kahani sangrah- Tees Baras Ghati.
तीस बरस घाटी
आखिर करें भी तो क्या करें बिसेस्सर।
किसे सुनाए अपने दिल का दुखड़ा? अपनी पत्नि
को? बच्चों को? अपने मित्रों को या फिर पड़ोसियों को? सब की सब कन्नी काट जाते हैं। सबके
पास अपने-अपने बहाने हैं।
वह आखिर चाहता क्या है? किसी को जानने की उत्सुकता नहीं है।
वह क्यों, रात जागकर गुजार देता है ?
उसके कलेजे में छायी दुःख भरी बदली क्यों गरजते-बरसते रहती है ? किसी के पास फुर्सत हो तब न ! कितना व्यस्त हो
गया है आज का आदमी। उसके पास यदि कोई कमी है तो वह समय की कमी है। कितना टोटा हो
गया है समय का, आदमी के पास। सामने से आते दोस्त भी उसे आता देखकर, अपना रास्ता बदल लेते हैं। ऐसे कठिन
समय में , आखिर करें भी तो क्या करें बिसेस्सर !
एक दिन उसकी पत्नि ने उसकी ऑंखों में
ऑंखें डालते हुए तथा अपनी नर्म-नाजुक उॅंगलियों से बालों को सहलाते हुए, उसकी पीड़ा को जानने की कोशिश की थी।
बड़ा अच्छा लगा था उसे उस वक्त। कोई तो है, उसके दिल का हाल पूछने वाला. सोचते
हुए वह भावुक हो गया था और उसके सीने से चिपक गया था। उसके कलेजे में, वर्षों से जमें हिमखण्ड पिघल कर बहने
लगे थे।
चालीस-बयालिस साल का वह अधेड़, एकदम बच्चा बन गया था, उस समय। अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए वह
अपने अतीत की तीस बरस घाटी उतरने लगा था और उसके चारों ओर स्मृतियों का बीहड़ जंगल
ऊग आया था।
सारी बातों को गंभीरता से सुन चुकने
के बाद उसकी पत्नि ने अफसोस जताते हुए कहा था-तीस बरस का समय कम नहीं होता। यदि वे
जीवित होते तो अब तक लौट आते अथवा चिट्ठी-पत्री से अपना कुशलक्षेम लिख भेजते। आदमी
इतना पत्थर-दिल नहीं होता कि उसे अपनी जन्मभूमि याद न आए। मेरी मानो तो आप बच्चों
को लेकर गयाजी चले जाओ। उनका पिण्ड-दान करा आओ। उनकी आत्मा को शांति मिलेगी और
आपकी भी।
पत्नि की सपाट बयानी पर उसे बेहद
क्रोध आया था। सुनते ही वह उबलने लगा था। उसका चेहरा तमतमाने लगा था। पैर पटककर यह
कहते हुए उठ खड़ा हुआ था- ष्तुम भी औरों की तरह सोचती हो। मेरा भाई जिंदा है।
देखना-एक दिन वह लौट आएगा।ष्
टोह लेने की गरज से एक दिन, अपने दोनों बेटों को बुलाया। पास
बिठाया और पूछा कि वे क्या सोचते हैं। बेटे जानते थे कि पिता अपने भाई के बारे में
वह सब कुछ सुनना नहीं चाहेंगे, जो वे कहना चाहते हैं। जवाब तो आखिकार उन्हें
देना ही था। शब्दों को तौलते हुए बड़े बेटे ने कहा- पिताजी... अतीत को अतीत ही रहने
दें और वर्तमान को जिएॅं। जो पीछे छूट गया, सो छूट गया। अब, हम सबके बारे में सोचिए जो आपका
वर्तमान तो है ही और भविष्य भी। ऐसा कहते हुए उसने अपना नन्हा. सा बेटा उसकी गोद
में डाल दिया था।
शब्दों की जादूगरी वह समझ रहा था। वह
यह भी समझ रहा था कि उसका मंतव्य क्या है।
निराशा भरी नजरों से उसने अपनी
मिचमिचाती ऑंखों से आसमान को देखा। हमेशा की तरह निर्मल-शांत और अपना नीलापन लिए
आसमान एकाएक मटमैला हो गया था। हवा का चलना एकदम बंद हो गया था और आसमान में उड़
रही गिद्ध-चीलें अधर में लटक गए थे।
निराशा और हताशा के बीच की एक पतली सी
सुराख के बीच से गुजरते हुए, आखिरकार उसने एक ऐसे व्यक्ति को खोज निकाला जो न
तो भाग सकता था, न जिसे भूख सताती है न ही प्यास और न ही वह पेशाब जाने का बहाना बताकर
रफुचक्कर हो सकता था।
उसने एक आदमकद आईना खरीद लिया और अपने
शयन-कक्ष में लगा लिया था। वह आईने के पास बैठकर सामने बैठे व्यक्ति से अपनी पीड़ा
उजागर कर देता था। जानता है ! वह उसका अक्स है ! उसकी प्रतिच्छाया ! लेकिन कोई तो
है उसकी सुनने वाला ! अपनी बात पूरी तरह कह चुकने के बाद वह पूरी तरह, अंदर से खाली हो जाता ! ऐसा करते हुए वह प्रसन्नता से भरने लगता था।
उसे अब भी याद है। भैया रामेस्सर के
इस तरह चले जाने के बाद उसके वृद्ध माता-पिता पर क्या गुजरी थी। मॉं तो जैसे
विक्षिप्त सी हो गई थी। वह कुछ बोलती-बतियाती नहीं थी और हमेशा रोती ही रहती थी।
वह अक्सर कहती-मेरे राम-लक्ष्मण की जोड़ी बिछुड़ गई। पिता कहते-मेरी अजोध्या राम के
बगैर सूनी हो गई। बावजूद इसके वे मॉं को समझाने का प्रयास करते। मॉं कहती- कैसे
भूल जाऊॅं? कैसे कह दूॅं कि वह मेरे शरीर का हिस्सा नहीं था। कैसे भूल जाऊॅं कि
मैंने उसे अपनी कोख में नहीं पाला।
कुछ दिन बाद पिता ने अपने आपको एक
कमरे में कैद कर लिया था। वियोग के विषधर की फुंसकार से उनका गोरा बदन काला पड़ गया
था।
पिता अक्सर यह कहते सुने गए थे शरीर
एक बार बिगड़ जाए तो उसे सुधारा जा सकता है। एक से बढ़कर एक डॉक्टर मौजूद हैं इस देश
में। अगर मन एक बार दबका खा जाए, तो उसे सुधारना बहुत मुश्किल है। कहते हैं कि
इसकी दवा हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी। सबको सीख देने वाले पिता का मन भी दबका
खा गया था।
बिसेस्सर जब भी गहरी नींद में होता है, वह तीस साल पुरानी घटना, सपना बनकर ऑंखों के सामने घूमने लगती
है, ठीक सिनेमा की रील की तरह। एक-एक पल, एक-एक क्षण जीवन्त हो उठते हैं। कभी
जब वह अचेतन अवस्था में रहता है, तब उसे कुछ भी याद नहीं रहता। यदि नींद खुल गयी
तो जागती ऑंखों से वह सब देखता-सोचता रहता है क्योंकि यही तो वह क्षण होते हैं जब
भाई की स्पष्ट छवि देखी जा सकती है।
उसके सपने में उभरता है एक गॉंव। गॉंव
के किनारे बहता चमारनाला, जहॉं उसके पूर्वज मरे ढोरों के शरीर से चमढ़ा
उतारा करते थे। उसके परदादा एक कुशल चर्मकार थे। उन्होंने उस समय के तत्कालीन
जमींदार को एक ऐसी अनोखी जूती बनाकर दी थी जिसे जरूरत पड़ने पर कागज की तरह मोड़कर
जेब में भी रखा जा सकता था। उसकी कलात्मक नक्काशी और बेलबूटे बनाने में पूरे छैः
मास लग गए थे।
जमींदार ने खुष होकर चमारनाले से लगी
भूमि बक्षीस में देते हुए कहा था कि वह यह देखना चाहता है कि एक कलाकार उस अभिषप्त
एवं उजाड़भूमि को अपने कौषल से किस तरह संवारता है। उसके परदादा ने न सिर्फ कड़ी
मेहनत की थी, बल्कि अपने परिश्रम से उसे खेती लायक भी बना डाला था। उस समय से वह
भूमि उनके अधिकार में थी।
देष आजाद हुआ। गॉंव एक औद्योगिक नगर
में तब्दील होने लगा। जमीन की कीमत आसमान छूने लगी। अब जमींदार के वंषज लाठी व
रूतबे के दम पर वह जमीन हथियाना चाहते थे।
गर्मी के दिन थे। गेहूॅं कटाई के बाद
खलिहानों में रख दिया गया था। उड़ानी होनी बाकी थी। खेत खाली थे। बच्चे
गिल्ली-डण्डा खेलने में व्यस्त थे। उचित अवसर जान लठैतों ने उसके पिता को घेर लिया
और खेत छोड़कर भाग जाने की धमकी दी। बात जब नहीं जमी तो खलिहानों में आग लगा दी गई।
लाठियॉं बरसायी जाने लगी। आग की लपटों व चीत्कार की आवाज सबसे पहिले बिसेस्सर ने
देखा था। वह इतना ही कह पाया था- भइया... रामेस्सर आग!. आग की लपटें अपने विकराल
रूप में थी।
रामेस्सर बिसेस्सर से मात्र चार साल
बड़ा था लेकिन अल्पवय के बावजूद वह कद्दावर था और बलिष्ठ भी। उसकी चाल में चीते की
सी छलांग थी। पलभर में वह वहॉं जा पहुॅंचा था। उसने देखा। जमींदार का पोता उसके
पिता को भद्दी-भद्दी गालियॉं देकर लात-जूतों से पीट रहा है। देखते ही उसका खून खौल
उठा था। उसने निशाना साधकर एक बड़ा सा पत्थर उसकी ओर उछाल दिया था। पत्थर निशाने पर
पड़ा था और वह जमीन पर गिरा तड़प रहा था। शायद उसकी खोपड़ी चटक गई थी। फिर उसने एक
लठैत से लाठी छीनकर वार करना शुरू कर दिया था। कुछ तो भाग खड़े हुए थे। कुछ जमीन की
धूल चाट रहे थे। इस बीच पुलिस भी आ गई थी। इस बार भी बिसेस्सर चीखा था-भइया पुलिस
और वह भाग खड़ा हुआ था।
स्मृति के बतौर यह वही घटना है, जिसे उसने अपनी ऑंखों से देखा था और
अंतिम बार अपने भाई की सूरत। वह बार स्मृतियों में इस घटना को दोहराता है ताकि भाई
की वह छवि देख सके।
एक लम्बे मुकदमे को वह जीत चुका था।
आज उस जमीन की वजह से उसके पास आलीषान बंगले-मोटर गाड़ियॉं, बैंक-बैलेंस व नौकर-चाकरों की फौज है।
बावजूद इसके नाथ होते हुए भी अनाथ। मॉं-बाप को तो वह खो ही चुका था। एक भाई की आस
थी। वह भी दुनिया की भीड़ में न जाने कहांॅ खो गया था। तीस बरस बीत गए। न तो वह
लौटा, न ही उसकी कोई चिट्ठी-पत्री आयी। उसे अब भी विष्वास है कि एक दिन वह
लौट आएगा।
एक सुबह! वह जल्दी उठ बैठा और अपने
बागीचे में चला आया था। भोर की उजास अभी फैलना बाकी थी।
उसने देखा! एक व्यक्ति लंगड़ता हुआ
उसकी ओर आ रहा है। नजदीक आते ही उसने ऊॅंची आवाज में कहा- ष्भइया बिसेस्सर-देख
तेरा भाई लौट आया है।ष् खून ने खून को पहचान लिया था। सपना टूटा और एक धूमिल बिम्ब
स्पष्ट होता जा रहा था।
वह लौट आया था।
दोनों भाई एक-दूसरे में लिपटे रहे।
ऑंसुओं की धारा बहती रही और मौन संवाद चलता रहा।
आषाओं का मृतप्रायः जंगल लहलहाने लगा
था तथा मधुमास की मादक गंध फैलने लगी थी। चौदह साल से दो गुणा वनवास काट कर राम, अपनी अजोध्या में लौट आए थे। परिवार
का हर छोटा-बडा प्राणी, अपने दादाजी के चरणों में नतमस्तक था।
देर रात तक बिसेस्सर अपनी तीस साला
कहानी दुहरा रहा था। जमीन के प्रकरण से लेकर अपने माता-पिता के करूण-अंत तक की
कहानी, उसने एक सांस में कह सुनायी थी।
अब रामेस्सर की बारी थी। घर छोड़ने से
घर बसाने तक की दास्तान उसने कह सुनाया था। सारा कुनबा अपने दादा की बातों को
परीलोक की कहानी की भॉंति सुन रहा था।
सारी राम-कथा सुनने के बाद बिसेस्सर
ने, अपने भाई से कहा कि वह अपनी सीता-सी
भाभी व बच्चों को लेकर यहॉं आ जाए। बात आगे बढ़ाते हुए उसने यह भी कहा कि
जमीन-जायजाद में आज भी उसका हिस्सा है।
सारी रात दोनों भाई बातें करते रहे और
रात मोमबत्ती की तरह सुलगती और पिघलती रही।
आठ-दस दिन कैसे बीत गए। पता ही नहीं
चला।
रामेस्सर अब लौट जाना चाहता था। उसे
अपनी-बीवी और बच्चों की याद सताने लगी थी। वह तो उतावली में बिना बताए ही घर से
निकल गया था। उसके भाई ने उसके बिछोह में तीस साल कैसे बिताए होंगे ? कल्पना मात्र से वह सिहर उठा था।
चूॅंकि वह मर्द था, आघात सहता रहा लेकिन एक औरत अपने पति के वियोग में तो तत्काल जान ही
दे देगी। बच्चों का क्या होगा ? रामेस्सर के मन में एक विचित्र ऑंधी सक्रिय होने
लगी थी। वह हर हाल में लौट जाना चाहता था।
बिसेस्सर जिद लगाए बैठा था कि अब वह
किसी भी कीमत पर उसे जाने नहीं देगा। उसने कोर्ट से स्टॉम्प-पेपर खरीद लाया था और
चाहता था कि भाई को उसका हिस्सा सौंप कर, शेष जीवन निःश्चिन्तता से बिताएगा।
रात का सन्नाटा पसरा पड़ा था। रामेस्सर
खर्राटें भर कर सो रहा था। बिसेस्सर के बड़े बेटे ने धीरे से बगल में सोते अपने
पिता को जगाया और कमरे में ले आया, जहॉं उसकी मॉं-छोटा भाई व बहुएॅं पहले से ही बैठे
हुए थे।
बिसेस्सर का दिमाक ठनका था। इतनी रात
गए, इस तरह बुलाने का मतलब ? शंका-कुशंका की घनी बेलें उसके शरीर में तेजी से
लिपटने लगी थी और चिन्ता की मकड़ी, उसके चेहरे पर जाल बुनने लगी थी।
एक कुर्सी में धंसते हुए उसने धड़कते
दिल से पूछा कि इतनी रात गए, इस तरह बुलाने का मतलब ? सभी के म्लान चेहरों पर नजरें घुमाते
हुए उसने पूछा था।
बड़े बेटे ने पहल करते हुए कहा। कहते
हुए उसके चेहरे पर तनाव की परछाई स्पष्ट देखी जा सकती थी। वह तैश में था। वह तल्खी
के साथ बोला था। बोलते समय उसका शरीर कांप भी रहा था।
पिताजी ... यह क्या पागलपन मचा रखा है
आपने? क्या जरूरत है उन्हें हिस्सा देने की? लाखों-करोड़ों की जमीन आप मुुफ्त में
दे देंगे ! इस जमीन को लेकर आपने कितने कष्ट सहे हैं। हफ्तों भुखमरी की मार झेली
है। इन्होंने किया ही क्या था? सारी मेहनत तो आपने की है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर
आपने लगाए हैं और आप इतनी बड़ी जायजाद तश्तरी में रख कर अपने धोखेबाज भाई के चरणों
में रखने जा रहे हैं। हम चुप नहीं बैठेंगे। हम अपने जीते-जी ऐसा होने नहीं देंगे।
जली-कटी बातें सुनकर बिसेस्सर को लगा
कि असंख्य बर्र-मक्खियों ने उस पर हमला बोल दिया है और दंशों के निशान पूरे शरीर
पर उभर आए हैं। उसे ऐसा भी लगा कि उसके कपड़े जबरिया उतार दिए गए हैं ओर उसे तपती
रेत पर लिटा दिया गया है और आसमान से उतरकर चीलें और गिद्ध उसके शरीर से
मांस-पिण्ड नोंच रहे हैं।
उसका दम घुटने लगा था। वह वहॉं और
ज्यादा देर तक रूक नहीं सका था। तेजी से पलटते हुए वह उस कमरे में चला आया था, जहॉं उसका भाई सो रहा था।
उसकी ऑंखें फटी की फटी रह गई। वह
हैरान व हतप्रभ था, देखकर कि उस कमरे में उसका भाई मौजूद नहीं है। उसे बिस्तर पर न पाकर
उसका कलेजा धौंकनी सा धड़कने लगा था।
उसने बारी-बारी से सभी कमरों की तलाष
कर डाला। वह वहॉं नहीं था। पागलों की तरह चीखता हुआ- ष्भैया तुम कहॉं हो?ष् वह बाहर निकल आया था।
रात्रि अपने अन्तिम पहर की बची-खुची
सॉंसें ले रही थी। दुर्गम-गहन अंधकार की परतों से टकरा कर उसकी आवाज लौट आयी थी।
स्वर्ण-नगरी में राम तुम रह भी कैसे
सकते थे बुदबुदाते हुए वह वापिस लौट आया।
स्मृतियों का बीहड़ जंगल, तेजी के साथ फैलता जा रहा था।
जीवन के रंग हजार
अब कैसी है जानकी? किस वार्ड में भर्ती है? डॉक्टर ने क्या बताया? आप दोनों के बीच कोई कहा-सुनी तो नहीं
हुई? क्या शहर में टेलीफोन का टोटा हो गया
था? गली-गली में बूथ खुल गए हैं, कहीं से भी टेलीफान कर खबर दे सकते थे? क्या आपने हमें पराया समझ लिया है, तभी तो खबर नहीं दी?
वे क्रुद्ध सिंहनी की तरह दहाड़ रही
थीं, दहाड़ सुनकर उनकी घिग्गी बंॅध गई थी।
कुछ प्रश्न तो ऐसे भी थे, जिन्हें सुनकर वे तिलमिला भी गए थे। प्रतिवाद न
करते हुए, चुप रहना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
वे चाहते तो अपने जवाब में बहुत कुछ
कह सकते थे। शब्दों का उनके पास अक्षय भण्डार था। शब्दों की अर्थवत्ता के नए-नए
प्रतिमान देने वाले सिद्धहस्त प्राचार्य के लिए यह कोई दुष्कर कार्य नहीं था।
जानते थे वे कि सामने खड़ा शख्श कोई और
नहीं बल्कि उनकी भाभीजी थीं। वे सदा से ही उन्हें सम्मान देते आए हैं। मुॅंह लगकर
बात कैसे कर सकते थे। फिर उन्हें यह हक बनता था कि वे उन्हें डॉंटें-फटकारें। वे
चाहते थे कि हर हाल में उनका सम्मान बना रहे।
वे ये भी जानते थे कि विपरीत परिस्थितियों
में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। फिर यह जरूरी नहीं कि वह जो भी बोलें, वह ठीक ही हो। अक्सर ऐसे समय में जबान
धोखा दे जाती है, वह बोलना कुछ चाहता है और बोल कुछ जाता है।
बोलते समय उनका चेहरा तमतमाया हुआ था।
शब्दों में तल्खी थी। वे कुछ ज्यादा ही तेज सुर में, बोल भी रही थीं।
सारा गुस्सा एक बार में उगल देने के
पश्चात् वे एकदम शांत हो गईं थीं। तेज बोलने के कारण अथवा सीढ़ियॉं चढ़ने के कारण, वे हॉंफ रही थीं।
जयश्री के साथ सीढ़ियॉं चढ़ते हुए देख, वे सीट से उठ खड़े हुए और पास चले आए
थे। वे जानते थे कि भाभीजी इस समय क्रोध में आविष्ठित हैं। आते ही वे सारा गुस्सा
उनपर उतार देगी। शेरनी के सामने खरगोश बनकर जाना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
उनका चुप हो जाना, उनके लिए एक शुभ-लक्षण था। यदि वे
आई.सी.सी.यू वार्ड के समक्ष खड़ी होकर जोर-जोर से बोलतीं, तो संभव है कि ऐसा किया जाना मरीजों
के हित में नहीं होता और न ही वहॉं के प्रचलित नियमों के अनुरूप।
अब वे बड़े इतमीनान के साथ अपनी बात कह
सुनाना चाहते थे। सूखे हलक को थूक से गीला करते हुए वे कुछ कह पायें, इसके पूर्व ही जयश्री का आक्रोश फूट
पड़ा था।
मम्मीजी... आप भी कैसे-कैसे ऊल-जुलूल
प्रश्न लेकर बैठ गईं? क्या आप भूल गईं कि इस समय अंकलजी कितनी भीषण मानसिक यंत्रणाओं के दौर
से गुजर रहे हैं? क्या आज और अभी प्रश्न पूछना जरूरी है? पत्नि कोमा में पड़ी हैं। बेटा विदेश
में है। ऐसे कठिन समय में इन्हें सवालों की नहीं बल्कि कोमल-कोमल शब्दों में पगे
सहानुभूति के मरहम की जरूरत है। ऐसे शब्द जो इनका ढॉंढस बंधा सके।ष्
उनका मन ही मन खुश होना स्वाभाविक था।
वे सोचने लगे थे। जो काम मॉं नहीं कर पाई, उसे बेटी ने पूरा कर दिखाया। जयश्री
को अपने पक्ष में खड़ा पा, वे अपने दुःखों को कुछ हद तक भूल गये थे।
जो होना था, हो चुका लेकिन जयश्री के इस तरह दलील
देने से कहीं मॉं का दिल आहत न हो गया हो। कहीं वे अपने आपको अपमानित महसूस न करने
लगी हों। संभव है, बाद में दोनों के बीच तकरार न हो। उनकी दिली इच्छा थी कि मॉं का
सम्मान भी बना रहे और बेटी को उसके हक की शाबासी मिल जाए।
बातों का सम्मानजनक संतुलन बनाते हुए
उन्होंने कहा ण्ण्ण्ण्जयश्री... तुम भूल रही हो कि इस समय तुम्हारी मॉं के मन में
कितनी पीड़ा है? उन्होंने सदा से ही हमें अपनापन दिया है। वे हमें अपनों से अलग नहीं
मानती और तो और वे जानकी को अपनी छोटी बहन मानती है। तुम्हीं बताओ... एक बहन...
अपनी दूसरी बहन को मौत के कगार पर खड़ा कैसे देख सकती है? अतः इनका क्रोधित होना स्वाभाविक है।
मैं कसूरवार हूॅं कि इन्हें सूचना नहीं दे पाया।
बड़े गर्व के साथ मैं एक बात और कहना
चाहता हूॅं। अगर तुम वक्त पर साथ नहीं होती तो जानकी शायद ही बच पाती। इस बुढ़ाते
शरीर में अब पहले जैसा न जोर है, न ही जोश। मैं भला कितनी दौड़-भाग कर सकता था।
जयश्री... तुमने अपना फर्ज निभाया और मुझ पर कर्ज चढ़ा दिया है। मैं तुम्हारा
कर्जदार हूॅं।
शब्दों की जादूगरी ने अपना असर दिखाना
शुरू कर दिया था। दोनों की नम ऑंखें देखकर, वे भी अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाए
थे। उनकी भी ऑंखें भींग गई थी।
बोझिल वातावरण को सरस बनाने की पहल
करते हुए जयश्री ने कहा ?अंकलजी... हम आपके लिए टिफिन लेती आईं हैं। कृपया
समय पर खाना जरूर खा लीजिएगा। हम घर जाकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगी कि अण्टीजी को
होश आ जाए और वे पहले की तरह भली-चंगी हो जाएं।
आश्वस्ती और सद्भावना से भींगी
फुवारों से उनके दग्ध-हृदय को शीतलता मिलने लगी थी। कृतघ्नतावश उनके हाथ जुड़ आए थे
और वे उन्हें जाता हुआ देखते रहे।
बरामदे में लटके बल्ब से झरती
पीली-बीमार रोषनी को चीरते हुए उनकी नजर बेंचों पर बैठे मरीजों के अभिभावकों के
चेहरों पर जा टिकीं। सभी के म्लान, पीले-पके आम की तरह लटकी सूरतें और चेहरों पर
चिंता की मकड़ियों के बुने घने जालों को देखकर वे सिहर गए थे। पीली मिट्टी से पुती
दीवारें उनके भय को और बढ़ाने लगी थी।
वे मन ही मन अपने इष्ट-देव के नाम का
जाप करते और मनौती मांगते रहे कि जानकी जल्दी ही ठीक हो जाए।
तभी वार्ड के दरवाजे में हल्की सी
हलचल हुईं। दरवाजा खुला। एक नर्स अपनी सैंडिल खटखटाते हुए बाहर निकली। यंत्रवत वे
उठ खड़े हुए और उसके पीछे हो लिए।
उन्होंने बड़े अनुनय-विनय के साथ अपनी
जानकी के हाल जानना चाहा। तमकते हुए उसने कहा.. बाबा... तुम लोग भी चैन से नई
बैइठता ... न हम लोगों को चैन से काम करने देता। कित्ती बार हम तुमको बोला ...
हमको नई मालुम। कहते हुए वह दूसरे वार्ड में जा घुसी थी।
चेहरा लटकाए वे अपनी जगह पर आकर बैठ
गए। पूरे आठ घंटे बीत जाने के बाद भी वे कोई समाचार प्राप्त नहीं कर पाए थे। मन अब
बैचेनी में घिरने लगा था। उटपटांग ख्याल उन्हें और व्यथित करने लगे थे।
बेंच पर बैठे-बैठे उन्हें कोफ्त होने
लगी थी। वे अपनी सीट से उठ खड़े हुए और बरामदे में चहल-कदमी करने लगे। लोगों की
नजरें बचाकर वे आहिस्ता से खिड़की के पास जाकर सटकर खड़े हो जाते और जगह-जगह से
खुरचे कांच में से भीतर झांॅंक कर देखने का प्रयास करते। अंदर कुछ भी दिखलाई नहीं
पड़ा। वे वहॉं से हट जाते। फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाते।
टेबल पर पड़े टिफिन-कैरियर को देख
उन्हें जयश्री के कहे वाक्यों की अनुगूंज सुनाई देने लगी वे भाव विव्हल होने लगे
थे। मन पर छाए निराषा के बादलों में आद्रता बढ़ने लगी थी। वह कहीं बरस न जाए, इससे पहिले ही वे टिफिन लेकर सीढ़ियॉं
उतरने लगे थे।
सीढ़ियॉं उतरते हुए वे मन नही मन कह
उठे। कितना ध्यान रखती है जयश्री उनका। बिटिया जानती है कि मैं समय का कितना ध्यान
रखता हूॅं। तभी तो वह जाते समय, भोजन कर लेने की बात कहती गई थी।
भूख तो उन्हें जोरों की लगी थी। लेकिन
मन साथ नहीं दे रहा था फिर अस्पताल का रूग्ण-वातावरण उन्हें ऐसा नहीं करने दे रहा था।
एक भिखारी को खाना देकर वे वापिस लौट
आए थे। रात के ग्यारह बज चुके थे। नींद अब भी ऑंखों से कोसों दूर थी।
खाली बेंच पर पैर फैलाकर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस
में फंसाते हुए सिर के नीचे रख लिया और ऑंखें बंद कर ली थी। पलकों के बंद होते ही
बीती बातें एक-एक करके याद आने लगी थीं।
दोपहर का एक बजा था। वे अपने
डाइनिंग-टेबल पर बैठकर खाना खा रहे थे। यह उनके रोज का खाना खाने का समय था। खाना
खाते हुए समाचार-पत्रों के पन्ने पलटना उनकी दिनचर्या का आवष्यक अंग बन गया था।
हालॉंकि वे सारे अखबार सुबह ही बांच चुके होते हैं।
जानकी इस समय रसोई-घर में व्यस्त थी।
उसका बेटा अजय बाहर से घर लौट रहा था। वह भी कितने सालों बाद। अजय उनका भी बेटा है
लेकिन मॉं का हक कुछ ज्यादा ही था।
बेटे के आने की खबर पाकर वह बेहद ही
खुष थी और व्यंजन तैयार करने में लगी थी। वह चाहती थी कि उसके आने के पूर्व, वे सारी चीजें बनकर तैयार हो जाने
चाहिए जो उसे सर्वाधिक प्रिय है। याद कर-करके वे चीजें बनाती जाती, फिर उसे कांच के मर्तबान में करीने से
जमाकर रखती जातीं थीं।
इस समय वह खोवा की करंजियॉं सेंक रही
थी। कढ़ाई से उठ रही मीठी-मीठी गंध से समूचा वातावरण धमधमा रहा था। हाथ चलाते हुए
वह गुनगुनाती भी जा रही थी। उसका कण्ठ अब कुछ ज्यादा खुल गया था और गीतों के बोल
हवा की पीठ पर सवार होकर उन तक आ रहे थे। मीठे बोल सुनकर वे झूमने लगे थे। उन्हें
ऐसा भी लगने लगा था कि वे किसी दिव्य लोक में जा पहुॅंचे हैं। तभी जयश्री की
हास्य-मिश्रित खनकदार आवाज सुनकर वे उस लोक से लौटने लगे थे।
उसने बड़े ही मनोहारी ढंग से थाली में
करंजी परोसते हुए कहा ंकलजी... इसे भी तो चखकर देखिए... कैसी बनी है? कहीं कोई कोर-कसर तो बाकी नहीं रह गई?
मुॅंह में करंजी रखते ही वे वाह-वाह
कह उठे थे। अपनी शान में काढ़े गए कसीदों को सुनकर, जानकी के गाल लाल हो उठे थे।
सुस्वाद भोजन का रसास्वादन करते हुए
वे जानकी के तरफ देखना नहीं भूलते थे। अनायास ही नजरें आपस में मिलतीं और वह शरमा
कर दूसरी तरफ देखने लग जाती थी।
विगत तीन-चार दिनों से
विभिन्न-विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जा रहे थे।
खाना खाते हुए वे सोचने लगे थे। बेटे
के आगमन की खुशी ने जानकी को पागल बना दिया है। सच भी है, बेटे के आगमन की खबर पाकर कौन मॉं खुश
नहीं होती। खबर पाते ही मॉंओं के हृदय-कमल खिल-खिल जाते हैं।
ममता की कुम्हलाई लतिकाएं हरियल होने
लगती है। उनका पोर-पोर आनन्द की लहरियों में हिलोरें लेने लगता है। मन-मयूर थिरकने
लगता है। पैर तो जैसे उनके जमीन पर ही नहीं पड़ते हैं। वे फिरकी की तरह घूम-घूमकर
अपने समूचे परिवेश को सजाने-संवारने में लग जाती है।
जयश्री भी बड़ी सुबह से जानकी के कामों
में अपना हाथ बॅंटा रही थी। वह उनके जिगरी दोस्त गोविंद की इकलौती बेटी है। दोनों
ही परिवारों के बीच गहरी अंतरंगता है। दूध में घुले बताशे की तरह। अजय के आगमन की
सूचना पाकर वह भी बेहद उत्तेजित है, दोनों ही बचपन से साथ-साथ खेले-कूदे, पले-बढ़े हैं। अजय से वह मात्र पॉंच साल
छोटी है। एक-दूसरे के यहॉं आने-जाने में कभी भी समय का बंधन नहीं रहा।
आने को तो वह रोज ही आती है, लेकिन जब से उसने स्थानीय कॉलेज में
सहायक-प्राध्यापक का पदभार ग्रहण किया है, तब से समय में थोड़ा फेरबदल अवश्य हुआ
है।
अपने बेटे के आगमन की खुशी को यादगार
बनाने के लिए उन्होंने कुछ योजनाएं भी बना डाली थीं। वे इस खुशी में एक शानदार
पार्टी देना चाहते थे। कहॉं शामियाना लगेगा। झूमरें कहॉं-कहॉं लगेगी। आवासीय भवन
में किस तरह की विद्युत साज-सज्जा की जाएगी आदि चीजों पर बारीकी से मनन कर लिया था
और ठेकेदार को उसका आर्डर भी दे दिया था।
वे चाहते थे कि अति विशिष्ट स्वजनों, अतिथियों और रिश्तेदारों की उपस्थिति
में अजय और जयश्री की मंगनी की भी घोषणा कर दी जानी चाहिए। गोविंद उनका दोस्त ही
नहीं बल्कि एक सच्चा हमदम भी है। उन्हें पक्का यकीन है कि वह इस रिश्ते से इनकार
नहीं करेगा। उनकी दिली इच्छा थी कि दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदल जाना चाहिए।
अतिगोपनीयता बरतते हुए उन्होंने
पूजा-ज्वेलर्स के यहॉं से वेडिंग-रिंग भी बनवाकर रख ली थी।
वे सोचने लगे थे ष्अजय को आने में अभी
कल का पूरा दिन बाकी है। वह कल सुबह पुणे से पहली फ्लाईट पकड़कर, एक घंटे की छोटी उड़ान के बाद नागपुर
पहुॅंचेगा फिर कार द्वारा यहॉं के लिए प्रस्थान करेगा। उसे यहॉं आते-आते, शाम ही क्या, रात ही हो जाएगी। झिलमिल-झिलमिल
झिलमिलाती रोशनी में उसका स्वागत करने में मजा आ जाएगा।ष्
कल्पनाओं के रंग-बिरंगे बादल झमझमाकर
बरस रहे थे और वे उसमें भींग भी रहे थे। तभी टेलीफोन की घंटी घनघना उठी। शायद
ओवरसीज काल थी। जानकी ने अति-उत्साहित होते हुए रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ अजय ही
था।
बातचीत का क्रम जारी था। वह
हॅंस-हॅंसकर बतिया रही थी। प्रसन्नता से लकदक चेहरा और फुलझड़ी से झरते हास्य को
देख-सुनकर वे भी प्रसन्न हो रहे थे।
पता नहीं, अचानक क्या हुआ, उसका दिपदिपाता चेहरा बुझने लगा था।
वह कांतिहीन होने लगी थी। मुक्त हास्य व मुस्कान की जगह तनाव घिरने लगा था। उसकी
मुट्ठियॉं कसने लगी थीं। वे कुछ समझें, वह ही कुछ बोल पाए, रिसीवर क्रेडल पर रख पाए, इसके पूर्व ही वह गीली मिट्टी की
दीवार की तरह भरभरा कर गिर पड़ी थी।
हे भगवान ! ये क्या हो गया??
पास आकर देखा, नब्ज टटोली, समझ में कुछ नहीं आया। वे बुरी तरह से
घबरा गए थे। सोचने समझने की बुद्धि को जैसे काठ मार गया था। धड़कनें बढ़ गई थी, लेकिन जयश्री ने अपनी हिम्मत और बुद्धि
की डोर कसकर साध रखी थी। बिना समय गंवाए वह तीर की तरह बाहर निकल गई और पास-पड़ोस
के लोगों को मदद के लिए गुहार लगाने लगी थी।
उस घटना की कल्पना मात्र से, वे सिहर उठे थे। दिल जोरों से धड़कने
लगा था। वे अपनी सीट से उठ खड़े हुए और चहल-कदमी करते हुए अपने को सामान्य बनाने का
उपक्रम करने लगे थे।
काफी देर तक यहॉं-वहॉं का चक्कर काटने
के बाद वे अपनी सीट पर आ बैठे। दहशत का असर अब भी उन पर जारी था।
जमीन पर और अलग-अलग बेंचों पर पड़े
मरीजों के अभिभावकों-शुभ-चिन्तकों को गहरी नींद में खुर्राटे भरते देख वे सोच में
पड़ गए कि इन्हें सुख की नींद कैसे आ गई होगी।
उन्होंने घड़ी की ओर देखा। सुबह के
पॉंच बज रहे थे। उनकी पूरी रात ऑंखों ही ऑंखों में कट गई थी।
वे अपनी इस सोच को लेकर खुश हो रहे थे
कि जानकी अब पहले से बेहतर होगी, अन्यथा इसकी सूचना उन्हें अब तक मिल जाती।
वे सोच रहे थे ष्जानकी अब जो जीवन
जिएगी निःसंदेह वह जयश्री का दिया हुआ जीवन ही जिएगी। सचमुच में वे उसके अहसानमंद
हैं। इस अहसान के बदले में वे, अपने जीवन का जो भी सर्वश्रेष्ठ होगा, वे उसे उपहार में दे देंगे।ष्
वे नहीं जानते, अजय की उसकी अपनी क्या सेच है। क्या
वह जयश्री को पसंद करता है और जयश्री भी अजय को? इसका पता तो उसके आने के बाद ही चल
पाएगा।
अजय तीन सालों से परदेष में है। संभव
है, वह किसी गौरांग-बाला के जुल्फों के
व्योमपाष में न उलझ गया हो। वहॉं की युवतियॉं जानती हैं कि यहॉं का दूल्हा सबसे
टिकाऊ होता है।
अजय सुंदर है, स्मार्ट है, उसके तीखे नाक-नक्ष, शरीर शौष्ठव को देखकर कोई भी युवती
उसकी ओर सहज ही आकर्षित हो सकती है, जवानी होती भी तो अंधी है, पैर फिसलने में देर ही कितनी लगती है
! ज्ञानी-ध्यानी परम तपस्वी विश्वामित्र भी तो मेनका की मादक अदाओं के सामने कहॉं
टिक पाए थे। ऐसे एक नहीं, अनेकों उदाहरण देखे जा सकते हैं।
संभव है, शायद उसने, अपने इसी आशय की सूचना अपनी मॉं को
टेलीफोन पर दी होगी। अपने रंग-बिरंगे सपनों के रंगमहल को धूल-धूसरित होता देख उसका
हृदय कांप उठा होगा और सुनते ही वह गश्त खाकर गिर पड़ी। हर मॉं अपने बच्चों को लेकर
ख्बाब बनातीं हैं। अगर वे उन्हें पूरा होता हुआ नहीं देखतीं तो सदमें को गले से
लगा बैठती हैं।
उन्हें अब भी विश्वास है कि अजय ने
ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं किया होगा। संस्कृति-लोकमर्यादा और संस्कारों की घुट्टी जिसे
बचपन में ही घोंटकर पिला दी गई हो, उसके बहकने के कम ही चांस होते हैं। आज हवा का
रूख ही बदल गया है। अतः वे यकीनन तौर पर कुछ भी नहीं कह सकते।
आधारहीन बातों को सोच-सोचकर वे अपना
दिमाक खराब करना नहीं चाहते थे। फिर उन्हें मालूम था कि अजय को आने में अभी बीसो
घंटे बाकी है। जब सामने होगा तो सारी बातों का खुलासा हो जाएगा।
वे उठकर छत पर चले आए थे। भोर होने
में अभी थोड़ा समय बाकी था।
छत पर पहुॅंचते ही उन्हें शीतल हवा के
झोंकों ने अपनी लपेट में ले लिया था। शीतल हवा का स्पर्श पाकर वे चैतन्य होने लगे
थे।
हल्का सा उजाला फैल गया था। चिड़ियों
की चहचहाट से समूचा वातावरण संगीतमय हो उठा और देखते ही देखते अनेक रंगों की छटा
से आकाश रंगीन हो उठा था। रंगों का अद्भुत संयोजन देखकर दंग रह गए थे। रात अपनी
सलमा-सितारों वाली काली-कमली उतारकर रंगों के सागर में उतरकर डुबकी लगाने लगी थी।
सहसा उन्हें कविवर प्रसाद की ये पंक्तियॉं याद हो आईं, जो उन्होंने प्रकृति की इस अनुपम
सुंदरता और दृश्यों को देख कर लिखी होंगी।
बीती विभावरी जाग री। अंबर पनघट में
डुबो रही। ताराघट उषा नागरी।
खगकुल-कुल सा बोल रहा। किसलय का अंचल
डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई। मधु मुकुल नवल
रस गागरी।
ऑंखों में राग अमंद पिये। अलकों में
मलयज बंद किए।
तू अब तक सोई है आली। ऑंखों में भरी
विहाग री।
कवि की पंक्तियों को गुनगुनाते हुए वे
मानव जीवन में बिखरे रंगों के बारे में सोचने लगे थे।
परमपिता परमेश्वर ने आदमी को
मन-मस्तिष्क और ऑंखें उपहार में महज इसलिए दी है कि वह हर रस से उत्पन्न होने वाले
विभिन्न भावों से उत्पन्न रंगों की छटाओं को देख सके।
मन-मस्तिष्क और ऑंखें मिलकर एक ऐसा
त्रिकोण (केलेडेस्टकोप) का निर्माण करती है...उन्हें आकर्षक बनाती है। हर रस की
अनुभूतियों को अपनी शक्ति और सामर्थ्य से देख सकने वाले इन्सान को वे अलग-अलग
रंग-रूप व छटा दिखाती है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने तप और
ज्ञान के बल पर यह खोज निकाला कि मानव शरीर के अंदर भी रंगों का अद्भुत संयोजन हुआ
है। इन रंगों के तालमेल में, जरा सा भी परिवर्तन उसके आरोग्य पर गहरा प्रभाव
डालता है।
क्राउनचक्र (सहस्त्रार चक्र) में
बैंगनी, पिय्यूटरीचक्र (आज्ञाचक्र) में गहरा नीला, थायराइड (विशुद्ध चक्र) में हल्का
नीला, थाईमस (हृदयचक्र) में चमकदार हल्का हरा, सोलर प्लेक्सस (मणिपुर) तीव्र पीला, स्वाधिष्ठान चक्र अथवा हारा चक्र में
गुलाबी-नारंगी एवं रूटचक्र (मूलाधारचक्र) में लाल रंग समाहित है।
उजाला फैलने लगा था। भुवन-भास्कर अपने
दिव्य-रथ पर आरूढ़ होकर निकल चुके थे। उनका रथ सहस्त्रों-किरणों की आभा में जगमगा
रहा था।
उन्होंने सिर झुकाकर नमन किया और
जानकी के शीघ्र रोगमुक्त होने की मंगल कामना के लिए प्रार्थना की और सीढ़ियॉं उतरने
लगे थे।
वे सीढ़ी के अंतिम पायदान पर आकर खड़े
हुए ही थे कि नर्स ने उन्हें सूचना दी कि जानकी को होश आ गया है और अब वे उससे मिल
सकते हैं।
खबर सुनते ही उन्हें लगा कि खुशियों
के हजारों-हजार रंग-बिरंगे दीप एक साथ जल उठे थेण्
जीवन के रंग हजार
अब कैसी है जानकी? किस वार्ड में भर्ती है? डॉक्टर ने क्या बताया? आप दोनों के बीच कोई कहा-सुनी तो नहीं
हुई? क्या शहर में टेलीफोन का टोटा हो गया
था? गली-गली में बूथ खुल गए हैं, कहीं से भी टेलीफान कर खबर दे सकते थे? क्या आपने हमें पराया समझ लिया है, तभी तो खबर नहीं दी?
वे क्रुद्ध सिंहनी की तरह दहाड़ रही
थीं, दहाड़ सुनकर उनकी घिग्गी बंॅध गई थी।
कुछ प्रश्न तो ऐसे भी थे, जिन्हें सुनकर वे तिलमिला भी गए थे। प्रतिवाद न
करते हुए, चुप रहना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
वे चाहते तो अपने जवाब में बहुत कुछ
कह सकते थे। शब्दों का उनके पास अक्षय भण्डार था। शब्दों की अर्थवत्ता के नए-नए
प्रतिमान देने वाले सिद्धहस्त प्राचार्य के लिए यह कोई दुष्कर कार्य नहीं था।
जानते थे वे कि सामने खड़ा शख्श कोई और
नहीं बल्कि उनकी भाभीजी थीं। वे सदा से ही उन्हें सम्मान देते आए हैं। मुॅंह लगकर
बात कैसे कर सकते थे। फिर उन्हें यह हक बनता था कि वे उन्हें डॉंटें-फटकारें। वे
चाहते थे कि हर हाल में उनका सम्मान बना रहे।
वे ये भी जानते थे कि विपरीत
परिस्थितियों में आदमी की बुद्धि कुंद हो जाती है। फिर यह जरूरी नहीं कि वह जो भी
बोलें, वह ठीक ही हो। अक्सर ऐसे समय में जबान धोखा दे जाती है, वह बोलना कुछ चाहता है और बोल कुछ
जाता है।
बोलते समय उनका चेहरा तमतमाया हुआ था।
शब्दों में तल्खी थी। वे कुछ ज्यादा ही तेज सुर में, बोल भी रही थीं।
सारा गुस्सा एक बार में उगल देने के
पश्चात् वे एकदम शांत हो गईं थीं। तेज बोलने के कारण अथवा सीढ़ियॉं चढ़ने के कारण, वे हॉंफ रही थीं।
जयश्री के साथ सीढ़ियॉं चढ़ते हुए देख, वे सीट से उठ खड़े हुए और पास चले आए
थे। वे जानते थे कि भाभीजी इस समय क्रोध में आविष्ठित हैं। आते ही वे सारा गुस्सा
उनपर उतार देगी। शेरनी के सामने खरगोश बनकर जाना ही श्रेयस्कर लगा था उन्हें।
उनका चुप हो जाना, उनके लिए एक शुभ-लक्षण था। यदि वे
आई.सी.सी.यू वार्ड के समक्ष खड़ी होकर जोर-जोर से बोलतीं, तो संभव है कि ऐसा किया जाना मरीजों
के हित में नहीं होता और न ही वहॉं के प्रचलित नियमों के अनुरूप।
अब वे बड़े इतमीनान के साथ अपनी बात कह
सुनाना चाहते थे। सूखे हलक को थूक से गीला करते हुए वे कुछ कह पायें, इसके पूर्व ही जयश्री का आक्रोश फूट
पड़ा था।
मम्मीजी... आप भी कैसे-कैसे ऊल-जुलूल
प्रश्न लेकर बैठ गईं? क्या आप भूल गईं कि इस समय अंकलजी कितनी भीषण मानसिक यंत्रणाओं के दौर
से गुजर रहे हैं? क्या आज और अभी प्रश्न पूछना जरूरी है? पत्नि कोमा में पड़ी हैं। बेटा विदेश
में है। ऐसे कठिन समय में इन्हें सवालों की नहीं बल्कि कोमल-कोमल शब्दों में पगे
सहानुभूति के मरहम की जरूरत है। ऐसे शब्द जो इनका ढॉंढस बंधा सके।ष्
उनका मन ही मन खुश होना स्वाभाविक था।
वे सोचने लगे थे। जो काम मॉं नहीं कर पाई, उसे बेटी ने पूरा कर दिखाया। जयश्री
को अपने पक्ष में खड़ा पा, वे अपने दुःखों को कुछ हद तक भूल गये थे।
जो होना था, हो चुका लेकिन जयश्री के इस तरह दलील
देने से कहीं मॉं का दिल आहत न हो गया हो। कहीं वे अपने आपको अपमानित महसूस न करने
लगी हों। संभव है, बाद में दोनों के बीच तकरार न हो। उनकी दिली इच्छा थी कि मॉं का
सम्मान भी बना रहे और बेटी को उसके हक की शाबासी मिल जाए।
बातों का सम्मानजनक संतुलन बनाते हुए
उन्होंने कहा ण्ण्ण्ण्जयश्री... तुम भूल रही हो कि इस समय तुम्हारी मॉं के मन में
कितनी पीड़ा है? उन्होंने सदा से ही हमें अपनापन दिया है। वे हमें अपनों से अलग नहीं
मानती और तो और वे जानकी को अपनी छोटी बहन मानती है। तुम्हीं बताओ... एक बहन...
अपनी दूसरी बहन को मौत के कगार पर खड़ा कैसे देख सकती है? अतः इनका क्रोधित होना स्वाभाविक है।
मैं कसूरवार हूॅं कि इन्हें सूचना नहीं दे पाया।
बड़े गर्व के साथ मैं एक बात और कहना
चाहता हूॅं। अगर तुम वक्त पर साथ नहीं होती तो जानकी शायद ही बच पाती। इस बुढ़ाते
शरीर में अब पहले जैसा न जोर है, न ही जोश। मैं भला कितनी दौड़-भाग कर सकता था।
जयश्री... तुमने अपना फर्ज निभाया और मुझ पर कर्ज चढ़ा दिया है। मैं तुम्हारा
कर्जदार हूॅं।
शब्दों की जादूगरी ने अपना असर दिखाना
शुरू कर दिया था। दोनों की नम ऑंखें देखकर, वे भी अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाए
थे। उनकी भी ऑंखें भींग गई थी।
बोझिल वातावरण को सरस बनाने की पहल
करते हुए जयश्री ने कहा ?अंकलजी... हम आपके लिए टिफिन लेती आईं हैं। कृपया
समय पर खाना जरूर खा लीजिएगा। हम घर जाकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगी कि अण्टीजी को
होश आ जाए और वे पहले की तरह भली-चंगी हो जाएं।
आश्वस्ती और सद्भावना से भींगी
फुवारों से उनके दग्ध-हृदय को शीतलता मिलने लगी थी। कृतघ्नतावश उनके हाथ जुड़ आए थे
और वे उन्हें जाता हुआ देखते रहे।
बरामदे में लटके बल्ब से झरती
पीली-बीमार रोषनी को चीरते हुए उनकी नजर बेंचों पर बैठे मरीजों के अभिभावकों के
चेहरों पर जा टिकीं। सभी के म्लान, पीले-पके आम की तरह लटकी सूरतें और चेहरों पर
चिंता की मकड़ियों के बुने घने जालों को देखकर वे सिहर गए थे। पीली मिट्टी से पुती
दीवारें उनके भय को और बढ़ाने लगी थी।
वे मन ही मन अपने इष्ट-देव के नाम का
जाप करते और मनौती मांगते रहे कि जानकी जल्दी ही ठीक हो जाए।
तभी वार्ड के दरवाजे में हल्की सी
हलचल हुईं। दरवाजा खुला। एक नर्स अपनी सैंडिल खटखटाते हुए बाहर निकली। यंत्रवत वे
उठ खड़े हुए और उसके पीछे हो लिए।
उन्होंने बड़े अनुनय-विनय के साथ अपनी
जानकी के हाल जानना चाहा। तमकते हुए उसने कहा.. बाबा... तुम लोग भी चैन से नई
बैइठता ... न हम लोगों को चैन से काम करने देता। कित्ती बार हम तुमको बोला ...
हमको नई मालुम। कहते हुए वह दूसरे वार्ड में जा घुसी थी।
चेहरा लटकाए वे अपनी जगह पर आकर बैठ
गए। पूरे आठ घंटे बीत जाने के बाद भी वे कोई समाचार प्राप्त नहीं कर पाए थे। मन अब
बैचेनी में घिरने लगा था। उटपटांग ख्याल उन्हें और व्यथित करने लगे थे।
बेंच पर बैठे-बैठे उन्हें कोफ्त होने
लगी थी। वे अपनी सीट से उठ खड़े हुए और बरामदे में चहल-कदमी करने लगे। लोगों की
नजरें बचाकर वे आहिस्ता से खिड़की के पास जाकर सटकर खड़े हो जाते और जगह-जगह से
खुरचे कांच में से भीतर झांॅंक कर देखने का प्रयास करते। अंदर कुछ भी दिखलाई नहीं
पड़ा। वे वहॉं से हट जाते। फिर अपनी सीट पर आकर बैठ जाते।
टेबल पर पड़े टिफिन-कैरियर को देख
उन्हें जयश्री के कहे वाक्यों की अनुगूंज सुनाई देने लगी वे भाव विव्हल होने लगे
थे। मन पर छाए निराषा के बादलों में आद्रता बढ़ने लगी थी। वह कहीं बरस न जाए, इससे पहिले ही वे टिफिन लेकर सीढ़ियॉं
उतरने लगे थे।
सीढ़ियॉं उतरते हुए वे मन नही मन कह
उठे। कितना ध्यान रखती है जयश्री उनका। बिटिया जानती है कि मैं समय का कितना ध्यान
रखता हूॅं। तभी तो वह जाते समय, भोजन कर लेने की बात कहती गई थी।
भूख तो उन्हें जोरों की लगी थी। लेकिन
मन साथ नहीं दे रहा था फिर अस्पताल का रूग्ण-वातावरण उन्हें ऐसा नहीं करने दे रहा
था।
एक भिखारी को खाना देकर वे वापिस लौट
आए थे। रात के ग्यारह बज चुके थे। नींद अब भी ऑंखों से कोसों दूर थी।
खाली बेंच पर पैर फैलाकर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस
में फंसाते हुए सिर के नीचे रख लिया और ऑंखें बंद कर ली थी। पलकों के बंद होते ही
बीती बातें एक-एक करके याद आने लगी थीं।
दोपहर का एक बजा था। वे अपने
डाइनिंग-टेबल पर बैठकर खाना खा रहे थे। यह उनके रोज का खाना खाने का समय था। खाना
खाते हुए समाचार-पत्रों के पन्ने पलटना उनकी दिनचर्या का आवष्यक अंग बन गया था।
हालॉंकि वे सारे अखबार सुबह ही बांच चुके होते हैं।
जानकी इस समय रसोई-घर में व्यस्त थी।
उसका बेटा अजय बाहर से घर लौट रहा था। वह भी कितने सालों बाद। अजय उनका भी बेटा है
लेकिन मॉं का हक कुछ ज्यादा ही था।
बेटे के आने की खबर पाकर वह बेहद ही
खुष थी और व्यंजन तैयार करने में लगी थी। वह चाहती थी कि उसके आने के पूर्व, वे सारी चीजें बनकर तैयार हो जाने
चाहिए जो उसे सर्वाधिक प्रिय है। याद कर-करके वे चीजें बनाती जाती, फिर उसे कांच के मर्तबान में करीने से
जमाकर रखती जातीं थीं।
इस समय वह खोवा की करंजियॉं सेंक रही
थी। कढ़ाई से उठ रही मीठी-मीठी गंध से समूचा वातावरण धमधमा रहा था। हाथ चलाते हुए
वह गुनगुनाती भी जा रही थी। उसका कण्ठ अब कुछ ज्यादा खुल गया था और गीतों के बोल
हवा की पीठ पर सवार होकर उन तक आ रहे थे। मीठे बोल सुनकर वे झूमने लगे थे। उन्हें
ऐसा भी लगने लगा था कि वे किसी दिव्य लोक में जा पहुॅंचे हैं। तभी जयश्री की
हास्य-मिश्रित खनकदार आवाज सुनकर वे उस लोक से लौटने लगे थे।
उसने बड़े ही मनोहारी ढंग से थाली में
करंजी परोसते हुए कहा ंकलजी... इसे भी तो चखकर देखिए... कैसी बनी है? कहीं कोई कोर-कसर तो बाकी नहीं रह गई?
