Monday, 2 June 2025

  

 यात्राओ पर आलेख.


 

धरती पर स्वर्ग : कश्मीर.

कश्मीर की हसीन वादियों में.

श्रीनगर का दृश्य।

हमारी मित्र मण्डली माह  दिसंबर 2024 की आठ तारीख को असम,अरूणाचल तथा मेघालय की यात्रा से लौटी ही थी कि एक मित्र ने सुझाव दिया क्यों न हम माह मार्च में कश्मीर की यात्रा पर चलें. उसने प्रफ़ुल्लित होकर आगे बताया कि माह मार्च के द्वितीय-तृतीय सप्ताह  से लेकर अप्रैल के प्रथम-द्वितीय सप्ताह के बीच कश्मीर की संपूर्ण घाटी में ट्युलिप के रंग-बिरंगे पुष्प खिलते हैं, जिसे देखने के लिए भारत से ही नहीं अपितु विश्व के कोने-कोने से पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं. सुझाव उत्तम था.जिसे मैं बड़े चाव से सुन भी रहा था और मन ही मन उस उद्यान में जा पहुँचा था. दो बार कश्मीर जाना हुआ था, लेकिन शायद वह समय ट्युलिप पुष्पों के खिलने का समय नहीं था. बात ही कुछ ऐसी थी कि मित्र के परामर्श पर  सभी ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी और देखते ही देखते कश्मीर जाने का प्लान तैयार हो गया.

कश्मीर के नाम में आकर्षण है, जादू है. यही कारण है कि कश्मीर का नाम जुबान पर आते ही मन की वीणा के तार झंकृत होने लगते है. मन मयूर नाच उठता है और नयनों में सुनहरे सपने सजने लगते हैं. चारों ओर बर्फ की चादर ओढ़े पर्वतों की श्रृँखलाएँ दिखाई देने लगते हैं. चीड़, देवदार,चिनार कैला,फ़र, टैक्सस, जुनियर और साइप्रस के सघन वन दिखाई देने लगते है. जम्मू-कश्मीर राज्य का एक वृक्ष है जिसे चिनार कहते है. जो अपने विशाल आकार तथा शरद ऋतु में रंगीन पत्तियों के बीच मुस्कुराता मिलता है. देवदार एक शंकुवृक्ष है जो अपनी लम्बाई तथा अपनी मजबूती के लिए जगप्रसिद्ध है. कैला भी देवदार प्रजाति का एक वृक्ष है. हिमालय की ऊँचाईयों पर पाया जाने वाला वृक्ष फ़र है. टैक्सस एक शंकुधारी वृक्ष है जो जहरीली पत्तियों के लिए जाना जाता है. कम ऊँचाई पर पाया जाने वाला वृक्ष ओक है. जूनियर-एक शंकुधारी वृक्ष है जो अपने खूशबूदार फ़लों और औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है. कश्मीर की इन्हीं हसीन वादियों में खिलता है एक पुष्प, जिसे हम ट्युलिप के नाम से जानते हैं, अपने आकर्षण के लिए जगप्रसिद्ध है.

नीचे जो दृश्य दिख रहा है वह पीर पंजाल रेंज है. शायद ऐसा ही दृश्य देखकर जहांगीर ने फारसी में कहा था, ‘गर फिरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्तअर्थात अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं पर है और सिर्फ यहीं पर है.

फ़िरदौस का  एक अर्थ –स्वर्ग, अथवा एक बगीचा, वाटिका या उद्यान भी होता है. बाइबल के मुताबिक अदन का एक बाग जिसका नाम फ़िरदौस था. फ़िरदौस एक अरबी मूल का यूनिसेक्स नाम भी है. फ़िरदौस एक फ़ारसी कवि का नाम भी था. फ़िरदौसी ने जगप्रसिद्ध शाहनामा में इसकी रचना की थी. बारहवीं शताब्दी में कश्मीर में एक कवि जन्म लिया था जिसका नाम “कल्हण” था. इसने “राजतरंगिणी” नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें कश्मीर के इतिहास का लेखा-जोखा दर्ज है.

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स्वर्ग का-सा अद्भुत नजारा देखे बिना कोई कहे कि क्या रखा है कश्मीर में?  तो इसका उत्तर होगा कि कश्मीर में क्या नहीं है.! बहुत कुछ है देखने को, लेकिन उसे देखने लिये उस तरह की आँखें चाहिए. जैसे ही आप इस हसीन वादियों में प्रदेश करते हैं ,बर्फ़ीले पहाड़ों से लिपटकर चलती शीतल हवा के झोंके, आपके शरीर में कंपकंपी पैदा करने के लिए पर्याप्त है.जम्मु-कश्मीर के पहाड़ों के नीचे, बहुत नीचे ढलान में सर्पाकार गति से कलकल-छलछल के स्वर निनादित करती नदियाँ- झेलम,चिनाव, तवी, रावी और सिंधु कश्मीर की इस सुरम्य परिदृष्य में सुंदर ढंग से केवल बहती ही नहीं हैं,बल्कि इसके आकर्षण को चार गुणा बढ़ाती भी है. कश्मीर के पश्चिमी भाग में वेरीनाग में गहरे नीले पानी के झरने से एक आकर्षक नदी निकलती है झेलम.725 किमी की यात्रा करती हुई झेलम पाकिस्तान के पूर्वी क्षेत्र में सिंधु नदी में मिल जाती है. झेलम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना एक शब्द है. झेल या जल, जल माने पानी और हम का अर्थ होता है बर्फ. संस्कृत साहित्य में झेलम का एक नाम-वितस्ता है. जो कश्मीरी भाषा में “व्येध” के नाम से बोली तथा जानी जाती है.

