Monday, 2 June 2025

 यात्रा _(11)

यात्रा अरूणाचल, असम तथा मेघालय की.

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यात्रा में कौन नहीं हैं? जब मंदिर की घंटियों की आवाज, हवा में तैरती हुई हमारे कानों से आकर टकराती हैं तो  हमारा मन बिना देर किए मन्दिर जा पहुँचता है. कभी दूर किसी मल्लाह के स्वर कानों में सुनाई पड़ते हैं तो चप्पू की आवाज भी खुद-ब-खुद सुनाई देने लगती है.

यात्रा तो यात्रा है, चाहे  वह भीतरी हो या बाहरी. प्रायः हम सभी दोनों प्रकार की यात्रा करते हैं. आदमी यात्री हो न हो, लेकिन उसका मन सबसे बड़ा यात्री होता है. बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी वाहन के, वह लाखों-करोड़ों किलोमीटर की यात्रा पलक झपकते ही कर लेता है. इसी तरह कोई सन्यासी, कोई तपस्वी, आराम की मुद्रा में बैठा-बैठा, स्वर्ग में बैठे देवताओं तक की यात्रा कर आता है.सच ही कहा है किसी ने-“.जिसका मन यात्रा में रमता है, वह तो घर में बैठ ही नहीं सकता, वह तो भ्रमण कर स्वयं संसार से परिचय पाने की कोशिशों का हामी होता है”. घुम्म्मड़ राहुल सांस्कृतायन जीवन भर यात्री बने रहे. उन्होंने यात्रा को ज्ञान की नाव की तरह लिया. वे कहा करते थे- “ घुम्मकड़ी मनुष्य के सौभाग्य की निशानी है. यात्रा करने वालों ,संसार तुम्हारे स्वागत के लिए तैयार है. सफ़र पर निकलने के लिए चिंतामुक्त होना आवश्यक है, तो ही यात्रा को अपना उद्देश्य बनाओ.”

विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता यात्रा अनुभव की गांठ यूं खोलते हैं.

“इतनी बड़ी पृथ्वी को/ कितना भर जानता हूँ? / कितनी राजधानियां हैं? / मनुष्य की कितनी कीर्ति है? / कितनी नदियां, कितने पहाड़? / कितने समुद्र और कितने रेगिस्तान? / जाने कितने जीव हैं, जिन्हें नहीं जानता / आगे कितने पेड़ हैं / ये सब अगोचर रह गए / विश्व का अगोचर विशाल है / मेरा मन उसने एक छोटे-से / कोने से जुड़ा है / इसी बेचैनी में / उन ग्रंथों को अक्षय उत्साह से पढ़ता हूँ / जिनमें यात्रा-वृत्तांत है / जहां भी चित्रमय वर्ण की वाणी पाता हूं / चुनकर ले आता हूं / अपने मन के इस ज्ञान-दारिद्रय को / जहां तक भर सकता हूँ / भर लेता हूं /”

यात्रा और सृजन-

हमारी संस्कृति में यात्राओं का विशेष महत्व है, क्योंकि इस विविधता भरी धरती में “एक संस्कृति” का प्रश्न यायावरी से जुड़ा है.यायावरी एक सांस्कृतिक महाभाव है और उसका सृजन सहयात्रा के लिए आमंत्रण. यात्रा मनुष्य के मन की मूल्यवान पहचान है. मानव मात्र की एकता और उसकी अंदरूनी एकसूत्रता की तलाश, विश्व में शायद हर कहीं हो सकती है. हर देश का पानी-पहाड़ लगभग एक-सा ही है..यात्रा का उल्लास कभी तो यायवर को प्रकृति से एकरुप करता है, कभी अंतःप्रकृति से जोड़ देता है. इसलिए वह विस्मयमुग्ध मन से भ्रमण करता है. और फ़िर बाद में भ्रमण करता है, यात्राओं को रचकर. वह उसे दोबारा देखने का जतन करता है. यात्रा भाव और सृजन यानी घूमना और लिखना एक-दूसरे के पूरक हैं.

हमारे घुमक्कड़  मित्र प्रो. श्री राजेश्वर अनादेव एक जगह कभी रुकना नहीं चाहते. करीब  तिरतालिस देशों की यात्रा करने और समूचे भारतवर्ष की यात्रा कर चुकने के बाद भी चौबीसों पहर किसी नयी यात्रा की योजना बनाने में निमग्न रहते है. अभी-अभी मई 2024 को हम श्रीलंका से लौटे हैं कि अगला कार्यक्रम सिक्किम के लिए बन गया. दो माह भी नहीं बीते होंगे कि आपने अरूणाचल, असम और मेघालय भ्रमण का टूर प्लान बना डाला.