मुॅंह में करंजी रखते ही वे वाह-वाह
कह उठे थे। अपनी शान में काढ़े गए कसीदों को सुनकर, जानकी के गाल लाल हो उठे थे।
सुस्वाद भोजन का रसास्वादन करते हुए
वे जानकी के तरफ देखना नहीं भूलते थे। अनायास ही नजरें आपस में मिलतीं और वह शरमा
कर दूसरी तरफ देखने लग जाती थी।
विगत तीन-चार दिनों से
विभिन्न-विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जा रहे थे।
खाना खाते हुए वे सोचने लगे थे। बेटे
के आगमन की खुशी ने जानकी को पागल बना दिया है। सच भी है, बेटे के आगमन की खबर पाकर कौन मॉं खुश
नहीं होती। खबर पाते ही मॉंओं के हृदय-कमल खिल-खिल जाते हैं।
ममता की कुम्हलाई लतिकाएं हरियल होने
लगती है। उनका पोर-पोर आनन्द की लहरियों में हिलोरें लेने लगता है। मन-मयूर थिरकने
लगता है। पैर तो जैसे उनके जमीन पर ही नहीं पड़ते हैं। वे फिरकी की तरह घूम-घूमकर
अपने समूचे परिवेश को सजाने-संवारने में लग जाती है।
जयश्री भी बड़ी सुबह से जानकी के कामों
में अपना हाथ बॅंटा रही थी। वह उनके जिगरी दोस्त गोविंद की इकलौती बेटी है। दोनों
ही परिवारों के बीच गहरी अंतरंगता है। दूध में घुले बताशे की तरह। अजय के आगमन की
सूचना पाकर वह भी बेहद उत्तेजित है, दोनों ही बचपन से साथ-साथ खेले-कूदे, पले-बढ़े हैं। अजय से वह मात्र पॉंच
साल छोटी है। एक-दूसरे के यहॉं आने-जाने में कभी भी समय का बंधन नहीं रहा।
आने को तो वह रोज ही आती है, लेकिन जब से उसने स्थानीय कॉलेज में
सहायक-प्राध्यापक का पदभार ग्रहण किया है, तब से समय में थोड़ा फेरबदल अवश्य हुआ
है।
अपने बेटे के आगमन की खुशी को यादगार
बनाने के लिए उन्होंने कुछ योजनाएं भी बना डाली थीं। वे इस खुशी में एक शानदार
पार्टी देना चाहते थे। कहॉं शामियाना लगेगा। झूमरें कहॉं-कहॉं लगेगी। आवासीय भवन
में किस तरह की विद्युत साज-सज्जा की जाएगी आदि चीजों पर बारीकी से मनन कर लिया था
और ठेकेदार को उसका आर्डर भी दे दिया था।
वे चाहते थे कि अति विशिष्ट स्वजनों, अतिथियों और रिश्तेदारों की उपस्थिति
में अजय और जयश्री की मंगनी की भी घोषणा कर दी जानी चाहिए। गोविंद उनका दोस्त ही
नहीं बल्कि एक सच्चा हमदम भी है। उन्हें पक्का यकीन है कि वह इस रिश्ते से इनकार
नहीं करेगा। उनकी दिली इच्छा थी कि दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदल जाना चाहिए।
अति गोपनीयता बरतते हुए उन्होंने
पूजा-ज्वेलर्स के यहॉं से वेडिंग-रिंग भी बनवाकर रख ली थी।
वे सोचने लगे थे अजय को आने में अभी
कल का पूरा दिन बाकी है। वह कल सुबह पुणे से पहली फ्लाईट पकड़कर, एक घंटे की छोटी उड़ान के बाद नागपुर
पहुॅंचेगा फिर कार द्वारा यहॉं के लिए प्रस्थान करेगा। उसे यहॉं आते-आते, शाम ही क्या, रात ही हो जाएगी। झिलमिल-झिलमिल
झिलमिलाती रोशनी में उसका स्वागत करने में मजा आ जाएगा।
कल्पनाओं के रंग-बिरंगे बादल झमझमाकर
बरस रहे थे और वे उसमें भींग भी रहे थे। तभी टेलीफोन की घंटी घनघना उठी। शायद
ओवरसीज काल थी। जानकी ने अति-उत्साहित होते हुए रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ अजय ही
था।
बातचीत का क्रम जारी था। वह
हॅंस-हॅंसकर बतिया रही थी। प्रसन्नता से लकदक चेहरा और फुलझड़ी से झरते हास्य को
देख-सुनकर वे भी प्रसन्न हो रहे थे।
पता नहीं, अचानक क्या हुआ, उसका दिपदिपाता चेहरा बुझने लगा था। वह
कांतिहीन होने लगी थी। मुक्त हास्य व मुस्कान की जगह तनाव घिरने लगा था। उसकी
मुट्ठियॉं कसने लगी थीं। वे कुछ समझें, वह ही कुछ बोल पाए, रिसीवर क्रेडल पर रख पाए, इसके पूर्व ही वह गीली मिट्टी की
दीवार की तरह भरभरा कर गिर पड़ी थी।
हे भगवान ! ये क्या हो गया??
पास आकर देखा, नब्ज टटोली, समझ में कुछ नहीं आया। वे बुरी तरह से
घबरा गए थे। सोचने समझने की बुद्धि को जैसे काठ मार गया था। धड़कनें बढ़ गई थी, लेकिन जयश्री ने अपनी हिम्मत और
बुद्धि की डोर कसकर साध रखी थी। बिना समय गंवाए वह तीर की तरह बाहर निकल गई और
पास-पड़ोस के लोगों को मदद के लिए गुहार लगाने लगी थी।
उस घटना की कल्पना मात्र से, वे सिहर उठे थे। दिल जोरों से धड़कने
लगा था। वे अपनी सीट से उठ खड़े हुए और चहल-कदमी करते हुए अपने को सामान्य बनाने का
उपक्रम करने लगे थे।
काफी देर तक यहॉं-वहॉं का चक्कर काटने
के बाद वे अपनी सीट पर आ बैठे। दहशत का असर अब भी उन पर जारी था।
जमीन पर और अलग-अलग बेंचों पर पड़े
मरीजों के अभिभावकों-शुभ-चिन्तकों को गहरी नींद में खुर्राटे भरते देख वे सोच में
पड़ गए कि इन्हें सुख की नींद कैसे आ गई होगी।
उन्होंने घड़ी की ओर देखा। सुबह के
पॉंच बज रहे थे। उनकी पूरी रात ऑंखों ही ऑंखों में कट गई थी।
वे अपनी इस सोच को लेकर खुश हो रहे थे
कि जानकी अब पहले से बेहतर होगी, अन्यथा इसकी सूचना उन्हें अब तक मिल जाती।
वे सोच रहे थे ष्जानकी अब जो जीवन
जिएगी निःसंदेह वह जयश्री का दिया हुआ जीवन ही जिएगी। सचमुच में वे उसके अहसानमंद
हैं। इस अहसान के बदले में वे, अपने जीवन का जो भी सर्वश्रेष्ठ होगा, वे उसे उपहार में दे देंगे।ष्
वे नहीं जानते, अजय की उसकी अपनी क्या सेच है। क्या
वह जयश्री को पसंद करता है और जयश्री भी अजय को? इसका पता तो उसके आने के बाद ही चल
पाएगा।
अजय तीन सालों से परदेष में है। संभव
है, वह किसी गौरांग-बाला के जुल्फों के
व्योमपाष में न उलझ गया हो। वहॉं की युवतियॉं जानती हैं कि यहॉं का दूल्हा सबसे
टिकाऊ होता है।
अजय सुंदर है, स्मार्ट है, उसके तीखे नाक-नक्ष, शरीर शौष्ठव को देखकर कोई भी युवती
उसकी ओर सहज ही आकर्षित हो सकती है, जवानी होती भी तो अंधी है, पैर फिसलने में देर ही कितनी लगती है
! ज्ञानी-ध्यानी परम तपस्वी विश्वामित्र भी तो मेनका की मादक अदाओं के सामने कहॉं
टिक पाए थे। ऐसे एक नहीं, अनेकों उदाहरण देखे जा सकते हैं।
संभव है, शायद उसने, अपने इसी आशय की सूचना अपनी मॉं को
टेलीफोन पर दी होगी। अपने रंग-बिरंगे सपनों के रंगमहल को धूल-धूसरित होता देख उसका
हृदय कांप उठा होगा और सुनते ही वह गश्त खाकर गिर पड़ी। हर मॉं अपने बच्चों को लेकर
ख्बाब बनातीं हैं। अगर वे उन्हें पूरा होता हुआ नहीं देखतीं तो सदमें को गले से लगा
बैठती हैं।
उन्हें अब भी विश्वास है कि अजय ने
ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं किया होगा। संस्कृति-लोकमर्यादा और संस्कारों की घुट्टी जिसे
बचपन में ही घोंटकर पिला दी गई हो, उसके बहकने के कम ही चांस होते हैं। आज हवा का
रूख ही बदल गया है। अतः वे यकीनन तौर पर कुछ भी नहीं कह सकते।
आधारहीन बातों को सोच-सोचकर वे अपना
दिमाक खराब करना नहीं चाहते थे। फिर उन्हें मालूम था कि अजय को आने में अभी बीसो
घंटे बाकी है। जब सामने होगा तो सारी बातों का खुलासा हो जाएगा।
वे उठकर छत पर चले आए थे। भोर होने
में अभी थोड़ा समय बाकी था।
छत पर पहुॅंचते ही उन्हें शीतल हवा के
झोंकों ने अपनी लपेट में ले लिया था। शीतल हवा का स्पर्श पाकर वे चैतन्य होने लगे
थे।
हल्का सा उजाला फैल गया था। चिड़ियों
की चहचहाट से समूचा वातावरण संगीतमय हो उठा और देखते ही देखते अनेक रंगों की छटा
से आकाश रंगीन हो उठा था। रंगों का अद्भुत संयोजन देखकर दंग रह गए थे। रात अपनी
सलमा-सितारों वाली काली-कमली उतारकर रंगों के सागर में उतरकर डुबकी लगाने लगी थी।
सहसा उन्हें कविवर प्रसाद की ये पंक्तियॉं याद हो आईं, जो उन्होंने प्रकृति की इस अनुपम
सुंदरता और दृश्यों को देख कर लिखी होंगी।
बीती विभावरी जाग री। अंबर पनघट में
डुबो रही। ताराघट उषा नागरी।
खगकुल-कुल सा बोल रहा। किसलय का अंचल
डोल रहा।
लो यह लतिका भी भर लाई। मधु मुकुल नवल
रस गागरी।
ऑंखों में राग अमंद पिये। अलकों में
मलयज बंद किए।
तू अब तक सोई है आली। ऑंखों में भरी
विहाग री।
कवि की पंक्तियों को गुनगुनाते हुए वे
मानव जीवन में बिखरे रंगों के बारे में सोचने लगे थे।
परमपिता परमेश्वर ने आदमी को
मन-मस्तिष्क और ऑंखें उपहार में महज इसलिए दी है कि वह हर रस से उत्पन्न होने वाले
विभिन्न भावों से उत्पन्न रंगों की छटाओं को देख सके।
मन-मस्तिष्क और ऑंखें मिलकर एक ऐसा
त्रिकोण (केलेडेस्टकोप) का निर्माण करती है...उन्हें आकर्षक बनाती है। हर रस की
अनुभूतियों को अपनी शक्ति और सामर्थ्य से देख सकने वाले इन्सान को वे अलग-अलग
रंग-रूप व छटा दिखाती है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने अपने तप और
ज्ञान के बल पर यह खोज निकाला कि मानव शरीर के अंदर भी रंगों का अद्भुत संयोजन हुआ
है। इन रंगों के तालमेल में, जरा सा भी परिवर्तन उसके आरोग्य पर गहरा प्रभाव
डालता है।
क्राउनचक्र (सहस्त्रार चक्र) में
बैंगनी, पिय्यूटरीचक्र (आज्ञाचक्र) में गहरा नीला, थायराइड (विशुद्ध चक्र) में हल्का नीला, थाईमस (हृदयचक्र) में चमकदार हल्का
हरा, सोलर प्लेक्सस (मणिपुर) तीव्र पीला, स्वाधिष्ठान चक्र अथवा हारा चक्र में
गुलाबी-नारंगी एवं रूटचक्र (मूलाधारचक्र) में लाल रंग समाहित है।
उजाला फैलने लगा था। भुवन-भास्कर अपने
दिव्य-रथ पर आरूढ़ होकर निकल चुके थे। उनका रथ सहस्त्रों-किरणों की आभा में जगमगा
रहा था।
उन्होंने सिर झुकाकर नमन किया और
जानकी के शीघ्र रोगमुक्त होने की मंगल कामना के लिए प्रार्थना की और सीढ़ियॉं उतरने
लगे थे।
वे सीढ़ी के अंतिम पायदान पर आकर खड़े
हुए ही थे कि नर्स ने उन्हें सूचना दी कि जानकी को होश आ गया है और अब वे उससे मिल
सकते हैं।
खबर सुनते ही उन्हें लगा कि खुशियों
के हजारों-हजार रंग-बिरंगे दीप एक साथ जल उठे थेण्
एकदम अकेली पड़ गई थी सुधा। वक्त की
ऑंधी ने उसके नीड़ का एक-एक तिनका बिखेरकर रख दिया था। रिश्तेदार, पास-पड़ोस के लोग आते, दुःख दूर करने के बजाय दुःख बढ़ाकर चल
देते। अभी उम्र ही क्या है? पति यूँहि ही उठ जाएगा, किसे पता था? बेचारी....
वैसे ही दुःख क्या कम छोटा था. लोगों
की बातें अंदर उतर कर कलेजा छलनी करती रहीं. अंदर सब क्षत-विक्षत था।
एक अजीब सी छटपटाहट ने घेर लिया था
उसे, बावजूद इसके मंथन भी चल रहा था अंदर ही अंदर. कैसे काट पाएगी वह पहाड़ जैसी
जिन्दगी? कहने को नाते-रिश्तेदार बहुत है, पर वे सान्तवना के अलावा दे भी क्या
सकते हैं? हर तरफ मोर्चा-बंदी है. लड़ाई तो उसे अकेले ही लड़नी है... हर हाल में.
स्वयं को. हर मोर्चे पर. लड़ाई लम्बी चलेगी. उधम-साहस, धैर्य-बुद्धि-शक्ति और पराक्रम जैसे
कारगर हथियार उसे स्वयं ही जुटाने होंगे, जानती है वह। मृत्यु पर किसी का वश
नहीं। अमानत के तौर पर वे देवेन्द्र को गोद में सौंप गए हैं। कम से कम ... उसके
लिए तो जीवित रहना पड़ेगा। घुट-घुटकर जीने में क्या फायदा? उसे उठ खड़ा होना होगा।
अपने चालीस-बयालिस साल के जीवन का
लेखा-जोखा करने लगी थी वह। अपनी सखी-सहेलियों से एकदम हटकर थी वह, सूरत-सीरत में। कुदरत ने स्वयं अपने
हाथों से श्रृंगार किया था उसका। फूल जब अपने शबाब पर होता है तो भौरों को
निमंत्रण देने नहीं जाना पड़ता, खुद ही उस ओर खिंचे चले आते हैं। इन सब बातों से
वह बिल्कुल ही बेखबर थी। अपनी दुनिया में मस्त, अपने में ही गुम।
पिताजी चाहते थे कि उसकी अब शादी कर
देनी चाहिए। धुन और जिद की पक्की थी वह। “ जब तक हिन्दी साहित्य में एम.ए. नहीं कर
लेती, शादी नहीं करेगी”. ऑंखें नचाते हुए उसने निर्भीकता से अपना निर्णय कह सुनाया
था।
एक दिन, चार बजे के लगभग ... उससे कहा गया कि
वह छैः कप चाय तैयार करके ले आए और साथ में कुछ नाश्ता-वास्ता। सुनते उसका माथा
ठनका। तीन प्याली चाय तो इस वक्त रोज ही बनाती है। मम्मी-पापा और स्वयं के लिए फिर
तीन अतिरिक्त क्यों? होंगे कोई भी। अक्सर पापा के दोस्त भी आ धमकते हैं। शायद कोई दोस्त
होंगे। लापरवाही से सोचते हुए वह चाय बनाने लगी।
चाय व नाश्ता का ट्रे लेकर जैसे ही वह
बैठक-खाने में पहुँची, अपरिचितों को सामने पा ठिठककर खड़ी रह गई।
रामप्रसाद जी ... ये है मेरी बेटी
सुधा। सुधा ... ये हैं सुदर्शन और उसके माता-पिता, कम से कम शब्दों में पापा ने सबका
परिचय करवा दिया। परिचय से पहले न तो वह उस व्यक्ति का नाम जानती थी और न ही पहले
कहीं देखा था। देखते ही उसके दिल ने उससे कहा “ यही है उसके सपनों का राजकुमार”.
बात पक्की हो, इससे पहले ही उसने अपना निर्णय कह
सुनाया कि वह एम.ए. करना चाहती है। उन दिनों इतनी खुलकर बात करने का प्रचलन नहीं
था। सचमुच वह किस्मत की धनी निकली और उसकी बात मान ली गई।
परीक्षाएं समाप्त होते ही वह ससुराल आ
गई। रिजल्ट आया। उसने प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वह शिक्षिका बनना
चाहती थी, पर रूढ़िवादी परम्पराओं के आगे उसे नतमस्तक होना पड़ा। “ इस घर की बहू-बेटियॉं
नौकरी नहीं करा करतीं”.. ससुर ने अपना फरमान जारी करते हुए निर्णय कह सुनाया था।
ससुर की अपनी आढ़तिया की दुकान थी।
ढेरों सारी एजेन्सियॉं भी उन्होंने ले रखीं थीं। चारों भाई और वे स्वयं इसमें
अति-व्यस्त रहते थे।
उसका जी घुटता था, इन चार-दीवारी में रहकर। वह कुछ करना
चाहती थी। ऐसा कुछ ... जो हटकर हो, जिससे उसकी मानसिक क्षुधा शांत हो सके और परिवार
का यश-वर्धन। उसने अपने मन की बात सभी को कह सुनाई थी, बदले में मिले थे ठोस-चट्टानों के से
सूखे शब्द। “ इस खानदान की अपनी कुछ मर्यादाएं हैं... उसे लांघने की किसी को भी
इजाजत नहीं है”।
प्रत्युत्तर में वह कुछ नहीं कह पायी।
कुछ भी नहीं। पर उसे सुनते हुए कोफ्त अवश्य हुई थी कि मर्यादा शब्द को इतना छोटा
करके आंक रहे हैं, ये लोग। धन कमाने की लालसा होनी चाहिए ... लिप्सा नहीं, पर इतनी भी लालसा नहीं होनी चाहिए कि
उसके आगे सब कुछ गौण हो जाए, सब कुछ बौना होकर रह जाए।
अपनी हद और जद् में रहते हुए उसने
सारी परम्पराएँ निभाई, लेकिन अंदर एक सुधा बैठी हुई थी, उसे कौन समझाए?, वह चैन से नहीं बैठती, बिल्कुल भी नहीं। जब सारी दुनिया
सन्नाटा ओढ़कर सो जाती है। वह कागज-कलम उठा लाती और अपनी व्यथा-कथा कागज पर उतार
देती, जस की तस। हालॉंकि उसने इस बात की भनक किसी को भी नहीं लगने दी और न
ही कभी किसी से चर्चा तक की कि वह छद्म नाम से लिखती और छपती है।
काफी कम उम्र में ही उसने हिन्दुस्तान
की सीमाओं को छू लिया था। नदी-नाले, जंगल-पहाड़, वनैले जीव-जन्तु, सागर-सीपी-झीलें सब कुछ अपने आप कागज
पर उतरते चले आते थे। पिता खुश थे। खुश इस बात पर कि... जो वे कुछ नहीं कर
पाए...उनकी बेटी वह सब कुछ कर पा रही है। वे किसी दूसरी यात्रा की तैयारी में जुट
जाते।
बिदा होने से पहिले पिता ने सर पर हाथ
फेरते हुए उससे कहा था। “ बेटी... ब्याह को पैरों की बेड़ी मत समझना। तुझमें अपार
संभावनाएं मैं देख रहा हूँ। सब कुछ करना, मगर विद्रोह करके नहीं, प्यार में बहुत बड़ी ताकत होती है। नदी
अपने बहने का रास्ता खुद तलाष कर लेती है। अपनी नदी के स्त्रोतों को कभी सूखने मत
देना”। बिदाई के भावुक क्षणों में पिता इतना ही कह पाए थे। इतनी ही सीख दे पाए थे।
पिता अपनी बेटियों को सीख ही तो देते आए हैं और इस बात को उसने अपने मन में गांठ
बांध कर रख लिया था।
समय पंख लगाकर अपनी निर्बाध गति से
उड़ता रहा। इस दृष्य-जगत के मंच से वे पात्र क्रमशः हटते चले गए, जिनका रोल समाप्त हो गया था। पहले सास, बाद में वे ससुर लेकिन सुदर्शन के इस
तरह अचानक चले जाने से उसका जीवन एकदम से मरूस्थल में बदल गया। चारों तरफ तपती रेत।
धूल भरी ऑंधी। एक दिन उन्होंने मजाक में या यूही कह दिया था- “ सुधा मेरे आने की
आहट तो तुम बखूबी पहिचान लेती हो लेकिन मेरे जाने की आहट तुम सुन नहीं पाओगी”।
एक-एक शब्द, उसे अब भी याद है। तपते हुए रेगिस्तान में वह एकाकी चलने लगी थी और
पांवों के फफोले फटकर असह्य पीड़ा पहुँचाने लगे थे।
ससुर की ऑंख बंद होते ही लूट मच गई
थी। जिसके जो हाथ, वह उसका था। तीन भाईयों के लिए कोठियॉं बनकर तैयार थी। चौथी उनके लिए
बन रही थी। आधी-अधूरी ही बन पाई थी। नम्बर एक का जो धन था, वह चारों के बीच बराबरी में बांटा
गया। सबकी अपनी दुकान-सबका अपना मकान था। आधे-अधूरे मकान को पूरा करना पहली
प्राथमिकता भी। एक बड़ी रकम उस पर खर्च हो गई। शेष जो बचा था, देवेन्द्र की पढ़ाई के लिए एक हद तक
काफी था। फिर भी उसे काफी नहीं कहा जा सकता था। एक पूरी नदी सूख जाती है, यदि उसका स्त्रोत सूख जाए तो फिर जमा-पूंजी
कितने दिन चलती। एक न एक दिन तो उसे खत्म होना ही था। एक छोटी सी कोशिश की उसने, जो जरूरी नहीं अपितु अनिवार्य भी थी।
वह एक प्रायवेट स्कूल की अध्यापिका बन गई। जानती है वह। उम्र के इस पड़ाव पर सरकारी
नौकरी मिलने से रही। देवेन्द्र अपनी पढ़ाई के सिलसिले में बाहर था। एक अकेली जान के
लिए जो उसे मिल रहा था। पर्याप्त था। पहाड़ जैसा दिन अकेले काटे, कहॉं कटता है। नौकरी के बहाने ऐसा कर
पाना संभव हो पाया था। वह खुश थी। बहुत खुश।
देवेन्द्र मेरिट-स्कॉलर होकर पास हुआ
और अब वह उच्च शिक्षा के लिए दो साल के अनुबंध पर विदेश में था। उसका लेखक मन भी
अब खुलकर बाहर आ गया था। पिता भले ही सशरीर साथ नहीं थे, लेकिन उनका आशीर्वाद और
दी गई सीख के सहारे वह परवान चढ़ने लगी थी।
देवेन्द्र का एक अभिन्न मित्र सुधीर
जो इन दिनों भारत आया हुआ था और साथ ही उसका पत्र भी लाया था, उससे मिलने यहॉं आया था।
चाय की चुस्की लेता हुआ वह उसके चेहरे
पर अपनी नजरें केंद्रित कि हुए था। शायद वह चेहरे पर लिखी इबारत पढ़ने की कोशिश कर
रहा था। फिर एकदम बच्चे की सी हरकतें करते हुए कहने लगा- “ क्या मैं आपको अपनी
मम्मी कहकर बुला सकता हूँ?। मम्मी शब्द सुनते ही उसके सीने में ममत्व का अजस्त्र
स्त्रोत फटकर बह निकला। शरीर में रोमांच हो आया। शब्दों के साथ ऑंखें भी आर्द्र हो
आई थी। उसका मन प्रसन्नता से नाच उठा। मम्मी शब्द सुनते ही वह इतनी आनन्दित हुई थी
कि बोल ही नहीं फूट पा रहे थे। अपनी उमड़ती-घुमड़ती भावनाओं को नियंत्रित करते इतना
ही कह पायी। “ सुधीर ... तुम मेरे कलेजे के टुकड़े के अभिन्न मित्र हो। तुम मेरे
बेटे जैसे ही हो। हॉं... तुम मेरे बेटे हो। तुम्हें अधिकार है कि तुम मुझे मम्मी
कहकर बुला सकते हो”. कहते हुए उसने उसे अपने सीने से लगा लिया था।
देर तक अपने सीने से चिपकाए रहने के
बाद, अलग होते हुए, उसने उसके माथे पर अपने ममत्व का अमिट
चुम्बन जड़ दिया था और अब वह अपने बेटे का पत्र पढ़ने लगी थी। पत्र में देवेन्द्र ने
लिखा था कि वह कुछ ही दिनों के लिए सही, सुधीर के गांव अवश्य जाएं। बात को आगे
बढ़ाते हुए उसने यह भी लिखा था कि उसके लेखक मन को वहॉं बहुत कुछ मिलेगा। जहॉं एक
से बढ़कर एक अनमोल रत्न बिखरे पड़े हैं।
पत्र में क्या कुछ उसने लिख भेजा था
इस बारे में सुधीर बिल्कुल भी अंजान था। लिफाफा अच्छी तरह बंद करते हुए उस पर टेप
की पट्टी भी चढ़ाई हुई थी। वह कुछ भी निश्चित नहीं कर पायी थी कि सुधीर ने फिर
चहकते हुए अपनी ओर से प्रश्न उछाला।
मम्मीजी ... मुझे आज ही गांव जाना है।
यदि आप मुनासिब समझें तो मेरे साथ मेरे गॉंव चलिए। वहॉं की प्राकृतिक सुंदरता आपका
मन मोह लेगी। आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगी। अब वह दोहरे मोड़ आ खड़ी हुई थी। न
तो वह अपने बेटे के सुझाव को टाल सकने की स्थिति में थी और न ही सुधीर के आग्रह
को। उसे हॉं कहना ही पड़ा।
ट्रेन चार बजे खुलती थी और अभी दिन का
दो बजा था। उसे तैयारी भी करती थी। उसने अपने कपड़े समेटे। सूटकेस में पैक किया।
रात के लिए टिफिन तैयार किया. जाने के लिए वह लगभग तैयार हो चुकी थी। सुधीर भी इस
बीच रिजर्वेशन करवा कर आ चुका था।
ट्रेन ठीक चार बजे खुल गई थी। महानगर
का कोलाहल, भीड़ सिमेन्ट-कांक्रीट के जंगल सब पीछे छूटते जा रहे थे। आज बरसों बाद
वह ट्रेन का सफर कर रही थी।
सुधीर बुक-स्टॉल से कुछ पत्रिकाएं
खरीद लाया था, जिसमें एक पत्रिका पृथ्वी और पर्यावरण की थी। शायद वह पत्रिका उसने
उसकी रूचियों को देखते हुए खरीदी थी। पत्रिका के मुख-पृष्ठ पर “ अनघ” की कविता ’ वन!
कहॉं हो तुम” पढ़ते हुए विव्हल होने लगी थी। ट्रेन की खिड़की से देखते हुए उसने यह
बात सिद्दत के साथ अनुभव की थी कि उसे न तो बड़े-विशाल पेड़ देखने को मिले, न वृक्षों का सघन समूह।
पर्वत-श्रेणियॉं भी लगभग वृक्ष-विहीन ही थीं।
गीतकार नईम व विष्णु विराट की
कविताओं। गीतों के पदों ने भी उसे गहरे तक प्रभावित किया।
’ बहने दो जीवित..... आशीषों और दुआओं
को.... बड़े बुजुर्गों की.... सनेह भींगी मंशाओं को.... बंजर मत होने दो... हरियल
वसुन्धरा को... युगों-युगों से.... चलती आयी परम्परा को.... कार्य और कारण के घेरे
से बाहर ही......रखना होगा गर्म हवाओं को”. विराट ने लिखा- हंस उड़-उड़ थक गया है।
मानसर तो बिक गया है। लुट गए मोती, सभी दुर्गन्धता है। न अब सरिता में रहा जल। सूखते
जाते कमल दल। अब न कोसों तक बहारों का पता है। सर सरोवर सूख जाना। निर्झरों का रूठ
जाना। पौरूषी अभियान का थकना। नहीं शुभ है-अमंगल है।
कोई भी कवि। गीतकार चाहे वह अनथ
हों-नईम हों अथवा विराट ही अथवा कोई कहानीकार ही क्यों न हो, ये मात्र दर्शक नहीं होते और न ही
शब्दों के जादूगर। बल्कि वे युगदृष्टा भी होते हैं, जो अपनी लेखनी के माध्यम से
जन-सामान्य को चेताने का काम करते हैं।
कुछ बातें-कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते काफी
रात हो आयी थी। अंधकार को चीरता हुआ बूढ़ा इंजिन हॉंफता-खॉंसता-खंखारता-फुंफकारता-शोर
मचाता, डिब्बों को खींचता, अपने निर्धारित पथ पर अग्रसर हो रहा था।
भूख लग आयी थी। दोनों ने मिलकर खाना
खाया। सुधीर को उंगलियॉं चाट-चाटकर खाता देख उसे देवेन्द्र की याद ताजा हो आयी। एक
खाकर तृप्त हो रहा था तो दूसरा खाता देख तृप्ति का अनुभव कर रहा था। खाने के स्वाद
का चटखारा लेते हुए वह जो उसकी शान में कसीदे काढ़ रहा था। उसे सुदर्शन की भी याद
हो आयी। सुदर्शन की अथवा देवेन्द्र की याद में ऑंखें नम हुईं थी, यह तो वह नहीं जानती। वह तो केवल इतना
भर जान पायी कि सुधीर ने उसके अतीत के कुछ पल लौटा दिए थे।
नींद के बोझ से पलकें भारी होने लगी
थी और अब वह सो जाना चाहती थी।
सुबह जब नींद खुली तो ट्रेन एक छोटे
से पहाड़ी-स्टेषन पर रूकी हुई थी। भोर की उजास होने में अभी कुछ वक्त बाकी था।
सामान समेटते हुए वे नीचे उतर आए थे। यहॉं से उन्हें लगभग सात किलोमीटर पैदल चलते
हुए गांव पहुँचना था। सुधीर इस बात को लेकर हैरान व परेशान था कि नौकर अब तक अपनी
घोड़ा-गाड़ी लेकर क्यों नहीं आया। घोड़ा-गाड़ी भिजवाने की बात वह पहिले ही कह चुका था।
सुधीर के चेहरे पर छाए निराषा के भावों को वह पढ़ चुकी थी। अपनी अटैची उठाकर यह
कहते हुए वह चल पड़ी कि वह अब भी दस-पंद्रह किलोमीटर पैदल चल सकती है। सुधीर भी
सहमत होते हुए उसके साथ हो लिया।
एक लाल-सिंदूरी गोला, पर्वत के पीछे से झांकने लगा था।
चिड़ियों व अन्य पखेरूओं के शोर से समूचा जंगल जाग उठा था। ललछौंही किरणें पेड़ों पर
से उतरते हुए-लुका-छिपी का खेल खेलते हुए जमीन पर आकर पसरने लगी थीं। हवा भी अब
मतवाली हो चली थी। शीतल बयारों के झोंके उसके बदन से आकर लिपटने लगे थे। पहाड़ों से
उतर रही नदी-सूरज की किरणों का स्पर्श पाकर जवान होने लगी थी। उसकी समूची देह राशि
कुंदन की सी दमक रही थी। कभी तो यह भी भ्रम होता कि उसमें पानी के बजाय सोना बहा
जा रहा है। प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को देखते हुए वह किसी अन्य लोक में जा पहुँची।
इस बीच घोड़ा-गाड़ी भी आ पहुँची। उसने
सविनय यह कहकर बैठने से मना कर दिया कि उसे पैदल चलने में ही आनन्द आ रहा है।
रास्ता चलते वह ऊॅंचे-ऊॅंचे दरख्तों
को देखती चलती। कभी तो ऐसा भी प्रतीत होता कि वे आसमान से जा मिले हैं। जंगल के
बीच से गुजरती तेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियॉं-सघन हरियाली-हरियाली के बीच मुस्कुराते जंगली
फूल-शाखाओं से लिपट कर वितान बनाती लतिकाएँ अनुपम दृष्य उपस्थित कर रही थी। बरबस
ही उसे जयशंकर प्रसाद की कविता याद हो आयी- “ खगकुल-कुल सा बोल रहा-....किसलय का
अंचल डोल रहा-....लो यह लतिका भी भर लाई-.....मधु-मुकुल नवल रस गागरी”
उसका जी हुआ कि बस यहीं बस जाऊॅं। यहीं की होकर रह जाऊॅं।
पल भर को वह यह भी भूल गई थी कि अभी
उसे काफी दूर जाना भी है।
जंगल के बीच सोई हुई आदिवासी बस्तियॉं
भी जाग चुकी थीं। नंग-धडंग आदिवासी बच्चे उसे टुकुर-टुकुर जाता हुआ देखते रहे। कुछ
आदिवासी पुरूष-महिलाएँ अपनी परम्पराओं को अब भी बचाए हुए विचित्र आवाज निकालते
हुए-हाथ जोड़े उसका अभिवादन कर रहे थे।
एक अल्हड़ नदी अब ठीक सामने थी जो दूर
से अपने विदेही होने का परिचय दे रही थी। नदी के ऊपर एक लकड़ी का पुल बना हुआ था और
इस पुल पर से होते हुए उसे उस तिलिस्म में जा समाना था, जो दूर से ही अपनी कलात्मकता व भव्यता
के साथ उपस्थित था। वह सुधीर का अपना घर-संसार था।
छोटे मगर खूबसूरत बागीचे के बीच से
होती हुई वह एक मकान के आहते में प्रवेश कर रही थी। मुख्य द्वार पर एक व्यक्ति
शालीनता से हाथ जोड़े खड़ा था। उसकी पीठ के ठीक पीछे हाथ बांधे नौकर-चाकर भी खड़े थे।
जैसे-जैसे वह नजदीक आती गई। उसका चेहरा भी स्पष्ट हो चला था। गठीला-कसा हुआ बदन, यथेष्ट कद-काठी, ओठों पर कमान सी तनी-घनी मूछें।
मुस्कुराते ओंठ और एक ही नजर में सम्मोहन के जाल में आविष्ट करा देने वाली
नीली-नीली ऑंखें। एक बारगी उसे तो ऐसा भी लगा कि वह कहीं सुदर्शन तो नहीं। सुदर्शन
तो वह है ही, पर वो सुदर्शन नहीं जिसमें उसके तन-मन पर बरसों राज किया था।
शिष्टतावश उसके भी हाथ जुड़ आए थे। संक्षिप्त
परिचय के बाद वह अंदर चली आयी। परिचय क्या था, महज फार्मलिटिज़ थी, जो उसे निभानी थी। वह पहले से ही
जानता था कि सुधीर के साथ देवेन्द्र की मॉं आ रही है। इस आशय की सूचना वह पहले ही
भेज भी चुका था। भवन की कलात्मकता व भव्यता से वह प्रभावित हुई थी। अंदर भी वह
किसी राजमहल से कम प्रतीत नहीं हो रहा था। जगह-जगह कलात्मक झाड़-फानूस, मूर्तियॉं-नायाब पेंटिंग्स लटक रही
थीं। प्रियरंजनजी के व्यक्तित्व-कृतित्व में वे चार चॉंद लगा रही थी।
खाना खाने के बाद तनिक विश्राम करते
हुए वह घर का मुआयना करने लगी थी। सारी चीजें साफ-सुथरी व करीने से जमायी गईं थीं।
बड़े-बड़े हवादार कमरें। कमरों में ढेरों सारी कलात्मक वस्तुएँ, जैसा कि वह बैठक-कक्षा में देख ही
चुकी थी। एक-दूसरे से बहुत हटकर भिन्नता लिए हुए, रखी गई।
अब वह उन अंचलों में जाना चाहती थी, जहॉं प्रकृति ने अनुपम-मनभावन सिंगार
किया था। वह एक-एक कोना घूम डालना चाहती थी। कभी वह सुधीर को साथ ले जाती, तो कभी स्वयं अकेली निकल पड़ती।
प्रियरंजन भी साथ होते। पर उसका साथ उसे कुछ असहज कर देता, पता नहीं क्यों उसके साथ रहते हुए
उसकी सॉंसें फूलने लगती। दिल धडकने लगता, ऑंखें झुक जातीं, बातें करते वक्त ढेरों शब्द हलक से
चिपक जाते, पर एक-दो बार के साहचर्य में सब नार्मल होता चला गया और अब वह मित्रवत
व्यवहार करने लगी थी।
डसके
मन के अंदर का लेखक सतत जाग रहा था। हर पल-हर क्षण नया लिखा जा रहा था। वह खुश थी।
बेहद खुश। सच ही लिखा था देवेन्द्र ने अपने पत्र में। सचमुच यहॉं नायाब-चीजें
बिखरी पडी हैं। वह जितना इकट्ठा कर पा सकती थीं, कर रही थी और अपनी लेखनी में भी
उतारती जा रही थी।
एक
के बाद एक, पूरे पन्द्रह दिन कब पंख लगाकर उड गए, पता ही नहीं चल पाया। अब वह घर लौट
जाना चाहती थी। संभवतः सुधीर को भी वापिस होना था। वह लौटने की तैयारी करने लगी
थी।
सुबह
का समय था। अभी-अभी सूरज उगा ही था। रंग-बिरंगे फूलों से बागीचा अटा पडा था।
रंग-बिरंगी ढेरों सारी तितलियॉं यहॉं वहॉं मंडरा रही थीं। नदी अपनी अल्हड चाल से
बही जा रही थी। वह एक बडी सी चट्टान पर बैठी इस अद्भुत नजारों को देख रही थी। तभी
सुधीर भी वहॉं आ पहुँचा। देखते ही लगा कि वह रात भर सोया नहीं है। शायद घर न छोड
पाने का मोह, अथवा उससे बिछुड जाने का गम वह पाले हुए था। सीधे आकर वह पैरों के पास
बैठ गया और अपनी गर्दन उसके पैरों पर झुका लिया था। असमंजस में थी वह। पता नहीं वह
क्या कहना चाहता है, उसके मन में क्या है? जब तक कोई बोले-बताए नहीं, कैसे जाना जा सकता है।
उसने
स्वयं ने ही पहले करते हुए पूछा- “ सुधीर.... क्या बात है। कुछ ज्यादा ही परेशान
दिख रहे हो”? प्रश्न बिलकुल सीधा-सादा थ। ममत्व की चाशनी में डूबे हुए थे शब्द।
सुनते ही उसकी ऑंखों में ऑंसू झरने लगे थे जो उसकी साड़ी को भिगो रहे थे। उसकी इस
स्थिति को देखकर वह डर सी गई थी कि इस लड़के को आज हो क्या गया है?.
काफी
देर तक चुप्पी साधे रहने के बाद उसने मुँह खोला।
“
मम्मीजी... मैं नहीं जानता कि मैं गलत हूँ या सही। मैं यह भी नहीं जानता कि मैंने
जो सोच रखा है, वह कोरी भावनाओं का संजाल है या महज बचकानापन, आपसे इतना ही निवेदन है कि मेरी अन्तस
की पीड़ा को पूरी तरह सुनें, सुनते ही अपना निर्णय न सुना दें, उस पर गहनता से सोचें, फिर अपना निर्णय दें”।
सुधा समझ नहीं पा रही थी कि यह छोकरा आखिर
क्या कहना चाहता है? क्या है उसके मन में? निश्चित ही वह किसी उलझन में आ फॅंसा है, तभी तो कहते हुए डर भी रहा है और कहना
भी चाहता है।
“सुधीर... जब तक तुम अपने मन की उलझन
नहीं बतलाओगे... मैं तुम्हारी मदद कैसे कर पाउॅंगी। बोलो तुम क्या चाहते हो? एक
बेटा अपने मन की बात अपनी मम्मी से ही तो कहता है। संभव हुआ तो मैं तुम्हारी मदद
भी करूँगी”। सुधा ने कहा।
आश्वासन की कुनकुनी धूप का स्पर्श
पाकर मन में जमी हिमशिलाएँ पिघलने लगी थी। अब वह आश्वस्त हुआ जा रहा था।
~मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि आपने मुझे
अपना बेटा माना और मम्मी कहने का अधिकार दिया। मैं चाहता हूँ कि अब आपको मम्मी न कहकर
सीधे-सीधे मॉं कहकर पुकारुं। देखिये... आप मेरी बातों को अन्यथा न लें। बात के
मर्म को समझें, मैं जानता हूँ ये उम्र सेहरा बॉंधने की नहीं है। इस अवस्था में आपको
सहारा चाहिये जो अंतिम सांसों तक आपका साथ निभाता चले. मेरा आशय आप पूरी तरह समझ
ही गई होंगी”। इतना कहकर वह चुप हो गया था। सुनते ही सुधा को जैसे काठ मार गया।
अंदर एक तूफान उठ खड़ा हुआ था जो उसके संयम-विवेक-बुद्धि के परकच्छे उड़ा देने के
लिए काफी था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे, इस नादान बच्चे से। वह ऐसी-वैसी बात
कैसे सोच सकता है?. वह यह नहीं जानता कि क्या करने जा रहा है?. यह बात सच है कि
उसने ही उसे मम्मी कहने का अधिकार दिया था और वह अपनी मॉं की सूरत में उसकी सूरत
देखने लगा था, तो उसमें उसका दोष कहॉं है। पर वह जो कुछ सोच रहा है... क्या वह संभव
है? नहीं... यह कदापि संभव नहीं। प्रश्न
सुधीर की ओर से था, उसे अब उत्तर देना था। उत्तर ही नहीं बल्कि अपना अंतिम निर्णय भी कह
सुनाना था, अब उसकी बारी थी। वह प्रश्नों के कटघरे में घिरी खड़ी थी। उत्तर तो उसे
उसी लहजे में देना होगा कि उसकी झोली को खुशियों की रातरानी के सुगंधित फूलों से
भर दे-...महका दे।
बहुत
कुछ सोचते हुए उसे अपने पिता की याद हो आयी. बिदाई के भावुक क्षणों में उन्होंने
कहा था-“बेटी... ब्याह को पैरों की बेडी मत समझना। तुम में मैं अपार संभावनाएँ देख
रहा हॅूं..... सब कुछ करना, मगर विद्रोह करके नहीं, प्यार में बहुत बड़ी ताकत होती है, नदी अपने बहने का रास्ता खुद-ब-खुद
तलाश कर लेती है, अपनी नदी के स्त्रोत सूखने मत देना”।
और
वह बहती नदी की ओर देखती रही जो अपनी उद्याम-गति से कलकल-छलछल के सुहाने गीत गाती
हुई आगे बढ़ रही थी। उसे प्रश्नों का उत्तर मिल गया था। हॉं उसने उत्तर पा लिया था।
“ सुधीर... सच है मैंने तुम्हें मम्मी
कहने का अधिकार दिया। यह अधिकार अब भी तुम्हारे पास बरकरार है। तुम मुझे मम्मी
कहो-मॉं कहो-आई कहो या अलग-अलग भाषा में मॉं के लिए जो भी शब्द हों। इससे क्या
फर्क पडता है। इससे मॉं की गरिमा कहीं भी कम नहीं होती, उसका माधुर्य खत्म नहीं होता और न ही
ममत्व, लेकिन यह कहते हुए मुझ दुःख हो रहा है कि तुमने मॉं शब्द को लेकर मुझे
एक चौखट में घेरने का जो उपक्रम किया, उससे मॉं की गरिमा बढी नहीं है अपितु
गिरी ही है। तुमने यह कैसे अनुमान लगा लिया कि मैं तुम्हारे पिता की अंकशायनी बनूँगी।
तभी मैं मॉं का दर्जा पा सकूँगी। तुमने मॉं शब्द को बहुत छोटा कर के ऑंका है जबकि
मॉं वह विराट-सत्ता की स्वामिनी होती है, जिसमें ये तो क्या कई संसार समा सकते
हैं। तुमने कभी सोचा कि जिस मॉं ने शिशु को अपने गर्भ में नौ माह तक रखा और वे उसे
किसी कारणवश अपना दूध नहीं पिला पायीं तो क्या वे मॉं कहलाने से वंचित रह गईं या
वे मॉंए, जिन्होंने मॉं न होते हुए भी अपना दूध पिलाया क्या वे मॉं का दर्जा
नहीं पा सकीं या उहें मॉंवत नहीं माना गया।
मैं
तुम्हारे इस प्रस्ताव से न तो दुःखी हुयी, न ही अति प्रसन्न। न ही मेरे मन में
कोई विषाद जागा है, न ही तुम्हारे प्रति नफरत के भाव। उठो.......उठो। तुम अब भी मेरे
पुत्र हो...... बेटे.....हॉं मैं तुम्हारी मॉं हूँ। मॉं का स्वरूप कभी नहीं
बिगड़ता। उसे कम से कम विकृत तो न करो”।
चलो
उठो..... ट्रेन का टाईम हो चला है। यदि हम समय से नहीं पहुँचे तो रात स्टेशन पर
काटनी पड़ सकती है।
खुशियों
वाली नदी
खुशियों वाली नदीण्ण्ण्ण्खुशियों वाली
नदीण्ण्ण्ण्ण्ण्खुशियों वाली नदीण्ण्ण्ण्ण्ण्खुशियों वाली नदीण्ण्ण्खुशियों वाली
नदी
गोवर्धन यादव
पोर-पोर में आलस रेंग रहा था और मन था
कि लाख कोशिशों के बावजूद भी काम से जुड नहीं पा रहा था। आज पहली बार उन्होंने
सिद्दत के साथ शैथिल्यता का अनुभव किया था। वरना जोशीजी का जोश देखने लायक होता
था। चीते की सी चपलता, कागा की सी पैनी दृष्टि और गिद्ध की सी एकाग्रता के कारण ही उनके
अधीनस्थ कर्मचारी सदा चौकस और सजग बने रहते थे।
पत्रों
की प्रत्येक लाईन पर से उनकी नजरें दौडती थी। वे सभी पत्र बडी तन्मयता के साथ
पढते। आवश्यक टीप देते और संबंधित शाखाओं में भिजवा देते। उन्हें यह भी ध्यान बना
रहता था कि किस टेबल से जवाब आना बाकी है और कौन सा पेपर पेंडिंग में डाल दिया गया
है। वे संबंधित लिपिक को बुलाते। जवाब प्रस्तुत करने को कहते। इसके लिये उन्होंने
कभी कोई डायरी-फायरी मेंटेन नहीं की। सारी चीजें दिमाग के कम्प्यूटर में अंकित
रहतीं थी। शायद यही कारण था कोई भी कर्मचारी किसी को धोखा हीं दे पाता था और न ही
उपरी आय की आशा ही संजोकर रख पाता था। ऐसा भी नहीं कि वे दरख्त की तरह तने रहते
थे। उनकी बिल्लौरी ऑंखें सदा हॅंसती दिखती और ओठों पर स्निग्ध मुस्कान हमेशा दौड़ती
ही रहती थी। वे सहृदय और मिलनसार भी थे। अपनी स्पष्टवादिता, साफ-सुथरी छबि और कडकपन के लिए वे
सदैव याद किए जाते थे। रिश्वत की ऑंधी उकी कलम को कभी भी झुका नहीं पायी थी।
लगभग
पूरा ही दिन वे अपने चेंबर में अपनी कुर्सी से चिपके बैठे रहे। कुर्सी के बेक से
पीठ टिकाते हुए उन्होंने अपने हाथों की उंगलियों को आपस में कस लिया था और सिर के
पीछे रखते हुए निर्मिशेष नजरों से छत को घूर रहे थे। आकाश की तरह ही ऑफिस की छत भी
सपाट व भावशून्य थी। एक ख्याल आता तो दूसरा तिरोहित हो जाता था।
उन्हें
एक ही चिंता खाये जा रही थी। वे चाहते थे कि किसी तरह शारदा का विवाह हो जाए। उसके
हाथ पीले हो जाए और वह अपनी घर-गृहस्थी में रम जाए। अब तक शारदा को तीन लडके देख
चुके थे। हर बार आशा बंधतीं। फिर सूखी रेत की तरह हथेली से झर जाया करती थी। वे
सोचते श्ला क्या कमी है शारदा में! पढी-लिखी है। हिस्ट्री में एम.ए. किया है। वह
भी फर्स्ट-क्लास में। अब अंग्रेजी में एम.ए. करने वाली है लिटरेचर लेकर। तीखे
नाक-नक्ष है। झील सी गहरी ऑंखें हैं, केष-राषि नितम्बों को छूती है। छरहरी
देह है। मीठा बोलती है। मिलनसार है। व्यवहारिक है। गुणों की खान होने के बावजूद
केवल एक कमी है उसमें, उसका रंग थोडा सांवला है। सांवला होने के बावजूद वह सलोनी है। चेहरा
फोटोजेनिक है। फिर भी वह किसी न किसी बहाने रिजेक्ट कर दी जाती है। पता नहीं, बेचारी के भाग्य में क्या लिखा-बदा है, अनायास ही उनकी ऑंखें छलछला आयी थी।
चष्में की फ्रेम तनिक उॅंचा उठाते हुए उन्होंने रूमाल से ऑंखें पोंछ डाली थी।
यंत्रवत
उनके हाथ टेबल से लगी कालबेल की बटन पर जा पहुॅंचे। कालबेल बजते ही चपरासी ने अंदर
प्रवेष किया। सलाम ठोंका और अगले आदेष की प्रतीक्षा करने लगा। उन्होंने चपरासी को
कडक-मीठी चाय लाने को कहा। आदेष लेकर चपरासी जा चुका था। उन्होंने टेबल पर पडे
सिगरेट केस को उठाया। सिगरेट निकाली। माचिस की तीली चमकायी और गहरा कष लेते हुए
ढेरों सारा धुॅंआ छत की ओर उछाल दिया। छत अब भी निर्विकार भाव से टंगा था। उपर
पंखा स्पीड से चक्कर घिन्नी काट रहा था। अब तक वे चार बार चाय पी चुके थे। आने
वाली पांचवी थी। वैसे उनकी आदत में शुमार था कि वे एक चाय सीट पर बैठने के साथ ही
सुडकते थे और शाम को सीट छोडने के पहले दूसरी चाय। उनका मानना था कि सीट पर बैठते
ही चाय इसलिए ली जानी चाहिए कि काम की शुरूआत के पहले मुॅंह एक हल्की सी मिठास के
साथ मीठा हो जाए।
चाय
की चुस्की लेते हुए वे एक लंबा कश लें ही पाये थे कि दरवाजे पर हल्की सी दस्तक
सुनाई दी। वे कुछ कह पाते। ओंठ बोलने के पूर्व फडफडाये भी थे। शब्द ओठों तक आ पाते
इसके पूर्व ही पाटिल अंदर प्रवेश कर चुके थे। चाय की चुस्की पूरी तरह से हलक के
नीचे उतर नहीं पायी थी। मुॅंह में भरा-सिगरेट का धुॅंआ भी वे पूरी तरह उगल नहीं
पाए थे। पाटिल को देखते ही जैसे पूरे शरीर में बिजली कौंध गई। वे पूरे जोश के साथ
अपनी सीट से उठ खडे हुए और अपना दाहिना हाथ आगे बढाते हुए बोले ष्आओ पाटिल आओ, बहुत दिन बाद आना हुआ अब तक कहॉं गायब
रहे।ष्
पाटिल
भी पूरे जोष से भरे हुए थे। थुलथुला शरीर होने के बावजूद भी उनमें चपलता-चंचलता
थीं। पलभर में दो मित्र जोश के साथ हाथ मिला रहे थे। बडी देर तक वे पाटिल के हाथ
अपने हाथ में थामे रहे। फिर ओठों पर स्निग्ध मुस्कान बिखेरते हुए उन्हें बैठने का
इशारा कर स्वयं अपनी सीट पर बैठ गए। उनके हाथ कालबेल की स्विच पर जा पहुॅंचे। घंटी
बजते ही चपरासी फिर हाजिर हुआ। उन्होंने चाय-नाश्ता लाने को कहा। फिर पाटिल की
ऑंखों में ऑंखें डालते हुए कहने लगे ष्कहॉं गायब हो जाते हो पाटिल! तुम्हें देखने
को जैसे ऑंखें तरस गई। वे कुछ आगे बोल पाते कि पाटिल ने चहकते हुए कहना शुरू कर
दिया श्देख यार जोषी मैं तेरे जैसा तो हूॅं नहीं कि दिन भर कुर्सी से चिपका पडा
रहूॅं। तू जानता है। अपनी यायावरी जिन्दगी है। एक आजाद पंछी की तरह घूमता रहता
हूॅं। एक बडी खुषखबरी है....... सुनेगा तो सिर के बल खडा हो जायेगा। बोल
सुनाउॅं।ष्
ष्एक
तू ही तो मेरा जिगरी यार है........ तू न होता तो मैं जिंदा रह पाता! बोल क्या खबर
है।ष् पाटिल बोल पाये इसके पूर्व ही न जाने कितनी ही मीठी-मीठी कल्पनाएॅं, जोषी के अंदर बनती-मिठती चलीं गई थी।
पाटिल एक हाथ से बिस्कुट खाता जाता और
दूसरे हाथ से चाय सुडकते जा रहा था। वे सोचने लगे थे, बुढापा आ गया पाटिल को लेकिन अब तक
बचपना नहीं गया और वह है कि समय से पहले ही बूढ़ा हो गया है। उनकी नजरें अब भी
पाटिल के चेहरे से चिपकी थी।
चाय के घूंट के साथ बिस्कुट हलक से
नीचे उतारते हुए पटिल ने बताया कि वे अभी-अभी शोलापुर से लौटे हैं और आते ही सीधे
यहॉं चले आए हैं। उन्होंने एक लका देख रखा है शारदा बेटी के लिए। लडका बडा होनहार
है। पोस्ट ग्रेजुएट है। हैण्डसम है और वह कल दस बजे तेरे यहॉं पहुॅंच जाएगा। फिर
चाय की घूंट हलक से नीचे उतारते हुए कहने लगे ष्जोशी, भगवान दत्तात्रय की कृपा से सब ठीक हो
जायेगा। मैं सब कुछ बता चुका हूॅं तेरे बारे में। उसे केवल लड़की चाहिए और कुछ
नहीं। भगवान की दया से सब कुछ है उसके पास।ष् पाटिल ने बहुत कुछ कहा पर वे सुन
नहीं पाये थे। उनके कान में अब भी वे शब्द बार-बार गूंज रहे थे। लड़का ठीक दस बजे
पहुॅंच जायेगा। बस इतना सुनते ही वे किसी तीसरे लोक में उड़ान भरने लगे थे। सुनते
ही उनके शरीर में रोमांच आ गया था। ऑंखें सजल हो उठी थी। उन्हें ऐसा भी लगने लगा
था कि सारे मनोरथ एक साथ पूरे होने वाले हैं। वे यंत्रवत कुर्सी से उठ खडे हुए और
अपनी विशाल बाहों में पाटिल को भर लिया था। वे अब और अपने आप को रोक नहीं पाए थे।
उनकी ऑंखों से अश्रुधारा बह निकली थी, जो पाटिल के कुरते को भिंगो देने के
लिए पर्याप्त थी।
पाटिल
को छोड़ने के लिए वे तीसरी मंजिल से सीढ़ियॉं उतरते हुए गेट तक चले आए थे। वे चाहते
तो लिफ्ट से सीधे उतर सकते थे। चाहकर भी वे वैसा नहीं कर पाये थे कि पाटिल से
जितनी भी बातें की जा सकती थी, की जानी चाहिए। क्योंकि एक तो वे उनके जिगरी
दोस्त थे और एक शुभ समाचार भी लेकर आए थे।
अपने चेंबर में लौटकर उन्होंने
इंटरकाम पर अपने सचिव को सूचित किया कि वे जरूरी काम से चार घंटे पूर्व ही अपना
कार्यालय छोड़ रहे हैं।
उनकी
चाल मे गेंद की सी उछाल थी। मन प्रसन्नता से लबरेज था। आशाओं के बूझते दीप फिर एक
बार टिमटिमाने लगे थे। उन्होंने पाटिल से लडके के बारे में बारिक से बारिक
जानकारियॉं प्राप्त कर ली थीं। उसे क्या पसंद है? नाश्ते में वह क्या लेगा? खाने में क्या-क्या लेगा? काहे से आयेगा? कितनी देर तक रूकेगा? लडका देखने के बाद स्वयं फैसला करेगा
या फिर अपने आई-बाबा के कंधों पर जवाबदारी डाल देगा?
