वर्षों से समिति हिन्दी को देश और विश्वस्तर पर यथोचित प्रतिष्ठा दिलवाने
की दिशा में विशेष प्रयास कर रही है. इस दिशा में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय संगोष्ठियां
का आयोजन किया जाता है. विगत वर्षॊं में “हिन्दी का वर्तमान और भविष्य़ दृष्टि”,
“हिन्दी और भारतीय भाषाओं के बीच सार्थक संवाद की आवश्यक्ता”, “डा. राममनोहर
लोहिया; वर्तमान संदर्भ में, “निराला के काव्य में सांस्कृतिक स्वर” विषयों पर
गोष्ठियां की गईं.
अंतरंग
गोष्ठियां
समिति
द्वारा सम-सामयिक विषयों पर विशेषज्ञों के व्याख्यान तथा साहित्य और वांगमय की
विभिन्न विधाओं पर रचनापाठ के कार्यक्रम भी “अंतरंग” श्रृंखला के अन्तर्गत
प्रतिमाह किए जाते हैं.
समिति की
संयुक्त भागीदारी से आयोजन
समिति के
वार्षिक प्रतिष्ठा आयोजनों में मुख्य अतिथि, अध्यक्ष एवं वक्ता के रुप में पधारने
वाले विद्वान अतिथियों, सुधि सहयोगियों और जागरुक मीडिया के माध्यम से विभिन्न
संस्थाएं भाषाई, साहित्यिक और बौद्धिक चेतना आयोजन करने के लिए संस्था अग्रसर होने
लगी है. भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान, शिमला और इलाहाबाद संग्रहालय, नेशनल बुक
ट्रुस्ट, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, म.प्र. लेखक संघ, दुष्यंतकुमार संग्रहालय,
समकालीन साहित्य सम्मेलन मुम्बई, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं शोध
विश्वविध्यालय तथा राष्ट्रीय अकादमी, रुपाम्बरा कोलकाता तथा निराला सृजन पीठ के
साथ मिलकर हिन्दी भवन में संयुक्त आयोजन भी किए जाते हैं.
प्रतिभा
प्रोत्साहन प्रतियोगिताएं.
युवा पीढ़ी को भाषा, साहित्य और संस्कृति से
जोड़ने के उद्देश्य से समिति ने बारह वर्षों से कक्षा ९ वीं से १२ वीं के
छात्र-छात्राओं के लिए प्रतिभा प्रोत्साहन प्रतियोगिता के विशिष्ट पहल आरंभ की है.
इसके अंतर्गत निम्न प्रतियोगिताएं दो चरणॊं में आयोजित की जाती हैं. प्रथम शाला
स्तर पर तथा द्वितीय जिला स्तर पर.
प्रतियोगिताओं
का विवरण इस प्रकार है.
१. काव्य पाठ
(२) वाद-विवाद, भाषण (३) साहित्यिक अंत्याक्षरी (४) एकल लोकगीत गायन प्रति.(५) चित्रकला
प्रति.
२. पुरस्कार-
प्रत्येक वर्ग में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्थान प्राप्त प्रतियोगियों को क्रमशः
३००/-, २५०/-, २००/- नगद तथा स्मृति चिन्ह के साथ प्रमाण पत्र भी दिए जाते हैं.
हम भारतीय
अभियान
सात
संकल्पों वाला “ हम भारतीय अभियान “ समिति का राष्ट्रीय कार्यक्रम है. इसका संदेश
प्रदेश के गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए समिति अलग-अलग जिलों में “हम भारतीय
अभियान” संचालित करती है. समिति का उद्देश्य है कि हिन्दी के माध्यम से भारतीयों
में राष्ट्रीयता का भाव प्रबल हो और वे राष्ट्र निर्माण में अपना रचनात्मक योगदान
देने के लिए आगे आएं. पर्यावरण के प्रति जागरुकता, जातिगत, धर्मगत भेदभाव से मुक्त
होकर हर नागरिक में भारतीय होने का गौरव-बोध जागृत हो. वृक्षारोपण, स्वच्छता
अभियान, साक्षरता अभियान, सामाजिक समरसता बढ़ाने वाले सांस्कृतिक आयोजन इस अभियान
के अंग हैं. महात्मा गांधी जी के अनुयायी स्व.माननीय श्री मधुकर राव चौधरी जी ने
“सप्तपदी” अभियान की शुरुआत महात्मा गांधी जी की कर्मभूमि वर्धा से प्रारंभ की थी.