हालांकि  चार जून 2011 को मैं मेघालय की राजधानी शिलांग हो आया था. प्रसंग था-पूर्वोत्तर  हिंदी अकादमी शिलांग द्वारा साहित्यिक आयोजन. इसमें मेरा कहानी संग्रह “तीस बरस घाटी” सर्वोतम कृति पायी गई थी और मुझे “डा. महाराज कृष्ण जैन स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. असम भी मैं हो आया था, केवल अरुणाचल नहीं जा पाया था. अतः मैंने अपनी स्वीकृति दे दी और हम चौदह यात्रियों ने इन तीनों स्थानों का भ्रमण किया और भरपूर आनंद उठाया.

दिनांक 23/11/24 को हम सभी सहयात्री जबलपुर से डिब्रुगढ़ एक्सप्रेस ( 15945 ) पर सवार होकर चौबीस घंटे की यात्रा करते हुए गुवहाटी पहुँचें.

गुवहाटी- एक संक्षिप्त परिचय-

ब्रह्मपुत्र नदी के पावन तट पर प्राचीन मन्दिर “कामाख्या” के सहित अनेकों दर्शनीय स्थल है. यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और कल्चर इसे नार्थ-ईस्ट में बेहद खास बना देता है. गुवहाटी का प्राचीन नाम प्राज्ञ ज्योतिषपुर था. बाद में इसका नाम गुवहाटी रखा गया. चुंकि गुवहाटी हमारी यात्रा का पहला पड़ाव था और हमें यात्रा करने के पश्चात इसी स्थान पर लौट आना भी था. अतः गुवहाटी का भ्रमण न करते हुए हमने बोमडिला की ओर प्रस्थान करना उचित समझा.

हमारी ट्रेन दिन के लगभग दस बजे गुवहाटी पहुँची थी. रेल्वे स्टेशन पर टूर आपरेटर उत्सव दालचूट हमारे आने की प्रतीक्षा कर रहा था. स्टेशन से बाहर आकर हमने चाय का आनंद उठया और बिना किसी देरी के बोमडिला की ओर प्रस्थान किया. ज्ञात हो कि गुवहाटी से बोमडिला लगभग साढ़े तीन सौ किमी है. पांच-छः के दरमियान हम बोमडिला पहुँचे. हालांकि दिन के पांच-छः ही बजे थे,लेकिन देखकर लगता था कि रात्रि के नौ-दस बज रहे हैं.

24-11-2024

बोमडिला.

समुद्रतल से 2217 मीटर की ऊंचाई पर बसा बोमडिला, न केवल अपने क़ुदरती सौंदर्य के लिए पर्यटकों को लुभाता है, बल्कि चीन की सीमा से अपनी नज़दीकी की वजह से भी यह पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण इलाकों में शुमार हो जाता है. सुदूर पर्वतों की चोटियों के बीच घिरा गौतम बुद्ध के अनुयायियों का ये छोटा शहर उनके ही जीवन मूल्यों की तरह शांत भी है और अलग-अलग जनजातियों से जुड़े यहाँ के लोगों के दृदय में बसी शांति सहज ही दिख जाती है.

मोंपा, मिजी, आका, बेगुन या शेरडुकपेन जनजातियों की रिहाइश वाले बोमडिला में तिब्बती संस्कृति का प्रभाव साफ़ नज़र आता है. सेव के बाग़ानों और ऑर्किड की महक के साथ लोसर जैसे उत्सवों की धूम बोमडिला आने के अहसास को कुछ ख़ास बना देती है.  

 

बोमडिला पहुंचकर आपको अरुणांचल प्रदेश की सबसे ऊंची चोटियां केंगटो और गोराइचेन आपको एकदम सामने नज़र आती हैं, जैसे इस पर्वतीय प्रदेश में आने पर अपनी उजली मुस्कुराहट के साथ वो आपका स्वागत कर रही हों. कहा जाता है कि मध्यकाल में बोमडिला तिब्बत के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था. कुछ साक्ष्य इस बात के भी हैं कि यहाँ पर भूटान की जनजातियों का शासन रहा है. 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन  की सेना ने बोमडिला पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन बाद में उन्हें वापस लौटना पड़ा.

बोमड़िला से तवांग के रास्ते पर पड़ने वाले टिपी ऑर्किड रिसर्च सेंटर तथा सेब के बागीचे. में हमने भ्रमण किया. बोमडिला जाने के लिए इनरलाईन परमिट बनाना आवश्यक है.

शाम का लगभग चार बजा रहा होगा, लेकिन बोमड़िला पहुँच कर ऐसा लगने लगा था मानो रात्रि के नौ-दस बज रहे होंगे. ठिठुरती शाम में हमने बोमड़िला के होम-स्टे में रात्रि निवास किया और अगली सुबह हम तवांग के लिए निकल पड़े. दरअसल हमारी यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य यह था कि हम तवांग जाकर उन तमाम भारतीय सैनिकों को भावभीनी श्रद्धांजलि देना था, जिन्होंने 1962 के युद्ध में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था. 

25-11-2024

तवांग-(संक्षिप्त परिचय.)