झेलम ईसा पूर्व 326 में लड़ी गई हाइडस्पेस की लड़ाई के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें सिकन्दर महान ने अपनी सेना के साथ इसी झेलम को पार किया था और राजा पोरस को हराया था. प्राचीन युनानी नदी को समुद्र का देवता थौमास और बादलों को देवी इलेक्ट्रा का पुत्र मानते थे. झेलम कश्मीर की खूबसूरती में चार चाँद लगाती है. सर्दियों के मौसम की शुरुआत के दौरान इसकी खूबसूरती सबसे ज्यादा देखने में मिलती है. यही कारण है कि इस मौसम में सैलानी/पर्यटक ज्यादा संख्या में पहुँचते हैं.

“कश्मीर” Free Breathtaking view of lush green hills and mountains in Haveli Azad Kashmir, perfect for a nature escape. Stock Photo

कश्मीर नाम  संस्कृत से लिया गया है और इसे कश्मीरा भी कहा जाता है. कश्मीर को लेकर एक लोकप्रिय स्थानीय व्युत्पत्ति यह है कि यह पानी से सूखी हुई भूमि है. एक अन्य वैकल्पिक व्युत्पत्ति के अनुसार यह नाम वैदिक ऋषि कश्यप के नाम से लिया गया है. जिनने बारे माना जाता है कि उन्होंने इस भूमि पर लोगों को बसाया था.

श्रीनगर.-

भारतीय पुराणॊं के अनुसार “श्री “ का अर्थ होता है = लक्ष्मी. इस संदर्भ के अनुसार श्री का निवास-स्थान.अर्थात एक ऐसा नगर/स्थान  जहाँ लक्ष्मी निवास करती हैं.  प्रारंभिक इतिहास कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार, अशोक ने कश्मीर घाटी में “श्रीनगरी” नाम से एक राजधानी बनाई थी. कल्हण इस राजजधानी को पुरानाधिष्ठान कहते हैं, जिसका संस्कृत में अर्थ है-पुरानी राजधानी, जिसकी पहचान वर्तमान के पंद्रेथन के रूप में की गई है, जो श्रीनगर से 3.5 किमी दक्षिण-पूर्व में है.

श्रीनगर जिसे “पृथ्वी पर स्वर्ग” कहा जाता है. अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है. यह शहर डल झील, हाउसबोट (तैरते हुए होटल एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करते हैं.) और शिकारा ( पारंपरिक लकड़ी की नावें झील में सवारी के करने के लिए और आसपास के दृश्यों का आनंद लेने के लिए एक लोकप्रिय तरीका है.) जैसी चीजों के लिए जाना जाता है. यहाँ के बाग-बगीचे, झील और पारंपरिक कश्मीरी हस्तशिप के प्रसिद्ध है. श्रीनगर को चारों ओर से पहाड़ घेरे हुए है, जो न केवल इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते है.

22 मार्च को छिन्दवाड़ा से प्रस्थान.

कश्मीर की सौंदर्यता को जी भर निहारने के लिए उतावले होते हुए हमने अण्डमान-जम्मु के बीच चलने वाली एक्सप्रेस ट्रेन नंबर 16031 से टिकटें आरक्षित कर ली थीं.  अण्डमान एक्सप्रेस रात्रि के 12-30 बजे जबलपुर पहुँचती है, कुछ यात्री छिन्दवाड़ा से, कुछ अन्य मार्गों से समयपूर्व जबलपुर पहुँच चुके थे. निर्धारित समय से कुछ विलम्ब से चलती हुए हमारी ट्रेन दिनांक 25 मार्च को जम्मु पहुँचती है, जहाँ हमारा ट्रेलिंग एजेंट श्री उत्सव दालचूट हमारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था. जम्मु से श्रीनगर की दूरी 243.3 किमी है, जिसे हमने सड़क मार्ग से लगभग छः घंटे का सफ़र तय करते हुए शाम को श्रीनगर पहुँचे और रात्रि होटेल में विश्राम किया.

26-03-2025-कश्मीर से गुलमर्ग ( 51. किमी. दूरी तय करने में लगभग एक से देढ़ घंटा लगता  है.)

गुलमर्ग. -

श्रीनगर से गुलमर्ग की सड़क से दूरी 51 किमी है. एक से देढ़ घंटे में आप यहाँ आराम से पहुँच सकते हैं. गुलमर्ग का मूल नाम गौरीमर्ग था. 16वीं शताब्दी में युसुफ़ शाह चक ने बदलकर गुलमर्ग कर दिया. अपनी नैसर्गिक सुदरता के कारण इसे धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है. यहाँ के हरे-भरे ढलान और बर्फ़ से लदी पर्वत श्रेणिया पर्यटकों का मन मोह लेता है. समुद्र तल से 2730 मीटर के ऊँचाई पर बसे गुलमर्ग

              

Village in the middle of Himalaya mountains Village in the middle of Himalaya mountains (Gulmarg, Kashmir, India) gulmarg stock pictures, royalty-free photos & images

में सर्दियों के मौसम के दौरान यहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं. यहां से चलकर हम थोड़ा आगे बढ़ते है अरु घाटी की ओर. यहाँ भी चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ था. स्लेज गाडी के सवारी करने का मन था,अतः उसका भी आनन्द लिया जाए सोचकर उस पर सवार हुआ. एक ऊंचे टीले से स्लेज के सहारे नीची गहराइयों में तीव्रगति से फ़िसलते हुए नीचे की ओर आना रोमांच में भर देता है. उस समय कुछ ऐसा लगा मानो बचपन में प्रवेश कर गया होऊँगा.

