मुझे
साथ दो.
मुझे
साथ दो मेरे साथी
मुझे
हाथ दो मेरे साथी
मैं इस धरती पर स्वर्ग बसाउँ
मैं इस धरती पर रामराज्य लाउँगा
वे सर उठाये चले आ रहे हैं
पशु से बदतर पाषाणी चले आ रहे हैं
नजर
उठा के देखो तो सही
घटायें तम की घनी छा रही है
साँसों मे घुटन बढती जा रही है
साथ को साथ
दो मेरे साथी
साज पर आवाज दो मेरे साथी
मैं इस धरती पर सूर्य बनकर दमकुंगा
मैं पाषाणी
उनकी मोमों मे ढल दूंगा
जिन्दगी से मौत दूर कितनी
मौत से दूर कितनी जिन्दगी
यही
कुछ दूर है, ना कि
वही
कुछ दूर है
सिर्फ़
सांसों
का कोरा क्रमसंचय है
मुझको ये सांसें दे
दो साथी
मुझको ये
सांसें दे दो साथी
मैं प्रचण्ड प्रलय बनकर गरजूंगा
मैं नस-नस में उनकी डर भर दूंगा
कितनी
ही होती है खुलकर बातें
जब भी
आतीं हैं कुछ ऎसी रातें
मिलकर
एक होते हैं
ऎसे
जैसे
नीर क्षीर में एक दूसरे
आज
किसी ने आँचल थामा है
आज
किसी ने नजर उठाया है
उठती
नजर उठा ही
दूंगा
उठते
हाथ मरोड ही
दूंगा
मुझे
साथ दो मेरे
साथी
मुझे हाथ
दो मेरे साथी
मुझकॊ उन
हाथॊं की जरुरत है
मुझे खून
दो मेरे साथी
मुझे साथ
दो मेरे साथी
बस अपना एक मुस्कुराना है
पवन
कह
दो हर कली से
कि
वह तैयार रहे
घोर
घमण्ड कर तूफ़ान आने वाला है
गगन
में घोर काले बादल घिरेगें
कौन
जाने कब,दामिनी-कामिनी का होगा नर्तन
कडक-कडक कर,चमक-चमक कर वे
भरना
चाहेगीं डर नस-नस में
पर
इससे तुझे क्या ?
आती
तो रहेगीं हरदम घडियाँ तम की
और कभी मिलेगा मिलिन्द आसक्त रक्त का
खिल
सर कंटकों के बीच मुस्कुराना है
जिन्दगी
में अपना बस,एक मुस्कुराना है
जिन्दगी भी मुस्कुरा देगी
प्रीत के गीत मुझे दे दो
तो,मैं उम्र भर गाता रहूँ
प्रीत
ही मुझे दे दो तो
मैं
जिन्दगी भर संवारता रहूँ
जब मैं तुम्हारी सरहद में आया था
याद करूं तो कुछ याद न आया था
एक अजब खामोशी व खुमारी थी
जो मुझ पर अब तक छाये
है
खामोशी
के राज मुझे दे दो
कि मैं
चैन की बंसी बजाता रहूँ
गीत
नये-नये गाता रहूँ
गीत
नये-नये गुनगुनाता
रहूँ
तुम
तभी से
अपने हो
जब चांद तारे भी
न थे
ये जमीं आसमान भी न थे
तुम तभी से साथ हमारे थे
गीतों
के बदले जिन्दगी भी मांग लोगी
तो
मुझे तनिक भी गम न रहेगा
क्योंकि
मुझे मालुम है कि
गीतॊं
के बहाने नयी जिन्दगी लेकर
तुम द्वार
मेरे जरुर आओगी
अधरों पर लिख
दो
इन
अधरों पर लिख दो
एक
सुहाना सा नाम
हो
ना जाये अनबिहायी
पीडा
…………. बदनाम
सपनॊं ने नयनों को नीर ही दिया है
चंदा ने चकोरी कॊ पीर ही दिया है
वेदना है मीरा तो मरहम है श्याम
इन अधरों पर लिख दो
सुन्दर सा एक नाम
देखेंगी अलसाई रत जगी अखियां
भुनसारे पनघट पर छेडेंगी सखियां
बार-बार पूछेगी सजना का नाम
इन अधरों पर लिख दो
सुहाना
सा एक नाम
पग-पग
दीप जलाये हैं
पग-पग
दीप जलाये हैं
फिर भी ठोकर खा ही जाती हूँ
ये पैंजन सारे की सारे भेद
पल भर में खोल जाते हैं
कहा कई है बार नटवर से
कि इतनी रात
बीते
न छेडा कर
तान अपनी
‘ कि
मैं हो जाऊँ अधीर,बावली
कालिंदी के तट
पर
न जा किस झुरमुट में
छिपकर करते आँख मिचौनी
मालुम कितनी व्याकुल होती हूँ मैं
और भर आते नयना पलभर में
फिर चुपके - चुपके
आकर
मुझको वे बांहो में भर लेते
सहमी-सहमी सी रह जाती मैं
सारा की सारा गुस्सा पीकर
बाँहों के बंधन
का सुख
कितना प्यारा-प्यारा तू, क्या
जाने
पहरे बीत जाती पल
में
और मन ही मन रह
जातीं
कितनी ही सारी बातें
सखी-य़े दीपावलियाँ
कितनी प्यारी-प्यारी
न जाने कितना
तम हर लेती हैं
ऎसे ही उस नटवर की मधुर स्मृति
कितने अलौकिक स्वपन दिखा जाती है
फिर समझ नहीं मुझको ये पडता है
ये जग मुझे क्यों बावरी-बावरी कहता है
जल-जल
दीप जलाए सारी रात
जल- जल दीप
जलाये सारी रात
हर गलियाँ सूनी सूनी
हर छोर अटाटूप अंधेरा
भटक न जाये पथ में
आने वाला हमराही मेरा
झुलस- झुलस दीप जलाये
सारी रात
घटायें जब घिर-घिर आती
मेरा मन
है घबराता
हा-दिखता
नहीं कोई सहारा
क्षित्तिज मे आँख लगाये हर क्षण तेरी इन्तजारी में
सिसक-सिसक दीप
जलाये सारी रात
आशाओ की पी पीकर खाली प्याली
ये जग
जीवन रीता है
ये जीवन बोझ कटीला है
राहों के शूल कटीले
है
तिस पर यह चलता दम भरत्ता
है
तडफ़-तडफ़्र दीप
जलाये सारी रात
लौ ही दीपक का जीवन
स्नेह में ही स्थिर जीवन
बुझने को होती है रह रह
तिस पर आँधी शोर मचाती
एक दरस को अखिंयां अकुलाती
जल-
जल दीप
जलाये सारी रात
दीपक माटी
का
तुम हो सोने की वाटिका
तो मैं हूँ नन्हा दीपक माटी का
तुम प्रभात के साथ मिल
अलख जगाने आयी हो
जिसके रव में
कोई
कवि रोता है
या हंसता है
मेरा अस्ताचल का साथ
मानो भारी निद्रा लाया है जिसका कण कण भी
आँखों में
आंजे सोता है
दुनियां भी कितनी बौराई है
या फिर
कोई पागलपन है
कोई कहता मिट्टी सोना हो गया
कोई कहता सोना मिट्टी हो गया
यदि ये अन्तर एकाकी हो जाये
तो दुनियां निर्विकार हो जाये
क्यों कर मेरा
आँगन महक गया है
अचानक यूंहि तुमसे
हुई भेंट थी
अनायास ही ये अखियां
मिल लाचार हुई थी
क्यों कर तुम तभी से
मुझे याद आ रहे हो
अल्हड यौवन क्यों कर
कुछ खोया खोया सा है
और चंचलता क्योंकर
गहरी चुप्पी साधे है
क्योंकर तभी से यह
एक नया परिवर्तन है
अज्ञातभय से कांप उठे थे
हाथ मेरे
जब मैने छेडा वीणा नवीना को था
एक नया स्वर
पाया था
जिसे न चाहकर भी पाया था
क्योंकर
अब रोम-रोम मेरे
गीत तुम्हारे गुनगुनाने लगे है
अलसाये सपनो ने
ली अब एक नई अंगडाई है
बदल बदलकर रूप नित नये
मन को मेरे गुदगुदाने लगे है
क्यों कर सपने मेरे
बहक बहक गये है
बाग की हर डाली डाली
झूल गई यौवन के भार से
मिलकर इनसे पवन झकोंरा
एक नई फ़ुवांर बांट रहा
क्योंकर मेरा आँगन
महक महक गया है
छोटा सा संदेश
जा उड़ जा रे उस ओर
जहाँ मेरे सांवरिया रहते हैं