भारत के अरुणाचल प्रदेश प्रांत का एक नगर है, जो तवांग जिले का मुख्यालय भी है. तवांग अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमोत्तर भाग में स्थित है. तवांग की उत्तर-पूर्व दिशा में तिब्बत, दक्षिण-पश्चिम में भूटान और दक्षिण-पूर्व में पश्चिम कमेंग ज़िला स्थित है..तवांग, तवांग चू घाटी में स्थित है और  हिमालय में 3,048 मीटर (10,000 फीट) की ऊँचाई पर बसा हुआ है.

तवांग का मुख्य काम-धंधा कृषि और पशु-पालन है. यह प्राकृतिक रूप से बहुत ख़ूबसूरत है. छिपे हुए स्वर्ग के नाम से यह पर्यटकों में काफ़ी लोकप्रिय है. तवांग बहुत ख़ूबसूरत है. पर्यटक यहाँ पर ख़ूबसूरत चोटियाँ, छोटे-छोटे गाँव, शानदार गोनपा, शांत झील और इसके अलावा बहुत कुछ देख सकते हैं. इन सबके अलावा यहाँ पर इतिहास, धर्म और पौराणिक कथाओं का सम्मिश्रण भी देखा जा सकता है. तवांग का नामकरण 17 वीं शताब्दी में मिराक लामा ने किया था. यहाँ पर मोनपा जाति के आदिवासी रहते हैं. इनकी जाती का संबंध  मंगोलों से  है. ये लोग पत्थर और बांस के बने घरों में रहते हैं. प्राकृतिक ख़ूबसूरती के अलावा पर्यटक यहाँ पर अनेक बौद्ध मठ भी देखे जा सकते हैं. यहाँ का तवांग मठ बहुत प्रसिद्ध हैं. इसकी गणना एशिया के सबसे मठ में की जाती है. अपने बौद्ध मठों के लिए यह प्रदेश पूरे विश्व में पहचाना जाता है. सदाबहार वनों की हरियाली में ढका अरुणाचल प्रदेश का सबसे खुबसूरत तवांग जिलें में आप एक अलग कल्चर को देख सकते है.

तवांग का नाम याद आते ही हमारी स्मृतियों में 1962 में चीन द्वारा थोपा गया युद्ध याद हो आता है. चीनी-हिन्दी भाई-भाई के नारे लगाने वाले चीन ने हमारे देश पर आक्रमण कर दिया था. उनकी सेना मारकाट मचाते-मचाते, जमीन अधिकृत करते हुए तवांग तक आ चुकी थी. तवांग घाटी में चीन की सेना से दो-दो हाथ करते हमारे वीर जवानों ने अपने प्राणॊं की बाजी लगा दी थी. हमारी यात्रा का असल उद्देश्य था कि हम यहाँ पहुँचकर, उन वीर जवानों की स्मृतियों को नमन कर सकें.और उनके शहादत को याद कर सकें.

(तवांग का वह दुर्गम इलाका जहाँ चीनी सेना ने सन 1962 में तवांग को अपने कब्जे में ले लिया था.(एक नक्शा)

वार मेमोरियल-तवांग.

केप्टिन जोगेन्द्रसिंह-

केप्टिन जोगेन्द्रसिंह सिख रेजिमेंट की प्रथम बटालियन में एक अधिकारी थी. वे अपने तीस साथियों के साथ तवांग-नेफ़ा (अरुणाचल प्रदेश) मार्ग में एक महत्वपूर्ण स्थान की सुरक्षा कर रहे थे. हरी-भरी पहाड़ी पर नेफ़ा में एक प्राचीन बुद्ध मन्दिर है. चीन इस स्थान को अपने अधिकार में लेने के मनसूबे बना रहा था.

सुबेदार जोगिन्द्रसिंह और उनके साथी युद्ध के लिए मोर्चा पर तैनात थे. सुबेदार का आदेश मिलते ही सिख रेजिमेंट के योद्धा, चीन के सैनिकों को काल कवलित करने लगे. पहली बार में 200 चीनी सैनिक की टुकड़ी का साफ़ाया कर देने के बाद अचानक दूसरी  टुकड़ी जिसमें 200 चीनी सैनिक होते हैं ,कतारबद्ध हो आगे बढ़ चले थे.

सुबेदार जोगिन्द्रसिः और उनके साथी जितनी तेजी से मशीन गण चलाई जा सकती थीं, चला रहे थे. गोलियां तेजी से दागी जा रही थीं और दुश्मन सैनिक यमलोक की यात्रा पर जा रहे थे. भीषण गोलाबारी के चलते दुश्मन सेना तितर-बितर हो गयी. अनेक सैनिक मारे गए. अंततः चीनी सेना पीछे हट गई. इस तरह सुबेदार साहब ने चीनी सेना का दूसरा आक्रमण भी विफल कर दिया.

इस युद्ध में हमारे आधे सैनिक भी वीर गति को प्राप्त हो गए. एक चीनी सैनिक ने घात लगाकर सुबेदार को अपना निशाना बनाया. गोली उनकी जांघ पर लगी, जिससे गहरा घाव बन गया. घायल अवस्था में भी उन्होंने अपना साहस नहीं खोया.