उन्होंने
जेब में हाथ डाला। पर्स निकाला। पॉंच-सात सौ रूपये भर पडे थे जेब में। इतने से
रूपयों में क्या होगा! मन ही मन बुदबुदाते हुए उन्होंने अपने आप से कहा था। रिस्ट
वॉच पर नजर डाली। तीन बज चुके थे। बैंक अथवा पोस्ट ऑफिस से रकम अब निकाली नहीं जा
सकती थी। अभी इतने रूपयों में आवश्यक चीजें खरीद लेना चाहिये। कुछ रह भी जायेगी तो
घर के पास की किसी दुकान से खरीद की जा सकती है। सुलभा के पास कुछ रूपये तो पडे ही
होंगे। लडका आ भी रहा है तो महीने के अंत में इतने पैसे बच ही कहॉं पाते हैं कि
हजार-दो हजार की खरीद की जा सके। माह की पहली तारीख को तनख्वाहरूपी सूरज उगता है
और माह के अंत तक आते-आते इतना निस्तेज हो जाता है कि सब्जी-भाजी भी ढंग से खरीदी
नहीं जा सकती।
एक
मिनिट से भी कम समय में उन्होंने कई बातों पर गहनता से सोच डाला था। एक
डिपार्टमेंटल स्टोर्स में घुसकर अत्यावष्यक चीजें खरीदी। कार्टून में पैक करवाया
और बस-स्टॉप पर बैठ कर बस की प्रतीक्षा करने लगे थे।
महानगरों
की बसें एक तो धीमी गति से नहीं चलती। चलती भी है तो हवाई-जहाज की स्पीड से होड
लेती है। समय पर आ ही जायेगी, उसकी कोई गारंटी नहीं। आ भी गई तो दस-पांच पायदान
पर लटके मिलेंगे। तरह-तरह के ख्याल मन को अषांत कर जाते। वे बस को आता देखते। अपना
कार्टून संभालते। तब तक बस चरमराकर आकर खडी हो जाती और झटके के साथ आगे बढ जाती
थी। इतने कम समय में दो-चार चढ-उतर पाते थे। वे सोचने लगे। जवानी अब रही नहीं।
दौड-धूप उनके बस में रहा नहीं। जल्दी की और कहीं सलट गये तो लेने के दे पड
जायेंगे। एक ख्याल जोष दिलाता है तो दूसरा हवा निकला देता था।
न
जाने कितनी ही बसें आईं और चली गईं। अब तक वे बस-स्टॉप पर बैठे ही रह गए थे।
उन्हें अब अपने आप पर चिढ सी भी होने लगी थी। सूरज अपनी उपस्थिति में आग बरसा रहा
था। वे जेब से बार-बार रूमाल निकालते। पसीने से लथपथ देह पोंछते और हसरत भरी नजरों
से बस का इंतजार करने लगते। भीषण गर्मी में तन झुलसाते हुए उनके मन के किसी कोने
से विचारों की सरिता बह निकली।
ष्मैं
भी कितना बडा मूर्ख हूॅं। कोई चिराग लेकर ढूॅंढने निकले तो मुझसे बडा मूर्ख कोई
मिलेगा नहीं। सचिवालय में काम कर रहा हूॅं। सेक्सन इंचार्ज हूॅं। फाइलों के बीच से
रूपयों की गुप्त-गोदावरी बहती है। एक-एक फाईल लाखों-अरबों की होती है। अगर एक-एक
बूॅंद भी निकाल पाता तो आज लाखों में खेलता। मेरे अपने पास भी बेशकीमती गाडी होती।
गाडी होती तो मुझे, जाहिल गंवारों की तरह यहॉं स्टापेज पर बैठ कर बस का इंतजार नहीं करना
पडता।ष्
रहने
के लिये बाप-दादाओं के हाथ का एक टूटा-फूटा सा मकान है। वह भी ढाई कमरों वाला। घर
में रहने वाले पॉंच प्राणी। पति-पत्नि दो और तीन बेटियॉं। शारदा बेटियों में ससे
बडी है। एक प्रायवेट स्कूल में पढाती है। शिल्पी और सुनयना अभी पढ रही है। शिल्पी
एम.ए प्रीवियस में है। सुनयना फर्स्ट-ईअर में। शारदा सांवली है। मेरी जैसी। शिल्पी
अपनी आई पर गई है। गोरी-चित्ती। देखने में शारदा से बीसा पडती है। रिश्ता आता है
शारदा के लिए। पसंद कर ली जाती है शिल्पी। बडी के रहते छोटी की शादी हो! हो ही
नहीं सकती। संभव भी कैसे है। कर भी दूॅं तो बडी में खोट निकाली जाएगी। तरह-तरह की उल्टी-सीधी
बातें फैलायी जायेगी।
दो
साल पहले एक लडका आया था। घंटों तक वह शारदा का इंटरव्यू लेता रहा था। सांवली होने
के बावजूद वह पसंद कर ली गई थी। लडका तैयार था। पर वह इस बात पर अडा रहा कि
मांॅ-बाप की रजामंदी के बाद ही वह कुछ कह पाएगा। जाते ही सूचित करेगा। बीस-बाईस
दिन बेसब्री से इंतजार करने के बाद एक पत्र आया। लिखा था। आई-बाबा को लडकी तो पसंद
है। पर वे चाहते हैं कि लडकी संगीत में एम.ए. होनी चाहिए। ये भी कोई बात हुई!
लडकियॉं क्या कोई कैसेट की डिब्बी है जिसमें ढेरों सारी चीजें टेप करा दी जाए। आप
कितनी बातों में लडकियों को पारंगत करा सकते हैं?
उसके
बाद एक लडका और आया। सुदर्शन था। पढा लिखा था। लडकी कैसी भी रहे चलेगी। पर
दान-दक्षिणा तगड़ी चाहिए। बडी रकम कहॉं से आती। रिश्वतखोरी तो अब तक की नहीं
फिर-डाका भी तो नहीं डाला जा सकता। एक लडकी हो तो उधारवाड़ी भी ली जा सकती थी। दो
लड़कियॉं और भी है। किस-किस को कितनी रकम दी जा सकती थी। जेब में होती तब न! मामला
फिर लटक गया।
पिछले
साल एक संबंध और आया। लडका देखने में उठाईगिर-सडक छाप मजनू लगता था। कंधे तक बाल
झूल रहे थे। दाढी मूछें बढी हुई थी। जिस पर काला चश्मा चढ़ाये। बडी नजाकत-नफासत से
बात करता था। हाथ-हिलाहिलाकर बातें करते समय उसका पूरा शरीर थिरकता रहता। शारदा की
बढ़ती उम्र और कमजोर जेब देखकर लगा कि रिश्ता चल सकता है। बात आगे बढ़ी।
उसकी
मॉं भी उसके साथ आयी थी, देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि वह उसकी मॉं
होगी। लग रहा था कोई मॉडल सामने बैठी है। पारदर्शी कपडों में से झांकता उसका यौवन, गर्दन नीची किये देता था। मन पर
बडा-सा पत्थर रखकर बात आगे बढानी पडी। उसकी मॉं ने बतलाया था कि वे आजाद ख्यालों
वाली है। स्वतंत्र विचारधारा वाली है। लड़की हमारे परिवार में एडजस्ट हो पायेगी
अथवा नहीं, इस बात का भी ध्यान रखना होगा। वह चाहती थी कि लडका, लडकी से खुलकर बातें कर सके। पर ढाई
कमरों वाले इस मकान में यह संभव नहीं। उन्हें लडकी को लडके के साथ बाहर भेजना
पडेगा। साथ-साथ घूमेंगे, खायेंगे। एक-दूसरे को समझेंगे। पूरी जिन्दगी का
सवाल जो ठहरा।
शारदा
उसके साथ बाहर जाने को तैयार नहीं थी। सुलभा का भी कुछ इसी तरह का इरादा था। सबकी
नजरें उन पर केन्द्रित थी। फैसला उन्हीं को लेना था। लाचारी का समुद्र सामने दहाड
मार रहा था। अनिर्णयात्मक-द्वन्द मन में चल रहा था। उनकी नजरें बार-बार शारदा के
चेहरे पर चिपक जाया करती थी। शारदा के कोमल मन में एक अज्ञात भय गहरे तक धंस आया
था। वह कनखियों से उनकी ओर देखती जा रही थी। निर्णय उन्हें ही लेना था। दिल पर
वजनी पत्थर रखते हुए वे इतना ही कह पाए थे कि घूम फिर कर जल्दी लौट आना। बाप के
चेहरे से टपकती लाचारी भी वह देख चुकी थी।
दोनों
के बीच जो कुछ भी घटा, उन बातों को सोचते ही घिन होने लगी है। वह लंपट उसे गार्डन में ले गया, बेंच पर बैठते हुए उस निर्लज्ज ने
शारदा से पूछा था ष्क्या उसने कभी किसी से प्यार किया है? क्या उसने अपने किसी बॉयफ्रेण्ड से
शारीरिक संबंध स्थापित किये हैं? जब दो जवान जिस्म हम-बिस्तर होते हैं तो कैसा मजा
आता है?ष् शारदा जैसे काठ बनकर रह गई थी। उसके अंदर क्रोध उबल रहा था। न
चाहते हुए भी वह चुप थी... सारा जहर पीकर। फिर वह उसे फिल्म देखने ले गया।
ग्लैक्सी में सिराको फिल्म चल रही थी। बेहद अश्लील! बेहद उत्तेजक! ट्रिपल एक्स
फिल्म थी। शारदा गर्दन नीची किए बैठी रही। फिल्म चल रही थी। नजदीक खिसकते हुए उसने
उसे अपनी बाहों में भर लिया था और ढेरों सारे चुंबन उसके गाल पर जड दिये थे और
अपना हाथ उसके ब्लाउज में डाल दिया था।
मर्यादा
की सारी सीमाएं वह तोड चुका था। शारदा ने किसी तरह अपने आपको उसके पाश्विक-बंधन से
मुक्त कराया और तीन-चार झापड उसके गाल पर जड़ दिये थे और घर लौट आयी थी। घर लौटते
ही उसने आपने आपको एक कमरे में कैद कर लिया था। आपने आपको कमरे में बंद करने से
पहले उसने इतना कहा था कि वह जहर खाकर मर जाना पसंद करेगी पर ऐसे लुच्चे-लफंगे के
साथ शादी नहीं करेगी। उसने यह भी कहा था कि अगर दुबारा शादी की बात की गई तो वह
किसी उॅंची इमारत से कूद कर अपनी इहलीला समाप्त कर देगी।
शारदा
की सारी व्यथा-कथा सुलभा ने उनको बाद में बताया था। पहिले बताती तो शायद वह उसकी
दुर्गति अवश्य बना देता। सुलभा ने यह भी सुझाव दिया कि बात पता चलने के तुरंत बाद, उन्हें लडके के घर जाना चाहिए। सारी
चीजों की मालूमात कर लेना चाहिए। फिर उन्हें आने के लिए कहना चाहिए। सुलभा की
बतायी बातों का ख्याल आते ही लगा कि हलक कडुआ हो गया है। उन्होंने खांसकर गला साफ
किया और ढेरों सारा थूक एक ओर उछाल दिया। जबान में कडुआपन अब भी तैर रहा था।
पता
नहीं कल आने वाला लडका कैसा निकले! लडका ढंग का ही होगा। फिर पाटिल रिश्ता लाया
है। पाटिल उसका जिगरी दोस्त ही नहीं, सगे भाई से बढ़कर है। वह कोई गलत
रिश्ता ला भी कैसे सकता है। फिर शारदा की कही गई बातें याद आते ही उनकी धड़कने बढने
लगी थी। ष्दुबारा शादी की बात की तो वह किसी उॅंची इमारत से कूद कर जान दे देगीष्।
उन्हें ऐसा भी लगने लगा था कि वह जिस जगह बैठे हैं, वह भी कांॅपने लगी है। फिर वे अपने
आपको समझाईश देने लगे थे। वे शारदा से कहेंगे कि पिछली बातों को एक बुरा सपना
समझकर भूल जाए। पाटिल फिर अपना ही है। वह भला गलत रिश्ता लाने से रहा। वह किसी तरह
शारदा को मना लेंगे।
उन्हें
इस बात का भी ख्याल हो आया कि शिल्पा को थोडी देर के लिए ही सही बाहर भेजना पड़ेगा।
किसी सहेली के यहॉं अथवा पडोसी के घर। कहीं उस लडके की नजर शिल्पा पर पड गई तो वह
उसका हाथ न मॉंग बैठे। सुनयना रहेगी न घर में। वह सुलभा का हाथ बंॅटा देगी। लडका
पूछ भी बैठा शिल्पा के बारे में तो कह देंगे, मामा के घर गई है।
विचार
की ऑंधियॉं उनके साहस व धैर्य की चूलें हिलाने लगी थी। बस के इंतजार में ऑंखें
पथराने सी लगी थी। वे इस बात को सोचने के लिए मजबूर हो चले थे कि काश एक मरी-टूटी
मोटर बाईक ही खरीद ली होती तो अब तक इस तरह बैठना नहीं पड़ता। पता नहीं वह भी किस
मिट्टी का माधो बना बैठा रहा। रिश्वत अथवा घूसखोरी न लेने की अपने पिता की सीख को
वह अपने कलेजे से चिपकाये न रख पाता तो आज यह दुर्दशा न हुई होती।
क्यों
बना रहा वह इस घोर कलयुग में राजा हरिश्चन्द्र? क्या मिला राजा हरिश्चन्द्र बनकर? सिवाय फ्रस्टेशन के। कुण्ठा के।
आत्मग्लानी के। पश्चाताप के। वह भ्रष्टाचार में भले ही आकण्ठ न डूबता। रिश्वत न
लेता। कम से कम परसेंटेज मनी पर तो सहमत हो जाता। एक परसेन्ट अथवा आधा ही पर्याप्त
होता है। लाखों बनाए जा सकते थे। अरबों-खरबों की योजनाएॅं बनती है। आज जेब में
ढेरों सारा पैसा होता। गाड़ियॉं होती। आलीशान बंगले होते। लोग खिंचे चले आते है
डेजिग्नेशन देखकर। जब उन्हें हकीकत की कंकरीली जमीन पर खडा होना पडता है तो अपनी
भूल पर पछताने लगते हैं। उन्हें समझ में आ चुका होता है कि वह पारसमणी नहीं बल्कि
एक मामूली कॉंच का टुकडा है। जब उन्हें यह भी पता चलता है कि बेचारा कलजुगी
हरिश्चन्द्र है। तो वे दबी आवाज में हॅंसने लगते हैं। दूर छिटकने लगते हैं।
बंगले
की कल्पना मात्र से उसे अपने टूटे-फूटे ढाई कमरों वाले मकान की याद हो आयी। वह
जैसा भी हो अपना मकान तो है। उस मकान में इतना सुख तो अवश्य समाया हुआ है। जो पॉंच
लोगों के लिए पर्यात है। किसी एक कमरे की सफाई करनी पडेगी। उसमें रखा कबाड़खाना, किसी दूसरे कमरे में ठूॅंसकर भरना
होगा। भले ही अस्थाई रूप में वह हो। ड्राइंगरूम में तो उसे बदलना ही होगा, जहॉं बैठकर कल बातें की जानी है।
तरह-तरह
के ख्याल दिल और दिमाक को मथ जाते। वे कुछ और सोच पाते ष्बेस्टष् की एक बस सामने
खडी थी। भीड भी नहीं थी उसमें। न ही चढने-उतरने वालों का रेला था। किसी तरह भारी
भरकम कार्टून उठाकर वे बस में चढ पाने में सफल हो सके थे। बस से उतरने के साथ ही
लगने लगा था कि शरीर जड़ हो आया है। पोर-पोर में ऐंठन व दर्द रेंगने लगा है। सुबह
से पहले वे क्या कुछ कर पाएंगे। इसमें संदेह होने लगा था। कार्टून उठाये किसी तरह
लडखडाते कदमों से वे घर की ओर बढ चले थे।
चूं-चां-चर्र
की आवाज के साथ गेट खुला। अंदर प्रवेश करते ही ठहाकों के मिश्रित स्वर कानों से
आकर टकराने लगे। वे ठिठककर वहीं खडे रह गये मानो पैर में ब्रेक लग आए हों। ठहाकों
के मिश्रित स्वरों में उनकी पति सुलभा की हॅंसी की गूंज भी वे सुन पा रहे थे। वे
सुलभा की हॅंसी के स्वर को पहचानते थे। एक मुद्दत बाद वे उसकी हॅंसी सुन पा रहे
थे। दरवाजे की चौखट पर, बडा सा कार्टून हाथ में लटकाये, वे विस्फोटित नजरों से अंदर देखने लगे
थे। हॅंसने वालों में पत्नि और बच्चियों के अलावा एक अजनबी को हॅंसता देख उन्हें
अच्छा नहीं लगा। ष्निर्लज्जता की भी हद होती हैष् एक अजनबी के साथ ठहाके लगाने का
मतलब।ष् वे सोचने लगे थे। सुलभा ने पलटकर देखा। पति दरवाजे पर खड़े हैं। पति के
पदचापों को वह भलीभॉंति पहचानती थी। बरसों से जो सुनती आ रही थी। उन्हें तो अब तक
अन्दर आ जाना चाहिए था। समझ गई। अंदर न आने का कारण। सहज हास्य बिखेरते हुए वह
उसके पास तक चली आयी थी। उसके हाथ में मिठाई का डिब्बा था। मुॅंह में मिठाई
ठूॅंसते हुए, हॅंसकर कहने लगी ष्बधाई हो जोशी जी।ष् पत्नि के मुख से जोशी जी सुनकर
वे हैरान से होने लगे थे। अब तक तो वह ऐ जी! अथवा शारदा के बाबा कहकर पुकारती आयी
है। बाबा अचानक जोशी जी कैसे हो गया? विस्फारित नजरों से वह कभी सुलभा का
चेहरा देखते, कभी बच्चियों का, तो कभी अजनबी का। कई रंगों के शेड उनके चेहरे पर
बनते बिगडते रहे।
पल
भर को वे, ये भी भूल गये थे कि हाथ में वजनी कार्टून अब भी लटक रहा है। कार्टून
को नीचे रखते हुए अपनी झेंप मिटाने का सायास प्रयास करने लगे थे। हाथ का बोझ तो कम
हुआ, पर दिल पर बोझ अब भी लदा हुआ था। कौन
है यह अजनबी? पिता को आया देख शारदा और युवक ने आगे बढकर आदर के साथ उनके चरण
स्पर्श किए। शारदा बस इतना ही कह पायी थी-ष्बाबा! मैंने और शरद ने गंधर्व विवाह
रचा लिया है। शरद मेरे ही स्कूल में शिक्षक है। हमें आशीर्वाद दीजिए।ष् बस वह केवल
इतना ही बोल पायी थी। उसके चेहरे पर सूर्यादय की सी लाली छाने लगी थी।
सोचने
समझने को अब बाकी रह भी क्या गया था। जोशी जी की कोर भींग उठी थी। जोशी जी का खोया
हुआ जोश फिर लौट आया था। उन्होंने दोनों को उठाया और गले से लगा लिया था।
गले
लगाते हुए जोशी जी को लगा कि उनकी सूखी देह में खुशियों की नदी, हरहराकर बह निकली है।
? सीढ़ियॉं चढते और उतरते समय उसके पैर
अब जवाब देने लगे थे। किसी तरह वह घुटनों पर हथेली से दबाव बनाते हुए सीढ़ियॉं चढ़
तो जाती, वहीं सॉंसें भी फूलने लग जाती थी। उतरते समय मन के किसी कोने में एक
अज्ञात भय हमेशा की तरह ही समाया रहता कि गिर पडेगी। एक-एक सीढी, पूरी सावधानी एवं सतर्कता के साथ
उतरती, सबसे पहले अपनी हथेली से रेलिंग की पकड़ मजबूत करती, फिर आहिस्ता से पैर उठाकर नीचे की
पायदान पर रखती, जब तक वह पूरी तरह से इस प्रक्रिया में सफल नहीं हो जाती, पकड़ ढीली नहीं होने देती थी।
हमेशा
की तरह वह सीढ़ियॉं चढ तो गई पर सॉंसें धोंकनी की तरह चलने लगी थी। कुछ अंॅधेरा भी
ऑंखों के सामने घूमने लगा था। दीवार से पीठ टिकाए वह सॉंसों को नियंत्रित करने लग
गई थी। काफी देर बाद वह नार्मल हो पाई थी।
पास
पड़ी कुर्सी को उसने अपनी ओर खींचा और सिर को कुर्सी से टिकाते हुए आसमॉं की ओर
ताकने लगी थी। आसमान एकदम साफ था। सूरज एक ओर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी नजरें अब
भी पूरे नीलाकाश की अपरिमित सीमा को नाप रही थी। दूर कहीं से भटकता हुआ एक बादल का
टुकडा हवा में तैरता दिखा। धीरे-धीरे वह नजदीक आता चला गया। अब उसने सूरज को पूरी
तरह से अपने आगोश में ले लिया था। काफी देर तक सूरज बादल के साथ ऑंख-मिचौली खेलता
रहा। कभी लगता सूरज तेज गति से भाग रहा है तो कभी बादल, ऑंख-मिचौली का यह खेल भी, ज्यादा समय तक नहीं चल पाया और अब वह
सूरज से हटते हुए दूर निकल गया था।
काफी
देर तक आसमॉं अलसाया सा पसरा पडा रहा। तभी कहीं दूर से पंखेरूओं का एक झुण्ड हवा
को चीरता हुआ आता दिखलाई पडा। जब वह काफी दूर था तो लगता था कि आसमॉं पर भुनगे
भिन-भिना रहे हैं। क्रमशः वह झुण्ड नजदीक आता चला गया और डैनों को फडफडाते हुए वह
ठीक उसके सिर पर से गुजरते हुए दूर निकल गया था।
उसकी नजरें अब भी आसमान से चिपकी हुई
थी, तभी चिडियों का एक दल चिंचियाता हुआ
बाउण्ड्रीवॉल पर बैठ गया। वह वहॉं से उड़ता तो दूसरी तरफ आकर बैठ जाता था। चिडियों
की चें-चें भी उसका ध्यान भंग नहीं कर पा रही थी। तभी कुछ चिड्डे-चिडिया उसके
नजदीक आकर अठखेलियॉं करने लगे। सहसा उसे ध्यान आया कि उसने तो चिडियों के लिए
मुट्ठीभर दाने ले आई थी। मुट्ठियॉं खोलकर दानों को फर्ष पर बिखेर दिये। कुछ दाने
उसकी हथेली से चिपके पडे थे। शायद हथेली पसीने से गीली हो आई थी। दोनों हाथों को
आपस में मलते हुए उसे चिपके हुए दानों को झाड़कर साफ किया। चिडियों की टोली अब दाना
चुगने में तल्लीन हो गयी थी। यह इसका प्रतिदिन का नियम ही था कि जब भी वह छत पर
आती, पंखेरूओं के लिये दाना अवश्य लेकर आती
है या फिर बची हुई रोटी ही जिसे वह हथेली से चूराकर बिखेर दिया करती थी। दाना
चुगते समय वे आपस में चिंचिंयाने सी लगती थी, शायद कृतघ्नता जतला रही हों।
उसका मन अब अवसार से भरने लगा था। वह
सोचने लगी थी कि मूक पंखेरू भी अपनापन बतलाने लगते हैं पर आदमी! आदमी कहीं से भी
ऐसा नहीं करता। बल्कि समय आने पर वह दंश करने से अथवा चोट पहुॅंचाने से नहीं
चूकता। उसे अपने बेटों की याद हो आई थी। कितना क्या कुछ नहीं किया उसने अपने बेटों
के लिए चार-चार औलाद होने के बाद भी आज वह नितान्त अकेली जीवन काट रही है।
वह और कुछ सोचे, तभी उसके कान से ढोलक की थापों की
आवाज और मंजीरों के धमक के मिश्रित स्वर आकर टकराने लगे थे।
उसे सहसा ध्यान आया कि रामदुलारी सुबह
ही आई थी और उसने अपने नाती के जन्म दिवस के अवसर पर आने का निमंत्रण डाल गई थी और
वह यह भी कह गई थी कि आज बरसों बाद ऐसा सुनहरा अवसर आया है जब हम और तुम मिल-बैठकर
गायेंगे-बजायेंगे। बात ध्यान में आते ही वह अपने आपको धिक्कारने लगी थी और मन ही
मन कहने लगी थी कि उसे आज छत पर चढना ही नहीं चाहिए था, जितनी शक्ति उसने आज छत पर चढने पर
खर्च की है, शायद उतनी ही ताकत वे चलकर रामदुलारी के यहॉं तक जा सकती थी। फिर नये
सिरे से सोचती कि उसने छत पर आकर गुनाह ही क्या किया है। अगर वह छत पर नहीं आयी
होगी तो ढेरों सारी चिडिया आज फांके मारती। फिर पल-पल बदलते दृष्य को देखकर वह
अपने गम को भूल तो जाती है। रही बात रामदुलारी की तो वहॉं रोज-रोज गम्मत होती है।
कुछ बातें ऐसी भी होती है कि उनके
संदर्भ में ढेरों सारी किताबें छाननी पडती है, कई पन्ने पलटने होते हैं, पर मन एक ऐसी लायब्रेरी है जहॉं
पुरानी किताबों के पन्ने पलटने नहीं पडते। बस जरा-सा ध्यान लगाया कि एक-एक पल
जीवंत हो उठते हैं। ढोल-ढमाके की आवाज सुनकर उसे अपने बीते दिन की याद आने लगी थी।
एक-एक लम्हा उसकी ऑंखों के सामने साकार हो लगा था।
उसका घर मोहल्ले की औरतों से अटा पडा
था। ढोलक ढमकाई जा रही थी, मंजीरे पीटे जा रहे थे। औरतें घेरा बनाए बैठी
झूम-झूमकर गा-बजा रही थी, इस दिन उसकी बहू का सतवासा किया जाना था, गर्भधारण किए हुए सात माह हो गए थे
उसे। इस दिन को शुभ मानकर घर में उत्सव मनाया जाता है।
सास ने पूरे मुहल्ले को न्यौत आई थी, मॉं-बाबूजी भी आए थे। आज के दिन
मंगल-गीतों के चलते ही उसे नए कपडों में खूब सजाया संवारा गया था। फिर ननद के हाथ
पकड कर वहॉं ले आई थी, जहॉं घर में गाना-बजाना चल रहा था उसे एक पीढे पर बैठा दिया गया था।
सामने एक मंगलदीप सिलगा दिया गया था। कुछ छोटे-मोटे नेंग-दस्तूर के बाद उसकी ओली
भरी जाने लगी थी। बडी-बूढी आशीषें देंगी- फूलो-फलो, दूधो-नहाओ के ढेरों सारे आशीषों की
बौछारें होने लगी थी। बारी-बारी से वह सभी के चरण-स्पर्श भी करती जाती थी। पूरा
दिन उत्सव मनाने में बिता, तबसे कुछ ज्यादा ही अपने होने वाले बच्चे के बारे
में सोचने लगी थी। बच्चे होने की कल्पना मात्र से वह उस दिन रोमांचित हो उठी थी।
जब उसे बतलाया गया कि वह मॉं बनने वाली है, शायद इस बात की विधिवत घोषणा की जा
चुकी थी। हालॉंकिवह स्वयं भी जानती थी कि वह पेट से है और यह होना भी निश्चित था
क्योंकि माहवारी जो नहीं आई थी।
तबसे
वह सुबह-षाम हर पल अपने होने वाले बच्चे के बारे में सोचते रहा करती, ऐसा होगा... वैसा होगा... बडी-बडी
ऑंखें होगी... गोरा-नारा होगा... आदि, आदि। उसका अपना कल्पना संसार औरों से
निराला ही था। वह दिन भी शीघ्र ही आ उपस्थित हुआ। जब उसने एक नन्हें शिशु को जन्म
दिया था। उसकी बडी-बडी ऑंखों को देखते हुए उसने मन में गॉंठ बॉंध ली थी कि उसका
नाम वह राजीव ही रखेगी। भले ही उसका जन्म नाम किसी अन्य अक्षर से निकले। राजीव
अपनी हरकतें तेज करें इसके पूर्व ही उसे दूसरे गर्भ की चिन्ता सताने लगी थी। एक
साल के अंतराल में उसने चार शिशुओं को जन्म दिया था। नाम भी सभी के प्यारे-मनभावन
ही थे। पहला राजीव, दूसरा नीरज, तीसरा सूरज और चौथा सुन्दर।
बडी-बूढी
अक्सर कहती ष्कुसुम तेरा नाम कुसुम नाहक ही रखा है, तेरा नाम तो कौशल्या होना चाहिये
था... कौशल्या और वह फूली नहीं समाती थी, घर का कोना-कोना खुशियों से भरा पडा
था। कब दिन ढलता और कब रात बीत जाती, पता ही नहीं चल पाता था।
खुशियों
से ऑंगन महमता-दमकता ज्यादा दिन नहीं रह पाया। एक ऐसी घनी अंधेरी रात भी आई जिसमें
उसे सारे चमकते दिन सदा-सदा के लिए लोप हो गए थे। उसके बाद वह सूरज उगा ही नहीं जो
उसकी अंधेरी रातों को उजास से भर दें। केवल एक ही आशा अथवा अंतिम किरण मन में शेष
थी कि किसी तरह चारों की परवरिश ढंग से हो जाए उन्हें ऐसा मकाम मिल जाए जहॉं पलटकर
फिर कालिख अपनी जगह न बना सके।
सर
ढकने को खपरेल वाली छत व दस-बारह एकड जमीन पास थी जो पेट के गड्ढे को पूरी तरह भर
सकने में असमर्थ थी। मुख्य कारण तो यह था कि उसने जीवन के जीवित रहते हुए कभी उसर
भूमि पर पैर ही नहीं रखा था। चाहती तो वह भी थी कि प्रत्छाया बन कर खेतों में काम
करती रहे। पर वह उसे गंवारा नहीं था। नहीं जान पाई थी वह कब क्या बोना-उडाना है।
कब नींदना-बखराना है। बटाईदार ने जो काट कर ले आया-सो ले आया। वह कितना माल मार
रहा है। कितना जानवरों को खिला रहा है। उसका वह जाने। पर वह इतना ही जान पाई थी कि
इतनी बडी जमीन उन पांचों का पेट नहीं भर पायेंगी। काफी समय तक तो उसने कपडा सिलकर
तो कभी स्वेटरें बनाकर घर की गाडी खीची। पर लगता कि अब वह भी ज्यादा दिन खींच नहीं
पायेगी।
पत्थर
हो चुके दिल पर एक बडी सी चट्टान और रखते हुए-उसने खेत बेच दिया। लोग-बाग कहते, पगला गई है, जो बनी बनाई सम्पत्ति थी, उसे गण्डे में बेचने में जुटी है। कोई
कहता और दिन सबर रखो। ज्यादा में बिकेगी पर उस पर क्या बीत रही थी वह उसका वह ही
जान पाई थी, ज्यादा भरोसे एवं दिलासा के बोलों से वह तंग आ गई थी। अपने गिरधर की
मूरत के सामने बैठकर वह बार-बार रोई थी और अच्छे दिन फेर लाने के लिए गुहार लगाती
रही थी। अब उस पर भरोसा जतलाते हुए खेत नाप दिया था। जब तक जीना है तब तक सीना है।
जो भी करना है, खुद के दम पर करना है। निर्णय गलत-सलत हों पर निर्णय खुद के हों। वह
जान चुकी थी कि वह जो भी करने जा रही है उसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार भी होगी। जब
आदमी करो या मरो का निर्णय ले चुका होता है तब ही सफलता हाथ लगती है। शायद वह यह
साबर मंत्र जान चुकी थी।
पुराना
मकान ढहाया जाने लगा था और उसकी जगह सीमेंट कांक्रीट की ठोस आकृति उसकी जगह लेने
लगी थी। दूसरी मंजिल पर उसने अपना आवास बना लिया था और शेष किराये पर उठा दिया था।
उसने मन ही मन में गुणा भाग लगाकर ज्ञात कर लिया था कि आमदनी पहले से कहीं ज्यादा
होने लगी थी। खेत को जब वह ठेके पर देती थी तो मुश्किल से दो हजार की रकम इकट्ठी
हुआ करती थी जबकि इससे कहीं उपर वह मासिक किराया ले रही है। उसने अब पूरे जतन के
साथ अपने बच्चों को पढाने-लिखाने और उन्नति के सोपान बढाने के पुनीत कार्य में जुट
गई थी।
समय
अपने डैने फैलाए द्रुतगति से उडा चला जा रहा था। बडे ने आई.एस.एस. करके विदेश जा
चुका था। दूसरा कलेक्टर होकर, तीसरा सांख्यिकी अधिकारी व चौथा तहसीलदार होकर
अन्यत्र चले गए थे। शेष बची रही वह अकेली खटने के लिए। ऐसा नहीं था कि वह बच्चों
के पास रहने नहीं गई थी गई तो थी पर कटु अनुभव लेकर लौटी थी और उसने प्रण कर लिया
था कि वह कभी भी किसी के भी पास जाकर नहीं रहेगी।
पुरानी
यादें ताजा होते ही मन विषाद से घिरने लगा था। दुःख का घनत्व कुछ ज्यादा ही होता
है, तभी तो सारे समय अंदर गहरे तक पसरा
पडा रहता है। दुःख काफी हलका इत्र की तरह होता है जो जल्दी ही हवा के संग उड जाता
है। दुःख के दरिया में पूरी तरह डूबने से तो अच्छा होगा कि पडोस में होने जा रहे
कार्यक्रम में शामिल होकर वह सब कुछ भूल जाने की कोशिश करे। वह यह भी अच्छी तरह
जानने लगी थी कि दुःख का एक ऐसा कीडा होता है जो तन को धीरे ही सही, पर पूरी तरह से कुरेद-कुरेद कर खोखला
कर देता है। दुःख के कीडे को मारने का केवल एक ही तरीका है कि वह उसे भूल जाए। पर
क्या भुला पाना भी इतना आसान होता है। उसने मन ही मन अपने से कहा था।
ढोल
धमाके की स्वर लहरी कानों से आकर टकराने लगी थी। कुछ सामान्य होते हुए उसने
देखा-सूरज पहाडों के पीछे उतर जाने के लिए व्यग्र हो रहा है और अपनी किरणों का जाल
लपेटे की तैयारी में जुटा है। सामने पीपल के पेड पर पखेरू इकट्ठे होकर शोर मचा रहे
हैं और पूरा आसमान सिन्दूरी रंग में नहा उठा है। वह उठ बैठी और आहिस्ता-आहिस्ता
सीढियॉं उतरने लगी थी।
जब
वह वहॉं से लौटी तो एकदम तरोताजा थी, अब वह अपने कमरे में बढने के लिए
सीढियॉं चढने लगी थी। हथेली से घुटनों को दबाते हुए वह सीढियॉं चढ रही थी। दर्द की
टीस ने उसे अंदर तक लहूलुहान कर दिया था। उसने मन ही मन सोचा कि अब वह दूसरी मंजिल
पर न रहकर नीचे किसी कमरे में आकर टिक जाएगी। संभव हो तो किसी किरायेदार को कमरा
खाली करने को भी कह देगी। ताला खोलकर अंदर प्रवेश करते हुए उसने स्विच ऑन कर दिया, पूरा कमरा अब दूधिया रंग से दमकने लगा
था।
पलंग
पर बैठकर सुस्ताते हुए वह अपने आप कह उठी ष्एक अकेली जान के लिए क्या खाना-क्या
पकाना,उसने निर्णय ले लिया था कि वह अब चूल्हे-चौके में घुसकर समय नष्ट करने
की बजाय बैठकर रामायण बाचेगी और एक ग्लास दूध पीकर सो रहेगी, पूजा-घर से वह रामायण उठा लाई और
चश्मे के कॉंच को साडी के पल्लू से पोंछते हुए कान पर चढाकर रामायण बांचने लगी।
राम-लक्ष्मण, भरत-शत्रुघ्न के चरित्र बांचते-बांचते
उसे अपने चारों बेटों की याद ताजा हो आई। मन फिर विषाद से घिरने लगा था, यादों की हिमशिलाएॅं, दुःख की उष्मा पाकर पिघलने-सी लगी थी।
अंदर एक बवण्डर सा उठ खडा होने लगा था। अब तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह तूफान सब
कुछ नेस्तानाबूत कर देगा। उसकी एक-एक परत-दर-परत उखाड फेंकेगा। उसे ऐसा महसूस सा
होने लगा था कि अंदर अब कुछ दरकने लगा है और उसकी किरचिंया मॉंस-पेशियों को छेदने
लगी है। वह अब एक नए सिरे से सोचने लगी थी कि क्या कुछ नहीं किया था उसने अपने
बच्चों के लिए। अपने जीवन का अर्क निचोड-निचोड कर पिलाया था, सभी को। उन्हें अच्छे संस्कार दिये थे
और समाज में सम्मान से जीने का मार्ग दिखाया था, सब कुछ व्यर्थ ही गया, नेक काम करते-करते उसकी हथेलियों की
रेखाएॅं तक घिस चुकी थी, शायद अब काली भी पडने लगी थी, उसने अपनी हथेलियों को फैलाकर
देखा-सचमुच काली दिखने लगी थी। न चाहते हुए भी उसे वे क्षण याद हो आये जब वह
बनी-ठनी अपने बडे बेटे के पास विदेश गई थी। उसकी शान-शौकत देखकर वह फूली नहीं समा
पा रही थी। लगता था कि उसकी बगिया में असंख्य फूल खिले हैं, असलियत जब सामने आई तो लगा कि फूल तो
फूल ही थे पर उनमें खुशबू थी ही नहीं। विदेशी बहू फूली-फूली सी दिखती। बोलती तो
लगता था कि बादल फट रहे हों, गिटिर-पिटिर, पता नहीं क्या-क्या। उसका परिचय अपनी
सहेलियों से बतलाते हुए उसने सर्वेन्ट शब्द का इस्तेमाल किया था। तब तो वह नहीं
जान पाई थी कि आखिर सर्वेन्ट है किस बला का नाम। वह तो उसे सुनकर भी खुश हो रही थी
कि वह मेरे शान में कसीदा पढ़ रही होगी। दोनों के वे रूखे व्यवहार को देखकर वह
वापिस लौट पडी थी और यहॉं पहुॅंचकर किसी से पूछा था कि सर्वेन्ट का अर्थ क्या होता
है। अर्थ जानकर लगा था कि धरती फट जाती और वह उसमें समा जाती। पर क्या धरती ऐसे ही
रोज-रोज फटती है। उसने मन में गॉंठ बांॅध ली थी, दुबारा वह उस धरती पर कदम भी नहीं
रखेगी, जहॉं सब कुछ कदम-कदम पर छद्म भरा हुआ है। उसे हर चीज से नफरत-सी हो गई
थी, जिसमें उसका संस्कारी लडका अपने शरीर
से चिकाये पडा है। उसे तो वह घटना भी याद हो आई जब वह वापिस लौटी थी तो लोगों ने
वहॉं के हालचाल जानने चाहे थे। वहॉं के ग्लैमर के बारे में सुनना चाहते थे। पर
उसने चुप्पी साध ली कि पता नहीं क्या गिटिर-पिटर करते हैं वहॉं के लोग, जो समझ से बाहर के थे। खान-पान में
मॉंस व शराब का ज्यादा सेवन करते हैं। वहॉं की औरतें सरेआम अपनी छातियॉं दिखाती
घूमती हैं, वहॉं हम और कहॉं वहॉं की अधकचरी संस्कृति। न मुझ से रहा गया, न देखा गया, बस चली आई वापिस। इसके बाद से न तो
लोगों ने कुछ पूछा और न ही उसने कुछ बतलाया ही। क्या वह यह बतलाती कि वह वहॉं
नौकरों की हैसियत से रह रही थी। क्या वह यह बतलाती कि उसके लडके को बात करने तक की
फुर्सत नहीं मिलती थी, क्या वह बतलाती कि उसने जितने भी संस्कार घुट्टी में मिलाकर चटाये थे, सब बेअसर रहे।
दूसरे
और तीसरे बेटे के यहॉं भी माहौल कुछ ऐसा ही था। पर कुछ भिन्न-किस्म का था, बहू-बेटे सब मिलते तो तबियत से थे, पर उनमें बासीपन था। लगभग बनावटी अथवा
दिखावा ही था। दरअसल समय की बडी कमी थी उनके पास। न बेटे के पास समय, न बहू के पास, हाय-हलो कहके घर से निकलते थे, फिर कब घर लौटते थे, वह नहीं जानती। उनके नौकर-चाकरों के
बीच बैठती तो उनकी प्रेस्टीज खराब होती थी। न वहॉं कोई बोलने-बतियाने वाला था, न आत्मीयता दिखलाने वाले जन। सुबह से
शाम तक नियम, कायदे-कानून, यस सर-नो सर वालों की भीड, लौट पडी थी वहॉं से भी उदासी ओढकर।
चौथे
के यहॉं जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। माना कि उसने अब तक तीनों की तरह
अंतर्जाति-विवाह नहीं किया था। उसकी यह धारणा ज्यादा पुष्ट हो आई थी कि जब चारों
को ही उसने संस्कारित किया था, तीन उसमें खरे नहीं उतरे तो चौथा भी लगभग उन
तीनों जैसा ही हो सकता है। काफी रात बीत चुकी थी। नींद अब भी ऑंखों से कोसों दूर
थी। अंदर तोड-फोड-कोहराम मचा हुआ था। जी में तो यहांॅ तक भी आया था कि रो लूॅं, अंदर ऑंसुओं की बाढ आ रही थी और वह
नहीं चाहती थी कि पलकों के तटबंध उसमें डूब जाएंॅ। बहुत रो चुकी वह, जब उसका सूरज सदा-सदा के लिए उसे
तन्हा-अकेला छोड गया था। बस, रोई थी उसी के याद में और जितने ऑंसू बहा सकती थी, वह बहा चुकी। अब न तो ऑंसुओं का कोई
मोल ही रह गया है, न ही महत्व और फिर उनके लिए क्या ऑंसू बहाना, जो अपने न हो सके। ऑंसुओं के
उमडते-घुमडते सैलाब को वह अपने आतप्त हृदय में समाती चली जा रही थी।
अपने
अतीत की गहरी-अंधी खाई में उतरकर वह नुकीली चट्टानों से टकराती अपने-आपको लहूलुहान
करती रही थी। कितनी देर वह इसमें भटकती रही थी। वह स्वयं नहीं जान पाई थी और कब
नींद के आगोश में समा गई थी, वह नहीं जानती।
जब
दूसरे दिन सोकर उठी तो सूरज सर पर चढ आया था। उसने आईने के सामने जाकर खडेहो कर
देखा। ऑंखें सूज आईं थीं, चेहरा निस्तेज सा था। वह बाथरूम में जा पहुॅंची।
मल-मलकर शरीर धोया, तब जाकर लगा कि सारा शारीरिक कलुष धुल-धुलकर बह गया है, पर मन का कलुष तो अब भी चिपका पड़ा है।
खाना
खाकर वह छत पर चढने लगी थी। पैर अब भी जवाब दे रहे थे। उपर छत पर बैठना उसकी
मजबूरी थी। शायद नहीं भी। क्योंकि वहॉं बैठने से जो उसे पुरजोर सुकून मिलता है, वह वहॉं बंद कमरे में बैठने से नहीं।
छत पर उसकी अपनी चिडियों की टोली है, खुला असीम आकाश है। बेदाग-एकदम शांत
हल्का-फीका नीलापन लिए हुए, जो देखने में सुकून देता है। ओढ़ने में सुखदेता
है। हल्की अथवा तेज चलने वाली हवा, शरीर से लिपट कर ठंडक तो देती है। बाहर पीपल का
बूढा पेड है। वैसा ही बूढा जैसी कि वह स्वयं है। बात-बात में वह ताली बजाता रहता
है, हॅंसता रहता है, डोलते रहता है। उसकी शाखों पर अब भी
पक्षी वास करते-चहचहाते हैं। उसके अपने संगी-साथी है, उन्हीं के शब्दों को ओढता-उन्हीं की
भाषा में तुतलाकर बातें करता। बूढ़ा पीपल अब भी जीने की राह दिखाता। हॅंसकर कहता, जड हूॅं फिर भी जिन्दा हूॅं, तू चल-फिर सकती है फिर भी अंदर से जड
हो गई है। बार-बार चेताता, बार-बार हॅंसता-हॅंसाता।
छत
पर चढते समय उसकी हाथों में सोमी अली की एक किताब थी। वह एक पक्षी विशेषज्ञ था।
बहुत बारीक अध्ययन किया था उसने पखेरूओं का। धूप में कुर्सी पर बैठते हुए वह सोमी
अली को पढ रही थी।
सोमी
अली की एक बात उसके मन को छू गई। लिखा था कि पक्षी जब अपना जोडा बनाता है, तो अण्डे देने के लिए दोनों नर-मादा
तिनका-तिनका जोडकर घोंसला बनाते हैं, घोंसला बन जाने के बाद मादा उसमें
अण्डे देती है, घण्टों बैठकर अण्डों को सेती है, फिर अण्डों के फूटते ही बच्चे बाहर
निकल आते हैं। दोनों मिलकर बच्चों को दाना-चुग्गा देते हैं। बच्चे जब तक बडे नहीं
हो जाते, वे घोंसले का उपयोग करते रहते हैं। जब बच्चे उडना सीख जाते हैं, तो घोंसले की उपयोगिता नहीं रह जाती।
जब वे बच्चे जवान होते हैं तो अपना जोडा स्वयं बनाते हैं और अण्डे देने के लिए फिर
से एक नया घोंसला, पुराना घोंसला अपने आप ही बिखर जाता है। इस तरह हर पक्षी अपने-अपने
घोंसले बनाते हैं। उनका उपयोग करते हैं, फिर हवा उन्हें तिनकों में बिखेर देती
है।
उसे
ऐसा लगने लगा था कि मन की बंद खिडकियॉं चरमराकर खुलने लगी है और ढेरों सारा प्रकाश
अंदर उतरने लगा है।
वंश वृक्ष
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी
गोवर्धन यादव
सुबह से ही उसकी बॉंयी ऑंख फरक रही
थी। जब जब भी उसकी बॉंयी ऑंख फरकी है, तब-तब उसे शुभ समाचार सुनने को मिले
हैं। तभी उसे डाकिया आता दिखा। उसने सहज रूप से अंदाज लगाया कि आज वह उसके बेटे की
चिट्ठी जरूर लेकर आयेगा। वह प्रसन्नता से भरने लगा था। पोर-पोर से रोमांच हो आया
था। उसका मृगी-मन कुलाचें भरने लगा था। बुझा चेहरा फिर दिपदिपाने लगा था। सूखी देह
फिर हरियल होने लगी थी। इसी दिन का उसे बेसब्री से इंतजार था।
विगत
चार माह से दिनेश का पत्र नहीं आया था, उसी कारण वह पगलाया सा रहने लगा था।
खाने-पीने में उसे अरूचि होने लगी थी। रात की नींद व दिन का चैन छिन गया था। एकांत
क्षणों में उटपटांग विचार आते, जो दिल और दिमाग को मथ जाते। वह हमेशा बेचैनी से
भरा रहता था।
एक
दिन तो वह डाकघर भी जा पहुॅंचा था और अपनी चिट्ठियों के बारे में पूछताछ करता रहा
था। डाकिये ने जब इंकार की मुद्रा में अपनी भारी-भरकम गर्दन हिला दिया था, तो वह भी अंदर तक हिल गया था। उसका
शरीर पीपल के पत्ते की तरह कांप गया था। तरह-तरह के प्रश्न उसके दिल में सालबोरर
की तरह छेद करते रहे थे। अगरबत्ती की तरह वह दिन-रात सुलगता रहा था।
ऐसा भी विचार मन में आया कि वह खुद
शहर चला जाये और अपनी ऑंखों से सभी को देख आए। चाहकर भी वह वैसा नहीं कर पाया था।
एक तो बुढ़ाती देह, उपर से कमजोर ऑंखों की वजह से वह हिम्मत ही नहीं जुटा पाया था।
हॉं! एक बार वह शहर गया था। चिंटू का
जन्म-दिन था। संयोग से दिनेश भी साथ था। हवा से बातें करती मोटर में बैठ कर उसे
लगा कि वह हवा में उडा जा रहा है। बस से उतरते ही उसकी घिग्गी बंध गई थी। अनगिनत
वाहनों को बेलगाम दौडता देख वह डर सा गया था। ठगा सा रह गया था, गगनचुंबी इमारतों को देखकर। उसे तो इस
बात पर भी आश्चर्य हो रहा था कि शहर का आदमी चलता कम है और दौडता ज्यादा है। वह
सोचने लगा था। आदमी की शक्ल में घोडे दौड रहे हैं। भीड देखकर वह असहज हो उठा था।
उसकी बुद्धि चकराने लगी थी। वह अकेला जा पायेगा, इसमें संदेह होने लगा था। पहली बार
में ही हिम्मत जवाब दे गई थी।
दिनेश
पत्र नहीं लिख पाया। इसका कारण तो समझ में आता है सूरज की पहली किरण के साथ वह उठ
बैठता है। दैनिक क्रिया-कर्म से निजात पाकर वह बगल में टिफिन दबाये वह घर से निकल
पडता है। उसे रास्ते में बस भी बदलनी पडती है। अगर पहली बस नहीं पकडी जा सकी, तो दफ्तर समय पर पहुॅंच पाना संभव
नहीं। उसका कार्यालय भी तो उसके घर से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूरी पर है। अतः समय का
पाबंद होना बहुत जरूरी है, उसके लिए।
अति-उत्साहित
होते हुए दिनेश ने बतलाया था कि वह दफ्तर से लोन लेकर मोटर सायकिल खरीदने की सोच
रहा है। सुनते ही वह बमक गया था। उसने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि बुरा ख्याल
तत्काल मन से बाहर निकाल फेंके।
बेलगाम
भागते वाहनों को वह देख ही चुका था। वह यह भी देख चुका था कि आदमी, आदमी की तरह सडक पर चल भी कहॉं पाता
है। सभी स्पीडमें होते हैं। सभी आगे निकल जाना चाहते हैं। आगे निकल भागने की
खतरनाक प्रवृत्ति के चलते वह गफलत का शिकार हो जाता है और असमय ही मौत को गले लगा
बैठता है। अपने अल्प प्रवास में वह कई दर्दनाक हादसे देख भी चुका है।
शहर
की न तो अपनी कोई तमीज होती है, न ही इंसान के मन में दया-ममता-सहानुभूति ही।
हादसों को देखकर वह आगे बढ़ जाता है। मानो कुछ हुआ ही न हो। कोई रूकना नहीं चाहता।
कोई पलटकर नहीं देखता। हमदर्दी नहीं जतलाता। वह नहीं चाहता कि उसकी अपनी इकलौती
संतान कभी दुर्घटना का शिकार बने। उसने समझा दिया था कि बस से आने-जाने में ही
फायदा है। समय बचाना यहॉं जरूरी नहीं है। जान बचाना आवश्यक है। जान है तो जहान है।
अंत में अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए उसने आदेश दिया था कि वह भूलकर भी मोटर
सायकिल नहीं खरीदेगा और न ही वह इसके लिए इजाजत ही देगा।
दिनेश
की बात तो समझ में आती है कि उसके पास दम मारने को फुर्सत नहीं है। जब फुर्सत ही
नहीं है तो क्या खाक वह पत्र लिख पाएगा। बहूरानी करती भी क्या है दिनभर! दिनेश
ऑफिस चला जाता है। चिंटू अपने स्कूल चला जाता है। फुर्सत ही फुर्सत रहती है उसके
पास। वह चाहे तो एकाध पोस्टकार्ड अपने बूढे ससुर के नाम लिख सकती है। पर महारानी
लिख पाए तब न। निपट देहाती-अनपढ-गंवार बहू बिहा लाता तो बात दूसरी थी। वह तो शहर
की कॉलेज पढ़ी लड़की को बहू बनाकर लाया था। ऐसा भी नहीं कि उसे पत्र लिखने का सउर
नहीं होगा। सब कुछ जानती होगी। पता नहीं... वह पत्र नहीं लिखती। दिनभर टीवी-फीवी
से चिपकी रहती होगी। सच है। समय कहॉं है, उसके पास। उसे रजनी पर क्रोध हो आया
था।
अतीत
के गर्त में उतरकर वह लहूलुहान होता रहा। वह कुछ और सोच पाता, डाकिए ने पत्रों के बण्डल में से एक
पत्र छॉंटकर उसके हाथ में थमा दिया था। वह अपने विचारों की तन्द्रा की खोल में से
पूरी तरह से निकल भी नहीं पाया था कि डाकिया जा चुका था। उसे अपनी भूल का अहसास
होने लगा था।
पत्र
हाथ में आते ही लगा कुबेर का खजाना हाथ लग आया है। उसके पूरे शरीर में...