जो हरदम मेरे उर में बसते हैं
लेकर ये छोटा सा सन्देश
कि बिना तुम्हारे लगता
जीवन सूना-सूना
आ मैं तुमको उनकी पहचान बताऊँ
सांवरी-सांवरी सी सूरत होगी
ख्यालों में डूबे-डूबे से होंगे
कुछ खोये-खोये से रहते होंगे
रो-रोकर ये अंखियां
न जाने कितनी लाचार हुई हैं
अरमां कितने लाचार हुये है
रंगमहल बन गया धूसर कटिंला
हा-तुझको ये कैसे बतलाऊं
ये माना तुम शांति के परिचायक हो
एक काम मेरा छोटा सा ये करना
मन के मीत अगर मिल जाये,तो कहना
बिना तुम्हारे लगता ये जीवन सूना-सूना
कल तक मैने जो स्वप्न
संजोये थे
निस दिन मुझसे पूछा करते हैं
दिल नहीं कहता,पर मन का सन्देह
दूर जाकर क्या वे मुझको भूल गये होंगे
या उनको भी मेरी सुधि आती होगी
" जीवन- मरण" का प्रश्न होगा
जो तुम लेकर आओगे सन्देश
बस पाने को एक छोटी सी पाती
बैठी रहूँगी,राहों में अखियाँ छाती
…..कैसे
गाऊँ और गवाऊँ रे
तुम कहते हो गीत सुनाओ
तो, कैसे
गाऊँ और गवाऊँ रे
मेरे हिरदा पीर जगी है
तो, कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे
आशाऒं की पी-पीकर खाली प्याली
मैं बूंद-बूंद को तरसा हूँ
उम्मीदॊं का सेहरा बांधे
मैं द्वार-द्वार भटका हूँ
तुम कहते हो राह बताऊँ
तो कैसे राह बताऊँ रे
मन एक व्यथा जागी है
कैसे हमराही बन जाऊँ रे
रंगो-रंग में रंगी निय़ति नटी
क्या-क्या दृष्य दिखाती है
पातों की हर थरकन पर
मदमाती-मस्ताती है
तुम कहते हो रास रचाऊँ
तो,कैसे नाचूँ और नचाऊँ रे
मन मयूर विरहा रंजित है
कैसे नाचूं और नचाऊं रे
दिन
दूनी सांस बांटता
सपन
रात दे आया हूँ
मन में थोडी आंस बची है
तन में थोडी सांस बची है
तिस पर तुमने सुरभि मांगी
तो,कैसे-कैसे मैं बिखराऊँ रे
तुम कहते हो गीत सुनाऊँ
तो कैसे गाऊँ और गवाऊँ रे
छ्लक रहा रंग लाल-लाल
आकाश के भट्टे मे लगाई आग लाल-लाल
जिसमें ईंधन झोंक दिया,गोल-गोल
लाल-लाल
कढाहे में उबल रहा, छ्लक्र रहा लाल-लाल
छलक रहा लाल-लाल,टपक रहा लाल-लाल
टपक रहा लाल-लाल, सूखे से पेड पर
जिसे हमने तुमने
कहा,टेसू लाल-लाल
झर रहे टेसू लाल-लाल , हवा के
मस्त झोंकों पर
झर रहे टेसू लाल-लाल, हो गई
परत लाल-लाल
बांसुरी बजाता नंदलाल, नाच रहे ग्वाल-बाल
नाच रहे ग्वाल-बाल, घोला रंग
लाल-लाल
भर-भर मारी पिचकारी,कर दियो चीर
लाल-लाल
कर दियो चीर लाल-लाल, हो गये
सब लाल-लाल
भर- भर मारा है जब रंग लाल , लाल
गुलाल
छा गया रंग लाल-लाल,छा गई धुंध लाल-लाल
नाच रहीं गोपियाँ बेहाल, नाच रहे नंद के लाल
प्रीत के छंद
अधर पर खिले
प्रीत के छंद
मुस्कान बनकर
सजन अब कौन सी
व्यथा मन की
बेचैन हो रह गई मौन
पलकों की सेज पर
महक उठे सपने
एक याद बनकर
सजन अब कौन
टीस रह गई
गलहार बनकर
घटायें सावन की
पलकॊं मे सिमट रह गई
मूक बनकर
सजन अब कौन सी
व्यथा रह गई
प्यास बनकर
अलकॊं मे बांधकर
मलयज हौले से
शुन्य अब संसार हुआ
सजन अब कौन हार
हार कर रह गई
कण्ठहार बनकर
कपसीले बादल
कांधो पर विवशताओं का बोझ
हथेली से चिपकी-
बेहिसाब बदनाम डिग्रियां
दिल पर आशंकाओं-कुशंकाओं के-
रेंगते जहरीले नाग
निस्तेज निगाहें
पीले पके आम की तरह लटकी सूरतें
और सूखी हड्डियों के ढाचों के-
गमलों मे बोई गईं
आशाओं की नयी-नयी कलमें
और पाँच हाथ के
कच्चे धागे मे लटके-झूलते -
कपसीले बादल
जो आश्वासनों की बौझार कर
तालियों की गडगडाहट के बाद
फिर एक लंबे अरसे के लिये
गायब हो जाते हैं
और कल्पनाओं का कल्पतरु
फ़लने-फ़ूलने के पहले ही
ठूंठ होकर रह जाता है
मैं अपना ईमान
नहीं बेचूंगा
पथ पर गिरकर
चाहे कुचला जाऊं
पर अपना ईमान-
नहीं बेचुंगा
धड से कट कर
चाहे शीश गिरे पर अपना ईमान नहीं बेचुंगा
अपने ही जन
स्वार्थसिद्धिवश
पग-पग पर
गहरे गड्डे खोद रहे
दबकर मर जाना चाहुंगा
पर अपना ईमान
नहीं बेचुंगा
ये धरती राम रहीम की है
ये धरती गांधी की है
ये धरती उन वीरॊं की है
जिनके रक्त से सिंचित
आज खडा आजादी का पौधा है
आज के भिकमंगे
अपनी पूजा करवाना चाहें
धड से कट कर चाहे भुजा गिरे
आज के भिकमंगे
अपनी पूजा करवाना चाहें
धड से कट कर चाहे भुजा गिरे
पर मैं अपने हाथ नहीं जोडुंगा
मैं अपना ईमान
नहीं बेचुंगा
हर गली-गली
चौराहों पर
पाखण्डियों के अड्डे हैं
चांदी के चन्द सिक्कों पर
खरीद रहे ईमान खडे
मुर्दा काया
चाहे बिक जाय ये
नकली पुतले
पर अपना इमान
नहीं बेचुंगा
दिल के काले
तन के उजले
विषधर बन कर
चाहे लाख फ़न पटके
तडफ़-तडफ़ मर जाना चाहुंगा
पर अपना ईमान नहीं बेचुंगा
ये धरती राम रहीम की है
ये धरती गांधी की है
ये धरती उन वीरॊं की है
जिनके रक्त से सिंचित
आज खडा आजादी का पौधा है
आज के भिकमंगे
अपनी पूजा करवाना चाहें
धड से कट कर चाहे भुजा गिरे
आज के भिकमंगे
अपनी पूजा करवाना चाहें
धड से कट कर चाहे भुजा गिरे
पर मैं अपने हाथ नहीं जोडुंगा
मैं अपना ईमान नहीं बेचुंगा
अपनी माटी का
क्या होगा.
धरती पर पलने वाला
धरती पर गलने वाला
मानव कुछ सोच रहा
बैठ गरुरी के झोंकों पर
अपनी माटी को भूल रहा
खबर नहीं है उसको
अपनेपन की,जनधन की
ओ-आसमां पर,
सम्पाति सा ऊँचा
उडने वालों
गर तुमने सोचा होता, अपने
कोमल पंखों का क्या होगा ?
हर गली-गली चौराहों पर
पाखंडियों के अड्डे हैं
तन - मन
लीलाम हो रहा
चांदी के चंद सिक्कों पर
अब स्टेजों तक शेष रही
अब आम
सभाओं तक शेष रही
मानव से मानवता की चर्चाएं
ओ
मानवता के भक्षक
बनने वालों
गर तुमने सोचा होता, गांधी के सपनों
का क्या होगा?
हाट बाट में बिकने वाली राम प्रतिमाएं
हमने तुमने लाख खरीदीं होगी
कंठी माला लेकर हमने तुमने
लाख दुआएं बांटी होगी
केवल शब्दों ही शब्दों में
हमने जी भर राम रमाया
न बदली काया, ब बदली माया
ओ
दानव से मानव
बनने वालों
गर तुमने सोचा होता, राम की मर्यादा
का क्या होगा?