तीसरी बार 200 चीनी सैनिको की टुकड़ी भारी तोपों और और गोले के साथ आगे बढ़ती चली आ रही थी. सुबेदारजी समझ चुके थे कि चीन की युद्ध नीति तीन बार आक्रमण करने की है. परंतु वे भी जिद्दी सैनिक थे.अपने आधे बचे सैनिक साथियो के सात तीसरे आक्रमण को विफल करने के लिए वे निर्भीकता के साथ युद्ध के मैदान में डटे हुए थे. कम संख्या में सैनिक बच रहे थे, अतः उन्होंने स्वयं मशीनगन का उपयोग करते हुए युद्ध का संचालन करना उचित समझा.

मशीनगन से दुश्मन को रोका नहीं जा सकता था. “असंभव” शब्द उनके शब्दकोश में नहीं था. वे असंभव को भी संभव बनाना जानते थे. जब उनकी मशीनगन की अखिरी गोली शेष थी.तब  वे समझ चुके थे कि अब जीवित रहना संभव नहीं है. विषम परिस्थितियों को भांपते हुए उन्होंने अपनी बन्दुक में संगिन लगा ली और “वाह गुरु जी खालस., वाह गुरुजी फ़्तह” का नारा लगाते हुए दुश्मन सैनिकों को यमपूरी भेजते रहे. बड़ी संख्या में दुश्मन सैनिक मौत के घाट उतार दिए गए थे. अचानक चीनी सैनिकों को ने उन्हें चारों ओर से घेर कर घायल करना आरंभ कर दिया. इस तरह जाबांज सुबेदार जोगिन्द्रसिंह जी वीरगति को प्राप्त हुए.

भारत की सीमा को सुरक्षित करते हुए वीर गति को प्राप्त हुई सिख रेजिमेंट के बलिदान को अमिट बनाए जाने के लिए भारत सरकार ने तवांग में “वार मेमोरियल” की स्थापना की है. इस वार मेमोरियल में उन तमान घटनाऒं का विस्तार के साथ उल्लेख किया है और वीर जोगिन्द्रसिंह की एक प्रतिमा भी यहाँ स्थापित की गई है.

हम सभी सह-यात्रियों ने वार मेमोरियल पहुँचकर, अपना शीश झुकाकर, वीर सैनिकों को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की.

तवांग का नाम तवांग क्यों पड़ा ?

 एक दिलचस्प कहानी पढ़ने को मिलती है. तिब्बती बौद्धों के सबसे बड़े नेता और पांचवें  दलाई लामा  “ मेराक लाम लोद्रे ग्यास्तों ” ने अपने शिष्य को आदेश दिया कि वह  बौद्ध मठ बनाने के लिए सुन्दर जगह की तलाश करे. उन्होंने अपने चेले को उड़ने वाला घोड़ा भी दिया. शिष्य ने एक स्थान का चयन किया और ध्यान लगाने बैठ गया. जब वह ध्यानावस्था से बाहर आया, तो देखा कि घोड़ा कहीं दिखाई नहीं दे रहा है. बहुत तलाश करने के बाद भी घोड़ा नही मिला. किसी ने बताया कि घोड़ा यहाँ से कई मील दूर, एक ऊँचे पहाड़ पर चरता देखा गया है.

घोड़े के उस पहाड पर पहुँचने को उन्होंने ईश्वर का इशारा समझा और उस स्थान पर बौद्ध मठ बनाने का निर्णय लिया. चुंकि इस स्थान की खोज घोड़े ने की थी. अतः उस स्थान का नाम “तवांग” रखा गया. तिब्बती भाषा में “त” का अर्थ घोड़ा होता है और “वांग” का अर्थ चुना हुआ” यानी घोड़े के द्वारा चुना गया स्थान.

 शाम घिर आयी थी. हालांकि शाम के पांच बजे रहे होंगे, लेकिन लगता था कि रात्रि का दस बज रहा है. चुंकि वार मेमेरियल एक ऊँचे स्थल पर बनाया गया है. शीत लहर का प्रकोप जारी हो चुका था. अतः बिना देरी लगाए हम अपने होटेल में चले आए थे. तवांग में रात्रि विश्राम करने के पश्चात हमारा अगला पड़ाव था-“जीरो पाईण्ट “और “ माधुरी लैक “ का स्वर्गीय आनंद उठाना था.