गुलमर्ग में  बर्फ़बारी दिसंबर से फ़रवरी तक होती है. अतः यहाँ भीषण ठंड पड़ती है. शून्य से नीचे तपमान -5 डिग्री से -15 तक जा पहुँचता है.  लेकिन हम तो मार्च के अंतिम सप्ताह में इस स्थान पर पहुँचे थे. और देखते क्या हैं कि चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ जमी हुई थी. इतना खुशनुमा वातारण देखने के लिए यह  मेरा पहला अवसर था, जब मैं अपनी खुली आँखों से प्रचूर मात्रा में चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ देख रहा था. हम सारे मित्र बर्फ़ पर चहलकदमी करते हुए इस अद्बुत नजारे को देखकर गदगद हुए जा रहे थे. आमतौर पर बर्फ़ या बर्फ़ की सतह पर स्लाईड करने का अपना रोमांच है. स्लेज चालक मुझसे अनुरोध करने लगा कि मैं उसकी स्लेज पर सवार होकर आनंद उठाऊँ. मैं भी अंतःकरण से स्लेज पर सवारी करने की सोच भी रहा था.

गुलमर्ग में इस समय कंपा देने वाली बर्फ़िली हवा प्रवहमान हो रही थी. चारों ओर धुंधा-सी छाई हुई थी. हल्की-हल्की बारिश भी हो रही थी.इस सुहावने मौसम में आगे बढ़ते हुए हम हरि निवास महल जा पहुँचे

महाराज हरिसिंह पैलेस- Hari Niwas Palace-Heritage Hotel

महाराजा हरिसिंह-  (23 सितंबर 1895 : 26  अप्रैल 1961 मुंबई.) जम्मू और कश्मीर रियात के अन्तिम शासक थे. वे महाराजा रामवीर सिंह के पुत्र और पूर्व महाराज प्रताप सिंह के भाई, राजा अमरसिंह के सबसे छोटे पुत्र थे. इन्हें जम्मू-कश्मीर की राजगद्दी अपने चाचा महाराज प्रताप सिंह से वीरासत में मिली थी.

महाराज कर्ण सिंह- ( 1931)-भारतीय राजनेता, लेखक और  कूटनीतिज्ञ महाराज कर्ण सिंह जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह और महारानी तारा देवी के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी (युवराज) जे रूप में जन्मे डा.कर्ण सिंह ने अठारह वर्ष की उम्र में राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया था. वर्ष 1949 में प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरु के हस्तक्षेप पर उनके पिता ने उन्हें राजप्रतिनिधी (रीजेंट) नियुक्त किया. वे अठारह वर्षों तक राजप्रतिनिधि निर्वाचित - सदर-ए-रियासत और अनंतः राज्यपाल के पदों पर भी रहे.

कश्मीर रियासत का भारत में विलय 26 अक्टूबर1947 को हुआ. जब महाराज हरिसिंह ने भारत सरकार के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, यह कदम रियासत पर पाकिस्तान के कबालियों द्वारा आक्रमण के खतरे के बाद उठाया, जिससे महाराजा को भारत से मदद मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा था

27-03-2025

सोनमर्ग तथा ट्युलिप गार्डन-की सैर.

  सोनमर्ग सुरंग- “J&K Crown Of India, Want It To Be Beautiful”: PM Modi As He Launches  Z-Morh Tunnel

जम्मु और कश्मीर के गंदरबल जिले में नगनगीर और सोनमर्ग को जोड़ने वाली 6.5 किमी लंबी सड़क सुरंग है. हिमस्खलन और भारी बार्फ़बारी के कारण सर्दियों में सड़क मार्ग अवरुद्ध हो जाता था. सुरंग बनजाने के बाद अब सभी मौसम में यातायात अवरुद्ध नहीं होता. इससे पहले जिग-जैक सड़क पर घंटों की तुलना में अब केवल 15 मिनट लगते हैं. सुरंग पार होते ही हमें चारों ओर बर्फ़ ही बर्फ़ दिखाई दे रही थी.

जम्मू-कश्मीर प्रदेश के पीर पंजाल पर्वतमाला को पार करने के लिए एक सुरंग बनाई गई है. यह 8.45 किमी लंबी स़ड़क सुरंग बनीहाल और काजीगुंड को जोड़ती है. सामरिक दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण टनल है. साढ़े आठ किमी लंबी सुरंग बनिहाल दर्रा में मौजूद जवाहर सुरंग के ठीक 400 मीटर नीचे बनी है.

 

बनीहाल काजीगुंड रोड सुरंग.