हर सुबह हर शाम
केवल चिंताओं का घेरा है
कब किसको बरबाद करे
कब किसको आबाद करे
और केवल ,बस केवल ,अपनी ही
प्रभुता का बखान करे
और दानवता का माटी में दंभ भरे
रे, अपनी
माटी को दम्भ दिखाने
वालों
गर तुमने सोचा होता, अपनी इस माटी का क्या होगा?
बोलो तुम कौन?
मेरे उद्बोधन के
झील किनारे
तुम गुमसुम-गुमसुम सी-
बैठी-बैठी
फूलों के पाखों से
कोमल-कोमल हाथॊं से
मेरे जीवन- घट में
घोल रही हॊ सम्मोहन
हे, देहलता सी तरु बाला
बोलो- बोलो
तुम कौन
तोडो- तोडो
हे मौन
चिरकाल काल से साध रहा हूँ
अपने अंतर तल में बैठा-बैठा
अपने तल को माप रहा हूँ
किसलित अरमानों के आँचल मे-
लिपटी-लिपटी तुम
क्यों मन के अवगुंठन को
सौरभ से सोख रही हो
हे कंचन सी कचनार कामिनी
बोलो-
बोलो तुम कौन ?
तोडो-
तोडो हे मौन
निर्वसना कुसुमित-
भावनाओं की-
मंथरगति में बहकर
मैं दिगंत को माप रहा हूँ
जीवन की कडियों से-
कडियाँ जोड रहा हूँ
तुम अभिलसित-
शुष्क अधरों से
प्रीति के रस घोल रही हो
हे कुन्दन सी
रतनार कामिनी
बोलो...बोलो तुम
कौन
तोडॊ ....
तोडॊ हे मौन
पाँखुरी गुलाब की
मेरा भी एक बाग था
बाग मे एक गुलाब था
लाल-लाल वो,लाल था
मेरे चमन का ताज था
देश का वह गुमान था
वो जवाहरलाल था
जिस पर हमें नाज था
ऎसा वो गुलाब था
एक घटा थी उमड गई
एक प्रलय जगा गई
वक्त भी मचल गया
मौत ने अधर धरे
होंठ पर गुलाब के
चूम- चूम वो गई
झूम-झूम वो गई
बाग के गुलाब से
लौट के जब आया
होश था वक्त को
सिहर-सिहर वो गया
कांप-कांप वो गया
एक घटा थी थम गई
हिम सी वो जम गई
रुदन- चीत्कार था
नयन थे भरे-भरे
मौत के डरे-डरे हुये
कैसा ये गुबार था
कैसा ये उतार था
कैसा ये मोड था
चमन-चमन उजड गया
बागवां फ़िसल गया
मौत की ढलान से
कैसा ये खेल था
कैसा ये मेल था
वक्त है फ़िसल रहा
और एक ढलान पर
सोच और कुछ रहा
चल और कुछ रहा
पाँख-पाँख झर गई
शाख-शाख झुक गई
पात-पात झर गई
लाल एक गुलाब की
कैसा ये गुमान था
कैसा ये ख्याल था
गिरे जहाँ-जहाँ भी
कतरा-ए गुलाब
के
जाग-जाग है गई
अनंत में बहार की
महक-महक है गई
दिगन्त मे गुलाब की
एक फ़ूल में थी समायी
एक शक्ति ब्रम्ह की
उस शक्ति को प्रणाम है
उस रत्नगर्भा को प्रणाम है
उस देवदूत को प्रणाम है
आज भी महक रही-
लाल पाँखुडी गुलाब की
लांघ गई धूप
यौवन की देहलीज
लांघ गई धूप
डाली से टूट
बिखर गये फ़ूल
सपनॊं की अमराई
नहीं बौरायापन
मस्ताती कोकिला
राह गई भूल
यौवन की देहलीज
लांघ गई धूप
सूनी प्यालों की गहराई
रीते पलकों के पैमाने
सिसक रही मधुबाला
पीकर आँसू खारे
कंगन की खनकार
हो गईं अर्थहीन
पांव बंधी पायल
हो गई मौन
यौवन की देहलीज
लांघ गई धूप
न जाने कितनी
है बाकी
जीवन में और सांसे
और न जाने कितनी
भरनी है युंहि आहें
थम गये पाँव
थम गई छांव
उमर की ढलान
लगा गई दांव
यौवन की दहलीज
लांघ गई धूप
दीप गीत
सखी री.........
एक दीप बारना तुम
उस दीप के नाम
जिस दीप के सहारे
हम सारे दीप जले हैं
सखी री........
सखी री..
दूजो दीप बारियो तुम
उस दीप के नाम
जिस दीप के सहारे
हम जग देखती हैं
सखी री........
सखी री.....
तीजॊ दीप बारियो तुम
उस माटी के नाम
जिस माटी से
बनो है ये दींप
सखी री.......
सखी री.....
चौथो दीप बारियो तुम
उन दीपों के नाम
जो तूफ़ानों से टकरा गये थे
और बुझकर भी
भर गये जग में
अनगिनत दीपों का उजयारा
सखी री........
अपना विश्वास नहीं
क्या मुझ
पर अपना ही
विश्वास नहीं ?
जो केवल ,केवल सपना था
आज वह केवल अपना है
अब तक थीं तुम आँखों की परछाई
हो अब मेरे धडकन की तरुणाई
क्या यह अपना
एक नया इतिहास नहीं ?
भरती सांसों सांसॊं में प्राण
तेरी ये मादक मुस्कान
मदहोश हो उठा पाकर
मैं, तेरा
वह सुन्दर प्यार
क्या यह "आप" का वरदान
नहीं ?
हंसों के पंखों से भी कोमल
आँखों की कजराई कोमल
कितना नशा इन वासंती अंगों में
खिली अरुणाई मानो उदयाचल में
अब अपने को अपना ही
होश नहीं
खूब सुरा पी है मैंने
भरकर इन प्यालों से
बिंधा चुका है अलि
अपने को इन पांसों से
मेरे सुख की मादकता
खडी द्वार पर आज अचानक कैसे?
मिलन प्रहर के इस
क्षण को पाने में मैने
तन के कितने उत्पात सहे?
क्या मुझ पर
अब भी विश्वास नहीं ?
लगन मीत का दीप
जलाओ
लगन मीत का दीप जलाओ
तो मैं द्वार
तुम्हारे आऊं
मैं मौसम बन छा जाता हूँ
हर फ़ूल लदी
डाली पर
तुम अपलक देखतीं रहीं
दूर क्षितिज पर !
तुम सपनों का मधुमास
रचाओ
तो मैं मधुप बन, गली तुम्हारे आऊं
बात कभी चली तो याद कर लिया
रूप कभी बहका तो पलकों में आंज लिया
कभी बदलियां रुकी-रुकी सी
तो मेह सा बरसा दिया
तुम यादों की जंजीर बनाओ
तो मैं बंधा-बंधा चला
आऊं
यह कम सच भी नहीं
कि मैं नन्हा दीपक माटी का
यह उतना ही सच सही
कि तुम हो सोने की वाटिका
इस इस अन्तरतम को दूर हटाओ
तो मैं द्वार
तुम्हारे आऊं
याद तुम्हारी आय़ी
जब - जब
याद तुम्हारी आयी
बरबस ही ये नयना भर-भर आये
छत की मुंडेर से
दूर उठती गोधुली
लाज की मारी ऊषा
लाली सी छितराती
लगता अब तुम आयीं,तब तुम आयी
बरबस ही ख्वाबों
की लहराई
डाल पर अमुआ
के
फ़डफ़डाने की आवाज
मन के सोये तंतु में
फिर एक किरण अलसाई
जब भी तुम्हारे रूप के बादल छाये
बरबस ही ये नयना भर-भर आये
बांध लो इस प्यार
को
कितनी मादक
और सजीली
इन होठों की लाली
कितनी प्यारी-हे आली
रच लो इनको
अब पिया मनभावन आवन को
वरना ये बहकता-बहकता
नवरंग सा बिखर जायेगा.
कितना नशीला
कितना मदमाता
तुम्हारा ये यौवन रूप
लगती सुहावनी
सावन सी धूप
साज लो इसको
थाम लो इनको
वरना ये मचलता-मचलता
दिगन्त में बिखर जायेगा
कितनी भयानक
और शांत भी
छा जाती है तम की हाला
कि बस संभव है ज्योति-ज्वाला ?