सातों पदों को क्रमवार दुहराया जाता है
सप्तपदी.
मेरा जन्म भारत में हुआ इसकी
भूमि के अन्न, जल से मेरा पोषण होता है, इस अर्थ में मैं भारतीय हूँ. यह सत्य है
किन्तु सच्चे अर्थ में भारतीय नागरिक कहलाए जाने के लिए मैं ये सात संकल्प करता
हूँ-
१. मै अपना
परिचय जाति, धर्म, भाषा, प्रांत के संदर्भ में न देते हुए “मैं भारतीय हूँ” इसी
प्रकार दूंगा लेकिन मेरी भारतीयता “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना को समाहित
करने वाली होगी.
२. मैं चिंतन
करने, बोलने, लिखने या हस्ताक्षर करने के लिए अपनी मातृभाषा व्यवहार में लाऊंगा.
मैं स्वदेशी वस्तुओं को ही उपयोग में लाऊंगा. बहुत आवश्यक होने पर ही विदेश में
निर्मित वस्तुओं का इस्तेमाल करूंगा.
३. अनेक जाति,
धर्म, पंथ वाले अपने समाज में सामाजिक अभिसरण को बढ़ाने के दायित्व का निर्वहन
करुंगा. इसके लिए मैं अपनी जाति, धर्म, पंथ से बाहर कम से कम पांच व्यक्तियों को
अपना मित्र बनाऊंगा.
४. अपने
परिवार के अतिरिक्त कम से कम पांच अन्य परिवारों के साथ स्नेह, सदभाव से संबंध जोड़कर
उन्हें छॊटॆ तथा सुखी परिवार की कल्पना दूंगा तथा देश की तीव्र गति से बढ़ती
जन-संख्या को नियंत्रित करने का प्रयास करूंगा.
५. मैं जिस
हरी-भरी वसुंधरा पर रहता हूँ उसके पर्यावरण के लिए खतरा पैदा हो रहा है इसलिए कम
से कम पांच वृक्ष लगाऊंगा तथा आस-पास की जगह, नदी-नाले आदि को स्वच्छ बनाऊंगा.
६. निरक्षरता
हमारे देश के लिए बहुत बड़ा कलंक है. उसे मिटाने के लिए कम से कम पांच लोगों को मैं
साक्षर बनाऊंगा.
७. अपनी
शैक्षणिक एवं वैचारिक क्षमता बढ़ाने के लिए तथा राष्ट्र निर्माण की कल्पना को मूर्त
रूप देने लिए मैं पांच राष्ट्रपुरुषों की प्रेरणादायी जीवनियों और पांच उन्नत तथा
ऊर्जावान राष्ट्रों के इतिहास का गहराई से अध्ययन करूंगा.
कुछ महत्वपूर्व तथ्य.
एक सिद्दहस्त जादूगर अपने
कौशल से तिल का ताड़ बना देता है, शुन्य में से कबूतर निकाल सकता है, हवा में हाथ
हिलाकर साधारण कागज को करेंसी में बदल देता है और किसी के शरीर को हवा में टांग
सकता है और भी न जाने कितने करतब दिखाकर वह शौहरत और दौलत बटोर लेता है. यह सब
देखकर उपस्थित जन-समुदाय तालियों की गड़गड़ाहट से समूचा हाल गूंजाने लगता है. क्या
यह हकीकत है? नहीं.. यह हकीकत नहीं है, यह महज आंखों का धोका है. इसमें शुरु से
अंत तक बारिक चालाकियां होती है, और कुछ नहीं. न तो वह कुछ बना सकता है और न ही
कुछ बनाने के लिए समर्थ होता है.