प्रसन्नता की लहर दौडने लगी थी। उसने लिफाफे को उलट-पलटकर देखा। पत्र पर लिखी
इबारतदिनेश के हाथ ही की थी। वह दिनेश की लिखावट अच्छी तरह से पहचानता था।
प्रसन्नता के साथ उसे अफसोस भी होने लगा था। वह सोचने लगा था- काश वह पढा-लिखा
होता तो अब तक पत्र पढ जाता। समाचारों से अवगत हो चुका होता। पता नहीं। दिनेश ने
पत्र में क्या लिख भेजा है। मजमून जानने के लिए वह उतावला हुआ जा रहा था। उसे
गोपाल की याद हो आयी। उसने झट से पैरों में जूते डाले और घर से निकल पडा। रास्ता चलते
उसे होश आया कि वह बण्डी-धोती में ही घर से निकल पड़ा है। कुर्ता पहनना तो वह भूल
ही गया था। ष्गॉंव में सब चलता हैष् यह कहते हुए व्यग्रता से आगे बढ चला था।
रास्ता
चलते कई विचार भी साथ चलने लगे। गोपाल घर में मिलेगा भी अथवा नहीं? वह खेलने-कूदने न निकल गया हो! संभव
है, वह खेत पर निकल गया हो। खैर! वह कहीं
भी होगा, वह उसे ढूॅंढ निकालेगा।
ष्बडा
प्यारा बच्चा है गोपाल। फिर पूरी ट्यूनिंग भी तो मिलती है उससे। जहॉं भी मिलता है, दादाजी प्रणाम अथवा दादाजी पायलागू
कहना नहीं भूलता। कोई भी काम बतलाओ, फौरन कर डालता है। पढ़ने को कहो। झट तैयार हो जाता
है। उसके पढ़ने का ढंग भी निराला है। ऐसे बांचता है मानो ऑंखों देखा हाल सुना रहा
हो। लिखने की कहो। फौरन दवात-कलम उठा लाता है। लिखता भी क्या गजब का है, मानो कागज पर मोती टांक रहा हो।
उसने
दूर से ही देख लिया था। शायद वह कहीं जाने की तैयारी में था। देखते ही वह उॅंची
आवाज में बोल उठा था- ष्गोपालेे दिनेष का पत्र आया है।ष् इसके आगे वह कुछ भी बोल
नहीं पाया था। बोलने को बचा भी क्या था। अब उसकी चाल में गेंद की सी उछाल थी।
लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ वह आगे बढ़ चला था।
श्दादाजी-पायलागूश्
कहता हुआ वह उसके पैरों तक झुक आया था। उसने उसे उठाते हुए अपने सीने से लगा लिया
था। उसे सीने से चिपकाते हुए उसे लगा, ममता का एक सोता अंदर बह निकला है।
भाव-विह्वल होते हुए उसके नेत्र सजल हो उठे थे।
गोपाल
ने उसके हाथ से लिफाफा ले लिया और ओटले पर बैठते हुए उसे खोलने लगा। वह भी उससे
सटकर बैठ गया। विस्फारित नजरों से वह उसे लिफाफा खोलते देखते रहा। अपनी सारी
शक्तियों को समेटकर वह अपना ध्यान वहॉं केन्द्रित करने लगा था। पत्र की तहें ठीक
करते हुए अब वह पत्र पढने लगा था।
पिताजीे...
पिताजी सुनते ही लगा कि किसी ने
मिश्री घोलकर उसके कानों में उडेल दिया हो। उसकी देह गन्ने की सी मीठी होने लगी
थी। उसे ऐसा भी लगने लगा था कि दिनेश सामने प्रत्यक्ष रूप से बैठकर बातें कर रहा
हो।
आनंदपूर्वक
हूॅं। ऑफिस की व्यस्तताओं की वजह से पत्र लिखने में काफी विलंब हुआ। पत्र न मिलने
से आपको कितनी मानसिक पीडाओं के बीच से गुजरना पडा होगा, आपपर कैसी, क्या बीती होगी! इस दर्द का मुझे
अहसास है। कृपया माफ करने की कृपा करें।
पिताजी...
मैंने कितनी ही बार आपसे विनती की है कि आप यहॉं आकर हमारे साथ रहें। आपको लेकर
मैं अक्सर चिंताओं से घिरा रहता हूॅं। आप गॉंव में निपट अकेले रहते हैं। आपको कहीं
कुछ हो गया तो मैं सहन नहीं कर पाउंगा, मेरी भी आखिर कोई जवाबदारी है आपके
प्रति। आप भलीभॉंति जानते ही हैं कि दफ्तर से बार-बार छुट्टियॉं लेकर मैं गॉंव
नहीं आ सकता। आप आना नहीं चाहते। मैं बार-बार नहीं आ सकता। ऐसे में कैसे काम चलेगा।
आप के न आ सकने का कारण मैं जानता हूॅं। आप खेती-बाडी, मकान और मवेशियों की वजह से वहॉं
फॅंसे रहते हैं। मैं पूर्व में भी निवेदन कर चुका हूॅं कि इन सबको बेच डालिए।
अच्छी-खासी रकम मिल जाएगी। हम या तो यहॉं बना-बनाया मकान खरीद सकते हैं अथवा प्लॉट
लेकर मकान बनवा सकते हैं। आप-हम-सब साथ रहेंगे। आपको चिंटू का भी साथ मिल जायेगा।
वह भी दादाजी-दादाजी की रट लगाए रहता है, उसे आपका साथ मिल जायेगा। आप ही तो
कहते हैं ष्मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है।ष्
अपने
किसी निजी काम से गोविंद शहर आया था। मुझसे उसकी मुलाकात हुई थी। मैंने ही पहल
करते हुए उससे कहा था कि कोई अच्छा-सा ग्राहक बताए। खेत-बाडी न बेचने की वह भी कह
रहा था। मेरी ही जिद देखकर वह सभी कुछ खरीदने को तैयार हो पाया है। वह यह भी कह
रहा था कि तय कीमत के अलावा भी वह पॉंच-पच्चीस ज्यादा देने को तैयार है। वह यह भी
कह रहा था। घर की चीज घर में ही रहेगी।
फैसला
अब आपको करना है। इतना अच्छा क्रेता कहॉं मिलेगा। आप अपनी सहमति-असहमति के बारे
में लिख भेजें। मैं समय पर आ जाउंगा ताकि रजिस्ट्री वगैरह करा ली जाये।
शेष
शुभ
आपका
दिनेश
एक-एक
शब्द वह ध्यानपूर्वक सुन रहा था। खेत-बाडी-घर बेच देने की बात सुनते ही वह बमक गया
था। उसके चेहरे पर क्रोध की परछाईयॉं छाने लगी थी। वह तनाव में घिरने लगा था। उसकी
ऑंख क्रोधाग्नि में भड़कने लगी थी। वह दॉंत भी पीसने लगा था। उसे ऐसा भी लगा कि
असंख्य बर्र मक्खियों ने उस पर अचानक धावा बोल दिया है। पूरे शरीर में दंश के
निशान उभर आए हैं। शब्द अंदर उतरकर विस्फोट करने लगे थे। अंदर सब क्षत-विक्षत था।
वह तमतमाकर उठ खड़ा हुआ। गोपाल के हाथ से लगभग पत्र छीनते हुए उसने उसके
टुकड़े-टुकड़े कर दिये और हवा में उछालते हुए घर की ओर लौट पड़ा।
गोपाल
ने संभवतः आज पहली बार दद्दा को इस तरह भड़कते देखा था। दद्दा का रोद्ररूप देखकर वह
घबरा सा गया था। एक डर मन की गहराईयों तक उतर आया था, विस्फारित नजरों से वह उसे जाता देखता
रहा।
घर
आकर वह कटे हुए लाठ के लट्ठे की तरह बिस्तर पर गिर पड़ा था। वह आवेश में उबल रहा
था। उसका दिमाग अब भी भिन्ना रहा था। दिनेश की लिखी बातें रह-रह कर याद आती। शब्द
कलेजे को छलनी कर रहे थे। इतना होने के बावजूद उसकी सोचने-समझने की बुद्धि बराबर
काम कर रही थी। उसे दिनेश की बुद्धि पर तरस आने लगा था। वह सोच रहा था ष्दिनेश अभी
बच्चा है, अकल का कच्चा है। तभी तो वह एैसी-वैसी बातें सोच पाया। उसने कैसे
अनुमान लगा लिया कि दद्दा ऐसा कुछ कर सकता है। निश्चित ही गोविन्द ने उसे भड़काया
होगा। वह किसी अन्य काम से शहर नहीं गया था बल्कि वह अपने मनोरथ लेकर दिनेश से
मिला होगा। जब वह अपना दांव दद्दा पर नहीं लगा पाया तो उसने दिनेश को अपना मोहरा बनाया
और वह बेवकूफ उसके झॉंसे में आ गया।
गोविन्द
पल्ले दर्जे का लंपट है, बदमाश है, धूर्त है, चालबाज है, हरामी है। आये दिन वह गॉंव में भी कोई
न कोई बखेड़ा करता रहता है। प्रपंच रचना उसकी फितरत है। उसकी गिद्ध दृष्टि हमेशा
दूसरों की जायजाद पर गड़ी ही रहती है। दाना डालकर तमाशा देखने की उसकी आदत है। साला
हरामी, हरामखोर, बदमाश। कुत्ते का पिल्ला और भी न जाने कितनी ही गालियॉं वह बुदबुदाते
हुए देता रहा।
गोविन्द
का नाम जुबान पर आते ही लगा-मुॅंह का स्वाद कसैला-कड़ुआ हो आया है। उसका जी मिचलाने
लगा था। आक-थू करते हुए उसने गला साफ किया और खेतों की ओर बढ़ चला था।
हरी-भरी, लहलहाती फसलों को देखकर उसका चेहरा
कमल की भॉंति खिलने लगा था। ऑंखों में ठंडक भरने लगी थी। शीतल हवा के झोंकों ने
बदन से लिपटते हुए शीतलता की लेपन चढ़ दिया था। तपते बदन को राहत मिलने लगी थी।
शरीर पर उभर आये दंश के निशान मिटने लगे थे।
खेत
की मेढ़ों से चलते हुए वह वृक्ष की टहनियॉं को हाथ में लेकर हिलाता चलता मानो वह
अपने मित्र से हाथ मिला रहा हो। कभी वह पेड़ों के तनों पर अपनी हथेली से हल्की-सी
थाप देता। मानो वह उकी पीठ सहला रहा हो, ऐसा करते हुए वह प्रसन्नता से भरने
लगा था। ऐसा कुछ करते हुए उसने अपने पिता को देखा था। बाल सुलभ जिज्ञासा के चल
उसने पूछा था कि वे ऐसा क्यों करते हैं? प्रश्न सुनकर पिता गंभीर हो गये थे।
वे आकाश की ओर सर उठाकर देखने लगे थे। शायद आकाश में फैले शब्दों के संजाल समेटने
की कोशिश कर रहे थे।
देर
तक मौन रहने के बाद वे बोल पाए थे। शब्दों के गहन-गंभीर शब्दार्थ छिपे हुए थे।
शब्द क्लिष्ट नहीं थे। सीधे-सादे शब्द थे। सरल और आसान, जिसे आसानी से समझा जा सके। इतने आसान
कि अल्पज्ञ भी समझ ले। उन्होंने जो कुछ भी कहा, सुनकर आश्चर्य एवं कौतूहल होना
स्वाभाविक था। उनके कहने का अंदाज कुछ-कुछ दार्शनिक की तरह था। कम शब्दों में काफी
कुछ कह गए थे। उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए बतलाना शुरू किया।
जानते
हो मन्नू...! ईश्वर ने धरती की उत्पत्ति के ठीक बाद पेड़-पौधे लगाए। फिर असंख्य
जीव-जन्तु पैदा किए। बादल-बिजली-पानी वे पहले ही बना चुके थे। ईश्वर जानते थे कि
कितना भू-भाग छोड़ा जाए कितना नहीं। उन्होंने एक भाग धरती, तीन भाग पानी भर दिया ताकि किसी
जीव-जन्तु को पानी की कमी न पड़ जाए। धरती का खूब साज-सिंगार करने के बाद उन्होंने
मानव की उत्पत्ति की।
ईश्वर
जानते थे मनुष्य की फितरत को और उसकी नेक-नियति को भी। दिमाग का भरपूर उपयोग करने
वाला वह पहला प्राणी था। ईश्वर यह भी जानते थे कि एक दिन वह धरती में छेद करके
पाताल तक पहुॅंचेगा। समुद्र को चीर कर वह नागलोक और आसमान में सुराख करके वह
स्वर्गलोक तक आ धमकेगा और उसे ही धता बतलाने लगेगा। जहॉं एक ओर वह साइंस और
टेक्नालॉजी में परचम लहराकर अपनी बुद्धि कौशल्य से नयी-नयी इबारतें लिखेगा तो वहीं
एक दिन वह धरती के विनाश का कारण भी बनेगा।
जिस
धरती को ईश्वर ने स्वयं अपने हाथों से दुल्हन की तरह सजाया-संवारा वह भला धरती का
विध्वंश होते कैसे देख सकता था। ईश्वर की फिर अपनी भी मजबूरी थी। यदि वह आदमी की
उत्पत्ति नहीं करता तो कौन बताता ईश्वर कैसा है। उसका स्वरूप कैसा है। ईश्वर के मन
में भी मानव को लेकर कुछ लालसायें थीं। सारी क्रियाशीलता के गुण तो उसने केवल
मनुष्य में ही डाले थे। ईश्वर की मजबूरी कहें अथवा कुछ भी कह लें। उसे आदमी को
धरती पर भेजने का निर्णय लेना ही पड़ा था।
जानते
हो मन्नू! इन्हीं पेड़-पौधों ने आदमजात को खाने को मीठे-मीठे फल खाने को दिए तो वही
तन ढंकने को अपनी खाल। इन्हीं पेड़ों की छाल पहिनकर तो वह सभ्य कहला पाया। अपनी
नंगाई ढक पाया। ये बात अलग है कि आदमी ने बदले में इन्हें क्या दिया। आज वह
निर्ममता से उनके विनाश में जुटा हुआ है। सच मानो मन्नू। ये ही असली धरती-पुत्र
है। ये एक पल के लिए भी धरती का साथ नहीं छोड़ते। वृक्षों को ऋषि भी कहा गया है।
ऋषि सदा से ही कुछ न कुछ देते आए हैं। भले ही मनुष्य इनकी कितनी ही प्रताड़ना क्यों
न करें।
मन्नू....!
एक पते की बात और सुनो। आदमजात का कोई भी उत्सव हो। तीज -त्यौहार हों, बिना वृक्ष अथवा वृक्षों की प्रजाति
के उपस्थिति के संपन्न नहीं होते, यहॉं तक आदमी जब प्राण त्यागता है तो वृक्ष ही
उसका साथी साबित होता है, वह भी उसके तन के साथ जलता हुआ अपना अस्तित्व
मिटा देता है।
आदमजात
जब प्रसन्नता से इनसे मिलता है तो ये बेहद खुश हो जाते हैं, वे भी प्रसन्नता से नाच उठते हैं। वे
इठलाने लगते हैं। कोई उन्हें गले लगाए अथवा टहनी पकड़कर हिलाऐं सो ये प्रसन्न होने
लगते हैं। हवा इनसे मिलकर सारी प्रसन्नता दूर-दूर तक फैला देती है। पूरा वातावरण
ही प्रसन्नता से भर उठता है। यदि इन्हें क्रोध में धारदार हथियार दिखलाओ तो सिहर
उठते हैं। इन्हें भी भय सताने लगता है। मेरे पिता ने केवल इतना ही समझाया था।
उसमें प्रेम का दर्शन छिपा हुआ है।
फिर
धरती। धरती तो मॉं होती है, हम लोगों की । बिना मॉं के बच्चों की कल्पना तक
नहीं की जा सकती। वह अपनी जमीन को एक निष्प्राण टुकड़ा नहीं मानता। जितनी उसके पास
है वह उसे सम्पूर्ण रूप में मॉं ही मानता आया है। वह अपनी मॉं को बेचने की कैसे
सोच सकता है। एक पुत्र अपनी मॉं को कैसे बेच सकता है। उसे क्या अधिकार है कि वह
ऐसा कर सके। इसी धरती पर, इसी जमीन पर उसका वंश-वृक्ष विस्तार लेता आया है।
दस पीढ़ी, बीस पीढ़ी अथवा इससे कुछ ज्यादा। वह नहीं जानता। उसे अपनी पिछली सात-आठ
पीढ़ी के बुजुर्गों के नाम कण्ठस्थ याद हैं। वह कदापि अपनी जड़ों से नहीं कटना
चाहता। जड़ों से कटने का परिणाम क्या हो सकता है, वह यह भली-भॉंति जानता है। वह किसी भी
कीमत पर अपनी जड़ें छोड़कर कहीं नहीं जाएगा और न ही जमीन किसी और को बेचेगा। वह
गोविन्द के मिशन को सफल नहीं होने देगा। कदापि नहीं।
उसने
खेत से अंजुली भर मिट्टी उठायी। अपने माथे से लगाया। ऐसा करते हुए वह भावुक हो उठा
था। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे थे। अपनी मॉं के प्रति उमड़ आयी प्रेम की सरिता
उसकी समूची देह में हरहराकर विस्तार लेने लगी।
मनोहर
को अपनी भूल का अहसास होने लगा था। उसे याद आया। उसे कभी दिनेश को इस रहस्य से
परिचित नहीं करवाया। दिनेश ने भी कभी कुछ पूछा ही नहीं। वह रह भी कहॉं पाया। भले
ही वह पूछ न पाया हो। यह उसका कर्तव्य बनता है कि वह उसे बतलाए। एक पीढ़ी, आने वाली पीढ़ी को बताते चले यह क्रम
बना ही रहना चाहिए।
वह
दिनेश को समझायेगा कि वह नौकरी छोड़कर चला आए। क्या रखा है शहर में। भीड़भाड़, चीखते-चिल्लाते, भागते-शोरमचाते वाहन। शोर-शराबा। यही
तो है शहर में। वहॉं प्राणदायक वायु कहॉं! सॉंस लेना भी मुश्किल। रहने को
तंग-अंधेरी खोलियॉं, जहॉं चार लोग भी न बैठ सके। खाने-पीने की सभी चीजें मिलावटी। पग-पग पर
डेरा डाले बैठी मौत। जन-जीवन को निगलने के लिए तत्पर बैठी है।
सुरसा
की तरह बदन फैलाते जा रहे शहरों को सुनकर वह हतप्रभ था। जब से पास वाले शहर ने
अपना विस्तार लेना शुरू किया है, तब से उसने गॉंवों की खुशहाल जिंदगी को निगलना
शुरू कर दिया है। गॉंवों से पढ़े-लिखे नवयुवक मेहनत मजदूर-मिस्त्रियों को शहर के
आकर्षण ने गॉंव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। गॉंवों में बचे रह गये हैं वे लोग जो
खेती-बाड़ी छोड़कर नहीं जा सकते, वे लोग जो अपाहिज हैं, लाचार हैं, बीमार हैं। वे ही बचे रह गये हैं, बाकी सभी को शहर ने अपने में समेट
लिया है।
उसे
गॉंधीजी की याद हो आयी। गॉंधीजी कभी इसी गॉंव में आये थे। जनसभा को संबोधित करते
हुए उन्होंने कभी कहा था। गॉंवों में ही हिन्दुस्तान बसता है। अतः सरकार को चाहिए
कि वह सारी योजनाऐं गॉंव से ही बननी चाहिए। पहिले गॉंवों का विकास हो, तब जाकर समग्र देश खुशहाल हो सकेगा।
आजादी के बाद गॉंधी बाबा की बात जैसे भुला ही दी गई। शहर, नगरों में और नगर-महानगरों में
विस्तार लेते चले गए। गॉंव कंगले और उपेक्षित होते चले गए।
उसे
मालूम है, दिनेश की कितनी पगार मिलती है। वह यह भी जानता है कि सामान्य परिवार
को जीवन-यापन करन के लिए कितने रूपयों की जरूरत पड़ती है। वह यह भी जानता है कि उसे
माह दो माह अथवा चार माह में कुछ रकम भी भेजनी पड़ती है। तब जाकर शहर का खर्च उठा
पाता है। वह दिनेश को समझाएगा और बतलाएगा भी कि वह उतनी राशि तो नौकरों में बॉंट
देता है। फिर क्या जरूरत है शहर में रहकर समय बरबाद करने की। अगर वह एक नौजवान को
समझाने में सफल हो गया तो अपने आपको धन्य मानेगा। वह गर्व से यह तो कह सकेगा कि
बाबा को वह भले ही सम्पूर्ण रूप से नहीं भी जी पाया तो क्या हुआ, एक भटके हुए आदमी को रास्ते पर ला तो
सका है।
विचारों
की श्रृंखला रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसने देखा। सूरज अस्ताचल की ओर बहा
चला जा रहा है। देखते ही देखते सुरमई अंधियारा गहराने लगा था। जड़-चेतन सब एकाकार
होने लगे थे।
बैलों
के गले में बंॅधी घण्टियों के मद्दम स्वर उसके कानों से आकर टकराने लगे थे। उसने
अनुमान लगाया कि पड़ोसी किसान घर लौट रहा होगा। कौन होगा? वह यह नहीं जानता।
घण्टियों
के स्वर अब स्पष्ट हो चले थे पास से गुजरने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि गोविंद
ही था।
मेढ़
पर बैठकर उसने टेर लगायी ष्कौन गोविन्दष्?
ष्हॉं
दद्दा मैं गोविन्द ही हूॅं।ष्
ष्आज
बड़ी देर कर दी तैने। जरा एक बात तो सुन। मइने सुनौ हों... तू खेत बारी सबै कुछ
बेचन बारो है। का कीमत धरी है तैने। कीमत जो भी धरो होवे, वो से पच्चीस-पचास जादा दूंगो। फिर घर
की चीज घरई में रहनी बी चाहिये, जा में भलाई भी है।ष्
गोविन्द
को उसने माकूल जवाब दे दिया था। गोविन्द को मौन पाकर वह मुस्कुरा उठा था। गोविन्द
के पास कोई जवाब नहीं था। रह भी कहॉं सकता था। बिना प्रत्युत्तर दिये वहॉं से खिसक
जाना ही श्रेयस्कर लगा था उसको। सुना-अनसुना करते हुए वह तेजी से आगे बढ़ गया था।
थोड़ी
देर के बाद। गहन अंधकार के गर्भ को चीरता हुआ चॉंद, आकाश-पटल पर चमचमाने लगा था।
बेपर आवाजें
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी
गोवर्धन यादव
सूरज के उदय होने के साथ ही माहौल
गरमाने लगता। जैसे-जैसे सूरज उपर उठता, पारा भी उॅंचाइयॉं छूने लगता और दोपहर
होते ही आसमान से आग बरसने लगती। सांय-सांय, के सायरन बजाती हवा, पुलिसिया अंदाज में सड़कों-गली-कूचों
में गश्त लगाने लगती। घरों और दुकानों के पट बंद हो जाते। लोग घरों में दुबके
रहते। जानवर, दीवालों की ओट ले लेते अथवा वृक्षों की छॉंव तलाष कर ठहर जाते। वाहनों
के काफिले, थम से जाते। सारा नजारा देखकर ऐसा लगता कि शहर में कर्फ्यू लगा दिया
गया हो।
सूरज
शहर का माहौल बिगाड़ दे, इसके पूर्व हरीश अपने सुबह के काम निपटाकर
कार्यालय जा पहुॅंचता है। ऑफिस का वर्किंग-अवर ग्यारह बजे से शुरू होता है और इस
समय सिवाय चौकीदार के वहॉं कोई भी नहीं होता।
चौकीदार
उसे आया देख मुस्कुराता है और अदब के साथ सलाम लेता है। वह भी होले से मुस्कुराता
है और सलाम के जवाब में नमस्कार कहता है और अपने कैबिन में जा समाता है। पूरा
कार्यालय एअर-कंडिशन्ड है। वह या तो अपना पेन्डिंग कार्य निपटाने लगता है या फिर
ड्राज से कोई साहित्यिक-पत्रिका निकालकर पढ़ने बैठ जाता है।
हरीश
को यहॉं आए हुए, एक बरस से उपर हो चुका है और वह अब तक अपने पड़ोसियों से खास जान-पहचान
नहीं बना पाया है। उसने पहल करते हुएा अपने पड़ोसी से बात करना चाहा था। नतीजा सिफर
निकला। उसे वह देर तक अजनबियों की तरह घूरता रहा फिर बुरा सा मुॅंह बनाते हुए अपने
दड़बे में जा घुसा। उसकी इस हरकत पर उसे क्रोध आया। ष्बड़ा अजीब आदमी हैष् मन ही मन
बुदबुदाते रह गया था वह। उसके हाथ जुड़े के जुड़े रह गए थे।
उसके
कार्यालय का भी लगभग वही हाल था। हाय-हैलो के अलावा बात आगे बढ़ नहीं पायी थी। वह
यह सोचकर चुप हो जाता कि शायद इस शहर का, कुछ ऐसा ही दस्तूर होगा।
उसे
अपने गॉंव की याद हो आती। गॉंव की याद आते ही उसका मन-मयूर थिरक उठता और वह यादों
में खोता चला जाता।
उॅंची-नीची
पहाड़ियों के मध्य, कमल-सा खिला एक गॉंव। गॉंव के चारों तरफ फैली सघन अमराइयॉं। पेड़ों से
झरती ठंडी-ठंडी हवाएॅं, कल-कल, छल-छल, के स्वर निनादिन करती, पहाड़ों से उतर कर बहती अल्हड़ नदी।
लम्बे-चौड़े खेत। खेतों में लहलहाती फसलें। आसमान के सुराख से फूटती रंग-बिरंगी
रोशनी। पेड़ों की शाखाओं पर धमा-चौकड़ी मचाते शाखा-मृग। चिंचियाती चिड़ियों का समूह।
हर छोटी-बड़ी चीजों में भरे होते जादुई रंग। नारी कण्ठों में इतनी लोच होती कि कोयल
भी शरमा जायें। चारों तरफ से मानों सपनों की बरसात होती रहती। तितलियों सा फुदकता
उसका मन, कहीं भी एक जगह ठहरना नहीं चाहता।
घर
में मॉं-पिताजी है। दो छोटे-भाई बहन है। छोटे से घर में मानो स्वर्ग सिमट आया हो।
मॉं-बाप का प्यार और आशीर्वाद पाकर वह निहाल हो उठता। गॉंव में जितने भी घर हैं, वे सारे की सारे उसके अपने हैं। किसी
में मामा-मामी हैं। किसी में चाचा-चाची। किसी में फूफा-फूफी। किसी में भाई-भौजाई
रहते हैं। गफूर चच्चा तो जैसे उस पर जान ही छिड़कते थे।
बाबा
रामदीन को वह अक्सर यह कहते हुए सुनता था। श्जननी-जन्मभूमिष्च स्वर्गादपि गरीयसीश्
और भी न जाने क्या-क्या। ष्शब्दों में गहरे अर्थ भरे होते। सुनने में अच्छे तो
लगते थे लेकिन उनका अर्थ वह उस समय समझ नहीं पाया था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया
और किताबों से जुड़ता गया, उन बातों का अर्थ, उनका मर्म, उनकी गहराईयों से परिचित होता चला
गया। सच ही कहा करते थे बाबा श्गॉंवों में स्वर्ग बसता है।श्
गॉंव
में रहकर उसने मैट्रिक की परीक्षा पास की और पास वाले शहर से कॉलेज की पढ़ाई। उसने
कभी सपने में नहीं सोचा था कि उसे पढ़-लिखकर बित्तेभर पेट के गढ्ढे को भरने के लिए
दूसरे शहर भी जाना पड़ सकता है।
विकास
की अचानक आयी ऑंधी ने गॉंव की गॉंव उजाड़ दिये। गॉंवों में अब बूढ़े और अपाहिजों के
अलावा कोई नहीं रहता। वे लोग रहते हैं जो खेती-बाड़ी से जुड़ें हैं या फिर निठल्ले।
विकास की अवधारणा से, गॉंव रहने लायक नहीं बचे और शहर बसने लायक।
गॉंव
की मिट्टी की सोंधी- सोंधी महक और अपने स्वजनों-परिजनों की याद आते ही उसकी देह
गन्ने की सी मीठी होने लगी थी।
गुजरे
हुए दिनों की पगडंडियों पर वह देर तक चहल-कदमी करता रहा और शीघ्र ही अतीत की
भूल-भुलैया से वर्तमान में लौट आया था।
ऑफिस
में बैठे-बैठे उसे अपने मित्र जगदीश की याद हो आयी। उसकी खोजी नजरें, ऑफिस की खिड़की के उस पार उतर कर, उसे खोजने का उपक्रम करने लगती।
उस
दिन का दिन, यादगार दिन था उसके लिए। जब वह इस शहर में, पहली बार आया था, तो उसने एक लॉज को अपना अस्थायी
ठिकाना बनाया था। फिर उसकी जिंदगी, एक बने बनाए ढर्रे पर चल निकली थी। श्होटल में
खाना और मस्जिद में सोनाश् जैसे मुहावरे का अर्थ, अब उसकी समझ में आया था।
शीघ्र
ही वह अपने एकाकी जीवन से उबने सा लगा था। उसे एक मित्र की तलाश थी। एक ऐसा मित्र
जिससे वह अपने मन की बात कह सके और अपने सुख-दुःख बॉंट सके। शीघ्र ही उसकी खोज
पूरी हुई। जगदीश को मित्र रूप में पाकर वह बेहद खुश हुआ था।
जगदीश
की जिन्दा-दिली, उसके बात करने का अंदाज, ओठों पर खेलती-ठिठककर ठहर जाती हॅंसी, ये सब देखकर वह बेहद प्रभावित हुआ था
और उसने मित्रता स्थाति करने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया था। जगदीश आज उसका मित्र ही
नहीं अपितु भाई से बढ़कर है।
जगदीश
ने ही बताया था कि यह शहर सहसा किसी पर विश्वास नहीं करता। विश्वास करने की इसने
बड़ी-बड़ी कीमतें चुकाई है और जब से विश्वास अर्जित हो जाता है, तो वह सर ऑंखों पर बिठाने में पीछे
नहीं रहता।
जगदीश
के कहने पर उसने, लॉज की चौहद्दी छोड़कर, एक मकान किराये पर उठा लिया था तो वह किराये का
मकान, जिसे वह अपना तो कह ही सकता था।
घर-गृहस्थी
की चीजें जोड़ी जाने लगी थी। अब वह घर पर ही खाना पकाने लगा था। शुरू में खाना
पकाकर खाने में मजा तो आ रहा था, लेकिन जल्दी ही उसका मन उचाट सा गया। बहुत सारा
समय, खाना पकाने, खाने और बर्तन मलने में जाया हो जाता
था। उसे पढ़ने का बेहद शौक था और वह उसके लिए समय नहीं निकाल पा रहा था। अंततोगत्वा
उसे फिर होटलों की शरण में जाना पड़ा और शीघ्र ही वह पेट का मरीज बन बैठा।
जगदीश ने सलाह दी कि वह एक खाना पकाने
वाली महाराजन रख लें। उसे सुबह-शाम ताजा खाना मिलेगा और घर की समुचित साफ-सफाई भी
होती रहेगी। सुझाव अच्छा था लेकिन वह उसे तत्काल क्रियान्वित करने के पक्ष में
नहीं था। वह एक लम्बे अरसे से घर नहीं जा पाया था। उसकी दिली इच्छा थी कि वह एक
बार घर हो आए और अपने नवजात पुत्र को देखता भी आए।
कार्यालय
सप्ताह में पॉंच दिन लगता था। सोम व मंगल की छुट्टियॉं थी। उसने एडवांस में तीन
दिन के आकस्मिक अवकाश के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया था और रेल्वे से सीट भी
आरक्षित करवा ली थी।
निर्धारित
समय से पूर्व वह अपने बॉस के चेम्बर में जा पहुॅंचा और छुट्टियॉं प्रदान करने की
विनती करने लगा। बॉस ने उसका निवेदन ठुकराते हुए, लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया। श्हरीश इस
समय मैं तुम्हें छुट्टी नहीं दे सकता। तुम्हें मालूम ही है कि आधे से ज्यादा स्टॉफ
छुटटी पर है। कोई मेडिकल पर है तो कुछ के यहॉं शादी-ब्याह सम्पन्न होने हैं। ऐसे
क्रिटिकल पोजीशन में छुट्टी नहीं दी जा सकती। जैसे ही ऑफिस की पोजीशन नार्मल होती
है, तुम चले जाना।श्
बात
सुनकर उसका मन कसैला हो उठा था। वह तर्क और कुतर्क में फॅंसना नहीं चाहता था।
जानता था कि इससे घातक परिणाम ही हो सकते हैं। वह मन मसोसकर रह गया था। फिर उसका
घर भी इतना दूर था कि वह चार दिन में लौटकर नहीं आ सकता था।
गरमी
अपने चरम पर थी और उसे हर हाल में, घर पर ही रहना था। घर में निठल्ले बैठे रहने की
अपेक्षा अच्छे-अच्छे नॉवल पढ़ना, उसे ज्यादा श्रेयस्कर लगा था। उसने ऑफिस की
लायब्रेरी से तीन किताबें आबंटित करा ली थी। उसमें एक थी कमलेश्वर की श्कितने
पाकिस्तानश् मन्नु भंडारी की श्मैं हार गईश् औ तीसरी मैत्रेत्री पुष्पा की श्अल्मा
कबूतरीश्। उसे अपनी पढ़ाकू-षक्ति पर पूरा भरोसा था कि वह चार दिन में तीनों किताबें
पढ़ लेगा।
साहित्य जगत के लब्धप्रतिष्ठ, बहुआयामी सृजनशील रचनाकार, पत्रकार, लेखक कमलेश्वर के उपन्यास की
प्रसिद्धि के बारे में उसने काफी कुछ सुन रखा था। लेकिन यह उसका अपना दुर्भाग्य था
कि वह किताब खरीद नहीं पाया था। उपन्यास हाथों-हाथ बिक रहा था। उसे पढ़ना चाहने
वालों के सिर पर जुनून इस कदर हावी था कि अनुप्लब्धता की दशा में फोटो-प्रतियॉं
प्राप्त कर अपनी मानसिक भूख मिटा रहे थे और जैसे ही उसकी नजर बुक सेल्फ में रखे
उपन्यास पर पड़ी, बिना देरी किए उसने उसे बुक करवा लिया था।
किताब
हाथ लगते ही उसका सारा तनाव दूर होने लगा था।
घर
आकर उसने अपने कपड़े बदले। गर्मी के मारे बुरा हाल था। पसीने की चिपचिपाहट और
दुर्गंध से और भी बुरा हाल था और वह अब नहाना चाहता था। उसने शॉवर ऑन किया और देर
तक उसके नीचे खड़ा रहा। हालॉंकि पानी में उतनी ठंडक नहीं थी, जितनी कि होनी चाहिए थी। बावजूद इसके
उसे अच्छा लग रहा था।
यहॉं-वहॉं
समय न गॅंवाते हुए उसने उपन्यास उठा लिया।
कमलेश्वर
की विलक्षण लेखनी का जादू, उस पर छाने लगा। रूमाल से बात होते हुए अदीब तक
जा पहुॅंची थी। वह उसका परिचय नयी-नयी सभ्यता से करवा रहा था। लेखक की कलात्मक सोच, गहरी समझ पिरो देने की अद्भुत क्षमता
व नूतन प्रयोगों से वह बेहद प्रभावित हुआ था। उपन्यास पढ़ने में वह इतना खो चुका था
कि उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि गला सूख आया है और उसे पानी पीना है।
टेबिल
पर रखी पानी की बोतल उठाते समय उसकी नजरें अनायास ही दीवार घड़ी पर जा टिकी। रात के
दो बज चुके थे। पानी पीकर उसने गले को तर किया और फिर पढ़ने लगा। वह कब तक पढ़ता रहा, यह तो उसे याद नहीं, लेकिन जब उसकी नींद खुली तो उसने अपने
आप को टेबिल पर सिर टिकाए, सोता हुआ पाया था।
नींद
खुलने के साथ ही वह पलंग पर आकर लेट गया। उपन्यास में वर्णित सारे घटनाक्रम उसकी
ऑंखों के सामने, सिनेमा की रील की तरह चलायमान हो रहे थे। देर रात तक जागते रहने से
उत्पन्न होने वाला आलस्य नहीं था और न ही शरीर में ऐंठन-वैठन जैसी कोई चीज। वह
अपने आप को एकदम तरोताजा सा महसूस कर रहा था।
देर
तक यूॅं ही पड़े रहने के बाद उसे नहाना एकदम जरूरी सा लगा। उठते हुए वह बाथरूम में
जा समाया।
दोपहर
हो चुकी थी। गरमी अपने चरम पर थी। कूलर नकारा सिद्ध हो रहा था। उसने एक तौलिए को
भिगोया और पीठ पर डाल लिया। ऐसा करते हुए उसे अच्छा लग रहा था।
उपन्यास
में खोया हुआ था वह। तभी उसे मेन गेट पर होने वाली चर्र-मर्र की कर्कश आवाज सुनायी
दी। कौन हो सकता है इस वक्त? ऐसी कड़ी धूप में बाहर निकलने की किसने जुर्रत की? सोचते हुए उसके माथे पर बल पड़ने लगे
थे।
कुर्सी
पर से उठते हुए उसने खिड़की पर पड़े मोटे पर्दे को थोड़ा सा हटाया। देखा बाहर तेज धूप
थी। सड़क सूनी पड़ी थी और एक महिला गेट पार कर सीढ़ियॉं चढ़ रही थी। उसने एक हाथ से
रेलिंग पकड़ रखी थी और दूसरे से घुटने पर दबाव बनाए हुई थी।
देखते
ही वह समझ गया। आने वाला और कोई नहीं बल्कि महाराजन बाई थी, जिसके बारे में जगदीश ने उसे विस्तार
से बता दिया था। वह कुछ और सोच पाता, दरवाजे पर दस्तक की आवाज सुन, वह दरवाजा खोलने आगे बढ़ा।
दरवाजा
खुलते ही एक तेज गरम हवा के झोंके ने उसे अपनी लपेट में ले लिया। ऑंखें चुॅंधियाने
लगी। ऑंखों के सामने हथेली की ओट बनाते हुए उसने, उससे कहा- श्इतनी कड़ी धूप में आने की
क्या जरूरत थी। आना ही था तो शाम को चली आती या सुबह आ जाती। क्या तुम्हें मरने से
डर नहीं लगता?श् जल्दी...जल्दी से अंदर आ जाओ, वरना तलुओं में फफोले पड़ जाएंगे...
उसकी
आवाज में क्रोध उतर आया था। हालात ही कुछ ऐसे थे, क्रोध हो आना स्वाभाविक था। वह अपने
पर नियंत्रण नहीं रख पाया था।
भीतर
आकर वह दीवार का सहारा लेकर फस्स से नीचे बैठ गई और अपनी असामान्य हो आयी सॉंसों
को सामान्य बनाने में लग गई थी। वह भी अपनी कुर्सी पर आकर धॅंस गया। क्रोध और
विवेक, कभी भी, एक साथ, रह नहीं सकते।
एक
समय में, कोई एक ही रह सकता है। क्रोध जा चुका था और उसका विवेक लौट आया था।
उसे अब अपने कहे पर पछतावा होने लगा था।
कुर्सी
की बेक से सिर टिकाते हुए वर उपर देखने लगा। छत सपाट व भावशून्य थी। पंखा अपनी जगह
खड़ा, चकरघिन्नी काट रहा था। देर तक उसे घूरते
रहने के बाद अपनी ऑंखें मींच ली थी। शायद वह अपने मन के भीतर उतर का परिस्थितियों
का आंॅकलन करने लगा था। जगदीश के द्वारा बतलाई गई बातें उसके दिमाग में टेप की तरह
बजने लगी थी।
सुखी
परिवार था उसका अपना। शहर से लगी हुई उनकी अपनी जमीन थी। अच्छी कास्त होती थी। उन
दोनों के अलावा उनकी अपनी एक बेठी थी। बेटी सयानी हो चली थी। उन दोनों का एक ही
सपना था। बेटी के हाथ पीले हो जाए। बड़े अरमानों से वे उसका लालन-पालन, पोषण करते थे। उन्हें पता ही नहीं चला
कि कब और कितने नामालूम ढंग से दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा है।
शहर
अपना आकार बढ़ा रहा था। जमीन के दाम आसमान छू रहे थे। एक बिल्डर गिद्ध की तरह उनके
सुखों पर झपट्टा मारने के लिए अपने पर तौल रहा था। वह मुॅंह-मॉंगी कीमत देने को
तैयार था लेकिन वे अपनी जमीन बेचना ही नहीं चाहते थे। बिल्डर अब नीचता पर उतर आया
था। कभी वह खड़ी फसलों में आग लगवा देता, तो कभी उन पर हमला करवा देता। वह जब
नहीं माना तो उसकी बेटी अगवा करा दी गयी। पति इतने दारूण दुःख नहीं झेल पाया और एक
दिन... वह दुनिया से ही रूखसत हो गया। वह खून के ऑंसू बहाती, गुहार लगाती लेकिन कौन सुनने वाला था? किसको इतनी फुरसत थी। बिल्डर ने
मुखौटा लगा रखा था। एक तरफ वह उसका हितैषी दिखायी देता तो दूसरी तरफ कुचक्र चलाता
रहता था।
धोके
से कागजों पर लगाए गए अॅंगूठे के निशानों की वजह से वह बेघर करा दी गई। उसने कई
बार आत्महत्या तक का प्रयास किया लेकिन उसे जीना था हर हाल में, दुःख उठाते रहने के लिए।
वह
और ज्यादा सुन नहीं पाया था। उसने जगदीश से बात बदल देने की प्रार्थना भी की थी।
जगदीश ने उसे यह भी बतलाया था कि यदि वह मकान बदली नहीं करता, तो शायद ही वह उसे काम से बंद करता।
जिस जगह उसका अपना मकान है, वह काफी दूर है और वह इतनी दूरी तय नहीं कर सकती
थी। दोनों की अपनी मजबूरियॉं थी।
वर्तमान
में लौटते हुए उसने, उस अधेड़ महिला की ओर देखा। चेहरा भाव-शून्य व सपाट था। वक्त की मकड़ी
ने, उसके चेहरे पर सघन जाले चुन दिए थे।
उसकी ऑंखें अंदर तक धॅंसी हुई थी।
उसकी
दुर्दशा देख हरीश के दिल और दिमाग में दूर-दूर तक दुःख का एक समन्दर फैलता चला गया
और उसकी भयानक चीख चारों तरफ गूंजने लगी थी। घबराकर उसने अपनी नजरें, उसके चेहरे परसे हटा ली।
वह
उठ खड़ा हुआ। किचन में गया। फ्रिज खोला और एक लोटा पानी गटागट पी गया। पानी के कुछ
छींटे चेहरे पर मारे। ऐसा करते हुए उसे कुछ राहत सी मिलने लगी थी।
लौटकर
उसने अपनी पेंट की जेब से कुछ रूपये निकाले और उसकी झुर्रियों से भरी हथेली पर
रखते हुए कहा- श्ये कुछ पैसे हैं, इन्हें रख लो। सबसे पहले अपने लिए नयी चप्पलें
खरीदना और दो साड़ियॉं भी और कल से काम पर आ जानाश् वह इतना ही बोल पाया था।
पैसों
को उसकी हथेली पर रखते हुए, उसने गौर से देखा था। उसकी हथेलियॉं कॉंप गई थी।
शायद प्रसन्नता की कोई किरण फूटी थी उसके भीतर। ढेरों सारे आशीष देते हुए वह उठ
खड़ी हुई। उसे सुनते हुए ऐसा लगा कि उसके कलेजे के कोटर में बैठा कोई नन्हा परिंदा
चहका हो। तार-तार हो आयी साड़ी के पल्लू से ऑंसुओं को पोंछते हुए उसके हाथ जुड़ आये
थे और अब वह बाहर निकल गई थी।
हरीश
की ऑंखें, उसका पीछा कर रही थी लगातार। वह सीढियॉं उतर रही थी। गेट पार कर वह
अपने घर की ओर बढ़ चली थी। उसने एक बार पीछे पलटकर देखा। उसकी पनियानी ऑंखों में
आशा के सैकड़ों दीप झिलमिलाते दिख रहे थे।
दूसरे
दिन वह ठीक समय अपने काम पर आ गयी, उसके पैरों में नयी चप्पलें थी और उसने नयी साड़ी
भी पहन रखी थी। उसकी उदास ऑंखों में अब झिलमिल मुस्कुराहट थी।
चौके
में कोई खास सामान तो था नहीं। जो था वह एक अकेले आदमी के लिए पर्याप्त था। गैस-स्टोव्ह
पर उबले हुए दूध, चाय की मोटी परतें जमी थी, जो सूख कर बदरंग हो गई थी। जूठे बर्तन
सिंक में बेतरतीब पड़े थे और फर्श पर सिगरेट के जले-अधजले चुट्टे बिखरे पड़े थे।
चौका देखकर वह मुस्कुराए बगैर न रह सकी थी।
वह
काम में जुट गई। हरीश अपने कमरे में आ गया। उसका मन अब किताबों से जुड़ नहीं पा रहा
था। शायद उसका मन कॉंटों में उलझ गया था। उलझन इस बात को लेकर थी कि वह उसे किस
नाम से बुलाए। बाई कहकर वह एक महिला जाति की बेइज्जती नहीं करना चाहता था। उसे हर
हाल में एक महिला के सम्मान की रक्षा करना था।
उसकी
कद-काठी देखकर उसे अपनी मॉं की याद हो आयी। मॉं के उम्र की तो होगी वह भी। यही कोई
चालीस-पैंतालीस के आसपास की। सोचते हुए उसने निर्णय ले लिया था कि वह उसे अम्माजी
कहकर ही पुकारेगा।
ऐसा
निर्णय लीते हुए उसे प्रसन्नता का अनुभव हुआ था, प्रसन्न बदन वह किचन में आया। देखा, सारी चीजें करीने से जमा दी गई थी, फर्श चमचमा रहा था।
उसे
संबोधित करते हुए उसने कहा श्अम्माजी... खाना दो लोगों के लिए बनेगा, आप भी यहॉं भोजन कर लिया करना।श्
सुनते
ही उसकी ऑंखों की कोर भींग आयी थी। उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था। शायद
वह अपने बहते ऑंसू उसे नहीं दिखाना चाहती थी। खुशी के ऑंसू थे वे, जिन्हें वह पोंछना नहीं चाहती थी।
ज्यादा
देर तक वह, वहॉं खड़ा नहीं रह सका था।
दिन
पर दिन और इस तरह पूरा साल किस तरह बीत गया, पता ही नहीं चल पाया। जब वह टेलीफोन
पर बातें करता, अपनी मॉं और बाबूजी से, उसके बारे में बतलाता जरूर। उसका मित्र जगदीश भी
प्रसन्न हुआ था, यह देखकर कि उसका खोया हुआ स्वास्थ्य लौट आया है।
एक
दिन मॉं-बाबूजी, सुनीता और कनिष्क को साथ लेकर चले आए। कनिष्क पूरा एक साल का हो गया
था। वह अब शरारतें भी करने लगा था। कनिष्क को पाकर वह भी खिल सी उठी थी। एक मधुर
संगीत सा बजने लगा था उसके भीतर। घर के सारे काम निपटाकर वह कनिष्क के संग हो
लेती। उसकी शरारतों में रस लेती। कभी झूठी डॉंट भी पिलाती। अपने सीने से लिपटा
लेती। कनिष्क भी खुश था। वह भी खुश थी। एक मौसम खिल उठा था उसके भीतर। रूठे हुए
परिन्दे लौट-लौटकर आने लगे थे। उसके चेहरे का रेशा-रेशा मखमली हो उठा था और
प्राणों में मीठी सी गंध भर गयी थी।
सुनीता
के पौ-बारह हो गए थे। आराम के बहाने वह पलंग तोड़ते रहती।
पन्द्रह-बीस
दिन रहकर मॉं और बाबूजी गॉंव लौट गए। बार-बार के आग्रह के बावजूद, वे अब एक दिन भी ज्यादा ठहर जाने भी
तैयार नहीं थे। उन्हें अपने खेतों की चिंता सताने लगी थी। यह वह समय था जब खेतों
को अगली फसल के लिए तैयार करना होता है और वे इस समय को खोना नहीं चाहते थे।
मौसम
कभी एक सा नहीं रहता। एक बदलाव आ रहा था चुपके-चुपके हमारे अपने घर में। एक मनहूस
क्षण, बिल्ली की तरह दबे पॉंवों से चलता हुआ, कब हमारे घर के भीतर घुस आया, पता ही नहीं चला। छोटी-छोटी खुशियों
के तिनकों को जोड़-जोड़कर बनाया गया घोंसला, उसकी उछाल में, जमीन पर आ गिरा। घोंसले में दुबके
पखेरू, चिंचियाते हुए, फुर्र से दूर जा उड़े।
पखेरूओं
की चहचहाट की जगह अब कर्कश स्वरों ने ले ली थी। घर, एक अच्छे खासे हंगामों से भर उठा था।
कनिष्क
के गले की सोने की चैन, कहीं ढूॅंढे नहीं मिल रही थी। आरोपों की जद में
अम्माजी थी। वह भयभीत हिरणी की तरह कॉंप रही थी और सुनीता, सिंहनी सी गरज रही थी। एक गहरी सांॅझ
उसके मन में उतर आयी थी। उसके मन के ऑंगन में, चिड़ियों की चहचहाट की जगह, अब उल्लुओं की भयानक चीखों ने जगहें
बना ली थी। उसके इंकार करते रहने के बावजूद, सुनीता उससे इकरार करवाना चाहती थी।
उसके चेहरे पर एक नीला अवसाद फैलने लगा था। उसका धीरज नाम का पर्वत दरक गया था।
उसके भीतर से एक ऑंधी गुजर रही थी, जिसने आशाओं के झिलमिलाते दीपों से रोशनी छीन ली
थी।
उसकी
ऑंखों की झील में इतना पानी बचा ही कहॉं था। कितना ही पानी तो उसने अपनी प्यारी
बच्ची के गम में तथा पति के असमय मौत में रो-रोकर बहाया था। वह विक्षिप्त सी मौन
खड़ी आरोपों को झेल रही थी।
अपने
बचाव में, उसके पास शब्द नहीं थे। वह केवल इनकार की मुद्रा में अपने हाथ हिलाती
रही थी। बेगुनाह होने का इससे बड़ा और क्या सबूत हो सकता था, लेकिन सुनीता समझ पाती, तब न!