बांध लो इस प्यार को
मन के धागों से
वरना ये बिखरता-बिखरता
बाजार हो जायेगा.
प्रतिमा पाषाणी
आशाओं के दीप जलाये
मैं आया हूँ इस द्वारे -
चोला बदल-बदल कर
पर तुम को कुछ भी याद नहीं?
अपनी पूजा का आराध्य-
तुम्हीं को माना है मैंने
अपने जीवन का सार
तुम्हीं को जाना है मैंने
ओ ! पाषाणी
प्रतिमा
जड़ता की आधारशिला
अरमानों के पुष्पों को
अश्कॊं के तारो में गूँथ
गल्हार पहनाये थे तुमको
पर
ओ पाषाणी प्रतिमा
तुमको कुछ भी याद नहीं !
खूब सुना है मैंने
तेरे घर दॆर अवश्य है
पर अंधेर नहीं है
इसी वास्ते तेरे द्वारे ठहरा हूँ
अब रीत चुके-
आशाओं के प्याले
अब सूख चुके-
अश्कों के लहराते सागर
पर ओ पाषाणी
प्रतिमा
हुआ न हलचल अब भी तुझमें
किसी और के अब
जाकर द्वार खटखटाऊँ
ये ना होगा मुझसे
बची-कुची सांसॊं के मनसब
अब इसी द्वारे छोड़ा जाता हूँ
अरे ! आराध्य
तुम्हीं को
माना है अपना मैंने
आज नहीं तो,कल अवश्य ही
पूरी होगी मेरी सफ़ल आराधना
आऊँगा फिर इसी द्वार
मैं चोला बदल-बदलकर
ओ ! पाषाणी प्रतिमा
जड़ता की आधारशिला
नदी के डैश-डाट
अशांत मन लेकर
जब मैं-
किसी नदी के तट पर जाता हूँ
तो लहरों का नर्तन
गुदगुदा स्पर्ष
और कलरव सुनकर
मेरा भी जी चाहता है
कि दो-चार कविता लिख डालूं
नदी की कलकल की निरन्तर आती - आवाज को सुनकर सहसा ध्यान दफ़्तर में लगे-
साउन्डर की तरफ़ जाता है
जिससे लगातार-
डैश-डाट , डैश-डाट-
निरन्तर बजता रहता है
इसका मतलब तो हम प्रायः सभी-
निकाल लेते हैं
लेकिन नदी के साउन्डर से निकलती-
कल-कल
की ध्वनि का मतलब
हम केवल अपनी समझ से
निकाल पाते हैं ,अलग-अलग
जिसका कोई वर्गीकरण नहीं होता
और न ही इसका कोई मैसेन्जर
खबर लेकर द्वार-द्वार भटकता है
लगता है
लगता है आज तुम
बहुत उदास
हो
अल्हड संदिली बयार के झोंको ने
रहे सहे मन
के संयम को
जी भर के
उडाया है आज
लगता है आज मन
कहीं खोया-खोया सा है
बेखबर से बिखरे- बिखरे ये केशकुंतल
न जोडा गया
आज निखरा गुलाब
लगता किसी निष्ठुर सपन ने तोडा है मन
लगता है किसलित अरमानों को
लग गई पतझर की नजर है
मन-प्राण
क्यों विकल बेचैन
है
क्योंकर छूट जाती है धीरज की डोर
आओ भी मेरे सपनों की ठंडी छांव
तले
तेरे मेरे सपने
शायद एक रंग हैं
लगता है सचमुच तुम
आज बहुत उदास हो
समाजवाद मंथन
देव और दानवों ने-
मथा सागर
व्यर्थ ही पिसता रहा वासुकि
मिला क्या ?
शांति-शांति की-
चलती रही चख-चख
फ़ायदा उठाया शेषशायी ने
अपना और देवगण का कराया
आज इसी क्रम में हो रहा
समाजवाद मंथन
मस्का निश्चित ही-
वरिष्ठ पायेंगें
कुछ चमचे चाट जायेगें
मठा,
समाज के नाम चढाकर
गरीबी हटाओ
गरीबी हठाओ
केवल दो शब्द
और छ्ह अक्षर
मगर कैसे ?
कोरे भाषणॊं से नहीं
कोरे प्रचारों से नहीं
केवल हिलमिलकर हम
उद्धम -साहस -धैर्य -बुद्धि-शक्ति और पराक्रम
इन छः दिव्यास्त्रों को
अपने हाथॊं में लेकर
सभी छ्ह राक्षसों को
पलभर में मार सकेगें
इनकी नाभी में अमृतकुंड है ?
तो यह हमारा कोरा भ्रम
होगा.
पाल रहे नागराज
हम असफ़ल प्रयत्न करने के-
आदी हो गये हैं
अच्छी से अच्छी लच्छेदार बातें करने में-
माहिर हो गये हैं
कोई हमारी सुने या न सुने
हम सुनाने के शौकिन हो गये हैं
आसन, आश्वासन,भाषण, अनुमोदन
अब हमारी परिपाटी हो गई है
कुछ दिनों से चर्राया
है शौक
हमनें अपने ही आंगन
में
बना डाली है बांबी
और पाल रहे नागराज
बस केवल एक कमी है उसमें
वह हमें देखकर फ़ुंसकारता है
पर हमारा भी अटल विश्वास है
एक न एक दिन तो वह मान ही जायेगा
इसीलिये हमनें -
उस कातिल को-
रोज दूध पिलाने की ठान ली है
धर्म परिवर्तन
एक दिन
समाजवाद -
मंच पर खडा
गरीब पक्ष का-
जमकर समर्थन कर रहा था
शायद वह -
रामराज्य लाने के चक्कर में था
जनता ने उसे खूब उछाला
उसे गले से लगाया
यहाँ तक उसके पैर भी पडे
दूसरे दिन
एक दमदार नेता ने
उसे दावत पर बुलाया
स्काच पिलाया
और मुर्गमुस्सलम भी खिलाया
तीसरे दिन
देश के सभी समाचार पत्रों ने
बडे-बडे अक्षरों मे खबर प्रकाशित की
कि, समाजवाद ने -
अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है
मेरा जीवन
केवल-
मुठ्ठी भर-
उजाला ही तो मेरे पास है
यदि वह मैं तुम्हें दे दूँ
तो मैं कहीं का नही रहूँगा
नहीं नहीं, -
यह क्दापि नहीं हो सकता
कभी नहीं हो सकता
उसके एक-एक शब्द
मुझे अक्षरतः याद है
प्रतिशोध की ज्वाला-
मुझे बार-बार उकसाती है कि
मैं उसका मुँह नोच लूं
पर मैं उसका कुछ भी-
बिगाड नहीं पाता हूँ
क्योंकि
उसकी बंद मुठ्ठी में
सिसक रहा होता है
मेरा जीव
प्रसव पीडा
प्रसव पीड़ा की
छटपटाहट के बाद
जब एक कवि ने
जन्म दिया एक कविता को
तो प्यार से उसका नाम रखा -
शांति
जब दूसरी को जन्म दिया
तो नाम दिया
कांति
और तीसरी को जन्म दिया तो
नाम रखा
आकृति
ठीक इसी तरह
राजनीति के साथ
गंदी रतिक्रीडा करते हुये
कुछ छैलों ने जन्म दिया
अशांति-विकृति-
इसी का दुष्परिणाम है कि
न जिये चैन है
और न मरे चैन है
याने कि
सब बेचैन हैं
तुम नित नूतन
सिंगार करो
कंचन सी कचनार कामिनी
कनक प्रभा सा
तेज
ऊषा आकर लाली मल दे
चाँद सी बिंदिया माथे जड़ दे
चमक उठेगी देह
सखी री ! तुम
नित नूतन सिंगार करो !
जब -जब भी हैं फ़ूल खिले
जूड़े से वे है आन जुडे
मलयाचल जब मचल उठे
आँचल से वह उलझ पड़े
तो महक उठेगी
देह
सखी री ! तुम
नित नूतन सिंगार करो !
घटायें काली घिर-घिर आये
चातक- मन भरमाये
पी-पी
की सुन टेर सखी
व्याकुल मन घबराये
सखी री ! तुम अब थामो धीरज
डोर !
कलिंदी के तट पर देखो
पिया खड़े हैं
जौन
बंसी के धुन पर देखो
तोड़ रहे हैं
मौन
सखी री ! तुम नित नूतन अभिसार
करो
सखी री ! तुम नित -नूतन सिंगार करो!
