Monday, 2 June 2025

 यात्रा (10)


 

            

मेरी भुटान यात्रा.

प्रकृति की मनोरम छटा मानव को सदा अपने आगोश में लेने को तैयार रहती है. सच पूछॊ तो वह एक प्रकार से मनुहार सी करती लगती है. शायद ही कोई ऎसा अभागा मानव होगा जो प्रकृति के इस मनुहार का लुफ़्त न उठाना चाहे. हरियाली की चादर ओढ़े, आसमान को छूती सी प्रतीत होतीं पर्वतमालाएं, बरफ़ की पगड़ी बांधे चमचमाते पर्वत शिखर, पाताल सी गहराइयां लिए घाटिंया, कलकल-छलछल के स्वर निनादित करती बहती अल्हड़ नदियां, लहर-लहर लहराती धान की फ़सलें जिनके आचार में दूध पकने को तैयार है, तेढ़े-मेढ़े सर्पीले रास्ते, सेब-फ़लों से लदेफ़दे बागीचे, सुन्दर नक्काशी में सजे बौद्ध मठ, स्थापत्य शैली में बनी इमारतें, विनीत भाव से स्वागत करने को उद्दत प्रवेश द्वार, शानदार पुल, होंठों पर मुस्कान ओढ़े, पारंपरिक पोषाकों में सजी नवयुवतियों को देखकर भ्रम होने लगता है कि  हम इंद्र की नगरी अमरावती में चले आये हैं. ये दिलकश नजारे भूटान की खासियत है. यहां के लोग अपनी विरासत, परम्पराओं और रीति-रिवाजों पर न केवल गर्व करते हैं बल्कि अपनी शान भी समझते है और यात्रियों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं.

भुटान की यात्रा करने से पहले हमें वहां की भौगोलिक स्थिति की जानकारी जरुर प्राप्त कर लेनी चाहिए. भुटान शब्द की यदि हम संधिविग्रह करें तो यह अर्थ प्रतिध्वनित होता है. भू यानि जमीन, उत्थान माने ऊंचा.= माने एक ऎसा प्रदेश जो ऊँचा हो. आप यहां आकर देखेंगे कि सारी पर्वत श्रेणियां आकाश को छूती से प्रतीत होती है. हिमालय की तराई में बसे भूटान का कुल क्षेत्रफ़ 398,390 वर्गकिलोमीटर है. भुटान की मुद्रा नगूलट्रम है  जिसकी विनिमय दर एक भारतीय रुपए के बराबर है. यहां की राष्ट्रभाषा जोंगखा है, पुरुषॊं की राष्ट्रीय पोषाक “घो” और महिलाओं की  “कीरा” कहलाती है. यह ब्रजयानी बौद्ध धर्म वाला देश है. भूटान का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पारो में है. रन-वे काफ़ी छोटा होने के कारण इसे खतरनाक माना गया है. चारों तरफ़ से घिरे पहाड़ों के कारण हवाई जहाज को उतारने और  उड़ाने में पायलट को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है, अन्यथा प्लेन पहाड़ी से जाकर टकरा सकता है. तीरंदाजी और फ़ुटबाल यहाँ के लोकप्रिय खेल है. भूटान के वैसे तो २२ जिले हैं लेकिन थिंपु, पुनाखा और पारो में देखने लायक बहुत कुछ है. सप्ताह-दस दिन में इन स्थानॊ का भ्रमण किया जा सकता है.

कुछ बातें ऎसी भी है भूटान के बारे में जिन्हें जानना और समझना आवश्यक है. पहला तो यह कि सन 1947 तक भूटान भारत का हिस्सा था, बाद में सन 1948 में एक स्वतंत्र देश बना. स्वतंत्रता के बाद से इसमें तेजी से बदलाव आने लगा, पर्यावरण के क्षेत्र में यह अन्य देशों से प्रथम पायदान पर खड़ा है. तीसरा यह कि सन १९९९  से इस देश मे< पालिथिन के प्रयोग पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाया. चौथा –यहां पहुंचना अब भी एकदम आसान नहीं है. पांचवा-भूटान का मुख्य निर्यात बिजली उत्पाद करना है, जिसे वह भारत को पनबिजली बेचता है. इसके अलावा लकड़ी, सिमेंट और हस्तशिल्प का भी निर्यात करता है. छटा-भूटान के पास अपनी सेना जरुर है लेकिन नौसेना और वायुसेना नहीं है. इसका मुख्य कारण है कि यह चारों तरफ़ ऊंची०ऊंची पहाड़ों से घिरा हुआ है. सात- यहां के नागरिकों को पेड़ लगाना पसंद है. किसी प्रिय के जन्म के समय और किसी के दिवंगत होने पर एक पेड़ लगाने की यहाँ प्रथा है. यही कारण है कि यहाँ सघन वन देखे जा सकते हैं. सन 2006 में सत्ता ग्रहण करने वाला राजा जिग्मे खेसार नामग्येल वांगचुक ने इस देश में बड़े बदलाव किये, जिसे प्रत्यक्ष देखा और समझा जा सकता है.