कुछ बिरले
ही लोग होते हैं जो अपनी मेहनत, लगन, सोच और कुछ कर गुजरने की इच्छा शक्ति से समाज
में व्यापक परिवर्तन लाने के लिए भगीरत तप करते हैं, तब जाकर एक स्वपन जमीन पर
उतरता है, जिसे हम अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देख सकते हैं, उसे छू सकते हैं, और
उसके व्यापक प्रभाव को महसूस कर सकते हैं. ऎसे ही एक निष्काम योगी की उपस्थिति हम
हिन्दी भवन भोपाल में देख सकते हैं, उनसे बातें कर सकते हैं और अपने जीवन को धन्य
बना सकते हैं. उस परम तपस्वी का नाम है-श्री कैलाशचन्द्र पन्त.
वह एक
अच्छे नाविक की तरह उन लोगों के साथ रह कर यात्रा करता है, जिनका वह मार्गदर्शन
करता है. वह उन्हें रास्ता बताकर दूर नहीं चला जाता. वह एक अच्छे मित्र के रूप में
पूरे समय उनके साथ रहता है. जब आप संघर्ष करते हैं तो वह आपको नरमी और प्रेम से
सुधारता है और जब आप असफ़ल होते हैं तो वह आपको आगे बढ़ने का संबल देता है. वह आपको
अपनी पूर्ण क्षमता तक विकास करने के लिए प्रोत्साहित करता है. सबसे महत्वपूर्ण बात
तो यह है कि वह आपकी सफ़लताओं का जश्न कुछ इस तरह मनाता है, जैसे वे उसी की सफ़लताएं
हों. यही वह महत्वपूर्ण तथ्य है जिसके चलते लोग उन्हें सम्मान के साथ “दादा”
कहकर सम्बोद्धित करते हैं.
श्री कैलाशचन्द्र पन्त( मंत्री-संचालक )
श्रीमती हरिप्रिया पन्त और
श्री लीलाधर पन्त के यहां एक बालक २६-०४-१९३६ को मध्यप्रदेश के महू में जन्म लिया.
उसका नाम रखा गया- कैलाशचन्द्र. शुरु से ही मेधावी रहे श्री पन्तजी ने एम.ए.,
साहित्याचार्य, साहित्य रत्न की उपाधियां प्राप्त कीं. यूनियन थियोलाजिकल सेमीनरी
इन्दौर में व्याख्याता, विध्याभवन उदयपुर में प्रकाशन प्रमुख, पंचायत राज
प्रशिक्षण केन्द्र भोपाल में प्राचार्य, सोशलिस्ट कांग्रेस मैन, दिल्ली में सह
संपादक, दैनिक नवभारत भोपाल में सह संपादक, मासिक “शिक्षा प्रदीप” भोपाल में
संपादक, दैनिक इन्दौर समाचार इन्दौर में संवाददाता, साप्ताहिक जनधर्म भोपाल में
संपादक, साप्ताहिक “दूरगामी आब्जर्वर, इन्दौर में संपादक के पद पर कुशलतापूर्वक
काम करते रहने के बाद, वर्तमान में वे द्वैमासिक पत्रिका “अक्षरा” भोपाल मे प्रधान
संपादक के रूप में पदस्थ हैं.