लॊ आ
गये बादल
उमड़-उमड़
कर
घुमड़-घुमड़ कर
लॊ आ गये बादल
नभ पर छा गये बादल
हवाओं ने की अगवानी
मयूर-पग नाचे बेसानी
लचकती डालियों ने किया
-झुककर अभिवादन
उमड़-उमड़ कर
घुमड़-घुमड़
कर
आ गये बादल
लो नभ पर छा गये बादल
प्यासे चातक में प्राण भरे
याचक कृषक ने हाथ जोड़े
टिन-टिन टिनटिना उठीं
वृषभ की गलहार घंटियां
लो सरगम बिखेरते
आ गये बादल
उमड़-घुमड़ आ गये बादल
लो नभ पर छा गये बादल
तपस की हवस ने थे
वसुन्धरा के छीने प्राण
अब वही बादल बन
अमृत की फ़ुवांर बांट रहा
स्वर्ग-धरा को जोड़ रहा
बादल बन तार-तार
आओ हम सब मिलकर
खूब मनायें बूदों का त्योहार
नर्तन करते
गर्जन करते
लो आ गये बादल
नभ पर छा गये बादल
हस्ताक्षर
सूख भी नहीं पाये थे अभी- सूखे के हस्ताक्षर
कि बाढ ने दनादन -
जड दिये चांटॆ
आदमी के गाल पर
पता नहीं इन दो पाटों के बीच
कब तक वह अपनी
सूखी हड्डियाँ पिसवाता जायेगा ?
हम कोरे आश्वासनॊं के ढेर पर बैठे हैं
वे हमारे सिर पर आसन लिये बैठे हैं
वे नित नये आसमां से बातें करते है
और हम रोज रात में
सपनों के जाल बुना करते हैं
इन दो अंतरालों के बीच आदमी
और कितना गिरता जायेगा ?
पता नहीं-पता नहीं
कब वह
सडक पर चलना सीख पायेगा ?
अपने आंगन में उन्होनें
लगा रखे हैं कल्पतरु
सुराघट भी सदा उनके पास रहता है
मेनकादि अप्सरायें भी
चरणों में बैठा किया करती हैं
वे नित नये पकवान उडाते हैं
और यहाँ सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती
चांद सी दिखने वाली ये रोटी
और कितने दूर होती जायेगी
पेट और रोटी कि दूरी
और कितनी बढती जायेगी ?
वे यमुना के किनारे बैठे हैं
और गंगा में पाप धोते हैं
और हम केवल नाम सुनकर
भवसागर से पार उतरने की सोचते हैं
पता नही यह बंदरचाल कब तक चली जायेगी ?
सुना है हमनें कि
उन्होने अपनी पीढी-दर-पीढी का
कर लिया इंतजाम है
और हम पैसॊं -पैसॊं के लिये
दर-दर
भटका किये करते हैं
यदि मांगने की जिद की तो
बदले में मिलती है
गोलियाँ
पता नहीं आदमी कब तक
आग और पानी पीता जायेगा ?
चंदन सा एक नाम
इन होठॊं पर लिख दो
एक सुहाना सा नाम
मन की ये पीडा
अब सही नहीं जाये
तन की ये तपन
अब सही नहीं जाये
दहकते हुये
बदन पर
लिख दो, चंदन सा एक नाम
सखियों के घेरे
मुझको है छेडे
नाम को तेरे
मेंहदी से जोडे
हां, तन-मन पर लिख दो मेरे
शीतल सा एक
नाम
इन होठॊं पर लिख दो
एक सुहाना सा नाम
अपनों से लगने लगे
हो
देखा है हमने तुम्हें
सपनों की गाँव में
पीपल की ठंडी छांव में
तभी से न जाने क्यों तुम
अपनों से लगने लगे हो
सपने सजीले अब सजने लगे हैं
बदल-बदलकर
नित रूप नए
मन को मेरे गुदगुदाने लगे हैं
तभी से न जाने क्यों मुझे
सपने अच्छे से लगने लगे हैं
अल्हड यौवन कुछ खोया-खोया सा है
और चंचलता गहरी चुप्पी साधे है
क्यों कर यह एक नया परिवर्तन है
तभी से न जाने क्यों मेरा मन
गीत
तुम्हारे गुनगुनाने लगा हैं
बाग की हर डाली -डाली
झूल गई यौवन के भार से
मिलकर इनसे पवन झकोंरा
एक नयी फ़ुवांर बाँट रहा
तभी से न जाने क्यों मेरा
आँगन महक- महक गया
है
लो आ गए दिन मनुहार
के
सपनों के बुनने के
फ़ूलों को चुनने के
गीत गुनगुनाने के
सलोने दिन आ गये
लो आ गए दिन मनुहार के
कलियों के मेले में
फ़िर भी अकेले में
वासंती गीत गाने के
सतरंगी दिन आ गए
लो आ गए दिन बहार के
फ़ागुनी हि्डॊलों में
झूलने को जी चाहे
बांध मलयज पावों मे
उडने को जी चाहे
लो आ गए दिन प्यार के
रूप के सिंगार के
हास के परिहास के
रूठने मनाने के
चमत्कारी दिन आ गए
लो आ गये दिन रुपहले संसार के
वाद
भारतीय यात्री की प्रतिक्षा में
एक यान ,अडा खडा था
किसे भेजे,किसे न भेजे
इसी उआपोह में मामला
ठंडे बस्ते मे पडा था
एक नेता ने सोचा
काश अगर वह-
अंतरिक्ष में जा पाता
तो चाँद सितारों का वैभव
नजदीक से देख पाता
उसने अधीर होकर
अपने पी.ए को बुलाया
और अपना दुखडा रो सुनाया
"तुम्हीं बताओ मित्र
जो भी इस अंतरिक्ष में जायेगा
वह भला वहाँ क्या कर पायेगा
जैसा जायेगा वैसा ही वापिस लौट आयेगा
काश अगर मैं जा पाता
तो चाँद सितारों की हसीन वादियों में
कुछ वाद बो आता
वॆसे तो हमने इस धरती पर
भाषावाद- जातिवाद-प्रांतवाद-अवसरवाद-फ़ूटवाद
और न जाने कितने ही वादों को
सफ़लतापूर्वक पनपाया है
फिर मुझे चाँद-सितारों से क्या लेना-देना
वे आज भी तुम्हारे हैं ,कल भी तुम्हारे रहेगें
बस मात्र एक दिली इच्छा थी कि
मैं चाँद सितारों की बंजर भूमि में
कुछ नए वाद बो आता
जीवन के शुन्य
जीवन के ये शुन्य-
क्या कभी भर पायेगें
रिसते घावों के जख्म-
क्या कभी भर पायेगें
ये आँसू कुछ ऎसे आँसू हैं
जो निस दिन बहते ही जायेगें
दर्दॊं से मेरा कुछ-
रिश्ता ही ऎसा है
ये बहते और बहते ही जायेगे
जीवन
के ये शुन्य
क्या कभी भर पायेगें ?
रिसते घावों के जख्म
क्या कभी भर पायेगें ?
आशाएं केवल-
स्वपन जगाती हैं
पलकों की सीपियों से जो
वक्त-बेवक्त
लुढक जाया करती है
सपनों के राजमहल
खण्डहर ही होते हैं
पल भर में बन जाया करते हैं
और पलभर में ढह जाया करते हैं
आशाएं
क्या कभी
सभी पूरी हो पाती हैं ?
सपने सजीले सभी
क्या कभी सच हो पाते हैं ?
विश्वास
सोने का मृग है
आगे-पीछे,पीछे-आगे
दौडाय़ा करता है
जीवन भर भटकाया करता है
अशोक की छाया तो होती है
फिर भी
शोकाकुल कर जाता है
जीवन का यह विश्वास
क्या कभी जी पाता है ?
जीवन के शुन्य
क्या कभी भर पाते हैं ?
धन-माया
सब मरीचिकाएं हैं
प्यास दर प्यास
बढाया करती हैं
रात तो रात
दिन में भी
स्वपन दिखा जाती हैं
न राम ही मिल पाते हैं
न माया ही मिल पाती है
धन-दौलत-वैभव
क्या सभी को रास आते हैं?
जीवन के ये शुन्य
क्या कभी भर पाते हैं ?
फ़ूल खिलेगें
गुलशन-गुलशन
क्या कभी फ़ल लग पायेगें ?
जीवन केवल ऊसर भूमि है
शूल ही लग पायेगें
पावों के तलुओं को केवल
हँसते जख्म ही मिल पायेगें
शूल कभी क्या
फ़ूल बन खिल पायेगें ?
जीवन की उजाड बस्ती में
क्या कभी वसंत बौरा पायेगा ?