सात सदस्यी भूटान यात्रा के सहयात्री सर्व श्री राजेश्वर आनदेव(पूर्व प्राचार्य पीजी.कालेज), गोवर्धन यादव (कवि-लेखक-कहानीकार), अध्यक्ष म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जिला इकाई छिन्दवाड़ा  एवं पूर्व पोस्टमास्टर (एच.एस.जी-1) , श्री नर्मदा प्रसाद कोरी (हेड कैशियर एवं सचिव म.प्र.रा.भा.प्र.समिति, श्री जी.एस. दुबे (से.नि इंजिनियर),श्री महेश चौरसिया, होटल व्यवसायी पचमढ़ी, श्री अरूण अनिवाल, से.नि.सहायक कमिश्नर इनकम टैक्स, नागपुर, श्री विजय आनदेव,सहायक कमिश्नर, इनकम टैक्स नागपुर, जो अस्वस्थता के कारण इस ग्रुप में नहीं जा पाए.

ग्यारह नवम्बर को बस द्वारा नागपुर के हम रवाना हुए. शाम 7.05 बजे मुम्बई-हावड़ा गीतांजलि एस्कप्रेस से हावड़ा करीब ढाई बजे पहुंचे. चुंकि हमारी अगली यात्रा सियालदा से रात्रि दस बजे थी. सो हमने एक टैक्सी किराये पर ली और बेल्लुरमठ और दक्षिणेश्वर महाकाली जी के दर्शनओं का पुण्य लाभ कमाया.  रात 10.30  दिनांक १२/११/२०१७ को दार्जलिंग ट्रेन से सियालदाह से न्युजलपाईगुड़ी सुबह 08.30 पर पहुंचे.. बस स्टैण्ड पर संतोष लामा विनीत भाव के साथ अपनी जाइलो (WB-7544 ) गाड़ी लिए तैयार  मिला. नेपाली-कट, छोटी-छोटी मुस्कुराती आंखे, चौड़ा माथा, कसरती बदन, गोरा रंग और अच्छी खासी कद-काठी के धनी इस युवक के होंठों पर खेलती हंसी देखकर हमारा प्रसन्न होना स्वभाविक था. पूरी यात्रा के दौरान वह हमारे साथ बना रहा. मन में कई सवाल तैरते और वह सबका समाधान करते चलता  संतोष, जयगांव का रहने वाला है, जिसकी सीमा भूटान से लगी हुए है. सामान लादा जा चुका था और अब हम ( PHUENTSHOLING ) फ़ुंस्सोल्लिंग  के लिए रवाना हुए. रात भर का ट्रेन का सफ़र फ़िर करीब चार घण्टे की लंबी सड़क यात्रा के  दौरान हमें तिल मात्र भी थकावट महसूस नहीं हुई. इसका मुख्य कारण यह भी रहा कि हम नित-नूतन होते प्रकृति के बदलाव का आनन्द लेते हुए तिस्ता नदी के किनारे-किनारे निरन्तर आगे बढ़ रहे थे. रास्ते में पड़ने वाले एक होटेल जे.के.फ़ेमिली रेस्टारेंट में सुस्वाद भोजन का आनन्द उठाया रास्ते में एक बार तो हमें गाड़ी भी रुकवानी पड़ी. भूटान-हिमालयान रेंज के अद्भुत दर्शन करने को मिला. पूरा पर्वत-शिखर बर्फ़ की पगड़ी बांधे सुहाना जो लग रहा था.  सभी ने गाड़ी से उतरकर इस विहंगम और नयनाभिराम दृष्य को जी भर के निहारा और फ़ोटोग्राफ़्स भी उतारे. ( PHUENTSHOLING ) फ़ुंस्सोल्लिंग  से महज पच्चीस-तीस मील की दूरी पर थे, तभी टूरआपरेटर सुश्री कला गुरुंग जी ने संतोष को आदेश दिया कि वह सभी पर्यटकों के वोटरकार्डों की छायापरति वाट्साप पर भिजवा दे, वे चाहती थीं कि जब हम यहाँ प्रवेश करें,उससे पूर्व सभी आवश्यक दस्तावेज इमिग्रेशन आफ़िस पहुंच जाये ताकि परमिट बनाने में लगने वाले समय को बचाया जा सके. जब हम शाम छः बजे हम टूर आपरेटर सुश्री कला ऊर्फ़ दीक्षिका गुरुंग के आफ़िस में थे. उन्होंने मुस्कुराते हुए हम सबका भावभीना स्वागत किया. औपचारिक चर्चाएं जिसमें भूटान टुरिस्म का विकास, लोगों का खान-पान, फ़सलें, वेशभूषा, कुटीर उद्धोग, आर्गेनिक खेती पर सार्थक वार्तालाप हुआ और साथ ही गरमा-गरम चाय का लुफ़्त भी हम उठाते रहे.