 

सोनमर्ग-  जिला गंदरबल ( 79.4 किमी. सड़क मार्ग से चलते हुए यहाँ से 2.30 घंटे लगते हैं.) सोनमर्ग जिसका अर्थ होता है-“सोने की घास का मैदान.” दूर-दूर तक फ़ैले नीले आसमान के नीचे 

 

 

 

 

 

सोनमर्ग में लगातार बारिश हो रही थी. फ़र्फ़ के हल्के-हल्के गोले आसमान से होते हुए धरती पर आ रहे थे. ठंड अपने शबाब पर थी. चारों ओर धुंधलका छाया हुआ था. सुहावना दृष्य देखकर हम भी अपनी मस्ती पर उतर आए थे और ठुमका लगाकर नाचने लगे थे. जीवन में इतनी सारी बर्फ़ देखने का यह मेरा पहला अवसर था.

ट्य्लिपगार्डन

field of flowers beside trees

 

ट्युलिप गार्डन को कभी फ़्लोरीकल्चर सेंटर के नाम से जाना जाता है. वर्तमान में इसका नाम इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्युलिप गार्डन है.यह एशिया का सबसे बड़ा ट्युलिप गार्डन है, जो लगभग 30 हेक्टेयर के क्षेत्र में फ़ैला हुआ है. यह जबरवान रेंज के आधार पर स्थित है, जो एक ढलान वाली जमीन पर सीढ़ीदार तरीके से बनाया गया है. ट्य्लिप गार्डेन में ट्युलिप की लगभग 75 किस्में हैं. ट्युलिप के अलावा यहाँ 46 प्रकार के फ़ूल हैं, जिसमें हाइसिंथ, डेफ़ोडिला और रैनुनकुलस शामिल हैं, जिन्हें हालैंड से लाया गया है.

मुगल गार्डन-

कश्मीर के मुगल गार्डन विशेष रूप से शालीमार बाग, निशात बाग और चश्मे शाही मुगल बादशाहों, विशेष रूप से जहांगीर और शाहजहां द्वारा निर्मित किए गए थे. ये बागीचे अपने खूबसूरत परिदृश्य, जल स्त्रोतों और वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं. शालीमार बाग का निर्माण जहां गीर ने अपनी पती नूरजहां के लिए 1619 में बनवाया था. इस बाग में फ़व्वारे,छतें और नहरें है, जो डल झील से जुड़ी हुईं हैं. निशात

बाग का निर्माण जहांगीर की पत्नी नूरजहां के भाई असफ़ खान ने बनवाया था. इस बाग में सुन्दर पेड,फ़ूल और झरने हैं.चश्में शाही 17 वीं शताब्दी में बनाया गया था.

ट्युलिप गार्डन में भ्रमण करने के पश्चात हम सोनमर्ग की ओर बढ़ जाते हैं. यहाँ जमकर बर्फ़ पड़ी थी. अतः चारों ओर के पर्वत बर्फ़ की चादर ओढ़े किसी तपस्वी से कम नहीं लग रहे थे. हल्की बारिश भी हो रही थी. आकाश से बर्फ़ के मुलायम गोले हवा में तैरते हुए नीचे आ रहे थे. मुझे अपने जीवन में इतनी प्रचुर मात्रा में बर्फ़ देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ था.

27-03-2025    डलझील

डलझील-तीन दिशाओं से घिरी पहाड़ियों के बीच 18 किमी में फ़ैली हुई डल झील अपनी सुंदरता के लिए विख्यात है. कश्मीर घाटी की अनेक झीलें इसमें आकर मिलती हैं. इसे “श्रीनगर का गहना” //कश्मीर का मुकुट” नाम दिया गया है. झील की तटरेखा लगभग 15.5 किमी. है, जो मुगल युगों के उद्यानों, पार्को, हाउसबोट और होटलों से सजी एक बुलेवार्ड से घिरी हुई है. झील के सुन्दर दुश्य मुगल उद्यानों जैसे शालीमार बाग, निशात बाग से देखे जा सकते है, जिन्हें मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में बनवाया था.

शिकारा में भ्रमण करते हुए एवं आनंदित होते हुए प्रायः सभी मित्रों ने अपने-अपने मोबाईल में डलझील की खूबसूरती को कैद किया. तात्पश्चात हमारी मित्र-मण्डली ट्युलिप गार्डन जा पहुँची.

28.03-2025- अहरबल-

 

        

अहरबल-  गुलमर्ग से अहरबल लगभग 113 किमी है. साढ़े तीन घंटे में यहाँ पहुँचा जा सकता है. इसे कश्मीर का  नियाग्रा फ़ाल कहा जाता है. यह कश्मीर घाटी के दक्षिण-पश्चिम भाग में स्थित है. यह काफ़ी शांत जगह है. इस वाटरफ़ाल को देखने के लिए अनेक पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं .अहरबल का प्रख्यात जलप्रपात देखकर हम लौट पड़ते है पहलगामकी ओर. और रात्रि विश्राम करते हैं.

29-03-2025

पहलगाम—

पहलगाम.-पर्यटल स्थल पहलगाम अपने शंकुधारी वनों के लिए प्रसिद्ध है. 2,130 मीटर की ऊंचाई पर और श्रीनगर से 95 किमी की दूरी पर स्थित है  यह और यह घने जंगलों, खूबसूर्त झीलों और फ़ूलों के घास के मैदानों से घिरा हुआ है. 16,000 फ़ीट से अधिक की ऊँचाइ पर स्थित कश्मीर में लिद्दर नदी, पहलगाम में घूमने के लिए सबसे खूबसूरत जगहों में एक है.