26-11-2024

तवांग से जीरो पाइन्ट

 

समुद्र सतह से 15,300 फीट की उँचाई पर स्थित है “ युमेसानडोंग”, जो जीरो पाईण्ट के नाम से जाना जाता है. अत्यधिक ऊँचाई के कारण यहाँ आक्सीन की मात्रा काफ़ी कम होती है. अतः यात्री को अपने साथ होम्योपेथी की दवा “ कोका” तथा टेबलेट “डायामेक्स” तथा भीमसेन कपूर साथ रखना बहुत जरूरी होता है. अत्यधिक ऊँचाई पर रहने पर यात्री को आक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है. सांसे फ़ूलने लगती है. अतःएक कदम भी आगे बढ़ाने में नानी याद आती है. ऐसी अवस्था में इन दवाइयों को प्रयोग में लाने से यात्री को राहत महसूस होने लगती है. चीन की बार्डर से सटे इस इलाके में आपको पेड़ देखने को नहीं मिलते. बारिस भी कम होती है, लेकिन मुलायम-मुलायम बर्फ के छोटे-छोटे गोले लगातार बरसते रहते हैं, जिससे संपूर्ण घाटी में बर्फ़ की चादर ओढी-हुई सी दिखती है.

स्वास्थ्य ठीक नहीं लगने के कारण मैं तथा मित्र श्री रमेश चौधरी जी एवं श्री पौराणिक जी ने इस दुर्गम यात्रा पर न जाना ही उचित समझा और अपने होटेल में आराम करना ज्यादा श्रेयस्कर समझा.

 

 

बर्फ़ से आच्छादित वादियों में मित्रगण.

बर्फ़ से आच्छादित वादियों में मित्रगण.

यहाँ से लौटकर मित्रों ने माधुरी लेक के विहंगम दृष्य का अवलोकन किया.

 

सन 1997 में शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित की “कोयला” फ़िल्म की शूटिंग इसी झील के किनारे हुई थी. इस तरह “संगत्सर लेक” आज माधुरी लेक के नाम से प्रसिद्ध है. झील के ठहरे हुए स्वच्छ और पारदर्शी जल तथा चारों ओर फ़ैली प्राकृतिक सुन्दरता को देखकर पर्यटक ठगा-सा रह जाता है.

तवांग का दर्शनीय स्थल नूरनांग जलप्रपात

 

तवांग के खूबसूरत जंगल में स्थित यह वॉटरफॉल देश के सबसे अच्छे झरनों में गिना जाता हैं. बड़ी संख्या में पर्यटक झरने के पास पिकनिक मनाने के लिए आते हैं. झरने का पानी 100 मीटर की ऊँचाई से गिरता हैं. यह वॉटरफॉल “नूरनांग नदी”  का एक अहम हिस्सा जो कि सेला दर्रे से निकलती है.

सेला दर्रा तवांग का प्रसिद्ध स्थान हैं जोकि हिमालयी विस्टा में सबसे खूबसूरत दृश्य प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है. सेला पास को अरुणांचल प्रदेश के लोगो की जीवन रेखा भी माना जाता हैं. दर्रा की रहस्यवादी सौंदर्यता यहाँ आने वाले पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं. भारत के पूर्वोत्तर में यह प्रकृति के आकर्षण का सुन्दर नमूना है. यह स्थान बर्फ से ढंका हुआ रहता हैं और समुद्र तल से 4170 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं. सेला दर्रा और सेला झील को अरुणाचल प्रदेश के प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है.

सेला पास (अरुणाचल.)

अरूणाचल प्रदेश स्थित बार्डर रोड आर्गेनाईजेशन ने 13000 फीट की ऊँचाई पर दो टनलों का निर्माण किया है. इसके निर्माण से चीन की बार्डर तक हमारे सैनिक साजो-सामान के साथ कम समय पर पहुँच सकते है. हमारी मित्र-मण्डली ने विहंगम स्थल पर फ़ोटॊग्राफ़ी की. (चित्र में मित्र-मडली.)

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा 825 करोड़ रुपये की कुल लागत से निर्मित टनल 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. अन्य बातों के अलावा, सेला देश की सबसे ऊंची सुरंग है जो रणनीतिक तवांग क्षेत्र और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास चीन की सीमा से लगे अन्य अग्रिम क्षेत्रों को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है.

सेला टनल 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और इसे सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा 825 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया है. इस परियोजना में दो टनल शामिल हैं - (टनल 1) 1,003 मीटर लंबी है और (टनल 2) 1,595 मीटर की ट्विन-ट्यूब टनल है. इस परियोजना में 8.6 किमी लंबी दो सड़कें भी शामिल हैं. टनल को प्रति दिन 3,000 कारों और 2,000 ट्रकों के यातायात घनत्व के लिए डिजाइन किया गया है, जिसकी अधिकतम गति 80 किमी प्रति घंटा है.

 

सुरंग- 2 में यातायात के लिए एक बाइ-लेन ट्यूब और आपात स्थिति के लिए एक एस्केप ट्यूब है. इसमें टनल 1 तक सात किलोमीटर की एक पहुँच सड़क का निर्माण भी शामिल है, जो बीसीटी रोड से निकलती है, और 1.3 किलोमीटर की एक लिंक रोड, जो टनल 1 को टनल 2 से जोड़ती है. सेला टनल के कारण तेजपुर से तवांग तक यात्रा का समय भी एक घंटे से अधिक कम हो सका है.