वह
एक ही रट लगाये हुए थी। श्कनिष्क पूरे दिन तो तुम्हारी गोद में चढ़ा रहता है। तुम्हें
चेन का पता होना चाहिए। जब तुमने नहीं निकाली तो क्या धरती खा गयी या आसमान ने
निगल लिया।श् वह बार-बार थाने में रपट दर्ज कराने को कहती।
वह
जितनी भी समझाईशें देता, सब व्यर्थ जातीं, उसकी क्रोधाग्नि की लपटें, उतनी ही विकराल हो उठती।
उसने पुनः समझाते हुए कहा श्सुनीता... बंद करो
अपनी बकवास। किसी पर आरोप जड़ने से पहले, ठंडे दिमाग से सोचो। घर का कोना-कोना
छान मारो। हो सकता है, यहीं कहीं पड़ी होगी। अरे... जिसने जिन्दगी भर धोके खाये हों, वह भला किसी को क्या धोका दे सकता
है।श्
सुनीता
अब उसके साथ वाक-युद्ध पर उतर आयी थी। पूरा घर युद्ध-भूमि में तब्दील हो चुका था।
युद्ध
की परिणति हमेशा से ही त्रासद और भयावह होती है, चाहे वह जिस भी पृष्ठभूमि पर लड़ा गया
हो। युद्ध के बाद की शांति किस तरह की होती है, कृष्ण और युद्धिष्ठिर से अच्छा भला
कौन जान सकता है।
सुनीता
समझाए नहीं समझ रही थी। बातें निष्प्रभावी हो रही थी। उसका गुस्सा अब सातवें आसमान
पर था। उसने दो-चार चॉंटें उसके गाल पर जड़ दिये थे।
गुस्सायी
सुनीता ने सूटकेस पैक किया और शाम की ट्रेन से घर लौट गई। नन्हा कनिष्क भौंचक्का
देख रहा था सब कुछ। उसमें इतनी समझ और सामर्थ्य कहॉं था कि वह अपनी मॉं को रोक
पाता।
सुनीता
जा चुकी थी, फिर निकट भविष्य में लौट आने के लिए, लेकिन वह जा चुकी थी, फिर कभी न लौटने के लिए।
कहॉं-कहॉं
नहीं ढूॅंढा उसने उसे। चिलचिलाती धूप और उमस भरे माहौल में वह बदहवास भटकता रहा था
लेकिन वह नहीं मिली, तो फिर नहीं मिली।
उसे
अब हर हाल में थाने में रपट दर्ज करवाना ही था। उसके अपने मोबाईल में कनिष्क के
साथ वाली कई तस्वीरें कैद थी। एक गुमशुदा को तलाशने के लिए, फोटो सहायक सिद्ध हो सकती थी।
शाम
घिर आयी थी। अपने कॉंधों पर गहरी उदासी का लबादा डाले वह लौट रहा था और बेपर आवाजें
उसका पीछा कर रही थी लगातार।
छोटे-मोटे
नेगदस्तूर निपटाते-निपटाते, कब सुबह से शाम, फिर शाम से रात घिर आई, पता ही नहीं चल पाया, पास-पड़ोस की महिलाएॅं, अपने-अपने घरों को चलीं गईं थीं और वह
अब तक जाग रही थी।
काफी
देर तक तो वह, ओरती की दीवार से, अपनी पीठ टिकाए खड़ी रही, फिर धीरे से नीचे बैठते हुए उसने, अपने दोनों पैरों को सामने की ओर फैला
दिए थे। दोनों हाथों को कॉंधे से झुला दिया था और दीवार से सिर को टिकाते हुए, मण्डप में लटक रहीं रंग-बिरंगी
झूमर-झालरों को एकटक देखती रहीं।
दरअसल
वह नाचते-नाचते बेहद थक गई थी और अब थोड़ी देर बैठकर सुस्ताना चाहती थी।
जब
आदमी निहायत ही अकेला होता है, अक्सर ऐसे समय में वह या तो भविष्य को लेकर
सुनहरे सपने बुनने लगता है अथवा अतीत की ठहरी हुई नदी में गहरा उतरकर, उन नायाब मोतियों की तलाश करने लगता
है, जो जाने- अनजाने में उसकी मुट्ठियों
से फिसल कर जा गिरे होते हैं।
राधा
जानती है, उसका अपना अतीत कभी भी सुनहरा नहीं रहा। बहुत छोटी सी उमर में उसने
अपनी मॉं को खो दिया था। सौतेली मॉं के आने के बाद के कुछ दिनों तक तो ठीक रहा, लेकिन बाद में उसे दुत्कार, गालियॉं झिड़कियॉं और मार के अलावा कुछ
नहीं मिला। न तो वह खुलकर हॅंस सकती थी और न ही रो सकती थी। बाप के चेहरे पर लटकी
बेबसी और उदासी देखकर सहम सी जाती। उसे डर था कि कहीं वह अपने पिता को भी न खो दे।
वह चुप्पी साधे रहती। जवानी की देहलीज पर आ खड़ी हुई ही थी कि उसकी शादी एक अय्याश, बिगड़े दिल ओर और शराबी युवक से करा दी
गई।
अपने
भविष्य को लेकर वह ज्यादा उत्साहित और आशान्वित भी नहीं थी। उसे मालूम है कि आज
खुषियों के जो दो नायाब मोती मिली हैं, वे भी कम्मो भौजी की वजह से मिले हैं।
वह यह तो नहीं जानती कि उसने अपने पिछले जन्म में कभी कोई पुण्य का काम किया था।
संभव है कि अनजाने में उसने उस पर कोई अहसान कर दिया हो, तभी तो वह इस जन्म में अपना कर्जा, मय-ब्याज के उसे लौटा रही है।
वह
नहीं चाहती कि ऐसे समय में, जब खुशियॉं उसके ऑंगन में पाहुन बनकर खड़ी है, वह अपने अतीत के बारे में सोचे। श्उसे
सोचना भी नहीं चाहिए।श् वह अपने आपको समझाईश देने लगी थी।
सारी
व्यर्थ की बातों पर से ध्यान हटाते हुए वह वर्तमान में लौटने लगी थी।
शहनाईयों
की मीठी-सुरीली आवाज, ढोलक की ढम्मक-ढम, मंजीरों की खनक और औरतों के सम्मिलित स्वरों की
गूंज, उसके कानों में अनुगुंजित होने लगी थीं। गहराईयों के साथ अब वह स्वरों
के तिलिस्म में प्रवेश करने लगी थी।
सुबह
से ही उसके ऑंगन में भीड़ जुड़ने लगी थी। मण्डप छाया जाने लगा था। मण्डप के छा जाने
के बाद, एक ओर कुर्सियॉं डाल दी गई थीं। मोहल्ले के बड़े-बूढ़े कुर्सियों में
धॅंसे या तो बीड़ी का धुॅंआ उड़ा रहे थे अथवा आपस में बतिया रहे थे। बच्चे भी अपनी
धींगा-मस्ती पर उतर आए थे। कोई उस ओर से दौड़ लगाता आता और दूसरे छोर पर जा
पहुॅंचता था।
अब
खाम गड़ाए जाने का दस्तूर किया जा रहा था। खाम के गड़ने के पश्चात्, एक कलश पर दीप प्रज्जवलित कर दिया
गया। औरतों का दल खांभ के पास बैठा बन्नी गाने लगा था।
भीतर
जाकर भौजी कंचन को साथ लिवा लाई और उसे पटे पर बिठा दिया। महिलाएॅं अब बारी-बारी
से उसकी कंचन सी काया में हल्दी-चंदन का लेप चढ़ाने लगी थी।
मंगल-गीत
गाए जा रहे थे। ढोलक ढमकाई जाने लगी थी। मंजीरे खनकाए जा रहे थे। मण्डप के बाहर बैठा, बाजा बजाने वालों का दल वाद्य-यंत्र
बजाने लगा था।
शहनाईयों
की मीठी-सुरीली आवाज, ढोलक की ढम्मक-ढम, मंजीरों की खनक और महिलाओं के सम्मिलित स्वरों की
गूंज के साथ ही सारा वातावरण रसमय हो गया था। चारों तरफ उत्सव का सा माहौल था।
ढोलक
ढमकाते, बन्नी गाते, कम्मो भौजी उठ खड़ी हुई और ठुमक-ठुमककर नाचने लगी।
नाचते हुए वह चुहलबाजी करने से भी बाज नहीं आ रही थी। भौजी को नाचता देख, अब बाकी औरतें भी बारी-बारी से अपने
नृत्य-कौशल दिखाने लगी थी।
अपनी
मोहक अदाओं से सभी को रिझाने वाली भौजी ठुमकते हुए उस तक चली आई और उसका हाथ पकड़कर, महिलाओं के दल के बीच ला खड़ा कर दिया
और उसे नाचने के लिए उकसाने लगी थी। इस समय वह दूर खड़ी, सारे नेग-दस्तूरों को होता हुआ देखकर
मगन हो रही थी।
बेटी
की शादी हो अथवा बेटे की, कौन मॉं भला नाचना नहीं चाहती। उनका मन प्रसन्नता
से भर उठता है। पोर-पोर में रोमांच हो आता है। वे मतवाली हो उठती है। देह उनकी
जैसे वृंदावन बन जाती है और सॉंस-प्रवास में जैसे बॉंसुरी बज उठती है। पैर तो उनके
जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ते हैं। वे तितली बनी उड़ती-डोलती फिरती है। संतान के पैदा
होने के साथ ही, मॉंओं के मन में अरमान मचलने लगते हैं और वे उन्हें दुल्हा अथवा
दुल्हन बना देखना चाहती है। बरसों इंतजार के बाद उसके यहॉं ऐसा शुभावसर आया था। वह
सचमुच में बेहद खुश थी।
उसका
मन भी नाचने-नाचने को हो रहा था लेकिन नाच भी पायेगी अथवा नहीं, इसमें सन्देह होने लगा था। थोड़ी सी
ना-नुकर और मान-मनौवल के बाद वह नाचने लगी थी। वह तब तक नाचती रही थी, जब तक वह थककर चूर नहीं ले गई थी।
उसकी सॉंसें फूल रही थी और और कलेजा जोरों से धड़कने लगा था।
अपनी
मॉं को इस तरह नाचता और बेतहाशा खुश होता हुआ देखकर कंचन भी हतप्रभ थी। आज पहली
बार वह अपनी मॉं के बदले हुए स्वरूप को देख रही थी।
कल्पना
में सुख के बादल झमझमाकर बरस रहे थे और वह उसमें सराबोर भी हो रही थी कि ठोकों की
आवाज सुनकर वह वर्तमान में लौटने लगी थी।
रात
पारी में तैनात किसी पुलिस-कर्मी ने थाने के आहते में लटक रहे घण्टे पर चोट की थी।
उसने एक के बाद एक बारह ठोके लगाए थे।
दरवाजा
बंद कर वह भीतर आकर अपने बिस्तर पर लेट गई। वह अब थोड़ी देर सो जाना चाहती थी।
लेकिन नींद जैसे गौरैया (चिड़िया) हो गई थी। उसे पकड़ने के लिए वह अपना हाथ, आहिस्ता से बढ़ाती। हाथ उस तक पहुॅंचे, इसके पूर्व वह फुर्र से उड़ जाती थी।
वह
सोचने लगी थी। उसे नींद भी कैसे आ सकती है? वह सोना चाहे तब भी नहीं। एक मॉं, चैन की नींद कहॉं सो पाती है। अपनी
बेटियों को जवानी की देहलीज पर खड़ा देख, उनकी नींद गायब हो जाती है। उनकी
ऑंखें तो जैसे बेटियों के पीठ से ही जा चिपकती है। वे उठते-बैठते-सोते- जागते, अपनी बेटियों को पीछा करने लगती है।
वे नहीं चाहती कि उनकी बेटियॉं गलत राह पर चल पडें़। वे समय-समय पर उन्हें फिसलन
भरी राहों के बारे में बतलाना भी नहीं भूलती। वे उन्हें रीति-रिवाजों और परम्पराओं
के बारे में भी बताती चलती है। इस समय वे लड़कियों की मॉं ही नहीं बल्कि दोस्त बन जाती
है। चैन की नींद तो वे उस समय ही ले पाती हैं, जब बेटियॉं डोली में बैठकर अपने
ससुराल चली जाती है।
उसे
अनायास ही अपनी मॉं की याद ताजा हो आई। वह सोचने लगी थी- श्काश! वह जिन्दा होती तो
शायद ही उसकी दुर्गति होती।श् मॉं का चित्र अभी पूरी तरह से बन भी नहीं पाया था कि
सौतेली मॉं का रौद्ररूप उसकी ऑंखों के सामने ताण्डव करने लगा था।
विमाता
से जुड़ी उन तमाम बातों को वह एक बारगी भूल भी सकती थी लेकिन दो बातें ऐसी थीं कि
वह भूलना चाहे, तब भी भूल नहीं पाती थी।
बातों
के दौरान एक बार उसके पिता ने उसे स्कूल में दाखिला दिला देने की बात की थी। सुनते
ही वह भड़क गई थी। उसके द्वारा कहे गये एक-एक शब्द उसे आज भी अक्षरशः याद है। श्का
कही तैने? राधा को पढ़ाने है? का कर लोगे पढ़ा-लिखा के। घर-गिरस्थी के बातें
सीखन दो, जो जिनगी भर काम आवेंगे। फिर चपरासी की बेटी कलक्टर बनने से रही।श्
पिता के चेहरे पर उड़ती हवाई और डबडबाई ऑंखों को देखकर वह रो पड़ी थी।
एक
बार धोके से, उसके हाथ से कॉंच का ग्लास टूट गया था। उसके क्रोध का ज्वालामुखी फट
गया था। उसने चूल्हे में जलती लकड़ी से उसका हाथ जख्मी कर दिया था। अनायास ही उसकी
उंगलियों के पोर वहॉं जा पहुॅंचे, जख्म तो मिट गया था लेकिन दर्द आज भी उतनी ही
तीव्रता के साथ चिलक रहा था।
उसे
आज भले ही अक्षर ज्ञान नहीं है लेकिन उसने अपने जीवन की पाठशाला में पढ़ते हुए यह
जान लिया था कि मॉं का जीवित रहना बच्चे के लिए कितना महत्वपूर्ण है। उसके न रहने
से बच्चे अनाथों की तरह पलते हैं। मॉं के बगैर बच्चों के सुखी जीवन की कल्पना भी
नहीं की जा सकती।
एक
दिन ऐसा भी आया जब उसके भाग्य का सूरज एक बार डूबा तो फिर नहीं उगा। उसका पति एक
रात उसे सोता छोड़, अपनी खूबसूरत प्रेमिका के साथ भाग गया। वह कामी-लम्पट उसकी गदराई देह
से जोक की तरह तो चिपका रहता लेकिन सूरत देखते ही तिलमिला उठता था। उसने कई बार
आइने के सामने बैठकर अपनी सूरत को गौर से देखा लेकिन कहीं भी खामी नजर नहीं आई।
सीरत में तो वह एकदम फिट भी लेकिन सूरत के मामले में थोड़ा पीछे थी, बावजूद इसके उसे बदसूरत नहीं कहा जा
सकता था।
अपने
पैसों के बल पर उसने कई नाजायज संबंध भी बना लिए थे। उसने कभी भी इस बात पर न तो
अपना आक्रोश दिखाया और न ही मुॅंह खोला था। एक दिन वह रूप का रसिया उसकी कोख में
बीज डालकर चलता बना। फिर उसने दोबारा पलटकर भी नहीं देखा कि वह किन हालातों से
गुजर रही है।
असहाय
अवस्था में पड़ी वह केवल ऑंसू ही बहा सकती थी। उसने कई बार आत्महत्या करने की ठानी
लेकिन दूधमुॅंही बच्ची का चेहरा देख, वह ऐसा नहीं कर पाई।
उसकी
गदराई देह देखकर, मॉंद में छिपे भेड़िए बाहर निकल आए थे। वे उसे चीथ डालने के लिए अपनी
डरावनी सूरतें और नुकीले दॉंत दिखाने लगे थे। वह शहर ही छोड़ देना चाहती थी लेकिन
जाती भी कहॉं? उसे मालूम था कि वह जहॉं भी जाएगी, उसे भेड़िए मिलते ही रहेंगे।
संयोग
से उसकी भेंट कम्मो से हो गई। वह भी कभी इन्हीं हालातों से होकर गुजरी थी। एक दर्द
ने अपने सजातीय दर्द को पहचान लिया था। दूरियॉं नजदीकियों में बदल गई थी और
अनजानापन एक गहरे रिश्ते में।
कम्मो
जानती थी कि रास्ते में पड़े कॉंटों को किस तरह दूर किया जा सकता है। उसने कॉंधे पर
हाथ रखते हुए और ऑेखों में ऑंखें डालते हुए उससे कहा श्मैं बोली ना तेरे कु, डरने का नई, कोई हरामी का पिल्ला ऑंख दिखाए तो अपुन
के भाई का नाम बताना। बोलना... भाई से बतायेगी। वो तेरी क्या दुर्गत बनायेगा... तू
जानश् कम्मो ने उसे एक शाबर-मंत्र दे दिया था। उसने शब्दों की ताबीज बनाकर अपने
कण्ठ में धारण कर लिया था।
उस
दिन के बाद से वह किसी की भाभी है। किसी की बहन, किसी की बहू अथवा बेटी है। भाई की
छत्र-छाया में वह निर्भय जीवन जीने लगी थी। भौजी
ने जहॉं उसे जीवन जीने की लालसा जगाई थी, वहीं उसे रोजगार भी मुहैया करवा दिया
था। आज वह एक चर्चित भोजनालय की मालकिन है।
अपने
विचारों की तंद्रा में खोई राधा को नींद ने कब आपने आगोश में ले लिया, उसे पता ही नहीं चल पाया। जब वह सोकर
उठी तो एक नया सूरज आसमान में चमचमा रहा था।
छोटे-मोटे
कामों को निपटाने के अलावा जनवासे में भी समुचित व्यवस्था की जानी थी। वह नहीं
चाहती थी कि किसी भी प्रकार की कोई कसर बाकी रह जाए। हालॉंकि अभी बारात के आगमन
में काफी समय बाकी था।
स्ुबह
से ही कारीगर अपने काम को अंजाम देने में जहुट गए थे। आठ-दस घण्टों की कड़ी मेहनत
के बाद एक भव्य राजमहल खड़ा हो गया था। जगह-जगह झाड़-फानूस, रंग-बिरंगी झालरों और झूमरों को देख, उसका मृगी मन कुलाचे भरने लगा था।
शाम
घिर आई और बारात के आने का भी समय हो चला था। बाहरी व्यवस्थाओं को पूर्णता की ओर
बढ़ता देख, वह अंदर चली आई।
उसने
देखा। कंचन अपनी सखी-सहेलियों के बीच घिरी बैठी है। कोई उसके साज-सिंगार में लगी
है तो कोई उसकी हथेलियों में मेंहदी से सुन्दर-सुन्दर आकृतियॉं उकेर रही हैं। अपनी
बेटी को दुल्हन के रूप में सजा देखकर वह अपनी सुधबुध खोने लगी थी।
देर
तक टकटकी लगाए देखते रहने के बाद वह वहॉं से यह सोचकर हट गई कि कहीं उसे नजर न लग
जाए।
पटाखों
की गूंज से आकाश कॅंपाती, आधुनिक वाद्ययंत्रों की धुन पर थिरकते
युवक-युवतियों के दल के साथ बारात उसके द्वार पर खड़ी थी। सुंदर पोषाकों में लिपटी
युवतियॉं अपने सिरों पर मंगल-कलश लिए बारात के स्वागत में चल पड़ी थीं। वह भी हाथ
में कुमकुम-रोली की थाली लिए सबको साथ लेकर चल रही थीं।
द्वारचार
की पारम्परिक औपचारिकता को पूरा करते हुए अपने दामाद की उंगली पकड़कर स्टेज पर ला
बिठाया।
कंचन
अपनी सखी-सहेलियों से घिरी, हाथ में वरमाला लिए, अपनी नजरें नीची किए, लोकलाज और संकोच के साथ गजगामिनी की
सी चाल में चलते हुए आगे बढ़ रही थी।
अब
वर-वधू स्टेज पर आमने-सामने खड़े थे। हाथ में माईक लिए पण्डितजी मंगलाचरण का सस्वर
पाठ कर रहे थे। इशारा पाकर वधू ने वरमाला वर के गले में डाल दी थी। अब वर की बारी
थी। उसके वरमाला डालते ही हजारों-हजार हाथ एक साथ तालियॉं बजाने लगे थे।
वाद्य-यंत्र पूरी रफ्तार के साथ बज उठे थे। इस अनुपम व अद्भुत दृष्य को देखकर वह
गदगद हो रही थी। उसे ऐसा भी लग रहा था मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो।
तोहफा
देने और फोटो खिंचवाने को आतुर लोग स्टेज पर जाते। शान से फोटो खिंचवाते और
मुस्कुराते हुए नीचे उतर आते। बाकी के लोग भोजन पर टूट पड़े थे। चारों तरफ
गहमा-गहमी का माहौल था।
मण्डप
के नीचे अब खास-खास लोग ही रह गए थे। वे जिनका वहॉं रहना आवश्यक था और वे जो अपनी
ऑंखों से इस मंगल-काज को हेता हुआ देखना चाहते थे।
चढ़ावे
की रस्म पूरा होते ही अब भॉंवर की तैयारी की जाने लगी थी। पण्डितजी पूरी तन्मयता
के साथ मंत्रोच्चारण कर रहे थे। अपनी रौ में बोलते हुए वे बोल उठे- श्अब कन्यादान
के लिए पिता को बुलवाइये।श्
सुनते
ही वह धक से रह गई थी। कलेजा मुॅंह को आ गया था। वह सोचने लगी थी- श्पिता तो है
नहीं। जल्दबाजी में वह पण्डितजी को वास्तविकता से परिचित नहीं करा पाई थी।श्
इस
उद्घोषणा के साथ ही उसने देखा- दूर बैठा एक व्यक्ति अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और
कछुआ चाल में चलता हुआ उस ओर आने लगा था। उसकी मरियल चाल को देखकर यह कहा जा सकता
था कि वह कई दिनों से बीमार चल रहा होगा। उसे चलने में भी कष्ट हो रहा था। वह
एक-एक कदम बड़ी ही सावधानी के साथ आगे बढ़ा रहा था।
औरत
सब कुछ भूल सकती है लेकिन अपना पहला प्यार और पति को कदापि नहीं भूलती। ईश्वर ने
भेंट स्वरूप उन्हें अपनी ओर से एक अलग से ज्ञानेन्द्रिय दे रखी है जो एक ही नजर
में संभावित खतरों और अपने दुश्मनों को पहिचान लेती हैं।
उसने
पहिचानने में तनिक भी भूल नहीं की थी। वह तत्काल ही पहचान गई, आने वाला उसका ही पति है। वह लौट भी
रहा है तो पूरे पच्चीस बरस बाद।
श्वह
कैसे आ धमका? उसे किसने निमंत्रण-पत्र भेजा? उसके यहॉं आने का क्या प्रयोजन है? उसकी हिम्मत कैसे हुई यहॉं आने की? क्या वह यहॉं आकर कोई बखेड़ा तो खड़ा
करना नहीं चाहता?श् सैकड़ों प्रश्न उसके जेहन में फन उठाए, यहॉं-वहॉं डोलने लगे थे।
संभावित
खतरा देखकर जिस तरह हिरणी अपने शावकों को अपनी ओट में लेकर चौकन्नी दृष्टि से
चारों दिशाओं का मुआयना करने लगती है और अपने लम्बे कानों को खड़ा कर, आहटों को पकड़ने की कोशिश करती है। ठीक
उसी तरह वह भी चौकस हो गई थी और संभावित खतरे से बचने के लिए गहराई से सोचने लगी
थी।
ष्उसका
इस तरह अचानक प्रकट हो जाना, न तो उसके लिए शुभकारी है और न ही उसकी बच्ची के
लिए। उसे आना ही था तो बहुत पहिले आता और देखता कि वह किस तरह जी रही थीं। उसे याद
आया। कंचन अपनी तुतलाती जुबान में अपने पिता के बारे में पूछती थी। उसका इस तरह
पूछना उचित भी था। उसे अधिकार है कि वह अपने पिता के बारे में जाने। प्रश्न सुनते
ही वह उलझन के चक्रव्यूह में घिर जाती। समझ नहीं पड़ता, क्या जवाब दे। सच बतानेकी उसमें
हिम्मत नहीं थी और न ही झूठ बोलने का साहस। उसका मन पेण्डुलम की तरह दोलायमान होने
लगता था।ष्
वह
किस मुॅंह से बताती कि तेरा बाप किसी छिनाल के साथ भाग गया है, वह यह कैसे बताती कि तेरे बाप के
कितने अवैध संबंध थे। वह यह भी कैसे बताती कि तेरे बाप को जुऑं-दारू का भी चस्का
लग गया था। जानती थी वह कि उसके कोमल मन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
कंचन
उस समय छोटी थी। अकल की कच्ची थी। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी जीवन भर कड़वे-सच
को लेकर अपना जीवन धूल-धूसरित कर दे। सच को सफाई के साथ झुठलाते हुए उसने अपने
जवाब में इतना भर कहा था- ष्वे भगवान के घर चले गये हैं।ष् इतना ही कहना, उसके लिए पर्याप्त था।
तीर
की तरह अकड़कर चलने वाली उसकी देह, कमान बन गई थी। दौलत की चमक से दिपदिपाता उसका
चेहरा निस्तेज हो गया था। वह समझ गई। अपनी उन्मुक्तत, देह और रूप के बली पर जादू जगाने वाली
औरतें ऐसे आदमियों को अपने जाल में फॅंसा लेती हैं वे ठीक उस मकड़ी की तरह होती हैं
जो शिकार के फॅंसते ही उन्हें पूरी तरह से चूस जाती है। गन्ने की तरह चूसने के बाद
वे उन्हें सड़कों पर फेंक देती है। इसके साथ भी वही सब कुछ हुआ होगा, तभी तो यह वापिस आने और कन्यादान के
बहाने पुनः प्रवेश लेना चाहता है। वह ऐसी औरतों को हर हाल में दोषी भी नहीं मानती।
उसका अपना मत है कि यह कोई नई-प्रक्रिया नहीं है। यह तो लूटने वाला और लुटाने
वालों का खेल अनादिकाल से अनवरत होता चला आया है।
उसे
तत्काल उस घटना की भी याद हो आई। जब अनिरूद्ध के पिता, कंचन का संबंध तय करने के लिए उसके
यहॉं पधारे थे। वह अपनी ओर से अपनी पृष्ठभूमि के बारे में सब कुछ बतला देना चाहती
थी तो विनम्रता से उन्होंने उसके प्रस्ताव को अमान्य करते हुए कहा था- ष्वे किसी
के जातीय मामले में झॉंकना नहीं चाहते और न ही जात-पात को ही मानते हैं।ष् बातों
को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तो यह भी कहा था कि वह रूपवान-गुणवान और संस्कारित लड़की
को अपनी पुत्र-वधु बनाना चाहते हैं। कंचन सिर्फ अनिरूद्ध की ही नहीं बल्कि उनकी
अपनी भी पसंद है, फिर दोनों एक साथ काम भी करते हैं। उन्होंने यह भी वचन दिया था कि वे
कंचन को पिता की कमी महसूस नहीं होने देंगे।
उसका
दिमाक इस समय मीटर की गति से घूम रहा था। चंद मिनटों में ही उसने निर्णय ले लिया
था कि वह इसके बढ़ते कदमों को वहीं रोक देगी। वह कदापि भी नहीं चाहती थी कि वह यहॉं
आकर बखेड़ा खड़ा करे अथवा उसकी उपस्थिति को लेकर कोई और बखेड़ा खड़ा हो।
पण्डितजी...
बस पॉंच मिनट रूकिये। मैं अभी आई।
कहते
हुए वह तेज चाल चलते हुए उस तक जा पहुॅंची। अब तक वह केवल आधा ही रास्ता तय कर
पाया था।
उसने
मजबूती के साथ उसका हाथ पकड़ा और लगभग घसीटते हुए वह उसे मण्डप के बाहर ले आई।
बाहर
आते ही वह बिफर पड़ी- ष्क्यों आए हो तुम, हम मॉं-बेटी के जीवन में जहर घोलने? मैं तुम्हारा मकसद कभी पूरा नहीं होने
दूंगी। जैसे आए हो वैसे ही लौट जाओ। कहॉं थे उस समय तुम, जब हमें तुम्हारे सहारे की जरूरत थी? अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है।
वह
इस समय सिंहनी की सी गरज रही थी। बरसों से कलेजे में सुप्त पड़ा ज्वालामुखी धधकने
लगा था और लावा, शब्दों की शक्ल में ढलकर बह निकाला था।
कमजोर
होते हुए भी उसने उसका हाथ झटक दिया था और तेजी से वह वापिस मुड़ने को हुआ। उसने भी
पूरी मजबूती के साथ उसे रोकते हुए उसके गाल पर तीन-चार चांटे रसीद कर दिये। ठीक
उसी समय एक ऑटो-रिक्शा पास से गुजर रहा था। उसने उसे रोका और अंदर जबरन ठेलते हुए
ऑटो-चालक से कहा ष्इसे कहीं दूर जाकर उतार देना।ष् उसने तत्काल ऑटो-चालक के हाथ
में पचास रूपये का नोट थमा दिया था।
अपनी गर्वीली और सधी हुई चाल में चलते हुए वह
वापिस लौटने लगी थी।
वह
सचमुच में, पॉंच मिनट के भीतर लौट आई थी।
अतीत और वर्तमान के समांतर चलते हुए
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी
गोवर्धन यादव
गली-कूचों में अफवाहों की तितलियॉं उड़
रही थी। बेखौफ। कभी वे अखबारों के पन्नों में लिपटकर तो कभी खिड़की-दरवाजों की
सुराखों में से फलांगकर घरों में प्रवेश पा जाती थी।
निशा
इन सब बातों से अनजान थी। वह नहीं जानती थी कि उसके खिलाफ कौन षडयंत्र रच रहा है।
वह तो यह भी नहीं जानती थी कि उसका मकसद क्या है? वह तो अपने आप में व्यस्त थी। अपने
में खोई हुई, दीन-दुनिया से बेखबर, मीरा की तरह, अनिरूद्ध के नाम का इकतारा बजाती हुई।
अभी
पन्द्रह दिन पहले ही तो वह गोवा की ट्रिप से वापिस लौटी थी और आते ही बिस्तर से जा
लगी थी।
कॉलेज
के प्राचार्य ने उसका नाम प्रपोज करते हुए, आदेश पारित कर दिए थे कि वह लड़कियों
के ग्रुप की इंचार्ज होगी। लड़कों के ग्रुप का प्रतिनिधित्व अनिरूद्ध कर रहा था।
उसे जब इस बात की जानकारी मिली तो उसने सानुनय इस प्रस्ताव के विरूद्ध अपनी असहमति
दर्ज करा दी थी।
उसकी
सोच के केंद्र में अनिरूद्ध था। उसके प्रति बढ़ती आसक्ति और बाद में मिलने वाली
बदनामी के डर से, उसने वहॉं जाने से मना कर दिया था। पूरे पन्द्रह दिन की एक्सजर्सन
ट्रिप थी वह कॉलेज की तरफ से।
अनिरूद्ध
से उसकी पहली मुलाकात बड़ी ही अजीबो-गरीब परिस्थितियों में हुई थी। वह किसी अन्य
कॉलेज से स्थानांतरित होकर आया था, जहॉं वह स्वयं सहायक प्राध्यापक थी।
कॉमनरूम
में प्रवेश करते ही उसकी नजर अनिरूद्ध पर जा पड़ी, वह वहीं ठिठककर खड़ी हो गई। वह उस समय
स्टॉफ के अन्य सदस्यों के बीच घिरा बैठा बतिया रहा था। उसे देखते ही वह भय-मिश्रित
आश्चर्य से घिने लगी थी ष्कौन है यह नवयुवक? उसकी शक्ल तो हू-ब-हू अजय से
मिलती-जुलती है, वही नाक-नक्श, वही तराश हुआ चेहरा, शरीर-शौष्ठव, कद-काठी और बातें करने का अंदाज भी तो
मिलता-जुलता है। उसकी नीली-भूरी ऑंखें और हॅंसने का अंदाज भी तो अजय से मिलता है।
वर्तमान
में रहते हुए वह अतीत की सीढ़ियॉं उतरने लगी थी।
एम.ए.
प्रीवियस की छात्रा थी वह उन दिनां। शाम के यही कोई चार-साढ़े चार बजे रहे होंगे।
यह वह समय होता है जब परिवार के सारे सदस्य एक साथ बैठकर चाय पीते हैं। वह किचन
में चाय बनाने में व्यस्त थी। तभी मॉं ने कमरे में प्रवेश करते हुए उससे तीन
प्याली चाय और बढ़ा देने को कहा। उसने सुना-अनसुना करते हुए लापरवाही से अपनी गर्दन
को झटकते हुए अंदाजा लगाया कि पापा के दोस्त-वोस्त आ धमके होंगे। किचन से लौटते
समय मॉं यह भी कह गई थीं कि चाय के साथ कुछ खारा-मीठा और बिस्कुटें भी लेती आए।
एक
बड़ा-सा ट्रे हाथ में उठाए वह बैठक-कक्ष में पहुॅंची। वहॉं पापा के दोस्त नहीं
थे... कोई अन्य भद्र-पुरूष बैठे दिखलाई दिये। वह समझ गई। आने वाले निश्चित ही उसे
देखने आए होंगे। उसने सहज ही अंदाज लगाया था। तभी पापा के कहे शब्द याद हो आए
...जब तक तेरी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, हम शादी की बात नहीं करेंगे। पापा का
वचन याद आते ही वह आश्वस्त हो चली थी।
नजदीक
पहुॅंची ही थी कि पापा ने लगभग चहकते हुए कहा ....ये रही हमारी बिटिया निशा...और
निशा.... ये हैं मिस्टर अजय... कॉलेज में सहायक प्राध्यापक हैं और ये इनके
माता-पिता। उंगलियॉं नचाते हुए उन्होंने सभी का परिचय करवा दिया था।
ट्रे
अब भी हाथ में ही था। उसने शिष्टाचारवश अपनी गर्दन को झुकाकर सभी का अभिवादन किया।
ट्रे को सेन्टर टेबिल पर रखते हुए वह मॉं के करीब सटकर बैठ गई थी।
चाय
की प्याली बढ़ाते हुए उसने अजय को देखा, तो बस देखते ही रह गई थी वह। अब एक
अजीब किस्म की बेचैनी में घिरनेलगी थी। दिल जोरों से धड़कने लगा था। सॉंसें बेकाबू
हो गई थी। अजय की नीली-भूरी ऑंखों के समन्दर में, जो एक बार डूबी तो फिर उबर न सकी थी।
बात
पक्की हो, इससे पूर्व ही उसने अपना मंतव्य कह सुनाया कि वह आगे भी पढ़ना चाहेगी।
अजय की स्वीकृति की मुहर लग जाने के बाद, वह उसे और भी सुन्दर दिखाई देने लगा
था।
और
इस तरह वह अजय के साथ शादी के बंधन में बंॅधकर ससुराल चली आई थी।
मॉं-बाबूजी
का आशीर्वाद और अजय का प्यार पाकर वह निहाल हो गई थी। दिन सुनहरे और रात मतवाली हो
उठी थी। चारों तरफ खुशियों के बादल बरस रहे थे और वह उसमें सराबोर भी हो रही थी।
पर
ये खुशियॉं ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाई। नियति के क्रूर हाथों ने, उसके माथे पर लगे सिंदूर को बड़ी ही
बेरहमी के साथ पोंछ डाला था। वह सधवा से विधवा बना दी गई थी। फूलों की सेज, कॉंटों में बदल गई थी। उसके सपनों का
रंग-महल धूसर-कॅंटीला हो गया था और वह एक मर्मान्तक पीड़ा के दौर से गुजरने लगी थी।
मॉं
और बाबूजी का बुरा हाल था। वे विक्षिप्त से रहने लगे थे। अपने इकलौते बेटे के गम
ने उन्हें पगला सा दिया था। उनका हॅंसता-खेलता आशियाना जैसे जलकर खाक हो गया था।
अहिल्या
की सी बुत बनी निशा ने अपनी पीठ पर हल्का सा स्पर्श पाकर पीछे पलटकर देखा। वहॉं
कोई और नहीं, बाबूजी खड़े थे। उनकी शून्य में झॉंकती निस्तेज निगाहों को देखकर वह भय
के मारे कॉंपने लगी थी और अब फबक कर रो ही पड़ी थी।
देर
तक चुप्पी ओढ़े रहने के बाद उन्होंने अपना मौन तोड़ा था। बड़ी ही संजीदगी के साथ। शब्द
जैसे दुःख के कीचड़ में सने थे और बोलते समय उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी।
बेटा...
अजय जहॉं तुम्हारा पति था, वहीं वह हमारा बेटा भी था। जितना दुःख तुम्हें है, उतना हमें भी है। दुःख आखिर दुःख ही
होता है। वह न तो बड़ा होता है और न छोटा। वह तो आदमी के कमतर अथवा तीव्रतर अनुभव
अथवा आघात के आधार पर छोटा-बड़ा हो सकता है। फिर जाने वाले के पीछे जाया भी तो नहीं
जा सकता। न तो कभी कोई गया है और न ही यह संभव है। सभी को अपनी-अपनी उमर की फसल
यहीं काटनी होती है।
मेरा
इशारा उस आने वाले कल की तरफ है, जहॉं हमें या तो मर-मर के जीना है अथवा जीते-जी
मर जाना है। आने वाला कल सुखभरा हो... बस मेरी यही कामना है। मेरा क्या है...
बुझता हुआ चिराग हूॅं। नहीं जानता... मेरे दीये में कितना तेल बाकी बचा है। आज
नहीं तो कल बुझ ही जाउंगा। तुम्हें अभी जीना है, फिर तुम्हारी अभी उमर ही कितनी है।
मैं
नहीं जानता, तुम अपनी बात कहकर भूल चुकी हो अथवा नहीं। लेकिन मुझे अब भी याद है।
तुमने कहा था कि तुम शादी के बाद भी पढ़ना चाहती थी। याद आया? तुम मेरी मानो तो कल से ही कॉलेज
ज्वाईन करो। एम.ए. करो और परीक्षा की तैयारी में जुट जाओ। तुम्हें उस खाली जगह को
भरना है, जिसे अजय छोड़ गया है।
बाबूजी
की बातें सुनकर वह हतप्रभ भी। इसव उम्र में भी इतना जोश और जोश वाली बातें और
भविष्य में झॉंक सकने वाली दूर-दृष्टि देखकर उसने भी अपनी हिम्मत की ढहती दीवारों
की मरम्मत करनी शुरू कर दी थी और इस तरह वह एक सहायक प्राध्यापक बनकर उसी कॉलेज
में चली आई थी, जहॉं अजय था। अजय के द्वारा खाली किए गए जगह में अपने-आपको पाकर वह
गदगद हो उठी थी।
दो
मिनिट से भी कम समय में उसने अपने अतीत के गहरे समन्दर को खंगाल डाला था। वह और न
जाने कितनी ही देर यूॅं ही खड़ी रहती, अगर उसे अपनी सहकर्मी मेडम पॉल ने
झकझोर कर बाहर न निकाला हो ...निशाजी... आज बाहर ही खड़े रहने का इरादा है क्या? अंदर नहीं चलेंगी?
अपने
अतीत की दुनिया को पीछे छोड़ते हुए वह बाहर तो आ गई थी लेकिन अब भी सामान्य नहीं हो
पाई थी। दिल पूर्ववत ही जोरों से धड़क रहा था और सॉंसें फूली हुई थी। वह जैसे-तैसे अपने-आपको
उस कमरे में ठेल पाई थी।
औपचारिक
परिचय के बावजूद वह उससे मिलने अथवा बात करने से अपने- आपको बचाती रही थी। वह
जितना भी बचने का प्रयास करती, वह उतना ही पास आता चला गया था। वर्तमान और अतीत
के समान्तर चलते हुए वह अपने-आपको असहजता की स्थिति में ही पाती थी।
प्राचार्य
के आदेश पाने के बाद के दो दिनों तक वह सो न सकी थी। उठते-बैठते-टहलते उसे एक ही
ख्याल आ घेरता, वह कैसे जा सकेगी? उसे जाना ही नहीं चाहिए। पूरे पन्द्रह दिन तक अजय
का और उसका साथ रहेगा। स्वाभाविक है... बातें भी करनी पड़ेगी। समय-समय पर
सलाह-मशविरे भी करने पड़ेंगे अथवा देने पड़ेंगे। वह अपने-आपको कब तक बचाती फिरेगी।
क्या वह अनिरूद्ध से यह कह पाएगी कि उसकी सूरत, उसके अजय से हू-ब-हू मिलती है और वह
उसमें अपने पति अजय की छबि को ही पाती है। कैसे कह सकेगी वह? फिर एक विधवा को आज का क्रूर और
दकियानूसी समाज, यह सब कैसे करने देगा? तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगेगी। संभव है कि
सहज होते हुए भी कोई ऐसी-वैसी हरकतें कर बैठी तो भला वह लड़कियों की नजरों से अपने
को कैसे बचा पाएगी? वे कंधे उचका-उचका कर यहॉं-वहॉं कहतीं फिरेगी कि एक विधवा को यह सब
कहॉं करना कहॉं तक उचित है। उसकी बदनामी तो होगी ही, साथ में बाबूजी का सिर भी शर्म से झुक
जाएगा। वह किस-किस के मुॅंह पर ढक्कन लगाती फिरेगी।
ढेरों
सारे प्रश्नों का जवाब देते-देते वह थक सी गई थी। अंत में उसने निर्णय ले लिया था
कि वह ट्रिप में जाने से मना ही कर देगी। बाबूजी को जब इस बात का पता प्राचार्य
महोदय से मिला तो वे खुष नहीं हुए थे। उनकी मान्यता थी कि प्रकृति का संग अच्छे से
अच्छे जख्मों को भी भर देता है। समझाईष देते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि वे अपने
विचार उस पर लाद नहीं रहे हैं बल्कि सलाह दे रहे हैं कि चारदीवारी के भीतर घुट-घुटकर
जीने के बजाय, प्रकृति की गोद में जाना चाहिए, जहॉं हर चीज खुली होती है। जहॉं
खिड़की-दरवाजे नहीं होते, वहॉं ही ईष्वर का वरदान बरसता है।
बाबूजी
के विचार किसी तपोनिष्ट साधु पुरूष के जैसे थे, उनके एक-एक शब्द में जादू भरा सम्मोहन
तो था ही, साथ ही एक दिव्य-दृष्टि भी थी, जो अंधेरे को भेदकर दूर तक जाती थी।
प्रत्यक्ष
अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वह बाबूजी के आदेश को टाल नहीं सकी थी। उनकी आज्ञा को
शिरोधार्य करते हुए वह वहॉं जाने की तैयारी करने लगी थी।
औरंगाबाद, पुणे, नासिक और मुंबई होते हुए ट्रिप गोवा
पहुॅंची थी। कॉलेज की ओर से प्रायोजित यह एक्सकर्सन ट्रिप पूरे पन्द्रह दिनों की
थी।
गोवा
की हसीन वादियों में कदम रखते ही वह पुनः अजय की यादों में खोने लगी थी। वह जहॉं
भी जाती, अजय की यादें उसका बराबर पीछा करती रही थी।
अपनी
शादी के बाद हनीमून मनाने वह गोवा ही तो आई थी। उन यादगार पलों को वह भूल भी कैसे
सकती थी। उसने मन ही मन निर्णय ले लिया था कि अब वह अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं होने
देगी जो बदनामी का कारण बने। इस निर्णय के साथ ही वह ट्रिप का इन्जॉय करने लगी थी।
अजय
के व्यक्तित्व की वह शुरू से ही कायल रही है, लेकिन वर्तमान में साथ-साथ रहते हुए
उसने उसके अंदर छिपे अन्य विशिष्ट गुणों को भी जॉंच-परख लिया था। अजय के व्यवहार
में कहीं भी बनावटीपन नहीं था। उसके नैसर्गिक गुणों के कारण ही तो वह एक जगमगाते
हीरे की तरह था। दूरियॉं अब नजदीकियों में बदलने लगी थी और मौन, मुखर होने लगा था।
शाम
का समय हो चला था। सभी छात्र-छात्राएॅं पहाड़ी की चोटी पर बैठे सुर्यास्त का
दिलचस्प और अद्भुत नजारा देख रहे थे।
एक
बड़ा सा सिंदूरी गोला, आसमान और समुद्र के मध्य लटक रहा था। हवाएंॅ तेज चलने लगी थी और
समुद्र की उद्याम लहरें किनारों से आकर टकराने लगी थी। समुद्री पक्षियों का झुण्ड
आसमान में अपने करतब दिखला रहे थे। उनकी चहचहाटों से समूचा वातावरण संगीतमय हो उठा
था।
सिंदूरी
गोला आहिस्ता-आहिस्ता नीचे की ओर उतरने लगा था। समूचे आसमान और समुद्र का पानी
सिंदूरी रंग में बदल गया था।
इस
अनुपम और अद्भुत नजारे को देखते हुए निशा, पुनः अजय की यादों में घिरने लगी थी।
उसे ऐसा महसूस हुआ कि अजय उससे सटकर बैठा है और उसकी विशाल बाहें उसकी कमर के
इर्द-गिर्द लताओं की सी लिपटीं हुई हैं।
अजय
तो खैर अब इस दुनिया में नहीं था, लेकिन यादों के झरोखों से वह अब भी झॉंक रहा था।
उसकी निकटता से उत्पन्न ताप और स्पर्श की उष्मा, वह अब भी महसूस कर रही थी।
देखते
ही देखते वह सुनहरा गोला समुद्र में पूरी तरह उतर चुका था। चारों तरफ सुरमई
अॅंधियारा घिरने लगा था और अब वह गहराने भी लगा था।
अपने
वर्तमान में लौटते हुए वह वापिस लौट जाने के लिए उठ खड़ी हुई थी। पूरे इत्मीनान के
साथ अपने कदमों को आगे बढ़ाते वह पहाड़ी उतरने लगी थी। सारी सावधानियों के बावजूद
उसका पैर बुरी तरह से फिसला और वह एक चीख के साथ नीचे जा गिरी थी। उसके घुटने, हथेलियॉं जख्मी हो गए थे और बॉंए पैर
की हड्डी संभवतः चटक गई थी।
अनिरूद्ध
उससे कुछ फासला बनाकर चल रहा था। उसे गिरा हुआ देख और आवाज सुनकर वह पास आ गया और
मदद के लिए छात्र-छात्राओं को आवाज देने लगा था। लेकिन पास में कोई भी नहीं था।
शायद उसकी आवाज उन तक नहीं पहुॅंची थी। उसे मदद देने के लिए अब स्वयं आगे बढ़ने के
अलावा कोई चारा भी नहीं था। उसने उसे अपनी बाहों में भरकर उठा लिया और अब वह
धीरे-धीरे पहाड़ी उतरने लगा था।
किसी
पर-पुरूष के सामीप्य का वह पहली बार अनुभव कर रही थी। दर्द का सैलाब अपने चरम पर
था। बावजूद इसके वह एक निर्वचनीय सुख का भी अनुभव कर रही थी।
तत्काल
ही उसे हॉस्पिटल ले जाया गया था।
सारी
जॉंच के बाद डॉक्टर ने पैर में फैक्चर होना बताया था और अब एक बड़ा-सा प्लास्टर
उसकी टॉंग पर चढ़ा दिया गया था।
ट्रिप
का सारा मजा ही इस दुर्घटना के बाद किरकिरा हो गया था। एक दिन पूर्व ही समापन की
घोषणा के साथ ही छात्र-छात्राएॅं वापिस लौटने की तैयारी करने लगे थे।
उदासी
की चादर ओढ़े अनिरूद्ध, अपने कमरे में बैठा निशा के बारे में ही सोच रहा था। दरअसल आज वह अपने
मन की गॉंठ उस पर उजागर कर देना चाहता था लेकिन वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाया
था।
अपने
विचारों की खोल से वह बाहर भी नहीं आ पाया था कि दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक सुनकर
उसने लापरवाही से उसे अंदर आने को कहा। उसकी अपनी सोच थी कि कोई छात्र अपनी समस्या
को लेकर उसके पास आया होगा।
उसकी
ऑंखें फटी की फटी ही रह गई थीं। आने वाला कोई छात्र नहीं बल्कि एक छात्रा थी, उर्वशी। उसने झीने कपड़े पहन रखे थे।
पारदर्शी कपड़ों के भीतर से उसका गदराया यौवन झॉंक रहा था।
उर्वशी
को भला कौन नहीं जानता। अपनी धींगा-मस्ती और खुलेपन के लिए वह सदा ही सुर्खियों
में बनी रहती थी। अपने कॉलेज ज्वाइन करने के दिनां से वह भी उसे जानने लगा था।
अंदर
आते ही वह बुलबुल की सी चहकने लगी थी।
हाय हैण्डसम... किस गम में डूबे हुए
हो?
ओह तुम... क्यों आई हो इस समय... और
वह भी इतनी रात गए ?
क्या करती सरेे ... दिल मान ही नहीं
रहा था... सो चली आई...