जीवन एक लालसा है
वरना कब का मर जाता
जीवन जीने वाला
मर-मर कर आखिर जीने वाला
मर ही जाता है
पर,
औरों के खातिर जीनेवाला
न जाने कितने जीवन जी जाता है
और अपना आलोक अखिल
कितने ही शुन्यों में भर जाता है
वरना ये शून्य,
शून्य ही रह जाते
ये रीते थे,रीते ही रह जाते
जीवन के ये शून्य
कभी-कभी ही भर पाते है
पावों के हंसते जख्म कभी-कभी
ही भर पाते हैं
आम्रमंजरी की हाला
*आम्र मंजरी की
पीकर हाला
कोकिला तुझको ये कण्ठ मिला है
फ़ुदक-फ़ुदक कर इस डाली से उस डाली
तूने सम्मोहन का जाल बुना
है
अलसाई शरमायी कलियों ने
अब अपना घुंघट खोला है
मंदहास मादक चितवनयन से
अलियों को आमंत्रण भेजा है
यौवन की गगरी लादे कलियाँ
झीनी डाली पर डोल रही है
पवन झकोरों के हिंडॊलों पर
अपने उन्मादों को तौल रही हैं
आदमी
तमाम जिन्दगी चलता रहा आदमी
अपनी ही लाश ढोता रहा आदमी
शहर फ़ुलों का ढूंढता रहा आदमी
बेतरतीब ख्वाबॊं को सजाता रहा आदमी
होंठॊं पर नकली मुस्कान ओढता रहा आदमी
देखने मे कितना खुश नजर आता है आदमी
पर लिहाफ़ मे
घुसकर रोता रहा आदमी
दुनियां की तमाम खुशियाँ पाने को आदमी
आदमियों का काम तमाम करता रहा आदमी
धन - दौलत शोहरत पाने को आदमी
आदमियों के शहर जलाता रहा आदमी
बदहवास यहाँ-वहाँ भागता रहा आदमी
इन्सानियत की दौड में हारता रहा आदमी
अपने ही प्यादों से मात खाता रहा आदमी
सच जानिये कितना बदनसीब है आदमी
तमाम जिन्दगी चलता रहा आदमी
अपनी ही लाश ढोता रहा आदमी
शहर फ़ुलॊं के ढूंढ्ता राहा आदमी
और कांटॊं की नोक चलता रहा आदमी
हे दीपमालिके
हे दीपमालिके-
जगमग कर दे
गहन अगम अंधकार पथ को
आलोकित कर दे
हे दीपमालिके
जगमग कर दे
रोज नया सूरज ऊगे
फिर भी पावन धरती
किरणों को तरसे
शोषित-पीढित जन
नव -प्रकाश को तरसे
हे दीपमालिके
अंधियारी कुटियों को
आलोकित कर दे
तिल-तिल कर गला सूरज
पश्चिम के भाल से
कालिख सी मल गया
उषा के गाल पर
तल-अतल -वितल
जड- चेतन में तू
किरणों का सागर भर दे
हे दीपमालिके
जगमग जग कर दे
सतरंगी प्रकाश
किरणें
सतरंगी प्रकाश किरणों का
नव वितान सा छाया
सूरज चांद सितारों का वैभव
पृथ्वी ने फ़िर पाया
सचमुच सकुचित स्वर्ग बेचारा
इस पावन धरती से हारा
दिया भेंट मे उसने जग को
अनगिनत दिपॊं का उजयारा
आलोक मेरा नाम है
दिन भर का थका हारा सूरज
रात भर सुसताता रहा
और बुनता रहा किरणॊं का जाल
मैं मृत्तिका के दीप सा
जलता रहा रात भर
पथ आलोकित करता रहा रात भर
तो, जल जाना ही मेरा काम है
आलोक मेरा नाम है
आलोक मेरा नाम है
खोया बचपन
सुबह से
राशन की लाइन में खडा बालक
जब शाम को घर पहुंचा
तो उसकी माँ ने
उसे पहिचानने से इंकार कर दिया
क्योंकि
जब वह सुबह घर से चला था
तो बच्चा था
दोपहर में वह जवान हुआ
और सांझ ढले
जब वह लौटा तो
बूढा हो चुका था.
*सडकों पर परिरंभन हो
चौराहॊं पर हो चीर हरण
शैशव के तेरे ये दिन है
तो भरी जवानी में क्या होगा ?
मन तू उदास क्यों ?
धरती का अंधकार कांप जाता है
नव-प्रभात की नन्हीं किरणों से
दिल और दिमाक रौशन हो जाते हैं
जब ग्यान फ़ूट पडता है
हे मन! फ़िर तू उदास क्यों ?
उठ सूरज सा जाग
मन के सोये तंतु
खुद-ब-खुद जाग जायेगें
मंजिल खुद् चलकर
कदमॊं से लिपट जायेगी
अगस्त्य बन कर तो देख
विंध्याचल खुद सर झुकायेगा
यह कलयुग है
सतजुग तो नहीं
थोडा सा श्रम तो
तू कर
घर-घर गंगा बह सकती है
हे मेरे मन ! फिर तू उदास क्यों ?
सदियों से बंद पडे हैं वेद पुराण के पन्ने बरसों से तरस रहे साकार होने को गांधी के सपने
सुंदर सा एक गांव बसाकर
उन सपनों की बगिया तू महका
खुशियों का सोना उगल
तू रोज सुबह देखेगा
हे मेरे मन ! फिर तू उदास क्यों ?
वादा- नये
वाद लाने का
हमने गांधी के
स्वर्णीम सपनों को
उनकी रामराज्य की
विशाल कल्पनाओं को
बंदकर रखा है
एक कब्र के मानिंद
राजघाट में
और नित नये मुखौटे आकर
फ़ूलॊं की बलि चढा जाते हैं
और दो मिनट का मौन रखकर
तनिक गर्दन झुका कर
मन ही मन कह जाते हैं
बापु....हम शर्मिंदा हैं
तेरे उपदेशॊं का
अमृततुल्य वचनों से
इतनी ज्यादा बढ गई है गरिष्ठता कि
सांस लेना भी दूभर हो गया
चलकर आना तो बडी बात थी
तनकर हो गै है तुंबे सी तोंद
खैर....