आपने अनेक संस्थाओं में
स्वैच्छिक सेवाएं भी दी हैं—(१).संस्थापक, स्वाध्याय विध्यापीठ, महू (२) सचिव,
भारत कृषक समाज, भोपाल (३) सचिव, शहीद गणेश शंकर विध्यार्थी मेमोरियल पत्रकारिता
ट्रुस्ट, भोपाल, (४) मंत्री संचालक म.प्र.रा.भाषा प्रचार समिति, भोपाल,(५) मंत्री
संचालक, हिन्दी भवन, भोपाल,(६) सहायक मंत्री राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा, (७)
उपसभापति, मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर (८) राष्ट्रीय संयोजक “हम भारतीय
अभियान” वर्धा.(९) न्यासी, बालनिकेतन ट्रुस्ट भोपाल.(१०) संरक्षक, समकालीन साहित्य
सम्मेलन, मुंबई (१२) अध्यक्ष, म.प्र.प्रौढ़ शिक्षा, भोपाल तथा (१२) संरक्षक, कला
मंदिर, भोपाल.
हाथ में प्रज्ज्वलित मशाल हो
तो अन्धकार स्वतः हट जाता है, रास्ता साफ़ दिखाई देने लगता है और यात्रा सुगम हो
जाती है. मन में हिन्दी को सिरमौर बनाने के प्रति जागी ज्वाला को साथ लिए वे चल
पड़े. उन्होंने न सिर्फ़ अपने आपको आगे बढ़ाया बल्कि अन्य हिन्दी प्रेमियों को भी
अपना हमराही बनाया. कदम जब मंजिल की ओर बढ़ने लगते हैं तो उसमें स्वमेव जन-सहयोग
मिलने लगता है, सरकारी अनुदान भी प्राप्त होने लगता है. और इस तरह देखते ही देखते
एक विशाल मंदिर आकार लेने लगता है, जिसमें ज्ञान की देवी सरस्वती स्वतः प्रकट हो
जाती हैं. (किस तरह एक बंजर भूमि पर एक विशाल इमारत आकार लेने लगती है, के बारे
में ऊपर के पैराग्राफ़ में विस्तार के साथ बताया जा चुका है.)
कलम के प्रतिबद्ध इस सिपाही
ने काफ़ी कुछ लिखा है.-(१) कौन किसका आदमी (२) धुंध के आर-पार (३) शब्द का
विचार-पक्ष (४) शैलेश मटियानी; सृजन यात्रा; संपादन (५) सत्ता, साहित्य और समाज
(प्रकाशनाधीन) (६) सांस्कृतिक धारा के हिन्दी रचनाकार( प्रकाशनाधीन),(७)
साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर सात सौ से अधिक आलेख विभिन्न
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. तथा (७) संस्कार, संस्कृति और समाज
आपके द्वारा संपादित विशिष्ट
कार्यों की फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है. हिन्दी की पताका को लेकर आपने अनेक देशों की
यात्राएं भी की हैं. आपको अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है. विशेष
उल्लेखनीय बात तो यह है कि आपको जोहान्सवर्ग में आयोजित नौवें विश्व हिन्दी
सम्मेलन मे विश्व हिन्दी सम्मान से सम्मानित किया गया.
( हिन्दी भवन का विशाल सभा
गृह जिसमें करीब सात सौ लोगों के बैठने की क्षमता है.)
और अन्त में,
लंबे समय तक अनेक साहित्यिक
संस्थाओं से जुड़े रहने की बावजूद भी मुझे जो आत्मिय संतुष्टि मिलनी चाहिए थी, वह प्राप्त
न हो सकी. अतः इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अब तटस्था कर लेने में ही भलाई है. संयोग
से वह दिन भी आया जब मेरे मित्र (स्व).श्री प्रमोद उपाध्याय ने माह अगस्त में होने
वाले पावस व्याख्यानमाला के बारे में जानकरी देते हुए वहां चलने का अनुरोध किया.
यह ग्यारह वर्ष पूर्व की बात है. हिन्दी भवन के विशाल हाल में मेरी भेंट “दादा” से
होती है. उपाध्याय जी कुछ और बतलाएं इससे पूर्व उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा;-“
आपके बारे में मैं काफ़ी कुछ सुन और पढ़ भी चुका हूँ. सेवानिवृत तो आप हो ही चुके
हैं, यदि हिन्दी की सेवा के लिए समय दे सकें तो मुझे संतुष्टि होगी.”