उसकी बेशर्मी-भरी बातों को सुनकर उसे
क्रोध हो आया था। मन में आया कि उसे खूब जलील करे और तत्काल बाहर निकल जाने की कह
दे, लेकिन वह कह नहीं पाया था। मुॅंह से
कोई भी बात निकालने के पहिले वह उस बात को तौल लिया करता था, तब अपना मुॅंह खोल पाता था। यह उसकी
अपनी आदत थी, वह सोचने लगा था कि ऐसा करने से कहीं दॉंव उल्टा भी पड़ सकता है। ऐसी
लड़कियॉं अक्सर अपने बचाव को लेकर तरह-तरह के दॉंव-पेंचों को निर्धारित करने में
माहिर होती हैं। वे जानती हैं, कब-कहॉं-कौन सा दॉंव लगाना चाहिए। यदि वह उल्टे
उसी पर इल्जाम मढ़ देगी तो वह कहॉं-कहॉं अपनी सफाई देता फिरेगा। बातों को गम्भीरता
से सोचते हुए उसने निर्णय लिया कि इस खूबसूरत बला को, यहॉं से किसी तरह टाल देने में ही
भलाई है।
उसने
बड़ी ही अजीजी के साथ कहा-ष्देखिए मैडम... इस समय में काफी डिस्टर्ब हूॅं... जो भी
बातें आप कहना चाहती हैं... उसे कल के दिन में भी कही जा सकती है। कृपया मुझे मेरे
हाल पर छोड़ दीजिए और आप यहॉं से तशरीफ ले जाने की कृपा करें।
अपनी
मादक अदाओं को बिखेरती और गोल-गोल ऑंखें नचाते हुए उसने कहा- ष्सर जी... मैं आई तो
थी ही इस इरादे से कि आज की रात इसी कमरे में बिताउंगी... वह भी आपके साथ, लेकिन... जानेमन... जाने की कह रहे
हैं। मैं चली जाउंगी... बेशक चली जाउंगी... लेकिन मेरी भी तो कुछ सुन लीजिए। क्यों
लट्टू हो रहे हैं आप निशा मेडम पर ? क्या रखा है, खास उसमें, जो हममें नहीं है। सिर से पॉंव तक
एकदम फिट... खूबसूरती से भरा जिस्म। नाप भी 34-24-34 का है। नाप कर देख
लीजिए। इतना कहते ही उसने अपने उपर का टॉप
उतारकर फेंक दिया था। कमर से उपर का धड़, एकदम नंगा था, विवस्त्र।
उसकी
इस निर्लज्ज हरकतों को देखकर वह दंग रह गया था। सच ही सोचा था उसने कि वह किसी भी
पायदान पर उतर सकती है। उसकी पेशानी पर पसीना छूने लगा था। दिल एक अजीब सी जकड़न
में कसने लगा था। वह कब यहॉं से बाहर जाती है, वह इसकी बड़ी ही बेसब्री से इंतजार करने
लगा था।
उर्वशी
शायद अपना होश खो बैठी थीं उसका पूरा शरीर उत्तेजना में कांॅप-सा रहा था। ऑंखें
नचाते हुए उसने कहा- देखा आपने, मैंने कहा था न! निशाजी से बीसा ही पड़ूॅंगी।
मैं
एक खिला हुआ फूल हूॅं, जिसमें चटक रंग है... खुशबू है... मकरंद है... अपनी शोखियॉं भी है, वह आपको एक कदम आगे बढ़कर खुला
निमंत्रण दे रहा है और आप हैं कि बासी फूल पर मंडरा रहे हैं। कैसे भॅंवरे हैं आप
शायद
आप नहीं जानते। आपको यह बताना भी जरूरी है कि वह एक जूठन है... उतरा हुआ कपड़ा है।
समझ रहे हैं न आप... मेरे कहने का मतलब है कि वह किसी की विधवा है। मुझे आपकी सोच
पर अफसोस ही नहीं हो रहा है, बल्कि तरस भी आ रहा है।
मैं जा रही हूॅं। हॉं मैं जा रही हूॅं, लेकिन मेरी बात कान खोलकर सुन लीजिए, मेरा नाम उर्वशी है। उर्वशी के
रूप-सौंदर्य के सामने जब विश्वामित्र भी नहीं टिक पाए थे तो आप कहॉं लगते हैं? उर्वशी जब कोई चीज ठान लेती है ते
करके भी बताती है। उसका मन जिस चीज पर भी आ जाता है, वह उसे प्राप्त करके ही दम लेती है।
जब मेरा दिल आप पर आ ही गया है ते आपको पाकर ही रहूॅंगी... बाई हुक या क्रुक...
समझे आप? किसी ने कहा है कि प्यार में जोर-जबरदस्ती नहीं की जाती। मैं आपको
अपने राह पर ले ही आउंगी एक दिन। कहते हुए उसने जमीन पर पड़े टॉप को उठाया, पहना और जूतियॉं खटखटाती बाहर निकल
गई।
दरवाजा धड़ाम से बंद हो गया था।
उस खूबसूरत बला को वह गुस्से में जाता देखता रहा। दरवाजे की धड़ाम सी आवाज
सुनते ही उसका दिल भी जोरों से धड़कने लगा था। वह सोचने लगा था- उर्वशी जाते-जाते
उसे खुली धमकी दे गई है। गुर्राहट से साफ झलकता है कि वह चैन से नहीं बैठेगी। वह
कोई भी हरकत कर सकती है। आने वाले दिन उलझनों से भरे मिलेंगे... यह तय है। एक घायल
नागिन और एक अतृप्त-आत्मा अपना बदला लेने के लिए उस समय तक घात लगाए बैठे रहते हैं, जब तक वे अपना बदला नहीं भंजा लेते।
उसे अब हर कदम पर सावधानी बरतनी होगी।
वह यह भी सोचने लगा था- कैसी नादान व बेवकूफ लड़की है उर्वशी। शरीर से वह
भले ही एक सम्पूर्ण औरत के जिस्म में ढल गई है, लेकिन उसका बचपना अभी भी नहीं गया है।
अकल से भी कच्ची लगती है... वह यह नहीं जानती कि दिल कोई ऐसी-वैसी फालतू चीज तो
नहीं कि जब मन में आया, किसी को भी उठाकर दे दिया। वह क्या जाने दिल और
दिल की भाषा। लापरवाही से सिर झटकते हुए उसने अपने आप से कहा था।
जाने को वह चली तो गई थी लेकिन एक शांत झील में वह एक बड़ा-सा पत्थर जरूर
उछाल गई थी। उसका मन भी किसी झील की तरह अशांत हो उठा था। विचारों की असंख्य लहरें, तट पर आकर टकराने लगी थी।
पूरी रात वह चैन की नींद नहीं सो पाया था।
सुबह होने के साथ ही सामान गाड़ियों पर लादा जाने लगा था।
वापिस लौटने के साथ ही निशा बिस्तर पर जा टंगी थी।
वह न तो चल-फिर ही सकती थी और न ही कोई काम ही कर सकती थी। कभी वह तकिया का
सहारा लेकर बैठी रहती अथवा मैग्जीन के पन्ने पलटती रहती या फिर अपनी ऑंखें बंदकर
अपनी पलकों में मीठे हसीन सपनां को सजाती रहती। समय था कि काटे नहीं कट रहा था।
वह इन बातों से सर्वथा अनभिज्ञ थी कि बाहर कहॉं, क्या हो रहा है। वह तो यह भी नहीं
जानती थी कि कौन उसके खिलाफ विष-वमन कर रहा है। सोते-जागते-उठते-बैठते वह अनिरूद्ध
के बारे में ही सोचती रहती थी।
उसकी ऑंखों के सामने गोवा की हसीन वादियॉं, उॅंची-नीची पहाड़ियॉं, लहलहाता समुद्र तैरते रहते और उन सबके
बीच होता अनिरूद्ध।
अनिरूद्ध को पाकर उसके दिल की मुरझाई कलियॉं फिर से मुस्कुराने लगी थीं।
चारों तरफ वसंत का सा माहौल छाने लगा था। शरीर का रोम-रोम सितार की तरह झंकृत हो
रहा था। उसे तो ऐसा भी लगने लगा था जैसे वह किसी परीलोक में चली आई है।
मीठे-हसीन सपनों को देखती हुई वह सो रही थी कि अचानक दर्द का एक सैलाब आया
और उसके सारे सपनों को बहाकर ले गया। एक तीखे दर्द के अहसास ने उसे रोने पर मजबूर
कर दिया था।
दर्द से निजात पाने के लिए उसने सिरहाने पड़े दवा का रैपर उठाया, एक गोली निकाली, जीभ पर रखी और पानी के घूॅंट के साथ
ही उसे हलक के नीचे उतार लिया।
दर्द अब भी पूरी रफ्तार के साथ चिलक रहा था।
थोड़ी देर बाद उसे राहत मिलने लगी थी। वह पुनः अपने खयालों में खोने लगी थी।
उसे इस ख्याल ने लगभग चौंका ही दिया था कि वह क्यों अनिरूद्ध को चाहने लगी
है? क्या उसे ऐसा करने का अधिकार है? क्या आज का दकियानूसी समाज उसे ऐसा
करने की इजाजत देगा? वह कभी किसी की अमानत रही है, उसे वह अपना दिल की क्या शरीर भी सौंप
चुकी थी। क्या वह उसके प्रति विश्वासघात नहीं होगा? जिस दिल में उसने अजय को जगह दी थी, अब क्या वह उसे निकाल बाहर फेंकेगी और
अनिरूद्ध को बसने की जगह देगी। क्या वह इतनी आसानी से उसे भूल पाएगी? अजय को एकदम से भुला पाना उतना आसान
नहीं है।
यह ठीक है कि उसके मन में अनिरूद्ध को लेकर एक प्यार का पौधा अंकुरित हुआ
है। वह उसे चाहने लगी है। वह सिर्फ एक-तरफा प्यार है। क्या अनिरूद्ध के मन में भी
इसी तरह का प्यार पनप रहा है? क्या वह भी उसे चाहने लगा है? मेरे अपने बारे में सब कुछ
जानते-बूझते हुए वह क्या ऐसा कर पायेगा? उसने अपनी ओर से कभी भी इस बात को
उजागर नहीं किया है। यह टीक है कि वह रोज़ उसे देखने आता है। इसका आशय तो यह कदापि
नहीं लगाया जा सकता कि वह केवल प्यार जताने ही आ रहा है। एक सहकर्मी होने के नाते
भी तो वह आ सकता है।
प्रश्नों के चक्रव्यूह में वह बुरी तरह फॅंस गई थी और बाहर निकल जाने के रास्तों
के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी।
समय का बहाव अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाता है। उसने अपने जीवन की नौका को
समय के बहाव के साथ खुला छोड़ देने का मानस बना लिया था। वह यह नहीं जानती कि उसकी
नाव किस घाट पर जाकर लगेगी अथवा उद्याम लहरों के थपेड़ां में चूर-चूर होकर, सदा-सदा के लिए समुद्र के गर्भ में
समा जाएगी।
प्रेम-प्यार-समर्पण जैसे शब्दों को बलाए-ताक पर रखते हुए, वह उस घड़ी का इंतजार करने लगी थी, जो भविष्य की मुट्ठियों में कैद थीं।
उर्वशी चुप बैठने वालों में से नहीं थी। वह चुप बैठी ही कहॉं थी। आने के
साथ ही वह इस उधेड़बुन में लगी रही थी कि वह किस तरह से अनिरूद्ध को पा सकती थी।
सारे हथकण्डे अपनाने के साथ ही वह उन्हें समाज में बदनाम करने की भी योजना बना
चुकी थी।
खबरों को सनसनीखेज बनाते हुए वह उसे कागजों पर उतारती और अखबारों के पन्नों
के बीच रखवाकर उन्हें घरों-घर पहुॅंचवाने लगी अथवा खिड़की-दरवाजों की सुराखों से
अंदर डलवा देती। शुरू-शुरू में लोगों ने उसे महज एक एड का पुर्जा समझकर रद्दी की
टोकरियों के हवाले कर दिया तो कभी उसे यूॅं ही फाड़कर फेंक दिया। फिर अचानक ही ये
खबरें लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलने लगी। बद्रीविशाल के विशाल व्यक्तित्व के चलते
लोगों की हिम्मत उनके सामने मुॅंह खोलने की तो नहीं हुई, लेकिन दोनों के प्रेम-प्रसंगों की
चर्चाएॅं आम हो गई थी।
अपने मिशन को असफल होता देख वह क्रोध में भरने लगी थी। असफल होने के बावजूद
उसने हिम्मत नहीं हारी थी। अब वह कॉलेज परिसर में ही नए-नए हथकण्डे अपनाती और
अनिरूद्ध को रिझाने की कोशिश करती। अनिरूद्ध भी कम होशियार नहीं था। वह उसकी हर
चाल को शिकस्त देता चलता था।
अनिरूद्ध निशा से मिलने और हाल-चाल जानने के लिए सुबह समय नहीं निकाल पाता
था। हॉं, शाम को वह कॉलेज से छूटते ही वहॉं जा पहुॅंचता था।
आने के साथ ही वह सीधा बाबूजी के कमरे में जा पहुॅंचता था। निशा के हाल-चाल
पूछता, फिर यहॉं-वहॉं की बातें करता हुआ, वह वापिस हो लेता था। उसने कभी-भी
भूलकर सीधे निशा के कमरे में जाने की जहमत नहीं उठाई थी। उसकी अपनी शालीनता, आत्म-सजगता और कुशल-व्यवहार से सभी का
दिल जीत लिया था। बाबूजी भी उसमें अपने बेठे का स्वरूप देखकर उसे पुत्रवत् स्नेह
भी करने लगे थे। निशा भी उसके कर्तव्यबोध की सराहना करते नहीं थकती थी।
दो माह बाद वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई थी। हड्डियॉं जुडृ गई थी और अब वह
चल-फिर भी सकती थी।
कॉलेज जाने के लिए अपनी गाड़ी न निकालते हुए उसने पैदल ही जाने का निश्चय
किया। दरअसल वह यह देखना चाहती थी कि कहीं कोई कोर-कसर बाकी तो नहीं रह गई है।
हाथ में किताबों को उठाए वह कॉलेज की ओर बढ़ रही थी। बाहर आते ही उसे लगा कि
इस बीच पूरी दुनिया ही बदल गई है।
उसे देखते ही औरतों और पुरूषों की भीड़ इकट्ठी होने लगी थी। वे आपस में
खुसुर-फुसुर भी करते जा रहे थे। उन्हें ऐसा करता हुआ देख, वह असहज होने लगी थी। उसे आश्चर्य इस
बात पर हो रहा था कि पूर्व में ऐसा कभी नहीं हुआ था।
जब वह अपने क्लास-रूम में पहुॅंची तो ब्लैक-बोर्ड पर अपनी और अनिरूद्ध की
तस्वीरें बनी देखकर वह सन्न रह गई थी। कमरे में सन्नाटा पूरी तरह से पसरा हुआ था।
छात्र-छात्राएॅं टकटकी लगाए उसके चेहरे पर पड़ने वाले प्रभावों को पढ़ने की कोशिश कर
रहे थे।
वह समझ गई। उसे समझने में ज्यादा देर भी नहीं लगी थी। उसके सोच के केंद्र
में उर्वशी थी। वह जानती थी कि वह कुछ भी कर सकती है। गोवा की ट्रिप में भी वह यह
ऐसी-वैसी हरकतें कर चुकी थी लेकिन तब वह माहौल को गड़बड़ होता नहीं देखना चाहती थी, लेकिन पानी अब सर पर से उॅंचा बहने
लगा था।
वह यह भी जानती थी कि इस समय थोड़ा-सा भी आक्रोश दिखाने से मामला खटाई में
पड़ सकता है। संभव है कि वह बाजी भी हार जाए और लोगों के बीच तमाशा बनकर रह जाए।
अपने धैर्य और संयम को बचाए रखते
हुए उसने अपने ओंठों पर एक विस्मित भरे हास्य को बिखेरा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसने डस्टर
उठाया और बोर्ड साफ करते हुए उसी तन्मयता से पढ़ाने लगी, जैसे वह पहले भी पढ़ाती आई थी।
अपना पिरीयड पूरा करने के बाद उसने उर्वशी से मुखातिब होकर कहा कि वह उससे
अलग से बात करना चाहती है, एकांत में।
उसे अब उर्वशी का इंतजार था। एक पेड़ के नीचे खड़े रहकर वह उसके आने का
इंतजार कर रही थी।
उर्वशी को आता देख उसने संतोष से गहरी सॉंसें ली और अब वह उसके साथ आगे
बढ़ने लगी थी।
रास्ता चलते उसने मौन ओढ़ रखा था। उर्वशी हतप्रभ थी कि कि मेडम उसे कहॉं और
क्यों ले जाना चाहती है।
रास्ता कट गया और कब घर आ गया, पता ही नहीं चल पाया। उर्वशी भी बिना
कुछ बोले उसके पीछे-पीछे यंत्रवत् चलती रही थी।
अपने कमरे में प्रवेश करने के साथ ही निशा ने अपनी तर्जनी उठाकर उस ओर
इशारा किया जहॉं अजय की तस्वीर लटक रही थी और उस पर एक माला भी लटक रही थी। उसने
कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा- ष्ये मेरे स्वर्गवासी पति अजय की फोटो
है।ष्
उर्वशी की नजरें चकराने लगी थी। वह सोचने लगी थी...अरे... इसकी सूरत तो
हू-ब-हू अनिरूद्ध से मिलती है। ऐसे कैसे हो सकता है? उसने अपने आप से कहा था
तीसरी मंजिल
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी कहानी
कहानी कहानी कहानी
गोवर्धन यादव
बादल के टुकड़े को आसमान में तैरता देख
वह छत पर चली आयी थी। आरामकुर्सी पर बैठते हुए उसने अपने लम्बे-घने-गीले बालों को
पीछे झुला दिया और टकटकी लगाए बादलों को देखती रही।
बंजारा
बादलों की बस्तियॉं बसने लगी थी। कुछ आवारा-घुमन्तु किस्म के बादल अब भी हवा की
पीठ पर सवार होकर यहॉं-वहॉं विचर रहे थे। सूरज भी भला कब पीछे रहने वाला था। वह भी
मस्ती मारने पर उतर आया। कभी वह उस बस्ती में जा घुसता तो कभी दूसरी में। जब वह
बादलों की ओट होता तो एक मोरपंखी अंधियारा सा छाने लगता और जब बाहर निकलता तो
चमचमाने लगता था।
ऋतुओं
में वर्षा-ऋतु उसे सर्वाधिक प्रिय है। इन दिनों, न तो तेज गर्मी ही पड़ती हैं, न ही हलक बार-बार सूखता है और न ही
ठिठुरन भरी ठंड ही सताती है। मंथर गति से इठला-इठलाकर चलती पुरवाई, पोर-पोर में संजीवनी भरने लगती है।
पेड़-पौधे नूतन परिधान पहिन लेते हैं। जवान होती ललिकाएॅं वृक्षों के तनों से
लिपटकर आसमान से बातें करने लगती हैं। लाल-पीले-नीले-बैंगनी-गुलाबी फूलों से यह
अपना श्रृंगार रचाती है। मोर नाचने लगते हैं। पपीहे की टेर अलख जगाने लगती है।
नदी-नाले मुस्कुराने लगते हैं। ..... के
कण्ठों से सरगम फूट निकलता है। धरती पर हरियाली की कालीन सी बिछ जाती है। लगभग
समूचा .............................ही ........... मुस्कुराने लगता है।
देर
तक वह बादलों का उमड़ना-घुमड़ना देखती रही। तभी हवा का एक झोंका माटी की सोंधी-सोंधी
गंध लिए, उसके नथुनों से आ टकराया। उसने सहज ही अंदाजा लगाया कि कहीं आसपास
पानी बरस रहा है। संभव है, यहॉं भी पानी बरसने लगे। वह और कुछ सोच पाती, पानी झम-झमाकर बरसने लगा। पानी में
भींगते हुए वह अपनी स्मृतियों की घुमावदार सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए बचपन की
देहलीज पर जा पहुॅंची।
मॉं-बाबूजी, दादी, दो छोटी बहनें, भाई कारिडॉर में बैठे बतिया रहे थे।
गरज-बरस के साथ बादल बरस रहे थे। वह चुपचाप उठी और ऑंगन में निकल आयी। देर तक पानी
में भींगती रही। अब वह फिरकी की तरह गोल-गोल घूमकर नाचने लगी थी। फ्राक के छोरों
को अपनी उंगलियों में दबाये वह थिरकती रही। नाचते समय उसे लगा कि वह मोर-बनी नाच
रही है। बीच-बीच में मोर की सी आवाज भी निकालते जाती। कभी लगता कि तितली
बनी-रंग-बिरंगे पंखों को फैलाये, उड़ी चली जा रही है। कभी इस फूल पर जा बैठती तो
कभी उस फूल पर।
मॉं
चिल्लाती श्सर्दी हो जायेगी... बुखार पकड़ लेगा।श् दादी बड़बड़ाती श्निमोनिया हो जाएगा।श्
जितने मुॅंह, उतनी ही बातें। वह सभी का कहा-अनसुना कर देती। कनखियों से उसने बाबूजी
की ओर देखा। वे तालियॉं बजा-बजाकर उसका उत्साहवर्धन कर रहे थे। अब वह और भी
इठला-इठलाकर नाचने लगी थी। वह तब तक नाचती रहती थी, जब तक बादलों ने बरसना बंद नहीं कर
दिया था।
बारिश
के थमते ही उसके पैर भी स्थिर हो जाते। दौड़कर वह भीतर आती और मॉं से आकर लिपट
जाती। मॉं तौलिए से उसका भीगा बदन सुखाने लगती। दादी का बड़बड़ाना अब भी जारी था। वह
दादी से आकर चिपक जाती। दादी के कपड़े भींगने लगते। वे झिड़कियॉं देने लगती। दादी के
चेहरे पर समय की मकड़ी ने ढेरों सारे महीन जाल बुन दिए थे। वे अब गहराने लगे थे।
दादी बड़बड़ती जाती... बुदबुदाती जाती और अपनी खुरदुरी हथेलियों से उसका गाल सहलाती
जाती। एक खुरदुरे मगर मीठे अहसास से वह भींग उठती।
बचपन
से जुड़ी अनेक मीठी-मीठी स्मृतियॉं विस्तार लेने लगी थी। वह हड़बड़ा उठी। उसकी समूची
देह राशि पीपल के पत्ते की तरह थर-थर कॉंपने लगी थी। उसने पीछे पलट कर देखा अभिजीत
खड़ा मुस्कुरा रहा था।
बारिश
के ही दिन थे। वह छत पर बैठी अपने गीले बालों को सुखा रही थी। वह दबे पॉंव छत पर
चढ़ आया और चुपके से उसने, उसे अपनी बांॅहों में भर लिया था। इस अप्रत्याशित
घटना से वह बिल्कुल ही बेखबर थी। हड़बड़ा उठी वह। उसे अभिजीत पर क्रोध हो आया था और
वह बेशरम खी-खी करके हॅंस रहा था।
अब
वह कुछ ज्यादा ही हरकत करने पर उतर आया था। कभी वह गुदगुदा कर हॅंसाने का असफल
प्रयास करता। कभी बालों की लटों से खेलने लगता। अब की तो उसने हद ही कर दी थी।
पीछे से लगभग, पूरा झुकते हुए उसने अपने ओंठ उसके अधरों पर रख दिए थे। उसका समूचा
शरीर सितार की तरह झनझा उठा था। सॉंसें अनियंत्रित सी हो लगी थी। पलकें मूंदने सी
लगी थी। बेहोशी का आलम पल-प्रतिपल बढ़ता जा रहा था। बादल भी उस दिन जमकर बरसे थे।
होश तो उन्हें तब आया था, जब बादलों ने बरसना बंद कर दिया था और सूरज उनके
जिस्मों को गरमाने लगा था।
उसने
आहिस्ता से ऑंखें खोली। अभिजीत वहॉं नहीं था। हो भी कैसे सकता था। विगत कई वर्षों
से उसने उसकी सुध तक नही ली थी। अभिजीत की याद ने उसे लगभग रूला ही दिया। डबडबाई
ऑंखों में उसके कई-कई चेहरे आकार-प्रकार लेते चले गए।
उसे
अब भी याद है, शादी के बाद, वह कई महिनों तक अपनी फैक्टरी नहीं जा पाया था।
दिन-रात... सुबह-शाम वह परछाई बना आगे-पीछे डोलता रहा था। बाद में वह लापरवाह होता
चला गया। जानबूझकर... या... योजनाबद्ध तरीके से।
यह
वह नहीं जानती। माह में एक-दो दिन.... पूरा सप्ताह... फिर पूरे-पूरे माह वह गोल
रहने लगा। अभिजीत से निरंतर बढ़ती दूरी ने उसे लगभग अशांत ही कर दिया था।
वह
जब भी घर लौटता, वह किसी भूखी शेरनी की तरह उस पर झपट पड़ती। प्रश्नों के पहाड़ उसके
सामने खड़ा कर देती। वह किसी बहरूपिये की तरह अपने चेहरे पर मासुमियत का मुल्लमा
चढ़ा लेता। सिर झुकाए खड़ा रहता। उसका इस तरह मौन ओढ़ लेना, उसे ज्यादा विचलित कर देता था। सारे
हथियारों का प्रयोग कर चुकने के बाद, उसका तरकश लगभग खाली हो जाता। वह
फफककर रो पड़ती और उसके सीने पर अपना सिर टिकाए रोती रहती-उसके कपड़े भिंगो देती।
टीसें
अब समुद्र का सा विस्तार लेने लगी थी। वह नहीं चाहती थी कि अभिजीत की याद उसे
जब-तब रूला जाए। अनमनी सी वह उठ बैठी और नीचे उतर आयी।
मन
बलात और शरीर थका-थका लगने पर भी वह कमरे में चक्कर काटती रही। कभी उस कुर्सी पर
जा बैठती, कभी दूसरी पर। एक कमरे में जा घुसती तो दूसरे से बाहर निकल आती। वह
जिस भी वस्तु को देखती-छूती-उसे अभिजीत की उपस्थिति का अहसास होता। उसकी गर्म-गर्म
सॉंसों की गर्माहट मिलती। वह उसे जितना भुलाने की कोशिश करती वह उतना ही याद आता।
खिसियाकर उसने अपनी दोनों हथेलियों से कानों को कसककर दबा लिया था और ऑंखें भी बंद
कर ली थी ताकि उसे न तो कुछ दिखाई दे सके और न ही सुनाई पड़े। पत्थर को अहिल्या बनी
वह न जाने कितनी ही देर तक बैठी रही थी।
घड़ी
की ओर देखना उसने लगभग बंद ही कर दिया था। जानती थी वह घड़ी के तरफ देखे अथवा न भी
देखे तो क्या फर्क पड़ने वाला था। जब वह अभिजीत को रोक नहीं पायी तो भला वक्त को
कहॉं रोक पाती। वक्त को अब तक कौन रोक पाया है। उसमें न तो इतनी हिम्मत ही है और न
ही सामर्थ्य कि वह वक्तरूपी अश्व को बॉंध पाए-रोक पाए। एक दिन होश में आकर उसने
दीवार घड़ी के सेल ही निकालकर फेंक दिए थे।
अंॅंधकार अब भी ऑंखों के सामने खड़ा
ताण्डव कर रहा था। चीजें अस्पष्ट व धुॅंधली दिखायी पड़ रही थी। बैठे-बैठे उसे उकलाई
सी भी होने लगी थी। किसी तरह दीवार का सहारा का सहारा लेकर वह उठ खड़ी हुई और
वाश-बेसिन तक जा पहुॅंची। ऑंखों पर पानी के छींटें मारे... कुल्ला किया और तौलिए
से मुॅंह पोंछती हुई कुर्सी पर आकर धम्म से बैठ गयी।
तौलिए
से मुॅंह पोंछते हुए उसकी नजर टेबल पर पड़े अखबार पर जा पड़ी। अखबार के पन्ने हवा
में फड़फड़ा रहे थे। न चाहते हुए भी उसने अखबार उठा लिया और पढ़ने लगी।
राज्य
की नई दुनिया का 28 जुलाई 02 का ताजा अंक उसके हाथ में था। मोटी-मोटी हेड लाईनों
पर नजरें फिसलते हुए आगे बढ़ जाती। समाचारों को डिटेल में पढ़ने में उसे अब रूचि
नहीं रह गई थी। राजनैतिक घटनाक्रम उसे उबाउ से लगते। वह पन्ने पलटती रही।
समाचार-पत्र के आखिरी पन्ने पर एक ज्वालामुखी का चित्र छापा गया था। चित्र के नीचे
बारीक अक्षरों में कुछ लिखा भी था। अब वह ध्यानपूर्वक पढ़ने लगी थी।
लिखा
था अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित ज्वालामुखी किलाउ से लावा बहकर प्रशांत महासागर
में प्रतिदिन गिर रहा है। तीन जनवरी 83 से ज्वालामुखी रूक-रूक कर लावा उगल रहा है।
यहॉं हर वर्ष लाखों लोग इसे देखने आते हैं। तीन हफ्तों से दर्शकों की संख्या में
इजाफा हुआ है।
टकटकी लगाए वह ज्वालामुखी का चित्र देखती रही। किलाउ और उसमें कितनी
समानताएॅं। वह भी अपने अंदर एक ज्वालामुखी पाले हुए है। उसमें भी तो निरन्तर लावा
उबल रहा है। वह कब फट पड़ेगा, नहीं जानती। पर इतना जरूर जानती है कि वह जब भी
फटेगा, उसका अपना निज उसका अपना अस्तित्व, यहॉं तक कि उसका अपना वर्चस्व सभी कुछ
जलकर राख हो जाएगा। फिर तेज गति से चलने वाला अंधड़ सब कुछ दूर-दूर तक उड़ा ले
जाएगा। वह सोचने लगी थी।
पत्र
में तो यह भी लिखा था- 3 जनवरी 83 से किलाउ रूक-रूककर लावा उगल रहा है। दिन...
तारीख... महीना यहॉं तक सन् भी उसे ठीक से याद नहीं परंतु इतना भर याद है कि विगत
कई वर्षों से उसके अंदर लावा उबल रहा है, धधक रहा है। अभिजीत की याद में बहता
लावा... उसके बिछोह में धधकता लावा। लावा यदा-कदा उसकी शिराओं में आकर बहने लगता
है। लावा कब तक यूॅं ही बहता रहेगा... यह वह नहीं जानती।
तभी
उसने महसूस किया कि अंदर कुछ रदक गया है और लावा तेजी के साथ बहने लगा है। उसकी
सॉंसे अनियंत्रित-सी होने लगी। दिल एक अजीब-सी धड़कने लगा है। जीभ तालू से जा चिपकी
है। उसकी नाजुक कंचन-सी काया पीपल के पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगी है। शरीर पर
बुद्धि की पकड़ ढीली पड़ने लगी है। बेहोशी का आलम उसकी सम्पूर्ण संचेतना पर हावी
होने लगा है। मिट्टी की कच्ची दीवार की तरह वह भरभराकर गिर पड़ी। वह कितनी देर तक
संज्ञाहीन पड़ी रही थी, उसे कुछ भी याद नहीं।
चेतना
धीरे-धीरे लौटने लगी थी। सोचने-समझने की बुद्धि पुनः संचरित होने लगी थी। होश में
लौटते हुए उसने महसूस किया कि वह फर्श पर औंधी पड़ी हुई है। कपड़े-लत्ते सब
अस्त-व्यस्त हो गए हैं। नारी सुलभ लज्जा के चलते उसने अपनी नंगी टांगों को फिर
खुले वक्ष को ढंका और उठ बैठने का उपक्रम करने लगी। अपनी कमजोर टांगों पर किसी तरह
शरीर का बोझ उठाते हुए वह पुनः बिस्तर पर आकर पसर गई। उसका माथा अब भी भिन्ना रहा
था। एेंठन के साथ-साथ पोर-पोर में दर्द भी रेंग रहा था। इतना सब हो जाने के बावजूद
भी यादों के कबूतर उसकी स्मृति की शाखों पर बैठे गुटरगूॅं कर रहे थे।
वह सोचने लगी थी- ष्कितने दारूण दुःख दे रहे हो तुम मुझे अभिजीत। आखिर क्या
कुसूर था मेरा? क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा? क्या प्यार करने की इतनी निर्मम
परिणति होती है? तुम इतने क्रूर निकलोगे, इसकी तो मैंने कल्पना तक नहीं की थी।
कितनी ही रातें मैंने जाग-जागकर तुम्हारा इंतजार किया था। क्या तुम्हें पल-भर भी
याद नहीं आयी? तुमने पलटकर तक नहीं देखा कि तुम्हारी शशिप्रभा किन हालातों में जी
रही है। इस तरह तड़पा-तड़पा कर मार डालने से तो अच्छा था कि तुम मुझे जहर ही दे
देते। इन भीषण यंत्रणाओं से मुक्ति तो मिल जाती। गला ही घोंट देते, मैं उफ तक नहीं करती। किश्त-किश्त
जिन्दगी जीते हुए मैं तंग आ गयी हूॅं। ये अंतहीन टींसे... ये अंतहीन पीड़ायें...
उफ्... अब मैं पलभर भी झेल नहीं पाउंगी।
मैं भी मूर्खा निकली... जो तुम्हारी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गयी। तुम्हारे
प्यार को सर्वोपरि मानकर ही तो मैं तुम्हारे साथ भाग निकली थी। रंगीन सपनों ने भी
क्या कम भरमाया था मुझे। कितना बड़ा कल्पना-संसार रच रखा था मैंने अपने आसपास।
परिन्दे की तरह उन्मुक्त गगने में विचरती रही थी। भूल गयी थी कि कभी जमीन पर वापिस
आना भी पड़ सकता है।
वह रात भी कितनी भयंकर... कितनी निर्मम... काली घनेरी रात थी। मैं बेखौफ
होकर तुम्हारे साथ हो ली थी। इस अंधी रात की सुबह इतनी पीड़ादायक.... होगी... इसका
तो मुझे गुमान तक नहीं था। इस बात का भी तनिक ध्यान नहीं आया कि मेरे इस तरह घर से
भाग जाने के बाद मॉं-बाबूजी पर क्या बीतेगी? जवान होती बहनों को कौन अपनी चौखट पर
जगह दे पाएगा? भाई का क्या होगा? क्या वह गर्दन उंची किए समाज में चल पाएगा? किस-किस के फितरे सुनते रहेगा।
तुम मेरे साथ हो... सदा-सदा के लिए... हमेशा के लिए... बस इसी ख्याली
विश्वास के जहरीले कीड़े ने मेरी जिन्दगी में... अपने खूनी पंजे गाड़ दिये हैं। जिस
विश्वास को मैंने किश्ती जानकर सवार हो ली थी वह एक ही झटके में किरची-किरची होकर
बिखर जाएगी... नहीं जानती थी। उमड़ते-घुमड़ते बड़बड़ाते... दहाड़ते समाजरूपी समुद्र से
टक्कर लेने की जिद कितनी नाकारा... कितनी नाकाफी सिद्ध हुई है... आज जान पायी। तुम
साथ होते तो जीने-मरने का आनन्द लिया जा सकता था पर तुम इतने डरपोक... इतने
बुजदिल... निर्मोही निकले कि बीच सफर से ही किनार कर गए। किसे पुकारती मैं मदद के
लिए ? किसके हाथ जोड़ती? किसके आगे गिड़गिड़ाती? कौन सुनने वाला था? कौन बचाने आने वाला था? इस बड़बड़ाते सागर की चीख के आगे, मेरी चीख लगभग गुम होकर ही रह गई थी।
लोगों को पता चला कि यह तो घर छोड़कर भागी हुई लड़की है। लोगों के दिल में
सहानुभूति का ज्वारभाटा मचलने लगा था। औरतों के प्रति सहानुभूति का अर्थ जानते हो? सबकी ऑंखों में वासना के ज्वारभाट मचल
रहे थे। सहानुभूति की आड़ में एक जवान जिस्म की चाहत थी सभी के मन में। अब तुम्हीं
बताओ अभिजीत... कहॉं जाए तुम्हारी शशि। मॉं-बाप-भाई-बहन यहॉं तक सगे संबंधियों ने
भी अपने-अपने द्वार मेरे लिए हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर लिए हैं।
मानती हूॅं तुमने ढेरों सारी दौलत... मकान... ऐशो-आरा की चीजें... सभी मेरे
नाम कर दी है। पर बगैर तुम्हारे क्या मैं उसका उपभोग कर पाउंगी?
तुम्हारा किया-धरा अब समझ में आने लगा
है। दरअसल... जिसे मैं प्यार समझी बैठी थी, वह प्यार-प्यार न होकर महज एक वासना
का नंगा खेल था। तुमने जब जी चाहा... जहॉं जी चाहा... मेरी जवानी को चादर की तरह
बिछाते रहे हो। जानते हो... प्यार और वासना के बीच एक झीना-सा परदा होता है, तुम कभी भी उस पर्दे को चीरकर इस तरफ
नहीं आ पाए थे।
मुझे... मुझे आज मजबूत कंधों की जरूरत थी। पलभर को ही सही, मैं अपना सिर रखकर रो तो सकती थी। आज
बेटियॉं पास होती तो मैं ऐसा कर सकती थी। पर... तुम निर्मोही ने वह सहारा भी मुझसे
छीन लिया। मुझे आज भी याद है उषा जब पैदा हुई थी... तो तुमने मुझे स्तनपान करने से
मना कर दिया था। तुम्हारी अपनी दलील थी कि इससे मेरा फिगर खराब हो जायेगा... सेहत
गिर जाएगी और मैंने तुम्हारा कहा मान, उसे आया की गोद में डाल दिया था।
दूसरी के साथ भी यही सब कुछ हुआ। वे थोड़ा संभल पाती कि तुमने उन्हें हॉस्टल में
डाल दिया और उन्हें विदेश भी भेज दिया। निश्चित ही तुम्हारी अपनी योजना रही होगी
कि मैं तुम्हारे वियोग में तड़पने के साथ-साथ अपनी बेटियों के बिछोह में भी तड़पू।
पता नहीं-तुम उन्हें किस सॉंचे में ढालना चाहते हो... शायद अमेरिकन साये में। तो
आज तुम्हारी बेटियॉं पूरी तरह से अमेरिकन-रंग में रंग चुकी है। तुम्हें पता चला-या
नहीं, नहीं जानती... जब वे घर लौटी थी तो दोनों के पेट में अवैध संतान पल
रही थी। इतनी कम उमर में कितना कुछ सीख चुकी हैं तुम्हारी बेटियॉं। पता नहीं...
क्यों चिढ़ हैं तुम्हें भारतीयों से... भारतीय संस्कृति से।
कितना नीच... कितना कमीना... कितना खुदगर्ज होता है तुम्हारा पुरूष वर्ग।
औरतें भी बेवकूफ होती है। वे थोड़ा सा पुचकारने से... फुसला देने से... बहला देने
से... बहल जाती है... फिसलने लग जाती है। फिर बिछ-बिछ जाती है आदमकद जात के सामने
ताकि वह उसका दैहिक-शोषण कर सके... अपनी आदमभूख मिटा सके... औरतों को बदले में भला
चाहिए भी क्या! दो जून की रोटी... टूटी-फूटी झोपड़ी... अदना सा मकान... या फिर कोई
आलिशान बंगला... वे निहाल हो उठती है। तन सजाने को ढेरों सारे जेवर... खुश हो जाती
है औरतें, फिर वह धीरे से किसी पालतू कुत्ते की तरह गले में डाल देता है एक
पट्टा... एक जंजीर... अथवा मंगलसूत्र। बस इस छोटे से लटके-झटके... टोटके मात्र से
औरतें बंध जाती है किसी गाय की तरह उसके खूॅंटे से... मरते दम तक के लिए।
कुछ औरतों की बात हटकर है। वे अपने आप को
स्वच्छंद... स्वतंत्र... स्वावलंबी महसूसती हैं... क्या वे अपने आपको पिशाची
दरिन्दों के पंजों से शिकार होने से बचा पाती है? बदलते युग में अब बलात्कार भी सामूहिक
हो चले हैं। वे अपने मिलकर झपट्टा मारते हैं। जब वे वासना का खेल खेल रहे होते हैं, तब वह अपने हाथ-पैर चलाकर अपने को
बचाने का प्रयास भर कर पाती है। उसके गिरफ्त से निकल कहॉं पाती है? उसे तो उस समय अपनी मुक्ति की कामना
भर होती है। इस जोर-जबरदस्ती में वह किस-किस का चेहरा... किस-किस का नाम याद रख
पाती होगी। शरीर निचुड़ जाने के बाद, उसमें इतना नैतिक साहस... हिम्मत भी कहॉं बच पाती
है कि वह उसके खिलाफ खड़ी भी हो सके।
उसकी तो बात ही अलग है, जो खुद होकर अपने कपड़े उतारने पर
आमादा होती है। पुरूष पहल करे इससे पहले वे अपने कपड़े उतारकर नंगी हो जाती है।
माना.... ऐसा करने पर उन्हें मुॅंह-मांगी कीमत... अकूत सम्पदा भले ही मिल जाती
होगी पर उनकी आत्मा तो कभी की मर चुकी होती है। जब आत्मा ही मर गई तो मुर्दा शरीर
को नंगा रखो या ढॉंककर ही, क्या फर्क पड़ता है।
तरह-तरह के नुकीले विचार उसकी आत्मा को
लहू-लुहान करते रहे। लगभग तीन-चौथाई रात बीत चुकी थी और वह सो जाना चाहती थी। पर
नींद ऑखों से कोसों दूर थी। अनमने मन से उसने एक पत्रिका उठाई और पन्ने पलटने लगी।
दरअसल वह पढ़ कम रही थी और पन्ने ज्यादा पलट रही थी। नींद ने कब उसे अपने आगोश में
ले लिया, पता ही नहीं चल पाया।
सोकर उठी तो दिन के बारह बज रहे थे। उसने
महसूस किया कि दर्द के साथ-साथ आलस भी शरीर में रेंग रहा है। बिस्तर पर पड़े-पड़े, अब उसे उकताई-सी होने लगी थी। न चाहते
हुए भी उसे उठना पड़ा। वह सीधे बाथरूम में जा समाई।
अपने जिस्म को तौलिये से लपटते हुए वह
सीधे ड्रेसिंग-रूम में चली आई। उसने देखा ड्रेसिंग टेबल पर एक आमंत्रण-पत्र पड़ा
है। आश्चर्य से उसके ओंठ गोल होने लगे। कुर्सी पर बैठते हुए उसने गीले हाथों से
आमंत्रण-पत्र उठाया। पत्र उठाते ही लेवेण्डर की भीनी-भीनी खुशबू उसके नथुरों से आ
टकराई। पत्र उसी के नाम से प्रेषित किया गया था। पत्र पर की लिखावट भी क्या खूब थी, मानो मोती जड़ दिये गये हों। उसने पत्र
को उलट-पलट कर देखा। पारदर्शी प्लास्टिक टेप से चिपकाया गया था। पत्र भेजने वाला
कोई दयाशंकर था। प्रोफेसर दयाशंकर। पत्र भेजने वाले के तौर-तरीके से वह बेहद
प्रभावित हुई थी। मन ही मन वह सोचने लगी थी ष्कौन है दयाषंकर? उसे कहॉं देखा था? देखा हुआ तो नहीं लगता, कहॉं भेंट हुई थी? कहॉं मिली थी? सहपाठी है या नजदीक का रिष्तेदार?ष् उसने अपने स्मृति के घोड़ों को
दूर-दूर तक दौड़ाया भी। पर कोई स्पष्ट तस्वीर दयाशंकर की बन नहीं पाई।
उसने आहिस्ता से टेप उतारा, पत्र खोला और एक सॉंस में पूरा पढ़ गई।
वर-वधू के नाम, उसके अभिभावकों के नाम, विवाह-तिथी, विवाह-स्थल सभी कुछ। कार्ड के साथ अलग
से एक चिठ भी चस्पा की गई थी, उसमें लिखा था। शशि जी... मेरी बेटी प्रभा की
शादी में तुम जरूर-जरूर आना। तुम के नीचे गहरी स्याही से रेखांकित किया गया था।
तुम के नीचे खींची गई रेखा उसे किसी तिलस्मी खजाने की कुंजी-सी लगी। अब वह तिलस्म
की मायाजाल में फॅंसते जा रही थी। ष्क्यों की गई होगी अण्डरलाईन? क्या वह नजदीकी दिखलाने की कोशिश कर
रहा है अथवा आत्मीयता... अथवा निकट की कोई रिश्तेदार ही, या उसने सब जान-बूझकर किया है?ष् दयाशंकर उसे अब एक दिलचस्प जादूगर
भी लगने लगा था। वह इस जादू के सम्मोहन में घिरती चली जा रही थी। उसने तत्काल
निर्णय लिया कि इस शादी में वह जरूर जाएगी और तिलस्मी रहस्य को उजागर करके रहेगी।
उसे अब उस दिन, उस घड़ी का बेसब्री से इंतजार रहने लगा था।
नियत समय पर उसने एक महॅंगा सा गिफ्ट आइटम पैक कराया। अपना सूटकेस तैयार
किया। ड्रायवर को निर्देश दिया कि वह गाड़ी निकाल लाये।
शहर को पीछे छोड़ते हुई उसकी गाड़ी अब जंगल के बीच से होकर गुजर रही थी।
उंची-नीची पहाड़ियॉं... टेढ़े-मेढ़े घुमावदार राश्ते, आकाश को छूते, बात करते पेड़ों की कतारें। पहाड़ की
चोटी से उतरते... मुस्कुराते... हवा में सरगम बिखेरते झरने। कुॅंलांचे भरते
मृग-शावक। ढोर-डंगर चराते चरवाहे। चलचित्र के मानिंद पल-पल बदलते दृश्य देख वह
अभिभूत हुई जा रही थी। भीगी-भीगी हवा के अलमस्त झौंके, उसके गोरे बदन से आकर लिपट-लिपट जाते
थे। उसे ऐसा भी लगने लगा था कि वह किसी अन्य गृहों पर उड़ी चली जा रही है और एक नया
जीवन जीने लगी है। विस्फारित नजरों से वह प्रकृति का मनमोहक रूप देखती रही।
कुछ देर तक तो उसका मन प्रकृति के साथ तादात्म्य में बनाये रखता। फिर
शंका-कुशंकाओं की कटीली झाड़ियों में जा उलझता। कभी उसे इस बात पर पछतावा होने लगता
कि वह नाहक ही चली आई है। घर बैठे भी तो भेंट स्वरूप राशि भेजी जा सकती थी अथवा
डाकघर से पार्सल द्वारा भी। कभी लगता, उसका आना जरूरी था और दया से मिलकर उस
रहस्य पर से पर्दा भी उठाना था कि वह उसके अतीत के बारे में क्या कुछ जानता है।
गाड़ी की सीट से सिर टिकाकर वह कुछ न कुछ सोचती अवश्य चलती। अब वह
कल्पना-लोक में विचरने लगी थी। लगा कि वह शादीघर में जा पहॅुंची है। उसकी खोजी
नजरें दया को ढूंॅढने लगी थी। तभी एक कड़क अधेड़ भद्र पुरूष आता दिखा। उसकी चाल में
चीते की सी चपलता थी। अब वह करीब आ पहुॅंचा था। उसने सूट-टाई पहन रखी थी तथा सिर
पर गुलाबी साफा बॉंधे हुआ था। गुलाबी पगड़ी निश्चित तौर पर उसे भीड़ से सर्वथा अलग
कर रही थी। ष्यह ही दयाशंकर होगा।ष् उसने अनुमान लगाया था पास आते ही उसकी नजरें
उसके चेहरे से जा चिपकी। सुगठित देहयष्टि, रोबदार चेहरा, चेहरे पर घनी-चौड़ी मूॅंछें, ओठों पर स्निग्ध मुस्कान, चश्मे के फ्रेम से झांॅकती-हॅंसती
बिल्लौरी ऑंखें देख वह प्रभावित हुई बिना न रह सकी थी।
पास आते ही वह किसी शरारती बच्चे की तरह चहकने लगा था। आइये... शशि जी!