यह टनल महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन की सीमा से लगे तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है. इसके निर्मान से तवांग की यात्रा का समय भी कम से कम एक घंटे कम हो सका है., इसके साथ ही वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास अग्रिम क्षेत्रों में हथियारों, सैनिकों और उपकरणों की तेजी से तैनाती हो सकती है. सेला दर्रे के पास स्थित टनल की आवश्यकता थी क्योंकि भारी वर्षा के कारण बर्फबारी और भूस्खलन के कारण बालीपारा-चारीद्वार-तवांग मार्ग वर्ष की लंबी अवधि के लिए बंद रहता था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 मार्च को अरुणाचल प्रदेश की अपनी एक दिवसीय यात्रा के दौरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सेला टनल परियोजना का उद्घाटन किया.था.

29-12-2024

बोमडिला से काजीरंगा अभ्यारण्य की ओर.

बोमडिला से  तेढ़े-मेढ़े रास्ते, तो कभी गोलाकार रास्तों से हिचकोले खाते हुए हम काजीरंगा अभ्यारण्य की ओर बढ़ चले थे. करीब ढाई-सौ किमी की लंबी यात्रा करते हुए शाम के चार-साढ़े चार बजे हम काजीरंगा पहुँचे. शाम घिर आयी थी लेकिन लगने लगा कि जैसे रात के कोई आठ-दस बजा होगा. काजीरंगा पहुँचकर हमने विश्राम किया.

काजीरंगा एक परिचय

भारत में 100 से भी अधिक राष्ट्रीय उद्यान हैं, जो दुनियाभर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. इन्हीं में से एक है काजीरंगा नेशनल पार्क, जिसे गैंडे की भूमि के नाम से भी जाना जाता है. दरअसल, यह उद्यान एक सींग वाले गैंडे (  राइनोसेरोस, यूनीकोर्निस ) के लिए प्रसिद्ध है. गैंडे की भूमिके अलावा इस पार्क को भारतीय बाघों का घर भी कहा जाता है.

भारत के सबसे पुराने आरक्षित क्षेत्रों में से एक काजीरंगा नेशनल पार्क असम राज्य के गोलाघाट और नागांव जिले में स्थित है. लगभग 430 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ यह पार्क ब्रह्मपुत्र सहित चार प्रमुख नदियों से घिरा हुआ है. इसके अलावा काजीरंगा के जल निकाय और जंगल इस पार्क में चार चाँद लगा देते हैं. इन सब के अलावा सर्दियों में यहाँ साइबेरियन प्रवासी पक्षी भी देखने को मिलते हैं. जिससे यहां आने वाले पर्यटकों को एक अलग ही आनंद प्राप्त होता है. आपको बता दें कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले गैंडों की संख्या सबसे अधिक है. एक रिसर्च के अनुसार मार्च 2015 में यहाँ लगभग 2,401 गैंडे थे. इसके अलावा पार्क में हाथी, दलदली हिरण, जंगली जल भैंस आदि भी मौजूद हैं.

1 जून 1905 में इस क्षेत्र को काजीरंगा प्रस्तावित रिजर्व फ़ॉरेस्ट बनाया गया. उसके बाद 1908 में इस स्थान इस स्थान को रिज़र्व फ़ॉरेस्ट घोषित कर दिया गया और 1916 में इसका नाम बदलकर काज़ीरंगा गेम रिज़र्व रख दिया गया. स्वतंत्रता के बाद, यानी कि वर्ष 1950 में इस पार्क को काजीरंगा वन्यजीव अभयारण्य बनाया गया और 1968 में यह असम राष्ट्रीय उद्यान अधिनियम पारित हुआ और फिर काजीरंगा को राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया. इस तरह 11 फरवरी 1974 इस पार्क को भारतीय सरकार से आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई और वर्ष 1985 में, काजीरंगा नेशनल पार्क ने यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की घोषणा प्राप्त की.


काजीरंगा नेशनल पार्क में आपको प्रकृति की अछूती एवं शांत सुंदरता का आभास होगा. यह सर्वाधिक बाघ घनत्व वाला स्थान है. यहाँ आपको बड़ी बिल्लियों, रॉयल बंगाल टाइगर्स और तेंदुओं की झलक भी देखने को मिलती है.. इसके साथ ही आपको उद्यान में गिद्धों और सांपों की कई प्रजातियाँ जैसे किंग कोबरा, भारतीय पायथन और रॉक पायथन भी देखने को मिलते हैं. यहाँ पक्षियों की 400 से अधिक प्रजाति एवं 13 से अधिक विभिन्न प्रकार के कछुए मौजूद है. इसके साथ ही साँपों की 16 से अधिक प्रजातियाँ, छिपकलियों की 10 से अधिक प्रजातियाँ और कई छोटे जानवर और कीड़े, प्रसिद्ध मगरमच्छ  घड़ियाल भी काजीरंगा नेशनल पार्क में पाए जाते हैं.