भारत, बांगलादेश और मालदीव के पर्यटकों को भूटान में प्रवेश करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं है लेकिन पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र जैसे पहचान का सबूत दिखाना पड़ता है. भूटान में प्रवेश करने के लिए फ़ुंस्सोल्लिंग  में परमिट के लिए टूरिस्ट परमिट लेना आवश्यक है. पर्यटकों के पास-पोर्ट या मतदाता परिचय पत्र के साथ २ पासपोर्ट साइज के फ़ोटो होना अनिवार्य है. टुरिस्ट परमिट निंशुल्क जारी किए जाते हैं. मतदाता परिचय के साथ फ़ोटोग्राफ़्स हम पहले ही भेज चुके थे. सुश्री गुरुंग ने अपनी सहायिका कु. तुलासा को पहले से ही इस काम के लिए नियुक्त कर रखा था, कुछ ही समय में हमारा परमिट बनकर तैयार हो गया. परमिट प्राप्त करने के पश्चात हम रात्रि विश्राम के लिए स्थानीय थ्री स्टार होटेल “दि आर्चेड होटल” जो पहले से ही आरक्षित की जा चुकी थी, पहुंचकर हमने रात्रि विश्राम किया.

13 नवम्बर 2017-  “दि आर्चिड होटेल” में रात्रि विश्राम.

सुबह नाश्ते के बाद हमारी मुलाकात इस होटेल के मैनेजर श्री डेटू से मुलाकात की. हिन्दी बोलने-समझने वाले श्री डॆटू से भूटान की कई जानकारियां प्राप्त की. इसी समय हमारी मुलाकत कार्यालय में कार्यरत सुश्री नामगे हामो .आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेती है. हमने जानकारी पाप्त करनी चाही कि बोलने के अलावा वे हिन्दी लिखना-पढ़ना भी जानती हैं कि नहीं? उन्होंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि वे हिन्दी में लिख और बोल सकती है. श्री कोरी और मैंने उनके साथ फ़ोटॊ शेयर की और हिन्दी भवन भोपाल से प्रकाशित “अक्षरा” की और कोरी का कहानी संग्रह” मैं कहता आंखन देखी” भेंट में दी. चुंकि संतोष के आगमन में देरी  थी, अतः हमने स्कूल जा रहे छात्रओं से हिन्दी में बातें कीं और इन्हें हिन्दी लिखने-पढ़ने के लिए आग्रह किया. सभी बच्चे-बच्चियां अपनी भूटानी वेशभूषा में नजर आए.

14 नवम्बर 2017- सुबह का लंच. नौ बजे के करीब ”थिंफ़ु” (THIMPHU) के लिए रवाना हुए.