 

पहलगाम का पौराणिक महत्व--एक कथा.

माता पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने के लिए उन्होंने पहलगाम में अपने प्रिय वाहन नंदी का त्याग किया था. फ़िर उन्होंने अपनी जटाओं में शोभायमान चन्द्रमा का त्याग किया. जिस स्थान पर चन्द्रमा का त्याग किया, वह स्थान चंदनवाड़ी के नाम से प्रसिद्ध है. आगे के क्रम में उन्होंने शेषनाग नामक झील पर पहुँचकर अपने गले में लिपटे सर्प का त्याग किया. आज वह झील शेषनाग झील के रूप में जानी जाती है. अगले पड़ाव महागुनस पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने अपने प्रिय पुत्रा श्री गणेश जी का त्याग किया. फ़िर पंचतरणी पहुँचकर उन्होंने अपनी जटओं के सुशोभित मां गंगाजी को त्याग दिया. इस तरह शिवजी ने पाँच तत्वों का त्याग कर अंत में अमरनाथ गुफ़ा में प्रवेश किया और माता पार्वर्ती जी को अमरकथा  कह सुनायी...     

  Hindu pilgrims queue to see an ice stalagmite resembling Shiva outside the sacred cave of Amarnath, one of the most revered of Hindu shrines on June...       

62 दिन चलने वाली अमरनाथ यात्रा की शुरुआत माह जुलाई से प्रारम्भ होती है. इस पवित्र गुफ़ा में विशाल आकार का शिवलिंग स्वमेव ही आकार लेता है. जिस  स्थान पर शिवलिंग होता है, ठीक उसके आजू-बाजू में माता पार्वती और श्रीगणेश जी पिंडी के रूप में दिखाई देती हैं.

चंदनबाड़ी-

पहलगाम में रात्रि विश्राम के बाद हम चंदनबाड़ी, बेताब व्हेली, तथा अरु व्हेली को देखने के लिए निकल पड़ते हैं.

29-03-2025

चंदनबाड़ी- पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वतीजी को अमरकथा सुनाने से पहले इसी स्थान पर उन्होंने चंद्रमा का  त्याग किया था. इसका वर्णन हम ऊपर कर चुके हैं..

View of Betab Valley in winter season, near Pahalgam, Kashmir, India Jammu and Kashmir Stock Photo

पहलगाम  अनन्तनाग जिले में स्थित है.अनन्तनाग से 45किमे दूर लिद्दर नदी के किनारे बसा हुआ है. यह एक लोकप्रिय पर्यटन और पर्वतीय स्थल है.अमरनाथ यात्रा का एक महत्वापूर्ण पड़ाव है. यहाँ विश्व भर से हजारों पर्यटक प्रति वर्ष आते हैं.यहाँ के आकर्षक और नयनाभिमान दृष्यों को देखने के पश्चात हम बेताबा घाटी की ओर बढ़ते हैं.

बेताब घाटी.

River and parking at Betaab valley near Pahalgam, Jammu Kashmir, India

बेताब घाटी का मूल नाम हजन घाटी है. यह अनन्तनाग जिले में पहलगाम से 15 किमी दूर पर्वतीय क्षेत्र है. सन 1983 को फ़िल्म “बेताब” की शूटिंग इसी स्थान पर हुई थी., जिसमे सनी देवोल और अमृता सिंह ने अभिनय किया था. हजन घाटी का नाम लोग भूल चुके हैं. अब यह बेताब घाटी के नाम से जानी जाती है.

बेताब घाटी के विहंगम दृष्यों को बस से ही निहार्ते हुए हम जा पहुँचे अरु व्हेली.

अरू व्हेली.

 

 

अरु व्हेली को अदाब के नाम से भी जाना जाता है. अनन्तनाग से 53 किमी दूर, पहलगाम से 12  किमी, और लिद्दर नदी से 11 किमी ऊपर की ओर स्थित है अरु व्हेली.अपने सुन्दर घासों के मैदानों, झीलों और पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध यह कोलाहोई ग्लेशियर, तारसर झील, मार्सर और हरबागवान झील की ट्रेकिंग के लिए बेससिक कैंप है. यह गाँव अरु नदी के बाएं किनारे पर स्थित है, जो लिद्दर नदी की एक सहायक नदी है. अरु-जम्मू और कश्मीर का सबसे बड़ा चारा बीज उत्पाद स्टेशन है. अरु घाटी अपने प्राकृतिक सौंदर्य और ट्रैकिंग की संभावनाओं के कारण एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है. यह घाटी उन लोगों के लिए एक आदर्श गंतव्य है जो प्रकृति और साहसिक गतिविधियों का आनंद लेते हुए लौटते हैं..  यहाँ से लौटकर हमने रात्रि विश्राम किया और अगली सुबह हम पटनीटाप की ओर रवाना हुए.

