यात्रा समय
पातालकोट-जहाँ
धरती बांचती है आसमानी प्रेमपत्र.
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कितना अद्भुत है भारत,
सौंदर्य से भरा हुआ. प्रकृति और मानव निर्मित खूबसूरती का आगार. इसको देखना मानो
स्वयं को देखना है. चारो ओर इतनी हरियाली, इतने मौसम, इतना खिलता जीवन. नदियों का
गूँजता स्वर, पहाड़ियों का एकांत, समुद्र की पछाड़, रेगिस्तान में दमकता सूरज, घने
वन, दूर-दूर तक फ़ैले गाँवों में प्रकृति का अनूठा राग...फ़िर कितने ही मौसम...कितने
ही रंग और रूप बदलते आसमान के नीचे कितने ही रूपों में बसता, खिलता भारत का जीवन.
हमारे प्राचीन महाकाव्यों
में जो प्रकृति वर्णित है, वह मात्र कवियों की अतिश्योक्ति नहीं, वरन भारत का सच
है. कालीदास जी का मेघदूत हो या फ़िर ऋतुसंहार, व्यास जी का महाभारत हो या कि फ़िर
वाल्मीकि की रामायण, जिस भारत के वनों-पर्वतों-बस्तियों-नदियों की महागाथा कहते
नहीं अघाते, वह भारत में आज भी मौजूद है, उपस्थित है.
प्रकृति की हर धड़कन में
कुदरत के रचियता के श्रृंगारिक मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है. कितने किस्म के
तो हैं उत्सव,मौसमों की रंगत भी कुछ कम अनूठे नहीं.,. जाड़े में ठिठुरन, बारिश में
भींगना, गर्मी में दरख्तों की छांव, सबके सब मौसम कुछ न कुछ बयां करते हैं सच ही कहा है किसी ने--"प्रकृति की हर धड़कन
में एक अनूठे ज्ञान की पाठशाला समाई हुई है ". बस जरुरत है इस बात की कि हम
कुदरत की स्वभाविक उड़ान को, उसके योगदान को समझें-सराहें और पहचानें.
घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर
प्रकृति के अनूठे, अनछूये सौंदर्य के दर्शन करना, खिलखिलाते समय के कंधे पर हाथ
रखकर उसके साथ खिलखिलाना- मुस्कुराना- बातें करना, उछलती-कूदती, बल- खाती
झूमती नदियों का पहाड़ी गीत-संगीत सुनना, पहाड़ों के एकांत में खो जाना, घने जंगलों
में सरसरा -कर बहती अल्हड़ हवा के झोंकों के संग
झूमना-इठलाना, चिड़ियों का शोर सुनना और आकाश में चहचहाते, उड़ान भरते विहंगो को
निहारना, पहाड़ों की चोटियों से उछल-कूद मचाते, गीत गाते झरनों को धरती पर उतरते
हुए देखना और भी न जाने कितने ही रंग-रूप बदलते नीलाकाश के नीचे स्वछंदता के साथ
विचरना, दहाड़ते-उफ़नते सागर से बातें करना, आसमान से सरसरा कर बरसती अमृत-बूंदो में
सराबोर होकर अपने अंतरमन को भींगोना एक नये अहसास से भर देता है. दरअसल बारिश धरती
को लिखा एक प्रेम-पत्र ही तो है, ऐसे में अपने को भींगोने से डरना कैसा?
जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब
जीवन एकाकीपन के घिरने लगता है. जीवन से ऊब होने लगती है. मन छटपटाने लगता है, एक
अज्ञात भय मन के आंगन में घेरा डालकर बैठ जाता है. ऐसे विकट और कठिन समय में जीवन
नीरस जान पड़ने लगता है. जीवन अपना अर्थ खोने लगता है. जैसे ही आप अपने परिधि
(रेडियस) से बाहर निकलते हैं यात्रा पर,
अपने आपको एक नई दुनिया में पाते हैं. वहाँ का नयापन आपको अपने सम्मोहन के जाल में
बांधने लगता है. घर से बाहर निकलते ही आप
स्वयं भी बदलने लगते है. एक नया परिवर्तन अपने आप आने लगता है. नीरस जीवन
अपने आप रंगीन होने लगता है. अतः ऐसे नीरस जीवन को रसमय बनाने के लिए बहुत
जरुरी है "यात्रा" में निकल पड़ना.
यात्रा एक छोर से निकलकर दूसरे छोर तक
जाना नहीं है, बल्कि नित नूतन होते संसार में प्रवेश करना भी होता है. यात्रा का
तात्पर्य केवल समय नष्ट करना नहीं होता, बल्कि एक अपरिचित-अनचिन्हे संसार को
जानना-पहचाना भी होता है. यात्राएं केवल भौतिक ही नहीं होती, बल्कि बाहर से अन्दर
की ओर भी होती है. अंतरयात्रा से व्यक्ति अपनी आत्मा के बेहद करीब पहुँच जाता है.
मन की अतल गहराइयों के भीतर उतरकर, वह जीवन का
वास्तविक अर्थ खोजने लगता है. अपने आपको पहचाने लगता है और एक दिव्य प्रकाश
से नहा उठता है.
यात्रा एक मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक और
अध्यात्म से जुड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम भी है. जैसे ही हमारा आधिपत्य, मूल
प्रकृति पर होने लगता है, उसी क्षण से एक विलक्षण सृजनात्मकता का उदय होने लगता
है.
यात्रा के दरमियान जहाँ
नदियों-झीलों-नहरों और भूखंड में आईस-पाईस का खेल चल रहा हो, या यूं कहें जल-थल
समवेत कोई उत्सव मना रहे हों, अनंत तक पसरा सागर, सतत प्रवाहमयी दुनिया, अपने
अस्तित्व की मर्यादा में, परस्पर समर्पित. नदी-सागर की ऐसी जुगलबंदी जिसमें कोई
अतिक्रमण नहीं, एक दूसरे में आवाजाही दिखती है,वो भी सम पर, न कोई बेसुरा, न
बेताल. नहरे नदी में, नदियां झीलों में, अनेक संगम एक साथ. जल, थल, प्रकृति और
वातावरण में आपसी लेन-देन. मैं तुझमें समा जाऊँ, तूम मुझमें समा जाओ जैसा
एकात्मकबोध वाली. प्रकृति सिर्फ़ प्रकृति नही होती, वह हमें भी रचती है.
जीवन भी तो एक यात्रा ही है. एक योनि
से दूसरी योनि में जाने की यात्रा. जीवन की हर सांस जीवन- यात्रा ही तो है. बादलों
के संग रुत की यात्रा,माटी संग बीज की यात्रा. कुछ भी नहीं थमता, हर पल निज यात्रा
में. जीवन की इस यात्रा में कोई हमराह होता है, किसी से राहें जुदा होती हैं.
जिन्दगी के इस सफ़र में यह सब होता रहता है, आखिर सफ़र ही तो है यह. इन अहसासात की
अपनी यात्रा है.
स्वयं वक्त भी तो राही ही है. सुइयों
के पांव लगाकर समय हर पल चलता रहता है. यह सबसे पुरानी यात्री है. जैसे कोई साइकिल
हो, जिसके पैडल कभी सूरज लगाता है, तो कभी चांद. वो भी यात्री. सुबह-से रात इनके
पहिये घूमते ही रहते हैं.इनकी चाल में कोई फ़र्क नहीं पड़ता. सब चलते रहते हैं
अविराम. चलते रहे हैं अविराम. अथक. युगों-युगों के यात्री हैं ये.
पीछे छूटते स्टेशनों की तरह
पड़ाव-दर-पड़ाव गुजरते जाते हैं, जैसे कोई फ़िल्म की रील चल रही हो. फ़्रेम-दर-फ़्रेम
जिन्दगी के अमूल्य पल, चंद सेकेंड में यूं ही गुजर जाते हैं. पेड़ से बिछुड़कर गिरता
पत्ता भी यात्रा पर जाने को बाध्य है. जीवन में बिछुड़ते हर पल, भले ही फ़िर हाथ में
आ सकते हों, लेकिन अपनी यादें छोड़ जाते हैं. यात्राएं अनंत है और स्वपन भी. जीवन,
इंसान, स्मृतियां, अहसास, सृजन सब यात्रा में है.
थके मन और शिथिल देह के साथ उलझन से
घिरे जीवन में यकायक "यात्रा" करने का उत्साह जब झंकृत होने लगे तो
समझिए- "उत्सव का अवसर" आ गया है. नैराश्य पर मनुष्य की विजय का सबसे
बड़ा प्रमाण है-" उत्सव यात्रा". और यही जीत हासिल करने का उद्घोष भी है.
पुनर्नवा होने के लिए किए गए अद्भुत प्रयास की बानगी भी है और उल्लास-अभिव्यक्ति
की सुंदर छवि भी.
बदलते समय के साथ हम, मौसम से बिंधे मन
लिए फ़िरते है "यात्रा" में. हमारी आँखें निहारने लगती हैं ऋतुओं को और
मन उसके मुताबिक शब्दों के मोती चुन-चुनकर हार गूंथने लगता है. जैसे ऋतु- वैसा
मन- वैसे वचन.
प्रख्यात साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा
इसी मौसम से बंधकर कह उठते हैं- मस्ती से भरके जबकि हवा / सौरभ से
बरबस उलझ पड़ी / तब उलझ पड़ा मेरा सपना / कुछ नए-नए अरमानों से / गेंदा फ़ूला जब
बागों में / सरसों फ़ूली जब खेतों में / तब फ़ूल उठी सहस उमंग / मेरे मुरझाए प्राणों
में.// मुरझाए प्राणों को प्राणवान बनाने का सबसे सरल और कारगर उपाय
है-यात्रा पर निकल पड़ना.
इस विराट प्रकृति की वंदना
करते हुए मुझे बरबस ही श्री नरेश मेहता जी की कविता-" चरैवेती-जन-गरबा"
की याद हो आती है. वे लिखते हैं.(एक अंश)
चलते चलो, चलते
चलो,/सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो / नदियों ने चलकर ही सागर का रूप लिया / मेघों
ने चलकर ही धरती को गर्भ दिया / रुकने का मरण नाम / पीछे सब प्रस्तर है / आगे है
देवयान, युग के ही संग-संग चलते चलो //
मानव जिस ओर गया नगर
बसे, तीर्थ बने/ तुमसे है कौन बड़ा गगन-सिंधु मित्र बने / भूमा का भोगो सुख, नदियों
का सोम पियो / त्यागो सब जीर्ण वसन नूतन के संग-संग चलते चलो.//
कुदरत की इस स्वभाविक उड़ान
को समझने के लिए, पहचानने के लिए मैं निकल पड़ता हूँ प्रकृति की गोद में. घर और
गांव में रहकर मैं जितना खाली हो जाता हूँ, और जब लौटकर वापिस आता हूँ तो उतना ही
भरा-भरा महसूस करता हूँ, उतना ही मालामाल हो कर लौटता हूँ जैसे कोई राजा-महाराजा.
यात्रा
संस्मरण
जहाँ धरती बांचती है आसमानी प्रेमपत्र
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1. पातालकोट-धरती पर एक अजूबा
गगनचुंबी इमारतें, सडकों पर फ़र्राटे भरती रंग-बिरंगी-चमचमाती लक्जरी
कारें,मोटरगाडियां और न जाने कितने ही कल-कारखाने, पलक झपकते ही आसमान में उड जाने
वाले वायुयान, समुद्र की गहराइयों में तैरतीं पनडुब्बियाँ, बडॆ-बडॆ स्टीमर,-जहाज
आदि को देख कर आपके मन में तनिक भी कौतुहल नहीं होता. होना भी नहीं चाहिए,क्योंकि
आप उन्हें रोज देख रहे होते हैं,उनमे सफ़र
कर रहे होते हैं. यदि आपसे यह कहा जाय कि
इस धरती ने नीचे भी यदि कोई मानव बस्ती हो,जहाँ के आदिवासीजन हजारों-हजार साल
से अपनी आदिम संस्कृति और रीति-रिवाज को
लेकर जी रह रहे हों, जहाँ चारों ओर बीहड जंगल हों, जहाँ आवागमन के कोई साधन न हो,
जहाँ विषैले जीव जन्तु, हिंसक पशु खुले रुप में विचरण कर रहे हों, जहाँ दोपहर होने
पर ही सूरज की किरणें अन्दर झांक पाती हो, जहाँ हमेशा धुंध सी छाई रहती हो, चरती
भैंसॊं को देखने पर ऐसा प्रतीत है,जैसे कोई काला सा धब्बा चलता-फ़िरता दिखलाई देता
हो, सच मानिए ऐसी जगह पर मानव-बस्ती का होना एक गहरा आश्चर्य पैदा करता है.
जी हाँ, भारत का हृदय
कहलाने वाले मध्यप्रदेश के छिन्दवाडा जिले से 62 किमी. तथा तामिया विकास खंड से
महज 23 किमी.की दूरी पर स्थित “पातालकोट” को देखकर ऊपर लिखी सारी बातें देखी जा
सकती है. समुद्र् सतह से 3250 फ़ीट ऊँचाई पर तथा भूतल से 1200 से 1500 फ़ीट गराई में
यह कोट यानि “पातालकोट” स्थित है.
हमारे पुरा आख्यानों में “पातालकोट”
का जिक्र बार-बार आया है.”पाताल” कहते ही हमारे मानस-पटल पर ,एक दृष्य तेजी से
उभरता है. लंका नरेश रावण का एक भाई,जिसे अहिरावण के नाम से जाना जाता था, के बारे
में पढ चुके हैं कि वह पाताल में रहता था. राम-रावण युद्ध के समय उसने राम और
लक्ष्मण को सोता हुआ उठाकर पाताललोक ले गया था,और उनकी बलि चढाना चाहता था,ताकि
युद्ध हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए. इस बात का पता जैसे ही वीर हनुमान को
लगता है वे पाताललोक जा पहुँचते हैं. दोनों के बीच भयंकर युद्ध होता है,और अहिरावण
मारा जाता है.उसके मारे जाने पर हनुमान उन्हें पुनः युद्धभूमि पर ले आते हैं.
पाताल अर्थात अनन्त गहराई वाला स्थान. वैसे
तो हमारे धरती के नीचे सात तलॊं की कल्पना की गई है-अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल,
महातल,तथा महातल के नीचे पाताल.. शब्दकोष में कोट के भी कई अर्थ मिलते
हैं=जैसे-दुर्ग, गढ, प्राचीर, रंगमहल और अंग्रेजी ढंग का एक लिबास जिसे हम कोट
कहते है. यहाँ कोट का अर्थ है-चट्टानी दीवारें, दीवारे भी इतनी ऊँछी,की आदमी का
दर्प चूर-चूर हो जाए. कोट का एक अर्थ होता है-कनात. यदि आप पहाडी की तलहटी में खडॆ
हैं,तो लगता है जैसे कनातों से घिर गए हैं. कनात की मुंडॆर पर उगे पॆड-पौधे, हवा
मे हिचकोले खाती डालियाँ,,हाथ हिला-हिला कर कहती हैं कि हम कितने ऊपर है. यह कनात
कहीं-कहीं एक हजार दो सौ फ़ीट, कहीं एक हजार सात सौ पचास फ़ीट, तो कहीं खाइयों के
अंतःस्थल से तीन हजार सात सौ फ़ीट ऊँची है. उत्तर-पूर्व में बहती नदी की ओर यह कनाट
नीची होती चली जाती है. कभी-कभी तो यह गाय
के खुर की आकृति में दिखाई देती है.
पातालकोट का अंतःक्षेत्र
शिखरों और वादियों से आवृत है. पातालकोट में, प्रकृति के इन उपादानों ने, इसे
अद्वितीय बना दिया है. दक्षिण में पर्वतीय शिखर इतने ऊँचे होते चले गए हैं कि इनकी
ऊँचाई उत्तर-पश्चिम में फ़ैलकर इसकी सीमा बन जाती है. दूसरी ओर घाटियाँ इतनी नीची
होती चली गई है कि उसमें झांककर देखना मुश्किल होता है. यहाँ का अद्भुत नजारा
देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो शिखरों और वादियों के बीच होड सी लग गई हो. कौन
कितने गौरव के साथ ऊँचा हो जाता है और कौन
कितनी विनम्रता के साथ झुकता चला जाता है. इस बात के साक्षी हैं यहाँ पर ऊगे
पेड-पौधे,जो तलहटियों के गर्भ से, शिखरों की फ़ुनगियों तक बिना किसी भेदभाव के फ़ैले
हुए हैं.
पातालकोट की झुकी हुई
चट्टानों से निरन्तर पानी का रिसाव होता रहता है. यह पानी रिसता हुआ ऊँचें-ऊँचे आम
के वृक्षॊं के माथे पर टपकता है और फ़िर छितरते हुए बूंदॊं के रुप में खोह के आँगन
में गिरता रहता है. बारहमासी बरसात में भींगकर तन और मन पुलकित हो उठते है.
अपने इष्ट, देवों के
देव महादेव, इनके आराध्य देव हैं. इनके अलावा और भी कई देव हैं
जैसे-मढुआदेव,हरदुललाला, पनघर, ग्रामदेवी, खेडापति, भैंसासर, चंडीमाई, खेडामाई,
घुरलापाट, भीमसेनी, जोगनी, बाघदेवी, मेठोदेवी आदि को पूजते हुए अपनी आस्था की लौ
जलाए रहते हैं, वहीं अपनी आदिम संस्कृति, परम्पराओं ,रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों
मे गहरी आस्था लिए शान से अपना जीवन यापन करते हैं. ऐसा नहीं है कि यहां अभाव नहीं
है. अभाव ही अभाव है,लेकिन वे अपना रोना लेकर किसी के पास नहीं जाते और न ही किसी
से शिकवा-शिकायत ही करते हैं. बित्ते भर पेट के गढ्ढे को भरने के लिए वनोपज ही
इनका मुख्य आधार होता है. पारंपरिक खेती कर ये कोदो- कुटकी, -बाजरा उगा लेते हैं.
महुआ इनका प्रिय भोजन है .महुआ के सीजन में ये उसे बीनकर सुखाकर रख लेते हैं और
इसकी बनी रोटी बडॆ चाव से खाते हैं. महुआ से बनी शराब इन्हें जंगल में टिके रहने
का जज्बा बनाए रखती है. यदि बिमार पड गए तो तो भुमका-पडिहार ही इनका डाक्टर होता
है. यादि कोई बाहरी बाधा है तो गंडा-ताबीज बांध कर इलाज हो जाता है. शहरी चकाचौंध
से कोसों दूर आज भी वे सादगी के साथ जीवन यापन करते हैं. कमर के इर्द-गिर्द कपडा
लपेटे, सिर पर फ़डिया बांधे, हाथ में कुल्हाडी अथवा दराती लिए. होठॊ पर मंद-मंद
मुस्कान ओढे ये आज भी देखे जा सकते हैं.
विकास के नाम पर करोडॊ-अरबॊं का खर्चा किया गया, वह रकम कहां से आकर , चली
जाती है, इन्हें पता नहीं चलता और न ही ये किसी के पास शिकायत-शिकवा लेकर नहीं
जाते. विकास के नाम पर केवल कोट में उतरने के लिए सीढियां बना दी गयी है,लेकिन आज
भी ये इसका उपयोग न करते हुए अपने बने –बनाए रास्तों-पगडंडियों पर चलते नजर आते
हैं. सीढियों पर चलते हुए आप थोडी दूर ही जा पाएंगे,लेकिन ये अपने तरीके से चलते
हुए सैकडॊं फ़ीट नीचे उतर जाते हैं. हाट-बाजार
के दिन ही ये ऊपर आते हैं और इकाठ्ठा किया
गया वनोपज बेचकर, मिट्टी का तेल तथा नमक आदि लेना नहीं भूलते. जो चीजें जंगल में
पैदा नहीं होती, यही उनकी न्यूनतम आवश्यकता है.
एक खोज के अनुसार पातालकोट की तलहटी
में करीब 20 गाँव सांस लेते थे, लेकिन प्राकृतिक
प्रकोप के चलते वर्तमान समय में अब केवल 12 गाँव ही शेष बचे
हैं. एक गाँव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते.
जिन बारह गांव में ये रहते हैं, उनके नाम इस प्रकार है-रातेड, चमटीपुर,
गुंजाडोंगरी, सहरा, पचगोल, हरकिछार, सूखाभांड, घुरनीमालनी, झिरनपलानी, गैलडुब्बा,
घटलिंग, गुढीछातरी तथा घाना. सभी गांव के नाम संस्कृति से जुडॆ-बसे हैं. भारियाओं
के शब्दकोष में इनके अर्थ धरातलीय संरचना, सामाजिक प्रतिष्ठा, उत्पादन विशिष्टता
इत्यादि को अपनी संपूर्णता में समेटे हुए है.
ये
आदिवासीजन अपने रहने के लिए मिट्टी तथा घास-फ़ूस की झोपडियां बनाते है. दिवारों पर
खडिया तथा गेरू से पतीक चिन्ह उकेरे जाते हैं .हँसिया-कुल्हाडी तथा लाठी इनके
पारंपरिक औजार है. ये मिट्टी के बर्तनों का ही उपयोग करते हैं. ये अपनी धरती को
माँ का दर्जा देते हैं. अतः उसके सीने में हल नहीं चलाते. बीजों को छिडककर ही फ़सल
उगाई जाती है.. वनोपज ही उनके जीवन का मुख्य आधार होता है. \\
पातालकोय़
में उतरने के और चढने के लिए कई रास्ते हैं. रातेड-चिमटीपुर और कारेआम के रास्ते
ठीक हैं. रातेड का मार्ग सबसे सरलतम मार्ग है, जहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है.
फ़िर भी संभलकर चलना होता है. जरा-सी भी लापरवाही किसी बडी दुर्घटना को आमंत्रित कर
सकती है.
पातालकोट
के दर्शनीय स्थलों में ,रातेड, कारेआम, चिमटीपुर, दूधी तथा गायनी नदी का उद्गम स्थल और राजाखोह प्रमुख है. आम के
झुरमुट, पर्यटकॊं का मन मोह लेती है. आम के झुरमुट में शोर मचाता- कलकल के स्वर
निनादित कर बहता सुन्दर सा झरना, कारेआम का खास आकर्षण है. रातेड के ऊपरी हिस्से
से कारेआम को देखने पर यह ऊँट की कूबड सा दिखाई देता है. राजाखोह पातालकोट का सबसे
आकर्षक और दर्शनीय स्थल है. विशाल कटॊरे मे मानिंद ,एक विशाल चट्टान के नीचे 100 फ़ीट लंबी तथा 25 फ़ीट चौडी कोत(गुफ़ा) में कम से कम
दो सौ लोग आराम से बैठ सकते हैं. विशाल कोटरनुमा चट्टान, बडॆ-बडॆ गगनचुंबी आम-बरगद
के पेडॊं, जंगली लताओं तथा जडी-बूटियों से यह ढंकी हुई है. कल-कल के स्वर निनादित
कर बहते झरनें, गायनी नदी का बहता निर्मल ,शीतल जल, पक्षियों की चहचाहट,
हर्रा-बेहडा-आँवला, आचार-ककई एवं छायादार तथा फ़लदार वृक्षॊं की सघनता, धुंध और हरतिमा के बीच धूप-छाँव की आँख मिचौनी, राजाखोह
की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है. और उसे एक पर्यटन स्थल विशेष का दर्जा
दिलाता हैं. नागपुर के राजा रघुजी ने अँगरेजों की दमनकारी नीतियों से तंग आकर
मोर्चा खोल दिया था, लेकिन विपरीत परिस्थितियाँ देखकर उन्होंने इस गुफ़ा को अपनी
शरण-स्थली बनाया था, तभी से इस खोह का नाम “राजाखोह” पडा. राजाखोह के समीप गायनी
नदी अपने पूरे वेग के साथ चट्टानों कॊ काटती हुई बहती है. नदी के शीतल तथा निर्मल
जल में स्नान कर व तैरकर सैलानी अपनी थकन भूल जाते हैं.
पातालकोट
का जलप्रवाह उत्तर से पूर्व की ओर चलता है. पतालकोट की जीवन-रेखा दूधी नदी है, जो
रातेड नामक गाँच के दक्षिणी पहाडॊं से निकलकर घाटी में बहती हुई उत्तर दिशा की ओर
प्रवाहित होती हुई पुनः पूर्व की ओर मुड जाती है. तहसील की सीमा से सटकर कुछ दूर
तक बहने के , पुनः उत्तर की ओर बहने लगती है और अंत में नरसिंहपुर जिले में नर्मदा
नदी में मिल जाती है.
पातालकोट का आदिम- सौंदर्य जो भी एक बार
देख लेता है, वह उसे जीवन पर्यंत नहीं भूल सकता. पातालकोट में रहने वाली जनजाति की
मानवीय धडकनों का अपना एक अद्भुत संसार है,जो उनकी आदिम परंपराओं,
संस्कृति,रीति-रिवाज, खान-पान, नृत्य-संगीत, सामान्यजनों के क्रियाकलापॊं से मेल
नहीं खाते. आज भी वे उसी निश्छलता,सरलता तथा सादगी में जी रहे हैं.
यहाँ प्राकृतिक दृष्यों की भरमार है.यहाँ
की मिट्टी में एक जादुई खुशबू है, पेड-पौधों के अपने निराले अंदाज है, नदी-नालों
में निर्बाध उमंग है, पशु-पक्षियों मे निर्द्वंद्वता है ,खेत- खलिहानों मे श्रम का
संगीत है, चारो तरफ़ सुगंध ही सुगंध है, ऐसे मनभावन वातावरण में दुःख भला कहाँ
सालता है?. कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी यहाँ आकर नतमस्तक हो जाती है
सूरज के प्रकाश में नहाता-पुनर्नवा
होता- खिलखिलाता-मुस्कुराता- खुशी से झूमता- हवा के संग हिचकोले खाता- जंगली
जानवरों की गर्जना में कांपता- कभी अनमना तो कभी झूमकर नाचता जंगल, खूबसूरत पेड-पौधे, रंग-बिरंगे फ़ूलों से लदी-फ़दी
डालियाँ, शीतलता और ,मंद हास बिखेरते, कलकल के गीत सुनाते, आकर्षित झरने, नदी का
किसी रुपसी की तरह इठलाकर- बल खाकर, मचलकर चलना देखकर भला कौन मोहित नहीं होगा ?.
जैसे –जैसे सांझ गहराने लगती है,और अन्धकार अपने पैर फ़ैलाने लगता है, तब अन्धकार
में डूबे वृक्ष किसी दैत्य की तरह नजर आने लगते है और वह अपने जंगलीपन पर उतर आते
हैं. हिंसक पशु-पक्षी अप्नी-अपनी मांद से निकल पडते हैं, अपने शिकार की तलाश में.
सूरज की रौशनी में, कभी नीले तो कभी काले कलूटे दिखने वाले, अनोखी छटा बिखेरते
पहाडॊं की श्रृंखला, किसी विशालकाय राक्षस से कम दिखलाई नहीं पडते. खूबसूरत जंगल
,जो अब से ठीक पहले, हमे अपने सम्मोहन में
समेट रहा होता था, अब डरावना दिखलायी देने लगता है. एक अज्ञातभय, मन के किसी कोने
में आकर सिमट जाता है. इस बदलते परिवेश में पर्यटक, वहाँ रात गुजारने की बजाय
,अपनी-अपनी होटलों में आकर दुबकने लगता है, जबकि जंगल में रहने वाली जनजाति के
लोग, बेखौफ़ अपनी झोपडियों में रात काटते हैं. वे अपने जंगल का, जंगली जानवरों का
साथ छॊडकर नही भागते. जंगल से बाहर निकलने की वह सपने में भी सोच नहीं बना पाते.
“जीना यहाँ-मरना यहाँ” की तर्ज पर ये जनजातियां बडॆ सुकून के साथ अलमस्त होकर अपने
जंगल से खूबसूरत रिश्ते की डोर से बंधे रहते हैं.
अपनी माटी के प्रति अनन्य लगाव, और उनके
अटूट प्रेम को देखकर एक सूक्ति याद हो आती है.” जननी-जन्मभूमिश्च
स्वर्गादपिगरियसी”= जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी महान होती है” को फ़लितार्थ और
चरितार्थ होते हुए यहाँ देखा जा सकता है. यदि इस अर्थ की गहराइयों तक अगर कोई
पहुँच पाया है, तो वह यहाँ का वह आदिवासी है, जिसे हम केवल जंगली कहकर इतिश्री कर
लेते है. लेकिन सच माने में वह “:धरतीपुत्र” है,जो आज भी
उपेक्षित है.
पातालकोट के कुछ
चित्र. पूरा परिवार प्राकृतिक सौंदर्य देखकर नृत्य करते हुए.
पातालकोट पिकनिक में मेरा पूरा परिवार- दो
बेटे-बहू, पुत्री-दामाद सहित पोते-पोतियां, नाती-नातिन
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शिमला टू काजा (
दि हिमालयान कोल्ड डेजर्ट) व्हाया चंडीगढ़
कितना
अद्भुत है भारत, सौंदर्य से भरा हुआ. प्रकृति और मानव निर्मित खूबसूरती आ आगार.
इसको देखना मानो स्वयं को देखना है. चारो ओर इतनी हरियाली, इतने मौसम, इतना खिलता
जीवन. नदियों का गूँजता स्वर, पहाड़ियों का एकांत, समुद्र की पछाड़, रेगिस्तान में
दमकता सूरज, घने वन, दूर-दूर तक फ़ैले गाँवों में प्रकृति का अनूठा राग...फ़िर कितने
ही मौसम...कितने ही रंग और रूप बदलते आसमान के नीचे, कितने ही रूपों में बसता, खिलता भारत का जीवन.
हमारे
प्राचीन महाकाव्यों में जो प्रकृति वर्णित है, वह मात्र कवियों की अतिश्योक्ति
नहीं, वरन भारत का सच है. कालीदास जी का मेघदूत हो या फ़िर ऋतुसंहार, व्यास जी का
महाभारत हो या कि फ़िर वाल्मीकि की रामायण, जिस भारत के
वनों-पर्वतों-बस्तियों-नदियों की महागाथा कहते नहीं अघाते, वह भारत में आज भी
मौजूद है, उपस्थित है.
प्रकृति
की हर धड़कन में कुदरत के रचियता के श्रृंगारिक मन की खूबसूरत अभिव्यक्ति होती है.
कितने किस्म के तो हैं उत्सव. मौसमों की रंगत भी कुछ कम अनूठी नहीं. जाड़े में
ठिठुरन, बारिश में भींगना, गर्मी में दरख्तों की छांव, सबके सब मौसम कुछ न कुछ
बयां करते हैं. शिमला की बात करें, यहां वसंत
एक बार आता है, तो फ़िर यहीं महिनों ठहरा रहता है, जबकि उसी भू-भाग में बसा काजा,
बर्फ़ की चादर ओढ़े, किसी तपस्वी की भांति समाधि में लीन रहता है. सच ही कहा है किसी
ने- प्रकृति की नब्ज में एक अनूठे ज्ञान की पाठशाला समाई हुई है. बस जरुरत है इस
बात की कि हम कुदरत की स्वभाविक उड़ान को, उसके योगदान को समझें-सराहें और पहचानें.
कुदरत की
इस स्वभाविक उड़ान को समझने के लिए, पहचानने के लिए मैं निकल पड़ता हूँ प्रकृति की
गोद में. घर और गाँव में रहते हुए मैं जितना खाली हो जाता हूँ, लेकिन जब लौटकर
वापिस आता हूँ तो उतना ही भरा-भरा महसूस करता हूँ, उतना ही मालामाल हो कर लौटता
हूँ जैसे कोई राजा-महाराजा.
इस विराट
प्रकृति की वंदना करते हुए मुझे बरबस ही श्री नरेश मेहता जी कि कविता-"
चरैवेती-जन-गरबा" की याद हो आती है. वे लिखते हैं. (एक अंश)
चलते
चलो, चलते चलो / सूरज के संग-संग चलते चलो, चलते चलो / नदियों ने चलकर ही सागर का
रूप लिया / मेघों ने चलकर ही धरती को गर्भ दिया / रुकने का
मरण नाम / पीछे सब प्रस्तर है / आगे है देवयान, युग के ही संग-संग चलते चलो //
मानव
जिस ओर गया नगर बसे, तीर्थ बने / तुमसे है कौन बड़ा गगन-सिंधु मित्र बने / भूमा का
भोगो सुख, नदियों का सोम पियो / त्यागो सब
जीर्ण वसन नूतन के संग-संग चलते चलो. //
मेरी
यात्रा का पहला पड़ाव है चंडीगढ़. इस शहर का
नामकरण दुर्गा के रूप में "चंडिका" के कारण हुआ है. चंडीगढ़ से कुछ दूरी
पर है अवस्थित है माता मनसा देवी का जगप्रसिद्ध मन्दिर. इनका प्रादुर्भाव मस्तक से
हुआ है. इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा. महाभारत के अनुसार इनका वास्तविक नाम जरत्कारू
है. समान नाम वाले पति का नाम महर्षि जरत्कारू तथा पुत्र आस्तिक है. माता रानी के
दर्शनों के पश्चात हम टैक्सी द्वारा कालका पहुँचते हैं और कालका से मिनि टाय ट्रेन
से शिमला के लिए रवाना होते हैं.