थिंफ़ू १९६१ में भूटान की राजधानी बनाई गई थी जो विश्व की तीसरी सर्वाधिक ऊँचाई पर बसी राजधानी थिंपू ( २,२४८ मीटर-२,६४८ मीटर) है. पर्यटक सड़क मार्ग से अथवा हवाई मार्ग से यहाँ पहुंच सकता है. वांगछू नदी के किनारे बसे इस शहर के केन्द्र में चार समानान्तर सड़कें हैं. पारम्परिक विकास और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाये हुए थिंपू की इन्हीं सड़कों पर मुख्य बाजार, रेस्तरां, शासकीय कार्यालय, स्टेडियम, बागीचे तथा कई दर्शनीय स्थल हैं. रिहायशी इलाका घाटी में दूर-दूर तक फ़ैला है. आधुनिकता की दौड़ में शामिल इस शहर में बहुमंजिला इमारतें, एवं अपार्टमेन्ट्स काफ़ी तादात में बन रहे हैं.  पुरुष एवं महिलायें अपनी पारम्परिक पोषाक में नजर आते हैं. अपनी राष्ट्रभाषा जोंगखा के अलावा इन्हें हिन्दी में महारत हासिल है. जहाँ वे एक तरफ़ हिन्दी बोलते-बतियाते तो हैं लेकिन लिखना और पढ़ना इन्हें नहीं आता. शहर से ५४ किमी दूर पारो हवाई अड्डा है, जो चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है. ऊपर से देखने पर यह एक कटोरे की भांति प्रतीत होता है. रन-वे भी काफ़ी छोटा है अतः पायलट हो हवाई जहाज उतारते समय अतिरिक्त सावधानियां बरतनी पड़ती है. जरा सी भी लापरवाही से जहाज सामने खड़े पहाड़ से टकरा भी सकता है.

शाम 6.30 बजे के करीब हम भूटान की राजधानी थिंपु पहुंचे. यहाँ हमारे लिए “होटेल समभाव” में रुकने-ठहरने की व्यवस्था की गई थी. अब हम समुद्र सतह से 13,000 फ़ुट की ऊंचाई पार थे. मौसम खुश्क था और पारा 2 डिग्री शेलशियस बतला रहा था. चार-पांच गरम कपड़ों को पहिनने के बाद भी ठंड अपना प्रभाव बतला रही थी. रात के लगभग यहाँ का तापमान (-) माइनस डिग्री पर था. होटेल मैनेजर ने बतलाया कि इस भीषण ठंड में केवल यंग कपल्स ज्यादा आते हैं, वैसे यह समय आफ़-सीजन का चल रहा है. माह अप्रैल के आते ही यहाँ सैलानियों की भीड उमड़ने लगती है. बड़ी संख्या में भारत से लोग यहाँ पहुंचते हैं.

15-11-2017- सुबह गरमा-गरम नाश्ता करने के बाद हम टेक्सटाईल म्युजियम, 1972 में रायल स्वीन मदर के द्वारा तृतीय किंग की याद में बनाया गया मेमोरियल देखा. थिंपु शहर के पास ही हमने बुद्धा टेम्प्ल देखा.

 

                                                           

       बुद्धा पाईंट

बुद्धा पाईंट- थिंपू शहर के निकट दक्षिणी भाग में एक ऊंची पहाड़ी पर बुद्ध की 51.5 मीटर अर्थात 169 फ़ीट ऊंची विशालकाय धातु प्रतिमा एक ऊंचें अधिष्ठान पर स्थापित है. यहाँ के शिंपूम शहर की खूबसूरती देखते ही बनती है. भुटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक की साठवीं वर्षगांठ पर बुद्ध ( शाकमुनी) की भव्य प्रतिमा 169 फ़ुट यानी 52मीटर, 1000,000 इंच ऊँचाई और   25,000.12 इंच लंबी मुर्ति की स्थापना की गई. इसका निर्माण 2006  में शुरु हुआ और 2010 में बनकर तैयार हुआ. सोने के पालिश में बुद्ध की विशाल प्रतिमा,  विशाल प्रांगण में चारों तरह सोने के पालिश से सुन्दर नारी प्रतिमाएं और अपनी पारंपरिक परिकल्पना में बना भव्य पूजा-गृह देखकर आनन्द द्विगुणित हो उठता है. इस प्रतिमा के निर्माण की कुल लागत S- 47 मिलियन की लगत से चीन के नानाजिंग के.एयरोसुन कारपोरेशन के द्वारा किया गया था,जबकि परियोजना कुल लगत 100 मिलियन अमेरिकी डालर की आंकी गई थी. प्रायोजकों के नाम ध्यान हाल में प्रदर्शित किए गए है जो इस बुद्ध की प्रतिमा आदि के निर्माण में सहयोगी थे. विशाल कुएंसेल फ़ादरांग नामक प्रकृति पार्क जो करीब 943.4 एकड़ वन क्षेत्र में फ़ैला हुआ है.