 

केमरे में कैद विश्व प्रसिद्ध एक सिंग वाला गैण्डा तथा मस्ती में चरते विशालकाय हाथियों की टोली.

एक सिंग वाला गैण्डा

एसिया की सबसे बड़ी गैंडॆ की प्रजाति और चौथा सबसे बड़ा जानवर होता है. तैरने के मामले में यह उत्कृष्ट श्रेणी में आता है, यह 55 किमी प्रतिघंटा की गति से दौड़ सकता है. इसमें सुनने और सूंघने की अद्भुत क्षमता है, लेकिन इसकी दृष्टि कमजोर होती है.इसका गर्भाधान काल 16 माह का होता है. यह आकार में ऐशियाई हाथी के बाद आकार में दूसरे नंबर पर आता है. अफ़्रीकी और सुमात्रा में गैंडॆ के दो सिंग होते है, जबकि यहाँ पाए जाने वाले गेंडॆ का एक सिंग होता है. नर हो अथवा मादा, दोनों के सिर पर सींग मौजूद होता है.

काजीरंगा में पाए जाने वाले गेंडॆ के अलावा असम प्रदेश के ही प्रजाति पोबीतारा (WLS), औरंग राष्ट्रीय उद्यान, मानस राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिम बंगाल में जलदापारा राष्ट्र्रीय उद्यान, गौरुमारा राष्ट्रीय उद्यान और उत्तरप्रदेश के दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में भी गेण्डॆ पाए जाते हैं.

हम सैलानियों ने काजीरंगा के रिसाट” काजीरंगा” में रात्रि विश्राम किया.

01-12-2024

अगली सुबह हम काजीरंगा से मेघालय की ओर रवाना होते हैं. मेघालय में हमारा चार दिवसीय भ्रमण कार्यक्रम है. इसमें हम शिलांग, चेरापूंजी, डवकी के सहित अन्य स्थानों का भ्रमण करेंगे.

शिलांग- एक परिचय

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित मेघालय राज्य की राजधानी है. यह शहर खासी पहाड़ियों पर स्थित है और सम्द्र सतह से लगभग 1,496 मीटर (4.815 फ़ीट) की ऊँचाई पर स्थित है. शिलांग को “पूर्व का स्काटलैं” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ का मौसम स्काटलैंड जैसा ही ठंड़ा और सुहावना  रहता है. यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए जाना जाता है.

शिलांग पहुँचकर हमने होटेल बर्बरिक में रात्रि विश्राम किया और अगली सुबह चेरापूंजी के लिए रवाना हुए.

शिलांग से चेरापूंजी 53 किमी दूर स्थित है.

चेरापूंजी 4869 फ़ीट की ऊँचार पर खासी हिल्स के दक्षिणी हिस्से में एक पठार पर स्थित है. इसके सामने की ओर बंगलादेश के मैदानी इलाके पड़ते हैं. दक्षिण-पश्चिम और पूर्वोत्तर मानसूनी हवाएं चेरापूंजी में दोनों ओर से आती है, जिसके कारण यहाँ मानसून-सा सीजन बन जाता है. यहाँ हवा का सबसे अधिक जोर होता है. सर्दियों में यहाँ पूर्वोत्तर की ओर ब्रह्मपुत्र घाटी से आने वाली मानसून वर्षा लाती है.

अत्यधिक वर्षा होने का मुख्य कारण यहाँ की पर्वत संरचना जिम्मेदार है. दक्षिण की ओर से पहाड़ियों पर उड़ने वाले बादल घाटी में हवा के दवाब से तेजी पाते है और सीधे पहाडियों से टकरा कर तेजी से ऊपर उठ जाते है, भारी वर्षा तो तब होती है जब हवाएं खासी हिल्स से सीध में टकराती हैं. चेरापूंजी में औसतन 11,777 मिंली मीटर सालाना होती है.

सेवन सिस्टर्स.

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अरुणाचल, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड एवं त्रिपुरा, जिन्हें सेवन सिस्टर्स” के नाम से जाना जाता है. उत्तर-पूर्व के इन राज्यों की एक दूसरे पर निर्भरता के कारण “सात बहने” का नामकरण हुआ.भारत के ये सातों राज्य बहुत ही खूबसूरत हैं. खासी हिल्स में अनेक झरनो के बहते हुए दिखाई देते है.  इस स्थान का नाम सात राज्यों के नाम पर “सेवन सिस्टर्स” पड़ा.

मौसिनराम-

 

चेरापूंजी में अब सघन वर्षा न होकर  शिलाग से करीब 60 किमी दूर मौसिनराम वह स्थान है, जहाँ सबसे ज्यादा बारिश होती है. इसी स्थान पर एक मनोरम प्राकृतिक गुफ़ा है, जो मावजिम्बुइन के नाम से जाती है. गुफ़ा के मध्य में गाय का थन. के आकार की  एक शिला से पानी बूंद-बूंद होकर नीचे बने प्राकृतिक शिवलिंग पर टपकता रहता है. अत्यन्त ही संकरें और पथरीले चट्टानों के बीच से होकर ही इस गुफ़ा में प्रवेश करना होता है.