आज हम पुनः कसम खाते हैं
कि तेरे सपनों को हम
हवा में यूंहि तैरने नहीं देगें
वैसे तो
हमने पूरे देश मे
पीट दिया है डिंडोरा
कि हमने, एक नहीं
अनेकों वादों को
इस भूमि मे पनपाया है
जैसे प्रजावाद-देशवाद
जातिवाद,जनवाद-प्रांतवाद
अवसरवाद-फ़ूटवाद
हम वादा करते हैं आपसे
और भी नए-नए वाद लाने की
बचे
हुये समय में
------- -----------------------------------
आग पानी
बचे हुए समय मे मैं बचे हुए समय मे मैं
बचाकर रखना चाहता हूँ बचा कर रखना चाहता हूँ
थोडी सी आग थोडा सा पानी
ताकि कर सकूं हवन बल्कि एक समूची नदी
मन की अतल गहराई तक ताकि धो सकूं
-जमा कचरा-कूडा मैली कथडी और
और भी उन तमाम चीजों को बुझा सकूं प्यास
जो फ़ैलाती हैं विद्वेष-घृणा और नफ़रत उन तमाम
और निखर सकूं आकंठ प्यासे कंठों की
दमक सकूं तपकर जो प्यासे थे
कुंदन सा
पिछली कई
सदियों से
हवा समय
बचे हुए समय में बचे हुए समय में से
मैं बचाकर रखना चाहता हूँ मैं चुराना चाहता हूँ
थोडी सी हवा थोडा सा समय
ताकि लोग बचा सके ताकि संवार सकूँ
अपने आप को घुटन से जीवन उन सबका
और ले सकें- जो समय की दौड से -
थोडी सी राहत भरी सांस कर दिए गये थे बाहर
जो सदियों पहले और छोड दिए गए थे -
दबा दिये गये थे तपते रेगिस्थान में
भारी चट्टान के नीचे तिल-तिल कर मरते रहने और तिल-तिल जलते रहने के लिये
अधरों पर लिख दो
इन अधरों पर लिख दो
चंदन सा एक नाम
सपनो ने नैनों को नीर ही दिया है
चंदा ने चकोरी कॊ पीर ही दिया है
वेदना है मीरा तो मरहम है श्याम
देखेगीं अलसाई रत- जगी अंखियाँ
भुनसारे पूछेगी सखियाँ
पूछेगी हरदम साजन का नाम
श्वासों की जोगन का रक्स रुकेगा
अम्बर का धरती पर शीश झुकेगा
राधा है प्यासी - रुठा है श्याम
प्यार का पौधा
साथ रहना
तुम्हें गवांरा नहीं
और चाहती हो
बचा रहे प्रेम
बस
एक ही उपाय है कि
तुम बन जाओ धरती
और मैं बन जाऊँ आकाश
बाहें हमारी आपस में जुडी रहेगीं
और बना रहेगा अंतर भी
शायद इस तरह
जीवित बचा रह सकेगा
प्यार का पौधा
एक लडकी
एक लडकी
बडे भुनसारे जाग जाती है
जागने के साथ ही
चौका-बासन, झाडू-पोंछा कर नहाती है
और बेलती है रोटियाँ
और निपटाती जाती है वे सारे काम
जो विमाता द्वारा बतलाये जाते हैं
उसे देना पडता है दो-चार कप प्याली चाय
तब जाकर वह छोड पाती है बिस्तर
दिन के ग्यारह बजते-बजते
किताबों के गठ्ठर का बोझ
और दिल और दिमाक मे तनावों को लादे
स्कूल के लिये निकल पडती है
रास्ते में कुछ टपोरी टाइप के लडके
उसे आता देख
रोक लेते है रास्ता
कुछ शोहदे-
सीटियाँ बजाकर
अपने वहाँ होने का अहसास कराते है
डरी-डरी ,सहमी-सहमी सी वह लडकी
चुपचाप अपनी गर्दन नीचे किये
नापती है स्कूल का रास्ता
स्कूल का माहौल भी
कुछ साफ़-सुथ़रा नहीं होता
कुछ दिल फ़ेंक मास्टर भी
उसके जिस्म में चुभोते हैं
अपनी नजरों के तीर
न जाने कितने ही
चक्रव्यूहॊं मे घिरते-घिराते
और उन्हें कुशलता से तोडते हुये
लौट पडती है अपने घर के लिये
घर की ओरती के नीचे खडी होकर
अपनी अनियंत्रित हो आयी सांसों को
नियंत्रित करने लगती है
और शुक्रिया अदा करती है
आकाश में टंगे देवताओं को
और घुस पडती है
लाक्षागृह में
देर रात तक खटती रहने के लिये
एक नदी
मेरे अंतःस्थल में
बहती है एक नदी
"ताप्ती"
जिसे मैं
महसूसता हूँ अपने भीतर
जिसका शीतल,पवित्र और दिव्यजल बचाये रखता है मेरी
संवेदनशीलता
खोल,कंदराओं,जंगलों और पहाडॊं
के बीच
बहती यह नदी
बुझाती है सब की प्यास
और तारती है भवसागर से
दुष्टॊं को
इसके तटबंधों पर खेलते हैं असंख्य बच्चे
स्त्रियां नहाती हैं
और पुरुष धोता है अपनी
मलीनता
इसके किनारे पनपती हैं सभ्यताएं
और
लोक संस्कृतियाँ लेती हैं आकार
लोकगीतॊं लोक धुनॊं पर
मांदर की थापों पर
टिमकी की टिमिक-टिमिक पर
थिरकता रहता है लोकजीवन
माँ
मैं,
काली घटाओं
को-
बरसने
से रोक सकता हूँ,
चमचमाती
बिजली को-
हथेली
में थाम सकता हूँ,
शोर
मचाते-दहाडते समुद्र
पर-
सरपट
दौड लगा सकता हूँ,
तूफ़ानों
का रुख-
पलभर
में-
मोड
सकता हूँ,
पहाडॊं
को झुका सकता हूँ
मैं
वह सब कर सकता हूँ
लेकिन
ममता
की मूरत-
करुणा
की सागर और दयामयी माँ पर
कोई
कविता/कहानी नहीं
लिख सकता.
उदास नदी पर सात कविताएं
(१)
सूख कर कांटा हो गई नदी,
पता नहीं, किस दुख की मारी है बेचारी ?
न कुछ कहती है,
न कुछ बताती है.
एक वाचाल नदी का -
इस तरह मौन हो जाने का -
भला, क्या अर्थ हो सकता है?
(२)
नदी क्या सूखी
सूख गए झरने
सूखने लगे झाड़-झंखाड़
उजाड़ हो गए पहाड़
बेमौत मरने लगे जलचर
पंछियों ने छॊड़ दिए बसेरे
क्या कोई इस तरह
अपनों को छॊड़ जाता है?.
(३)
उदास नदी
उदासी भरे गीत गाती है
अब कोई नहीं होता संगतकार उसके साथ
घरघूले बनाते बच्चे भी अब
नहीं आते उसके पास
चिलचिलाती धूप में जलती रेत
उसकी उदासी और बढ़ा देती है
(४)
सिर धुनती है नदी अपना
क्यों छॊड़ आयी बाबुल का घर
न आयी होती तो अच्छा था
व्यर्थ ही न बहाना पड़ता उसे
शहरों की तमाम गन्दगी
जली-अधजली लाशें
मरे हुए ढोर-डंगर
(५)(*)
नदी-
उस दिन
और उदास हो गई थी
जिस दिन
एक स्त्री
अपने बच्चों सहित
कूद पड़ी थी उसमें
और चाहकर भी वह उसे
बचा नहीं पायी थी.
(६)
नदी-
इस बात को लेकर भी
बहुत उदास थी कि
उसके भीतर रहने वाली मछली
उसका पानी नहीं पीती
कितनी अजीब बात है
क्या यह अच्छी बात है?
(७)
घर छॊड़कर
फ़िर कभी न लौटने की टीस
कितनी भयानक होती है
कितनी पीड़ा पहुंचाती है
इस पीड़ा को
नदी के अलावा
कौन भला जान पाया है ?
खुश है नदी- सात कविताए
(१)
आकाश में-
उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देख
बहुत खुश है नदी, कि
उसकी बुढ़ाती देह
फ़िर जवान हो उठेगी.
चट्टानों के बीच गठरी सी सिमटी
फ़िर कल-कल के गीत गाती
पहले की तरह बह निकलेगी.
(२)
अकेली नहीं रहना चाहती नदी
खुश है वह यह सोचकर, कि
कजरी गाती युवतियां
सिर पर जवारों के डलिया लिए
उसके तट पर आएंगी
पूजा-अर्चना के साथ, वे
मंगलदीप बारेगीं
उतारेगीं आरती
मचेगी खूब भीड़-भाड़
यही तो वह चाहती भी थी.
(३)
पुरुष धोता है अपनी मलिनता
स्त्रियां धोती है गंदी कथड़ियां
बच्चे उछल-कूद करते हैं -
छपाछप पानी उछालते
गंदा होती है उसकी निर्मल देह
फ़िर भी यह सोचकर
खुश हो लेती है नदी,कि
चांद अपनी चांदनी के साथ
नहाता है रात भर उसमें उतरकर
यही शीतलता पाकर
उसका कलेजा ठंडा हो जाता है.
(४)
“नदिया जरा धीरे बहो”
गीत गाता कवि-
उससे ठहरकर बहने को कहता है
नदी कल-कल कहते हुए
बढ़ जाती है आगे बिना रुके
देते हुए संदेश
बहते रहना ही जीवन है
और रुक जाना मौत.
इसलिए वह अविरल बहती रहती है.
(५)
पसंद नहीं है
नदी को बंधकर रहना
फ़िर भी -
बनाए जा रहे हैं बडे-बड़े बांध
रास्ता रोकने में पारंगत आदमी
खुश हो लेता है अपनी ओछी मानसिकता पर
शायद नहीं जानता वह, नदी का क्रोध
पूरे वेग के साथ तोड़ती हुई अवरोध
बह निकलती है पूरी नदी.
(६)
जल है तो कल है,
जल है तो जीवन है
जल है तो अर्पण है
जल है तो तर्पण है
जल है तो समर्पण है
जल है तो आकर्षण है
जल है तो मंगल है
जल है तो जंगल है
नहीं होगा जब जल
तो जल जाओगे तुम सब
कहती है नदी हमसे
समय है अभी भी
संभल सको तो संभल जाओ.
(७)
जनम-जनम से नाता है
नदी और पेड़ का
सहोदर है दोनों
जब कटता है कोई पेड़
तो रोती है नदी चीख-चीखकर
कोई बहन भला
कटते हुए देख सकती है अपने भाई को
लेकिन मदांध आदमी
चलाता है कुल्हाड़ी निर्ममता से
जब पेड़ नहीं होगे, तो
नदी भी नहीं होगी
जब नदी नहीं होगी
तो जीवन भी नहीं होगा.