    चांग मानेस्ट्री- इस बौद्ध मठ की स्थापना 12 वीं शताब्दी में एक ऊंची पहाड़ी पर लामा फ़ाजो रुजौम शिगपो द्वरा की गई थी. मंदिर परिसर से शिंपू शहर का विहंगम दृष्य दिखाई देता है. मन्दिर के चारों ओर 108 मंत्रोंसे सुसज्जित हाथ से घुमाने वाले चकरी देखने को मिली. ऎसी मान्यता है कि इसे घुमाने से सारे पापों का अंत हो जाता है. इसी मन्दिर के परिसर में हमारी मुलाकात एक भूटानी महिला सुश्री तिला रूपा छेत्री जी से हुई. आपने हिन्दी में भूतान की बहुत सारी बातों को बतलाया और हमारी डायरी में शुभकामनां संदेश लिखकर दिया.

मोतीथंग- रायल ताकिन संरक्षित वन

      

मोतीथंग- रायल ताकिन संरक्षित वन क्षेत्र- 15  वीं शताब्दी में ताकिन को भूटान का राष्ट्रीय पशु घोषित किया था. ताकिन के अलावा यहां पर हिरण, बारहसिंघे देखे जा सकते है. पूरा वन क्षेत्र मिनिस्ट्री आफ़ एग्रीकल्चर-फ़ारेस्ट के अन्तरगत आता है.

  फ़ोक हेरिटेज म्युजियम.

28 जुलाई २००१ में इस संग्रहालय की स्थापना की गई थी. इसमें भूटान की ग्रामीण संस्कृति और जीवन जीने के तरीके संबंधी अनेकानेक सामग्रियों को प्रदर्शित किया है. प्रदर्शनी में घरों की कलाकृतियां, उपकरण तथा अनेकानेक  वस्तुएं संग्रहित की गई हैं. यहाँ कार्यरत महिलाकर्मियो-सुश्री अंजल, सनम और संगी से कई विषयों पर जानकारियां प्राप्त हुई. 19वीं शताब्दी के एक तीन मंजिला घर को उस मूल स्वरुप में ही संरक्षित किया गया है. यह घर मिट्टी एवं लकड़ी से बना है.

नेशनल स्टेडियम थिंपु

        

शाम घिरने को थी और हम नेशनल स्टेडियम के सामने खड़े थे. तीरंदाजी और फ़ुटबाल खेल के लिए इसमें युवा खिलाड़ियों की अच्छी खासी भीड होती है. इनका उत्साह देखते ही बनता है. इसी बीच हमारी मुलाकात सेक्युरिटी अफ़सर श्री मणिकुमार जी से भेंट हुई. मिलकर प्रसन्नता हुई और वे हमें गेट बंद होने के बवजूद खेल मैदान में ले गए जहाँ तीरंदाजी में प्रवीण खिलाड़ियों के मध्य 150 मीटर की दूरी पर लगे पाईण्ट पर निशाना साधने का उपक्रम कर रहे थे. देर तक इस रोचक खेल को देखने के बाद हम अपनी होटेल “संभाव” के लिए रवाना हुए.

16-11-2017     दोचुला पास

                                              

दोचुला 16-11-2017.--रात्रि विश्राम के बाद सुबह का नाश्ता-चाय लेने के बाद हम 10.25 बजे पुनाखा शहर के लिए रवाना हुए जो यहाँ से 82 किमी की दूरी पर अवस्थित है. पुनाखा के रास्ते में दोचुला पास पर बने, समुद्र सतह से 3020 मीटर पर बने बौद्ध मन्दिर और 108 कलात्मक स्तूपों जो उल्फ़ा उग्रवादियों से लड़ाई करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए भूटानी सैनिकों की याद में बनाए गए थे. एक तरफ़ यह विशालकाय निर्माण तो दूसरी ओर भूटान-हिमालयान रेंज की बर्फ़ीली चोटियों को देखकर सारी थकावट दूर हो जाती है.

   लोवेसी वेली-रास्ते में लोवेसी-पुनाखा में प्लेट्स खेती (टेरेस फ़ार्मिंग) के भव्य नजारे देखने को मिले . किस तरह यहाँ के किसान पहाड़ों को काटकर प्लेट्स बनाकर खेती करते हैं. सभी खेतों में चावल बोया गया था. इसी तरह की खेती पुनाखा और पारो में भी होती है. इन विहंग्रम दृष्यों को निहारते हुए अब हम पहाड़ के उस निचले हिस्से (तल) में उतर रहे थे,जहाँ मोचू नदी अपनी तेज गति लिए हुए पहाड़ों से उतरकर बहती है.

मोचू में 14 किमी की राफ़्टिंग.       