मावजिम्बुइन गुफ़ा.

    

 

शिलांग की प्राकृतिक सुंदरता को निहार कर अब हम डवकी की ओर बढ़ते हैं.

डवकी नदी

डंमगोट, डाकी के अलावा इस नदी का नाम डवकी भी है.  

यह नदी मेघालय की राजधानी शिलांग से 95 किमी दूर भारत-बांगलादेश की सीमा  के पास जयंतिया पहाड़ियों में बहती है. यह राज्य के तीन गावों दावकी, दरंग और शेनांगगेंडेग से होकर गुजरती है.

मेघालय राज्य में  यह एक ऐसी नदी है जिसे सबसे साफ नदी का टैग मिला हुआ है. नदी में नाव पर सवारी करने पर ऐसा लगता है मानों कांच पर नाव चल रही हो.  नदी में कई फ़ीट नीचे पड़े हुए पत्थर भी एकदम साफ़ नजर आते हैं. इस गिनती दुनियां की सबसे साफ़ नदी के रूप में होती है.

डवकी नदी को देवी का दर्जा दिया गया है. यहाँ अनेक श्रद्धालु इसकी पूजा-पाठ करते देखे गए हैं. इसके किनारे गंदगी करना आदि सक्त मना है. नदी के उस ओर बंगला देश है और इस ओर और भारत है. नदी को पार कर अनेक घुसपैठिए यहाँ सिगरेट आदि बेचने चले आते है, बार्डर की सुरक्षा के लिए बार्डर सेकुरिटी फ़ोर्स सैनिक भी यहां तैनात किए गए है, जो मुस्तैदी से इन पर नजर रखे हुए हैं.

साफ़-सुथरी नदी, पारादर्शी पानी और पानी के सतह से साफ़-साफ़ दिखाई देने वाले पत्थरों और बालू को देखना अपने आपमें एक आश्चर्य है. आश्चर्य इसी लिए भी कि हमने इससे पहले इतनी साफ़-सुथरी नदी को आज दिन तक नहीं देखा है.

हम मित्रों ने जमकर नौका विहार किया. अब लग आयी थी करारी भूख, तो नदी के तट पर बनी होटल में हमने सुस्वादु भोजन का आनंद उठाया और अब हम लौट पड़ते हैं एम अन्य पर्यटक स्थल उमियम जलाशय की ओर.

उमियम जलाशय.(शिलांग.)

 

शिलांग से 15 किमी की दूरी पर स्थित है उमियम झील. यह एक जलाशय है जिसे 1960 में उमियम नदी पर बनाया गया है. तब से यह पर्यटकों की पसंदीदा जगह बनकर उभरी है. विशाल झील का नीला पानी और उसमें दिखती प्रकृति की सुंदरता लैंडस्केप फ़ोटोग्राफ़ी के लिए एक उचित स्थान है. आप यहां कई तरह के वाटरस्पोर्ट्स का मजा ले सकते हैं. यह जलाश्य घने शंकुधारी जंगलों से घिरा हुआ है और लगभग 222 किमी के क्षेत्र में फ़ैला हुआ है.

 

रुट ब्रिज

किसी करिश्में से कम नहीं है पेड़ों की जड़ों से बना रूट ब्रिज  (मेघालय).

 

 

जड़ों  से जड़ों को आपस में बांधकर बनाया गया यह पुल आश्चर्य पैदा करता है. अपनी यात्राको सुलभ बनाने के लिए  या एक स्थान से दूसरे जगह जाना हो,जहां गहरी खाई हो अथवा किसी नदी के उस पार जाना हो, तो कोई न कोई साधन तो होने ही चाहिए.इसी समस्या को हल करने के लिए 180 वर्ष पूर्व साधनहीन मनुष्य ने पेड़ों की जड़ों को आपस में बांधकर एक ऐसा पुल तैयार किया, जिससे उफ़नती हुई नदी के उस पार जाया जा सकता है.

आपने. हमने दुनियां में ऐसे बाहुतेरे पुल देखे हैं, जिसे इंसान ने ही बनाया है. सिडनी का हार्वर ब्रिज हो या टावर ब्रिज इनकी पहचान दुनिया में एक अलग ही किस्म की है लेकिन भारत में ऐसा ब्रिज है, जो अपने आप में इतना अद्भुत, अकल्पनीय है कि जिसे देखकर पर दंग रह जाएंगे. उसके आगे मार्डर्न तरीके से बनाए गए ब्रिज आपको फ़ीके से लगने लगेंगे.

जी हाँ, जड़ों से जड़ों को बाधकर बनाया गया जिसे हम जीवित जड़ सेतु (living root bridge in Meghalaya.) भी कह सकते हैं, आज भी उतनी ही मजबूई से टिका हुआ है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

              

 

 

 

 


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