रोमांचकारी सफ़र-कालका से शिमला तक का-
पहाड़ों
की रानी के नाम से जग-विख्यात शिमला, वर्तमान में हिमाचल प्रदेश की राजधानी है.
शिमला को अपनी खूबसूरती का प्राकृतिक उपहार आशीर्वाद के रूप में मिला है. चारों ओर
हरे-भरे पहाड़ों और हिमाच्छादित चोटियों से घिरा हुआ. यहाँ की शांत वादियां अन्य
पहाड़ियों से एक अलग ही आभा से जगमगाती है..1864 में शिमला को भारत में ब्रिटिश राज की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित
की गई थी. औपनिवेशिक युग के समय की अनेक इमारतें, जिसमें ट्यूडरबेटन और नव-गाथिक
वास्तुकला के साथ-साथ कई मंदिर और चर्च शामिल है. वाइसराय लाज, क्राइस्ट चर्च,
जाखू मंदिर, माल रोड और रिज इस शहर के आकर्षण हैं. यूनेस्कों द्वारा विश्व विरासत
स्थल के रूप में घोषित "कालका-शिमला रेल्वे लाइन" भी एक प्रमुख
पर्यटक आकर्षण का केन्द्र है.
कालका-शिमला मिनी टाय ट्रेन से सफ़र
2 फ़ीट 6 इंच चौड़ी पटरी पर छुकछुक की आवाज निकालती हुई ये ट्रेन शिवालिक की
पहाड़ियों पर 919 घुमावदार रास्ते, 103 सुरंगे और 869 पुलों से गुजरती है..कभी वह 48 डिग्री कोण से घूमती हुई 2076 मीटर ऊपर बसे शिमला तक जाती है.
इस नैरो गेज लेन ने 09 नवम्बर 1903 को अपना सफ़र शुरु किया था, जो आज भी अनवरत जारी है 8 जुलाई 2008 को, यूनेस्को ने कालका-शिमला रेलवे को 'भारत के पर्वतीय रेलवे विश्व धरोहर स्थल' के रूप में शामिल किया.
मिनि टाय ट्र्रेन में सफ़र
करना एक रोमांचकारी अनुभव था मेरे लिए. इस मिनि ट्रेन में सफ़र करते हुए मैं बरबस
ही अपने बचपन की भूल-भुलैया में जा पहुँचता हूँ. मैं इंजन बनता और मेरे नन्हें
मित्र, एक दूसरे की शर्ट का पिछला हिस्सा पकड़कर, डब्बे के रूप में जुड़कर ट्रेन
बनाते. शोर मचाते और छुकछुक की आवाज निकालते हुए एक के पीछे एक चला करते थे.
छुक-छुक की आवाज निकालती यह
मिनि ट्रेन 656 मीटर की ऊँचाइयों पर चढ़ती जाती है. इसमें बैठकर आप सरसराती-/शरारती
शीतल हवा के झोंकों को महसूस करेंगे, तो कभी पीछे छूटते, सरपट भागते जंगल और
गाँवों को, तो कभी इसे गहरा मोड़ लेकर सुरंग में प्रवेश करती हुई देखकर पर्यटक
रोमांच से भर उठते है. ट्रेन की खिड़की से जब आप, पहाड़ से छलांग लगाते झरनों को
देखते हैं तो सहसा कह उठते हैं-" वाह ! कितना रोमांचकारी और अद्भुत है यह
सफ़र..इसे तो मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा". आपकी प्रसन्नता के पारावार को बढ़ता
देख, आपका ही कोई साथी कह उठता है.- " अरे वाह ! .बचपन में मैंने
भी कभी इस ट्रेन में सफ़र करने का सपना देखा था आज उसे मैं अपनी खुली आँखों से देख
रहा हूँ".
दूसरे दिन भी हमें शिमला
में ही रुकना था,. समय का सदुपयोग करते हुए हमने.शिमला से 20 किमी.की दूरी पर अवस्थित
है “खुपरी”
जाना उचित समझा
कुफ़री-.
कुफ़री अपने एडवेंचर गेम्स
के लिए प्रसिद्ध है. करीब आठ-दस किली की दुर्गम चढ़ाई के बाद यहाँ पहुँचा जा सकता
है. पिछली रात में बारिश हो चुकी थी. रास्ता कच्चा और दलदली थी. घोड़े की पीठ पर
सवार होकर हमने इस यात्रा का भरपूर आनंद उठाया. और दूसरे दिन हम हिमाचल प्रदेश के सराहन
की ओर रवाना हुए.दिन भर की यात्रा के बाद हमने सराहन में रात्रि
विश्राम किया.
सराहन-
हिमालय से निकल कर बहती
सतलुज नदी के किनारे बसा है सराहन. सराहन अपने प्राकृतिक दृष्यों के लिए विख्यात
है. यहीं पर जगप्रसिद्ध भीमाकाली का जगप्रसिद्ध मन्दिर अवस्थित है.
भीमाकाली मंदिर-(मंडी)-
कहा जाता है कि इस स्थान
पर भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर को मार गिराया था. कृष्ण के बाद उनके यादव
अनुयायियों ने इस मंदिर को बनाया. भीमाकाली को रामपुर बुशहर के राजाओं की आराध्या
देवी माना जाता है. व्यास नदी के तट पर स्थित मंदिर का परिसर काफ़ी सुंदर बनाया गया
है. एक लंबे रैम्पस से चढ़ते हुए तीसरी मंजिल पर पहुँचकर आपको माँ भीमाकाली के
दिव्य दर्शन होते हैं.
सराहन में रात्रि विश्राम
के बाद हमारा अगला पड़ाव होता है, 84 किमी की दूरी पर बसा, हिमाचल
प्रदेश राज्य के किन्नौर जिले में स्थित एक गाँव "सांगला".में.
सांगला की ओर रवाना होते हुए हम मनमोहक प्राकृतिक दृष्यों को निहारते हुए हम जा
पहुँचे “ बसपा
“ नदी के सुंदर और आकर्षक तट पर. ऊँचे-ऊँचे पहड़ो को चीरकर
रास्ता बनालर बहती नदी को देखने का अपना ही आनंद होता है. होटेल में रुककर भोजन
करने के बजाय हमने बसपा के पावान तट पर बैठकर “वन भोजन “ करना ज्यादा उचित लगा. जी भर के प्राकृति दृष्यों को निहारने के बाद हमने
सांगला में रात्रि विश्राम किया.
सांगला-
यहाँ कई मंदिर हैं. यहाँ
के अधिदेवता हैं बेरिंग नाग, माजेन और पिरी नाग, इनके मंदिरों के अलावा बद्रीनाथ
जी और छितकुल माता मंदिर.भी देखे जा सकते हैं. सांगला के आखिरी छोर पर बसा है बसपा नदी के तट पर बसा है“ छितकुल”
गाँव “जिसे हम भारत का अंतिम बिंदु या आखिरी
भू-भाग भी कह सकते हैं. छितकुल से लगे ऊँचे पहाड़ के उस पार से तिब्बत की सीमा
प्रारंभ हो जाती है.
छितकुल-
हिमाचल राज्य के किन्नौर जिले में, भारत तिब्बत
मार्ग पर 3450 मीटर (बारह हजार फ़ीट) की
उँचाइयों पर, वसपा घाटी का अंतिम गाँव, बसपा नदी के किनारे अवस्थित है “छितकुल
“. यह भारत का सीमा पर बसा आखिरी गाँव और आखिरी डाकघर भी है.
इसी स्थान पर शाक्यमुनि (Kagyupa)
"बुद्ध" की अत्यधिक मूल्यवान पुरानी छवि है. छितकुल एक तरह से किन्नर
कैलाश परिक्रमा का अंतिम बिंदु है, क्योंकि यहाँ से कोई भी चढ़ाई कर सकता है.
छितकुल की रोमांचिक यात्रा कर हम पुनः सांगला में आकर रात्रि विश्राम करते हैं.
सांगला से कल्पा की ओर.
सांगला में रात्रि
विश्राम के बाद हम चल पड़ते हैं कल्पा की ओर.कल्पा की ओर बढ़ते हुए हमें रास्ते में
मिलता है “ रेकांग पेओ” ( Reckong Peo) किन्नौर का हेडक्वाटर और
सुसाईड पाईंट (sucide point).
सुसाइड पाईंट--
पहाड़ी सड़क के एक खतरनाक
मोड़ पर “ सुसाइड
पाईंट’ को देखा जा सकता है. प्रकृति की अद्भुत कारीगरी और
नयनाभिराम दृष्य को देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाता है. इसी जगह पर रुककर एक
महिला फ़ोटोग्राफ़ी करते समय नीचे गिर पड़ी थी, जिसे फ़िर कभी नहीं खोजा जा सका. अतः
बेरिकेट्स लगा दिए गए हैं कि कोई व्यक्ति धोके से दुर्घटना का शिकार न होने पाए.
सांगला से कल्पा-
हम अब एक ऐसे स्थान की ओर
बढ़ चले थे, जो हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के लिए एक विशेष महत्व रखता है.
इसी कल्पा से किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शन किए जा सकते है.
"किन्नर कैलाश".
हिमाचल प्रदेश के किन्नौर
जिले में तिब्बत सीमा के समीप 6050 मीटर ऊँचाई पर, आकाश से होड़
लगाता, हिमाच्छादित पर्वत, जिस पर शिवजी का विशाल शिवलिंग प्राकृतिक रूप से
विद्यमान है. यह वही हिमालय है जहाँ से पवित्रतम नदी गंगा का उद्भव गोमुख से होता
है. "देवताओं की घाटी" के नाम से विख्यात कुल्लू भी इसी हिमालय की रेंज
में आता है. इस घाटी में 350 से भी ज्यादा मंदिर स्थित हैं. इसके अलावा अमरनाथ और मानसरोवर झील
भी हिमालय पर ही स्थित है. अनेकों एडवेंचरों के लिए हिमालय विश्व प्रसिद्ध है.
हिमालय विश्व का सबसे बड़ा "स्नोफ़िल्ड" है, जिसका कुल क्षेत्रफ़ल 45,000 किमी. से भी ज्यादा है.
भगवान श्रीकृष्ण जी ने
हिमालय के बारे में भगवद गीता में कहा है-" मेरा निवास पर्वतों के राजा
हिमालय में है". उसी तरह स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि " हिमालय
प्रकृति के काफ़ी समीप है. वहाँ अनेक देवी-देवताओं का निवास है. महान
हिमालय....देवभूमि". यही कारण है कि भारतवासियों में खासकर हिन्दू समाज में
हिमालय को देवत्व के काफ़ी करीब माना जाता है .
पुरातन काल में लिखित
सामग्रियों के अनुसार किन्नौर के निवासी को किन्नर कहा जाता है, जिसका अर्थ होता
है- आधा किन्नर और आधा ईश्वर. गंधर्वों और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना
जाता है. इन्होंने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से विद्यमान है.
उन ध्वनियों के आधार पर उन्होंने मंत्रों की और सहायक ध्यान ध्वनियों की रचना की.
किन्नर इन्ही ध्यान ध्वनियों की सहायता से शिवजी की आराधना कर उन्हें प्रसन्न रखते
हैं. यहाँ किन्नरों का निवास रहने के कारण इसे "किन्नर कैलाश" के नाम से
जाना जाता है.
19,849 फ़ीट की ऊँचाई पर 45 फ़ीट उँचा और
16 फ़ीट चौड़ा स्फ़टिक शिवलिंग हिन्दू और बौद्ध दोनों के लिए समान रूप से
पूज्यनीय है. लोगों की इसमें गहरी आस्था है. इस शिवलिंग के चारों ओर परिक्रमा करने
की इच्छा लिए भारी संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं.
हिमालय के गर्भ में बसा
कैलाश भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है, लेकिन हिमाचल के किन्नौर में मौजूद किन्नर कैलाश शिवजी का शीतकालीन निवास
माना जाता है. शिवलिंग अपने आप में अद्भुत है. इसे बाणासुर का किन्नर कैलाश के नाम
से भी जाना जाता है. बाणासुर ने इसी पर्वत पर शिवजी की कठिन तपस्या कर उन्हें प्रसन्न
किया था. ऐसी भी मान्यता है कि किन्नर कैलाश के आगोश में श्री कृष्ण जी के पोते
"व्रजभान" का विवाह हुआ था. किन्नर कैलाश दिन में कई बार रंग बदलता है,
सूर्योदय से पूर्व सफ़ेद, सूर्योदय होने पर पीला, मध्यान्ह काल में लाल हो जाता है
और फ़िर क्रमशः पीला, सफ़ेद होते हुए संध्या काल में काला हो जाता है, जबकि इसके
आसपास मौजूद पहाड़ियों का रंग एक जैसा ही रहता है..किन्नर कैलाश अपनी इन्हीं विशेषताओं के लिए जाना और माना जाता है.
कल्पा में हमें रात्रि विश्राम करना था. हम दोपहर को लगभग दो-ढ़ाई बजे
के करीब यहाँ पहुँच गए थे. कल्पा के होटेल में मुझे कमरा नंबर 204 दिया गया था, जो पहली मंजिल
पर था. कमरे के ठीक सामने किन्नर कैलाश अपनी दिव्य आभा के साथ चमचमा रहा था. कमरे
में बैठे-बैठे ही हम उसकी दिव्यता को जी भर के निहार सकते हैं..
कमरे के एक कोने में बैठकर मैं जी भर के उसे निहारते रहा. फ़िर आँखे
बंद कर उसकी पावन छवि को अपने मन-मस्तिस्क की ओर ले गया..मेरा चंचल मन धीरे-धीरे
स्थिर होने लगा.था मन के शांत होते ही मेरे अन्दर एक अद्भुत संगीत बजने लगेगा.
शायद एक ऐसा संगीत, जिसे किन्नर अपने आराध्य देव महादेव को प्रसन्न रखने के लिए
बजाया करते हैं.( जैसा कि मैने अनुभव किया था). यात्रा की वापसी में भी मुझे यही
कमरा मिला. इस तरह मुझे दो बार इसके दिव्य दर्शनों का पुण्य लाभ मिला.
किन्नर कैलाश जाने का
मार्ग काफ़ी कठिन है जो मुश्किल दर्रों से होकर गुजरता है. पहला लालांति दर्रा जो 14,501 फ़ीट की
ऊँचाई पर और दूसरा चारंग दर्रा है जो 17,218 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है.
किन्नर कैलाश के दिव्य
दर्शनों के उपरान्त हमने "रेकाग पिओ"की ओर प्रस्थान किया. रिकांग
पिओ किन्नौर जिले का वाणिज्यिक व प्रशासनिक केन्द्र है, जो सतलुज नदी के किनारे
अवस्थित है. इसके बाद हमने रेकांग पिओ के निकट "ब्रेंलेंगी गोम्फ़ा"
लोकप्रिय गोम्फ़ा, " हू बू लान कार" मोनेस्ट्री देखा और काल्पा में
विश्राम किया.
काल्पा से काजा ( दि
हिमालयन कोल्ड डेजर्ट)-( 210 KM. )
हिमाचल प्रदेश राज्य के
लाहौल और स्पिति जिले में, स्पीति नदी के किनारे, शिमला से 425 किमी की दूरी पर, समुद्र
तल से 3,650 मीटर ( 11,980 फ़ीट) की उँचाई पर स्थित काजा,
अपने शानदार पहाड़ियों दृष्यों, बौद्ध मठों और प्राचीन गाँवों और बर्फ़ीले पर्वतों
के लिए जाना जाता है. काजा लाहौल स्पीति जिले का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र
भी है जो चारों ओर से बर्फ़ीले पर्वतों से घिरा हुआ है.
काजा अपने रंगीन
त्योहारों के लिए जाना जाता है. प्राचीन "शाक्य" तांग्यद मठ शहर से 14 किमी. की दूरी पर
अवस्थित है. यहाँ बहुत कम या मानसून में बारिश होती है. जलवायु शुष्क और
स्फ़ूर्तिदायक रहता है. सर्दियों के दौरान तापमान शून्य से नीचे चला जाता है, जिसके
कारण यहाँ पर औसतन बर्फ़बारी सात फ़ुट तक हो जाती है.
यहाँ आकर आपको बरबस ही
शिमला की याद ताजा हो आएगी. यहाँ की हरी-भरी वादियां, सघन पेड़ों की श्रृंखलाएं और
खुशगवार मौसम को देखकर भ्रम होता है कि वंसत यहां एक बार आता है, तो कई-कई महिने ठहरा
रहता है. इस चित्ताकर्षक वादियों में भ्रमण करते हुए आप रोमांच से भर उठते हैं,
जबकि काजा में आकर आपको देखने को मिलते है नीली गहरी उदासी ओढ़े हुए रंग-बिरंगे
रुखे-सूखे से पहाड़. यहाँ आपको एक भी वृक्ष देखने को नहीं मिलेगा. अक्टूबर-नवम्बर
में यहाँ भीषण बर्फ़बारी होती है. तब बर्फ़ की मोटी चादर ओढे पहाड़ किसी तपस्वी से कम
प्रतीत नहीं होते. हिमाचल प्रदेश के एक ही बेल्ट पर आपको दो अलग-अलग मौसम देखने को
मिलेंगे. एक छोर पर खिलता वसंत है तो वहीं दूसरे छोर पर बर्फ़ का रेगिस्तान देखकर
आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है.
चंद्रताल झील-
चंद्रताल झील पर्यटकों और
ट्रेकरों के लिए स्वर्ग से स्वर्ग से कम नहीं है. चंद्रताल (चंद्रमा की झील) इसके
अर्धचंद्राकार होने की वजह से पड़ा है. यह झील भारत की दो उच्च ऊँचाई वाली
आर्द्रभूमि के रूप में से एक है. इस पानी का रंग दिन ढलने के साथ लाल से नारंगी और
नीले से हरे रंग में बदलताअ रहता है. यह झील काजा से 55 किमी की
दूरी पर है.
किब्बर गाँव-
एक चूना पत्थर चट्टान के
शिखर पर एक संकीर्ण घाटी में किब्बर,काजा से 17 किमी की
दूरी पर, समुद्र तल से 4,328 मीटर की ऊँचाई पर बसा यह
गाँव विश्व भर में सबसे अधिक ऊँचाई पर बसा गाँव है. ठंडॆ रेगिस्तान में स्थित अपने
सुरम्य गाँव, बंजर परिदृष्य के लिए जाना जाता है. इसे लघु तिब्बत भी कहा जाता है.
(
KIBBAR VILLAGE.)
ताबो मोनेस्ट्री-
काजा से 48 किमी
मीटर, समुद्र तल से 3,050 मीटर की ऊँचाइयों पर बसा यह गाँव "हिमालय का
अजंता" कहलाता है.
की मठ-(KYE)-
काजा से 7 किमी की दूरी पर स्थित
"की मठ" गोंपा के नाम से जाना जाता है. इस मठ का निर्माण 11 शताब्दी
के दौरान किया गया था, अपनी आकर्षक वास्तु-कला
के लिए पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है. समुद्र तल से 13,504 फ़ीट की ऊँचाई पर एक
शंक्वाकार चट्टान पर निर्मित इस मठ को रिंगछेन संगपो ने बनवाया था.
गोम्फ़ा के भीतर प्रवेश
करते ही आपको लगने लगेगा कि आप किसी अलौकिक जगह में आ गए है. ठीक सामने की दीवार
पर विशालकाय बुद्ध की तस्वीर, सामने पूजा-पाठ की सामग्रियाँ और भी अनेकानेक चीजें
करीने से रखी हुई मिलेंगी, गोम्पा की कलात्मक साज-सज्जा, कक्ष के बीच में मुख्य
पुजारी अपनी पारंपरिक पोषाक में बैठा दिखाई देगा, वहीं उसके दोनों ओर कतार से बैठे
बुद्ध के अनुयायी मंत्रों को उच्चारते दिखाई देंगे. यहाँ आकर यदि आपने इस मठ को
नहीं देखा, तो कुछ भी नहीं देखा.
लाहौल और स्पीति-
हिमाचल प्रदेश में समुद्र
तल से 10050 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है
लाहौल-स्पीति.पहले लाहौल और स्पीति अलग-अलग राज्य थे. इन दोनों के विलयोपरांत को
मिलाकर एक जिला बना दिया गया है. विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय
"करदंग" और स्पीति का मुख्यालय "दनकर" था. अत्यधिक शीत के
चलने के कारण यहाँ पेड़-पौधे तक नहीं पनप पाते. सारा इलाका बंजर रहता है
कुछ कड़ी घास एवं झाड़िया
यहाँ उग पाती हैं, वो भी 4000 मीटर के
नीचे. अपनी ऊँची पर्वतमाला के कारण यह शेष दुनिया से कटा रहता है. यह स्थान
"कोल्ड डेजर्ट आफ़ हिमालय" के नाम से भी जाना जाता है.
यात्रा करते समय आपको
"हिमालयान याक" और "नीली भेड़े" भी देखने को मिलती मिलीं..
हिक्किम गाँव-
स्पिति घाटी में बंजर
पहाड़ों के बीच एक छॊटा-सा गांव है "हिक्किम". इसी गाँव में दुनिया के
सर्वाधिक 14,567 फ़ीट की ऊंचाईयों पर
कार्यरत "हिक्किम डाकघर, जो आसपास के कई गांवों को बाकी दुनिया से जोड़ता है.
चुंकि मैं भी पोस्टमास्टर
( H.S.G.I ) के
पद से सेवानिवृत्त हुआ था. दुनिया के सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित डाकघर को काम करता
देख मुझे बहुत प्रसन्नता हुई, डाकघर जाना और डाकपाल से मिलना मेरे लिए जरुरी था.
मुख्य सड़क से करीब दो सौ फ़ीट नीचे ढलान में उतर कर वहां जाना होता है, अत्यधिक
ढलान से फ़िसलने का खतरा बना रहता है. काफ़ी सावधानी पूर्वक उतरते हुए मैं वहां जा
पहुंचा. पोस्टमास्टर श्री रिंचेन शेरिंग से मुलाकत करते हुए अपना परिचय
दिया. परिचय पाकर वे बहुत खुश हुए थे. उन्होंने साग्रह मुझे अंदर आने का आग्रह
किया, कुर्सी दी, जलपान का आग्रह किया. लेकिन मेरे पास समय की कमी थी. यात्रा में
और आगे बढ़ना था. मैंने डाकपाल के साथ फ़ोटो लिया और वापिस हो लिया.
गयू गाँव-
ताबो मोनेस्ट्री से करीब 50 किमी
दूर "गयू" नाम के गाँव में मिली यह ममी 550 वर्ष लामा सांगला
की है, जो तिब्बत से चलकर यहाँ तपस्या करने आए थे. जब वे तपस्या में लीन थे, अचानक
1974 में आए
भुकम्प से वहीं दबे रह गए. 1975 में आईटीबीपी के जवानों को लामा का शव सड़क बनाते
समय खुदाई में मिला था.
कहते है खुदाई के समय
कुदाल लगने से ममी से खून निकल आया था..ज्ञात हो कि इस ममी पर अन्य ममियों की तरह
कोई लेप आदि नहीं लगाया गया है. बिना लेप आदि लगाए इस ममी के बाल और नाखून आज भी
बढ़ रहे हैं, यह एक आश्चर्य का विषय है. लोग इसे जिंदा भगवान मानकर पूजा करते हैं..
काजा हमारी यात्रा का
अंतिम बिंदु था. काजा में दो दिन बताने और उसके आसपास फ़ैले रहस्यमय जगत को देखने
और अपने कैमरों में दुर्लभ चित्र और मन में एक नई यादों का पिटारा लिए हम लौट पड़ते
हैं.
यात्रा में यदि आपके साथ
सहयात्री न हों तो यात्रा का सही आनंद प्राप्त नहीं होता. वे न केवल आपके सहयात्री
ही नहीं होते हैं बल्कि जरुरत पड़ने पर आपकी हर संभव सहायता भी करते हैं. इनके साथ
रहने से आपकी यात्रा का आनंद द्विगुणित हो जाता है. मेरे सहयोगियों में
प्रो.राजेश्वर आनदेव, श्रीमती अनिता आनदेव, जयंत डोले, श्रीमती सुषमा डोले,
नर्मदा प्रसाद कोरी, डा,विजय चौरसिया, अमित दुबे, श्रीमती मुनमुन दुबे, वीर दुबे
सहित हरीश खण्डेलवाल सहयोगी-सहयात्री थे.
सच ही कहा है किसी ने कि
हर यात्रा एक तलाश होती है- अपनी और उस अछोर जीवन की उस विराट प्रकृति की, हमारा
अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है. इसीलिए हर यात्रा से कुछ न कुछ मिलता जरूर है, किसी भोर
का उगता सूरज, कोई बल खाती नदी, दूर तक फ़ैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई सिंदूरी
शाम, दूर गांव से आती ढोलक की थाप, पीछे छूटती दृष्यावलियां..हमारे भीतर रच-बस
जाती हैं. यही सब तो जीवन की संपदाएं हैं. मुझे बरबस ही अज्ञेय जी की कविता याद हो
आती है.
मंदिर से, तीर्थ से, यात्रा से हर पग से, हर सांस से कुछ मिलेगा, अवश्य
मिलेगा, पर उतना ही जितने का
तू है अपने भीतर से.
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3..
लक्षद्वीप
की सुरम्य यात्रा.
भारत के दक्षिण-पश्चिम
किनारे से लगभग 400 किमी.की दूरी पर अवस्थित है एक अद्भुत द्वीप, जिसे लक्षद्वीप के नाम से
जाना जाता है. यही एकमात्र ऐसा द्वीप है जिस पर जाने के लिए पर्यटक को भारत सरकार
से इजाजत लेनी पड़ती है. पूरा आइलैण्ड करीब 32 किमी के
क्षेत्र में फ़ैला हुआ है.
यहाँ का प्राकृतिक
सौंद्र्य, प्रदुषणमुक्त वातावरण, चारों ओर से घिरा शांत समुद्र और इसका
पारदर्शी-तल पर्यटक को अपने सौंदर्य से मंत्रमुग्ध कर देता है. समुद्र के नीले
पानी के भीतर तैरती असंख्य रंग-बिरंगी मछलियाँ, द्वीप पर आच्छादित नारियल और पाम
के हरे-भरे वृक्ष, चांदी-सी चमकती,मुलायम रेत एक अनोखा दृष्य उपस्थित होता है. इस
द्वीप-समूह में कुल मिलाकर 36 द्वीप हैं,जिसमें से केवल तीन
द्वीप कलपेनी, अगाती और अमीनी द्वीप पर ही जाने की इजाजत मिलती है. इजाजत कोच्ची स्थित
कार्यालय से ली जा सक्ती है. पर्यटक को अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन से इस आशय का
प्रमाण-पत्र लेना होता है कि वह अपराधी-किस्म का नहीं है. यदि आप इस सुन्दरतम
द्वीप की यात्रा करना चाहते हैं तो मई से लेकर सितम्बर का समय उचित होगा. शेष समय
यहाँ तीखी धूप पड़ती है. अगाती द्वीप की कुल मिलाकर आबादी करीब सात हजार है. ये कभी
हिन्दू धर्मावलंबी थे, चौदहवीं सदी में इस्लाम स्वीकार कर लिया था. लक्षद्वीप भारत का एकमात्र मूँगा
द्वीप है. इन द्वीपों की श्रृंखला मूँहा एटोल है. एटोल मूंगे के द्वारा बनाया गई
ऐसी रचना है जो समुद्र की सतह पर पानी और हवा मिलने पर बनती है. सिर्फ़ इन्हीं
परिस्थितियों में मूँगा जीवित रह सकता है.
आज यह द्वीप पर्यटन की
दृष्टि से तेजी से विकास कर रहा है. पर्यटक यहाँ आकर जहाँ प्रकृति के नैसर्गिक
वातावरण को निहारकर मंत्रमुग्ध हो उठता है, वहीं वह वाटर स्पोर्ट्स यानी स्कूबा
डायविंग, कायाकिंग, नौकायन, ग्लास-बोट, वाटर स्कीइंग का जमकर लुत्फ़ उठा सकता है.
मलयालम. जेसेरी भाषा यहाँ के निवासियों की आम-भाषा है. अगाती और बंगारम द्वीप बहुत
ही खूबसूरत द्वीप है. यहाँ बोट हमेशा तैयार मिलती है. नौकायन ही यहाँ का यातायात
का मुख्य माध्यम है.
कावारत्ती आइलैंड कवरत्ती
यहाँ की प्रशासनिक राजधानी है। यह सबसे अधिक विकसित भी है साथ ही सैलनियों के लिए
एक बहुत ही लोकप्रिय स्थल है. यह आइलैंड पूरी तरह हरियाली, नीले पानी और बालू से घिरा हुआ है, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है. पूरे द्वीप में 52 मस्जिद हैं, सबसे खूबसूरत मस्जिद है उज्र मस्जिद. इस द्वीप में
एक्वेरियम भी है जिसमें सुंदर मछलियों की प्रजातियाँ हैं. यहाँ काँच की तली वाली नौका में बैठकर
आप समुद्री दुनिया का नजारा ले सकते हैं.
मिनिकॉय आइलैंड यह आइलैंड कवरत्ती से 200 किमी दूर
दक्षिण में है. मालदीव के करीब होने के कारण यहाँ भिन्न संस्कृति के दर्शन होते हैं. मिनिकॉय नृत्य परंपरा के
मामले में बेहद समृद्ध है. विशेष अवसर पर यहाँ लावा नृत्य किया जाता है. यहाँ खासकर तूना मछली का शिकार और नौका
की सैर आनंददायी है. अँग्रेजों के द्वारा 1885 में बनवाया गया प्रकाश
स्तंभ देखने लायक है, पर्यटक यहाँ ऊपर तक जा सकते हैं. बंगारम आइलैंड यह आइलैंड
बेहद ही शांत है यहां की अपार शांति पर्यटकों को खासा पसंद आती है. साथ ही यहां नारियल के वृक्ष सघन
मात्रा में हैं. कालपेनी
आइलैंड यहाँ तीन द्वीप हैं जिनमें आबादी नहीं है. कदमठ आइलैंड
एक जैसी गहराई और दूर अनंत तक जाते किनारे कदमठ को स्वर्ग बनाते हैं. यही एकमात्र
द्वीप है जिसके
पूर्वी और पश्चिमी दोनों ओर लैगून हैं. यहाँ वाटर स्पोर्ट्स की बेहतरीन सुविधाएँ
हैं.
लक्षद्वीप
जाने से पूर्व हमने कुछ जानकारिय़ाँ इंटर्नेट से प्राप्त की थी. ज्ञात हुआ कि इस
द्वीप पर पहुँचने के दो ही साधन
है. या तो आपको सफ़र पानी के जहाज से जाना होता है या फ़िर हवाई जहाज से. इस प्रमाण-पत्र
के आ पर आपको अपनी उपस्तिथि दर्ज करवानी होती है. बाद में यह भी ज्ञात हुआ कि पानी के जहाज अभी नहीं चल रहे हैं और वे रिपेयरिंग के लिए कुछ समय तक के लिए रोक दिए गए हैं. हमारे पास एक
ही विकल्प बचा था कि हम हवाई यात्रा करते हुए वहां पहुँचे. पर्यटक को द्वीप में चार दिन से ऊपर रुकने नहीं
दिया जाता है. साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि कोच्ची से सप्ताह में केवल एक दिन ही हवाई जहाज यहाँ के
लिए उड़ान भरता है.
यह भी पता चला कि लौटते समय हवाई जहाज कोच्ची की जगह कोझिकोड के लिए उडान भरेगा. ऐसी विकट
परिस्थिति में हमने नागपुर के “स्वस्तिक टूर्स एन्ड ट्रेवल” ( Swastic Tours
and Travels, Plot No. 10, Dandige Lay 0ut, Shankar Nagar (440010). के संचालक श्री निनाद आल्मेलकर जी (
मोबा.9421706506) का
सहारा लिया और हमने अपने हिसाब से कार्यक्रम निर्धारित किए. श्री आल्मेलकर जी ने
अपने सहायक श्री प्रमोद झाड़े (7620107238) को हमारे साथ यात्रा पर भिजवाया,
ताकि हमें कोई
असुविधा न हो. इस यात्रा में हमें सिर्फ़
अगत्ति, बंगारम और तलापैनी द्वीप पर ही जाने की इजाजत मिल पायी थी.
हमारे साथ इस यात्रा
में अन्य प्रदेशों से श्री अनन्त रालेगांवकर जी, एन.श्रीरामन, श्रीमती पुष्पा श्रीरामन, सुश्री वीणा
महाडिकर जी, सुश्री शालिनी डोणे जी, श्री साकेत केलकरजी, श्री सर्वोत्तम केलकरजी, सुश्री
शर्मिन क्यूटो (Sharmeen Couto), सुश्री स्मिता
श्रीवास्तवजी, सुश्री चित्रा परांजपे जी एवं दीपक गोखले जी भी शामिल थे. ये सभी अलग-अलग रुट से
कोच्ची पहुँचे थे.