30-04-2025

पटनीटाप-पटनीटॉप क्यों प्रसिद्ध है? Photo

 

 

बर्फ़ से ढंकी पहाड़ियों, हरे-भरे घास के मैदानों और पैराग्लाइडिंग, स्कीइंग और ट्रेकिंग आदि गतिविधियों के कारण पटनीटाप अपने आप में एक सौंदर्य स्थल है. पटनीटाप नाम की उत्पत्ति मूल नाम- पाटम दा तालान” का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है- राजकुमारी का तालाब. पुराने जमाने में घास के मैदानों में एक तालाब हुआ करता था और राजा की राजकुमारी अक्सर वहाँ स्नान किया करती थी. तालाब का एक हिस्सा अभी भी युवा छात्रावास के पास देखा जा सकता है. पटनीटाप प्रसिद्ध वैष्णो मन्दिर जाने वाले लोगों के बीच एक लोकप्रिय रिसार्ट है.

 

पटनीटाप में रात्रि विश्राम करने के पश्चात हम अगली सुबह माता वैष्णव देवी के दर्शनों के लिए कटरा की ओर रवाना होते हैं.पटनीटाप से कटरा की दूरी 84.2 किमी है. ढाई-तीन घम्टे में आप यहाँ पहुँच सकते हैं.

 

30-03-2025

 

पटनीटाप नाग मन्दिर.

 

सनातन परंपरा में नाग देवता की पूजा पौराणिक काल से चली आ रही है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु जहां शेषनाग की शैय्या पर शयन करते हैं तो वहीं यही नाग भगवान शिव के गले का हार बनता है. देवी-देवताओं से जुड़े नाग देवता की पूजा का बहुत ज्यादा माना गया है. यही कारण है कि श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पंचमी जो कि नाग पंचमी के रूप में जानी जाती है, उसमें नाग देवता के विभिन्न स्वरूपों और मंदिरों में दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. नाग देवता का आठ दशक से पुराना मंदिर जम्मू के पटनीटाप में स्थित है. हिंदू मान्यता के अनुसर इस मंदिर में नाग देवता की पूजा करने पर व्यक्ति के जीवन से जुड़े कष्ट दूर और कामनाएं पूरी होती हैं. यही कारण है कि नागपंचमी के पावन पर्व पर यहां पर नागदेवता के भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है. मान्यता है कि यहां पर कभी इच्छाधारी नाग देवता ने ब्रह्मचारी रूप में कठिन तप किया था और उसके बाद उन्होंने यहां पर पिंडी रूप धारण कर लिया था. तब से यहां पर महिलाओं का प्रवेश मना है.

गोंडोला का प्रथम फ़ेज

पटनीटाप से आप गोंडोला की ओर जाते केबल कार को आता-जाता देख सकते हैं. गोंडोला की स्वारी का पहला चरण कोंगडोरी तक होता है. इस चरण में आप गुलमर्ग के हरी-भरी घास के मैदान और अल्पाइन जंगलों का मनोरम दृश्य देख सकते हैं. लगभग पन्द्रह मिनिट मेम आप केवल कार पर सवार होकर यहाँ पहुँच सकते है. इस प्रथम फ़ेज में आप एटीवी राइड और स्लेजिंग का आनन्द ले सकते हैं.

गोंडोला का द्वितीय फ़ेज

प्रारंभ बिंदु-कोंगाडोरी से होकर इसका अन्तिम बिंदू अफ़रवट की चोटी पर जाकर समाप्त होता है. लगभग 35 मिनट में आप यहाँ जा पहुँचते हैं. यहाँ से आपको हिमालय की राजसी सुंदरता बहुत करीब से देखने को मिलती है.

गोंडोला का तीसरा फ़ेज

इसका प्रारंभ बिंदू कोंगडोरी ही है और अन्तिम पडाव मेरी शोल्डर पर समाप्त होता है.

गोंडोला से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी

 गुलमर्ग-गोंडोला एशिया की सबसे ऊँची केबल का परियोजना है. यह दुनिया की सबसे बड़ी और दूसरी सबसे ऊँची कार परियोजना है. केबल कार में छः लोग ही बैठ सकते हैं. एक घंटे में लगभग छः सौ लोग गोंडॊला से यात्रा कर सकते हैं, यात्रा सुबह के दस बजे से शाम के पांच बजे तक का है.

गोंडोला राइड-

गोंडोला राइड का अर्थ है “केबल कार की सवारी”

 

यह एक ऐसी सवारी है जहाँ  आप एक केबल से जुड़ी हुई एक बोगी में बैठते है और वह आपको ऊँचाई पर ले जाती है. इस केबल कार में बैठ कर आप वहाँ ने नयनाभिराम दृष्यों को देख सकते हैं.

 

गुलमर्ग में गोंडोला राइड एक लोकप्रिय गतिविधि है, जहाँ आप गुलमर्ग से कोगडोरी और फ़िर अफ़रवाल तक केबल कार से यात्रा कर सकते हैं. यह दुनिया की सबसे ऊँची केबल कार में से एक है और इसमें दो चरण होते हैं. पहले में आपको यह केबल कार 8530  फ़ीट की ऊंचाई पर कोंगडोरी तक ले जाती है और दूसरा चरण 12293 फ़ीट की उँचाई तक जाता है. इस यात्रा पर जाने से पूर्व आपको अपनी सीट आरक्षित करवानी होती है. दोनों फ़ेस के लिए अलग-अलग टिकटें बुक करवाना होता है और यह काम आपको इंटरनेट के माध्यम से हासिल करनी होती है. दोनों फ़ेज की टिकिट कंफ़र्म होने पर ही आप इस केबल कार में सफ़र करने की सोचें. यदि किन्हीं कारणों से द्वितीय फ़ेज की यात्रा निरस्त होती है, तब आपको रिफ़ंड मिल जायगा. यदि प्रथम फ़ेज की टिकिट आपको नहीं मिलती है और दूसरे की मिल जाती हो तो कृपया आप टिकटें बुक न करवाएं. इसमें रिकंड नहीं मिलेगा.