आपका दिली स्वागत है। कहते हुए उसके दोनों हाथ आपस में जुड़ आये थे। शशि की नजरें
अब भी उसकी मोहक मुस्कान देख थम-सी गई थी। वह बार-बार अभिवादन कर रहा था। बार-बार
के आग्रह के बाद उसकी चेतना वापिस लौट आई थी और उसे अपनी भूल पर पश्चाताप सा भी
होने लगा था। अपने झेंप मिटाते हुए वह केवल प्रत्युत्तर में नमस्ते भी कह पाई थी।
अब वह उसके पीछे हो ली थी। कदम से कदम मिलाते हुए आगे बढ़ चली थी। जगह-जगह
प्रौढ़-प्रौढ़ाओं, युवक-युवतियों ने अपने-अपने घेरे बना लिये थे और खिलखिलाकर
हॅंसते-बतियाते जा रहे थे। चलते हुए वह बीच में रूक भी जाता और उसका परिचय भी
करवाता चलता। दया के बोलने-चालने का ढंग, ऑंखें मटमटाकर देखने का अंदाज गले की
माधुर्यता देख-सुन उसे ऐसा भी लगने लगा था कि ढेर-सारे घुॅंघरू एक साथ झनझना उठे
हों।
भीड़ को चीरता हुए वह डायस की ओर बढ़ चला था। डायस पर वर-वधू मंच की शोभा बढ़ा
रहे थे। एक नहीं बल्कि अनेकों कैमरे अपनी-अपनी फ्लैशों से चकमक-चकमक प्रकाश उगल
रहे थे। फोटोग्राफों को तनिक रूक जाने का संकेत देते हुए वह मंच पर जा खड़ा हुआ था।
वह भी उसका अनुसरण करती हुई मंच पर जा चढ़ी थी। मंच पर पहुॅंचते ही उसने अपनी बेटी
प्रभा का उससे परिचय करवाया। फिर वर से परिचय करवाते हुए वह फोटोग्राफरों की ओर
मुखातिब होते हुए फोटो लेने के लिए कहने लगा। कमरे क्लिक हो इसके पूर्व उसने अपनी
लंबी बलिष्ठ बॉंहें उसके कमर के इर्द-गिर्द लपेट लीं थी। कई-कई कैमरे एक साथ चमक
उठे थे।
एक अपरिचित-अजनबी आदमी उसकी कमर में एैसे-कैसे हाथ डाल सकता है? उसकी ये मजाल! उसका चेहरा तमतमाने लगा
था। ऑंखों में क्रोध उतर आया था। मुट्ठियॉं मीचने लगी थीं। इच्छा इुई कि कसकर
चॉंटा जड़ दे पर एक अनजान शहर में अपरिचित-अनचीने लोगों के बीच वह ऐसा कैसे कर
पाएगी। वह सोचने लगी थी। किसी तरह अपने क्रोध को दबाते हुए उसने उसके हाथों को झटक
दिया और स्टेज पर से उतर आई।
होश में लौटते हुए उसने महसूस किया कि उसका स्थूल शरीर अब भी अपनी सीट पर
पसरा पड़ा है। गाड़ी अपनी गति से सरपट भागी जा रही है। उसने अपनी हथेली से माथे को
छुआ। पूरा चेहरा पसीने से तरबतर हो आया था। पर्स में से रूमाल निकालते हुए उसने
चेहरे को साफ किया। खिड़की का शीशा नीचे उतारा। ठण्डी हवा के झोंकों के अंदर आते ही
उसने कुछ राहत-सी महसूस की। एक कल्पना मात्र ने सचमुच उसे बुरी तरह से डरा ही दिया
था। अब वह एकदम नार्मल-सा महसूस करने लगी थी।
वह कुछ और सोच पाती, उसकी गाड़ी एक झटके के साथ, एक मण्डप के पास आकर रूक गयी थी। उसने
खिड़की में से झॉंककर देखा। हू-ब-हू वही मण्डप सामने चमचमा रहा था जैसा कि उसने कुछ
समय पूर्व कल्पना लोक में विचरते हुए देखा था। गाड़ी के रूकते ही एक भद्र पुरूष
उसके तरफ आते दिखाई दिया।
आगन्तुक की चाल-ढाल में चीते की सी चपलता थी। अब वह गाड़ी के काफी नजदीक तक
आ पहुॅंचा था। उसकी नजरें अपरिचित व्यक्ति के चेहरे से मानो चिपक सी गई थी। वही
रोबदार चेहरा। घनी-चौड़ी मूॅंछें। ग्रे कलर की टाई। ओंठों पर थिरकती मुस्कान।
सुनहरे चश्मे से झॉंकती बिल्लौरी ऑंखे। शिष्टता से उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये
थे और स्वागत कहते हुए उसे गाड़ी से नीचे उतरने प्रार्थना करने लगा था।
शशि का माथा चकराने लगा था। वह मन ही मन सोचने पर विवश हो गई थी-ष्ऐसे कैसे
हो सकता है?ष् जैसा कुछ सोच रखा था वैसा ही वह अपनी खुली ऑंखों से देख रही थी।
उसे तो ऐसा भी लगने लगा था कि वह सचमुच में तिलस्म के उस मुहाने पर आकर खड़ी हो गई
है, जहॉं से उसे अंदर प्रवेश करना है।
आइये... शशि जी अंदर चलते हैं, कहता हुआ वह आगे बढ़ चला था। वह भी
किसी मंत्रमुग्ध हिरनी की तरह उसके कदमों से कदम मिलाते हुए पीछे-पीछे चलने लगी
थी। भीड़ को लगभग पीछे चीरते वह निरंतर आगे बढ़ रहा था। बीच-बीच में रूकते हुए वह
मेहमानों-स्वजनों से बतियाता-पूछता चल रहा था कि उन्हें कोई असुविधा तो नहीं हो
रही है।
हतप्रभ थी शशि कि उसने उसका परिचय किसी से
भी नहीं करवाया। अब वह स्टेज की ओर बढ़ने लगा था। स्टेज पर पहुॅंचते ही उसने शशि का
परिचय अपनी पुत्री प्रभा से करवाया। फिर होने वाले दामाद से। परिचय करवाने के बाद
वह फोटोग्राफरों को तस्वीर लेने की कहने लगा था। एक ज्ञात भय फिर मन के किसी कोने
से बाहर निकल आया था। वह सोचने लगी थी कि फोटो लेते समय वह उसके कमर में हाथ डाल
देगा। पर उसने ऐसी-वैसी हरकतें बिलकुल भी नहीं की थी। उसकी कल्पना दूसरी बार भी
निर्मूल सिद्ध हुई थी।
छोटे-मोटे नेग-दस्तूर, वरमाला फिर भॉंवरे निपटाते-निपटाते
पूरी रात कैसे बीत गई, पता ही नहीं चल पाया। बारात अब बिदा होने को थी। बिदाई की सारी रश्में
पूरी की जा चुकी थी।
बिदाई के भावुक क्षणों में प्रभा अपने
प्रिय पापा को गले लगकर जार-जार रोई जाने लगी थी। शशि का कलेजा जैसे बैठा जा रहा
था। उसकी ऑंखां से भी ऑंसू छलछला पड़े थे। अब वह शशि से लिपटकर रो पड़ी थी। प्रभा को
गले लगाते हुए उसे अपनी बेटी ग्रुशा की याद हो आई। काश! वह पास होती। संभव है, उसकी भी अब तक शादी हो चुकी होगी।
प्रभा के हमउम्र तो वह होगी ही। वह सोचने लगी थी बिदाई के जीवंत एवं भावुक क्षणों
के बीच बहते हुए एक मर्मान्तक पीड़ा का पहली बार अनुभव कर रही थी।
बारात के बिदा हो जाने के बाद दया की
हालत देखकर वह सिहर उठी थी। दया की हालत कुछ ऐसी बन गई थी कि जैसे किसी मणिधारक
सर्प से उसका मणि छीन लिया गया हो। ज्यादा देर तक उसकी नजरें दया के चेहरे पर टिकी
नहीं रह पाई थी।
दया ने अपने आपको एक कमरे में कैद कर
लिया था। अपने कमरे में जाने के पूर्व उसने उसे ये कमरा दिखाते हुए कहा था कि वह
भी पूरी रात जागती रही है। अतः उसे भी थोड़ी देर सो लेना चाहिए। रही ढेरों सारी
बातें करने की तो वे बाद में भी की जा सकतीं हैं।
शशि ने स्पष्ट रूप से महसूस किया था कि
इस समय वास्तव में दया को आराम करने की सख्त आवश्यकता है। वह स्वयं भी प्रश्नों को
छेड़कर उसे और भी व्यथित नहीं करना चाहती थी।
कमरे की भव्यता एवं साज-सज्जा देखकर शशि
काफी प्रभावित हुई थी। डनलप के बिस्तरों को देख उसका भी मन कुछ देर सो जाने के लिए
मचलने लगा था। अब वह बिस्तर पर जाकर पसर गई थी।
उसके पोर-पोर में दर्द रेंग रहा था और वह
सचमुच में सो जाना चाहती थी, पर उसका मन से ताल-मेल नहीं बैठ पा रहा था।
रह-रहकर नए ख्याल और तिरोहित हो जाया करते थे।
काफी देर तक बिस्तर पर पड़े रहने के बाद
वह उठ बैठी। उसने खिड़की से झॉंककर देखा। दया का कमरा अब भी बंद पड़ा था। अब वह फिर
बिस्तर पर आकर पसर गई। थोड़ी-थोड़ी देर बाद उठती, खिड़की से झॉंकती, दरवाजा बंद पाकर फिर लौट आती।
बिस्तर पर पड़े-पडे़ उसे उकताई सी होने
लगी थी। दरवाजा खोलकर वह कारीडोर में निकल आई। बाहर आकर कुछ अच्छा सा लगने लगा था
उसे।
पॉंच-सात मिनिट ही खड़ी रह पाई
होगी कि उसने तीसरे कमरे से एक महिला को बाहर निकलते देखा। शकल-सूरत से वह दया की
बहन जान पड़ती थी। वह कुछ और सोच पाती कि वह महिला ठीक उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
महिला के हाथ में पूजा की थाली थी। थाली में दीप जल रहा था। शायद वह मंदिर जाने की
तैयारी में थी। वह कुछ कहना चाह रही थी कि महिला चहक उठी।
देखिये बहन जी... हम आपको न तो जानते हैं
और न ही पहचानते हैं। बस इतना जरूर जानते हैं कि दया भैया ने आपको अपने विशेष कक्ष
में ठहराया है, जाहिर है कि आप हमारे खास मेहमान हैं। हम अकेले ही रघुनाथ मंदिर जा
रहे हैं दर्शनों के लिए। आप साथ चलना चाहें तो चल सकते हैं। हम जब भी कभी यहॉं आते
हैं, रघुनाथ मंदिर जाना कभी नहीं भूलते।
बड़ी शांति मिलती है वहॉं जाकर।
शशि देख-सुन रही थी। आगन्तुक महिला
लगातार बोले जा रही थी। कुछ लोगों को ज्यादा ही बोलने की आदत होती है। बोलते समय
वे आगे-पीछे कुछ भी नहीं देखते और बातों ही बातों में अपने मन की बात उगलकर रख
देते हैं। वे इस बात से भी अनभिज्ञ रहते हैं कि कोई उनकी बातों से नाजायज फायदा भी
उठा सकता है। बातों के दौरान उसने सहज रूप से अपना परिचय खुद ही दे दिया था कि वह
दया की बहन है। दया की बहन है यानि दया के बारे में सब कुछ जानती है। उस रहस्यमय
तिलस्म की गइराई में उतरने के लिए यह महिला सीढ़ी का काम बखूबी कर सकती है। वह मन
ही मन सोच रही थी, उसने तत्काल निर्णय ले लिया कि वह मंदिर अवश्य जाएगी।
गाड़ी भीड़भाड़ वाले इलाके के बीच से होकर
गुजर रही थी, वह उसे बातों में उलझाये रखती। दरअसल धीरे-धीरे वह अपने मकसद की ओर
बढ़ना चाह रही थी। बातों के दौरान वह दुकानो-मकानों के साइन-बोर्ड भी पढ़ते चलती।
उसने शशिप्रभा मिडिल स्कूल का बोर्ड देखा। उसे हैरानी-सी होने लगी थी। रास्ते में
आगे बढ़ते हुए अपने नाम के कई बोर्ड देखे-शशिप्रभा हाईस्कूल, शशिप्रभा नारी-ज्ञान केन्द्र, शशिप्रभा कला केन्द्र। अपने नाम के
अनेक साइन-बोर्ड देखकर वह आश्चर्य से दोहरी हुई जा रही थी। कौन शशिप्रभा! वह स्वयं
या कोई और। यहॉं की कोई स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता-एम.एल.ए. है अथवा सांसद। अब वह
अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पा रही थी। उसने भावावेश में उस महिला से इसके बारे
में जानकारी लेनी चाही। शशि को अब दया के बहन के उत्तरों की प्रतीक्षा थी।
लम्बी चुप्पी तोड़ते हुए उस महिला ने
अपना मुॅंह खोला था ष्देखिये बहन जी... जब आपने पूछा ही है तो हमें बतलाना ही
पड़ेगा...। मगर हम यह नहीं जानतीं कि आप बीती बातों को जानकर क्या करेंगी।
जानकारी लेने में कोई बुराई भी तो नहीं
हैण् शशि ने अपने सारे हथियार डालते हुए उसकी ऑंखों की गहराई में उतरते हुए पूछा
था।
ष्यही कोई सत्रह-अठारह साल पुरानी बात है। भैया
के साथ एक लड़की पढ़ती थी उसका नाम शशिप्रभा था। वे उसे मन ही मन चाहने लगे थे और
उससे शादी भी करना चाहते थे। भैया ने अपने मन की बात पिताजी पर जाहिर करते हुए
निवेदन करते हुए कहा था कि वे लड़की के पिता से मिलकर बात पक्की कर आएॅं। उस लड़की
के पिता ने इस रिश्ते पर अपनी स्वीकृति की मुहर भी लगा दी थी। जब हम नियत समय पर
बारात लेकर पहुॅंचे तो पता चला कि लड़की अपने याद के साथ पिछली रात ही घर छोड़कर भाग
गई थी। दया भैया इस बात को जानकर काफी दुखित हुए थे। उनका दिल जैसे टूट ही गया था
और उन्होंने उसकी समय जीवन भर अविवाहित रहने का फैसला कर लिया था।ष् अपने भाई की
व्यथा-कथा बतलाते-बतलाते सावित्री फफककर रो पड़ी थी। शशि का भी जैसे कलेजा बैठा जा
रहा था। वह भी अपने ऑंसुओं के आवेग को रोक नहीं पाई थी। अंतरवेदना में डूबते हुए
भी एक सवाल उसके दिमाग को मथ रहा था। आजन्म अविवाहित रहने की घोषणा करने वाले दया
ने अभी कुछ घण्टों पूर्व ही तो अपनी बेटी प्रभा को डोली में बिठाकर बिदाई दी थी
ऐसे कैसे संभव है कि शादी हुई नहीं और बेटी भी हो गई। अपने अंदर उमड़-घुमड़ रहे
प्रश्न को वह रोक नहीं पाई और उसने आवेग के साथ अपना प्रश्न दाग दिया था।
काफी देर तक शून्य में झॉंकती रहने के
बाद सावित्री ने बतलाया कि बारात के लौटने के साथ ही भैया किसी अन्यत्र स्थान की
यात्रा पर निकल गये थे। शायद वे घर लौटना नहीं चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि उस
लड़की की याद उसे जब-तब घेरकर उसे परेशान करती रहे। वे सब-कुछ भुला देना चाहते थे।
अपने यात्रा के दौरान वे एक भीषण रेल-दुर्धटना के शिकार हो गये। कई लोग इस हादसे
में मारे गये। शायद इनकी जीवन-रेखा लम्बी थी। वे बच गये किसी तरह क्षतिग्रस्त
डिब्बे से बाहर निकलने का सायास प्रयास कर रहे थे, उन्हें एक अबोध बालिका रोती-बिलखते
दिखी। इस बच्ची के मॉं-बाप इस दुर्घटना में मारे गये थे। भैया उस बच्ची को उठा
लाये और उसे विधिवत अपनी पुत्री की मान्यता दिलाते हुए उसका पालन-पोषण करने लगे।
उन्होंने मॉं-बाप दोनों की सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया। सच मानो, उस बच्ची के आ जाने से भैया की
जिन्दगी में एक परिवर्तन आता चला गया। उन्हांने अपने जीवन-मूल्यों को पहचाना और
प्यार की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए प्रयासरत हो गए। वे कॉलेज में
प्राध्यापक के पद पर थे ही, उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए भगीरथ
तप किया और एक के बाद एक स्कूल-कॉलेज खोलते चले गए।
अपने भाई के बारे में विस्तार से
जानकारी देने के बाद वह पुनः शून्य में झॉंकने लगी थी। सारी बातें जान चुकने के
बाद अब जानने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। शशि को लगा कि शब्द अंदर उतरकर उसका
कलेजा छलनी करने लगे हैं। भय-आशंका-दुःख-दर्द के स्वनिर्मित पर्वत जिनसे यदा-कदा
धधकता लावा उसके शिराओं में बहता रहा है, ध्वस्त होने लगे हैं। आकाश में
आच्छादित धूल-गुबार की धुंध अब धीरे-धीरे छॅंटने लगी थी और आशा-उत्साह का एक नया
सूरज क्षितिज में चमचमाने लगा था।
शुभ्र धवल प्रकाश में सराबोर होते हुए
उसे ऐसा भी महसूस होने लगा था कि वह स्वयं एक तराजू बनी खड़ी है, जिसकी अपनी दो भुजाएॅं हैं। एक तरफ
स्वार्थी-खुदगर्ज-लंफट उसका अपना पति अभिजीत खड़ा है, जिसे उसने अपने दिल की गइराइयों से
प्यार किया और प्यार के खातिर वह अपने मॉं-बाप, भाई-बहनों को रोता-बिलखता छोड़कर भाग
खड़ी हुई थी। बदले में उसे उसने क्या दिया? सिवाय दुःख-दर्द-कुण्ठाओं के। दूसरी
तरफ दया खड़ा है। उसने उसे अपने मन-मंदिर में बिठाकर पूजा-अर्चना की है। उसने प्यार
की कीमत को ऑंका है। प्यार कितना बहुमूल्य होता है, इस बात को उसने स्वयं अपनी ऑंखों से
उन विद्या-मंदिरों को देखा है जहॉं से ज्ञान की गंगा बहाई जा रही है।
और निर्णयात्मक द्वंद की स्थिति में
खड़ी वह सोचने लगी थी कि उसे अब किस ओर जाना चाहिए। एक तरफ अभिजीत के द्वारा
निर्मित दुनिया है। अब वह भूलकर भी वहॉं वापिस जाना नहीं चाहेगी। दूसरी तरफ दया के
द्वारा निर्मित दुनिया है, जहॉं उसे उसकी अनुपस्थिति में देवी का दर्जा दिया
गया है। वह वहॉं भी जाना नहीं चाहेगी। उसने तत्काल निर्णय लिया कि वह किसी तीसरी
दुनिया में चली जाएगी, जहॉं उसे न तो कोई जान पाएगा और न ही पहचान पाएगा। तीसरी दुनिया में
प्रवेश करने के अलावा अब कोई विकल्प भी नहीं बचा था उसके पास।
उसने ड्रायवर को निर्देश दिया कि वह
उसे रेल्वे-स्टेशन पर छोड़ता हुआ वापिस हो ले। स्टेशन के आते ही उसने झटके के साथ
गेट खोला और सरपट भागने लगी। दया की बहन इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा पाई कि शशि
ऐसा भी कुछ कर सकती है। गाड़ी की खिड़की से गर्दन बाहर निकालते हुए वह चिल्लाए जा
रही थी कि जाने के पूर्व उसे अपना नाम पता तो बतलाती जाए। पर उसे सुना-अनसुना करते
हुए वह सरपट भागी जा रही थी।
प्लेटफार्म पर पहुॅंचते ही उसने देखा
कि कोई गाड़ी स्टेशन छोड़ रही है। अब वह दुगुनी ताकत के साथ भागने लगी थी। भागते हुए
किसी तरह वह अपने आप को एक कोच में चढ़ा पाई थी। ट्रेन ने अब अपनी स्पीड पकड़ ली थी।
कोच में एक सीट पर बैठते हुए वह अपनी
अनियंत्रित हो आई सॉंसों को नियंत्रित करने में लग गई थी नार्मल होते ही उसने
खिड़की में से झॉंकते हुए बाहर देखा, सब कुछ दु्रतगति से पीछे छूटते चला जा रहा था।
धनिया
भिनसारे उठ बैठती धनिया और बाउण्ड्री
वाल से चिपकर खड़ी हो जाती। उसकी खोजी नजरें, पहाड़ों की गहराइयों में अपना गांव
खोजने में व्यस्त हो जातीं। गहरे नीले-भूरे रंग के धुंधलके की चादर ताने, जंगल अब तक सो रहा था। इक्का-दुक्का
चिडिय़ा फरफरा कर इस झाड़ से उड़ती और दूसरी पर जा बैठती। सोचती, आज तो कड़ाके की ठंड है। पंखों को
फुलाकर वह अपने शरीर को गर्माने लगती।
काफी देर बाद सूरज उगा। उनींदा सा।
अलसाया सा। थका-थका सा। पीलापन लिए हुए। जंगल में अब भी कोई हलचल नहीं हो रही थी।
चारों तरफ सन्नाटा, मौत की सी खामोशी लिए पसरा पड़ा था।
सूरज अब थोड़ा ऊपर उठा। उसकी किरणों
में अब तीखापन आने लगा था। धुंधलका अब पिघलने सा लगा था। तिस पर भी गांव दिखलाई
नहीं पड़ा। नजरें गड़ाकर उसने यहां वहां चलने का प्रयास किया तभी धुएं की एक पतली
सी रेखा आसमान की ओर उठती दिखलाई पड़ी, उसने सहज ही अन्दाजा लगा लिया कि वहीं
कहीं आसपास उसका अपना गांव होगा, तभी एक बड़ी सी चील सरसराती हुई उसके करीब से
गुजरी और देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गई।
उसे अपनी मां की याद हो आयी। गर्मी के
दिनों में महुआ खूब फलता था। साल भर खाने पुरता इक_ा कर लेती वह। फिर आंगन में फैलाकर
सुखाती और फिर एक बड़े से मंधुले में भरकर रख देती। जब चारों ओर मूसलाधार बारिश हो
रही होती तो वह मिट्टी की हांडी में पकाती। बापू को दारू पीने का बड़ा शौक था, एक बड़े से मटके में महुआ सड़ाता। फिर
आग पर चढ़ाकर पोंगली लगाता। गरमागरम बूंदें नली से टपाटप टपकने लगतीं। जब ढेर सारी
इक_ी हो जाती तो देवी-देवताओं के नाम
चढ़ाना कभी नहीं भूलता।
सांझ के गहरा जाने के साथ ही चांद भी
निकल आया। सब लोग धीरे-धीरे एक जगह इक_ा होने लगे। बापू आले में से मटका उठा
लाता। एक दोना भर दारू उसने देवता पर उड़ेला। फिर बारी-बारी से सभी स्वाद चखने
लगे। बूढ़े-मरद, औरतें, यहां तक कि बच्चे भी दारू गटकते। जब सिर पर अच्छा खासा नशा सवार हो
जाता तो वह टिमकी उठा लाता। कोई झांझर उठा लाता तो कोई तुरही। बापू टिमकी गजब की
बजाता है। बीच-बीच में दोहरे डाले जाते और टिमकी की टिमिक-टिमिक पर सभी औरत-मर्द
एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरकने लग जाते। वासना से कोसों मील दूर जनजातियां
इसी तरह के उत्सव मनाया करते रहती हैं।
एक दिन मां आंगन में बैठी, महुआ सुखा रही थी, तभी बच्चों का एक हुजूम हो-हल्ला
मचाता हुआ उधर से आ निकला। मां को अकारण ही क्रोध आ जाता है। वह बच्चों को मारने
दौड़ पड़ती है। इस अप्रत्याशित घटना से भीड़ बिदक जाती है। बच्चे तितर-बितर होकर
पहाड़ उतरने लगते हैं। धनिया भी भला, पीछे रहने वाली कहां थी। वह भी भीड़
का हिस्सा बनी पहाड़ उतरने लगती है। पहाड़ उतरते समय उसे ऐसा लगता है कि वह चील
बनी आकाश में उड़ रही है, उसके दोनों हाथ दाएं-बाएं फैल जाते हैं। अपने
डैनों को विभिन्न मोड़ देते हुए वह पहाड़ उतरने लगती है और एक विशेष प्रकार की
आवाज निकालने लगती है।
भीड़ देनवा के तट पर आकर ठहर जाती है।
दूर-दूर तक फैली रेत पर बच्चे पसर जाते हैं और थकान मिटाने लगते हैं। कल्लू को पता
नहीं क्या सूझा। उसने अपनी कोपिन उतार फेंकी और गहरे पानी में छलांग लगा दी। फिर
क्या था देखा-देखी सब वैसा ही करने लगे।
जी भर कर तैरते-उतराते रहने के बाद लग
आती भूख। दो-दो, तीन-तीन की टोलियां बनाई जातीं। टोलियां अब चारों ओर बिखर जातीं। जब
वापिस होतीं तो किसी के हाथ में कंदमूल-फल होते, तो कोई महुआ ही बीन लाती। ढेर सारी
खाने की चीजें इक_ी हो जातीं। तब लकड़ी-कण्डा बीनने लग जाते। जब अच्छा-खासा ढेर इक_ा हो जाता तो चकमक से आग पैदा की जाती
और ढेर में लगा दी जाती। लाल-लाल दहकते अंगारों पर चीजें भूनी जाने लगतीं। भुने
हुए महुए की मादक गंध से भूख और करारी हो उठती। आग खूर-खूरकर दोनों हाथों से
बंदरों की तरह खाने भिड़ जाते। जब हलक तक पेट भर जाता तो प्यास सताने लगती।
टिंगरा-टिंगरा पानी में उतर कर, पसो से पानी पीने लग जाते। खेल ही खेल में पता
नहीं चल पाता कि सूरज सिर पर चढ़ आया है ... अब घर की याद सताने लगती। भीड़ अब
अपने घरों को लौट पड़ती।
धनिया ने एक वृक्ष की ओर देखा। मां
बाहर ही बैठी हुई है। लकड़ी का टुकड़ा अब भी पास पड़ा था। आज जमकर धुनाई होगी, उसने मन ही मन सोचा। एक डर गहरे तक
उतर आया जिसने उसे लगभग कंपा ही दिया। घर तो पहुंचना ही पड़ेगा, चाहे पिटाई ही क्यों न हो जाए। यह
सोचते हुए वह आगे बढ़ती रही। मां ने उसे लौटते देखा। अपनी टोकनी उठाई और आगे बढ़
गई।
धनिया को मालूम है कि मां इस वक्त
कहां जायेगी। वह सीधे खेत पहुंचेगी जहां बापू और दादू उसका इंतजार कर रहे होंगे।
वह बड़ी सुबह ही खेत चले जाते हैं, खेत यही कोई ढाई तीन एकड़ का होगा, जिसमें वे हल-बख्खर चलाकर बोआई के लिए
तैयार करेंगे। बापू इस बीच लकडिय़ां काट लेता है, कभी-कभी चार-चारोली भी इक_ी कर लेता है। हाट के दिन वह इन्हें
बेचेगा। धनिया भी बापू के पीछे-पीछे हाट जाती है। जब भी वह हाट जाती है, गोलू हलवाई की दुकान से गुड़ की
जलेबियां खाना नहीं भूलती। रकम अच्छी मिली तो चूड़ी कंघा-रिबिन का भी सेजा जम जाता
है अथवा एकाध फ्राक व्राक का भी। गुड़ की जलेबी की याद आते ही उसके मुंह में मीठास
घुलने लगी।
दोनों को दूर से आता देख वे खेत से
निकलकर एक सघन वृक्ष के नीचे बैठकर सुस्ताने लगते हैं। मां धीरे से अपनी पोटली
खोलती है। ज्वार-बाजरा अथवा महुआ की मोटी-मोटी रोटी सभी के हाथ में पकड़ाते जाती
है फिर उस पर टमाटर की चटनी अथवा बेसन या फिर प्याज हरी मिर्च व नमक रख देती है।
हौले से निवाला तोड़कर वे मुंह में भरकर चबाने लगते हैं। जब पेट भर जाता है तो
नारियल की नरेटी से पानी लेकर अपनी प्यास बुझाते हैं। धनिया को भूख तो थी नहीं, अत: वह ना-नुकुर करने लगती है। उसकी
नजरें तो मचान से चिपकी हुई थीं, पलक झपकते ही वह मचान पर जा चढ़ी और बंदरों की सी
हरकतें करने लगी। दादू ने एक मचान बना रखा था खेत में। फसल जब लहलहा रही होती है
तो दादू उस पर बैठकर जागली करता है। गोफन भी चलाता है। गोफन से छूटा पत्थर बड़ी
तेजी के साथ सूअर के थूथने पर पड़ता है तो वह भयंकर चीख के साथ भाग खड़ा होता है।
जंगली सूअर से खेतों को ज्यादा ही नुकसान होता है। शाम ढलने से पहले सभी घर लौट
आते। बैलों को कोठे में बांधकर बापू उनको चारा-पानी डालता है। फिर बाप-बेटे दोनों
ओसारी में बैठकर बतियाने लगते हैं। बतियाते हुए धुक-धुक करके बीड़ी का धुआं भी
उगलते जाते हैं। वैसे दादू को चिलम पीना कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता है।
मां आले में रखा भपका जला देती है।
पीली-पीली रोशनी से झोंपड़ी नहा उठती है। अब वह चूल्हा जलाकर आटा रांधने लगती है।
खाना खा चुकने के बाद सभी अपनी कथड़ी-गोदड़ी में दुबक जाते हैं। मां भपका बुझा
देती है। भपके के बुझते ही काला-कलूटा अंधियारा झोंपड़ी में घुस आता है। मां के
पास ही सोती है धनिया। सोते समय खुरदरी हथेलियों से सिर को सहलाती और बालों में
उंगलियां चलाती रहती। बीच-बीच में किसी जंगली जानवर का गुरगुराना तो कभी जंगल के
राजा का दहाडऩा सुनाई दे जाता। शेर की दहाड़ सुनकर वह मां के सीने से चिपक जाती।
मां के धड़कते दिल की आवाज उसे साफ-साफ सुनाई पड़ती। जब आदम जात का सोने का वक्त
होता है जो जंगली जानवर के जागने का वक्त हो जाता है। जंगली जानवर रात में शिकार
पर निकल पड़ते हैं। उनींदे से हो आए लता-वृक्ष शेर की दहाड़ सुनकर चौंक-चौंक पड़ते
हैं। डरे सहमे से ये वृक्ष शायद ही अच्छी नींद में सो पाते होंगे। शेर जब ऊपर मुंह
करके दहाड़ता है तो डाल पर बैठा मोर अथवा बंदर मारे डर के टपक पड़ता है। और शेर का
शिकार हो जाता है। बापू ने झोंपड़ी के चारों ओर कांटों का सघन बाढ़ लगा दिया था
ताकि कोई जानवर अंदर न घुस आए। बाड़ी के उस पार कभी किसी जंगली जानवर की गोल-गोल
कंचे की सी आंखें चमकती दिखलाई दे जातीं। आंखें ऐसी चमकतीं जैसे अंधेरी रात में कोई
हीरा जगमगा रहा हो। मां उसे हिम्मत बंधाने की गरज से यह सब दिखाने की कोशिश करती।
पर वह उसके सीने से जोर से चिपट जाया करती।
पूरा परिवार सूरज की पहली किरण के साथ
ही जाग जाता। जम्हाते हुए धनिया उठ बैठती और आंखें मलते हुए प्रकृति का नजारा
देखने लग जाती। लाल-पीले सुनहरे रंग से जंगल मुस्कराने लगता। पहाड़ों की उंचाइयों
से उतर रही देनवा का पानी ऐसे लगता जैसे सोना पिघलकर बहा जा रहा हो।
खुशनुमा सुबह नहीं थी आज की।
भयमिश्रित मातमी एकांत में भीगी हुई थी। दादू को तो जैसे काठ मार गया था। मां के
अंदर गहरे तक मोम ही जम आई थी। दादू से गिड़गिड़ाते हुए उसने कारण जानना चाहा तो
उसकी बूढ़ी आंखों से टपाटप आंसू बह निकले और जब वह मां के पास पहुंची कारण जानने, तो बजाय कुछ कहने के उसने उसे सीने से
चिपका लिया और फफक कर रो पड़ी। वह लगातार रोए जा रही थी। शंका और कुशंकाओं के
जहरीले नाग उसके कोमल मन में, आंगन में, यहां वहां विचरने लगे थे। जब मां ने
जी भर रो लिया और बतलाया कि उसका बापू पहाड़ी के उस पार गया, लौटकर नहीं आया। लगता है कि किसी
चुड़ैल ने उसे फंसा लिया है। चुड़ैल तक तो बात ठीक थी पर 'चुड़ैल ने फंसा लिया हैÓ यह जुमला उसकी समझ में नहीं आया। उसने
फंसाने का अर्थ मां से पूछा, तो उसने एक ही उत्तर दिया कि जब बड़ी हो जायेगी, तो खुद-बखुद समझ जायेगी कि फंसाना
क्या होता है। अपनी सहेलियों एवं मित्रों से उसने इस गुत्थी को सुलझाना चाहा, पर असफलता ही हाथ लगी थी, वह बार-बार सोचती कि बापू पहाड़ी के उस
पार क्या करने गया होगा। तभी उसे ध्यान आया कि एक दिन दादू ने कहानी बतलाते हुए
कभी बतलाया था कि पहाड़ी के उस पार किसी रानी का राज है। वहां मरद नाम का कोई
प्राणी नहीं रहता। उसकी फौज-फटाका में भी औरतें ही रहती हैं। यदि कोई मरद धोखे से
उस ओर चला गया तो जिन्दा वापिस नहीं लौटा है। यह ठीक है कि बापू वहां चला गया होगा, रानी ने बापू को फंसा लिया होगा। पर
फंसाया किस चीज से होगा, उसकी समझ में नहीं आया। अब वह मां के कथन के
अनुसार बड़ी होने की सोचने लगी। धनिया अब सुबह-शाम मां के पल्लू से ही चिपकी रहती।
अंदर से बरफ क ी सी ठंडी हो चुकी मां की उसे अब ज्यादा ही चिन्ता रहती। बापू वापिस
आ जाये, इस वास्ते उसने न जाने कितने ही देवी-देवताओं की मिन्नतें मांगी थीं।
पर बापू जो गया तो लौटकर नहीं आया। एक दिन वह ओझा के घर जा पहुंची।
ओझा के घर में घुसने से पहले एक
तीखी-बदबूदार गंध उसकी नाक से आ टकराई। इससे पहले उसने ऐसी गंध नहीं सूंघी थी।
अंदर प्रवेश करते ही उसने देखा कि चारों तरफ जानवरों की खालें एवं ढांचे लटके पड़े
थे। ओझा एक ऊंचे से चबूतरे पर बैठा हुआ था और उसके ठीक सामने, एक धूनी जल रही थी, तथा पास ही इंसान की खोपड़ी व
हड्डियां पड़ी थीं। लाल-पीले-काले रंग से उसने अपने चेहरे को और भी वीभत्स बना
डाला था। मां को देखते ही उसने बड़बड़ाना शुरू कर दिया और आंय-बांय बकते हुए, उसने मु_ी में कुछ उठाया और आग पर दे मारा। एक
काला बदबूदार धुआं ऊपर-ऊपर तक उठ आया। डर के मारे उसकी तो घिग्घी ही बंध गई थी।
उसने मां की ओट लेते हुए बचने का प्रयास किया। मां अब जमीन पर बैठ गई और अपना
दुखड़ा सुनाने लगी। वह बार-बार हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती और कहती, जो भी मांगोगे दूंगी, पर धनिया के बापू को वापिस बुला लो।
ओझा, अब अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही, जोर-जोर से उछलकूद करने लगा। पता नहीं, क्या-क्या अर्र-सर्र बकता जाता। धनिया
ने गौर से देखा कि उसकी कामुक नजरें मां के जिस्म से बुरी तरह चिपकी हुई हैं। मां
के शरीर पर भरपूर गोश्त था। सिर के बाल जमीन से छू रहे थे। वक्ष उन्नत व कठोर थे।
साड़ी से कमर तक ढकने के बाद, उसने शेष साड़ी से पीठ और वक्ष ढक रखा था। इतनी
गोरी-चिट्टी थी मां कि उसके जैसी दूसरी कभी देखने में नहीं आई। हमारी जाति में औरत, मरद सभी काले कलूटे रहते हैं। बापू
उसे प्यार से गोरी-कबूतरी जो कहा करते थे। ओझा ने हूं-हां-हूं-हां बकते रहने के
बाद उसे रात में आने को कहा और यह भी कहा कि इस लौंडिया को साथ लेकर न आए। कुछ
विशेष जतन करना होगा, तीसरे दिन तेरा मरद वापिस आ जायेगा। रात में बुलाने का मतलब कुछ-कुछ
उसकी समझ में आ रहा था। फिर भला मां को तो अच्छी तरह समझ में आ ही गया होगा। मां
दुबारा पलटकर वहां नहीं गई और न ही उसने कभी जाने का मानस ही बनाया।
बापू के जाने के बाद से, मां में एक कठोरता घर कर गई थी, जो उसके व्यवहार से साफ झलक भी आया
करती थी। अंदर तक वह इतने क्रोध में भरी हुई होती थी कि जब वह किसी लकड़ी के ल_े पर, कुल्हाड़ी का भरपूर वार करती तो वह फक
से दो टुकड़ों में बंट जाता था। एक दिन वह लकड़ी काटने जंगल में घुसी तो आदमखोर के
हत्थे चढ़ गई। लोगों ने जंगल की खाक छान मारी, पर मां का कहीं भी पता नहीं चला। कुछ
दिन बाद उसके शरीर का पिंजड़, एक ऐसी जगह मिला, जहां आम आदमी का पहुंच पाना संभव नहीं
था।
मां और बापू के इस तरह चले जाने के
बाद से दादू और व्यथित सा रहने लगा। उसके मन में अब एक ही आस बची थी कि वह किसी
तरह उसके हाथ पीले कर दे और चैन से मौत को गले लगा ले। पर क्या वह उसके बस में था।
समय पंख लगाकर उड़ता रहा। दादू के कलेजे में लगे जख्म शायद ही भर पाए होंगे। इसका
अहसास उसे भी बराबर बना रहता। वह खुद भी दोनों के वियोग में कितना तड़पती रहती है, यह तो उसका अपना दिल ही जानता है।
दादू की देखरेख करते, घर का कामकाज सम्हालते, उसे पता ही नहीं चल पाया कि बचपना
रेंगकर कब जवानी की देहलीज पर आ पहुंचा। बूढ़ी हड्डियां कब तक जोर मारतीं। एक बार
वह बिस्तर से जा लगा, तो दुबारा उठ न पाया।
दिन पर दिन गिरती उसकी हालत को देखकर
चिन्तित हो उठी वह। अगर उसका दादू यूं ही चल बसा तो उसका क्या होगा। यह ख्याल उसे
बेचैन कर देता। अपने दादू के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थी। मूसलाधार बारिश हो
रही थी। बिस्तर पर पड़ा दादू हिचकियां ले रहा था। जब वह सांस लेता तो खर्र-खर्र की
आवाज आती जो दूर तक सुनाई पड़ती। असह्ïय दर्द से वह बीच-बीच में चीख भी
पड़ता था।
धनिया के जी में आया कि दौड़कर ओझा को
बुला लाए। शायद उसका जन्तर-मन्तर कुछ काम आ जाए और दादू बच जाये, तभी उसको पिछली घटना याद हो आई। मां
भी तो गई थी ओझा के पास। बापू को वापिस लिवा लेने के लिए। मां के गदराए जिस्म को
देखकर वह किस प्रकार की हरकतें करने लगा था। उसे आज भी याद है। तभी उसकी नजर अपने
समूचे जिस्म पर दौड़ पड़ी। मां ही के जैसी तो दिखती है वह भी। उसने उसके ही जैसा
जिस्म पाया है, जो कपड़े में नहीं समा पा रहा है। फिर साड़ी तो चिन्दी-चिन्दी हो आयी
है और फटी जगह से उरोज बाहर तक उचक आए हैं। क्या ऐसी हालत में उस दरिन्दे के समीप
जाना उचित होगा उसका। तरह-तरह के प्रश्नों के पहाड़ खड़े हो गए थे उसके सामने
जिसके उस पार जाने की वह न तो हिम्मत जुटा पाई और न ही उसमें उतनी सामथ्र्य थी।
असमंजस की स्थिति में उसे डाक्टर का ध्यान हो आया। आशा की एक किरण कौंधी और बारिश
केे थमते ही वह सरपट दौड़ पड़ी डाक्टर को लिवा लाने। घिर आई सांझ में उसके मन में
न तो किसी हिंसक पशु के खौफ का ही डर समाया और न ही कंटीली ऊबड़-खाबड़ रास्तों की
चुभन। वह सरपट बिना रुके ही चली आई थी, डाक्टर को लिवा लाने। वह तब तक दौड़ती
रही जब तक डाक्टर का मकान नहीं आ गया।
अजीब खब्ती किस्म का था यह डाक्टर।
शहरों की चकाचौंध से दूर वह इस बीहड़ में चला आया था। शोषित-पीडि़त-अज्ञानी
आदिवासियों की सेवा करने का जुनून सवार था उसके सिर पर। चढ़ती दोपहरी तक वह अपने
दवाखाने में इलाज करता फिर पहाड़ों की तलहटी में बसे गांवों में घुस पड़ता।
ऊबड़-खाबड़ रास्तों के बीच चलता। कभी उसका वास्ता जंगली जानवरों से भी पड़ता। पर
वह निर्भीक अपनी ही धुन में रमा रहता। दिन में दो-चार गांवों की फेरी लगा लेना
उसकी आदत सी बन गई थी। पत्नी-बच्चे और मां भी उसने ऐसे ही पाये थे जिन्हें आदिवासी
जनजीवन से गहरा लगाव था।
अपने ही विचारों की तंद्रा में खोई थी
धनिया। तभी उसकी नजर बाउण्ड्री वाल से ठीक सटकर, पहाड़ों के उतार में उतर रही पगडण्डी
पर पड़ी। उसने सहज में ही अंदाजा लगा लिया कि यह वही पगडण्डी है, जिस पर चलकर वह यहां दूसरी बार आई थी।
पहली पहल जब, उसका दादू सख्त बीमार पड़ गया था और दूसरी बार वह डाक्टर के साथ चली
आई थी सदा-सदा के लिए दुबारा वापिस न लौटने के लिए।
दादू के मरने की खबर प्राय: आसपास के
सभी गांवों में फैल गई थी। आहत ओझा ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाने की सोची। अपने
दो-चार लग्गू-भग्गूओं के साथ वह आ धमका था। क्रोध से भरा हुआ वह थर-थर कांप भी रहा
था। प्राय: सभी के हाथ में कोई न कोई हथियार था। आते ही उसने डाक्टर को घेर लिया और
उपस्थित समुदाय को उसके विरुद्ध भड़काने लगा। उसका अपने हक में ऐसा किया जाना भी
शायद अनिवार्य था क्योंकि उसका फलता-फू लता धंधा एकदम चौपट जो हो गया था। आदिवासी
लोग अब उसके पास न जाकर, सीधे डाक्टर के पास चले जाया करते थे। बीमार पडऩे
पर वहां उन्हें दवा-दारू भी मिलती और वे शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ पा लेते थे।
डाक्टर की पत्नी आदिवासी बच्चों को पढ़ाती थी। शायद यही कारण था कि इस दम्पति के
आने के बाद से इनके जीवन स्तर में अच्छा खासा परिवर्तन आ गया था। इस बात को
रेखांकित करना भी लोग नहीं भूले थे। शायद यही कारण था कि उसके भड़काऊ भाषण का किसी
पर भी असर नहीं पड़ा था बल्कि लोगों ने उसके विरुद्ध मुंह खोलना भी शुरू कर दिया
था। अपने ही समाज में, जहां उसे सिर आंखों पर बिठाया जाता था आज बेइज्जत किया जाने लगा था।
डाक्टर के बढ़ते प्रभाव व अपनी घटती इज्जत से वह बुरी तरह बौखला सा गया था और अंदर
गहरे तक आहत भी हो उठा था।
सारे क्रियाकर्म निपट जाने के बाद वह
डाक्टर के साथ हो ली थी। दादू की स्वयं की भी यही इच्छा थी कि वह डाक्टर के साथ
चली जाए। दादू के मन में एक अज्ञात भय ने घर कर लिया था कि वह अकेली इस बीयावान
में कैसे रह पायेगी। अत: मरने से पहले उसने लडख़ड़ाती जबान से डाक्टर से अनुनय किया
था कि वह उसे अपने साथ ले जाये— रूखा- सूखा जो भी इसे मिलेगा खाकर रह लेगी और घर
के कामकाज कर देगी। आश्वस्त होने के बाद ही बुड्ढे ने अपने प्राण त्याग दिए थे।
डाक्टर जब उसे अपने साथ लिवा लेने लगा तब भी ओझा ने खासा विरोध किया परन्तु उसे
असफलता ही हाथ लगी थी। बदला लेने की प्रतिज्ञा के साथ ही वह जंगल में समा गया था।
ओझा के रौद्र रूप का ख्याल आते ही वह
आशंकित हो उठी थी। उसकी आशंका कुछ ज्यादा ही बलवती हो चली थी कि ओझा, डाक्टर से भी बदला जरूर लेगा। अत:
डाक्टर को भी चाहिए कि वह अकेला घाटी में न उतरे बल्कि अपने साथ किसी न किसी को
लेकर अवश्य चला करे।
पहाड़ों की गहराई में नजरें झुकाए
धनिया अपने अतीत के भंवर में गोते खा रही थी। पता नहीं, वह और कितनी देर पाषाणी प्रतिमा बनी
बैठी रहती यदि दादी आकर उसे झकझोर न देती।
जब तक अपने ठाकुर जी की पूजा पाठ और
रामायण का एक मास पारायण नहीं कर लेती दादी तब तक वह अनाज का एक दाना भी हलक के
नीचे नहीं उतारती थी। पूजा पाठ समाप्त कर उन्हें भूख भी लग आई होगी और उन्होंने
मुझे ढूंढऩा शुरू किया होगा। जब पूरा घर छान मारा उन्होंने और मुझे कहीं नहीं पाया
होगा तो वे चिन्तित अवश्य हो उठी होगी और मुझे यहां खड़ा पाया तो चली आई लेने।
धनिया ने अपने आप से कहा। दादी को सामने पा वह मुस्कराने लगी। दादी ने नीचे झांककर
देखा। एक गहरी निस्तब्धता कुण्डली मारे बैठी थी, उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में बोलते
हुए पूछा, ''क्यों री तू रोज यहां खडी होकर क्या देखती है- मुझे तो कुछ भी दिखाई
नहीं पड़ रहा है।ÓÓ धनिया की समझ में नहीं आया कि वह दादी को क्या और कैसे समझाए कि उसका
अपना अतीत इन्हीं गहराईयों में कहीं दफन हो चुका है और आज वह भूत बनकर उसका पीछा
कर रहा है। जवाब न देते हुए वह दादी को बांहों का सहारा देते हुए घर की ओर लौट
पड़ी।
गहरी नींद में सो रही धनिया।
चर्र-मर्र चर्र-मर्र की आवाज सुनकर वह जाग गई। उसने ध्यान से उस आवाज को पहचानने
की कोशिश की— अरे- ये तो बैलगाडिय़ों की चलने की आवाज है। याने कि कल हॉट भरेगा।
उसने सहज में अंदाज लगा लिया।
पहाड़ों के कंधों पर से एक सर्पाकार
सड़क रेंगते हुए आती है और इस गांव को छूते हुए दूर निकल जाती है। सड़क कहां से
आती है और कहां चली जाती है उसे नहीं मालूम, पर वह इतना जरूर जानती है कि व्यापारी
लोग दूर-दूर से अपनी-अपनी गाडिय़ों में माल लादे रातभर चलते हैं और सुबह यहां अपनी
दुकान सजाते हैं और माल बेचते हैं। सड़क के उस पार मैदानी इलाका है, जहां यह गांव बसता है, यहां अस्पताल है, गेस्ट हाउस है, रेस्ट हाउस है, रिहायशी मकान भी हैं। अब तो जगह-जगह
होटलों ने भी अपने पैर पसार लिए हैं। दूरदराज से सैलानी अक्सर यहां आते हैं, होटलों की शरण में रात बिताते हैं और
पौ फटते ही जंगलों में उतर जाते हैं। पहाड़ों की तहलटी में जलप्रपात है, पुराने महलों के भग्नावशेष हैं, प्रकृति यहां नित्य नूतन शृंगार करती
है। हिरण-बारहसिंगा, लोमड़ी-बायसन और भी न जाने कितने रंग बिरंगे पक्षी यहां डेरा डाले
रहते हैं। सामने वाली काली पहाड़ी पर से सूर्योदय व सूर्यास्त का नजारा देखने लायक
होता है। लोग-बाग यहां बड़े-बड़े कैमरे लेकर आते हैं और नयनाभिराम दृश्यों को कैद
करके ले जाते हैं। इन्हीं तलहटियों में सैकड़ों आदिवासी गांव अपनी धरोहरों एवं
परम्पराओं को जीवित रखते हुए, तिल-तिल करके मर रहे हैं। पल-पल मुसीबतों का
सामना करते हुए नंगे-अधनंगे रहते हुए, घास-पास की झोंपड़ी में सिर छिपाते
हुए भूखे-नंगे आदिवासी जन आज भी अपनी ही लीक पर चलने को मजबूर हैं। विकास के नाम
पर करोड़ों की राशि अधिकारियों व अफसरों द्वारा डकार ली जाती है। इन्हें कुछ भी
पता नहीं होता। यदि जान भी जाए तो इन्हें कोई शिकवा-शिकायत नहीं और न ही ये अपना
दुखड़ा लेकर किसी के पास जाते हैं। जो कुछ भी सहज-सुलभ उपलब्ध है उसी में जिंदगी
काट देते हैं। उदासी-लाचारी-मजबूरी जैसे घटिया शब्द शायद इनकी डिक्शनरी में लिखे
ही नहीं गए हैं। जो भी करते मिलजुल कर करते हैं। सुख तो इनके नसीब में लिखा ही
नहीं है। अक्सर सुख बांटने के चक्कर में ही झगड़े-फसाद मचते हैं। सुख है भी कहां
जिसे बराबर-बराबर बांटा जा सके। हिस्से में सभी के आते हैं दुख-तकलीफें। तो वे सब
हिलमिल कर बांट ले जाते हैं। दुख मिटाने का उपाय भी जानते हैं ये लोग। कड़वी घूंट
हलक के नीचे उतरी नहीं कि पांव थिरकने लग जाते हैं। समूची देहराशि नाच उठती है।
औरत मरद एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, घेरा बनाए घंटों नाचते रहते हैं।
टूटे-फूटे शब्दों में गीत भी मुखरित हो उठते हैं। क्या मजाल कि कभी किसी के मन जरा
सा खोट भी आ जाए। कभी-कभार कोई टंटा खड़ा हो भी जाए तो पंचायत बैठ जाती है और
फैसला हो जाता है। मन में गांठ बांधकर रहने की इनकी आदत ही नहीं है। पलभर को तकरार
फिर गले में हाथ डाले-हंसने बोलने लगते हैं। चार-चारोली, महुआ-लकड़ी गोंद न जाने कितनी ही
वनोपज लेकर ये हॉट आते हैं, इन्हें बेचकर मिट्टी का तेल व नमक खरीदना नहीं
भूलते। कभी-कभार अगर गंडे ज्यादा मिल गए तो अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदी जातीं।
लगभग सम्पन्नता की सोपानों पर चढ़ते
हुए भी, व्यापारी लूट-खसोट की परम्पराओं को बरकरार रखे हुए, हॉट में टूट पड़ते हैं। औने-पौने में
माल खरीदकर लाखों कमा लेते हैं। आदिवासी जन जानते हैं कि उन्हें लूट लिया गया है
फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक दिखलाई नहीं पड़ती। जानते हैं वे अपनी हद और सरलता
की हल्की फुल्की सी मुस्कान ओढ़े रहने की जैसे इनकी आदत ही बन गई है।
सप्ताह में एक दिन भरता है हॉट।
तरह-तरह की चीजें यहां सजने लगती हैं। गांव के बहुत सारे लोग हॉट में आएंगे। आएंगे
शब्द की कल्पना मात्र से वह रोमांचित हो उठी। सतिया, सलोजी, सोमत, झीनी, बसंती, कल्लू, भीमा, माखन इन सारे संगी साथी में से कोई न
कोई हॉट में मिलेगा। मिलते ही गले लग जाएंगे फिर एक कोने में बैठकर गपियाएंगे।
संभव हुआ तो गोलू हलवाई कीदुकान से जलेबी अथवा मूमपट्टी अवश्य ही खाई जायेगी।
जलेबी की याद आते ही मुंह में मिश्री सी घुलने लगी। वह चट से उठ बैठी और सीधे
बाथरूम में जा घुसी। उसे मालूम है कि इस वक्त चुन्नु-मुन्नु मांजी स्कूल के लिए जा
चुके होंगे। डाक्टर अपनी क्लीनिक के पास पहुंच चुके होंगे। दादी या तो पूजाघर में
बैठी गुरिया सटका रही होगी या घर में अस्त-व्यस्त फैले सामानों को करीने से सजा
रही होगी। फिर उसे खाना भी तो पकाना है। यदि पूजा समाप्त हो गई हो तो सीधे ठाकुरजी
के भोग के लिए कुछ मांगेगी। बिना नहाए-धोए चौके में घुसना यहां वर्जित सा है।
बाथरूम में घुसकर उसने अपने कपड़े
उतारे और नहाने बैठ गई। शरीर को सुंगधित साबुन से मलमल कर नहाने के बाद उसने कपड़े
बदलने शुरू किए। बाथरूम में टंगे आईने में उसने अपने शरीर को देखा तो बस देखते ही
रह गई। मैली-कुचैली सी रहने वाली धनिया का रूप रंग कितना खिल गया है, उसने मन ही मन निहारते हुए कहा और
आईने के और करीब खिसक आई। जरूरत से ज्यादा विकसित हो आए उरोजों को उसने छूकर देखा।
छूते समय उसकी उंगलियों के पोर, घुण्डियों से जा टकराए। एक अजीब सी सनसनी और
मादकता से उसका पोर-पोर थरथरा गया। लगा पूरा शरीर ही झंकृत हो उठा है। सुर्ख हो आए
लरजते ओंठ, उभरे हुए गालों पर एक छोटा तिल, शराबी सी हो आई आंखें देखकर खुद अपने
आपको रोक नहीं पाई और उसने आगे बढ़कर अपने अक्स को चूम ही डाला। अपने ही ओठों पर
ओंठ टिकाते समय उसने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि वह किसी अन्य लोक में पहुंच चुकी