(Photo
Group-All members)
17/19-01-2020 ( सुवर्ण जयंति एक्स. रात्रि 11.30)
17 तारीख की शाम को हम छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए रवाना हुए. सुवर्ण जयंती
एक्स.नागपुर रात्रि साढ़े ग्यारह बजे पहुँचती है. लगातार दो दिन की यात्रा के
पश्चात हम दिनांक 19 जनवरी की सुबह छः-साढे छः बजे के करीब
कोच्चि पहुँचे. शहर की प्रख्यात थ्री-स्टार होटेल सारा (SARA) में हमें रुकवाया गया. चुंकि हमारे पास आज का दिन ही शेष था, अगली सुबह
हमें शीघ्रता से तैयार होकर कोच्चि एअर-पोर्ट पहुँचना था. अगत्ति के लिए फ़्लाईट सुबह
साढ़े नौ बजे की थी. अतः हमने इस अल्पावधि में कोच्ची शहर के कुछ प्रसिद्ध स्थलों
को देखने का मानस बनाया.
इस
अल्पावधि में हमने फ़ोक क्लोर म्युजियम (FOLK CLORE MUSIUM), सेंट फ़्रांसिस जेवियर चर्च ( SAINT FRANCIS ZAVIER) , साइनेगोग जिव्ज मन्दिर (यहूदियों का प्रार्थना स्थल) -SYNEGOG JEWS
TEMPLE- तथा डच पैलेस ( DUTCH PALACE) देखा और दोपहर को हमने
“फ़ोर्ट क्वीन” होटेल में सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया.
ज्ञात हो कि पुर्तगाली नाविक वास्को
डी गामा 8 जुलाई 1497 में भारत की खोज में निकला था. 20 मई 1498 को वह केरल तट के कोज्जीकोड जिले के कालीकट
के कप्पाडु ( Kappadu near
Kozhikode (Calicut), in Malabar Coast (present day Kerala state of India), on 20 May 1498. पहुँचा था. 1502 में वह पुनः दूसरी बार भारत आया था. लंबी बिमारी
के बाद उसका निधन सन 1524 में हुआ. उसके मृत शरीर को कोच्चि
के संत फ़्रांसिस चर्च में दफ़नाया गया था. सन 1539 में
पुर्तगाल के इस हीरो के शरीर के अवशोषों
को निकालकर पुर्तगाल के विडिगुअरा (VIDIGUEIRA ) में दफ़नाया
गया.
20-22 जनवरी--अगत्ति.द्वीप
बीस जनवरी की सुबह आठ बजे
हमने होटेल सारा छोड़ दिया और सीधे एअरपोर्ट पहुँचे. सुबह साढ़े नौ बजे की इंडियन एअरलाईन की फ़्लाईट अगत्ति के लिए थी.
कोच्ची (कोचीन) से अगत्ती तक
की उड़ान में महज एक घंटा तीस मिनट लगते हैं. उड़ते हुए हवाई जहाज अगत्ति द्वीप इस
तरह दिखाई देता है.
(वायुयान से कुछ इस तरह
दिखता है अगत्ति द्वीप )
अगत्ति एअरपोर्ट हम
छिन्दवाडा के साथी.
अगत्ति द्वीप
हवाई
अडडे से कुछ ही दूरी पर सैलानियों के लिए हट्स बने हुए हैं. मीलों दूर-दूर तक
फ़ैली, चांदी-सी चमचमाती मखमली रेत के मध्य ये हट्स बने हुए हैं. इस मखमली रेत पर
चलना एक अलग ही तरीके का अहसास दिलाता है. जगह-जगह ऊगे नारीयल के असंख्य पेड़ और
पास ही लहलहाता-समुद्र आपको किसी दिव्य लोक में ले जाने के लिए पर्याप्त है. इतना
अलौकिक दृष्य जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता. दूर-दूर तक फ़ैली नीले पानी की
चादर, क्षितिज पर रंग बिखेरता सूरज, सफ़ेद झककास रेत और रंग-बिरंगी मछलियाँ अगत्ती
की असली पहचान है. यदि संयोग से उस दिन पूर्णिमा हो तो इस द्वीप के सुन्दरता को
देखकर आप मंत्रमुग्ध होउठेंगे.
सूर्यास्त के समय का मनभावन दृष्य
तलापैनी द्वीप
यहाँ तीन द्वीप हैं जिनमें आबादी नहीं है. इनके चारों ओर
लैगून की सुंदरता देखने लायक है. कूमेल एक खाड़ी है जहाँ पर्यटन की पूरी सुविधाएँ
उपलब्ध हैं. यहाँ से पित्ती और थिलक्कम नाम के दो द्वीपों को देखा जा सकता है. इस
द्वीप का पानी इतना साफ है कि, आप इस पानी में अंदर तैरने वाले जीवों को आसानी से देख सकते हैं. साथ ही
यहाँ आप तैर सकते हैं, रीफ पर चल सकते हैं, नौका में बैठकर घूम सकते हैं और कई वाटर स्पोर्ट्स का आनंद ले सकते हैं.
बंगारम
आइलैण्ड.
अन्य द्वीपों
से यह सबसे खूबसूरत द्वीप है. यह बेहद ही शांत द्वीप है. इसकी शांति पर्यटकों को
अच्छी खासी पसंद आती है. यहाँ नारियल के सघन वृक्ष आपका मन मोह लेते है. डालफ़िन,
कछुए, मेंढक और रंग-बिरंगी मछलियाँ यहाँ देखी जा सकती है. मन मोह लेने वाले इस
द्वीप पर हमने बहुत सारा समय आनन्द में बिताया और इसी के किनारे एक विशालकाय टैंट
के नीचे बैठकर हम सब पर्यटकों ने सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया. और अगत्ति द्वीप
द्वीप के लिए रवाना हो गए. चुंकि हमारे लिए 22 जनवरी की रात हमारे लिए
अन्तिम रात्रि थी, अगली सुबह हमें वापिस लौट जाना था. इस अन्तिम पड़ाव पर हम सब
शांत समुद्र के किनारे बैठकर शेर-शायरी और सुन्दर गीतों और कविताओं का आनन्द उठाते
रहे
और अंत में.
लक्षद्वीप से लौटकर आए हुए हमें अभी
ज्यादा समय नहीं बिता है. दस दिन के इस रोमांचक सफ़र की मधुर-स्मृतियाँ आज भी
चमत्कृत करती है. चमत्कृत करते हैं वे अद्भुत क्षण, जब हम पूरब से सूरज को निकलता
देख रोमांचित होते थे तो वहीं उसे अस्ताचल में जाता देख, इस आशा के साथ लौट पड़ते
थे कि अगली सुबह फ़िर सूरज एक नया उजाला, एम नया संदेशा लेकर फ़िर नीलगगन में अवतरित
होगा. खिलखिलाता-दहाड़ता समुद्र और समुद्र के बीच कमल सा खिला द्वीप, जिसकी
चांदी-सी चममचाती मुलायम रेत पर विचरण करना और नारियल के पेड़ के पेड से बंधे झूले
में जी भरके झूलना. रह-रह कर याद आते हैं वे क्षण जब हम सब मिलकर द्वीप पर फ़ैली
असीम शांति के बीच सहभोज का आनन्द उठाते है. याद आते हैं वे क्षण जब हम नौका विहार
करते हुए समुद्र के तल में फ़ैली शैवाल के सघन बुनावटॊं को देखकर रोमांचित होते थे.
4
अद्भुत -अकल्पनीय किन्नर कैलाश
अद्भुत -अकल्पनीय किन्नर
कैलाश
००००००००
दरअसल
हम यात्राओं को अपनी व्यस्त जीवन-चर्या का एक अंतराल या छुट्टियाँ बिताने का एक तरीका
समझते हैं. ठीक भी है. परन्तु मेरी समझ
के अनुसार यात्रा एक तलाश होती है--अपनी और उस अछोर जीवन की,
उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक
कड़ी है. इसीलिए हर यात्रा से कुछ न कुछ मिलता जरुर है.
यात्राएँ
हमें भीतर से समृद्ध करती हैं. हमारे जीवन को गहराई देती है. हमें
देना और जीना दोनों सिखाती हैं. किसी भोर का उगता सूरज,
कोई बल खाती अल्हड़ नदी के मंत्रमुग्ध कर देने वाले गीत की स्वर-लहरी, दूर-दूर तक फ़ैला कोई
मैदान, या चारागाह या फ़िर दूर-दूर तक
फ़ैली, नीलगगन को स्पर्ष करती प्रतीत होती पर्वतों की
श्रेणियाँ, कोई सिंदुरी शाम, दूर कहीं
किसी गाँव से आती ढोल-ढमाके की थाप, तांसे,
झांझ-मंजीरों आदि की झंकार या फ़िर शहनाई की
कोई मीठी सुरीली धुन, पीछे छूटती दृष्यावलियां, हमारे भीतर रच-बस जाती है. यही
तो हम सब के जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर मेंजगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिसकी आभा में हम उस सब को
पहचान पाते हैं, जो हमारा अपना जीवन है.
इस
विराट प्रकृति की वंदना करते हुए मुझे बरबस ही श्री नरेश मेहता जी कि कविता-"चरैवेती-जन-गरबा"की याद हो आती है.
वे लिखते हैं.(एक अंश)
चलते
चलो, चलते चलो,
/ सूरज के संग-संग चलते चलो, / चलते चलो....../नदियों ने चलकर ही सागर का रूप लिया/ मेघों ने चलकर ही धरती को गर्भ
दिया / रुकने का मरण नाम / पीछे सब
प्रस्तर है / आगे है देवयान, / युग के
ही संग-संग चलते चलो /. मानव जिस ओर
गया नगर बसे / तीर्थ
बने /तुमसे है कौन बड़ा / गगन-सिंधु मित्र बने / भूमा का भोगो सुख, / नदियों का सोम पियो / त्यागो सब जीर्ण वसन / नूतन के संग-संग चलते चलो.
बस, इसी तरह चलते-चलते हम कब 6050 मीटर की ऊँचाई पर स्थित कालपा आ
पहुँचे., पता ही नहीं चल
पाया. मुझे होटेल में जो कमरा अलाट किया गया था, वह पहली मंजिल पर था, जहाँ से बैठकर मैं किन्नौर
कैलाश की अद्भुत छटा को जी भर के निहार रहा था. अद्भुत-अकल्पनीय. एक ऐसा दृष्य, जिसे
मैंने पहले कभी नहीं देखा था. आँखें पलक झपकना ही भूल गई थीं.
तभी तो श्रीकृष्ण जी ने हिमालय के बारे में भगवत गीता में कहना पड़ा-"मेरा निवास
पर्वतों के राजा हिमालय में है."इसी तरह स्वामी विवेकानंद जी ने हिमालय
को महिमा मण्डित करते हुए कहा था-"हिमालय प्रकृति के समीप है. वहाँ अनेक देवी-देवताओं का निवास है. महान हिमालय...देवभूमि."
किन्नर
कैलाश हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में तिब्बत सीमा के समीप है. यह स्थान हिन्दू
धर्म में आस्था रखने वालों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है. इस पर्वत की खास विशेषता है कि समुद्र तल से 17200 फ़िट की ऊँचाई पर 79 फ़िट का प्राकृतिक शिवलिंग है, जो दिन में कई बार
रंग बदलता है. सूर्योदय से पहले सफ़ेद, दूर्योदय
होने पर पीला, मध्यान्ह काल में लाल, फ़िर
शाम के समय काला हो जाता है.
ऐसा क्यों होता है? इस रहस्य का पता आज तक कोई नहीं लगा पाया है.
किन्नौर
के निवासी इसको दिव्य शक्ति का चमत्कार मानते हैं. हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये
स्फ़टिकीय रचना है. अतः अलग-अलग दिशाओं
से पड़ने वाली सूर्य की किरणों के कारण इसका रंग बदलता रहता है.
किन्नर कैलाश का
पौराणिक महत्व- किन्नर कैलाश के बारे में बहुत सी मान्यताएं
प्रचलित है. ऐसी भी मान्यता है कि इसी पर्वत पर पहली बार शिव और
पार्वती का मिलन हुआ था. कुछ विद्वानों का कहना है कि
महाभारत काल में किन्नर कैलाश का नाम "इन्द्रकीलपर्वत"था, यहाँ भगवान शिव और
अर्जुन का युद्ध हुआ था. साथ ही अर्जुन को पासुपातास्त्रकी प्राप्ति हुई
थी. एक मान्यता ये भी है कि पांडवों ने अपने वनवास काल का
अंतिम समय इसी जगह पर गुजारा था. किन्नर कैलाश को वाणासुर का
कैलाश भी माना जाता है. कुछ विद्वान तो ये भी कहते हैं कि
यहाँ भगवान कृष्ण के पोते अनिरुध का विवाह ऊषा से हुआ था.किन्नर
कैलाश हिमाचल प्रदेश का बद्रीनाथ भी कहलाता है. बहुत से लोग
इसे रॉककैसलके ( Rock Chaslche
)के नाम से भी जानते हैं. इस शिवलिंग की परिक्रमा करना
बहुत ही जोखिम भरा होता है.
चुंकि हमारा
भ्रमण-कार्यक्रम
चण्डीगढ़ से शुरु होकर शिमला, सराहन, सांगला,
काल्पा तथा काजा तक का था. अतः जाते समय
काल्पा में पूरा दिन. और लौटते समय भी हमें फ़िर से काल्पा
में रुकने का सुअवसर मिला और इस तरह हमें दो बार किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शनों का
पुण्य लाभ मिला. किन्नर कैलाश की परिक्रमा का कोई कार्यक्रम
हमारी भ्रंमण-सूची में था भी नहीं.
इसका नाम किन्नर
कैलाश कैसे पड़ा?
पुरातन काल में
में लिखी सामग्रियों के अनुसार किन्नौर के निवासी को किन्नर कहा जाता है. लोग
अक्सर इसका अर्थ यह भी लेते है कि किन्नर माने आधा नर और आधी नारी. जबकि किन्नर एक विशेष प्रकार के (छॊटे) देवता होते हैं, जो संगीत और गायन में विशेष दक्षता
रखते हैं और अपने से बड़े देवताओं को गा-बजाकर प्रसन्न रखते
हैं.
भारत मेंसंगीत की
परंपरा अनादिकाल से ही रही है. हिन्दुओं के प्रायः सभी देवी-देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है. विष्णु
के पास शंख है,, शिव के पास डमरू है, नारद
मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, वहीं भगवान श्रीकृष्ण के
पास बांसुरी है..
चुंकि गंधर्वों
और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना जाता है. खजुराहो का मन्दिर हो या
फ़िर कोणार्क का सूर्य मन्दिर. इनकी दीवारों पर गंधर्वों और किन्नरों
की मूर्तियाँ आवेष्ठित की गई है.
संगीत का विज्ञान- हिन्दू धर्म के अनुसार
संगीत मोक्ष प्राप्त करनेका साधन है. संगीत से हमारा मन और
मस्तिस्क पूर्णतः शांत और स्वस्थ हो सकता है. भारतीय ऋषियों
ने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से ही
विद्यमानथीं. उन ध्वनियों के आधार पर ही उन्होंने मंत्रों की
रचना की थी.
हमारे अपने देश
की लोक-संस्कृति
का मूल स्वर है "उत्सव".और "पर्वों"की परंपरा. पर्व
शब्द ही पर्वत से बना है. पहले कम ऊँचीं चोटी, फ़िर उससे ऊँचे, फ़िर उससे ऊँचे पर्वत दिखाई देते हैं,
जोसही अर्थों में "पर्व"ही है जो हमारी चेतना को उत्तरोत्तर ऊँचाइयों की ओर ले जाते हैं.
प्रकृति और मनुष्य
में गहरा रिश्ता है, अनादि
नाता है. उसने जो कुछ भी सीखा प्रकृति से ही सीखा है.
चलती हवा ने उसे मस्ती करना सीखाया. बहते
झरनों और नदियों की रवानी ने उसे गाना सिखाया. खिलते फ़ूलों
ने उसे मुस्कुराना सिखाया. नवस्पतियों से उसे शीतलता का आभास
हुआ. याद रखिए, जहाँ वनस्पति है,
वृक्ष हैं, हरियाली है, आसमान
से बातें करते पर्वत शिखर हैं, वहाँ राग होगा, प्रेम होगा.
किन्नर कैलाश अपनी
इन्हीं विशेषताओं के लिए जाना और माना जाता है. आप एक कोने में बैठकर जी भर के उसे निहारें.
फ़िर आँखे बंद कर उसकी पावन छवि को अपने मन-मस्तिस्क
की ओर ले जाएं. आपका चंचल मन धीरे-धीरे
स्थिर होने लगेगा. मन के शांत होते ही आपके अन्दर एक अद्भुत
संगीत बजने लगेगा. एक ऐसा संगीत, जिसे
किन्नर अपने आराध्य देव महादेव को प्रसन्न रखने के लिए बजाया करते हैं.( एक अनुभव जो मुझे हुआ)
बिनासंगीत केजीवन राग कैसे बज सकता है? जिनके जीवन में संगीत
नहीं हैं, प्रेम नहीं है वे रोजमर्रा के तनाव और दवाबों के
चलते लोग खुद से हारने के आदि हो जाते हैं. हारा हुआ आदमी
अपने आपको अक्षम, अवश और निःसहाय समझने लगता है. थके हुए मन और शिथिल देह के साथ उलझन से घिरे जीवन में किसी रस की
निस्पत्ति नहीं होती. "रस"याने
आनन्द. आनंद का न होना, ही आदमी को
नैराश्य के भंवर में डूबो देने के लिए पर्याप्त है. अतः नीरस
जीवन को रसमय बनाने के लिए "यात्रा"ही एक ऐसा मौका है...अवसर है, जब
हम और आप अपने ही बुने जाल से बाहर झांकने की हिम्मत जुटा सकते हैं.
यह सब लिखते हुए
मुझे "अज्ञेय" जी की कविता की चंद लाईनें याद आती है
"मंदिर से,
तीर्थ से, यात्रा से हर पग से, हर सांस से कुछ मिलेगा, अवश्य मिलेगा, पर उतना ही जितने का
तू है अपने भीतर से दानी"
(
पार्श्व में किन्नर कैलाश दृष्टव्य है )
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5.
3
बाल साहित्य
संगोष्टी के बहाने उत्तराखण्ड की यात्रा.
इसी
माह की तेरह तारीख को मैं उत्तराखण्ड से वापिस लौटा हूँ. उत्तराखण्ड जाने का
कार्यक्रम अनायास ही नहीं बना था,बल्कि यह प्रायोजित था. जाखनदेही(अल्मोडा) के मेरे अपने
मित्र श्री उदय किरोलाजी,जो एक जानदार त्रैमासिक पत्रिका”बाल-प्रहरी”के संपादक
हैं,और वर्ष में एक बार राष्ट्रीय बाल संगोष्ठी का कार्यक्रम उत्तराखण्ड के किसी
खास स्थान पर आयोजित करते हैं. ऎसा करने के पीछे उनका मकसद होता है कि ज्यादा से
ज्यादा संख्या में बाल-साहित्यकार वहाँ आएं और अपनी रचनाधर्मिता के साथ-साथ पर्यटन
का भी आनन्द उठाएं. जून २००९ की तेरह-चौदह तारीख को उन्होंने अपना कार्यक्रम
भीमताल(नैनीताल) में रखा और मुझे निमंत्रण-पत्र भेजने के साथ ही फ़ोन पर भी आग्रह
किया कि मैं वहाँ पहूँचु. भीलवाडा(राजस्थान) के मेरे अभिन्न मित्र,डा,श्री
भैंरुलाल जी गर्ग, जो मासिक पत्रिका” बालवाटिका” के संपादक है, का फ़ोन आया और
उन्होंने भी वहाँ साथ चलने का आग्रह किया था. इस तरह मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ
कि मैं नैनादेवी के दर्शन लाभ उठा सका. इस यात्रा में मेरी धर्मपत्नि श्रीमती
शकुन्तला यादव भी साथ थीं.
सन
२००९ के बाद से मैं नीजि कारणॊं से, किरोलाजी के कार्यक्रम में नहीं जा पाया था.
उन्होंने सन 2010 में मसूरी, 2011 में
जोशीमठ तथा २०१२ में अल्मोडा जैसे पवित्र एवं जगप्रसिद्ध पर्यटन-स्थल पर कार्यक्रम
किए थे. इस वर्ष उन्होंने अपना कार्यक्रम उत्तरकाशी में रखा. निमंत्रण-पत्र
भिजवाया,साथ ही फ़ोन पर आने का आग्रह भी किया था. मैंने अपने कुछ मित्रों को साथ
चलने को कहा. दो मित्र श्री आर.एम.आनदेव तथा श्री डी.पी.चौरसियाजी जाने को उद्दत
हुए. कार्यक्रम की रूपरेखा बनाते समय हमने तय किया कि यमुनोत्री-गंगोत्री-
केदारनाथ तथा बदरीनाथजी की भी यात्रा करेंगे. इस तरह छिन्दवाडा से दिल्ली के बीच
प्रतिदिन चलने वाली पातालकोट एक्सप्रेस से हमने अपनी-अपनी सीटें आरक्षित करवायी.
इस बार मैंने अपने चौदह वर्षीय पोते श्री दुष्यंत को भी साथ ले जाने का मानस बनाया
कि वह पर्यटन के साथ-साथ कार्यक्रम में भाग ले सके. यात्राक्रम में आंशिक परिवर्तन
करते हुए मैंने हरिद्वार-देहरादून तथा मसूरी को भी जोडा और इस तरह हम छिन्दवाडा से
दो जून को रवाना हुए.
तीन
जून को हम सराय रोहिल्ला स्टेशन पर सुबह आठ बजे पहुंचे. वहाँ से बस द्वारा
हरिद्वार शाम छः बजे पहुंचे. शाम के वक्त ही गंगाजी में स्नान किया,क्योंकि दूसरे
दिन सुबह हमें देहरादून के लिए निकलना था. गंगाजी में इस समय बाढ चल रही
थी.स्थानीय लोगों ने बतलाया कि ऊपर खूब पानी बरसा है. तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार
श्री गर्गजी भी अपने परिवार के साथ देहरादून पहुँचने वाले थे. हम लोग 5
जून को देहरादून से सुबह साढे पांच बजे की बस से यमुनोत्री के लिए निकले.
यमुनोत्री यहाँ से लगभग 273 कि.मी. की दूरी पर अवस्थित है.
पहाडी इलाके से प्राय़ः सभी बसें इसी समय रवाना होती है,क्योंकि एक तो रास्ते का
चौडीकरण का काम चल रहा है और दूसरा रास्ते में अंधे मोड भी आते रहते है. रास्ता पहाडॊं
की ढलान से सटकर चलता है. हजारॊं फ़ुट गहरी खाईय़ों, घने जंगलों के बीच रेंगती हमारी
बस धीरे-धीरे आगे बढ रही थी. बडकोट से टैक्सी लेकर हम लोग दो बजे के करीब
जानकीचट्टी पहुँचे. जानकी चट्टी से से यमुनोत्री के लिए एकदम सीधी खडी चढाई 5 किमी.की है. हम चाहते तो उसी दिन माँ यमुना के उद्गमस्थल के दर्शन कर
सकते थे. लेकिन बारिश के चलते, हमने उसे अगले दिन के लिए टालना ही उचित समझा और
पास के बने एक मकान को किराए पर उठाया और रात्रि विश्राम किया.
इसी
मकान के पास श्री तरपनसिंह राणा (मोबाईल नम्बर 09411363167-09012863957) की होटल है. शाम की चाय और रात्री का भोजन हमने यहीं किया. बातों ही
बातों में पता चला कि उसके पास चार खच्चर है और वह सात सौ रुपया प्रति खच्चर के दे
सकता है. यदि इससे ज्यादा खच्चर चाहिए तो वह हमें उपलब्ध करवा देगा. एक तो रात भर
बारिश होती रही.ऎसे समय में रास्ता फ़िसलन भरा हो जाता है और फ़िर सीधे खडॆ पहाड पर
चढना हम जैसे उम्रदराज लोगों के लिए तो एकदम असंभव सा है.
चार बजे जगा दिया था,लेकिन नस-नस में आलस भरी हुई थी और आँख थी कि खुल
नहीं पा रही थी. इसके पीछे मुख्य कारण यह रहा कि हम एक अजनबी जगह पर थे और शाम चार
बजे के बाद से कमरें में बिजली नहीं थी. किसी तरह मोमबत्ती जलाकर कम्ररे को रोशन
करते रहे थे. फ़िर कमरा भी हवादार नहीं था. किसी को भी चैन की नींद नहीं आयी थी.
किसी तरह पांच बजे हम तैयार हो पाए और चाय लेकर निकल भी नहीं पाए थे कि चार खच्चर
तैयार खडॆ थे. तीन खच्चर हम लोगो के लिए थे और एक श्री गर्गजी के लिए था. भाभीजी
के लिए पिठ्ठु की व्यावस्था की गई थी. शेष सदस्यों ने पैदल चलकर यात्रा करने का
मानस बना लिया था.
खच्चर
पर बैठना भी किसी तपस्या से कम नहीं होता. शरीर को उसकी चाल के अनुसार साध कर रखना
होता है और जिन्स से लगे हुक को मजबूती से पकड कर रखना होता है. कमर से ऊपर के भाग
को सामने की ओर झुकाकर बैठना होता है,क्योंकि खच्चर ऊपर की ओर चढ रहा होता है, ऎसा
किए जाने से सवार को बैठने मे आसानी होती है और संतुलन भी बना रहता है. खच्चर सवार
को इस बात का भी ध्यान रखना होता है कोई चट्टान सर के ऊपर तो नहीं आ रही है. जरा
सी भी असावधानी, किसी बडी दुर्घटमा को अंजाम दे सकती है. अतः यहाँ सावधानी बरतना
तथा चौकस रहना अति आवश्यक है.
जैसे-जैसे
हम आगे बढते हैं,प्रकृति के पल-प्रतिपल बदलते अद्भुत सौंदर्य को देखकर मन खुश हो
जाता है. चारों तरह आसमान से बातें करती पर्वत श्रेणियाँ, रंग-बिरंगे पेड, कहीं
पहाडॊं की कोख से फ़ूटकर निकलता झरना, पहाडी गीत सुनाने लगता है. अपने वेग में
इठलाती, बलखाती, शोर मचाती, छोटी-बडी चट्टानों से कूदती-फ़ांदती यमुना जी का अद्भुत
रुप देखकर मन, न जाने किस नयी दुनियां की ओर उडा चला जाता है. कई घुमावदार
–तेढे-मेढे रास्तों से गुजरते हुए हम कब यमुनोत्रीजी के करीब पहुँच गए थे, पता ही
नहीं चल पाया.
एक
निश्चित दूरी पर सारे खच्चर रोक दिए जाते हैं और अब यत्रियों को पैदल चलते हुए पुल
पार करना होता है. रास्ते में जगह-जगह प्रसाद बेचने वालों की दूकाने सजी होती है.
यात्री पूजा की सामग्री लेकर आगे बढता है. देवी के दर्शनों से पहले नहाना जरुरी
होता है. ऊपर गरम पानी का कुंड है,जिसमें से भाप निकलते देखा जा सकता है. शरीर के
पोर-पोर में जमी ऎंठन और ठंडक पानी में उतरते ही रफ़ुचक्कर हो जाती है. यात्री यहाँ
जी भर के अपने शरीर को गरम पानी से गर्माता है और फ़िर कपडॆ बदलकर माँ के दर्शनार्थ
आगे बढ जाता है. यहाँ पुरुषों और महिलाओं के नहाने की अलग-अलग व्यवस्था बना दी गई
है.
माँ
यमुना के दर्शन कर यात्री कृतार्थ हो उठता है. मन्दिर के समीप ही सूर्यकुंड है,जिसमे
भक्तगण चांवल की पोटली डालकर, उसके पक जाने का इन्तजार करता है और पके हुए चांवल
को प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है.
यह धाम समुद्र सतह से
10,800 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है. आसपास के सभी पर्वत शिखर हिमाच्छादित हैं.
दुर्गम चढाई के कारण श्रद्धालु इस उद्गम स्थल को देखने से वंचित रह जाते है. अतः
मन्दिर का निर्माण ऎसी जगह किया गया है, जहाँ आम आदमी आराम से पहुँच सकता है. इसी
ग्लेशियर से माँ यमुना निकलती है और अपने पूरे वेग से साथ नीचे उतरती हैं.
गढवाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी
जिले में स्थित यमुनोत्री चारधाम यात्रा का पहला पडाव है. यमुना नदी का स्त्रोत,
कालिंदी पर्वत पर है. यमुनोत्री का वास्तविक स्त्रोत बर्फ़ की जमी हुई एक झील और
हिमनद चंपासर ग्लेशियर है. यमुनोत्री मंदिर परिसर 3235
मी.ऊँचाई पर स्थित है. मन्दिर प्रागंण में एक विशाल शिला स्तम्भ है,जिसे दिव्यशिला
के नाम से जाना जाता है. माह मई से अक्टूबर तक यहां यात्रा की जा सकती है. शीतकाल
में यह स्थान पूर्णरुप से हिमाच्छादित रहता है. मोटरमार्ग का अंतिम बिंदु हनुमान
चट्टी है. हनुमान चट्टी से मंदिर तक 14कि.मी.पैदल चलना होता
था किंतु अब हलके वाहनों से जानकीचट्टी तक पहुंचा जा सकता है,जहाँ से मन्दिर मात्र
पांच कि.मी.दूर रह जाता है. पाँच कि.मी.तक का यह
रास्ता घुमावदार एवं सीधी खडी चढाई वाला है, जिसे खच्चर,पिठ्ठु की सहायता
से अथवा पैदल चलते हुए जाया जा सकता है.
देवी यमुनाजी के
मन्दिर का निर्माण टिहरी गढवाल के महाराजा
प्रतापशाह द्वारा किया गया था.यमुना के जल की शुद्धता,एवं पवित्रता के कारण
भक्तजनों के मन में इसके प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति उमड पडती है. पौराणिक
मान्यता के अनुसार असित मुनि की पर्णकुटी इसी स्थान पर है. देवी यमुना के मन्दिर
तक की चढाई का मार्ग सकंरा, दुर्गम और रोमांचित कर देने वाला है. मार्ग के अगल-बगल
में स्थित गगनचुंबी, मनोहारी,बर्फ़ से ढंकी चोटियाँ ,घने जंगल की हरितिमा यात्रियों
का मन बरबस ही मोह लेती है. यमुनोत्री मन्दिर के आसपास के क्षेत्र में अनेक गर्मजल
के सोते हैं. इन सोतों में सबसे प्रसिद्ध कुंड “सूर्यकुंड” है,जो अपने उच्चतम
तापमान के लिए विख्यात है. भक्तगण इस कुंड में चावल की पोटली,जो प्रसाद आदि के साथ
सहज में ही उपलब्ध हो जाती है,इसी कुंड के गरम पानी में डालकर पकाते हैं और उसे
प्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं. सूर्यकुंड के समीप ही एक दिव्यशिला है. इसे
ज्योतिशिला भी कहते हैं. माँ यमुना की पूजा से पहले इस शिला की पूजा करने का नियम है.
ग्रीष्मकाल के दिन सुहावने और रातें काफ़ी सर्द रहती है. यहां का न्युनतम तापमान 5 डिग्री..तथा अधिकतम 20 डिग्री.तक रहता है.
दर्शनों के बाद
यात्री होटलों में चाय-नाश्ते के लिए रुकता है. खच्चर वाले इस इन्तजार में रहते
हैं कि कब उसका सवार वापिस आता है और वह वापिस हो सके. वापसी की यात्रा ज्यादा
खतरनाक हो उठती है,क्योंकि अब खच्चरों को नीचे उतरना होता है. खच्चर वाले पहले से
आगाह कर देते हैं कि सवार अपने शरीर को पीछे झुकाकर बैठे और पीछे लगे हुक को कसकर
पकड ले.. यदि सवार असावधान रहा तो उसके सिर के बल गिरने के ज्यादा आसार होते हैं,
ऊपर चढने वाले खच्चरों का रैला, पैदल चढाई करने वाले यात्रियों के झुंड और झुकी
हुई चट्टानों को भी ध्यान में रखना होता है. कभी-कभी थॊडी सी भूल अथवा असावधानी से
जाम लग जाता है.,जिससे यात्रा में घंटॊं बरबाद होते हैं. अतः यहाँ चौकस और सावधान
रहना अत्यंत आवश्यक होता है.
आसमान यहाँ हमेशा
बादलों से अटा पडा रहता है. कब बारिश हो जाए और कब हवा, तूफ़ान का रुख अख्त्यार कर
ले,कहा नहीं जा सकता. अतः यात्रियों को चाहिए कि वह अपने साथ बरसाती अथवा छाता
लेकर जरुर चले. गनीमत थी कि हमारे साथ ऎसा कुछ भी नहीं हुआ और हम दोपहर दो बजे के करीब अपने ठिकाने पर वापिस आ गए थे.
राणा के अस्थायी होटल
में हम आकर बैठे ही थे कि बादलों ने अपने रंग दिखाने शुरु कर दिए और बूंदा-बांदी
होने लगी, तब से लेकर सारी रात, बारिश रिमझिम के तराने गाती रही. बिजली यहां
कभी-कभार ही आती है. सांझ ढलते ही काला-कलुटा अंधियारा, कुण्डली मारकर चहुंओर पसर
गया था. दिन में बहुत ही खूबसूरत दिखाई देने वाली बर्फ़ीली चोटियाँ अब डराने से लगी
थी. हवा भी चल निकली थी, अपने साथ बर्फ़ीली ठंडक लिए हुए. यहाँ आने वाले यात्रियों
को चाहिए कि वह अपने साथ ऊनी कपडॆ लेकर जरुर चलें
राणाजी के चुल्हे के
आसपास बैठकर हम अपने शरीरों को गरमा रहे थे. भूख भी अब जोरों से लग आयी थी. राणा
को हमने टमाटर की खट्टी-मीठी सब्जी बनाने को कहा. तवे से उतरती गर्मा-गरम रोटियां
और टमाटर की सब्जी खाने में बडा मजा आ रहा था. रात काफ़ी बीत चुकी थी. अब हमें आराम
करने की जरुरत थी और सुबह पांच बजे उठना भी था क्योंकि राज्य परिवहन की बस सुबह
साढे पांच बजे उत्तरकाशी के लिए रवाना होती है. आगे की यात्रा पूरे सात घंटॊं की
थी. यात्रियों की संख्या देखकर पहले से टिकीट लेकर अपनी सीटें आरक्षित करना जरुरी
लगा था हमें, ताकि आगे की यात्रा आराम से कट सके. “सुबह जल्दी उठना है” के चक्कर
में रात बेचैनी में कटी. बारिश अब भी अपने पूरे शबाब पर थी. पहाडी इलाकों के चलने
वाले बसें सुबह ही रवाना हो जाती है.क्योंकि रास्ता पहाडॊं को काट कर बनाया गया है
जो अत्यधिक ही संकरा होता है और दूसरा यह कि रास्ते में अनेक घुमावदार मोड भी आते
हैं. अतः दोपहर दो बजे के बाद कोई भी बस यहां से रवाना नहीं होती. यदि रवाना भी
होती है तो बड़कोट पर आकर रुक जाती है. हाँ, टैक्सी वाले जरुर मिल जाते हैं ,लेकिन
इसमें खतरे है, अतः यात्रियों को चाहिए कि वह जल्दबाजी के चक्कर में न पडॆ,तो
बेहतर है..
दिनांक 7 जून -दोपहर
दो बजे के लगभग हम उत्तरकाशी आ पहुँचे. हमारे रुकने की व्यवस्था पंजाब-सिंध
धर्मशाला में की गई थी. कहने के लिए वह धर्मशाला थी, लेकिन किसी थ्री-स्टार होटल
से कम न थी. उस धर्मशाला की दीवार, ठीक गंगाजी के तट कॊ छूती हुई थी. कमरे के
सामने बेंचे लगा दी गई थी, जहाँ से बैठकार आप गंगाजीके दर्शन आराम से कर सकते हैं.
करीब तीन सौ मीटर नदी का पाट रहा होगा. गंगा मे इस समय बाढ आयी हुई थी,सो उसकी
गर्जना की आवाज सुनकर भय की प्रतीती होती थी.(फ़ोटॊ-६)
शाम चार बजे से
कार्यक्रम शुरु होना था. नहा-धोकर हम कार्यक्रम में शरीक होने के लिए पहुँचे.
कार्यक्रम म्युनिस्पल के बडॆ हाल में होना था, जो इस जगह से थॊडी दूर पर ही
अवस्थित था. कु.गरीमा किरौला, मंजु रावत,जिया, खजानसिंह एवं देवाशीष ने हमारा
स्वागत किया. हमने अपना पंजीकरण कराया और ठीक साढे चार बजे बाल-काव्य गोष्ठी का
दौर शुरु हुआ. इसमे करीब तीस बच्चों ने
काव्य-पाठ किया. डा.श्री. रामनिवास मानवजी की अध्यक्षता एवं डा श्री
हरिशचन्द्र बोरकर,श्री गोविन्द भारद्वाज,एवं डाक्टर श्री भैंरुलालजी गर्ग की
गरीमामय उपस्थिति में इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई,जिसका संचालन स्वयं श्री उदय
किरौला ने किया. “बाल साहित्य में बाल पत्रिकाओं का योगदान” विषय पर डा.गर्गजी ने
अपना उद्बोधन दिया. दुसरे दिन अर्थात दिनांक 8 जून को सुबह नौ बजे पहले सत्र में
स्वागत संबोधन के साथ स्लाइड शो(अब तक की यात्रा) के माध्यम से बालप्रहरी के
विभिन्न कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी गई. दस बजे-बाल साहित्य में विज्ञान
लेखन”विषय पर पैनल द्वारा खुली चर्चा आयोजित
की गई. श्री गुरुवचनसिंह की अध्यक्षता एवं श्री राजीव सक्सेना, डा उमेश
चमोला,श्री विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी की गरीमामय उपस्थिति में इस कार्यक्रम की
शुरुआत हुई. दो बजे “बाल विज्ञान कहानी विश्लेषण”पर श्री एसपी.सेमवाल, डा.मोहम्मद
अर्शद,डा.महावीर रवांल्टा की उपस्थिति में बाल कहानियों पर विस्तार से चर्चा की
गई. इस कार्यक्रम का संचालन श्री प्रमोद पैन्यूली ने सफ़लतापूर्वक किया. शाम चार
बजे” बाल विज्ञान कविता विश्लेशन” के अन्तर्गत डा परशुराम शुक्ल,श्री रमेश
तैलंग,राज्रेश उत्साही की उपस्थिति में इस विषय पर श्री घमन्डीलाल अग्रवाल,डा.
शेषपाल शेष,अखिलेश निगम,देशब्न्धु शाहजहांपुरी, ने अपनी कविताओं का वाचन करते हुए
उसे विश्लेषित किया. शाम पांच बजे डा. मधु भारती की अध्याक्षता में तथा डा श्री
अशोक गुलशन,श्री मुरलीधर पाण्डॆय,श्री अश्विनी पाठक की गरीमाय उपस्थिति में काव्यपाठ
का आयोजन हुआ. इस कार्यक्रम का सफ़ल संचालन श्रीमती मंजु पाण्डॆ तथा डा.दीपा
काण्डपाल ने किया. तीसरे दिन अर्थात दिनांक
नौ जून को सुबह नौ बजे “ बाल साहित्य का शिक्षण” विषय पर डा. प्रीतम
अपच्छ्याण, मनोहर चमोली एवं रेखा चमोली की उपस्थिति में बच्चों ने कक्षा के
अनुभवों पर खुली चर्चा की. सम्मान एवं समापन सत्र में डा. राष्ट्रबंधु जी की
अध्यक्षता में न्यायविद श्री मुरलीधर वैष्णव ,श्रीमती विमला भंडारी,
डा.अमरेन्द्रसिंह, श्री खजानसिंह की उपस्थिति में डा. शेषपालसिंह शेष, डा.मधु
भारती, श्री गोविन्द भारद्वाज,डा, महावीर रवांल्टा, डा.श्री परशुराम शुक्ल,
डा.विमला भंडारी, डा,मोहम्मद अरशद खान,, श्री आशीष शुक्ला, डा.घमंडीलाल अग्रवाल,
एवं श्री मनुज चतुर्वेदी”भारत” का शाल ,श्रीफ़ल एवं ,संस्था का स्मृति-चिन्ह देकर
सम्मानीत किया गया एवं अन्य विद्वतजनॊं को स्मृति-चिन्ह प्रदान किए गए.
कार्यक्रम
की समाप्ति के बाद हमारे पास कुल देढ दिन का समय बचा था. हमारा वापसी का टिकिट
सराय रोहिल्ल(दिल्ली) से दिनांक 11 जून का था और इस बीच हमें गंगोत्री और केदारनाथ
भी जाना था. इतने कम समय में केवल एक स्थान पर ही जाया जा सकता था. अंततः यह तय
हुआ कि गंगोत्री की यात्रा की जा सकती है. केदारनाथ की यात्रा संभव नहीं लग रही
थी. हमारे पास केवल एक उपाय शेष था कि किसी तरह टिकिट कैंसल होकर आगे की तिथि की
हो जाए, तो केदारनाथ भी जाया जा सकता है. अतः हमने आठ तारीख को कलेक्टोरेट जाकर
टिकिट निरस्त कराने और नया टिकिट तेरह तारीख की जारी करवाने की सोची..सनद रहे कि
उत्तरकाशी में रेललाईन न होने की वजह से वहां कोई टिकिटघर नहीं है अतः टिकिट जारी
नहीं की जा सकती थी. इस समस्या को हल करने के लिए कलेक्टोरेट में अतिरिक्त
व्यवस्था की गई है. लेकिन उस दिन दूसरा शनिवार होने के नाते कार्यालय बंद था. अतः
हमारी योजना पर पानी फ़िर गया. अब केवल एक चारा बचा था कि हमें तत्काल ही गंगोत्री
के लिए रवाना हो जाना चाहिए.
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद हमारे सारे मित्रगण टैक्सी लेकर रवाना हो
चुके थे. टैक्सी के लिए कम से कम दस सीटॊं की आवश्यकता होती है. लेकिन हम केवल तीन
लोग थे. और हमें कम से कम सात लोगो के साथ की जरुरत थी. संयोग से श्रीमती मंजु
पाण्डेजी, के ग्रुप मे उनके अतिरिक्त चार महिलाएं और थीं,जिन्हें गंगोत्री जाना
था,का साथ मिल गया और इस तरह हम गंगोत्री के लिए निकल पडॆ.(फ़ोटॊ-७)
उत्तरकाशी से गंगोत्री की दूरी 172 किमी.है. भटवारी,झाला, लंका और
भैरोंघाटी होते हुए गंगोत्री पहुंचा जा सकता है. अमुनन इस रास्ते को पार करने में
कम से कम सात घंटे का समय लगता है. यात्रा की शुरुआत से लेकर भागीरथी, हमारे साथ
चलती रहती है. कभी आँखों से ओझल हो जाती है फ़िर थॊडी देर बाद प्रकट हो जाती है.
पहाडॊं की अनवरत श्रृंखला भी हमारे साथ –साथ चलती रहती है. लेकिन आज वे उदास हैं.
पहाडॊं का अन्यतम मित्र वृक्ष ही होता है,जो आज विलुप्त होने की कगार पर है.
वृक्षविहीन पहाडॊं पर छाई उदासी को देखकर मन में अपार पीडा होती है भीमकाय जेबीसी
मशीनें उनकी छाती को छील रही होती है. जगह-जगह पर पत्थर-मिट्टी.के ढेर आवागमन में
बाधा बनने का कारण बनते हैं. पैसा कमाने की होड में लोगो ने सडकों तक अपने मकानों
को फ़ैला रखा है और तो और उन लोगों ने पहाड की ढलान पर से सिंमेंट-कांक्रीट के पिल्लर
खडॆ करके अपने साम्राज्य खडॆ कर लिए हैं. विकास के नाम पर यदि इसी तरह का दुष्चक्र
चलता रहा तो एक दिन हम विनाश को रोके, रोक नहीं पाएंगे.
उत्तराखण्ड का सुप्रसिद्ध तीर्थ गंगोत्री है,जो गंगाजी का उद्गमस्थल है.
यहाँ गंगोत्री में गंगा का नाम भागीरथी है. भागीरथ ने यहाँ रहकर गंगाजी को प्रसन्न
करने के लिए कठिन तप किया था .इसलिए इस स्थान से बहने वाली गंगाजी का नाम भागीरथी
पडा. गंगोत्री धाम 10,300 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है. वास्तव में भागीरथी का उद्गम, गंगोत्री से भी
तीस किमी आगे ऊपर की ओर गोमुख में है, जहाँ अत्यन्त विस्तृत हिमनद के नीचे से
भागीरथी का जल प्रवाहित होता है. गोमुख तक पहुंच पाना इतना आसान नहीं है. इसलिए
गंगाजी का मन्दिर ऎसे स्थान पर बनाया गया है जहां आम आदमी आराम से पहुँच सकता है.
यहां का जल अत्यधिक स्वच्छ होता है गंगोत्री में श्रीमती
मंजुजी पाण्डॆ के परिचित गुरुजी पं.श्री दिनेश प्रसादजी ने डालमिया मंगलम
निकेतन”नामक अपना भवन बना रखा है,जिसमे उनके शिष्यादि आकर रुकते हैं. उन्होंने
रात्रि में विश्राम करने के लिए कमरे खोल दिए. यह हमारा सौभाग्य ही था कि हमें
यहां रुकने की उत्तम व्यवस्था मिल गयी,अन्यथा उस दिन की अत्यधिक भीड के चलते हम
इतनी आरामदायक जगह की कल्पना तक नहीं कर सकते थे. यह भवन गंगाजी के दूसरे छोर पर
अवस्थित है,जहां से बैठकर आप मन्दिर के दर्शन कर सकते हैं.
रात्रि
में ही हमने मां गगाजी के दर्शन किए. वहीं तट पर बने होटल में रुचिकर भोजन का
आनन्द लिया. रात्रि में विश्राम किया और बडी सुबह हम उसी टैक्सी से उतरकाशी के लिए
रवाना हो गए. उत्तरकाशी से गंगोत्री जाना और वहां से वापसी के लिए हमने पहले से एक
टैक्सी को बुक कर रखा था.उत्तरकाशी आकर रुकना हमें उचित नहीं लगा, क्योंकि हमारे
पास समय की बेहद कमी थी. यदि हम वहाँ रुक भी जाते तो किसी भी कीमत पर सराय
रोहिल्ला(दिल्ली) नहीं पहूँच पाते. सराय रोहिल्ला से छिन्दवाडा वापसी की ट्रेन दिन
के साढे बारह बजे खुलती है. अतः हमारा ऋषिकेश तक पहुँचना बहुत जरुरी था. वहाँ से
हमें दिल्ली की ओर प्रस्थान करने वाली बसें मिल सकती थी. मंजुजी एवं उनकी मित्र
मण्डली उत्तरकाशी में रुकते हुए यमुनोत्री के दर्शनार्थ जाना चाहती थीं. लेकिन
मंजुजी की तबियत अचानक खराब होने लगी और उन्होंने अपना कार्यक्रम निरस्त किया और
हमारे साथ ही ऋषिकेश तक चलना उचित समझा. यहाँ आकर उन्हें हल्द्वानी जाने के लिए
बसें मिल सकती थीं. अतः हमने टैक्सी वाले से बात की और वह किसी तरह तीन हजार पांच
सौ रुपयों में ऋषिकेश तक चलने के लिए राजी हो पाया था.
रात के बारह बजे के करीब हम लोग ऋषिकेश के बस-स्टैण्ड पर पहुंचे. बस से
उतरते ही मंजुजी को हल्द्वानी की ओर जाने वाली बस मिल गई और हमें दिल्ली की ओर
प्रस्थान करने वाली बस. सुबह पांच बजे हम दिल्ली के बस-स्थानक पर पहुंचे. अब हमारे
पास पर्याप्त समय था,जब हम अपनी ट्रेन आराम से पकड सकते थे.
तेरह तारीख को दस बजे सुबह हम अपने घर पहुँच गए थे. निश्चित
ही यह यात्रा,अपने आप में एक रोमांचक यात्रा थी. ट्रेन से प्रतिध्वनित होती
छुक-छुक की आवाज, स्टेशनो पर उतरते और सवार होते नए-नए यात्री के साथ यात्रा करना,
उनके सुख-दुख में शामिल होना, कुछ अपनी बताने और कुछ उनसे सुनने की लगन, चाय-और
नाश्ते के लिए गुहार लगाते वैडरों की आवाज कानॊं में अब भी गूंज रही थी. ट्रेन से
उतरकर बस अतवा टैक्सी पकडकर आगे की यात्रा की तैयारी करना, रास्ते में अजनबी
पहाडॊं से होती मुलाकातें, विशालकाय पेडॊं से झरती ठंडी-ठंडी हवा के झोंकों में
सराबोर होते थे हम लोग .इन सब के चलते न जाने कितना समय बीत गया, ,इसकी ओर तनिक भी
ध्यान नहीं गया. एकदम नयी-निराली दुनियां,दुनियां में तरह-तरह के लोग, अलग-अलग
प्रदेशों से आए हुए लोग,जो सर्वथा अनजाने होते हैं,को देखना-समझना अच्छा लगता था.
फ़िर हमारा परिचय होता है अजनवी शहर से, जिसे हमने इससे पूर्व कभी देखा तक न था.
वहाँ के मन्दिरों से और एकदम अपरिचित सडकों और गलियों से, कार्यक्रम में मिलते
अपने चिर-परिचित साहित्यकारों से, इनमें कुछ एकदम नए भी होते थे ,जिनकी रचनाएं
हमने कभी किताबों-पत्रिकाओं में पढा था, एक दूसरे से परिचित होते,मिलते, कक्षा चौथी-पांचवीं
में पढते कविता सुनाते बच्चे, इसी क्रम में
कविता पढता और वाहवाही बटोरता, स्मृतिचिन्ह लेता सम्मानित होता मेरा अपना
प्यारा पोता दुष्यंत, कार्यक्रम की
समाप्ति के बाद फ़िर आता एक बिखराव का दौर. सब अपने-अपने रास्ते पर चल निकलते. इन सबके साथ बिताए गए पल रह-रह
कर याद आते रहे.
याद
आती रही हरिद्वार में उफ़नती-तेज बहाव में बहती पतित पवनी गंगाजी,जिसमें हम, सांझ
ढले स्नान करने पहुँचे थे. बहते पानी की गति इतनी तेज थी कि पांव जमीन पर टिक नहीं
पा रहे थे. रौद्ररुप दिखाति, जोरों से गरजतीं-उफ़नदी गंगा शायद अपना दुखडा सुना रही
थी कि उसके साथ, ये दो पैर का आदमी कितनी तकलीफ़ें दे रहा है उसे, शायद हमारे कान
सुन नहीं पा रहे थे या हम सुन पाने की स्थिति में नहीं थे. मन में तब एक ही कल्पना
साकार हो रही थी कि इसके उद्गम का स्वरुप कैसा होगा जिसे हमने, इससे पहले कभी देखा
था और न ही सुना था, जिसे हम निकट भविष्य में देखने जाने वाले थे.
फ़िर मुलाकात होती है उत्तरकाशी में स्थित
पंजाब-सिंध धर्मशाला की भव्य इमारत से सटकर बहती हुई गंगा से. तब जाकर इसका
दुख-दर्द समझ में आया कि गंगा हरिद्वार में क्या कहना चाहती थी. दुखडॆ की कहानी
यहाँ आकर रुकती नहीं है,बल्कि उत्तरोत्तर उस ओर बढते हुए देखा और जाना कि कितना
अत्याचार मचा रहा है, तथाकथित नयी
टेक्नोलाजी का ज्ञाता आज का आदमी. विकास के नाम पर विनाश की लीला रचता, पहाडॊं की
छाती छोलकर सडक का निर्माण करता, नदी का रुख मोडता, बारुदी सुरंगे बिछाता आज का
आदमी शायद विकास के नाम पर विनाश के बीज बोता आज का आदमी. नदी-पहाडॊं की
सुनी-अनसुनी कर भी दें तो उसने अपना साम्राज्य बढाते हुए देवता के मन्दिर तक अपने
पैर जमा लिए हैं. समझ में नहीं आत्ता कि हम मन्दिर के प्रागंण में हैं या फ़िर
सिमेंट-कांक्रीट के घने जंगल में?
कितने
सपने- और न जाने कितनी ही सुकोमल भावनाएं लेकर हम वहाँ जा पहुँचे थे,जहाँ असीम
शांति की जगह, शहरों सी कोलाहल थी, भीड थी और मोटर-गाडियों का जमावडा था, बडी-बडी
अट्टालिकों में ऎश-ओ-आराम की सुख-सुविधाएं
पर्यटकॊं को लुभाने के लिए जगमगा रही थी. मैं इस बात पर भी गंभीरता से सोचने के
लिए विवश हो गया कि जब हम घर से चले थे तो मन में एक सोच थी कि हम देवों के देव
महादेव की ससुराल जा रहे हैं, जहाँ जाकर हमें असीम सुख की प्रतीती होगी, और हमें
देखने को मिलेगा मां यमुना और गंगा का अपना मायका, जहाँ वे बडॆ दुलार और प्यार के
साथ पली-बढीं और पहाडॊं से उतरकर चल पडी मैदानी इलाको की ओर, ताकि वे जन-जन की
पालनहार बन सकें. लेकिन दुर्भाग्य कि उनकी अस्मिता अपने ही घर के आंगन में
नोंच-खरोंच कर तार-तार कर दी गई.
सोच
का यह सिलसिला अभी थमा भी नहीं था कि माह जून की पन्द्रह तारीख की सुबह, इतनी
क्रूर और भयानकरुप से सामने आयी कि गुस्साई गंगा ने रौद्र रुप धारण कर लिया और
काली की तरह अपना विकराल रुप दिखलाते हुए सब कुछ लीलते जा रही है.- उसने सब कुछ
मटिया-मेट कर दिया,जो उसके बहाव में अपने पैर गडाए हुए थे. उसके इस क्रोध के चलते
न जाने कितने ही निर्दोष भक्तों की भी उसने बलि ले ली. शायद हमारे सबके लिए यह
उसकी ओर से एक चेतावनी मात्र थी,कि समय रहते संभल जाओ,अन्यथा और भी भयंकर परिणामों
के लिए तैयार रहो. अब यह समय, उस आदमीके लिए, सोचने-समझने और विचार करने का विषय
है तो विकास के बड़े-बड़े सपने देखते हुए मुंगेरीलाल बना घूम रहा है.
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6
छ्त्तीसगढ का
खजुराहो- भोरमदेव
\
मध्यप्रदेश
के उत्तरीय भाग में पन्ना एवं छतरपुर के मध्य स्थित “खजुराहो”, १० वीं एवं ११ वीं
शताब्दी में बने हिन्दु मन्दिरों के लिए विश्वविख्यात है. मन्दिरों के दीवालों पर
उत्कीर्ण मैथुनरत प्रतिमाएँ हमेशा से उत्सुकता के केन्द्र में रही हैं. इन्हें
देखने के लिए लाखों पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं.
ठीक
इसी तर्ज पर कवर्धा(छत्तीसगढ) से लगभग १७ कि.मी.पूर्व की ओर मैकल पर्वत श्रृंखला
पर स्थित ग्राम छपरी के निकट चौरागाँव नामक गाँव में स्थित है. छत्तीसगढ का
खजुराहों कहा जाने वाला “भोरमदेव” मन्दिर, न केवल
छत्तीसगढ अपितु समकालीन अन्य राजवंशों की
कला शैली के इतिहास में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है.
भोरमदेव के बारे में
काफ़ी कुछ मैं सुन चुका था और उसके बारे में पढ भी चुका था, लेकिन कभी इस बात का
ख्याल मन में नहीं आया कि समय निकालकर इसे देख आऊँ.और न ही कभी सोच पाया था कि
भविष्य में कभी वहाँ जा भी पाऊँगा. संयोग से मुझे वर्ष २००२ में प्रमोशन मिला और
मैं कवर्धा प्रमुख डाकघर में बतौर पोस्टमास्टर (H.S.G.1) के
पदस्थ हुआ. मन के कोने-अंतरे में दबी लालसा बलवती हो उठी, इस अनुपम कृति को अपनी
आँखों से जी भर देखने की. रविवार चुंकि डाकघर बंद रहता है, और इससे अच्छा मौका और
दूसरा हो नहीं सकता था. मैंने अपने मित्र श्री लक्ष्मीकांत ठाकुर से फ़ोन पर संपर्क
साधा और उन्हें कवर्धा आने का निमंत्रण दिया. वे उस समय दुर्ग के प्रधान डाकघर में
पोस्टमास्टर के पद पर कार्यरत थे. इस तरह हमने छत्तरपुर के खजुराहो नाम से
विख्यात” भोरमदेव” के दर्शन का लाभ उठाया.
११वीं
शताब्दी के अंत में( लगभग १०८९ ई.) निर्मित इस मन्दिर मे शैव, वैष्णव एवं जैन
प्रतिमाएँ भारतीय संस्कृति एवं कला की उत्कृष्टता की परिचायक है. इन प्रतिमाओं से
ऎसा प्रतीत होता है कि धार्मिक व सहिष्णु राजाओं ने सभी धर्मों के मतावलम्बियों को
उदार प्रश्रय दिया था.
किवदन्ती
है को गोंड जाति के उपास्य देव भोरमदेव( जो कि महादेव शिव का एक नाम है) के नाम पर
निर्मित कराए जाने पर इसका नाम “भोरमदेव” पड गया और आज भी इसी नाम से प्रसिध्द है.
मन्दिर
की स्थापत्य कला शैली मालवा की परमार शैली की प्रतिछाया है. छत्तीसगढ के
पूर्व-मध्यकाल(राजपूत काल) में निर्मित सभी मन्दिरों में “भोरमदेव” सर्वश्रेष्ठ
है. निर्माण योजना एवं विषय वस्तु में सूर्य मन्दिर कोणार्क एवं खजुराहो के
मन्दिरों के समान होने से इसे छत्तीसगढ का खजुराहो भी कहा जाता है.
इस
मन्दिर का निर्माण, श्री लक्ष्मण देव राय द्वारा कराया गया था. इसकी जानकारी वर्तमान मण्ढप में रखी हुई एक
दाढी-मूंछ वाले योगी की बैठी हुई मूर्ति, जो ०.८९ से.मी. ऊँची एवं ०.६७ से.मी.
चौडी है, पर उत्कीर्ण लेख से प्राप्त होती है. इसी प्रतिमा पर उत्कीर्ण दूसरे लेख
में, कलचुरिन संवत ८४० तिथि दी हुई है. इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि यह
मन्दिर छठे फ़णि नागवंशी शासक श्री गोपालदेव के शासन में निर्मित हुआ था.
किन्तु
मण्डवा महल से प्राप्त शिलालेख में राजा रामचन्द्र द्वारा निर्माण होना बताया गया
है. चूंकि यहाँ फ़णिनाग वंश के नागवंशी राजाओं ने लम्बे काल तक राज्य किया, जो
कलचुरियों के अधिसत्ता को स्वीकार करते थे. लंबी वंशावली में सर्वप्रथम अहिराज
राजा से नागवंश की शुरुआत हुई. शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि अर्तुकन की अनुपम
सुंदरी पुत्री मैथिला का एक नागराज से प्रेम हुआ था और इनसे उत्पन्न पुत्र अहिराज
से वंश की शुरुआत हुई.
पूर्वाभिमुखी
प्रस्तर निर्मित यह मन्दिर,नागर शैली का सुन्दर उदाहरण है. मन्दिर में तीन
प्रवेशद्वार हैं- प्रमुख द्वार पूर्व दिशा की ओर, दूसरे का मुख दक्षिण की ओर और
तीसरा, उत्तराभिमुखी है. इसमें तीन अर्ध-मंडप, उससे लगे अंतराल और अंत में गर्भगृह
है. अर्धमंडप का द्वार शाखों व लता-बेलों से अलंकृत है. द्वार शाखों पर शैव
द्वारपाल, परिचारिक,-परिचारिका प्रदर्शित है. मण्डप के तीन दिशाओं के द्वारों के
दोनों ओर पार्श्व में एक-एक स्तंभ है, जिनकी यष्टि अष्ट कोणीय हो गई है. इसकी चौकी
उल्ट विकसित कमल के समान है, जिस पर कीचक बने हुए हैं, जो छत का भार थामे हुए हैं.
मण्डप में कुल १६ स्तंभ हैं, जो अलंकरणयुक्त हैं. मण्डप की छत का निर्माण
प्रस्तरों को जमाकर किया गया है. छत पर शतदल कमल बना हुआ है. मन्दिर १५३ मीटर ऊँचे
अधिष्ठान पर निर्मित है. इसकी लम्बाई १८१३ और चौडाई १२२० मीटर है.
गर्भगृह
का मुँह पूर्व की ओर है तथा धरातल १.५० मीटर गहरा है. इसके ठीक बीच में शिवलिंग
प्रतिष्ठित है. छत के ऊपर शतदल कमल बना हुआ है. गर्भगृह में पंचमुखी नाग प्रतिमा,
नृत्य गणपति की अष्ट भुजी प्रतिमा, ध्यानमग्न राजपुरुष की पद्मासन में बैठी हुई
प्रतिमा, उपासक दंपत्ति प्रतिमा विद्धमान है.
मंदिर
के कटिभाग की बाह्य भित्तियाँ अलंकरण युक्त हैं. कटिभाग में देवी-देवताओं की
प्रतिमाएं उत्कीर्ण है,जिसमे विष्णु, शिव, चामुण्डा, गणेश आदि की सुन्दर प्रतिमाएं
उल्लेखनीय है. मन्दिर के जंघा पर कोणार्क के सूर्य मन्दिर एवं खजुराहों के मंदिरों
की भांति सामाजिक एवं गृहस्थ जीवन से संबंधित अनेक मिथुन दृष्य तीन पंक्तियों में
कलात्मक अभिप्रायों समेत उकेरे गए हैं, जिसके माध्यम से समाज के गृहस्थ जीवन को
अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है. मिथुन मुर्तियों का यहाँ बाहुल्य है. इन प्रतिमाओं
में नायक-नायिकाओं, अप्सराओं की प्रतिमाएं अलंकरण के रुप में निर्मित की गई हैं.
प्रदर्शित मिथुन मुर्तियों में कुछ सहज मैथुन विधियों का चित्रण तो हुआ है, कुछ
काल्पनिक विधियों को भी दिखाने का प्रयास किया गया है. पुरुष नर्तक-नारी नर्तकियों
से यह आभास होता है कि दसवीं-ग्यारवीं
शताब्दी मे इस क्षेत्र के स्त्री-पुरुष नृत्यकला में रुचि रखते थे. मंजीरा,
मृदंग, ढोल, शहनाई, बांसुरी एवं वीणा आदि वाद्ध-उपकरण मूर्तियों के द्वारा बजाए
जाते हुए प्रदर्शित हुए हैं.मंदिर के परिसर में संग्रहित प्रतिमाओं में विभिन्न
योद्धाओं एवं सती स्तंभ प्रमुख हैं.
मैथुनरत
मुर्तियों को देखकर ,पर्यटक काफ़ी रस लेकर, तरह-तरह की बातें करते देखे जा सकते
हैं. उन्हें सुनते हुए लगता है कि वे बिना कुछ सोचे-समझे अपने तर्क-कुतर्क देने
में मश्गुल होते हैं,जबकि भारतीय मनीषा ने कभी भी काम को सर्वोच्चता नहीं दी है,
बल्कि अपनी कलाकृति के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि “काम” केवल एक
बाहरी उद्वेग है, उसके हटते ही आप ईश्वर से अत्यंत ही अपने आपको निकट पाते हैं.
शायद यही कारण है कि ये मन्दिर चाहे खजुराहो के हों अथवा भोरमदेव का मन्दिर, इनके
बाहरी बनावट पर इसे आप देख पाते हैं,जबकि भीतरी पर्तों में इसका निशान तक देखने को
नहीं मिलता.
भोरमदेव
मन्दिर के उत्तर की ओर शिवमन्दिर, दक्षिण में एक शिवमन्दिर जिसे मण्डवा महल के नाम
से जाना जाता है,स्थित है. पश्चिम की ओर छेरकी नामक शिवमन्दिर है.
अगले इतवार को मैंने कवर्धा के तत्कालीन विधायक
श्री जोगेश्वरराजसिंह से भेंट की,जो भूतपूर्व कवर्धा रियासत के राजा के बेटॆ हैं.
यहाँ जाने से पूर्व फ़ोन पर मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे मिलने की इच्छा जाहिर
की थी. उनकी स्वीकृति मिलने के बाद मै उस भव्य राजप्रसाद के परिसर में जा
पहुँचा,जहाँ उन्होंने आगे बढकर मेरा स्वागत किया. महल के भीतरी भागों में घुमाया
और साथ बैठकर नाश्ता और चाय का भी आनन्द उठाया. मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा
था-“ यह पहला मौका है जब कवर्धा के पोस्टमास्टर मुझसे मिलने आए हैं”
जब-जब
भी कवर्धा की बात होती है, तो मुझे वहाँ बिताए गए प्रत्येक क्षण की मधुर याद ताजा
हो उठती है.
कवर्धा
का राजमहल
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7.
नाथद्वारा (राजस्थान) में श्रीनाथजी के दिव्य दर्शन
7.
झीलों
की नगरी के नाम से जगप्रसिद्ध नगर उदयपुर से महज 58 किमी की दूरी पर स्थित नाथों
के नाथ श्रीनाथजी का भव्य मन्दिर अवस्थित है जिसे बस द्वारा एक घण्टा बाईस मिनट की
यात्रा करते हुए पहुँचा जा सकता है. 17वीं शताब्दी में बनास नदी के भव्य तट पर इस
मन्दिर को श्रीभगवान का प्रवेश-द्वार भी कहा जाता है. उत्सवप्रिय प्रभु श्रीनाथजी
नाथद्वारा में साक्षात विराजमान होकर भक्तों एवं गोस्वामी बालकों द्वारा नित्य
सेवित है.. गर्गसंहिता में संग्रहित एक कथा के आधार पर श्रीनारदजी राजा बहुलाश्व
को बतलाते हैं कि गिरिराजजी की गुफ़ा के मध्यभाग में श्रीहरि का स्वतःसिद्ध रूप
प्रकट होगा. भगवान भारत के चार कोनों में क्रमशः जगन्नाथ, श्रीरंगनाथ, श्री
द्वारकानाथ, और श्रीबदरीनाथजी के नाम से पसिद्ध हैं. नरेश्वर ! भारत के मध्यभाग
में में भी वे गोवर्धननाथजी के नाम से विद्यमान हैं. इन सबका दर्शन करने से नर
नारायण हो जाता है. नारदजी ने राजा बहुलाश्व को यह भी बतलाया कि जो विद्वत पुरुष
इस भूतल पर चारों नाथों के यात्रा करके मध्यवर्ती देवदमन श्रीगोवर्धननाथजी के
दर्शन नहीं करता, उसे यात्रा का फ़ल नहीं मिलता. जो गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथजी के
दर्शन कर लेता है, उसे पृथ्वी पर चारों नाथों की यात्रा का फ़ल सहज में ही प्राप्त
हो जाता है.
जनश्रुति के आधार पर सन 1410 में गोवर्धन पर्वत पर श्रीभगवानजी का बांया
हाथ प्रकट हुआ, जो ऊपर उठा हुआ था, यह इस बात का प्रतीक था कि उन्होंने गोवर्धन
पर्वत को अपनी ऊंगली पर उठा रखा है. फ़िर उनका मुख प्रकट हुआ. वल्लभाचार्यजी का
जन्म 1479 को हुआ. इनके जन्म के पश्चात ही श्रीनाथजी की शेष आकृति प्रकट हुई. इस
दिव्य-आकृति के साथ ही दो गायें,एक सर्प,एक सिंह,दो मोर भी प्रकट हुए. इन आकृतियों
में एक तोते की भी आकृति थी,जो श्रीजी के मस्तक पर विराजमान था. यह वह समय था जब
भारतवर्ष पर पूजा-पाठ विरोधी, मूर्ति-भंजक, कट्टरपंथी औरंगजेब शासन कर रहा था.
उसकी सेना जिस ओर जाती मन्दिरों का विध्वंस करती और मूर्तियों को भग्न करती-फ़िरती.
वैष्णव संप्रदाय के लोगों में इस बात को लेकर भय पैदा हो गया था कि किसी भी समय
औरंगजेब की सेना का रुख इस ओर होगा और वे इस दिव्य श्री का विग्रह भंग कर देंगे.
अतः वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि श्रीजी को एक ऎसे स्थान पर ले जाकर स्थापित कर
दें, जहाँ वे सुरक्षित रह सकें. भगवान श्रीकृष्णचंदजी ने सपने में दर्शन देते हुए
बतलाया कि उनके श्रीविग्रह को बैलगाडी पर मेवाड की ओर रुख करें. उन्होंने यह भी
बतलाया कि बैलगाडी जहाँ अपने आप रुक जाएगी, वहीं उन्हें स्थापित कर दिया जाए. इस
तरह का संकेत प्रप्त होते ही श्रीविग्रह को एक बैलगाडी पर रखते हुए उसे पत्तों से
ढंक दिया गया. ऎसी भी जनश्रुति है कि नटवरनागर ने अपनी भक्त मीराबाई को स्वंय चलकर
मेवाड आने का वादा किया था. घसियार होते हुए गाडी आगे बढ रही थी कि अचानक बनास नदी
पार करते हुए बैलगाडी कीचड में धंस गयी. काफ़ी प्रयास करने के बावजूद गाडी उस दलदल
से नहीं निकल पायी. श्रीजी का आदेश भी था कि गाडी जहाँ से आगे न बढ पाये, उस स्थान
पर उन्हें स्थापित कर दिया जाये. श्रीजी के आदेशानुसार मेवाड के तत्कालीन राजा
राणा राजसिंहजी ने अपने महल में उन्हें स्थापित किया.
श्रीनाथद्वारा में श्रीजी की आठों पहर पूजा-अर्चना की जाती है,जिसमें
मंगला, श्रृंगार,राजभोग, उत्थान,भोग,आरती और शयन आरती की जाती है.लाखों की संख्या
में वैष्णव भक्त नित्य प्रति आकर आपके दिव्य दर्शन कर अपने आपको अहोभागी मानते
हैं.
यों तो नाथद्वरा में श्रीनाथजी के मन्दिर में नित्य मनोरथ एवं उत्सव होते
हैं,तथापि उनमें से कुछ उत्सवों के बारे में संक्षिप्त में जानकारी लेते चलें.
जन्माष्टमी----यों तो जन्माष्टमी का पर्व संपूर्ण भारतवर्ष में हर्षोल्लास
के मनाया जाता हैं.किंतु नाथद्वारा में बडॆ भारी आनन्द से यह उत्सव मनाया जाता है.
इस दिन देश-विदेश से अनेक वैष्णभक्तों का यहाँ आगमन होता है. प्रातःकाल
मंगला-दर्शन में प्रभु का पंचामृत होता है,बाद में श्रृंगार होता है. रात्रि में
जागरणदर्शन होते हैं एवं मध्यरात्रि में जन्म का महोत्सव होता है. महाभोग में
श्रीप्रभु को छप्पन भोग लगाया जाता है. जन्माष्टमी के दूसरे दिन पलना के दर्शन
होते हैं. सोने के पलने में ठाकुरजी को झुलाया जाता है. भक्तगण ग्वाल-बाल के रूप
में बनकर दूध, दही आदि अर्पणकरते हैं. अपार जनसमूह इस उत्सव का दर्शन कर कृतकृत्य
होते हैं. इसी तरह राधाष्टमी ,नवरात्र०-उत्सव ,दशहरा, शरदपूर्णिमा, दीपावली
,मकरासंक्रान्ति, वसन्तपंचमी पर अनेकानेक उत्सव आयोजित किए जाते हैं. दीपावली में एकादशी से ही तिलकायत के श्रृंगार आरम्भ हो
जाते हैं. धनतेरस को जरी के वस्त्रों द्वारा भारी श्रृंगार एवं रूपचौदस को ठाकुरजी
का अभ्यंग होता है. राजभोग में सोने-चाँदी का बंगला होता है. दीपावली के दिन सफ़ेद
जरी के वस्त्र एवं बहुत भारी श्रृंगार होता है. आज ही के दिन गोशाला से गायें
नाथद्वारा में प्रवेश करती हैं. सायं “कान्ह जगाई” होती है एवं रतनचौक में नवनीत
प्रभु विराजते हैं.
अन्नकूट नाथद्वारा का सबसे बडा उत्सव है. दोपहर में गोवर्धन-पूजा होती है.
सायं अन्नकूट में देढ सौ मन चाँवल का ढेर लगाकर अन्नकूट(शिखर) बनाया जाता है.
अनेकानेक प्रकार की सामग्री भोग में आती है. कार्तिक की शुक्ल द्वितीया ,
गोपाष्टमी पर विशेष श्रृंगार होता है. पौष कृष्णनवमी को श्रीगुसाईंजी का उत्सव
मनाया जाता है. इस दिन जलेबी विशेष रुप से बनाई जाती है. इसे जलेबी-उत्सव भी कहते
हैं. फ़ाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रीनाथजी नाथद्वारा में पाट पर विराजते हैं.
इसी माह की पूर्णिमा को खूब गुलाल उडाई जाती है. चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को डॊलोत्सव
का आयोजन होता है. तथा प्रतिपदा के दिन भगवान के पंचाग सुनाई जाती है. तृतीया को
गणगौर का उत्सव तीन दिन चलता है. चैत्र शुक्ल नवमी को रामजन्मोत्सव मनाया जाता है.
बैसाख कृश्ण एकादशी को श्रीमहाप्रभुजी का उत्सव होता है. आज ही के दिन महाप्रभुका
प्राक्टय चम्पारण्य में हुआ था. वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन सन्ध्या आरती में
शालग्रामजी को पंचामृत से स्नान कराया जाता है. ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को श्रीजी में
नावका मनोरथ होता है. ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को ठाकुरजी को अभिषक करा कर सवा लाख
आमों का भोग लगाया जाता है. आषाढ शुक्ल द्वित्तीया को रथयात्रा का आयोजन होता है.
इस दिन भी सवा लाख आमका भोग लगाया जाता है. श्रवाणमास में पूरे माह मन्दिर में
हिंडोला होते हैं. नित्य नूतन श्रृंगार होते हैं. विशेषकर हरियाली अमावस, ठकुराइन
तीज, पवित्रा एकादशी एवं राखी का भारी उत्सव होता है. इस दिन श्रीजी को राखी बांधी
जाती है. पुरुषोत्तममास में पूरे महिने तिथि के अनुसार साल भर सभी त्योहार बडी
धूमधाम से मनाए जाते हैं.
सच है. जहाँ गिरिवरधारी, नटराज स्वयं उपस्थित हों, वहाँ उत्सवों के भव्यतम
आयोजन न हो, ऎसा भला कभी हो सकता है. मैं स्वयं तो इन तमाम तरह के उत्सवों में भले
ही शामिल नहीं हो पाया, लेकिन पाटोत्सव के समय मुझे श्रीजी के दर्शनों का पुण्यलाभ
जरुर मिला है. माह फ़रवरी २०१२ मे साहित्य-मण्डल् प्रेक्षागार में आयोजित कार्यक्रम
में अन्य साहित्यिक मित्रों के साथ”हिन्दी भाषा भूषण” सम्मान से सम्मानीत किया गया
था. तिबारा वहाँ जाना तो नहीं हो पाया,लेकिन मन-पाखी जब-तब श्रीचरणॊं के दर्शनार्थ
जा पहुँचता है. उनके दिव्य दर्शन प्राप्त कर मन में परम सन्तोष की प्राप्ति मिलती
है.
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-8.
यात्रा अमरनाथ की
\
आपने अब तक अपने जीवन मे अनगिनत यात्राएं की होगी,लेकिन किन्हीं कारणवश आप
अमरनाथ की यात्रा नहीं कर पाएं है, तो आपको एक बार बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों के लिए
अवश्य जाना चाहिए. दम निकाल देने वाली खडी चढाइयां, आसमान से बातें करती, बर्फ़ की
चादर में लिपटी-ढंकी पर्वत श्रेणियां, शोर मचाते झरने, बर्फ़ की ठंडी आग को अपने
में दबाये उद्द्ण्ड हवाएं,जो आपके जिस्म को ठिठुरा देने का माद्दा रखती हैं,कभी
बारिश आपका रास्ता रोककर खडी हो जाती है,तो कहीं नियति नटि अपने पूरे यौवन के साथ
आपको सम्मोहन में उलझा कर आपका रास्ता भ्रमित कर देती है, वहीं असंख्य शिव-भक्त
बाबा अमरनाथ के जयघोष के साथ,पूरे जोश एवं उत्साह के साथ आगे बढते दिखाई देते हैं
और आपको अपने साथ भक्ति की चाशनी में सराबोर करते हुए आगे,निरन्तर आगे बढते रहने
का मंत्र आपके कानों में फ़ूंक देते हैं. कुछ थोडॆ से लोग जो शारीरिक रुप से अपने
आपको इस यात्रा के लिए अक्षम पाते हैं,घोडॆ की पीठ पर सवार होकर बाबा का जयघोष
करते हुए खुली प्रकृति का आनन्द उठाते हुए,अपनी यात्राएं संपन्न करते हैं. सारी
कठिनाइयों के बावजूद न तो वे हिम्मत हारते हैं और न ही जिनका मनोबल डिगता है, आपको
निरन्तर आगे बढते रहने के लिए प्रेरित करते हैं.
रास्ते में जगह-जगह भंडारे वाले आपका रास्ता, बडी मनुहार के साथ रोकते
हुए,हाथ जोडकर विनती करते है कि बाबा की प्रसादी खाकर ही जाईये. भंडारे में आपको
आपके मन पसंद चीजें खाने को मिलेगीं.कहीं कडाहे में केसर डला दूध औट रहा है, तो
कहीं अमरती सिंक रही होती है,बरफ़ी,पॆडा,बूंदी,कचौडियां,न जाने कितने ही व्यंजन
आपको खाने कॊ मिलेगें, वो भी बिना कोई रकम चुकाए. ऐसा नहीं है कि यह नजारा आपकॊ
एकाध जगह देखने को मिले,आप अपनी यात्रा के प्रथम बिन्दु से चलते हुए अन्तिम पडाव
तक, शिवभक्तों की इस निष्काम सेवा को अपनी आँखों से देख सकते है. हमारी बस को जब
एक भंडारे वाले( अब नाम याद नहीं आ रहा है) ने रोकते हुए हमसे प्रसादी ग्रहण करने
हेतु विनती की,तो भला हममे इतनी हिम्मत कहां थी कि हम उनका अनुरोध ठुकरा सकते थे.
काफ़ी आतिथ्य-सतकार एवं सुसुवादू प्रसाद ग्रहण कर ही हम आगे बढ पाए थे. मन की आदत
बात- बात में शंका करने की तो होती है. मेरे मन में एक शंका बलवती होने लगी थी कि
ये भंडारे वाले,अगम्य ऊँचाइयों पर जहाँ आदमी का पैदल चलना दूभर हो जाता है,यात्रा
के शुरुआत से पहले अपने लोगों को साथ लेकर अपने-अपने पंडाल तान देते है. रसॊई
पकाने में क्या कुछ नहीं लगता, वे हर छोटी-बडी सामग्री ले कर इन ऊँचाइयों पर अपने
पंडाल डाले यात्रियों की राह तकते हैं और पूरी निष्ठा और श्रद्धाके साथ सभी की
खातिरदारी करते हैं. वे इस यात्रा के दौरान लाखों रुपया खर्च करते हैं,भला इन्हें
क्या हासिल होता होगा? क्यों ये अपना परिवार छोडकर, काम-धंधा छोडकर यात्रा की
समाप्ति तक यहाँ रुकते हैं? भगवन भोले नाथ इन्हें भला क्या देते होंगे?
मन में उठ रहे प्रश्न का उत्तर जानना मेरे लिए आवश्यक था. मैंने एक भक्त
से इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहा तो वह चुप्पी लगा गया. शायद वह अपने आपको अन्दर
ही अन्दर तौल रहा था कि क्या कहे. काफ़ी देर तक चुप रहने के बाद उसने हौले से मुँह
खोला और बतलाया कि वह एक अत्यन्त ही गरीब परिवार से है.रोजॊ-रोटी की तलाश में
दिल्ली आ गया. छोटा-मोटा काम शुरु किया. सफ़लता रुठी बैठी रही. समझ में नहीं आ रहा
था कि क्या किया जाए? किसी शिव-भक्त ने मुझसे कहा-भोले भंडारी से मांगो. वो सभी को
मनचाही वस्तु प्रदान करते हैं.बस, उसके प्रति सच्ची लगन और श्रद्धा होनी
चाहिए.मैंने अपने व्यापार को फ़लने-फ़ूलने का वरदान मांगा और कहा कि उससे होने वाली
आय का एक बडा हिस्सा वह शिव-भक्तों के बीच खर्च करेगा. बस क्या था,देखते-देखते
मेरी किस्मत चमक उठी और मैं यहां आने लगा.मेरी कोई संतान नहीं थी.मैंने शिव जी से
प्रार्थना की और आने वाले साल पर मेरी मनोकामना पूरी हुई.इतना बतलाते हुए उसके
शरीर में रोमांच हो आया था और उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली थी. इससे
ज्ञात होता है कि यहाँ आने वाले सभी शिव भक्तों को भोलेभंडारी खाली हाथ नहीं
लौटाते. शायद यह एक प्रमुख वजह है कि यहाँ प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में शिवभक्त
आते है. यह संख्या निरन्तर बढती ही जा रही है. दूसरा कारण तो यह भी है कि बर्फ़ का
शिवलिंग केवल इन्हीं दिनों बनता है और हर कोई इस अद्भुत लिंग के दर्शन कर अपने
जीवन को कृतार्थ करना चाहता है. और तीसरी खास वजह यह भी है कि लोग अपने नंगी आँखों
से प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य देखना चाहते है.
जो शिवभक्त हिम से बने शिवलिंग के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बनाना चाहते
हैं,,उन्हें जम्मु पहुँचना होता है. जम्मु रेलमार्ग-सडकमार्ग
तथा हवाई मार्ग से देश के हर हिस्से से जुडा हुआ है.
1-जम्मु से पहलगाम( २९७ कि.मी ) _
पहलगाम
जम्मु से पहला पडाव पहलगाम है. यात्री टैक्सी
द्वारा नगरोटा-दोमल-उधमपुर-कुद-पटनीटाप-बटॊट-रामबन-बनिहाल-तीथर-तथा जवाहर सुरंग
होते हुए पहलगाम पहुँच है. पहलगाम नूनवन के नाम से भी जाना जाता है. यह एक अतयन्त
सुन्दर –रमणीय स्थान है. जनश्रुति के अनुसार भगवाअन शिव ने माँ पारवती को अमरकथा
का रहस्य सुनाने के लिए एक ऐसे स्थान का चयन करना चाहते थे,जहाँ अन्य कोई प्राणी
उसे न सुन सके. ऐसे स्थान की तलाश करते-करते श्स्सिव पहलगाम पहुँचे थे. यह वह
स्थान है,जहाँ उन्होंने अपने वाहन न्ण्दी का परित्याग किया था. इस स्थान प्राचीन
नाम बैलगाम था,जो क्षेत्रीय भाषा में बदलकर पहलगाम हो गया. यात्री यहाँ भण्डारे
में भोजन कर रात्री विश्राम करते हैं
2-पहलगाम से चन्दनवाडी-(16कि.मी.)
चंदनवाडी
यात्री सुबह चाय-पानी
का टैक्सी द्वारा चन्दनवाडी पहुँचता है. चन्दनवाडी के बारे में मान्यता है कि
भोलेनाथ ने अपने माथे का चन्दन यहां छोडा था. यहाँ से कुछ दूरि पर प्रकृति द्वारा
निर्मित 100मीटर लंबा पुल है,जो लिद्दर नदी के ऊपर बना है. पर्वत श्रृंखलाएं यहां अपना रुप-रंग बदलती जाती
है.आगे की यात्रा थोडी कठिन है,जिसे घोडॆ द्वारा तय की जा सकती है.
चन्दनवाडी से
शेषनाग-(13कि.मी.)
शेषनाग झील
चन्दनवाडी से शेषनाग के लिए यह रास्ता काफ़ी कठिन
तथा सीधी चढाई वाला है. पिस्सु घाटी होते हुए लिद्दर नदी के किनारे-किनारे मनोहर
दृष्यों को निहरते हुए यात्री शेषनाग पहुँचता है. यह स्थल झेलम नदी का उदगम स्थल है,जिसे शेषनाग सरोवर भी कहते
हैं. पहली झलक में यूं प्रतीत होता है कि कोई विशाल फ़णीधर(शेषनाग) कुण्डली मारे
बैठा हो. झील के पार्श्व में खडी ब्रह्मा-विष्णु-महेश नाम की तीम चोटियां प्रकृति
का एक महान चमत्कार ही है.इस झील का पानी नीला है. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने
अपने गले का शेषनाग का यहां परित्याग किया था. इसी कारण इसका नाम शेषनाग झील पडा.
चारों ओर बर्फ़ से ढंकी पहाडियॊं को निहार कर यात्री धन्य हो जाता है.झील से थोडा
आगे यात्रियों को रात्रि विश्राम करना होता है.यहां जगह-जगह भण्डारे लगे होते
हैं,जहां यात्री अपनी पसंद के सुस्वादु भोजन से तृप्त हो जाता है.
4- शेशनाग से
पंचतरणी-(12.6कि.मी.)-
पंचतरणी
सुबह होते ही यात्री चाय-पानी-नाश्ता कर
पंचतरणी की ओर प्रस्थान करता है. मार्ग में महागुनस पर्वत है जिसकी ऊँचाई 14500फ़ीट है. महागुनस पर्वत अपने आप में एक आश्चर्य है. हरे-भूरे,कभी-कभी
सिन्दुरी रंग में दिखाई देने वाले इस विशाल पर्वत तथा उस पर जमी बर्फ़ की परतों से
सूरज की किरणे परावर्तित होकर लौटती है तो यह किसी बडॆ हीरे की तरह जगमगाता
द्दिखता है. ऊँचाई पर होने की वजह से आक्सीजन की मात्रा मे कमी होने लगती है,जिससे
यात्री को सांस लेने में कठिनाई होती है.एक कदम आगे बढाना भी दुष्वार सा लगाने
लगता है. अतः यात्री को चाहिए कि वह यहां बैठकर थोडा सुस्ता ले और अपने आप को
सामान्य स्थिति में ले आए. कपूर की डली भी उसे पास में रखनी चाहिए. उसे सूंधने में
राहत मिलती है.यहां जोर आजमाइश करने की जरुरत नहीं है.
भगवान भोलेनाथ ने यहां अपने
पुत्र श्री गणेश को छोड दिया था.तभी से इसका नाम महागणेश जो कालान्तर में महगुनस
हो गया.थोडा आगे चलने पर पंचतरणी नामक स्थान आता है. आइसा कहा जाता है कि जब शिव
मां पार्वती को अमरकथा सुनाअने के लिए यहां से गुजर रहे थे,तब उन्होंने नटराज का रुप
धारण कर नृत्य किया था. नृत्य करते समय उनकी जटा खुल गई थी जिसामें से गंगा
प्रवाहित होते हुए पांच दिशाओं में बह निकली. ऐसी मान्यता है कि भोले ने यहां पंच
महाभूतों का यहां परित्याग कर दिया था
यात्री यहां रात्री विश्राम करता है
तथा जगह-जगह लगे भण्डारों मे भोजन करता है 5-पंचतरणी से पवित्र गुफ़ा( 6 कि.मी)
पवित्र गुफ़ा
पंचतरणी से 3कि.मी सर्पाकार पहाडीयां चढकर 3कि.मी बरफ़ीली
चट्टानॊं पर चलकर यात्री बर्फ़ से अठखेलियां करता, उत्साह के के साथ आगे बढता
है,क्योकि यहीं से वह दिव्य गुफ़ा के दर्शन होने लगते है. गुफ़ा को देखते ही यात्री
की अब तक की सारी थकान काफ़ुर हो जाती है.
समुद्र सतह से 12730 फ़ीट की ऊँचाईं पर 60फ़ीट चौडी,25फ़ीट लंबी तथा15फ़ीट ऊँची गुफ़ा में यात्री की आँखें
प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंग को निहारकर धन्य हो उठती हैं. यहीं हिम से निर्मित
मां पारवती के भी दर्शन होते हैं.गुफ़ा के ऊपर रामकुण्ड है,जिसका अमृत समान जल गुफ़ा
मे प्रवेश करने वाले यात्रियों पर बूंद-बूंद टपकता है.
हजारों फ़ीट ऊपर से प्रकृति का अद्भुत
नजारा देखकर काफ़ी प्रसन्नता का अनुभव होता है.गुफ़ा के पास ही हैलीपैड भी बना हुआ
है,जहां से आप हेलिकाप्टर को पास से उत्ररता तथा आसमान में उडान भरते देख सकते
हैं.वे यात्री जिनके पास समय कम है अथवा वे शारीरिक रुप से कमजोर हैं,इस सेवा का
लाभ उठा सकते हैं. आपकी यात्रा के शुरुआती बिन्दु से लेकर यात्रा के अन्तिम पडाव
तक भारतीय फ़ौज के जवान दिन-रात आपकी सुरक्षा में तल्लीन रहते हैं. कभी-कभॊ
घुसपैठिये इस यात्रा में विध्न उतपन्न करने से बाज नहीं आते.फ़ौज के रहने से आपको
चिन्ता करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है.
भगवान अमरनाथ के दर्शन-पूजा-पाठ आदि के
बाद यात्री अपनी यात्रा से वापिस लौटने लगता है. यहाँ से एक छोटा रास्ता नीचे
उतरने के लिए बालटाल होकर भी जाता है.यदि आप इस काफ़ी उतार वाअले रास्ते का चयन
करते हैं तो आपको रास्ते मेंलेह-लद्दाख-कारगिल-सोनमर्ग-गुलमर्ग होते हुए श्रीनगर
आया जा सकता है.यहां आकर आप शिकारे का आनन्द उठा सकते हैं. कश्मीर का यह पिछला
हिस्सा सौंदर्य से भरपूर है. प्रकृति नटी का अनुपम नजारा आपको यहां देखने को मिलता
है.
अमरनाथ की यात्रा यद्दपि कठिन अवश्य
है,लेकिन मन में यदि उत्साह और उमंग है तो निःसन्देह इसमे आपको भरपूर मजा आएगा.
यदि आपने प्रकृति के इस अद्भुत नजारे तो नहीं देखा तो सब बेकार है. अतः एकबार
पक्का मन बनाइये और बर्फ़ानी बाबा के दर्शनों का लाभ उठाइये. यात्रा करने से पहले
हमें क्या-क्या करना चाहिए और कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए,उस पर थोडा ध्यान
दिए जाने की जरुरत है.
1-यात्री
अपना नाम-पता-टेलीफ़ोन नम्बर-मोबाइल नम्बर आदि को अपनी जेब में अवश्य रखें और साथ
ही अपने साथियों के नाम पते भी रखे,जो जरुरत पडने पर बडा काम आएगा.(2) अपने साथ सूखे मेवे,नमकीन अथवा भूने चने तथा गुड अवश्य रख लें.(3) सर्द हवा से चेहरे को बचाने के लिए वेसलीन,मफ़लर,ऊनी
दास्ताने,बरसाती,मोजे,कोल्ड क्रीम साथ रखें ,क्योकि यहां कभी भी बारिश अथवा बर्फ़
पड सकती है.खुला आसमान और खुली धरती के बीच आपको यहां रहना होता है.फ़िर यहां
टैंटॊं के अलावा कोई शैड-वैड आपको देखने को भी नही मिलेगे ( 4) यदि आप पिट्टु या घोडॆ वाले को साथ लेते हैं तो
उनका रजिस्ट्रेशन -कार्ड अपने पास रख लें और यात्रा की वापसी में लौटा दें.(5) रास्ता उबड-खाबड अथवा फ़िसलन भरा मिलेगा ही, अतः जूते वाटरप्रुफ़ तथा
ग्रिप वाले ही पहने.(6) चढाई करते समय थक जाएं तो बीच-बीच मे
आराम करते चले.अपने आपको ज्यादा थका देने का प्रयास न करें.(7) आवश्यक दवाएं अपने पास रखें. हालांकि यहां पर पूरी व्यवस्था सरकार बना
कर चलती है,फ़िर भी अपने पास दवाओं का किट रख लें.(8)
मुझे यह कहने मे तनिक भी संकोश
नही हो रहा है कि हम भारतियों मे यहां-वहां कचरा फ़ेंक देने की बुरी आदत है.कृपया
इससे बचें. अपनी खाली प्लास्टिक की बोतलें अथवा प्लास्टिक की थैलियां यहां –वहां न
फ़ेके. जब गांव-शहर में ही समुचित सफ़ाई की व्यवस्था हम नही बना पाते तो पहाडॊं के
दुर्गम स्थान पर कौन सफ़ाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा. कई सज्जन लोग बोतल को आधी
भरकर उसे नदी मे बहा देते हैं. पता नहीं,
अनजाने में ही हम पर्यावरण का कितना नुकसान कर बैठते हैं.(9) मेडिकल फ़िटनेस का सर्टिफ़िकेट यात्रा से पूर्व अवश्य बनवा लें.((10) भारत सरकार ने चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कडॆ बन्दोबस्त किए हैं.इसके
अलावा आपकी निगरानी के लिए हेलीकाप्टर से भी नजर रखी जाती है. अतः सैनिकों के
द्वारा दिए गए निर्देशों का कड़ाई से पालन करे.
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9.
चित्र-विचित्र मेला -गोटमार मेला
यह देश विविधताओं से
भरा हुआ देश है. तीन अलग-अलग मौसमों में,आदमी कभी बारिश में भींगता, तो कभी ठंड
में ठिठुरता, तो कभी चिलचिलाती धूप में हलाकान–परेशान हो उठता है, लेकिन हर मौसम
में पडते तीज-त्योहारों और परम्पराओं में निमग्न होते हुए वह, उन पलों को बडी आत्मीयता
के साथ, अपने आपको जोडते हुए, अपने को डुबो देता है,.जिससे उसे आत्मीय खुशी मिलती
है. इस आत्मीक खुशी को हम चाहें तो आनन्द कह लें या फ़िर परमानन्द अथवा ब्रह्मानंद.
आदमी की इसी जिजीविषा का ही परिणाम है कि वह दैहिक-दैविक और भौतिक तापों की जलन से
अपनी आत्मा को लहुलुहान होने से बचा पाता है. ऐसा नहीं है कि केवल भारत में ही यह
सब कुछ होता है, पूरी दुनिया में इसी तरह की जद्दोजहद चलती रहती है.
अभी बारिश का मौसम चल रहा है. बारिश के इस मौसम
में भीगते हुए अभी हमने रक्षाबंधन का पवित्र पर्व मनाया. तो इसी क्रम में तीज-छट
का त्योहार और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी बडी धूमधाम से मनाया. इसी कडी में
छिन्दवाडा जिले के पाण्ढुर्णा तहसील में जाम नदी के तट पर एक अजीबो-गरीब परम्परा
में लिपटे हुए गोटमार मेले का आनन्द भी उठाया. पाण्ढुर्णा के इस मेले में जमकर
पत्थर बरसते हैं. लोग जख्मी होते हैं. अंग-भंग होता है
और कभी-कभी तो जान से भी हाथ धोना पडता है. है न ! अजीबो-गरीब परम्परा. इसे मात्र कोरी गप्प
न मानें, यदि मन न माने इस बात पर विश्वास करने को, तो इस दिन यहाँ आकर अपनी आँखों
से इसे होता हुआ देख सकते हैं..
माह अगस्त की अठारह
तारीख को संपन्न हुआ,यह अजीबॊ-गरीब विश्व प्रसिद्ध मेला जिसे गोटमार के नाम से
जाना जाता है, मनाया गया. पांढुर्णा मराठीभाषा का क्षेत्र है. गोट का अर्थ
पत्थर होता है. इस दिन यहाँ जमकर पत्थरबाजी का खेल खेला जाता है.
(नदी के दोनो तरफ़ बडी संख्या में
उमडा जनसैलाब)
किंवदती के अनुसार करीब तीन सौ साल पहले,
पांढुर्णा के एक युवक को सांवरगांव में रहने वाली एक युवती से प्रेम हो गया. दोनो
पक्ष के लोग इस विवाह के पक्ष में नहीं थे. युवक जब अपनी प्रेयसी को सांवरगांव से
लेकर पांढुर्णा लाने लगा. यहां आने के लिए बीच में जाम नदी पडती है,जिसे पार करते
हुए इस पार आया जा सकता है. दोनो बीच नदी में पहुंचे ही थे कि गांव वालों ने पथराव
शुरु कर दिया. सांवरगांव के लोगो द्वारा पत्थरबाजी के जवाब में पांढुर्णा वालों ने
भी पथराव शुरु कर दिया. इस पत्थरबाजी में कइयों को चोटॆं आयीं, कई सिर फ़ूटे, कुछ
की जाने भी गई. अंतः वह युवक, युवती को लाने में सफ़ल हुआ.
भादों मास के कृष्ण पक्ष में ,अमावस्या को
पोले के त्योहार के ठीक दूसरे दिन, जाम नदी के मध्य में शमी वृक्ष के पेड की टहनी
गाडी जाती है और उस पर झंडा लगाया जाता है. पांढुर्णा के लोग इस झंडॆ कॊ लाने का
पूरा प्रयास करते हैं और सांवरगांव के लोग पत्थर बरसा कर उन्हें रोकने का प्रयास
करते हैं. इस तरह दोनो तरफ़ से पत्थरों की अनवरत बरसात होती है,जिसमे कई युवक गंभीर
रुप से जख्मी हो जाते है. खून की नदियां बह निकलती है,लेकिन जांबाज लोग, बगैर
जख्मों की परवाह किए निरन्तर आगे बढते हैं और झंडॆ कॊ लाने का उपक्रम करते हैं.
पिछली साल पूजा-वंदना के साथ शनिवार यानि 18 अगस्त को विश्वप्रसिद्ध गॊटमार मेला शुरु हुआ. सुबह से शुरु हुई
पत्थरबाजी दोपहर बाद तक चलती रही. लोगों ने एक दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए. स्थानीय
समाचार-पत्र के अनुसार पांढुर्णा पक्ष के 175 और सांवरगांव
के 160 लोग घायल हुए. बुरी तरह से जख्मी 33 लोगों को स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती करवाया गया.
पांच की स्थिति अत्यन्त ही नाजुक हो चली थी,जिन्हें तत्काल नागपुर रेफ़र कर दिया
गया. इस तरह गोटमार शाम के छः बजे तक चलती रही. कोई निर्णय न होता देख,स्थानीय
लोगों,अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों ने आपसी सहमति बनाकर पत्थरबाजी रुकवाई.
तत्पश्चात चंडी माता मंदिर में झंडॆ की पूजा-अर्चना की गई. इस तरह इस विचित्र
किंतु सत्य मेले का समापन हुआ.
इस विश्वप्रसिद्ध गोटमार मेले में
व्यवस्थाएं बनाने आला प्रशासनिक अधिकारियों ने पांढुर्णा और सांवरगांव में
व्यवस्थाएं संभाल ली थी. उन्होंने गोटमार मेले को रोकने के लिए विभिन्न आयोजन भी
आयोजित किए ,बावजूद इसके वे इसे रोक पाने में असफ़ल हुए. इस मेले में 73 एस आई, 95 हेड कांस्टेबल, 454
आरक्षक सहित 645 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए थे,जो मेले की
सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे थे.इसके अलावा जिला सिवनी और नरसिंहपुर से भी पुलिस बल
बुलाया गया था.
इस चित्र-विचित्र मेले को साकार रुप में
दुनिया को दिखाने के लिए इसका फ़िल्मांकन भी करवाया गया था. सभी ने इसे हैरत के साथ
देखा और सुना.
यह चित्र-विचित्र गोटमार मेला पुनः इस धरती
पर भाद्र पदी 14 अर्थात दिनांक 24-08-2014 को खेला जाएगा. कोई नहीं जानता कितने लोग पत्थरों से घायल होंगे कितने
लहुलुहान होगे और कितने लोग गंभीररुप से घायल होंगे? हालांकि सरकार की तरफ़ से पूरे
बन्दोबस्त किए जाएंगे, कई आला अफ़सर यहाँ तैनात किए जाएंगे. डाक्टरों की फ़ौज भी
यहाँ डॆरा डले हुए रहेगी. ऎंबुलेस की गाडियां तैयार रहेगी, बडी संख्या में पुलिस
बल उपस्थित होगा, इन सबके रहते हुए यह खतरनाक खेल अबाध गति से चलता रहेगा.
इससे पूर्व इस अजीबो-गरीब खेल को रोकने के कडॆ
उपाय भी किए गए, लेकिन असफ़लता ही हाथ लगी. इस बार एक नयी पहल की गई है कि पत्थरों
को उपयोग में लाने के बजाए टमाटर से इस खेल को खेला जाए. पहल तो अच्छी दिखाई देती
है,लेकिन इसमें कितनी सफ़लता मिलती है, यह भविष्य़ के गर्त में छिपा है.
(छिन्दवाडा भास्कर-27-0802014) इस साल गोटमार मेले में पांढुरना
के खिलाडी झंडा तोडने में असमर्थ रहे.खेलस्थल पर असंख्य पत्थरों और सैंकडीं
खिलाडियों के बावजूद पांढुर्ना पक्ष असफ़ल रहा. रत करीब सवा आठ बजे दोनो पक्षों की
सहमति से झंडा मां चंडिका के मन्दिर में लाया गया और पूजा अर्चना के बाद मेले का
समापन किया गया.
सुबह आठ बजे मेले की
शुरुआत हुई.दोपहर एक बजे तक धीमी गति से चलता रहा. शाम होते-होते घायलो की संख्या
सात सौ से अधिक (पांढुर्ना से 275 और सांवरगांव से 230 लोगों के घायल होने की पुष्टि की है.)
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10.
धरती पर उतर आया
स्वर्ग- उनाकोटि
``धरती पर स्वर्ग-उनाकोटि
अगर मैं कहूँ कि धरती पर स्वर्ग उतर आया है तो
आप सहसा विश्वास नहीं करेंगे. नहीं भी करना चाहिए, लेकिन जब आपका इस स्थान पर
पदार्पण होगा, तब आप स्वयं कह उठेंगे कि हाँ यह सच है. तत्पश्चात आप सोचने पर विवश
हो जाएँगे कि आखिर वह कौन शिल्पकार था, जिसने मात्र एक छेनी और एक हथौड़ी के बल पर
कठोर पत्थरों पर, एक करोड़ से एक कम चित्र उकेरे ? वह भी एक रात में.
आप यह जानकर हैरान होने लगेंगे कि किसी अनाम
शिल्पकार ने, मात्र छेनी-हथौड़ी की सहायता से, विशालकाय तथा कठोर पत्थरों पर, एक
नहीं बल्कि एक करोड़ में एक कम यानि निन्याबे लाख, निन्यानबे हजार, नौ सौ निन्यानबे
चित्र बना डाले, वह भी केवल एक रात में ?. इस बात पर आप सहसा विश्वास नहीं करेंगे
कि यह ऐसे कैसे संभव हो सकता है कि एक अकेले कलाकार ने एक रात में इतने सारे चित्र
पत्थरॊं पर कैसे उकेर पाया होगा?. बात गले से नीचे नहीं उतरती.लेकिन ऐसा हुआ है.
अविश्वास करते हुए भी हमें विश्वास करना पड़ता है.
हाँ मित्रो ! हाँ, भारत में एक नहीं बल्कि
अनेक ऐसी जगहें हैं, जिनके सीने में छिपे राज को आज तक कोई नहीं जाना पाया.
त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 150 किमी.दूर
एक ऐसा स्थान है जिसे "उनाकोटी" के नाम से जाना जाता है. यही वह जगह है
जहाँ किसी अनाम शिल्पी ने एक रात में निन्यान्बे लाख, निन्यान्बे हजार, नौ सौ
निन्यानबे चित्र पहाड़ों की विशाल और कठोर छाति पर, केवल अपनी एक छेनी और एक हथौड़ी
की सहायता से उकेर डाला. इस रहस्य को आज तक कोई भी सुलझा नहीं पाया है. जैसे कि-
ये मूर्तियाँ किसने बनाई, कब बनाई और क्यों बनाई और सबसे जरुरी कि एक करोड़ में एक
कम ही क्यों? हालांकि इन रहस्यमयी पहेलियों के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं, जो
आपको हैरानी में डाल देने वाली हैं.
"उनाकोटी" एक ऐसा स्थान है, जो
चारों ओर से ऊँची-नीची पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है. एक ऐसे निर्जन
स्थान में लाखों मूर्तियों का निर्माण कैसे किया गया होगा? इतनी विशाल संख्या में
चित्र उकेरने में जहाँ कई-कई बरस लग जाएंगे, एक रात में बना पाना कैसे संभव हुआ
होगा, जबकि इस स्थान में कोई बसाहट नहीं है. इस आश्चर्यजनक स्थान के रहस्यों को
जानने समझने में बुद्धि भी चकराने लगती है. आज भी यह लंबे समय से शोध का विषय बना
हुआ है.
इन रहस्यमय मूर्तियों के कारण ही इस जगह का नाम उनाकोटी
पड़ा है, जिसका अर्थ होता है करोड़ में एक कम.
इस जगह को पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से एक माना जाता है. कई सालों
तक तो इस जगह के बारे में किसी को पता ही नहीं था. हालांकि अभी भी बहुत कम लोग ही इसके
बारे में जानते हैं.
इन
रहस्यमयी मूर्तियो के निर्माण को लेकर एक पौराणिक कथा बहुत प्रचलित है. मान्यता है
कि एक बार देवों के देव महादेव जी के समेत एक करोड़ देवी-देवता कहीं जा रहे थे.
अनवरत यात्रा के दौरान रात्रि घिर आयी. अंधकार घिरता देख समस्त देवी-देवताओं ने
महादेव जी से इसी स्थान में रुककर विश्राम करने की प्रार्थना की, जिसे उन्होंने
स्वीकार कर लिया. निवेदन स्वीकार करने से पूर्व उन्होंने समस्त देवी-देवताओं से कहा
कि सूर्योदय होने से पहले आप सभी इस स्थान को छोड़ देंगे. शिवजी अकेले जागते रहे
थे, जबकि समस्त देवी-देवता आँखों में गहरी निद्रा आंजे सो रहे थे. सूर्योदय होने
का समय हो आया था, लेकिन कोई भी देवी-देवता इससे पूर्व नहीं जाग पाए. यह देखकर
शिवजी क्रोधित हो उठे और उन्होंए श्राप देकर सभी को पत्थर बना दिया. यही वह कारण
था कि इस स्थान में 99 लाख, 99 हजार, 999 मूर्तियाँ
हैं.( एक करोड़ में एक कम भगवान शिवजी को छोड़कर.)
एक
और अन्य कथा प्रचलन में है. कहते हैं कि कोई कालू नाम का एक शिल्पकार था, जो भगवान
शिव और माता पार्वती जी के साथ कैलाश जाना चाहता था. ऐसी मान्यता है कि कैलाश
पर्वत पर केवल और केवल शिव परिवार ही रहता है. लेकिन भक्त की जिद थी कि वह वहाँ
जाना चाहता था. भक्त की बात भगवान भोले नाथ कैसे ठुकरा सकते थे?. उन्हें तो हर हाल
में अपने भक्त की इच्छा का सम्मान करना था. उन्होंने अपने भक्त के सामने एक
विचित्र शर्त रखी कि यदि वह एक रात में एक करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बना
देगा तो वे उसे अपने साथ कैलाश ले जाएंगे.
भक्त
जानता था कि एक रात में वह एक करोड़ मूर्तियां नहीं बना पाएगा, लेकिन कैलाश जाने और
अपने आराध्य के संग रहने की लालसा के चलते, उसने शिव जी की शर्त मंजूर कर
ली और बड़े जोर-शोर के साथ पत्थरों पर मूर्तियों का निर्माण करने में जुट गया. उसने
पूरी रात मूर्तियों का निर्माण किया,लेकिन तभी दुर्भाग्य से रात बीत गयी. सुबह जब
मूर्तियों की गिनती की गई, तो पता चला कि उसमें एक मूर्ति कम है. भक्त शिवजी के
मंशा के अनुरुप एक करोड़ मूर्तियों का निर्माण नहीं कर पाया, यही वह कारण था कि
शिवजी अपने साथ उसे कैलाश नहीं ले जा पाए. एक करोड़ में एक कम होने के कारण इस
स्थान का नाम "उनाकोटी" पड़ा.
यहाँ
के पहाड़ इतने ऊँचे हैं कि आसमान से होड़ ले रहे होते प्रतीत होते है. गहराइयाँ भी
इतनी अधिक है कि यहाँ बनी सीढ़ियों से नीचे उतरना जितना आसान है, उतना ही कठिन होता
है, ऊपर चढ़कर आना. चढ़ाई चढ़ते समय व्यक्ति को भगवान की याद आने लगते है. हालांकि
दूर-दूर तक फ़ैले सघन वनों से झर कर आती शीतल हवा के झकोरे उसे कुछ राहत प्रदान
करते हैं. वहीं अल्हड़ बहती नदी का शोर भी पर्यटकों के आनंद को द्विगुणित कर देता
है. ऐसा अद्भुत-अकल्पनीय "उनाकोटी" पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा रहस्य
और अद्भुत सौंदर्य को अपने में समेटे हुए
है, जो काफ़ी सालों तक अज्ञात बना रहा. आज भी लोग इस स्थान का नाम कम ही जानते है.
घने जंगलों के बीच शैल-चित्रों और मूर्तियों के जो अक्षय भण्डार उतने ही अद्भुत और
दिलचस्प है.
उनाकोटी में दो तरह की मूर्तियाँ मिलती हैं. एक-" पत्थरों को
काट कर बनाई गईं मूर्तिया". दूसरी- "पत्थरों पर उकेरी गईं
मूर्तिया". प्रायः सभी मूर्तियाँ हिंदू धर्म से जुड़ी हुईं प्रतिमाएं है,
जिनमे शिव जी, देवी दुर्गा जी, भगवान विष्णु, गणेश आदि की मूर्तियाँ उकेरी गईं
हैं. भगवान शिव की तीस फ़ीट की एक ऊँची प्रतिमा बनी हुई है, जिसे
"उनाकोटेश्वर" के नाम से जाना जाता है. इसी विशाल प्रतिमा के पास शिव के
वाहन नंदी की मूर्ति भी देखने को मिलती हैं. भगवान श्री गणेश जी की एक अद्भुत
मूर्ति ऐसी भी है, जिनकी चार भुजाएं और बाहर की तरफ़ निकले तीन दांत को दर्शाया गया
है. इसके अलावा श्री गणेश की एक मूर्ति ऐसी भी है जिसमें उनके चार दांत, आठ भुजाएं
दिखाई देती हैं. लोग यहाँ श्रद्धा के साथ आकर पूजा-पाठ करते हैं. हर साल अप्रैल
महीने के दौरान यहां मेले का आयोजन भी किया जाता है, जिसमे शामिल होने के लिए बड़ी
संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं.
उनाकोटी, अगरतला से टैक्सी द्वारा लगभग एक सौ पचास किमी. की दूरी पर
अवस्थित है. टैक्सी द्वारा 4-5 घंटे में आप यहाँ पहुँच जाते है. अगरतला से उनाकोटी रेलमार्ग द्वारा भी
पहुँचा जा सकता है. धर्मनगर रेल्वे स्टेशन से अथवा कुमारघाट रेल्वे स्टेशन से पैदल
रास्ते से आप उनाकोटी पहुँच सकते हैं. धर्मनगर से उनाकोटी सड़कमार्ग से दूरी 11.7 किमी है. लगभग इतनी
ही दूरी धर्मनगर रेल्वे स्टेशन से तय करने के बाद आप उनाकोटी पहुँच सकते हैं. तब
हम यह नहीं जानते थे कि ट्रेन से सफ़र करने के पश्चात धर्मनगर अथवा कुमारघाट रेल्वे
स्टेशन पहुंचने के बाद, ग्यारह किमी, की दूरी तय करने के लिए कोई वाहन मिलेगा भी
अथवा नहीं. चुंकि हमारे पास समय की कमी थी. अतः हमें टैक्सी द्वारा यात्रा करना
सुविधाजनक लगा था.
उनाकोटी की यात्रा को सुगम बनाने के लिए हम आभारी है विकासखंड
अधिकारी मान.श्री प्रशांत चक्रवर्ती जी के, जिन्होंने न केवल अगरतला में हमारे लिए
होटेल बुक की और उनाकोटी के लिए टैक्सी की व्यवस्था भी की. इतना ही नहीं, हमें
विमानतल तक पहुँचाने के लिए उन्होंने टैक्सी की व्यवस्था भी की थी. व्यस्ततम समय
में से समय निकालकर वे होटेल तक जरुर आते और हालचाल जानते. मात्र एक अल्प परिचय
में इतना सहयोग देना, उनकी हृदय की विशालता का परिचायक है. निः संदेह हम उनके बहुत
आभारी हैं.
साउथ एशिया फ़्रेटेर्निटी द्वारा तीन दिवसीय कान्फ़्रेंस मणिपुर की
राजधानी इम्फ़ाल में रखी गई थी. हमें इस शिविर में भाग लेने जाना था. छिन्दवाड़ा से
नागपुर की 110 किमी की यात्रा कर हम नागपुर के विमानतल डा.
बाबासहेब आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय विमानतल पर पहुँचे. नागपुर से सीधे इम्फ़ाल के लिए
कोई उड़ान नहीं है. नागपुर से दिल्ली, फ़िर दिल्ली से होते हुए इम्फ़ाल के लिए हवाई
सेवा थी.
तीन दिन शिविर में भाग लेकर अब हम चल पड़ते हैं इम्फ़ाल से गुवहाटी
होते हुए अगरतला की ओर हवाई मार्ग द्वारा. चुंकि हमारा मुख्य उद्देश्य था आश्चर्य
से भरे "उनाकोटी" की दिव्यता और भव्यता को जी भर के देखना और निहारना
था. निहारना था उन सघन वनों को, जिनमें सूरज की किरणें बड़ी मुश्किल से भीतर प्रवेश
कर पाती है. यहाँ के जंगल बारहों माह हरियाली की चादर ओढ़े रहते है. ऊपर खुलता नीला
आसमान, सघन वृक्षो के झुरमुट के बीच से चलकर सरसराकर बहती शीतल हवा के झोकें और
ऊँचे नीचे पहाड़ों के बीच से होते हुए यात्रा करना कौन नहीं चाहेगा?. जब भी आपका मन
बने, एक बार उनाकोटी जाने का कार्यक्रम जरुर बनाएं.
इम्फ़ाल, मणिपुर, अगरतला में भ्रमण करते हुए हमने वहाँ के दर्शनीय
स्थलों को देखा, जिसका उल्लेख फ़िर किसी अन्य आलेख में किया जाना उचित होगा. चुंकि
हमारा उद्देश्य "उनाकोटी" जाना और वहां की अद्वितीय सुन्दरता और उसके
गर्भ में समाए अनेक रहस्यों से परिचित होना था. अतः बात केवल उनाकोटी की ही की
जाना मुझे उचित जान पड़ा है.
"उनाकोटी" त्रिपुरा राज्य के उनाकोटी जिले के कैलाश शहर
उपखंड में स्थित एक ऐतिहासिक व पुरातात्विक हिन्दू तीर्थ स्थल है. यहाँ भगवान
भोलेनाथ को समर्पित मूर्तियाँ और स्थापत्य, जिनका निर्माण 7 वीं-9 वीं शताबदी ईसवी या उससे भी पहले बंगाल व
पड़ौसी क्षेत्रों के पाल वंश के राजकाल में हुआ था.
इस रोमांचक यात्रा के सूत्रधार थे हमारे मित्र (से.नि.) प्रो.
राजेश्वर आनदेव. सहयात्री थे श्रीमती अनिता आनदेव, डा. ममता आनदेव, श्री जयंत
डोले, श्रीमती सुषमा ढोले, श्री हरिश खण्डेलवाल, श्री सुनिल श्रीवास्तव.और स्वयं
मैं. (हमारी यह यात्रा 8 नवम्बर से 19 नवम्बर तक
निर्धारित थी.)_
उनाकोटी विश्व का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ एक नही, दो नहीं, बल्कि 99 लाख, 99 हजार,999
देवी-देवताओं का निवास-स्थान है. दूसरे शब्दों में कहें कि स्वर्ग यहीं है., तो
कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.. अगर आपने ऐसा स्थान नहीं देखा, तो सच मानिए, आपने कुछ
नहीं देखा.
उनाकोटी के जादुई आकर्षण में बंधकर और उससे लिपटे रहस्यों को जानकर
हम लौट पड़ते हैं अपने-अपने-अपने घरों की ओर.
शौर्य और पराक्रम की भूमि चित्तौड़गढ़
संपूर्ण राजस्थान अपने शौर्य, देशभक्ति एवं
बलिदान के जगप्रसिद्ध है. यहाँ के असंख्य राजपूत वीरों ने अपने देश तथा धर्म की
रक्षा के लिए अपने प्राणॊं का उत्सर्ग किया. वहीं राजपूत विरांगनाओं ने अनेकानेक
अवसरों पर अपने बच्चों सहित जौहर की अग्नि में प्रवेशकर एक आदर्श स्थापित किया.
यही कारण है कि संपूर्ण राजस्थान न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे विश्व में एक
प्रेरणा का स्त्रोत बन चुका है.
चित्तौड़गढ़ का अपना एक सुनहरा इतिहास है. यहाँ
के रणबांकुरों ने आक्रमणकारी मुगलों से जमकर लोहा लिया और अपने जीवित रहते हुए न
तो उनकी गुलामी स्वीकार की और न ही हार मानी, भले ही उन्हें कितनी की कष्टदायक
स्थिति से क्यों न गुजरना पड़ा हो.
महाराना सांगा से लेकर महाराणा प्रताप की
शूरवीरता के अनेकों किस्से बचपन में पढ़ने और सुनने को मिले, जिन्हें सुनते हुए मन
गर्व से भर जाता था. महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हल्दीघाटी में हुए युद्ध, और
हार के बाद जंगल में परिवार सहित रहते हुए प्रतीज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ को पुनः
प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक भूमि पर ही सोउंगा. एक वक्त ऎसा भी आया जब उनके
बच्चों को घास के बीजों की रोटी खाने पर विवश होना पड़ा था. एक किस्सा तो ऎसा भी
पढ़ने को मिला कि एक बिलाव उनके बच्चों की रोटी चुरा कर भाग गया और उन्हें भूख का
सामना करना पड़ा. इस घटना को सुनकर दिल दहल गया था. आँखों से आँसू झरझरा कर बह
निकले थे. इतना सब कुछ होते हुए भी उन्होंने अकबर के सामने घुटने नहीं टेके.
देशभक्त महाराणा की इस भूमि को देखने की इच्छा बलवती हो उठी थी. कालान्तर में वह
अवसर भी आया, जब मैं शूरवीरों की भूमि के दर्शन प्राप्त कर सका था.
मेरे साहित्यिक अवदान को देखते हुए वर्ष 2008 में आखिल भारतीय बालसाहित्य संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह मंच भीलवाड़ा
(राज) ने मुझे सम्मानीत करने का मानस बनाया और आमंत्रण-पत्र प्रेषित किया.
अनेकानेक साहित्यकार/गणमान्य नागरिकों की गरीमामय उपस्थिति में राजस्थान साहित्य
अकादमी की तत्कालीन निदेशक श्रीमती अजीत गुप्ताजी के हस्ते सम्मान-प्राप्त किया.
1.बालसाहित्य संगोष्ठी के संयोजक/ बालवाटिका पत्रिका
के संपादक, राजस्थान साहित्य अकादमी की तत्कालीन निदेशक श्रीमती अजीत गुप्ता जी से
सम्मान ग्रहण करते हुए
2. राजस्थान साहित्य अकादमी की निदेशन मा.श्रीमती अजीत
गुप्ताजी से सम्मानित होते हुए.
इस भव्य और रंगारंग कार्यक्रम के दूसरे दिन डा.
श्री भैंरुलाल गर्ग जी से मैंने निवेदन किया कि मेरा मन राजस्थान के उस भूभाग को
जिसे शूरवीरों की धरती चित्तौड़गढ़ के नाम से जाना जाता है, देखने की प्रबल
इच्छा है. दो दिवसीय कार्यक्रम के समापन के बाद वैसे ही वे थकान से चूर थे, बावजूद
इसके उन्होंने अपनी स्टेशन-वैगन निकाली और इस तरह मैं गाजियाबाद के मित्र श्री
महेश सक्सेना, डा.मधु सक्सेना के साथ चित्तौड़गढ़ के लिए रवाना हुए.
अजमेर से खण्डवा जाने वाली ट्रेन के द्वारा
रास्ते के बीच स्थित चित्तौड़गढ़ जंक्शन से करीब दो किमी. उत्तर-पूर्व की ओर एक अलग
पहाड़ी पर भारत का गौरव, राजपूताने का सुप्रसिद्ध चित्तौड़गढ़ का
किला बना हुआ है. समुद्र सतह से १३३८ फ़ीट ऊँची
भूमि पर स्थित ५०० फ़ुट ऊँची एक पहाड़ी पर निर्मित यह दुर्ग लगभग ३ मील लंबा और आधा
मील तक चौड़ा है. पहाड़ी का घेरा ८ मील है. यह किला लगभग ६०९ एकड़ भूमि पर बसा है.
इस विशाल किले के अन्दर पद्मिनी महल, कालिका
माता मन्दिर, गोमुख, समिद्धेश्वर महादेव मन्दिर, कीर्ति स्तंभ,मीरा का मंदिर,
गोमुख के अलावा एक-दो महलों को छॊड़कर शेष खण्डहर में तब्दील हो चुके हैं.
पद्मिनी महल.. एक झील के किनारे रावल रत्नसिंह की रानी
पद्मिनी के महल बने हुए हैं. एक छॊटा महल जलाशय के बीच में बना हुआ है जो जनाना
महल के नाम से जाना जाता है, व किनारे के महल मरदाने महल कहलाता है. मरदाना महल के
एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहाँ से झील के मध्य बने जनाना
महल की सीढ़ियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब दर्पण में नजर आता है.
परन्तु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता. संभवतः
अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खए होकर रानी पद्मिनी का प्रतिबंब देखा था.
काली माता का मन्दिर- पद्मिनी महल के उत्तर में
बाईं ओर कालिका माता का सुन्दर विशाल मन्दिर है. मूल रुप से यह सूर्य मन्दिर था.
गर्भगृह के बाहरी दीवर के ताकों (आलों) में स्थापित सूर्य की मूर्तियाँ इसका
प्रमाण है. मुसलमानों के आक्रमण के दौरान इसे तोड़ दिया गया था. बरसों सूना पड़ा
रहने के बाद इसमें कालिका की मूर्ति स्थापित की गई. तभी से यह कालिका मन्दिर के
नाम से जाना जाता है.
कीर्तिस्तम्भ
गमहाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलाजी को १९४० ई.
में प्रथम बार परास्त कर उसकी याद में अपने इष्टदेव श्री विष्णु के निमित्त यह
कीरिस्तंभ बनवाया था. स्तम्भ अपनी वास्तुकला की दृष्टि से अपने आप मंजिल पर झरोखा
होने से इसके भीतर प्रकाश बना रहता है.इसमें विष्णु के विभिन्न रुपों जैसे जनार्दन, अनन्त आदि, उनके अवतारों तथा ब्रम्हा, शिव, भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं, अर्धनारीश्वर (आधा शरीर
पार्वती तथा आधा शिव का), उमामहेश्वर, लक्ष्मीनारायण,
ब्रम्हासावित्री, हरिहर (आधा शरीर विष्णु और
आधा शिव का), हरिहर पितामह (ब्रम्हा, विष्णु
तथा महेश तीनों एक ही मूर्ति में)
ॠतु, आयुध (शस्र), दिक्पाल तथा रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियाँ खुदी
हैं। प्रत्येक मूर्ति के ऊपर या नीचे उनका नाम भी खुदा हुआ है। इस प्रकार प्राचीन
मूर्तियों के विभिन्न भंगिमाओं का विश्लेषण के लिए यह भवन एक अपूर्व साधन है। कुछ
चित्रों में देश की भौगोलिक विचित्रताओं को भी उत्कीर्ण किया गया है। कीर्तिस्तम्भ
के ऊपरी मंजिल से दुर्ग एवं निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य दिखता है। बिजली
गिरने से एक बार इसके ऊपर की छत्री टूट गई थी, जिसकी महाराणा
स्वरुप सिंह ने मरम्मन करायी थी. कई शौकीन चित्रकार यहाँ चित्रकारी करते हुए देखे जा सकते हैं.
मीराबाई का मंदिर
मीराबाई का मन्दिर मीरा
मन्दिर में श्री विष्णु मंगरुलकर, गोवर्धन यादव डा.भैंरुलाल
गर्ग अपने पोते के साथ.
श्री कृष्ण की दीवानी भक्त मीरा बाई का भव्य
मन्दिर देखने लायक है. इसकी नक्काशी भावविभोर कर देती है. कहते हैं कि राणा की
मृत्यु के पश्चात मीरा राजभवन छॊड़कर इसी स्थान पर रहकर अपने आराध्य श्रीकृष्णजी की
भक्ति में लीन रहती थी. पहले गर्भगृह में कोई मुर्ति नहीं थी, बाद में किसी ने
श्रीकृष्णजी के आदमकद तस्वीर यहाँ रख दी है. इसी मन्दिर के सामने मीराजी के गुरु
संत रैदास जी का एक छॊटा सा मन्दिर स्थापित है. इस मन्दिर में मीरा के गुरु
रैदासजी के चरणचिन्ह अंकित हैं.
गौमुख कुण्ड.
महासती स्थल के पास ही गौमुख कुण्ड है। यहाँ एक
चट्टान के बने गौमुख से प्राकृतिक भूमिगत जल निरन्तर एक झरने के रुप में शिवलिंग
पर गिरती रहती है। प्रथम दालान के द्वार के सामने विष्णु की एक विशाल मूर्ति खड़ी
है। कुण्ड की धार्मिक महत्ता है। लोग इसे पवित्र तीर्थ के रुप में मानते हैं।
कुण्ड के निकट ही उत्तरी किनारे पर महाराणा रायमल के समय का बना एक छोटा सा
पार्श्व जैन मंदिर है, जिसकी
मूर्ति पर कन्नड़ लिपि में लेख है। यह संभवतः दक्षिण भारत से लाई गई होगी। कहा
जाता है कि यहाँ से एक सुरंग कुम्भा के महलों तक जाती है। गौमुख कुण्ड से कुछ दूर
दो ताल हाथी कुण्ड तथा खातण बावड़ी है।
.
समिध्देश्वर का मन्दिर
विजय स्तम्भ के दक्षिण में
समिध्देश्वार महादेव का एक प्राचीन मन्दिर है जिसके निज-मन्दिर में शिवलिंग के
पीछे दीवार पर शिव की त्रिमूर्ति है जो सत ( सत्यता), रज ( वैभव) व तम (क्रोध) के
द्दोतक है. इस मन्दिर का निर्माण मालवा के राझा भोज के करवाया था. सन 1427 ई.में
चितौड़ के महाराणा मोकल ने इसका जीर्णॊध्दार करवाया था. ऎसे दो शिलालेख प्राप्त हुए
है.
कालीका का मन्दिर.
जयमल-पत्ता के महल के दक्षिण में सड़क के पश्चिमी
किनारे पर काली जी का सुन्दर, विशाल और ऊँची कुर्सी पर बना बहुत प्राचीन मन्दिर
है. मन्दिर के खम्बों, छत मंदिर के द्वार पर खुदाई का काम बहुत ही प्राचीन प्रतीत
होता है. मन्दिर के द्वार पर खुदी सूर्य-मूर्ति तथा गर्भ-गृह के बाहर पार्श्व के
अनेक भागों में स्थापित सूर्य की मूर्तियों को देखने पर ज्ञात होता है कि यह सूर्य
मन्दिर ही रहा होगा. मुगलों के आक्रमण के समय सूर्य की मूर्ति तोड़ दी गई थी तथा
बाद में उसकी जगह काली जी की मूर्ति की स्थापना कर दी गई हो.
इनके अलावा महाराणा कुम्भा का महल, फ़तहप्रकाश
महल, महासती-स्थल, जयमल पत्ता के महल, खाती रानी का महल, गोरा-बादल के महल आदि अब
जीर्ण अवस्था में है, जिन्हें देखकर उस समय के वैभव को जाना जा सकता है.
चित्र 1 एवं 2 में सम्मानित होते हुए
गोवर्द्धन यादव
चित्र 3 एवं 4 में हल्दीघाटी के
प्रांगण में यादव
चित्र 5 में मित्र श्री विष्णु मंगरुलकर. चित्र 6 में चेतक की समाधी.
चित्र 7 में अकादमी के समक्ष मित्र मण्डली. चित्र 8
उदयपुर की नवकृति मंच से यादव का सम्मान
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12.
अविस्मरणीय यात्रा अंडमान-निकोबार की.
घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर प्रकृति के
अनूठे, अनछूये सौंदर्य के दर्शन करना, खिलखिलाते समय के कंधे पर हाथ रखकर उसके साथ
खिलखिलाना- मुस्कुराना- बातें करना, उछलती-कूदती, बल- खाती झूमती नदियों का पहाड़ी गीत-संगीत सुनना, पहाड़ों के एकांत में खो
जाना, घने जंगलों में सरसरा -कर बहती अल्हड़ हवा के झोंकों के
संग झूमना-इठलाना, चिड़ियों का शोर सुनना और आकाश में चहचहाते, उड़ान भरते विहंगो को
निहारना, पहाड़ों की चोटियों से उछल-कूद मचाते, गीत गाते झरनों को धरती पर उतरते
हुए देखना और भी न जाने कितने ही रंग-रूप बदलते नीलाकाश के नीचे स्वछंदता के साथ
विचरना, दहाड़ते-उफ़नते सागर से बातें करना ही तो यात्रा के पर्याय है.
जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब जीवन
एकाकीपन के घिरने लगता है. जीवन से ऊब होने लगती है. मन छटपटाने लगता है, एक
अज्ञात भय मन के आंगन में घेरा डालकर बैठ जाता है. ऐसे विकट और कठिन समय में जीवन
नीरस जान पड़ने लगता है. जीवन अपना अर्थ खोने लगता है. जैसे ही आप अपने परिधि
(रेडियस) से बाहर निकलते हैं यात्रा पर,
अपने आपको एक नई दुनिया में पाते हैं. वहाँ का नयापन आपको अपने सम्मोहन के जाल में
बांधने लगता है. घर से बाहर निकलते ही आप
स्वयं भी बदलने लगते है. एक नया परिवर्तन अपने आप आने लगता है. नीरस जीवन
अपने आप रंगीन होने लगता है. अतः ऐसे नीरस जीवन को रसमय बनाने के लिए बहुत
जरुरी है "यात्रा" में निकल पड़ना.