एक चिड़िया की आत्मा- दो कविताएँ
एक चिड़िया की आत्मा- अक्सर सवार हो जाती है मेरे ऊपर
और उड़ा ले जाती है आसमान में
जहां सूरज अपनी प्रचण्ड किरणॊं
से
बरसाता रहता है आग
हवा में उड़ते हुए
वह मुझे दिखाती है
श्रीहीन पर्वत श्रेणियां
ठूंठ में तब्दील हो चुके उदास
जंगल
सूखी नदियां-नाले-जलाशय
मेड़ पर बैठा
हड्डियों के ढांचे में तब्दील
हो चुका किसान
जो टकटकी लगाए ताकता रहता है
आसमान की ओर, कि
कोई दयालु बादल का टुकड़ा
हवा में तैरता हुआ आएगा
और बुझा देगा उसकी
जनम-जनम की प्यास.
(२)
एक चिड़िया की आत्मा
अक्सर सवार हो जाती है मेरे ऊपर
और उड़ा ले जाती है मुझे
चिपचिपे-कपसीले बादलों के बीच
फ़िर हवा में तैरती हुई वह
मुझे दिखाती है वह
आलोक यादव का और पीदयाल श्रीवास्तव
का घर
जहां एक कहानी लिख रहा होता है
तो दूसरा लिख रहा होता है
बाल कविताएं
चुपके से फ़िर एक गौरैया,
चित्र के ऊपर आकर बैठ जाती है,
अनमनी-सी
फ़िर, दूर उड़ाती हुई वह
मुझे दिखाती है-
सतपुड़ा के घने जंगल
पहाड़ॊं के तलहटी पर-
अठखेलिया खेलती-
अल्हड़ देनवा-
सरगम बिखेरते झरने-
हल चलाते किसान-
कजरी गातीं औरतें
और, टिमकी की टिमिक-टिम पर
आल्हा गाती मर्दों की टोलियां
न जाने, कितना कुछ दिखाने के
बाद
वह, मुझे छॊड़ जाती है वापस
अपने घर की मुंडेर पर
मैं बैठा रहता हूं देर तक भौंचक
चिड़िया की जगह, चिड़िया की तरह.
भूल गया
लिफ़ाफ़ा-
लिफ़ाफ़ा के भीतर एक और लिफ़ाफ़ा
उस लिफ़ाफ़े के भीतर-
मां का एक पत्र था
और साथ में एक तुड़ा-मुड़ा पांच
का नोट
मां ने लिखा है अपने पत्र में
कि, अपने जनम दिन पर-
ननकू हलवाई की दुकान से
कोई अच्छी सी मिठाई लेकर खा
लेना.
पत्र में ढेरों सारी शुभकामनों
के साथ
आशीषों की झड़ी-सी लगा दी थी
उसने
उसके एक-एक शब्द में पगा हुआ था
मीठापन
पत्र पढ़ते हुए मेरी देह –
गन्ने की तरह मीठी होने लगी थी
मैं उस मीठेपन में, इस कदर खो
गया
कि, ननकू की दूकान तक-
जाना भूल गया.
गौरैया पर नौ कविताएं
1
एक अरसा बीत गया
तुम दिखाई नहीं दीं गौरिया ?
और न ही वह झुंड जो
हरदम आता था साथ तुम्हारे-
दाना-चुग्गा चुनने
कहाँ हो, कहाँ हो गौरैया तुम ?
न जाने कहाँ बिला गईं ?
तुम्हें एक नजर देखने को
कब से तरस रही हैं मेरी आँखें।
2-
अपनी संग-सहेलियों के संग
आँगन में फ़ुदक-फ़ुदक कर चलना
चाँवल की कनकी को चुनना
चोंच भर पानी पीना
फ़िर, फ़ुर्र से उड़ जाना
कितना सुहाना लगता था
न तो तुम आईं
और न ही तुम्हारी कोई सहेली
बिन तुम्हारे
सूना-सूना
सा लगता है आँगन।
3-
कहाँ हो, कहाँ हो तुम गौरिया ?
तुम्हें धरती ने खा लिया, या
आसमान ने लील लिया ?
एक अरसा बीत गया तुम्हें देखे
न जाने क्य
उलटे-सीधे सवाल उठने लगे ह मन में।
4-
तुम तो तुम
वह लंगड़ा कौवा भी अब दिखाई नहीं देता
जो तुम्हें डराता नहीं था, बल्कि
चुपचाप बैठा,
रोटी के टुकड़े बीन-बीन खाता था.
अब सुनाई नहीं देती-
तुम्हारी आवाज और
न ही दिखाई देता है वह लंगड़ा कौवा ही
फ़र्श पर बिखरा चुग्गा
मिट्टी के मर्तबान में भरा पानी
जैसा का वैसा पड़ा रहता है महिनों
शायद, तुम लोगों के इन्तजार में
कब लौटोगे तुम सब लोग ?
5-
तुम्हारे बारे में
सोचते हुए कुछ.....
कांपता है दिल
बोलते हुए लड़खड़ाती है जीभ
कि कहीं तुम्हारा वजूद
सूरज की लपलपाती प्रचण्ड किरणॊं ने-
तो नहीं लील लिया?
शायद ऎसा ही कुछ हुआ होगा
तभी तो तुम दिखाई नहीं देतीं
दूर-दूर तक
और न ही सुनाई देती है
तुम्हारी चूं-चां की आवाज।
6-
कितनी निष्ठुरता से आदमी
काटता है पेड़
पल भर को भी नहीं सोचता, कि
नहीं होंगे जब पेड़, तो
हरियाली भी नहीं बचेगी
हरियाली नहीं होगी तो
बंजर हो जाएगी धरती
बेघर हो जाएंगे पंछी
सूख जाएंगी नदियां
अगर सूख गईं नदियां
तो तुम कहीं के भी नहीं रहोगे
और न ही तुम्हारी पीढ़ियाँ ?
7-
एक चोंच दाना-
एक चोंच पानी और
घर का एक छोटा सा कोना-
यही तो मांगती है गौरैया तुमसे,
इसके अलावा वह और कुछ नहीं मांगती
न ही उसकी और कोई लालसा है
क्या तुम उसे दे पाओगे?
चुटकी भर दाना,
दो बूंद पानी और
घर का एक उपेक्षित कोना ?
8-
मुझे अब भी याद है बचपन के सुहाने दिन
वो खपरैल वाला, मिट्टी का बना मकान
जिसमें हम चार भाई,
रहते थे मां-बाप के सहित
और इसी कच्चे मकान के छप्पर के एक कोने
में
तुमने तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था घोंसला
और दिया था चार बच्चों को जनम
इस तरह, इस कच्चे मकान में रहते थे
हम एक दर्जन प्राणी,
हंसते-खेलते-कूदते-खिलखिलाते-आपस में बतियाते
तुम न जाने कहां से बीन लाती थीं खाने की
सामग्री
और खिलाती थीं अपनों बच्चों को भरपेट.
समय बदलते ही सब कुछ बदल गया
अब कच्चे मकान की जगह
सीमेन्ट-कांक्रिट का तीन मंजिला मकान हो गया है खड़ा
रहते हैं उसमें अब भी चार भाई पहले की तरह
अलग-अलग, अनजान, अजनबी लोगों की तरह-
किसी अजनबी पड़ौसियों की तरह
नहीं होती अब उनके बीच किसी तरह की कोई
बात
सुरक्षित नहीं रहा अब तुम्हारा घोंसला भी
तो
सोचता हूँ, सच भी है कि
मकान भले ही कच्चा था लेकिन मजबूत थी
रिश्तों की डोर
शायद, सीमेन्ट-कांक्रीट के जंगल के ऊगते ही
सभी के दिल भी पत्थर के हो गए हैं ।
9-
बुरा लगता है मुझे-
अखबार में पढ़कर और
समाचार सुनकर
कि कुछ तथाकथित समाज-सेवी
दे रहे होते हैं सीख,
चिड़ियों के लिए पानी की व्यवस्था की जाए
और फ़िर निकल पड़ते हैं बांटने मिट्टी के
पात्र
खूब फ़ोटॊ छपती है इनकी
और अखबार भी उनकी प्रसंशा में गीत गाता है
लोग पढ़ते हैं समाचार और भूल जाते हैं.
काश ! हम कर पाते इनके लिए कोई स्थायी व्यवस्था
तो कोई पशु-पक्षी -
नहीं गंवा पाता अपनी जान।
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१०३. कावेरी नगर,छिदवाड़ा (म.प्र.) 480001 गोवर्धन यादव.
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