चुंकि हमारे पास द्वितीय फ़ेज के टिकटें आरक्षित थीं,लेकिन पहले फ़ेज की टिक्ट लाख कोशिश काने के बाद भी प्राप्त नहीं कर पाए. किसी मित्र ने सलाह दी कि प्रथम फ़ेज की टिकटें वहीं से ले लेंगे,लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. इस तरह हमें द्वितीय फ़ेज का टिकट रिफ़ंड नहीं हो पाया. जब तक दोनों फ़ेज की टिकटें न मिले, टिकटें लेने से बचें.

31-03-2025 पटनीटाप में विश्राम करने के पश्चात हम अगली सुबह चार बजे उठकर हेलीपैड की ओर प्रस्थान करते हैं.

01-04-2025

माता विष्णो देवी के दर्शन-के लिए प्रस्थान.

 सांझीछत हेलीपैड

   कोहरे के कारण कटरा-सांझीछत ...  Helipad at Sanjichat - Picture of Himalayan Heli Services ...

 

      

कटरा से हेलीपैड- “सांझीछत”की दूरी लगभग दो किमी है. हेलीकाप्टर से एक ओर की यात्रा का 2100.00 तथा आने-जाने का किराया 4200.00 लगता है. इस यात्रा के लिए आनलाइन बुकिंग करना होता है. हेलीकाप्टर में एक बार में अधिकतम पांच यात्रियों को ले जाया जा सकता है. माता का भवन सांझीछत से 2.4 किमी. दूर है. देवी के दर्शनों के लिए आपको पदयात्रा करनी पड़ती है.

 

वैष्णो देवी मन्दिर  

 

पौराणिक मान्यता है कि वैष्णो देवी मन्दिर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है,,जहाँ देवी ने भैरवनाथ का वध किया था और बाद में तपस्या की थी. 108 शक्तिपीठ में से इसे एक माना जाता है, जहाँ देवी सती का कपाल गिरा था. यह भारत के सबसे अधिक देखे जाने वाले तीर्थ स्थलों में से एक है, जहाँ हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं.

 

कटरा से देवी गुफ़ा तक की यात्रा 13 किमी. है., जिसे टट्टू, डांडी, इलेक्ट्रिक कार या पैदल ही तय किया जा सकता है. चुंकि हमारे ग्रुप में सभी यात्री सीनियर सीटीजन की श्रेणी में आते हैं अतः कुछ महानुभावों ने घोड़ों की मदद से और कुछ ने हेलीकाप्टर से यात्रा करना उचित समझा और तदानुसार टिकटें आरक्षित करवा ली थीं. Jammu Know the history, story and importance of Vaishno Devi ...

 

 

Mata Vaishno Devi Shrine wears a grandeur look during ...

 

श्रीमद देवी भागवत जैसे विभिन्न पुराणों में 51और108 शक्ति पीठों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है. श्री माता देवी विष्णव देवी मन्दिर 108 शक्ति पीठों में एक है. गर्भगृह में तीन पिण्डियों यथा-महाकाली, महा सरस्वती और महालक्ष्मी के एक साथ दुर्लभ दर्शन होते हैं/ इस स्थान पर माता सती का कपाल गिरा था. दर्शन-पथ के दोनों ओर फ़ूलों के आकर्षक दृष्य बनाए जाते हैं. एक जानकारी के अनुसार प्रतिदिन पाँच करोड़ रुपया फ़ूलों की खरीद पर खर्च होता है.

देवी भागवत के अनुसार महिषासुर नामक दैत्य ने मां भगवती के समक्ष विवाह करने का प्रस्ताव भेजा. जब देवी ने उससे कहा कि तुम मुझसे युद्ध करो. यदि मैं पराजीत हो गई तो तुमसे विवाह अवश्य कर लूँगी.महिषासुर ने देवी के विरुद्ध वीरतापूर्वक युद्ध किया. वह पल-पल के रूप बदलते हुए माता रानी से युद्ध करता था/ कभी वह भैसें का, तो कभी हाथी का का रूप धारण कर युद्ध करता रहा. अंत में  वह भैंसे ही अपने मूल स्वरूप के रूप में प्रकट हुआ. देवी ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया.

माता का जयकारा लगाते हुए आप बिना थकावट के मंदिर-गुफ़ा तक आराम से जा सकते हैं. यात्रा पर जाने से पूर्व आप अपना रजिस्ट्रेशन अवश्य करवा लें.रजिस्ट्रेन के आधार पर आपको माता रानी के दर्शनों के लिए सुविधाजनक मार्ग मिल जाता है.

 

लाखों की संख्या में भक्तगण यहाँ आकर माता रानी के दर्शन कर कृतार्थ होते है

जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी के दर्शन के लिए एक महत्वपूर्व शहर है. और इसका इतिहास मुख्य रूप से इस मन्दिर और उससे जुड़ी धार्मिक यात्रा से जुड़ा हुआ है.