है।
आहट पाकर वह चौंक पड़ी। उसकी नजरें
पुन: आईने से जा चिपकीं। देखा, ओझा उसे घूर रहा था। उसका माथा ठनका। ओझा और
यहां। हो सकता है वह बदला लेने के लिए यहां आ धमका हो। उसने पलटकर देखा। सचमुच ओझा
सामने खड़ा अपनी वीभत्स मुस्कान बिखेर रहा था। और बार-बार अपनी जीभ ओठों पर फेर
रहा था। उसका शरीर डर के मारे पीपल के पत्ते के मानिंद थरथर कांपने लगा। पता नहीं
कितनी देर से खड़ा वह उसकी नग्न देह को घूर रहा होगा। उसने तत्काल लपककर साड़ी
उठानी चाही। साड़ी के उठाते ही बघनखा एक ओर लुढ़क पड़ा। उसने उसे उठाया और बचाव की
मुद्रा में खड़ी हो गई। अब वह आक्रमण करना ही चाहती थी। जैसे ही उसने अपना हाथ हवा
में उछाला और उसकी ओर लपकी, वार खाली गया। वहां तो कोई भी नहीं है। बुदबुदाते
हुए उसने अपने आप से कहा। चारों ओर नजरें घुमाकर भी देखा। सचमुच वहां कोई भी नहीं
था। उसे अपने आप पर ही क्रोध हो आया। बघनखे को कमर में खोंसकर उसने साड़ी लपेटी और
बाहर आ गई। बाहर आकर उसने एक-एक कोना छान मारा कोई भी नहीं था वहां। उसने
बाउण्ड्री वाल के उस पार भी झांककर देखा। पहाड़ अपनी अनन्त गहराईयां लिए हुए
दूर-दूर तक पसरा पड़ा था और हवा सांय-सांय करके बह रही थी। उसने इत्मिनान से लंबी
गहरी सांस ली और अपने आपको संयत करने लगी। उसके अपने हाथ पुन: कमर के इर्द-गिर्द
घूम गए। बघनखा बंधा हुआ पाकर उसने फिर एक गहरी सांस ली। तभी उसे मां के ये शब्द
अक्षरत: याद हो आए, ''बेटी- इसे अपने से कभी भी अलग मत करना। जरूरत पडऩे पर ये काम आयेगा।ÓÓ कितने विश्वास के साथ कहा था मां ने।
तभी उसे एक पुरानी घटना याद हो आई।
मां के ही साथ गई थी धनिया महुआ
बीनने। इस बार भी महुआ गजब का फूला था। मां महुआ बीन रही थी। तभी एक भालू उधर से आ
निकला। एक वृक्ष की आड़ लेकर बचाव की मुद्रा में खड़ी हो गई मां। भालू ने झपट्टा
मारा। पर दुर्भाग्य से उसका वार खाली गया। भालू के दोनों पंजे तने से बाहर निकल
आए। मां ने पलटकर फुर्ती से उसके दोनों पैर पकड़ लिए और पूरी ताकत से उसे अपनी ओर
खींचा। भालू का सीना तने से टकराया और वह बुरी तरह से चीख उठा। तने पर एक पैर
टिकाते हुए मां ने उसे परे ढेला फिर ताकत से अपनी ओर खींचा। रस्साकशी का ये खेल
काफी देर तक चलता रहा, जब तक भालू निढाल होकर गिर नहीं पड़ा। भालू के गिरते ही मां ने कमर
में लिपटा बघनखा निकाला और उसका पेट चीर दिया। एक भयंकर चीख के साथ वह ढेर हो गया।
मां की बहादुरी का नमूना उसने अपनी आंखों से देखा था। उसे गर्व हो आया था अपनी मां
पर। एक बड़ी-सी चट्टान पर बैठकर अपनी तेज हो आई सांसों पर नियंत्रण करने लग गई थी।
संयत होते ही उसने इसी बघनखे को उसकी कमर में बांध दिया था तथा चलाने का प्रशिक्षण
भी दे दिया था। काश यह बघनखा मां के पास उस समय होता, जब शेर ने उस पर आक्रमण कर दिया था तो
वह अपने आपको शायद बचा ले आती, पर होनी को कौन टाल सकता है। उसने अपने आपसे कहा।
चुन्नु-मुन्नु और मांजी स्कूल से लौट
चुके थे। चारों ने मिलकर खाना खाया। खाना खा चुकने के बाद वे गिल्ली-डंडा खेलने
में व्यस्त हो गए। मांजी का अब बाजार जाने का वक्त था। उन्होंने थैलियां उठाईं और
जाने को उद्धत हुईं। तभी उन्होंने धनिया से भी हॉट चलने को कहा। धनिया तो कभी की
तैयार थी। बस उसे इशारे भर की जरूरत थी।
आधा-एक फर्लांग की दूरी पर भरता है
हॉट। रास्ता चलते समय उसकी नजरें आने जाने वालों के चेहरों से जा चिपकतीं। इन
अजनबी चेहरों में वह अपने स्वजनों को खोजने का प्रयास करती। जब कोई परिचित मिल
जाता तो रास्ता चलते चटर-पटर करने लगती।
पूरे सप्ताह की चीजें खरीदती जाती
मांजी और धनिया को पकड़ाती जातीं। सारी खरीददारी निपटाने के बाद वे वापिस होने को
हुई तो धनिया ने मासूमियत के साथ थोड़ी देर रुककर आगे आने को कहा क्योंकि वह जानती
थी कि हॉट से थोड़ा हटकर आदिवासी जन बैठकर बतियाते हैं। उसे उम्मीद थी कि कोई न
कोई परिचित उसे जरूर मिल जायेगा। बहुत दिन हो गए सबसे मिले हुए। यही कोई छह महीना
अथवा साल भर अथवा इससे भी ऊपर ठीक से याद नहीं उसने सोचा।
व्यग्रता से वह हॉट के उस पार जाना
चाहती है। अपने स्वजनों से मिलने की आतुरता में उसकी चाल दोहरी हो उठती है। उसने
दूर से ही देखा। लोग घेरा बनाए बैठे बतिया रहे थे। अपने स्वजनों से भेंट करने एवं
खबरों का आदान-प्रदान करने के लिए हॉट से बढ़कर और क्या हो सकता है। उसकी नजरें
फुर्ती के साथ सभी के चेहरों पर फिसलने लगीं। उसने सतिया को बैठे देखा। फुर्ती से
बढ़कर उसने थैला एक ओर रखा और उसे अपनी बांहों के घेरे में आलिंगनबद्ध कर लिया। इस
अप्रत्याशित घटना से सतिया घबरा सी उठी। धनिया उसे पूरी ताकत के साथ अपने सीने से
चिपकाती तो कभी उसके गालों पर चुम्बन जड़ देती। उसने उसे परे ढेलने की कोशिश की पर
धनिया की पकड़ काफी मजबूत थी। लोग-बाग दो सहेलियों के मिलन को देखकर गद्ïगद्ï हुए जा रहे थे। फिर दोनों सहेलियां
वार्तालाप में निमग्न हो गईं तभी उसकी नजर चट्टान पर बैठे एक बांके छैला पर पड़ी
जो घेरे से दूर बैठा, न जाने किन विचारों में गुम बीड़ी धुनक रहा था। सिर पर पगड़ी, रौबदार चेहरा, चेहरे पर नुकीली मूंछें, कुर्ता बंडी व घुटने-घुटने तक धोती
बांधे शांत भाव से इन्हें ही घूर रहा था। धनिया ने इशारे से पूछा तो सतिया ने
बतलाया कि यह और कोई नहीं बल्कि उसका कल्लू है। अरे वही कल्लू जो अक्सर तुझसे ही
ज्यादा तकरार किए रहता था और तुझसे ही चिपका डोलते रहता था। याद है तुझे, देनवा के गहरे पानी में ये मुआ
नंग-धड़ंग कूद पड़ा था और तैरते हुए मुझे ही सता रहा था। बचपन की छेड़छाड़ की याद
आते ही उसके गाल लाल हो उठे।
उसकी मनभावन सुगठित देह यष्टि देखकर
उसके मन में कुछ-कुछ होने लगा। जी में आया कि दौड़कर गले लगा डाले और जड़ दे ढेर
सारे चुम्बन। बचपन में यह सब संभव था। क्या आज वह इस उमर में और सबके सामने ऐसा कर
पायेगी। विचारों के आते ही उसे लाज -सी भी हो आई। उसकी नजरें अब भी उसके
इर्द-गिर्द ही घूूम रही थीं और वह बांका छोरा भी कनखियों से उसे ही देख रहा था।
शायद न देखने का बहाना बनाते हुए अपनी सहेली से बातों में उलझी धनिया ने पुन: पलट
कर देखना चाहा तो वह अपनी जगह पर नहीं था। 'कहां चला गया होगा कल्लूÓ उसने अपने आपसे प्रश्न किया। उसका मन
कल्लू को देखने के लिए बेताब हो उठा और वह चारों ओर नजरें घुमाकर उसे खोजने का
प्रयास करने लगी।
तभी उसने देखा। वह लौट रहा है और उसके
हाथ में कुछ दिखलाई भी पड़ रहा है। न जाने क्या ला रहा होगा? उसने अपने आपसे कहा। तब तक कल्लू लंबे
डग भरता हुआ वहां आ पहुंचा। उसके हाथों में गरमागरम जलेबी से भरा दोना था। सतिया
ने फुर्ती से दोना छुड़ाकर अपने कब्जे में कर लिया फिर एक जलेबी उठाकर धनिया के
मुंह में ठूंस दिया फिर कल्लू के मुंह में। हास-परिहास-ठिठौली के इस खेल को देखकर
प्राय: सभी ठहाका मार कर हंस पड़े। मुंह में मिठास पड़ते ही धनिया को याद हो आया
कि बचपन में जब भी वह बापू के साथ हॉट आती थी। कल्लू और वह हलवाई की दुकान में
सरपट भागकर जाते थे और जलेबी अवश्य खाते थे। आज कल्लू स्वयं आगे बढ़कर जलेबी उसके
लिए लाया है। यह देखकर वह आनन्द से विभोर हो उठी।
अब उसे आने वाले हॉट की प्रतीक्षा
रहती। हॉट वाले दिन वह अपने आपको खूब सजाती संवारती और मां के साथ हो लेती। आज कुछ
हॉट ज्यादा ही भरा था। लगुन-सरा का मौसम जो था। उसने कल्लू को यहां वहां ढूंढ़ा पर
कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ा। तरह-तरह के प्रश्न मन में आते जो उसे छलनी कर जाते।
किसी अंदेशे के चलते उसका दिल धड़कने लगा। काफी खोज खबर के बाद सतिया मिली तो उसने
बतलाया कि ओझा ने उन दोनों को मिलते देख लिया था। उसने कल्लू को रोकना चाहा पर
कल्लू के सिर चढ़ी जवानी कहां मानती। फिर क्या था। ओझा के दो-चार लग्गु-भग्गु उस
पर टूट पड़े और तब तक पीटते रहे, जब तक वह बेदम नहीं हो गया।
कल्लू के साथ घटित घटना को सुनते ही
वह चीत्कार कर उठी। आंखों से आंसू टपटपाकर बह निकले। वह जानती थी कि ओझा इसे
बर्दाश्त नहीं कर पायेगा और वह नीच, कुछ भी कर बैठेगा। हुआ वही, जिसका उसे अंदेशा था। उसके जी में आया
कि घाटी उतरकर सरपट दौड़ पड़े और अपने कल्लू को बचा ले। उसने गांव जाने की जिद
ठानी तो लोगों ने उसे समझाया कि वह ऐसा न करे क्योंकि यह भी संभव है कि अकेली
दुकेली पाकर, वह उसे भी घायल कर दे। संयोग से डाक्टर भी हॉट पहुंच गए थे। जब
उन्होंने इस हृदय विदारक घटना को सुना तो एक अच्छा खासा जत्था लेकर घाटी में उतर
गए और जब लौटे तो गंभीर हालत में पड़े कल्लू को उठा लाए और अस्पताल में दाखिला
देते हुए उसका इलाज शुरू कर दिया। किसी चाकरी की तरह सेवा करती रही धनिया। कुछ दिन
बाद वह पूर्णरूपेण स्वस्थ हो गया। स्वस्थ होते ही वह घर जाने की जिद करने लगा।
हालांकि धनिया चाहती थी कि यहीं रुक जाये, पर ऐसा कर पाना उसके लिए संभव नहीं
था।
अब आए दिन ओझा के उत्पात बढ़ते ही चले
गए। कभी वह अस्पताल आकर डाक्टर को धमकी दे जाता तो कभी धनिया को। कभी-कभी तो वह
पूरे परिवार को जादू-मंतर से मार डालने की धमकी दे जाता। डाक्टर के परिवार को
आतंकित करने के लिए वह आटे का पुतला बनाता। हल्दी कुमकुम से उसे लाल-पीला कर देता
और डाक्टर की चौखट पर धर आता। कभी नींबू में कीलें टोंच देता और दरवाजे पर बांध
आता। यह काम वह बड़ी सफाई से देर रात करता ताकि कोई उसे आता-जाता न देख पाए।
आखिरकार तंग आकर डाक्टर ने पुलिस में रपट दर्ज करवा डाली।
शायद पुलिस वालों की यातना के भय से
अथवा किसी अन्य कारण के चलते वह दुबारा उस गांव में दिखलाई नहीं पड़ा और न इस बीच
आतंक ही मचाया। लगा कि सब कुछ एकदम शांत हो गया है।
दोपहर का यही कोई तीन अथवा चार बजा
रहा होगा। परिवार के सभी सदस्य आंगन में बैठे बतिया रहे थे। तभी कल्लू आता दिखलाई
पड़ा। धनिया का मन कल्लू को देखकर प्रसन्नता से नाच उठा। वहीं शंका-कुशंकाओं के
चलते निराशा से भर उठा। पता नहीं कल्लू क्यों आ रहा होगा- क्या बात होगी- कारण
क्या है उसका इस वक्त आने का। तरह-तरह के प्रश्न उसके जेहन में उतर कर उसे अशांत
कर देते। वह जानती थी कि बड़े-बूढ़ों के समक्ष वह उससे बात नहीं कर पायेगी और न ही
उससे आंख मिला पायेगी। किसी काम का बहाना बताकर वह अन्दर चली गई और दीवार की ओट
लेते हुए सुनने का प्रयास करने लगी।
कल्लू ने आते ही शिष्टता से अपने
दोनों हाथ जोड़े और फिर परिवार के सभी सदस्यों को सतिया के विवाह में आने का निमंत्रण
देने लगा। धनिया ने जब सतिया के विवाह की बात सुनी तो वह प्रसन्नता से नाच उठी।
कितने दिन बीत गए वह अपने गांव नहीं जा पाई थी। अब वह सतिया की शादी में जायेगी तो
झूमझूम कर नाचेगी-गायेगी। सारे लोगों से उसकी भेंट भी होगी। दीवार की ओट में खड़ी
धनिया कल्पना लोक में विचरने लगी थी।
परिवार के प्राय: सभी सदस्यों ने शादी
में आने का वादा किया। आश्वस्त कल्लू अब वापिस होने को था। उसकी नजरें धनिया को
बराबर खोज रही थीं। जब उसने उसे कहीं नहीं पाया तो वह उद्विग्न मन से लौट पड़ा।
आगे बढ़कर उसने गेट खोला। बाहर निकला, गेट लगाया और उतार में उतरने लगा।
पच्चीस-पचास कदम ही चल पाया होगा कि उसने धनिया को सामने खड़ी पाया। कहां से आ गई
धनिया। उसने अपने आपसे प्रश्न किया और लपककर उसने धनिया के हाथ पकड़ लिए। एक सघन
वृक्ष की छांव तले बैठते हुए काफी देर तक बतियाते रहे और सहज प्यार के चलते अपना
भविष्य तलाशते रहे। जब कल्लू ने अंदाज लगा लिया कि यहां बैठे काफी देर हो गई है तो
शादी में आने का पुन: वादा करवाते हुए उसने धनिया से विदा मांगी और पहाड़ी की
गहराईयों में उछलता-कूदता आगे बढ़ गया। धनिया तब तक खड़ी उसे निहारते रही जब तक वह
आंखों से ओझल नहीं हो गया। जब वह लौटी तो उसके ओठों पर कोई सुरीला प्यार भरा गीत
मुखरित हो रहा था।
अब उसे आने वाले हॉट का बेसब्री से
इंतजार था। घर का कामकाज सम्हालते, दादी से नोंकझोंक करते रहने में पूरा सप्ताह यूं
ही बीत गया जैसे कोई कल ही की बात रही हो।
दोपहर बाद वह मांजी के साथ हॉट
पहुंची। रास्ता चलते उसकी खोजी आंखें अपने स्वजनों को ढूंढ़ती। जब कोई राह चलते
मिल जाता, चटर-पटर करती चलती। एक मनीहारी की दुकान के सामने जाकर ठहर गई। मांजी
ने कालीपोत की माला-ढेरों सारे टिकुली के पैकेट-आईना-कंघा-रिबिन और न जाने कितनी
ही चीजें खरीदीं। धनिया बार-बार सोचती भला क्यों खरीद रही होंगी मांजी। शायद उसके
लिए अथवा सतिया के लिए जिसका अगली पूरनमासी पर ब्याह जो होना था। यंत्रवत्ï धनिया खरीदी गई वस्तुएं करीने से झोले
में रखती जाती। फिर गोटा-चांदी के दुकान में रुकते हुए हंसली-दोहरी-कंगन-पायल-बाजूबंद
और न जाने कितनी ही वस्तुएं खरीदीं। ''मांजी, ये सब किसके लिए हैं?ÓÓ लगभग मध्यम स्वर में धनिया ने पूछा।
''कुछ तो तेरे लिए और कुछ तेरी सहेली
सतिया के लिए।ÓÓ
''कितना प्यार करती हैं आप हम
आदिवासियों से।ÓÓ धनिया ने सहजता से कृतघ्नता प्रकट करते हुए कहा।
''हां, ये बात तो सच है कि दिल में तुम लोगों
के प्रति हमेशा से ही प्यार का ज्वारभाटा मचलता रहता है, फिर ये हमारा ही नहीं बल्कि सभी लोगों
के मन में भी इस तरह की भावनाएं होनी चाहिए। चल अब घर चलें।ÓÓ मांजी ने कहा।
''मैं अगर थोड़ी देर ठहर कर आऊं तो आप
बुरा न मानेंगी न?ÓÓ धनिया ने अहिस्ता से कहा। मांजी जानती थीं कि धनिया का मन कल्लू का
सानिध्य पाना चाह रहा होगा तभी तो लजाते हुए उसने रुक जाने का मन बनाया था।
''अच्छा जल्द ही लौट पडऩा।ÓÓ कहती हुई वे आगे बढ़ गईं।
बाजार से थोड़ा हटकर पुरुष-महिलाएं
घेरा बनाए हुए बतिया रहे थे। धनिया की चाल में एक अलग ही किस्म का आवेग था। तितली
बनी उड़ती डोलती सी वह मस्तानी चाल में उड़ी चली जा रही थी। दूर से जब उसने अपने
स्वजनों को बैठा पाया तो उसकी प्रसन्नता का पारावार देखने लायक था। सतिया से मिलते
हुए उसने अपने सीने से चिपका लिया और न जाने किस आवेश के चलते उसके गाल पर अनेक
चुंबन जड़ दिए। सतिया भी परेशान सी हो उठी कि आज धनिया को हो क्या गया है। फिर एक
ओर बैठते हुए बतियाने लगी। बातों ही बातों में उसने उसके लिए क्या-क्या खरीदा है
सब उगल दिया। अनायास ही सतिया की आंखें डबडबा आईं। शायद इस सोच के चलते कि दोनों
पति-पत्नी आदिवासी जनजीवन से कितना जुड़ाव रखते हैं। सप्ताह भर पहले आ जाने का
वादा करते हुए धनिया वापिस हो ली।
आए दिन गए ओझा कोई न कोई षड्ïयंत्र अवश्य रचता। कभी डराने की गरज
से तो कभी भय पैदा करने की गरज से वह आटा का पुतला बना लाल पीले रंग में रंगता और
अंधियारा गहरा जाने के साथ ही डाक्टर के आवास के सामने रख आता। कभी नींबू पर कीलें
गड़ा कर, उस पर सिंदूर अथवा कुमकुम डालकर रख आता। उसकी दिली इच्छा थी कि ऐसा
करने पर डाक्टर डर जायेगा और फिर घाटी में उतरने की हिम्मत नहीं करेगा। सारे धतकरम
करने के बाद भी डाक्टर ने अपनी हिम्मत नहीं हारी और वह अब प्राणपन से अपने काम को
अंजाम देता रहा।
सतिया की शादी में सप्ताह भर पहले
जाने की जिद धनिया करने लगी। डाक्टर तो यह चाहता था कि शादी के दिन सभी जाएंगे इक_े और वापिस भी हो लेंगे। पर धनिया
अपनी ही जिद पर अड़ी रही। डाक्टर यह भी जानता था कि ओझा अपनी सीमाएं तोड़ बैठेगा
और अकेली दुकेली जान धनिया को शारीरिक नुकसान भी पहुंचा सकता था। धनिया के मन में
कहीं डर न बैठ जाए शायद इसके चलते वह खुलकर बोल नहीं पा रहे थे। जब धनिया नहीं
मानी तो उन्होंने एक आदमी को साथ लेकर जाने के लिए कहा। डाक्टर चाहता था कि वह
आदमी उसे सही सलामत सतिया के यहां तक छोड़ आए। थोड़ी दूर तक तो वह भेजे गए आदमी के
साथ चलती रही फिर उसे वापिस हो जाने के लिए प्रार्थना करती रही। अब एक आजाद
परिन्दे की तरह वह फुदकती-इठलाती-गुनगुनाती पहाड़ी उतरने लगी।
ढेरों सारे सामान की गठरी लादे जब वह
सतिया के घर पहुंची तो वहां का उत्साह देखने लायक था। हर कोई अपने आप में मगन था।
धनिया को अपने बीच पाकर शायद उनका आनन्द द्विगुणित हो गया था। देर रात तक गीतगारी
होती। मटकों से दारू उतारी जाती और औरत-मरद साथ बैठकर गटकते। बच्चे भी भला पीछे
रहने वाले कहां थे। वे भी नजरें चुराकर दोना दो दोना गटक जाते। हास-परिहास ठिठोली
में दिन कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता। सखी-सहेलियों के आग्रह पर उसने भी चढ़ा रखी थी। फिर
कल्लू भी तो चाहता था कि धनिया के साथ रात भर ठुमका लगाता रहे। देर रात तक नाचना-गाना-बजाना
चलता रहा।
धनिया की आंख खुली तो देखा सूरज सिर
पर ऊपर तक चढ़ आया है। आंखें मटमटाते हुए उसने महसूस किया कि सारे लोग उदासी ओढ़े
बैठे हैं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक हो क्या गया। जब उसने कारण जानना
चाहा तो पता चला कि सतिया रात में घर से भाग गई। सारे लोग उसे खोज-खोज कर थक गए।
पर वह मिल नहीं पा रही है। धनिया ने पूरा किस्सा सुना तो उसके होंठ गोल हो आए।
बनावटी उदासी का कारण उसकी समझ में भलीभांति आ चुका था। वह जानती थी कि शादी से
पहले लड़की घर से भाग जाती है। वह साथ में अपने होने वाले खाविन्द को भी लेकर
रफू-चक्कर हो जाती है। जंगल में छिपकर वे कहां रहते होंगे, ये सभी जानते हैं। पर भाग जाने पर शोक
जरूर मनाते हैं। दो-चार दिन तक ये नाटक चलता रहता है। औरत मरद का जत्था जंगल का
पत्ता-पत्ता छान डालने का ढोंग करता जाता है। साथ ही गीत-गारी का भी कार्यक्रम जारी
रहता है। फिर शादी से एक दिन पहले दोनों को पकड़ लिया जाता है। रस्सी से बांधकर वे
दोनों को घर ले आते हैं। फिर दोनों को आमने-सामने किसी वृक्ष के तने से टिकाकर
खड़ा कर देते हैं। दोनों के बीच अलाव जलता रहता है ताकि ठंड का उन दोनों पर कोई
असर न पड़े। अलाव के चारों ओर औरत मरद घेरा बनाकर बैठ कर गपियाते हैं, औरतें गीत गाने लगती हैं। कोई दारू से
भरी मटकी उठा लाता है तो कोई टिमकी-तुरही अथवा अन्य कोई वाद्य। टिमकी की टिमक-टिमक
के बीच दोना भर-भर कर दारू बांटी जाती है। जब अच्छा खासा नशा सवार हो जाता है तो
औरत मरद एक दूसरे की कमर में हाथ डाले रात भर थिरकते। मस्ती मारते। हो-हल्ला
मचाते। दूसरे दिन दोनों की रस्सी खोल दी जाती है। एक तरफ दुल्हन का साज सिंगार
होता है तो दूसरी तरफ दूल्हे को खूब सजाया संवारा जाता है। सूरज की पहली किरण के
साथ ही नगाड़ों की गूंज से जंगल मुस्कराने लगता है। ढेरों सारी रस्मों को पूरा
कराता रहा ओझा। दोनों को आमने सामने बिठा आंय-बांय न जाने क्या-क्या बकता। ये तो
वही जाने। फिर एक दोना दारू बुलवाई जाती। आधी दुल्हन पीती तो उसी दोने में बची आधी
दूल्हा। दोना खाली होते ही हो जाता दूसरा नेंग। जामुन की एक हरी डाली तोड़कर लाई
जाती। उस डाली को जमीन में गड्ढा खोद कर लगा दिया जाता। फिर दूल्हा-दुल्हन उसके
चार-पांच चक्कर लगाते। इस तरह दो जान एक हो जाते।
धनिया को मालूम है कि सतिया और भद्दू
इस समय कहां छुपे होंगे। अगर वह चाहे तो एक मिनट में दोनों को पकड़ कर ला सकती है।
पर वह जानती है कि सामाजिक परम्पराओं को निबाहने के लिए ही ये सब किया जाना आवश्यक
है। उसका मन तो कल्लू को ढूंढऩे के लिए उतावला हुआ जा रहा था।
अलाव के चारों ओर बैठे मरद और औरतें
चुहलबाजियां कर रहे थे। यही तो मौका होता है शादी विवाह में, जब दोनों पक्ष बैठकर हास-परिहास करते
हैं। मन नहीं लग रहा था धनिया का, वहां बैठने को। नजरें बचाकर वह उठ बैठी और अभी
आती हूं कहकर चल पड़ी। जानती थी वह कि झरने के किनारे कल्लू बैठा उसका इंतजार कर
रहा होगा।
पहाड़ की चोटी से उतरते हुए देनवा
अपनी अधिकतम गति से शोर मचाती हुई आती है और फिर एक बड़ी-सी पहाड़ी पर से झरना का
आकार लेते हुए गहराईयों में छलांग लगा जाती है। तेजी से नीचे गिरती हुई जलराशि, एक अट्टहास पैदा करते हुए झाग उगलने
लगती है। साथ ही चारों ओर धुआं-सा भी उठ खड़ा होता है। नदी में बनते भंवरों ने
पहाड़ में जगह-जगह सुराख-से भी बना डाले थे। यह प्रक्रिया एक दो दिन की नहीं बल्कि
बरसों से सतत चल रही प्रक्रिया का नतीजा था। आदमी एक सुराख में पूरा समा जाए इतनी
गहराईयां तो बन चुकी थीं। वह एक दर्रे से घुसता तो दूसरे से जा निकलता।
धनिया नजरें बचाती हुई उस ओर बढ़ी चली
जा रही थी। चांद अपने पूर्ण यौवन पर था। झरने के किनारे पहुंची तो लगा कि चांदी
पिघल कर बही जा रही है। उसे मालूम था कि यहीं कहीं कल्लू बैठा उसकी प्रतीक्षा कर
रहा होगा। दूर से ही उसने एक परछाई को घूमता देखा, फिर वह आंखों से ओझल हो गया। धनिया को
लगा कि कल्लू ने उसे देख लिया होगा और अब वह छुप जाने का उपक्रम कर रहा होगा। शायद
उसे चखाने के लिए।
मन में एक विशेष उमंग लिए धनिया आगे
बढ़ती चली गई। वह उस ओर निर्भीकता से बढ़ी चली जा रही थी, जहां उसने एक परछाई को अभी-अभी डोलते
देखा था। जब वह वहां पहुंची तो देखा, वहां कोई नहीं था। दिल धक से धक-धक
करने लगा। कहां चला गया होगा कल्लू, उसने अपने आपसे प्रश्न किया। सफेद झक प्रकाश में
उसकी नजरें अपने प्रियतम को खोज रही थीं। कभी उसकी नजरें पहाड़ की गहराईयों में जा
समातीं तो कभी किसी झुरमुट में।
उसे तत्क्षण ऐसा लगा कि कल्लू इसी
चट्टान के पीछे छुपा होगा। उसने आहिस्ता से बढ़ते हुए उस ओर जाना चाहा। तभी किसी
की मजबूत बांहों ने उसे अपने शिंकजे में कैद कर लिया। उसने सहज में ही अंदाजा
लगाया कि हो न हो कल्लू ही होगा। पर बांहों का कसाव कल्लू का न होकर किसी और का हो
सकता है क्योंकि उसके कसाव से स्वत: ही स्पष्ट था कि वह प्यार की गरज से लिपटे हुए
हाथ नहीं थे, बल्कि उसके शरीर के पुर्जे-पुर्जे को तोड़ डालने के लिए कसे गए थे।
हड़बड़ा उठी धनिया। उसने अपने आपको उस चुंगल से छुड़ाना चाहा। पर कसाव लगातार
बढ़ता ही चला जा रहा था। चीख उठी धनिया और कसाव से मुक्त होने के लिए हाथ पांव
मारने लगी। काफी छीना-झपटी के बाद वह मुक्त हो पाई थी। मुक्त होते ही उसने पलटकर
देखा। ओझा अपनी वीभत्सता के साथ अट्टहास कर रहा था। पसीना-पसीना हो आई धनिया।
साक्षात्ï मृत्यु को सामने पाकर वह हड़बड़ा उठी और किसी तरह अपनी जान बचाने की
सोचने लगी। ओझा अपनी मस्ती में चूर उसकी ओर एक-एक कदम आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ा रहा
था। किंकत्र्तव्यविमूढ़ धनिया पीपल के पत्ते के मानिंद थर-थर कांप रही थी।
हड़बड़ाहट में उसके हाथ बघनखे से जा टकराए। बघनखा हाथ में आते ही उसे लगा कि बचाव
का उपाय हाथ आ गया है। बचाव की मुद्रा लेते हुए उसने बघनखे को तत्क्षण अपने पंजे
में फंसाया और ओझा के अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगी। जैसे ही वह झपटने की मुद्रा
में आगे बढ़ा, धनिया ने लपककर वार कर दिया। पल भर में उसने बघनखा उसके पेट में गहरे
तक धंसा दिया और झटके से बाहर खींच लिया। एक चीख के साथ ओझा धरती पर जा गिरा। उसके
गिरते ही उसने पलटकर जगह-जगह से उसका मांस नोंचना शुरू कर दिया। रणचण्डिका बनी
धनिया तब तक वार करती रही जब तक वह बेजान होकर एक ओर लुढ़क नहीं गया। धनिया
जैसे-जैसे वार करती जाती, ओझा भयंकर गर्जना के साथ चीखता-चिल्लाता। जब
धनिया ने देखा कि वह निष्प्राण हो गया है तो उसने उसे पूरी ताकत के साथ घसीटा और
देनवा में फेंक दिया।
उसने नीचे झांककर देखा। चांद के
प्रभाव में चांदी सा हो आया जल सुर्ख लाल हो उठा था।
-------------------------------------------------------------------------
जूती
उसने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि मन
के आंगन के किसी कोने से मस्ती का एक सोता फूट निकला है। अब धीरे-धीरे वह शिराओं
में आकर बहने लगा था। शरीर में परिवर्तन होने लगे थे। उसके गाल चटक लाल, ओंठ गुलाबी व लजीले हो आए थे। आंखें
नशीली होने लगी थीं। सांस-प्रस्वांस में मलयाचल प्रवाहित होने लगा था। कानों में
हजारों-हजार नूपुर एक साथ झंकृत होने लगे थे। देह चन्दन की सी सुवासित होने लगी थी
और मन किसी रेशमी रूमाल की तरह हवा में लहराने लगा था। अब वह अपने प्रिय का समीप्य
पाने के लिए अधीर हो उठी थी।
आदमकद आईने के सामने निर्वस्त्र बैठी
राधा, अपने जीवन में अचानक आए
परिवर्तनों का सुक्षमता से निरीक्षण कर रही थी। अपने आप में गुम थी राधा तभी उसके
कानों से कुछ कर्कश स्वर आकर टकराने लगे। उसने सहजता से ही अन्दाजा लगा लिया था कि
टेरने वाला और कोई नहीं बल्कि बुआ थी।
बुआ उर्फ गंगा देवी उर्फ ठाकुर दौलत
सिंह जी के स्वर्गवासी पिता की मुंहबोली बहन। हवेली में आने जाने की इन्हें मनाही
नहीं है। वे कभी भी किसी भी वक्त बिना रोकटोक के आ जा सकती हैं। पारिवारिक मामलों
में दखलंदाजी भी कर सकती हैं। अपनी सलाह के साथ हुक्म भी दे सकती हैं। इस
साम्राज्य में, किसी में भी, इतनी हिम्मत नहीं है कि वह इनकी आज्ञा टाल सके।
विशेषकर, जब ठाकुर साहब घर पर नहीं होते हैं, तब इनकी चौकसी और भी बढ़ जाया करती
है।
वह थोड़ा सा संभल गई थी कि बुआ तूफान
की चाल चलते हुए सोफे में आकर समा गई थी और बिना समय गंवाये, उन्होंने कहना शुरू कर दिया था—
'घर का कोना-कोना छान मारा और महारानी
है कि यहां बैठी हुई है। बिहारी की मां आई थी। न्यौता डाल गई है। आज शाम उसकी बहू
की गोद भराई है तैयार रहना। चार-पांच के बीच में लेने आऊंगी।Ó
प्रत्युत्तर में वह कुछ कहना चाह रही
थी। उसके ओंठ फडफ़ड़ाए ही थे, तब तक तो वे कमरे के बाहर भी निकल चुकी थीं।
राधा ने गौर से देखा उनकी सांसें फूली
हुई थीं और वे बराबर हांफ भी रही थीं तिस पर भी वे कितना कुछ बोल चुकी थीं। एक
तूफान के गुजर जाने के बाद की भांति अब चारों ओर शांति पसरने लगी थी।
उसने तन पर जैसे-तैसे साड़ी लपेटी।
टेबल पर पड़ी कुंकू की डिब्बी उठाई। माथे पर एक बड़ा-सा सूरज उगाते हुए, मांग भरने ही जा रही थी कि आईने में
बनने वाला उसका अक्स बोल उठा—
'राधा, बिहारी की शादी हुए एक साल बीता है और
वह बाप बनने जा रहा है। तेरी शादी हुए तो तीन साल बीत गए। तू कब मां बनेगी? तेरी कोख कब हरी होगी?Ó
प्रश्न सुनते ही लगा जैसे उसने धोखे
से बिजली का नंगा तार छू लिया हो। पूरा बदन झनझना उठा। आंखों के सामने अंधियारा-सा
छाने लगा। थर-थर कांपने लगी। माथे पर पसीने की मोटी-मोटी बूंदें छलछला आईं। हलक
गहरे तक सूख आया, लगा कि मिट्टी की कच्ची दीवार की तरह भरभरा कर वह गिर ही पड़ेगी।
अपनी बिखरी हुई शक्तियों को समेटने का
उसने पुरजोर प्रयास किया पर लगा कि वह उसके बूते की बात नहीं रह गई है। जैसे तैसे
अपने आपको संभाला और लडख़ड़ाते कदमों से चलते हुए वह बरामदे में पड़े झूले पर आकर
पसर गई। झूले की लोहे की कडिय़ों से निरन्तर आ रही चर्र-चर्र की आवाज और दहशत
बढ़ाने लगती थी। ज्ञात डर को और गहरा कर जाती थी।
विस्फरित नजरें अब भी छत की दीवार से
चिपकी थीं। वह अपने आपसे ही पूछने लगी, क्या दर्पण भी कभी झूठ बोलता है। सच
ही तो कहा है उसने, शादी हुए तीन साल बीत गए, अब तक उसके गर्भ ठहरा नहीं है। वह तो
पूरे प्राणपन से मां बनने को तैयार बैठी है। कितने ही देवी-देवताओं को वह अब तक
नवस चुकी है तिस पर भी अगर वह मां नहीं बन पा रही है तो उसमें उसका दोष कहां है।
वर्तमान की त्रासदी और भविष्य की
भयावहता की परिकल्पना से वह सिहर उठती। भयानक गर्त में डूब जाने के डर से वह अपने
पर बचाने का प्रयास करते हुए कोई समाधानकारक छत खोजने का प्रयास करती। पर मन की
अथाह गहराईयों तक समा चुका डर, अब रूप बदल बदलकर सामने खड़ा होकर डराने लगता। वह
उसके खूनी पंजों से बचने के लिए पैंतरे बदलती, फिर भी खरोंच के निशान उभर आते और देह
से खून टिपटिपा कर बह निकलता।
वह सोचती इन तीन सालों में कितना कुछ
बदल गया है। यह सच है कि उसने कभी महलों का ख्वाब देखा था। अकूत धन-दौलत की कामना
की थी। आज सब कुछ है उसके पास। जैसा जो कुछ चाहा था उसने। उसे पूरा-पूरा मिला है।
हां उसे तब मां बनने का कभी ख्याल भी नहीं आया था। मां बनने की तब वह सोच भी कैसे
सकती थी। सपनों ने इतना विस्तार लिया ही कहा था, जिसमें पति होगा-बच्चे होंगे। बस केवल
धन चाहने की लालसा मन में हिलोरें भरने लगी थी। बापू यदि धन्ना सेठ होते तो शायद
ही वह धन-दौलत की कामना करती।
सपनों के अनुरूप हवेली भी मिल गई।
नौकर-चाकर भी मिल गए। पर पास का जो अमूल्य खजाना था— वह खो गया था। बात बात पर
खिल-खिलाकर हंस देने वाली राधा आज पाषाणी प्रतिमा बनकर दिन भर बैठी रहती है। अब तो
वह दूसरों की बजाय स्वयं से ही बातें ज्यादा करने लगी है। भीड़-भाड़ से बचने का
प्रयास करने लगी है, जानती है वह कि भीड़ उससे क्या प्रश्न पूछेगी। क्या वह जवाब दे पायेगी? है उसके पास जवाब? वह अपने आपसे प्रश्न पूछती फिर स्वयं
ही उत्तर खुद को देती। प्रश्न तो राधा तेरे स्वयं के पास इतने हैं कि तुझे उसके
उत्तर ही नहीं मालूम। जब वह स्वयं ही उत्तर नहीं जानती तो भला पूछे जाने पर क्या
जवाब देगी।
उसे लगने लगा था कि वह प्रश्नों के
जलते रेगिस्तान में खड़ी है। दूर कहीं दूर आशा की एक किरण दिखलाई देती। वह हांफती
दौड़ती उस तक पहुुंचती तो पाती कि वह तो केवल एक मृगतृष्णा थी। अकारण ही वह
दौड़-भाग करती रही। उसे तो यह भी महसूस होने लगा था कि उसके तलवों में गहरे जख्मों
ने जगह बना ली है और मवाद उसमें से रिस-रिस कर बहने लगा है। वह लगातार चलते तो
रहना चाहती है पर जानती है कि पैर उठाये, उठ नहीं रहे हैं। वह धम्म से नीचे बैठ
जाती है। जानती है वह कि रेगिस्तान में कब आंधी चलने लगती है। कभी भी
आंधी उठ खड़ी होगी और उसका सारा
वजूद-सारा वर्चस्व गर्म रेत के नीचे दब जायेगा, दफन हो जायेगा सदा-सदा के लिए, हमेशा के लिए। उसका मन अब बरगद की
शीतल ठंडी छांह तले बैठकर आराम करना चाहने लगा था। तभी मन के किसी कोने से एक झीनी
सी आवाज सुनाई दे गई कि राधा बरगद की ठंडी छांव तो तुझे तब नसीब होगी जब तेरी कोख
से किसी बीज का अंकुर फूटेगा।
हंसते-मुस्कुराते-हाथ पांव चलाते
चपल-चंचल बच्चे की तस्वीर उसके आंखों के सामने नाचने लगी। बच्चे की कल्पना मात्र
से लगा कि बसंत लौट आया है। चारों ओर हरियाली छाने लगी है। हजारों-हजार रंग-बिरंगी
तितलियां हवा में फुदकने लगी हैं। बस यह तो वह सब कुछ चाहती है। इन्हीं सपनों के
साकार होने की प्रतीक्षा में उसके प्राण-विकल बेचैन होते हैं।
कल्पनाओं के गहरे सागर में उतरकर वह
डूबती-तैरती रही। तभी एक बवण्डर सा उठ खड़ा हुआ। जोरदार धमाके के साथ तिनका-तिनका
बिखर गया। कल्पनाओं के कल्पतरू धराशायी हो गए। अंदर अब सब कुछ क्षत-विक्षत था।
चारों ओर गहरे अंधियारे धूल मिट्टी के गुबार के अलावा बचा भी क्या था।
सब कुछ शांत होने के बाद फिर एक आशा
की किरण झिलमिलाती सी दिखलाई थी। आशाएं फिर बलवती होने लगीं। मन में उत्साह का
संचरण होने लगा। सलोने सपने फिर सजने लगे।
आशा और निराशा की लहरों पर हिचकोले
खाते हुए वह डूबती-उतरती रही। इस बीच नींद ने उसे कब अपने आगोश में ले लिया, पता ही नहीं चल पाया।
नींद खुली लगा पोर-पोर में ऐंठन के
साथ आलस भी रेंग रहा है। एक लंबी अंगड़ाई लेते हुए उसने दूर तक देखा। देखा, दीवार की ओट से हरिया अंदर तांक-झांक
कर रहा है। वह क्या देख रहा होगा? वह अंदर आने की हिम्मत कैसे जुटा पाया है? तरह-तरह के प्रश्न दिमाग को मथने लगे
थे। वह उसे डांट कर भगा देने ही वाली थी, तभी एक ख्याल कौंधा कि पता तो लगाया
जाए कि आखिर वह देख क्या रहा है। उसने झूले पर पड़े-पड़े ही चारों ओर नजरें घुमाई।
ऐसा तो कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। वह स्वयं से कह उठी थी। फिर उसने अपनी नजरें
अपनेे जिस्म पर दौड़ाई। देखा निर्वस्त्र पूरी नंगी देह झूले पर झूल रही थी। बात
समझ में आई। उसे स्वयं ही अपनी देह देखकर शर्म-सी आने लगी थी। मानसिक संताप के
चलते वह यहां चली आई थी। उसे तो अब यह भी याद आने लगा कि वह उस समय इस स्थिति में
थी ही नहीं कि साड़ी भी ढंग से लपेट पाती और शायद इसी संताप के चलते वह ब्लाउज भी
नहीं पहन पाई थी।
नारी की अनावृत देह देखकर ऋषि मुनि भी
विचलित हो जाते हैं, तपस्वियों के तप भंग हो जाते हैं, तो भला हरिया हाड-मांस का एक जीता
जागता इंसान है, उसमें भी एक दिल धड़कता है। नारी सौंदर्य देखकर वह अगर विचलित हो ही
गया है तो भला इसमें उसका दोष ही कहां है। काश अगर वह स्वयं उसकी जगह होती तो।
...तो पता नहीं... कुछ न कुछ तो अब तक हो जाता। उसने अपने आप से कहा। पोर-पोर में
अब रोमांच हो आया था।
हरिया को डांटकर भगा देने का ख्याल मन
से तिरोहित हो गया था। उसने उठते हुए यह अभिनय करने का प्रयास किया जैसे कुछ हुआ
ही नहीं। जैसे उसने कुछ देखा ही न हो।
बिखरी हुई साड़ी को उठाकर लपेटते हुए
वह अपने कमरे में आकर समा गई। चलते समय उसने पलटकर यह भी देखने का प्रयास किया कि
क्या हरिया अब भी वहां खड़ा है। हरिया उसे दिखलाई नहीं पड़ा। अपनी मालकिन को जागता
देख शायद वह दीवार की ओट में दुबक गया हो और संभव है वह अब तक भागकर अपनी खोली में
जा छिपा हो।
हवेली से काफी दूर हटकर नौकरों के लिए
अलग-अलग खोलियां बनी हैं। इन्हीं एक खोली में हरिया भी रहता है। एकदम शांत
सीधा-सादा हरिया अपने काम में दिन भर रमा रहता। सुबह-शाम गाय-भैंसें लगाता।
चारा-पानी देता और निर्देशों का तत्परता से पालन करता। लकडिय़ां फाड़ते हुए उसने
उसे कई बार देखा है। गठी हुई देह, यष्टि-चौड़ा सीना, कसी हुई भुजाएं, जब वह कुल्हाड़ी का भरपूर वार लकड़ी
के ल_े पर करता, सैकड़ों मछलियां उसकी भुजाओं में उछलने लगती थीं।
किसी जरूरी काम से आ निकला होगा और मुझे अनावृत देखकर ललचा गया होगा। मर्द बेचारा-
वह विस्तार से सोचने लगी थी।
देह पर साड़ी लपेट लेने के बाद भी ऐसा
लग रहा था कि समूची देह पर हरिया की आंखें चिपकी हुई हैं और वे उसे लगातार घूरे जा
रही हैं। शर्म से वह दोहरी हुई जा रही थी।
नहाना अब जरूरी हो गया था। सीधे वह
बाथरूम में पहुंची। मल-मल कर शरीर धोया। शरीर को अच्छी तरह सुखाकर पाउडर छिड़का।
बार्डर वाली नीली चमचमाती सी साड़ी लपेटी और बाहर आकर बुआ का इंतजार करने लगी।
बुआ का अब तक कहीं अता-पता नहीं था।
बैठे-बैठे उसे कोफ्त होने लगी थी। ऊंची-ऊंची दीवारों को लांघकर ढोल-मंजीरों के
स्वर एवं महिलाओं के मिश्रित स्वर अंदर तक आ रहे थे। बुआ के इंतजार में वह अधीर
हुई जा रही थी। उससे अब और नहीं बैठा गया। नौकरानी को आवश्यक निर्देश देकर वह घर
से निकल पड़ी। एकबारगी मन हुआ, कार निकाल ले, पर मन ने मना कर दिया था। आम औरतें
शायद यह न सोचने लगें कि अमीरी का ठस्सा दिखाने के लिए वह गाड़ी पर चढ़ कर आई है।
वह पैदल ही हो ली।
बिहारी की मां ने उसका भरपूर स्वागत
किया और बिराजने को भी कहा। पलभर को ढोल-मंजीरे बजने बंद हो गए थे। विस्फरित नजरों
से सारी औरतें उसे घूरकर देखने लगी थी। उसके बैठते ही ढोल-ढमाका फिर शुरू हो गया।
पूरी मस्ती के साथ औरतें गाने लगी थीं। बीच-बीच में उसकी तरफ देख-देखकर एक दूसरे
के कानों में खुसुर-पुसुर भी करते जा रही थीं। लगा कि लक्ष्य उसे ही बनाया जा रहा
है।
एक बड़ा सा चौक पूरकर पटा बिछा दिया
गया। पानी से भरे लोटे को कलश बनाकर उस पर दीप भी जला दिया गया था। बिहारी की बहू
को पटे पर लाकर बिठा दिया गया। औरतें बारी-बारी से गोद भराई करतीं आशीशें देतीं और
अपनी जगह पर आकर बैठ जाया करतीं। ढोलक की थाप पर महिलाएं अब पूरे जोश के साथ गा
बजा रही थीं।
राधा को अब अपनी बारी का इंतजार था।
उसने गौर से बहू की ओर देखा। डील-डौल काठी से शायद वह हमउम्र रही होगी या साल दो
साल छोटी। उसकी कोख में एक बच्चा पल रहा है और वह अब तक इस सुख से वंचित है। एक
ईष्र्या भाव मन के किसी कोने में अंगड़ाई लेने लगा था। धड़कते दिल के साथ उसे एक
बात और उद्वेलित कर रही थी कि क्या वह आशीर्वचनों के साथ पूतो फलो-दूधो नहाओ कहने
का अधिकार रखती है जबकि इसकी स्वयं की कोख अब तक खाली है। वह मन ही मन अपने से बात
कर ही रही थी तभी एक अधेड़ औरत ने जुमला उछालते हुए पूछ ही डाला ''काहे बाई- अपनो नंबर कबे आन वारो है-
का यहीं से उठकर हवेली चला चलेंंÓÓ बात सीधी-सादी थी पर उसने उसके पूरे वजूद को
हिलाकर रख दिया था।
जिस बात को लेकर वह भरी-भरी सी थी—
डरी-डरी सी थी, वही बात सामने आकर खड़ी हो गई। उसे कोई उत्तर सूझ नहीं पड़ा। आंखें
डबडबा आईं। उसे अब मितली सी होने लगी, लगा कै हो जायेगी। तमतमाकर खड़ी हो
गई। औरतों के झुण्ड को लगभग लांघते हुए वह बहू के पास पहुंची। सौ का एक नोट थमाया
और बिना कुछ कहे, मुंह पर हाथ रखकर सरपट भागी और कमरे के बाहर निकल गई।
तेज गति से चलते हुए उसे लगा कि औरतों
के कहकहे, फूहड़ हंसी और तीखे नुकीले व्यंग्य उसका पीछा कर रहे हैं। तेज चाल
चलते हुए वह पसीना-पसीना हुई जा रही थी।
दम साधकर उसने सोचा— 'दमयन्ती यहीं पास में रहती है, चलकर मिल आने में क्या हर्ज है। उसे
अपनी पहली मुलाकात की याद हो आई। परिचय पाते ही, सौतिया डाह के चलते उसने उसके मुंह पर
थूका और गरजते हुए कहा था कि दुबारा लौटकर यहां कभी मत आना। वह तो केवल संभावना के
चलते मिलना चाहती थी। फिर उसने अपने आपको समझाईस देते हुए ऐसा करने से मना कर दिया
कि एक कमजोर डरी हुई औरत से मिलकर फायदा भी क्या होगा। अगर वह तनिक भी हिम्मतवर
होती तो पूछती ठाकुर से कि वह बच्चा जन क्यों नहीं पा रही है। उसमें उसका दोष है
या ठाकुर का। बदले इसके, उसने अपने माथे पर बांझ होने का ठप्पा लगवा लिया
और बगल में गठरी दबाए चली आई इस काल कोठरी में। उसने अपने आप को इस कोठरी में बंद
कर लिया था सदा-सदा के लिए। वह तो यह भी कहती है कि मर कर ही इस कोठरी से निकलेगी।
उसके बाद किसी ने भी उसे बाहर निकलते नहीं देखा है। बुजदिल कमजोर औरत— बुदबुदाई थी वह। एक घृणा का भाव तिर आया
था मन में दमयन्ती के लिए। यह घृणा और भी घनीभूत हो उठी थी, जब उसे याद आया कि उसके बदन पर थूक
दिया गया था। उसे ऐसा लगने लगा कि पूरे बदन पर थूक ही थूक चिपका हुआ है। तन के
साथ-साथ मन भी गंदा हो चला था। उसने अपने बढ़ते हुए कदमों को रोका और लौट पड़ी थी
हवेली की ओर।
घर लौटी। सन्नाटे के साथ अंधियारा भी
चारों तरफ पसरा पड़ा था। बल्ब फ्यूज हो गए थे अथवा नौकरानी ने जलाए ही नहीं। वह
नहीं जानती और न ही उसने लाईट जलाने के लिए स्विच बोर्ड की तरफ हाथ ही बढ़ाए।
अंधेरे में कुर्सी टटोलते हुए वह उस पर जा बैठी। आहट पाकर जैकी भूंका जरूर था।
विचारों की शृंखला अब भी उसका पीछा
नहीं छोड़ रही थी। प्रश्न अपने आपको दुहराने लगता। वह अपने आप से पूछती— ''क्या वह ठाकुर के बच्चे को नहीं जन
पायेगी? अगर ऐसा न हुआ तो क्या वह अपने माथे पर बांझ होने का ठप्पा लगवा
पायेगी?ÓÓ
मां न बन पाने की व्यथा औरत को
तिल-तिल करके जलाती तो है, समाज यदि उसे बांझ कहकर पुकारने लगे तो व्यथा और
भी बढ़ जाती है। उसका समूचा अस्तित्व ही धू-धू करके जल उठता है। क्या वह इस धधकती
अग्नि में अपने-आपको झोंक पायेगी? तरह-तरह के प्रश्नों के जहरीले नाग उसके बदन को
कसने लगे थे। लगा कि शरीर की सारी हड्डियां चरमराकर चूर-चूर हो जायेंगी।
भावविह्वल होते हुए एक दिन बुआ ने
उसके सामने सच उगल ही दिया था। ठाकुर की पहली दो औरतों ने भी इसी गम को अपने गले
से लगा लिया था, और तिल-तिल गलते हुए दुनिया से रुखसत हो गई थीं। तीसरी दमयन्ती इसी
रास्ते पर चल ही पड़ी है। घर से जब उसे निकाला गया था, उसकी आत्मा मर गई थी और शेष रह गया था
शरीर, मरने के लिए।
अपुष्ट खबरों से उसे यह भी ज्ञात हो
चुका था कि अपनी बीवियों के रहते, ठाकुर विभिन्न शहरों में रखैल भी रखे हुए हैं।
राजे-रजवाड़ों, अमीर-उमराओं के महलों में, बिगड़े रईसों की हवेलियों में औरतों
की इज्जत होती ही कितनी थी। मात्र एक जूती के बराबर। जब तक जी चाहा पैरों में डाले
रखा और जब जी चाहा, उतार दिया चौखट के बाहर।
आज भी इन रईसजादों के बिस्तर पर जवान
औरतों को चादर की तरह बिछाया जाता है और जब चादर मैली कुचली हो जाती है तो उन्हें
फेंककर नई चादर बिछा दी जाती है।
इन्हीं रईसों के खानदान से संबंध रखते
हैं ठाकुर दौलतसिंह जी यानी उसके पति। इनकी नजरों में आज भी औरत की कीमत एक जूती
के बराबर है। एकबारगी वह चादर जरूर बनना पसंद करेगी परंतु जूती बनना कभी पसंद नहीं
करेगी। ठाकुर को सिर्फ एक वारिस चाहिए और उसे बस एक औलाद। जब उसके औलाद पैदा होगी, तो वह संपूर्णता के साथ जी उठेगी।
उसके मन का आकाश खुशियों से झूम उठेगा। जब उसका नन्हा राजदुलारा तुतलाती मीठी
जुबान में बोलेगा— मां कहकर पुकारेगा तो उसके साथ दसों दिशाएं खिल उठेंगी। उसका
रोम-रोम मीठे-मीठे गीत गाने लगेगा। उसके सारे संताप-सारे दु:खदर्द- सारी कुंठाएं
उसी मीठी चाशनी में घुल जाएंगी-गुम हो जाएंगे। फिर चाहे ठाकुर उसे चादर की तरह बदल
दे और नई चादर भी बिछा ले तो वह न तो दुख मनायेगी, न संताप लेगी- न ही आहें भरेगी और न
ही सीत्कार करेगी।
घड़ी ने रात के बारह बजे का ठोंका
लगाया। ढोल-मंजीरों के स्वर अब भी हवा में तैर रहे थे। वह उठ खड़ी हुई। पैरों में
चप्पलें डालीं और बाहर निकल पड़ी।
सन्नाटे से भरे अंधियारे पथ में, उसके कदम हरिया की खोली के तरफ बढ़
चले थे। शायद एक सूरज की तलाश में जो उसका जग आलोकित कर सके।
-------------------------------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment