समस्त आलेख.
आलेखों की सूची.
--------------------------------------------------------------------------------------
1. आजादी के मतवालों की गाथा. (प्रसंगवश) गवाह है हमारा पुरखा-
सतपुड़ा
2. हिन्दी भाषा और
साहित्य: इस पार - उस पार
3. राष्ट्रभाषा हिंदी
और महात्मा गांधी.
4. विश्व में हिंदी की बढ़ती
लोकप्रियता.
5. हिन्दी भाषा की
विशेषताएं और आकर्षण
6. अंग्रेजी के कारण ही आज हिन्दी की उपेक्षा हो रही है.
7. कब सजेगी हिन्द के
माथे पर हिन्दी की बिंदी ?
8. कहानी पोस्टकार्ड की
9.
गुरुओं की पावन परम्परा को याद करते हुए.
10. चिट्ठियाँ बांटने वाला डाग
(कुत्ता) “ओने”
11. लोक साहित्य में
पर्यावरण चेतना.
12. प्रतीक-कविता में नए अर्थ भरता है.
13. प्रौद्धिगिकी की हमसफ़र है हिन्दी.
14. बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ.
15. भारतीय
परिप्रेक्ष्य में सर्व प्रथम महिलाएँ.
16.
भारतीय महिलाएँ एवं आरण्य संस्कृति
17. मनोभावों को परिमार्जित करने के लिए गीता
18. मंदाकिनी का प्राकृतिक सौंदर्य
19. मित्रों और अमित्रों की पहचान.
20. राजा के कर्तव्य
21. हिन्दी फ़िल्मी गीतों में
बरसता सावन
22. लघुकथा- इतिहास के झरोखे
से
23. लोकगीत- एक मीमांसा.
24. विवाह संस्कार और बन्ना-बन्नी
के गीत
25. संस्कृत काव्य धारा में
प्रकृति की आदिम सुवास.
26. साहित्य का आपद धर्म.
27. हिन्दी साहित्य में
लघुकथा का अस्तित्व तथा महत्व
28. हिन्दी—देश से परदेश तक
29. अष्ठ सिद्धि नवनिधि के
दाता
30. नटखट बाल
हनुमान.
31. अष्टावक्र ने सिखाया शारीरिक सौंदर्य से बडा है ज्ञान
32. बालक ध्रुव का
हठ सभी के लिए आदर्श बन गया.
33. आ गई
महाशिवरात्रि पधारो शंकरजी
34. ,
महाशिव रात्रि
35. ऋषिपंचमी
36 आज के परिप्रेक्ष्य में कितने प्रासंगिक है श्रीराम
37. आत्मनिर्भर
भारत में हिन्दी का योगदान
38. श्रीमद्भवतगीता
तथा अन्य गीताएँ.
39. चिठिया हो तो हर कोई बांचे.
40. दादा कैलाशचन्द्र पंत
41. जनकवि श्री बालकवि बैरागी.
42 ये आकाशवाणी है....
43.आसमान में उडती परियां.
44.आसमान में उडते पक्षी अपनी उडान-गति का स्वयं
निर्धारण करते हैं
------------------------------------------------------------------------------------------
1 आजादी के मतवालों की गाथा. (प्रसंगवश)
गवाह है हमारा पुरखा- सतपुड़ा
(
गोवर्धन यादव.)
समय से संलाप करती बोदरी नदी हो, कुलबेहरा हो या फ़िर कन्हान, महुआ की मादक गंध
और तरंग में, टिमकी की टिमिक-टिम धुन
पर थिरकते आदिवासी जन हों, या चिखलदेव की झिरिया जहाँ स्वयं भोलेनाथ विराजते हों
अथवा तामिया की पहाड़ियों के मध्य विराजे छोटा महादेव की गुफ़ा हो, अथवा पांढुर्णा
के तट को छूकर बहती जाम नदी हो ( जिसके किनारे (पत्थरमार) गोटमार मेले का आयोजन सदियों से होता आ
रहा है ) अथवा एक हजार दो सौ पचास फ़ुट से ज्यादा
वर्गफ़ुट में फ़ैली, पातालकोट की हजारों फ़िट गहरी तलहटी में (जिसे प्रकृति का कुँआ भी कहा जा सकता है) आदिवासियों के बारह गाँव आज भी अपनी आदिम संस्कृति को बचाए हुए जी रहे
हैं, अथवा मोहखेड़ कस्बे के समीप चन्दन वनों से घिरा देवगढ़ का ऐतिहासिक किला हो
(चन्दन वनों का उल्लेख उपन्यास में मिलता है)
जहाँ कभी चन्द्रकांता संतति उपन्यास के बीज पड़े थे या फ़िर यहाँ का मोती टांका, जिसमें अथाह जलराशि समाई हुई है (जो कभी नहीं सूखा). या फ़िर हर्रई की
जागीर हो अथवा सोनपुर की, या फ़िर मोहगांव हवेली स्थित अर्धनारीश्वर का जगप्रसिद्ध
मन्दिर हो, ये सभी इस बात के साक्षी रहे हैं और साक्षी रहा है हमारा पुरखा- सतपुड़ा जो युगों-युगों से अपनी करोड़ों
आँखों से और सूपों सदृष्य कानों से देख-सुन रहा है.और चश्मदीद गवाह है कि आजादी के
मतवालों की टोली यहाँ शुरु से ही संघर्षशील रही है.
इतिहास भी साक्षी है इस बात का कि आजादी की अलख जगाते महात्मा गाँधी जी के चरण
इस माटी पर पड़े थे और मतवालों की टोली उनके पीछे दौड़ पड़ी थी. गाँधी जी के अलावा और
भी स्वनामधन्य महापुरुषों का यहाँ समय-समय पर आगमन होता रहा है.

आजादी की अलख जगाते बापू का छिन्दवाड़ा आगमन....
इतिहास का यह वह स्वर्णिम काल था जब बापू 1920-21
में नागपुर में कांग्रेस का महा-अधिवेशन आयोजित किया गया था,
भाग लेने के लिए पधारे थे. इसी महाअधिवेशन में “असहयोग आन्दोलन का नारा” बुलन्द हुआ था. एक अलख
जगायी जा रही थी. अधिवेशन की समाप्ति के बाद, महात्मा गांधी उन दिनों के प्रसिद्ध
अली बन्धुओं मुहम्मद अली एवं शौकत अली तथा सरोजनी नायडू के साथ छिन्दवाड़ा पधारे
थे. 06 जनवरी 1921 का वह
स्वर्णिम दिन था. नागपुर अधिवेशन की बयार यहाँ भी बह रही थी. पूरा नगर जोश और
जुनून से भरा हुआ था. अपने प्रिय नेताओं को ठहराने का कोई उपयुक्त स्थान उस समय
उपलब्ध नहीं था. पर बापू तो सादगी से भरे अपूर्व मानव थे. उन्होंने सेठ नरसिंह दास
की धर्मशाला में ठहरने की स्वीकृति दे दी थी.
उनके आगमन से उत्साहित महिलाओं ने जिस जोश भरे अन्दाज में आजादी के नारे
बुलन्द किए, उससे बापू बहुत प्रभावित हुए और दोपहर के समय उन्होंने सबसे पहले
महिलाऒं को संबोधित किया. संध्या समय चिटनवीसगंज ( आज का गांधीगंज ) में एक विशाल
सभा आयोजित की गयी. महात्मा जी ने नागपुर अधिवेशन में पारित “असहयोग आन्दोलन प्रस्ताव” की विस्तृत चर्चा की.
उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरोध में, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार
की अपील की. जोश और उमंग से भरे लोगों ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई. बापू के
उस मर्मांत्क भाषण ने लोगों के दिलों को गहराई से प्रभावित किया था. नगर के
प्रभावशाली वकीलों- सर्व श्री साल्पेकर, बी.आर. ढोक, मोरेकर, व्ही.एस.शर्मा, श्री
मनोहर घाटे तथा बृजलाल वर्मा ने अपनी
वकालत छॊड़कर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़ने की घोषणा मंच से ही कर दी थी. साथ ही
अन्य लोगों ने भी अपनी शासकीय नौकरियों को त्याग कर देश प्रेम का अद्भुत उदाहरण
पेश किया था. इस तरह पूरे अंचल-सौंसर, पांढुर्णा, अमरवाड़ा आदि सभी क्षेत्रों में
असहयोग आन्दोलन की तीव्र आँधी बहने लगी थी.
गाँधीजी के इस अंचल से प्रस्थान करने के बाद नगर कांग्रेस कमेटी का गठन किया
गया ताकि आन्दोलन का प्रभावी ढंग से संचालन किया जा सके. किन्तु इन कांग्रेसी
नेताओं सर्वश्री कृष्णा स्वामी नायडू, देवमन वानखेड़े, नेमीचंदजी, जयदेव इगंदे,
गुलाबराव बोरीकर, बालाजी एवं विठ्ठलपुरी (सौंसर), देवराव (सौंसर) आदि को सश्रम
कारावास के दण्डस्वरूप जेलों में बंद कर दिया गया.
अपने प्रथम प्रवास में ही बापू को इस अंचल ने बड़ा प्रभावित किया था. सुदूर
होने तथा आवागमन के सीमित साधन होने के बाद भी बापू ने इस नगर को अपनी चरणधुलि 29 नवम्बर 1933 को पुनः उपलब्ध करायी. उस समय पूरा भारतवर्ष “महात्मा गांधी जिन्दाबाद”,
“भारत माता की जय” के नारों से गूँज रहा था. इस छोटे-से नगर ने अपने प्रिय नेता के
स्वागत-सत्कार में पलक पाँवड़े बिछा दिए. पूरे नगर को तोरण और बन्दनवारों से सजा
दिया गया था. महात्मा गाँधी जी की सुन्दर शोभायात्रा निकाली गयी. छितियाबाई के
बाड़े में विशाल जनसभा आयोजित हुई. नगर की ओर से गांधीजी को मान-पत्र भेंट किया
गया. इस सभा में गाँधीजी ने श्री विश्वनाथ साल्पेकर जी के त्याग और सेवा की
भूरि-भूरि प्रशंसा की. इसके पश्चात गाँधीजी ने हरिजन मुहल्ले का भ्रमण किया तथा
उनकी कठिनाइयों को जाना-समझा.
छिन्दवाड़ा अंचल एवं स्वतंत्रता आन्दोलन.
स्वतंत्रता आन्दोलन की चिनगारी इस अंचल में “ राष्ट्र जागृति आन्दोलन” के नेता
डा.बी.एस.गुंज एवं दादा साहेब खापरे के 11 मई 1906 मे आगमन से ही सुलगने लगी थी. इसे नगर का सौभाग्य ही कहा जा सकता है कि पूज्य
बापू का आगमन जनवरी 1921 एवं पुनरागमन नवम्बर 1933 को हुआ था.. डा.सरोजिनी नायडू 18 अप्रैल 1922 को तथा
पण्डित जवाहरलाल नेहरु का 31
दिसंबर 1936 को छिन्दवाड़ा में आगमन हुआ था. पूरे अंचल
में अंग्रेजी सत्ता के विरोध स्वरूप अनेक आन्दोलन चल रहे थे. सत्याग्रहियों पर
अनेक तरह के जुल्म ढाये जा रहे थे. नागपुर के झण्डा सत्याग्रह में भाग लेने गए
सर्वश्री कृष्णा नायडू, जयदेव उगदे, देवमन वानखेड़े, गुलाबराव बोरीकर, आदि को पकड़कर
जेल में यातनाएं दी गईं. 23 मार्च
1931 को भगतसिंग, सुखदेव तथा राजगुरु को एक दिन पूर्व
जब अचानक फ़ांसी दे दी गयी, तो पूरे अंचल में स्वप्रेरित भूख हड़ताल हुई. छिन्दवाड़ा,
सौंसर,अमरवाड़ा तथा अन्य कस्बों में, न केवल भूख हड़ताल की गयी, वरन सारी व्यापारिक
गतिविधियाँ रुक गईं. इसी प्रकार कांग्रेस के महान नेताओं के आव्हान पर यहाँ के
अंचलवासियों ने रोलेक्ट एक्ट, साईमन कमीशन का विरोध, जंगल सत्याग्रह में सोत्साह
भाग लेकर अपने विरोध को मुखर किया और यातनाएं सहीं. द्वितीय विश्वयुद्ध की सफ़लताओं
ने मित्र देशों को गर्वोन्मत बना दिया था. अतः पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजी शासन का
दमनचक्र तीव्रता से चलने लगा. इन परिस्थितियों में सन 1942
में महात्मा गांधीजी ने “अंग्रेजों भारत छॊड़ो
आन्दोलन” का उद्घोष कर दिया.
इस घोषणा का आम जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा. देखते ही देखते नगरवासियों ने
कार्यक्रम की एक रुपरेखा तैयार करते हुए गहन अन्धकार में कांग्रेसी नेताओं ने
गुप्त बैठक आयोजित की. इस बैठक में मुख्य रूप से हरदा नगर से पधारे, अखिल भारतीय
चरखा संघ के प्रमुख श्री दादाभाई नायक ने संबोधित किया. इसे जन-आन्दोलन का रूप दिए
जाने की विधिवत तैयारियां भी की गयी. विशाल आमसभा को नगर के प्रसिद्ध कांग्रेसी
नेता एवं वकील श्री श्यामचरण सोनी संचालित कर रहे थे. उन्होंने आम नागरिकों से “भारत छॊड़ो आन्दोलन” को भरपूर सहयोग देने की अपील की.
“भारत माता की जय”, “महात्मा गांधी जिन्दाबाद” के नारों की गूंज से समूचा वातायण
कंपित हो उठा. आन्दोलन अपना मूर्त रुप ले पाता, तभी 9 अगस्त 1942 को अंग्रेजी शासन ने सभी कांग्रेस कमेटियों को भंग कर दिया. देखते ही देखते
जगह-जगह छापे मारे जाने लगे और नेताओं की धर-पकड़ शुरु हो गयी. चुंकि श्री
कृष्णास्वामी नायडू अपनी दाढ़ी और कमली के कारण आसानी से पहिचान लिए गए थे.
गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया. इसके पश्चात अन्य कांग्रेसी नेताओं जिनमें
मुख्यरुप से श्री अर्जुनसिंह सिसोदिया, श्री आर.के.हलदुलकर, श्री गोविन्दराम
त्रिवेदी, श्री देवमन वानखेड़े, श्री साल्पेकर आदि नेताओं को रातों-रात गिरफ़्तार कर
लिया गया. श्री चोखेलाल मान्धाता अपने टीन के चोंगे से सड़कों पर “महात्मा गांधी
जिन्दाबाद” के नारे लगाते घूम रहे थे, गिरफ़्तार कर लिया गया.
इन नेताओं की गिरफ़्तारी ने नगरवासियों में काफ़ी उद्वेलित कर दिया था. सभी
अपने-अपने ढंग से प्रदर्शन करने में जुट गए थे. नगर के छात्रों ने भी अपनी एक
योजना बनाई और श्री दत्तात्रेय बागड़देव जी के नेतृत्व में सड़कों पर निकल पड़े.
पूरा नगर इन छात्रों के समर्थन में उतर आया था. नगर के सभी व्यापरियों ने
अपने-अपने प्रतिष्ठान बन्द कर दिए थे. सरकार तुरन्त हरकत में आयी और पुलिस ने
निर्दयतापूर्वक लाठियाँ भांजी. छात्रों को बुरी तरह से पीटा गया. छात्रनेता
बागड़देव को गिरफ़्तार कर अनेक यातनाएं दी गईं. पुलिस के इस दमनकारी बल- प्रयोग के
विरोध में श्री पी.डी.महाजन ने शाम के समय एक आमसभा का आयोजन किया, किन्तु उन्हें
भी गिरफ़्तार कर लिया गया.
इस घटनाक्रम से समूचा शहर रोष में भर गया था. इन युवकों द्वारा रोष प्रदर्शन
करने पर इन्हें अंग्रेजी शासन का कोप भाजन बनना पड़ा. श्री सूरजप्रसाद सिंगारे ने
सभी युवकों को संगठित किया और पुनः आन्दोलन को तीव्र करने की योजना बनायी. इस
योजना की भनक लगते ही सिंगारे जी सहित सभी छात्रों को 10 नवम्बर 1942 को गिरफ़्तार कर जेल के सींकचों में बंद कर दिया गया.
निर्दयी शासन के इस बल प्रयोग एवं नेताओं और युवकों की गिरफ़्तारी से पूरा अंचल
उद्वेलित हो उठा. फ़िर क्या था, नगरवासी अब खुलकर अपना विद्रोही तेवर दिखाने लगे
थे. पूरे शहर में जगह-जगह सत्याग्रह के शामियाने दृष्टिगोचर होने लगे. बैरिस्टर
गुलाबचन्द चौधरी, राजाराम तिवारी, भगवती प्रसाद श्रीवास्तव, मंगली प्रसाद तिवारी
सहित अमरवाड़ा, सौंसर, पांढुर्णा क्षेत्रों में सुदरलाल तिवारी, नीलकण्ठराव झलके,
रायचन्द्र भाई शाह, मानिक राव चवरे आदि के नेतृत्व में, सत्याग्रह में सम्मलित
होकर अपना विरोध प्रदर्शित करने लगे. श्री प्रेमचंद जैन, श्री चुन्नीलाल राय आदि
नेता घर-घर जाकर, आजादी की अलख जगाने लगे. ठाकुर श्री चैनसिंह, सोनपुर जागीरदार,
ठाकुर राजवा शाह, जागीरदार प्रतापगढ़, ठाकुर, महावीर सिंह, जागीरदार हर्राकोट को,
जिन्होंने इस स्वतन्त्रता की लड़ाई में अपने प्राणॊं को न्योछावर कर दिया. क्या
इनकी शहादत को यूंही भुलाया जा सकता है?.
हम उन्हें भी याद करते चलें जिन्होंने हमें आजाद भारत की खुली हवा में साँस
लेने के लिए तन के अपार कष्टों को झेला. श्री बादल भोई-पगारा, श्री स्वामीनन्द
–अमरवाड़ा, श्री अब्दुल रहमान-छिन्दवाड़ा, श्री नाथूलक्षमण गोंसाईं, श्री वामनराव
पटेल-बानोरा, श्री रायचन्द राय शाह, श्री पिलाजी श्रीखण्डॆ, श्री सूरजप्रसाद
मथुरिया, श्री जगमोहनलाल श्रीवास्तव, श्री महादेवराव खाटॊरकर, श्री छोटेलाल चवरे,
श्री तुकाराम थोसरे श्री महादेव धोटे, श्री गोविन्दराम त्रिवेदी, श्री
दुर्गाप्रसाद मिश्रा, श्री हरप्रसाद शर्मा,, श्री शिवकुमार शर्मा, श्री
विश्वम्भरनाथ पाण्डॆ,, श्री रामनिवास व्यास, श्री गुरुप्रसाद श्रीवास्तव, श्री
दयाल मालवीय, श्री प्रह्लाद भावसे, श्री जयराम वर्मा, श्री नेमीचन्द, श्री बलीराम
मिस्त्री, श्री गुलाबराव बोरीकर, श्री देवराव (सौंसर). श्री देवमन वानखेड़े (
सौंसर), श्री माधव प्रसाद गुप्ता, श्री रेखड़े वकील एवं सत्यवती बाई आदि.
श्री रायबहादुर मथुराप्रसाद, श्री गुरुप्रसाद श्रीवास्तव, श्री गोपीनाथ
दीक्षित, श्री देवीदयाल चतुर्वेदी, श्री रामेश्वर दयाल वर्मा, श्री भगवत प्रसाद
शुक्ल, श्री रामप्रसाद राठौर, श्री ब्रजमोहन वर्मा, श्री मारोतीराव ओकटे, श्री
झामसिंग, श्री दीनदयाल वर्मा आदि ने अपनी ओजस्वी लेखनी के माध्यम से इस महायज्ञ
में अपनी भागीदारी का निर्वहन किया था. हिन्दी के आशुकवि श्री रामाधार शुक्ला,
भगवती प्रसाद शुक्ला, मारोतिराव ओकटे, रामनिवास व्यास, मराठी भाषा के मर्मज्ञ
कवि-कथाकार श्री द्वारका ,श्री मनोहर राव घाटे, श्री प्र.श.मांजरेकर आदि ने अपनी
ओजस्वी वाणी तथा लेखनी के माध्यम से जनता को जाग्रत करने का बीड़ा उठाया.
छॊटी बाजार के जिस चौक में पंडितजी ने ओजस्वी भाषण दिया था, आपके आगमन की खुशी
में समूचा शहर एकत्रित हो गया. बड़ी संख्या में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.
महिलाओं के विशाल जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं श्रीमती दुर्गाबाई मांजरेकर.
क्रांतिकारियों के दिलों में जोश भरता और काफ़ी प्रसिद्धि पा चुका गीत “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा....झंडा ऊँचा रहे हमारा” और “ स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है”
नारे के प्रणेता श्री बाल गंगाधर तिलक के उद्घोष से समूचा शहर गूंज उठा था.
महिलाओं का यह जुलूस बुधवारी बाजार होता हुआ छोटी बाजार पहुँचा. इस जुलूस का
नेतृत्व कांग्रेस नेत्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती राधेकुमारी वर्मा कर रही
थीं. श्रीमती विद्यावती मेहता, श्रीमती केकरे, श्रीमती घाटे, श्रीमती रेखड़े,
श्रीमती पार्वती आदि तिरंगा लहराते हुए साथ चल रही थीं.
15 अगस्त 1947 का वह शुभ दिन भी शीघ्र ही आया, जब हमारा देश आजाद हुआ. शायद इंद्र देवता भी
उस दिन बहुत प्रसन्न थे. रिमझिम बारिश से यह पूरा अंचल भींग रहा था. जिस घर में
रेडियो उपलब्ध था, वहाँ लोगों की भीड़ जमा थी. दिल्ली में होने वाले सत्ता परिवर्तन
की पल-प्रतिपल की खबरें प्रसारित हो रही थीं. साँसे रोकर लोग एक-एक शब्द को अपने
जेहन में उतार रहे थे. पूरे नगर को तोरणॊं एवं बन्दनवार से सजाया गया और शाम को हर
घरों में रौशनी की गई थी. अर्ध रात्रि को तिरंगा फ़हराकर अपनी सदियों पुरानी मुराद
पूरी होता देख जनसामान्य भी गद-गद था. यह रात जश्न की रात थी. उस रात शायद ही कोई
सो पाया होगा. नगर के विभिन्न मोहल्लों से “भारत माता की जय”, “महात्मा गाँधी
जिन्दाबाद” के नारे सुनाई पड़ रहे थे. नगरपालिका तथा जिला कचहरी को विद्युत बल्बों
से रोशन किया गया था. लोग आपस में गले मिलते हुए एक-दूसरे को बधाइयां प्रेषित कर
रहे थे. खुशी के मारे सभी के चेहरों पर प्रसन्नता की चमक देखी जा सकती थी.
छोटी बाजार चौक में सर्वाधिक गहमा-गहमी थी. महिलाएं भी बड़ी संख्या में यहाँ पहुँच
चुकी थीं. महिलाओं के इस हुजूम एक जुलूस की शक्ल में बदल गया. इस विशाल जुलूस का
नेतृत्व श्रीमती दुर्गाबाई मांजरेकर जी कर रही थीं. “विजयी विश्व तिरंगा
प्यारा...झण्डा उँचा रहे हमारा” गान को गाते हुए जुलूस आगे बढ़ रहा था. इस जुलूस
में उस समय की कांग्रेसी नेत्रियाँ श्रीमती राधेकुमारी वर्मा, श्रीमती विद्यावती
मेहता, श्रीमती केकरे, श्रीमती घाटे, श्रीमती रेखड़े, श्रीमती पार्वती आदि तिरंगे
को लहराते हुए चल रही थीं और बीच-बीच में ओजस्वी नारों से समूचा वातायन गुंजायमान
हो रहा था. नगर की प्रमुख सड़कों- गोलगंज, बुधवारी बाजार से होता हुआ जुलूस छोटी
बाजार आकर एक सभा के रूप में परिवर्तित हो गया.
इतिहास के इन गौरवशाली पन्नों को पलटते हुए शरीर में रोमांच हो आता है. वहीं
उन तमाम घटनाओं को याद करते हुए, उन गौरवशाली सपूतों के चेहरे, आँखों के सामने
दृष्यमान हो उठते हैं, जिन्होंने बेड़ियों में जकड़ी भारतमाता को बंधनमुक्त कराने के
लिए अपने प्राणॊं तक का उत्सर्ग कर दिया था. कल्पना मात्र से शरीर के रोंगटे खड़े
हो जाते है कि किस तरह इन सपूतों ने शारीरिक और मानसिक आघातों को अपने ऊपर झेला
होगा, लेकिन ऊफ़ तक नहीं की थी. उन तमाम शहीदों की शहादत को याद करते हुए आँखों से
आँसू स्वमेव झरने लगते हैं.
15 अगस्त 1947 की तिथि को हम 74-75 साल पीछे छॊड़ आए है और निकट भविष्य 2022 में हम भारत की आजादी की पचहत्तरवीं साल-गिरह मनाएंगे. अहिंसा के इस
पुजारी का जन्म दिवस 2 अक्टूबर 1869
है. इसी तरह हम
बापू की एक सौ पचासवीं जयन्ती भी मनाएंगे.
प्रश्न यह उठता है कि इन 74-75 सालों में हमने क्या
खोया और क्या पाया, की मीमांसा करनी होगी. चर्चा करनी होगी गांधीजी के उन तमाम
सपनों की, जिन्हें वे अपनी खुली आँखों देखा किया करते थे, कि मेरा भारत कुछ इस तरह
होगा,जो विश्व का सिरमौर बनेगा, क्या हम उनके सपनों में रंग भर पाए हैं या हमने
उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है, गहन अध्ययन किए जाने की मांग करता है. प्रश्न
एक नहीं बल्कि अनेकों उठ खड़े होते हैं कि क्या हम देश से गरीबी को पूरी तरह मुक्त
कर पाएं है? क्या हम शोषित-पीड़ित मानव-जन को, जो आज भी अन्तिम छोर पर खड़ा, आशा भरी
नजरों से दिल्ली की ओर मुँह उठाये टुकुर-टुकर देख रहा है, क्या हम उस तक पहुँच पाए
है? क्या हम उसकी आँखों से झरते आँसूओं को पोंछ पाए है? क्या हम भारत को, भारत की
नदियों को पूरी तरह से साफ़-स्वच्छ रख पाए हैं? क्या हम प्रत्येक गाँव को सड़कों से
जोड़ पाए हैं? गांधीजी कहा करते थे कि भारत गाँवों में बसता है, क्या हमने
कभी पलटकर कभी गाँवों की ओर कदम बढ़ाया हैं? क्या हम छुआ-छूत जैसे घिनौनी प्रथा को
बंद कर पाए है? क्या हम शिक्षण संस्थाओं
में, उन तमाम बलिदानी महापुरुषों की स्मृतियों को अक्षुण्य रख पाए है?. क्या हम
उनकी शूरवीरताओं के किस्सों को आमजन तक पहुँचा पाए हैं? यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो,
आज विश्वविद्यालयों से “भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे...लेकर रहेंगें आजादी जैसे
घिनौने नारे कैसे लग पाते?.
ऐसा नहीं है कि इन सत्तर सालों में कोई विकास हुआ ही नहीं. विकास तो हुआ जरुर
है लेकिन उनका फ़ायदा उस अन्तिम-जन नहीं पहुँच पाया, जिसकी की कभी कल्पना बापू सहित
अन्य महान विभूतियों ने की थी. सत्ता की चाहत और सत्ता के घिनौने खेल आदि काल से
चलते रहे हैं और चलते रहेंगे. सरकारें आती-जाती रही है, लेकिन वर्तमान की सरकार
ने, गांधीजी के सपनों को, उनकी रामराज्य की विशाल कल्पना को धरती पर उतारना चाहा
है, की राह में एक नहीं, बल्कि अनेकों रोढ़े खड़े किए जा रहे है. कई लोगों की अपनी
सोच है कि जो काम हम नहीं कर पाए, ये कैसे कर पाएंगे?. ऐसी सोच को मान्य नहीं किया
जाना चाहिए. अगर मन में दृढ़ इच्छा-शक्ति हो तो क्या नहीं किया जा सकता.?..कुछ करने
के लिए हौसले तो चाहिए ही चाहिए तथा सपनों में रंग भरने का जस्बा भी होना चाहिए.
सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में संकल्प लिया था...”सबका साथ...सबका विश्वास”. इस
संकल्प के चलते काफ़ी कुछ बदलावा आया है, जो अकल्पनीय है.
सत्ता में पुनः वापसी के साथ ही सरकार ने अपने पुराने वाद में एक नया वाद और
जोड़ा है...और वह है “सबका विश्वास”. अतः विश्वास किया जाना चाहिए कि निकट भविष्य
में जो भी कुछ होगा, वह सुखकर ही होगा. भारत शीघ्र ही विश्व-गुरु की प्रतिष्ठा पर
पुनः जा पहुंचेगा. चारों तरफ़ सुख की अविरल वर्षा होगी, सभी निरोगी होंगे.भारत की
गली-कूचे, शहर, नगर, महानगर सभी साफ़-स्वच्छ होगें..नदियाँ भी साफ़-स्वस्छ हो जाएगी
और इस तरह एक नए भारत का उदय होगा. यही सुन्दर-सलोना सपना तो बापू ने देखा था, जो
संभवतःशीघ्र ही सच होने जा रहा है.
शहीद स्मारक छिन्दवाड़ा
छिन्दवाड़ा जिले के इस गौरवपूर्ण इतिहास में एक नाम और जुड़ता है पण्डित
विश्वम्भरनाथ जी का.. जिला मुख्यालय से करीब साठ-सत्तर किमी की दूरी पर एक छोटा-सा
गाँव है उमरेठ. उमरेठ निवासी पं,रामाधार पांण्डॆ के यहां एक बालक ने 23 दिसम्बर 1906 में जन्म लिया, नाम रखा विश्ववम्भरनाथ. शुरु से ही आप मेधावी रहे. शासकीय
उच्चतर माध्यमिक शाला से मैट्रिक पास करने के बाद अड़यार (मद्रास.) एवं शांति
निकेतन में उच्च शिक्षा इतिहास एवं संस्कृति में स्नातकोत्तर होकर शोध कार्य किया. 1920 में सत्याग्रही के रूप में कांग्रेज की सदस्यता ली. 1980
से 1982 तक भारत-चीन सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष रहे. 1952-53 में उत्तरप्रदेश विधान सभा एवं 72-74 में
उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सदस्य, 1982-83 तथा 88 में उत्तरप्रदेश के
राज्यसभा सदस्य. 1983-99 तक उड़िसा के महामहिम राज्यपाल रहे.
आपको पद्मश्री एवं राष्ट्रीय इंदिरा गांधी सम्मान सहित अनेको प्रतिष्ठित पुरस्कार
एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया. सनद रहे कि आपके दादाश्री रघुनाथ जी पाण्डॆ को
अंग्रेजों के खिलाफ़ विद्रोह करने पर 1859 को फ़ांसी की सजा दी
गई थी. आप 1980 से
मृत्युपर्यंत ( 1 जून
1998 ) गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति
नई दिल्ली भी रहे थे.
( पण्डित विश्वम्भरनाथ पाण्डॆ जी)
मेरे कथाकार/कवि मित्र एवं "साहित्य समय" जैसी चर्चित त्रैमासिक
पत्रिका का भोपाल से संपादन कर रहे है, जो दादा विश्वम्भरनाथ पाण्डॆजी के पौत्र
हैं.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
2 हिन्दी भाषा और साहित्य: इस पार - उस पार.
( गोवर्धन यादव.)
भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है. यह अभिव्यक्ति आमजन की अस्मिता से
लेकर राष्ट्र के आगत भविष्य निर्मांण के लिए भी हो सकती है. इसीलिए भाषा का प्रश्न
केवल भाषा तक ही सीमित नहीं होता. हम जो सोचते हैं अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त
करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाती है. हमनें अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई
हिन्दी के माध्यम से जीती है. आमजन की भाषा की राष्ट्रीय गरीमा को प्रतिष्ठित करना
एवं उसे कायम रखना है.
भाषा का निर्माण टकसाल में न होकर सड़क पर होता है, चौपालों में होता है, गाँव
के गलियारों में होता है और उसका शिल्पी देश का आमजन है. भाषा की समृद्धि एवं
संपन्नता जन-जन की भाषा के प्रति सजगता ,सक्रीयता एवं जागरुकता पर निर्भर करती है.
भाषा के विनाश एवं विकास में वही एकमात्र जिम्मेदार है.
भारत के कोने-कोने में बोली जाने एवं समझी जाने वाली हिन्दी ही एकमात्र भाषा
है. सरल, और वैज्ञानिक लिपि में लिखी जाने के कारण हिन्दी भाषा अत्यन्त
सुव्यवस्थित, संपन्न और लोकप्रिय है. भारत के अधिकांश भागों में प्रयोग किए जाने
के कारण हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त है. राष्ट्रभाषा के रुप
में हिन्दी एक प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेशों के लोगों को जोड़ती है, और
राष्ट्रीय एकता का भाव जगाती है. हिन्दी की इसी विशिष्टता के कारण हमारे
संविधान निर्माताओं ने 14 सितम्बर 1949 को
देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को, संघ की राजभाषा के रुप में स्वीकार
किया तथा 26 जनवरी 1950 को संविधान में
इसका प्रावधान किया.
हिन्दी भाषा की एक नहीं,अनेक खूबियां है.
1/- हिन्दी एक सशक्त और सरल भाषा है.(2)
हिन्दी देवनागरी लिपि मे ध्वनि-प्रतीकों( स्वर-व्यंजन) का क्रम वैज्ञानिक है (3) इसमे प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग चिन्ह है(4) इसमे
केवल उच्चारित ध्वनियाँ ही लिखी जाती है.(5)जिस रुप में यह
बोली जाती है, उसी रुप में लिखी भी जाती है.(6) हिन्दी
जर्मनी की तरह अपने ही प्रत्ययों से नवीन शब्दों का निर्माण कर लेती है.(7) हिन्दी में क्रदंन्त क्रियायों को अधिक ग्रहण किया है, क्योंकि ये बहुत
सरल एवं स्पष्ट होती है.(8) हिन्दी की संज्ञा-विभक्तियां
सिर्फ़ पांच-सात ही हैं.(9)हिन्दी के सर्वनाम अपने हैं.(10) हिन्दी में विशेषण के साथ अलग-अलग विभक्ति लगाने की जरुरत नहीं होती. (11) हिन्दी के अपने अव्यय हैं
स्वाधीन भारत की नींव को सुदृढ़ करने के लिए गांधीजी ने जितने काम किए,उनमें
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का काम भी प्रमुख स्थान रखता है,लेकिन गांधीजी की
भाषिक मान्यताओं पर विमर्श करने से पूर्व यह भी जानना आवश्यक है कि क्या गांधीजी
से पूर्व हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की आवाज किन लोगो ने उठाई थी? हाँ, गांधीजी
से पूर्व हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशे की गई थी. प्रख्यात फ़्रांसीसी
विद्वान गार्साद तासी ने सन 1852 के फ़्रांस के
अपने भाषण मे हिन्दुओं-हिन्दुस्थानी को हिन्दुस्थान की लोक या सार्वदेशीय़ भाषा के
रुप में रखा था. अंग्रेजी के प्रसिद्ध कोश “ हिंदुस्थानी जाब्सन” में जिसका
प्रकाशन सन 1886 में लंदन में किया गया था, हिंदुस्थानी को
सभी भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रभाषा माना गया, फ़िर तो गियर्सन जैसे अनेक लोग
हिन्दी के सार्वदेशिक रुप को लेकर आगे आए.
स्वदेशी लोगों में सबसे पहले राजा राममोहन राय ने एक भाषण में संकेत दिया था कि
श्री पेठे, जो मुंबई के कालेज में अध्यापक थे, ने मराठी में “राष्ट्रभाषा” नाम की
पुस्तक सन 1864 में लिखी, जिसमें हिन्दी भारत की आवश्यक
भाषा के रुप में स्वीकार किया. बंगाल के महान धार्मिक नेता केशवचन्द्र ने अपने
“सुलभ समाचार” नामक पत्र में भारत की एकता के लिए हिन्दी अपनाने की पूरी वकालत की
थी. यही नहीं, श्री सेन ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सक्रीय सहयोग भी दिया.
वैदिक धर्म के अनन्य प्रचारक और विद्वान स्वामी दयानन्द सरस्वती ने, जो पहले
संस्कृत में ही प्रचार करते थे, 48 वर्ष की अवस्था में
उन्हीं “सेन” के कहने से हिन्दी सीखी और उसी में सारा कार्य करने लगे. गुजराती के
लल्लुजी”लाल” ने हिन्दी के प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ “ प्रेमसागर” की रचना की. 1870 के आसपास मराठी विद्वान हरिगोपाल पाण्डे ने “ भाषा तत्व-दीपिका “संज्ञक”
हिन्दी व्याकरण लिखा. प्रख्यात बंगला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी ने बंगाल के
प्रसिद्ध साहित्यिक-पत्र “बंग.दर्शन” में 1817 में एक आलेख
लिखा, जिसमें राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में अपने विचार दृढ़ता से व्यक्त किए.
बंगाली शिक्षाविद भूदेव मुखर्जी ने प्रशासन से टक्कर लेकर बिहार की कचहरियों में नागरी तथा कैथि
लिपियों को प्रवेश दिलाया और “ “आचार-प्रबन्ध” नामक अपनी पुस्तक में हिन्दी के सभी
भारतीय भाषाऒं की एकता का साधन-सूत्र बतलाया.
सन 1900 तक आते-आते अनेक बंगाली,
मराठी, गुजराती, हिन्दी समर्थकों और प्रचारकों की भीड़ खड़ी हो गई,जिसमे
योगेन्द्रनाथ बसु अमृतलाल चक्रवर्ती
,सदाशिवराव, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, सेठ गोविन्ददास आदि प्रमुख हैं. इस प्रयासों
से बल पाकर जब राष्ट्रनायक जैसे “महिमंड” व्यक्तित्व के धनी गांधीजी ने हिन्दी
भाषा के प्रश्न को राजनैतिक दृष्टि से सामने रखा और उन्हीं के प्रयासों से जब इसे
संविधान में “राष्ट्रभाषा” का पद मिला तो यह मान लिया गया कि वे इस क्षेत्र के
अपूर्व नेता है.
भारतीय भाषा समस्या के विषय पर गांधीजी के विचार बड़े निर्मल, वस्तुनिष्ठ और
पूरी तरह व्यवहारिक हैं. वैसे भी उनके विचार प्रांजल और पारदर्शी होते हैं. जिस
स्त्रोतों से उनके भाषा विषयक विचार उपलब्ध होते हैं, उनमें उनके लेखों का प्रमुख
स्थान है, जो यंग इण्डिया, हरिजन-सेवक, हरिजन बन्धु आदि मे प्रकाशित हैं. इसके
अतिरिक्त कुछ ऎसी सामग्री “इण्डियन होमरुल” जैसे पुस्तकों और तत्कालीन विभिन्न
व्यक्तियों को लिखे गए उनके पत्रों से मिली है. गांधीजी ने भाषा विषय में
सबसे पहले अपने विचार 1909 में अपनी पुस्तक “हिन्द-स्वराज” और होमरुल”के 18 वें परिच्छेद में यों व्यक्त किए हैं “ हर एक पढ़े-लिखे
हिन्दुस्थानी को अपनी भाषा का, हिन्दु को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी
को पर्शियन का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए. कुछ हिन्दुओं को अरबी और कुछ
मुसलमानों को हिन्दी का और कुछ पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिए. उत्तर और पश्चिम
में रहने वले हिन्दुस्तानी को तमिल सीखनी चाहिए. सारे हिन्दुस्थान के लिए तो
हिन्दी होनी ही चाहिए. उसे उर्दू या नागरी लिपियां जानना जरुरी है. ऎसा होने पर हम
अपने आपस में व्यवहार से अंग्रेजी को बाहर कर सकेंगे.”
गांधीजी की इन भाषिक मान्यताओं के पीछे लोक-संग्रहक संतुलन का भाव प्रमुख है.
लोकभाव को अक्षत और अक्षुण्य रखते हुए उसके लिए वे कारगर तरीका अपनाने की बात कहते
हैं, वह यह कि भारत की प्रत्येक जाति का निवासी पहले तो अपने को ठीक से
समझे, अपने जातीय संस्कार की भाषा को समझे, फ़िर दूसरे की भाषा का ज्ञान भी रखे,
फ़िर सामाजिक या राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए
हिन्दी से भी अवगत हों.
भंडोंच स्थित “गुजरात शिक्षा परिषद” में सभापति –पद से व्याख्यान देते हुए
उन्होंने “राष्ट्रभाषा की अवधारणा” पर विस्तार से प्रकाश डाला.” अगर
गहरे पैठकर हम सोचें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अंग्रेजी राजभाषा नहीं बन सकती और न
ही उसे बनाना चाहिए. इसे ठीक से समझने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि किसी भाषा
में राष्ट्रभाषा बनने के लिए क्या-क्या बातें आवश्यक है, ऎसी पांच बातें हैं जो
राष्ट्रभाषा के लिए आवश्यक है.
1/- सरकारी अधिकारियों के लिए उसका सीखना आसान होना चाहिए.
2/-वह भारत के धार्मिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक विचार-विनिमय का
माध्यम बनने के योग्य होनी चाहिए.
3/-वह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जानी चाहिए.
4/-समूचे देश के लोगों के लिए उसका सीखना सरल होना चाहिए.
5/-इस भाषा का चुनाव करते समय अस्थायी भाव अथवा क्षणिक हितों का
ख्याल नहीं रखा जाना चाहिए.
उन्होंने इन गुणॊं की दृष्टि से अंग्रेजी को शून्य बताया और हिन्दी को
परिपूर्ण माना. इसीलिए हिन्दी राष्ट्रभाषा के पद पर योग्य ठहरती है. आजीवन वे इस
बात को को लिखते और भाषण देते रहे. यह उन्हीं का कृतित्व प्रसाद है कि सन 1949 में कंस्टीट्यूएंट असेम्बली ने हिन्दी को राजभाषा की पदवी
दी.गई.
गांधीजी के अलावा हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने के समर्थक, देश के
मूर्धन्य विद्वानों एवं नेताओं में पुरुषोत्तमदास टंडन, सेठ गोविन्ददास,
डा.राजेन्द्रप्रसाद, वीर सावरकर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी,
बंकिमचन्द्र चटर्जी, विनोबा भावे, डा. सुनीतिकुमार आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं.
भारतीय नेताओं ने जब आंदोलन के लिए हिन्दी को अपनाया और उसका समर्थन किया
क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि हिन्दी ही वह भाषा है जिसके बोलने वालों की संख्या
सबसे अधिक है और उसे भारत के अधिकांश जनता समझ सकती है.
राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी का समर्थन हिन्दीतर प्रदेशों के जननायकों,
समाजसुधारकों तथा विद्वानों द्वारा किया गया, बंगाल के राजा राममोहन राय,
केशवचन्द्र, बंकिमचन्द्र, शारदाशरण मित्र, गुजरात के स्वामी दयानन्द सरस्वती,
महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक आदि ने जनभाषा के रुप में हिन्दी का समर्थन किया.
उन्नीसवीं सदी के अंत तक हिन्दी का पक्ष सबल बन चुका था. उत्तरभारत के विद्वानों,
साहित्यकारों, और नेताओं ने भी हिन्दी का दृढ़ता से समर्थन किया. भारतेन्दु
हरिश्चन्द्र के समय से हिन्दी में साहित्य निर्माण का कार्य तो होने लगा किंतु
उसके सम्यक प्रचार में कई बाधाएं थीं.
महात्मा गांधी की प्रेरणा से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सन 1918 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास की स्थापना हुई.
गांधीजी की इस संकल्पना के लग्भग ग्यारह वर्ष पूर्व ही मद्रास( अब चैन्नई) में एक
तमिलभाषी मनीषी ने हिन्दी प्रचार की नींव
डाली. यह मनीषी कोई और नहीं, तमिल के सुविख्यात महाकवि सुब्रह्मण्य भारतीजी थे.
सर्वप्रथम भारतीजी ने अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिका” इंडिया” के 15 दिसंबर 1906 के अंक में तमिलभाषियों से हिन्दी
सीखने की अपील की थी. महाकवि ने न केवल समूचे तमिलनाडुवासियों के प्रतिनिधि के रुप
में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी थी बल्कि राष्ट्रीय एकता के भविष्यदृष्टा के
रुप में भी उन्होंने हिन्दी का पुरजोर समर्थन किया था. भारतीजी के ही नेतृत्व में 1908 में सर्वप्रथम चैन्नई के तिरुवेल्लीकेणि( ट्रिप्लिकेन) में हिन्दी वर्गों
के संचालन का श्रीगणेश हुआ था. इस घटना के दस वर्ष के बाद गांधीजी की संकल्पनाओं
के अनुरुप दाक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की नींव पड़ी. इस कार्य हेतु गांधीजी ने
आपने सुपुत्र देवदास गांधी को चैन्नई भेजा था.
गांधीजी के प्रेरणा से हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना दिनांक 4 जुलाई 1936 को वर्धा में महात्मा गांधी
के निवास स्थान पर इस समिति की पहली साधारण बैठक हुई, इसमें कुल 21 सदस्य थे. इस बैटक में जिन पदाधिकरियों का चुनाव हुआ उसमें डा.
राजेन्द्रप्रसादजी को अध्यक्ष, सेठ जमनालाल बजाज को उपाध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष,
श्री मोटूरी सत्यनारायण को मंत्री, श्रीमन्नारायणजी अग्रवाल को
संयुक्तमंत्री,बनाया गया. हिन्दी प्रचार
समिति का कार्य गांधीजी की देखरेख में चले, इसीलिए उसका मुख्य कार्यालय वर्धा में
रखा गया.
हिन्दी प्रचार समिति राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रही
थी. अतः हिन्दी की जगह “राष्ट्रभाषा” शब्द लेने का प्रस्ताव पारित हुआ.
राष्ट्रभाषा प्रचार सामिति की दो बैठकें 12.04.1942 तथा 21.06.1942 कॊ हुई. इन दोनों बैठकों के महात्मा गांधी,
डा.राजेन्द्रप्रसाद, काका काहब कालेलकर, तथा श्रीमन्ननारायण उपस्थित थे. दिनांक 12.07.1942 को सेवाग्राम में
गांधीजी की कुटी मे नवगठित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की पहली बैठक हुई. राजर्षि
पुरुषोत्तमदास टण्डन ने अध्यक्ष का आसन ग्रहण किया. समिति के इस बैठक में मंत्री
पद के लिए भदन्त आनन्द कौसल्यायन को और सहायक मंत्री के लिए श्री रामेश्वरदयाल
दुबे को चुना गया.
सन 1956 में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल बनी.
राजधानी बनने के साथ ही मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल ने अपना कार्य
शुरु किया. इससे पूर्व इन्दौर-मऊ मे यह समिति कार्यरत थी. वर्तमान में हिन्दी भवन
भोपाल में माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंत जी मंत्री-संचालक के रुप में कार्यरत हैं,
किंतु भारत के 2% अंग्रेजीपरस्त वर्तमान शासक इन सबको
दरकिनार कर अंग्रेजी भाषा का 98% जनता पर अंग्रेजी थोपने का
प्रयास करते रहे हैं. इस प्रकार देश पर विदेशी भाषा थोपने वाले अंग्रेजी -परस्त
नेताओं का निर्णय कितना खोखला था. यह इस बात से प्रमाणित हो जाता है कि
राष्ट्रभाषा हिन्दी को पीछे ढकेलने वाली शाजिशों के बावजूद हिन्दी भारत में ही
नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय हो रही है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि
भारत के लगभग 170 स्वयंसेवी संगठन हिन्दी के प्रचार-प्रसार
एवं संवर्धन निष्ठा के साथ एवं अधिक सुनियोजित ढंग से कर रहे हैं. जहाँ तक
विश्वभाषा के रुप में हिन्दी की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा का प्रश्न है, शंकरदयाल
सिंह के निम्नाकिंत शब्द इसे भली भांति स्पष्ट करते हैं-“ जिस भाषा की पढाई विश्व
के 136 विश्वविद्दालयों में हो रही हो, 50 से अधिक देश जिस भाषा का प्रयोग किसी न किसी रुप में कर रहे हों तथा
जिसके बोलनेवालों की संख्यां 70 करोड के लगभग पहुँच चुकी हो,
वह भाषा अन्तर्राष्ट्रीय न कही जायेगी तो क्या कहा जाएगा”.
इस संबंध में वास्तविकता यह है कि गुट निर्पेक्ष राष्ट्रों के मुखिया भारत,
संसार की उभरती अर्थशक्ति भारत,परमाणुशक्ति
संपन्न राष्ट्रभारत, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में पथ-प्रदर्शक भारत, एवं
संसार के सबसे बड़े बाजारों में एक भारत से निकटता बढ़ाने के लिए विश्व का हर देश
ललायित है. यही कारण है कि विश्व के अनेक देश अपने यहाँ हिन्दी शिक्षण की
उच्चस्तरीय व्यवस्था कर रहे हैं. इस देशों में अमरीका, रुस, इंगलैण्ड, फ़्रांस,
चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे विश्व के प्रभावशाली देश भी शामिल हैं. इतना
ही नहीं प्रवासी भारतीयों ने अपनी संस्कृति के रक्षा के लिए हिन्दी के
अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था विश्व में बड़े व्यापक स्तर पर की है. वे हिन्दी की
सुरक्षा, प्रतिष्ठा एवं प्रचार के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.
संसार
में कुल मिलाकर लगभग 2800 भाषाएं हैं. इनमे 13 ऎसी भाषाएं हैं,जिनके बोलने वालों की संख्यां 8
करोड से अधिक है. ताजा अंकडॊं के अनुसार संसार की भाषाओं में, हिन्दी भाषा को
द्वितीय स्थान प्राप्त है. भारत के बाहर वर्मा, श्रीलंका, फ़ीजी, मलाया, दक्षिण और
पूर्वी अफ़्रीका में भी हिन्दी बोलने वालों की संख्या ज्यादा है. एशिया महादेश की
भाषाओं में हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है, जो अपने देश के बाहर भी बोली और लिखी जाती
है,क्योंकि यह एक जीवित और सशक्त भाषा है.
ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में हिन्दी जानने वालों की संख्या सौ करोड़ है.
भारत के बाहर पाकिस्थान, इजराइल, ओमान, इक्वाडोर, फ़िजी, इराक, बांगलादेश, ग्रीस, ग्वालेमाटा,म्यांमार,
यमन, त्रिनीदाद, सउदी अरब, पेरु, रुस, कतर,, मारीशस, सूरीनाम, गुयाना, इंग्लैण्ड
आदि में बोली जाती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को राष्ट्रसंघ की आधिकारिक
भाषा की मान्यता मिलने जा रही है. वर्तमान में अंग्रेजी, फ़्रेंच, चीनी, रुसी एवं स्पेनिस
भाषाओं को राष्ट्रसंघ की मान्यता प्राप्त है.
संसार में हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है,जिसे विदेशियों ने सर्वप्रथम विश्वपटल
पर रखा. हिन्दी के शोधार्थी डा.जुइजिपियोतैस्सी तोरी ने फ़्लोरेंस विश्वविद्धयालय
इटली में रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन 1911 में शुभारंभ किया. भारत की संस्कृति ने उन पर इतना असर डाला कि स्वदेश
“इटली” छोडकर जीवनपर्यंत बीकानेर में रहे.
साम्यवादी देशों में तुलसीकृत रामचरित मानस की लोकप्रियता देख, स्टालिन ने द्वितीय
विश्वयुद्ध के समय अकादमीशियन अलकसई वरान्निकोव द्वारा रुसी भाषा में पद्दानुवाद
कराया, जिसमें साढ़े दस वर्ष लगे. तुलसीभक्त वेल्जियम में जन्में फ़ादर रेवरेण्ड
कामिल बुल्के जिन्होंने हिन्दी के कारण भारत की नागरिकता ली. तुलसी की काव्यकृति
हनुमानचालीसा का रोमानियन भाषा में, बुकारेस्ट में प्रो. जार्ज अंका ने डा. यतीन्द्र
तिवारी के सहयोग से अनुवाद किया.
अमेरिका के कई विश्वविद्दालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है. यथा-
पेनस्टेटयेल, लायोला, शिकागो, वाशिंगटन, ड्यूक, आयोवा, ओरेगान, मिशिगन, कोलंबिया,
हवाई इलिनाय, अलवामा, युनिवर्सिटी आफ़ बर्जिनिया, युनि.आफ़ मीनेसोटा, फ़्लोरिडा, वैदिक
वि.वि.सिराक्यूज, केलिफ़ोर्निया वि.वि., वर्कले युनिवर्सिटी आफ़ टेक्सास, रटगर्स,
एमरी, नार्थ केरोलाइना स्टेट,एन.वाय.यू.इन्डियाना, यूसीएलए, मेनीटावा,लाट्रोव तथा
केलगेरी विश्वविद्धालय आदि जहां हिन्दी की शिक्षा दी जाती है.
आधुनिक
चीन में हिन्दी की विधिवत शुरुआत सन 1942 में
यूनान प्रांत पूर्वी भाषा और साहित्य कालेज में हिन्दी विभाग की स्थापना के साथ
हुई. यह वह समय था जब सारा संसार द्वितीय विश्वयुद्ध की चपेट में था. ऎसी स्थिति
में अपनी सुरक्षा के लिए हिन्दी विभाग एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होता रहा.
तीन वर्षों बाद सन 1945 में हिन्दी विभाग यूनान प्रांत से
स्थान्तरित होकर छॊंगछिन में आ गया और साल भर बाद हिन्दी चीन की राजधानी में स्थित
पीकिंग वि.वि. के विदेशी भाषापीठ में आसीन हुई और तबसे यहीं फ़ूलती-फ़लती रही. यहां
हिन्दी के अलावा संस्कृत, पालि, और उर्दू भाषा साहित्य का अध्ययन-अध्यापन होता है.
1949 से 1959 तक का समय विकास की
दृष्टि से बेहतरीन रहा. बाद के वर्षों में काफ़ी शिथिल पडा.. 1960-1979 तक का समय चीनी जनता और समाज के कठिनाइयों भरे
दिन थे, हिन्दी विभाग सिकुडकर छोटा हो गया 1980-1999 का यह दौर परिवर्तन का दौर रहा. हिन्दी की मशाल को प्रज्जवलित करने में
तीन प्राध्यापकों का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता. वे हैं प्रो.यीनह्युवैन,
प्रो.लियो आनवू और प्रो. चिनतिंनहान. इन तीनो विद्वानों ने अपनी लगन ,कर्मठता और
आदर्श के बल पर हिन्दी के लिए जितना कार्य किया वह प्रेरणादायक है.
जापान
में विदेशी भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन के दो प्रमुख केन्द्र हैं. तोक्यो युनि. आफ़
फ़ारेन स्टडीज एवं ओसाका युनि.आफ़ फ़ारेन स्टडीज. इन दोनों ही वि.वि. में सन 1011-1021 से ही हिन्दुस्थानी भाषा के रुप
में हिन्दी-उर्दू की पढाई का सिलसिला प्रारंभ हो गया था. इसकी नींव डालने वाले
विद्वान श्री.प्रो.रेइची गामो तथा प्रो.एइजो सावा हैं. 1911
में डिग्रीकोर्स आफ़ हिन्दुस्तानी एण्ड तमिल शुरु हो गया था. सन 1909 से 1914 के मध्य प्रसिद्ध सेनानी मोहम्मद बरकतउल्ला
इस विश्वविद्धालय में “हिन्दुस्थानी भाषा” के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रुप में
नियुक्त किए गए. ये दोनो वि.वि. सरकारी विश्वविद्धयालय हैं, जहां 4 वर्षीय पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं. आरम्भ में प्रो. देई ने तोक्यो में तथा
प्रो.एइजो स्ववा ने ओकासा में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन की नींव डाली. ये विद्वान
प्रोफ़ेसर हिन्दी के साथ ही उर्दू भी पढाते थे. सन 2003 में
सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रो. तोसियो तनाका का “विश्व
हिन्दी सम्मान” से सम्मानित किया गया
तोकियो और ओसाका के राष्ट्रीय वि.वि. के अतिरिक्त अन्य कई गैर सरकारी
वि.वि. और शिक्षा संस्थान भी हैं, जहाँ वैकल्पिक विषय के रुप में प्रारंभिक और
माध्यमिक कक्षाओं तक हिन्दी पढने-पढाने की व्यवस्था है. ताकुशोक वि.वि. के प्रो.
हेदेआकि इशिदा, सोनोदा वीमेन्स युनिवर्सीटी के प्रो. उचिदा अराकि और ताइगेन
हशिमोतो, तोमाया कोकुसाई वि.वि. के प्रो. शिगोओ अराकि और मिताका शहर में स्थित
एशिया-अफ़्रीका भाषा के प्रो. योइचि युकिशिता का नाम अत्यंत प्रसिध्द है.
मारिशस
में भारतीय मजदूरों के आगमन के साथ ही इस भूमि पर हिन्दी का प्रवेश हुआ. जिन
मजदूरों को भारत के भोजपुर इलाके से यहां लाए गए थे “गिरमिटिया” कहलाए. वे अपने
साथ झोली में रामचरित मानस, हनुमानचालिसा,
महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथ लेकर आए. इन्हें विरासत में समृद्ध साहित्य, धर्म, और
संस्कृति का ज्ञान था. अपनी जमीन से उजडॆ-उखडॆ इन मजदूरों को नयी जमीन, यातना
शिविर में अपने को जीवित रखने, स्थापित करने और अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए
भोजपुरी और हिन्दी का सहारा ही सबसे बडा अवलंबन था. मजदूरी की क्रूर नियति से दुखी
और हताश ये मजदूर, कभी विरहा, कभी कजरी तो कभी हनुमानचालीसा की पंक्तियों से अपनी आंतरिक शक्ति बचा रखने और रात में
रामचरितमानस का पाठ उनकी थकान मिटाकर हौसला बढाते. कई अवरोधों के बावजूद बैठकें
चलती और भाषा के साथ संस्कृति और धर्म को गति देते रहे. हिन्दू महासभा, आर्यसभा,
हिन्दी प्रचरिणी सभा तथा अन्य संस्थानों के सहयोग तथा पण्डित विष्णुदयाल और डा.
शिवसागर रामगुलाम के नेतृत्व में भारतीय संस्कृति और इसकी वाहक हिन्दी अपनी उत्कृष्टता
पाने में सफ़ल हुई. आज महात्मा गांधी संस्थान और इन्दिरा गांधी सांस्कृतिक केन्द्र,
भाषा प्रचार और सांस्कृतिक गतिविधियों को विस्तार दे रहे हैं. भारत सरकार के सहयोग
से अब हिन्दी स्पीकिंग यूनियन तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान भी इस सांस्कृतिक
अभियान में जुड गए हैं, तथा हिन्दी सचिवालय की स्थापना में नया आयाम मिला है.
थाईलैण्ड में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन का कार्यक्रम सबसे पहले थाई-भारत
सांस्कृतिक आश्रम से शुरु हुआ जिसकी स्थापना सन 1943 में
स्वामी सत्यानन्दपुरीजी ने की थी. आचार्य डा. करुणा कुसलासाय जी पहले थाई विद्वान
थे, जो हिन्दी पढने भारत आए थे. महात्मा गांधी से सारनाथ में मिले और जब वे लौटे
तो थाई-भारत सांस्कृतिक आश्रम में ही हिन्दी पढ़ाना शुरु किया और बैंकाक के भारतीय
दूतावास में नौकरी शुरु की.
सन 1989 में सिल्पाकोव वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान
संकाय के प्राच्य भाषा विभाग मे एम.ए.संस्कृत पाठ्यक्रम बनाया गया. उस समय आचार्य
डा. चमलोडां शारफ़ेदनूक हिन्दी शिक्षक थे. सन 1966 में
शिलपाकोन वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान संकाय के प्राच्य भाषा विभाग के संस्कृत
अध्यापन केन्द्र की, भारतीय आगन्तुक डा. सत्यव्रत शास्त्री के द्वारा स्थापना की
गई. 1993 में थमसात वि.वि. में थाईलैण्ड के भारतीय
व्यापारियों के सहयोग से भारत अध्ययन केन्द्र की स्थापना हुई. डा. करुणा कुशलासाय,
डा. चिरफ़द प्राकन्विध्या एवं आचार्य डा. चम्लोंग शरफ़दनूक तीनों ने हिन्दी कक्षाएं
चलायी.
इस तरह हम देखते हैं कि संपूर्ण विश्व में हिन्दी अपना स्थान बना चुकी है.
भारत में, दुर्योग से वह राष्ट्रभाषा तो नहीं बन पायी, लेकिन विश्वभाषा होने का
गौरव और दर्जा तो उसे पहले से ही प्राप्त चुका है.
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
.
3
राष्ट्रभाषा
हिंदी और महात्मा गांधी.
महात्मा गांधी जी ने कहा था-" कोई भी देश सच्चे अर्थों में जब तक
स्वतंत्र नहीं है जब तक वह अपनी भाषा नहीं बोलता. अपनी भाषा के बिना राष्ट्र गूँगा
है. प्रत्येक राष्ट्र की अपनी राष्ट्रभाषा उस राष्ट्र की अस्मिता की प्रतीक होती
है. किसी भी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व वहाँ की भाषा करती है जो राष्ट्र की संस्कृति
और सभ्यता की भी संवाहक होती है".
गांधीजी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रबल पक्षधर थे. वे राष्ट्रभाषा को इतना महत्व
देते थे कि किसी भी मूल्य पर वे भाषा के स्तर पर समझौते के लिए तैयार नहीं थे. वे
भारत के भविष्यदृष्टा थे. मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के संबंध में गांधीजी का दृढ़
निश्चय उनकी वाणी में मुखरित हुआ है. उन्होंने अपने "मेरे सपनों का भारत" ग्रंथ में अपने उद्गार
व्यक्त करते हुए लिखा था-" अगर मेरे हाथ में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज ही
से अपने लड़कों-लड़कियों को विदेशी माध्यम के जरिए से दी जाने वाली शिक्षा बंद कर
दूँ और सारे शिक्षकों और प्रोफ़ेसरों से यह माध्यम तुरन्त बदलवा दूँ या उन्हें
बरखास्त करा दूँ. मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इन्तजार नहीं करुँगा. वे तो
माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे चले आएँगे".
अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व पर चिंतित होते हुए उन्होंने एक स्थान पर लिखा
है-" अंग्रेजी आज इसीलिए पढ़ी जा रही है कि उसका व्यवसायिक एवं तथाकथित
राजनैतिक महत्व है. हमारे बच्चे अँग्रेजी यह सोचकर पढ़ते हैं कि अँग्रेजी के पढ़े
बिना उन्हें नौकरियाँ नहीं मिलेंगी. लड़कियों को अँग्रेजी इसलिए पढ़ाई जाती है कि
इससे उनकी शादी में सहूलियत होगी. ये सारी बातें मेरी नजर में गुलामी और घोर-पतन
के चिन्ह हैं. मैं इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता कि देशी भाषाएँ इस तरह कुचल दी
जाएँ".
1918 को इंदौर के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के सभापति
पद से अपने उद्गार प्रकट करते हुए
उन्होंने चेताया था -"मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम भाषा को
राष्ट्रीय और अपनी-अपनी प्रान्तीय भाषाओं को उनके योग्य स्थान नहीं देंगे, तब तक
स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं. हिन्दुस्थान को यदि सचमुच एक राष्ट्र बनाना है
तो कोई चाहे, कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा हिन्दी बन सकती है. क्योंकि जो
स्थान हिन्दी को प्राप्त है, वह किसी दूसरी भाषा को कभी नहीं मिल सकता". वे न
केवल हिन्दी को एक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे, बल्कि वे उसे
व्यापार, वाणिज्य, न्याय तथा प्रशासन की भी भाषा बनाना चाहते थे.
गाँधीजी मातृभाषा के प्रबल समर्थक तो थे ही, साथ ही वे विश्व की अन्यान्य
भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने पर भी जोर देते थे. उनका प्रबल विश्वास था कि
मातृभाषा के माध्यम से अपने चिंतन का स्पष्ट अभिव्यक्तिकरण हो सकता है, वैसे अन्य
भाषाओं के माध्यम से नहीं. भाषाओं के संबंध में समय-समय पर उन्होंने अपने विचार
व्यक्त किए हैं, वे अत्यन्त ही उल्लेखनीय हैं. एक स्थान पर उन्होंने लिखा
है-" युवक और युवतियाँ अँग्रेजी खूब पढ़ें, लेकिन उनसे आशा करुँगा कि वे अपने
ज्ञान का प्रसाद भारत को और सारे संसार को उसी तरह प्रदान करेंगे जैसे बोस, राय और
स्वयं कवि रवीन्द्रनाथ ने प्रदान किया था".
उन्होंने दक्षिण की द्रविड़ भाषाओं, पूर्व और पश्चिम की भाषाओं की संपन्नता का
परिचय देते हुए अपील की कि इन समृद्ध भाषाओं से शब्द ग्रहण कर हिंदी को समृद्ध
बनाना चाहिए. ये भाषाएँ संपन्न जरूर हैं, परन्तु ये राष्ट्रभाषा नहीं बन सकतीं.
राष्ट्रभाषा तो केवल हिंदी ही बन सकती है. परन्तु मैं तो हिंदी के लिए मर्यादा रख
देना चाहता हूँ कि वह अन्य प्रांतों की भाषाओं का स्थान न ले, वह माध्यम बने.
महात्मा गांधी की प्रेरणा से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सन 1918 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास की स्थापना हुई.
गांधीजी की इस संकल्पना के लग्भग ग्यारह वर्ष पूर्व ही मद्रास( अब चैन्नई) में एक
तमिलभाषी मनीषी ने हिन्दी प्रचार की नींव डाली. यह मनीषी कोई और नहीं, तमिल के
सुविख्यात महाकवि सुब्रह्मण्य भारती जी थे. सर्वप्रथम भारती जी ने अपने संपादन में
निकलने वाली पत्रिका” इंडिया” के 15 दिसंबर 1906 के अंक में तमिलभाषियों से हिन्दी सीखने की अपील की थी. महाकवि ने न केवल
समूचे तमिलनाडुवासियों के प्रतिनिधि के रुप में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी थी
बल्कि राष्ट्रीय एकता के भविष्यदृष्टा के रुप में भी उन्होंने हिन्दी का पुरजोर
समर्थन किया था. भारतीजी के ही नेतृत्व में 1908 में सर्वप्रथम चैन्नई के तिरुवेल्लीकेणि ( ट्रिप्लिकेन)
में हिन्दी वर्गों के संचालन का श्रीगणेश हुआ था. इस घटना के दस वर्ष के बाद
गांधीजी की संकल्पनाओं के अनुरुप दाक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की नींव पड़ी. इस
कार्य हेतु गांधीजी ने आपने सुपुत्र देवदास गांधी को चैन्नई भेजा था.
अपने स्वराज मिशन के साथ भाषा को लेकर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने
कहा-" लाखों लोगों को अंग्रेजी का ज्ञान कराना उन्हें गुलाम बनाना है. मैकाले
ने भारत में जिस शिक्षा की नींव रखी, उसने सबको गुलाम बना दिया है. अगर स्वराज
अंग्रेजी बोलने वाले भारतीय लोगों का और उन्हीं के लिए होने वाला है, तो निःसंदेह
अंग्रेजी ही राष्ट्रभाषा होगी. लेकिन अगर स्वराज्य करोड़ों भूखों मरने वालों,
निरक्षरों और दलितों व अंत्यजों का है और इन सब के लिए होने वाला है, तो हिन्दी ही
एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है".
भारतीय भाषा समस्या के विषय पर गांधीजी के विचार बड़े निर्मल, वस्तुनिष्ठ और
पूरी तरह व्यवहारिक हैं. वैसे भी उनके विचार प्रांजल और पारदर्शी होते हैं. जिस
स्त्रोतों से उनके भाषा विषयक विचार उपलब्ध होते हैं, उनमें उनके लेखों का प्रमुख
स्थान है, जो यंग इण्डिया, हरिजन-सेवक, हरिजन बन्धु आदि मे प्रकाशित हैं. इसके
अतिरिक्त कुछ ऎसी सामग्री “इण्डियन होमरुल” जैसे पुस्तकों और तत्कालीन विभिन्न
व्यक्तियों को लिखे गए उनके पत्रों से मिली है. गांधीजी ने भाषा विषय में
सबसे पहले अपने विचार 1909 में अपनी पुस्तक “हिन्द-स्वराज” और होमरुल”के 18 वें परिच्छेद में यों व्यक्त किए हैं “ हर एक पढ़े-लिखे
हिन्दुस्थानी को अपनी भाषा का, हिन्दु को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी
को पर्शियन का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए. कुछ हिन्दुओं को अरबी और कुछ
मुसलमानों को हिन्दी का और कुछ पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिए. उत्तर और पश्चिम
में रहने वले हिन्दुस्तानी को तमिल सीखनी चाहिए. सारे हिन्दुस्थान के लिए तो
हिन्दी होनी ही चाहिए. उसे उर्दू या नागरी लिपियाँ जानना जरुरी है. ऎसा होने पर हम
अपने आपस में व्यवहार से अंग्रेजी को बाहर कर सकेंगे.”
गांधीजी की इन भाषिक मान्यताओं के पीछे लोक-संग्रहक संतुलन का भाव प्रमुख था.
लोकभाव को अक्षत और अक्षुण्य रखते हुए उसके लिए वे कारगर तरीका अपनाने की बात कहते
थे, वह यह कि भारत की प्रत्येक जाति का निवासी पहले तो अपने को ठीक से समझे, अपने
जातीय संस्कार की भाषा को समझे, फ़िर दूसरे की भाषा का ज्ञान भी रखे, फ़िर सामाजिक
या राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए हिन्दी से भी अवगत हों.
गांधीजी के प्रेरणा से हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना दिनांक 4 जुलाई 1936 को वर्धा में
महात्मा गांधी के निवास स्थान पर इस समिति की पहली साधारण बैठक हुई, इसमें कुल 21 सदस्य थे. इस बैठक में जिन पदाधिकरियों का चुनाव हुआ,
उसमें डा. राजेन्द्रप्रसादजी को अध्यक्ष, सेठ जमनालाल बजाज को उपाध्यक्ष एवं
कोषाध्यक्ष, श्री मोटूरी सत्यनारायण को मंत्री, श्रीमन्नारायणजी अग्रवाल को
संयुक्त मंत्री बनाया गया. हिन्दी प्रचार
समिति का कार्य गांधीजी की देखरेख में चले, इसीलिए उसका मुख्य कार्यालय वर्धा में
रखा गया.
हिन्दी प्रचार समिति राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रही
थी. अतः हिन्दी की जगह “राष्ट्रभाषा” शब्द लेने का प्रस्ताव पारित हुआ.
राष्ट्रभाषा प्रचार सामिति की दो बैठकें 12.04.1942 तथा 21.06.1942 कॊ हुई. इन दोनों बैठकों के महात्मा गांधी, डा.राजेन्द्रप्रसाद, काका काहब
कालेलकर, तथा श्रीमन्ननारायण उपस्थित थे. दिनांक 12.07.1942 को सेवाग्राम में गांधीजी की कुटी मे नवगठित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की
पहली बैठक हुई. राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने अध्यक्ष का आसन ग्रहण किया. समिति
के इस बैठक में मंत्री पद के लिए भदन्त आनन्द कौसल्यायन को और सहायक मंत्री के लिए
श्री रामेश्वरदयाल दुबे को चुना
गया.
1946 में दक्षिण भारत हिन्दी
प्रचार सामिति की रजत जयन्ती का उद्घाटन करने के पश्चात सार्वजनिक सभा को
सम्बोद्धित करते हुए उन्होंने कहा था-" कुछ समय बाद हिन्दुस्थान आजाद होगा और आजाद
हिन्दुस्थान की राजभाषा हिन्दी होगी. इसलिए मैं युवा पीढ़ी से अपील करता हूँ कि वे
अभी से हिन्दी सीखना शुरु कर्रें और देश के आजाद होते ही शासन के समस्त कार्य-कलाप
हिन्दी में सम्पन्न करें, ताकि अंग्रेजी का वर्चस्व अपने आप समाप्त हो जाए".
दक्षिण के चार प्रान्तों (केरल, तमिलनाडु, आंध्र,और कर्नाकट) छोड़कर समिति का
कार्यक्षेत्र पूरे भारत में स्वीकृत किया गया. इसी संदर्भ में वर्ष 1954 से पहले मध्य-भारत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गठित की गई और सीतामऊ के
महाराजकुमार रघुवीरसिंह इसके अध्यक्ष बने. मध्य प्रदेश का गठन होने के बाद समिति
को मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में परिवर्तन कर प्रांतीय कार्यालय इंदौर
से भोपाल स्थानान्तरित किया गया. समिति के कार्यों को स्थायित्व देने के लिए
मध्यप्रदेश शासन ने भूखण्ड दिया और शासन के तथा जनता के सहयोग से हिन्दी भवन भोपाल
का निर्माण हुआ. समिति के संस्थापक मंत्री-संचालक श्री बैजनाथप्रसाद दुबे जी थे. 28 नवंबर 1988 को उनके निधन के बाद यह
दायित्व श्री कैलाशचन्द्र पंत जी को सौंपा गया. तब से लेकर वर्तमान समय में हिन्दी
भवन ने अपने अनूठे कार्यक्रमों की वजह से देश-प्रदेशों में ही नहीं अपितु विदेशों
तक अपनी अमिट छाप छोड़ी है.
भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है. यह अभिव्यक्ति आमजन की अस्मिता से
लेकर राष्ट्र के आगत भविष्य निर्मांण के लिए भी हो सकती है. इसीलिए भाषा का प्रश्न
केवल भाषा तक ही सीमित नहीं होता. हम जो सोचते हैं अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त
करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाती है. हमनें अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई
हिन्दी के माध्यम से जीती है. आमजन की भाषा की राष्ट्रीय गरीमा को प्रतिष्ठित करना
एवं उसे कायम रखना है.
भारत के कोने-कोने में बोली जाने एवं समझी जाने वाली हिन्दी ही एकमात्र भाषा
है.जो सरल, और वैज्ञानिक लिपि में लिखी जाने के कारण हिन्दी भाषा अत्यन्त
सुव्यवस्थित, संपन्न और लोकप्रिय है. भारत के अधिकांश भागों में प्रयोग किए जाने
के कारण हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त है. राष्ट्रभाषा के रुप
में हिन्दी एक प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेशों के लोगों को जोड़ती है, और
राष्ट्रीय एकता का भाव जगाती है. हिन्दी की इसी विशिष्टता के कारण हमारे
संविधान निर्माताओं ने 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को, संघ की राजभाषा के रुप में
स्वीकार किया तथा 26 जनवरी 1950 को संविधान में इसका प्रावधान किया.
वह गांधी, जिसने स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में हिन्दी को माध्यम बनाया, वह
गांधी, जिसने नगर-नगर, शहर-शहर जाकर हिन्दी का घनघोर प्रचार-प्रसार किया, वह
गांधी, जिसने हिन्दी के अलावा कई भाषाओं को सीखने का आव्हान किया था, वह गांधी,
जिसने घोषणा कर दी थी कि "गांधी अंग्रेजी भूल गया", वह गांधी जिसने
रामराज्य की विशाल परिकल्पना की थी, वह गांधी जो तत्काल अंग्रेजी स्कूलों और कालेजों
को बंद कर देने की बात कहते थे. उसी गांधी के विचारों को भारत के स्वतंत्र होने के
पश्चात विस्मृत कर दिया गया और हिन्दी के समकक्ष अंग्रेजी को पन्द्रह वर्षों के
लिए लाद दिया गया.
इन पन्द्रह वर्षों की अवधि को लेकर हिन्दी के प्रबल पक्षधर राजर्षि टण्डन जी
ने सितम्बर 1949 में राष्ट्रभाषा के
प्रश्न पर भारतीय संविधान-सभा में ऐतिहासिक भाषण दिया था- " हिन्दी कोई नई
भाषा नहीं है. जब आयरलैण्ड ने अपना संविधान बनाया, तब उसने आयरिश भाषा को अपनाया
था, जिसमें न तो अधिक साहित्य था और न ही पर्याप्त शब्दावली ही थी. किन्तु, फ़िर भी
आयरलैण्ड ने उसे ही अपनाया. जबकि हमारी हिन्दी तो अत्यन्त शक्तिशाली भाषा
है". उनका स्पष्ट संकेत था कि जो काम आज हो गया, वह हो गया, जरुरी नहीं कि वह
पंद्रह वर्ष बाद हो सकेगा. उनकी भविष्यवाणी सही निकली. कई पंद्रह वर्ष बीत गए, हम
जहाँ थे, वहीं खड़े हैं.
अपने विशाल शब्द भण्डार, वैज्ञानिकता, शब्दों और भावों को आत्मसात करने की
प्रवृत्ति के साथ ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में अपनी उपयुक्तता एवं विलक्षणता
के कारण और बिना राजाश्रय के हिन्दी विश्व पटल पर एक प्रतिष्ठित और मान्यता
प्राप्त भाषा के रूप में उभर चुकी है. बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार बहुत तेजी से हुआ है. भूमंडलीकरण के दौर में देशों
के बीच की भौगोलिक दूरियाँ कम हुई है. हिन्दी केवल जनभाषा के रूप में ही नहीं
बल्कि विश्व बाजार के रूप में अपने को ढाल रही है. आज वह ग्लोबल भाषा के रूप में
भी अपना वर्चस्व दिखा रही है. हिन्दी आज बाजार की भाषा बन चुकी है. यही कारण है कि
विदेशी कंपनियों को अपने उत्पाद की बिक्री के लिए हिन्दी का सहारा लेना पड़ रहा है.
लगभग अस्सी करोड़ आमजनों द्वारा व्यवहृत और विश्व के 176 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली हिन्दी
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है. हिन्दी संपूर्ण भारत के जन-जन की
वाणी है. हिन्दी का अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. विश्व भाषा के रूप में
हिन्दी का विकास उसके अपने गुणॊं के कारण ही हो रहा है.
हम सभी हिंदी प्रेमियों को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि विश्व की तमाम भाषाओं
में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा में इसका सर्वश्रेष्ठ स्थान निरुपित हो चुका
है. निश्चित ही हमारे लिए यह गौरव का विषय तो है की, साथ ही हमारी जिम्मेदारियां
और भी अधिक बढ़ जाती है कि हम इसे इसी क्रम में बनाए रखने के लिए सतत संघर्षशील
रहें.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
4
विश्व में हिंदी की बढ़ती
लोकप्रियता.
वैश्वीकरण-भूमण्डलीकरण
के दौर में सूचना प्रौद्योगिकी का हिंदी के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है.
प्रिंट मीड़िया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में हिंदी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका
का निर्वाह किया है. कम्प्यूटर, इन्टरनेट, लैपटाप, ई.मेल, फ़ैक्स, पेजर, वेबसाइट
आदि हिंदी भाषा के विकास में सहायक हो रहे हैं. विज्ञान और तकनीकी ने हिंदी भाषा
के लिए नए क्षितिज खोल दिए हैं. यही वे कारक है कि हिंदी आज विश्वबाजार में अपना
परचम लहरा रही है. इतना ही नहीं उसने विश्व बाजार पर गहराई से अपना प्रभाव भी
स्थापित किया है तथा उसका कुनबा लगातार
बढ़ता ही जा रहा है.
संसार में
प्रमुख रूप से तीन भाषाएं- चीनी, अंग्रेजी और हिंदी सर्वाधिक बोली जाती है. हिंदी
को सिनेमा उद्योग ने अंतर्राष्ट्रीय ऊँचाइयों पर पहुँचाने में अपनी अहम भूमिका का
निर्वहन किया है. उसने हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी लोकप्रियता स्थापित
की है. संसार के अनेक देशों में हिंदी फ़िल्में खूब देखी और पसंद की जाती है. इस
संदर्भ में यह कथन उल्लेखनीय है-"मनोरंजन उद्योग के ग्लोबल बाजार ने बताया है
कि वालीवुड की फ़िल्मों और गानों की धुनों को जो लोग भाषा की दृष्टि से नहीं समझते,
वे भी उसकी संस्कृति संरचनाओं के प्रभाव में रहते हैं. वे जापानी, चीनी, फ़ैंच
बोलने वाले हो सकते हैं, मगर हिंदी फ़िल्मों को बहुत पसंद करते हैं. इसी बहाने
हिंदी के कुछ शब्द अनायास ही उनके दिल और दिमाक में स्थान बना लेते हैं. इस तरह हम
देखते हैं कि हिंदी अब दुनिया के लिए अजनबी नहीं रह गई है.
जिस चीनी
भाषा को संसार की सब से बड़ी भाषा के रूप में जाना जाता है, वह राष्ट्रभाषा के होते
हुए भी उसके जानने वाले चीन में हर कहीं उपलब्ध नहीं होते. ऐसी ही स्थिति
इंग्लैण्ड में अंग्रेजी भाषा की है. कनाड़ा में अंग्रेजी के समानांतर फ़्रेंच भाषा
का वर्चस्व है. अमेरिका में स्पेनिश बोलने वालों की संख्या करोड़ों में है. यदि हम
विश्व के मानचित्र में देखें तो ज्ञात होता है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वाले
पचास प्रतिशत है तो वहाँ अंग्रेजी जानने वाले केवल दशमलव .58
प्रतिशत मात्र हैं. मतलब एक प्रतिशत भी नहीं है. यह कितने आश्चर्य का विषय है?.
स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी शब्द संपदा का जितनी तेजी से विस्तार हुआ है, उतना
विश्व की शायद ही किसी भाषा का विस्तार हुआ हो.
समय-समय
पर विश्व हिंदी सम्मेलनों के माध्यम से विदेशों में रहने वाले लाखों भारतीयों को
भारतीय संस्कृति से परिचित करवाया जाता रहा है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम स्वाधीन भारत के लिए परिकल्पना दी थी - "एक राष्ट्र, एक राष्ट्रभाषा
हो".इसी परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सन् 1936 में वर्धा में हिंदी के उन्न्यन और प्रचार-प्रसार के महान उद्देश्यों
को लेकर भारत के हिंदीतर राज्यों में, समितियों का गठन किया. संस्था के उद्देश्यों
में हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ राष्ट्रीय एकता को भी सुदृढ़ करना था. कार्यवाही
पंजी में हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों में स्वयं महात्मा गांधीजी,
डा.राजेन्द्रप्रसाद जी, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जी, सेठ श्री जमनालाल बजाज,
काका कालेकर जी, ब्रिजलाल बियानी जी, हरिहर शर्माजी, वियोगी हरि जी, शंकर देव जी
सहित बाबा राघवदास जी थे.
आज हिंदी
विश्व में अपनी पहचान स्थापित कर चुकी है. हिंदी को जानने, समझने और बोलने को
उत्सुक विदेशियों के मन में भी इस भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हुई, तभी तो हिंदी
अंतरराष्ट्रीय क्षितिज में सूर्य की भांति चमक रही है. मारीशस, आस्ट्रेलिया के
समीप फ़िजी, त्रिनीनाड, गुयाना, स्वीडन, डेनमार्क, सूरीनाम, अमेरिका, कनाड़ा,
नीदरलैंड,, जर्मनी,नार्वे, म्यांमार, थाईलैंड, सिंगापुर, मलेशिया,, न्यूजीलैंड,
इंडोनेशिया, जाम्बिया, अफ़्रीका महाद्वीप, केन्या, युगांडा, कम्पाला, तंजानिया,
नाइजीरिया, चाइना, जापान, फ़्रांस, रोमानिया, युगोस्वाविया, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया,
तुर्की, इरान, सउदी अरब, मिस्त्र, लीबिया आदि देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी विधिवत
पढ़ाई जा रही है.
आधुनिक
यूरोपीय भाषाओं में जर्मन भाषा के व्याकरण पर हिंदी का गहरा प्रभाव है. हिंदी
साहित्य के अन्य विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो रहे हैं. और पत्र-पत्रिकाओं के
अतिरिक्त भी अनेक ग्रंथ प्रकाशित किए जा रहे हैं. हिंदी की ध्वजा संपूर्ण विश्व में
फ़हराई जा रही है, क्या यह हमारे लिए अत्यन्त ही गौरव का विषय नहीं है कि स्वाधीनता
के बाद विश्व भर में हिंदी को जो गौरव और
सम्मान प्राप्त हुआ है, वह विश्व की किसी भी भाषा के लिए दुर्लभ है.
हिंदी की
शाखा-प्रशाखा को पुष्पित-पल्लवित करने में प्रवासी भारतीय लेखक / लेखिकाओं ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है. उन्होंने न
केवल हिंदी का प्रचार-प्रसार किया, अपितु अपनी भाषा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का
वहाँ बीजारोपण भी किया है. सुश्री अंजना संघीर, सुरेन्द्रनाथ तिवारी, हरिशंकर
आदेश, श्री उमेश शर्मा, कृष्ण बिहारी नूर,
पूर्णिमा बर्मन, राम्कृष्ण द्विवेदी "मघुकर", विद्याभूषण धर,. उषा राजे
सक्सेना, अचला शर्मा, कादम्बरी मेहरा, कीर्ति चौधरी, गोविन्द शर्मा, जाकिया
जुबेरी, डा.कृष्णकुमार, पद्मेश गुप्त, डा.महेन्द्र वर्मा,तेजेन्द्र शर्मा, तोषी
अमृता, दिव्या माथुर, नरेश भारतीय, निखिल कौशिक, प्राण शर्मा, कैलाश बुधवार, उषा
प्रियंवद, सुषम बेदी, सुधा ओम ढींगरा, नीना पाल, दिव्या माथुर, उषा वर्मा, जया
वर्मा, शैल अग्रवाल, ईला नरेन, इला प्रसाद, स्नेह ठाकुर,, विशाखा ठक्कर, रेणू
राजवंशी, राजश्री, अंशुल जौहरी, सौमित्र सक्सेना, रचना श्रीवास्तव, पुष्पा
सक्सेना, प्रतिमा सक्सेना,राजश्री, अमरेन्द्रक्मार,स्वदेश राणा आदि लेखकों ने अपनी
रचनाधर्मिता से हिंदी के मान-सम्मान, गरिमा और गौरव में श्रीवृद्धि की है.
यह
उल्लेखनीय है कि हिंदी को समृद्ध करने में देश के विद्वानों के साथ-साथ अनेक
विदेशी विद्वानॊ की भी अहम भूमिका रही है. उनका हिंदी के प्रति गहरा अनुराग का एक
लंबा इतिहास रहा है. जैसे कि ब्रिटेन के जान गिल क्राइस्ट, थामस डूएर ब्रूटेन,
फ़्रेडरिक पिंकाट. जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन,, जान फ़र्गुसन, डा,मैकग्रैगर, फ़्रांस के
गार्सा द तार्सी, अमेरिका के सैमुएल बेहरी केलाग, प्रो.एनस्ट वेण्डर, सारा कोहिम,
इटली के एल.पी.तेस्सीतारी, जर्मनी से डा.ईनेस फ़ोर्नेल, पोलैंड से प्रो.ब्रिस्की,
रूस से डा.चेर्निशोव, वारान्निकोव.जैसे अनेकानेक विद्वानों ने हिंदी के
प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका का निर्वहन किया और कर रहे हैं. जापान से डा.तोमिजो
मिजोकामी, तोमियो मिजोकामी और रूस के वारान्निकोव, डा. ल्युदमिला, एवं पोलेंड के
प्रो.ब्रिस्की जैसे विद्वानों के शोध कार्य लगातार सामने आ रहे हैं.टोक्यो
युनिवर्सिटी में प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण के प्रयासों से लगातार हिंदी के कार्यक्रम
आयोजित हो रहे हैं और ओकासा युनिवर्सिटी में प्रो. हरेन्द्र चौधरी भी इस कार्य को
आगे बढ़ा रहे हैं.
इसी
प्रकार दूसरी ओर वे भारतवंशी लोग हैं जो गिरमिटिया मजदूर के रूप में 150
वर्ष पूर्व मारीशस, फ़िजी, त्रिनिदाद, गयाना और सूरीनाम पहुँचे थे. वे अपने साथ
रामायण, हनुमान चालीसा और आल्हा आदि लेकर गए थे और अपनी पीढ़ियों के पास विरासत के
रूप में संरक्षित भी करते रहे, जिसके परिणामस्वरुप इन देशों में हिंदी व भारतीय
लोक भाषाएं भी साथ-साथ यात्रा करती रहीं. मारीशस के राष्ट्रकवि बिजेन्द्र भगत
मधुकर, अभिमन्यु अनत, रामदेव धुरंधर, राज हीरामन, सोमदत्त बखौरी, मुनिश्वरलाल
चिंतामणि, अजामिल माताबदल, धनराज शंभु, बीरसेन जागासिंह, इन्द्रदेव भोला, हेमराज
सुन्दर, सूरजप्रसाद मंगर, धनराज शंभु, धर्मवीर घूरा, राजेन्द्र अरू, राजरानी
गोविन, जयदत्त जीवत, खैर जगह सिंह, महेश रामजियावन मोहित आदि प्रमुख हस्ताक्षर हैं,
जिन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है.
हिंदी अब
विश्व भाषा बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. आज भले ही वह संयुक्त राष्ट्र
संघ की अधिकारिक भाषा नहीं है परंतु व्यहावारिक स्तर पर उसकी सभी एजेन्सियों की
मान्य भाषा है. संयुक्त राष्ट्र संघ नियमित रुप से हिंदी में एक साप्ताहिक
कार्यक्रम प्रसारित करता है, जिसे उसकी वेबसाइट पर देखा जा सकता है. हिंदी को
संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए सघन प्रयास किए जा रहे हैं.
जिन देशों में हिंदी के बोलने-पढ़ने और लिखने वालों की संख्या अधिक है, उन देशों का
एक संगठन बनाने की दिशा में भारत सरकार काम कर रही है.
हिंदी के
उन्न्यन और प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए विदेश मंत्रालय में-हिंदी एवं
संस्कृत प्रभाग- का गठन किया गया है, जो विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के
लिए विभिन्न गतिविधियों को संयोजित करता है. वह अपने विदेश स्थित दूतावासों के
माध्यम से हिंदी की कक्षाएं आयोजित करने अनुदान देता है. साथ ही विदेशों में
अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रिय हिंदी सम्मेलनों का भी आयोजन करता है.
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए
"भारतीय संस्कृति संबंध परिषद"(आईसीसीआर) अपनी महत्वपूर्ण भुमिका का
निर्वहन कर रही है. इसने दुनिया भर में अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ की
स्थापना की है. इतना ही नहीं, इन विश्वविद्यालयों में भारत से ही शिक्षक
प्रतिनियुक्ति पर भेजती है, जो हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग करते हैं.
हिंदी आज
सात समुद्र पार अपना परचम लहरा रही है- अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, दक्षिण
अफ़्रीका, नेपाल, मारीशस, न्यूजिलैंड, सिंगापुर, यमन, युगांडा, इन दश देशों में
हिंदी भाषी भारतीयों की संख्या दो करोड़ के लगभग है. फ़ीजी, गुयाना, सूरीनाम,
टोबोगो, ट्रिनिडाड तथा अरब अमीरात- इन छः देशों में हिंदी को अल्पसंख्यक भाषा के
रूप में संवैधानिक दर्जा प्राप्त है. भारत के बाहर जिन देशों में हिंदी को
बोलने,लिखने, पढ़ने, अध्ययन और अध्यापन की दृष्टि से प्रयोग होता है, उन्हें हम इन
वर्गों में बांट सकते हैं.
1..जहां
भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं-पाकिस्तान, नेपाल,भूटान,बांगलादेश,
म्यांमार, श्रीलंका और मालद्वीव आदि.( 2.) भारतीय
संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश-इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड,
चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान.(3). जहां हिंदी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है-
अमेरिका, आस्ट्रेलिया,कनाड़ा और यूरोप के देश, 4.अरब और
इस्लामिक देश- संयुक्त अरब अमीरात,(दुबई), अफ़गानिस्तान, कतर, मिस्त्र,
उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि.
प्राप्त
जानकारी के अनुसार कैम्ब्रिज मे विगत 150 वर्षों से तथा यूरोप के 200 से अधिक वर्षों से हिंदी का अध्ययन-अध्यापन का कार्य हो रहा है. विश्व
के कगभग 600 से अधिक स्थानों पर हिंदी शिक्षण का कार्य हो
रहा है. श्रीलंका दूतावास के सहयोग से हिंदी की कक्षाओं में दो सौ से अधिक
छात्र-छात्राएं प्रवेश लेते हैं.
इसी
प्रकार अनेक पत्र-पत्रिकाएं भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो रही हैं, जो
हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रही हैं. जापान से "सर्वोदय" एवं
"जापान" तथा "ज्वालामुखी" पत्रिकाएं का प्रकाशन विगत बीस
वर्षों से निरन्तर जारी है. अनुवाद के माध्यम से संत तुलसीदास जी के "रामचरित
मानस" का लगभग पचास भाषाओं में, तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर की सत्तर पुस्तकों का
चीनी भाषा में अनुवाद हुआ है.
ग्लोबल
होती हिंदी की गति तो देखकर जहाँ हमें अपार प्रसन्नता होती है, वहीं हिंदी आज भी
भारत की राष्ट्रभाषा बनने की प्रतीक्षा कर रही है. आज भले ही वह राष्ट्रभाषा नहीं
बन पायी, लेकिन उसने अपने बलबूते पर विश्व भाषा होने का गौरव प्राप्त कर लिया है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------
5
हिन्दी भाषा की विशेषताएं और आकर्षण
हिन्दी
हमारी आन-बान-शान की भाषा है. हमारी अस्मिता की भाषा है. हमारी सांस्कृतिक पहचान
की भाषा है. राष्ट्रहित की बात हो या फ़िर जनहित की, इसके योगदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता.
इसकी अमोघ शक्ति के बारे में पूरा विश्व भली-भांति परिचित है. यह उस आंधी का नाम है कि जिसने ब्रिटिश साम्राज्य
को जड़ों को उखाड़ फ़ेंका. जैसा कि कभी यह कहा जाता था कि उसका सूरज कभी अस्त नहीं
होगा. उसने अपनी शक्ति से विश्व को परिचित करवा दिया है.
अंग्रेजी विश्व की संपर्क
भाषा है, यह कहते हुए अंग्रेजीदां कहते नहीं थकते है, जबकि हकीकत ठीक इसके विपरीत
है. विश्व में सबसे ज्यादा चीनी भाषा "मन्दारिन" बोली जाती है और दूसरा
क्रमांक हिन्दी का है. जबकि रुसी, स्पेनिज, पोर्तुगीच और डच आदि ग्यारह भाषाऒं में
अंग्रेजी बारहवें पादान पर है. विश्व की चार प्रतिशत आबादी ही अंग्र्रेजी बोलती-
लिखती और समझती है. सवाल उठना लाजमी है कि यह कैसी विश्वभाषा है? हमारी हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है, जबकि अंग्रेजी अवैज्ञानिक
है. यह बिना लगाम की घोड़ी के समान है. इंगलैण्ड के जंगली लोगों ने जब इसे बोलना
शुरु किया तो इसे अंग्रेजी जुबान का नाम मिला, जबकि इससे पूर्व वहाँ लैटिन भाषा
प्रचलन में थी. हिन्दी के पास अपने मौलिक शब्दों की संख्या साठ लाख है, जबकि
अंग्रेजी के पास लगभग देढ़ लाख शब्द हैं, और वे भी इधर-उधर से उधार लिए गए हैं.
आइए जानते हैं कि हिन्दी
भाषा की विशेषताएं और आकर्षण के बारे में-
1-संस्कृत की दुहिता होने के कारण हिन्दी बहुसंख्य लोगों के द्वारा
बोली और समझी जाती है. 2-.इसका साहित्यिक झान विभिन्न भाषाओं
में विस्तृत तथा उच्च कोटि का है. 3-.इसका शब्द भंडार तथा विचार क्षेत्र व्यापक है. 4.- इसका व्याकरण सरल और प्रामाणिक है. 5-. इसकी ग्राहय
शक्ति शक्तिशाली है जिससे वह आवश्यकतानुसार देशी-विदेशी भाषाओं के शब्दों को सरलता
से अपने में आत्मसात कर लेती है. 6-इसकी लिपि सरल है.7 जैसा लिखा जाता वैसा पढ़ा जाता है. 8- इसमें
भावात्मक एकताअ स्थापिअत करने की पूरी सामर्थयता है. इन्हीं सारी विशेषताओं को
देखते हुए देश के विभिन्न भाषा-भाषियों, उदारचेतना से संपन्न बुद्धिजीवियों और
राष्ट्र हितैषियों ने अपने विचार प्रकट करते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया
था.
अर्थ-शक्तिभारत,
परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र भारत, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में पथ-प्रदर्शन
भारत,एवं संसार केसबसे बडॆ बाजारों में एक भारत से निकटता बढाने के लिए विश्व का
हर देश ललायित है. यही कारण है कि विश्व के अनेक देश अपने यहाँ हिन्दी शिक्षण की
उच्चस्तरीय व्यवस्था कर रहे हैं. इस देशों में अमरीका, रुस, इंगलैण्ड, फ़्रांस,
चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे विश्व के प्रभावशाली देश भी शामिल हैं. इतना
ही नहीं प्रवासी भारतीयों ने अपनी संस्कृति के रक्षा के लिए हिन्दी के
अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था विश्व में बडॆ व्यापक स्तर पर की है. वे हिन्दी की
सुरक्षा, प्रतिष्ठा एवं प्रचार के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.
संसार में
कुल मिलाकर लगभग २८०० भाषाएं हैं. इनमे १३ ऎसी भाषाएं हैं,जिनके बोलने वालों की
संख्यां ८ करोड से अधिक है. ताजा अंकडॊं के अनुसार संसार की भाषाओं में, हिन्दी
भाषा को द्वितीय स्थान प्राप्त है. भारत के बाहर वर्मा, श्रीलंका, फ़ीजी, मलाया,
दक्षिण और पूर्वी अफ़्रीका में भी हिन्दी बोलने वालों की संख्या ज्यादा है. एशिया
महादेश की भाषाओं में हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है, जो अपने देश के बाहर भी बोली और
लिखी जाती है,क्योंकि यह एक जीवित और सशक्त भाषा है.
ताजा
आंकडॊं के अनुसार भारत में हिन्दी जानने वालों की संख्या सौ करोड है. भारत के बाहर
पाकिस्थान, इजराइल, ओमान, इक्वाडोर, फ़िजी, इराक, बांगलादेश, ग्रीस,
ग्वालेमाटा,म्यांमार, यमन, त्रिनीदाद, सउदी अरब, पेरु, रुस, कतर,, मारीशस,
सूरीनाम, गुयाना, इंग्लैण्ड आदि में बोली जाती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी
को राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा की मान्यता मिलने जा रही है. वर्तमान में अंग्रेजी,
फ़्रेंच,चीनी,रुसी एवं स्पेनिस भाषाओं को राष्ट्रसंघ की मान्यता प्राप्त है.
संसार में
हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है,जिसे विदेशियों ने सर्वप्रथम विश्वपटल पर रखा. हिन्दी के
शोधार्थी डा.जुइजिपियोतैस्सी तोरी ने फ़्लोरेंस विश्वविद्धयालय इटली में
रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन १९११ में शुभारंभ किया. भारत
की संस्कृति ने उन पर इतना असर डाला कि स्वदेश “इटली” छोडकर जीवनपर्यंत बीकानेर
में रहे. साम्यवादी देशों में तुलसीकृत
रामचरित मानस की लोकप्रियता देख, स्टालिन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अकादमीशियन
अलकसई वरान्निकोव द्वारा रुसी भाषा में पद्दानुवाद कराया, जिसमें साढे दस वर्ष
लगे. तुलसीभक्त वेल्जियम में जन्में फ़ादर रेवरेण्ड कामिल बुल्के,जिन्होंने हिन्दी
के कारण भारत की नागरिकता ली. तुलसी की काव्यकृति हनुमानचालीसा का रोमानियन भाषा
में, बुकारेस्ट में प्रो. जार्ज अंका ने डा. यतीन्द्र तिवारी के सहयोग से अनुवाद
किया.
अमेरिका
के कई विश्वविद्दालयों में हिन्दी पढाई जाती है. यथा- पेनस्टेटयेल, लायोला,
शिकागो, वाशिंगटन, ड्यूक, आयोवा, ओरेगान, मिशिगन, कोलंबिया, हवाई इलिनाय, अलवामा,
युनिवर्सिटी आफ़ बर्जिनिया, युनि.आफ़ मीनेसोटा, फ़्लोरिडा, वैदिक वि.वि.सिराक्यूज,
केलिफ़ोर्निया वि.वि., वर्कले युनिवर्सिटी आफ़ टेक्सास, रटगर्स, एमरी, नार्थ
केरोलाइना स्टेट,एन.वाय.यू.इन्डियाना, यूसीएलए, मेनीटावा,लाट्रोव तथा केलगेरी
विश्वविद्धालय आदि जहां हिन्दी की शिक्षा दी जाती है.
आधुनिक चीन
में हिन्दी की विधिवत शुरुआत सन १९४२ में यूनान प्रांत पूर्वी भाषा और साहित्य
कालेज में हिन्दी विभाग की स्थापना के साथ हुई. यह वह समय था जब सारा संसार
द्वितीय विश्वयुद्ध की चपेट में था. ऎसी स्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिन्दी
विभाग एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होता रहा. तीन वर्षों बाद सन १९४५ में
हिन्दी विभाग यूनान प्रांत से स्थान्तरित होकर छॊंगछिन में आ गया और साल भर बाद
हिन्दी चीन की राजधानी में स्थित पीकिंग वि.वि. के विदेशी भाषापीठ में आसीन हुई और
तबसे यहीं फ़ूलती-फ़लती रही. यहां हिन्दी के अलावा संस्कृत, पालि, और उर्दू भाषा
साहित्य का अध्ययन-अध्यापन होता है. १९४९ से १९५९ तक का समय विकास की दृष्टि से
बेहतरीन रहा. बाद के वर्षों में काफ़ी शिथिल पडा.. १९६०-१९७९ तक का समय चीनी जनता
और समाज के कठिनाइयों भरे दिन थे, हिन्दी विभाग सिकुडकर छोटा हो गया .१९८०-१९९९ का यह दौर परिवर्तन का दौर
रहा. हिन्दी की मशाल को प्रज्जवलित करने में तीन प्राध्यापकों का योगदान विस्मृत
नहीं किया जा सकता. वे हैं प्रो.यीनह्युवैन, प्रो.लियो आनवू और प्रो. चिनतिंनहान.
इन तीनो विद्वानों ने अपनी लगन ,कर्मठता और आदर्श के बल पर हिन्दी के लिए जितना
कार्य किया वह प्रेरणादायक है.
जापान में
विदेशी भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन के दो प्रमुख केन्द्र हैं. तोक्यो युनि. आफ़ फ़ारेन
स्टडीज एवं ओसाका युनि.आफ़ फ़ारेन स्टडीज. इन दोनों ही वि.वि. में सन १०११-१०२१ से
ही हिन्दुस्थानी भाषा के रुप में हिन्दी-उर्दू की पढाई का सिलसिला प्रारंभ हो गया
था. इसकी नींव डालने वाले विद्वान श्री.प्रो.रेइची गामो तथा प्रो.एइजो सावा हैं.
१९११ में डिग्रीकोर्स आफ़ हिन्दुस्तानी एण्ड तमिल शुरु हो गया था. सन १९०९ से १९१४
के मध्य प्रसिद्ध सेनानी मोहम्मद बरकतउल्ला इस विश्वविद्धालय में “हिन्दुस्थानी
भाषा” के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रुप में नियुक्त किए गए. ये दोनो वि.वि. सरकारी
विश्वविद्धयालय हैं, जहां ४ वर्षीय पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं. आरम्भ में प्रो. देई
ने तोक्यो में तथा प्रो.एइजो स्ववा ने ओकासा में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन की नींव
डाली. ये विद्वान प्रोफ़ेसर हिन्दी के साथ ही उर्दू भी पढाते थे. सन २००३ में
सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रो. तोसियो तनाका का “विश्व
हिन्दी सम्मान” से सम्मानित किया गया
तोकियो और
ओसाका के राष्ट्रीय वि.वि. के अतिरिक्त अन्य कई गैर सरकारी वि.वि. और शिक्षा संस्थान
भी हैं, जहाँ वैकल्पिक विषय के रुप में प्रारंभिक और माध्यमिक कक्षाओं तक हिन्दी
पढने-पढाने की व्यवस्था है. ताकुशोक वि.वि. के प्रो. हेदेआकि इशिदा, सोनोदा
वीमेन्स युनिवर्सीटी के प्रो. उचिदा अराकि और ताइगेन हशिमोतो, तोमाया कोकुसाई
वि.वि. के प्रो. शिगोओ अराकि और मिताका शहर में स्थित एशिया-अफ़्रीका भाषा के प्रो.
योइचि युकिशिता का नाम अत्यंत प्रसिध्द है.
मारिशस
में भारतीय मजदूरों के आगमन के साथ ही इस भूमि पर हिन्दी का प्रवेश हुआ. जिन
मजदूरों को भारत के भोजपुर इलाके से यहां लाए गए थे “गिरमिटिया” कहलाए. वे अपने
साथ झोली में रामचरित मानस, हनुमानचालिसा,
महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथ लेकर आए. इन्हें विरासत में समृद्ध साहित्य, धर्म, और
संस्कृति का ज्ञान था. अपनी जमीन से उजडॆ-उखडॆ इन मजदूरों को नयी जमीन, यातना
शिविर में अपने को जीवित रखने, स्थापित करने और अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए
भोजपुरी और हिन्दी का सहारा ही सबसे बडा अवलंबन था. मजदूरी की क्रूर नियति से दुखी
और हताश ये मजदूर, कभी विरहा, कभी कजरी तो कभी हनुमानचालीसा की पंक्तियों से अपनी आंतरिक शक्ति बचा रखने और रात में रामचरितमानस
का पाठ उनकी थकान मिटाकर हौसला बढाते. कई अवरोधों के बावजूद बैठकें चलती और भाषा
के साथ संस्कृति और धर्म को गति देते रहे. हिन्दू महासभा, आर्यसभा, हिन्दी
प्रचरिणी सभा तथा अन्य संस्थानों के सहयोग तथा पण्डित विष्णुदयाल और डा. शिवसागर
रामगुलाम के नेतृत्व में भारतीय संस्कृति और इसकी वाहक हिन्दी अपनी उत्कृष्टता
पाने में सफ़ल हुई. आज महात्मा गांधी संस्थान और इन्दिरा गांधी सांस्कृतिक केन्द्र,
भाषा प्रचार और सांस्कृतिक गतिविधियों को विस्तार दे रहे हैं. भारत सरकार के सहयोग
से अब हिन्दी स्पीकिंग यूनियन तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान भी इस सांस्कृतिक अभियान
में जुड गए हैं, तथा हिन्दी सचिवालय की स्थापना
में नया आयाम मिला है.
थाईलैण्ड
में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन का कार्यक्रम सबसे पहले थाई-भारत सांस्कृतिक आश्रम से
शुरु हुआ जिसकी स्थापना सन १९४३ में स्वामी सत्यानन्दपुरीजी ने की थी. आचार्य डा.
करुणा कुसलासायजी पहले थाई विद्वान थे, जो हिन्दी पढने भारत आए थे. महात्मा गांधी
से सारनाथ में मिले और जब वे लौटे तो थाई-भारत सांस्कृतिक आश्रम में ही हिन्दी
पढाना शुरु किया और बैंकाक के भारतीय दूतावास में नौकरी शुरु की.
सन १९८९ में
सिल्पाकोव वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान संकाय के प्राच्य भाषा विभाग मे
एम.ए.संस्कृत पाठ्यक्रम बनाया गया. उस समय आचार्य डा. चमलोडां शारफ़ेदनूक हिन्दी
शिक्षक थे. सन १९६६ में शिलपाकोन वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान संकाय के प्राच्य
भाषा विभाग के संस्कृत अध्यापन केन्द्र की, भारतीय आगन्तुक डा. सत्यव्रत शास्त्री
के द्वारा स्थापना की गई. १९९३ में थमसात वि.वि. में थाईलैण्ड के भारतीय
व्यापारियों के सहयोग से भारत अध्ययन केन्द्र की स्थापना हुई. डा. करुणा कुशलासाय,
डा. चिरफ़द प्राकन्विध्या एवं आचार्य डा. चम्लोंग शरफ़दनूक तीनों ने हिन्दी कक्षाएं
चलायी.
-------------------------------------------------------------------------------------------------
6
अंग्रेजी के कारण ही आज हिन्दी की उपेक्षा हो रही है.
यह बात सोलह आने सच है कि अंग्रेजी के कारण ही आज हिन्दी की उपेक्षा हो रही
है. यह बात भले ही किसी अंग्रेजीदां के गले न उतरे, लेकिन हकीकत तो यही है. और इसे
नकारा भी नहीं जा सकता. देश में प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी के अखबार हैं ही
कितने ? और उनके पाठकों की संख्या भी देश की जनसंख्या का लगभग चार-पांच प्रतिशत ही
बैठेगी, फ़िर भी अंग्रेजी सिरमौर बनी हुई है. इसी तरह हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं की
संख्या के आगे अंग्रेजी की पत्रिकाएं नगन्य है फ़िर भी अंग्रेजी हावी बनी हुई है.
कितनी अंग्रेजी फ़िल्में तैयार होती है? हिन्दी-विरोध के नाम पर अहिन्दी भाषी खासकर
दक्षिण प्रांतो की दुहाई दी जाती है, वहाँ कितने लोग अंग्रेजी बोलते हैं? दक्षिण
के चेन्नई में अधिकतर फ़िल्में बनती हैं-अंग्रेजी फ़िल्मों का तो कहीं नाम भी नजर
नहीं आता. दक्षिण का साहित्य तामिल, तेलुगु, मलयालम तथा कन्नड़ में लिखा जाता है,
अंग्रेजी में नहीं. कर्नाटक का संगीत अंग्रेजी भाषा में नहीं है. समझ नहीं आता कि
आखिर क्यों दक्षिण को अंग्रेजी से जोड़ दिया जाता है. उत्तर हो या फ़िर दक्षिण या
पूरब-पश्चिम, देश की संस्कृति एवं भाषायी परम्पराओं से दूर-दूर तक अंग्रेजी का कोई
संबंध नहीं है. केवल और केवल चार-पांच प्रतिशत लोगों की भाषा से भारतीय भाषाओं की
घोर उपेक्षा अथवा भारी क्षति हुई है. इसके लिए और कोई नहीं बल्कि देश के राजनेता,
जनप्रतिनिधि, राज्य की सरकारें जिम्मेदार है. हमारे संविधान में 1950 से 1965 यानि कुल पन्द्रह सालों के अंग्रेजी को जारी रखने का प्राचधान किया गया था
किन्तु राजभाषा अधिनियम 1963 राजभाषा विधेयक 1967 तथा राजभाषा 1976 द्वारा संविधान में संशोधन करके अनिश्चित काल के लिए अंग्र्रेजी को जारी
रखने की छूट दे दी गई. यह सारा प्रपंच कांग्रेस की राजसत्ता का रचाया हुआ था.
कांग्रेस ही क्यों, इसके लिए अन्य राजनीतिक दल भी उतने ही जिम्मेदार है. यदि वे
समय रहते इसका पुरजोर विरोध करते तो यह नौबत आती ही नहीं. ऐसा नहीं है कि विरोध
करने कोई आगे नहीं आया, लोग आगे आए भी लेकिन संख्या-बल में कमी रहने के कारण वे
वैसा नहीं कर पाए.
संविधान सभा में राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन जी का ऐतिहासिक भाषण उठाकर पढ़
लीजिए. इस सभा में श्री टण्डन जी के अलावा श्री गोपालस्वामी आयंगर जी, श्री मोटुरी
सत्यनारायण जी, श्री शंकरराव देव, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, श्री एच.के खाण्डॆकर,
डा,.पी.एस.देशमुख, मौलाना हसरत मोहानी,.श्री आर.आर.दिवाकर, पं.लक्ष्मीकांत मैत्र,
श्री के.सन्तानम आदि शामिल थे. इस सभा में हिन्दी भाषा को रोमन में लिखने तथा हिन्दी
के मानक अंको के प्रयोग को लेकर सघन चर्चायें हुईं थी. सभी सदस्य अंग्रेजी को
पन्द्रह साल तक बनाए रखने के पक्षधर थे, लेकिन टण्डन जी ने इस लम्बी अवधि को
स्वीकार न करते हुए पांच वर्ष रखने का सुझाव दिया था, जिसे बाद में अनेक कारणों को
गिनाते हुए अंग्र्रेजी पन्द्रह वर्ष तक बनी रहेगी, यह निर्णय लिया गया. श्री टण्डन
जी ने आग्रहपूर्वक कहा था कि जो काम आज हो सकताअ है, शायद बाद में कभी संभव न हो
सकेगा. वही हुआ भी, जो उन्होंने अत्यंत ही पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था.
महात्मा गाँधी ने लन्दन से दक्षिण अफ़्रीका लौटते समय रास्ते में जो संवाद
लिखा, वह "हिन्दी स्वराज" के नाम से 22 नवम्बर 1909 में प्रकाशित हुआ था. मूल किताब गुजराती में लिखी गई है. उन्होंने हिन्दी
के बारे में जो विचार लिखे वे इस प्रकार है. " हिन्दुस्तान की आम भाषा
अंग्रेजी नहीं बल्कि हिन्दी है. वह आपको सीखनी होगी और हम तो आपके साथ अपनी भाषा
में ही व्यवहार करेंगे" यह टिप्पणी बापू ने अंग्रेजों को सम्बोधित करते हुए
की थी. इस पुस्तक में भारतीयों द्वारा अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर दुःख प्रकट करते
हुए लिखा था- ". यह क्या कम जुल्म की
बात है कि अपने देश में मुझे इंसाफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करना
चाहिए. बैरिस्टर होने पर भी मैं स्व-भाषा में बोल ही नहीं सकता ! यह कुछ कम दंभ है
! यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमें मैं अंग्रेजी का दोष निकालूं या
अपना. हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्र्रेजी जानने वाले ही हैं.
राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं, बल्कि हम पर पड़ेगी."
राष्ट्रभाषा हिन्दी पर महात्मा गांधी के विचारों को विस्तार से जानने के लिए
हमें गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए.
करीब देढ़ सौ पृष्ठों की इस किताब से हम उनके दिव्य वचनों से रोशनी पा सकते हैं.
महात्मा गांधी की प्रेरणा से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सन 1918 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास की स्थापना हुई.
गांधीजी की इस संकल्पना के लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व ही मद्रास( अब चैन्नई) में एक
तमिलभाषी मनीषी ने हिन्दी प्रचार की नींव
डाली. यह मनीषी कोई और नहीं, तमिल के सुविख्यात महाकवि सुब्रह्मण्य भारती जी थे.
सर्वप्रथम भारती जी ने अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिका” इंडिया” के 15 दिसंबर 1906 के अंक में तमिलभाषियों से हिन्दी
सीखने की अपील की थी. महाकवि ने न केवल समूचे तमिलनाडुवासियों के प्रतिनिधि के रुप
में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी थी बल्कि राष्ट्रीय एकता के भविष्यदृष्टा के
रुप में भी उन्होंने हिन्दी का पुरजोर समर्थन किया था. भारतीजी के ही नेतृत्व में 1908 में सर्वप्रथम चैन्नई के तिरुवेल्लीकेणि( ट्रिप्लिकेन) में हिन्दी वर्गों
के संचालन का श्रीगणेश हुआ था. इस घटना के दस वर्ष के बाद गांधीजी की संकल्पनाओं
के अनुरुप दाक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की नींव पड़ी. इस कार्य हेतु गांधीजी ने
आपने सुपुत्र देवदास गांधी को चैन्नई भेजा था.
गांधीजी के प्रेरणा से हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना दिनांक 4 जुलाई 1936 को वर्धा में महात्मा गांधी
के निवास स्थान पर इस समिति की पहली साधारण बैठक हुई, इसमें कुल 21 सदस्य थे. इस बैटक में जिन पदाधिकरियों का चुनाव हुआ उसमें डा.
राजेन्द्रप्रसादजी को अध्यक्ष, सेठ जमनालाल बजाज को उपाध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष,
श्री मोटूरी सत्यनारायण को मंत्री, श्रीमन्नारायणजी अग्रवाल को संयुक्त मंत्री
बनाया गया. हिन्दी प्रचार समिति का कार्य गांधीजी की देखरेख में चले, इसीलिए उसका
मुख्य कार्यालय वर्धा में रखा गया.
हिन्दी प्रचार समिति राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रही
थी. अतः हिन्दी की जगह “राष्ट्रभाषा” शब्द लेने का प्रस्ताव पारित हुआ.
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की दो बैठकें 12.04.1942 तथा 21.06.1942 कॊ हुई. इन दोनों बैठकों के महात्मा गांधी,
डा.राजेन्द्रप्रसाद, काका काहब कालेलकर, तथा श्रीमन्ननारायण उपस्थित थे. दिनांक 12.07.1942 को सेवाग्राम में
गांधीजी की कुटी मे नवगठित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की पहली बैठक हुई. राजर्षि
पुरुषोत्तमदास टण्डन ने अध्यक्ष का आसन ग्रहण किया. समिति के इस बैठक में मंत्री
पद के लिए भदन्त आनन्द कौसल्यायन को और सहायक मंत्री के लिए श्री रामेश्वरदयाल
दुबे को चुना गया.
बापू ने जहाँ हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया, वहीं उन्होंने स्वदेशी
अपनाने पर भी जोर दिया था. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहें कि उनकी बातों को भुला
दिया गया और अंग्रेजी का वर्चस्व लगातार बढ़ता रहा. समय-समय पर आयोग बैठते रहे,
लेकिन उनकी सिफ़ारिशें रद्दी की टोकरी के
हवाले जाती रहीं. इसी का दुष्परिणाम है जिसे हम आज तक भुगत रहे हैं. अंग्रेजी के
माध्यम से जीवन में प्रवेश करने वाले बच्चे आज न तो अंग्रेजी के अधिकारी विद्वान
बन पाए और न ही हिन्दी के.
आज भी केन्द्र के कार्यालयों में, केन्द्र की सरकार का काम-काज में अंग्रेजी
का प्रभुत्व बना हुआ है. बात यहीं समाप्त होती, केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच
पत्रों का आदान-प्रदान की भाषा अंग्रेजी ही बनी हुई है. नागालैण्ड हो या केरल या
फ़िर तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, बंगाल, त्रिपुरा, मिजोरम आदि में अंग्रेजी का
एकाधिकार बना हुआ है. साथ ही अन्य प्रदेशों की हालत भी लगभग वही है. पहली से
प्राथमिक कक्षा से ही अंग्र्रेजी लागू करने के कारण देश की शैक्षिक, सामाजिक एवं
आर्थिक स्तर पर भारी असमानता आ गई है. उच्च शिक्षा, मेडिकल, इंजीनियरी प्रबंधन आदि
व्यवसायिक शिक्षा, प्रौद्धोगिकी एवं तकनीकी शिक्षा तथा इनसे संबद्ध नौकरियां पाने
वालों में सबसे ज्यादा अंग्रेजी जानने वालों का वर्चस्व है. देश की आम जनता हो या
साधारण छात्रों की यहाँ पहुँच ही नहीं है. फ़िर अखिल भारतीय सेवाओं तथा अन्य
नौकरियों पर अंग्रेजी वालों का अधिकार होता है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि,
हम स्वतंत्र तो हो गए हैं, लेकिन आज भी
अंग्रेजी के गुलाम बने हुए हैं. यह सब देखते आज भी बहुत से लोग इस बात को लेकर,
परहेज न करते हुए कहते हैं कि इससे तो अंग्र्रेजी राज क्या बुरा था.? अंग्रेज थे तो
अंग्रेजी भी थी, स्वतंत्रता के बाद गोरे अंग्रेज तो चले गए लेकिन काले यहीं
अंग्रेज छोड़ गए.
हमारा विरोध अंग्र्रेजी भाषा से और न ही किसी अन्य भाषा से, न तो कभी था और न
ही रहा है. हम जितनी भी भाषा के अधिकारी विद्वान बनेंगे, उतना ही हमारा और देश का
भला होगा. लेकिन हमें अपनी मातृभाषा को ही प्रयोग में लाना चाहिए.
चीनी, स्पेनिश, अंग्रेजी, अरबी, रुसी और फ़्र्रेंच ये छः भाषाएँ संयुक्त
राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषाएं हैं. हमारी हिन्दी को अभी तक उसमें स्थान नहीं मिला
है. प्राप्त आंकड़ों के अनुसार चीनी पहली भाषा है जिसके बोलने वाले और समझने वालों
की संख्या लगभग 80 करोड़, हिन्दी 55, स्पेनिश-40,
अरबी-20, रूसी 17, और फ़्रेंच-9 करोड़ के आसपास है. चीनी बोलने और समझने वालों की संख्या यकीनन अधिक है
परन्तु इसका क्षेत्र्र हिन्दी की अपेक्षा
कम है. एक सर्वेक्षण के अनुसार हिन्दी जानने वालों की संख्या सर्वाधिक है. इसके
बाद भी हिन्दी को अपने ही देश में राष्ट्रभाषा होने का आधिकारिक दर्जा प्राप्त
नहीं हुआ है.
आज हिन्दी विश्व के कई देशों में सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग की जा रही
है. कई देश तो ऐसे हैं जहाँ अप्रवासी भारतीयों की संख्या 40% तक से अधिक है जैसे-बांगलादेश, भूटान, नेपाल आदि. कुछ देश
ऐसे हैं जहाँ हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में सीखाया, पढ़ाया जा रहा है, शोध कार्य
हो रहा है. पी.एच.डी की उपाधि तक प्राप्त करने की व्यवस्था है. अमेरिका में भारतीय
मूल के लोगों की संख्या लगभग दो करोड़ है. वहाँ हार्वर्ड, पेन, मिशिगन, येल एवं
अन्य 65 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन
कार्य हो रहा है. सूरीनाम में हिन्दी सहित क्षेत्रीय भाषायें तक बोली जाती है.
जैसे-अवधि, भोजपुरी, मगही, मैथिली इन्हीं के मिश्रण से उपजी भाषा को सूरीनाम
हिन्दी कहा जाता है. पोलैण्ड के बारसा. काकूब, पेनजान एवं अन्य विश्वविद्यालयों
में हिन्दी पढ़ाई जा रही है. रूस और भारत की घनिष्ट मैत्री है. रूस में प्राथमिक
स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी का पठन-पाठन हो रहा है. बल्गारिया में
भी हिन्दी के साथ संस्कृत के अध्ययन केन्द्र उपलब्ध हैं. फ़ीजी में भी हिन्दी बोली,
समझी और जानी जाती है.
इंग्लैण्ड, अमेरिका, दक्षिण अफ़्रीका, कनाड़ा, मलाया, सिंगापुर,, ब्रिटेन,
क्यूबा, कोरिया, मंगोलिया, पोलैण्ड आदि में भी हिन्दी बोली जाती है. ब्रिटेन के
स्कूल ओफ़ ओरियण्टल एण्ड अफ़्रीकन स्टेडीज के माध्यम से हिन्दी को खूब बढ़ावा मिला.
इंग्लैण्ड में अनेक वर्षों से हिन्दी का अध्यापन कार्य चला. प्रवासो टुडॆ एवं
पुरवाई जैसी प्रख्यात साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं. श्रीलंका के तीन
विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है. इंडोनेशिया की भाषा में 18 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं जो कि देवानागरी लिपि में ही
है. मालद्वीप की भाषा भारतीय भाषा के निकट है. थाईलैण्ड में हिन्दी का पठन-पाठन
होता है. इतना ही नहीं, फ़्रांस, इटली, स्वीडन, आस्ट्रिया, नार्वे, डेनमार्क,
स्विटजरलैंड, हालैड, पोलेंण्ड, चैक गणराज्य, जर्मन, रोमानिया, बल्गारिया, हंगरी,
तुर्की, इराक, मिस्त्र, लिविया, संयुक्त अरब अमीरात, दुबई और पाकिस्तान में भी
हिन्दी ने आधिपत्य जमा लिया है. हिन्दी के प्रति बढ़ते इस अनुराग के पीछे उसका
सरल,सहज एवं उदार होना प्रमुख कारण है कि आज यह विश्वपटल पर दृष्टिगोचर हो रहा है.
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ही हिन्दी इस देश में राष्ट्रभाषा का
आधिकारिक स्थान न ले पायी हो, लेकिन वह विश्वभाषा तो बन ही चुकी है.
शुरु से ही हमारे राजनेताओं ने, न सिर्फ़ हिन्दी के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार
किया बल्कि देश में ही दो देश बनाने से भी गुरेज नहीं किया. एक देश में दो
देश, दो संविधान और दो झंडॆ...विश्व में ऐसा होता हुआ, न तो किसी ने सुना है और न
ही कभी हुआ है. संविधान लिखते समय भी चालाकी बरती गई. "इण्डिया दैट इज
भारत" लिखने पर हमने कहीं भी, कभी भी इस बात का विरोध नहीं किया. भला हो इस
वर्तमान सरकार का कि उसने इस कलंक को हटाया. आज एक देश, एक संविधान और एक झंडा
लागु हो गया है. कागजों में भले ही हिन्दी को अपना मुकम्मल स्थान नहीं मिल पाया
हो, लेकिन अब लगता है कि वर्तमान सरकार इस कलंक से भी जल्दी ही मुक्ति दिला देगी.
भला हो कोरोना महामारी के जनक चीन का कि उसने हमें आज स्वदेशी अपनाने का रास्ता
स्वमेव चुनने के लिए बाध्य कर दिया है. "मेक इन इण्डिया" आज हकीकत बनकर
हमारे सामने एक नयी उम्मीद और आशा लेकर आया है. अब हम गर्व से कह सकेंगे कि अमुक
वस्तु इसी भारत देश की बनी हुई है.
जय भारत....जय हिन्दी....
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
7 कब सजेगी हिन्द के माथे पर हिन्दी की बिंदी ?
हिन्दी भाषा हमारा राष्ट्रीय गौरव है. हमारी पहिचान है. हमारा स्वाभिमान है.
हमारी अस्मिता है. यह मात्र एक भाषा भर नहीं हैं. इसमें मिठास है, मिट्टी की सोंधी
खुशबु है. माँ का प्यार है. हमारी आन-बान-शान है. एक जीवन-धारा है. एक सभ्यता है.
हमारा गौरव है. एक जीवन शैली है. विचारों का लहलहाता सागर है. सवेदनाओं की झील है.
हमारा कंठहार है. भागीरथी गंगा है. यह वह भाषा है जो सुदूर कश्मीर से कन्याकुमारी,
अटक से लेकर कटक तक लोगों को एकसूत्र में बांधे हुए है. यह वह भाषा है,जिसमें
हमारे शूरवीर, क्रांतिकारियों ने धूर्त अंग्रेजों को ललकारा था. यह वह भाषा है
जिसमें आजादी के दीवानों ने जोशीले तराने गाए थे.
यह वह भाषा है जिसके माध्यम से देश को सांस्कृतिक एकसूत्रता प्रदान करने की
आवाज बंगाल के राजा राममोहन राय, बंकिमचन्द्र चटर्जी तथा विध्यासागर जैसे दूरदर्शी
नेताओं ने उठाई थी. उधर गुजरात में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आन्दोलन स्वामी
दयानन्द सरस्वती ने आरंभ किया और संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित होते हुए भी सारे
ग्रंथ हिन्दी में लिखे. कालान्तर में महात्मा गांधी हिन्दी आंदोलन के अध्यक्ष बनकर
राष्ट्रभाषा हिन्दी को बल प्रदान किया. यही कार्य गोविन्द रानाडे, तथा गोपाल हरि
देशमुख ने किया. हालांकि पंजाब प्रांत में उर्दू, फ़ारसी का बोलबाला था किन्तु आर्य
समाज की स्थापना के साथ हिन्दी अध्ययन तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार की योजनाएं
बनीं.
जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात जब अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित
किया गया तो स्वागताध्यक्ष के पद से स्वामी श्रद्धानन्दजी ने अपना स्वागत भाषण
हिन्दी में दिया. कांग्रेस के मंच से दिया गया यह प्रथम हिन्दी भाषण था.
१८९३ में काशी में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई. सभा ने जहाँ हिन्दी को
रक्षा और प्रचार का काम, किया, वहीं सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रयोग का समर्थन
किया. महामना मदनमोहन मालवीय जी का सहयोग इस सभा को मिला और संयुक्त प्रान्त के
सरकारी दफ़्तरों में हिन्दी का प्रयोग होने लगा. १९१० में हिन्दी साहित्य सम्मेलन
की स्थापना के साथ ही हिन्दी को राष्ट्रव्यापी प्रचार को बल मिला.
आज विश्व में सर्वाधिक समझी और बोली जाने वाली हिन्दी को महात्मा गांधी,
मदनमोहन मालवीय,नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, डा,राजेन्द्र प्रसाद, राजर्षि टंडन, डा.
राममनोहर लोहिया, सेठ गोविन्ददास जी ने राष्ट्रीय आंदोलन का एक हिस्सा बना दिया
था. परिणाम स्वरूप ही देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना व्याप्त हो गई क्योंकि
वे जानते थे कि अंग्रेजी के माध्यम से कुछ प्रतिशत ही लोगों तक पहुँच सकते थे.
हिन्दी में कबीर, सूर, तुलसीदास, रहीम, रसखान, जयशंकर प्रसाद, निराला, पन्त,
महादेवी वर्मा, मैथिलिशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, मुंशी
प्रेमचन्द आदि अनेक कवियों और लेखकों ने इसे समृद्ध बनाया.
भारत एक अद्भुत देश है, जहाँ बहुजातीय, बहुभाषी और बहुधर्मी मानव-समुदाय
परस्पर मेल-मिलाप और सौहार्द के मिलकर रहते हुए एक गौरवशाली राष्ट्र का निर्माण
करते हैं. इन सबकी मिली-जुली सामाजिक संस्कृति ही भारत की शक्ति है.
भाषा का निर्माण टकसाल में न होकर सड़कों पर होता है, चौपालों में होता है,
गाँव के गलियारों में होता है और उसका शिल्पी देश का आमजन है. भाषा की समृद्धि एवं
संपन्नता जन-जन की भाषा के प्रति सजगकता, सक्रीयता एवं जागरुकता पर निर्भर करती
है. भाषा के विनाश एवं विकास में वही एकमात्र जिम्मेदार होता है. आज वह जिम्मेदारी
खतरे में पड़ी नजर आती है. सबसे पहले मुगलों ने हिन्दी के साथ अन्य भाषाऒं के साथ
संयोग-समन्वय किया. इससे हिन्दी भाषा का विभाजन नहीं हुआ, बल्कि उसकी विविधता में
विकास ही हुआ. हिन्दी में उर्दू और फ़ारसी आदि भाषाऒं का सुन्दर गठजोड़ हुआ. भाषा कई
आयामों में विकसित हुई. विकास के इन मूल कारणॊं को अंग्रेजों की अंग्रेजी ने
कुठाराघात किया और इसे कमजोर करते हुए हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी को प्रतिष्ठित
बनाने का कुचक्र रचा. काफ़ी हद तक यह कुचक्र सफ़ल हुआ,जिसका परिणाम हम सब के सामने
है कि हम हिन्दी से अधिक अंग्रेजी बोलने में गर्व अनुभव करते हैं.
संविधान निर्माताओं ने १४ सितम्बर १९४९ को हिन्दी को राजभाषा घोषित किया.
राजभाषा का आशय था--राजकाज की भाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग. केन्द्र सरकार के
कार्यालयों की भाषा के रूप में हिन्दी को अपनाया जाना. इसे “आफ़िसियल लैंग्वेज” का
नाम दिया गया. अंग्रेजी को सहभाषा बनाते हुए उन्होंने सोचा था कि देश में हिन्दी
का प्रयोग धीरे-धीरे कम करके भारतीय भाषाओं और हिन्दी का प्रयोग होने लगेगा
क्योंकि अंग्रेजी देश को दो हिस्सों में बांटती है. एक वर्ग है जो अपने को आम जनता
से अलग कर अंग्रेजी भक्त होने के कारण स्वयं को खास कहता है. जबकि दूसरा वर्ग
हिन्दी प्रेमी है. वह जानता है कि हिन्दी राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय सम्मान और
राष्ट्रीय एकता का माध्यम है. .
२ जनवरी १९५० को भारत के संपूर्ण जनतंत्रात्मक गणराज्य बनने के साथ ही संघ की
राजभाषा “हिन्दी” तथा लिपि “देवनागरी” घोषित की गई. यह संकल्प लिया गया कि
अंग्रेजी का प्रयोग सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में २६ जनवरी,१९६५ में सिमट
जाएगा. ऎसा नहीं हुआ, हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में अपना स्थान बना नहीं पा सकी.
१९६७ में “राजभाषा संशोधन विधेयक-१९६७” के माध्यम से अंग्रेजी के प्रयोग को
अनिश्चित्काल के लिए बढ़ा दिया गया, जिससे हिन्दी सिर्फ़ राजभाषा विभागों में सिमट
कर रह गई. इससे पहले ७ जून १९५५ श्री
बी.बी.खेर की अध्यक्षता में राजभाषा घोषित किया गया. संविधान सभा के संकल्प के
बावजूद हिन्दी वास्तविक राजकाज की भाषा न बनकर सिर्फ़ “आफ़िशियल लैंगवेज” के दायरे
में सिमट कर रह गयी. खेर आयोग के बाद ही केन्द्रीय हिन्दी समिति
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनी और फ़िर एक और समिति सरकारी प्रयोजनों के लिए
हिन्दी के प्रगामी प्रयोगों से संबंधित मामलों पर भारत सरकार को सलाह देने के लिए
गृहमंत्री की अध्यक्षता में गठित की गई. इसके बाद गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग
के सचिव के अधीन एक और समिति का गठन किया गया. संसद की समितियों की कड़ी में संसदीय
समिति भी गठित की गई. यह सब हिन्दी को राजकाज की भाषा के रूप में बढ़ावा देने के
लिए किया गया. इसके बाद भी हिन्दी राजभाषा के रूप में “हिन्दी दिवस” “हिन्दी
पखवाड़ा” या फ़िर “हिन्दी मास” तक ही सिमटी हुई है
हिन्दी के मूल में अंग्रेजों के कुठाराघात के बाद फ़िर से एक और
प्रहार हो रहा है--भूमंडलीकरण का. भूमंडलीकरण के इस भयावाह दौर में किसी स्वाधीन,
संपन्न और आत्मनिर्भर राष्ट्र में दूसरे देश की भाषा का विकास का पैमाना बने, यह
कैसे स्वीकार्य होगा? यह भी सच है कि विश्व के किसी देश में भाषा की
स्वाधीनता-स्वतंत्रता और उसकी निजता को इतने व्यापक विस्तार और बारीकी से नहीं
लिया गया, जितना हमारे देश में और यह घटना आज भी जारी है.
बाजारवादी व्यवस्था में हिन्दी की अस्मिता, अस्तित्व और निजता के लिए
उत्तरदायी लोगों की अभिरुचि ऎसे गंभीर और बुनियादी सवालों पर नहीं है. वे इस भाषा
को विश्वव्यापी बनाने, वर्तमान समय में अन्य भाषाओं के समान विकसित एवं समृद्ध
करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. वे तात्कालिकता पर इतना अधिक विश्वास
करते हैं कि ये महाप्रश्न उनके लिए बेईमानी और निरर्थक हो गया हैं. उन्हें भाषागत
स्वाभिमान की बात बेकार एवं गैरजरुरी लगती है. इस प्रकार एक ओर जहाँ भाषा का
शिल्पी आमजन निष्क्रिय, निस्तेज है, वहीं दूसरी ओर इसे व्यापक बनाने वाले मूर्धन्य
शिल्पकार घोर उदासीन नजर आते हैं.
बाजारवाद तात्कालिक आवश्यकता को सर्वाधिक अहमियत देता है. वह ऎसी संकर भाषा
निर्मित करता है, जिससे केवल उसका हित संवर्धित हो सके. वह अपने लाभ के लिए आज
हिन्दी भाषा का, जितना सर्वनाश कर सकता है, कर रहा है और इसके प्रति हमारी घोर
उदासीनता ने हमारी पहचान को प्रश्न के घेरों में ला खड़ा कर दिया है. चांदी के चंद
सिक्कों में हम अपनी पहचान खोने लगे हैं. अगर ऎसा नहीं है तो क्या कारण है कि हमें
अपनी हिन्दी एवं अन्य मातृभाषा बोलने में, लिखने में संकोच क्यों होता है?. ऎसा
संकोच तो चीनी रूसी, जर्मन एवं फ़्रांस के लोग नहीं करते, वे अपनी ही भाषा को
प्राथमिकता देते हैं. आँकड़ॊं की ओर नजर डालें तो पता चलता है कि चीनी बोलने वाले
९० करोड़, अंगरेजी बोलने वाले ८० करोड़ और हिन्दी बोलने वाले ७० करोड़ हैं.
मेरिट रलेन जी पुस्तक “ ए गाईड टु दि वर्ल्ड लैंग्वेज” (स्टेनफ़ोर्ड
यूनिवर्सिटी प्रेस,१९८७) के अनुसार अकेले चीन में एक बिलियन लोग मेंडरिन बोलते हैं
और लगभग एक बिलियन ही अंग्रेजी. तीसरे स्थान पर हिन्दी-उर्दू बोलने
वाले चार सौ बिलियन ही हैं. स्पेनिश और रूसी के तीन-तीन सौ मिलियन. चीन की पूरी
आबादी मैंडरिन बोलती है. कुछ भाषाविद चीन के इस सर्वेक्षण को सही नहीं मानते,
क्योंकि शंघाई, कैंटन, फ़ुकीन, हक्का, तिब्बती और तुर्की आदि नगरों में अन्य भाषाएं
भी बोली जाती है. इस प्रकार चीन में ८० प्रतिशत लोग मैंडरिन बोलते हैं.
इस संदर्भ में डा.जयंती प्रसाद नौटियाल का एक सर्वेक्षण महत्त्वपूर्ण है. वे
व्यापक दृष्टिकोण वाले थे. वे उर्दू को भी हिन्दी में शामिल करके देखते थे. इतना
ही नहीं वे विभिन्न प्रदेशों की बोलियों को भी हिन्दी में सम्मिलित मानते थे.
जैसे-ब्रज, अवधी, राजस्थानी आदि, परन्तु यह विषय भाषाविदों के लिए एक चुनौती है.
हिन्दुस्थान में हिन्दी को कैसे परिभाषित किया जाए? यही बड़ी समस्या बन गई है. क्या
ब्रजभाषा, बुंदेली, मगही, भोजपुरी, मैथिली, पंजाबी, गुजराती बोलने वाला हिन्दीभाषी
नहीं है? क्या उर्दू को अलग रखा जाए, जबकि इसकी व्याकरण संरचना एक जैसी है तथा
वाक्य विन्यास समान है. इन भाषाओं के बीच संवाद की समस्या भी नहीं है, ऎसे में
हिन्दी की व्यापकता एवं संकीर्णता दोनों सामने आते है. भाषाविद कहते हैं कि इन
बोलियों के साथ हिन्दी की समृद्धि और एकाकी हिन्दी को खड़ा करना संकीर्णता है. हमें
अपनी भाषा को बोलने में गर्व होना चाहिए. भाषा की श्रेष्ठता तो इसके विचारों में
है.
बाजारवाद के घोर समर्थक एवं पक्षधर अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार एवं विस्तार के
लिए अधिक रुचि दिखाते है, क्योंकि इसी मे उनका लाभ है. तीन प्रतिशत भारतीय जनों के
लिए इतनी सजगता और सतानवे प्रतिशत जनता के लिए इतनी उपेक्षा क्यों?. विदेशी भाषाओं
को सीखने, समझने एवं व्यवहार करने में कोई समस्या नहीं है, परन्तु इन्हें अन्य
भारतीय भाषाओं की तुलना में वरीयता प्रदान करना अत्यंत घातक एवं चिंताजनक है,
अंग्रेजी अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान में संवाद की भूमिका निभाए तो स्वीकार है,
परन्तु इस सिद्धांत एवं मान्यता के विरुद्द भाषाविद कहते हैं कि ऎसा संभव नहीं है.
अंग्रेजी भाषा के बाजारवादी कुचक्र एवं षड़यंत्र से सावधान रहना चाहिए और हमें
हिन्दी का सृजन, अध्ययन एवं प्रसार करना चाहिए. इस भाषा के हमारे देश और जनता के
बीच मधुर संबंधों को फ़िर से उजागर करना चाहिए. हमारी तमाम मौलिकता अंग्रेजी की
चकाचौंध में विनष्ट हो रही है. भाषा सीखनी चाहिए, परंतु प्रतिष्ठा एवं अहंकार के
पोषण के लिए नहीं. हमारी मौलिकता एवं निजता की अभिव्यक्ति हमारी भाषा में निहित
होती है, इसका ध्यान रखना चाहिए.
हिन्दी भाषाई नेतृत्व की आशा-अपेक्षा प्रत्येक भारतीय भाषा के
रचनाकार-साहित्यकार से है. उन्हें तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद इस अहम तथ्य पर
एकमत होना चाहिए. भारतीय भाषा अपनी प्रगतिशील परंपराओं का विकास करे और दूसरी
भारतीय भाषाऒं तथा विश्व की विकसित भाषाओं के साथ जातीय संवाद द्वारा संसार से
अपेक्षित प्रतिष्ठा एवं समृद्धि उपलब्ध करे. इस तथ्य के समर्थन में हिन्दी साहित्य
के शिरोमणी मुंशी प्रेमचंद के शब्द हैं-“ राष्ट्र
की बुनियाद, राष्ट्र की भाषा है. नदी, पहाड़ और समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते. भाषा ही
वह बधंन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रहती है और इसे बिखरने,
विखंडित होने एवं विभाजित होने से रोकती है”.
राष्ट्रभाषा के पुरोधा श्री अरविंद कहते है -किसी
राष्ट्र अथवा मानवीय समुदाय की आत्मा के लिए यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि वह
अपनी भाषा की रक्षा करे और उसे एक सशक्त और सजीव सांस्कृतिक बना ले. जो राष्ट्र,
जाति अथवा जनसमुदाय अपनी भाषा खो देता है, वह अपना सम्पूर्ण एवं सच्चा जीवन व्यतीत
नहीं कर सकता. वह आगे स्पष्ट करते हैं कि भाषा का राष्ट्र के जीवन में महत्त्व है
तथा सामान्य रूप से मानव जाति के लिए भी यह अत्यधिक उपयोगी है.
श्री अरविन्द के अनुसार भाषा जाति के सांस्कृतिक जीवन का प्रतीक एवं चिन्ह है.
उसके एक विचारगत और मनोगत आत्मा का संकेत है, जो उसके पीछे होती है तथा उसकी
कर्मगत आत्मा को समृद्ध बनाती है. वह एक ऎसा बौद्धिक, सौंदर्यात्मक तथा अभिव्यंजक
बंधन है, जो जहाँ विभाजित होता है, वहाँ उसकी शक्ति बढ़ाता है और जहाँ एकता प्राप्त
हो चुकी है, वहीं उसे पुष्टि एवं बल प्रदान करता है. विशेषकर यह राष्ट्रीय और
जातीय एकता को स्वचेतना प्रदान करता है.
सांस्कृतिक प्रतीक चिन्ह हिंदी भाषा की रक्षा हमें करनी होगी और उसके लिए उसकी
अपनी सांस्कृतिक विविधताओं का इस प्रकार नवनिर्माण करना होगा कि उसके प्राचीन
स्वरुप को अधिक तेजस्वी, अधिक घनिष्ट एवं पूर्ण रूप में अभिव्यक्ति दी जा सके. फ़िर
उसे समस्त जगत के ऊपर आरोपित कर देना चाहिए, जैसा कि उसने सुदूर युगों में अधिकार
किया था अथवा कम से कम प्रकाश प्रदान किया था. आज हिन्दी भाषा को ऎसा नूतन स्वरूप
उपलब्ध कराना है, जिसके विराट एवं व्यापक अंतस्थल में सभी भाषाएं समा जाएं, पर
विनष्ट न हों, बल्कि पुष्ट एवं विकसित हों. भाषा के प्रति ऎसी सुरक्षा एवं समर्पण
हो कि किसी भी प्रकार का कुचक्र एवं षड्यंत्र काम न कर सके. ऎसे समर्पण से हम
अपनी मातृभाषा की रक्षा एवं विकास कर सकेंगे, जिसके विकास में राष्ट्र, जाति एवं
संस्कृति का भविष्य़ निर्भर है.
आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि कभी वह समय था जब देश में अंग्रेजों के प्रति
नफ़रत का भाव आलोढ़न ले रहा था, उन्हें देश से निकाल बाहर करने के लिए आंदोलन पर
आंदोलन किए जा रहे थे. अंग्रेज तो खैर चले गए लेकिन अंग्रेजी छॊड़ गए. यह बात समझ
से परे है कि अंग्रेजों के प्रति नफ़रत और उनकी भाषा के प्रति इतना लगाव आखिर
क्यों?. आज हिन्दी न सिर्फ़ भारत में, वरन विश्व के कोने-कोने में बड़ी संख्या में
बोली जा रही है. इतना ही नहीं विश्व के लगभग १५५ देशों केविश्वविध्यालयों में पढ़ाई
भी जा रही है. इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि हिन्दी आज भारत की राष्ट्रभाषा भले
ही नहीं बन पायी,लेकिन विश्वभाषा जरुर बन गयी है
इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. यदि सरकार
हिन्दी को प्रोत्साहित करेगी तथा सभी विभाग व संस्थान हिन्दी में काम करने में
हिचकेगी नहीं तो बाकी के लोग भी हिन्दी को अपनाने में झिझक महसूस नहीं करेंगे.
हिन्दी दिवस पर केवल लंबे-चौड़े भाषण झाड़ना पर्याप्त नहीं होगा. इस दिशा में
गंभारता से कुछ कर दिखाने की जरुरत है. हिन्दी को विज्ञान व तकनीक की भाषा बनाने
के लिए ठॊस कदम उठाए जाने चाहिए. हिन्दी अपनाने वाले लोगों को तथा सरकारी
कर्मचरियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. मातृभाषा में शिक्षा देने वाले स्कूलों
को विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए और हिन्दी को दलगत राजनीति का मुद्दा न बनाकर देश
की गरिमा के तौर पर उभारा जाए तो हिन्दी को राष्ट्र की बिंदी बनते देर नहीं लगेगी.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
8 कहानी पोस्टकार्ड की
डाक का महत्व प्राचीन काल
से ही रहा है. उस समय एक राजा दूसरे राज्य के राजा तक अपना संदेश एक विशेष व्यक्ति
जिसे दूत कहा जाता था, के माध्यम से भेजते थे. उन दूतों को राज्य की ओर से
सुरक्षा तथा सम्मान प्रदान किया जाता था. महाकाव्य रामायण तथा महाभारत में कई
प्रसंगों में संदेश भेजे जाने का उल्लेख प्राप्त होता है. राजा जनक ने अपनी पुत्री
सीता और राम के विवाह होने का संदेश राम के पिता दशरथ को भिजवाया था. रावण की
राजसभा में श्रीराम का सन्देश लेकर अंगद का जाना, इस बात का प्रमाण है.. महाभारत
में श्रीकृष्ण का कौरवों के लिए पांच गांव मांगने जाना तथा अनेक राज्यों में
पांडवों तथा कौरवॊं के पक्ष में, युद्ध में भाग लेने के लिए संदेश पहुँचाना, जैसी
कोई डाक व्यवस्था उस समय काम कर रही होगी.
अन्य प्रसंगों में राजा नल द्वारा दमयन्ती के बीच सन्देशों का आदान-प्रदान हंस
द्वारा होने का वर्णण आता है. महाकवि कालीदास के मेघदूत में दक्ष अपनी
प्रेमिका के पास मेघों के माध्यम से सन्देश पहुँचाते थे. एक प्रेमी राजकुमार अपनी
प्रेमिका को कबूतरों द्वारा पत्र पहुँचाते थे. खुदाई के दौरान कुछ ऐसी महत्वपूर्ण
जानकारियां मिली हैं कि मिस्र, यूनान एवं चीन में डाक व्यवस्था थी. सिकन्दर महान
ने भारत से यूनान तक संचार व्यवस्था बनाई थी, जिससे उसका संपर्क यूनान तक रहता था.
अनेक राजा-महाराजा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश पहुंचाने के लिए द्रुतगति से
दौडने वाले घोडॊं का प्रयोग किया करते थे.
यह सब कालान्तर की बातें तो है ही, साथ ही रोचक भी है. इसका प्रयोग केवल उच्च
वर्ग तक ही सीमित था. साधारण जन इससे कोसों दूर था. बाद मे कई प्रयास किए गए और
डाक व्यवस्था में निरन्तर सुधार आता गया और आज यह व्यवस्था आम हो गई है. १ अक्टूबर सन १८५४ को पहला भारतीय डाक टिकिट जारी किया गया था. उस समय तक
पोस्टकार्ड की कल्पना भी नहीं की गई थी. सन १८६९ में आस्ट्रिया के डाक्टर इमानुएल
हरमान ने पत्राचार के एक सस्ते साधन के रुप में पोस्टकार्ड की कल्पना की थी. भारत
में पहली बार १ जुलाई १८७९ को पोस्टकार्ड जारी किए गये. जिसकी डिजाइन और छपाई का
कार्य मेसर्स थामस डी.ला.रयू. एण्ड कंपनी लंदन ने किया था. उसके दो मूल्य वर्ग थे. एक पैसा( उस समय एक आने में
चार पैसे हुआ करते थे) मुल्य का कार्ड अन्तरदेशीय प्रयोग के लिए था और देढ-आना
वाला कार्ड ,उन देशों के लिए था जो “अंतरराष्ट्रीय डाक संघ” से संबद्ध थे.
पहले पोस्टकार्ड मध्यम हलके भूरे से रंग में छपे थे. एक पैसे वाले कार्ड पर “
ईस्ट इण्डिया पोस्टकार्ड” छपा था. बीच में ग्रेट ब्रिटेन का राज चिन्ह मुद्रित था
और ऊपर की तरफ़ दाएं कोने मे लाल-भूरे रंग में छपी ताज पहने साम्राज्ञी विक्टोरिया”
की मुखाकृति थी. विदेशी पोस्टकार्ड में ऊपर अंग्रेजी और फ़्रेंच भाषाओं में”
यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन” अंकित था. इसके नीचे दो पंक्तियों में अंग्रेजी में
क्रमशः “ब्रिटिश इण्डिया” और” पोस्टकार्ड” और इसका फ़्रेंच रुपान्तर तथा इन दोनों
के बीच में ब्रिटेन का राजचिन्ह मुद्रित था एवं ऊपर दाहिने कोने पर टिकिट होता था.
टिकिट और लेख नीले रंग में थे. दोनों ही प्रकार के कार्डॊ में अंग्रेजी में” दि
एड्रेस ओनली टु बी रिटेन दिस साईड” छपा था. पोस्टकार्ड में कई परिवर्तन हुए. १८९९ में “ईस्ट” शब्द हटा दिया गया और उसके
स्थान पर “ इण्डिया पोस्ट कार्ड” मुद्रित होने लगा.
दिल्ली के सम्राट जार्ज पंचम के राज्याभिषॆक की स्मृति में सन १९११ में
केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों ने सरकारी प्रयोग के लिए विशेष पोस्टकार्ड जारी
किए थे. इन पर “ पोस्टकार्ड” शब्द मुद्रित था,परन्तु टिकिट का कोई चिन्ह अंकित
नहीं था. इन पर “ताज” और “ जी.आर.आई” मोनोग्राम सुनहरे रंग में और दिल्ली तथा
विभिन्न प्रांतों के बीच के प्रतीक-चिन्ह ,भिन्न-भिन्न रंगों से इम्बासिंग पद्धति
से मुद्रित थे.
स्वतंत्रता के बाद चटकीले हरे रंग में “त्रिमूर्ति” की नयी डिजाइन के टिकिट
वाला प्रथम पोस्टकार्ड ७ दिसम्बर १९४९ को जारी किया गया था. सन १९५० में कम डाक
दर( ६ पाई) के स्थानीय़ पोस्टकार्ड जारी किए गए, जिन पर कोणार्क के घोडॆ की प्रतिमा
पर आधारित टिकिट की डिजाइन चाकलेट रंग में छपी थी. २ अक्टूबर १९५१ को तीन चित्र पोस्ट्कार्डॊं की
एक श्र्रृंखला जारी की गई,जिसमें एक पर बच्चे को लिए हुए गांधीजी, दूसरे पर चर्खा
चलाते हुए गांधीजी और तीसरे पर कस्तूरबा गांधी के साथ गांधीजी का चित्र अंकन था. २
अक्टूबर १९६९ को गांधी शताब्दी के उपलक्ष में तीन पोस्टकार्डॊं की दूसरी श्रृंखला
निकाली गई, जिसमें गांधीजी और गांधीजी की मुखाकृति अंकित थी.
जबसे पोस्टकार्डॊं का प्रचलन हुआ है, तभी से जनता के पत्र-व्यवहार का माध्यम
ये पोस्ट्कार्ड रहे हैं. हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ये काफ़ी
लोकप्रिय है. इस समय प्रतिवर्ष अरबों की संख्या में पोस्टकार्ड देश के एक छोर से
दूसरे छोर तक, देशवासियों को भातृत्व के बंधन में बांधने का कार्य करते हैं.
9.
गुरुओं की
पावन परम्परा को याद करते हुए.
गुरु श्री गोविन्द सिंह जी. ( २२ दिसंबर
१६६६- ७ अक्टुबर १७०८)
इस
निर्दयस्त समय में जहाँ स्वार्थ और लोलुपता की आंधिंयाँ चल रही हो, जहाँ गलाकाट
स्पर्धाएँ चल रही हों, सिर्फ़ धन बटॊरने के लिए नित नए फ़ंडॆ ईजाद किए जा रहे हों,
जहाँ आचार-विचार और परंपराओं की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, जहाँ आदमी के
संवेदना-जगत को क्षत-विक्षत करते हुए उसे खण्डहर में तब्दील किया जा रहा हो, जहाँ
खुदगर्जी, फ़रेब और औपचारिकता ही आदमी की पहचान बनती जा रही हो, जहाँ आदमी के जीवन
के शाश्वत मूल्यों की जमीन लगातार छॊटी होती जा रही हो. शब्द- रूप, रस तथा गंध के
संवेदनों, भावभूमि के मूल्यवर्ती अहसासों और क्रिया-कलापॊं से वह लगातार अजनबी
बनता जा रहा हो. ऎसे कठिन समय में एक प्रश्न उठना लाजमी है कि इनसान कैसे बचे,
इन्सानियत कैसे बचे और यह देश कैसे बचे?
हम
कभी इतिहास के पन्ने नहीं पलटते. इसे पलटना और सबक लेना हमने कभी जरुरी भी नहीं
समझा. यदि जरुरी समझा गया होता तो फ़िर हमारे झंडॆ-डंडॆ अलग नहीं होते, जाति-पांति
की विष-बेल न उगी होती, मत-मतान्तर नहीं होते, विचार धाराएँ अलग-अलग नहीं होती,
आपस में विद्वेश नहीं होता. ऊँच-नीच की दीवारें न होती.
हम भूल जाते हैं कि आपस की जलन-कुढन के चलते सगा
भाई अपने भाई के विरुद्ध तलवार उठा लेता है और अपना ही घर आततायियों की मदद से
जलाकर राख कर देता हैं. आपस की बैर के चलते हमने बड़े-बड़े राजघरानों को बरबाद होते
सुना है. राना सांगा बावन घाव झेलने के बाद ही पूरे मरुथल में दौड़ लगाते रहे, चेताते
रहे कि इन दुश्मनों को अपने स्वार्थ के लिए पनाह मत दो, इन्हें आमंत्रण नही दो.
सभी जानते हैं कि आखिर हुआ क्या? इस देश के लुटेरों ने भारत को कई घाव दिए, जमकर
लूटा, नगर की नगर जला दिए. हजारों की संख्या में नागरिक हलाक हुए. कितनी ही
महिलाऒं ने दुशमन के हाथ नहीं आने की पीड़ा के चलते अपने को अग्नि के हवाले कर
दिया. काश हमारे उस समय के तथाकथित राजा-महाराजा, क्षत्रप उस बात को समझ
पाते. केवल एक ही उदाहरण पर्याप्त है कि
शक्तिसिंह ने राणा प्रताप के विरुद्ध अकबर से मिलकर पूरे मेवाड़ की धरती को कलंकित
किया. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक यही सब निर्बाध गति से
चलता रहा. यह मात्रा एक कहानी भर नहीं है. सारा पक्का चिठ्ठा इतिहास के पन्नों में
दर्ज है, जो हमारी बेवकूफ़ियों को विस्तार के साथ दर्ज किए हुए है.
धन्य
वे वे शूरवीर, वे महात्मा जिन्होंने इस पवित्र माटी में जन्म लिया और देश के पैरों
में पड़ी गुलामी की जंजीरों को काट फ़ेंका. यह सब तो हुआ लेकिन इनकी कुर्बानी, इनकी
शहादत को जैसे भूला ही दिया गया है. आज हालात जस की तस है. सभी राजनैतिक पार्टियाँ
दल की दलदल में फ़ंसी केवल और केवल कुर्सी की लड़ाई में मशगूल हैं. उन्हें न तो देश
की परवाह है और न ही अपने जन-धन की. आज भी वही इतिहास लगभग दुहराया जा रहा है और
अपना पड़ौसी आँखें दिखा रहा है. इतना सब कुछ होने के बाद भी हम केवल और केवल
दोषारोपण करने में मग्न हैं. दूसरों के खोट ढूंढने में लगे हैं.
यह
वह समय है जब हमें अपने इतिहास को, अपने उन पूर्वजों को, जो देश के लिए जन्में,
देश के लिए मर मिटे, जिन्होंने अपना सुख-चैन, अपना परिवार इस देश की खातिर कुर्बान
कर दिया. आज हमें फ़िर से उस इतिहास की ओर मुड़ना है, जहाँ हमारी सारी बेवकूफ़ियाँ,
नादानियाँ, कमजोरियाँ दर्ज पड़ी हैं जिनके चलते हमें और देश को गुलामी की भट्टी में
जलना पड़ा था.
गुरुओं
की पावन परमपरा हमारे देश की प्राचीन समय से रही है. गुरू सदा से ही अपने आपको
ईश्वर में लीन रखता है. उसी तप के चलते वे सिद्धियां प्रप्त करते हैं और
दीन-दुखियों पर ही अपनी कृपा नहीं बरसाते, बल्कि वे सामान्य से सामान्य जन को भी
भक्ति का मार्ग बतलाते हैं, भटके हुए को रास्ता बतलाते हैं, उनका दुख दूर करते हैं
और जरुरत पड़ने पर शास्त्र की जगह शस्त्र भी उठाने पर गुरहेज नहीं करते.
आज
इसी क्रम में आज गुरू गोविन्दसिंह जी को याद कर रहे हैं. याद कर रहे हैं
उनकी कुर्बानियों को, उनके देश प्रेम को. धरती माँ के उस महान बलिदानी को याद कर
रहे हैं अतीत में छिपे उन षड़यंत्रों को, जिनके चलते उन्हें न जाने कितने शारीरिक
और मानसिक आघातों को सहना पड़ा था.
सिखों
के दसवें गुरू गोविन्दसिंह जी का जन्म बिहार के पटना शहर में सन २२ दिसम्बर १६६६
में नौवें गुरू तेगबहादुर और माता गुजरी के घर हुआ था. उस समय आपके पिता असम में
धर्मोपदेश के लिए गए हुए थे. उन्होंने अपनी माताजी से संस्कार पाए और कम उम्र में
ही फ़ारसी, संस्कृत, उर्दू की शिक्षा ग्रहण कर ली और एक कुशल योद्धा बनने के लिए
बचपन से मार्शल कौशल भी सीख लिया था.
मात्र
ग्यारह साल की उम्र में ही आपका विवाह सुन्दरी जी के साथ हुआ था. इनके चार सुपुत्र
श्री अजीत सिंहजी, जुझारसिंहजी, जोरावरसिंहजी और फ़तेहसिंहजी. थे. अपने पिता के
समान ही वे चारों पुत्र बड़े होनहार और शूरवीर थे.
गुरू
गोविन्दसिंहजी अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की तरह ही महान बलिदानी, लेखक, मौलिक चिंतक
और अनेकों भाषाओं के ज्ञाता थे. उन्होंने कई धार्मिक ग्रंथों की रचनाएँ की. यही
कारण था कि वे “संत सिपाही” भी कहलाए.
उन्होंने
मुगलों के विरुद्ध चौदह धर्म युद्ध लड़े और धर्म के खातिर ही उन्होंने अपने समस्त
परिवार का बलिदान कर दिया. इसलिए वे “सरबंसदानी” भी कहलाए. जीवन में आए
अनेकों उतार-चढ़ाव के बाद, अनेकों युद्ध में विजयी होने के बाद बिलासपुर की विधवा
रानी के अनुरोध पर आनंदपुर चले आए. सन १६९५ में दिलावर खान ने अपने बेटे हुसैन खान
को आनन्दपुर पर हमला करने के लिए भेजा. भीषण युद्ध हुआ जिसमें मुगल सेना हार गई और
हुसैन खान मारा गया. अपनी हार से बौखलाए दिलावर खान ने फ़िर से शिवालिक पर घेरा
डाला. इस बार मुगल सम्राट औरंगजेब ने सेना की अगुवाई के लिए अपने बेटे को आगे
किया.
मुगलों
के विरुद्ध लड़ते-लड़ते वह एक क्रूर दिन भी उनके जीवन में आया जब उनके दो बेटे चमकौर
के युद्ध में शहीद हो गए और दो बेटॊं को जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया गया. इतनी
घनघोर मानसिक पीड़ा को झेलने के पश्चात भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और धर्म की
स्थापना के लिए धर्मयुद्ध लड़ते रहे.
आपने अपने जीवन में
कई ग्रन्थ लिखे. यथा- चण्डी चरित्र, दशमग्रन्थ, कृष्णावतार, गीत गोविन्द, प्रेम
प्रबोध, जाप साहब, अकाल उस्तुता, चौबीस अवतार, गुरू ग्रंथ साहिब तथा विचित्र नाटक
आदि.
वे भविष्य के गर्भ में भी झांक कर देख सकने में
समर्थ थे. वे जानते थे कि “गुरू” जैसे पवित्र नाम पर भविष्य में तकरार हो सकती है.
इस पद को पाने के लिए षड़यंत्र भी रचे जा सकते हैं. उन्होंने अपने लिखित ग्रंथ “
गुरू ग्रंथ साहिब” को गुरू का दर्जा देते हुए उपदेश दिया कि आज के बाद इसे ही
गुरू माना जाए. उन्होंने पंच प्यारा बनाकर गुरू का दर्जा देते हुए स्वंय उनके
शिष्य बन गए. उनकी इस उदारता की मिसाल शायद ही कहीं देखने-पढ़ने को मिलेगी.
उन्होंने अपने अनुयायियों को युद्ध की स्थिति में सदैव बने रहने के लिए पांच करार
अनिवार्य करवाए. इन पाँचों करार को अपनाते हुए हर सिख भाई अपने को गौरवान्वित
महसूस करता है. वे पाँच करार इस प्रकार से हैं.
(१)
केश रखना- ऋषि-मुनियों की परम्परा को आगे
बढ़ाने के लिए केश काटन वर्जित किया.
(२)
कंघा- बाल हमेशा साफ़-सुथरे रहें. अतः कंघी का
होना अनिवार्य था.
(३)
कच्छा पहनना- इसे पहने से शरीर में स्फ़ुर्ति
बनी रहती है.
(४)
कड़ा- कड़ा जिसे दाएँ हाथ में पहना जाता है. यह
हर हमेशा नजरों के सामने बना रहता है. इसके दर्शन मात्र से नियमबद्ध बने रहने और
संयमित जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त होती है.
(५)
कृपाण- तलवार से लगभग आधा अथवा थोड़ा छॊटा
हथियार जिसे कृपान कहा जाता है. अपनी आत्मरक्षा के लिए हर सिख अपनी कमर में धारण
किए रहता है.
उनके
मन में कभी भी जाति-पात को लेकर संकीर्ण विचार नहीं रहे. उनकी नजरों में सभी ईश्वर
की संतान थे. अतः उन्हें बराबरी का हक है.
इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जिन पाँच लोगों को “पंच प्यारे”
चुना गया, वे सभी अलग-अलग समाज के, अलग-अलग जाति के लोग थे. उन्होंने सभी को
“अमृत” का पा कराया और धर्म के रास्ते पर चलने का मंत्र दिया. इस प्रकार उन्होंने
समाज में एक ऎसी क्रान्ति का सूत्रपात किया जिससे जाति भेद मिट सकता था. इन्हीं
शुद्धतम विचारों से ओतप्रोत गुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की.
खालसा शब्द का अर्थ भी हमें समझना होगा. खालसा
याने एकदम
निर्मल, विशुद्ध, मन-मस्तिस्क और विचारों में समानता की भावना या कहें बिना किसी मिलावट
का विचार रखने वाला- और मर्यादाओं का ध्यान रखने वाला. ईश्वर में विश्वास और धर्म
के प्रति आस्थावान व्यक्ति, धर्म और मानवता के रक्षार्थ अपना जीवन कुर्बान कर देने
वाला व्यक्ति ही खालसा हो सकता है. सन १६९९ में बैसाखी के दिन आपने खासला पंथ की
स्थापना की थी.
बैसाख का वह पवित्र
दिन होता है जिस दिन से फ़सल की कटाई प्रारंभ होती है. देश के दूसरे हिस्सों में आज
ही के दिन फ़सल कटाई का त्योहार मनाने की प्रथा रही है, भले ही उसे अलग-अलग नामों
से जाता रहा हो.
२२ दिसम्बर सन १६६६
ई. को इस महान आत्मा ने अपने को ईश्वर में विलीन कर दिया. धन्य है भारतवर्ष कि इस
पवित्र धरती पर एक महा-मानव ने जन्म लेकर धर्म की स्थापना की और संसार की समस्त
मानव जाति को नेक-नियति के रास्ते पर चलने का मार्ग दिखाया.
गुरु गोविन्दसिंहजी
सिख धर्म के आन्तिम दसवें गुरु थे. उनसे पहले नौ गुरु हुए, जिनके बारे में हम
संक्षिप्त में जानकारियां लेते चलें.
प्रथम गुरु नानक देव जी
जन्म तिथि गुरु बनने की तिथि निर्वाण की तिथि कुल वर्ष जीवित रहे. -------------------------------------------------------------------------------------------------------
१५ अप्रैल १४६९ २० अगस्त १५०७ २२
सितंबर १५३९ ६९ ----------------------------------------------------------------------------------------------------------
२.
दूसरे गुरु अंगद देव जी.
३१ मार्च १५०४ ७ सितंबर १५३९ २९ मार्च १५५२ ४८
३.
तीसरे गुरु अमर दास जी
५ मई १४७९ २६ मार्च १५५२ १ सितंबर १५७४ ९५
४.
चौथे गुरु रामदास जी.
२४ सितंबर १५३४ १
सितंबर १५७४ १ सितंबर १५८१ ४६
५.
पांचवें गुरु अर्जुन देव जी.
१५ अप्रैल १५६३ १ सितंबर १५८१ ३० मई १६०६ ४३
६.
छटवें गुरु हर गोविन्द सिंह जी.
१९ जून १५९५ २५ मई १६०६ २८ फ़रवरी १६४४ ४८
७
सातवें गुरु हर राय जी
१६ जनवरी १६३० ३ मई १६४४ ६ अक्टूबर १६६१ ३१
८
आठवें गुरु हर किशन साहिब जी
७ जुलाई १६५६ ६
अक्टूबर १६६१ ३० मार्च १६६४ ७
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
९.
नौवें गुरु तेग बहादुर जी.
१ अप्रैल १६२१ २० मार्च १६६५ ११ नवंबर १६७५ ५४

10.
चिट्ठियाँ बांटने वाला डाग (कुत्ता) “ओने”
अमेरिका में घटित यह घटना सन 1888 की है, जब शरद ऋतु में पूरा अमेरिका ठंड में कांप रहा था.
एक दोगली नस्ल का छोटा-सा कुत्ता सर्दी में ठिठुरता-कांपता न्यूयार्क के अलवाने
डाकखाने में घुस आया. बेचारा भूख के मारे हड्डियों का पिंजर बन कर रह गया था.
डाककर्मियों को उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे डाक के थैलों के ढेर में जगह दे
दी. थैलों के बीच रहने से उसका शरीर थोड़ा गरमाया. अब वह आराम से सो सकता था. एक
भरपूर नींद निकालने के बाद जब वह जागा, तो डाक-कर्मियों ने उसके लिए भोजन की
व्यवस्था पहले ही कर रखी थी. कुत्ते ने जी भर के खाया और फ़िर स्नेहवश वह अपनी पूंछ
हिलाने लगा. चुंकि वह एक लावारिश कुत्ता था इसलिए डाकखाने वालों ने संयुक्त रूप से
इसे अपने संरक्षण में ले लिया और उसका छॊटा सा नाम “ओने” रख दिया.
आराम और अच्छा भोजन पाकर “ओने” का स्वास्थ्य सुधर गया. वह
डाकखाने के वातावरण में रहता था, जहां हर समय डाक के थैले आते-जाते रहते.
डाकगाड़ियों का आगमन भी जारी रहता और डाकिए इधर-उधर घूमते रहते. “ओने” ने बहुत
जल्दी समझ लिया कि अब उसे क्या काम करना चाहिए. वह डाकियों के पीछे-पीछे जाने लगा.
कुछ ही दिनों में उसे अपने इलाके के प्रत्येक मकान का पता याद हो गया. क्लर्कों ने
भांप लिया कि कुत्ता असाधारण रूप से बुद्धिमान है. उन्होंने उससे डाकिए का काम
लेना शुरू कर दिया. उसकी पीठ पर डाक का थैला बांध दिया जाता और फ़िर वह पूरे इलाके
का चक्कर लगाता. हर मकान और दुकान पर जाता. लोग थैले में से अपने-अपने पत्र छांटकर
निकाल लेते और कुत्ते को प्यार से थपकी देते.
एक दिन ओने गटरमस्ती के लिए डाकखाने के बाहर निकला और
स्टेशन की ओर गया, तो वहां उसने रेलगाड़ी में लगी लालरंग की डाक-कार को पहचान लिया.
डाक-कार न्यूयार्क की ओर जाने के लिए तैयार खड़ी थी. ओने के जी में आया कि आज इस
गाड़ी में सैर करनी चाहिए. यह उसकी पहली यात्रा थी. फ़िर जीवन के सत्रह वर्षों में
उसने कई लंबी-लंबी यात्राएं की,बल्कि यूं कहिए कि लगभग पूरी दुनिया भर में घूमा.
ऎसा सौभाग्य उससे पहले किसी कुत्ते को नसीब नहीं हुआ था.
डाकगाड़ियां अमरीका में जहां तक जाती थीं, उन सब पर उसने
बारी-बारी से यात्राएं कीं. इस आशंका से कि कहीं वह खो न जाए, अलबाने के
डाक-कर्मियों ने उसके गले में एक खूबसूरत-सा पट्टा बांध कर एक पीतल का तगमा लगा
दिया, जिस पर ओने का नाम और पूरा पता अंकित था.
कुत्ते की आश्चर्यजनक सूझ-बूझ, डाकखाने और रेलवे के आदमियों के
लिए हैरानी का कारण थी. कुत्ता उनमें से प्रत्येक की न केवल शक्ल पहचानता था,बल्कि
उनके नामों से भी परिचित था.
एक दिन वह तीकोमा (वाशिंगटन) में घूमते-घूमते समुद्र के तट
पर जा निकला. उस समय वहां भाप से चलने वाला एक छॊटा-सा पोत विक्टोरिया
जापान की यात्रा पर जाने के लिए तैयार खड़ा था. बंदरगाह पर जहाज के मल्लाहों ने
कुत्ते को तत्काल पहचान लिया, क्योंकि वह अपने तगमें और रंग-बिरंगी पेटियों के
कारण फ़ौरन पहचान लिया जाता था. बस, उसे जहाज पर सवार कर लिया गया. जहाज जब
याकोहामा पहुंचा, तो ओने की ख्याति उससे पहले ही वहां पहुंच चुकी थी. बंदरगाह पर
जापानियों ने उसका स्वागत किया. यहां तक कि जापान के सम्राट ने स्वयं उसके लिए
शाही सम्मान के साथ पासपोर्ट जारी किया और उसे सरकारी अतिथि की तरह रखा गया.
उन दिनों सानफ़्रांसिस्को में एक डाक-तार परिषद हुई, जिसमें
डाक-विभाग के उच्चाधिकारी सम्मिलित हुए. उसमें ओने को विशेष अतिथि के रूप में
आमंत्रित किया गया. उसकी उम्र ज्यों-ज्यों अधिक होती गई, उसमे चिड़चिड़ापन बढ़ता गया.
लोग उससे दूर-दूर रहने लगे, क्योंकि वह अब काट खाने के दौड़ता था. ओने की दिमागी
हालत ठीक करने के लिए बहुत प्रयत्न किए गए, पर शायद उसका समय पूरा हो चुका था.
एक दिन टुलेडो में उसने एक पोस्टल क्लर्क को काट लिया.
पोस्टमास्टर ने पुलिस को सूचना दी कि इस खूंखार कुत्ते से छूटकारा दिलाया जाए.
आखिर निश्चय किया गया कि उसे गोली मार दी जाए. अन्य कोई उपाय न था. इसलिए दूसरे
दिन एक पुलिस-अफ़सर ने अपनी पेटी से पिस्तौल निकाली. उसमें गोली भरी. ओने के सिर पर
निशाना लिया और फ़ायर कर दिया. कुछ ही मिनट में अमेरिका का लोकप्रिय कुत्ता इस
संसार से बिदा हो गया. मरते समय उसकी उम्र लगभग सत्रह साल की थी.
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
11 लोक साहित्य में पर्यावरण चेतना.
(
गोवर्धन यादव ) .
लोकसाहित्य पढने-लिखने में एक शब्द है, पर वह वस्तुतः यह दो गहरे भावों का
गठबंधन है. “लोक” और “साहित्य”एक दूसरे के संपूरक, एक दूसरे में संश्लिष्ट. जहाँ
लोक होगा, वहाँ उसकी संस्कृति और साहित्य होगा. विश्व में कोई भी ऎसा स्थान नहीं
है, जहां लोक हो और वहां उसकी संस्कृति न हो.
मानव
मन के उद्गारों व उसकी सूक्ष्मतम अनुभूतियॊं का सजीव चित्रण यदि कहीं मिलता है तो
वह लोक साहित्य में ही मिलता है. यदि हम लोकसाहित्य को जीवन का दर्पण कहें तो कोई
अतिश्योक्ति नहीं होगी. लोक सहित्य के इस महत्व को समझा जा सकता है कि लोककथा को
लोक साहित्य का जनक माना जाता है और लोकगीत को काव्य की जननी. लोक साहित्य मे
कल्पना प्रधान साहित्य की अपेक्षा लोकजीवन का यथार्थ सहज ही देखने में मिलता है.
लोकसाहित्य हम धरतीवासियों का साहित्य है, क्योंकि हम सदैव ही अपनी
मिट्टी, जलवायु तथा सांस्कृतिक संवेदना से जुडे रहते हैं. अतः हमें जो भी उपलब्ध
होता है वह गहन अनुभूतियों तथा अभावॊं के कटु सत्यों पर आधारित होता है, जिसकी
छाया में वह पलता और विकसित होता है. इसीलिए लोक साहित्य हमारी सभ्यता का संरक्षक
भी है. साहित्य
का केन्द्र लोकमंगल है. इसका पूरा ताना- बाना लोकहित के आधार पर खडा है. किसी भी
देश अथवा युग का साहित्यकार इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकता. जहाँ अनिष्ठ की
कामना है,वहाँ साहित्य नहीं हो सकता. वह तो प्रकृति की तरह ही सर्वजनहिताय की
भावना से आगे बढता है.
संत शिरोमणि तुलसीदास की ये पंक्तियां” कीरत भनित भूरिमल सोई-सुरसरि के सम
सब कह हित होई” अमरत्व लिए हुए है. गंगा की तरह ही साहित्य भी सभी का हित सोचता
है. वह गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमय है, वह धरती को जीवन देता है...श्रृंगांर
देता है और सार्थकता भी. प्रकृति साहित्य की आत्मा है. वह अपनी मिट्टी से, अपनी
जमीन से जुडा रहना भी साहित्य की अनिवार्यता समझता है. मिट्टी में सारे रचनाकर्म
का” अमृतवास´ रहता है. रचनाकर उसे नए-नए रुप देकर रुपायित करता है. गुरु-शिष्य
परम्परा हमें प्रकृति के उपादानॊं के नजदीक ले आती है. जहाँ कबीर का कथन प्रासंगिक
है-´गुरु कुम्हार सिख कुंभ गढी-गढी काठै खोट- अन्तर हाथ सहार दे बाहर वाहे खोट”
संस्कारों से दीक्षित व्यक्ति सभी प्रकार के दोषॊं-खोटॊं से मुक्त रहता है. इसमें
लोकहित की भावना समाहित है. मलूकदास भी इन्सानियत की परिभाषा अपने शब्दों में यूं
देते हैं-“मलुका सोई पीर है,जो जाने पर पीर-जो पर पीर न जानई,सो काफ़िर बेपीर.”
दूसरों की पीडा समझने वाला इन्सान पशु-पक्षी का भी अहित नहीं सोच सकता. उसे
वनस्पति के प्रति मैत्री का वह विस्तार साहित्य ही तो है.
जिज्ञासु
व्यक्ति कुछ न कुछ सोचने की चेष्टा करता है. इस प्रकृति के सहचर्य से उसने बहुत
कुछ सीखा है. उस काल के वेदज्ञ ब्राहमण चौदह विद्दाओं का अध्ययन करना अपना अभीष्ठ मानते थे. सोलह कलाओं और चौदह विधाओं के अलावा
वे संगीत, सामुद्रिक, ज्योतिषि, वेदाध्ययन काव्य, भाषाशास्त्र, पशुभाषा ज्ञान,
तैरना,धातु विज्ञान, रसायन, रत्न परख, चातुर्य एवं अंग विज्ञान आदि अनेक विषयों
में गहरी रूचियाँ रखते थे.इस बात के साक्षी है पुरातन भारतीय- ग्रंथ जो समय की
सीमा को पार कर चुके हैं .मनुष्य के संचित ज्ञान और अनुभव के पहले पुस्तकाकार
स्वरुप की याद आते ही दृष्टि स्वमेव ही वेदों की ओर चली जाती है. वेद वे वाड.मय जो
ज्ञान कोष के रुप में सदियों से हमारा साथ देते आए हैं. ऋगवेद को सृष्टि विज्ञान
की प्रथम पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है. जल, अग्नि, वायु, मृदा, चारों वेदों की
रचना के पीछे ये ही तत्व प्रमुख रुप से काम करते हैं. ऋगवेदे मे अग्नि के
रुपान्तरण कार्य और गुणॊं की व्याख्या है., तो यजुर्वेद में विविध रुपों और गुण
धर्मों की. सामवेद का प्रधान तत्व जल है, तो अथर्वेवेद पृथ्वी( मृदा) पर केन्द्रित
है. पांचव तत्व आकाश तत्व है. सृष्टि की रचना करने वाले उस महान कुंभकार ने इन्हीं
पांचों तत्वों के कच्चे माल को मिलाकर एक ऐसी ही रचना की ,जो बेजोड है.
हमारी
धरती के अस्तित्व का जो आधार है जिसे भारतीय मेधा ने भूमि माँ कहकर अभिनन्दन के
स्वर अर्पित किए_”माताभुमिः पुत्रोव्है पृथिव्या”. अर्चन-अभिनन्दन के इन् स्वरों
में बहुत ही सार्थक भावभीना स्वर है. यह वैदिक पृथ्वी समूह मां पृथ्वी की स्तुति
का पावन सूत्र,प्रकृति प्रेम की अद्भुत मिसाल,पर्यावरण विमर्श का महत्वपूर्ण
घोषणा-पत्र,पर्यावरण प्रतिष्ठा का सारस्वत अनुष्ठान और उसके संरक्षण के लिए
समर्पित शिव संकल्प, आसुरी वृत्तियों के अस्वीकार तथा दैवी वृत्तियों के स्वीकार
का घोषणा-पत्र है. यह पृथ्वी की समस्त निधियों के विवेक सम्मत प्रयोग का आग्रही
है. यह प्रेम के लिए नहीं, श्रेय के लिए समर्पित शोध का पक्षधर है. यह
सामाजिकता,मंगलमयता में लीन हो जाने का आव्हान है. आज के पर्यावरण संकट की समस्त
युक्तियों का एक सूत्रिय समाधान है. बीस कांडॊं, इकतीस सूत्रों और पांच हजार नौ सौ
इकहत्तर मंत्रों का महाकोष है. व्यक्ति सुखी रहे, दीर्घायु प्राप्ति करे. सदनीति
पर चले, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों एवं जीव जगत के साथ साहचर्य रहे,इन्हीं कामनाओं
से ओत-प्रोत यह अद्भुत ग्रंथ है.
लोक चेतना तो संस्कृति और साहित्य की परिचालक शक्ति मानी जाती है.किन्तु
वर्तमान मशीनी और कम्प्युटरी समाज से लोक चेतना शून्य होती जा रही है. आज जरुरी है
कि साहित्य का मूल्यांकन लोकजीवन, लोक संस्कृति की दृष्टि से किया जाना चाहिए. जो
लोकसाहित्य लोकजीवन से जुडा होगा वही जीवन्त होगा. माना भूमिः प्रयोग है पृथीव्याः
अथर्ववेद कि ऋचा का महाप्राण है. लोकजीवन इस ऋचा के आशय का प्रतिनिधित्व युगों से
करता आ रहा है.यही लोक साहित्य की आधार शिला है. लोकसाहित्य परम्परा पर आधारित
होता है. अतः अपनी प्रकृति मे विकाश- शील है. इसमें नित्यप्रति परिवर्तन की
संभावना बनी रहती है. इसका सृजन युगपीडा एवं सामाजिक दवाब को भी निरन्तर महसूस
करता रहता है.
सांस्कृतिक परिस्थितियों का निर्वहन ही सभ्यता कहलाती है. कुछ विद्वान
सभ्यता और र्संस्कृति को एक ही मानते हैं और उसके विचार में सभ्यता और संस्कृति का
विकास समान रुप से होता है. काफ़ी गहराई से चिंतन करें तो सभ्यता का ज्यों-ज्यों
विकास होता है,त्यों-त्यों संस्कृति का ह्रास होता है. खान-पान, पहनावा सब बदलता
जाता है और उसका प्रत्येक पर प्रभाव पडता है.
लोकसाहित्य में लोककथा-लोकनाटक तथा लोकगीतों के रखा जा सकता है. जिसमें
जनपदीय भाषाओं का रसपूर्ण-कोमल भावनाओं से युक्त साहित्य होता है. भारतीय लोक
साहित्य के मर्मज्ञ आर.सी टेम्पुल के मतानुसार लोक साहित्य कि साहित्यिक दृष्टिकोण
से विवेचना करना उसी सीमा तक करना उचित होगा, जिस सीमा तक उसमें निहित सुन्दरता और
आकर्षण को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे. यदि लोक साहित्य की वैज्ञानिक विवेचना की
जाती है तो मूल विषय नीरस और बेजान हो जाएगा. लोक के हर पहलू में संस्कृति के
दिव्य दर्शन होते हैं. जरुरत है तीक्ष्ण दृष्टि और सरल सोच की. लोक साहित्य के
उद्भट विद्वान देवेन्द्र सत्यार्थी ने साहित्य के अटूट भंडार को स्पष्ट तौर पर
स्वीकार करते हुए कहा था-“ मैं तो जिस जनपद में गया, झोलियां भरकर मोती लाया. परलोक
की धारणाएँ भी इन्हीं से जुडी है. सभी कर्मकाण्ड,पूजा-अनुष्ठान तथा उन्नत
सांस्कृतिक समाज में मनुष्य के आचरण का निर्धारण इसी लोक में होता है. लोक हमारी
सामाजिकता की गंगोत्री है और सभ्यता का प्रवेश द्वार भी. भारतीय जनमानस को श्रीमद
भगवद्गीता ने जितना प्रभावित किया उतना शायद किसी अन्य पुस्तक ने नहीं किया.
वैष्णवी तंत्र ने गीता की जो व्याख्या की है, उसमें प्रतीक के रूप में पशु जीवन का
महत्व प्रतिपादित होता है.
सर्वोपनिषदो
गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः पार्थो वत्स सुधीर्भॊक्ता दुग्धं
गीतामृतं महत.!
अर्थात उपनिषद गाय है ,कृष्ण उनको दुहने वाले है, अर्जुन बछडा है और गीता
दूध है. गीता मे प्रकृति को ईश्वर की माया के रूप में दर्शाया है. गीता के कुछ
स्लोकों को ( अर्थ) रेखांकित किया जा सकता है. जो तेज सूर्य और चन्द्रमा में है,
उसे मेरा ही तेज मानों. मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके सभी भूत-प्राणियों के धारण
करता हूँ. चन्द्रमा बनकर औषधियों का पोषण करता हूँ. जठ-राग्नि बनकर प्राणियों की
देह मे प्रविष्ठ हूँ. प्राणवायु- अपानवायु से संयुक्त होकर चारों प्रकार से भोजन
किए हुए प्राणियों के अन्न को पचाता हूँ. संपूर्ण भूतों (प्राणियों) के ह्रदय
क्षमता में निवास
करता
हूँ.( अध्याय.१५)
श्रीकृष्ण ने अपनी प्रकृति को अष्टकोणी बताया है. इसमें पृथ्वी,
जल,अग्नि,वायु एवं आकाश के साथ-साथ मन-बुद्धि एवं अहंकार की गणणा कि गई है. अपनी
बाल-लीलाओं के माध्यम से उन्होंने जो दिव्य संदेश दिया उसका व्यापक प्रभाव लोकजीवन
तथा लोकपरम्पराओं पर पडा. उस दिव्य संदेश के पीछे तात्पर्य यह था की
वनस्पति,नदियां,पहाड,पशु-पक्षी,गौवें,जलचर और मनुष्य सभी इस प्रकृति के अंगीभूत
स्वरुप हैं.और सबका रक्षण,पोषण और विकास जरुरी है.
पर्व और त्योहारों के इतिहास में हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का
इतिहास सृष्टि वस्तुतः सारे त्योहार ऎसे हैं जो प्रकृति की गोद में और प्रकृति के
संरक्षण में मनाए जाते हैं. जैसे गोवर्धन पूजा, आवंला पूजन, गंगा सप्तमी, माह
कार्तिक मे तुलसी पूजन आदि. ये सभी पर्व हमें अपनी प्राकृतिकता से सह संबंधो की
परम्पराओं की याद दिलाते हैं .ऎसे पर्व जो प्रकृति के विभिन्न घटकॊं को पूजने के
दिन के रुप में मनाए जाते है, उसी पर्व के अवसर पर सम्पन्न क्रिया –कलाप और समारोह
प्रकृति-प्रेम एवं प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का नया वातावरण हमें प्रदान कर
पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए उत्प्रेरित करते हैं. प्रकृति घटकों के सहसम्बन्ध
हमें नई उमंग और प्रकृति प्रेम के नए उत्साह का अनुभव कराता है. भौतिक ,सांस्कृतिक
एवं लोभ मानसपटल पर नहीं होंगे तो स्वार्थमय भौतिक संस्कृति जैसे प्रदूषण प्रकट
नहीं होंगे और पर्यावरण शुद्ध बना रहेगा.
विभिन्न तथ्यों एवं लोकजीवन की शैली के आधार पर निष्कर्ष में कह सकते हैं
कि वृक्ष हमारी संस्कृति के विभिन्न अंग रहे हैं .भारत कृषि प्रधान देश है. अतः
मृदा का संरक्षण आवश्यक है. प्राकृतिक अवस्था में मैदानी एवं पहाड़ी स्थानों पर लगे
वृक्षॊं की जड़ें जमीन को पकडॆ रहती है,जिससे पानी का प्रवाह एवं हवा संतुलित रहती
है. वृक्षॊं के अभाव में हवा एवं पानी पर नियंत्रण नहीं रहने से भूमि के रेगिस्थान
में परिवर्तन होने की प्रबल संभावनाएं बनती जा रही है. वनों की कटाई न करने के
प्रति जन चेतना फ़ैलाने के उद्देश्य से आंदलनॊं को शुरु किया जाना चाहिए.
मनुष्य की
प्रदूषित मानसिकता प्रकॄति को किसी न किसी रुप में प्रदुषित करती है. अस्तु
प्रकृति के प्रदूषण को रोकने के लिए संस्कृति की आत्मा,जिसमें प्रकृति की गूँज
है,से अनुप्राणित होकर शिक्षा प्रदान करनी चाहिए. अतः शिक्षण संस्थाओं में
अध्ययनरत बालक-बालिकाओं को परम्परागत भारतीय शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.
पूर्व की
पीढियों ने अपने समय में प्रकृति का पूर्ण विकास कर उनको भौतिक संपत्ति के रुप में
बदलकर अगली पीढियों को प्रदान किया जाना है और यह माना है कि आने वाली पीढी उन
पूर्वजों का उपकार मानेगी, लेकिन वर्तमान पीढ़ी की तो भावी मानव के लिए जटिल
समस्याएं और प्रकृति के विध्वंस का आधार छोड़ कर जाने की संभावनाएं बन रही है. आज
रेगिस्थान बढ़ रहे हैं. जीव-जंतुओं की बहुत सी प्रजातियां लुप्त हो रही है. प्रकृति
के वर्तमान दोहन के भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर ही अपनी योजनाओं का
निर्माण करना चाहिए
----------------------------------------------------------------------------------------
12
प्रतीक-कविता
में नए अर्थ भरता है.
(परिभाषा)
प्रतीक का
अर्थ है” चिन्ह” किसी मूर्त के द्वारा
अमूर्त की पहचान. यह अभिव्यक्ति का बहुत सशक्त
माध्यम है. अमूर्त का मूर्तन अर्थात जो वस्तु हमारे सामने नहीं है, उसका
प्रत्यक्षीकरण प्रतीकों के माध्यम से होता है. मनुष्य अपने सूक्ष्म चिंतन को
अभिव्यक्त करते समय इन प्रतीकों का सहारा लेता है. इस तरह ““मनुष्य का समस्त जीवन
प्रतीकों से परिपूर्ण है.
(२)अथवा-किसी
वस्तु, चित्र, लिखित शब्द, ध्वनि या विशिष्ठ चिन्ह को प्रतीक कहते हैं, जो संबंध
सादृष्य या परम्परा द्वारा किसी अन्य वस्तु का प्रतिनिधित्व करता है. उदाहरण- एक
लाल कोण, अष्टकोण (औकटागौन), रुकिए( स्टाप) का प्रतीक हो सकता है. सभी भाषाओं में
प्रतीक होते है, व्यक्तिनाम, व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीक होते
हैं.
प्रयोगवाद
के अनन्त समर्थक अज्ञेय ने अपने चिंतन से कविता को नयी दिशा दी. उन्होंने
परम्परागत प्रतीकों के प्रयोग पर करारा प्रहार करते हुए शब्दों मे नया अर्थ भरने
की बात की. उनकी वैचारिकता से बाद के अशिकांश कवियो ने दिशा ली.और कविताओं में नए
रंग भरने लगे. (इससे पूर्व महादेवी वर्मा ने अपनी कविता में “दीपक”
को प्रतीक बनाया और एक नए चिंतन, नए आयाम, नए क्षितिज रचे थे.
प्रयोगवाद
के के अनन्य समर्थक अज्ञेय की एक छोटी से कविता की बानगी देखिए
उड
गई चिडिया
कांपी
स्थिर
हो गई पाती
चिडिया का
उडना और पत्ती का कांपकर स्थिर हो जाना बाहरी जगत की वस्तुएँ है. परन्तु कवि इस
बात को कहना नहीं चाहता. वह इसके माध्यम से कुछ और ही कहना चाहता है. जैसे- किसी के बिछुडने पर मन के आंगन में मची हलचल,
बैचेनी, घबराहट, असुरक्षा का भाव आदि का होना. फ़िर मन की हलचलों के शांत हो जाने
के बाद की प्रतिक्रिया को वे बाहरी वस्तु जगत की वस्त्यों के लेकर एक प्रतीक रचते
हैं.
यथार्थ के धरातल पर यदि हम चीजों को
देखें तो लगता है कि कहीं जडता सी आ गयी है. हमारी अनुभूतियां, संवेदनाएं, यदि
यथार्थपरक भाषा में संप्रेषित हो रही हैं, तो सपाटबयानी सा लगता है. दरअसल हम जो
कहना चाहते हैं वह पूरी तरह से संप्रेषित नहीं हो पा रहा है...कुछ आधा-अधूरा सा
लगता है. यदि वही बात हम “प्रतीक” के माध्यम से कहते हैं तो वह उस बात को नए
अर्थों में खोलता सा नजर आता है. दूसरे शब्दों में कहें कि मनुष्य अपने सूक्ष्म
चिंतन को अभिव्यक्त करते समय प्रतीकों का सहारा लेता है. इस तरह मनुष्य का समस्त
जीवन प्रतीकों से परिपूर्ण है. और वह प्रतीकों के माध्यम से ही अपनी बात को सोचता
है. वैसे भी भाषा के प्रत्येक शब्द किसी न किसी वस्तु का प्रतीक-चिन्ह
ही होते हैं. सामान्य शब्द का अर्थ जब तक वह सार्थक एवं प्रचलित रहता है- विभिन्न
व्यक्तियों एवं विभिन्न प्रसंगों में भिन्न-भिन्न हो जाता है. “प्रतीक” की विवेचना
करते हुए डा. नगेन्द्र कहते हैं कि, ”प्रतीक” एक प्रकार से रुढ उपमान का ही दूसरा
नाम है, जब उपमान स्वतंत्र न रहकर पदार्थ विशेष के लिए रुढ हो जाता है तो “प्रतीक” बन जाता है. इस
प्रकार प्रत्येक प्रतीक अपने मूल रुप में उपमान होता है. धीरे-धीरे उसका बिम्ब-रुप
संचरणशील न रहकर स्थिर या अचल हो जाता है. डा. नामवरसिंहजी भी मानते हैं कि, बिम्ब
पुनरावृत्त होकर “प्रतीक” बन जाता है.
उदाहरण
स्वरुप= प्रयोगवाद के अनन्य समर्थक अज्ञेय
की की एक कविता “सदानीरा” सादर प्रस्तुत है.
’ “सबने
भी अलग-अलग संगीत सुना इसकी
वह
कृपा वाक्य था प्रभुओं का
उसको
आतंक/मुक्ति का आश्वासन
इसको/वह
भारी तिजोरी में सोने की खनक
उसे/बटुली
में बहुत दिनों के बाद अन्न की सौंधी खुशबु
किसी
एक को नई वधू की सहमी-सी पायल ध्वनि
किसी
दूसरे को शिशु की किलकारी
एक
किसी जाल-फ़ांसी मछली की तडपन
एक
ऊपर को चहक मुक्त नभ में उडती चिडिया की
एक
तीसरे को मंडी की ठेलमठेल,ग्राहकों की अस्पर्धा भरी व
चौथे
को मंदिर की ताल युक्त घंटा-ध्वनि
और
पांचवे को लोहे पर- सधे हथौडॆ की सम चोंटें,
और
छटे की लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की
अविराम
थपक
बटिया
पर चमरौंधों की संघी चाप सातवें के लिए
और
आठवें की कुलिया की कटी मेंड से बहते जल की
इसे
नमक...की एडी के घुंघरु की
उसे
युद्ध का ढोल
इस
संझा गोधूली कर लघु-चुन-दुन
उसे
प्रलय का डमरुवाद
इसको
जीवन की पहली अंगडाई
असाध्य
वीणा में बिम्ब और प्रतीकों की जो गहन गहराती ध्वनि है वह बाद की कविता में दुर्लभ
होती गई है.. इस देश की पूरी परम्परा और रीति-रिवाजों का और इस देश के भूभाग का
विस्तृत अध्ययन अगर आपको करना हो तो यह कविता आपको वह सब बतला सकती है, जो बडॆ-बडॆ
साहित्यकारों, इतिहासकारों और नृत्तत्वशास्त्रियों के बस का नहीं है,.देश केवल
भौगोलिक मानचित्र पर बना देश नहीं होता, वह उस देश के असंख्य जीव-जंतुओं का भी
होता है.
अज्ञेय
की एक नहीं बल्कि अनेक कविताएं--मसलन-रहस्यवाद, समाधिलेख, हमने पौधे से कहा, देना
जीवन, जितना तुम्हारा सच है, हम कृती नहीं है, मैंने देखा एक बूंद, नए कवि से,
दोनो सच है, कविता की बात, पक्षधर, इतिहास बोध, आदि कविताएं हैं, जिनमें दर्शन या
विचार अनुभूति की बिम्बभाषा में पूरी तरह आत्मसात हो जाते हैं.
अज्ञेय
की एक कविता “कलगी बाजरे की’ की बानगी देखिए
“अगर
मैं तुमको
ललाती
सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब
नहीं कहता
या
शरद के भोर की नीहर-न्हायी-कुंई
टटकी
काली चम्पे की
वैगरह
तो
नही
कारण कि मेरा हृदय उथलाया कि सूना है
या
कि मेरा प्यार मैला है
बल्कि
केवल यही
ये
उपमान मैले हो गए हैं
देवता
इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच
कभी
बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है.
(२) नदी के द्वीप
हम
नदी के द्वीप हैं
हम
नहीं कहते कि हमको छॊडकर स्त्रोतस्विनी बह जाए
वह
हमें आकार देती है
हमारे
कों,गलियाँ, अंतरीप,उभार,सैंकत-कूल
सब
गोलाइयाँ उसकी गढी हैं
माँ
है वह ! है उसे से हम बने हैं......मातः उसे फ़िर संस्कार तुम देना
यह पूरी कविता बिम्बों और प्रतीकों से
सम्प्रेषित कविता है... एक विचार है. इससे पहले हिन्दी में एक रुढ मान्यता यह रही
है कि आधुनिक काव्यभाषा बिम्बधर्मा होती है और वक्तव्य उससे अकाव्यात्मक चीज है,
लेकिन नई कविता के शीर्ष कवि और सिद्धांतकार अज्ञेय ने महज इस कविता में ही नहीं
बल्कि अपनी अनेक कविताओं में प्रतीक-बिम्ब और वक्तव्य की परस्पर अपवर्ज्यता को
अमान्य किया है. कई दौरों में लिखी गई कविताएँ=जैसे= रहस्यवाद, समाधि-लेख, सत्य तो
बहुत मिले, हमने पौधे से कहा, देना जीवन, अकवि के प्रति कवि, हम कृती नहीं है,
मैंने देखा एक बूंद ,नए कवि से, चक्रांत-शिला, पक्षधर, कविता की बात आदि कविताओं
में निःसन्देह कुछ ऎसी कविताएं है, जिनमे दर्शन, अनुभूति की बिम्बभाषा अपनी
संपूर्णता के साथ समाए हुए हैं.
अपनी
विचार-कविता (भवन्ती-१९७२) में वे लिखते हैं
“विचार कविता की जड में खोखल यह है
कि विचार चेतन क्रिया है जबकि कविता की प्रक्रिया चेतन और अवचेतन का योग है,
जिसमें अवचेतन अंश अधिक है और अधिक महत्वपूर्ण है......”विचार कविता” का समर्थक यह
कहे कि उसमें एक स्तर रचना सर्जना का है, साथ ही दूसरा स्तर है जिसमें कल्पना से
प्राप्त प्राक-रुपों बिम्बों में चेतन आयास से वस्तु या अर्थ भरा गया है, तो वह उस
प्रकार की कविता को अलग से पहचानने में योगदान देगी, पर यह आपत्ति बनी रहेगी कि यह
दूसरा स्तर तर्क-बुद्धि का स्तर है, रचना का नहीं. अर्थात “विचार कविता” कविता
नहीं, कविता विचार है और ऎसी है तो उसकी “कविता” पर विचार करने के लिए “उसके
विचार” को अलग देना होगा या [रसंगेतर मान लेना होगा.”
देश और
प्रदेश के ख्यातिलब्ध कवि श्री चन्द्रकांत देवतालेजी ने जातीय जीवन में व्याप्त
क्रूरता और निरंकुशता को महसुस करके लिखी गई कविता “उजाड में संग्रहालय” की अन्तिम
कविता का शीर्षक है=”यहाँ अश्वमेघ यज्ञ हो रहा है”. आज के घटित यथार्थ से मुठभेड
की कविता. इसमें अश्वमेघ का घोडा और घण्टाघर की सार्वजनिक घडी “प्रतीक” बनकर
वातावरण और ज्यादा तनावपूर्ण बनाते हैं. बरसों पहले मुक्तिबोध की कविता “अंधेरे
में” भी एक शोभा यात्रा का वृतांत आया था, यहाँ भी है
जिस
शोभा यात्रा में पिछलग्गुओं की भीड थी कित्ती
उसी का तो
उत्तरकाण्ड इस महापंडाल में
नहीं,नहीं
इस महादेश में भी
हर
तरफ़ “अंधेरे में” का उत्तरकाण्ड
तब
तो बस एक था डॊमाजी उस्ताद
अब
तो देखो जिसे वही वही वही...
हर
दूसरा काजल के बोगदे में
तीसरा
तस्कर मंत्र-जाप करता
चौथा
आग रखने को आतुर बारुद के ढेर पर
और
पहला कौन है क्या सत्तासीन अथवा बिचौलिया
बिका
हुआ सज्जन
पाँचवा-छठा-सातवां
फ़िर गिनती के बूते के बाहर संख्या में
शामिल
होते हैं अन्दर जाते हैं—बाहर जाते हैं
पवित्र
गन्ध से आच्छादित है नगर का आकाश
जिसका
नगर कोई नहीं जानता
यहाँ
अश्वमेघ यज्ञ हो रहा है (पृ.१५०)
विश्व विख्यात कवि श्री विष्णु खरे की एक
कविता सिलसिला (“सब की आवाज के पर्दे में”
संग्रह से)
कहीं
कोई तरतीब नहीं
वह
जो एक बुझता हुआ सा कोयला है
फ़ूँकते
हुए रहना है उसे
हर
बार राख उडने से
जिससे
भौंहे नहीं आँख को बचाना है
वह
थोडा दमकेगा
जलकर
छॊटा होता जाएगा
लेकिन
कोई चारा नहीं फ़ूँकते रहने के सिवा
ताकि
जब न बचे साँस
फ़िर
भी वह कुछ देर तक सुलगे
उस
पर उभर आई राख को
यकबारगी
अंदेशा हो लम्हा भर तुम्हारी साँस का
अंगारे
को एक पल उम्मीद बँधे फ़िर दमकने की
इतना
अंतराल काफ़ी है
कि
अप्रत्याशित कोई दूसरी साँस जारी रखे यह सिलसिला
इस कविता में कोयला एक प्रतीक है. उसमें धधकती
आग को जलाए रखना जरुरी है ताकि उस पर रोटियाँ सेकी जा सके. देश में व्याप्त
गरीबी-मुफ़लिसी-बेहाली-तंगहाली को बयां करती यह कविता अन्दर तक उद्वेलित कर देती
है.
विश्व विख्यात कवि श्री लीलाधर मंडलोई की
कविता की बानगी देखिए
पहले
माँ
चाँवल में से कंकर बीनती थी
अब
कंकड
में से चाँवल बीनती है.
यहाँ कंकड गरीबी का और चाँवल अमीरी का प्रतीक
है. घर में जहां कभी सम्पन्नता थी, अब वहाँ गरीबी का ताण्डव है. दोनो ही
परिस्थितियों को उजागर करती यह कविता आत्मा को हिलाकर रख देती है.
अपनी कविताओं में प्रतीक का उपयोग करने श्री
अरुणचंद्र राय की एक कविता की बानगी देखिए.
“शर्ट की
जेब/होती थी भारी/सारा भार सहती थी/कील अकेले
नए
बिम्बों के प्रयोग में संदर्भ में इस कविता को देखें. उन्होंने कील को प्रतीक के
रुप में लिया है. कील का विशिष्ठ प्रयोग यहां एक मानवीय संवेदना की प्रतिमुर्ति
बनकर सजीव हो उठी है. जड-बेजान कील यहां कील न रहकर सस्वर हो जाती है.- एक नए अर्थ
से भर उठती है. अपनी अर्थवत्ता से विविध मानसिक अवस्थाओं –आशाओं, आवेग, आकुलता,
वेदना, प्रसन्नता, स्मृति, पीडा व विषाद आदि के मार्मिक चित्र उकेरती है.
कविता को
पढते ही एक चित्र हमारी आंखों के सामने थिरकने लगता है. कील पर जो पिता की कमीज
टंगी है, उस टंगी कमीज में निश्चित ही जेब भी होगी. और जेब है तो उसमें पैसे भी
होंगे. वे कितने हो सकते है, कितने नहीं, इसे बालक नहीं जानता. संभव है वह खाली भी
हो सकती है लेकिन उसके मन में एक आशा बंधती है कि जेब में रखे पैसों से चाकलेट
खरीदी जा सकती है, पतंग खरीदी जा सकती है. और कोई खिलौना भी लिया जा सकता है. यह
एक नहीं अनेक संवेदनाओं को एक साथ जगाता है. लेकिन बच्चा नहीं जानता कि उस जेब के
मालिक अर्थात पिता को कितनी मुश्किलों का सामना करना पडा होगा, अनेक कष्टॊ को सहकर
उसने कुछ रकम जुटाई होगी और तब जाकर कहीं चूल्हा जला होगा और तब जाकर कहीं वह अपने
परिवार का उत्तरदायित्व संभाल पाया होगा.
अपने आशय
को साफ़ और सपाट रुप में प्रस्तुत करने के बजाय कवि ने सांकेतिक रुप से उस मर्म को,
बात की गंभीरता.को मूर्त जगत से अमूर्त भावनाओं को प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया है.
शाश्वत सत्य की व्यंजना प्रस्तुत करना हो तो वह
केवल और केवल प्रतीकों के माध्यम से की जा सकती है. ऎसा किए जाने से अर्थ की
गहनता, गंभीरता तथा बहुस्तरीयता की संभावनाएं बढ जाती है
शंकरानन्द
का कविता संग्रह “दूसरे दिन के लिए” एक नए तरह के प्रतीक और बिम्ब के जरिए
प्रभावित कर देने वाला काव्य-लोक है. छोटी-छॊटी कविताएं अपने विन्यास में भले ही
छोटी जान पडॆ, पर अपनी प्रकृति में अपनी रचनात्मक शक्ति के साथ, चेतना को स्पर्ष
करती है और बेचैन भी. बानगी देखिए
माँ चुल्हा जलाकर बनाती है रोटीया
छौंकती है तरकारी कुछ
भी करती है कि उसमें
गिर जाता है पलस्तर का टुकडा फ़िर
अन्न चबाया नहीं जाता पलस्तर
एक दुश्मन है तो उसे झाड देना चाहिए मिटा
देना चाहिए उसे पूरी तरह
डा
रामनिवास मानव की काव्य रचनाओं में, वे कविता, दोहा, द्विपदी, त्रिपदी, हायकू आदि
में से चाहे किसी भी विधा की क्यों न हो, प्रतीकों का सुदृढ एवं सार्थक प्रयोग
करते हैं. प्रतीकों के माध्यम से वे ऎसा बिम्ब प्रस्तुत करते हैं, जिनमे यथार्थ
हो, प्रतिभासित हो ही जाता है. पाठक की कल्पना भी अपना क्षेत्र विस्तृत करने के
लिए विवश हो जाता है. उनकी एक जानदार कविता है-“शहर के बीच”. इसकी बानगी देखिए
जब भी निकलती है बाहर कोई
चिडिया घोंसले से बाज
के खूनी पंजे दबोच
लेते हैं उसे.
यहां बाज
और चिडिया का प्रयोग बहुआयामी है. बाज-प्रशासक, शोषक या आतंकवादी कोई भी हो सकता
है. चिडिता- जनता शोषित या आतंकवाद का शिकार, कुछ भी हो सकता है.
इनकी
काव्य रचना में दिन-रात, घटा-बिजली, बाघ-भेडिये, बन्दर-भालू, कौवे-बगुले,
गिद्द-गिरगिट, फ़ूल-कांटे अदि न जाने कितने प्रतीक आते है और पूरी अर्थवत्ता के साथ
आते हैं.
एक बानगी
देखिए-कौवे,बगुले,गिद्द यहाँ हैं/ सारे साधक सिद्ध यहाँ है
डा. मानव की एक और रचना देखिए
जिसमें प्रेमचंदजी का गाँव है. गाँव है तो उसमे होरी है, गोबर है. गरीबी है,
मुफ़लिसी है, अभाव है, भूख है, मजबूरियां है. इतनी सारी बातें मात्र तीन लाइन मे
कवि अपने अन्तरमन की बात,- अपने मन की पीडा कम से कम शब्दों में “प्रतीकों” के
माध्यम से कह जाता है.
प्रेमचंद के गाँव मे ` (२) भाग्य खिचता डोरियाँ पडी
है आज भी बेडियाँ होरी
तडपे भूख से है
होरी के पाँव में गोबर ढोता बोरियाँ
देश में नेताओ, दलालों, अफ़सरों आदि
के कारनामे और व्ववस्था में आई गिरावट और विसंगतियों को देखकर वे लिखते हैं
धूर्त भेडिये/ और रंगे सियार/करते
राज
(२) भालू के बाद
बन्दर की बारी है
तभी देश समूचा /लगे
जंगल राज
राजनीति के मंच पर
घटिया प्रदर्शन जारी है.
मंगलेश
डबराल की एक कविता (स्मृति से साभार)
रात
भर हम देखते हैं
पत्थरों
के नीचे
पानी
के छलछला का स्वपन
यहाँ पत्थर कठोरता, पानी का छलछलाना करुणा का
प्रतीक है.
श्रीकांत वर्मा “हस्तिनापुर” से साभार
संभव
हो
तो
सोचो
हस्तिनापुर
के बारे में
जिसके
लिए
थोडॆ-थोडॆ
अंतराल में
लडा
जा रहा है महाभारत. (यहाँ हस्तिनापुर प्रतीक है सत्ता का)
मंगलेश
डबराल की एक कविता की बानगी देखिए.
मेरे बचपन के दिनों में
एक बार मेरे पिता एक सुन्दर सी टॉर्च
लाये
जिसके शीशे में गोल खांचे बने हुए थे
जैसे आजकल कारों कि हेडलाईट में होते हैं
हमारे इलाके में रोशनी कि वह पहली मशीन
जिसकी शहतीर एक चमत्कार कि तरह रात को
दो हिस्सों में बाँट देती थी।
एक सुबह मेरी पड़ोस की दादी ने पिता से
कहा
बेटा इस मशीन से चूल्हा जलाने कि लिए
थोड़ी सी आग दे दो
पिता ने हंसकर कहा चाची इसमें आग नहीं
होती सिर्फ उजाला होता है
यह रात होने पर जलती है
और इससे पहाड़ के उबड़-खाबड़ रास्ते
साफ दिखाई देते हैं
दादी ने कहा बेटा उजाले में थोडा आग भी
रहती तो कितना अच्छा था
मुझे रात को भी सुबह चूल्हा जलाने की
फ़िक्र रहती है
घर-गिरस्ती वालों के लिए रात में उजाले
का क्या काम
बड़े-बड़े लोगों को ही होती है अँधेरे
में देखने की जरूरत
पिता कुछ बोले नहीं बस खामोश रहे देर
तक।
इतने वर्ष बाद भी वह घटना टॉर्च की तरह
रोशनी
आग मांगती दादी और पिता की ख़ामोशी चली
आती है
हमारे वक्त की कविता और उसकी
विडम्बनाओं तक
इसमें
टार्च केवल एक प्रतीक भर है, लेकिन इसके भीतर से कितने कोलाज बनते हैं और एक नया
अर्थ यहां देखने को मिलता है,
(२) चाहे जैसी भी हवा हो /यदि हमें
जलानी है अपनी आग/ जैसा भी वक्त हो/ इसी में खोजनी है अपनी हँसी/ जब बादल नहीं
होंगे/ खूब तारे होंगे आसमान में / उन्हें देखते हम याद करेंगे/ अपना रास्ता.
यहाँ हवा
परिस्थितियों की प्रतीक है, आग क्रांति की और बादल परेशानियों का.
गोवर्धन
यादव की एक कविता (शेरशाह सूरी के घोड़े
से साभार)
पत्र पाते ही खिल जाता है
उसका
मुरझाया चेहरा
और
बहने लगती है एक नदी हरहराकर
उसके
भीतर.
(इसमे
घोडॆ प्रतीक है जो उजाड और नीरस जीवन में खुशियां लाते है औरजिनके आते ही वह
प्रसन्नता से भर उठती है
(२ मेरे
अन्तस में बहती है एक नदी
ताप्ती
जिसे
मैं महसूसता हूँ अपने भीतर
जिसकी
शीतल, पवित्र और दिव्य जल
बचाए
रखता है,मेरी संवेदनशीलता
खोह,कन्दराओं,जंगलों
और पहाडॊं के बीच
बहती
यह नदी
बुझाती
है सबकी प्यास
और
तारती है भवसागर से पापियों को
इसके
तटबंधों में खेलते हैं असंख्य बच्चे
स्त्रियाँ
नहाती हैं
और
पुरुष धोता है अपनी मलीनता
इसके
किनारे पनपती हैं सभ्यताएँ
और,
लोकसंस्कृतियाँ लेती है आकार
लोकगीतों
और लोकधुनों पर
मांद
की थापों पर
टिमकी
की टिमिक-टिमिक पर
थिरकता
है लोकजीवन
(यहाँ नदी एक प्रतीक के रुप में आती है)
०
पुलिस महानिदेशक श्रीविश्वरंजनजी की एक कविता
की बानगी देखिए
वह
लडकी नही पूछती है (२)
आसमान से बाजारी शमशीर
यह
सब अब खतरनाक तरीके से
वह
आँखें नीची रखती है काट रही थी हवा को
उसने
खुद को बचा रखा है ऊर्जारहित, शक्तिहीन,तेजस्वितारहित
बडॆ-बुजुर्गों
के आदेशानुसार वह एक भारी झूठ-सा गडा रहा दलदल में
आदिम
बलि के लिए बाजार की मार झेलने के लिए/वह बेचारा आदमी
वह
लडकी सचमुच बडी हो गई
हर
भारतीय कस्बे की लडकी की तरह (३) मैं
जानता हूँ बहुत गरीबी है
और
मैं जानता हूँ बहुत मुफ़लिसी है, यहाँ दर्द
है,तडपन है..
बहुत
अंदर से हार गई है. चलो बाहों में बाहें
डाल अपने अपने न बोले जाने वाले सत्यों और
अनुभूतियों के/
साथ
घूम आयें क्षितिजों से पार
डा.बलदेव
कि कविता की एक बानगी
पॆड
छायादार, पेडॊं की संख्या में एक पेड और
बच्चा
पूछ रहा- माँ कहाँ है ?
वृक्ष
में तब्दील हो गयी, औरत के बारे में
मैं
क्या कहूँ, कैसे कहूँ, वह कहाँ है
युवा कवि
रोहित रुसिया की कविता की एक बानगी
सहेज
लेना चाहता हूँ जब
मिलेंगे हम दोनो
अपने
पिता की तस्वीर के साथ किसी
ने कुछ भी नहीं कहा
थोडा
सा धान और कुछ गेहूँ की बालियाँ तुम
आयीं, बहने लगा झरना
कि
भरपूर हाईब्रीड के जमाने भी तुम
मुस्कुरायीं
मेरी
आने वाली पीढियाँ महसूस कर सकें खिल
गए सारे फ़ूल
अपनी
जडॊं की महक मैं
चुपचाप महसूस करता रहा
वसन्त
अपने भीतर
उपरोक्त
कविताओं के माध्यम से हमने देखा की “प्रतीक” के माध्यम से हम अपने आशय को साफ़-
सपाट रुप में प्रस्तुत करने की जगह सिर्फ़ सांकेतिक अर्थ में ,अर्थ
की व्यंजना करते हैं तो हमारे कहन में अर्थ की गहनता, गंभीरता तथा बहुस्तरीयता बढ
जाती है और साथ ही कविता का सौंदर्य भी. बस यहाँ ध्यान दिए जाने की जरुरत है कि कि
कविता की विशिष्ट लय बाधित नहीं होनी चाहिए.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
13.
प्रौद्धिगिकी की हमसफ़र है हिन्दी.
हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से लेकर
पश्चिम तक अपना अस्तित्व रखती है. सच माने में हिन्दी हमारी संस्कृति की पर्याय
है. वह बद्रीविशाल की अलकनंदा है, रामेश्वर के अभिषेक की गंगा है. जगदीश के शिखर
पर स्थापित भ्रामरीचक्र है, तो द्वारकाधीश के भव्य प्रासाद की फ़हराती ध्वजा है.
हिन्दी की जन्मजाती उपलब्धि कि वह संस्कृत की दुहिता है. जनपदीय बोलियाँ इसकी सहोदरा
है. यह अतुल शब्द संपदा वाली है. इसकी लिपि देवनागरी है, जो पूर्णतः वैञानिक है.
इन सभी गुणवत्ता के कारण ही हिन्दी अपनी लिपि, भाव,और भाषा की कसौटी पर खरी उतरी
है. विश्व मंच पर आज हिन्दी प्रौद्द्योगिकी की हमसफ़र बनकर भारतीय संस्कृति का परचम
लहरा रही है.
किसी भी देश को सुसंपन्न बनाने में स्वदेशी भाषा और स्वदेशी भाव का होना बहुत
जरुरी है. जब तक इन दो भावों का तालमेल नहीं होगा, देश कतई आगे नहीं बढ़ सकता. आज इस बात आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी है. अपने बाजार को
दूसरे देशों के हवाले करने से उस देश का आर्थिक आधार मजबूत होता जाएगा, लेकिन अपना खुद का देश बहुत पीछे चला जाएगा. हम जानते हैं
कि पुरातनकाल में भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर था. गाँव खुशहाल थे. सामाजिक
व्यवस्था एक दूसरे पर अवलंबित थी. इसी अवलंबन के भाव के कारण ही हर परिवार की
व्यवस्थाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं. इस कारण शहर ही नहीं गाँव भी आत्मनिर्भर थे.
आज देश को इसी भाव यानी स्वदेशी भाव की बेहद आवश्यकता है.
भारत की अर्थव्यवस्था का एक आधार यह भी था कि भारत के गाँवों में
कृषि एक ऐसा उद्योग था, जिस पर गाँव ही नहीं शहरों की भी व्यवस्थाएं
होती थी. इसके अलावा लगभग हर घर में कुटीर उद्योग जैसी व्यवस्था संचालित होती थी.
आज के समय में यह सारी व्यवस्थाएं चौपट हो गई हैं, जिन्हें फिर से स्थापित करने की
आवश्यकता है. यही स्वदेशी का भाव है और यही भारत की आत्मनिर्भरता का एक मात्र
रास्ता है. वर्तमान में एक धारणा प्रचलित है अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और ज्यादा गरीब होता जा रहा है. इसके पीछे मात्र कारण यही है कि
हम दूसरों पर आश्रित होते जा रहे हैं. दूसरों के सहयोग के बिना हम खाना भी नहीं खा
सकते हैं, यह सब धन केंद्रित जीवन का ही परिणाम है. धन भी जरूरी है, लेकिन पैसा भूख नहीं मिटा सकता यानी पैसा भूख का पर्याय नहीं हो सकता. यह बात स्वीकार करने योग्य है कि सारे देश को अंग्रेजी के माध्यम से साक्षर
नहीं बनाया जा सकता. वह हिन्दी या अन्य भारतीय प्रांतीय भाषाओं के द्वारा ही संभव
है. सारे संसार में भारत को छोड़कर कोई एक भी देश ऐसा नहीं है जिसकी राजभाषा विदेशी
भाषा है. भारत के अधिसंख्य लोग हिन्दी जानते-समझते हैं. अतः भविष्य में हिंदी तथा
अन्य प्रांतीय भाषाओं का वर्चस्व भारत में होना चाहिए. हिन्दी विरोधी लोगों का आज
भी तर्क है कि हिन्दी एक अविकसित भाषा है. इसमें वैज्ञानिक साहित्य का अभाव है.
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का अभाव है. इसमें शब्दो की एकरूपता नहीं है. एक ही शब्द अनेक प्रकार से
लिखा जाता है, किसे ग्राह्य समझें और किसे अग्राह्य, समझ में नहीं आता. इससे
हिन्दी लिखने में असुविधा और उलझन होती है.
वैज्ञानिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी.
हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए तथा विश्वविध्यालय स्तर पर
शिक्षण माध्यम के रुप में हिन्दी विकास के लिए भारत सरकार ने मानव संसाधन विकास
मंत्रालय के अधीन सन 1961 ई.में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली,
अखिल भारतीय शब्दावली, परिभाषा कोशों, चयनिकाओं, पाठसंग्रहों तथा विश्वविद्यालय
स्तर पर हिन्दी पुस्तकों के निर्माण का कार्या सौंपा गया था. आयोग अब तक अनेक
परिभाषिक शब्द-संग्रह और विभिन्न विषयों पर शब्दावलियां तथा परिभाषा कोश प्रकाशित
कर चुका है. इतना ही नहीं आयोग तथा प्रदेशों की हिन्दी अकादमियों द्वारा विभिन्न
विषयों जैसे- धर्मशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्विज्ञान, इंजीनियरी, कम्प्युटर विज्ञान,
गणित, दर्शन विज्ञान, सैन्य विज्ञान आदि विषयों पर विश्वाविद्याल स्तर की सैकड़ों
पुस्तकें प्रकाशित कर चुका है.
भूमण्डलीकरण और हिन्दी
सदियों से दुनिया के अनेक देश आपस में व्यापार करते आए है. यह भी एक प्रकार का
भूमण्डलीकरण ही था. परन्तु आधुनिक भूमण्डलीकरण उससे बहुत भिन्न है. अब
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार के साथा-साथ उत्पादन का बहूमण्डलीकरण भी हो रहा
है. इतना ही नहीं, आर्थिक स्वामित्व का भी भूमण्डलीकरण होने लगा है.
आज हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार का असर यह हो रहा है कि भारत में
बहुराष्ट्रीय निगमों के उत्पाद का विज्ञापन हिन्दी माध्यम से हो रहा है. सौदा तय
करने की अपनी भाषा है. यही सब कारण है कि हिन्दी की अन्तर्राष्ट्रीय पैठ बढ़ी है.
भूमण्डलीकरण का प्रभाव इन प्रस्तुत नीतियों के परिवर्तन से ही परिलक्षित होगा
१. विदेश व्यापार नीति, २-औद्योगिक नीति, ३-सार्वजनिक क्षेत्र नीति,
४-उत्पादनकारक नीति-( भूमि से संबंधित, भ्रमण से संबंधित, पूंजी, शेयर,बाजार से
संबंधित), ५-प्रशाशित मूल्य नीति, ६-तटकर नीति, ७- सेवा एवं पेटेंट नीति (
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी प्रवाह, अन्तर्राष्ट्रीय
उत्पादन, और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक स्वामित्व)
भाषा के प्रचार-प्रसार की अनेकानेक संभावनाएं
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषा के प्रसार एवं विकास
की बड़ी सम्भावनाएं है. भारतीयता को आगे बढ़ाने का स्वर्णिम अवसर है क्यंकि भाषा
केवल विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति भर का माध्यम नहीं है, यह देश की अस्मिता की
पहचान है. हिन्दी भारतीय संस्कृति की पहचान है.
भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमण्डलीकरण न केवल भारत की राजभाषा हिन्दी बल्कि
समस्त भारतीय भाषाओं के विकास एवं विस्तार का मार्ग प्रशस्त करता है.
भूमण्डलीकरण से पर्यटकों, व्यापारियों, उत्पादकों एवं सामान्य व्यक्तियों के
आवागमन में वृद्धि हुई है. भाषा व्यवहार की भी पहचान है. अपनेपन और आत्मीयता का
बोध कराती है. इसलिए इस अवसर का लाभ हमें भरपूर उठाने की आवश्यकता है.
भूमण्डलीकरण के साथ एक ओर जहाँ अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धा करानी पड़ रही है,
वहीं दूसरी ओर भाषा को भी प्रतिस्पर्धा करनी ही पड़ेगी. विदेशी बैंक, विदेशी
पूंजीगत एवं वाणिज्यिक कंपनियाँ उत्पादन फ़र्म निरन्तर देश में प्रवेश कर रही है.
आर्थिक विकास के साथ-साथ हिन्दी को भी प्रौढ़ावस्था में आना होगा, जिससे वह अन्य
भाषाओं से स्वतंत्र प्रतियोगिता में ठहर सके.
एक ओर उच्च शिक्षा का भी भूमण्डलीकरण हो रहा है तथा व्यावसायिकरण हो रहा है.
अन्य क्षेत्रों के साथ इसका भी निजीकरण हो रहा है. स्ववित्त पोषित कार्यक्रम के
अन्तर्गत अनेक व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं, यहाँ भी हिन्दी को
प्रतिस्पर्धा करनी होगी.
सूचना प्राद्दोगिकी और कम्प्युटर का विकास.
आज कम्प्युटर और सूचना प्राद्धोगिकी का युग है. सभी क्षेत्रों में कामकाज में
यांत्रिक और इलेक्ट्रानिक उपकरणॊ का प्रयोग बढ़ता जा रहा है. इसे देखते हुए राजभाषा
विभाग ने इन उपकरणॊं द्वारा हिन्दी में काम करने की सुविधाएँ जुटाने के लिए बहुत
ही महत्वपूर्ण कार्य किये है, जिसके दूरगामी परिणाम प्राप्त होने लगे हैं.
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद करने में अब कंप्युटर सक्षम है. इसकी सहायता से
प्रशासकीय क्षेत्र में प्रयोग में आने अंग्रेजी पत्रों का अनुवाद करने के लिए
सी_डेक पुणे के माध्यम से इसका साफ़्टवेयर तैयार किया गया है.
हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए और भी अनेक विभिन्न साफ़्टवेयर तैयार किए
जा चुके हैं. यान्त्रिक उपकारणों में " लीप आफ़िस" का विशेष उल्लेखनीय
है. इस साफ़्टवेयर से देवनागरी के अलावा असमी, बंगला, गुजराती, कन्नड़, मलयालम,
उड़िया, पंजाबी, तमिल, और तेलुगू इन दस लिपियों में काम किया जा सकता है. इस
साफ़्टवेयर में संपादन और मुद्रण आदि की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं. लिखित सामग्री को
दूसरी लिपि में भी परिवर्तित किया जा सकता है.
सी-डेक के अलावा और कई प्रतिष्ठानों में भी यांत्रिक और इलेक्ट्रनिक सुविधाएँ
उपलब्ध करने में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं. इसे और सरल बनाते हुए "गुरु"
को इजाद किया गया, यह मल्टीमिडिया सी.डी.रोम एक ऐसा ही उपकरण है. "गुरु"
वास्तविक और व्यवहारिक स्थितियों के आधार पर प्रशिक्षणार्थियों का मार्ग निर्देशन
करता है. इससे प्रशिक्षाणार्थी की प्रगति का मूल्यांकन भी किया जा सकता है.
इस बदलते राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक,
वैज्ञानिक और राष्ट्रीय तथा अंन्तर्राष्ट्रीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार, प्रयोग और उसकी सम्यक प्रतिष्ठा के लिए सतत
प्रयास किए है, अतः राजभाषा हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य को लेकर ज्यादा चिन्तित होने
की आवश्यकता नहीं है. इतना सब कुछ हो चुकने के बाद भी आज हिन्दी के धुर-विरोधी
इसके विपरीत कार्य करते देखे जा सकते है. वे चाहें तो इन साफ़्टवेयर की सहायता
हिन्दी में लिखना और टाईप करना आसानी से सीख सकते है. आजकल एंड्राईड मोबाईल का चलन
तेजी से बढ़ा है. उसमें भी हिन्दी में लिखे जाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन कुछ
सिरफ़िरे रोमन में लिखना अपनी शान समझ रहे हैं, जबकि वे आराम से हिन्दी को प्रयोग
में ला सकते हैं.लेकिन वे जानबूझ कर सीखना नहीं चाहते या हिन्दी के प्रति अपने मन
में विद्वेश पाले बैठे रहते हैं. यह ठीक नहीं है.
भारत में आज जितनी भी मल्टिनेशनल कंपनियां अपनी शाखाएं खोल रही है या खोल चुकी
हैं, सभी अपने प्रोडक्टस के बारे में हिन्दी का प्रयोग करते हुए उनकी गुणवत्ता का
बखान करते हुए अच्छा माल ( पैसा ) बना रही है. हिन्दी न केवल भारत में, बल्कि
विश्व के प्रायः सभी देशों में शान के साथ बोली जा रही है. लगभग हर देश में हिन्दी
के विश्व-विद्यालय संचालित हो रहे हैं.
अब जमाना बदल चुका है. मोदी जी की सरकार ने एक अरसे से चला आ रही शिक्षा
पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन किया हैं. बच्चे अब कक्षा चार तक अपनी मातृभाषा या
फ़िर देवनागरी हिन्दी में अध्ययन करेंगे. जैसा कि मैंने पहले इस बात का उल्लेख किया
है कि हिन्दी संस्कृत भाषा की दुहिता है, माने वह संस्कृत की बेटी है. बच्चे जब
हिन्दी से जुड़ेंगे तो निश्चित ही वे संस्कृत साहित्य को भी पढेंगे. हमारा संस्कृत
साहित्य अन्य देशों के साहित्य से ज्यादा धनी है. इसमें जीवन से जुड़ी हर प्रकार की
समस्याओं का निदान समाया हुआ है. इतना ही नहीं, हमारे जीवन मूल्य क्या होने
चाहिये, समाज कैसा हो, समाज में हमें कैसे रहना चाहिए, हमारे नैतिक दायित्व क्या
हैं और हम अपने राष्ट्र को कैसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा सकते हैं आदि के बारे
में विस्तार से दिया गया है.आज बच्चे हों या बुजुर्ग सभी अपने भारतीय मूल्यों की
तिलांजलि देकर पाश्चात्य परिवेश में ढल रहे है वा थोती पाश्चात्य संस्कृति को अपना
रहे हैं, में एक व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा.
हिन्दी आज विश्व भाषा बन चुकी है. मारीशस हो या आस्ट्रेलिया या फ़िर फ़िजी, त्रिनीडाड,
गुयाना, स्वीडन, डेनमार्क, सूरीनाम, अमेरिका, कनाड़ा, नीदरलैंड, जर्मनी, नार्वे,
म्यांमार, थाईलैंड , सिंगापुर, मलेशिया, न्यूजीलैंड, जाम्बिया, अफ़्रीकी महाद्वीप,
केन्या, युगांडा, कम्पाला, तंजानिया, नाइजीरिया, चाइना, जापान, फ़ांस,, रोमानिया,
योगोस्लाविया, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया, तुर्की, इरान, सउदी अरब, मिस्त्र, लीबिया
आदि देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी विधिवत पढ़ाई जा रही है. आधुनिक युरोपीय
भाषाओं में जर्मन सबसे अधिक विज्ञान संगत भाषा जरुर है लेकिन जर्मनी भाषा के
व्याकरण पर हिंदी का गहरा प्रभाव है. हिंदी साहित्य के अन्य विदेशी भाषाओं में
अनुवाद हो रहे है और पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त ग्रंथ प्रकाशित किए जा रहे हैं.
हिंदी की ध्वजा विश्व में फ़हराई जा रही है, क्या यह हमारे लिए हर्ष का विषय नहीं
है कि स्वाधीनता के बाद विश्व भर में हिंदी को जो मान्यता प्राप्त हुई है वह विश्व
की अनेक भाषाओं के लिए दुर्लभ है?
कोरोना महामारी का जनक चीन आज दुनियां की नजरों में गिर गया है. उसकी
विस्तारवादी नीति के चलते वह अपने पड़ौसी देशों से दुश्मनी भी मोल ले चुका है. यही
सब कारण है कि कई विदेशी कंपनियाँ वहाँ से अपना कारोबार समेट रही हैं. चुंकि भारत
विश्व का सबसे बड़ा बाजार है. अतः कई नामी-गिरामी उद्धोगपति अपना व्यापार भारत की
धरती पर स्थापित करने को ललायित हैं. भारत के लिए यह स्वर्णिम अवसर है कि वह इस
अवसर का फ़ायदा उठाए. अनेक उद्धोगो के
स्थापना से न सिर्फ़ रोजगार बढ़ेगा बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूत होगी और
मेक-इन-इंडिया, स्किल इंडिया जैसे प्रोग्रामों को बल मिलेगा.
विश्व में हिंदी भाषा की प्रधानता बढ़ी है क्योंकि इसका व्याकरण विज्ञान संगत
है. इसकी लिपि अब कंप्युटर की लिपि है. जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि संस्कृत
की पुत्री होने के कारण ही हिन्दी को वह स्थान और आधार मिला है. आत्मनिर्भर बनता
भारत आज की दुनिया के अन्य देशों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहा है, बल्कि यूं
कहा जाए कि वह कई क्षेत्रों में दुनिया के अन्य देशों से काफ़ी आगे निकल चुका है,
यह हमारे सबके लिए गौरव का विषय है. वह दिन भी शीघ्र ही आने वाला है जब हमारा
भारत, दुनिया का सिरमौर बनेगा, फ़िर से विश्व गुरु बनेगा, इसकी इबारत कभी की लिखी
जा चुकी है.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
14 बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ.
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा, भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय श्री
नरेन्द्र मोदी जी ने हरियाणा की विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए दिया था. अपने
भाषण में उन्हें यह कहने की आखिर जरुरत क्यों पड़ी कि हमारी मानसिकता १८ वीं सदी की
है, जबकि हम २१ वीं सदी में जी रहे है. हमें २१ वीं सदी का नागरिक कहलाने का कोई
अधिकार नहीं है. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी कहा- बेटे और बेटियों
के बीच भेदभाव को खत्म करना चाहिए. ऎसा करके ही कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सकता
है. यह हमारी सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है वरना हम न केवल मौजूदा पीढ़ी को नुकसान
पहुंचा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भयानक संकट भी आमंत्रित कर रहे
हैं. देश के डाक्टरों को कड़ी फ़टकार लगाते हुए उन्होंने यह कहा कि मेडिकल शिक्षा का
उद्देश्य जीवन बचाना है, न कि बेटियों की हत्या करना है.
उनका यह कोरा भाषण मात्र नहीं था, बल्कि एक समृद्ध होते देश को एक खुली
चेतावनी भी थी. निश्चित रूप से हमें इसकी गहराई में जाकर सोचने की आवश्यकता पड़ेगी
कि उन्हें आखिर ऎसा क्यों बोलना पड़ा ? २१ वीं सदी में जब हम अन्तरिक्ष में कदम बढ़ा
चुके हैं, देश-विदेशों में हमारी धाक बनी है, हम नित नूतन आविष्कार करते हुए भारत
को गौरव प्रदान कर रहे हैं, ठीक ऎसे समय में देश के प्रधानमंत्री जी को आखिर यह
प्रश्न क्यों कर उठाना पड़ा?
प्रधानमंत्री जी कहते, न भी कहते, लेकिन यह आज की कड़वी सच्चाई है कि बड़े
पैमाने पर कन्या भ्रूण की धड़ल्ले से हत्या की जा रही है. उन्हें कोख में ही मार
दिया जाता है. शायद इसके पीछे यह मुख्य कारण यह हो सकता है कि बेटी होगी तो उसका
लालन-पोषण करना पड़ेगा, उसे लिखाना-पढ़ाना होगा और एक दिन उसकी शादी भी करनी पड़ेगी.
निश्चित ही इन कार्यों मे एक मोटी रकम का खर्चा भी होगा. अभिभावक यह भी जानता है
कि बेटी आखिर होती ही है पराया धन. फ़िर इस पर इतनी रकम खर्च करने की क्या आवश्यकता
है ? बेटी पर किया गया खर्च लौटकर आने वाला नहीं है. अतः उस पर भारी रकम क्यों
खर्च की जाए? इस प्रकार की सोच निरन्तर बलवती होती चली गई. वे यह भी सोचते हैं कि
अगर इतना पैसा बेटों पर खर्च करेंगे, तो वह धन कमा के लाएगा, जिससे हमारा ऎश्वर्य
बढ़ेगा, समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा. स्टेटस बढ़ेगा. इसी संकीर्ण सोच के चलते समाज का
ढांचा लड़खड़ा गया.
ऎसी सोच वाला आदमी यह नहीं सोच पाता कि वह आखिर बहू लाएगा भी तो कहां से,
क्योंकि सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उनके यहाँ बेटी पैदा न हो. यदि इस प्रकार की
सोच को मैं घटिया मानसिकता कहूं, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. इसी घटिया सोच के चलते
न जाने कितनी कन्याएँ भ्रूण गर्भ में ही मार दी जाती हैं. यदि किसी कारणवश नहीं
मारी जा सकी तो उसे किसी गन्दे नाले में या कूड़ाघर में फ़ेंक दिया जाता है, गला
घोंट कर मौत के हवाले कर दिया जाता है. बहू को लगातार कन्या ही पैदा हो रही हो, तो
उसकी क्या गत बनती है परिवार में, यह भी हमसे छिपा नहीं है. सास तो सास, बेटा भी
अपनी पत्नि पर जुल्म ढाने में पीछे नहीं रहता. शायद वह यह नहीं जानता या जानना
नहीं चाहता कि इसमें उसकी पत्नि का तनिक मात्र भी दोष नहीं है. लेकिन सारा दोष बहू
पर लाद दिया जाता है और उस पर अनगिनत अत्याचार होने लगते हैं.
गर्भ में लड़का पल रहा है या लड़की इसकी जांच के लिए मशीनें इजाद की गई हैं,
जिससे यह पता चल जाता है कि लड़की होगी या फ़िर लड़का. लड़की होने की पुष्टि होते ही
उसे मार डालने का षड़यंत्र शुरु हो जाता हैं. डाक्टर जानता है कि इस प्रकार का
कृत्य कानूनन अपराध है, लेकिन मोटी रकम पाने की लालसा उसे ऎसा करने के लिए बाध्य
कर देती है.
बरसों से चल रही इस मानसिकता के चलते समाज में विसंगतियां पैदा होने लगी है.
लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या तेजी से घट रही है. लड़किया ढूंढे मिल नहीं
पाती है फ़िर दहेज का दानव चीतकार कर रहा होता है. जिसके घर बेटी है, जरुरी नहीं कि
वह दौलतमंद ही होगा. वह दहेज में मोटी रकम नहीं दे सकता. फ़लस्वरूप होता यह है कि
लड़की मां-बाप पर बोझ बनती चली जाती है और उन्हें न जाने कितनी ही मानसिक आघातों को
झेलना होता है. कुल मिलाकर स्थिति यह बन पड़ती है कि लड़के तो लड़के, लड़कियां तक
कुंवारी रह जाने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं.
लड़कियाँ अब मां-बाप का बोझ नहीं बल्कि उनका सहारा बनकर आगे आ रही हैं. एक
जमाना था जब उन्हें अनेकानेक पाबंदियों से होकर गुजरना पड़ता था. घर का सारा
काम-काज निपटाते रहने के बावजूद, लिंग-भेद का तनाव झेलने के बाद भी बेटियां वे समय
में से समय चुराकर अपनी पढ़ाई कर लेती हैं और अच्छे नम्बरों से पास ही नहीं
होती,बल्कि लाड़ले लड़कों को काफ़ी पीछे धकेल देती हैं. परीक्षा-फ़ल पर नजर डालें तो
सच्चाई देखी जा सकती है.
बेटियां किसी से कम नहीं होती. कभी अभावों के बीच से गुजरते हुए, तो कभी विषम
परिस्थितियों के बीच से गुजरते हुए बेटियों ने सफ़लता की मंजिलों को न सिर्फ़ छूया
है बल्कि विश्व-रिकार्ड भी बनाया है. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इनके
अभिभावकों ने बेटियों को बेटी न मानते हुए उनका लालन-पालन एक लड़के की तरह किया और
उसका परिणाम हम सबके सामने है. आइए, हम उन असाधारण बेटियों की बात करें,जिन्होंने
आगे चलकर इस देश का नाम रोशन किया.
उपकुलपति-हंसा मेहता,विधायक -डा.मुत्तुलक्ष्मी
(१९२६), न्यूज रीडर..येशन मेनन, आई.ए.एस..अन्ना राजम जार्ज, इंगलिश चैनल पार करने
वाली ..आरती साहा, एशियाई खेलों में प्रथम स्वर्ण विजेता-कंवलजीत कौर संधू(
५७.३५..४०० मीटर), इंडियन नेशनल कांग्रेस की महिला अध्यक्ष-विजय लक्ष्मी पण्डित, स्काउट
गाईड की मुख्य आयुक्त -माणिक बर्सले, महिला
टेस्ट में एक पारी में सात विकेट लेने वाली...एन.डेविड, अशोक चक्र से
सम्मानित-नीरजा मिश्रा-हाकी, प्रथम मिसेस वर्ल्ड -अदिति
गोवित्रिकर...२०००, दाँतों से विमान खींचने वाली -सीमा मढोश्रया..(दतिया), एशिया
की सबसे तेज दौडने वाली महिला तैराक. कावेरी ठाकुर, प्रथम महिला विदेश
सचिव-श्रीमती बोथिला अय्यर, सबसे कम उम्र की महापौर-पंचमार्थी अनुराधा
(विजयवाडा-२६ वर्षीय), प्रथम महिला प्रधानमंत्री-श्रीमती इन्दिरा गांधी, राज्यसभा
की प्रथम जनरल सेक्रेटरी-बी.एस.रमादेवी (१-७-९३),प्रथम महिला मेयर-सुलोचना मोदी,
प्रथम महिला राजदूत -विजयलक्ष्मी पण्डित (रूस १९४७-४९), संयुक्त राष्ट्र की प्रथम
महिला अध्यक्ष-विजयलक्ष्मी पण्डित (१९५३),भारत रत्न से सम्मानित-श्रीमती इंदिरा
गांधी (१९७५), प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश-लीला सेठ (हिमाचल ९१),सुप्रीम कोर्ट की
प्रथम महिला जज-मीरा साहिबा फ़ातिमा बीवी,फ़िंगरप्रिंट की प्रथम महिला चीफ़
एक्सपर्ट-वारथाम्बल (मद्रास १९५२),राज्यसभा की प्रथम महिला उपसभापति-मार्गरेट
अल्वा, गिनीज बुक आफ़ रिकार्ड्स में सर्वाधिक नाम दर्ज कराने वाली..भुवनेश्वरी
(स्क्वाश खेल),ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली-आशापूर्णा देवी,साहित्य अकादमी
पुरस्कार प्राप्त करने वाली-अमृता प्रीतम, फ़िल्म स्क्रीन पर आने वाली प्रथम
महिला-दुर्गाबाई और उनकी पुत्री कमलाबाई(मोहिनी भस्मासुर), स्क्रीन पर आने वाली
बालिका कलाकार दादा फ़ाल्के की पुत्री मन्दाकिनी(१९१८), प्रथम महिला भारत
केसरी-मास्टर चन्दीराम की पुत्री सोनिका, भारत में प्रथम महिला शासक-रजिया
सुल्तान,मंत्रीमंडल में प्रथम राजकुमारी-अमृतकौर (कपूरथला),प्रथम महिला
मंत्री-श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित (१९३७),प्रथम महिला मुख्यमंत्री-श्रीमती सुचेता
कृपलानी, एअर बस की प्रथम महिला पायलट-दुर्गा बनर्जी, प्रथम महिला
जिलाधिकारी-के.श्रीनिवास (मद्रास), एशियाई खेलों में सर्वाधिक स्वर्ण पदक
विजेता पी.टी.ऊषा,समुद्री यात्रा द्वारा
विश्व का चक्कर लगाने वाली- उज्जवला राय (१९८८),प्रथम महिला डीजल इंजिन
ड्राइवर-मुमताज कथावला (१९८८), प्रथम महिला जिसके विमान पर ध्वज लहराया
गया-विजयलक्ष्मी पण्डित, प्रथम मिस युनिवर्स-सुष्मिता सेन(२१-११-९४), प्रथम विश्व
सुंदरी-रीता फ़ारिहा (१९६६), चुनाव लडने वाली प्रथम महिला-कमलादेवी चट्टॊपाध्याय, प्रथम
पुलिस महानिदेशक-श्रीमती कंचन चौधरी भट्टाचार्य, कस्टम एण्ड एक्साइज
आयुक्त-कौशल्या नारायण, प्रथम दस्यु सुन्दरी-पुतलीबाई, अन्डर वर्ल्ड की पहली महिला
शूटर-प्रिया चन्द्रकला राजपूत, पद्मश्री की उपाधि पाने वाली पहली महिला-नर्गिस
दत्त (१९५८), बी.जे.पी सरकार की प्रथम महिला मुख्यमंत्री-श्रीमती सुषमा स्वराज,
प्रथम महिला बस ड्राइवर-वसन्तकुमार (कन्याकुमारी),संघ लोकसेवा आयोग की
अध्यक्षा-रोज मियिन मैथ्यूज, योजना आयोग की अध्यक्ष-श्रीमती इंदिरा गांधी, प्रथम
महिला चिकित्सक-मेजर जनरल जी.ए.एम.राम, प्रथम महिला बैंक मैनेजर-शांताकुमार(सिंडिकेट
बैंक बंगलोर), प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी--हर्षा (१९८६), सेना में उच्चतम पद पर
पहुंचने वाली-मेजर जनरल पी.एस. सरस्वती(आर्मी नर्सिंग सेवा ),चित्रपट की प्रथम
नायिका-देविका रानी प्रथम पोस्टमास्टर जनरल- श्रीमती सुशीला चौरसिया (१९७९), प्रथम
महिला चीफ़ इंजीनियर--पी.के.त्रेसिया नागूंली, टेनिस का डब्ल्यू टी.ए. खिताब जीतने
वाली- सानिया मिर्जा (२००३ हैदराबाद).
जमाना बदल गया है लेकिन मानसिकता अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पायी है.
मुझे तो बेसब्री से उस दिन की प्रतीक्षा है जब बेटी को दुर्भाग्य नहीं बल्कि
सौभाग्य की तरह माना जाएगा. कहावत है कि बेटी एक-साथ दो कुलों को तारती हैं.... एक
बेटी अगर साक्षर होती है...उन्नति की देहलीज पर जा खड़ी होती है तो वह न सिर्फ़
मां-बाप के गौरव में श्रीवृद्धि करती है,अपितु अपने ससुराल पक्ष का भी नाम रौशन
करती है. अपने को एक सभ्य और सुसंस्कृत मानने वाले हर उस व्यक्ति की जवाबदारी बनती
है कि वह अपने पास-पड़ौस के नासमझ लोगों को जागृत करे ..उन्हें समझाएं और एक
समतामूलक समाज का निर्माण करे जिससे बेटियों और बेटॊं के बीच के भेद-भाव को जड़-मूल
से समाप्त किया जा सके.
15 भारतीय परिप्रेक्ष्य में सर्व
प्रथम महिलाएँ.
उपकुलपति ........ हंसा
मेहता
विधायक.... डा.मुत्तुलक्ष्मी
(१९२६)
न्यूज रीडर......... येशन
मेनन
आई.ए.एस..... ` अन्ना राजम
जार्ज
इंगलिश चैनल पार करने वाली ....... आरती साहा
एशियाई खेलों में प्रथम स्वर्ण विजेता. कंवलजीत कौर संधू( ५७.३५..४०० मीटर)
इंडियन नेशनल कांग्रेस की महिला अध्यक्ष विजय लक्ष्मी पण्डित
स्काउट गाईड की मुख्य आयुक्त माणिक बर्सले
महिला टेस्ट में एक पारी में सात विकेट लेने वाली... एन.डेविड
अशोक चक्र से सम्मानित नीरजा
मिश्रा ..हाकी
प्रथम मिसेस वर्ल्ड अदिति
गोवित्रिकर...२०००
दाँतों से विमान खींचने वाली सीमा मढोश्रया..(दतिया)
एशिया की सबसे तेज दौडने वाली महिला तैराक. कावेरी ठाकुर
प्रथम महिला विदेश सचिव श्रीमती
बोथिला अय्यर
सबसे कम उम्र की महापौर पंचमार्थी
अनुराधा (विजयवाडा-२६ वर्षीय)
प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती
इन्दिरा गांधी
राज्यसभा की प्रथम जनरल सेक्रेटरी बी.एस.रमादेवी (१-७-९३)
प्रथम महिला मेयर सुलोचना
मोदी
प्रथम महिला राजदूत विजयलक्ष्मी
पण्डित (रूस १९४७-४९)
संयुक्त राष्ट्र की प्रथम महिला अध्यक्ष विजयलक्ष्मी पण्डित (१९५३)
भारत रत्न से सम्मानित श्रीमती
इंदिरा गांधी (१९७५)
प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ (हिमाचल ९१)
सुप्रीम कोर्ट की प्रथम महिला जज मीरा साहिबा फ़ातिमा बीवी
फ़िंगरप्रिंट की प्रथम महिला चीफ़ एक्सपर्ट वारथाम्बल (मद्रास १९५२)
राज्यसभा की प्रथम महिला उपसभापति मार्गरेट अल्वा.
गिनीज बुक आफ़ रिकार्ड्स में सर्वाधिक नाम दर्ज कराने
वाली..भुवनेश्वरी (स्क्वाश खेल)
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाली आशापूर्णा देवी
साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाली अमृता प्रीतम
फ़िल्म स्क्रीन पर आने वाली प्रथम महिला दुर्गाबाई और उनकी पुत्री कमलाबाई(मोहिनी
भस्मासुर)
स्क्रीन पर आने वाली बालिका कलाकार दादा फ़ाल्के की पुत्री मन्दाकिनी(१९१८)
प्रतन महिला भारत केसरी मास्टर
चन्दीराम की पुत्री सोनिका
भारत में प्रथम महिला शासक रजिया
सुल्तान
मंत्रीमंडल में प्रथम राजकुमारी अमृतकौर (कपूरथला)
प्रथम महिला मंत्री श्रीमती
विजयलक्ष्मी पण्डित (१९३७)
प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती
सुचेता कृपलानी
एअर बस की प्रथम महिला पायलट दुर्गा बनर्जी
प्रथम महिला जिलाधिकारी के.श्रीनिवास
(मद्रास)
एशियाई खेलों में सर्वाधिक स्वर्ण पदक विजेता पी.टी.ऊषा.
समुद्री यात्रा द्वारा विश्व का चक्कर लगाने वाली उज्जवला राय (१९८८)
प्रथम महिला डीजल इंजिन ड्राइवर
मुमताज कथावला (१९८८)
प्रथम महिला जिसके विमान पर ध्वज लहराया गया- विजयलक्ष्मी पण्डित
प्रथम मिस युनिवर्स सुष्मिता
सेन(२१-११-९४)
प्रथम विश्व सुंदरी रीता
फ़ारिहा (१९६६)
चुनाव लडने वाली प्रथम महिला कमलादेवी चट्टॊपाध्याय
प्रथम पुलिस महानिदेशक श्रीमती
कंचन चौधरी भट्टाचार्य
कस्टम एण्ड एक्साइज आयुक्त कौशल्या
नारायण
प्रथम दस्यु सुन्दरी पुतलीबाई
अन्डर वर्ल्ड की पहली महिला शूटर प्रिया चन्द्रकला राजपूत
पद्मश्री की उपाधि पाने वाली पहली महिला नर्गिस दत्त (१९५८)
बी.जे.पी सरकार की प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती सुषमा स्वाराज
प्रथम महिला बस ड्राइवर वसन्तकुमार
(कन्याकुमारी)
संघलोकसेवा आयोग की अध्यक्षा रोज मियिन बैथ्यूज
योजना आयोग की अध्यक्ष श्रीमती
इंदिरा गांधी
प्रथम महिला चिकित्सक मेजर जनरल
जी.ए.एम.राम
प्रथम महिला बैंक मैनेजर शांताकुमार(सिंडिकेट
बैंक बंगलोर)
प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी हर्षा
(१९८६)
सेना में उच्चतम पद पर पहुंचने वाली मेजर जनरल
पी.एस.सरस्वती (आर्मी नर्सिंग सेवा)
चित्रपट की प्रथम नायिका देविका
रानी
प्रथम पोस्टमास्टर जनरल सुशीला
चौरसिया (१९७९)
प्रथम महिला चीफ़ इंजीनियर पी.के.त्रेसिया
नागूंली
टेनिस का डब्ल्यू टी.ए. खिताब जीतने वाली सानिया
मिर्जा (२००३ हैदराबाद)
16
भारतीय
महिलाएँ एवं आरण्य संस्कृति
पॆट की आग बुझाने
के लिए अनाज चाहिए, अनाज को खाने योग्य बनाने के लिए उसे कूटना-छानना पडता है और
फ़िर रोटियां बनाने के लिए आटा तैयार करना होता है. इतना सब होने के बाद, उसे पकाने
के लिए ईंधन चाहिए और ईंधन जंगलॊं से प्राप्त करना होता है. इस तरह पेट में धधक
रही आग को शांत किया जा सकता है.
बात यहाँ नहीं रुकती.
जब पेट भर चुका होता है तो फ़िर आदमी के सामने तरह-तरह के जरुरतें उठ खड़ी होने लगती
हैं. अब उसे रहने के लिए एक छत चाहिए ,जिसमें लकड़ियाँ लगती है. लकडियाँ जंगल से
प्राप्त होती है. फ़िर उसे बैठेने-सोने अथवा अपना सामान रखने के लिए पलंग-कुर्सियाँ
और अलमारियाँ चाहिए, इनके बनाने के लिए लकड़ियाँ चाहिए. लकड़ियाँ केवल जंगल से ही
प्राप्त होती है. द्रुत गति से भागने के लिए वाहन चाहिए. गाड़ियां बनाने के किए
कारखाने चाहिए और कारखाने को खड़ा करने के लिए सैकडॊं एकड़ जगह चाहिए. अब गाड़ियों कि
पेट्रोल चाहिए. उसने धरती के गर्भ में कुएं खोद डाले .कारखाने चलाने के लिए बिजली
चाहिए. और बिजली के उत्पादन के लिए कोयला और पानी. अब वह धरती पर कुदाल चलाता है
और धरती के गर्भ में छिपी संपदा का दोहन करने लगता है. कारखाना सैकडॊं की तादात
में गाड़ियों का उत्पाद करता है. अब गाड़ियों को दौडने के जगह चाहिए. सड़कों का जाल
बिछाया जाने लगता है और देखते ही देखते कई पहाड़ियां जमीदोज हो जाती है., जंगल साफ़
हो जाते हैं बस्तियां उजाड़ दी जाती है, आज
स्थिति यह बन पड़ी है कि आम आदमी को सेड़क पर चलने को जगह नहीं बची.
अब आसमान छूती
इमारतें बनने लगी हैं इनके निर्माण में एक
बडा भूभाग लगता है. कल-कारखानों और अन्य बिजली के उपकरणॊं
को चलाने के लिए बिजली चाहिए नयी बसाहट को.पीने को पानी चाहिए. इन सबकी आपूर्ति के
लिए जगह-जगह बांध बनाए जाने लगे. सैकडॊ एकड जमीन बांध में चली गई. बांध के कारण
आसपास की जगह दलदली हो जाती है, जिसमें कुछ भी उगाया नहीं जा सकता. आदमी की भूख
यहां भी नहीं रुकती है. अब हिमालय जैसा संवेदनशील इलाका भी विकास के नाम पर बलि
चढाने को तैयार किया जा रहा है. करीब दो सौ योजनाएं बन चुकी है और करीब छः सौ
फ़ाईलों में दस्तखत के इन्तजार में पडी है. बडॆ-बडॆ बांध बनाए जा रहे हैं और नदियों
का वास्तविक बहाव बदला जा रहा है. उत्तराखण्ड में आयी भीषण त्रासदी,और भी अन्य
त्रासदियाँ, आदमी की विकासगाथा की कहानी कह रही है.
आने वाले समय में सब कुछ विकास के
नाम पर चढ़ चुका होगा. जब पेड़ नहीं होंगे तो कार्बनडाइआक्साईड और अन्य जहरीले गैसों का जमावड़ा हो जाएगा?
फ़ेफ़डॊं में घुसने वाली जहरीली हवा का दरवाजा कौन बंद करेगा? बादलों से बरसने के
लिए किसके भरोसे मनुहार करोगे ?भारत के पुरुषॊं ने भले ही इस आवाज को अनसुना कर
दिया हो, लेकिन भारतीय महिलाओं ने इसके मर्म को-सत्य को पहचाना है.
इतिहास को किसी कटघरे में खड़ा करने
की आवश्यक्ता नहीं है. वर्तमान भी इसका साक्षी है. महिलाएँ आज भी वृक्षों की पूजा
कर रही हैं. वटवृक्ष के सात चक्कर लगाती है और उसे भाई मानकर उसके तनों में मौली
बांधती हैं और अपने परिवार के लिए और बच्चों के लिए मंगलकामनाओं और सुख-समृद्धि के
लिए प्रार्थनाएँ करती है. तुलसी के पौधे में रोज सुबह नहा-धोकर लोटा भर जल चढाती
हैं. और रोज शाम को उसके पौधे के नीचे दीप बारना नहीं भूलती है. तुलसी के वृक्ष
में वह वॄंदा और श्रीकृष्ण को पाती हैं. उनका विवाह रचाती है. पीपल के वृक्ष में
जल चढाना –उसके चक्कर लगाना और दीपक रखना नहीं भूलतीं. अमुआ की डाल पर झुला बांधकर
कजरी गाती और अपने भाई से सुरक्षा और नेह मांगती है. अनेकों कष्ट सहकर बच्चों
का पालन-पोषण करना, कष्ट सहना, उसकी मर्यादा है. और
संवेदनशीलता उसका मौलिक गुण. यदि धोके से कोई एक छोटा सा
कीड़ा/मकोड़ा भी उसके पैरों तले आ जाए, तो वह असहज हो उठती है और
यह कष्ट, उसे अन्दर तक हिलाकार रख देता है. जो ममता की साक्षात मूरत हो, जिसके
हृदय में दया-ममता-वात्सल्य का सागर लहलहाता रहता हो, वह भला क्योंकर जीवित वृक्ष
को काटने की सोचेगी ?.
उद्योगपतियों को कागज के ,निर्माण
के लिए मोटे,घने वृक्ष चाहिए, लम्बे सफ़ेद और विदेशी नस्ल के यूक्लिप्टिस चाहिए और
अन्य उद्योगों के लिए उमदा किस्म के पेड़ चाहिए., तब वे लाचार-हैरान-परेशान,- गरीब
तबके को स्त्री-पुरुषॊं को ज्यादा मजदूरी के एवज में घेरते हैं और वृक्ष काटने
जैसा जघन्य अपराध करने के लिए मजबूर करते है. मजबूरी का जब मजदूरी के साथ संयोग
होता है तो गाज पेडॊं पर गिरना लाजमी है. इनकी मिली-भगत का नतीजा है कि
कितने ही वृक्ष रात के अन्धेरे में बलि चढ़ जाते हैं. इस प्रवृत्ति के चलते न जाने
कितने ही गिरोह पैदा हो गए हैं,जिनका एक ही मकसद होता है –पॆड़ काटना और पैसा
बनाना. अब तो ये गिरोह अपने साथ धारदार हथियार के साथ पिस्तौल जैसे हथियार भी रखने
लगे हैं. वन विभाग के अधिकारी और गस्ती दल,सरकारी कानून में बंधे रहने के कारण,
इनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते. केवल खानापूर्ति होती रहती है. यदि कोई पकड़ा भी गया,
तो उसको कड़ी सजा दिए जाने का प्रावधान भी नहीं है. उसकी गिरफ़तार होते ही जमानतदार
तैयार खड़ा रहता है. इस तरह वनमाफ़िया अपना साम्राज्य फ़ैलाता रहता है. देखते ही
देखते न जाने कितने पहाडॊं को अब तक नंगा किया जा चुका है. आश्चर्य तो तब होता है
कि इस काम में महिलाएं भी बडॆ पैमाने में जुड़ चुकी हैं,जो वृक्ष पूजन को अपना धर्म
मानती आयी हैं. यह उनकी अपनी मजबूरी है,क्योंकि पति शराबी है-जुआरी है-बेरोजगार है-कामचोर
है, बच्चों की लाईन लगी है, उनके पॆट में भूख कोहराम मचा रही है, अब उस ममतामयी
माँ की मजबूरी हो जाती है और माफ़ियों से जा जुडती हैं.
एक पहलू
और भी है
तस्वीर का दूसरा एक
पहलू और भी है और वह है त्याग, बलिदान और उत्सर्ग का. पुरुष का पौरुष जहाँ चुक
जाता है, वहीं नारी “रणचंडी” बनकर खडी हो जाती है .इतिहास के पृष्ठ, ऎसे
दृष्टान्तो से भरे पडे हैं. नारी के कुर्बानी के सामने प्रुरुष नतमस्तक होकर खडा
रह जाता है. जहाँ नारी अपने शिशु को अपने जीवन का अर्क पिलाकर उसे पालती-पोसती है,
अगर जरुरत पडॆ तो अपने बच्चे को दीवार में चुनवाने में भी पीछे नहीं हटतीं. पन्ना
धाई के उस बलिदानी उत्सर्ग को कैसे भुलाया जा सकता है.? जब मर्द
फ़िरंगियों की चमचागिरी में अल्मस्त हो,अथवा आततायियों के मांद में जा दुबका हो, तो
एक नारी झांसी की रानी के रुप में उसकी सत्ता को चुनौतियाँ देती हुई ललकारती
हैं.और इन आततायियों के विरुद्ध शस्त्र उठा लेती है.
पर्यावरण की रक्षा को महिलाओं ने
धार्मिक अनुष्ठान की तरह माना है और अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं. “चिपको”
आन्दोलन आखिर क्या है?. उसने पूंजींवादी व्यवस्था, शासनतंत्र और समाज के तथाकथित
टेकेदारों के सामने जो आदर्श प्रस्तुत किया है ,वह अपने आपमें अनूठा है. जब कोई
पेड काटने आता है, तो वे उनसे जा चिपकती है, और उन्हें ललकाराते हुए कहती हैं कि
पेड के साथ हम भी कट जाएंगी,लेकिन इन्हें कटने नहीं देंगी. लाल खून की यह कुर्बानी
देश के लाखों-करोडॊं पेडॊं की रक्षार्थ खडी हुई. यह एक अहिंसक विरोध था और इन
अहिंसा के सामने उन दुर्दांतों को नतमस्तक होना पडा. ऎसी नारियों का नाम बडी
श्रद्धा के साथ लिए जाते हैं. वे हैं करमा, गौरा, अमृतादेवी, दामी और चीमा
आदि-आदि. पेड़ों के खातिर अपना बालिदान देकर ये अमर हो गई और समूची मानवता को संदेश
दे गई कि जब पेड़ ही नहीं बचेगा, तो जीवन भी नहीं बचेगा. इस अमर संदेश की गूंज
आज भी सुनाई पडती है.
विश्नोई समाज ने पर्यावरण के रक्षा
का एक इतिहास ही रच डाला है. पुरुष-स्त्री, बालक-बालिकाएं पेडॊं से जा चिपके और
उनके साथ अपना जीवन भी होम करते रहे थे. विश्व में ऎसे उदाहरण बिरले ही मिलते हैं.
जोधपुर का तिलसणी गाँव आज भी अपनी गवाही देने को तैयार है कि यहाँ प्रकृति की
रक्षा में विश्नोई समाज ने अपने प्राणॊं की आहूतियाँ दी थी. श्रीमती खींवनी खोखर
और नेतू नीणा का बलिदान अकारण नहीं जा सकता. शताब्दियां इन्हें और इनके बलिदान को
सादर नमन करती रहेंगी. बात संवत 1787 की है. जोधपुर के
महाराजा के भव्य महल के निर्माण के लिए चूना पकाने के लिए लकडियाँ चाहिए थी. सब
जानते थे कि केजडली का वनांचल वृक्षॊं से भरा-पूरा है. वहाँ के लोग पेडॊं को अपने
जीवन का अभिन्न अंग मानते है. ये पेड उनके सुख-दुख में सगे-संबंधियों की तरह और
अकाल पडने पर बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते रहे हैं. लोग इस बात से भी भली-भांति
परिचित थे कि वे पेडॊं कॊ किसी भी कीमत पर कटने नहीं देंगे. महाराजा ने कारिन्दों
की एक बडी फ़ौज भेजी, जो कुल्हाडियों से लैस थी. उन्हें दलबल के साथ आता देख
ग्रामीणॊं ने अनुनय-विनय आदि किए, हाथ जोडॆ और कहा की ये पेड हमारे राजस्थान के
कल्पवृक्ष हैं. ये पेड़ धरती के वरदान स्वरुप हैं. आप चाहें हमारे प्राण ले लें
लेकिन हम पेड़ों को काटने नहीं देंगे. इस अहिंसात्मक टॊली की अगुआयी अमृता देवी ने
की. थीं.
अमृतादेवी पेड
से चिपकी अमृतादेवी
वे सामने
आयीं और एक पेड से जा चिपकी और गर्जना करते हुए कहा-“चलाओ अपनी कुल्हाडी....मैं
भले ही कट जाऊँ लेकिन इन्हें कटने नहीं दूंगी.” उसकी आवाज सुनी-अनसुनी
कर दी गई और एक कारिन्दे ने आगे बढकर उसके ऊपर कुल्हाडी का निर्मम प्रहार करना
शुरु कर दिया. अपनी माँ को मृत पाकर इनकी तीन बेटियाँ वृक्ष से आकर लिपट गईं.
कारिन्दे ने निर्मम प्रहार करने में देर नहीं लगाई. कुल्हाडी के वार उनके शरीर पर
पडते जा रहे थे और उनके मुख से केवल एक ही बोल फ़ूट रहे थे:-“सिर साठे सट्टे
रुंख रहे तो भी सस्तो जाण”. इनके बलिदान ने ग्रामीणॊं के मन में एक
अभूतपूर्व जोश और उत्साह को बढा दिया था. इसके बाद बारी-बारी से ग्रामीण पेडॊं से
जा चिपकता और कारिन्दे उन्हें अपनी कुल्हाडी का निशाना बनाते जाता. इस तरह 363
व्यक्तियों ने हँसते-हँसते अपने प्राणॊं का उत्सर्ग कर दिया.
हम जब
इतिहास की बात कर ही रहे हैं तो और थोडा पीछे की ओर चलते हैं. और उस पौराणिक युग
की यात्रा करते हैं ,जब प्रकृति और मनुष्य के जीवन के बीच कैसे संबंध थे.
मत्स्यपुराण
में वृक्ष लगाने कि विधि बतलायी गई है.
“पादानां विधिं सूत//यथावद
विस्तराद वद//विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्दापनं बुधै//ये चे लोकाः स्मृतास्तेषां
तानिदानीं वदस्व नः
ऋषियों ने सूतजी से पूछा;- ’अब आप हमें विस्तार
के साथ वृक्ष लगाने की यथार्थ विधि बतलाइये. विद्वानों को किस विधि से वृक्ष लगाने
चाहिए तथा वृक्षारोपण करने वालों के लिए जिन लोकों की प्राप्ति बतलायी गयी है,
उन्हें भी आप इस समय हम लोगों को बतलाइए”.
सूतजी
ने वृक्ष लगाए जाने के की विधि के बारे में विस्तार से वर्णण किया है. वर्तमान समय
में शायद ही इस विधि से कोई वृक्ष लगा पाता है. वृक्ष लगाने वाले अतिविशिष्ठ
व्यक्ति के लिए, पहले ही इसकी व्यवस्था करा दी जाती है. उनके आने का इन्तजार किया
जाता है और उसके आते ही उसे फ़ूलमालाओं से लाद दिया जाता है और वृक्ष लगाते समय उन
महाशय की फ़ोटॊ उतारकर अखबार में प्रकाशित करा दी जाती है. उसके बाद उस वृक्ष की
जडॊं में, पानी डालने शायद ही कोई जा पाता है. नतीजन वृक्ष सूख जाता है. कोशिश तो
यह होनी चाहिए कि वृक्ष पले-बढे, और लोगो को शीतल छाया और फ़ल दे सके. यदि ऎसा होता
तो अब तक उस क्षेत्र विशेष में हरियाला का साम्राज्य छाया होता और न जाने कितने
फ़ायदे वहां के रहवासियों को मिलते. खैर. सूतजी ने वृक्ष लगाए जाने पर किस-किस चीज
की प्राप्ति होती है बतलाया है.
“अनेन विधिना यस्तु कुर्याद वृक्षोत्सवं/ सर्वान कामानवाप्नोति फ़लं
चानन्त्यमुश्नुते यश्चैकमपि
राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः/सोSपि स्वर्गे वसेद राजन
यावदिन्द्रायुतत्रयम भूतान भव्यांश्च
मनुजांस्तारयेदद्रुमसम्मितान/परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम य इदं श्रृणुयान्नित्यं श्रावयेद वापि
मानवः/सोSपि सम्पूजितो देवैब्रर्ह्मलोके महीपते(16-17-18-19)
अर्थात:-
जो विद्वान उपर्युक्त विधि से वृक्षारोपण का उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ
पूर्ण होती है. राजेन्द्र ! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्ष की स्थापना करता है,
वह जब तक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं ,तब तक स्वर्ग में निवास करता है. वह
जितने वृक्षों का रोपण करता है, अपने पहले और पीछॆ की उतनी ही पीढियों का उद्धार
कर देता है तथा उसे पुनरावृत्ति से रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है. जो मनुष्य
प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओं द्वारा सम्मानित और
ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है.”(मत्स्यपुराण-उनसठवाँ अध्याय)
मत्स्यपुराण
में वृक्षों का वर्णण बार-बार मिलता है. इसके अलावा पद्मपुराण, भविष्यपुराण,
स्कन्दादिपुराणॊं में इसकी विस्तार से विधियां बतलायी गईं है.
“य़स्य भूमिः प्रमाSन्तरिक्षमुतोदरम/दिव्यं
यश्च बूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रहमणॆ नमः(अथर्ववेद (१०/७/३२)
अर्थात
“भूमि जिसकी पादस्थानीय़ और अन्तरिक्ष उदर के समान है तथा द्दुलोक जिसका मस्तक है,
उन सबसे बडॆ ब्रह्म को नमस्कार है.”
यहाँ
परमब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार कर, प्रकृति के अनुसार चलने का निर्देश दिया गया
है. वेदों के अनुसार प्रकृति एवं पुरुष का सम्बन्ध एक दूसरे पर आधारित है. ऋग्वेद
में प्रकृति का मनोहारी चित्रण हुआ है. वहाँ प्राकृतिक जीवन को ही सुख-शांति का
आधार माना गया है. किस ऋतु में कैसा रहन-सहन हो, क्या खान-पान हो, क्या सावधानियाँ
हों- इन सबका सम्यक वर्णण है.
ऋग्वेद (७/१०३/७)
में वर्षा ऋतु को उत्सव मानकर शस्य-श्यामला प्रकृति के साथ, अपनी हार्दिक
प्रसन्नता अभिव्यक्त की गयी है.
वेर्दों के अनुसार
पर्यावरण को अनेक वर्गों में बांटा जा सकता है.-यथा- वायु-,जल,-ध्वनि-,खाद्य और
मिट्टी, वनस्पति, वनसंपदा, पशु-पक्षी-संरक्षण आदि. स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए
पर्यावरणकी रक्षा में वायु की स्वछता का प्रथम स्थान है. बिना प्राणवायु के एक
क्षण भी जीना संभव नहीं है. ईश्वर ने प्राणिजगत के लिए संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर
वायु का सागर फ़ैला रखा है. हमारे शरीर में रक्त-वाहिनियों में बहता हुआ खून, बाहर
की तरफ़ दवाब डालता है, यदि इसे संतुलित नहीं किया गया तो शरीर की धमनियां फ़ट
जाएगीं और हमारा जीवन नष्ट हो जाएगा. वायु का सागर इससे हमारी रक्षा करता है.
पॆड-पौधे आक्सीजन देकर क्लोरोफ़िल की उपस्थिति में, इसमें से कार्बनडाईआक्साइड अपने
लिए रख लेते हैं और हमें आक्सीजन देते हैं. इस प्रकार पेड-पौधे वायु की शुद्धि
द्वारा हमारी प्राण-रक्षा करते हैं.
वायु की शुद्धि के लिए यजुर्वेद में
स्पष्ट किया है .
“तनूनपादसुरो
विश्ववेदा देवो देवेषु देवः/पथो अनक्तु मध्वा घृतेन” (२७/१२)
“द्वाविमौ
वातौ वात सिन्धोरा परावतः/दक्षं ते अन्य आ वायु परान्यो वातु यद्रपः (ऋग्वेद-१०/१३७/२)
यददौ वात
ते गृहेSमृतस्य निधिर्हितः/ततो नो देहि जीवसे (ऋग्वेद-१०/१८६/३)
हमारे पूर्वजों को यह
ज्ञान था कि हवा कई प्रकार के गैसों का मिश्रण है, उनके अलग-अलग गुण एवं अवगुण
हैं, इसमें प्राणवायु भी है, जो हमारे जीवन के लिए आवश्यक है. शुद्ध ताजी हवा अमूल्य
औषधी है और वह हमारी आयु को बढ़ाती है.
वेदों में यह भी कहा गया है कि तीखी
ध्वनि से बचें, आपस में वार्ता करते समय धीमा एवं मधुर बोलें.
मा
भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा/सम्यश्च सव्रता भूत्वा वाचं वदत
भद्रया(अथर्ववेद
३/३०/३). जिव्हाया अग्र मधु मे जिव्हामूले मधूलकम/ममेदह क्रतावसो मम
चित्तमुपायसि(अथर्वेवेद१/३४/२)
अर्थात;-
मेरी जीभ से मधुर शब्द निकलें. भगवान का भजन-पूजन-कीर्तन करते समय मूल में मधुरता
हो. मधुरता मेरे कर्म में निश्चय रहे. मेरे चित्त में मधुरता बनी रहे..इसी तरह
खाद्य-प्रदूषण से बचाव के उपाय एवं. मिट्टी(पृथ्वी) एवं वनस्पतियों में प्रदूषण की
रोकथाम के उपाय भी बतलाए गए हैं.
यस्यामन्नं
व्रीहियवौ यस्या इमाः पंच कृष्टयः/भूम्यै पर्जन्यपल्यै नोमोSत्तु वर्षमेदसे.(अथर्ववेद-१२/१/४२)
अर्थात;-
भोजन और स्वास्थय देने वाली सभी वनस्पतियाँ इस भूमि पर उत्पन्न होती है. पृथ्वि
सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं,क्योंकि वर्षा के रुप में पानी बहाकर यह
पृथ्वी में गर्भाधान करता है.
आप किसी
भी ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए,सभी में प्रकृति का यशोगान मिलेगा और यह भी मिलेगा कि
आपके और उसके बीच कैसे संबंध होंने चाहिए और किस तरह से हमें उसॆ स्वस्थ और स्वच्छ
बनाए रखना है. शायद हम भूलते जा रहे हैं कि पर्यावरण चेतना हमारी संस्कृति का
एक अटूट हिस्सा रहा है. हमने हमेशा से ही उसे मातृभाव से देखा है.
प्यार-दुलार-और जीवन देने वाली माता के रुप में. जो मां अपने बच्चे को, अपने जीवन
का अर्क निकालकर पिलाती हो, उसे उस दूध की कीमत जानना चाहिए. यदि हम उसके साथ
दुर्व्यवहार करेंगे, उसका अपमान करेंगे अथवा उसकी उपेक्षा करेंगे, तो निश्चित ही
उसके मन में हमारे प्रति ममत्व का भाव स्वतः ही तिरोहित होता जाएगा. काफ़ी गलतियाँ
करने के बावजूद ,माँ कभी भी अपने बच्चों पर कुपित नहीं होती. लेकिन जब अति हो जाए
–मर्यादा टूट जाए तो फ़िर उसके क्रोध को झेलना कठिन हो जाता है. अपनी मर्यादा की
रक्षा के लिए फ़िर उसे अपने बच्चों की बलि लेने में भी, कोई झिझक नहीं होती. म.प्र,20
17. मनोभावों को परिमार्जित करने के लिए गीता
सामान्य मनुष्य में प्रेम –दया-क्षमा-करुणा तथा सहानुभूति जैसे सकारात्मक भाव
कम आते हैं. ईर्ष्या, लोभ-मोह तथा क्रोध जैसे नकारात्मक भाव अधिक आते हैं.
विचारों की अपनी तरंगे होती है. इन तरंगों के माध्यम से विचार एक स्थान से दूसरे
स्थान और एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँचते रहते हैं. यदि आप किसी से मित्रवत
व्यवहार करेंगे तो वह आपका मित्र बन जाएगा. यदि आप किसी के साथ शत्रुता या ईर्ष्या
का भाव रखेंगे तो व्यक्ति निश्चित ही आपका शत्रु बन जाएगा. मनुष्य अपने भावों और
विचारों का विकिरण भी करता रहता है. किसी समुदाय में एक प्रसन्नचित व्याक्ति सबको
प्रसन्नचित बना देता है तथा दुखी व्यक्ति अपने दुख को अन्य लोगों में भी संप्रेषित
कर देता है.. नकारात्मक विचार और भाव चारों ओर नकारात्मक उर्जा का ही प्रसार
करेंगे, जिससे पूरा वातावरण प्रतिकूल रुप से प्रभावित होगा. नकारात्मक विचार हमसे
मूल्य वसूलते हैं. मन इससे अशांत रहताही है .नकारात्मक भाव अथवा विचार हमें
सामाजिकरुप से अलोकप्रिय एवं असम्मानित बनाते हैं.
नकारात्मक भावों और विचारों का परिमार्जन हर समझदार व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक
आवश्यकता है. इन मनोयोगों पर नियंत्रण एक पेचीदा मसला है. आधुनिक मनोवैज्ञान तथा
श्रीमद्ग गीता में मनोभावों के परिष्कार के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है.
मनोविज्ञान स्वतः अपरिपक्व अवस्था में है और इसने अनेकों बार अपनी मान्यताओं का
खंडन किया है.गीता पांच हजार साल से भी अधिक वर्षॊं से लोगों का मार्गदर्शन कर रही
है और यह आधुनिक मनोविज्ञान की तुलना मे अधिक भरोसेमंद है.
क्रोध एक पचंड मनोयोग है. हर व्यक्ति कभी न कभी इसका शिकार अवश्य होता है.
क्रोध हमारा एक प्रमुख शत्रु है. गीता में कई स्थानों पर क्रोद्ध का उल्लेख हुआ
है. गीता के दूसरे अद्ध्याय के बासठवें और तिरसठवें श्लोक में श्रीकृष्णजी ने
क्रोध उतपन्न होने के कारण तथा उससे होने वाली हानि और क्रोध को नियंत्रण करने के
उपाय पर प्रकाश डाला है.
“ध्यायते विषयान पुंसः संग
स्तेषूपजायते संगात संजायते कामः कामात क्रोधोभिजायते.क्रोद्धात भवति
सम्मोह,सम्मोहात स्मृतिविभ्र स्मृतिभ्रंशात बुद्धिनाशो, बुद्धिनाशात प्रणश्यति”
अर्थात विष्यों का निरन्तर ध्यान करते-करते व्यक्ति के मन मे विषयों के प्रति
रस उत्पन्न होता है. इस रस के कारण मनुष्यों के मन में विषयों के प्रति इच्छा
जागती है. इच्छापूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है. क्रोद्ध से स्मृति लुप्त
हो जाती है. स्मृति लोप से बुद्धि का नाश हो जाता है. बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य
स्वमेव नष्ट हो जाता है. यदि आप क्रोध से मुक्त होना चाहते हैं तो विषयों के प्रति
मन में उसे उत्पन्न ही न होने दें. यदि विषयों के प्रति कुछ अनुराग उत्पन्न हो ही
गया है तो उनकी इच्छा ही न उत्पन्न होने दें. इच्छापूर्ति में में बाधा से ही
क्रोध उत्पना होता है,इच्छाओं का गणित एक विचित्र प्रकार का गणित है. इन्हें समूल
नष्ट करने के तथा मन को नियंत्रत करने के अनेक उपाय गीता मे बताए गए हैं. ध्यान
करन, सात्विक आहर लेना, मन में सद्विचारों को जागृत करना,परमात्मा का चिन्तन करना,
तथा परमात्मा के प्रति समर्पण भाव रखना आदि ऎसे उपाय है,जो मनोभावों को नियंत्रित
तथा शुद्ध रखने में सहायक होते हैं.
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से एक से एक सरल उपाय
बताए हैं. हमें अपनी रुचि और शक्ति के अनुसार उपाय का चुनाव करके उसका सतत अभ्यास
करना चाहिए.
------------------------------------------------------------------------------------------------
18
मंदाकिनी
का प्राकृतिक सौंदर्य
महर्षि वाल्मिक
श्रीरामजी के समकालीन थे. उन्होंने अपनी आँखों से जो देखा उसे जस का तस लिख दिया.
उनके द्वारा रचित वह अद्भुत ग्रंथ बाल्मिक-रामायण के नाम से विख्यात हुआ. चुंकि
उस समय के समस्त ऋषि-मुनि-तपस्वी-जंगलों में निवास करते थे. उनके आश्रमों में, उस समय के तत्कालीन राजा-महाराजाओं के पुत्र
शिक्षा-दीक्षा पाते थे.
आलेख में उल्लेखित प्रंसग उस समय का
है, जब रामजी अपने वनवास काल में चित्रकूट में निवास कर रहे थे और भरतजी अपने
प्राणसम भ्राता श्रीराम को वापिस लाने के प्रयोजन से अपनी माताऒं, भाइयों तथा गुरु
वशिष्ट सहित भरद्वाज मुनि के आश्रम तक जा पहुँचे और.उन्होंने मुनिश्री को अपने
आगमन का प्रयोजन कह सुनाया. तत्पश्चात उन्होंने परिवारसहित मुनिश्री का आथित्य
ग्रहण किया. रात भर आश्रम में विश्राम करने के बाद, सबेरा होने पर प्रस्थान करने
के लिए आज्ञा मांगी ,साथ ही चित्रकूट पहुँचने के लिए उपयुक्त मार्ग की जानकारी
चाही.
प्रस्तुत आलेख को
दो भागों में विभक्त किया गया है. पहले भाग में भरद्वाज मुनि, भरत को राम का पता
बतलाते हुए चित्रकूट पर्वत तथा प्रवाहित होती मन्दाकिनी का और आसपास के प्राकृतिक
सौंदर्य का वर्णन करते हैं. तथा दूसरे भाग में उस स्थान में निवास कर रहे श्रीराम
उसी प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अपनी प्राणप्रिया सीता को करा रहे होते हैं.
बाल्मीक रामायण में प्रकाशित कुछ श्लोंकों के माध्यम से उस प्राकृतिक सौंदर्य का
रसास्वादन करते चलते हैं.
महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनि
ने भाई के दर्शन की लालसा वाले भरत को इस प्रकार उत्तर दिया.
भाग-१ ‘भरतार्धतृतीयेषु योजनेष्वजने वने
/ चित्रकूटगिरिस्तत्र
रम्यनिर्झरकाननः(१०)
भरत,
यहाँ से ढाई योजन की दूरी पर एक निर्झर वन में चित्रकूट नामक पर्वत है, जहाँ के
झरने और वन बडॆ ही रमणीय है (प्रयाग से चित्रकूट की आधुनिक दूरी लगभग २८ कोस
है) भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसी
में निवास करते हैं.
“उत्तरं
पार्श्वमासाद्द तस्य मन्दाकिनी नदी / पुष्पितद्रुमसंछन्ना रम्यपुष्पितकानना(११) अनन्तरं तत्सरितश्र्चित्रकूटं च
पर्वतम / तयोः पर्णकुटीं तात तत्र तौ वसतो ध्रुवम(१२)
उसके उत्तरी किनारे से मन्दाकिनी
नदी बहती है, जो फ़ूलों से लदे सघन वृक्षों से आच्छादित रहती है, उसके आस-पास का वन
बडा ही रमणीय़ और नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित है. उस नदी के उस पार चित्रकूट
पर्वत है. तात ! वहाँ पहुँचकर तुम नदी और पर्वत के बीच में श्रीराम की पर्णकुटी
देखोगे. वे दोनो भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसी में निवास करते हैं.
गुरु वशिष्ठ भी श्री
लक्षमणजी के साथ यात्रा कर रहे थे. उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि हम भरद्वाजजी के
बतलाए हुए स्थान तक आ पहुंचे
“ अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा
मन्दाकिनी नदी / एतत प्रकाशते
दूरान्नीलमेघनिभं वनम(८)
जान पडता
है कि यही चित्रकूट पर्वत है तथा मन्दाकिनी नदी बह रही है. यह पर्वत के आस-पास का
वन दूर से नील मेघ के समान प्रकाशित हो रहा है.
भाग-२
श्रीराम
का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन
ठीक इसी समय, श्रीराम सीता का प्रिय
करने की इच्छा से तथा अपने मन को बहलाने के लिए अपनी भार्या को विचित्र चित्रकूट
की शोभा का दर्शन करवा रहे थे. चित्रकूट दिखलाने के बाद श्रीरामजी ने मिथिलेशकुमारी
सीता को पुण्यसलिला रमणीय मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराया.
“विचित्रपुलिनां
सम्यो संससारससेविताम/कुसुमैरुपसम्पन्नां.पश्य मन्दाकिनी नदीं(३)
प्रिये !
अब मन्दामिनी नदी की शोभा देखों हंस और सारसों से सेवित होने के कारण यह कितनी
सुन्दर जान पडती है. इसका किनारा बडा ही विचित्र है. नाना प्रकार के पुष्प इसकी
शोभा बढा रहे हैं.
“नानाविधैस्तीररुहैर्वृतां
पुष्पफ़लद्रुमैः/राज्न्ती राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः(४)
“फ़ल और
फ़ूलों के भार से लदे हुए नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से घिरी यह मन्दाकिनी
कुबेर के सौगन्धिक सरोवर की भांति सब ओर से सुशोभित हो रही है.
“मृगयूथनिपीतानि कलुषाम्भांसि
साम्प्रतम/तीर्थानि रमणीयानि रतिं संजनयन्ति मे.(५)
हरिनों के
झुंड पानी पीकर इस समय यद्दपि यहाँ का जल गंदला कर गये हैं तथापि इसके रमणीय घाट
मेरे मन को बडा आनन्द दे रहे हैं.
“जटाजिनधराः काले वल्कलोत्तरवाससः/
ऋषय्स्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनी प्रिये (६)
प्रिये !
वह देखो, जटा, मृगचर्म और वल्कल का उत्तरीय घारण करने वले महर्षि उपयुक्त समय में
आकर इस मन्दाकिनी नदी में स्नान कर रहे हैं.
“आदित्यमुपतिष्ठन्ते
नयमादूध्र्वबाहवः/एते परे विशालाक्षि मनयः संशितव्रताः(७)
विशाललोचने
! ये दूसरे मुनि, जो कठोर व्रत का पालन करने वाले हैं, नैत्यिक नियम के कारण दोनों
भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यदेव का उपस्थान कर रहे हैं.
“मारुतोद्धूतशिखरैः प्रनृत्त एव
पर्वतः/ पादपैः पुष्पपत्राणि सृजभ्दिरभितो नदीम (८)
हवा के
झोंके से जिनकी शाखाएँ झूम रही हैं, अतएव जो मन्दाकिनी नदी के उभय तटॊं पर फ़ूल और
पत्ते बिखेर रहे हैं, उन वृक्षों से उपलक्षित हुआ यह पर्वत मानॊ नृत्य-सा करने लगा
है.
क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित
सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनी नदीम (९)
देखो !
मन्दाकिनी नदी की कैसी शोभा है, कहीं तो इसमें मोतियों के समान स्वच्छ जल बहता
दिखायी देता है, कहीं यह ऊँचे कगारों से ही शोभा पाती है और कहीं सिद्धजन इसमें
अवगाहन कर रहे हैं तथा यह उनमे व्याप्त दिखाई देती है.
निर्धूतान वायुना पश्य विततान
पुष्पसंचयाना/पोप्लूयमानानपरान पश्य त्वं तनुमध्ये(१०)
सूक्ष्म
कटिप्रदेशवाली सुन्दरि ! देखो, वायु के द्वारा उडाकर लाये ये ढेर-के-ढेर फ़ूल किस
तरह मन्दाकिनी के दोनों तटॊं पर फ़ैले हुए हैं और वे दूसरे पुष्पसमूह कैसे पानी पर
तैर रहे हैं.
“पश्यैतद्वल्गुवचसो रथांगाह्वयना
द्विजाः/अधिरोहन्ति कल्याणि निष्कूजन्तः शुभा गिरः(११)
कल्याणि !
देखो तो सही, ये मीठी बोली बोलने वाले चक्रवाक पक्षी सुन्दर कलरव करते हुए किस तरह
नदी के तटॊं पर आरुढ हो रहे हैं.
“दर्शनं चित्राकूटस्य
मन्दाकिन्याश्च शोभने/ अदहिकं पुरवासाच्च मन्य तव च दर्शनात (१२)
शोभने !
यहाँ जो प्रतिदिन चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन होता है, वह अयोध्यानिवास की
अपेक्षा भी अधिक सुखद जान पडता है.
विधूतकल्मषैः
सिद्धैस्तपोदमशमान्वितैः/नित्यविक्षोभिजलां विगाहस्व मया सह(१३)
इस नदी
में प्रतिदिन तपस्या इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह से समपन्न निष्पाप सिद्ध महात्माओं
के अवगाहन करने से इसका जल विक्षुब्ध होता रहता है. चलो, तुम भी मेरे साथ इसमें
स्नान करो.
सखीवच्च विगाहस्व सीते मन्दामिनी
नदीम/ कमलान्यवमज्जन्ती पुष्कराणि च भामिनि(१४)
“भामिनि
सीते ! एक सखी दूसरी सखी के साथ जैसे क्रीडा करती है, उसी प्रकार तुम मन्दाकिनी
नदी में उतरकर इसके लाल और श्वेत कमलों को जल में डुबोती हुई इसमें स्नान-क्रीडा
करो.
त्वं पौरजनवद व्यालानयोध्यामिव
पर्वतम/ मन्यस्व वनितेर नित्यं सरयूवदिमां नदीम(१५)
प्रिये !
तुम इस वन के निवासियों को पुरवासी के समान समझो, चित्रकूट पर्वत को अयोध्या के
तुल्य मानो और इस मन्दाकिनी नदी को सरयू के सदृश जानो.
लक्ष्मणश्र्चैव धरमात्मा
मन्निदेशे व्यवस्थितः/त्वं चानुकूला वैदेहि प्रीतिं जनयती मम(१६)
विदेहनन्दिनि
! धर्मात्मा लक्षमण सदा मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं और तुम भी मेरे मन के अनुकूल
ही चलती हो, इससे मुझे बडी प्रसन्नता होती है.
उपस्पृशंस्त्रिषवर्ण
मधुमूलफ़लाशनः/नायोध्यायै न राज्याअय स्पृहये च त्वया सह(१७)
प्रिये !
तुम्हारे साथ तीनों काल स्नान करके मधुर फ़ल-मूल आहार करता हुआ मैं न तो अयोध्या
जाने की इच्छा रखता हूँ और न राज्य पाने की ही
इमां हि रम्यां
गजयूथलोडितां/निपीततोयां गजसिंहवानरै/सुपुष्पितां पुष्पभरैरलंकृतां न सोSस्ति
यः स्यान्न गतक्लमः सुखी”
जिसे
हाथियों के समूह मथे डालते है तथा सिंह और वानर जिसका जल पिया करते हैं, जिसके
तटपर सुन्दर पुष्पों से लदे वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जो पुण्यसमूहों से अलंकृत है,
ऎसी इस रमणीय मन्दाकिनी नदी में स्नान करके जो ग्लानिरहित और सुखी न हो जाय-ऎसा
मनुष्य इस संसार में नहीं है.
“इतीव रामो बहुसंगतं वचः
प्रियासहायः सरितं प्रति ब्रुवन/चचार रम्यं नयनांजनप्रभं स चित्रकूटं रघुवंशवर्धनः”
रघुवंश की
वृद्धि करने वाले श्रीरामचन्द्रजी मन्दाकिनी नदी के प्रति ऎसी अनेक प्रकार की
सुसंगत बातें कहते हुए नील-कान्तिवाले रमणीय चित्रकूट पर्वत पर अपनी प्रिया पत्नी
सीता के साथ विचरने लगे.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------
19 मित्रों और अमित्रों की पहचान.
युधिष्ठिर
ने पितामह भीष्म जी से पूछा- " हे
पितामह ! छोटे से छोटा काम को भी अकेले किसी की सहायता के बिना करना कठिन हो जाता
है. फिर राजा का कार्य तो दूसरे की सहायता लिए बिना हो ही नहीं सकता ? इसलिए मंत्री का होना आवश्यक है. अब आप
बताइए राजा का मंत्री कैसा होना चाहिए? उसका स्वभाव और
आचरण किस तरह का हो, कैसे व्यक्ति पर विश्वास किया जाया
और कैसे पर नहीं?
भीष्मजी
ने उत्तर देते हुए कहा- हे बुद्धिमान
युधिष्ठर ! राजा के पांच प्रकार के मित्र होते है. एक - सहार्थ (जो
किसी शर्त पर एक दुसरे की सहायता के लिए मित्रता करते है ). दूसरा- भजमान (
जिनके साथ पुश्तैनी मित्रता हो ). तीसरा- सहज ( जिनके के साथ नजदीकी
रिश्तेदारी हो उन्हें सहज मित्र कहते है). चौथा- कृत्रिम ( धन आदि देकर अपनाए हुए
लोग होते है). पांचवा मित्र धर्मात्मा होता है, वह किसी एक का पक्षपाती नहीं होता और न ही
दोनों पक्षों से वेतन लेकर कपटपूर्वक दोनों का ही मित्र बना रहता है. जिधर धर्म का
पल्ला मजबूत रहता है उसी पक्ष का वह आश्रय ग्रहण करता है अथवा जो राजा धर्म में
स्थित होता है, वही उसे अपनी ओर खीच लेता है.
उपर्युक्त मित्रो में से भजमान और सहज श्रेष्ठ समझे जाते है. शेष
दो की ओर से तो सदा सशंक रहना चाहिए. वास्तव में अपने कार्य को दृष्टि में रख सब
प्रकार के मित्रो से ही सावधान रहना चाहिए. राजा को मित्रो की रक्षा करने में कभी
असावधानी नहीं करनी चाहिए, क्योकि असावधान राजा का सब लोग तिरस्कार करते है.
प्रश्न- मनुष्य
का चित्त चंचल होता है, भला मनुष्य बुरा
और बुरा भला हो जाया करता है, शत्रु मित्र और मित्र शत्रु
बन जाता है, अतः किस पर कौन विश्वास करे?.
उत्तर- " इसलिए मुख्य-मुख्य कार्यो को दूसरो पर न छोड़कर
अपने सामने ही करना चाहिए. किसी पर भी पूरा-पूरा विश्वास कर लेने से धर्म और
अर्थ दोनों का नाश होता है. दूसरो पर पूरी तरह विश्वास करना अकाल म्रत्यु को मोल
लेना है, अन्धविश्वासी को विपत्ति में पड़ना पड़ता है. वह
जिस पर विश्वास करता है उसी की इच्छा पर उसका जीना
निर्भर रहता है. इसलिए राजा को कुछ लोगो पर विश्वास भी करना चाहिए और उनकी ओर से
सतर्क भी रहना चाहिए. यही सनातन राजनीति है".
"अपने अभाव में जिस मनुष्य का राज्य पर कब्ज़ा हो सकता हो,
उससे सदा चौकन्ना रहा चाहिए, क्योकि विज्ञ पुरुषो ने उसकी शत्रुओ में गणना की गई
है".
"जो
मनुष्य राजा का अभुदय देखकर उसकी और भी
अधिक उन्नति चाहे और अवनत होने पर बहुत दुःखी हो जाए, वही उत्तम मित्र है".
"अपने
न रहने पर जिस व्यक्ति को विशेष हानि पहुँचने
की सम्भावना हो उस पर पिता के समान विश्वास करना चाहिए. और जब
अपने धन की वृद्धि हुई हो तो यथाशक्ति उसको भी
समृद्धशाली बनाना चाहिए. जो धर्म के कामो में भी राजा को नुकसान से बचाने का ध्यान
रखता है. उसकी हानि देखकर जिसको भय होता है. उसे ही उत्तम मित्र समझो. नुकसान
चाहने वाले तो शत्रु भी बनाये गए है".
"जो
मित्र की उन्नति देखकर जलता नहीं और विपत्ति देखकर घबरा उठता है, वह मित्र अपनी
आत्मा के सामान होता है".
"जिसका
रूप- रंग सुन्दर और स्वर मीठा हो, जो क्षमाशील , ईर्ष्या रहित ,
प्रतिष्ठित और कुलीन हो, उसकी श्रेणी पूर्वोक्त मित्र से भी
बढ़कर है".
"जिसकी
बुद्धि अच्छी और स्मरण शक्ति तीव्र हो, जो कार्य साधने में कुशल और स्वभावतः
दयालु हो, कभी मान या अपमान हो जाने पर, जिसके ह्रदय में
दुर्भाव नहीं आता, ऐसा मनुष्य यदि अत्यंत सम्मानित मित्र हो तो उसे तुम अपने घर
में मंत्री बनाकर रख सकते हो. वह तुम्हारे विशेष आदर का पात्र है.. उसको राजकीय
गुप्त विचारो तथा धर्म और अर्थ की प्रकृति से परिचित रखना. उसके ऊपर तुम्हारा पिता
के सामान विश्वास होना चाहिए".
"एक
काम पर एक ही व्यक्ति को नियुक्त करना, दो या तीन को नहीं, क्योंकि उनमें परस्पर अनबन हो जाने की सम्भावना बनी रहती है. कारण यह कि एक कार्य पर
नियुक्त हुए अनेक व्यक्तियों में प्रायः मतभेद होता ही है".
"जो कीर्ति को प्रधानता देता है और मर्यादा के भीतर कायम
रखता है, शक्तिशाली पुरुषो से द्वेष और अनर्थ नहीं करता,
कामना, भय, लोभ
अथवा क्रोध से भी जो धर्म का त्याग नहीं करता, जिसमे कार्यकुशलता तथा आवश्कता के
अनुरूप बातचीत करने की पूरी योग्यता हो, उसे तुम अपना प्रधान मंत्री बनाना. जो
कुलीन, शीलवान, सहनशील, डींग न मारनेवाला , शूरवीर, आर्य, विद्वान तथा कर्तव्य- अकर्तव्य को समझने
में कुशल हो, उन्हें अमात्य के पद पर बैठाना एवं
सत्कारपूर्वक सुख और सुविधा देना. ये तुम्हारे अच्छे सहायक सिद्ध होंगे और सब तरह
के कामों की देखभाल करेगे".
" हे युधिष्ठिर !
तुम अपने कुटुम्बियों को मृत्यु के समान समझकर उनसे सदा डरते रहना.
जैसे पड़ोसी राजा अपने पास के राजा की उन्नति नहीं सह सकता, उसी प्रकार एक कुटुम्बी दुसरे कुटुम्बी का अभ्युदय नहीं देख सकता.
जिसके कुटुम्बी या सगे संबंधी नहीं हैं, उसको भी सुख नहीं मिलता. इसलिए कुटुम्बी-
जनों की अवहेलना नहीं करना चाहिए. बंधु-बांधव से
हीन मनुष्य को दुसरे लोग दबाते है. यदि गैर आदमी अपने जातिवाले का अपमान कर रहा हो
तो, अपने जाती वाले के अपमान को वह अपना ही अपमान समझेगा. इस प्रकार कुटुम्बी जनों
के रहने में गुण भी है और अवगुण भी. कुटुंब का व्यक्ति, न अनुग्रह मानता है,
न नमस्कार करता है. उनमें भलाई बुराई दोनों देखने में आती है".
"राजा का कर्तव्य है कि वह अपने जातीय बंधुओ का वाणी और
क्रिया से सत्कार करे. सदा ही उनकी भलाई करता रहे. कभी कोई बुराई न होने दे. उन पर
विश्वास तो न करे, किन्तु विश्वास करनेवाले की भांति ही उनके साथ वर्ताव करे. उनमे
दोष है या गुण इसकी चर्चा न करे. जो पुरुष सदा सावधान रहकर ऐसा बर्ताव करता है,
उसके शत्रु भी प्रसन्न होकर, उसके साथ मित्रता का बर्ताव करने
लगते है. जो कुटुम्बी, सगे-संबंधी , मित्र, शत्रु तथा उदासीन व्यक्तियों के साथ,
इस नीति के अनुसार व्यवहार करता है, उसका सुयश चिर काल तक
बना रहता है".
20
राजा के कर्तव्य
(गोवर्धन यादव.)
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. भीष्म पितामह
बाणॊं की शैय्या पर पड़े हुए उत्तरायण की प्रतिक्षा कर रहे थे. सूर्य के उत्तरायण
होने पर वे देह त्यागने वाले थे. एक दिन भगवान श्री कृष्ण जी ने उनसे मिलने का
निश्चय किया और धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल आदि मुख्य वीरों को लेकर कुरुक्षेत्र
में जा पहुँचे. इस समय भीष्म ध्यानावस्थित होकर भगवान श्री कृष्ण की स्तुति कर रहे
थे. सभी लोगों को निकट आया हुआ देखकर वे गदगद हो उठे. इसी समय श्रीकृष्ण भीष्म से
मधुर वाणी में बोले- हे भीष्मजी ! आपको शर-शय्या पर पड़े-पड़े महान कष्ट हो रहा
होगा. फ़िर भी आपकी तरह मृत्यु को इस तरह वश में करने वाला मैंने तीनों लोकों में
आज तक नहीं देखा. ये धर्मराज ! अपने कुटुम्ब के नाश हो जाने से महान दुखी हो रहे
हैं. अब आप जैसे भी हो इनके दुःख दूर करें. आप महान राजनीतिज्ञ हैं. कृपा करके आप
इन्हें राज-धर्म की अच्छी तरह समझा दें.
श्री कृष्ण की बात सुनकर भीष्म ने उनकी स्तुति
करते हुए कहा-“हे मधुसुदन...हे माधव..आप तो स्वयं धर्म के सभी मर्मों को समझने
वाले हैं. फ़िर आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ?. मैं तो आपका शिष्य हूँ. अच्छा हो कि
आप स्वयं धर्मराज को इसके बारे में समझायें. इस समय मेरे शरीर में अत्यन्त दाह और
पीड़ा है. मुझमें बोलने के शक्ति भी नहीं रह गयी है, फ़िर मैं धर्मोपदेश किस प्रकार
दे सकूँगा”
श्री कृष्णजी भीष्मजी के कथन को सुनकर बोले-“
हे भीष्मजी ! संसार में जितने भी सत-असत पदार्थ हैं, वे मुझसे ही उत्पन्न हैं. अतः
मैं तो यश से परिपूर्ण हूँ ही. किन्तु मैं आप जैसे भक्तों का यश बढ़ाने हेतु आपके
ही मुख से युधिष्ठर को उपदेशित कराना चाहता हूं., जिससे संसार में आपका सम्मान और
भी बढ़े. आपके मुख से निकला हुआ हर वाक्य वेद-वाक्य होगा. आप दोष से मुक्त और
ज्ञानी हैं. अतएव आप ही धर्मराज को उपदेश देने की कृपा करें. इसके लिए मैं आपको
वरदान देता हूँ कि अब से आपको कोई पीड़ा दाह या व्यथा न रह जाएगी और आपकी
स्मरण-शक्ति भी पहले से भी करोड़ गुनी तेज हो जाएगी.
दूसरे दिन श्रीकृष्ण पुनः पाण्डवों के सथ रथ
पर आरूढ होकर भीष्मजी के पास जा पहुँचे. वहाँ उन्होंने देखा कि ऋषि-मण्डली पहले से
ही विराजमान है. धर्मराज युधिष्ठर ने पितामह सहित सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम किया
और भीष्म से बोले-“ हे पितामह ! आप मुझे राजधर्म के बारे में विस्तार से बतलाने की
कृपा करें”.
भीष्मजी ने कहा”-“ हे धर्मराज ! मैं भगवान
श्रीकृष्ण एवं सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम कर तुमसे राजधर्म कहता हूँ, उसे सुनिये.
हे कुरुराज ! राजा ऎसा होना चाहिए जो प्रजा को प्रसन्न रख सके. राजा को सदैव
पुरुषार्थी होना चाहिए. उसे दैव के भरोसे होकर कभी पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना
चाहिए.
" हे वत्स ! कार्य में असफ़लता होने पर
राजा को खिन्न नहीं होना चाहिए. उसे सत्यवादी होना चाहिए. राजा का स्वभाव न कोमल
हो न कठोर हो, क्योंकि कोमल स्वभाव वाले राजा की आज्ञा कोई नहीं मानता और कठोर
स्वभाव वाले राजा से प्रजा बहुत दुख उठाती है. ब्राह्मणॊं को प्राणदण्ड नहीं देना
चाहिए, उसे देश-निकाले का दण्ड पर्याप्त है. अग्नि जल से, क्षत्रिय ब्राह्मण से
तथा लोहा पत्थर से नष्ट हो जाता है. ये सारे ही अपने उत्पन्न कर्ता से संघर्ष करने
पर नष्ट हो जाते हैं. जैसे जल अग्नि को नष्ट कर देता है, पत्थर से लोहा कुंद पड
जाता है. लेकिन यदि ब्राहमण युद्ध के लिए ललकारता हो तब उसके वध से पाप नहीं लगता.
राजा को न कभी अपने धर्म का त्याग करना चाहिये और न ही उसे अपराधियों को दण्ड देने
में संकोच करना चाहिए, क्योंकि इस तरह से सेवक मुँह चढ़े हो जाते है और राजकाज में
अवरोध उत्पन्न करने लगते हैं.
"हे राजन ! हर राजा को परिश्रमी एवं
उद्धोगी होना चाहिए. जिस प्रकार बिल में रहने वाले चूहों को सर्प निगल लेता है,
उसी प्रकार दूसरे राजाओं से लड़ाई न करने वाले राजा तथा घर न छॊड़ने वाले ब्राह्मण
को पृथ्वी निगल जाती है.
" हे युधिष्ठिर ! राजा के सात अंग होते हैं- (१) राज्य (२)
मंत्री, (३) मित्र (४) कोष,(५) देश (६) किला और सातवां सेना. राजा को इनकी रक्षा
और सदुपयोग करना चाहिए. राजा के समस्त धर्मों का सार उसका प्रजा-पालन करना चाहिए.
राजा को राज्य प्रबन्ध को सुचारु रुप से चलाने के लिए गुप्तचर रखना चाहिए , जो
राजा को देश के समाचारों से अवगत कराता रहे. राजा को चाहिए कि वह अन्य देश के
राजाओं के साथ सन्धि करके, उन देशों में अपना राजदूत रखे. प्रजा को बिना कष्ट
दिये, कर इस प्रकार वसूलना चाहिए, जैसे गाय को बिना कष्ट दिये उससे दूध ले लिया
जाता है. सेवकों को कभी गुटबन्दी में न पड़ेने देना चाहिए. राजा का कर्तव्य है कि
वह निरन्तर अपने कोष को बढ़ाता रहे. साथ ही निर्बल शत्रु को भी कम न समझे. जैसे
थॊड़ी- सी आग जंगल को जला देती है, उसी प्रकार छॊटा सा शत्रु भी विनाश कर सकता हे”.
भीष्मजी के वचनॊं को सुनकर सभी उपस्थित ऋषियों
ने उनकी प्रशंसा की. फ़िर संध्या होने के कारण सभी लोग वापिस हस्तिनापुर लौट आए.
दूसरे दिन पाण्डव तथा श्रीकृष्णजी नित्य कर्म
से निवृत्त होकर फ़िर कुरुक्षेत्र में भीष्मजी के निकट जा पहुँचे और प्रणाम करने के
बाद उससे पूछा-“ हे पितामह ! कृपा करके बताएँ
कि इस "राजा" शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई?"
उन्होंने कहा- “हे धर्मराज ! सत्ययुग में राजा
नाम की कोई चीज ही नहीं थी. क्योंकि उस समय न कोई दण्ड था और न ही कोई अपराध करने
वाला ही था. उसके बाद लोग मोह के वशीभूत होने लगे. मोह से काम की उत्पत्ति हुई और
काम से राग पैदा हुआ.और राग से सभी प्रमादी हो गए और अपने-अपने कर्तव्यों को भूल गए.
कर्म भूलने से धर्म का ह्रास होने लगा. तब ब्रह्माजी ने एक लाख अध्याओं का नीति-
शास्त्र बनाया. वह ग्रन्थ "त्रिवर्ण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ. हे
धर्मराज ! इन शास्त्रों में साम-दाम-दन्ड, भेद तथा उपेक्षा इन पाँचों का पूर्ण
वर्णन है.”
धर्मराज युधिष्ठर ने पूछा-“चारों वर्ण, चारों
आश्रम तथा राजाओं के कौन-कौन से धर्म श्रेष्ठ माने गए हैं.”
भीष्मजी ने कहा-“हे धर्मराज ! धर्म की महिमा
ही अपरम्पार है. उसे ध्यान से सुनो. सच बोलना, क्रोधित न होना, धन को बाँटकर उसका
प्रयोग करना, क्षमा करना, अपनी स्त्री से सन्तान उत्पन्न करना, सौच करना, किसी से
बैर न रखना. ये सभी वर्गों के लिए समान है. ब्राह्मणॊं का धर्म है, इन्द्रिय दमन,
स्वाध्याय करना. क्षत्रियों का धर्म है दान देना तथा किसी से कुछ माँगना नहीं,
यज्ञ करना तथा कराना नहीं. वेदादि का अध्ययन करना, लुटेरों को दण्ड देना तथा प्रजा
का पालन करना. वैश्यों का धर्म है- दान, अध्ययन, यज्ञ करना व पवित्र उपायों से धन
कमाना, खेती कराना और पशुओं का पालन करना. शूद्र का धर्म है इन चारों की सेवा
करना”.
युध्दिष्ठर ने फ़िर पूछा- “हे पितामह ! राष्ट्र
का क्या कर्तव्य है ?”.
भीष्मजी ने उत्तर दिया- हे धर्मराज ! राजा का
राज्याभिषेक करना राष्ट्र का कर्तव्य है. बिना राजा के प्रजा नष्ट हो जाती है.
राज्य में उपद्रव होने लगता है तथा चोरी एवं हिंसा की घटना बढ़ने लगती है. बिना
राजा के सबल निर्बल को खाने लगता है".
युधिष्ठिर ने पूछा-“हे पितामह ! कृपा करके
बतायें कि राजा के क्या कर्तव्य हैं उसे अपने देश की रक्षा कैसे करनी चाहिए?”.
भीष्मजी ने कहा- “ हे धर्मराज ! राजा को पहले
अपने मन को जीत कर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए. उसे राज्य के प्रमुख
स्थानों पर सेना का प्रबन्ध करना चाहिए. साम-दाम-दण्ड, भेद से धन प्राप्त करना
चाहिए तथा प्रजा की आय का छटवाँ भाग कर के रुप में प्राप्त करना चाहिए. राजा का
कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को पुत्र की भाँति माने तथा मित्रों और मंत्रियों की
सलाह से काम करे. जो राजा दण्ड-नीति का पूरा-पूरा प्रयोग करता है, उसके राज्य में
सत्ययुग आ जाता है".
“ हे युधिष्ठिर ! राजा के छत्तीस गुण हैं. जो
इनका पालन करता है, वही स्वर्ग का अधिकारी होता है.
युधिष्ठिर ने कहा – हे पितामह ! शासन बिना
मित्र और मन्त्री की सहायता से नहीं चल सकता. कृपया बताएं कि उसके मित्र और
मन्त्री कैसे होने चाहिए ?”
भीष्मजी ने कहा;- हे धर्मराज ! मित्र चार
प्रकार के होते हैं---सहार्थ, यजमान, सहज, तथा कृत्रिम. इसके अतिरिक्त धर्मात्मा
मित्र भी होता है. ऎसा मित्र किसी का पक्ष न लेकर केवल धर्म का पक्ष लेता है. उक्त
चार मित्रों में पहले के दो मित्र श्रेष्ठ होते हैं और अन्त के मित्र उत्तम नहीं
होते. लेकिन कार्य साधन अपने सभी मित्रों से करना चाहिए. बुद्धिमान राजाओं को किसी
मित्र पर पूरा-पूरा भरोसा नहीं करना चाहिए. ऎसा करने वालों की अकाल मृत्यु हो जाती
है"
".हे युधिष्ठिर ! कुटुम्बियों से सदा
सावधान रहना चाहिए. एक कुटुम्बी दूसरे कुटूम्बी की उन्नति सहन नहीं कर सकता. लेकिन
कुटुम्बियों की अवहेलना कभी नहीं करनी चाहिए. क्योंकि दूसरों के दबाने पर कुटुम्बी
ही सहायता करता है”.
“ हे राजन ! जो मन्त्री खजाने की चोरी करता हो
और राज्य के गुप्त भेदों को खोलता हो, ऎसे मन्त्रियों को नहीं रखना चाहिए. कोष के
स्वामी की सदा रक्षा करते रहना चाहिए, क्योंकि धन के लोभ से लोग मरवा भी सकते हैं.
मन्त्री के पद पर शीलवान, सत्यवादी, सदाचारी तथा दयालु व्यक्ति को ही रखना चाहिए”.
“शत्रु से मित्रता करने वाले को शत्रु ही
समझना चाहिए. उसे गुप्त भेद कभी नही बताना चाहिए. सदाचारी एवं विचारशील व्यक्ति ही
गुप्त सलाह सुनने के अधिकारी हैं .“
युधिष्ठिर ने पूछा’-“ हे पितामह ! राष्ट्र की
रक्षा तथा उसका प्रबन्ध किस प्रकार करना चाहिए?”.
भीष्मजी ने
समझाया;-“ धर्मराज ! राजा को चाहिए कि वह एक ग्राम का एक-एक अधिकारी अलग-अलग रखे.
एक ग्राम वाले अधिकारी का कर्त्तव्य होगा कि वह अपने ग्राम की सब सूचनाएँ दस
ग्रामों के अधिकारी के पास भेजे. उसी प्रकार दस ग्राम वाला सौ अधिकारी के पास उक्त
सूचना को भेज दे. फ़िर सहत्र ग्रामों वाला अधिकारी उसकी सूचना राजा के पास देगा. इस
प्रकार राजा को हर सूचना मिलती रहेगी. ग्रामों की पैदावार ग्रामों के अधिकारियों
के पास ही रहनी चाहिए. वे वेतन के रूप मे नियत उपज का प्रयोग कर सकते हैं. हर नीचे
का अधिकारी अपने ऊपर वाले अधिकारी को कर देता रहे. सौ गाँव के मालिक को उसके खर्च
के लिए एक ग्राम की आमदनी देनी चाहिए. सहत्र ग्रामों वाले अधिकारी के पास युद्ध
समबन्धी सामग्री रहनी चाहिए तथा उनके पास राजा का एक पदाधिकारी रखना चाहिए.
बड़े-बड़े नगरों के प्रबन्ध के लिए एक-एक अध्यक्ष रखना चाहिए. प्रत्येक नगराध्याक्ष
के पास सेना तथा गुप्तचर होंने चाहिए”.
युधिष्ठिर ने फ़िर
प्रश्न किया;- “ हे पितामह ! यदि कोई राजा चढ़ाई कर दे तो उसके साथ किस प्रकार
युद्ध करना चाहिए “.
भीष्मजी ने कहा;-“
हे कुरु नन्दन ! बिना कवच वाले से युद्ध नहीं करना चाहिए. जब कोई कवच धारण कर
अस्त्र-शत्र सम्हाले, सामने आये, तो राजा को तुरन्त उसके साथ युद्ध के लिए
प्रस्तुत हो जाना चाहिए. एक वीर के साथ एक ही वीर का युद्ध होना चहिए. राजा
धर्म-युद्ध में धर्म का आचरण करे एवं कपट युद्द्ध में कपट का. संकट में पड़े हुए
शत्रु पर अथवा अस्त्र त्यागे हुए योद्धा पर तथा रथ से नीचे उतरने वाले या शरण में
आने पर कभी कोई चोट न करे. शिविर मे आने वाले की भली-भाँति चिकित्सा करा कर उसे घर
भिजवा देना चाहिए"..
----------------------------------------------------------------------------------------------------
21
.
हिन्दी फ़िल्मी गीतों में बरसता सावन

रिमझिम के तराने लेकर आई बरसात
अगर कोई मुझसे पूछे कि तुम्हें कौन-सा मौसम सुहावना लगता है, तो मैं बिना समय
गवाएं कह सकता हूँ कि मुझे तो सिर्फ़ बरसात का मौसम सुहाना लगता है. यह वह समय होता
है जब आसमान से इंद्र देवता धरती पर अमृत की वर्षा रहे होते हैं. इस बरसती बूंदों
में कौन भला भींगना नहीं चाहेगा? तन तो भींगता ही भींगता है, साथ में मन भी भींगता
रहता है.
बारिश की पहली फ़ुंवार के साथ ही धरती का कोना-कोना हरियाली की चादर से ढंक
जाता है. शीतल, मंद-मंद हवा के झोंके आपके शरीर को छूकर आगे बढ़ जाते है. कौन भला
इन सुखद हवा के झूलों में झूलना नहीं चाहेगा?. पेड़ों ने हरियल बाना पहन लिया है.
उनकी लचकदार डालियों में, कोई कच्ची कली, अपना
घूंघट खोले, रसिक भौरों को आमंत्रण दे रही होती है. नए
पत्तों से लदी-फ़दी किसी घनी डाली पर बैठी कोयल कुहू..कुहू की स्वर-लहरी बिखेर रही
होती है. झिंगुरों को कौन क्या कहे ? वे अपनी टिर्र-टिर्र से
पूरा वातायण गूंजाने लगते हैं. वे अपनी ही मस्ती में खोए हुए हैं. कान उनकी
टिर्र-टिर्र सुनना नहीं चाहते,लेकिन मजबूर है. आठ महिने धरती के गर्भ में अपने को
छिपाए बैठे मेंढक अब बाहर निकल आते हैं. वे भी अपने आप में किसी सिद्ध गायक की तरह
अपने को पेश करने में लगे हैं. कौन क्या सुनना चाहता है, किसे कौन-सा राग पसंद है,
उन्हें इससे मतलब नहीं. वे तो अपने ढर्रे पर उतर आए हैं और अपनी टर्र-टर्र की आवाज
निकालने में मस्त हैं. शायद उन्हें इस बात का भ्रम बना रहता है कि वे राग-मल्हार
ही गा रहे हैं.
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सभी प्राणी इस रिमझिमाते मौसम में खुश है.
खुश तो ढोर-डंगर भी हैं जिन्हें हरी-हरी,मुलायम घास खाने को जो मिलने लगी है. खुश
तो बेचारे तब भी थे, जब सूखी घास को खाकर किसी तरह अपना उदर-पोषण कर रहे थे. सूखी
घास में वह सुख कहाँ जो हरी-हरी घास में रहती है ! हरा चारा चर कर वे खुश तो हो ही
रहे हैं साथ ही ग्वाला भी खुश हो रहा है. जहाँ वह पाव भर दूध निचोड़ता था, अब किलो
से दुह रहा है. कृषक भी खुश हैं कि उसका खेत फ़सलों से लहलहा रहा है. एक साथ कई
उम्मीद बलवती हो उठती है कि इस बार फ़सल भरपूर होगी, तो वह अपनी सयानी होती बेटी को
डॊली में बिठाकर बिदा कर सकेगा. साहूकार के कर्ज का बोझ उतार सकेगा. अपने
मुन्ना-मुन्नी के लिए नए कपड़े सिलवा सकेगा. गले में नकली सोने की चेन पहने अपनी
प्रियतमा को कम से कम तोला दो तोला का हार ही बनवा देगा. ताल, तलैया, नदी, नाले
सभी खुश हैं कि उनकी प्यास बुझ जाएगी. सबसे ज्यादा खुशी तो उन तमाम नदियों को हो रही होती है, जो भीषण
गर्मी के चलते कृष्काय हो चुकी होती हैं. वे खुश हैं इस बात को लेकर कि आसामान से
बरसते अमृत को पीकर उनकी देह जवान हो उठेगी. जवान होते ही वह कल-कल, छल-छल के स्वर
निनादित करती हुई, अल्हड़ चाल से चलते हुए, पायल बजाते हुए, गीत गाते हुए बह
निकलेगीं. वे इस सोच के चलते भी खुश हो रही होती हैं कि उनके घाटॊं पर फ़िर मेले
लगने लगेगें. प्यासे डोर-डंगर,पखेरु,जंगली जानवर अपनी प्यास बुझा सकेगें और कजरी
गाती नव-यौवनाएं सिर पर जवारों की डलियाँ उठाए उनके तटॊं पर आएगीं. मंगल दीप बारे
जाएंगे, ढोल.ढमाकों के साथ नृत्य-गायन भी होगा. यह सब सोच-सोचकर वे अपने भाग्य की
सराहना करने लगती हैं. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पूरा संसार इस हरियल माहौल
में खुश नजर आ रहा है.
इन बरसती फ़ुंवारों में सभी खुश हो रहे हों, यह कतई जरुरी नहीं है. रिमझिम के
तराने गाती बरसात जहाँ एक ओर ठंडा माहौल बनाने में मगन हैं, वहीं दूसरी ओर कोई
नव-यौवना के मन में विरह की भीषण आग भी लगा जाती है. उसका प्रेमी यह कहकर गया था
कि वह बादलों के साथ लौट आएगा, वह अब तक आया नहीं है और न ही बैरन डाकिया अब तक
उसकी कोई पाति ही लेकर आया है. जैसे-जैसे बारिश तेज होती है, उसके कलेजे की आग
वैसे-वैसे भड़कती जाती है. एक ओर बरसात की झड़ी तेज होती जाती है, ठीक वैसे ही उसकी
कजरारी आँखों से विरहा के बादल फ़टकर बरसने लगते हैं. कहीं कोई निर्वासित, अभिशप्त
यक्ष, पहाड़ की ऊँचाइयों पर चढ़कर, किसी मेघ के आने की प्रतीक्षा में, अपनी देह को
कृषकाय करता हुआ, पाती भेजने की जुगाड़ में लगा हुआ होता है. किसी प्रेमी को किसी
आवश्यक काम से जाना जरुरी होता है, तो उसकी प्रेमिका गलहार बनकर उससे अनुनय करती
है कि बरसात की इस सुहानी घड़ी में उसे अकेला छोड़कर न जाए. या फ़िर बादलों से गुहार
लगाकर कहती है कि इतना बरसो की उसका प्रेमी घर के बाहर कदम निकालने की भी न सोचे.
बरसात के इस सुहाने मौसम को लेकर गीतकारों ने जमकर गीत लिखे. सिर्फ़ लिखे ही
नहीं बल्कि उन तमाम भावनाओं को भी उसके माध्यम से इस तरह पिरोया है कि लोग खुशी से
झूम उठें. कहीं उन्होंने उसे इतना गमगीन बना दिया कि आँखों से आँसू झरझरा कर बह
निकले. उनके लिखे गीतों ने फ़िल्मों में धूम मचा दी. हम सब उन तमाम फ़िल्मों के
निर्माताओं, गीतकारों, संगीतकारों, कलाकारों के ऋणी हैं कि उन्होंने बरसात को
माध्यम बनाकर एक नया संसार रचा. एक नयी चेतना को आयाम दिया और उसे सदा-सदा के लिए
अमर बना दिया.
बरसात पर लिखे गए गाने सिचुएशन को देखकर भी इस्तेमाल किए गए. अधिकतर गीतों में
बारिश का प्रयोग दृष्य को रोमांटिक पुट देने के लिए किया गया, जिसमें प्यार था,
मस्ती थी, रोमांस था, उल्ल्हास था, उमंग थी. इसके अलावा बारिश के गीतों में
अलग-अलग मूड के कई गीत भी थे. कुछ विरह का पुट लिए हुए था, तो कोई मोहब्बत का
पैगाम भेजते हुए था.
फ़िल्म रतन का गीत-“सावन के बादलों” -जबरदस्त हिट हुआ, फ़िल्म गुरु
का गीत” बरसो रे मेघा बरसों”. बरसात की बात चल रही हो तो फ़िल्म “बरसात” को
कैसे भूला जा सकता है...”.हम से मिले तुम सजन” फ़िल्म ४२० का बेहद लोकप्रिय
गाना-“ प्यार हुआ इकरार हुआ” शोमैन राजकपुर और नरगिस गाते हैं और बरसात होती रहती
है, अमिताभ बच्चन-राखी अभिनीत- बरसात की एक रात, भारत भूषण-मधुबाला की फ़िल्म “बरसात,
गोविल-जरीन वहाव अभिनीत-“सावन को आने दो: परख- ओ सजना बरखा बहार आई,
रस का फ़ुवार लाई, कालाबाजार—रिमझिम के तराने ले कर आई बरसात, सुजाता=काली
घटा छाए”, चलती का नाम गाड़ी-“एक लड़की भीगी भागी-सी”,फ़िल्म चिराग-“छाई
बरखा बहार, पड़े अंगना में फ़ुहार, फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ- उमड़ घुमड़ घिर आई
से घटा”,फ़िल्म धरती कहे पुकार के “जारे कारे बदरा बलम के द्वार”, फ़िल्म मिलन-“
सावन का महिना, पवन करे शोर”, फ़िल्म अनजाना-“भीगी भीगी रातों में, फ़िल्म दो
रास्ते-“ छुप गए सारे नजारे ओए क्या बात हो गई”, फ़िल्म मेरा गांव मेरा देश-“
कुछ कहता है सावन”, फ़िल्म आया सावन झूम के-“ बदरा छाए झूले पड़ गए”, फ़िल्म
शर्मीली-“ मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई निंदिया”, फ़िल्म गाइड-“ अल्लाह
मेघ दे पानी दे”, फ़िल्म मंजिल-“ रिमझिम गिरे सावन”, फ़िल्म जुर्माना-“
सावन के झूले पड़े”, फ़िल्म अजनवी-“ भीगी भीगी रातों में”, बेताब
फ़िल्म का गीत-“ बादल यों गरजता है”, फ़िल्म १९४२ ए लव स्टोरी-“ रिमझिम
रिमझिम रुमझुन-रुमझुम”, फ़िल्म किनारा-“ अबके न सावन बरसे”, आशीर्वाद
फ़िल्म से” झिर झिर बरसे सावलीं अखिंया”,, नमकीन फ़िल्म से-“ फ़िर से अइयो
बदरा बिदेसी”, फ़िल्म शोर-“ पानी रे पानी”, फ़िल्म प्यासा सावन-“ मेघा
रे मेघा”, फ़िल्म लगान-“ घनन घनन घन गरजत”, फ़िल्म बरसात की रात-“
गरजत बरसत सावन आये रे”, जुर्माना फ़िल्म का गीत-“ सावन के झूले पड़े तुम चले
आओ”, सावन के नाम से भी अनेके फ़िल्में बनी.जैसे-आया सावन झूम के, सावन को आने दो,
प्यासा सावन आदि.
पिछले चार-पांच दिनों से बारिश हो रही है लगातार. बादल न तो हड़बड़ी में है और न
ही सुस्त-आलसी बने हुए हैं बल्कि हल्की-हल्की फ़ुवार बरस रही
है.....टापुर-टापुर-टिपिर-टिपिर. मैंने कंप्युटर में बरसात पर लिखे गए गानों की
सीरीज खोज निकाली है और आराम कुर्सी में धंसते, बारी-बारी से उन तमाम गीतों को मगन
होकर सुन रहा हूँ. बाहर अब भी बारिश हो रही है टिपिर-टिपिर-टापुर-टापुर. क्या आप
अब तक इन सदाबहार गीतों को सुनने का, उसमें भींगने का मन नहीं बना पाए हों, तो कब
बना पाएगें ?
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
22
लघुकथा- इतिहास के झरोखे से. हिन्दी साहित्य के इतिहास को खंगालाने पर ज्ञात होता है कि विगत सौ-सवा सौ साल
के दौरान कहानियां,निबन्ध,उपन्यास,यात्रा-वृतांत,संस्मरण एवं रिपोर्ताज आदे विधाएं
विकसित हुईं,जिसमें कहानी की विधा सर्वोपरी रही.
ऐसा माना जाता है कि सन
40 के दशक में मराठी भाषा में लघुकथा का सूत्रपात हुआ था.उन दिनों प्रकास्शित होने
वाली साप्ताहिक पत्रिकाओं “चित्रा” तथा “आशा” मासिक पत्रिका “ज्योत्सना” में
लल्घुतम कथा शिर्षक से लघुकथाओं का प्रथम संग्रह प्रकास्शित हुआ था. तब से लेकर
आज तक विभिन्न भाषाऒं में हजारॊं लघुकथाएं प्रकाशित की जा चुकी हैं.
लघुकथा का अर्थ:-
नाम से ही स्पष्ट है कि छॊटी कथा. कम से कम शब्दों मे लिखी गई कथा या बहुत
छोटी कहानी, पर कहानी का संक्षिप्तीकरण नहीं. शिल्प और ट्रीटमेन्ट के कारण कहानी
से स्वतंत्र विधा.(2) छोटी पर अधूरी नहीं(3)छोटी माने केवल एक विषय, एक घटना के मार्मिक बिन्दु पर केन्द्रीत.(4) चरम सीमा से प्रारंभ होते हुए फ़िर अन्त.(5)प्रारम्भ
और अन्त आपस में गुथें हुए.(6) पात्र सृजन ,संघर्ष,
अंतर्द्वंद, वातावरण, वर्णण, विस्तार आदि की गुंजाइश नहीं. बस सब सांकेतिक.
उपरोक्त बिन्दुओं को अपने मे समाअहित करती हुई अगर कोई रचना है तो निःसंदेह वह
लघुकथा ही होगी. उसमें कसाव होगा. तीर की मारक क्षमता होगी. वह आघात भी करेगी. एक
आइसा घाव पैदा करेगी जो आपको कचोटती रहेगी.
लघुकथा का आकार-प्रकार.
लघुकथा का आकार-प्रकार क्या हो? इस संबंध में अब तक कोई मानक मापदण्ड नहीं है.
कुछ विद्वानों का मत है कि लघुकथा में पांच-छः सौ शब्दों के बीच वह सिमट जाना चाहिए. कथा सम्राट
प्रेमचन्द ने भी लघुकथाएं लिखी है. उसमे सबसे कम शब्दों में लिखी गई लघुकथा” “
राष्ट्र का सेवक” है,जिसमें 280 शब्द है. “ बंद
दरवाजा” में 350, “देवी” में 380,
“दरवाजा” में 650, “बाबाजी का भोग” में690, “कश्मीरी सेव में 720, “दूसरी शादी” में 740,”जादू” में 800,” शादी की वजह” में800, “गमी” में 820, “गुरु मंत्र” में 890, तटःआआ “यह भी नशा,वह भी नशा” में 930 शब्द थे.
अतः कहा जा सकता है कि लघुकथा में शब्द में शब्द निर्धारण कोई शर्त नहीं
है,परन्तु उसकी अधिकतम सीमा है अवश्य. यदि ऐसा नहीं होगा तो लघुकथा संकेतों के
व्यंजना के अपने सौंदर्य को खो देगी. वह कहानी बन जाएगी. सपाट, घटना कथा अथवा
सूचना रचना कथा बन कर रह जाएगी.
लघुकथा में आंतरिक उद्वेग जितना घनीभूत होगा, कथ्य जितना स्पष्ट होगा और
कथाकार जित्ना स्क्षम होगा, अभिव्यक्ति उतनी सटीक व प्रभावकारी होगी. अतः कथाकार
को उसकी रचना आकारगत में छोटी रह जाने अथवा लम्बी हो जाने की चिन्ता नहीं करनी
चाहिए.
कालखंडॊं में लघुकथाएं. प्राचीन
काल से ही लघुकथाएं साहित्य की एक विधा थी और संप्रेषण का माध्यम भी. इस काल की
लघुकथाएं पौराणिक साहित्य को समृध्दि प्रदान करती थीं. अतः कहा जा सकता है कि
लघुकथा कोई नयी विधा नहीं है. इसका जन्म तो वैदिक युग में ही हो गया था,किन्तु
इसके स्वरुप में समय व कालचक्र के साथ परिवर्तन होते चले गए.
मध्यकाल सूर-तुलसी,कबीर,जायसी जैसे श्रेष्ठ कवियों का काल था. इस काल
में भक्तिरस में डूबी-पगी कविताएं तथा नायिका के नख-शिख को बयान करती कविताओं का
युग था. गद्ध साहित्य लगभग उपेक्षित ही रहा है. इसीलिए लघुकथा की दृष्टि से यह
अभाव का काल था. \
इस काल में कुछ मुद्रित अंकों की उपलब्धि हुई. जैसे मर्सिया,,सिंहासन बत्तीसी
व माधोनल,चौरासी वैष्णवों की वार्ता आदि. लघुकथाओं की दृष्टि से केवल सिंहासन
बत्तीसी को ही लिया जा सकता है. इसी काल मे कुछ पत्र-पत्रिकाएं प्रकाश में
आयीं,जिसमे सरस्वती, चांद,मतवाला,ब्राह्मण आदि, लेकिन इन पत्र-पत्रिकाओं ने लघुकथा
के महत्व को कोई महत्व नहीं दिया.
1900 से 1947 तक का समय हिन्दी लघुकथा के
प्रारम्भिक युग के नाम से जाना जता है. सन 1901 मे माधवराव
सप्रे की लघुकथा” मिट्टी भर टोकरी” छात्तीसगढ-मित्र पत्रिका में प्रकाशित हुई थी.
बाद में इसे स्व.कमलेश्वर ने सारिका, पहली कहानी में अपने संपादत्वकाल में
प्रकाशित किया था. सरस्वती पत्रिका में
छबीलीलाल गोस्वामी की लघुकथा” विमाता” प्रकाशित हुई,लेकिन शब्दों की संख्या की
अधिकता की वजह से इसे लघुकथा की श्रेणी के उपयुक्त नहीं माना गया. सन 1916 मे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लघुकथा “ झलमला” प्रकाशित हुई. यह हिन्दी
की प्रथम जीवन्त लघुकथा मानी जाती है. इसमें प्रतीकात्मक और कथ्य की सहज भंगिमा
पायी गई.
सन 1914 में जगदीशचन्द्र मिश्र की “बूढा व्यापारी”, 1924 में आचार्य रामचन्द्र श्रीवास्तव की “बेबी”,1926में
जयशंकर प्रसाद की” कलावती की सीख”,1928में माखनलाल चतुर्वेदी
की “बिल्ली और ब्युखार”,1929 में कन्हैयालाल प्रभाकर की
सेठजी और सलाम,1930 में सुदर्शन की ”दो
परमेश्वर”,उपेन्द्रनाथ अस्श्क की”जादूगरनी,1933 में
भारतेन्दु की”आप बीती-जगबीती” कन्हैयालाल मिश्र की “सार्थकता”,जगदम्बाप्रसाद
त्यागी कि “विधवा का सुहाग”,1940 में रामनारायण उपाध्याय की
“आटा और सीमेन्ट” प्रकाशित हुई भोपाल के लघुकथाकार
जहुर बख्श ने खूब लघुकथाएं लिखी,जो काफ़ी सराही गयीं. 1950 से आजतक की लघुकथाएं आधुनिक लघुकथा के दायरे में आती हैं.
आधुनिक लघुकथा का जन्म सातवें दशक के
मध्य से माना जाता है. शताब्दी के आठवें दशक मे लघुकथा खूब लिखी गयीं.71 से 80 तक का समय लघुकथा के लिए
महत्वपूर्ण रहा. इस काल मे लघुकथा के विकास में अभूतपूर्व विकास हुआ. बढती मंहगाई,
भूख ,गरीबी, रिश्वतखोरी और जमा खोरी के सामने जनमानस में कुछ नहीं कर पाने की
बैचैनी थी. आठवें दशक में लघुकथा तेजी से सामने आने का कारण युगीन वातावरण था.
72-73 के समय में पांच भाषी राज्यों से छः पत्रिकाओं के लघुकथा
विशेषांक छपकर आए. भोपाल से अन्तर्यात्रा, राजस्थान से “अतिरिक्त” और “पवित्रा
”(ब्यावर),उत्तरप्रदेश से “मिनीयुग(गाजियाबाद) हरियाणा से”दीपशिखा”,पंजाब से”
प्रयास”पत्रिकाएं सम्मिलित हैं. इसके तुरन्त बाद कमलेश्वर ने जून 73 तथा जुलाई 75 में सारिका के लघुकथा विशेषांक
निकाले.
यह वह समय था जब विभिन्न समाचार पत्रों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं ने लघुकथा को
हाथों हाथ लिया. पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. नए लेखक मैदान में
आए. लघुकथा विशेषांकों और संग्रहों का जाल पूरे देश भर में फ़ैलता चला गया.
सन 74 मे भगीरथ व रमेश जैन के संपादन मे “गुफ़ाओं
से मैदान की ओर” रमेश बतरा द्वारा “तारिका”(अम्बाला) तथा जगदीश कश्यप व महावीर
प्रसाद जैन द्वारा “समग्र”, 77 में(दिल्ली) पत्रिका के
विशेषांकॊं ने लघुकथा को दो धाराओं में बांट दिया. एक धारा सतही वर्णणॊं को
उत्तेजना के साथ उकेरती थी जिसका प्रतिनिधित्व सारिका कर रही थी. दूसरी धारा युगीन
सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने की बेचैनी के साथ उसे कलात्मक यथार्थ मे परिणत करने
का संयम दिखा रही थी,किन्तु सारिका कि व्यवसायिकता व लोकप्रियता ने पहली धारा को
अच्छा खासा फ़ैलाव दिया. सतही और उबाऊ वर्णणों वाली लघुकथाएं अपनी गैर-जिम्मेवारी
के कारण तीखी आलोचना का शिकार होने लगीं. इसमे कुछ भी गलत नहीं था. 1972 में जगदीश कश्यप ने मिनी युग के माध्यम से लघुकथा साहित्य को सामने लाने
की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. बाद मे इसका संपादन बलराम अग्रवाल व सुकेश
साहनी ने संभाला. लघुकथा को विक्रम सॊनी ने “आघात”पत्रिका के माध्यम से स्थायीत्व
दिया. अशोक जैन ने लघु समाचार पत्र आकार की पत्रिका निकालकर महत्वपूर्ण योगदान
दिया. सन 84 में “ पहचान-यात्रा” नाम से साप्ताहिक एवं
त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ.
तरुण जैन ने “ आगमन “ (त्रै.) अंक निकाले. सतीशराज ने 86 से 88 तक “दिशा” पत्रिका निकाली. वे
पत्रिकाएं आज अतीत का हिस्सा बन चुकी हैं.
वर्तमान समय में हंस,वागर्थ,कथाक्रम,कथादेश,उद्भावना,कथाबिंब,,शोध दिशा आदि
पत्रिकाएं लघुकथा के प्रकाशन में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं. “सरस्वती
सुमन”पत्रिका( प्रधान संपादक डा.आनन्दसुमन सिंह) ने श्रीकृष्णकुमार यादव (निदेशक
डाक सेवाएं) के अतिथि संपादन मे वर्ष्य २०११ में 126 लघुकथाकरों का विषेशांक प्रकाशित किया. इस पत्रिका को काफ़ी सराहा गया.
अविराम साहित्यिकी (त्रै) के संपादक डा. उमेश महादोषी अपने सभी अंको में लघुकथाओं
को यथोचित स्थान दे रहे हैं. यद्दपि यह पत्रिका अपने आकार-प्रकार में छॊटी अवश्य
है,लेकिन इसमें प्रकाशित लघुकथाओं के तेवर देखने लायक होते हैं. और भी अन्य
पत्रिकाएं लघुकथाओं को लेकर प्रकाशित हो रही है,और न जाने कितनी ही पत्रिकाओं के
लघुकथा विशेषांक प्रकाशित किए जा चुके होगे. यह सब देख कर कहा जा सकता है कि लघुकथा
ने साहित्य में अपना अमिट स्थान बना लिया है और यह संतोष का विषय है.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
23
लोकगीत
वस्तुतः एक शब्द है,लेकिन अपने में दो भावों को समेटे हुए है, लोक
और गीत. दोनो एक दूसरे में संश्लिष्ट....एक दूसरे में संपूरक. लोकगीत पर चर्चा करने से पहले
हम लोक और गीत पर भी संक्षिप्त में चर्चा करते चलें, तो उत्तम होगा.
लोक
शब्द संस्कृत के “लोकधर्ने” धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है-देखने
वाला. साधारण जन के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर हुआ
है.
डा. हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने
“लोक” शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम से न लेकर नगरों व गांव में फ़ैली उस समूची जनता
से लिया है परिष्कृत रुचिसंपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा
अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है.
डा. वासुदेवशरण अग्रवाल के शब्दों
में “लोक हमारे जीवन का महासमुद्र है, जिसमें भूत, भविष्य और वर्तमान संचित है.
आर्वाचीन मानव के लिए लोक सर्वोच्च प्रजापति है.
उपरोक्त कथन के
अनुसार लोक विश्वव्यापी है. इसे छॊटा करके नही देखा जा सकता. तभी तो हमारे यहाँ
लोकरंग, लोकजीवन, लोकप्रसंग, लोकसंस्कृति,, लोककला, लोककथा, लोकगाथा, लोकगीत,
लोकधारणा, लोकसाहित्य, लोकतत्व, लोकसाहित्य, लोकजागरण, लोकरा,,लोकराग, लोकमूल्य,
लोकचित्र, लोकावस्था, लोककथाएं, लोकचित्त, लोकनाटक,लोकसमुदाय,आदि विस्तार लेते हुए
दिखाई देता है.
डॉ० कुंजबिहारी दास ने
लोकगीतों की परिभाषा देते हुए कहा है, ‘‘लोकसंगीत उन लोगों के जीवन की अनायास
प्रवाहात्मक अभिव्यक्ति है, जो सुसंस्कृत तथा सुसभ्य
प्रभावों से बाहर कम या अधिक आदिम अवस्था में निवास करते हैं। यह साहित्य प्रायः
मौखिक होता है और परम्परागत रूप से चला आ रहा है।’’
“युगतेवर” पत्रिका के संपादक श्री
कमलनयन पांडॆय लोकगीत विधा को लेकर कहते हैं—“लोकगीत” मानवीय वृत्तियों का अक्षय
भंडार है. लोक संस्कृति का अमरकोष है. चरणबद्ध मानव-विकास का सजग साक्षी है.
सामूहिकता का सहज गान है. करुणा का लहलहाता महासागर है. मानवीय-संवेगों का
दस्तावेज है. इतिहासवेत्ता मानव-विकास की कहानी के किसी कोने को दर्ज करने से चूक
सकता है, पर “लोक” की पारखी नजर से कुछ भी नहीं चूकता. इसीलिए मेरा मानना है कि
परम्परा की पडताल का सबसे बडा धरातल हमारे “लोकगीत” हैं, जिसमें हर कालखण्ड, हर
भूखण्ड के मानव-समुदाय की सांस-सांस टांकी गई है. रेशा-रेशा उपस्थित है. मन के
कोने-अंतरे के भाव-प्रभाव दर्ज हैं. सचेत इतिहासवेत्ताओं का मानना है कि इतिहास का
यथार्थ लेखन सिर्फ़ गजेटियरों और रियासतों के दस्तावेजों को आधार मानकर नहीं लिखा
जा सकता. यथार्थ इतिहास के लिए हमें लोक-सृजन की विविध विधाओं को भी आधार बनाना
पडॆगा.
उपरोक्त विद्वानों के मतों के आधार
पर कहा जा सकता है “लोकगीत” लोक के गीत हैं,जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि
पूरा लोक समाज अपनाता है. सामान्यतः लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक
के लिए लिखे गए गीतों कॊ “लोकगीत” कहा जा सकता है. लोकगीतों का रचनाकार अपने
व्यक्तित्व को लोक को समर्पित कर देता है. इनमें शास्त्रीय नियमों की विशेष परवाह
न करके सामान्य लोकव्यवहार के उपयोग में लाने के लिए मानव अपने आनन्द की तरंग में
जो छन्दोबद्ध वाणी सहज उद्भूत करता है, वही “लोकगीत” है.
लोकगीत को तीन अलग-अलग श्रेणियों
में विभक्त किया जा सकता है- लोक में प्रचलित गीत(२) लोक-रचित गीत-(३) लोक-विषयक
गीत. यहाँ यह बात स्मरण में जरुर रखी जानी चाहिए कि लोकगीत भारत की सभी भाषाओं मे
लिखे गए है. जिन्हें आज भी गाया जाता है. इनमे से कई लोकगीत या तो विस्मृत कर दिए
गए, या फ़िर इस बदलते परिवेश में जिन्हें गाना, शान के विरुद्ध माना जाने लगा है और
उन्हें तिरस्कृत किया जा रहा है जबकि इस अनमोल खजाने को संरक्षित करने की जरुरत
है.. इन्हीं बातों को लेकर देवेन्द्र सत्यार्थी ने उन्नीस बरस की अवस्था में कालेज
की पढाई को अधबीच में छॊडा और घर से निकल पडॆ.. इस घुम्मकड विद्वान ने गांवों की
धूलभरी पगडंडियों पर भटकते हुए, धरती के भीतर से फ़ूटे किस्म-किस्म के रंगों और
भाव-भूमियों के लोकगीतों को देखा,महसूस किया और उन्हें अपनी कापी में उतार लिया.
जब भी उन्हें कोई अच्छा सा लोकगीत सुनने को मिलता,लेकिन उसका अर्थ समझ में नहीं
आता, या फ़िर भाषा की कठिनाई महसूस करते तो पूछ-पूछ कर उसका अर्थ भी लिख लिया करते
थे. इस तरह उन्होंने काल-कवलित होते लोकगीतों का संरक्षण किया. जब भी लोकगीतों की
बात होगी, इस महामना को विस्मृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे पहले व्यक्ति थे,
जिन्होंने लोकगीतों के संरक्षण के लिए पहला कदम बढाया था.
कजरी, सोहर, चैती संस्कारगीत,
पर्वगीत,ऋतुगीत, आदि लोकगीतों की प्रसिद्ध शैलियाँ मानी गई है. इनके अलावा संस्कार
गीत= (बालक-बालिका के जन्मोत्सव, मुण्डन,जनेऊ, विवाह आदि अवसरों पर गाए जाने
वाले गीत)गाथागीत- (विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित विविध लोकगाथाओं पर
आधारित गीत. इसमें आल्हा, ठोला, भरथरी, नरसी भगत, घन्नैया को शामिल किया जा सकता
है)
पर्वतीत=(राज्य के विशेष पर्वों एवं
त्योहारों पर गाए जाने वाले गीत) को भी शामिल किया जा सकता है.
ऋतुगीत=(कजरी, बारहमासा,
चैता,हिंडोला आदि)
.कजरी=
हमारे यहाँ वर्षा ऋतु का अपना विशिष्ट स्थान है. आषाढ से लेकर भादों तक प्रकृति के
लहराते हरित अंचल की छटा एक ओर हमें मंत्रमुग्ध कर देती है, वहीं दूसरी ओर हमारे
अंतर्मन में एक संगीतमय दुदगुदी पैदा कर एक सुखद व्यथा को भी उत्पन्न करती है और
यही सुखद पीडा जन्म देती है संगीत को. वर्षा की रिमझिम फ़ुहारों के साथ कजरी के बोल
सर्वत्र गूँज उठते हैं माटी की सोंधी सुगंध के साथ. झूले पर पेंगें मारती यौवनाएं
हो या घर की गृहनियां हर किसी के अंतर्मन से कजरी के बोल फ़ूट पडते हैं. बूढा हो या फ़िर जवान हर कोई कजरी की लय में
खोकर रह जाता है.होंठ थिरक उठते है और बोल स्वतः फ़ूट पडते हैं- कइसे खेले जयबू
सावन में कजरिया, बदरिया घिरी आईस सजनी”
वर्तमान हिन्दीभाषी क्षेत्र
प्राचीन भारत का “मध्य देश” है इस क्षेत्र में बोली जाने वाली बोलियों को भाषा
वैज्ञानिकों ने चार भागों में विभक्त किया है.”पश्चिमी हिन्दी” जिसके अंतरगत खडी
बोली,ब्रज,कन्नौजी, राजस्थानी तथा बुंदेलखडी भाषाएं आती है. अवधी, बघेली, तथा
छत्तीसगढी मध्य की भाषाएं हैं और इसके पूर्व में बिहारी भाषा समुदाय की भोजपुरी,
मैथिली,तथा मगही है. उत्तर में कुमाऊँनी,भाषा है जो नैनीताल, अल्मोडा,टेहरी-गढवाल,
पिथौरागढ,चमौली,तथा उत्तर काशी में बोली जाती है. बोलियों में भी अनेक उपबोलियां
हैं,जिनमें लोकगीत गाए जाते हैं.
लोकगीत चाहे जहाँ के हों वे प्राचीन
परम्पराओं, रीतिरिवाजों एवं धार्मिक तथा सामाजिक जीवन को अपने में समेटे हुए
हैं.इनमें भाषा अथवा बोली की अनेकताएं भले ही हों पर भावों की एकता एवं उसे व्यक्त
करने तथा पात्रों का चयन लगभग एक जैसा ही होता है.
डोगरी
लोकगीत= चन्न म्हाडा चढेया ते बैरिया दे ओहले
बैर पटाओ म्हाडा चन्न मुहा बोल
मिलना जरुर मेरी जान
(
मेरा चांद बेर के दराख्त की ओट में चढा है. दरख्त कटवा दो ताकि मेरा चांद मुंह से
बोल सके.मेरी जान मिलना तो जरुर है)
पंजाबी
लोकगीत=
निक्की
निक्की बूँदी निक्कियाँ मीं वे वरें, वे वीरा नदियाँ किनारे घोडी घारु चरे वे ,वीरा
दादी सुहागण बूहे ढोल धरे वे वीरा भूआ
सुहागण सोहणें नाऊ धरे
(दूल्हे
का घोडी पर सवार होकर विवाह रचाने जाते समय गाया जाता है)
कश्मीर=
आव
बहार वलो बुलबुलो/सोन वलो बरवों शादी/द्राव कठकोश ग्रोअज पान छलो/जरा छलनय वन्दकिय
दादी/बुजू न्येन्द्रि बुनि छासुलो(वसंतकालीन पर्व पर गाए जाने वाला लोकगीत)
(२)
पोशपोजाये वेल हे वोत/कर्मपम्पोश सोन लबिमन्ज आवा/स्वर्गच पूजाये वेल है वोत(
वर्षागीत)
ब्रज
लोकगीत=
भतइया आयौ आंगन में बैठॊ दिल खोल/हुहर लायो अशरफ़ी लायौ रुपया लायौ भौत/सास हमारी
यों उठ बोली देखौ थैलीखोल/ खोटे तौ नाय ओहो रे नकली तो नाय...(आंगन में )हरवा लायो
निकलस लायो, चूडी लायौ मोल/जिठनी हमारी यों उठ बोली, देखो डिब्बा खोल/नकली तो नांय
फो रे,पालिश तो नांय(आंगन में)
भीलों
का भारथ=ए
गाडु सोरीन ऊपो रयो (२)/गाडु सोरीन ऊपो रयो हो....रा....झी/गुरु भेंमा रे पांडवन
साआआर नोखें(२)/ए सारनो पूळो रे नोखवा लागा हो....रा...झी
हरियाणा=नाच-नाच मेरा दामण पाट्या/
हे री ताई तूं के और सिमा देगी/मैं तेरे घर नाचण आई
मराठी(राम
जन्म का प्रसंग)=सात समिंद्राचं पानी/दसरथाच्या रांजनी/रामराय झाले
तान्हे/कौसल्या बाळंतिनी
(२)
सीता स्वयंबर का प्रसंग=शिवाच धनुष्य/सीतेनं केलं घोडं/रावणं आळा पुढं/देवाला
पडलं कोड/रावनानं कोधंड/उचललं घाई घाई/रामाची सीता नार/याळा मिळायची नाही.
निमाडी
लोकगीत =संजा
बाई, संजा बाई सांझ हुई/जाओ संझा ! थारा घर जा/थारी माय मारेगी, कूटेगी, चांद गयो
गुजरात/ हिरणी उगेगी,डुबेगी, हथनी का बडा-बडा दांत/थारी बईण डरेगी, कांपगी, कुतरा
भुकड गली म S/ थारी माय दचदेगी, पटकेगी.(२) राखो राखो रे पाणी, बोलो असी वाणी/जे कामS
मिसरी घुली,वाणी मिसरी वाली
बुदेली
लोकगीत= गिर्री
पे डॊरी डार मोरी गुंइयाँ/ डार नोरी गुइयां डराव मोरी गुइयां/गिर्री पे डोरी
त्रबहिं नीकी लागै/सोनन के घडेलना होय मोरी गुइयां.(प्रसव बाद कुएं पर पानी भरने
जाते समय गाए जाने वाला गीत)
मिथिला
(नागपूजा
के समय) =पुरैनिक पत्ता, झिलमिल लत्ता/नागदह नागदह पसरल पुरनि/जल उतपन मेल पांचो
बहिन/पांचों बहिन पांचों कुमारि/छोट देवी विषहरि बड उतफ़ालि
छत्तीसगढी
लोकगीत=देखो
फ़ुलगे चंदैनी गोंदा फ़ुलगे/एखर रुप रंग हा जिव मां,मिसरी साही घुरगे/एक फ़ूल मय
तुमला देथंव/बबा ददा औ भाई/नानुक बाबू नोनी दुलौरिन/बहिनी अउ मोर दाई/ तुंहर दरस
ला पाके, हमर सबके भाग हा खुलगे.(२) लउडी के चक लउडी भइया, लउडी म बांधे
फ़ुँदरवा/हम तो जाथंन गोवर्धन खुंदाय बर,माता-पिता के दुलरवा.
बस्तर
का लोकगीत=देवी
गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा/ हमरों भोजली रानी के आठॊ अंग है (अहो देवी गंगा)
पानी बिन बिजली, पवन बिन बारी/ सेवा बिन भोजली के हरषे हो रानी.
भोजपुरी=राति अँधियरिया, बाटी सूनि
मोर सेजरिया/मोरे दिलवा में उठेला तूफ़ान/बोलैले सियार कुचकुचवा बहरवाँ/ रेउवाँ
चिल्लात बाटॆं तालके किरनवाँ (२)धीरे बहा मोरी हे माता टँवसिया/लेइकै मोरी अँखियन
के आँसू/जइसे मोरी माता फ़ुलवन के बहवावा/वैसे मोरे दिल के जलनिया मिटावा.
राजस्थान
के लोकगीत=गाम
गाम खेजडी नै गामेगाम गोगो/घोट पीवो अंतर छाल कालो हणे नी बोगो.
खेजडी=शमी
वृक्ष/ घोट=पीसकर/कालो-सर्प/हणे=डसता है/बोगो=दो ओर मुंह वाला.
(२)समरुं
माता शारदा, गवरी पुत्र गणेश/मणिधर फ़णिधर गरलधर पन्नगनाथ महेश/करुं प्रार्थना
प्रेम थी, सफ़ल करो मुझ काज....(३) जय जयकार करई जोड/ऊभी मैदिनी ओळाओळ/करे परिकम्मा
देवे धोक/चढे नालेर,लगावे भोग...(३) गौर ऎ गणगौर माता, खोल ऎ किवाडी/बाहर ठाडी,
थारी,पूजन वारी..
मेवाती(राज)=बन्ना है बन्नी को बडो
चाव/चल दियो सिखर दुपहरी में/बन्ना जूता लायो सईं साज/ मोजा लायो दुपहरी में/बन्ना
है, बन्नी को बडॊ चाव
कन्नौज=सुमिर सरसुती जगदम्बा को,औ
गनपति के चरन मनाई/धरती माता तुमको ध्यावों, कीरती, सबसे बडी तुम्हार/कीरति
ध्यावों उन वीरन की, पलटै प्रबल काल की चाल/धारैं लौंटें तरवारनि की,उनके झुकैं न
ऊँचे भाल/अरि पन्नग पर पन्नगारि जस, तूटैं परे पराये काज/ पानी राखैं जनमभूमि का,
राखैं
जनम
भूमि की लाज
डोगरी=
नूं
पुच्छदी ऎ सस्सू कोला/बाहर सपाई कीया रौहन्दे न/भंगा पुट्टे सथुरा पान्दे/सूंक
सुट्टी सैई रौहन्दे न (बहू सास से पूछती है मां, बाहार सिपाही कैसे रहते हैं. सास
कहती है, भांग के पौधे उखाडकार बिस्तर बिछाते हैं और निश्वास लेकार सो जाते हैं.)
आदिवासी
चकमा समुदाय का गीत=छोरा छोरी बील हावा जोर/हादो पान खिलक हील हावो(नदी-नाले
और ताल-तलाइये भर जाने से जैसे मछलियां खुशी से नाच उठती है.मेरी सजनी ! वैसे ही
तेरे हाथों से पान खा कर मेरा दिल नाचने लगता है.)
ओडिया
लोकगीत=रंज
हेइचि कि सज करुच मो माआमाने/रुष बसिचि कि बोध करुच मो माआमाने/कानिपणतरे बांधि
रखिल मो माआमाने/एबे सबु स्स्स्पेह पासोरि देय मो माआमाने(आज तो कोई उत्सव नहीं है
कि तुम मेरा सिंगार्कर रही हो, न मैं रूठी हूँ कि तुम मुझे मना रही हो. मुझे आंचल
में छिपाकार रखती थी, अब सारा प्यार भूल गई हो.( वर आने से पहले कन्या स्नान करते
समय मां से कह रही है.)
अरुणाचल=(नृत्य करते समय गाए जाने
वाला लोकगीत)=पचि दोव से अने दने दोह/दुगो दोह से अने दने दोह/पचि साव से अने दने
दोह/दुगो दोह अने धने दोह
असम
(मजदूर का गीत)
कोट मारा जेमन तेमन/पाता तोला टान/हाय यदुराम/फ़ाकि दिया आनिलि आसाम/चाहेब बले काम
काम/बाबू बैले धररे आन/चार्दार बले लिबे पिठेर चाम/रे निठुर श्याम/फ़ांकि दिया आनिलि आसाम
बिलासपुर=(छ.ग.) जइसन जेकर दाई ददा, तेकर तइसन लइका/जयसन जेकर घर
कुरिया, तइसन जेकर घर कुरिया,/तयसन तेकर फ़इरका
(कोरबा)=जेकर जसन दाई ददा, तेकर तसन लइका/जेकर जसन घर दुवार, तेकर
तसन फ़इरका.(रायगढ)=जेकर जैसेन घर दुवार, तेकर तैसन फ़इरका/ जेकर जैसन
दाई-ददा, तेकर तैसन लइका.
24.
विवाह
संस्कार और बन्ना-बन्नी के गीत
मानव की
मूल प्रवृत्ति ही उत्सवधर्मी है. पाषाणयुग से बात शुरु करें, वह अपने समूह में
आखेट के लिए निकलता था और किसी पशु को अपना शिकार बनाने के बाद उसके इर्द-गिर्द
झूम-झम कर नाचता-गाता-खुशी मनाता था. फ़ुर्सद के समय में वह कन्दराओं में इसके
चित्र भी उकेरता था. क्रमशः वह सभ्य होता गया. उसकी उत्सवधर्मिता परवान चढने लगी.
उसने जाना कि छह ऋतुएं होती है. उसमे शरद ऋतु के आगमन के ठीक पहले वर्षा का अवसान
हो रहा है. वर्षा ऋतु में जैसे ही पहली बौझार पडती है,पृथ्वी के अंग-अंग में
नवजीवन लहलहा उठता है. धरती पर सब तरफ़ हरियाली का गलीचा बिछ जाता है. मोर के पावों
में थिरकन आ जाती है. पपिहा पी..आ...पी..आ गाने लग जाता है. नदियां तरुणाई से भर
उठती है.. बरसते पानी की रसधार में भींगते हुए उसने हल चलाते हुए गीत गाए. खेतों
में लहलाती फ़सलें और अपने श्रमसाफ़्ल्य को अनाज के रुप में फ़लता-फ़ूलता देख वह
प्रसन्नता से भर उठता है और कटाई के बाद पूरा परिवार ढोलक की थाप पर थिरक उठता है.
इस तरह उसने अपने आप को ईश्वर की लीलाओं से
पर्वों-त्योहारों को जोडते हुए अपनी उत्सवधर्मिता को नए-नए आयाम दिए. दस
कोस पर पानी और बीस कोस पर वाणी के बावजूद भारतीय समाज ने सांस्कृतिकता को विशिष्ट
स्थान दिलाया. लोक-अंचल में ही संस्कृति की असली विरासत सुरक्षित है. यद्दपि
अधुनिकता ने काफ़ी हद तक सांस्कृतिकता को प्रभावित किया है, इसके बाद भी हमारे लोक
क्षेत्रों से जुडॆ लोग, ग्रामीण समुदाय संस्कृति के सजक-प्रहरी के रुप में नजर आते हैं. संस्कृति का यह कार्य लोक-अंचल
में आसानी से दृष्टिगत होता है. चाहे वह छत्तीसगढ हो, असम हो, या फ़िर त्रिपुरा,
कुंमायू ,पूर्वांचल, बुंदेलखंड आदि कोई भी हो, कोई भी राज्य हो, सभी जगहों पर
सांस्कृतिक विशिष्टता को संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं.
बुंदेलखण्ड क्षेत्र हमेशा से ही लोक
के प्रति सचेत रहा है.शौर्य गाथाओं, लोक-गाथाओं या फ़िर लोक-देवताओं के सहारे उसने
अपनी संस्कृति को जीवित रखा है. पर्वों-त्योहारों,उत्सवों के साथ-साथ वैवाहिक
कार्यक्रमों का उत्साह भी यहां देखने को मिलता है. यह एक ऎसा संस्कार है जहाँ अनेक
प्रकार के रस्मों के साथ सम्पन्न किया जाता है. लडका-लडकी की बात पक्की हो जाने के
बाद लगुन लिखाई, तिलक, मगरमाटी, मंडपाच्छादन, देवपूजन, तेलपूजन, चीकट ,बारात
निकासी, द्वारचार, पांव पखराई, कुंवर कलेवा, भांवर, कन्यादान, बिदाई,, मुँह
दिखाई,,आदि-आदि. अनेकानेक रस्मों के यह संस्कार पूरा होता है.
इन रस्मों को संपन्न करते समय घर की
महिलाएं बन्ना-बन्नी के गीत गाती हैं. इनकी स्वर-लहरी सुनकर सभी लोग आनन्दित हो
उठते हैं. हम यहाँ पर कुछ रस्मों पर गाए जाने वाले गीतों पर चर्चा करते चलें. यथा-
लगुन लिखाई जा चुकी है. मगरमाटी भी लाई जा चुकी
है और लडकी जिसे अब बन्नी के रुप में जाना जाता है, हल्दी चढाई जा रही है. इस अवसर
पर घर तथा पास-पडौस की महिलाएँ सामुहिक रुप से बन्नी कॊ आधार बनाकर गीत गाती
हैं.जिसके बोल सीधे हृदय को पिघला देने वाले होते हैं. यथा-
बाबुल
उडन चिरैया, तुमने काहे पोसे
वो
तो उड चली देस-बिदेस
अम्मा
की कोयल उड चली
(२) दिहरी बिरानी बाबुल बिटिया बिरानी
बिटिया
की इक जनमी पाती रे
मोरे
बाबुल बिटिया बिरानी
वधु के यहाँ लगुन-लिखाई होती
है,जिसका विधिवत पूजन किया जाता है. पूजा के बाद लगुन के साथ नेग के रुप में कुछ
रुपये भी रखे जाते हैं. फ़िर घर के कुछ सदस्य जिसमें वधू का भाई, मुहल्ले-पडौस के
कुछ युवातुर्कों के साथ लगुन वर के घर पहुंचाई जाती है. लगुन के वहां पहुंच जाने
के बाद उसको किसी पंडित से पूजा करवाने के बाद पढा जाता है. इसके करने के पीछे
उद्देश्य यह होता है कि वर-पक्ष को इस बात की जानकारी से अवगत करवाना होता है कि
फ़ला दिन आपको बारात लेकर आना होगा. लगुन के आने पर स्त्रियां इस गीत को गाती हैं
लगुन आने पर
रघुननदन
फ़ूले ना समाये,लगुन आई अरे...अरे
लगुन
आई मोरे अंगना
रंग
बरसत है, रस बरसत है
मोरे
बन्ना की लगुन चढत है
कानों
में कुण्डल पहनो राजा बनडॆ
गले
मुतियन की माल बिरसत है
मोरे
बन्ना की लगुन चढत है
आज
मोरे रामजू की लगुन चढत है.
वर पक्ष के यहाँ भी वे सारी रस्में
संपन्न होती है, जो वधु के यहाँ की जा रही होती है. इधर वर पक्ष में बन्ना को
मण्ढे के नीचे खांब के पास बिठाया जाता है और फ़िर तेल चढावे की रस्म शुरु की जाती
है. महिलाएं सामुहिक रुप से गाती हैं. यथा-
तेल मायना
आज
मोरे बन्ना(बन्नी) को तेल चढत है
तो
तेल चढत है फ़ुलेल चढत है
चढ
गओ तेल फ़ूल की पाँखुरिया
जीजी
चढावे तेल ,बन्ना की बाहुलिया
भौजी
चढावे फ़ूल की पाँखुरिया
तेलन
लाई तेल, मालन लाई पाँखुरिया
(२) चढ गओ तेल फ़ुलेल चंपो तेरी दोई कलिया
कौन बाई तेल
चढावे,कौन राय की बेन्दुलिया (बहन का नाम)बाई तेल
चढाये (भाई
का नाम) राय की बेन्दुलिया
विवाह
के अवसर पर गौरी-गणेश के आव्हान पूजन के पश्चात पितरों को एवं प्रकृति प्रदत्त
भौतिक वस्तुओं का भी आव्हान किया जाता है. इस अवसर पर बन्ना या बन्नी की माता एवं
चाची चक्की पर गेहूँ पीसती जाती है एवं एक-एक पितरों का नाम लेती जाती है. साथ ही
बन्ना या बन्नी नाम के साथ ही चक्की पर चांवल के दाने निमंत्रण स्वरुप फ़ेंकते जाते
हैं. इस अवसर पर कुटुंब के सभी सदस्य उपस्थित रहते हैं. इस अवसर पर गाए जाने वाला
गीत-यथा
“काज
करो कजमन करो, आज को नेवतो पाइयो
(पितर
का नाम) बाबा नेवतियो”
आज
को नेवतॊ पाइयो ( एक-एक व्यक्ति के नाम का उच्चारण करते हुए इसे दोहराया जाता है)
(पितरों को नेवतने के बाद आग-पानी,
बदरा-पानी, लठ्ठा-भोंगा, हवा-आँधी सबको नेवतने के बाद बन्ना के हाथों से गोबर के
द्वारा चक्की का मुँह बंद कर दिया जाता है ताकि मंगल कार्य में कोई विघ्न न आने
पावे.
इसके
बाद बारात निकासी होती है. सभी आमंत्रित सदस्यों-रिश्तेदारों तथा परिवार और कुटुंब
के सन्मानित सदस्यों को साथ लेकर बारात घर से निकलती है. इस बीच कई प्रकार की
रस्में होती है.
माँ अपने बेटॆ की नजर उतारती है. नारियल की गिरि
तथा गुड से मुँह मीठा कराती है. अपना दूध पिलाकर बेटे से वचन लेना नहीं भूलती कि
शादी के बाद उसकी अच्छे से देखरेख करेगा. इस अवसर पर महिलाएं गीत गाती हैं.यथा-
(दुल्हा की निकासी पर गाए जाने वाला गीत)
“मझोल-
मझोल चलो जइयो रे हजारी दुल्हा
तुने
को के भरोसे घर छोडॆ रे हजारी दुल्हा
मैंने
मइया के भरोसे घर छोडॊ रे हजारी बन्ना
तेरी
मैया को नइया पतियारो रे हजारी दुल्हा
तू
तो ताला लगाये कुँजी ले जैयो रे हजारी दुल्हा”
(२) बन्ना
के आँगन गेंदा फ़ूल, कुसुम रंग फ़ीको पड गओ रे
बन्ना
पापा(दादा-चाचा-मामा-फ़ूफ़ा, भैया,जीजा)
सजे
बरात, सजन घर खलबल मच गई रे
सजन
घर खलबल मच गई रे
बन्ना
के आगे तबल निशान, पतुरिया छम-छम नाचे रे
पतुरिया
छम-छम नाचे रे
रुपइया
खन-खन बाजे रे
(३) ऎसो
सजीलो मेरो बन्ना रे, शोभा सजी सीस चांदनी बनके
कोई
तो नजर उतारो, ऎसो सजीलो मेरो बन्ना रे
सीस
बन्ना के सेहरा, सोहे कलगी पे जाऊँ बलिहारी रे
दिल
मे कब से था अरमान, बन्ना मेरा दूल्हा बने
चन्दन
के मण्डवा रुच रुच के लाओ रे.....बन्ना मेरा
वधु के यहाँ बारात पहुँच चुकी है. बारात की
अगवानी की जाती है. सजन-समधियों की भेंट होती है.इस अवसर भी गीत गाए जाते हैं.
ठाडॆ-
ठाडॆ जनक जी के द्वार हो
रामचन्द्र
दुल्हा बने
मंगल
साज सजे अंगना में
कम्मर
में सोहे कटार हो...रामचन्द्र.....
मुतियन
चौक सुनयना पूरे
मन
में हरष अपार हो.......रामचन्द्र......
बंदी
बिरुदावली उच्चारे
हो
रही जय जयकार....... रामचन्द्र.....
चन्दन
पीढा विराजो राजा बनडॆ
पहरो
नौ लख हार हो ...रामचन्द्र.....
महिलाएँ गारी गाती हैं इस अवसार पर
आए
मोरे सजना,सुहानो लागे अंगना
सजना
के लाने मैंने पुडिया पकाई
आवे
री खावे सजना(समधी)
पीछे
री खावे बलमा...आए मोरे सजना...
पाँव पखराई के समय का गीत
बिच
गंगा बिच जमना,तीरथ बडॆ हैं प्रयाग
बिच
बिच बैठे बाबुल उनके, लेत कुमारन दान
दैयो
रुप-रुपैया, छिनरिया को खनकत जाये
दैयो
उजरी सी गैया, छिनरिया को खोवा खाये
चढाव चढाई के अवसर पर गीत
“सिया
सुकुमारी को चढ रौव चढाव, हरे मंडप के नीचे
बेटी
मैके की बेंदी उतार धरो
ससुरे
की बेंदी को कर लेव सिंगार, हरे मंडप के नीचे
सिया
सुकुमारी को चढ रओ चढाव, हरे मंडप के नीचे”
चढाव
के बाद भावरें पडती है. इसके बाद जेवनार होता है. जेवनार के अवसर पर गाए जाने वाला
गारी गीत. इसमे समधी-समधन को ताना मारा जाता है.
“बन
में बघनी बियानी, सुनो भौंरा रे
ओको
दूध दुहा लई, सुनो भौंरा रे
समधी
नेवत बुला लई,सुनो भौंरा रे
ओकी
खीर बना लई,सुनो भौंरा रे
उनने
आतर चाटे,पातर चाटे,ले ले दोना नाचे”
जेवनार
के बाद दुल्हा०दुल्हन को लेहकोर के लिए लेकर जाते हैं. इस अवसर पर महिलाएं समधी को
ताना मारते हुए गाती हैं क्योंकि समधी की ओर से पान-बताशे बंटवाने का रिवाज है.
“पानो
की बिडिया कलेजे में लग गई
कलेजे
में लग गई, मेरे हियरे में लग गई
डलिया
में तेरी समधन पान भी नइया
तो
समधी को जियरा ठिकाने में नइया
बिदाई के अवसर पर गाए जाने वाला गीत
इस समय बिटिया को आशीष दिया जाता है
“जाओ
ललि तुम फ़लियो फ़ुलियो
सदा सुहागन रैयो मोरे लाल
सास ससुर की सेवा करिओ
पति आज्ञा में रहियो.”
( बिदाई के बाद बेटी का अपने ससुराल आना, वहाँ
पर भी अनेकानेक रस्में करवाई जाती है. )
लोकगीतों
की महत्ता लोक जीवन में हमेशा बनी रही है. विवाह संस्कार में गाए जाने वाले गीतों
में संदेश सम्प्रेषित होते हैं. लोकगीतों द्वारा विवाह संस्कार की गरीमा बढ जाती
है. लोकगीतों के मध्यम से हमारी लोक-संस्कृति, लोक-परंपरा, विरासत पल्लवित,पोषित
और संरक्षित होती रहेगी. ऎसा विश्वास है.
नोट;- विवाह संस्कार में अनेक स्थानों पर
छोटॆ-छोटे रस्मों को निभाए जाने का वर्णण मिलता है. उसे विस्तारित न करते हुए कम
से कम शब्दों में पूरा किया गया है.ताकि आलेख बोझिल न होने पाए.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
25
संस्कृत काव्य धारा में
प्रकृति की आदिम सुवास.
संस्कृत साहित्य में,विषेशकर उसकी काव्य परम्परा मे वेदव्यास, वाल्मिकि, भवभूति, भारवि,
श्रीहष, बाणभट्ट,कालीदास
आदि महाकवियों ने प्रकृति की जो रसमयी झांकि प्रस्तुत की है,वह
अनुपम-अतुलनीय तथा अलौकिक है. उसकी पोर-पोर में कुदरत की आदिम सुवास है-मधुर संस्पर्श है और
अमृतपायी जीवन दृष्टि है .प्रकृति में इसका लालित्य पूरी
निखार के साथ निखरा और आज यह विश्व का अनमोल खजाना बन चुका है. सच माना जाय तो प्रकृति,संस्कृत काव्य की आत्मा है--चेतना है और उसकी जीवन शक्ति है. काव्यधारा की इस
अलौकिक चेतना के पीछे जिस शक्ति का हाथ है,उसका नाम ही
प्रकृति है.
पृथ्वी से
लेकर आकाश तक तथा सृष्टि के पांचों तत्व निर्मल और पवित्र रहें, वे जीव-जगत के लिए हितकर बने रहें, इसी दिव्य संदेश की गूंज हमें पढने-सुनने को मिलती
है.
महाभारत
में हमें अनेक स्थलों पर प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा देखाने को मिलती है.
महाभारत के आरण्यक पर्व ३९/.१९ की एक बानगी
देखिए.
मनोहर
अनोपेता स्तस्मिन्न तिरथोर्जुनः
पुण्य शीतमलजलाः
पश्यन्प्रीत मनाभवत
कलकल के
स्वर निनादित कर बहती नदियाँ, नदियों में बहता शीतल स्वच्छ
जल, जल में तैरते-अलौकिक आनन्द मे डूबे
हंस, नदी के पावन पट पर अठखेलियां करते सारस, क्रौंच,कोकिला, मयूर, मस्ती में डोलते मदमस्त गेंडे, वराह, हाथी, हवा से होड लेते मृग, आकाश
कॊ छूती पर्वत श्रेणियां, सघन वन,वृक्षों
की डालियों पर धमाचौकडी मचाते शाखामृग,चिंचिंयाते रंग-बिरंगे पंछी, जलाशयों में पूरे निखार के साथ खिले
कमल-दल, कमल के अप्रतिम सौंदर्य पर
मंडराते आसक्त भौंरॊं के समूह, तितलियों का फ़ुदकना आदि को
पढकर आदिकवि के काव्य कौशल को देखा जा सकता है.
तो पश्य मानौ विविधन्च शैल प्रस्थान्वनानिच
नदीश्च विविध रम्या जग्मतुः सह सीतभा
सार सांश्चक्रवाकांश्च नदी पुलिन चारिणः
सरांसि च सपद्मानि युतानी जलजै खगैः
यूथ बंधाश्च पृषतां मद्धोन्मत्तान्विषाणि नः
महिषांश्च वराहंश्च गजांश्च द्रुमवैरिणः (रामायण- अरण्यकांड सर्ग ११(२-४)
राम अपने बनवास के समय एक स्थान
से दूसरे स्थान पर जाते हैं, तो मार्ग मे अनेक पर्वत प्रदेश,
घने जंगल, रम्य नदियाँ, और
उनके किनारों पर रमण करते हुए सारस और चक्रवाक जैसे पक्षी, खिले
-खिले कमलदल वाले जलाशय और अपने-अपने
जलचर, मस्ती मे डोलते हिरणॊं के झुण्ड, मदमस्त गैंडे, भैंसे, वराह,
हाथी, न सुरक्षा की चिन्ता, न किसी को किसी का भय, वाल्मिकी ने रामायण में जगह-जगह प्रकृति के मधुरिम संसार का वर्णण किया है.
भवभूति के काव्य में प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है. लताएं जिन पर तरह-तरह के खिले हुए पुष्प सुवास फ़ैला
रहे हैं .शीतल और स्वच्छ जल की निर्झरियां बह रही है.
भवभूति ने एक ही श्लोक में जल, पवन, वनस्पति एवं पक्षियों का सुंदर वर्णण प्रस्तुत किया है.
माघ के काव्य में तीन विशिष्ठ गुण है. उसमें उपमाएं
हैं.अर्थ गांभीर्य है और सौंदर्य सृष्टि भी. कहा जाए तो वे उपमाओं के राजा हैं. विशेष बात यह है
कि उन्होंने अधिकांश उपमाएं प्रकृति के खजाने से ही ली है.
शिशुपाल वध में अनेक ऎसे स्थल हैं जिनमें प्राकृतिक सौंदर्य और स्वच्छ
पर्यावरण का उल्लेख मिलता है. " काली रात के बाद भॊला
प्रकाश आ रहा है .उसके गोरे-गोरे हाथ-पांव ऎसे लगते हैं मानो अरुण कमल हों. भौंरे ऎसे हैं
जैसे प्रभात के नीलकमल नेत्रों के कज्जल की रेखाएं हों. सांध्य
पक्षियों के कलरव में मस्त हुई यह भोली बालिका( प्रभात)
रात के पीछे-पीछे चलकर आ रही है( शिशुपाल वध ६;२८)
महाकवि भारवि के ग्रंथ " किरातार्जुनीय "
में अनेक उपमाएं, शृंगार प्रधान व सौंदर्यपरक
रुपक है. वन में प्रवाहित नव पवन कदम्ब के पुष्पों की रेणु
द्वारा आकाश को लाल कर रहा है. उधर पृथ्वी, कन्दली के फ़ूलों के स्पर्ष से सुगन्धित हो रही है. ये
दोनो दृष्य अभिलाषी पुरुषॊं के मन को का-मनियो के प्रति
आकक्त करने वाले हैं. नवीन वनवायु अपने आप ही शुद्ध वायु की
ओर संकेत कराने वाला शब्द है. उधर धरती सुगंधित है, मन चंचल हो रहा है.(९)
नवकदम्ब
जोरुणिताम्बैर रधि पुरन्ध्रि शिलान्ध्र सुगन्धिभिः
मानसि राग वतामनु रागिता नवनवा
वनवायु भिरादे धे !!
वन में प्रवाहित नव पवन कदम्ब के पुष्पों की रेणु द्वारा आकाश को लाल कर
रहा है. उधर पृथ्वी कन्दली के फ़ूलों के स्पर्श से सुगन्धित
हो रही है. ये दोनों दृष्य अभिलाषी पुरुषॊं के मन को
कामनियों के प्रति आसक्त करने वाले हैं.
प्रकृति के लाडले कवि कुमारदास द्वारा रचित" जानकी
हरण "प्राकृतिक सौंदर्य एवं उपमाओं के भण्डार से भरा
हुआ है. अतीत की निष्कलंक एवं पवित्र प्राकृतिक , प्रायः सभी जगह बिखरी पडी है. कई स्थानॊं पर मार्मिक
मानवीकरण भी है.
कुदरत की मादक गोद में विचरण करते राजा दशरथ की मनःस्थिति का वर्णण करते
हुए कवि लिखता है " राजा ने नदी के उस तट पर विश्राम
किया, जहाँ मंद पवन बेंत की लताओं को चंचल कर रहा था.
सुखद पवन गंधी की दुकान की सुगंध जैसा सुगंधित था. वह सारस के नाद को आकर्षित करने वाला था. नीलकमलॊं
के पराग को उडा-उडाकर उसने राजा के शरीर कॊ पीला कर दिया".
इसे पढकर लगता है कि हम किसी चित्र-संसार की
सलोनी घटना को प्रत्यक्ष देख रहे हैं.
श्रीहर्ष
ने अपनी कृति " नैषधिय़" में प्रकृति के सलोने रुप का वर्णण किया है. इस दृष्य
को उन्होंने राजा नल की आँखों के माध्यम से देखा था. नल ने
भय और उत्सुकता से देखा. क्या देखता है कि जल में सुगंध फ़ैलाने
वाला पवन जिस लता को चूम-चूम कर आनन्द लेता है,वही लता ( जॊ मकरन्द के कणॊं से युक्त है.) आज अपनी ही कलियों में मुस्कुरा
रही है. एक चित्र और देखिए--
"फ़लानि पुष्पानि च पल्ल्वे करे क्योतिपातोद गत वातवेपिते"
वृक्षों ने अपने हाथों में पुष्प और फ़ल लेकर राजा का स्वागत किया.
ऊपर की ओर पक्षियों की फ़ड-फ़डाहट से हवा में
होने वाले कम्पन से शाखाएं हिल रही थीं. पढकर ऎसा लगता है कि
वृक्षों ने अपने इन्ही हाथों (शाखाओं) में
पुष्प और फ़ल लेकर राजा का स्वागत किया हो.
वाणभट्ट ने अपनी कृति" कादम्बरी" में अगस्त्य मुनि के आश्रम के पास, पम्पा सरोवर का
वर्णण करते हुए लिखा है" सरोवर में कई प्रकार के पुष्प
हैं. जैसे- कुसुम ,कुवलय और कलहार. कमल इतने प्रमुदित है कि उसमे मधु
की बूंदे टपक रही है. और इस तरह कमल-पत्रों
पर चन्द्र की आकृतियां बन रही है. सफ़ेद कमलों पर काले भवरों
का मंडराना अंधकार का आभास देता है. सारस मस्त हैं. मस्ती में कलरव कर रहे हैं. उधर कमल रस का पान करके
तृप्त हुई कलहंस भी मस्ती का स्वारालाप कर रही है. जलचरों के
इधर से उधर डोलने से तरंगे उत्पन्न हो रही है. मानो मालाएं
हों. हवा के साथ नृत्य करती हुई तरंगे वर्षा ऋतु का सा दृष्य उत्पन्न कर रही है.
सुंदर
लवंग लता की शीतलता लिए हुए कोमल और मृदु मलय पवन चलता है. मस्त भौंरों और कोयल वृंदो के कलरव से कुंज-
कुटीर निनादित है. युवतियां अपने प्रेमियों के
साथ मस्त होकर नृत्य करती हैं. स्वयं हरि विचरण करते हैं.-ऎसी वसन्त ऋतु, विरहणियों को दुःख देने वाली है.
वसंत ऋतु का ऎसा सजीव चित्रण जो मस्ती से लेकर, संताप
की एक साथ यात्रा करवाता है.
कालिदास ने कवि और नाटककर दोनों रूपों में अद्भुत प्रतिष्ठा प्राप्त की.
उन्होंने प्रकृति के अद्भुत रुपों का चित्रण किया है. सरस्वती के इस वरद-पुत्र ने भारतीय वाड;गमय को अलौकिक काव्य रत्नों एवं दिव्य कृतियों से भरकर उसकी श्रीवृद्धि की
है.
रघुवंश
के सोलहवें सर्ग में प्राकृतिक छटा का जो श्लोक है उसका भावार्थ यह है कि वनों में
चमेली खिल गई है जिसकी सुगन्ध चारों ओर फ़ैल रही है. भौंरे एक-एक फ़ूल पर बैठकर मानों फ़ूलों की गिनती कर
रहे हैं.". वसन्त का चित्रण करते हुए एक कवि ने सजीव
एवं बिम्बात्मक वर्णण किया है-" लताएं पुष्पों से
युक्त हैं, जल में कमल खिले हैं, कामनियां
आसक्ति से भरी है, पवन सुगन्धित है, संध्याएं
मनोरम एवं दिवस रम्य है, वसन्त में सब कुछ अच्छा लगता है".
शकुन्तला
के बिदाई के समय के चित्र को देखिए-" हे वन देवताओं से भरे तपोवन के वृक्षों ! आज शकुन्तला अपने पति के घर जा
रही है. तुम उसे बिदाई दो. शकुन्तला
पहले तुम्हें पिलाए बिना खुद पानी नहीं पीती थी, आभूषणों और
शृंगार की इच्छा होते हुए भी तुम्हारे कोमल पत्तों को हाथ नहीं लगाती थी, तुम्हारी फ़ूली कलियों को देखकर खुद भी खुशी से फ़ूल जाती थी, आज वही शकुन्तला अपने पतिगृह जा रही है. तुम उसे
बिदाई दो".
संस्कृत
काव्यधारा में फ़ूलों की आदिम सुवास का अनमोल खजाना ,अपने पूरे लालित्य के साथ समाया हुआ है. प्रकृति के
इन विभिन्न आयामों की रचना करने का उद्देश्य ही पर्यावरण संरक्षण रहा है. आज स्थितियां एकदम विपरीत है. जंगलों का सफ़ाया तेजी
से हो रहा है. विकास के नाम पर पहाडॊं का भी अस्तित्व दांव
पर लग चुका है. प्रकृति हमारे लिए सदैव पुज्यनीय रही है.
भारतीय मुल्य प्रकृति के पोषण और दोहन करने का है, न कि शोषण करने का. वनों ने सदा से ही संस्कृति की
रक्षा की है. पूरे पौराणिक और ऎतिहासिक तथ्य इस बात के
साक्षी हैं कि जब तक हमनें वन को अपने जीवन का एक अंग माना, तब
तक हमें कभी पश्चाताप नहीं करना पडा.
आज वनों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संतुलन गडबडा गया है. विभिन्न विभाग तथा संस्थाएं इस प्रयास में लगी तो हैं लेकिन उनमें समन्वय
की कमी दिखलाई पडती है. काफ़ी प्रचार-प्रसार
के बाद भी इच्छित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं. यदि हम
पर्यावरण को जन-जन से जोड़ना चाह्ते हैं तो आवश्कता इस बात की
है कि हमें इसे पाठ्यक्रम में उचित स्थान देना होगा.
-------------------------------------------------------------------------------------------------
26
साहित्य का आपद धर्म.
सर्व प्रथम मैं आत्मीय धन्यवाद देना चाहूँगा शासकीय स्वशासी स्नात्कोत्तर
महाविद्यालय के विद्वान प्राध्यापक माननीय श्री लक्ष्मीकांत चंदेला जी को कि
उन्होंने मुझे इस योग्य समझा और मुझे वेबिनार में शामिल होने के लिए आमंत्रित
किया. इस वेबिनर में देश-प्रदेश के विद्वान साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, सरस्वती
के वरद पुत्रो ने बड़ी संख्या में अपनी भागीदारी का निर्वहन किया. आप सभी को सुनते
हुए मुझे जो ज्ञानार्जन हुआ है, उसके लिए मैं आप सभी के प्रति नतमस्तक हूँ. कहा भी
गया है कि जहाँ संत समाज अपना ज्ञान-कोष लुटा रहे हों, वहाँ जरुर उपस्थित होना
चाहिए और उन्हें मन लगाकर और गहराई से मनन करते हुए आत्मसात करना चाहिए. तुलसीदास
जी ने कहा भी है- मुद मंगलमय संत समाजू, जो जग जंगम तीरथराजू. संसार में मंगलमय
सन्तो का समाज, आनन्ददायक चलता फ़िरता प्रगतिगामी, कल्याणकारी तीर्थराज प्रयाग के
समान है. इस वेबिलोन में उपस्थित साहित्यकारों को मैं इसी संत समाज का एक अंग
मानता हूँ, जो आज साहित्य के आपद धर्म पर परिचर्चा करने के लिए इकठ्ठा हुए हैं. आप
सभी की मैं मुक्तकंठ से प्रशंशा करता हूँ और आप सभी को मैं आत्मीय साधुवाद और
धन्यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ.
साहित्य क्या है और उसका धर्म क्या है? इस गंभीर विष्य पर चर्चा करने से पहले
धर्म क्या है? उसका स्वरूप क्या है? क्या वह जनकल्याण की भावना को प्रतिपादित करता
है? क्या वह शोषित, पीड़ित, वंचित जनों के संरक्षण में खड़ा होता है और विधर्मी से
उनका बचाव करता है? आखिर धर्म है क्या? इस पर भी थोड़ा विचार, थोड़ा मंथन करते चलें.
भारत का सबसे पुराना धर्म कोई है तो वह सनातन धर्म है. एक ऐसा धर्म जो अपने
मूल रूप में हिन्दू धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है. वैदिक काल में भारतीय
महाद्वीप के धर्म के लिए सनातन नाम मिलता है. सनातन माने- जो हमेशा बना रहने वाला,
जिसका कि न कोई आदि है और न ही अंत. सनातन धर्म मूलतः भारतीय धर्म है जो किसी
जमाने में पूरे वृत्त्तर भारत में व्याप्त रहा है.
मनु स्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए है-.
धृतिः क्षमा दमोSस्तेय शौचं इन्द्रिय निग्रहः //
धीः विद्या सत्यम क्रोधो दशकं धर्म लक्ष्णम // धृति का
अर्थ है सुख-दुख, क्षमा- अर्थात गलती को माफ़ कर देना. अस्तेय माने किसी के धन की
इच्छा न करना ही अस्तेय है. शौच माने बाह्य और आंतरिक शुचिता या पवित्रता. इंद्रिय
निग्रह माने विषयों में फ़ंसी हुई इन्द्रियों को विवेकपूर्वक रोकना. बुद्धि- ज्ञान
ग्रहण करना, विद्या- विद्या दो प्रकार की बतलाई गई हैं. (१) परा-ब्रहमविद्या से उस
अविनाशी ब्रह्म या ईश्वर को जानना और (२) अपरा- अर्थात लौकिक सुखों को प्राप्त
करना. मनुष्य को चाहिए कि वह इन दस लक्ष्णो को गहराई से जाने और समझे फ़िर समझ लेने
के बाद ऐसे काम करे जिससे किसी का अहित न हो. किसी को दुख न पहुंचे. धर्म के इन दस
लक्षणॊ के इर्द-गिर्द रचा गया साहित्य, समय-समय पर हमें चेताता रहता है. सजग करता
रहता है. इस तरह हम देखते हैं कि धर्म प्रेम के पक्ष में खड़ा होता है. वह सदा से
ही उस मनुष्य के पक्ष में उठ खड़ा होता है, जो शोषित है, पीड़ित है, उपेक्षित है,
सताया गया है. धर्म की व्याख्या करते हुए यह भी कहा गया है-धर्म वह अनुशासित जीवन
क्रम है जिसमें लौकिक उन्नति तथा आध्यात्मिक परमगति दोनों की प्राप्त होती है.
चार वेद और अठारह
पुराण सद-साहित्य के वे अद्भुत ग्रंथ हैं जो मनुष्य जाति को उन्नति के शिखर पर
पहुँचने और शांतिपूर्वक जीवन यापन करने के सोपानों को दर्शाते है. वे मनुष्य जाति
को कदम-कदम पर चेताते रहते हैं, सचेत भी करते रहते हैं कि तुम्हारी जरा सी गलती
अन्य लोगों को कितने कष्ट में डाल सकती है. अन्धकार से प्रकाश में जाने के प्रेरित
करते हैं. कठोपनिषद कहता है- त्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य
वरान्निबोधत।।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।।14।। (हे मनुष्यों) उठो, जागो
(सचेत हो जाओ). श्रेष्ठ (ज्ञानी) पुरुषों को प्राप्त (उनके पास जा) करके ज्ञान
प्राप्त करो. त्रिकालदर्शी (ज्ञानी पुरुष) उस पथ (तत्वज्ञान के मार्ग) को छुरे की
तीक्ष्ण (लांघने में कठिन) धारा के (के सदृश) दुर्गम (घोर कठिन) कहते हैं (२) ॐ
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।।
अर्थात : हे ईश्वर (हमको) असत्य से सत्य की
ओर ले चलो. अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो. मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो.
मार्कण्डेय पुराण- में आया है कि जो राजा या शासक अपनी
प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता, वह नरक जाएगा . इसमें योग साधना, इंद्रिय
संयम , नशा, क्रोध व अहंकार के दुष्परिणाम आदि भी बताए हैं. (५) भविष्य पुराण- वर्ष के 12 महीने, सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधान , गर्भादान से लेकर उपनयन तक के संस्कार, विविध
व्रत-उपवास, पंच महायज्ञ, वास्तु
शिल्प, शिक्षा-प्रणाली , काल-गणना, युगों का विभाजन, सोलह-संस्कार, गायत्री जाप का महत्व, गुरूमहिमा,मन्दिरों के निर्माण , यज्ञ
कुण्डों का वर्णन है (६) स्कंद पुराण- में 8 बातें
हर किसी के लिए अनिर्वाय है- सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, क्रूरता का अभाव, हिंसा
का त्याग, मन और इन्द्रियों पर संयम, सदैव प्रसन्न रहना, मधुर
व्यवहार करना और सबके लिए अच्छा भाव रखना आदि का पाठ पढ़ाते हैं और जीवन जीने के
मंत्र देते हैं धर्म की व्याख्या करते हुए यह भी कहा गया है--विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च / रुग्नस्य चौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च// अर्थात प्रवास में
मित्र विद्या. घर की मित्र पत्नी, मरीज की मित्र औषधि और मृत्योपरांत मित्र धर्म
ही होता है.हिन्दू सनातन सिद्धांत धारा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रमुख
स्थान है. धर्मयुद्ध का अर्थ यहां किसी संप्रदाय विशेष के लिए युद्ध नहीं है बल्कि
वह सत्य और न्याय के लिए युद्ध है.
हम पाते हैं कि सृष्टि के निर्माण के बाद रचा गया साहित्य मनुष्य को सत्य के
रास्ते पर चलने का आग्रह करते रहे हैं. यहि साहित्य का आपद धर्म है.
साहित्य हमेशा से ही सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा रहा है. साहित्य शब्द का
संधिविग्रह करते हुए हम उसे सह+इति=साहित्य कहकर हम उसे प्रतिष्ठित करते है. यदि
इसमे थोड़ा और रद्दोबदल किया जाए तो हम पाते हैं कि इन्ही शब्दों के बीच सत्य की
उपस्थिति पाते है. (सा से आ की मात्रा और हि हटाने पर सत्य ही बचता है
सत्य ही साहित्य है,
क्योंकि वह हमेशा से ही अधर्म के विरुद्ध रहा है. भारत में बारह ज्योतिर्लिंग
स्थापित हैं, उनकी हम यहां विस्तार से चर्चा नहीं करेंगे, लेकिन इनका अध्ययन करने
पर ज्ञात होता है कि जब-जब भी शिव भक्तों पर अनाचार-अत्याचार होता था, वे
प्रकट होकर उन दैत्यों का संहार करते थे. इसी प्रकार विष्णु के जितने भी अवतार हुए
वे सभी जनकल्याण के लिए हुए थे, मानवता को बचाने के लिए ही हुए थे. बात त्रेता युग
की है. यह वह समय था जब रावण के अत्याचार से चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी.
जब उसके अत्याचार से धरती की सहनशक्ति जब समाप्त हो गई तो वह गाय का रूप धारण करके
वहां गई जहां मुनि और देवता एकत्रा थे...धेनु रूप
धरि हृदय विचारी...गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी. धरती कि विनती सुन श्री हरि ने मानवता को बचाने के लिए श्रीराम धरती पर
अवतरित होते हैं. बड़ा ही रोचक प्रसंग आगे आता है कि मुनि विश्वामित्र श्रीराम जी
को वन ले जाने के लिए अयोध्या आते है. राजा दशरथ जिनके बारे में कहा गया है कि
देवताओं की ओर से युद्ध लड़ चुके होते है, राम के बदले स्वंय मुनि के संग जाने को
उद्दत होते हैं, लेकिन विश्वामित्र जी केवल राम को ही अपने साथ ले जाने की जिद्द
पर अड़ जाते हैं. आखिरकार श्रीराम और लक्ष्मण उनके साथ वन में जाते हैं. यह पहला
अवसर था उनके लिए कि उन्होंने पहली बार
जंगल देखा और जंगल में रह रह शोषित-पीड़ित जनों को देखा था. उनके दुःख दर्द को समझा
था. राक्षसी ताड़का को मौत के घाट उतारा.
एकहि बान प्रान हरि लीन्हा और और ताड़का के
साथी मारीच को बिना फ़ल वाला बाण मारकर सौ योजन समुद्र पार भेज दिया. बिन फ़र बान राम तेहि मारा, सत जोजन गा सागर पारा. विश्वामित्र जी यहाँ नहीं रुकते. वे श्रीराम और लक्ष्मण के
लिए उस वन प्रदेश से गुजरते है जहाँ अहल्या अपनी मुक्ति के लिए पाषाण बनी वर्षो से
श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही होती है. नारी मुक्ति का यह प्रथम और दुर्लभ
उदाहरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है. वे दोनों भाईयों को लेकर राजा जनक के यहाँ
जा पहुँचते हैं. वे श्रीराम से धनुष को तोड़ने की आज्ञा देते हैं. वे जानते थे कि
राजा दशरथ विष्णु भक्त थे और राजा जनक शिव भक्त. एक दूसरे के धुर विरोधी. यही वह
धनुष था जिसके चलते वे कभी एक दूसरे से मिले नहीं और न ही उनके आने-जाने-मिलने का
कहीं उल्लेख मिलता है.वे केवल धनुष ही नहीं तुड़वाते बल्कि दो पक्षों को रिश्तेदारी
में जोड़ देते हैं. दो शक्तिशाली राजाओं को एक सूत्र में बांधने का काम विश्वामित्र
जी करते हैं.
इस कथा क्रम में यदि कोई दूसरा शक्तिशाली केंद्र था तो वह
राजा दशरथ की प्राणप्रिया कैकई जी थीं. वे रामजी को राजा बनाने के पक्ष में कतई
नहीं थीं. वह यह भी जानती थी कि राम यदि राजा बन गए तो सिर्फ़ अयोध्या के राजा होकर
ही रह जायेंगे और फ़िर राजकाज के चक्रयूव्ह में इतना घिर जायेंगे कि इस परिधि से
बाहर नहीं निकल जायेंगे. वह यह भी जानती थी कि अयोध्या के अलावा देश में और भी
राजा-रजवाड़े हैं लेकिन वे सब मिलकर भी रावण का सामना नहीं कर सकते जो बुराइयों का
प्रतीक है, मानवता का भक्षक है. शोषित पीड़ित जनो के आर्तनाद वे अयोध्या में बैठकर
सुन और महसूस कर रही थीं. वे जानती थी कि ऐसा किए जाने से उसे वैधव्य की काल कोठरी
से होकर गुजरना पडेगा. उन्होंने अपना वैधव्य स्वीकारा लेकिन राम को राजा नहीं बनने
दिया और वन जाने के लिए आज्ञा दी. राम यदि बारह बरस के लिए बनवास में नहीं जाते तो
शायद ही उनकी मुलाकात जंगल में निवास कर रहे कोल-किरातों जैसी पिछड़ी जनजाति से होती
और न ही वे उनके सुख-दुख को जान पाते. शबरी के जुठे बेर खाकर उन्होंने दूसरी बार
नारी जाति को वह सर्वोच्च सम्मान दिया, जिसकी की कि वह सच्ची अधिकारिणी थी. ऐसे
अप्रतिम उदाहरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलते. मानवता को पैरों तले कुचलाने वाली
तथा बर्बरता की प्रतीक बनी सुर्पणखा की नाक-कान काटकर उन्होने सीधे रावण को खुली
चुनौती दी थी. सीता हरण के बाद उनकी मुलाकात गिद्दराज जटायु से होती है, जो वनवासी
है, जिसने नारी रक्षा के लिए रावण को चुनौती देते हुए उससे युद्ध किया थ और वीरगति
पाई थी. जंगल में भटकते हुए उनकी भेंट हनुमान जी और वानरराज सुग्रीव से होती है जो
महा-अत्याचारी बालि के डर से कन्दराओं में छिपकर रहने को विवश थे..युद्द होने से
पहले उन्होंने जंगल में रहने वाले रीझ-वानरों जैसी पिछड़ी जाति को सम्मिलित करते
हुए अपनी फ़ौज का गठन किया. ये सभी पिछडी जाति से संबंध रखते थे.
इसी तरह द्वापर युग में
श्रीकृष्ण जी ने अत्याचारी कंस को मारकर शोषित-पीड़ित-जनों का उद्धार ही किया था.
वे तो यह भी घोषणा करते हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय
च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥
संत शिरोमणि तुलसीदास की ये पंक्तियां- “कीरत भनित भूरिमल
सोई-सुरसरि के सम सब कह हित होई” अमरत्व लिए हुए है. गंगा
की तरह ही साहित्य भी सभी का हित सोचता है. वह गंगा की तरह पवित्र और प्रवाहमय है, वह धरती को जीवन देता है...श्रृंगार देता है और सार्थकता भी. जैन धर्म तथा
बौद्ध धर्म भी मनुष्य जाति को सदकर्म में लगे रहने का उपदेश देते हैं. भीषण
रक्तपात मचाने के बाद सम्राट अशोक को घोर पश्चाताप होता है और वे बौद्ध धर्म अपना
लेते है. उन्होंने न सिर्फ़ धर्म का
प्रचार-प्रसार किया, बल्कि अपने पुत्र को भी दीक्षित करते हुए श्रीलंका भेजा था.
जगह-जगह स्तंभ/शिलालेख लगवाए. कन्धार का द्विभाषी
शिलालेख (258 ईसापूर्व)- इस लेख
में संस्कृत में 'धर्म' और ग्रीक में उसके
लिए 'Eusebeia' लिखा है, जिसका अर्थ यह है कि
प्राचीन भारत में 'धर्म' शब्द का अर्थ
आध्यात्मिक प्रौढ़ता, भक्ति, दया, मानव समुदाय के
प्रति कर्तव्य आदि था. बुद्ध तो कहा करते थे-"अप्पो दीपो भव" अर्थात
स्वयं को प्रकाशित करो और फ़िर उस प्रकाश से भटकी हुई मनुष्य जाति को सही मार्ग
बतलाओ, इसका आशय हो यही हुआ न !.संत तुलसी जी भी-" परहित सरिस धर्म नहीं
भाई"-कहते नहीं थकते.
समय-समय
पर अनेकानेक संत/महात्माओं ने भी मनुष्य जाति को धर्म विमुख होने के लिए चेताते
हुए सही मार्ग पर चलने का उपदेश दिया है. इस क्रम में "कबीर" को कैसे
विस्मृत किया जा सकता है. पहले तो संपूर्ण भारत/आर्यावृत में सनातन धर्म ही था,
किंतु कालांतर में जैन धर्म, बौद्ध धर्म आदि का प्रादुर्भाव हुआ. सभी ने प्रायः
वही बातें कही हैं, जो सनातन धर्म कहता आया है. बावजूद इसके उनके बीच मनोमाल्यन
बनता रहा. कबीर जी इस गंभीर विषय पर कहते हैं-एक हे माटि की सब काया / ऊँच नीच कौ
नाहिं / एकहि ज्योति बरे कबीरा / सबके अंतर माहिं. सत्य को प्रतिपादित करते हुए वे
कहते है- " सांच बराबर तप नहीं, झूठ बरोपरि पाप // जाके हिरदा सांच है, ताके
हिरदै आप. कबीर जहां समग्र समाज का चिंतन करते हैं, वहीं उच्चवर्ग में उसी वर्ग की
"दलित" स्त्री के बारे में कहते है -"मोटी जनेऊ ब्रह्मण पेठो,
ब्राहमणी को नहीं पहनाई/ जनम जनम को भई वो सूदा, उने परस्यो तने खाई. पर पीड़ा को
लेकर वे कहते हैं-" कबीरा कोई वीर है, जो जाणे पर पीर". कपटी और
धोकेबाजों को चेताते हुए वे लिखते है-"मन बनैयाँ,बनैज न छॊड़ॆ, जनाम जनम का
मारा बनियाँ, आजहू पूर न तौले, पासँग के अधिकारी, लैले भूला-भूला डोलै/. घर में
दुविधा कुमति बनी है, पल-पल में चित तोरैं, कुनबा वाले सकल हरामी, अमृत में विष
घोलै". धर्म को खाद-पानी समाज से मिलता है. एक जगह उन्होंने व्यथित होकर
कहा-" चलती चक्की देखि के दिया कबीरा रोय/ दुइ पट भीतर आय के साबित बचा न
कोय. आदमी चाहे कितना ही घमण्ड कर ले अपनी दौलत पर,लेकिन जब मरता है तो खाली हाथ
ही जाता है. वे लिखते हैं- कबिरा सो धन संचए, जो आगे को होय/ सीस चढ़ाए गाठरी, जात
न देखा कोय //. एक उदाहरण इसी धन संचय पार- "आसा जीवै जग मरै,लोग मरै मरि जाइ
/ सोइ मूवै धन संचते, सो उबरे जे खाइ //.प्रेम धन की स्थापना के लिए वे लिखते है-
प्रेम न बाड़ी नीपजै, प्रेम न हाट बिकाइ / राजा परज जे रुचै सीस देइ ले जाइ //.(२)
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय/ ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय//.
साहित्य
के सत्य धर्म को गांधीजी ने गहराई से जाना-समझा. वे जब दक्षिण अफ़्रीका में थे तो
एक बैरिस्टर की हैसियत से गए हुए थे और जब लौटे तो एक महात्मा बनकर लौटे. दक्षिण
अफ़्रीका का वह स्टेशन "पीटरमारित्जबर्ग" जहां प्रथम श्रेणी का टिकिट
होने के बावजूद एक अंग्रेज ने उन्हे धक्के देकर उतार दिया और सामान प्लेटफ़ार्म पर
फ़ेंक दिया था. भीषण कड़ाके की ठंड होने के बावजूद वे पूरी रात उसी स्टेशन पर एक
बेंच पर बैठकर ठिठुरते रहे और अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े होने की योजना बनाते
रहे. एक बैरिस्टर से महात्मा बनने का यह एक एतिहासिक क्षण था.
भारत
लौटकर वे अपने आध्यात्मिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले जी से मिले. उन्होंने गांधीजी के
अन्दर धधकती ज्वाला को देखा और परामर्श दिया कि कोई भी योजना को मुहूर्त रुप देने
से पहले पूरे भारत की यात्रा करें. गांधीजी का पहली बार उन लोगों से साक्षात्कार
हुआ जो शोषित थे, पीढ़ित थे और गरीबी की मार सहने को अभिशप्त थे. जितनाअ विशाल देश
उतनी ही बड़ी समस्याएं, भाषा-बोली, रहन-सहन में विभिन्नता को देखकर उन्होंने स्वयं
गुजराती होते हुए "हिन्दी" की महत्ता को स्वीकारा और अपने अभियान को धार
दी.
स्वाधीनता
संग्राम के दौरान महात्मा गांधीजी ने सर्वप्रथम स्वाधीन भारत के लिए यह परिकल्पना
दी थी कि- "एक राष्ट्र, एक राष्ट्रभाषा हो:. इसी परिकल्पनाअ कओ ध्यान में
रकहते हुए सर्वाप्रथम सन 1936 में उन्होंने वर्धा के सेवाआश्रम में राष्ट्रभाषा प्रधार समिति की
स्थापना की. संस्था का उद्देशयों में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार और
राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना था. कार्यवाही पंजी में हस्ताक्षर करने वाले
व्यक्तियों में स्वयं महात्मा गांधी, डा.राजेन्द्रप्रसाद, राजर्षि टंडन, सेठ
जमनालाल बजाज, काका कालेलकर, ब्रिजलाल बियाणी, हरिहर शर्मा, वियोगी हरि, शंकरराव
देव और बाबा राघवदास थे.
जिस हिन्दी के रथ पर सवार
होकर गांधीजी ने सत्याग्रह चलाया और अन्ततः गोरों को देश से बाहर निकाल फ़ेंका, आज
उसी हिन्दी की दुर्दर्शा हम अपनी आँखों से देख रहे हैं.मेराअ विरोध अंग्रेजी या
अन्य भाषाओं से नहीं है,लेकिन हिन्दी की दोयम स्थिति को देखकर अपार पीड़ा होती है.
हमारे नवनिहाल पैदा होते ही अंग्रेजी की घुटी पी रहे हैं और प्रारंभिक शिक्षा भी
उसी में ले रहे हैं. द्विभाषा के फ़ार्मूले ने हिन्दी को बहुत पीछे छोड़ दिया है.
गली-गली में अंग्रेजी शिक्षण के स्कूलों का मकड़जाल फ़ैल चुका है. हिन्दी भाध्यम को
लेकर चल रहे स्कूलों में ताले डल रहे हैं. जिस साहित्य और साहित्य के आपाद धर्म की
हम आज चर्चा कर रहे हैं, वह आपके और हमारे बीच ही रहने वाला है.
हिन्दी के कट रहे बच्चे
धीरे-धीरे साहित्य से भी कटते जा रहे हैं. वे क्योंकर आपके साहित्य में झांकना
चाहेगे.? क्यों कर गीता-भागवत-रामायण का अध्ययन करेंगे. वे तो वही देख-सुन रहे है
जिसका प्रसारण टीव्ही के माध्यम से या फ़िर बनती फ़िल्मों के माध्यम से हो रहा हैं.
इसका निर्माता क्या गलत-सलत डाल रहा है, अपनी टीआरपी बढ़ने के चक्कर में कितना कूड़ा
भर रहा है, वे नहीं जान पाएंगे, जब तक कि वे उस साहित्य का अध्ययन नहीं करेंगे. एक
समय वह था जब हमारे हीरो भगतसिंह जैसे देशभक्तों का हुआ करता था. आज की पीढ़ी का
हीरो बदल चुका है. यह आज की वास्तविकता है. नकली जीवन जीने
की अभिलाषा ने हमारा सच हमसे छीन लिया है. यह आज का क्रूर सत्य है.
साहित्य केवल उपदेश देने मात्र का साधन न बन
पाए, इसकी सावधानी हमें रखनी होगी.उपदेश और शिक्षा तो हम सनातान काल से लेकर आज तक
देते और सुनते आए है. लेकिन इसकी उपादेयता लगभग समाप्त होने को है. आज सबसे बड़ा
सवाल हमारे सामने यह होना चाहिए कि हम साहित्य को और साहित्य के इस धर्म की रक्षा
कैसे कर सकते हैं? कैसे इसके प्राण बचा सकते हैं? इस जाटिल विषय पर हम सभी को
गंभीरता पूर्वक सोचना होगा, मनन करना होगा और तदानुसार कार्य-योजना बनानी होगी.
तभी हम साहित्य को बचा पाएंगे.
----------------------------------------------------------------------------------------------------
27
हिन्दी साहित्य में लघुकथा का अस्तित्व तथा महत्व
हिन्दी साहित्य के इतिहास
को खंगालाने पर ज्ञात होता है कि विगत सौ-सवा सौ साल के दौरान
कहानियां,निबन्ध,उपन्यास,यात्रा-वृतांत,संस्मरण एवं रिपोर्ताज आदे विधाएं विकसित
हुईं,जिसमें कहानी की विधा सर्वोपरी रही.
ऐसा माना जाता है कि सन
40 के दशक में मराठी भाषा में लघुकथा का सूत्रपात हुआ था.उन दिनों प्रकास्शित होने
वाली साप्ताहिक पत्रिकाओं “चित्रा” तथा “आशा” मासिक पत्रिका “ज्योत्सना” में लल्घुतम
कथा शिर्षक से लघुकथाओं का प्रथम संग्रह प्रकास्शित हुआ था. तब से लेकर आज तक
विभिन्न भाषाऒं में हजारॊं लघुकथाएं प्रकाशित की जा चुकी हैं.
लघुकथा का अर्थ:-
नाम से ही स्पष्ट है कि छॊटी कथा. कम से कम शब्दों मे लिखी गई कथा या बहुत
छोटी कहानी, पर कहानी का संक्षिप्तीकरण नहीं. शिल्प और ट्रीटमेन्ट के कारण कहानी
से स्वतंत्र विधा.(2) छोटी पर अधूरी नहीं(3)छोटी माने केवल एक विषय, एक घटना के मार्मिक बिन्दु पर केन्द्रीत.(4) चरम सीमा से प्रारंभ होते हुए फ़िर अन्त.(5)प्रारम्भ
और अन्त आपस में गुथें हुए.(6) पात्र सृजन ,संघर्ष,
अंतर्द्वंद, वातावरण, वर्णण, विस्तार आदि की गुंजाइश नहीं. बस सब सांकेतिक.
उपरोक्त बिन्दुओं को अपने मे समाअहित करती हुई अगर कोई रचना है तो निःसंदेह वह
लघुकथा ही होगी. उसमें कसाव होगा. तीर की मारक क्षमता होगी. वह आघात भी करेगी. एक
आइसा घाव पैदा करेगी जो आपको कचोटती रहेगी.
लघुकथा का आकार-प्रकार.
लघुकथा का आकार-प्रकार क्या हो? इस संबंध में अब तक कोई मानक मापदण्ड नहीं है.
कुछ विद्वानों का मत है कि लघुकथा में पांच-छः सौ शब्दों के बीच वह सिमट जाना
चाहिए.
कथा सम्राट प्रेमचन्द ने भी लघुकथाएं लिखी है. उसमे सबसे कम शब्दों में लिखी
गई लघुकथा” “ राष्ट्र का सेवक” है,जिसमें 280 शब्द
है. “ बंद दरवाजा” में 350, “देवी” में 380, “दरवाजा” में 650, “बाबाजी का भोग” में690, “कश्मीरी सेव में 720, “दूसरी शादी” में 740,”जादू” में 800,” शादी की वजह” में800, “गमी” में 820, “गुरु मंत्र” में 890, तटःआआ “यह भी नशा,वह भी नशा” में 930 शब्द थे.
अतः कहा जा सकता है कि लघुकथा में शब्द में शब्द निर्धारण कोई शर्त नहीं
है,परन्तु उसकी अधिकतम सीमा है अवश्य. यदि ऐसा नहीं होगा तो लघुकथा संकेतों के
व्यंजना के अपने सौंदर्य को खो देगी. वह कहानी बन जाएगी. सपाट, घटना कथा अथवा
सूचना रचना कथा बन कर रह जाएगी. लघुकथा
में आंतरिक उद्वेग जितना घनीभूत होगा, कथ्य जितना स्पष्ट होगा और कथाकार जित्ना
स्क्षम होगा, अभिव्यक्ति उतनी सटीक व प्रभावकारी होगी. अतः कथाकार को उसकी रचना
आकारगत में छोटी रह जाने अथवा लम्बी हो जाने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए.
कालखंडॊं में लघुकथाएं.
प्राचीन काल से ही लघुकथाएं साहित्य की एक विधा थी और संप्रेषण का माध्यम भी.
इस काल की लघुकथाएं पौराणिक साहित्य को समृध्दि प्रदान करती थीं. अतः कहा जा सकता
है कि लघुकथा कोई नयी विधा नहीं है. इसका जन्म तो वैदिक युग में ही हो गया
था,किन्तु इसके स्वरुप में समय व कालचक्र के साथ परिवर्तन होते चले गए.
मध्यकाल सूर-तुलसी,कबीर,जायसी जैसे श्रेष्ठ कवियों का काल था. इस काल
में भक्तिरस में डूबी-पगी कविताएं तथा नायिका के नख-शिख को बयान करती कविताओं का
युग था. गद्ध साहित्य लगभग उपेक्षित ही रहा है. इसीलिए लघुकथा की दृष्टि से यह
अभाव का काल था.
इस काल में कुछ मुद्रित अंकों की उपलब्धि हुई. जैसे मर्सिया,,सिंहासन बत्तीसी
व माधोनल,चौरासी वैष्णवों की वार्ता आदि. लघुकथाओं की दृष्टि से केवल सिंहासन
बत्तीसी को ही लिया जा सकता है. इसी काल मे कुछ पत्र-पत्रिकाएं प्रकाश में
आयीं,जिसमे सरस्वती, चांद,मतवाला,ब्राह्मण आदि, लेकिन इन पत्र-पत्रिकाओं ने लघुकथा
के महत्व को कोई महत्व नहीं दिया.
1900 से 1947 तक का समय हिन्दी लघुकथा के
प्रारम्भिक युग के नाम से जाना जता है. सन 1901 मे माधवराव
सप्रे की लघुकथा” मिट्टी भर टोकरी” छात्तीसगढ-मित्र पत्रिका में प्रकाशित हुई थी.
बाद में इसे स्व.कमलेश्वर ने सारिका, पहली कहानी में अपने संपादत्वकाल में
प्रकाशित किया था. सरस्वती पत्रिका में
छबीलीलाल गोस्वामी की लघुकथा” विमाता” प्रकाशित हुई,लेकिन शब्दों की संख्या की
अधिकता की वजह से इसे लघुकथा की श्रेणी के उपयुक्त नहीं माना गया. सन 1916 मे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लघुकथा “ झलमला” प्रकाशित हुई. यह हिन्दी
की प्रथम जीवन्त लघुकथा मानी जाती है. इसमें प्रतीकात्मक और कथ्य की सहज भंगिमा
पायी गई.
सन 1914 में जगदीशचन्द्र मिश्र की “बूढा
व्यापारी”, 1924 में आचार्य रामचन्द्र श्रीवास्तव की “बेबी”,1926में जयशंकर प्रसाद की” कलावती की सीख”,1928में
माखनलाल चतुर्वेदी की “बिल्ली और ब्युखार”,1929 में कन्हैयालाल
प्रभाकर की सेठजी और सलाम,1930 में सुदर्शन की ”दो
परमेश्वर”,उपेन्द्रनाथ अस्श्क की”जादूगरनी,1933 में
भारतेन्दु की”आप बीती-जगबीती” कन्हैयालाल मिश्र की “सार्थकता”,जगदम्बाप्रसाद
त्यागी कि “विधवा का सुहाग”,1940 में रामनारायण उपाध्याय की
“आटा और सीमेन्ट” प्रकाशित हुई भोपाल के लघुकथाकार जहुर बख्श ने खूब लघुकथाएं
लिखी,जो काफ़ी सराही गयीं. 1950 से आजतक की लघुकथाएं आधुनिक
लघुकथा के दायरे में आती हैं.
आधुनिक लघुकथा का जन्म सातवें दशक के मध्य से माना जाता है. शताब्दी के आठवें
दशक मे लघुकथा खूब लिखी गयीं.71 से 80 तक का समय लघुकथा के लिए महत्वपूर्ण रहा. इस काल मे लघुकथा के विकास में
अभूतपूर्व विकास हुआ. बढती मंहगाई, भूख ,गरीबी, रिश्वतखोरी और जमा खोरी के सामने
जनमानस में कुछ नहीं कर पाने की बैचैनी थी. आठवें दशक में लघुकथा तेजी से सामने
आने का कारण युगीन वातावरण था.
72-73 के समय में पांच भाषी राज्यों से छः पत्रिकाओं के लघुकथा
विशेषांक छपकर आए. भोपाल से अन्तर्यात्रा, राजस्थान से “अतिरिक्त” और “पवित्रा
”(ब्यावर),उत्तरप्रदेश से “मिनीयुग(गाजियाबाद) हरियाणा से”दीपशिखा”,पंजाब से”
प्रयास”पत्रिकाएं सम्मिलित हैं. इसके तुरन्त बाद कमलेश्वर ने जून 73 तथा जुलाई 75 में सारिका के लघुकथा विशेषांक
निकाले.
यह वह समय था जब विभिन्न समाचार पत्रों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं ने लघुकथा को
हाथों हाथ लिया. पाठकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. नए लेखक मैदान में
आए. लघुकथा विशेषांकों और संग्रहों का जाल पूरे देश भर में फ़ैलता चला गया.
सन 74 मे भगीरथ व रमेश जैन के संपादन मे “गुफ़ाओं
से मैदान की ओर” रमेश बतरा द्वारा “तारिका”(अम्बाला) तथा जगदीश कश्यप व महावीर
प्रसाद जैन द्वारा “समग्र”, 77 में(दिल्ली) पत्रिका के
विशेषांकॊं ने लघुकथा को दो धाराओं में बांट दिया. एक धारा सतही वर्णणॊं को
उत्तेजना के साथ उकेरती थी जिसका प्रतिनिधित्व सारिका कर रही थी. दूसरी धारा युगीन
सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करने की बेचैनी के साथ उसे कलात्मक यथार्थ मे परिणत करने
का संयम दिखा रही थी,किन्तु सारिका कि व्यवसायिकता व लोकप्रियता ने पहली धारा को
अच्छा खासा फ़ैलाव दिया. सतही और उबाऊ वर्णणों वाली लघुकथाएं अपनी गैर-जिम्मेवारी
के कारण तीखी आलोचना का शिकार होने लगीं. इसमे कुछ भी गलत नहीं था.
1972 में जगदीश कश्यप ने मिनी युग के माध्यम से लघुकथा साहित्य
को सामने लाने की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया. बाद मे इसका संपादन बलराम
अग्रवाल व सुकेश साहनी ने संभाला. लघुकथा को विक्रम सॊनी ने “आघात” पत्रिका के
माध्यम से स्थायीत्व दिया. अशोक जैन ने लघु समाचार पत्र आकार की पत्रिका निकालकर
महत्वपूर्ण योगदान दिया. सन 84 में “ पहचान-यात्रा” नाम से
साप्ताहिक एवं त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन हुआ.
तरुण जैन ने “ आगमन “ (त्रै.) अंक निकाले. सतीशराज ने 86 से 88 तक “दिशा” पत्रिका निकाली. वे
पत्रिकाएं आज अतीत का हिस्सा बन चुकी हैं.
वर्तमान समय में हंस, वागर्थ, कथाक्रम, कथादेश, उद्भावना, कथाबिंब,, शोध दिशा, मधुमती,आदि पत्रिकाएं लघुकथा के प्रकाशन में उल्लेखनीय योगदान
दे रही हैं. “सरस्वती सुमन”पत्रिका( प्रधान संपादक डा.आनन्दसुमन सिंह) ने श्रीकृष्णकुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं) के
अतिथि संपादन मे वर्ष्य 2011 में 126
लघुकथाकरों का विषेशांक प्रकाशित किया. इस पत्रिका को काफ़ी सराहा गया. अविराम
साहित्यिकी (त्रै) के संपादक डा. उमेश महादोषी अपने सभी अंको में लघुकथाओं को
यथोचित स्थान दे रहे हैं. यद्दपि यह पत्रिका अपने आकार-प्रकार में छॊटी अवश्य
है,लेकिन इसमें प्रकाशित लघुकथाओं के तेवर देखने लायक होते हैं. और भी अन्य
पत्रिकाएं लघुकथाओं को लेकर प्रकाशित की रही है.
छिन्दवाडा से श्री पवन शर्मा ने “ जंग लगी कीलें” (1966), श्री रामकुमार आत्रेय ( कैथल-हरियाणा) ने “छोटी-सी बात”(2006),
श्री गोविन्द शर्मा(संगरिया-राजस्थान) ने “रामदीन का चिराग (2014), डा. भारती खुबालकर (बिलासपुर-छ.ग-2002), डा.श्रीराम
मीना ( छिन्दवाडा-1980) ने “नीम चढी गुरबेल”, लघुकथाओं के अंक प्रकाशित हुए. इसी तरह “लघुकथा
का गढ छत्तीसगढ” (संपादन श्री जयप्रकाश मानव/डा.राजेन्द्र सोनी-2008), मुंशी प्रेमचन्द की लघुकथाओं के संचयन को लेकर “लघुकथा साहित्य”(
संपादन-सुरेश जांगिड- 1998), कथा सागर
लघुकथा विशेषांक ( पटना-
मार्च 2012) में, देवसुधा (संपादन श्री शशांक मिश्र
“भारती”(2012) तथा “लहर और लहर (संकलन-संपादन श्री अंजीव
अंजुम( भीलवाडा-राज्स्थान) आदि प्रकाशित हुए.( सभी मेरे पास अपने बुकसेल्फ़ में)
मेरे द्वारा अब तक लगभग
एक सौ लघुकथाएँ लिखी जा चुकी है. ”शहर अब शांति के आगोश में है” नाम से
लघुकथा संग्रह प्रकाशनाधीन है. हिन्दी बुक सेन्टर नई दिल्ली से प्रकाशित मारीशस के
प्रख्यातनाम साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर का लघुकथा संग्रह, “ यात्रा साथ-साथ”
जिसमें तीन सौ एक लघुकथाएं संग्रहित है, मेरे बुकशेल्फ़ में है.
इससे ज्ञात होता है कि
लघुकथाओं का संसार व्यापक है. देश में ही नहीं, अपितु पूरे संसार में लघुकथाएं
लिखी और प्रकाशित की जा रही है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------
28 हिन्दी—देश से परदेश तक
भाषा अभिव्यक्ति का
सर्वोत्तम माध्यम है. यह अभिव्यक्ति आमजन की अस्मिता से लेकर राष्ट्र के आगत
भविष्य निर्मांण के लिए भी हो सकती है. इसीलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही
सीमित नहीं होता. हम जो सोचते हैं अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त करते हैं और यह
अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाती है. हमनें अपनी स्वतंत्रता की लडाई हिन्दी के माध्यम
से जीती है. आमजन की भाषा की राष्ट्रीय गरीमा को प्रतिष्ठित करना एवं उसे कायम
रखना है.
भाषा का निर्माण टकसाल
में न होकर सडक पर होता है, चौपालों में होता है, गाँव के गलियारों में होता है और
उसका शिल्पी देश का आमजन है. भाषा की समृद्धि एवं संपन्नता जन-जन की भाषा के प्रति
सजगता ,सक्रीयता एवं जागरुकता पर निर्भर
करती है. भाषा के विनाश एवं विकास में वही एकमात्र जिम्मेदार है.
भारत के
कोने-कोने में बोली जाने एवं समझी जाने वाली हिन्दी ही एकमात्र भाषा है. सरल, और
वैज्ञानिक लिपि में लिखी जाने के कारण हिन्दी भाषा अत्यन्त सुव्यवस्थित, संपन्न और
लोकप्रिय है. भारत के अधिकांश भागों में प्रयोग किए जाने के कारण हिन्दी को भारत
की राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त है. राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी एक प्रदेश के
लोगों को दूसरे प्रदेशों के लोगों से जोडती है, एवं संपर्क स्थापित करती है और
राष्ट्रीय एकता का भाव जगाती है. हिन्दी की इसी विशिष्टता के कारण हमारे संविधान
निर्माताओं ने १४ सितम्बर १९४९ को देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को,
संघ की राजभाषा के रुप में स्वीकार किया तथा २६ जनवरी १९५० को संविधान में इसका
प्रावधान किया.
हिन्दी भाषा की एक नहीं,अनेक खूबियां है.
१/- हिन्दी एक सशक्त और सरल भाषा है.(२) हिन्दी देवनागरी लिपि मे ध्वनि-प्रतीकों(
स्वर-व्यंजन) का क्रम वैज्ञानिक है (३) इसमे प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग चिन्ह
है(४) इसमे केवल उच्चारित ध्वनियाँ ही लिखी जाती है.(५)जिस रुप में यह बोली जाती
है, उसी रुप में लिखी भी जाती है.(६) हिन्दी जर्मनी की तरह अपने ही प्रत्ययों से
नवीन शब्दों का निर्माण कर लेती है.(७) हिन्दी में क्रदंन्त क्रियायों को अधिक
ग्रहण किया है, क्योंकि ये बहुत सरल एवं स्पष्ट होती है.(८) हिन्दी की
संज्ञा-विभक्तियां सिर्फ़ पांच-सात ही हैं.(९)हिन्दी के सर्वनाम अपने हैं.(१०)
हिन्दी में विशेषण के साथ अलग-अलग विभक्ति लगाने की जरुरत नहीं होती.(११) हिन्दी
के अपने अव्यय हैं.
स्वाधीन भारत की नींव को सुदृढ करने के लिए गांधीजी ने जितने काम किए,उनमें
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का काम भी प्रमुख स्थान रखता है,लेकिन गांधीजी की
भाषिक मान्यताओं पर विमर्श करने से पूर्व यह भी जानना आवश्यक है कि क्या गांधीजी
से पूर्व हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की आवाज किन लोगो ने उठाई थी? हाँ, गांधीजी
से पूर्व हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिशे की गई थी. प्रख्यात फ़्रांसीसी
विद्वान गार्साद तासी ने सन १८५२ के फ़्रांस के अपने भाषण मे हिन्दुओं-हिन्दुस्थानी
को हिन्दुस्थान की लोक या सार्वदेशीय़ भाषा के रुप में रखा था. अंग्रेजी के
प्रसिद्ध कोश “ हिंदुस्थानी जाब्सन” में जिसका प्रकाशन सन १८८६ में लंदन में किया
गया था, हिंदुस्थानी को सभी भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रभाषा माना गया, फ़िर तो
गियर्सन जैसे अनेक लोग हिन्दी के सार्वदेशिक रुप को लेकर आगे आए.
स्वदेशी लोगों में सबसे
पहले राजा राममोहन राय ने एक भाषण में संकेत दिया था कि श्री पेठे, जो मुंबई के
कालेज में अध्यापक थे, ने मराठी में “राष्ट्रभाषा” नाम की पुस्तक सन १८६४ में
लिखी, जिसमें हिन्दी भारत की आवश्यक भाषा के रुप में स्वीकार किया. बंगाल के महान
धार्मिक नेता केशवचन्द्र ने अपने “सुलभ समाचार” नामक पत्र में भारत की एकता के लिए
हिन्दी अपनाने की पूरी वकालत की थी. यही नहीं, श्री सेन ने हिन्दी के
प्रचार-प्रसार में सक्रीय सहयोग भी दिया. वैदिक धर्म के अनन्य प्रचारक और विद्वान
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने, जो पहले संस्कृत में ही प्रचार करते थे,४८ वर्ष की
अवस्था में उन्हीं “सेन” के कहने से हिन्दी सीखी और उसी में सारा कार्य करने लगे.
गुजराती के लल्लुजी”लाल” ने हिन्दी के प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ “ प्रेमसागर” की रचना
की. १८७० के आसपास मराठी विद्वान हरिगोपाल पाण्डे ने “ भाषा तत्व-दीपिका “संज्ञक”
हिन्दी व्याकरण लिखा. प्रख्यात बंगला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी ने बंगाल के
प्रसिद्ध साहित्यिक-पत्र “बंग.दर्शन” में १८१७ में एक आलेख लिखा, जिसमें
राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में अपने विचार दृढता से व्यक्त किए. बंगाली शिक्षाविद
भूदेव मुखर्जी ने प्रशासन से टक्कर लेकर
बिहार की कचहरियों में नागरी त्तथा कैथि लिपियों को प्रवेश दिलाया और “
आचार-प्रबन्ध” नामक अपनी पुस्तक में हिन्दी के सभी भारतीय भाषाऒं की एकता का
साधन-सूत्र बतलाया.
सन १९०० तक आते-आते अनेक
बंगाली,ब मराठी, गुजराती, हिन्दी समर्थकों और प्रचारकों की भीड खडी हो गई,जिसमे
योगेन्द्रनाथ बसु अमृतलाल चक्रवर्ती
,सदाशिवराव, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, सेठ गोविन्ददास आदि प्रमुख हैं. इस प्रयासों
से बल पाकर जब राष्ट्रनायक जैसे “महिमंड” व्यक्तित्व के धनी गांधीजी ने हिन्दी
भाषा के प्रश्न को राजनैतिक दृष्टि से सामने रखा और उन्हीं के प्रयासों से जब इसे
संविधान में “राष्ट्रभाषा” का पद मिला तो यह मान लिया गया कि वे इस क्षेत्र के
अपूर्व नेता है.
भारतीय भाषा समस्या के विषय पर गांधीजी के विचार बडॆ निर्मल, वस्तुनिष्ठ और
पूरी तरह व्यवहारिक हैं. वैसे भी उनके विचार प्रांजल और पारदर्शी होते हैं. जिस
स्त्रोतों से उनके भाषा विषयक विचार उपलब्ध होते हैं, उनमें उनके लेखों का प्रमुख
स्थान है, जो यंग इण्डिया, हरिजन-सेवक, हरिजन बन्धु आदि मे प्रकाशित हैं. इसके
अतिरिक्त कुछ ऎसी सामग्री “इण्डियन होमरुल” जैसे पुस्तकों और तत्कालीन विभिन्न
व्यक्तियों को लिखे गए उनके पत्रों से मिली है. गांधीजी ने भाषा विषय में
सबसे पहले अपने विचार १९०९ में अपनी
पुस्तक “हिन्द-स्वराज” और होमरुल”के १८ वें परिच्छेद में यों व्यक्त किए हैं “ हर
एक पढे-लिखे हिन्दुस्थानी को अपनी भाषा का, हिन्दु को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी
का, पारसी को पर्शियन का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिए. कुछ हिन्दुओं को
अरबी और कुछ मुसलमानों को हिन्दी का और कुछ पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिए.
उत्तर और पश्चिम में रहने वले हिन्दुस्तानी को तमिल सीखनी चाहिए. सारे हिन्दुस्थान
के लिए तो हिन्दी होनी ही चाहिए. उसे उर्दू या नागरी लिपियां जानना जरुरी है. ऎसा
होने पर हम अपने आपस में व्यवहार से अंग्रेजी को बाहर कर सकेंगे.”
गांधीजी की इन भाषिक मान्यताओं के पीछे लोक-संग्रहक संतुलन का भाव प्रमुख है.
लोकभाव को अक्षत और अक्षुण्य रखते हुए उसके लिए वे कारगर तरीका अपनाने की बात कहते
हैं, वह यह कि भारत की प्रत्येक जाति का निवासी पहले तो अपने को ठीक से समझे, अपने
जातीय संस्कार की भाषा को समझे, फ़िर दूसरे की भाषा का ज्ञान भी रखे, फ़िर सामाजिक
या राष्ट्रीय सम्पर्क के लिए हिन्दी से भी
अवगत हों.
भंडोंच स्थित “गुजरात शिक्षा परिषद” में सभापति –पद से व्याख्यान देते हुए
उन्होंने “राष्ट्रभाषा की अवधारणा” पर विस्तार से प्रकाश डाला.” अगर गहरे पैठकर हम
सोचें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अंग्रेजी राजभाषा नहीं बन सकती और न ही उसे बनाना
चाहिए. इसे ठीक से समझने के लिए हमें यह देखना चाहिए कि किसी भाषा में राष्ट्रभाषा
बनने के लिए क्या-क्या बातें आवश्यक है, ऎसी पांच बातें हैं जो राष्ट्रभाषा के लिए
आवश्यक है.
१/- सरकारी अधिकारियों के लिए उसका सीखना आसान होना चाहिए.
२/-वह भारत के धार्मिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक विचार-विनिमय का माध्यम बनने के
योग्य होनी चाहिए.
३/-वह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जानी चाहिए.
४/-समूचे देश के लोगों के लिए उसका सीखना सरल होना चाहिए.
५/-इस भाषा का चुनाव करते समय अस्थायी भाव अथवा क्षणिक हितों का ख्याल नहीं
रखा जाना चाहिए.
उन्होंने इन गुणॊं की
दृष्टि से अंग्रेजी को शून्य बताया और हिन्दी को परिपूर्ण माना. इसीलिए हिन्दी
राष्ट्रभाषा के पद पर योग्य ठहरती है. आजीवन वे इस बात को को लिखते और भाषण देते
रहे. यह उन्हीं का कृतित्व प्रसाद है कि सन १९४९ में कंस्टीट्यूएंट असेम्बली ने
हिन्दी को राजभाषा की पदवी दी.गई.
गांधीजी के अलावा हिन्दी
को राष्ट्रभाषा बनाये जाने के समर्थक, देश के मूर्धन्य विद्वानों एवं नेताओं में
पुरुषोत्तमदास टंडन, सेठ गोविन्ददास, डा.राजेन्द्रप्रसाद, वीर सावरकर, नेताजी
सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, बंकिमचन्द्र चटर्जी, विनोबा भावे, डा.
सुनीतिकुमार आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं.
भारतीय नेताओं ने जब
आंदोलन के लिए हिन्दी को अपनाया और उसका समर्थन किया क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि
हिन्दी ही वह भाषा है जिसके बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है और उसे भारत के
अधिकांश जनता समझ सकती है.
राष्ट्रभाषा
के रुप में हिन्दी का समर्थन हिन्दीतर
प्रदेशों के जननायकों, समाजसुधारकों तथा विद्वानों द्वारा किया गया, बंगाल के राजा
राममोहन राय, केशवचन्द्र, बंकिमचन्द्र, शारदाशरण मित्र, गुजरात के स्वामी दयानन्द
सरस्वती, महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक आदि ने जनभाषा के रुप में हिन्दी का समर्थन
किया. उन्नीसवीं सदी के अंत तक हिन्दी का पक्ष सबल बन चुका था. उत्तरभारत के
विद्वानों, साहित्यकारों, और नेताओं ने भी हिन्दी का दृढता से समर्थन किया.
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से हिन्दी में साहित्य निर्माण का कार्य तो होने लगा
किंतु उसके सम्यक प्रचार में कई बाधाएं थीं.
महात्मा गांधी की प्रेरणा
से हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए सन १९१८ में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा
मद्रास की स्थापना हुई. गांधीजी की इस संकल्पना के लग्भग ग्यारह वर्ष पूर्व ही
मद्रास( अब चैन्नई) में एक तमिलभाषी मनीषी
ने हिन्दी प्रचार की नींव डाली. यह मनीषी कोई और नहीं,तमिल के सुविख्यात
महाकवि सुब्रह्मण्य भारतीजी थे. सर्वप्रथम भारतीजी ने अपने संपादन में निकलने वाली
पत्रिका” इंडिया” के १५ दिसंबर १९०६ के अंक में तमिलभाषियों से हिन्दी सीखने की
अपील की थी. महाकवि ने न केवल समूचे तमिलनाडुवासियों के प्रतिनिधि के रुप में अपनी
भावनाओं की अभिव्यक्ति दी थी बल्कि राष्ट्रीय एकता के भविष्यदृष्टा के रुप में भी
उन्होंने हिन्दी का पुरजोर समर्थन किया था. भारतीजी के ही नेतृत्व में १९०८ में
सर्वप्रथम चैन्नई के तिरुवेल्लीकेणि( ट्रिप्लिकेन) में हिन्दी वर्गों के संचालन का
श्रीगणेश हुआ था. इस घटना के दस वर्ष के बाद गांधीजी की संकल्पनाओं के अनुरुप
दाक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की नींव पडी. इस कार्य हेतु गांधीजी ने आपने
सुपुत्र देवदास गांधी को चैन्नई भेजा था.
गांधीजी के प्रेरणा से
हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना दिनांक ४ जुलाई १९३६ को वर्धा में महात्मा गांधी
के निवास स्थान पर इस समिति की पहली साधारण बैठक हुई, इसमें कुल २१ सदस्य थे. इस
बैटक में जिन पदाधिकरियों का चुनाव हुआ उसमें डा. राजेन्द्रप्रसादजी को अध्यक्ष,
सेठ जमनालाल बजाज को उपाध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष, श्री मोटूरी सत्यनारायण को मंत्री,
श्रीमन्नारायणजी अग्रवाल को संयुक्तमंत्री,बनाया गया. हिन्दी प्रचार समिति का कार्य गांधीजी की
देखरेख में चले, इसीलिए उसका मुख्य कार्यालय वर्धा में रखा गया.
हिन्दी
प्रचार समिति राष्ट्रभाषा के रुप में हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रही थी. अतः
हिन्दी की जगह “राष्ट्रभाषा” शब्द लेने का प्रस्ताव पारित हुआ. राष्ट्रभाषा प्रचार
सामिति की दो बैठकें १२.०४.४२ तथा २१.०६.४२ कॊ हुई. इन दोनों बैठकों के महात्मा
गांधी, डा.राजेन्द्रप्रसाद, काका काहब कालेलकर, तथा श्रीमन्ननारायण उपस्थित थे.
दिनांक १२.०७.४२ को सेवाग्राम में गांधीजी की कुटी मे नवगठित राष्ट्रभाषा प्रचार
समिति की पहली बैठक हुई. राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने अध्यक्ष का आसन ग्रहण
किया. समिति के इस बैठक में मंत्री पद के लिए भदन्त आनन्द कौसल्यायन को और सहायक
मंत्री के लिए श्री रामेश्वरदयाल दुबे को चुना.गया.
सन १९५६
में मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल बनी. राजधानी बनने के साथ ही मध्यप्रदेश
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल ने अपना कार्य शुरु किय. इससे पूर्व इन्दौर-मऊ मे
यह समिति कार्यरत थी.
किंतु भारत
के २% अंग्रेजीपरस्त वर्तमान शासक इन सबको दरकिनार कर अंग्रेजी भाषा का ९८% जनता
पर अंग्रेजी थोपने का प्रयास करते रहे हैं. इस प्रकार देश पर विदेशी भाषा थोपने
वाले अंग्रेजी -परस्त नेताओं का निर्णय कितना खोखला था. यह इस बात से प्रमाणित हो
जाता है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी को पीछे ढकेलने वाली शाजिशों के बावजूद हिन्दी भारत
में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय हो रही है. इसका सबसे बडा प्रमाण यही है
कि भारत के लगभग १७० स्वयंसेवी संगठन हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन निष्ठा
के साथ एवं अधिक सुनियोजित ढंग से कर रहे हैं. जहाँ तक विश्वभाषा के रुप में
हिन्दी की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा का प्रश्न है, शंकरदयाल सिंह के निम्नाकिंत
शब्द इसे भली भांति स्पष्ट करते हैं-“ जिस भाषा की पढाई विश्व के १३६
विश्वविद्दालयों में हो रही हो, ५० से अधिक देश जिस भाषा का प्रयोग किसी न किसी
रुप में कर रहे हों तथा जिसके बोलनेवालों की संख्यां ७० करोड के लगभग पहुँच चुकी
हो, वह भाषा अन्तर्राष्ट्रीय न कही जायेगी तो क्या कहा जाएगा”.
इस
संबंध में वास्तविकता यह है कि गुट निर्पेक्ष राष्ट्रों के मुखिया भारत, संसार की
उभरती अर्थ-शक्तिभारत, परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र भारत, संस्कृति और दर्शन के
क्षेत्र में पथ-प्रदर्शक भारत, एवं संसार के सबसे बडॆ बाजारों में एक भारत से
निकटता बढाने के लिए विश्व का हर देश ललायित है. यही कारण है कि विश्व के अनेक देश
अपने यहाँ हिन्दी शिक्षण की उच्चस्तरीय व्यवस्था कर रहे हैं. इस देशों में अमरीका,
रुस, इंगलैण्ड, फ़्रांस, चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे विश्व के प्रभावशाली
देश भी शामिल हैं. इतना ही नहीं प्रवासी भारतीयों ने अपनी संस्कृति के रक्षा के
लिए हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था विश्व में बडॆ व्यापक स्तर पर की है. वे
हिन्दी की सुरक्षा, प्रतिष्ठा एवं प्रचार के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.
संसार
में कुल मिलाकर लगभग २८०० भाषाएं हैं. इनमे १३ ऎसी भाषाएं हैं,जिनके बोलने वालों
की संख्यां ८ करोड से अधिक है. ताजा अंकडॊं के अनुसार संसार की भाषाओं में, हिन्दी
भाषा को द्वितीय स्थान प्राप्त है. भारत के बाहर वर्मा, श्रीलंका, फ़ीजी, मलाया,
दक्षिण और पूर्वी अफ़्रीका में भी हिन्दी बोलने वालों की संख्या ज्यादा है. एशिया
महादेश की भाषाओं में हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है, जो अपने देश के बाहर भी बोली और
लिखी जाती है,क्योंकि यह एक जीवित और सशक्त भाषा है.
ताजा आंकडॊं के अनुसार भारत में हिन्दी जानने वालों की संख्या सौ करोड है.
भारत के बाहर पाकिस्थान, इजराइल, ओमान, इक्वाडोर, फ़िजी, इराक, बांगलादेश, ग्रीस,
ग्वालेमाटा,म्यांमार, यमन, त्रिनीदाद, सउदी अरब, पेरु, रुस, कतर,, मारीशस,
सूरीनाम, गुयाना, इंग्लैण्ड आदि में बोली जाती है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी
को राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषा की मान्यता मिलने जा रही है. वर्तमान में अंग्रेजी,
फ़्रेंच,चीनी,रुसी एवं स्पेनिस भाषाओं को राष्ट्रसंघ की मान्यता प्राप्त है.संसार
में हिन्दी ही एक ऎसी भाषा है,जिसे विदेशियों ने सर्वप्रथम विश्वपटल पर रखा.
हिन्दी के शोधार्थी डा.जुइजिपियोतैस्सी तोरी ने फ़्लोरेंस विश्वविद्धयालय इटली में
रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण का तुलनात्मक अध्ययन १९११ में शुभारंभ किया. भारत
की संस्कृति ने उन पर इतना असर डाला कि स्वदेश “इटली” छोडकर जीवनपर्यंत बीकानेर
में रहे. साम्यवादी देशों में तुलसीकृत
रामचरित मानस की लोकप्रियता देख, स्टालिन ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अकादमीशियन
अलकसई वरान्निकोव द्वारा रुसी भाषा में पद्दानुवाद कराया, जिसमें साढे दस वर्ष
लगे. तुलसीभक्त वेल्जियम में जन्में फ़ादर रेवरेण्ड कामिल बुल्के,जिन्होंने हिन्दी
के कारण भारत की नागरिकता ली. तुलसी की काव्यकृति हनुमानचालीसा का रोमानियन भाषा
में, बुकारेस्ट में प्रो. जार्ज अंका ने डा. यतीन्द्र तिवारी के सहयोग से अनुवाद
किया.
‘ अमेरिका
के कई विश्वविद्दालयों में हिन्दी पढाई जाती है. यथा- पेनस्टेटयेल, लायोला,
शिकागो, वाशिंगटन, ड्यूक, आयोवा, ओरेगान, मिशिगन, कोलंबिया, हवाई इलिनाय, अलवामा,
युनिवर्सिटी आफ़ बर्जिनिया, युनि.आफ़ मीनेसोटा, फ़्लोरिडा, वैदिक वि.वि.सिराक्यूज,
केलिफ़ोर्निया वि.वि., वर्कले युनिवर्सिटी आफ़ टेक्सास, रटगर्स, एमरी, नार्थ
केरोलाइना स्टेट,एन.वाय.यू.इन्डियाना, यूसीएलए, मेनीटावा,लाट्रोव तथा केलगेरी
विश्वविद्धालय आदि जहां हिन्दी की शिक्षा दी जाती है.
आधुनिक
चीन में हिन्दी की विधिवत शुरुआत सन १९४२ में यूनान प्रांत पूर्वी भाषा और साहित्य
कालेज में हिन्दी विभाग की स्थापना के साथ हुई. यह वह समय था जब सारा संसार
द्वितीय विश्वयुद्ध की चपेट में था. ऎसी स्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिन्दी
विभाग एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होता रहा. तीन वर्षों बाद सन १९४५ में
हिन्दी विभाग यूनान प्रांत से स्थान्तरित होकर छॊंगछिन में आ गया और साल भर बाद
हिन्दी चीन की राजधानी में स्थित पीकिंग वि.वि. के विदेशी भाषापीठ में आसीन हुई और
तबसे यहीं फ़ूलती-फ़लती रही. यहां हिन्दी के अलावा संस्कृत, पालि, और उर्दू भाषा
साहित्य का अध्ययन-अध्यापन होता है. १९४९ से १९५९ तक का समय विकास की दृष्टि से
बेहतरीन रहा. बाद के वर्षों में काफ़ी शिथिल पडा.. १९६०-१९७९ तक का समय चीनी जनता
और समाज के कठिनाइयों भरे दिन थे, हिन्दी विभाग सिकुडकर छोटा हो गया.१९८०-१९९९ का
यह दौर परिवर्तन का दौर रहा. हिन्दी की मशाल को प्रज्जवलित करने में तीन
प्राध्यापकों का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता. वे हैं प्रो.यीनह्युवैन,
प्रो.लियो आनवू और प्रो. चिनतिंनहान. इन तीनो विद्वानों ने अपनी लगन ,कर्मठता और
आदर्श के बल पर हिन्दी के लिए जितना कार्य किया वह प्रेरणादायक है.
जापान
में विदेशी भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन के दो प्रमुख केन्द्र हैं. तोक्यो युनि. आफ़
फ़ारेन स्टडीज एवं ओसाका युनि.आफ़ फ़ारेन स्टडीज. इन दोनों ही वि.वि. में सन
१०११-१०२१ से ही हिन्दुस्थानी भाषा के रुप में हिन्दी-उर्दू की पढाई का सिलसिला
प्रारंभ हो गया था. इसकी नींव डालने वाले विद्वान श्री.प्रो.रेइची गामो तथा
प्रो.एइजो सावा हैं. १९११ में डिग्रीकोर्स आफ़ हिन्दुस्तानी एण्ड तमिल शुरु हो गया
था. सन १९०९ से १९१४ के मध्य प्रसिद्ध सेनानी मोहम्मद बरकतउल्ला इस विश्वविद्धालय
में “हिन्दुस्थानी भाषा” के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रुप में नियुक्त किए गए. ये दोनो
वि.वि. सरकारी विश्वविद्धयालय हैं, जहां ४ वर्षीय पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं. आरम्भ
में प्रो. देई ने तोक्यो में तथा प्रो.एइजो स्ववा ने ओकासा में हिन्दी
अध्ययन-अध्यापन की नींव डाली. ये विद्वान प्रोफ़ेसर हिन्दी के साथ ही उर्दू भी
पढाते थे. सन २००३ में सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रो.
तोसियो तनाका का “विश्व हिन्दी सम्मान” से सम्मानित किया गया
तोकियो
और ओसाका के राष्ट्रीय वि.वि. के अतिरिक्त अन्य कई गैर सरकारी वि.वि. और शिक्षा
संस्थान भी हैं, जहाँ वैकल्पिक विषय के रुप में प्रारंभिक और माध्यमिक कक्षाओं तक
हिन्दी पढने-पढाने की व्यवस्था है. ताकुशोक वि.वि. के प्रो. हेदेआकि इशिदा, सोनोदा
वीमेन्स युनिवर्सीटी के प्रो. उचिदा अराकि और ताइगेन हशिमोतो, तोमाया कोकुसाई वि.वि.
के प्रो. शिगोओ अराकि और मिताका शहर में स्थित एशिया-अफ़्रीका भाषा के प्रो. योइचि
युकिशिता का नाम अत्यंत प्रसिध्द है.
मारिशस
में भारतीय मजदूरों के आगमन के साथ ही इस भूमि पर हिन्दी का प्रवेश हुआ. जिन
मजदूरों को भारत के भोजपुर इलाके से यहां लाए गए थे “गिरमिटिया” कहलाए. वे अपने
साथ झोली में रामचरित मानस, हनुमानचालिसा,
महाभारत जैसे पवित्र ग्रंथ लेकर आए. इन्हें विरासत में समृद्ध साहित्य, धर्म, और
संस्कृति का ज्ञान था. अपनी जमीन से उजडॆ-उखडॆ इन मजदूरों को नयी जमीन, यातना
शिविर में अपने को जीवित रखने, स्थापित करने और अपनी अस्मिता को बनाए रखने के लिए
भोजपुरी और हिन्दी का सहारा ही सबसे बडा अवलंबन था. मजदूरी की क्रूर नियति से दुखी
और हताश ये मजदूर, कभी विरहा, कभी कजरी तो कभी हनुमानचालीसा की पंक्तियों से अपनी आंतरिक शक्ति बचा रखने और रात में
रामचरितमानस का पाठ उनकी थकान मिटाकर हौसला बढाते. कई अवरोधों के बावजूद बैठकें
चलती और भाषा के साथ संस्कृति और धर्म को गति देते रहे. हिन्दू महासभा, आर्यसभा,
हिन्दी प्रचरिणी सभा तथा अन्य संस्थानों के सहयोग तथा पण्डित विष्णुदयाल और डा.
शिवसागर रामगुलाम के नेतृत्व में भारतीय संस्कृति और इसकी वाहक हिन्दी अपनी
उत्कृष्टता पाने में सफ़ल हुई. आज महात्मा गांधी संस्थान और इन्दिरा गांधी
सांस्कृतिक केन्द्र, भाषा प्रचार और सांस्कृतिक गतिविधियों को विस्तार दे रहे हैं.
भारत सरकार के सहयोग से अब हिन्दी स्पीकिंग यूनियन तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान
भी इस सांस्कृतिक अभियान में जुड गए हैं, तथा हिन्दी सचिवालय की स्थापना में नया आयाम मिला है.
थाईलैण्ड
में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन का कार्यक्रम सबसे पहले थाई-भारत सांस्कृतिक आश्रम से
शुरु हुआ जिसकी स्थापना सन १९४३ में स्वामी सत्यानन्दपुरीजी ने की थी. आचार्य डा.
करुणा कुसलासायजी पहले थाई विद्वान
थे, जो हिन्दी पढने भारत आए थे. महात्मा गांधी से सारनाथ में मिले और जब वे लौटे
तो थाई-भारत सांस्कृतिक आश्रम में ही हिन्दी पढाना शुरु किया और बैंकाक के भारतीय
दूतावास में नौकरी शुरु की.
सन
१९८९ में सिल्पाकोव वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान संकाय के प्राच्य भाषा विभाग मे
एम.ए.संस्कृत पाठ्यक्रम बनाया गया. उस समय आचार्य डा. चमलोडां शारफ़ेदनूक हिन्दी
शिक्षक थे. सन १९६६ में शिलपाकोन वि.वि. के पुरातत्व विज्ञान संकाय के प्राच्य
भाषा विभाग के संस्कृत अध्यापन केन्द्र की, भारतीय आगन्तुक डा. सत्यव्रत शास्त्री
के द्वारा स्थापना की गई. १९९३ में थमसात वि.वि. में थाईलैण्ड के भारतीय
व्यापारियों के सहयोग से भारत अध्ययन केन्द्र की स्थापना हुई. डा. करुणा कुशलासाय,
डा. चिरफ़द प्राकन्विध्या एवं आचार्य डा. चम्लोंग शरफ़दनूक तीनों ने हिन्दी कक्षाएं
चलायी.
इस
तरह हम देखते हैं कि संपूर्ण विश्व में हिन्दी अपना स्थान बना चुकी है. भारत में,
दुर्योग से वह राष्ट्रभाषा तो नहीं बन पायी, लेकिन विश्वभाषा होने का गौरव और
दर्जा तो उसे पहले से ही मिल चुका है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------
29.
अष्ठ सिद्धि नवनिधि के दाता
(गोवर्धन यादव)
अतुलितबलधामं
हेमशैलाभदेहं, दानुजवनकृशानुं ज्ञानिनामाग्रगण्यम सकलगुणनिधानं
वानरानामधीशं,रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामी
-----------------------------------------------------------------
अतिबलशाली,पर्वताकारदेह, दानव-वन को
ध्वंस करने वाले, ज्ञानियों में अग्रणी, सकलगुणों के धाम,,वानरॊं के स्वामी, श्री
रघुनाथजी के प्रिय भक्त,पवनसुत श्री हनुमानजी को मैं प्रणाम करता हूँ
-----------------------------------------------------------------------------------------------------
बडा ही रोचक प्रसंग है.भगवान सूर्य के वरदान से जिसका स्वरुप सुवर्णमय हो गया
है,ऎसा एक सुमेरु नाम से प्रसिद्ध पर्वत है,जहाँ श्री केसरी राज्य करते हैं. उनकी
अंजना नाम से सुविख्यात प्रियतमा पत्नि के गर्भ से श्री हनुमानजी का जन्म हुआ.
सूर्यदत्तवरस्वर्णः
सुमेरुर्नाम पर्वतः*यत्र राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता तस्य भार्या
बभूवेष्टा अजंनेति परिश्रुता*जनयामास तस्यां वायुरात्मजमुत्तमम (वाल्मिक.रा.उत्तर.पंचत्रिशंसर्ग.श्लोक.१९-२०)
एक दिन माता अजंना फ़ल
लाने के लिए आश्रम से निकलीं और गहन वन में चली गयीं. बालक हनुमान को भूख लगी. तभी उन्हें जपाकुसुम
के समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये. उन्होंने उसे कोई फ़ल समझा और
वे झूले से फ़ल के लोभ में उछल पडॆ. उसी दिन राहु सूर्यदेव पर ग्रहण लगाना चाहता
था. हनुमानजी ने सूर्य के रथ के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो राहु वहां
से भाग खडा हुआ और इन्द्र से जाकर शिकायत करने लगा. हनुमानजी ने सूर्य को निगल
लिया. संपूर्ण संसार में अन्धकार का साम्राज्य छा गया. क्रोधित इन्द्र ने अपने
वज्र से हनुमान पर प्रहार किया. इन्द्र के व्रज के प्रहार से अचेत हनुमान नीचे की
ओर गिरने लगे. पिता पवनदेव ने उन्हें संभाला और घर ले आए. क्रोधित पवनदेव ने अपनी
गति समेट ली, जिससे समस्त प्राणियों की साँसे बंद होने लगी. देखते ही देखते सारे
संसार का चक्र बिगड गया. घबराए इन्द्र ने ब्रह्माजी की शरण ली और इससे बचने का
उपाय खोजने की प्रार्थना की.
तत्पश्चात चतुर्मुख
ब्रह्माजी ने समस्त देवत्ताओं, गन्धर्वों, ॠषियों, यक्षों सहित वहाँ पहुँचकर
वायुदेवता के गोद में सोये हुए पुत्र को देखा और शिशु पर हाथ फ़ेरा. तत्काल बालक के
शरीर में हलचल होने लगी. उन्होंने उस बालक से अनुरोध किया कि वह अपना मुख खोलकर
सूर्यदेव को छॊड दें. बालक के मुँह खुलते ही सूर्यदेव आकाशमण्डल पर फ़िर चमचमाने
लगे. संसार फ़िर अपनी गति पर चलने लगा. फ़िर ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं से कहा;_ “
इस बालक के द्वारा भविष्य में आप लोगों के बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे,
अतःवायुदेवता की प्रसन्न्ता के लिए आप इसे वर दें.
इन्द्र ने अपने गले में पडी कमल के फ़ूलों की
माला डालते हुए कहा:- मेरे हाथ से छूटॆ हुए व्रज के द्वारा इस बालक की “हनु”
(ठुड्डी) टूट गयी थी, इसलिए इस कपिश्रेष्ठ का नाम “हनुमान” होगा. इसके अलावा मैं
दूसरा वर यह देता हूँ कि आज से यह मेरे वज्र के द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा.
सूर्यदेव ने वर देते हुए
कहा:-“मैं इसे अपने तेज का सौवाँ भाग देता हूँ. इसके अलावा जब इसमें शास्त्राध्ययन
करने की शक्ति आ जायगी, तब मैं इसे शास्तों का ज्ञान प्रदान करुँगा, जिससे यह
अच्छा वक्ता होगा. शास्त्रज्ञान में कोई भी इसकी समानता करने वाला न होगा.”
वरुण देवता ने वर देते
हुए कहा:-“दस लाख वर्षॊं की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की
मृत्यु नहीं होगी”.
यमराज
ने वर देते हुए कहा;-“ यह मेरे दण्ड से अवध्य और नीरोग होगा.”.
कुबेर
ने वर देते हुए कहा:-“मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्ध में कभी इसे विषाद
नहीं होगा तथा मेरी यह गदा संग्राम में इसका वध न कर सकेगी”.
भगवान शंकर ने वर देते
हुए कहा:_” यह मेरे और मेरे आयुधों के द्वारा भी अवध्य रहेगा. शिल्पियों में
श्रेष्ठ परम बुद्धिमान विश्वकर्मा ने बालसूर्य के समान अरुण कान्तिवाले उस शिशु को
वर दिया “मेरे बनाए हुए जितने भी दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं,उनसे अवध्य होकर यह बालक
चिरंजीवी होगा.”
चतुर्मुख ब्रह्मा ने वर
देते हुए कहा:-“यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकार से ब्रहदण्डॊं से अवध्य होगा
तथा शत्रुओं के लिए भयंकर और मित्रों के लिए अभयदाता होगा. युद्ध में कोई इसे जीत
नहीं सकेगा. यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ जाना चाहे जा सकेगा. इसकी गति इच्छा के अनुसार तीव्र या मन्द होगी
तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी. यह
कपिश्रेष्ठ बडा यशस्वी होगा. यह युद्धस्थल में रावण का संहार करने और भगवान
श्रीरामचन्द्रजी के प्रसन्न्ता का सम्पादन करने वाले अनेक अद्भुत एवं रोमांचकारी
कर्म करेगा. (
वाल्मिक रामा.श्लोक ११ से २५)
इस प्रकार से हनुमानजी बहुत-से वर पाकर
वरदानजनित शक्ति से सम्पन्न और निर्भय हो ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उपद्रव
करने लगे. कभी वे यज्ञोपयोगी पात्र फ़ोड देते, उनके वत्कलों को चीर-फ़ाड देते. इनकी
शक्ति से परिचित ऋषिगण चुपचाप सारे अपराध सह लेते. भृगु और अंगिरा के वंश से
उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे और उन्हें शाप दिया कि वे अपनी समस्त शक्तियाँ
भूल जाएंगे और जब कोई उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाएंगे, तभी इसका बल बढेगा.
समुद्रतट पर नल- नील-
अंगद, गज, गवाक्ष, गवय,शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान बैठे
विचार कर रहे थे कि इस सौ योजन समुद्र को कैसे पार किया जाए?. सभी अपनी-अपनी सीमित
शक्तियों का बखान कर रहे थे और समुद्र से उस पार जाने में अपने आपको असमर्थ बतला
रहे थे. इस समय हनुमान एक दूरी बनाकर चुपचाप बैठे थे. तब वानरों और भालूओं के वीर
यूथपति जाम्बवान ने वानरश्रेष्ठ हनुमानजी से कहा कि वे दूर तक की छलांग लगाने में
सर्वश्रेष्ठ हैं. उन्होंने विस्तार के साथ पिछली सारी घटनाओं की जानकारी उन्हें
दी. अपनी शक्तियों का स्मरण आते ही वीर उठ खडॆ हुए और अपने साथियों को आश्वस्त
किया कि वे सीताजी का पता लगाकर निश्चय ही लौटेंगे.
एवमुक्तवा
तु हनुमान वानरो वानरोत्तमः उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन सुपर्णमिव चात्मानं मेने स
कपिकुंजरः (वाल्मीक रामा.सुन्दरकाण्ड सर्ग १-४३-४४)
ऎसा कहकर वेगशाली
वानरप्रवर श्री हनुमानजी ने किसी भी विघ्नबाधाओं का ध्यान न करके, बडॆ वेग से
छलांग मारी और आकाश में उड चले.
सभी इस बात से भली-भांति
परिचित ही हैं कि श्री हनुमानजी ने किस तरह रास्ते में पडने वाली समस्त बाधाओं को
अपने बल और बुद्धि के बल पर पार किया और लंका जा पहुँचे. वहाँ उन्होंने कौन-कौन से
अद्भुत पराक्रम किए, इसे सभी पाठक भली-भांति जानते हैं .ग्यारवें रुद्र श्री
हनुमानजी को माँ सीताजी ने अमरता का वरदान देते हुए कहा था...
अष्ट
सिद्धि नवनिधि के दाता* अस वर दिन्ह जानकी माता.
वे अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ क्या हैं,इसके बारे में संक्षिप्त में
जानकारियाँ लेते चलें
अष्ट सिद्धियाँ इस प्रकार
हैं---अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता तथा वशिता.
अणिमा सिद्धि=
इससे सिद्धपुरुष छोटे-से छोटा रुप धारण कर सकता है
लघिमा सिद्धि=
साधक अपने शरीर का चाहे जितना विस्तार कर सकता है.
महिमा सिद्धी=
कोई भी कठिन काम आसानी से कर सकता है
गरिमा= = इस सिद्धि में गुरुत्व की प्राप्ति होती
है.साधक जितना चाहे वजन बढा सकता है.
प्राप्ति= हर कार्य को अकेला ही कर सकता है..
प्राकाम्य= इसमें साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
वशित्व= साधक सभी को अपने वश में कर सकता है.
इशित्व
साधक को ऎश्वर्य और ईश्वरत्व प्राप्त होता है. हनुमानजी को ऎश्वर्य और ईश्वरत्व
प्राप्त है,
यही वजह है कि छोटे से छोटे गाँव से लेकर
महानगरों तक उनके मन्दिर देखे जा सकते
हैं.जहाँ असंख्य संख्या में भक्तगण श्री हनुमानजी की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने कष्टॊं के निवारण के प्रार्थना करते हैं
और दुःखों से छुटकारा पाते हैं
नौ निधियाँ= शंख, मकर, कच्छ, मुकुंद, कुंद, नील, पद्म और महापद्म
महर्षि
वाल्मिक ने श्रीरामभक्त हनुमान के बल और पराक्रम को लेकर सुन्दरकाण्ड की रचना की.
इन्होंने अडसठ सर्गों तथा जिसमें दो हजार आठ सौ बासठ श्लोक हैं
भक्त शिरोमणी श्री तुलसीदासजी ने
सुन्दरकाण्ड मे एक श्लोक,,साठ दोहे,तिहत्तर चौपाइयां और छः छंदॊ की रचना की.
सुन्दरकाण्ड अन्य काण्डॊं से सुन्दर इसलिए कहा गया है कि इसमें वीर शिरोमणी श्री
हनुमानजी के अतुलित पराक्रम, शौर्य, बुद्धिमता आदि का बडा ही रोचक वर्णन किया गया
है. संत श्री तुलसीदासजी ने निम्न लिखित ग्रंथॊं की रचनाएँ की. वे इस प्रकार
हैं.
श्रीरामचरितमानस/रामललानहछू/वैराग्यसंदीपनी/बरवैरामायण/पार्वतीमंगल/जानकीमंगल/रामाज्ञाप्रश्न/दोहावली/कवितावली/गीतावली/श्रीकृष्ण-गीतावली/विनय-पत्रिका/सतसई/छंदावली
रामायण/विनय पत्रिका//सतसई/छंदावली रामायण/कुंडलिया रामायण/राम शलाका/संकट
मोचन/करवा रामायण/रोला रामायण/झूलना/छप्पय रामायण/कवित्त रामायण/कलिधर्माधर्म
निरूपण तथा हनुमान
चालीसा आदि ग्रंथॊ की रचनाकर श्रीरामजी सहित हनुमानजी की अमरगाथा
को जन-जन तक पहुँचाया.
हम सभी भली-भांति जानते
हैं कि किस तरह अपनी पत्नि का उलाहना सुनकर तुलसीदास जी श्रीराम के दास बने और
उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन उन्हें समर्पित कर दिया. काशी में रहते हुए उनके भीतर
कवित्व-शक्ति का प्रस्फ़ुरण हुआ और वे संस्कृत में काव्य-रचना करने लगे वे जो भी
रचना लिखते रात्रि में सब लुप्त हो जाती थी. यह क्रम सात दिनों तक चलता रहा. आठवें
दिन स्वयं भगवान शिवजी –पार्वतीजी के सहित
आकर तुलसीदासजी के स्वपन में आदेश दिया कि तुम अयोध्या में जाकर रहॊ और अपनी भाषा
में काव्य रचना करो. मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फ़लवती होगी.
शायद आप लोगॊ ने अनुभव किया अथवा नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन इतना दावे के साथ
तो कह ही सकता हूँ कि रामायण की अनेक चौपाइयाँ, हनुमान चालीसा की अनेक पंक्तियाँ
शाबर मंत्रों की तरह चमत्कारी है तथा इनके विधिविधान से जाप करने पर तत्काल फ़ल की
प्राप्ति होती है,क्योंकि श्री हनुमानजी एकमात्र ऎसे देवता हैं जो अपने भक्तों पर
सहित ही प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी सभी कामनाओं कॊ पूरा करते हैं. यदि किसी को
भूत-पिशाच का डर सताता हो तो वह * भूत पिशाच निकट नहीं आवै* महाबीर जब नाम
सुनावै“”,रोगों से मुक्ति पाने के लिए
“नासै रोग हरै सब पीरा* जपत निंतर हनुमत बीरा, संकट से उबरने के लिए “संकट ते हनुमान
छुडावै*मन क्रम बचन ध्यान जो लावै””संकट कटै मिटै सब पीरा*जो सुमिरै हनुमत बलबीरा,
“कौन सो संकट मोर गरीब को,*जो तुमसों नहिं जात है टारो*बेगि हरो हनुमान
महाप्रभु,जो कछु संकट होय हमारो”,भूत प्रेत पिशाच निशाचर*अग्नि बेताल काल मारी
मर*इन्हें मारु तोहि शपथ राम की*राखु नाथ मरजाद नाम की”, आदि-आदि
इसी तरह श्रीरामशलाका
प्रश्नावली के अनुसार आप अपने मन में उमड-घुमड रही शंकाओं का तत्काल निदानकर सकते
हैं. वैसे तो संपूर्ण रामायण ही अद्भुत है, इसकी हर चौपाई शाबर मंत्रों की तरह काम
करती हैं तथा तत्काल सारे सकल मनोरथ पूर्ण करने करती है. यही कारण है कि भारत के
घर-घर में नित्य रामायण का पाठ होता है, किन्ही-किन्ही घरों में अखण्ड पाठ भी चलता
रहता है.
श्रीरामचन्द्रजी से प्रथम
भेंट के बाद से लेकर रामराज्य की स्थापना और बाद के अनेकानेक प्रसंगों को पढ-सुनकर
हृदय में अपार प्रसन्नता तो होती ही है, साथ में हमें सदकर्मों को करने की प्रेरणा
भी मिलती है. श्रीमदहनुमानजी की जितनी भी स्तुति की जाए, कम ही प्रतीत होती है.
श्री हनुमानजी के
व्यक्तित्व को पहचानने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम उनके चरित्र की मानवी भूमिका
के महत्व को समझें. यदि हम यह विश्वास करते हों कि श्रीराम के रुप में स्वयं भगवान
श्री विष्णु और मरुत्पुत्र के रुप में स्वयं शिव अवतारित हुए थे, तब भी हमको यह
समझना चाहिए कि दैवी-शक्तियाँ दो उद्देश्य से अवतरित होती हैं. इन उद्देश्यों की
सूचना गीता द्वारा भी हमें प्राप्त होती है. इन उद्देश्यों मे पहला उद्देश्य
है-धर्मसंस्थापना और दूसरा है दुष्टसंहार. इनमें भी ध्यान देने की बात यह है कि
दूष्टसंहार को पहला स्थान प्राप्त नहीं है. पहला स्थान धर्मसंस्थापन को दिया गया
है. धर्मसंस्थापन के लिए जब भगवान और देवता मनुष्य समाज में अवतरित होते हैं, तब
ठीक वैसा ही आचरण करते हैं,जो धर्माकूल और मनुष्यों जैसा ही हो. भगवान श्रीराम और
रामसेवक हनुमान यावज्जीवन संहारकर्म के ही व्यस्त नहीं रहें. वे समाज के धर्म
संस्थापन के कार्य में अग्रणी बनकर, जीवन भर उसका नेतृत्व करते रहे और जब आवश्यक
हो गया, तभी उन्होंने शस्त्रों का उपयोग किया. इसलिए यह आवश्यक है कि हम
हनुमच्चरित्र की मानवीय भूमिका को अपने जीवन में उतारें और युग-युग में व्याप्त
धर्मसंस्थाना के कार्यों में सहयोगी बनें एवं भारत का नाम रौशन करें.
---------------------------------------------------------------------------------------------------
30

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दानुजवनकृशानुं
ज्ञानिनामाग्रगण्यम सकलगुणनिधानं वानरानामधीशं,रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामी
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
अतिबलशाली,पर्वताकारदेह, दानव-वन को ध्वंस करने वाले, ज्ञानियों में अग्रणी, सकलगुणों के धाम,,वानरॊं के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त,पवनसुत श्री हनुमानजी को मैं
प्रणाम करता हूँ बडा ही रोचक प्रसंग है.भगवान सूर्य के वरदान से जिसका स्वरुप
सुवर्णमय हो गया है,ऎसा एक सुमेरु नाम से
प्रसिद्ध पर्वत है,जहाँ श्री केसरी राज्य करते
हैं. उनकी अंजना नाम से सुविख्यात प्रियतमा पत्नि के गर्भ से श्री हनुमानजी का
जन्म हुआ.
सूर्यदत्तवरस्वर्णः सुमेरुर्नाम पर्वतः*यत्र
राज्यं प्रशास्त्यस्य केसरी नाम वै पिता तस्य भार्या बभूवेष्टा अजंनेति
परिश्रुता*जनयामास तस्यां वायुरात्मजमुत्तमम (वाल्मिक.रा.उत्तर.पंचत्रिशंसर्ग.श्लोक.१९-२०)
एक दिन माता अजंना फ़ल लाने के लिए आश्रम से
निकलीं और गहन वन में चली गयीं. बालक हनुमान को भूख लगी. तभी उन्हें जपाकुसुम के
समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये. उन्होंने उसे कोई फ़ल समझा और वे
झूले से फ़ल के लोभ में उछल पडॆ. उसी दिन राहु सूर्यदेव पर ग्रहण लगाना चाहता था.
हनुमानजी ने सूर्य के रथ के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो राहु वहां से
भाग खडा हुआ और इन्द्र से जाकर शिकायत करने लगा. हनुमानजी ने सूर्य को निगल लिया.
संपूर्ण संसार में अन्धकार का साम्राज्य छा गया. क्रोधित इन्द्र ने अपने वज्र से
हनुमान पर प्रहार किया. इन्द्र के व्रज के प्रहार से अचेत हनुमान नीचे की ओर गिरने
लगे. पिता पवनदेव ने उन्हें संभाला और घर ले आए. क्रोधित पवनदेव ने अपनी गति समेट
ली, जिससे समस्त प्राणियों की
साँसे बंद होने लगी. देखते ही देखते सारे संसार का चक्र बिगड गया. घबराए इन्द्र ने
ब्रह्माजी की शरण ली और इससे बचने का उपाय खोजने की प्रार्थना की.
तत्पश्चात चतुर्मुख ब्रह्माजी ने समस्त
देवत्ताओं, गन्धर्वों, ॠषियों, यक्षों सहित वहाँ पहुँचकर
वायुदेवता के गोद में सोये हुए पुत्र को देखा और शिशु पर हाथ फ़ेरा. तत्काल बालक के
शरीर में हलचल होने लगी. उन्होंने उस बालक से अनुरोध किया कि वह अपना मुख खोलकर
सूर्यदेव को छॊड दें. बालक के मुँह खुलते ही सूर्यदेव आकाशमण्डल पर फ़िर चमचमाने
लगे. संसार फ़िर अपनी गति पर चलने लगा. फ़िर ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं से कहा;_ “ इस बालक के द्वारा भविष्य
में आप लोगों के बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे, अतःवायुदेवता की प्रसन्न्ता के लिए आप इसे वर
दें.
इन्द्र ने अपने गले में पडी कमल के फ़ूलों की
माला डालते हुए कहा:- मेरे हाथ से छूटॆ हुए व्रज के द्वारा इस बालक की “हनु” (ठुड्डी) टूट गयी थी, इसलिए इस कपिश्रेष्ठ का नाम “हनुमान” होगा. इसके अलावा मैं दूसरा
वर यह देता हूँ कि आज से यह मेरे वज्र के द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा.
सूर्यदेव ने वर देते हुए कहा:-“मैं इसे अपने तेज का सौवाँ
भाग देता हूँ. इसके अलावा जब इसमें शास्त्राध्ययन करने की शक्ति आ जायगी, तब मैं इसे शास्तों का ज्ञान
प्रदान करुँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा.
शास्त्रज्ञान में कोई भी इसकी समानता करने वाला न होगा.”
वरुण देवता ने वर देते हुए कहा:-“दस लाख वर्षॊं की आयु हो
जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी”.
यमराज ने वर देते हुए कहा;-“ यह मेरे दण्ड से अवध्य और
नीरोग होगा.”.
कुबेर ने वर देते हुए कहा:-“मैं संतुष्ट होकर यह वर देता
हूँ कि युद्ध में कभी इसे विषाद नहीं होगा तथा मेरी यह गदा संग्राम में इसका वध न
कर सकेगी”.
भगवान शंकर ने वर देते हुए कहा:_” यह मेरे और मेरे आयुधों के
द्वारा भी अवध्य रहेगा. शिल्पियों में श्रेष्ठ परम बुद्धिमान विश्वकर्मा ने
बालसूर्य के समान अरुण कान्तिवाले उस शिशु को वर दिया “मेरे बनाए हुए जितने भी
दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं,उनसे अवध्य होकर यह बालक
चिरंजीवी होगा.”
चतुर्मुख ब्रह्मा ने वर देते हुए कहा:-“यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकार से
ब्रहदण्डॊं से अवध्य होगा तथा शत्रुओं के लिए भयंकर और मित्रों के लिए अभयदाता
होगा. युद्ध में कोई इसे जीत नहीं सकेगा. यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ जाना चाहे जा सकेगा.
इसकी गति इच्छा के अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी. यह
कपिश्रेष्ठ बडा यशस्वी होगा. यह युद्धस्थल में रावण का संहार करने और भगवान
श्रीरामचन्द्रजी के प्रसन्न्ता का सम्पादन करने वाले अनेक अद्भुत एवं रोमांचकारी
कर्म करेगा. ( वाल्मिक रामा.श्लोक ११ से २५)
इस् प्रकार से हनुमानजी बहुत-से वर पाकर
वरदानजनित शक्ति से सम्पन्न और निर्भय हो ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उपद्रव
करने लगे. कभी वे यज्ञोपयोगी पात्र फ़ोड देते, उनके वत्कलों को चीर-फ़ाड देते. इनकी शक्ति से
परिचित ऋषिगण चुपचाप सारे अपराध सह लेते. भृगु और अंगिरा के वंश से उत्पन्न हुए
महर्षि कुपित हो उठे और उन्हें शाप दिया कि वे अपनी समस्त शक्तियाँ भूल जाएंगे और
जब कोई उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाएंगे, तभी इसका बल बढेगा.
समुद्रतट पर नल- नील- अंगद, गज, गवाक्ष, गवय,शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान बैठे
विचार कर रहे थे कि इस सौ योजन समुद्र को कैसे पार किया जाए?. सभी अपनी-अपनी सीमित
शक्तियों का बखान कर रहे थे और समुद्र से उस पार जाने में अपने आपको असमर्थ बतला
रहे थे. इस समय हनुमान एक दूरी बनाकर चुपचाप बैठे थे. तब वानरों और भालूओं के वीर
यूथपति जाम्बवान ने वानरश्रेष्ठ हनुमानजी से कहा कि वे दूर तक की छलांग लगाने में
सर्वश्रेष्ठ हैं. उन्होंने विस्तार के साथ पिछली सारी घटनाओं की जानकारी उन्हें दी.
अपनी शक्तियों का स्मरण आते ही वीर उठ खडॆ हुए और अपने साथियों को आश्वस्त किया कि
वे सीताजी का पता लगाकर निश्चय ही लौटेंगे.
एवमुक्तवा तु हनुमान वानरो वानरोत्तमः
उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुंजरः (वाल्मीक रामा.सुन्दरकाण्ड सर्ग
१-४३-४४) ऎसा कहकर वेगशाली वानरप्रवर श्री हनुमानजी ने किसी भी विघ्नबाधाओं का
ध्यान न करके, बडॆ वेग से छलांग मारी और
आकाश में उड चले.
सभी इस बात से भली-भांति परिचित ही हैं कि श्री
हनुमानजी ने किस तरह रास्ते में पडने वाली समस्त बाधाओं को अपने बल और बुद्धि के
बल पर पार किया और लंका जा पहुँचे. वहाँ उन्होंने कौन-कौन से अद्भुत पराक्रम किए, इसे सभी पाठक भली-भांति
जानते हैं .ग्यारवें रुद्र श्री हनुमानजी को माँ सीताजी ने अमरता का वरदान देते
हुए कहा था...
अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता* अस वर दिन्ह जानकी
माता. वे अष्ट सिद्धियाँ और नौ
निधियाँ क्या हैं,इसके बारे में संक्षिप्त में
जानकारियाँ लेते चलें
अष्ट सिद्धियाँ इस प्रकार हैं---अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता तथा वशिता.
अणिमा सिद्धि= इससे सिद्धपुरुष छोटे-से
छोटा रुप धारण कर सकता है
लघिमा सिद्धि= साधक अपने शरीर का चाहे
जितना विस्तार कर सकता है.
महिमा सिद्धी= कोई भी कठिन काम आसानी से कर
सकता है
गरिमा= = इस सिद्धि में गुरुत्व की
प्राप्ति होती है.साधक जितना चाहे वजन बढा सकता है.
प्राप्ति= हर कार्य को अकेला ही कर सकता है..
प्राकाम्य= इसमें साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
वशित्व= साधक सभी को अपने वश में कर
सकता है.
इशित्व साधक को ऎश्वर्य और ईश्वरत्व प्राप्त होता है.
हनुमानजी को ऎश्वर्य और ईश्वरत्व प्राप्त है, यही वजह है कि छोटे से छोटे गाँव से लेकर
महानगरों तक उनके मन्दिर देखे जा सकते हैं.जहाँ असंख्य संख्या में भक्तगण श्री
हनुमानजी की पूजा-अर्चना करते हैं और अपने कष्टॊं के निवारण के प्रार्थना करते हैं
और दुःखों से छुटकारा पाते हैं
नौ निधियाँ= शंख, मकर, कच्छ, मुकुंद, कुंद, नील, पद्म और महापद्म
महर्षि वाल्मिक ने श्रीरामभक्त हनुमान के बल और
पराक्रम को लेकर सुन्दरकाण्ड की रचना की. इन्होंने अडसठ सर्गों तथा जिसमें दो हजार
आठ सौ बासठ श्लोकों हैं
भक्त शिरोमणी श्री तुलसीदासजी ने सुन्दरकाण्ड
मे एक श्लोक,,साठ दोहे,तिहत्तर चौपाइयां और छः छंदॊ
की रचना की. सुन्दरकाण्ड अन्य काण्डॊं से सुन्दर इसलिए कहा गया है कि इसमें वीर
शिरोमणी श्री हनुमानजी के अतुलित पराक्रम, शौर्य, बुद्धिमता आदि का बडा ही रोचक वर्णन किया गया
है. संत श्री तुलसीदासजी ने निम्न लिखित ग्रंथॊं की रचनाएँ की. वे इस प्रकार हैं.
श्रीरामचरितमानस/रामललानहछू/वैराग्यसंदीपनी/बरवैरामायण/पार्वतीमंगल/जानकीमंगल/रामाज्ञाप्रश्न/दोहावली/कवितावली/गीतावली/श्रीकृष्ण-गीतावली/विनय-पत्रिका/सतसई/छंदावली
रामायण/विनय पत्रिका//सतसई/छंदावली रामायण/कुंडलिया रामायण/राम शलाका/संकट
मोचन/करवा रामायण/रोला रामायण/झूलना/छप्पय रामायण/कवित्त रामायण/कलिधर्माधर्म
निरूपण तथा हनुमान चालीसा आदि ग्रंथॊ की रचनाकर श्रीरामजी सहित हनुमानजी
की अमरगाथा को जन-जन तक पहुँचाया.
हम सभी भली-भांति जानते हैं कि किस तरह अपनी
पत्नि का उलाहना सुनकर तुलसीदास जी श्रीराम के दास बने और उन्होंने अपना संपूर्ण
जीवन उन्हें समर्पित कर दिया. काशी में रहते हुए उनके भीतर कवित्व-शक्ति का
प्रस्फ़ुरण हुआ और वे संस्कृत में काव्य-रचना करने लगे वे जो भी रचना लिखते रात्रि
में सब लुप्त हो जाती थी. यह क्रम सात दिनों तक चलता रहा. आठवें दिन स्वयं भगवान
शिवजी –पार्वतीजी के सहित आकर
तुलसीदासजी के स्वपन में आदेश दिया कि तुम अयोध्या में जाकर रहॊ और अपनी भाषा में
काव्य रचना करो. मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फ़लवती होगी. शायद
आप लोगॊ ने अनुभव किया अथवा नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन इतना दावे के साथ तो कह
ही सकता हूँ कि रामायण की अनेक चौपाइयाँ, हनुमान चालीसा की अनेक पंक्तियाँ शाबर मंत्रों
की तरह चमत्कारी है तथा इनके विधिविधान से जाप करने पर तत्काल फ़ल की प्राप्ति होती
है,क्योंकि श्री हनुमानजी
एकमात्र ऎसे देवता हैं जो अपने भक्तों पर सहित ही प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी सभी
कामनाओं कॊ पूरा करते हैं. यदि किसी को भूत-पिशाच का डर सताता हो तो वह * भूत
पिशाच निकट नहीं आवै* महाबीर जब नाम सुनावै“”,रोगों से मुक्ति पाने के लिए “नासै रोग हरै सब पीरा* जपत
निंतर हनुमत बीरा, संकट से उबरने के लिए “संकट ते हनुमान छुडावै*मन
क्रम बचन ध्यान जो लावै””संकट कटै मिटै सब पीरा*जो
सुमिरै हनुमत बलबीरा, “कौन सो संकट मोर गरीब को,*जो तुमसों नहिं जात है
टारो*बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होय हमारो”,भूत प्रेत पिशाच निशाचर*अग्नि बेताल काल मारी
मर*इन्हें मारु तोहि शपथ राम की*राखु नाथ मरजाद नाम की”, आदि-आदि
इसी तरह श्रीरामशलाका प्रश्नावली के अनुसार आप
अपने मन में उमड-घुमड रही शंकाओं का तत्काल निदान सकते हैं. वैसे तो संपूर्ण
रामायण ही अद्भुत है, इसकी हर चौपाई शाबर मंत्रों
की तरह काम करती हैं तथा तत्काल सारे सकल मनोरथ पूर्ण करने करती है. यही कारण है
कि भारत के घर-घर में नित्य रामायण का पाठ होता है, किन्ही-किन्ही घरों में अखण्ड पाठ भी चलता रहता
है.
श्रीरामचन्द्रजी से प्रथम भेंट के बाद से लेकर
रामराज्य की स्थापना और बाद के अनेकानेक प्रसंगों को पढ-सुनकर हृदय में अपार
प्रसन्नता तो होती ही है, साथ में हमें सदकर्मों को
करने की प्रेरणा भी मिलती है. श्रीमदहनुमानजी की जितनी भी स्तुति की जाए, कम ही प्रतीत होती है. श्री
हनुमानजी के व्यक्तित्व को पहचानने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम उनके चरित्र की
मानवी भूमिका के महत्व को समझें. यदि हम यह विश्वास करते हों कि श्रीराम के रुप
में स्वयं भगवान श्री विष्णु और मरुत्पुत्र के रुप में स्वयं शिव अवतारित हुए थे, तब भी हमको यह समझना चाहिए
कि दैवी-शक्तियाँ दो उद्देश्य से अवतरित होती हैं. इन उद्देश्यों की सूचना गीता
द्वारा भी हमें प्राप्त होती है. इन उद्देश्यों मे पहला उद्देश्य है-धर्मसंस्थापना
और दूसरा है दुष्टसंहार. इनमें भी ध्यान देने की बात यह है कि दूष्टसंहार को पहला
स्थान प्राप्त नहीं है. पहला स्थान धर्मसंस्थापन को दिया गया है. धर्मसंस्थापन के
लिए जब भगवान और देवता मनुष्य समाज में अवतरित होते हैं, तब ठीक वैसा ही आचरण करते
हैं,जो धर्माकूल और मनुष्यों
जैसा ही हो. भगवान श्रीराम और रामसेवक हनुमान यावज्जीवन संहारकर्म के ही व्यस्त
नहीं रहें. वे समाज के धर्म संस्थापन के कार्य में अग्रणी बनकर, जीवन भर उसका नेतृत्व करते
रहे और जब आवश्यक हो गया, तभी उन्होंने शस्त्रों का
उपयोग किया. इसलिए यह आवश्यक है कि हम हनुमच्चरित्र की मानवीय भूमिका को अपने जीवन
में उतारें और युग-युग में व्याप्त धर्मसंस्थाना के कार्यों में सहयोगी बनें एवं
भारत का नाम रौशन करें.
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
31
अष्टावक्र ने सिखाया शारीरिक सौंदर्य से बडा है ज्ञान
हिन्दू धर्मशास्त्रों में अष्टावर्क का नाम एक दार्शनिक और तत्व चिंतक के रुप
में आदर के साथ लिया गया है. कहते हैं कि अष्टावक्र न केवल बेहद कुरुप थे,बल्कि
उनका शरीर भी बेढंगा था. वे अष्टावक्र इसीलिए कहे जाते हैं,क्योंकि उनका शरीर आठ
जगह से वक्र अर्थात टेढा था.
प्रसिद्ध कथा है-अष्टावक्र राजा जनक
के दरबार में पहुंचे. दोनों ओर ऊँचे आसनों पर सभासद,ज्ञानी,पंडित,राजकर्मी आदि
बैठे थे और सामने राजा जनक का सिंहासन था,जिस पर वे विराजित थे. अष्टावक्र को
द्वारपाल ने नहीं रोका. वे उस समय किशोर वय के थे. उन्होंने जैसे ही राजा जनक की
सभा में प्रवेश किया, उन पर दृष्टि पडते ही सभी ने एक-दूसरे की ओर देखा और एक
जोरदार ठहाका सभा में गूंज उठा. इस ठहाके की गूंज देर तक सुनाई दी. सभी अष्टावक्र
का अजीबॊ-गरीब व्यक्तित्व देखकर हंस पडॆ थे. यह देख पहले तो वे कुछ समझ नहीं पाए,
फ़िर उन्हें हंसता देख वे भी जोर से हंसने लगे. इस तरह उन्हें हंसता देख जनक से रहा
न गया तो उन्होंने पूछा-“सब लोग तो तुम्हें देखकर हंसे, तुम क्यों हंस पडॆ.?” अष्टावक्र ने जबाब दिया-
मुझे लगा मैं चर्मकारों की सभा में आ गया हूँ, जहाँ व्यक्ति की चमडी देखकर उसका
निर्णय होता है”. जनक सहित पूरी सभा उनके इस उत्तर से पानी-पानी हो गयी. अष्टावक्र
ने जो संदेश दिया और वह यह कि व्यक्ति का महत्व उसके शरीर से नहीं,उसके ज्ञान
,व्यक्तित्व और कर्म से होता है.
32 धनिक ने सेम के बीज से जाना संपत्ति बढाने का रहस्य. -----------------------------------------------------------
किसी गांव में एक धनिक रहता था. दिन-रात वह इसी सोच में रहता कि उसके धन में
वृद्धि कैसे हो, किन्तु वह कोई उद्दम नहीं करना चाहता था. उसे यह भी भय लगा रहता
था को लोग उसकी अपार संपत्ति के विषय में न जान पाए. इस हेतु वह एक दिन संत रैदास
के पास जा पहुंचा और बोला-“महाराज ! आप परम ज्ञानी हैं. कृपया मुझे संपत्ति बढाने
का उपाय बताइए.”. संत ने उसे एक सेम का बीज देते हुए कहा कि इसे अपने आंगन के किसी
कोने में बो देना. तुम्हारे धन में वृद्धि अवश्य होगी. धनिक ने प्रसन्न होकर उसे
बो दिया. दो-तीन माह में बीज एक बेल के रुप में फ़ैल गया और उसमें बहुत सारी सेम
लगी,किन्तु उसके धन में बढौतरी नहीं हुई. निराश होकर वह फ़िर रैदास के पास पहुँचा
और कहने लगा-“ महाराज, बीज तो ऊग आया है और उसमें फ़ल्लियां भी खूब लगी है,लेकिन
मेरे धन मे वृद्धि नहीं हुई.”. तब रैदास ने समझाया- “भाई ! यदि मैं तुम्हें बीज
देकर यह कहता कि तुम इसे भूनकर खा जाना तो बीज नष्ट हो जाता और तुम्हारा पेट भी
नहीं भरता. तुमने इसे बोया और ढेर सारी फ़ल्लियों तुम्हें प्राप्त हो गयीं, जिनमें
असंख्य बीज भरे हुए हैं. यदि तुम भी अपने धन को सेम के बीज की तरह ही किसी उद्दम
में लगाओगे तो उसने वृद्धि होगी, अन्यथा वह धन नष्ट हो जाएगा”.
धनिक को अपनी भूल का अहसास हुआ. सार यह है कि आलस्य अपार संपत्ति को भी समाप्त
कर देता है, जबकि परिश्रम से उसमे कई गुना की वृद्धि होती है.
32 बालक
ध्रुव का हठ सभी के लिए आदर्श बन गया. -------------------------------------------------
प्राचीनकाल की बात है. राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं-सुनीति और सुरुचि.
दोनों रानियों से क्रमशः दो पुत्र-ध्रुव और उत्तम हुए. राजा उत्तानपाद रानी सुरुचि
को अधिक स्नेह करते थे,इसीलिए उनके पुत्र उत्तम को पिता की आत्मीयता अधिक मिलती
थी. एक बार राजा सिंहासन पर बैठे थे और उनकी गोद में उत्तम बैठा हुआ था. तभी बालक ध्रुव
खेलता हुआ वहां आ पहुंचा और अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा व्यक्त की. पास
ही विमाता बैठी हुई थी. उसने उस नन्हें बालक को यह कह कर बैठने से मना कर दिया कि
यदि वह राजा की गोद में बैठना चाहता है तुम्हें मेरी कोख से जन्म लेना होगा,तभी
तुम राजा की गोद में बैठने के अधिकारी हो सकते हो.” बालक रोता हुआ अपनी माँ के पास
पहुँचा और अपनी विमाता के कथन को कह सुनाया. सुनीति जैसा नाम उसका था वे थी भी
नीतिवान. उन्होंने बालक को पुचकारते हुए कहा-“ बेटा ! यदि बैठना ही चाहते हो तो
भगवान की गोद में बैठॊ, जहाँ से तुम्हें कोई उतर जाने की कहने की हिम्मत नहीं कर
सकता.” अपनी मां की बात सुनकर ध्रुव जंगल की ओर निकल गए. वे अपनी भक्ति से भगवान
को प्रसन्न करना चाहते थे,लेकिन भक्ति कैसे की जाती है,वे नहीं जानते थे. तभी नारद
मुनि वहाँ आता देख बालक ध्रुव ने उनसे भगवान को प्राप्त करने का उपाय पूछा. नारदजी
ने उसे आसान सा उपाय बताया.
ध्रुव ने कठिन तपश्चर्या की और भगवान विष्णु ने प्रकट होकर वर देते हुए कहा कि वह सब लोकों, ग्रहों,
नक्षत्रों के ऊपर आधार बनकर स्थित रहेगा..इसीलिए उनका स्थान “ध्रुवलोक” कहलाता है.
वरदान पाकर ध्रुव वन से लौटकर राजा बने.
उन्होंने अनेक वर्षॊं तक राज्य किया और अन्त में ध्रुवलोक के स्वामी बने.
इस कथा से यह संदेश प्राप्त होता है कि राजा यदि तपस्वी होगा तो उसकी नीतियां
भी आदर्श स्थापित करती हैं. नीतियों के फ़लस्वरुप ही वहाँ की प्रजा सुखी और खुशहाल
रहती हैं. इसीलिए कहा गया है कि जब तक किसी बात को लेकर हठ नहीं होगा, तब तक तप भी
पूर्ण नहीं होता. सार यह है कि अच्छे उदेश्यों के लिए किया जाने वाला संकल्प” दृढ
संकल्प” कहलाता है और कार्य की आधी सफ़लता संकल्प की दृढता में ही छिपी होती है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------
33.
आ गई महाशिवरात्रि पधारो शंकरजी
सृष्टि की रचना का श्रेय ब्रह्माजी को, वहीं उसके पालनहार का श्रेय श्री
विष्णुजी को और संहारक के रुप में भगवान शंकर को माना गया है. इस तरह प्रकृति का
संतुलन बना रहता है. श्री विष्णु और श्री ब्रह्माजी अपने-अपने लोक में बडॆ ही वैभव
के साथ रहते हैं ,जबकि शिव श्मसान में घूनी रमाये रहते है. वस्त्र के नाम पर उनके
शरीर से व्याघांबर होता है. पूरे शरीर पर भस्म लपेटे रहते हैं. और गले में सर्पों
की माला डली रहती है. उनके चारों ओर भूत-पिशाचों का जमावडा रहता है. वे पद्मासन
लगाये पल-प्रतिपल राम के नाम का जाप करते रहते हैं. भययुक्त वातावरण में रहने के
बावजूद भी उनके भक्तों की संख्याँ कम नहीं है. देवों के देव महादेव अपने भक्तों पर
असीम कृपा बरसाने वाले देव हैं. वे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले देवता और अपने
भक्तों को मनचाहा वरदान देने के लिए जगप्रसिद्ध हैं. महाशिवरात्रि का व्रत करने से
उनकी कृपा और भी सघन रुप से उनके भक्तों पर बरसती रहती है.
शिवरात्रि का अर्थ वह
रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है.या यह कहें कि शिवजी को
जो रात्रि अतिप्रिय है उसे “शिवरात्रि” कहा गया है.
रात्रि ही क्यों ?
भगवान शंकर संहारशक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अतः तमोमयी रात्रि से उनका
स्नेह(लगाव) होना स्वाभाविक है. रात्रि संहारकाल की प्रतिनिधि है. उसका आगमन होते
ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार, जीवों की दैनिक कर्मचेष्टाओं का संहार और अन्त में
निद्रा द्वारा चेतना का ही संहार होकर सम्पूर्ण विश्व संहारिणी रात्रि की गोद में
गिर जाता है. ऎसी दशा में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रिप्रिय होना सहज ही
हृदयंगम हो जाता है. यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में ही
वरन सदैव प्रदोष (रात्रि के प्राम्भ होने) के समय में की जाती है
एक बार पार्वतीजी ने जिज्ञासावश भगवान शिव से प्रश्न किया कि “शिवरात्रि” क्या
होती है, उस दिन शिवाराधना से किस फ़ल की प्राप्ति होती है और उसके करने का क्या
विधान है ? भगवान आशुतोष ने उत्तर देते हुए कहा
फ़ाल्गुने कृष्णपक्षस्य
या तिथि स्याच्चतुर्दशी तास्यां या
तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका तत्रोपवासं
कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम न
स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा
तन्नोपवासतः
अर्थात-फ़ाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी
“शिवरात्रि” कहलाती है. जो उस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है. मैं
अभिषेक, वस्त्र, घूप, अर्चन तथा पुष्पादिसमर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना
कि व्रतोपवास से.
ईशानसंहिता में बतलाया
गया है कि फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव भगवान श्रीशिव करोडॊं
सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंगरुप में प्रकट हुए.
शिवरात्रि व्रत की
वैज्ञानिकता तथा आध्यात्मिकता
ज्योतिष शास्त्र के
आनुसार फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है. अतः वही
जीवनरुपी चन्द्रमा का शिवरुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है. अतः इस चतुर्दशी को
शिवपूजा करने से जीव को अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है. यही “शिवरात्रि” का
रहस्य है.
महाशिवरात्रि का पर्व
परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है. उनके निराकार से साकार रुप में अवतरण
की रात्रि ही “ महाशिवरात्रि” कहलाती है. वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि
विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति, ऎश्वर्यादि प्रदान करते हैं.
ईशानसंहिता में एक आख्यान प्राप्त होता है –पद्मकप्ल के प्रारंभ में भगवान ब्रह्माजी ने
जब अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज एवं देवताओं आदि की सृष्टि कर चुके, एक दिन
विचरण करते हुए क्षीरसागर जा पहुँचे. उन्होंने देखा कि भगवान श्री नारायण शुभ्र,
श्वेत सहस्त्रफ़णमौलि श्री शेषजी की शय्या पर शांत अधलेटे हुए है.
श्रीदेवी श्रीमहालक्ष्मीजी उनकी चरण-सेवा कर
रही है. गरुड, नन्द, सुनन्द, गन्धर्व, किन्नर आदि विनम्रभाव से हाथ जोडॆ खडॆ हैं.
यह देखकर ब्रह्माजी को अति आश्चर्य हुआ. ब्रह्माजी को गर्व हो गया था कि कि वे ही
इस सृष्टि का मूल कारण, सबका स्वामी, नियन्ता तथा पितामह हूँ. वे मन ही मन सोचने
लगे कि इन्होंने मुझे आया देखकर न तो प्रणाम किया और न ही अभिवादन किया. क्रोध में
वे तमतमा उठे. उन्होंने निकट जाकर कहा:- “देखते नहीं...तुम्हारे सामने कौन खडा है ? मैं जगत का पितामह हूँ और तुम्हारा रक्षक. तुमको मेरा सम्मान
करना चाहिए”
इस पर भगवान नारायण ने कहा:- सारा जगत
मुझमें स्थित है. फ़िर तुम उसे अपना क्यों कहते हो ? तुम मेरी नाभि-कमल से पैदा हुए
हो, अतः मेरे पुत्र हो” दोनो में विवाद होने लगा. ब्रह्माजी ने “पाशुपत: और श्री
विष्णु ने “माहेश्वर” अस्त्र उठा लिया. दिशाएँ अस्त्रों के तेज से जलने लगीं,
सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी. देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ
के पास पहुँचे. अन्तर्यामी शिवजी समझ गए. देवताओं द्वारा स्तुति करने पर प्रसन्न
होते हुए उन्होंने कहा:-“मैं ब्रह्मा-विष्णु के बीच चल रहे युद्ध को जानता हूँ.
मैं उन्हें शांत कर दूंगा. ऎसा कहकर भगवान शंकर दोनो के मध्य में अनादि,
अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रुप में प्रकट हुए.
“शिवलिंगत्योभ्दूत्यः कोटिसूर्यसमप्रभः” .माहेशर, पाशुपत दोनों अस्त्र शान्त होकर उसी ज्योतिर्लिंग में
लीन हो गए.
यह लिंग निष्फ़ल ब्रह्म, निराकार ब्रह्म का प्रतीक है. श्री विष्णु और ब्रह्मा
ने उस लिंग की पूजा-अर्चना की. यह लिंग फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ तभी
से लिंगपूजा आज तक निरन्तर चली आ रही है.
श्री विष्णु और श्री ब्रह्माजी ने कहा_ हे प्रभु ! जब हम दोनों, लिंग के
आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा ? इस पर कृपालु
श्रीशिव द्वादशज्योतिर्लिंग में विभक्त हो गए. महाशिवरात्रि का यही रहस्य है.
(ईशानसंहिता)
द्वितीय आख्यान ----
वाराणसी के वन में एक भील रहता था. उसका नाम गुरुद्रुह था. उसका कुटुम्ब बडा
था. अतः वह प्रतिदिन वन में जाक्रर मृगों को मारता और वहीं रहकर नाना प्रकार की
चोरियाँ करता था. अपने माता-पिता-पत्नि और बच्चॊं ने भूख से पीडित होकर उससे भोजन
की याचना की. वह तुरंत धनुष-बाण लेकर जंगल में निकल पडा. सारे दिन जंगल में भटकता
रहा,लेकिन उस दिन कोई भी शिकार हाथ नहीं लगा. सूर्य भी अस्त हो चुका था. अतः जंगली
जानवरों के डर से बचने के लिए एक पेड पर चढ गया.
पेड की शाख पर बैठकर वह सो भी नहीं सकता था. खाली बैठे-बैठे वह कर भी क्या
सकता था? अनायास ही वह पत्तियाँ तोडते जाता और नीचे गिराता जाता था. वह कोई साधारण
पेड नहीं था, बल्कि वह बेल का पेड था. संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि का दिन था और
पेड के ठीक नीचे शिवलिंग स्थापित था. अनजाने में वह पूरी रात शिवजी की पूजा करता
रहा था. श्री शिवजी प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए और उससे वर माँगने को
कहा.” मैंने सब पा लिया” कहते हुए भील उनके चरणॊं में गिर पडा. शिवजी ने प्रसन्न
होकर उसका नाम “गुह” रख दिया और वरदान दिया कि भगवान राम एक दिन अवश्य ही तुम्हारे
घर पधारेंगे और तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे. तुम मोक्ष को प्राप्त होगे.वही व्याध
शृंगवेरपुर में निषादराज “गुह” बना, जिसने भगवान का आतिथ्य किया.
शिवरात्रि
पर्व का संदेश
भगवान शंकर में अनुपम सामंजस्य,
अद्भुत समन्वय और उत्कृष्ट सद्भाव के दर्शन होने से हमें उनसे शिक्षा ग्रहणकर
विश्व-कल्याण के महान कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए-यही इस परम पावन पर्व का
मानवजाति के प्रति दिव्य संदेश है. शिव अर्धनारीश्वर होकर भी कामविजेता हैं,
गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त हैं, हलाहल पान करने के कारण नीलकंठ होकर भी विष से
अलिप्त हैं, ॠद्धि-सिद्धियों के स्वामी होकर भी उनसे विलग हैं, उग्र होते हुए भी
सौम्य हैं, अकिंचन होते हुए भी सर्वेश्वर हैं, भयंकर विषधरनाग और सौम्य चन्द्रमा
दोनों ही उनके आभूषण हैं, मस्तक पर प्रलयकालीन अग्नि और सिर पर शीतल गंगाधारा उनका
अनुपम शृंगार है, उनके यहाँ वृषभ और सिंह का तथा तथा मयूर एवं सर्प का सहज वैर
भुलाकर साथ-साथ क्रीडा करना समस्त विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय की शिक्षा देता
है. इससे विश्व को सह-अस्तित्व अपनाने की अद्भुत शिक्षा मिलती है
इसी प्रकार उनका श्रीविग्रह-शिवलिंग ब्रह्माण्ड एवं निराकार ब्रह्म का प्रतीक
होने के कारण सभी के लिए पूज्यनीय है. जिस प्रकार निराकार ब्रह्म रुप, रंग, आकार
आदि से रहित होता है उसी प्रकार शिवलिंग भी है. जिस प्रकार गणित में शून्य कुछ न
होते हुए भी सब कुछ होता है, किसी भी अंक के दाहिने होकर जिस प्रकार यह उस अंक का
दस गुणा कर देता है, उसी प्रकार शिवलिंग की पूजा से शिव भी दाहिने होकर (अनुकूल
होकर) मनुष्य को अनन्त सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं. अतः मानव को उपर्युक्त शिक्षा
ग्रहणकर उनके इस महान महाशिवरात्रि-महोत्सव को बडॆ समारोहपूर्वक मनाना चाहिए.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
महाशिवरात्रि-
34, महाशिव रात्रि
महाशिवरात्रि
का अर्थ वह रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ट सम्बन्ध है. भगवान शिव कि
अतिप्रिय रात्रि को “शिवरात्रि” कहा गया है.
शिवार्चन और जागरण ही इस व्रत की विशेषता है. इसमें रात्रि भर जागरण एवं
शिवाभिषेक का विधान है.
श्री पार्वतीजी की जिज्ञासा पर भगवान शिवजी ने बतलाया कि फ़ाल्गुन कृष्णपक्ष की
चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है. जो इस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता
है. मैं अभिषेक, वस्त्र, धूप, अर्चन तथा पुष्पादिसमार्पण से उतना प्रसन्न नहीं
होता जितना कि व्रतोपवास से.
ईशानसंहिता में बतलाया
गया है कि फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव श्री शिव करोडॊं सूर्यों के
समान प्रभावाले लिंगरुप में प्रकट हुए.
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार
फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है. अतः वही समय
जीवनरुपी चन्द्रमा का शिवरुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है. अतः इस चतुर्दशी को
शिवपूजा करने से अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है. यही शिवरात्रि का रहस्य है.
महाशिवरात्रि का पर्व
परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है. उनके निराकार से साकाररुप में अवतरण
की रात्रि ही “शिवरात्रि” कहलाती है. वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि
विकारों से मुक्त करके, परम सुख, शांति, ऎश्वर्यादि प्रदान करते हैं.
चार प्रहर पूजा का विधान
चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है. इसमें शिवजी को पंचामृत से स्नान
कराकर चन्दन, पुष्प, अक्षत, वस्त्रादि से श्रृंगार कर आरती करनी चाहिए. रात्रि भर
जागरण तथा पंचाक्षर-मंत्र का जप करना चाहिए. रुद्राभिषेक, रुद्राष्टाध्यायी तथा
रुद्रीपाठ का भी विधान है.
शिवरात्रि के महत्व को
प्रतिपादित करने वाली दो कथाएं पढने को मिलती है,जिसमें शिवरात्रि के रहस्य को
जाना जा सकता है.
ईशानसंहिता के अनुसार--
सारी सृष्टि का निर्माण
कर चुकने के बाद ब्रह्माजी को घमंड उत्पन्न हो गया और वे अपने को सर्वश्रेष्ठ
समझने लगे. वे चाहते थे कि कोई उनके इस कार्य की प्रसंशा करे. घूमते-घूमते वे
क्षीरसागर जा पहुँचे जहाँ भगवान विष्णु विश्राम कर रहे थे. उन्हे ब्रह्माजी के
आगमन का पता ही नहीं चला. ब्रह्माजी को लगा कि विष्णु जानबूझकर उनकी उपेक्षा कर
रहे हैं. अब उनके क्रोध का पारावार बढने लगा था. उन्होंने अत्यन्त क्रोधित होते
हुए श्री विष्णु के समीप जाकर कहा-“ उठॊ...तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ.....मैं
सृष्टि का निर्माता ब्रह्मा तुम्हारे सामने खडा हूँ”
श्रीविष्णु ने जागते हुए उनसे बैठने का अनुरोध किया, लेकिन ब्रह्माजी तो क्रोध
में भरे हुए थे. झल्लाते हुए उन्होंने कहा-“मैं तुम्हारा रक्षक, जगत का पितामह
हूँ. तुमको मेरा सम्मान करना चाहिए.” बात छोटी सी थी लेकिन वाकयुद्ध अब सचमुच के युद्ध में तबदिल हो चुका था.
ब्रह्माजी ने “पाशुपत” और श्री विष्णु ने “माहेश्वर” अस्त्र उठा लिया. दिशाएँ
अस्त्रों के तेजसे जालने लगी. सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गई. देवगण भागते हुए
कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ के पास पहुँचे और इस युद्द को रोकने के प्रार्थना
करने लगे. देवताओं की प्रार्थना सुनते ही भगवान शिव दोनो के मध्य में अनादि,
अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रुप में प्रकट हुए. उनके प्रकट होते ही दोनो
दिव्यास्त्र शांत होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गए. तब जाकर ब्रह्माजी को अपनी
गलती का अहसास हुआ. श्री विष्णु और ब्रह्माजी ने उस ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना
की और अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी
यह लिंग निष्कल ब्रह्म, निराकार ब्रह्म का प्रतीक है. यह लिंग फ़ाल्गुन कृष्ण
चतुर्दशी को प्रकट हुआ,तभी से आजतक लिंगपूजा निरन्तर चली आ रही है
शिवपुराण के अनुसार एक कथा आती है-
गुरुद्रुह नामक एक भील वाराणसी के वन में रहता था. वह अत्यन्त ही बलवान और
क्रूर था. अतः प्रतिदिन वन में जाकर मृगों को मारता. वहीं रहकर नाना प्रकार की
चोरियां भी करता था.
प्रतिदिन की भांति वह वन
में जाकर अपने शिकार की तलाश कर रहा था. लेकिन दुर्भाग्य से उसे उस दिन एक भी
शिकार नहीं मिला. भटकते-भटकते वह काफ़ी दूर चला आया था. शाम भी घिर आयी थी. अतः
उसने किसी पॆड पर बैठकर रात्रि विश्राम करना उचित समझा. वह एक पेड पर जा चढा.
संयोग से वह पेड “बिल्व-पत्र”का था. नींद कोसों दूर थी. पेड की डाल पर बैठे-बैठे
वह पत्तियाँ तोड-तॊडकर नीचे गिराने लगा. ऎसा करते हुए तीन प्रहर बीत गए. चौथे
प्रहर में भी उसकी यह हरकत जारी रही. वह बेल-पत्र तोडता जाता और उसे नीचे गिरा
देता.
रात भर शिकार की चिन्ता
में व्याध निर्जल, भोजनराहित जागरण करता रहा था. वह यह नहीं जानता था कि उस
बिल्व-पत्र वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है. इस तरह उसकी चारों प्रहर की पूजा
अनजाने में स्वतः ही हो गई. उस दिन महाशिवरात्रि थी. भगवान शिव उसके सामने प्रकट
हो गए और उससे वर मांगने को कहा. “मैंने सब कुछ पा लिया” यह कहते हुए वह व्याध
उनके चरणॊं में गिर पडा. शिव ने प्रसन्न होकर उसका नाम “गुह” रख दिया और वरदान
द्दिया कि भगवान राम एक दिन अवश्य ही तुम्हारे घर पधारेंगे और तुम्हारे साथ मित्रता
करेंगे. तुम मोक्ष प्राप्त करोगे, वही व्याध शृंग्वेरपुर में निषाद्रराज “:गुह”
बना,जिसने भगवान राम का आतिथ्य किया.
यह महाशिवरात्रि
“व्रतराज” के नाम से भी विख्यात है. यह शिवरात्रि यमराज के शासन को मिटानेवाली है
और शिवलोक को देने वाली है. शास्त्रोक्त विधि से जो इसका जागरणसहित उपवास करते हैं
उन्हें मोक्ष की प्राप्त होती है. इसके करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता
है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
35 ऋषिपंचमी भाद्रपक्ष की
शुक्लपक्ष की पंचमी “ऋषीपंचमी” कहलाती है. इस व्रत के करने से ज्ञात-अज्ञात पापों
का शमन हो जाता है, अतः स्त्री-पुरुष इस व्रत को करते हैं. इस व्रत मे सप्तर्षियों
सहित अरुन्धती का पूजन होता है, इसीलिए इसे “ऋषिपंचमी” कहते है.
सदियों से चली आ
रही कथा को इस दिन बडी ही भक्ति-भाव से श्रवण किया जाता है. कथा इस प्रकार है.
कथा:-
सतयुग में श्येनजित नामक एक राजा राज्य करता था. उसके राज्य में सुमित्र नाम का एक
ब्राह्मण रहता था जो वेदों का ज्ञाता था. उसकी पत्नि जयश्री बडी साधवी और पतिव्रता
स्त्री थी. वह खेतों में अपने पति को सहयोग देती थी. एक बार उसने अपने रजस्वला
अवस्था में,अनजाने में उसने घर का सारा कार्य किया और पति का स्पर्ष कर लिया.
दैवयोग से पति-पत्नि का शरीरान्त एक साथ हुआ. रजस्वला अवस्था में स्पर्षास्पर्श का
विचार न रखने के कारण स्त्री को कुतिया की योनि में तथा पति को बैल के रुप में
जन्म मिला, परन्तु पूर्व जन्म में किए गए धार्मिक कृत्यों के कारण उन्हें ज्ञान
बना रहा. संयोग से इस जन्म में भी वे साथ-साथ, अपने ही घर में, अपने पुत्र और
पुत्रवधू के साथ रह रहे थे.
ब्राह्मण के पुत्र का नाम सुमति था
और वह भी अपने पिता की भांति विद्वान था. पितृपक्ष में उसने अपने माता-पिता का
श्राद्ध करने के उद्देश्य से खीर बनवायी और ब्राह्मणॊं कॊ निमंत्रण दिया. उधर एक
सर्प ने आकर खीर को विषाक्त कर दिया. कुतिया बनी ब्राह्मणी यह सब होता देख रही थी.
उसने सोचा कि यदि इस खीर को ब्राह्मण खाएंगे तो विष के प्रभाव से मर जाएंगे और
सुमति को पाप लगेगा. ऎसा विचार कर उसने खीर कॊ छू दिया. इस पर सुमति की पत्नि बहुत
क्रोधित हुई और उसने चूल्हे से जलती लकडी से उसकी पिटाई कर दी और उस दिन उसे भोजन
भी नहीं दिया.
रात्रि में कुतिया
ने बैल से सारी घटना कह सुनायी. बैल ने कहा कि आज मुझे भी खाने को कुछ नहीं दिया
गया, जबकि मैंने दिन भर खेतों में काम किया है. सुमति हम दोनों के ही उद्देश्य से
यह श्राद्ध कर रहा है और हमें ही भूखों मार रहा है. इस तरह हम दोनों के भूखे रह
जाने से उसका श्राद्ध करना व्यर्थ हुआ.
सुमति द्वार पर लेटा बैल और कुतिया
की वार्ता सुन रहा था. वह पशुओं की बोली भलीभांति समझता था. उसे यह जानकर बडा दुख
हुआ कि मेरे माता-पिता इस निकृष्ट योनियों में पडॆ दुख भोग रहे हैं. वह दौडता हुआ
एक ऋषि के आश्रम में गया और अपने माता-पिता के पशुयोनि में पडने का कारण और मुक्ति
का उपाय पूछा. ऋषि ने ध्यान और योगबल से सारा वृतान्त जान लिया. उसने सुमति से कहा
तुम पति-पत्नि भाद्रपद शुक्ल की पंचमी को “ऋषिपंचमी” का व्रत करो और उस दिन बैल के
जोतने से उत्पन्न कोई भी अन्न न खाओ. इस ब्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता-पिता की
मुक्ति हो जाएगी. उसने उस व्रत को किया और इस तरह उन दोनो को पशुयोनि से मुक्ति
मिली. यह तो मात्र एक कथा है. इसमें कितनी सच्चाई है, यह हम नहीं जानते लेकिन
भारत की धर्मप्राण जनता इस पर अपना विश्वास कायम रखते हुए बडी ही भक्तिभाव से इस
व्रत को करते चले आ रहे हैं.
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
36

आज के परिप्रेक्ष्य में कितने प्रासंगिक है श्रीराम
(गोवर्धन यादव)
आज सारे जगत के लिए सौभाग्य का दिन है क्योंकि अखिल विश्वपति सच्चिदानन्दघन
श्रीराम इसी दिन रावण जैसे दुर्धान्त रावण के अत्याचार से पीडित पृथ्वी को सुखी
करने के लिए और सनातन धर्म की स्थापना के लिए मर्यादापुरुषोत्तम के रुप में इस धरा
पर प्रगट हुए थे. श्रीराम केवल हिन्दुओं के ही “राम” नही हैं, बल्कि वे अखिल विश्व
के प्राणाराम हैं. सारे ब्रह्माण्ड में
चराचर रुप से नित्य रमण करने वाले, सर्वव्यापी श्रीराम किसी एक देश या
व्यक्ति की वस्तु कैसे हो सकते हैं ? वे तो सबके हैं, सबमें हैं, सबके साथ सदा
संयुक्त हैं और सर्वमय हैं. कोई भी जीव उनके उत्तम चरित्र का गान करता है, श्रवण
करता है, अनुसरण करता है, निश्चय ही पवित्र होकर परम सुख की प्राप्ति करता है.
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीराम के व्यक्तित्व पर प्रकाश
डालते हुए लिखा कि उन्हें राज्याभिषेक की बात सुनकर न तो प्रसन्नता होती है और न
ही वनवास की सूचना पर दुःख का अनुभव करते हैं. माँ कौशल्या श्री रामजी से कहती हैं
“तात जाउँ
बलि वेगि नहाहू. जो मन भाव मधुर कछु खाहू पितु समीप
तब जाएहु भैया. भै बडि बार जाइ बलि मैया.
हे पुत्र ! शीघ्र ही स्नान करके जो भी इच्छा हो कुछ मिष्ठान्न खालो. पीछे
पिताजी के पास जाना, बडी देर हो गई है. यहाँ माता कौशल्या को पता ही नहीं चल पाया
कि विमाता कैकेई ने उन्हें वन भिजवाने का पक्का प्रबंध कर रखा है. श्रीराम इस बात
को जान चुके थे. प्रसन्नवदन श्रीराम माँ से कहते हैं
पिता
दीन्ह मोहि कानन राजू. जहँ सब भाँति मोर बड काजू
धर्म की धुरी श्री रघुनाथजी ने धर्म की दशा को जाना और माता से अत्यन्त ही
मृदु शब्दों में कहा;- पिताजी ने मुझे वन का राज्य दिया है, जहाँ मेरा सब प्रकार
से कार्य सिद्ध होगा. फ़िर कहते हैं
आयसु देहि
मुदित मान माता, जेहिं मुद मंगल कानन जाता जनि सनेह
बस डपसि भोरें. आनन्दु अंब
अनुग्रह तोरे.
हे माता ! प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिए जो वन जाते प्रभु मुझे हर्ष और मंगलकारी
हों, स्नेह के वश भूलकर भी न डराना. हे माता ! आपके आशीर्वाद से मुझे सब प्रकार का
सुख मिलेगा.
महर्षि वाल्मीक इस प्रसंग को बडी ही कुशलता से लिखा कि पिता की दशा देखकर
श्रीराम दुखी हो जाते हैं .वे माता कैकेई से विनम्रतापूर्वक उसका कारण जानना चाहते
हैं. तब वे कहती हैं
“तत्र मे याचितो राजा
भरतस्याभिषेचनम* गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्दैव राघव.(”सर्ग १८/३३)
राघव ! मैंने महाराज से यह याचना की है कि भरत का राज्याभिषेक हो और आज ही
तुम्हें दण्डकारण्य भेज दिया जाए.
“तदप्रियममित्रन्घो वचनं
मरणॊपमम*श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेई चेदमब्रवीत (सर्ग १९/१) “एवमस्तु गमिष्यामि
वनं वस्तुमहं त्वितः*जटाचीर राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन (सर्ग १९/२)
“वह अप्रिय तथा मृत्यु के समान कष्टदायक वचन सुनकर भी शत्रुसूदन श्री राम
व्यथित नहीं हुए. उन्होंने कैकेई से कहा”-माँ ! बहुत अच्छा ! ऎसा ही हो. मैं
महाराज की प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए जटा और चीर धारण करके वन में रहने के
निमित्त अवश्य यहाँ से चला जाऊँगा.”
श्रीरामजी का पूरा जीवन संघर्ष व झंझावतों से घिरा रहा फ़िर भी वे सन्मार्ग से
कभी विचलित नहीं हुए. उनके सदगुण और निर्णय आज के परिप्रेक्ष्य में अत्यन्त
प्रासंगिक हैं,जिनसे हमें शिक्षा लेने की आवश्यकता है. दुर्भाग्य से आज चारों ओर
मानवीय मूल्यों का तेजी से विघटन हो रहा है. पारिवारिक मूल्यों की स्थिति यह है कि
नयी पीढी अपने माता-पिता, जिन्होंने उसे जन्म ही नहीं दिया, बल्कि लालन-पालन कर
शिक्षा प्रदान की और स्वावलंबी भी बनाया, वे उन्हें घर के कोने तक ही सीमित कर
देती है या वृद्धाश्रमों में-अनाथालयों में पहुँचा देती है. हमारे यहाँ मातृ देवी
भव, पितृदेवो भव माना जाता है. आज कौन पिता को देवता और माता को देवी मान रहा है.
भाइयों और अन्य संबंधियों मे अलगाव, जलन,घृणा और विद्वेष के भाव ही सब जगह लक्षित
हो रहे हैं. दरअसल यहीं पर श्रीराम का चरित्र प्रासंगिक हो जाता है. मर्यादित
पुरुषोत्तम श्रीरामजी ने सामाजिक मूल्यों का निर्वहन आजीवन निभाया. वे वास्तव में
माता-पिता को देवतुल्य मानते थे. गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है
प्रातःकाल
उठि के रघुनाथा* गुरु पितुमातु नवावहिं माथा.
वे अपने अनुजों से भी प्रगाढ प्रेम करते थे. उनके सभी भाई
उन्हें प्राणॊं से भी अधिक प्रिय थे. तुलसीदासजी लिखते हैं.
“अनुज सखा संग भोजन
करहीं*मातु पिता अग्या अनुसरहीं(बालकांड-२०४/२ “बेद पुरान सुनहिं
मन लाई* आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई.................. ३
“आयसु मागि करहिं काजा* देखि चरित हरषै मन राजा...... .४
लक्ष्मणजी के प्रति उनका स्नेह कुछ ज्यादा ही था. वाल्मीकजी
लिखते हैं
लक्ष्मणॊ लक्ष्मसम्पन्नो बाहिःप्राण इवापर* न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः*मुष्टमन्नमुपानीतमश्राति न हि तं
विना...............बालकाण्ड..३०
पुरुषॊत्तम राम को लक्षमण के बिना नींद नहीं आती थी. यदि
उनके पास उत्तम भोजन लाया जाता तो वे उसमें से लक्ष्मण को दिये बिना नहीं खाते थे.
यह
सर्वविदित ही है कि पिता के आदेश मात्र पर उन्होंने राजसिंहासन को त्याग करने का
निर्णय ले लिया था.जब राज्याभिषेक की बात चली तो उन्होंने सोचा कि उनके रघुकुल में
बडॆ राजकुमार को ही राजा बनाने की रीति दोषपूर्ण है. जब भरत को राजा बनाने की बात
माँ कैकेई ने की तो वे बडॆ प्रसन्न हुए थे. मेघनाथ के शक्ति प्रहार से मुर्छित
लक्ष्मण को देखकर वे फ़बक कर रो पडे थे और रोते-रोते उन्होंने यहाँ तक कह दिया था
कि यदि वे ऎसा जानते कि वन में भाई को खोना पडॆगा, तो वे अपने पिता की आज्ञा मानने
से भी इनकार कर देते. आज स्थिति सर्वथा प्रतिकूल है. भाई, भाई का दुश्मन है.
संयुक्त परिवार खंड-खंड हो रहे हैं. आज समाज में मानवता का पतन, परिवारों में
विघटन और आपसी बैर का बोलाबाला है. परिवार में अशांति का जहर घुल रहा है.
लोभ-स्वार्थ-नफ़रत-केवल और केवल धन कमाने की लिप्सा ने आदमी को जकड रखा है.
पास-पडौस के लोग कभी परिवार की तरह रहा करते थे, आज भागमभाग की जिन्दगी में कौन
पडौस में रह रहा है, यह जानने तक की फ़ुर्सत नहीं है. इस संदर्भ में श्रीराम द्वारा
प्रस्तुत उदाहरण अनुकरणीय है. उनके लिए छूत-अछूत, धनी-दरिद्र, ऊँच-नीच के बीच कोई
भेदभाव नहीं था. हमारे देश के कर्णद्धार दलित, अतिदलित,अनुसूचित जनजातियों,
वनवासियों के कल्याण के लिए केवल विकास का ढिंढोरा पीटते हैं और उनके बीच
वैमनस्यता के बीज बो रहे हैं. शबरी के जूठे बेरों को प्रेम से खाना, केवट निषादराज
को गले लगाना, वानर,भालू,रीछ जैसी जनजातियों को प्यार-स्नेह देकर उन्हें अपना
बनाना और उनके जीवन में उत्साह का संचरण करना,कोई राम से सीखे. रामराज्य में किसी
को अकारण दण्डित नहीं किया जाता था और न ही लोगों के बीच पक्षपात व भेदभाव था.
क्या आज की नई पीढी श्रीराम के इस सदाशय से कोई शिक्षा ग्रहण करेगी ?.
श्रीराम के समान आदर्श पुरुष, आदर्श धर्मात्मा, आदर्श
नरपति, आदर्श मित्र, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र, आदर्श शिष्य, आदर्श पति, आदर्श
स्वामी, आदर्श सेवक, आदर्श वीर,,आदर्श दयालु, आदर्श शरणागत-वत्सल, आदर्श तपस्वी,
आदर्श सत्यव्रती, आदर्श द्रढप्रतिज्ञ तथा आदर्श संयमी और कौन हुआ है? जगत के
इतिहास में श्रीराम की तुलना में एक श्रीराम ही हैं. साक्षात परमपुरुष परमात्मा होने
पर भी श्रीराम जीवों को सत्पथ पर आरुढ कराने के लिए ही आदर्श लीलाएं की, जिनका
अनुसरण सभी लोग सुखपूर्वक कर सकते हैं.
आज हमारे श्रीरामजी का पुण्य जन्मदिवस चैत्र शुक्ल नवमी है.
इस शुभ अवसर पर सभी लोगों को खासकर उनको,जो श्रीरामजी को साक्षात भगवान और अपना
आदर्श मानते हैं,श्रीराम-जन्म का पुण्योत्सव बडी धूमधाम से मनाना चाहिए. श्रीराम
को प्रसन्न करना और उनके आदर्श गुणॊं को अपने जीवन में उतारकर श्रीराम-कृपा
प्राप्त करने का अधिकारी बनना चाहिए.
------------------------------------------------------------------------------------
37.
आत्मनिर्भर भारत में हिन्दी का योगदान
हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक अपना अस्तित्व रखती है. सच माने में हिन्दी हमारी संस्कृति की
पर्याय है. वह बद्रीविशाल की अलकनंदा है, रामेश्वर के अभिषेक की गंगा है. जगदीश के
शिखर पर स्थापित भ्रामरीचक्र है, तो द्वारकाधीश के भव्य प्रासाद की फ़हराती ध्वजा
है. हिन्दी की जन्मजात उपलब्धि यह है कि वह संस्कृत की दुहिता है. जनपदीय बोलियाँ
इसकी सहोदरा है. यह अतुल शब्द संपदा वाली है. इसकी लिपि देवनागरी है, जो पूर्णतः वैञानिक
है. इन सभी गुणवत्ता के कारण ही हिन्दी अपनी लिपि, भाव,और भाषा की कसौटी पर खरी
उतरी है. विश्व मंच पर आज हिन्दी प्रौद्द्योगिकी की हमसफ़र बनकर भारतीय संस्कृति का
परचम लहरा रही है.
किसी भी देश को सुसंपन्न बनाने में स्वदेशी भाषा और स्वदेशी भाव का होना बहुत
जरुरी है. जब तक इन दो भावों का तालमेल नहीं होगा, देश कतई आगे नहीं बढ़ सकता. आज इस बात आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी है. अपने बाजार को
दूसरे देशों के हवाले करने से उस देश का आर्थिक आधार मजबूत होता जाएगा, लेकिन अपना खुद का देश बहुत पीछे चला जाएगा. हम जानते हैं
कि पुरातनकाल में भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर था. गाँव खुशहाल थे. सामाजिक
व्यवस्था एक दूसरे पर अवलंबित थी. इसी अवलंबन के भाव के कारण ही हर परिवार की
व्यवस्थाएँ एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं. इस कारण शहर ही नहीं गाँव भी आत्मनिर्भर थे.
आज देश को इसी भाव यानी स्वदेशी भाव की बेहद आवश्यकता है.
भारत की अर्थव्यवस्था का एक आधार यह भी था कि भारत के
गाँवों में कृषि एक ऐसा उद्योग था, जिस पर गाँव ही नहीं शहरों की भी व्यवस्थाएं होती थी. इसके अलावा लगभग हर घर
में कुटीर उद्योग जैसी व्यवस्था संचालित होती थी. आज के समय में यह सारी व्यवस्थाएं
चौपट हो गई हैं, जिन्हें फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है. यही स्वदेशी का भाव है और यही भारत
की आत्मनिर्भरता का एक मात्र रास्ता है. वर्तमान में एक धारणा प्रचलित है
अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब
और ज्यादा गरीब होता जा रहा है. इसके पीछे मात्र कारण यही है कि हम दूसरों पर आश्रित होते जा रहे
हैं. दूसरों के सहयोग के
बिना हम खाना भी नहीं खा सकते हैं, यह सब धन केंद्रित जीवन का ही परिणाम है. धन भी जरूरी है, लेकिन पैसा भूख नहीं मिटा सकता यानी पैसा भूख का पर्याय
नहीं हो सकता.
यह बात स्वीकार करने योग्य है कि सारे देश को अंग्रेजी के माध्यम से साक्षर नहीं
बनाया जा सकता. वह हिन्दी या अनय भारतीय प्रांतीय भाषाओं के द्वारा ही संभव है.
सारे संसार में भारत को छोड़कर कोई एक भी देश नहीं है जिसकी राजभाषा विदेशी भाषा
है. भारत के अधिसंख्य लोग हिन्दी जानते-समझते हैं. अतः भविष्य में हिंदी तथा अन्य
प्रांतीय भाषाओं का वर्चस्व भारत में होना चाहिए. हिन्दी विरोधी लोगों का आज भी
तर्क है कि हिन्दी एक अविकसित भाषा है. इसमें वैज्ञानिक साहित्य का अभाव है.
हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली का अभाव है. इसमें शब्दो की एकरूपता नहीं है. एक ही शब्द अनेक प्रकार से
लिखा जाता है, किसे ग्राह्य समझें और किसे अग्राह्य, समझ में नहीं आता. इससे
हिन्दी लिखने में असुविधा और उलझन होती है.
वैज्ञानिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी.
हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए तथा विश्वविध्यालय स्तर पर
शिक्षण माध्यम के रुप में हिन्दी विकास के लिए भारत सरकार ने मानव संसाधन विकास
मंत्रालय के अधीन सन 1961 ई.में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली,
अखिल भारतीय शब्दावली, परिभाषा कोशों, चयनिकाओं, पाठसंग्रहों तथा विश्वविद्यालय
स्तर पर हिन्दी पुस्तकों के निर्माण का कार्या सौंपा गया था. आयोग अब तक अनेक
परिभाषिक शब्द-संग्रह और विभिन्न विषयों पर शब्दावलियां तथा परिभाषा कोश प्रकाशित
कर चुका है. इतना ही नहीं आयोग तथा प्रदेशों की हिन्दी अकादमियों द्वारा विभिन्न
विषयों जैसे- धर्मशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्विज्ञान, इंजीनियरी, कम्प्युटर विज्ञान,
गणित, दर्शन विज्ञान, सैन्य विज्ञान आदि विषयों पर विश्वाविद्याल स्तर की सैकड़ों
पुस्तकें प्रकाशित कर चुका है.
भूमण्डलीकरण और हिन्दी
सदियों से दुनिया के अनेक देश आपस में व्यापार करते आए है. यह भी एक प्रकार का
भूमण्डलीकरण ही था. परन्तु आधुनिक भूमण्डलीकरण उससे बहुत भिन्न है. अब
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार के साथा-साथ उत्पादन का बहूमण्डलीकरण भी हो रहा
है. इतना ही नहीं, आर्थिक स्वामित्व का भी भूमण्डलीकरण होने लगा है.
आज हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार का असर यह हो रहा है कि भारत में बहुराष्ट्रीय
निगमों के उत्पाद का विज्ञापन हिन्दी माध्यम से हो रहा है. सौदा तय करने की अपनी
भाषा है. यही सब कारण है कि हिन्दी की अन्तर्राष्ट्रीय पैठ बढ़ी है.
भूमण्डलीकरण का प्रभाव इन प्रस्तुत नीतियों के परिवर्तन से ही परिलक्षित होगा
१. विदेश व्यापार नीति, २-औद्योगिक नीति, ३-सार्वजनिक क्षेत्र नीति,
४-उत्पादनकारक नीति-( भूमि से संबंधित, भ्रमण से संबंधित, पूंजी, शेयर,बाजार से
संबंधित), ५-प्रशाशित मूल्य नीति, ६-तटकर नीति, ७- सेवा एवं पेटेंट नीति (
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी प्रवाह, अन्तर्राष्ट्रीय
उत्पादन, और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक स्वामित्व)
भाषा के प्रचार-प्रसार की अनेकानेक संभावनाएं
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भाषा के प्रसार एवं विकास
की बड़ी सम्भावनाएं है. भारतीयता को आगे बढ़ाने का स्वर्णिम अवसर है क्यंकि भाषा
केवल विचारों एवं भावों की अभिव्यक्ति भर का माध्यम नहीं है, यह देश की अस्मिता की
पहचान है. हिन्दी भारतीय संस्कृति की पहचान है.
भारतीय अर्थव्यवस्था का भूमण्डलीकरण न केवल भारत की राजभाषा हिन्दी बल्कि
समस्त भारतीय भाषाओं के विकास एवं विस्तार का मार्ग प्रशस्त करता है.
भूमण्डलीकरण से पर्यटकों, व्यापारियों, उत्पादकों एवं सामान्य व्यक्तियों के
आवागमन में वृद्धि हुई है. भाषा व्यवहार की भी पहचान है. अपनेपन और आत्मीयता का
बोध कराती है. इसलिए इस अवसर का लाभ हमें भरपूर उठाने की आवश्यकता है.
भूमण्डलीकरण के साथ एक ओर जहाँ अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धा करानी पड़ रही है,
वहीं दूसरी ओर भाषा को भी प्रतिस्पर्धा करनी ही पड़ेगी. विदेशी बैंक, विदेशी
पूंजीगत एवं वाणिज्यिक कंपनियाँ उत्पादन फ़र्म निरन्तर देश में प्रवेश कर रही है.
आर्थिक विकास के साथ-साथ हिन्दी को भी प्रौढ़ावस्था में आना होगा, जिससे वह अन्य
भाषाओं से स्वतंत्र प्रतियोगिता में ठहर सके.
एक ओर उच्च शिक्षा का भी भूमण्डलीकरण हो रहा है तथा व्यावसायिकरण हो रहा है.
अन्य क्षेत्रों के साथ इसका भी निजीकरण हो रहा है. स्वावित्त पोषित कार्यक्रम के
अन्तर्गत अनेक व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं, यहाँ भी हिन्दी को
प्रतिस्पर्धा करनी होगी.
सूचना प्राद्दोगिकी और कम्प्युटर का विकास.
आज कम्प्युटर और सूचना प्राद्धोगिकी का युग है. सभी क्षेत्रों में कामकाज में
यांत्रिक और इलेक्ट्रानिक उपकरणॊ का प्रयोग बढ़ता जा रहा है. इसे देखते हुए राजभाषा
विभाग ने इन उपकरणॊं द्वारा हिन्दी में काम करने की सुविधाएँ जुटाने के लिए बहुत
ही महत्वपूर्ण कार्य किये है, जिसके दूरगामी परिणाम प्राप्त होने लगे हैं.
अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद करने में अब कंप्युटर सक्षम है. इसकी सहायता से
प्रशासकीय क्षेत्र में प्रयोग में आने अंग्रेजी पत्रों का अनुवाद करने के लिए सी-डेक
पुणे के माध्यम से इसका साफ़्टवेयर तैयार किया गया है.
हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए और भी अनेक विभिन्न साफ़्टवेयर तैयार किए
जा चुके हैं. यान्त्रिक उपकारणों में " लीप आफ़िस" का विशेष उल्लेखनीय
है. इस साफ़्टवेयर से देवनागरी के अलावा असमी, बंगला, गुजराती, कन्नड़, मलयालम,
उड़िया, पंजाबी, तमिल, और तेलुगू इन दस लिपियों में काम किया जा सकता है. इस
साफ़्टवेयर में संपादन और मुद्रण आदि की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं. लिखित सामग्री को
दूसरी लिपि में भी परिवर्तित किया जा सकता है.
सी-डेक के अलावा और कई प्रतिष्ठानों में भी यांत्रिक और इलेक्ट्रनिक सुविधाएँ
उपलब्ध करने में उल्लेखनीय कार्य हुए हैं. इसे और सरल बनाते हुए "गुरु"
को इजाद किया गया, यह मल्टीमिडिया सी.डी.रोम एक ऐसा ही उपकरण है. "गुरु"
वास्तविक और व्यवहारिक स्थितियों के आधार पर प्रशिक्षणार्थियों का मार्ग निर्देशन
करता है. इससे प्रशिक्षाणार्थी की प्रगति का मूल्यांकन भी किया जा सकता है.
इस बदलते राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक,
वैज्ञानिक और राष्ट्रीय तथा अंन्तर्राष्ट्रीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार, प्रयोग और उसकी सम्यक प्रतिष्ठा के लिए सतत
प्रयास किए है, अतः राजभाषा हिन्दी के उज्ज्वल भविष्य को लेकर ज्यादा चिन्तित होने
की आवश्यकता नहीं है. इतना सब कुछ हो चुकने के बाद भी आज हिन्दी के धुर-विरोधी
इसके विपरीत कार्य करते देखे जा सकते है. वे चाहें तो इन साफ़्टवेयर की सहायता
हिन्दी में लिखना और टाईप करना आसानी से सीख सकते है. आजकल एंड्राईड मोबाईल का चलन
तेजी से बढ़ा है. उसमें भी हिन्दी में लिखे जाने की व्यवस्था की गई है, लेकिन कुछ
सिरफ़िरे रोमन में लिखना अपनी शान समझ रहे हैं, जबकि वे आराम से हिन्दी को प्रयोग
में ला सकते हैं.लेकिन वे जानबूझ कर सीखना नहीं चाहते या हिन्दी के प्रति अपने मन
में विद्वेश पाले बैठे रहते हैं. यह ठीक नहीं है.
भारत में आज जितनी भी मल्टिनेशनल कंपनियां अपनी शाखाएं खोल रही है या खोल चुकी
हैं, सभी अपने प्रोडक्टस के बारे में हिन्दी का प्रयोग करते हुए उनकी गुणवत्ता का
बखान करते हुए अच्छा माल ( पैसा ) बना रही है. हिन्दी न केवल भारत में, बल्कि
विश्व के प्रायः सभी देशों में शान के साथ बोली जा रही है. लगभग हर देश में हिन्दी
के विश्व-विद्यालय संचालित हो रहे हैं.
अब जमाना बदल चुका है. मोदी जी की सरकार ने एक अरसे से चला आ रही शिक्षा
पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन किया हैं. बच्चे अब कक्षा चार तक अपनी मातृभाषा या
फ़िर देवनागरी हिन्दी में अध्ययन करेंगे. जैसा कि मैंने पहले इस बात का उल्लेख किया
है कि हिन्दी संस्कृत भाषा की दुहिता है, माने वह संस्कृत की बेटी है. बच्चे जब
हिन्दी से जुड़ेंगे तो निश्चित ही वे संस्कृत साहित्य को भी पढेंगे. हमारा संस्कृत
साहित्य अन्य देशों के साहित्य से ज्यादा धनी है. इसमें जीवन से जुड़ी हर प्रकार की
समस्याओं का निदान समाया हुआ है. इतना ही नहीं, हमारे जीवन मूल्य क्या होने
चाहिये, समाज कैसा हो, समाज में हमें कैसे रहना चाहिए, हमारे नैतिक दायित्व क्या
हैं और हम अपने राष्ट्र को कैसे उन्नति के शिखर पर पहुँचा सकते हैं आदि के बारे
में विस्तार से दिया गया है.आज बच्चे हों या बुजुर्ग सभी अपने भारतीय मूल्यों की
तिलांजलि देकर पाश्चात्य परिवेश में ढल रहे है वा थोती पाश्चात्या संस्कृति को
अपना रहे हैं, में एक व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेगा.
हिन्दी आज विश्व भाषा बन चुकी है. मारीशस हो या आस्ट्रेलिया या फ़िर फ़िजी,
त्रिनीडाड, गुयाना, स्वीडन, डेनमार्क, सूरीनाम, अमेरिका, कनाड़ा, नीदरलैंड, जर्मनी,
नार्वे, म्यांमार, थाईलैंड , सिंगापुर, मलेशिया, न्यूजीलैंड, जाम्बिया, अफ़्रीकी
महाद्वीप, केन्या, युगांडा, कम्पाला, तंजानिया, नाइजीरिया, चाइना, जापान, फ़ांस,,
रोमानिया, योगोस्लाविया, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया, तुर्की, इरान, सउदी अरब, मिस्त्र,
लीबिया आदि देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी विधिवत पढ़ाई जा रही है. आधुनिक
युरोपीय भाषाओं में जर्मन सबसे अधिक विज्ञान संगत भाषा जरुर है लेकिन जर्मनी भाषा
के व्याकरण पर हिंदी का गहरा प्रभाव है. हिंदी साहित्य के अन्य विदेशी भाषाओं में
अनुवाद हो रहे है और पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त ग्रंथ प्रकाशित किए जा रहे हैं.
हिंदी की ध्वजा विश्व में फ़हराई जा रही है, क्या यह हमारे लिए हर्ष का विषय नहीं
है कि स्वाधीनता के बाद विश्व भर में हिंदी को जो मान्यता प्राप्त हुई है वह विश्व
की अनेक भाषाओं के लिए दुर्लभ है?
आज विश्व में हिंदी भाषा की प्रधानता है क्योंकि इसका व्याकरण विज्ञान संगत
है. इसकी लिपि अब कंप्युटर की लिपि है. जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि संस्कृत
की पुत्री होने के कारण ही हिन्दी को वह स्थान और आधार मिला है.
आत्मनिर्भर बनता भारत आज की दुनिया के अन्य देशों के साथ कदम से कदम मिला कर
चल रहा है, बल्कि यूं कहा जाए कि वह कई क्षेत्रों में दुनिया के अन्य देशों से
काफ़ी आगे निकल चुका है, यह हमारे सबके लिए गौरव का विषय है. वह दिन भी शीघ्र ही
आने वाला है जब हमारा भारत, दुनिया का सिरमौर बनेगा, फ़िर से विश्व गुरु बनेगा,
इसकी इबारत कभी की लिखी जा चुकी है.
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
38. श्रीमद्भवतगीता
तथा अन्य गीताएँ.
महाभारत के भीष्म पर्व के पच्चीसवें
अध्याय से बयालिसवें अध्याय तक के संवादॊं को श्रीमद्भगवतगीता कहा जाता है., इसमें
सात सौ श्लोक 24447 शब्दों में निबद्ध हैं, जिसमें से पांच सौ चौहत्तर श्लोक भगवान
श्रीमुख से बोले गए हैं. महाभारत का यह विशेष खण्ड ही गीता के नाम से
जगतप्रस्सिद्ध है और प्रस्थानत्रयी में इसका प्रमुख स्थान विद्वानों द्वारा
सर्वमान्य है. मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को कहे जाने के कारण इस दिन गीताजयन्ती का
उत्सव भी श्रृद्धा के साथ मनाया जाता है. गीता शब्द कहते ही इसी ग्रंथ का स्वरुप
मानसपटल पर आता है और जनमानस में यही सर्वाधिक प्रचलित मान्य स्वीकार्य तथा
श्रद्धेय माना जाता है. उसमें कोई संशय नहीं.
श्रीमदभगवतगीता अद्वितीय ग्रंथ है. किंतु इसके अलावा भी अन्य गीताएं भी
पठनीय है. प्रकारांतर से हम कह सकते हैं कि वे गीता के अनुपूरक ग्रंथ है. मुख्य
गीता को स्पष्तः समझने के लिए इन अन्य गीताओं का अध्ययन सहयोग देता है.
कतिपय गीताओं के नाम इस प्रकार
है:-जैसे-उद्धवगीता- यह उद्धव-कृष्ण का आध्यात्मिक संवाद है. पाराशरगीता
में व्यवहारिक नियमों का विस्तार से उल्लेख है. भीष्मगीता में भीष्म
द्वारा युधिष्ठर को दिए गए उपदेश है. युधिष्ठगीता में दान आदि शुभकर्मों से मोक्ष
प्राप्त करने के उपदेश दिए गए हैं.. मनुगीता में निष्कामकर्म का प्रतिपादन
है. जापकगीता में जप की महिमा दर्शायी गयी है. ब्राह्मणगीता में
ज्ञानयज्ञ को ही मोक्षपद की प्राप्ति का साधन बताया गया है. हंसगीता में
मानवीय सदगुणॊं की महिमा का निरुपण है. कौशिकगीता में इन्द्रियों पर विजय
प्राप्त करने वाले को ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बताया गया है. महाभारत
समाप्ति पश्चात शोक में डूबे धृतराष्ट्र को धर्म का उपदेश विधुर द्वारा दिया गया
है, वह विधुरगीता में संग्रहित है. जाजलिगीता में भीष्म ने जाजलि और
तुलाधार वैश्य का संवाद युधिष्ठर को सुनाया है. मंकिगीता में मंकि ऋषि के
उपदेश है. शिव-पार्वती के वार्तालाप के रुप में महेश्वरगीता है. जनक और
याज्ञ्यवल्क का संवाद याज्ञ्वल्यकगीता कहलाता है. सांख्य शास्त्र और योग का
विशद वर्णण वशिष्ठगीता में है. राजा प्रथु के यज्ञ में गौतम और अत्रिमुनि
के वाग्युद्ध के विवाद का समाधान सनतकुमार द्वारा किया गया . यह मार्कण्डॆयगीता
में कल्याणकारी रुप में वर्णित है. सृष्टि से संबद्ध प्रश्नों के उत्तर भृगुगीता
में संग्रहित है. त्याग की महिमा को बताने वाला ग्रंथ कपिलगीता है.
राज्य के विधिवत संचालन की व्यवस्था ब्रम्हगीता में वर्णित है.
पुनर्जन्मवाद पर ब्रहस्पतिगीता प्रकाश डालती है. उतथ्य ऋषि द्वारा राजा
मान्धाता को राजधर्म का उपदेश जिसमें दिया गया है उसे उतथ्यगीता कहते हैं.
आत्मा के अस्तित्व को नास्तिकों के प्रति पंचशिख मुनि ने कहा है, वह पंचशिखगीता
में है. सावित्री और यमराज का वार्तालाप सावित्रीगीता कहलाता है.
इस प्रकार ये विभिन्न प्रकार की
गीताएं हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है और वह है आध्यात्मविद्या के अन्वेषण में
लगे हुए जिज्ञासुओं को सही मार्ग दिखलाना है.
श्रीमद्भगवतगीता तो प्रस्थानत्रयी
में से एक है.किन्तु उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उसी अर्जुन को जो वही उपदेश
तीन माह पश्चात सुनाए गए, वह भी एक गीता है.जिसे अनुगीता या उत्तरगीता
कहा जाता है. खेद है कि यह अपेक्षाकृत कम चर्चित है. आध्यात्मिक दृष्टि से यह
अनुठा और अद्वितीय ग्रंथ है. दोनो गीता में वेद्व्यास की रचनाएं है और दोनो महाभारत
के अनुशासनपर्व के ही अध्यायों में है.
इतिहास ऎसा है कि युधिष्ठर के
राज्याभिषेक के बाद, तीन माह पश्चात शांति के क्षणॊं में हस्तिनापुर के राजमहल में
सखा अर्जुन ने कृष्ण से प्रेमवश निवेदन किया कि हे प्रभु ! युद्ध आरंभ के समय आपने
जो ज्ञानोपदेश दिया था, वह कुछ स्मृत सा हो गया है. उस ज्ञानामृत को पुनः सुनने की
इच्छा बलवती हो गयी है. कृपया उसे मुझे पुनः सुनावें, क्योंकि अब आप शीघ्र ही
द्वारका को जाने वाले हैं और मैं कहीं उस अमृतलाभ से वंचित न हो जाऊँ.
तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पुनः वही
बातें बतायी जो अनुगीता के नाम से अनुशासनपर्व में छत्तीस अध्यायों में तथा एक
हजार से अधिक श्लोकों में निबद्ध हैं.
श्रीमद्भवतगीता में श्रीकृष्ण अपने
शब्दों में अर्जुन को उपदेश देते हैं,किंतु अनुगीता में जनमेजय कश्यप, ब्रह्मा,
नारद आदि को संदर्भित कर प्रमाण देते हुए अपनी बात अर्जुन को बताते हैं.
श्रीमद्भगवतगीता कहते समय परिस्थिति
ऎसी थी कि कम समय में बहुत सी बातें संक्षेप में कहनी थी,किंत्य अनुगीता के कथन के
समय, समयाभाव न होने से उन गूढ विषयों को तर्क और युक्तियुक्त तरीके से प्रस्तुत
किया गया है. अधिक मुक्त रुप से आध्यात्म को विश्लेषणात्मक विधि से उद्घाटित किया
गया है.
अनुगीता में श्रीकृष्ण अपने विराट
ईश्वरीय स्वरुप का दर्शन नहीं कराते, यह अन्तर दिखाई देता है. किंतु इसका स्पष्ट
कारण यह है कि युद्धपूर्व अर्जुन प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहा था. उसे तत्काल
प्रभावित करने तथा धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित कराने हेतु विराट स्वरुप को धारण करना
श्रीकृष्ण के लिए आवश्यक हो गया था. बाद में अनुगीता कही गयी. अतः विराट स्वरुप तो
अर्जुन देख ही चुका था. अतः उसकी आवश्यक्ता नहीं रह गयी थी. और वह उस स्वरुप से
भयभीत भी हो गया था. और चतुर्भुजी शांत
स्वरुप पसंद करने लगा था. स्वभाविक रुप से एक ही बात ज्यादा याद रहती है,
सुनी बातों में विस्मृति हो जाना स्वभाविक है.अतः विराट स्वरुप की आवश्यक्ता नहीं
थी. दोनो गीता के उपदेशों का मंतव्य समान है.श्रीमद्भगवतगीता को तो सांगोपांग रुप
से समझना क्लिष्ट है. हजारों साल से गीता की नित्य नूतनता और चिरपुरान्तता बनी हुई
है. अनेकों विद्वानों के भाष्य हमारे सामने है. शंकराचार्य से लेकर विनोबा भावे
सभी गीता को एक स्वर से हृदयांगम करने का निर्देश-उपदेश देते हैं.
अनुगीता बहुत सीमा तक
श्रीमद्भगवत्गीता सहायक सिद्ध हो सकती है, यदि अनुगीता को गीता का पूर ग्रंथ मानकर
अध्ययन किया जाए.
अनुगीता का महात्म्य बताते हुए
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं :- हे कुरुनन्दन ! यदि तुम मुझ पर विश्वास, प्रेम
और श्रृद्धा रखते हो तो (अनुगीता में
वर्णित) इस धर्म का पूर्ण आचरण करने पर तुम पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त
कर लोगे.
हम भारतवासी अपने आध्यात्मिक
ग्रंथॊं पर गर्व करते हैं. कृष्ण को अपना इष्ट देव मानते हैं और उन्हें अपना
पुरातन पुरुष समझते हैं, यदि ऎसा है तो हम श्रीकृष्ण के श्रीमुख से कही गीता और
अनुगीता का नियमित पठन-पाठन क्यों नहीं करते? ये ग्रंथ ईंट-गारे के बने म्युजियम
में रखाने की चीजें नहीं, मन-बुद्धि-मस्तिस्क के संग्रहालय में संग्रहित होने वाली
चीजें हैं.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
39.
चिठिया हो तो हर कोई बांचे.
( गोवर्धन यादव )
चिठ्ठी-पत्री का जमाना
बीते अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. एक समय वह था, जब हमें चिठ्ठियों का बड़ी बेसब्री
से इन्तजार हुआ करता था. घर-परिवार से यदि हफ़्ता-पंद्रह दिन के भीतर कोई पत्र नहीं
मिला, तो घबराहट बढ़ जाती थी. मन शंका-कुशंकाओं से भर उठता था. रह-रहकर उलटे-सीधे
विचार मन में उठने लगते थे. हर हमेशा हमारी नजरें पोस्टमैन को आता देखने के लिए
तरसने लगती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं होता. जब से हमने संचार-क्रांति के युग में प्रवेश
किया है, आज एक-दूसरे से जुड़ने के नये-नये उपकरण हमारे पास आ गए हैं. था वह कोई
जमाना, जब कालिदास ने मेघदूत के माध्यम से यक्ष का संदेश उसकी प्रियतमा तक
पहुँचाया था. अब जमाना ट्विटर का है, एसएमएस का है. पलक झपकते ही संदेशा दुनिया के
एक कोने से दूसरे कोने में पहुँच जाता है..आज दुनिया मुठ्ठी में है. सुदूर देश में
बैठा कोई बेटा, अब भारत के किसी गाँव में रह रहे अपने पिता से, ऐसे बात कर सकता
है, जैसे सामने बैठा हो. विज्ञान का यह खेल किसी करिश्में से कम नहीं है. सदियों पुरानी कल्पनाओं को आज हम साकार होते
देख रहे हैं.. पर इस “मिलन” में वह ऊष्मा है क्या, जो पांच पैसे के पोस्टकार्ड को
हाथ में लेकर महसूस की जाती थी?. संवेदना की इस मीठी-सी छुअन का अहसास हाथों से
फ़िसलते जाना, शायद मेरी पीढ़ी को हो,लेकिन अगली पीढ़ी को जिसने उस “छुअन” को कभी
महसूस तक न किया हो, तो उसका अभाव उन्हें खलेगा भी कैसे? खले भले ही नहीं, पर
वंचित तो जरुर रह जाएगी,इस अनुभव से.
घर के बाहर डाकिये की
साइकिल की घंटी का बजना या फ़िर “चिठ्ठी आयी है” वाले तीन शब्दों का गूंजना,जाने
कितनी-कितनी और कैसी-कैसी तरंगे मन में उठने लगती थीं. या फ़िर घर के मुंडेर पर बैठकर
किसी कौवे की कांव-कांव करके संदेश दे जाना, कभी किसी कबूतर का संदेश देकर “उस
पार” पहुंचाने का आग्रह करना,या फ़िर मेघदूत को दूत बनाकर संदेशा भेजना, ये
कल्पनाएं ही भीतर ही भीतर भावनाओं का ज्वार उठा जाती थीं. यादों के अंबार लग जाया
करते थे. अब ऐसा नहीं होता. पलक झपकते ही अनेक एसएमएस आपके स्क्रीन पर उभरने लगते
हैं. पर पिता की हाथ की लिखी कोई चिठ्ठी का होना, या फ़िर मां के हाथ से लिखी
चिठ्ठी का होना, कई-कई अहसासों को महसूसना होता था. चिठ्ठी मे लिखा हर एक अक्षर
शरीर में ऊषमा भर जाता था. पर अब ऐसा नहीं होता. चिठ्ठी लिखना अब सपना बन कर रह
गई है. अब शायद ही कोई भाग्यशाली मिलेगा, जिसे पत्र अब भी प्राप्त हो रहे हैं.
परम्परा की यह कल-कल कर
बहती नदी सूखती जा रही है. यदि यह कहा जाए कि वह लगभग सूख ही चुकी है, शायद ऐसा
कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. इन्हीं सब पीड़ाओं को सहते हुए मेरे स्व.मित्र नईम
की एक लंबी कविता के कुछ अंश...शीर्षक है-खतोकिताबत के मौसम फ़िर कब आएंगे?.
अमृता प्रीतम
चांद सूरज दो दवातें कलम ने डोबा लिया लिखतम
तमाम धरती पढ़तम तमाम धरती साईसदानों
दोस्तें! गोलियों,
बंदूकों,एटम बनाने से पहले इस खत को पढ़ लेना
नईम
चिठ्ठी-पत्री, खतोकिताबत के मौसम फ़िर
कब आएंगे?..
रब्बा जाने, सही इबादत के मौसम फ़िर
कब आएंगे?
गुलजार
बहुत दिन हो गए देखा नहीं ना खत मिला कोई बहुत
दिन हो गये सच्ची तेरी
आवाज के बौछार में भीगा नहीं हूं मै!
रघु यादव लिखते हैं-
भैया अगले हफ़्ते आना, घर से चिठ्ठी आई है थोड़े
से पैसे भिजवाना, घर से चिठ्ठी आई है.
भाभी को उलटी आती है,मां की
तबियत ठीक नहीं बापू
का चश्मा बनवाना है, घर से चिठ्ठी आई है.
वीर सक्सेना
पत्र तुम्हारा मिला, एक भी अक्षर नहीं लिखा समझ
गया मैं, जीवन में कितना सूनापन है.
काकेशियन कवि-काइसिन
कुलीव.
तुमसे भरा नहीं गया अपनी
नोट-बुक से फ़ाड़ा गया एक
नन्हा सा पन्ना भी जब
मैं, तुम्हें खुद लिखने बैठा हूं जगह
कभी पूरी नहीं पड़ती इसलिए मैं
अपने खत को खत्म करता हूं एक ऊष्मा भरे चुंबन से जो
डाक-टिकट के नीचे छिपा होता है.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
40.
दादा कैलाशचन्द्र पंत ( एक लाइट हाउस
की तरह हैं )
“हिन्दी की रक्षा
और सम्मान के लिए,
हमें अपनी संस्कृति पर हावी होते इण्डिया और भारत के अन्तर से लडना होगा. बिना लडॆ हम हिन्दी के
विकास की कल्पना नहीं कर सकते.”
“भारत के
पास वह आन्तरिक शक्ति है कि दुनिया की कोई भी सभ्यता या संस्कृति को नुकसान नहीं पहुँचा सकती”
“हिन्दी
को जन-जन की भाषा बनाने के लिए हम यहाँ से शुरुआत करें कि हम अपनी गाडिय़ों-अपने
घरों के नामपट्ट हिन्दी में लिखवाएँ और अपने हस्ताक्षर हिन्दी में करें”
शहर छिन्दवाडा में1903 में निर्मित ऎतिहासिक भवन” टाउन हाल” के
विशाल सभाग्रह में म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जिला इकाई छिन्दवाडा के
सदस्यों, जनसमुदाय,, तथा साहित्यकारों को “भूमण्डलीकरण व राष्ट्रभाषा की
चुनौतियाँ” विषय पर लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकार, लेखक, संपादक,पत्रकार,समाजसेवी,
चिन्तक,मनीषी तथा प्रखर वक्ता माननीय श्री कैलाशचन्द्र पंत(मंत्री-संचालक) ने
सम्बोधित करते हुए उक्त विचार व्यक्त किए. 28 अक्टूबर 2007 छिन्दवाडा जिले का वह ऎतिहासिक दिन था, जब “दादा” हिन्दी की मशाल थामे
भोपाल से चलकर यहाँ आए थे.
मंच पर वयोवृद्ध गीतकार
पंडित रामकुमार शर्मा, डा.वरदमूर्ति
मिश्र(एस.डी.एम), डा. कौशलकिशोर श्रीवास्तव, डा लक्ष्मीचंद तथा मैं स्वयं उपस्थित
था. समिति की ओर से उन्हें शाल ओढाकर,श्रीफ़ल भेंट देकर,सारस्वत सम्मान देकर नागरिक
अभिनन्दन किया गय़ा. दादा ने कवि मित्र ओमाप्रकाश”नयन” के काव्य संग्रह “ सच मानो
शकुन्तला” का विमोचन भी किया. दादा को सुनने के लिए जन सैलाब उमड पडा था. भीतर और
बाहर श्रोताओं की अच्छी-खासी भीड उमड आई थी. बावजूद इसके चारों ओर शान्ति व्याप्त
थी. आज भी मुझे उन क्षणॊं की याद आती है तो मैं आत्मविभोर हो जाता हूँ.
मेरा अपना मानना है कि
ऎसा सुयोग अनायास ही प्राप्त नहीं होता. निश्चित ही मैंने पुण्य अर्जित किए होंगे
कि आपका आशीर्वाद तथा सान्निध्य मुझे प्राप्त हुआ. उस दिन से लेकर आज तक मैं
हिन्दी के उन्नयन और संवर्धन के लिए पूरी ईमानदारी, पूरी निष्ठा तथा लगन से इस
दायित्व को निभाता आ रहा हूँ. यह कोई गर्वोक्ति नहीं है और न ही कोई दावा ही कर
रहा हूँ .इस सेतुबंध अभियान में मेरी भूमिका वीर हनुमान, नल-नील की सी है. बस मेरी
भूमिका उस छोटी सी गिलहरी के तरह है जो अपने शरीर को पानी में भिंगोती, रेत पर आकर
लेटती और शरीर पर चिपके रेत के कणॊं को लाकर समुद्र में छोड देती है.
“दादा” से मेरा पहला
परिचय और जुडाव किस तरह हुआ,यह एक दिलचस्प वाक्या है. मेरे एक हितैषी मित्र श्री
प्रमोद उपाध्याय ने मुझसे हिन्दी भवन में
आयोजित चौदहवीं पावस व्याख्यान माला (10-12.08.2007) में चलने का आग्रह किया. पावस व्याख्यान माला महीयसी महादेवी,
हजारीप्रसाद द्विवदी जी तथा हरिवंशराय बच्चन जी के जन्म शताब्दी पर केन्द्रीत थी..
मित्र प्रमोद उपाध्याय
जी ने मेरा परिचय दादा से करवाया. परिचय प्राप्त होने पर उन्होंने बडी ही संजीदगी
से मेरी ओर मुखातिब होकर कहा_”मुझे आपकी कुछ रचनाएं पढने को मिली थी. अच्छा लिखते
हैं आप.” बात को मोड देते हुए उन्होंने मुझसे पूछा-“ अभी आप किस संस्था से जुडॆ
हैं? मैंने कहा-“फ़िलहाल मैंने कोई संस्था की सदस्यता गृहण नहीं की है. जवाब सुनकर
उन्होंने कहा-“राष्ट्र भाषा प्रचार समिति का मुख्य उद्देश्य, हिन्दी का
प्रचार-प्रसार करना है और यह एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है. यदि आप हिन्दी की सेवा
करना चाहते हैं तो छिन्दवाडा में एक इकाई का गठन करें लोगों को जोडें और जन-जन तक
संस्था के मंतव्य को पहुँचाए.”
बातों को गंभीरता से
सुनते हुए मेरी नजरे उनके चेहरे पर केन्द्रीत थी. दिपदिपाता ओजमय चेहरा, होठॊं पर
तैरती मंद-मंद मुस्कान, आत्मविश्वास से लबरेज उनका हृदय आदि देखकर मैं भीतर ही
भीतर गदगद हो उठा था. अनुठे व्यक्तित्व के धनी, हिन्दी का एक कर्मठ सिपाही, हिन्दी
भवन का संचालक, वर्धा समिति का मंत्री, विख्यात साहित्यकार, सामाजसेवी, एक आला
दर्जे का संपादक, पत्रकार मुझसे रुबरु हो रहा था और मुझसे संस्था से जुडने का
आग्रह कर रहा था. मैंने सारी बाते सुन चुकने के बात वादा किया कि मैं शीघ्र ही
छिन्दवाडा में एक इकाई का गठन करुंगा और हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अपने आपको
समर्पित कर दूंगा.मेहनत रंग लाई और इस तरह राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की इकाई का
गठन हुआ.
समिति ने समय-समय पर कई
महत्वपूर्ण कार्यक्रम किए. मराठी बहुल क्षेत्र सौंसर में समिति कि शाखा खोली गई.
इसके बाद तामिया,मुलताई,बैतूल आदि स्थानों पर हिन्दी सेवियों की तलाश करते हुए
शाखाओं का प्रसार किया गया.
दादा पंत का जीवन वृत्त
26 अपैल 193 को महू(इन्दौर)
म.प्र. में जन्मे श्री पंतजी ने एम.ए.साहित्याचार्य तथा ,साहित्यरत्न में दीक्षित
होकर यूनियन थियोलाजिकल सेमीनरी इन्दौर(1957-59) मे
व्याख्याता, पंचायतराज प्रशिक्षण केन्द्र भोपाल(1963-71) के
प्राचार्य, विद्या भवन(एस,ई.टी.सी.) उदयपुर में प्रकाशन प्रमुख, दैनिक इन्दौर
समाचार(1972-77) के संवाददाता, सोशलिस्ट कांग्रेसमैन,दिल्ली(61-62), दैनिक
नवभारत,भोपाल(62),, दैनिक नवप्रभात,भोपाल(62-63),में सह-संपादक, मासिक “शिक्षा प्रदीप,भोपाल(63-64) साप्ताहिक जनधर्म,भोपाल(77-98), साप्ताहिक “दूरगामी
आब्जर्वर,इन्दौर( 2000-01) तथा हिन्दी भवन से प्रकाशित होने
वाली द्वैमासिक पत्रिका अक्षरा,भोपाल (2003 से अनवरत) संपादक
का प्रभार सम्हाले हुए हैं. अपनी बेबाक संपादकीय के लिए आपकी विशिष्ठ पहचान बन
चुकी है.
आपके व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र मूल्याकंन करते हुए,
देश के 18 विशिष्ठ मंचों द्वारा दादा का सम्मान किया जा चुका है. इसके अलावा .भारत सरकार के प्रतिनिधि के रुप
में आप फ़िलीपीन्स(76) नेपाल(87) इस्राइल(89)
इंडोनेशिया(92), पांचवे विश्व हिन्दी सम्मेलन में म.प्र.शासन
के प्रतिनिधि के रुप में ट्रिनिडाआड एवं टुबेगो(वेस्टैंडिज), लंदन के छटे
विश्वहिन्दी सम्मेलन में म.प्र.शासन की ओर से भागीदारी, अन्तरराष्ट्रीय रामायण
सम्मेलन ह्यूस्टन(यू.एस.ए) में भागीदारी, सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन सूरिनाम मे
प्रतिभागिता तथा मिस्र, जोर्डन,स्विट्जर्लैंड,
जर्मनी,फ़ांस,इटली,नीदरलैंड,सिंगापुर, नेपाल, और थाईलैंड की पर्यटन यात्राएं की है.
इतना व्यस्ततम जीवन जीते हुए दादा अब भी अनेको साहित्यिक
मंचॊं और अन्य सेवा संस्थानॊं में अपनी भागीदारी का निर्वहन कर रहे हैं.
(प्रकाशन)-
कौन किसका आदमी, धुँध के आर-पार, शब्द का विचार-पक्ष, शैलेश मटियानी:सृजन यात्रा: संपादन,
सत्ता,साहित्य और समाज,सांस्कृतिक धारा के हिन्दी रचनाकर आदि संग्रह और,
साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर करीब 800 आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं
हिन्दी भवन के निर्माण में आपका अथक
योगदान रहा है. इसके अलावा समिति का कार्यालय, वाचनालय, निवास के लिए दो विशाल
कक्षॊं का निर्माण भी दादा ने अपनी देखरेख में पूरे करवाए. वे यहीं नहीं रुके.
इसकेश बाद साहित्यकार निवास,जिसमें
लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकारों के नाम बारह सुसज्जित कमरे,जिसमे सारी सुविधाएं
उप्लब्ध है, का निर्माण कार्य करवाया. हिन्दी भवन के साथ ही यह निर्माण हिन्दी
साहित्य जगत के लिए अभूतपूर्व योगदान है.
हिन्दी भवन में पावस व्याख्यानमाला, बसंत व्याख्यानमाला एवं शरद व्याख्यानमाला
के अन्तर्गत दिए गए व्याख्यानों के दस्तावेजीकरण की नयी पहल की और उनका “संवाद और
हस्तक्षेप” एवं मंथन के नाम से प्रकाशन
प्रारम्भ किया. यह साहित्यिक संस्थाओं के लिए सर्वथा नयी परम्परा थी. वे स्वयं
प्रकाशक बने एवं युवा सहयोगियों के भी सम्पादन का अवसर दिया.
सन 2011 में अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे कर
चुके “दादा श्री कैलाशचन्द्र पंत “ का अमृत महोत्सव मनाए जाने के लिए हिन्दी भवन
समिति तथा नगर और नगर के बाहर की संस्थाओं ने निर्णय लिया तथा
उनकी स्मृतियों को अक्षुण्य बनाने के लिए एक स्मारिका के प्रकाशन का भी
निर्णय लिया गया. माधवराव सप्रे स्मृति समाचार संग्रहालय एवं शोध संस्थान की ओर से
डा.मंगला अनुजा जी ने प्रकाशन, का उत्तरदायित्व सभाला तथा डा.सुनीता खत्री, डा.सुषमा तिवारी ,डा,
प्रतिभा गुर्जर, तथा डा. ललिता त्रिपाठीजी
ने संपादक की भुमिका का निर्वह किया. आप सबने मिलकर इसके प्रकाशन-और साज-सजा के
लिए कडी मेहनत की और इस तरह 276 पृष्ठों का महान ग्रंथ “दादा
की स्मृति में प्रकाशित होकर आया.
रवीन्द्र भवन के मुक्ताकाश मंच पर, आयोजित इस भव्य समारोह में, प्रदेश के
मुख्य मंत्री श्रॊ.शिवराजजी चौहान , गृहमंत्री, संस्कृति मंत्री, खेल मंत्री,,
जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानान्द सरस्वती के निज सचित ,महापौर,सांसद,
तथा देश के कोने-कोने से पधारे लब्ध-प्रतिष्ठ
साहित्यकार, गणमान्य नागरिकों तथा विशाल जनसमूह की गरीमामय उपस्थिति के मध्य दादा
का नागरिक अभिनन्दन किया गया. देश की कई नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं ने भी
दादा को ,स्मृति चिन्ह भेंट किए. \
इस भव्य समारोह में मुझे जाने का अवसर प्राप्त हुआ था. एक व्यक्ति के सम्मान
के लिए प्रदेश के मुखिया सहित अनेक मंत्री, देश के कोने-कोने से पधारे
साहित्यकार,अनेक संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा विशाल जनसमूह की उपस्थिति को देखकर सहज
ही उस व्यक्ति की विराटता का अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कितना जनप्रिय है.
.चाणक्य ने एक जगह लिखा है-“प्रियभाषी का कोई शत्रु नहीं होता. यह वास्तविकता
है. जन-जन में संवाद शैली में गरिमा और मधुरता होनी चाहिए. शब्दों का अस्तित्व
सर्वाधिक प्रबल होता है.उनके अपने संस्कार होते हैं. शब्द एक उर्जा है. शब्द
ब्रह्म भी है. जिसने शब्द-ब्रह्म की उपासना की हो,जो जन-जन का प्रिय हो,उससे भला
किसकी शत्रुता हो सकती है.” ,
दादा के पास प्रेमभाव है, सेवा भाव है. सेवाभाव से सदा प्रेम ही उपजता है. यही
कारण है कि वे जन-प्रिय हैं. इसीलिए उनकी बातें ध्यान से सुनी जाती है. फ़िर वे एक
अच्छे नाविक की तरह है, जो अपने लोगों को साथ लेकर यात्रा करता है. उनका
मार्गदर्शन करता है. वे केवल मार्ग ही नहीं दिखलाते अपितु एक सच्चे हितैषी की
तरह-/एक बडॆ भाई की तरह पूरे समय साथ बने रहते हैं.
हेनरी फ़ोर्ड ने अपने वक्तव्य मे लिखा है-“ आपका सच्चा मित्र वही है,जो आपके
भीतर छिपे सर्वश्रेष्ठ को बाहर निकाले” सच है, जहां प्रतिभा चलती है,वही पथ बन
जाता है. और श्रेष्ठी जिस मार्ग से चलते हैं,लोग उसका अनुसरण करते हैं. यही
एकमात्र एक ऎसा कारण था कि लोग दादा के साथ पडॆ और धीरे-धीरे कारवां बनता चला गया.
मेरा अपना मानना है कि भौतिक उपलब्धियां प्राप्त करने और आध्यात्मिक
उपलब्धियां प्राप्त करने के अलग-अलग मार्ग हैं. आध्यात्मिक उर्जा प्राप्त करने के
लिए अपने आपको तपाना पडता है. स्वयं प्रकाशित होना होता है,तब कहीं जाकर आप दूसरों
का पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं.वेदों में ऋषियों ने आव्हान किया है कि –“हम निरन्तर
श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहें. प्रकाश को ग्रहण करें और प्रकाशवन हो जाएं”
दादा ने अपने आपको तपाया है और स्वयं प्रकाशित्र हुए है, और हमारा सबका पथ आलोकित
कर रहे हैं. सच माने में दादा एक विराट लाइट हाउस की तरह हैं
कवि दिनकर की जयन्ती पर, दक्षिण अफ़्रीका के जोहान्सबर्ग मे 9 वां विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. २२ सितम्बर से २४ सितम्बर तक चलने वाले इस तीन
दिनी सम्मेलन में, भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के हिन्दी प्रेमी उत्साह पूर्वक
शामिल होगे. राष्ट्र कवि दिनकरजी का यह जयंती वर्ष भी है. इस अवसर पर हिन्दी भवन
के संचालक, वर्धा समिति के मंत्री श्री
कैलाशचन्द्र पंतजी के समग्र अवदानों के देखते हुए उन्हें विश्व मंच पर सम्मानित किया गया.. 41.----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
जनकवि श्री बालकवि बैरागी. **
आलोचना की परवाह मत करो. संसार मे आलोचकों के स्मारक नहीं बनते. जो तना अपनी कोंपल का स्वागत नहीं करता, वह ठूंठ हो जाता
है** बालकवि -बैरागी
एक ऎसा मस्तमौला कवि, जो
बडी से बडी बात को, अपनी कविता में सहज और सरल ठंग से कह जाता हो, जिसे व्यक्त
करने में हम अपने आपको असमर्थ पाते हैं, जिसकी कविता में भारतीय ग्राम्य संस्कृति
की सोंधी-सोंधी गंध रची-बसी हो, जो लोगों के जुबान पर चढकर बोलती हो, एक ऐसा हाजिर
जवाबी कवि, जिसने गली-कूचों से चलते हुए, देश की सर्वोच्च संस्था,जिसे हम संसद के
नाम से जानते है,सफ़र तय किया हो, जिसे घमंड छू तक नहीं गया हो., जो खास होते हुए
भी आम हो, ऎसे जनकवि के लिए अतिरिक्त परिचय की दरकार नहीं होती. ऎसी ही एक अजीम
सख्सियत का नाम है-बालकवि बैरागी.
दस फ़रवरी सन उन्नीस सौ
इकतीस में, मनासा जिले की तहसील के रामपुर में जन्में दादा बालकवि, अपने बचपन से ही कविता रचते और उसे पूरी तनमयता के
साथ गाते थे. विक्रम विश्वविद्यालय से हिन्दी में आपने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की.
साहित्य में जितनी पकड आपकी रही,राजनीति में भी आप हमेशा अव्वल ही रहे. वे
मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे. दौरे में जहां भी जाते, अपने साहित्यकार मित्रों से मिलते और फ़िर जमकर काव्य-रस की
बरसात होती रहती राजनीति में उन्हें जितनी शोहरत मिली,मंचों पर भी उन्हें उतना ही
प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ. \
किसी शुभचिंतक ने इन्हीं बातों को लेकर उनसे प्रश्न किया तो
उन्होंने जवाब में कहा-“साहित्य मेरा धर्म है, और राजनीति मेरा कर्म”.
गहनता लिए हुए उनके इन्हीं शब्दों से, उनके व्यक्तित्व कॊ नापा जा सकता है.
मुझे कई बार दादा को
मंचॊं पर सुनने का मौका मिला है. उस समय पर होने वाले कवि-सम्मेलनॊं की आन-बान-शान
अलग ही होती थी.मंचों पर आलदर्जे के कविगण होते थे. श्रोताओं को साहित्य से भरपूर
रचनाएं सुनने को मिला करती थी. कवि-सम्मेलन तो अब भी हो रहे हैं,लेकिन उनमें केवल
चुटकुले ही सुनने को मिलते है. जब तक रचनाओं में साहित्य का पुट नहीं होगा,कोई भी
रचना सरस कैसे हो सकती है?.ग्राह्य कैसे हो सकती है?
आपके अब तक चार-पांच
काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं,-गौरव गीत, दरस दीवानी,दोदुका, भावी रक्षक देश
के आदि-आदि. “ मैं अपनी गंध नहीं बेचूंगा” काफ़ी लोकप्रिय कविता है, इस कविता से
सहज ही उनके आत्मगौरव को, देश के प्रति उनके समर्पण को देखा-समझा जा सकता है.
दादा ने मंचों पर गीत ही
नहीं पढे, अपितु फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे.” रेशमा और शेरा” का वह गीत ,कोई
भुलाए कैसे भूल सकता है. ” तू चन्दा....मैं चांदनी- तू तरुवर ..मैं शाख रे...तू
बादल ....मैं बिजुरी...तू पंछी.... मैं पांख रे....... लताजी की खनकदार आवाज, जयदेव का संगीत और दादा के बोल.
तीनॊं मिलकर एक ऎसा कोलाज रचते हैं,जिसमे श्रोता बंधा चला जाता है. ..गीत सुनते ही
लगता है जैसे आपके कानों में किसी ने मिश्री घोल कर डाल दी हो. इस गीत में मिठास
के साथ-साथ, एक तडफ़ है,,,एक दर्द है. गीत के बोल ही कुछ ऎसे हैं,जो आपको अन्य
लोक में ले जाते हैं..वसन्त देसाई की संगीत-रचना, दिलराज कौर की सुरीली आवाज मे
फ़िल्म” रानी और लालपरी का गीत “ अम्मी को चुम्मी....पप्पा को प्यार” वाला गीत हो,
अथवा संगीतकार (आशा भॊंसले के सुपुत्र) हेमन्त भॊंसले की संगीत रचना में फ़िल्म
“जादू-टोना” का गीत हो, अथवा दो बूंद पानी, अनकही, वीर छत्रसाल, अच्छा बुरा के गीत
हो, दादा की शब्दरचना आपको मंत्र मुग्ध कर देने में सक्षम है. सन १९८४ में
“अनकही”फ़िल्म का गाना---“मुझको भी राधा बना ले नंदलाल,”सुनते ही बनता है.
दादा को जब भी सुना,
मंचों पर सुना. कभी ऎसा मौका नहीं आया,जब उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात अथवा बातचीत हुई
हो.
जुलाई 2008 के अंत में मेरा दूसरा कहानी संग्रह
“तीस बरस घाटी” वैभव प्रकाशन रायपुर से प्रकाशित होकर आया. राष्ट्रभाषा प्रचार
समिति भोपाल में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली पावस व्याख्यानमाला के निमंत्रण पत्र
आदि छापे जा चुके थे, और मैं चाहता था कि इस पावन अवसर में मेरे संग्रह का विमोचन
हो जाना चाहिए. मैंने अपनी समस्या से माननीय पंतजी को अवगत कराया और अपनी मंशा
जाहिर की. दादा पंतजी ने मुझसे कहा कि संग्रह की कम से कम दस प्रतियाँ लेकर आप आ
जाना. उसका विमोचन हो जाएगा. दादा का आश्वासन पाकर मैं प्रसन्न था, लेकिन इस बात
को लेकर चिंतित भी था कि विमोचन किन महापुरुष के हस्ते विमोचित होगा?
तृतीय विमश सत्र के
विषय-शती स्मृति-राष्ट्रीय उर्जा के कवि रामधारी सिंह “दिनकर” पर अपना वक्तव्य
देने के लिए मंच पर श्री अनिरुद्ध उमट, डा. श्री कृष्णचन्द्र गोस्वामी, श्री
बी.बी.कुमार, श्री केशव “प्रथमवीर”, डा.श्रीराम पारिहार, श्री शंभुनाथ, श्री
अरुणेश नीरन और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे हमारे दादा श्री बालकवि
बैरागीजी. इसी सत्र में मेरे संग्रह का विमोचन होना था. सत्र शुरु होने से पहले
सारी औपचारिकता पूरी कर ली गई थी.
(कहानी संग्रह “तीस बरस घाटी” को
विमोचित करते बैरागीजी तथा अन्य सदस्य) मैं
रोमांचित था. वह दुर्लभ क्षण नजदीक आता जा
रहा था और वह समय भी आया,जब दादा ने उसे विमोचित किया. मेरे लिए यह प्रथम अवसर था
जब मैं दादा से रुबरु हो रहा था. उसके बाद से नजदीकियां बढी और अब कम से कम माह मे
एक अथवा दो बार दादा से फ़ोन पर वार्ता हो जाती है.
इस कार्यक्रम के काफ़ी
समय पश्चात मुझे नाथद्वारा जाने का अवसर प्राप्त हुआ. नाथद्वारा मे स्थित
साहित्यिक मंच”साहित्य-मण्डल नाथद्वारा” द्वारा मुझे सम्मानीत किया जाना था. मैं
अपने मित्र मुलताई निवासी श्री विष्णु मंगरुलकर जी के साथ यात्रा कर रहा था.
यात्रा का सारा कार्यक्रम इटारसी आने के पहले ही गडबडा गया. संयोग यह बना कि मुझे
भोपाल रात्रि विश्राम करना पडा. आगे की यात्रा में रतलाम रुकना पडा. फ़िर अगली सुबह
छः बजे की ट्रेन से आगे की यात्रा करनी पडी. रास्ते में “मनासा” स्टेशन पडा. दादा
की याद हो आयी. दरअसल वहाँ रुकने का कार्यक्रम पहले से ही तय था, लेकिन समय साथ
नहीं दे रहा था. वैसे ही हम एक दिन देरी से चल रहे थे, और हमें अभी आगे सफ़र जल्दी
तै करना था. स्टेशन से दादा को फ़ोन लगाया और अपने नाथद्वारा जाने का प्रयोजन
बतलाया. मेरा मन्तव्य सुनने के बाद उन्होंने कहा-“गोवर्धन भाई, समय मिले तो जरुर
आना”. उन्होंने बडी ही आत्मीयता के साथ मुझे अपने गांव आने का निमंत्रण दिया
था,लेकिन चाहकर भी हम मनासा रुक नहीं सकते थे. मुझे विश्वास है कि वह समय एक दिन
जरुर आएगा,जब हम दादा के गांव में होंगे. उनके साथ.....अपने साथियों के साथ.
तीन दिनी (22 सितम्बर
से 24 सितम्बर 2012) नौवां विश्व
हिन्दी सम्मेलन जोहान्सबर्ग-दक्षिण अफ़्रीका मे शुरु होने जा रहा है. माननीय दादा
श्री बैरागीजी, इस ऎतिहासिक अवसर पर सम्मानीत होने जा रहे हैं. दक्षिण अफ़्रीका में
गांधी के नाम से विख्यात श्री नेलसन मंडेला के हस्ते आपको सम्मानित किया जाएगा.
मैं अपने परिवार की ओर
से, मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जिला इकाई छिन्दवाडा के समस्त
पदाधिकारियों-सदस्यों तथा जिले में कार्यरत सभी साहित्यिक संस्थाओं की ओर से आपको
कोटिशः बधाइयां और शुभकामनाएं देता हूँ.
अपनी उम्र के अस्सीवें
पडाव पर, दादा आज भी उतने ही सक्रीय हैं,जितने वे पहले रहे हैं.. परमपिता परमेश्वर
से प्रार्थणा है कि वे दीर्घायु प्राप्त करें और देश की सेवा के साथ-साथ, साहित्य
सृजन करते रहें और गीतों के नायाब मोतियों की अनुपम सौगातें, हमें देते रहें.//आमीन//
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
42. ये आकाशवाणी है....
बात बीते दिनो की...
बात बीते दिनों की है, जब मैंने
अपनी पहली तन्खवाह से जबलपुर के अन्धेरदेव की किसी दुकान से दो बैण्ड वाला मरफ़ी का
ट्रांजिस्टर खरीदा था. उस समय में प्रसारित होने वाली अन्य कार्यक्रमों के अलावा
मुझे समाचार सुनना भी रुचिकर लगता था. समाचार सुनने का शौक आज भी बरकरार है.
समाचारों से अवगत होना, माने अपने आपको अपडॆट रखना होता है. सुबह के आठ बजने से
एकाध मिनट पहले उद्घोषणा होती है कि आप “थोड़ी देर में समाचार सुनिए.”. फ़िर एक बीप
सुनाई देती है. इस बीप के माने है कि देश के सभी रेडियो स्टेशन आपस में जुडने जा
रहे है. जैसे ही सभी स्टेशन आपस में जुड़ जाते, उद्घोषक कहता है..ये आकाशवाणी है,
अब आप देवकीनंदन पांडॆ से समाचार सुनिए. समाचार वाचक की खनकदार आवाज सुनकर आपका
सारा ध्यान रेडियो पर केन्द्रीत हो जाता है और आप पन्द्रह मिनट में देश-दुनियां के
सभी समाचारॊं से अवगत हो जाते, जबकि इन्हीं समाचारों को जानने के लिए आपको अखबार
के पन्ने पलटने पड़ते हैं. जरुरी नहीं कि अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरें एकदम
ताजा ही हों. दरअसल अखबारों में प्रकाशित खबरें, बीती रात तक की खबरें होती हैं,
जबकि रेडियो में प्रसारित होने वाली खबरे एकदम ताजा-तरीन और ज्यादा विश्वसनीय भी.
अखबार पढ़ने की प्रक्रिया में आपको अपना सारा ध्यान अखबार पर केन्द्रीत करना होता
है. आँखे खुली रखनी होती है. जबकि र्रेडियो सुनने में ये सब आपको करने की जरुरत
नहीं होती. दैनंदिन कार्यो को करते हुए भी आप समाचारों को सुन सकते हैं.
कल्पना कीजिए उन बीते दिनों की, जब
न तो रेडियो का आविष्कार हुआ था और न ही समाचर-पत्रों का प्रकाशन होता था. इतने
निर्दयस्त समय में आदमी, अपना समय कैसे गुजारता रहा होगा? कल्पना मात्र से ही आप
सिहर उठेंगे. अब कल्पना कीजिए, उस बेहद चमकीले क्षणॊं की, जब आदमी ने
पहली-पहल बार रेडियो पर संदेशा प्राप्त किया होगा. कितना खुश हुआ होगा आदमी...!
कितना आल्हदकारी दिन रहा होगा वह उसके लिए !. रेडियो का आना माने उसकी जिन्दगी में
जैसे बहार का आना हुआ.
कहते हैं न ! आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है. रेडियो के
विकास की कहानी अभी लिखी जानी बाकी थी. प्रयोग पर प्रयोग चल रहे थे. प्रक्रिया
आविष्कार से होकर गुजर रही थी. सैम्यूल एफ़.बी.मोर्स ने आखिर वह चमत्कार कर दिखाया और
उसने मोर्स-की से सूदूर बैठे लोगों तक बिना तार से जुड़े यंत्र से संदेशा भेजकर
दुनिया में तहलका मचा दिया.
इस क्रम को आगे बढ़ाने के लिए
मार्कोनी आए. 1895 के अंत में उन्होने 1.5 मील (2.4किमी.) के लिए रेडियो संकेत को सफ़लता से
संचारित कर दिखाया.
रेडियो शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा
के एक शब्द “रेडिंयस” से हुई है. रेडिंयस का अर्थ होता है-एक संकीर्ण किरण या
प्रकाश-पुंज, जो आकाश में इलैक्ट्रो मैगनेट तरंगों द्वारा फ़ैलती है. ये विद्युत
तरंगे संकेतों के रूप में सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का काम करती
है. पहली बार जर्मन भौतिक शास्त्री हेनरिच हर्ट्स ने 1886 में रेडियो तरंगो का सफ़ल प्रदर्शन किया. इसके बाद इटली के
गुगलियो ने रेडियो तरंगों के जरिए सफ़ल संचार करने में सफ़लता प्राप्त की थी.
भारत में पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ़
विभाग ने सन 1923 में मुंबई से संगीत कार्यक्रम का
प्रसारण किया. इसके बाद भारत सहित अनेक देश जैसे-कनाड़ा, ब्राजील, फ़्रांस, इटली आदि
में प्रसारण को बढ़ावा मिला और विश्व भर में सैकड़ों प्रसारण केन्द्रों की स्थापना
की गई.
ब्रिटिश राज के दौरान नवम्बर 1923 में रेडियो क्लब आफ़ बंगाल, 1924 में
बंबई प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब और मद्रास सहित अन्य रेडियो क्लब द्वारा प्रसारण
शुरु हुआ. 23 जुलाई 19२7 को इंडियन ब्राडकास्टिंग कम्पनी लिमि. को दो
रेडियो स्टेशन संचारित करने के लिए अधिकृत किया गया. प्रसारण का दायरा बढ़ाने के
लिए उद्योग और श्रम विभाग ने इसका नाम “इंडियन स्टेट ब्राडकास्तिंग सर्विस (
भारतीय राज्य प्रसारण सेवाएं) कर दिया. 1934 में सरकार ने
दिल्ली में रेडियो स्टेशन की स्थापना की स्वीकृति प्रदान की.8 जून 1936 को
आईएसबीएस का नाम बदलकर “आल इंडिया रेडियो” रखा गया. इसी वर्ष दिल्ली केन्द्र से
प्रसारण शुरु हुआ.
आकाशवाणी, भारत सरकार के सूचना एवं
प्रसारण मंत्रालय द्वारा संचालित होता है. भारत में पहली बार रेडियो प्रसारण की
शुरुआत मुंबई और कलकत्ता में सन 1927 में हुई थी. 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम “भारतीय प्रसारण सेवा “ ( INDIAN
BRODCASTING CORPORATION) रखा गया था. सन 1957
में इस नाम को बदलकर “आकाशवाणी” रखा गया. कई भाषाओं में तथा विभिन्न क्षेत्रों में
कार्यरत “आकाशवाणी” आज जन-जन की वाणी बन चुकी है. विविध भारती, आकाशवाणी की सबसे
लोकप्रिय सेवा है. इसे विज्ञान प्रसारण सेवा भी कहा जाता है. आकाशवाणी का प्रमुख
उद्देश्य “लोक-कल्याण” ही है. अतः इसका ध्येय वाक्य प्रचलन में
आया-“बहुजनसुखाय-बहुजनहिताय”. आज वह इसी प्रमुख ध्येय को लेकर चल रहा है.
विविध-भारती
विविध-भारती रेडियो चैनल आकाशवाणी की सबसे लोकप्रिय और
सर्वाधिक सुनी जाने वाली प्रमुख प्रसारण सेवा है, इसकी शुरुआत 3 अक्टूबर 1957 को की
गई थी. आज इस चैनल से साठ बरस का सफ़र तय कर लिया है. प्रसारण के इतिहास में यह एक
खास घटना है. इसकी स्थापना के पीछे बड़ा ही दिलचस्प वाक्या है. उस समय रेडियो सिलोन
का बोलबाला था. एक से बढ़कर एक गीत इस चैनल के माध्यम से प्रसारित हो रहे थे. अमीन
सयानी के खनकदार आवाज और गीत प्रस्तुत करने के कौशल से यह चैनल सर्वाधिक सुने जाने
वाला चैनल बन गया था. यह वह समय था जब भारतीय कम्पनियां अपने उत्पाद की बिक्री के
लिए रेडियो का सहारा ले रही थीं. इस तरह देश का पैसा बाहर जाने लगा था. अपना पैसा
किस तरह बचाया जाय, इस परिकल्पना को साकार करने के लिए पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को
फ़िल्मी लेखन के लिए बतौर एक अधिकारी बुलाया, तब उन्होंने अंग्रेजी के शब्द
“मिस्लेनियस” को एक नया हिन्दी शन्द दिया “ विविध”.
इसी विविध को भारती से जोड़कर एक नया शब्द बना “विविध-भारती, जो अत्यन्त ही
लोकप्रिय हुआ. इसकी स्थापना के पीछे एक दूसरी वजह यह भी थी और वह यह कि भारत सरकार
का ऐसा सोचना था कि फ़िल्मी गीतों को सुनकर लोग बिगड़ने लगे हैं. फ़िल्मी गीतों पर
प्रतिबंध लगाने के बाद केवल इस चैनल पर सुगम संगीत ही प्रसारित किया जा रहा था.
हालांकि इस अभिमत का कोई ठोस कारण नहीं था. यह मात्र कोरी कल्पना थी, जो बाद में
निर्मूल साबित हुई.
विविध-भारती की स्थापना के पीछे केशव पांडॆजी, नरेन्द्र
शर्माजी, गोपालदास जी और गिरिजा कुमार माथुर को कैसे विस्मृत किया जा सकता है.
विविध-भारती, आकाशवाणी की शुद्ध रुप से “अखिल भारतीय मनोरंजन सेवा” थी. वहीं
आकाशवाणी के पंचरंगी कार्यक्रम का अर्थ था- पांच कलाओं का समावेश होना. 3 अक्टूबर 1957 को
विविध-भारती का आगाज शील कुमार शर्मा जी की आवाज में हुआ था -“यह विविध भारती
है, आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम”. “लोगों की जुबान पर चढ़ चुका था.-
“विविध-भारती पर मुख्यतः हिन्दी फ़िल्मी गीत सुनाये जाते
है. इसके अलावा वार्ता, रेडियो वृतांत, नाटक, संगीत,साहित्य भारती, संस्कृत भारती,
चित्र भारती, विज्ञान भारती, युवा भारती सहित अंग्रेजी में हर महिने के चौथे
शुक्रवार को रात्रि के 10.00 बजे
राजधानी दिल्ली के राजधानी चैनल से प्रसारित किया जाता है. स्वास्थ्य और परिवार
कल्याण, महिलाओं के कार्यक्रम, बच्चों के कार्यक्रम सहित कृषि के विभिन्न पहलुओं
पर भी इसमें व्यापक चर्चाएं प्रसारित होती हैं.
हमारे देश में तकनीकी
रूप में तीन तरह के रेडियो प्रसारण काम करते हैं. मीडियम वेव, शार्ट वेव और एफ़.एम.
प्रसारण केंद्र. अपने नाम के अनुरूप इनके प्रसारणॊं की फ़्रीक्वेंसी भी अलग- अलग
होती है. रेडियो सेट को ट्यून करने के लिए उसकी फ़्रीक्वेंसी भी बतलाई जाती है.
मिडियम वेव की अपनी निश्चित सीमाएं हैं. जबकि एफ़.एम की अपनी. एफ़.एम अधिकतम पचास से
सत्तर किलो मीटर तक सुनाई देता है. आकाशवाणी और अन्य एफ़.एम.चैनलों में तरंगे
प्रसारित करने के लिए टावरों की जरुरत होती है. उपग्रह की भी इसमें मदद ली जाती
है.
एफ़.एम. रेडियो;-
यह एक प्रकार का रेडियो
प्रसारण ही है, जिसमें केरियर की आवृत्ति को प्रसारण ध्वनि के अनुसार माड्यूलेट
किया जाता है. इस प्रक्रिया को आवृत्ति माड्यूलेशन या आवृत्ति माड्यूलन कहते हैं.
इस प्रक्रिया द्वारा माड्यूलन कर जब रेडियो प्रसारण होता है- उसे एफ़.एम.
प्रसारण कहते हैं. इस वाहक का आयाम स्थिर बना रहता है और गुणवत्ता अधिक होती
है. इसी कारण आजकल एफ़.एम.के प्रसारण लोकप्रिय हो रहे हैं. आज रेडियो सुनना इतना
आसान और सुलभ हो गया है कि मोबाइल सेट में भी आप रेडियो सुन सकते हैं. जिस प्रकार
रेडियो के हार्डवेअर में परिवर्तन हुए हैं उसी प्रकार साफ़्टवेअर में भी
क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं. रेडियो और अधिक जन-उपयोगी होता जा रहा है. इसके
कारण रेडियो की स्वीकार्यता और मांग दोनों बढ़ गई है, कई चैनलों की भरमार हो गई है
और इसी के अनुरुप केन्द्रों की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है. इनकी बढ़ती
उपयोगिता के चलते ही सामुदायिक रेडियो, सेटेलाइट रेडियो, डिजिटल रेडियो तथा
इंटरनेट रेडियों आदि प्रचलन में आए.
भारत की आबादी के लगभग चालीस प्रतिशत के पास ही इंटरनेट
की सुविधा है, लेकिन वह हर जगह सही काम नहीं कर पाता. फ़िर गाँवों और कस्बों में
बिजली की समस्या है. लेकिन बैटरी से चलने वाला ट्रांजिस्टर रेडियो हर जगह और हर
वक्त चल सकता है. दूरदर्शन के डी.डी.भारती चैनल को छोड़कर किसी अन्य टीव्ही.चैनल पर
संगीत, विज्ञान, कृषि या साहित्य से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम प्रसारित नहीं किया
जाता. इसलिए हर संगीत प्रेमियों के लिए और विविध जानकारी प्राप्त करने के लिए
आकाशवाणी से बेहतर और कोई सेवा हो ही नहीं सकती है.
सबसे आसान, सबसे विश्वसनीय और कम खर्चे पर सुना जाने वाला
संचार का अगर कोई माध्यम है तो वह रेडियो संचार का माध्यम ही है, जहां श्रोताओं का
बहुत बड़ा वर्ग इससे जुड़ा हुआ है.
कुछ स्मरणीय बातें.
आकाशवाणी की लोकप्रियता को चार चांद लगाने में
साहित्यकारों का भी बड़ा योगदान रहा है. स्व.भगवती चरण वर्मा, पंडित प्रेम बरेलवी,
अशोक चक्रधर, रघुवीर सहाय, रमई काका, अमृतलाल नागर, भवानी प्रसाद मिश्र, जगदीश
चन्द्र माथुर, बालकृष्ण राव, भारतभूषन अग्रवाल, विष्णु प्रभाकर, सुमित्रा नन्दन
पंत, ममता कालिया, कमलेश्वर, आदि के नामों को कैसे विस्मृत किया जा सकता है.
विविध भारती के आगाज के
वक्त सबसे पहले-‘नाच रे मयूरा/ खोल कर सहस्न नयन/ देख सघन गगन-मगन/ देख सरस स्वप्न जो कि
आज हुआ पूरा’ गाना सबसे पहले बजाया गया था. इसे इस अवसर के
लिए विशेष रूप से पंडित नरेंद्र शर्मा ने लिखा था और अनिल विश्वास के संगीत
निर्देशन में मन्ना डे ने गाया था.
एक मनोरंजन रेडियो चैनल के रूप में
विविध भारती ने न केवल मुस्तैदी से अपनी भूमिका निभाई, बल्कि
साहित्य, शास्त्रीय संगीत, नाटक,
सिनेमा और फिल्म संगीत से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण बातों का
दस्तावेजीकरण भी किया गया है..
सुमित्रानंदन पंत, महादेवी
वर्मा, हरिवंश राय बच्चन जी से लेकर आज के जमाने के कवियों
तक…उर्दू अदब में अली सरदार जाफरी, इस्मत
चुगताई से लेकर शहरयार तक… शास्त्रीय संगीत में पंडित डीवी
पलुस्कर और भीमसेन जोशी से लेकर आज के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों तक. इसी तरह सिनेमा
में अशोक कुमार और लीला नायडू से लेकर शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा तक सभी नामी
हस्तियों की आवाजें विविध भारती के संग्रहालय में सुरक्षित हैं.
संगीत के दीवानों को विविध भारती पर
ही नौशाद से लेकर ओपी नैयर,
शंकर जयकिशन, सी.रामचंद्र, रोशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल,कल्याणजी-आनंदजी….इतने नाम हैं जिन्हें गिनाते-गिनाते थक जाएं.
इन सभी के साक्षात्कार विविध भारती
से ही सुनने को मिले हैं. कौन से गाने कैसे बने, रिकॉर्डिंग के समय कौन-कौन
सी घटनाएं हुईं. कौन से राग पर बने, शूटिंग के दौरान का
किस्सा क्या है… समझ लीजिए कि विविध भारती ने आधी सदी से
ज्यादा वक्त में बड़ी लगन के साथ एक ‘ध्वनि-महाग्रंथ’ तैयार किया है
रेडियो जगत के लिए यह गौरव का विषय था जब युनेस्को ने
अपनी 36 वीं महासभा में, रेडियो कैसे हमारे जीवन
को एक नया आयाम देने में मददगार सकता है इस परिकल्पना के साथ वर्ष 2011 में 13 फ़रवरी को “विश्व रेडियो दिवस” के रूप में
मनाने की घोषणा की. पहली बार विश्व रेडियो दिवस आधिकारिक रूप में वर्ष 2012 में मनाया गया. 13 फ़रवरी युनेस्को के लिए इसलिए भी
महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र के
पहले रेडियो स्टेशन की स्थापना का दिन भी यही था. तब से युनेस्को प्रतिवर्ष
संगठनों और समुदायों के साथ मिलकर विभिन्न गतिविधियों द्वारा विश्व रेडियो दिवस
मनाता है. रेडियो दिवस पर एक विषय का निर्धारण होता है.
इस वर्ष “रेडियो और खेल” विषय के अन्तर्गत आयोजन किए
जायेंगे. इस आयोजन में संबंधित निकायों और संगठनों द्वारा सूचना, मनोरंजन, चर्चाओं
आदि के माध्यम से लोगों को जोड़ने के लिए. “रेडियो और खेल” विषय रखा गया है. इसमें
पारंपरिक और जमीनी स्तर पर खेलों की विविधता बढ़ाने और खेलों से लोगों को जोड़ना
जैसे उद्देश्य शामिल है. साथ ही खेलों के माध्यम से विश्व-शांति और विकास के
पहलुओं पर फ़ोकस करना भी इस विषय का उद्देश्य है.
हम इस बात को गर्व के साथ कह सकते हैं कि रेडियो शुरु से
ही जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों में हमारे लिए उपयोगी और लाभकारी रहा है तथा
सभ्यता-संस्कृति तथा ज्ञान-विज्ञान और कलाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका का
निर्वहन करते हुए समाज के लिए वरदान साबित हुआ है.
43,

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
43.
आसमान में उडती परियां.
बच्चों, आपने
कभी आसमान में उडती हुई परियों को देखा है?
प्रश्न सुनते ही आप कह
उठेंगे कि परियां-वरियां नाम की कोई चीज होती ही नहीं है. या फ़िर यह कहेंगे कि
किसी सीरियल में, हमने
उसे आसमान से उतरते देखा है. उसके हाथ में एक जादू की छडी होती है और वह पलक झपकते
ही कहानी के हीरो की मदद करती है, अथवा उसके लिए कोई उपहार लेकर आती है. वह
मुस्कुराते हुए प्रकट है और फ़िर गायब भी हो जाती है.
यह बात सच है कि अब तक
कोई परी देखी नहीं गई है. परी होने की कल्पना भर की गई है. मेरा अपना मत है कि
आकाश में उडती सुन्दर सी किसी तितली को देखकर, परी होने की कल्पना की गई होगी.
हम जिस परी की बात करने
जा रहे हैं, वह किसी खूबसूरत परी से कम नहीं है. उस परी का नाम है-रंग-बिरंगी
तितलियाँ. ये तितलियां, हवा में बलखाती-उडती हुई कभी इस डाल पर, तो कभी उस डाल पर,
खिले सुवासित फ़ूलों पर जा बैठती है और उसका रस पीकर उड जाती है.
वातावरण में लगातार आ
रहे बदलाव तथा कीटनाशक दवाओं के प्रयोग के चलते यह खूबसूरत जीव दुनिया के पटल से
लगभग गायब हो रहा है. अन्यथा बारिश की पहली फ़ुवार के साथ, आप अनेक प्रकार की
रंगबिरंगी तितलियों को, हवा में तैरती देख सकते थे. खैर न अब वे दिन है और न
तितलियां. पर जो भी है, वे गजब की हैं. हवा में मटकते इन जीवों के पंखों से तो
नजरें हटाये नहीं हटती. बडा गजब का चुंबकीय आकर्षण होता है इनके परों में. प्रकृति
ने पूरे मनोयोग से -,बडॆ सलीके से, धैर्यपूर्वक इनके पंखों पर चित्रकारी की है
.उनके पंखों पर कहीं एक-एक आँख बनी है, तो कहीं दो या फ़िर इससे भी ज्यादा.
तितलियों के परों पर बनी
इन्हीं आँखों के आधार पर इनके नाम रखे गए हैं.
केसरिया रंग की तितली पर बनी, दो
बडी-बडी आँखें देखकर उसको नाम दे दिया गया- पीकाक पेंसी, नीली तितली को नाम दिया
गया “ब्लू पेंसी,”, किसी को कामन लाइम, किसी को टेल्ड या काली तितली को कामन-क्रो
आदि-आदि. हजारों प्रकार की तितलियां पाई जाती है, जिनके नाम रखने में कई परेशानियां खडी हो सकती है. तितलियों का
नामकरण शायद हमने नहीं किया. जो भी नाम मिलते हैं,वे सब अंग्रेजी में ही मिलते
हैं. स्पस्ट है कि हमने कभी भी इस बात को लेकर गंभीरता से नहीं सोचा. बस तितली
देखकर खुश होते रहे, जबकि पश्चिम के लोगों ने,इन नन्हे जीवों के प्रति अपनी
दिलचस्पी दिखलायी, उनके जीवन-चक्र के बारे में पूरी जानकारियां इकठ्ठी की, इनके
नाम रखे और इनके संरक्षण के लिए उपाय खोजे और उनके संग्रहालय तक बना डाले.
फ़्लोरिडा म्युजियम के नाम से विख्यात एक संग्रहालय है. इसके साथ ही इंगलैंड सहित
करीब बत्तीस देशों ने इस नन्हें जीवों के लिए वर्षावन आदि बनाए,जहां यह जीव
पलता-बढता और अंत में म्युजियम में सुरक्षित रख दिया जाता है.
यहां हम कुछ तितलियों के बारे में, उनके
जीवन चक्र के बारे में संक्षिप्त में जानकारी हासिल करते चलें.
तितली जिसे हम अंग्रेजी
में बटरफ़्लाई कहते है, कीट वर्ग का सामान्य सा प्राणी है. यह सब जगह पाया जाता है.
ठोस आहार न लेकर यह फ़ूलॊं का रस पीती है. इनका दिमाक अन्य कीटॊं से ज्यादा तेज गति
से चलता है. कोस्टारिका में तेरह सौ प्रकार की तितलियां पाई गई है. विश्व में सबसे
तेज गति से उडने वाली तितली का नाम”मोनार्क” है, जो एक घंटॆ में सतरह मील तक उड
सकती है. सबसे बडी तितली “जायंट वर्डविंग” है. इसके पंखों का फ़ैलाव करीब बारह इंच
होता है.
तितली के शरीर के मुख्य तीन भाग होते हैं. (१) सिर
(२) वक्ष (३) और तीसरा दो जोडी पंख. इनके छः पैर होते है. प्रत्येक पैर में तीन
जोड होते है, सिर पर दो जोडी आँख, मुँह में घडी की स्प्रिंग की तरह “प्रोवोसिस”
नामक खोखली सूंडनुमा जीभ होती है. फ़ूलों पर बैठकर ये इसी से फ़ूलों का रस चूसकर
पीती है. इनका जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता है. यह एक लिंगी प्राणी है. नर और मादा
अलग-अलग होते हैं. मादा पितली पत्तॊं के नीचे अपने अंडॆ देती है. कुछ समय बाद ये
लार्वा ( कैटर्पिलर)में बदल जाते है. कुछ समय पश्चात लार्वा एक खोल के रुप मे बदल
जाता है जिसे “प्यूमा” कहा जाता है. और अन्त में यह तितली के रुप में ढलकर आसमान
में उडने लगती हैं.
ऊपर दिए गए चित्र के
माध्यम से हम इसके शरीर के विभिन्न अंगों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती
है.
तितलियां विश्व के सभी भागों में पाई जाती है. चाहे वे
गर्म,ठंडॆ, उष्णकटिबंध,ज्यादा बारिश वाले इलाके हो,इन्हें आप हर जगह देख सकते है.
सारी तितलियां “लेपिडॊप्टेरा “(Lepidoptera)नामक वर्ग से होती है. यह एक ग्रीक शब्द है. “लेपिडोस”(lepidos) का अर्थ है स्कल्स और पिटेरा(ptera) का मतलब है
उनके “पंख” यह बहुत बडा वर्ग है और इसमे कई प्रकार की तितलियां पायी जाती है.इनके
पन्द्र्दह हजार से ज्यादा प्रकार पूरे विश्व में पाए जाते है. आइये, आज हम कुछ
विशेष तितलियों के बारे में संक्षिप्त में जानकारियां हासिल करते हैं.
मोनार्क तितली- मोनार्क
तितलियां अलग-अलग रंगो में तथा अनेक आकारों में पायी जाती हैं .लेकिन
संतरे के रंग तथा काले रंग की तितलियां देखने में अत्यन्त ही सुन्दर होती हैं.
मादा तितली के पंख गहरे रंग के होते है, जबकि नर तितली के पंखॊं के बीच धारियां
देखी जाती है. इनके पंखों के आधार पर हम नर अथवा मादा तितली की पहचान कर सकते हैं.
मादा तितली एक पॆड पर सैकडॊं अंडॆ देती है. इसकी एक विशेषता यह भी है कि यह कई
कि.मी. तक की यात्रा बडॆ आराम से कर लेती है. आस्ट्रेलिया और उत्तरी अमेरिका के
समुद्र तटॊं पर यह बहुतायत से देखने को मिलती हैं.
तितलियां अपने पसंद के
मौसम के हिसाब से एक इलाके से दूसरे इलाके में स्वतः आती-जाती रहती है. यहां हम
कुछ विशेष तितलियों के बारे में जानकारी प्राप्त करते चलें.
अमेरिकन नाट बटरफ़्लाई-(aamerical snout butterfly)
( ( libytheana carinenta)
इस ग्रुप की इस तितली का रंग
काले०भूरे रंग का होता है,जिस पर सफ़ेद,संतरे के रंग अथवा गहरे हरे तथा पीले रंग की
धारियां होती है. यह उत्तरी तथा दक्षिण अमेरिका में पायी जाती है.
गार्डन टाइगर तितली-( garden tiger butterfly )( arctia caja)
इस ग्रुप की तितली है
यह. आपने शेर तो देखा ही है. कुदरत ने इस नन्हे से जीव को भी टायगर की शक्ल में
ढाल दिया है. जिस तरह शेर के शरीर पर पट्टॆ देखे जा सकते है. ठीक इसी तरह इस तितली
के पंखों पर सफ़ेद-भूरे पट्टे पाए जाते हैं. इन्हीं पट्टॊं को देखकर इसका नाम टाईगर
तितली पडा
. 
नीली तितली( blue morpho butterfaly)( marpho
Menelaus group
नीली तितली( blue morpho butterfaly)( marpho
Menelaus group).इसके चटक नीले रंग को देखकर ही इस तितली को “नीली
तितली” का नाम मिला. मादा तितली का रंग,
नर तितली के मुकाबले उताना आकर्षक नहीं होता.
तितली की सुन्दरता देखकर विस्मय होता है. जब यह किसी फ़ूल अतवा डाली पर
बैठता है तो इसके शरीर पर भूरे-नीले रंग के आकर्षक छल्ले दिखायी देते है.वेनेजुएला
तथा ब्राजिल के जंगलों में इसे बहुतायत में देखा जा सकता है.
(Julia
butterfly) जुलिया तितली-(fama Nymphalidae
group)
(Julia butterfly)
जुलिया तितली-(fama Nymphalidae group) पीले-नारंगी
रंग की इस तितली का नाम जुलिया रखा गया है.इसके पंखों की लंबाई तीन से चार इंच तक
होते हैं.इसके पंखों पर गहरी रेखाएं देखी जा सकती है,जो इसकी सुन्दरता में चार
चांद लगा देती है.
goliath
birdwing butterfly-गोलिआथ बर्डविंग तितली-(Ornithoptera
goliath group)
क्वीन अलिक्जंडर नामक
तितली से थोडी छोटी,मगर सबसे बडी तितली होने का रुतबा इस्स तितली को प्राप्त
है.काले-पीले-तथा हरे रंग की इस तितली के पंख 11इंच तक के होते है.इसके पंखों पर कुदरत ने बडॆ ही मनोहारी ढंग से रीगों का
संयोजन कर,इसे बेहद ही खूबसूरती दी है.वर्षा-वनों मे इसे देखा जा सकता है.
California
dogface butterfly-केलिफ़ोर्निया डागफ़ेस तितली-(
California dogface butterfly-केलिफ़ोर्निया डागफ़ेस तितली-(ornithoptera goliath group) इसके पंखों पर ध्यान दीजिए. देखकर लगता है कि कुदरत ने इस पर कुत्ते की
सूरत उकेरी है. काले-पीले रंग की इस तितली के उपरी पंखों पर सफ़ेद रंग से यह आकृति
दिखाई देती है.इसके पंख 22 से 31mm के
होते हैं
“‘ 
(Julia
butterfly) जुलिया तितली-(family Nymphalidae group)
( Julia butterfly) जुलिया तितली-(family Nymphalidae group) पीले-नारंगी रंग की इस तितली के
च्चार पंख होते है जो तीन से चार इंच लंबे होते है,जिस पर गहरे नारंगी लकीरें से
खींची दिखाई देती है.दक्षिणी तथा मध्य अमेरिका में इसे देखा जा सकता है . इस् तितली का सिर बडा होता है.इसे गंदी चीजों से रस प्राप्त करने में मजा
आता है.
Carner
blue butterfly-कार्नेर तितली ( Lycaeides Melissa samuelis
group) -
इस छॊटी नीले रंग की इस
तितली के पंखों के किनारी पर सफ़ेदी देखी जा सकती है,.दून नेशनल पार्क सहित
न्यूजर्सी,न्यूयार्क आदि जगहों पर इसे देखा जा सकता है. प्रसिद्ध उपन्यासकार Vladimir Nabokov ने इस तितली को यह नाम दिया
था. जुलाई और अगस्त माह के मध्य इसे देखा जा सकता है.
( Milbert’s tortoiseshell )
मिल्बर्ट्स टारटाइजशेल
तितली”-चार पंखों वाली इस तितली के पंख 1.6-2.5 इंच के होते हैं.उत्तर अमेरिका तथा मैक्सिको में यह पाई जाती है.सडे फ़लों
से यह रस प्राप्त करती है.गहरे भूरे रंग अथवा सुर्ख ला रंग के परों पर काले छल्ले
तथा सफ़ेद रंग इसके आकर्षण को बढा देते हैं. यह तितली Nymphalis milberti group के अन्तरगत आती है.
morning cloak butterfly- मार्निंग
क्लाक तितली;
--Nymphalis antiopa वर्ग की यह तितली मेरुन
रंग की होती है,जिस पर नीले रंग के छ्ल्ले बने होते है तथा पीले रंग की बार्डर
होती है. फ़ूलॊ के पराग तथा फ़लों का रस पीना इसे प्रिय है. यूरोप के कुछ भागों तथा
अमेरिका के गर्म प्रदेशों में यह देखी जाती है. यह तितली ( Nymphalis
antiopa Linnaeus group) के अन्तरगत आती है.
Painted lady butterfly
( pented lady butterfly ) पेंटॆड लेडी बटरर्फ़्लाई :-vanessa cardui वर्ग की इस
तितली की खूबसूरती देखते ही बनती है. गहरे भूरे तथा लाल रंग के परों पर सफ़ेद छल्ले
इसकी सुन्दरता में चार चांद लगा देते हैं. 2-2 .7/8 इंच(5.1-7.3 c.m)के इसके पंख होते हैं. आस्ट्रेलिया तथा अमेरिका के भूभागों में यह पाई
जाती है. ( Vanessa Cardui group)
( peacock butterfly ) पिकाक बटरफ़्लाय-( Inachisio
group) गहरे मेरुन रंग के
परों पर चार बड़ी-बड़ी आंखें देखी जा सकती है., ऊपर के दो पंखों पर सफ़ेद गोले तथा
नीचे के दो पंखों पर नीले गोले इसकी सुन्दरता बढा देते हैं.

postman butterfly (
Heliconius melpomene group)
saturn butterfly( Zeuxidia amethystus group)
Queen
alexandra’s butterfly Southern dogface
butterfly(Zeuxsidia amethystus group)

Red admiral butterfly ( Vanessa
ataalanta) summer azure butterfly( celestrina
neglecta)

tiger swallowtail butterfly( Papilio glaucas group) zewbra
swallowtail butterfly
Ulysses
butterfly( Papilio Ulysses) viceroy butterfly( Limenitis
archippus)
उपरोक्त तितलियों के अलावा पोस्ट्मन तितली,सदर्न डागफ़ेस तितली,रेड एडमाइरल
तितली, समर एज्योर तितली,टाईगर स्वालोटेल तितली,जेबरा स्वालोटेल तितली,युलिसेस
तितली तथा वायसराय तितली के केवल चित्र दिए जा रहे हैं. इन चित्रों के सहारे हम
तितलियों के रंग. उनकी बनावट आदि की जानकरियां प्राप्त कर सकते है.
आप देखेंगे कि सभी तितलियों के नाम अंग्रेजी भाषा में ही रखे गए हैं. विदेश
में हर छोटे-बडॆ कीट के संबंध में वे उससे जुडी हर बातों पर ध्यान देते हैं. उनकी
दैनिक जीवनी पर कडी नजर रखते हैं और उसके मुताबिक रिकार्ड रखते हैं.हम केवल
कीट-पतंगों को देखते भर हैं. न तो हमें इनकी चिंता ही होती है और न ही हम इनकी
जीवन-चर्या पर ही ध्यान दे पाते हैं. अतः अब हमारा उत्तरदायित्व बनता है कि हम कम
से कम इनके प्रति सकारात्मक रुझान रखें और उनके संरक्षण के प्रति जागरुक बनें.
प्रकृति ने कितने
ही प्यारे जीव-जंतु इस धरती पर भेजे हैं. कोई भी जीव ऎसा नहीं है,जो मनुष्यता के
विरुद्ध है, वे हमारे परम हितैषि भी होते हैं. बस हमें अपना नजरिया बदलने भर की
आवश्यकता है.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

44, आसमान में उडते
पक्षी अपनी उडान-गति का स्वयं निर्धारण करते हैं
बच्चों,
आसमान में उडते पक्षी
अपनी उडान की गति को स्वयं निर्धारित करते हैं. कहां कब, कितनी गति से उडान भरना
है, कहां उसमें कमी लाना है और किस गति से, किस दिशा में मुड जाना है आदि-आदि का
ध्यान रखते हैं. वैसे भी आसमान में कोई गतिरोध तो होता नहीं है और न ही कोई उसकी
सीमा. असीमित होता है आकाश. इस असीमित आकाश में उन्हें कब क्या करना है और क्या
नहीं करना है, इसकी जानकारी उन्हें प्रकृति के वरदान स्वरुप मिली हुई होती है.
एक उदाहरण से इसे समझा
जा सकता है. मान लीजिए कोई कार अपनी निर्धारित गति पचास किमी प्रति घंटा की रफ़्तार
से दौड रही है, जब वह कार किसी पक्षी से पन्द्रह मीटर दूर रह जाती है, तो वह
फ़ुर्ती से उडान भरता है. यदि वही कार 110 किमी की रफ़्तार से दौड रही हो तो वह 75 मीटर दूर
रहते ही उडान भर लेता है. इससे स्पष्ट है
कि पक्षी आती हुई कार की गति का नहीं बल्कि उस सडक पर निर्धारित गति सीमा के
अनुसार व्यवहार करता है. आखित यह कैसे होता है?
शोधकर्ताओं के अनुसार
पक्षी इन कारॊं को शिकारी समझता हैं जो द्रुतगति से उनके तरफ़ बढ रहा होता है जो
उनके लिए खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है. शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि मौसम का असर भी
इस बात पर पडता है कि पक्षी कार के कितने पास आने पर उड जाएंगे.?. आम तौर पर वसंत
के मौसम में वे कार को ज्यादा नजदीक आने देते हैं जबकि शरद ऋतु में वे ज्यादा
सावधानियां बरतते हैं. इसके पीछे दो प्रमुख कारण हो सकते हैं. पहला तो यह कि वसंत
ऋतु में पक्षी वैसे ही फ़ुर्तीला होता है और कार के पास आने तक बैठकर इंतजार कर
सकता है. दूसरा यह कि वसंत में सडकों पर बैठे ज्यादतर पक्षी जो अभी शिशु हैं और
हाल में ही उडना सीख रहे होते हैं, सडक के नियमों से परिचित हो रहे होते हैं. जो
भी हो, समय के अनुसार वे अपना व्यवहार परिस्थितियों के अनुसार ढालने में सक्षम
होते हैं.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
-
.




No comments:
Post a Comment