यात्रा एक छोर से निकलकर दूसरे छोर तक जाना
नहीं है, बल्कि नित नूतन होते संसार में प्रवेश करना भी होता है. यात्रा का
तात्पर्य केवल समय नष्ट करना नहीं होता, बल्कि एक अपरिचित-अनचिन्हे संसार को
जानना-पहचाना भी होता है. यात्राएं केवल भौतिक ही नहीं होती, बल्कि बाहर से अन्दर
की ओर भी होती है. अंतरयात्रा से व्यक्ति अपनी आत्मा के बेहद करीब पहुँच जाता है.
मन की अतल गहराइयों के भीतर उतरकर, वह जीवन का
वास्तविक अर्थ खोजने लगता है. अपने आपको पहचाने लगता है और एक दिव्य प्रकाश
से नहा उठता है.
यात्रा एक मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक और
अध्यात्म से जुड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम भी है. जैसे ही हमारा आधिपत्य, मूल
प्रकृति पर होने लगता है, उसी क्षण से एक विलक्षण सृजनात्मकता का उदय भी हमारे
भीतर होने लगता है.
थके मन और शिथिल देह के साथ उलझन से घिरे जीवन
में यकायक "यात्रा" करने का उत्साह जब झंकृत होने लगे तो समझिए-
"उत्सव का अवसर" आ गया है. नैराश्य पर मनुष्य की विजय का सबसे बड़ा
प्रमाण है-" उत्सव यात्रा". और यही जीत हासिल करने का उद्घोष भी है.
पुनर्नव के लिए किए गए अद्भुत प्रयास की बानगी भी है और उल्लास-अभिव्यक्ति की
सुंदर छवि भी.
बदलते समय के साथ हम, मौसम से बिंधे मन लिए
फ़िरते है "यात्रा" में. हमारी आँखें निहारने लगती हैं ऋतुओं को और मन
उसके मुताबिक शब्दों के मोती चुन-चुनकर हार गूंथने लगता है. जैसे ऋतु- वैसा मन- वैसे वचन. प्रख्यात साहित्यकार भगवतीचरण
वर्मा इसी मौसम से बंधकर कह उठते हैं- मस्ती से भरके जबकि हवा / सौरभ से
बरबस उलझ पड़ी / तब उलझ पड़ा मेरा सपना / कुछ नए-नए अरमानों से / गेंदा फ़ूला जब
बागों में / सरसों फ़ूली जब खेतों में / तब फ़ूल उठी सहस उमंग / मेरे मुरझाए प्राणों
में.// मुरझाए प्राणों को प्राणवान बनाने का सबसे सरल और कारगर उपाय
है-यात्रा पर निकल पड़ना.
पिछली बार की यात्रा में हम एक ऐसे भू-भाग में
जा पहुँचे थे, जहाँ धरती के एक छोर पर वसंत की लालिमा छिटकी हुई थी, तो वहीं दूसरे
अन्तिम छोर पर रूखे-सूखे नंगे पहाड़ों का संजाल था. जहाँ हरियाली नाम मात्र को भी
नहीं थी. जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ- "शिमला टू काजा ( दि हिमालयन कोल्ड
डेजर्ट) व्हाया चंडीगढ़ की. अब की बार हमारी यात्रा थी-"हावड़ा से
अंडमान-निकोबार व्हाया नागपुर".हावड़ा में जहाँ भीड़-ही-भीड़ है, इन्सानों का
समुद्र जहाँ ठाठे मार रहा होता है, वहीं अंडमान चारों ओर से लहलहाते, मिलों लंबे
समुद्र से घिरे हुए तथा नारीयल और सुपाड़ी के घने जंगलओं के बीच मुस्कुराता है.
बतलाते हैं कि केवल 32 द्वीपों पर ही आवक-जावक है,
बाकी के द्वीप सरकार की निगरानी में उनकी देखरेख होती है. पर्यटक को केवल तीन
द्वीपों पर सैर करने की अनुमति है. तीनों ही द्वीप अपनी नैसर्गिक छटा से पर्यटकों
का मन मोह लेते हैं.
अंडमान द्वीप समूह में छोटे-बड़े 572 द्वीप
समाहित हैं. अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह का संपूर्ण क्षेत्रफ़ल 8249 (sqr) किलोनीटर है, यह द्वीप सैंडल पीक (532 मीटर), माउंट हैरियेट (365.मीटर), माउंट थूओलियर (642
मीटर) जैसी ऊँची-ऊँची पहाड़ियां से घिरा हुआ है. तथा इसकी चेन्नई से
(पोर्टब्लेयर) की दूरी 1190 किमी, कोलकाता से 1255 किमी. विशाखापट्टम से 1200 किमी.दूर है. एक अकेले
अण्डमान क्षेत्र की लंबाई 467 किलोमीटर तथा चौड़ाई 52 किलोमीटर है. निकोबार द्वीप समूह की लम्बाई 259
किलोमीटर तथा चौड़ाई 58 किलोमीटर है. ये सभी द्वीप, चारों ओर
से भयंकर शोर मचाते, दहाड़ते समुद्र (बंगाल
की खाड़ी) से घिरा हुआ है.
अण्डमान एवं निकोबार द्वीपसमूह की एक प्रमुख जनजाति है "जारवा". वर्तमान समय में इनकी संख्या 250 से
लेकर 400 तक अनुमानित है जो कि अत्यन्त कम है. जारवा लोगों की त्वचा का रंग एकदम काला होता है और कद छोटा होता है. करीब 1990 तक जारवा जनजाति किसी की नज़रों में नहीं
आई थी और एक अलग तरह का जीवन जी रही थी. अगर कोई बाहरी आदमी
इनके दायरे में प्रवेश करता था, तो ये लोग उसे देखते ही मार
देते थे. जारवा जनजाति अब भी तीर-धनुष से अपने लिए शिकार
करती है. इनकी आबादी प्रतिवर्ष घटती देखी गई है, एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में इनकी आबादी 250 से 400
के बीच है.
15-09-2022.
हावड़ा टू पोर्टब्लेयर व्हाया नागपुर.
15 सितम्बर 2022 की
अलसुबह हम जा पहुँचे कोलकाता के " नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंटरनेश्नल
एअरपोर्ट" पर. टाटा की एअरलाईन सर्विस " विस्तारा-
747" ने 09.00 पर उड़ान भरी और लंबी उड़ान भरते हुए हम दिन के 11.20
बजे जा पहुँचे "पोर्ट्ब्लेयर". वहाँ पहुँचकर हमने होटेल में भोजन किया
और कुछ समय विश्राम किया.
"पोर्ट्ब्लेयर"
"अंडमान-निकोबार की राजधानी " पोर्टब्लेयर"
है. यहाँ आपको ऐतिहासिल सेलुलर जेल, कोरबाइन्स कोव बीच, रोज आईलैण्ड, वाईपर आईलैण्ड,
ब्रिटिश कालोनी आदि देखने को मिलती हैं.. इस शहर को स्मार्ट सीटी के तौर पर विकसित
किया गया है. उतार-चढ़ाव वाली सड़कों पर फ़र्राटे भरते वाहन, जब सुपाड़ी और पाम के
सघन वृक्षों की हरियाली के बीच से होकर गुजरते है, तो यात्री यहाँ के नजारे देखकर
मंत्रमुग्ध हो जाता है.-
सबसे पहले हमने "सेलुलर जेल" जाकर उन ज्ञात-अज्ञात
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को, जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए शारीरिक और मानसिक आघातों / यातनाओं को सहकर
हंसते-हंसते फ़ांसी के फ़ंदे पर झूल गए लेकिन अंग्रेजी दासता को कभी स्वीकार नहीं
की. हम सर्व प्रथम इस ऐतिहासिक स्थल पर जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहते
थे.
सेलुलर जेल अर्थात कालापानी-
कालापानी- ( आतंकित
होने के लिए नाम ही काफ़ी है.
( सेलुलर जेल के समक्ष बाएं से दाएं- श्री
राजेश्वर आनदेव, हरीश खंडेलवाल, सत्यनारायण अग्रवाल,गोवर्धन यादव, ( इस लेख के लेखक.) विनोद शर्मा,सुनील श्रीवास्तव,
दीपक बुते, सुधीर शेकदार, विजय कुर्रे ,कन्हैयाराम रघुवंशी, हर्षद घाटोले, श्याम हुद्दार, प्रकाश इंगले, सतीष सिंगोर)
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प्रायः सभी द्वीप, चारों ओर से भयंकर शोर मचाते, दहाड़ते समुद्र (बंगाल की
खाड़ी) से घिरा हुए है, ऐसे दुर्गम स्थान
पर "सेलुलर जेल" का निर्माण किया जाना और उसमें सैकड़ों वीर सेनानियों
को..... उन क्रांतिकारियों को, जिन्हें ब्रितानिया सरकार अपने लिए बड़ा खतरा मानकर
चलती थी, यहाँ लाकर कैद में रखा जाता था. यदि कोई कैदी, सैनिकों की क्रूर निगाहों
से बचकर यहाँ से भागना भी चाहे, तो मीलों फ़ैले समुद्र को तैर कर पार कर पाना उसके
लिए लगभग असंभव ही था. "कालापानी"
के नाम से कुख्यात इस द्वीप समूह को "कालापानी " के नाम से जाना गया.
इसके पीछे दो तथ्य उभरकर सामने आते हैं, पहला तो यह कि अण्डमान समुद्र का नीला
गहरा पानी, जो देखने पर काला प्रतीत होता है, इस कारण इसका नाम
"कालापानी" पड़ा और दूसरा यह कि अंग्रेजों द्वारा जो खुँखार कैदियों और
क्रन्तिकारियों को सजा सुनाई जाती थी, सजा के रूप में इसे "कालापानी" से
सम्बोधित किया गया.
जब हम अपने देश के स्वतंत्रता सेनानियों को
याद करते हैं, तो हमें उस "कालापानी" की याद हो आती है, जो अंग्रेजों की
बर्बरता को बतलाने के लिए काफ़ी है. कालापानी की सजा का ख्याल आते ही शरीर के
रॊंगटे खड़े हो जाते हैं. हालांकि अब देश में "सजा-ए-कालापानी" का कोई
अस्तित्व नहीं रह गया है, फ़िर भी लोगों को उसके बारे में जानने की दिलचस्पी लगातार
बनी हुई है. कालापानी शब्द अंडमान के बंदी उपनिवेश के लिए देश निकाला देने का
पर्याय है.कालापानी का सांस्कृतिक भाव काल से बना है जिसका अर्थ होता है- मृत्यु
जल या मृत्यु के स्थान से है, जहाँ से कोई वापस नहीं आ पाता. देश निकालों के लिए
कालापानी का अर्थ तो यह भी है कि बचे जीवन के लिए कठोर और अमानवीय यातनाएं सहना.एक
अन्य अर्थ में कालापानी यानि स्वतंत्रता सेनानियों को अनकही यातनाओ और तकलीफ़ों का सामना करने के
लिए जीवित नरक में भेजना, जो मौत की सजा से भी बदतर था. कालापानी की सजा माने बंदी
को अपनों से दूर भेजना, एक ऐसा अदृष्य लोक, जिसके बारे में कोई कुछ नहीं जानता.
भारतीय कैदी जेलों से भाग निकलते थे, बावजूद
इसके ब्रिटिश सरकार ने कालापानी के बनाई गई जेल की चार दीवारी बहुत छोटी बनवाई थी,
क्योंकि इस जेल का निर्माण जिस जगह हुआ था, वह स्थान चारों ओर से समुद्र के गहरे
पानी में घिरा हुआ था. ऐसे में किसी भी कैदी का भाग पाना नामुमकिन था.
238 कैदियों ने एक साथ अंग्रेजों को चकमा देकर वहां से भाग निकलने
की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए और पकड़ लिए गए. फ़िर होना क्या था?. उन्हें
अंग्रेजों के कहर का सामना करना पड़ा. यातना सहन नहीं कर सकने की दशा में एक कैदी
ने आत्महत्या तक कर ली थी, जिससे नाराज होकर जेल अधीक्षक वाकर ने 87 लोगों को फ़ांसी पर लटकाने का आदेश दे दिया. निर्ममता से जुल्म सहने के
बावजूद हमारे स्वतंत्रता वीर सेनानियों ने "भारत माता की जय" बोलने से
कभी पीछे नहीं हटे.
सेसुलर जेल के निर्माण के मुख्य कारक जानने के
लिए हमें सन 1857 की ओर लौटना होगा. 10 मई 1857 को भारतीयों ने अंग्रेज शासन के खिलाफ़ विद्रोह
किया था. इस विद्रोह के 200 क्रांतिकारियों को पिनल सेटलमेंट
के तहत कालापानी अर्थात अण्डमान लाया गया था. अंग्रेज सरकार ने 20 नवम्बर 1857 को अण्डमान कमेटी का निर्माण किया,
जिसमें डा. फ़्रेडरिक जान मोट सर्जन बंगाल आर्मी की अध्यक्षता में समिति ने कार्य
करना शुरु किया. जिसमें स्पष्टरूप से कहा गया कि खाड़ी द्वीपों के तटॊं का बारिकी
से निरीक्षण करे एवं उपयुक्त स्थान का चुनाव करते हुए वहाँ जेल का निर्माण किया जा
सके. समिति के निर्णय के ठीक पन्द्रह दिन पश्चात अण्डमान में पिनल सेटलमेंट शुरु
किया गया.
कैपटन हेनरी मान को शासन की ओर से यह आदेश दिया गया कि वह इस बड़े
भूभाग पर ब्रिटिश यूनियन जैक फ़हराए और उसे अपने अधीन कर ले. इस तरह 22 जनवरी 1858 ई.को यूनियन जैक पताका को फ़हराया गया और
इसी के साथ वह अंग्रेजों का शासन शुरू हो गया. रास द्वीप के जंगलों को साफ़ करके
उसे राजधानी के रूप में विकसित किया गया. पिनल सेटलमेंट के तहत 1857 के सैनिक, पंजाब के गदर और बहावी विद्रोहियों, मणीपुर के विद्रोही और
अन्य प्रांत से लाए गए भारतीय देश भक्तों ने कठिन परिश्रम के बल पर जंगल साफ़ करके,
रासद्वीप को अंग्रेज शासन की राजधानी का रूप दिया गया. उस समय इन लाए गए देश
भक्तों को "कालापानी" सजा के रूप में अण्डमान में भयंकर कष्टपूर्ण
दर्दनाक सजा काटनी पड़ती थी. अण्डमान से भारत की मुख्य भूमि की ओर लौटना लगभग असंभव
था. उन स्वातंत्रवीरों को मिलने वाले कष्टों को यदि एक पल भर के लिए भी याद किया
जाए, तो शरीर में सिहरन होने लगती है. मन में एक अज्ञात भय समाने लगता है.
1858 को कालापानी सजा के रूप में पहला जत्था
200 सिपाहियों और उसके पश्चात लगातार सैकड़ों भारतीय
क्रांतिकारियों को यहाँ लाया गया, जिनका लेखे-जोखे का आज तक कोई अता-पता नहीं
मिलता. वे सैकड़ों क्रांतिकारी, अपने देश की आजादी के लिए इस "कालापानी"
धरती में सदा-सदा के लिए समा गए. भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात
अंग्रेज सरकार ने क्रांतिकारियों को कालापानी याने अण्डमान भेजना शुरु किया कि
उन्हें खतरनाक क्रांतिकारियों से सदा-सदा
के लिए मुक्ति मिल सके.
सेलुलर जेल-के नाम से कुख्यात इस जेल का
निर्माण अटलांटा पाईंट की ऊँचाइयों पर स्थित है. इसका निर्माण 1896-1906 ईसवीं के बीच हुआ. सनुद्री किनारे पर एक पहरेदार के समान यह आज भी खड़ा
है. जेल शहर के उत्तरीय पूर्व दिशा में है. इस जेल की एक-एक ईंट में
क्रांतिकारियों के खून-पसीने का इतिहास छिपा हुआ है. यह जेल सात कतार में खड़ा है.
हर कतार में तीन मंजिलें और सात ही कतार मंजिले, एक टावर से जुड़ी हुई है. दूर से
देखने पर यह "स्टार फ़िश" की तरह या साइकिल के चक्के से जुड़े स्पोक्स की
तरह नजर आता है. जेल के मध्य भाग में स्थित टावर से इस जेल की सात भुजाओं को एक
साथ देखा जा सकता है. जेल का निर्माण कार्य 1896 में शुरु
हुआ था और 1910 में संपन्न हुआ. यह इमारत एक गहरे भूरे लाल
रंग की ईंटॊं से बनी हुई है.
सेलुलर जेल में बनी 698 एकांत कोठरियां 13.5 फ़ीट लंबी तथा सात फ़ीट चौडी तथा
दस फ़ीट ऊँची है. कोठरी का लोहे का दरवाजा तीन फ़ीट की लोहे की राड के साथ बंद होता
है. अंधकारमय इन कोठरियों का दरवाजा खोलना इतना आसान नहीं होता कि कोई भी जब चाहे
दरवाजा खोल ले. प्रत्येक कोठरी में 3(x)1 का वेंटिलेटर बनाया
गया है. इन कोठरियों की बनावट इस प्रकार से की गई है कि कोई भी क्रांतिकारी न तो
अपने साथी का चेहरा ही देख पाता था और न ही कोई गुप्त विचार प्रकट कर सकता था.
सारी की सारी कोठरियां एक कतार में बनी है. दालान चार फ़ीट चौड़ा है, जो कठोर लोहे
से घिरा है. ये सभी दालान मध्य टावर से मिलते हैं. जेल में प्रवेश पाना और बाहर
निकलने के लिए एक ही रास्ता है. सभी तीनों गलियारे, मध्य टावर सभी गलियारे से जुड़े
हुए हैं.
इन तीनों गलियारों में एक वार्डर, उप-गलियारा
में दूसरा वार्डर और मध्य गालियारे में तीसरा वार्डर, इस प्रकार 21 वार्डर्स गस्त ड्यूटी में तैनात होते थे और क्रांतिकारियों की सभी
गतिविधियों पर नजर रखते थे. 12 घंटे के रात्रि काल में
कैदियों को पेशाब के लिए एक मिट्टी का पात्र दिया जाता था, जो कि एक समय के पेशाब
के लिए काफ़ी था. अगर टट्टी करने की बात आती तो उसके लिए अपने आप को काबू में रखना
होता था. जमादार की इजाजत के बगैर कोई भी कैदी को छॊड़ा नहीं जाता था. यदि कोई कैदी
बीमार पड़ जाता तो उसकी डाक्टरी जांच नहीं होती थी. उसे जेल के खुंखार जेलर बैरी के
सामने हाजिर होना पड़ता था. उसे अस्पताल भेजना या न भेजना, जेलर की मर्जी पर निर्भर
होता था. या फ़िर उसे भगवान के सहारे पर जिंदा रहना होता था.
जेल के कठोर नियमों में एक नियम यह भी था कि
प्रत्येक कैदी को एक निश्चित मात्रा में नारियल का तेल या फ़िर सरसों का तेल
निकालना होता था. यदि किसी कारणवश कोटा पूरा नहीं होता था, तो क्रोधी जेलर पीट-पीट
कर उसके शरीर की चमढ़ी तक उधेड़ देता था. कैदियों को बचे हुए नारीयल को छीलकर (
जटा-जूट ) रस्सी बनवाई जाती थी. उन्हें तेल निकालने की घानी में बैलों की तरह
कोल्हू खींचना पड़ता था. खाना भी पर्याप्त मात्रा में नहीं दिया जाता था. खाना अपने
आपमें इतना दुषित और विषैला होता थी कि एक अच्छे हृष्ट-पुष्ट इन्सान को बीमार बना
दे. जली-अधजली, कच्ची-पक्की रोटियां, दाल ( जिसमें पानी की भरमार ज्यादा होती थी)
और सब्जी परोसी जाती थी, जिनमें कीड़े-मकौड़ों का पाया जाना आम बात थी. भोजन में नमक
तो केवल नाम मात्र को ही होता था.
सेलुलर जेल के निर्माण होने के पहले यह वाइपर
द्वीप की जेल थी, जिसे ब्रिटिश शासन द्वारा देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को
प्रताड़ित किया जाता था. इस कुख्यात जेल को नाम दिया गया था-" वाइपर चेन गईंग
जेल" ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वालों के पैरों को जंजीर से जकड़ दिया जाता
था.
सेलुलर जेल की वास्तुकला "
पैसेव्लेनिया" प्रणाली या एकांत प्रणाली के सिद्धांत पर आधारित थी, जिसमें
अन्य कैदियों से पूरी तरह अलग रखने के लिए प्रत्येक कैदी को अलग-अलग रखने के लिए
अलग-अलग कारावास देने का नियम था. एक ही विंग या अलग विंगो में कैदियों के बीच
किसी भी प्रकार का संचार संभव नहीं था. पिसाई करने वाली चक्की पर , बागवानी करने,
गरी सुखाने, रस्सी बनाने, नारियल की जटा तैयार करने, कालीन बनाने, तौलिया बुनने
आदि का काम करते समय कैदियों के हाथों में हथकड़ी जकड़ी हुई रहती थी.. एकांत कोठरी
में कैद रहने, कई-कई दिनों तक भूखा रखने की सजा इतनी भयावह और असहनीय होती थी
जिसकी कल्पना मात्र से शरीर में सिहरन होने लगती है.
देश का यह सेलुलर जेल क्रांतिकारियों के लिए
आजादी का स्त्रोत रहा है, क्योंकि ब्रिटिश शासन खतरनाक क्रांतिकारियों को इस जेल
में भेजते थे. अत्याचारों के विरुद्ध जब वे भूख हड़ताल करने को मजबूर हो जाते तो उन
पर बेरहमी से लाठियां भांजी जाती थी. कैदियों को पत्र लिखने या पत्रिकाएं पढ़ने की
सख्त मनाही थी. साल में कैदियों को एक बार अपने घर पत्र लिखने की इजाजत थी. उनकी
लिखी चिठ्ठियों की बारिकी से जांच-पड़ताल होती थी. अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार
का मुकाबला कुछ ही कैदी कर पाते थे. बहुतेरों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी. कुछ
तो पागलपन का शिकार होकर काल-कवलित हो गए.
सन 1908 में बने
अण्डमान तथा निकोबार गजेटीयर के अनुसार जिन कैदियों को छः साल की सजा होती थी,
उन्हें जेल के कड़े अनुशासन में रहना पड़ता था. जिन्हें देढ़ साल की सजा दी जाती,
उन्हें कठिन काम दिया जाता था. जिस
कैदियों को तीन वर्ष की सजा होती थी, उन्हें बैरेक्स में रहना पड़ता था और जेल के
अधिकारियों के कठोर देखरेख में काम करना पड़ता था. काम के बदले कुछ पैसा भी उन्हें
मिलता था. आगे चलकर कैदी अगले पांच साल के लिए मजदूर कैदी के रूप में अपना
जीवनयापन करता था. उसे छोटी जिम्मेदारी दी जाती थी. जिनकी सजा की अवधि दस साल की
हो जाती थी, उसे खुली आजादी का टिकिट मिल जाता था, वह अपनी शेष जिन्दगी किसी गांव
में खेती और जानवर पालकर बिताता था. उसे शादी करने का अधिकार प्राप्त होता था. अपनी
आय का कुछ हिस्सा परिवार को भेज सकता था,लेकिन कैदी अपने आप में स्वतंत्र नहीं
होता था. वह सेटलमेंट के बाहर नहीं माना जाता था,लेकिन जो कैदी बीस-पच्चीस वर्ष
सेटलमेंट जीवन पूरा कर लेता था, उसे सेटलमेंट से छुट्टी दे दी जाती थी.
दूसरे महायुद्ध के दौरान अण्डमान तथा निकोबार
में जापानी हमला हुआ, इस तरह इसका प्रशासन जापान सरकार के अधीन हो गया. इस जापानी
प्रशासन के दौरान इन द्वीपवासियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. जैसे
खद्यान्न की भारी कमी, आम चीजों का अभाव आदि. जापानी सैनिक स्थानीय लोगों के घरों
में जबरन घुस कर कोई भी चीज उठा लेते थे. इसका विरोध करने का साहस करना कठिन था.
आए दिन जापानी महत्वपूर्ण ठिकानों पर ब्रिटिश हवाई हमले होते थे. इससे खाद्यान्न
भंडार, अस्त्र-शस्त्र का भारी नुकसान होता था. जापानियों को शक था कि यहां के
स्थानीय लोग अंग्रेजों से मिलकर जासूसी का काम करते हैं. इसलिए जापानी सेना ने
पढ़े-लिखे भारतीयों की धरपकड़ शुरु कर उन्हें जेल में डाल दिया. कुछ लोगों को जासूस
होने का करार देकर उन्हें जबरदस्ती नाव में बिठाकर हैवलाक के समुद्र में झोंक देते
थे. इतना ही नहीं उनके ऊपर बोट तक घुमा दी जाती थी, ताकि वे जीवित न बच पाए.
स्थानीय लोगों को मार-मारकर उनसे सड़कें बनवाना, सरकारी मकान आदि बनवाने के काम पर
लगाया जाता था.
26 दिसंबर सन 2004 को
ग्रेट निकोबार और लिटिल अण्डमान में 8.9 की तीव्रता वाला
भूकंप आया, जिसमें समुद्र की लहरें बेकाबू हो गई और देखते ही देखते उस क्षेत्र के
समुद्री किनारे पानी से भर गए और जनजीवन तहस-नहस हो गया.आदमी, औरतें, बच्चे पागलों
की तरह ऊँचाई वाली जगहों पर भागने लगे, हजारों जानवर जहाँ की तहाँ अपनी जान गवां
बैठे. नारीयल और सुपाड़ी और मसालों के बागीचे पूरी तरह तहस-नहस और बरबाद हो गए. इस
सुनामी की शुरुआत इंडोनेशिया देश के सुमात्रा द्वीप से हुई. इस विनाशकारी सुनामी
ने सुमात्रा, श्रीलंका, थाईलैण्ड और भारत के तामिलाडु और निकोबार एवं अण्डमान
द्वीपों को बुरी तरह से प्रभावित किया. इतना ही नहीं सुनामी के पश्चात यहाँ का
प्रमुख ज्वालामुखी द्वीप "बैरन" प्रज्जवलित हो उठा. इस सुनामी के प्रकोप
से सेलुलर जेल भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ. उसके कई हिस्से सुनामी की भेंट चढ़ गए.
अंग्रेजों ने बहुत सारे लोगों को कालापानी की
सजा सुनाई थी, जिसमें अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी थे. विनायक दामोदर सावरकर, सावरकर
के भाई बाबूराम सावरकर, डा दीवान सिंह, योगेन्द्र शुक्ला, होतीलाल वर्मा, बाबा भानसिंह, वारिन्द्र कुमार
घोष, क्रांतिवीर बटुकेश्वर दत्त, फ़िल्ड मार्शल संपादक लद्दाराम, मौलाना अहमदौल्ला,
मौलवी अब्दुल रहीम सादिकपुरी, भाई परमानंद, मौलाना फ़जल-ए-हक खैराबादी, शदलचंद्र
चटर्जी, सोहन सिंह, बबन जोशी, नंद गोपाल, महावीर सिंह आदि को कालापानी का दंश
झेलना पड़ा था. अंग्रेजों की क्रूरता इतनी बढ़ चुकी थी कि अब वह सहनशक्ति के बाहर ही
बात थी.
भगतसिंह के दोस्त महावीर सिंह जेल में भूख
हड़ताल पर बैठ गए. जब अंग्रेजों को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने और जुल्म ढाना शुरु
कर दिया, लेकिन वे उनकी भूख हड़ताल को रोक नहीं आए. अंत में उन्हें दूध में जहर
मिलाकर जबरन पिलाया गया, जिससे उनकी मौत हो गई. उनका दाह-संस्कार न करते हुए क्रूर
अंग्रेजों ने उसके शव को पत्थर में बांधकर समुद्र में फ़ेंक दिया, ताकि किसी को
उसके बारे में कोई खबर न लगे, लेकिन खबर ही कुछ इस प्रकार की थी, जिसके फ़ैलते ही
जेल के सारे कैदी भूख हड़ताल पर चले गए. बाद में महात्मा गांधी जी के हस्तक्षेप के
चलते 1937-38 में कैदियों को वापिस भारत भेज दिया गया.
1932 से
लेकर 1937 के दौरान विशेष रूप से सामूहिक भूख हड़ताल का सहारा
लिया गया. अंतिम भूख हड़ताल जो जुलाई 1937 से शुरु हुई थी, यह
45 दिनों तक जारी रही थी. अंततः सरकार को दंडात्मक उपनिवेश
को बंद करने का फ़ैसला लेना पड़ा और सेलुलर जेल के सभी राजनीतिक कैदियों को जनवरी 1938 तक भारत की मूख्य भूमि पर अपने-अपने राज्यों में वापिस भेज दिया गया.
सन 1941 में सुभाषचंद्र बोस मौलवी
बनकर पेशावर, काबुल होते हुए बर्लिन जा पहुँचे थे. वहाँ वे हिटलर से मिले और अंत
में सिंगापुर आकर क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस की सहायता से भारतीय सिपाहियों को एकजुट करके "आजाद
हिंद फ़ौज" की स्थापना की. जापान सरकार ने नेताजी को पूरा समर्थन दिया. उनकी
सेना में डा.कैप्टन लक्ष्मी सहगल महिला बटालियन की प्रमुख थीं.
29 दिसंबर 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद सरकार द्वारा द्वीपों पर राजनीतिक
नियंत्रण करने का मसौदा तैयार किया. उसे पारित किया और भारतीय राष्ट्रीय सेना का
तिरंगा फ़हराने के लिए पोर्टब्लेयर का दौरा किया. और 30
दिसंबर 1943 को तिरंगा फ़हराकर भारत की आजादी का शंखनाद किया
था.
आज न तो उन कालकोठरियों में कोई कैदी है और न
ही कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है, लेकिन वे सभी कालकोठरियां उन तमाम स्वतंत्रतावीरों
की दास्तान कह सुनाती है, जिसे सुनने और अनुभव करने के लिए उन दिनों को याद करना
होगा. सेलुलर जेल की एक -एक ईंट आज उन तमाम महान देशभक्तों और स्वतंत्रता
सेनानियों के आमानवीय कष्टॊं को और पीड़ाओं को देखने-समझने वाला मूक दर्शक के रुप
में खड़ा है. यहाँ की एक-एक ईंट, बल्कि यहाँ का जर्रा-जर्रा उस दर्दनाक कहानी को
सुना रहा है अपनी मूक वाणी में. उन सभी क्रांतिवीरों को हमारा शत-शत नमन.
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री मान.श्री
नरेन्द्र मोदी जी ने 30 दिसंबर 2018 दिन रविवार को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पहुँचे और उन्होंने तीनों
द्वीपों को नया नाम दिया. अपने कार्यकाल में पहली बार यहाँ
पहुँचे मोदीजी ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के यहाँ तिरंगा फहराने की 75वीं सालगिरह पर रोस आइलैंड का नामकरण उनके नाम पर करने की घोषणा
की-"अब इसे "नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वीप" के नाम से जाना जाता है.
इसके अलावा नील आइलैंड को "शहीद द्वीप" और हेवलॉक आइलैंड को "
स्वराज द्वीप" के नाम से पहचान मिली. ज्ञात हो कि द्वितीय विश्व युद्ध में
अंडमान-निकोबार पर जापानी सेना के कब्जे के बाद 30 दिसंबर,
1943 को यहाँ पहुंचे नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने ही अंडमान-निकोबार का
नाम बदलकर शहीद और स्वराज द्वीप करने की सलाह दी थी.
अपना संबोधन शुरू करने से पहले प्रधानमंत्री
ने उपस्थित जनता से अपने मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाकर नेताजी और आजाद हिंद फौज के
शहीदों को श्रद्धांजलि देने का आग्रह किया. इस पर हजारों मोबाइलों की लाइट से स्टेडियम
तत्काल ही जगमगा गया. इससे पहले प्रधानमंत्री मरीना पार्क पहुंचे और यहाँ 150
फुट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को फहराया. साथ ही नेता जी की प्रतिमा पर
पुष्प चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.
प्रधानमंत्री ने इस विशेष दिन पर नेताजी के
यहां तिरंगा फहराने की स्मृति में स्मारक डाक टिकट और 75 रुपये का सिक्का भी जारी किया. प्रधानमंत्री ने सेल्युलर
जेल का भी दौरान किया और उन शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी,
जिन्हें अंग्रेज शासित भारत से यहाँ राजनीतिक बंदी के तौर पर
"सजा-ए-काला" पानी देकर निवार्सित किया जाता था या फांसी पर लटका दिया जाता
था. वर्ष 1896 में शुरू होकर 1906
में पूरी हुई इस जेल में बहुत सारे नामी स्वतंत्रता सेनानियों को
बंद रखकर यंत्रणाएं दी गई थीं.