     

भूटान-हिमालयान रेंज से निकलने वाली दो नदियों माचू और पोचू अलग-अलग दिशाओं में बहती हुए डिस्ट्रिक आफ़िस से कुछ दूरी पर जाकर आपस में मिल जाती है. मोचू नदी में हमने करीब चौदह किमी.लंबे राफ़्टिंग का आनन्द उठया. निश्चित रुप से यह खेल हम लोगों के लिए जीवन में पहला रोमंचकारी -जोखिम भरा उपक्रम था. नदी के बर्फ़िले और तेज गति से बहती नदी की जलधारा में कभी भींगते तो कभी गहरी गहराई में उछलकर आगे बढ़ना और शौटिंग करते हुए आनन्दित होते रहे. शाम घिर आयी थी और हम लौट चले थे अपनी होटेल पुनाखा रेसिडेंसी की ओर. रात को गहरी नींद आयी. अचानक सुबह नींद खुली और हमने कमरे की बालकनी से सुबह का अद्भुत नजारा देखा. आसमान से बादल जमीन पर उतर आए थे और उन्होंने समूचे पहाडों को और सूरज के गोले को अपनी बांहों में भर लिया था. हलका लाल-लाल चमाचमाता सूरज का गोला देखकर मन खुश हो गया.

17-11-2017. (43)

                 

kharbandi goempa (खारबांडी गूंफ़ा)                             डैम

खारबांडी मठ- 1967 में अही चुडॆरान द्वारा स्थापित और चार सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस सुन्दर मठ में बुद्ध के जीवन, शाबुदंग न्वांग नाम्गयांल और गुरु रिनपोछे की मूर्तिया स्थापित हैं, डैम तथा थिंफ़ू के विहंगम दृष्यों को जी भर के निहारने के बाद हम होटेल लौट आए थे.

१४-०९-२०१७

 

थिंफ़ू चोरटेन

शहर के दक्षिण-मध्य भाग में स्थापित मेमोरियल स्तूप जिसे थिम्फ़ू चोर्टेन के रुप में भी जाना जाता है, डुक ग्यालपो, जिग्मे दोरोजी वांगचुक को सम्मानित करने के लिए इसकी स्थापना १९७४ में तत्कालीन राजमाता के द्वारा निर्मित किया गया था. चंगनखा टेम्पल, झिलुखा नुनेरी तथा ताशीछॊडोंग महल और मंत्रियों के आवासों को निहारते कब शाम ढल आयी, पता ही नहीं चल पाया. शाम के घिरते ही हम  अपनी होटेल “संभाववा”  लौट आए.

पुनाखा-

   

३९०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है पुनाखा. यहां दो नदियां बहती है जिनके नाम है क्रमशः पोचू और माचू. इन्हीं नदियों की ऊंची-नीची घाटियों में चावल की खेती की जाती है. लाल और सफ़ेद किस्म का चांवल यहां बहुतायत में होता है. भिक्षुओं के आवास के साथ ही यह धार्मिक केन्द्र भी है. भूटान के संस्थापक शबदरुंग नगवांग नामग्याल के समय यह भूटान की राजधानी रही है. आपका पार्थिव शरीर यहाँ एक कक्ष में रखा हुआ है. यहां ऎतिहासिक इमारते देखी जा सकती हैं. बागानों मे जैविक सब्जियों के साथ ही संतरा, पपिता और सेव जैसे फ़लों वाले पौधे होते हैं.

 

    

(khamsum yulley namgyal chorten)  खामसम यूलली नामग्याल चोंने 

 

खामसुम यूलली नामग्याल Chorten Punakha घाटी के ऊपर एक सुंदर रिज पर बाहर खड़ा है . इस 4 मंजिला मंदिर के निर्माण के लिए इंजीनियरी मैनुअल से सलाह लेने के बजाय 9 सालों का निर्माण और पवित्र ग्रंथों को लेकर विचार किया गया। यह भूटानी वास्तुकला और कलात्मक परंपराओं का एक बढ़िया उदाहरण है। यह मंदिर राज्य के उत्थान, उसके लोगों और सभी संवेदनशील प्राणियों के लिए समर्पित किया गया है। भूटान देश की बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से इस स्तूप का निर्माण क्वीन मदर असी तशेरिंग यंगडोन ने सन २००४ में बनवाया था. इसका बाहरी भाग स्तूप की तरह एक शिवालय के रुप में होता है. बर्ट्सम लामा कुनज़ांग वांगडी , जिसे एचएम डुडोजोम रिनपोछे केएक करीबी शिष्य लमा निंगकुला के रूप में जाना जाता था, इस चोंने के निर्माण के प्रभारी थे। यहाँ से खड़े होकर आप भूटान-हिमालयान रेंज के दर्शन कर सकते हैं. नीले पहाड़ों की श्रृंखला जिनका शिखर बर्फ़ से ढंका देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो उठता है.