हम सभी सहयात्री सौभाग्यशाली रहे हैं कि हमे माता रानी जी के दर्शनों का पुण्यलाभ  01 अप्रैल 25 को हुए और आज का दिन मंगलवार था. मंगलवार को देवी का दिन भी कहा जाता है. देवीजी के दर्शनों के उपरान्त हम सभी ने होटेल में विश्राम किया.

 

02-05-2025

 

अगली सुबह माने 02 मई को हम  लोग कटरा से जम्मू की ओर  रवाना हुए. कटरा से जम्मू की सड़क मार्ग से 45.7 किमी है, जिसे तय करने में एक से सवा घटें में पहुँचा जा सकता है. जम्मू पहुँचकर हमने स्टेशन पर बने यात्री लाउंज में अपना सामान रखा. यह लाउंझ ठंडा और आरामदायक है. सोफ़ा तथा आरामदायक कुर्सियाँ यहाँ उपलब्ध है. इसी लाउंज में चाय-नाश्ते की उत्तम व्यवस्था प्रदान की गई है. प्लेटफ़ार्म से लगे होने के कारण यात्री को ट्रेन तक पहुँचने में आसानी होती है. हमारी ट्रेन प्लेटफ़ार्म एक से ही रवाना होनी थी. इसी लाऊंज में दोपहर बाद तक विश्राम करने के पश्चात हमने जम्मू का प्रसिद्ध रघुनाथ मन्दिर के दर्शन किए.

 

रघुनाथ मन्दिर-जम्मू.

 

 

 

रघुनाथ मन्दिर जम्मू भगवान श्रीराम जी को समर्पित है. इसका निर्माण महाराज गुलाब सिंह ने 1835 में शुरुकिया था और उनके बेटे महाराज रणवीर सिंह ने 1860 में पूरा करवाया. उत्तरभारत के सबसे बड़े मन्दिर परिसरोम में से यह एक है, जिसमें सात अलग-अलग मन्दिरों का समूह है. यह मन्दिर अपनी कलात्मता और वास्तुकला के लिए जाना जाता है. सन 2002 में आतंकवादियों ने इस पर हमला किया, जिससे कई लोगों की जाने गई. मन्दिर के मरम्मत के पश्चात 2013 में इसे फ़िर से भक्तों के लिए खोला गया.

जम्मू में सूखे मेवे की प्रचूर मात्रा में दूकाने हैं. यहाँ का अखरोट, छिलके वाली बादाम और लहसून की खूब खरीददारी होती है. कश्मीर में बनने वाले कपड़ों की भी भरपूर दुकाने हैं. लोग यहाँ जमकर खरीदी करते हैं.

 

02-05-2025

दो अप्रैल की सुबह हम सभी सहयात्री कटरा से जम्मू के लिए रवाना हुए. जम्मू से जबलपुर की ओर चलने वाली ट्रेन 11450 का नाम श्रीमाता वैष्णो देवी कटरा जबलपुर एक्सप्रेस है. यह ट्रेन जबलपुर से कटरा के बीच (1582 किमी ) का सफ़र करती है. जबलपुर उतरकर हमें दूसरी ट्रेन 11202 नागपुर एक्सप्रेस में सफ़र करना था, जो जबलपुर से नौ बजे चलकर दोपहर  दो बजे के करीब छिन्दवाड़ा पहुँचती है. इस तरह हम सभी ने बारह दिन की यात्रा सफ़लतापूर्वक तय की. यह अत्यन्त ही प्रसन्नता की बात रही कि इस बीच किसी के स्वास्थ्य में गड़बड़ी नहीं हुई. सभी कुशलतापूर्वक अपने-अपने घरों को लौट गए.

अब इसे प्रकृति का प्रकोप कहना उचित होगा कि अप्रैल माह से ही छिन्दवाड़ा का तापमान -39-40-41 डिग्री पर तप रहा है, जबकि अमूमन अप्रैल माह में हल्की हल्की ठंड पड़ती रही है. प्रकृति में अचानक आए परिवर्तन के कारण हर कहीं तापमान में वृद्धि देखी जा रही है. कूलर नाकारा सिद्ध हो रहे है. दोपहर को चलते लू के थपड़े ,किसी गुस्सैल- बिगड़ैल सांड की तरह  नजर आता है जो लोगों के बंद खिड़की-दरवाजों को तोड़ने में आमादा हो जाता है. सड़कें सूनी हो जाती है. और हम उफ़-उफ़ करते हुए किसी तरह दोपहर काटने में मजबूर –बेबस होकर बंद कमरों में समय काटते हैं.

अभी कुछ समय पूर्व हम एक ऐसे प्रदेश से लौटे हैं, जहाँ पारा शून्य से काफ़ी नीचे रहा करता था और जहाँ चारों ओर बर्फ़ से ढंके पहाड़ दिखाई देते थे.    

यात्रा से लौटकर आए काफ़ी दिन बीत चुके हैं, यहाँ गर्मी के उफ़-उफ़ करते हुए मन-पाखी उड़ान भरते हुए  बार-बार लौट पड़ता है कश्मीर की ओर अर्थात नैसर्गिक स्वर्ग की ओर. यहाँ की अनेकानेक स्मृतियाँ  हैं, जो बार-बार लौट-लौट कर आती हैं, और हमारी प्रसन्नता को बनाए रखती हैं.

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103, कावेरी नगर छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001                       गोवर्धन यादव

9424356400

 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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