आपकी अनुकंपा से छिन्दवाड़ा
में म.प्र.रा.भा.प्र.समिति, जिला इकाई का गठन हुआ और तब से लेकर आज तक समिति ने
अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं. वर्तमान में मैं संस्था का संयोजक/अध्यक्ष हूँ और
श्री नर्मदा प्रसाद कोरी जो वर्तमान में महाराष्ट्र बैंक में हेड कैशियर हैं,
समिति के सचिव हैं.
अब तक मेरे दो कहानी संग्रह
(१) महुआ के वृक्ष और (२) तीस बरस घाटी प्रकाशित हो चुके है. इसके अलावा वेव
पत्रिका “रचनाकार” ने मेरे कविता संग्रह-“ बचे हुए समय में”, लघुकथा संग्रह-“ अब
नगर शांत है”, दो आलेख संग्रह-“
पातालकोट-धरती पर एक अजूबा” “ अपने समय को लिखते हुए”, “ दो हंसों का जोड़ा-
“बालसाहित्य, “ मैं कहता आंखन देखी”- “यात्रा संस्मरण,” कौमुदी महोत्सव- “हमारे तीज-त्योजार” पर
ई-बुक्स प्रकाशित किए हैं.
मेरी रचनाएं देश की विभिन्न
पत्र-पत्रिकाओं में तो प्रकाशित होती रही हैं लेकिन विदेश से निकलने वाली
पत्रिकाओं--- हिन्दी चेतना (अमेरिका), लेखनी(इंग्लैण्ड), साहित्य कुंज( कनाड़ा),
अभिव्यक्ति( दुबई), हिन्दी चेतना( कनाडा),प्रवासी दुनिया, अमस्टेलगंगा(निदरलैण्ड)
तथा मारीशस से प्रकाशित होने वाली पत्रिका” विश्व हिन्दी पत्रिका” में मेरे
लेख-आलेख-कहानियां और लघुकथाएं-प्रकाशित हुई है. मैं सौभाग्यशाली हूँ कि हिन्दी के
माध्यम से मेरी रचनाएं दूर देश में बैठे हिन्दी प्रेमियों तक पहुंची.
देश की अनेकानेक साहित्यिक
संस्थाओं द्वारा आयोजित अनुष्ठानों में भाग लेने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है.
इसके अलावा थाईलैण्ड, नेपाल और मारीशस की मैं यात्रा कर चुका हूँ. यहाँ यह बात
उल्लेखनीय है कि “अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी संगोष्ठी-वर्धा” द्वारा एक सद्भाव यात्रा
मारीशस के लिए आयोजित की गई थी. इस यात्रा को सुगम बनाने के लिए हिन्दी भवन भोपाल
ने मुझे पच्चीस हजार का अनुदान दिया था. हिन्दी भवन भोपाल एवं दादा पन्त को इस
अनुदान के लिए मैं हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ.
सारी उपलब्धियों का श्रेय
दादा पन्त जी और हिन्दी भवन भोपाल को है. यदि इस संस्था से मेरा जुड़ाव न हुआ होता,
तो मुझे इतनी आत्मिक संतुष्टि शायद ही प्राप्त हो पाती, जैसी की मैं महसूसता हूँ.
दादा पन्त और हिन्दी भवन के प्रति मैं पुनः
हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ.
छिन्डवाड़ा गोवर्धन
यादव
दिनांक- मार्च २०१६ ( संयोजक/अध्यक्ष )
१०३, कावेरीनगर मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
छिन्दवाड़ा (म.प्र.)४८०-००१ जिला इकाई,छिन्दवाड़ा
संपर्क-०९४२४३-५६४००
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