पारो.

सिततोखा झोंग

सितमोका झोंग (' ड्जोंग ' का अर्थ "महल-मठ") भी संगक जब्धन फोड्रांग ( 

भूटानी भाषाअर्थ: "गुप्त मंत्रों का गहरा अर्थ का पैलेस") एक छोटा झांग है  यह 1629 में ज़बदुरंग न्वांग नामग्याल द्वारा बनाया गया था, जो भूटान एकीकृत था। यह भूटान में निर्मित अपनी तरह का पहला है एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारक और पूर्व बौद्ध मठ, आज यह एक प्रमुख झोंगखा भाषा शिक्षण संस्थानों में से एक है। यह हाल ही में पुनर्निर्माण किया गया

 

            

सिततोंखा झोंग   

 

सितमोंखा झोंग का अर्थ होता है “महल मठ”. और एक अर्थ में गुप्त मंत्रों का पैलेस है. बुद्ध के छवि जिसे शाक्यमुनि के नाम से जाना जाता है. इसमें आठ बोधिसत्व है. यहां स्थापित हैं. यह भूटान का सबसे पुराना मठ है. इसका निर्माण 1627 में हुआ था. इसे अब एक स्कूल में परिवर्तित कर दिया गया जहां छात्र को धर्म आधारित ज्ञान दिया जाता है.

 

 राष्ट्रीय संग्रहालय-  टा झोंग(Ta Dzong)

पश्चिमी भूटान में पारों शहर में एक सांस्कृति संग्रहालय है. १९६८ में पुनर्निर्मित भवन महामहिम जिग्मे दोरजी वांगचूक के समय के भूटानी परंपरा कला के बेहतरीन नमूने, कास्य मूर्तियां, सुन्दरतम मुखौटे,सुन्दर पेंटिग, डाक-टिकटें आदि संग्रहित की गई हैं. ऊंचाई पर होने के कारण इसका उपयोग बाच-टावर ( 1627) के रुप में होता था. अब इसे बदलकर संग्रहालय बना दिया गया है. आज राष्ट्रीय संग्रहालय ने भूटानी कला के 3,000 से अधिक कामों के अपने कब्जे में है, जो कि भूटान की सांस्कृतिक विरासत के 1500 से अधिक वर्षों तक शामिल है। विभिन्न रचनात्मक परंपराओं और विषयों की इसकी स्मृद्ध धारण वर्तमन के साथ अतीत की एक उल्लेखनीय मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है और स्थानीय और विदेशी पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण का केन्द्र है.

 

 Rinpung Dzong (रिनपोंग मठ )

 

रिंगपोंग जोंग का अर्थ है गहने के ढेर का गढ़. १५ वीं शताब्दी में इसका निर्माण किया गया था. १६ वी-१७ वीं शताब्दी मे दौरान उत्तर दिशा से होने वाले आक्रमणॊं के खिलाफ़ एक गढ़ के रुप में इसका इस्तेमाल होता था. रिनफ़ुंग जोंग पारो जिले का मुख्यालय है. १६४४ में इसका निर्माण किया गया था.

 

    हा घाटी.

उत्तर से दक्षिण की ओर फ़ैली इस घाटी का नाम “हा” है. जिसे ह ह भी कहा जाता है. इस घाटी में चांवल के अलावा गेंहू,जौ,आलू,चेली और सेब की फ़लस बोई जाती है. प्रत्येक घर में याक और मवेशी, मूर्गियां, सुअरें और घोड़े पाए जाते हैं. सघन वन संपदायहां की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाती है. पूरी घाटी में पाईन के वृक्ष बहुतायत में देखे जा सकते हैं. घुमावदार सड़कों के साथ-साथ सघन वनों को निहारकर पर्यटक एक विशेष आनन्द का अनुभव करता है.

 

 

 

 

 

 टाकसांग मोनेस्ट्री ( टाइगर नेस्ट)

 



भूटान के पारो शहर के पास हिमालय की 10 हजार फीट ऊंचाई पर बसा है टाइगर नेस्ट बौद्ध मठ। गुफा में बना यह मठ 300 साल से भी ज्यादा पुराना है। इस ऊंचाई पर पैदल चढ़कर भोपाल के एक फोटोग्राफर ने मठ की कुछ तस्वीरें कैद की हैं। 8वीं शताब्दी में गुफा में की थी तपस्या...

हिमालय की पहाड़ियों पर बने टाइगर नेस्ट मोनीस्ट्री पहाड़ों के बीच बनी इस गुफा तक पैदल ही जाया जा सकता है। जो लोग ट्रेकिंग अच्छी करते हैं, उन्हें कम से कम दो से तीन घंटे बौद्ध मठ तक चढ़ने में लगते हैं, लेकिन जैसे ही बौद्ध मठ पर पहुंचते हैं, सारी थकान दूर हो जाती है। वहां मिलने वाला आध्यात्मिक माहौल और वहां से दिखने वाली हिमालय की वादियां एक अलग ही आनन्द देती हैं। इस बौद्ध मठ से भी ऊपर एक और बौद्ध मठ है, जो बच्चों का गुरुकुल है। कहा जाता है कि 1692 में टाइगर नेस्ट बौद्ध मठ का निर्माण हुआ था। इससे पहले 8वीं शताब्दी में यहां की गुफा में बौद्ध गुरु पद्मसंभवा ने तीन साल तीन महीने तीन हफ्ते तीन दिन और तीन घंटे तक ध्यान किया था। यह भी कहा जाता है कि पद्मसंभवा (गुरु रिम्पोचे) इस गुफा तक टाइगर की पीठ पर बैठकर उड़ते हुए आए थे।

 

   

Kyichu Lhakhang ( कैचु हाथांग)

पारो के बाहर भूटान का सबसे पुराना मन्दिर है. एक किंवदंती है कि हिमालय के इस क्षेत्र में एक विशाल राक्षस रहता था, जो बौद्ध धर्म के प्रचार को रोल रहा था. इस विपदा को दूर कने के लिए तिब्बत के राजा सोंगस्टेन गम्पो द्वारा ७ वीं शताब्दी में १०८ मन्दिरों का निर्माण कराया. इसे भूटान का पवित्र गहना माना जाता है. यह भी कहा जाता है इनका निर्मान एक रात में हुआ था. यहाँ से खड़े होकर आप बर्फ़ से ढंके भूटान-हिमालयान रेंज को अपनी खुली नजरों से देख सकते हैं. प्रकृति का सुन्दर और भव्य स्वरुप देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो उठता है.

 

पहाड़ी के पास ही एक बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें हिमालय की विभिन्न चोटियों कितनी-कितनी ऊंचाइयों पर है, जो बर्फ़ की चादर ओढ़े हुए है, दर्शाया गया है.

 

                            

(  PHUENTSHOLING ) फ़ुंस्सोल्लिंग  स्थित सुश्री कला गुरुंग ( टूर आपरेटर ) के कार्यालय में हम मित्रगण तथा स्टाफ़ के कर्मचारीगण )

             

 

लतागुरी फ़ारेस्ट रिजर्व. के पास स्थित- ग्रीन टच डूअर्स रिसोर्ट.

अब हम भूटान यात्रा के आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ते हैं. यह आखिरी पड़ाव है लातागुरी रिजर्व फ़ोरेस्ट ( Lataguri) जो अपने एक सिंग के गैंडॆ के लिए जाना जाता है. गैंडॊं अलावा जंगली हाथी, हिरण, जंगली भैंसा आदि बहुतायत में देखे जा सकते हैं.

उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में लातगुड़ी में ग्रीन टच डूरार्स इको रिजॉर्ट और होटल, पश्चिम बंगाल के उत्तरी जिलों में से एक है। यह बागडोगरा हवाई अड्डे से लगभग 90 किमी, एनजेपी से 80 किमी या सिलीगुड़ी से है। लातगुड़ी, बंगाल के हाल ही में विकसित पर्यटन स्थल है, जो दार्जिलिंग, कालीम्पोंग, लावा, लोलेगांव, गैंगटोक आदि के निकट लोकप्रिय हैं। लाटगुरी में हमारे होटल के आसपास हिमालय पर्वत के गोद से प्रकृति की सुंदरता को देखते हुए, क्लाउड के सूरज और सर्फ के साथ, प्राचीन ग्रीन वैली और असंबेड सील जंगल ने इस स्थल को लतागुरी में रहने वाले पर्यटकों की तलाश में लोकप्रिय बना दिया, यह लतागुरी में सबसे सुंदर पारिस्थितिकी रिसॉर्ट्स में से एक है।   इस रिसोर्ट की खूबसूरती है, आपको लतागुरी में सबसे सुखद आवास प्रदान करते हैं।

 

                       

                     

                              

 


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