प्रधानमंत्री जेल परिसर में उस बैरक में भी
पहुंचे,
जिसमें हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर को रखा गया था. बैरक में पहुँचने पर सावरकर के फोटो के सामने मोदी फर्श पर बैठ गए और कुछ
समय के लिए अपनी आंखें बंद करते हुए हाथ जोड़कर ध्यान जैसी मुद्रा बना ली. बैरक से
निकलकर वह केंद्रीय टॉवर में गए, जहां उन्होंने संगमरमर पर
लिखे गए यहां कैद रहे लोगों के नाम पढ़े. उन्होंने कहा-"
वीर सावरकर, बाबा भान सिंह, इंदुभूषण
राय जैसे शहीदों की बैरक किसी मंदिर से कम नहीं मानी जा सकती. उन्होंने फांसीघर भी
देखा, जहां एकसाथ तीन लोगों को फांसी देने की व्यवस्था थी और
फिर म्यूजियम में जाकर विजिटर- बुक में हस्ताक्षर भी किए.
आज यह कुख्यात सेलुलर जेल निःशब्द खड़ा है.
उसके पास अपनी दांसता सुनाने के लिए बहुत कुछ है. लेकिन मन में इतना दर्द छुपाए
हुए है कि बतलाना भी चाहे, तो बतला नहीं पाएगा. किस-किस का दर्द सुनाएगा वह?,
किस-किस की करूण कहानी सुना पाएगा वह?. विक्षिप्त अवस्था में रहते हुए कुछ भी नहीं
सुना पाने का दर्द मन में समाए हुए उसने मौन रहना ही श्रेयस्कर समझा. केवल बावरी
हवा उन कक्षों के चक्कर लगाकर लौट आती है गुमसुम-गुमसुम- सी...बिना कुछ बोले
चुपचाप लौट जाती है. अगर इसकी बेजान दीवारें कुछ बोलना भी चाहे, तो कुछ नहीं
बोल-बता पाएगी, क्योंकि उनमें मन में ब्रितानिया हुकुमत का खौफ़ भीतर गहराई तक घर
कर गया है. ठीक है. आज उसके भीतर न तो कोई क्रांतिकारी है और न ही कोई राजनीतिक
कैदी. सारे कक्ष सूने पड़े हैं, जो अपना
दर्द बयां करते नजर आते हैं.
किसी तरह साहस बटोरकर हम जा पहुँचे उस
ऐतिहासिक कक्ष में, जिसमें वीर सावरकरजी को कैद करके रखा गया था. सावरलरजी को इसी
कक्ष में दस साल तक कैद करके रखा गया था.
इस कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व दाईं ओर एक
बंद कमरा सा दिखाई देता है. उससे सटा एक दरवाजा भी है जो कि बाहर समुद्र की तरफ़
खुलता है. यह फ़ांसी सेल है, यह दो हिस्सों में बंटा हुआ है. ऊपर के हिस्से में तीन
फ़ंदे है और नीचले हिस्से में साफ़ फ़र्श.ऊपरी हिस्से में फ़ांसी दिए जाने के बाद
फ़ट्टॆ हटते ही शव नीचे चला जाता था. फ़िर वहां से शवों को निकालकार किस्ती के जरिए
समुद्र के बीच में बहा दिया जाता था. फ़ांसी दिए जाने का कारूणिक दृष्य सावरकरजी की
कोठी से साफ़-साफ़ देखा जा सकता है. ब्रितानियां हुकुमत चाहती थी कि सावरकर इसे अपनी
आंखों से देखे और मानसिक रूप से टूटकर अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुक जाए. बावजूद
इसके वे नहीं टूटे और न ही झुके. आज आपका नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों
में लिखा गया है.
उस कक्ष में हमने प्रवेश किया और नम आंखों से
उन्हें अपनी भाव-सुमन अर्पित किए और एक गहरी चुप्पी और उदासी लिए लौट आए.
यहाँ से लौटकर हमने "कोरबाइन्स कोव
बीच" पर आकर वहाँ के नैसर्गिक दृश्यावलियों को जी भर निहारा.
"कोरबाइन्स कोव बीच"-
पोर्टब्लेयर से लगभग छः किमी की दूरी पर यह
बीच सघन नारियल वृक्षों और पाम वृक्षों से घिरा हुआ है, यह बीच सैलानियों के लिए
वाटरस्पोर्ट्स के लिए प्रसिद्ध है. यहाँ होटेल, बार तथा रेस्टारेंट आदि प्रचुर
मात्रा में उपलब्ध है. बीच में प्रवेश करने से पूर्व आपको यहाँ जापानी बंकर भी
देखने को मिलता है. ब्रितानिया सेना की बमबारी से बचने के लिए जापानियों से यहाँ
बंकर बनाया था.
16-09-2022-
सुबह चाय-पानी के पश्चात हमारा अगला पड़ाव
था-रोज आईलैंड और नोर्थ-बे (कोरल आईलैंड) की ओर.
रोस आईलैण्ड (Ross island) (नेताजी सुभाषचंद्र द्वीप)
रोज आइलैंडरोज
द्वीप अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह का एक द्वीप है , जो पोर्टब्लेयर से 2 किमी. दूरी पर अवस्थित है. प्रशासनिक रुप से दक्षिण अण्डमान जिले के
अंतर्गत आता है और यह पोर्टब्लेयर से 40 किमी.पूर्वोत्तर में
स्थित है. इटालियन इंजीनियर जिआर्जिवों रोसा ने सन 1968 को
इस द्वीप को बसाया था. यहाँ पर टिम्बर जैसी लकड़ियाँ प्रचूर मात्रा में पायी जाती
है, यहाँ की हरियाली पर्यटकों का मन मोह लेती हैं. समुद्र का पानी देखने में नीला
दीखता है. बंगाल की इस खाड़ी के जलक्षेत्र में अनंत लैगून, रंग बिरंगी मछलियां अठखेलियां
करती मिलेगीं. यहाँ पर सेलुलर जेल मानव विकास के इतिहास को चित्रित करता संग्रहालय
, समुद्र संग्रहालय. लघु उद्योग संग्रहालय आदि देखने को मिलते हैं. यह नील द्वीप
के रूप में भी जाना जाता है.कभी यह प्रशासनिक मुख्यालय था, लेकिन वर्तमान में यह
निर्जन द्वीप है. इसकी प्राकृतिक सुंदरता मन मोह लेती है. 1941 में आए भूकंप के पश्चात अंग्रेजों ने इस आईलैंड को छोड़ दिया था. घने
जंगलों के बीच से गुजरते हुए आप एक चर्च, एक स्टोर रूम, एक टेनिस कोर्ट, अस्पताल.
कब्रिस्तान, प्रिंटिंग प्रेस सहित सचिवालय भी देख सकते हैं. ये काफ़ी पुराने समय के
हैं और आज खण्डहर के रूप में खड़े हुए हैं.
कोरल आईलैंड पोर्टब्लेयर-( north
bay (coral iland).
इस द्वीप के दो मुख्य आकर्षण है. पहला-समुद्र
के गहरे पानी में खूबसूरत कोरल देखने को मिलते हैं और दूसरा यहाँ का लाईटहाउस
देखने लायक है. नोट-बीस रुपए के नोट के
पृष्ठभाग पर छप इस लाईटहाउस की तस्वीर देखी जा सकती है. घने जंगल के बीच बनी करीब
चार सौ सीढ़ियों से नीचे उतरकर आप इस "लाईटहाउस" तक पहुँच सकते हैं. यहाँ
का नजारा देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो उठता है.
यहाँ से लौटकर हमने होटेल में रात्रि का भोजन
और विश्राम किया.
17-09-2022
सुबह होटेल छोड़ने से पूर्व हमने हल्का जलपान
किया और "हैवलाक द्वीप" ( स्वराज द्वीप) की ओर प्रस्थान किया
स्वराज द्वीप पहुंचने से पहले आपको "मैक
लोजिस्टिक्स (प्रा.लिमि.) की जेट्टी जिसका किराया 1155.00 रुपया प्रति व्यक्ति है ,सवार होकर, गरजते-उफ़नते महासागर का सीना चीरते हुए आगे बढ़ते है.
स्वराज द्वीप (हैवलाक द्वीप) पोर्टब्लेयर से 41
किमी.पूर्वोत्तर में स्थित है.स्वराज द्वीप के कई निवासी बांग्लादेश स्वाधीनता युद्ध के दौरान आए शरनार्थी
और उनके वंशज हैं, जिन्हें भारत सरकार ने यहां बसाया था.
यहां पांच गांव हैं- गोविन्दनगर, विजयनगर, श्यामनगर ,कृष्णनगर और
राधानगर. 55 किमी. की दूरी पर पश्चमी तट
पर बसे राधानगर को एशिया का सर्वोत्तम तट घोषित किया गया है. इस बीच पर आप सफ़ेद रेत, समुद्र का नीला पानी देखने
को मिलेगा. यहां आप लजीज सीफ़ूड का मजा ले सकते
हैं. इसके अलावा यहाँ एलिफ़ैंट बीच, विजय
बीच, नगर बीच और कालापत्थर बीच भी देखने को मिलते है.
सफ़ेद बालू वाला हैवलाक द्वीप (स्वराज द्वीप) आइलैंड मूंगों की चट्टानों और हरे-भरे जंगलों से घिरा हुआ है, जो इसकी सुन्दरता में चार
चांद लगा देता है. यहां आप वाटर-स्पोर्ट्स
का मजा ले सकते है. इसके अलावा आप स्कूबा डाईविंग, स्नोर्केलिंग, ट्रेकिंग, फ़िशिंग
और सी ब्लाक जैसी वाटर एडवेंचर का आनंद ले सकते हैं.
हैवलाक द्वीप की रोमांचक सैर के बाद हमने होटेल
में भोजन और विश्राम करने के बाद एलीफ़ईंटा बीच, राधानगर बीच
की सैर की और रात्रि में यहीं विश्राम किया.
18-09-2022
हमारा अगला पड़ाव था- नील आइलैंड-( शहीद द्वीप)
नील द्वीप अंडमान द्वीपस्मूह के कई खूबसूरत
द्वीपों में से एक है. यह द्वीप पोर्टब्लेयर से लगभग 37 किमी दूर स्थित है. " मैक लोजिस्टिक प्रा.लि. के जहाज पर, जिसका
किराया प्रति व्यक्ति 1155.00 रुपया है, सवार होकर इस
खूबसूरत द्वीप पर उतरे. (भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी ने 30
दिसंबर 2018 को इस द्वीप का नाम बदलकर
"शहीद द्वीप" रखा था.) यहां के तटॊं पर गजब की शांति और दूर-दूर तक फ़ैले
समुद्र में उठती लहरों को उठता देख, आपका आनंद द्विगुणित हो उठता है. अंडमान के
दक्षिण में 37
स्क्वायर किमी. में फ़ैला छोटा लेकिन बहुत ही खूबसूरत द्वीप है यह. कोरल रीफ़ और
बेहतरीन बायोडायवर्सिटी के लिए जाना जाता है.
यहां दिसंबर के अंत और जनवरी महिने के प्रारंभ
में " बाबू सुभाषचन्द्र बोस जी" की पावन स्मृतियों को संजोने के लिए
मेले का आयोजन दिया जाता है. यह मेला बोस जी की जयंती का प्रतीक है.
नील आईलैंड के आसपास लक्ष्मणपुर, भरतपुर, और
सीतापुर बीच भी हैं, जो रामायण के पौराणिक किरदारों से प्रेरित है. बेहतरीन
रिजार्ट्स आप यहाँ देख सकते हैं. अत्यन्त ही खूबसूरत इन द्वीपों का नैसर्गिक आनंद
उठाने के बाद हमने नील द्वीप में रात्रि विश्राम किया.
19-09-2022
सुबह चाय-नाश्ता से निवृत्त होकर हम नील द्वीप
से पी.एम.बी.जेट्टी पर सवार होकर पोर्टब्लेयर आए. पोर्टब्लेयर की होटल में भोजन
आदि से निवृत्त होकर हमने नेवी का म्युजियम "समुद्रीका", मानव विज्ञान
म्युजियम, मछलीपालन म्युजियम देखा. और रात्रि में उसी होटेल में विश्राम किया.
20-09-2022
सुप्त ज्वालामुखी -"बैरन" एवं चुना
पत्थर की गुफ़ाएं.
बिना चाय-पानी के बड़ी सुबह हमने होटेल से
निकलकर जेट्टी पर सवार होकर "बाराटंग" की ओर प्रस्थान किया. इस स्थान पर
"चुना पत्थर की गुफ़ाएं" और "सुप्त ज्वालामुखी- बैरन" को देखा
जा सकता है. चुना पत्थर की गुफ़ाएं देखने के लिए एक नौका पर सवार होकर एक निश्चित
स्थान तक (लगभग दो किमी.) पैदल चलना होता है. और सुप्त ज्वालामुखी देखने के लिए एक
जीप पर सवार होकर कुछ दूर जाने के बाद आपको
एक खास ऊँचाई पर जाकर इस ज्वालामुखी को देखा जा सकता है.
बैरन
ज्वालामुखी-
(यह अंडमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट
ब्लेयर से लगभग 138 किलोमीटर
उत्तर पूर्व में बंगाल की
खाडी में स्थित है).
"बैरन ज्वालामुखी" द्वीप अंडमान द्वीपों में सबसे पूर्वी
द्वीप है. यह भारत ही नहीं अपितु दक्षिण एशिया का एक मात्र
सक्रिय ज्वालामुखी है. ज्वालामुखी
हर किसी पहाड़ से नहीं निकलते हैं; यह ज्यादातर
वहां पाये जाते है जहाँ टेकटोनिक प्लाटों में तनाव हो या फिर पृथ्वी का भीतरी भाग
बहुत गर्म हो. यह द्वीप भारतीय व बर्मी टेकटोनिक प्लाटों के
किनारे एक ज्वालामुखी श्रृंखला के मध्य स्थित है.
तीन किलोमीटर में फैले इस द्वीप का ज्वालामुखी का पहला रिकॉर्ड सन 1787 का है. तब से अब तक यहाँ दस बार ज्वालामुखी फ़ट चुके
है. आज भी यहाँ धुआं निकलता देख जा सकता है. 'बैरन' शब्द का मतलब होता है
- बंजर, जहाँ कोई रहता नहीं हो. यह
द्वीप अपने नाम पर गया है, यहाँ कोई मनुष्य नहीं रहता. कुछ बकरियां, चूहे और पक्षी ही यहाँ दिखाई दे जाते
हैं.
चुना पत्थर की गुफ़ाएं एवं बैरन सुप्त ज्वालामुखी देखने के बाद हम
अपनी होटेल में लौट आए और 21-09-2022 की सुबह हमने अपनी यात्रा समाप्त कर
पोर्टब्लेयर के वीर सावरकर हवाई अड्डॆ के लिए प्रस्थान किया, जहाँ हमारा टाटा
ग्रुप का यान " विस्तारा-UK778 कोलकाता के
सुभाषचंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय के लिए उडान भरने को तैयार खड़ा था. इस यान
ने 11.55 पर उड़ान
भरी और कोलकाता 14.20 बजे पहुँच गया.
चुंकि हमारी ट्रेन कोलकाता के शालीमार स्टेशन से रात्रि के साढ़े आठ
बजे की थी,लेकिन किन्ही अपरिहार्य कारणॊं से सारी ट्रेने रद्द कर दी गईं थीं.. इस
तरह हमें फ़िर से अन्य होटेल की तलाश कर रात्रि विश्राम करना पड़ा. चुंकि सभी ट्रेने
परिचालन के लिए रद्द कर दी गई थीं अतः वे कब शुरु होगी, कब नहीं. कहा नहीं जा सकता
था. अतः हमने कोलकाता से नागपुर के लिए
इन्डिगो की फ़्लाइट 6E 291 बुक
की जो दूसरे दिन रात्रि के 20.55 पर थी. इस तरह हम नागपुर
रात्रि के लगभग 11.30 बजे पहुंचे और वहां से टैक्सी से
रात्रि के दो बजे के लगभग हम अपने घर छिन्दवाड़ा लौट आए.
यात्रा से लौटकर आए हुए करीब दस दिन बीत चुके हैं, लेकिन स्मृतियों
में अंडमान में बिताए रोमांचक क्षणों की यादें बरबस ही पलट-पलट कर याद आती हैं.
याद आता है- गरजता- उफ़नता महासागर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की अविरअल श्रृंखलाएं, कभी
मंद तो कभी तेज गति से प्रवहमान होती समुद्री हवाएं, पाम और सुपाड़ी के मुस्कुराते घने
जंगल, और सेलुलर जेल की भयावह स्मृतियां, उन ज्ञात और अज्ञात क्रांतिकारी वीरों की
स्मृतियां जिन्होंने भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए अपना
सर्वस्व न्योछावर कर दिया. उनकी स्मृतियों को याद करते हुए सिर श्रद्धा से झुक
जाता है और दोनों हाथ आपस में जुड़ जाते हैं. उन तमाम क्रांतिकारी वीरों को हमारा
नमन.बारम्बार नमन जिनके क्रांतिकारी अभियान के चलते आजादी की अलख जगायी गयी थी.
भारत
के स्वतंत्रतावीरों को हमारा नमन.
बारम्बार नमन.
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( अखबार पत्रिका-24-01-2023)
अंडमान-निकोबार के 21 द्वीपों को मिला नाम, शूरवीरों को सम्मान
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प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी ने सोमवार
को विडियो कांफ़्रेंसिग के माध्यम से अंडमान-निकोबार द्वीप-समूह के 21 द्वीपों का नामकरण 21परमवीर चक्र विजेताओं के नाम
करते हुए कहा कि पहले इन द्वीपों पर गुलामी की छाया थी. पराक्रमा दिवस के रूप में
मनाई जा रही नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में नए
नामकरण से नया इतिहास लिखा जा रहा है.
21 परमवीर चक्र पुरस्कार विजेताओं के नाम वाले द्वीपों की सूची:
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• लेफ्टिनेंट कर्नल (तत्कालीन मेजर) धन सिंह थापा के नाम पर धन सिंह द्वीप
•लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर के नाम पर तारापुर द्वीप
• लांस नायक करम सिंह के नाम पर करम सिंह द्वीप
• नायब सूबेदार बाना सिंह के नाम पर बाना द्वीप
• लांस नायक अल्बर्ट एक्का के नाम पर एक्का द्वीप
• सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के नाम पर खेत्रपाल द्वीप
•लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय के नाम पर पांडे द्वीप
• मेजर होशियार सिंह के नाम पर होशियार द्वीप
• मेजर शैतान सिंह के नाम पर शैतान द्वीप
• नायक जदुनाथ सिंह के नाम पर जदुनाथ द्वीप
• सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव के बाद योगेंद्र द्वीप
• कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार (CQMH) अब्दुल
हमीद के नाम पर हामिद द्वीप
• सेकेंड लेफ्टिनेंट रामा राघोबा राणे के नाम पर राणे द्वीप
• मेजर रामास्वामी परमेश्वरन के नाम पर रामास्वामी द्वीप
• कैप्टन विक्रम बत्रा के नाम पर बत्रा द्वीप
• सूबेदार जोगिंदर सिंह के नाम पर जोगिंदर द्वीप
• कैप्टन जीएस सलारिया के नाम पर सलारिया द्वीप
• कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह के नाम पर पीरू द्वीप
• मेजर सोमनाथ शर्मा के नाम पर सोमनाथ द्वीप
• फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों के नाम पर सेखों द्वीप
• सूबेदार मेजर (तत्कालीन रायफल मैन) संजय कुमार के नाम पर संजय द्वीप।
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The 21
Param Vir Chakra awardees, after whom the islands will be named are as follows,
Major Somnath Sharma; Subedar and Hony Captain (then Lance Naik) Karam Singh,
MM; 2nd Lt. Rama Raghoba Rane; Nayak Jadunath Singh; Company Havildar Major
Piru Singh; Capt GS Salaria; Lieutenant Colonel (then Major) Dhan Singh Thapa;
Subedar Joginder Singh; Major Shaitan Singh; CQMH. Abdul Hamid; Lt Col Ardeshir
Burzorji Tarapore; Lance Naik Albert Ekka; Major Hoshiar Singh; 2nd Lt. Arun
Khetrapal; Flying Officer Nirmaljit Singh Sekhon; Major Ramaswamy Parameswaran;
Naib Subedar Bana Singh; Captain Vikram Batra; Lt Manoj Kumar Pandey; Subedar Major
(then RifleMan) Sanjay Kumar; and Subedar Major Retd (Hony Captain) Grenadier
Yogendra Singh Yadav.
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13,
प्रकृति की अनुपम देन--फ़ूलों की
घाटी
फ़ूलों
की घाटी (उत्तराखण्ड)
यॊं
तो रंग-बिरंगे पुष्प सर्वत्र पाए जाते हैं, पर नन्दन वन के प्राकृतिक पुष्पोद्दान
की छटा ही निराली है. इस उद्दान को लेकर महाभारत में एक प्रसंग आता है. एक बार
अर्जुन ने द्रोपदी को कुछ देने की कामना की. कुछ न कुछ लेने के लिए, जब अर्जुन जिद करने लगे, तो द्रोपदी ने कहा-“ यदि
आप कुछ लाकर देने की जिद ही कर रहे हैं तो मुझे नन्दन-वन से पारिजात का पुष्प ला
दें, जो जल में नहीं, पत्थरों में पैदा होते हैं, जिनकी सुगन्ध कस्तुरी-मृग से भी
मादक होती है, जिसका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है.”
अर्जुन चले और नन्दन
वन जा पहुंचे. वहां के रक्षक से उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा, तब कहीं एक फ़ूल दौपदी के
लिए ला सके.
महाभारत
की यह कथा संभवतः कल्पना अधिक, तथ्य कम जान पड़ता हो, किन्तु यह कल्पना नहीं,
आश्चर्यजनक रहस्य है कि ऎसा नन्दन वन आज भी इसी भारतभूमि में वैसे ही विध्यमान है
जैसी महाभारत में कथा आती है. समुद्र सतह से 13,200 फ़ीट
ऊँचा यह हिमालय की गोदी में स्थित आज भी “फ़ूलों की घाटी” के नाम से विश्व विख्यात
है.
प्रतिवर्ष
हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ पहुँचते और जहाँ, वहाँ की मादक छटा को देखकर मुग्ध
होते हैं, वहीं यह आश्चर्य भी है कि 10-15 मील
क्षेत्र में प्राकृतिक तौर पर उगते आ रहे, इन हजारों प्रकार के चित्र-विचित्र
पुष्पों को किसने रौंपा ?. सारे संसार में ऎसा कोई भी स्थान नहीं जहाँ प्राकृतिक
तौर पर इतने अधिक, इतने सुन्दर, इतने वर्णॊं के पुष्प खिलते हों.
विशेषज्ञों
का अनुमान है कि यह फ़ूल प्रकृति की उतनी देन नहीं है जितना इस बात की सम्भावना कि
यह पौधे अतीत काल में सुनियोजित तरीके से विकसित किए गए हों. सम्भव है यह जो
राजोद्दान रहा हो. यह भी सम्भव है कि यहाँ कभी किसी महर्षि का तपोवन रहा हो. जो भी
हो- महाभारत काल के बाद, यह स्थान उन सैंकड़ों रहस्यों की तरह छुपा ही रहा, जिसके
लिए प्रतिवर्ष देश-विदेश के सैकड़ों पर्वतारोही आते और हिमालय के आश्चर्य खोजने का
प्रयत्न करते हैं.
जहाँ
अनेक धार्मिक व्यक्तियों का यह विश्वास है कि हिमालय में राजाओं द्वारा छिपाए हुए
खजाने हैं, यज्ञों के बहुमूल्य पात्र, आभूषण और अस्त्र हैं, वहाँ पर्वतारोहियों का
यह कथन है कि हिमालय की प्रत्येक वनस्पति औषधि है. जहाँ धार्मिक अग्नियाँ स्थापित
हैं, ऎसे-ऎसे गुप्त आश्रम हैं, जहाँ अर्ध-सहत्र आयु के संत-महात्मा समाधिस्थ हैं,
वहाँ पर्वतरोहियों ने हिममानव की कल्पना ही हिमालय में नहीं की, उनके पदचिन्ह भी
देखे हैं. आदि साधना भूमि होने के कारण यह विश्वास है कि हिमालय में
अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृष्य तरंगे, वह ज्ञान अब भी विध्यमान है जिसे प्राप्त
कर. इस भौतिक युग की संपूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धांतों को बालू की
दीवार की तरह बदला जा सकता है. “पुष्प घाटी” ऎसे-ऎसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक
प्रमाण है.
इस
स्थान की खोज सबसे पहले ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के एक कप्तान ने की थी. उसने
यहाँ के सैकड़ों प्रकार के फ़ूलों के बीज एकत्र कर इंग्लैण्ड भेजे. एक पुस्तक भी
लन्दन में प्रकाशित की गई, जिसमें इस
फ़ूलों की घाटी को प्रकृति का अद्भुत चमत्कार कहकर पुकारा गया. तब से अनेक
विदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे. पर इंग्लैण्ड की श्रीमती जान लेग को
दुबारा यह स्थान फ़िर मिल गया. उन्होंने यहाँ से लगभग 500 फ़ूलों के बीज इकठ्ठे कर लन्दन भेजे. अब तो वहाँ पहुंचने के की तमाम
सुविधाएं हो गई हैं इसलिए कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे हिमालय में ऎसा
बहुत कुछ है जहाँ तक हम जा सकते. वहाँ जा सके होते और उसके अनन्त रहस्यों में से कुछ
का भी पता लगा सके होते, तो देखते कि जिन वस्तुओं के लिए हम विदेशों के आश्रित
हैं, दूसरों का मुँह ताकते है, वह और उनसे श्रेष्ठ वस्तुएँ हम अपने ही भीतर से
निकाल सकते हैं.
तीर्थ-यात्रा
और आत्मकल्याण के लिए साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य़ स्थान बचा है.
वहाँ चित्ताकर्षक शांति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है. उसमें जो एक बार इस
पुष्प घाटी को देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं.
पुष्प
घाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना होता है. वहाँ से बद्रीनाथ को जाने वाली
सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट पर उतरना पड़ता है. यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे
घाघरिया तक की सात मील की दूरी को पार करने के लिए पूरा एक दिन लग जाता है.
घाघरिया
से कुल एक घंटे में मुख्य घाटी पहुँच जाते हैं. उसकी दाहिनी ओर “कुबेर भण्डार” पर्वत और आगे “कामेट चोटी” है.
बाईं ओर सप्राष्टांग पर्वतों की चोटियाँ हैं. कामेट झरना सामने ही बहता हुआ मिल
जाता है. म्यूण्डर ग्राम पर पहुँचते ही यह “पुष्प घाटी” मिल जाती है और अनेक
प्रकार के गुलाब, कुमुदिनी, गुलदाऊदी, सिलपाड़ा, जंगली गुलाब, चम्पा, बेला, जुही और
कुछ फ़ूल तो ऎसे हैं जिनके नाम वैदिक साहित्य में हैं पर अब उनकी सही जानकारी करना
कठिन है. अंग्रेजों ने इनके नाम “बड आफ़ पमडाइज, ग्लाडेओली, हिमालयन, आरकिड
हिबिस्टकम आदि रख लिए हैं. कथीड के सफ़ेद व बैंगनी फ़ूलों के गुच्छे बड़े मोहक लगते
हैं. बुरांस फ़ूल तो गुलाब के सौंदर्य को भी मात कर देता है. जब यह बुरांस पूरी तरह
अपनी ऋतु में फ़ूलता है तो यह वन नन्दन वन या स्वर्ग से भी सुहावना प्रतीत होता है.
कितना ही देखो-- न तो आँखें थकती हैं और न ही वहाँ से हटने का ही जी करता है. वर्ष
भर इसी तरह किसी न किसी फ़ूल की शोभा बनी ही रहती है. 3000 से अधिक विभिन्न फ़ूल विभिन्न समय
में फ़ूलते रहते है.
(ब्रह्मकमल)
ब्रह्म
कमल भी यहीं पाया जाता है. कमल जल में ही हो सकता है पर प्रकृति के संसार में क्या
बंधन ?. उसने यहाँ पत्थरों में कमल उगाकर दिखा दिया है कि उसकी सत्ता सर्वशक्तिमान
है. यह कमल श्वेत रंग का होता है, इसकी सुगन्ध ऎसी जादू भरी होती है कि हल्की-सी
महक से ही अनन्त सुख और शांति का आभास होता है. इसलिए इसका नाम ब्रह्म-कमल पड़ा है.
इसे पाकर ही द्रोपदी की इच्छा पूर्ण हुई थी.
फ़ूल
कहीं भी हो, वह तो प्रकृति का उन्मुक्त सौंदर्य है. जो लोग अपने घरों के आस-पास
थोड़े-से भी फ़ूलों के पौधे लगा देते हैं तो वह स्थान इतना अच्छा और आकर्षक लगने
लगता है कि बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, फ़िर एक ऎसे प्रदेश में पहुँचकर जहाँ 10 इंच से लेकर 28 इंच ऊँचाई के पौधे केवल फ़ूलों से ही
आच्छादित हों, उस स्थान के सौंदर्य का वर्णन ही क्या किया जा सकता है. यह स्थान तो
ईश्वर या उस दिव्य आत्मा के समान है, जिसके इस सौंदर्य और आनन्द की अनुभूति तो हो
सकती है, अभिव्यक्ति नहीं.
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14. मंहगा नहीं है सौदा.
(
सात ज्योतिर्लोंगो के दिव्य दर्शन )
( यात्रा 29 जनवरी से 6
फ़रवरी 2016 )
मात्र 7465/- (सात
हजार चार सौ पैसठ रुपये) में सात ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करना मंहगा सौदा नहीं
है. आई.आर.सी.टी.सी. हालिडे टूर पैकेज के अन्तर्गत चलने वाली “भारत दर्शन” स्पेशल
ट्रेन देश के विभिन्न अंचलों से चलाई जा
रही है, में यात्रा करना मंहगा नहीं पड़ता. एक निर्धारित स्टेशन से यह यात्रा शुरु
होकर उसी स्थान पर आकर ठहर जाती है.
इसकी कुछ खासियत
है, जो इसे आरामदायक बनाती है.(1) इस ट्रेन में वही यात्री सफ़र कर सकते हैं,जिन्होंने
अपना रिजर्वेशन बुक करवा लिया है.(2) सामान्य यात्री इसमें सफ़र नहीं कर सकते.(3)
आपकी अपनी सीट निर्धारित कर दी जाती है,जिसमें आप आराम से सो-बैठ सकते हैं (4) दर्शनों के लिए जाते समय आपको अपना सामान उठाकर
कहीं नहीं ले जाना पड़ता (5) सुरक्षा
गार्डों की नियुक्ति की जाती है,जिससे आपका सामान सुरक्षित रहता है.(6) दर्शन के लिए जाते समय आपको अपनी कीमती वस्तुएँ
जैसे सोने-चांदी के जेवरात, मोबाईल सेट आदि अपने पास रखना होता है.(7) सुबह के पांच बजते ही आपको अपनी सीट पर गरमा-गरम
चाय सर्व की जाती है. सामान्यतः इस समय मिलने वाली चाय उन यात्रियों के लिए होती
है, जो सुगर की बिमारी से ग्रसित होते हैं. ठीक पांच-दस मिनट बाद मीठी चाय,
और काफ़ी का आनन्द यात्री ले सकता है.(8) दिन के ग्यारह बजते ही आपको गरम-गरम खाना सर्व किया
जाता है. इसी तरह रात के आठ बजते ही आपको खाना खिला दिया जाता है.(9) प्रत्येक यात्री को एक स्टील के थाली दे दी जाती
है, जिसकी समुचित सफ़ाई यात्री को खुद करनी होती है. खाना परोसने के पहले थाली के
आकार की प्लास्टिक की पन्नी हर यात्री को दी जाती है. यात्री उसे अपनी थाली में
करीने से जमा लेता है. उस पर खाना परोसा जाता है. खाना खाने के बाद पन्नी एक
डस्टबीन में डालना होता है. इस प्रक्रिया से पानी की काफ़ी बचत तो होती ही है, साथ
ही थाली साफ़-सुथरी बनी रहती है...(10) हर कोच में एक बड़ा कन्टेनर रखा होता है,जिसमे कचरा
डालना होता है.(11) अपने निर्धारित स्टेशन के अलावा यह कहीं नहीं रुकती
है. अतः यात्रा में उबाऊपन महसूस नहीं होता.
इस नौ दिवसीय
यात्रा में शामिल होने के लिए हमने काफ़ी समय पूर्व ही अपना रिजर्वेशन करवा लिया
था. छिन्दवाड़ा से रवाना होने वाली ट्रेन “पातालकोट एक्सप्रेस” से हमारा परिवार
इटारसी रेल्वे स्टेशन के लिए रवाना हुआ. दिनांक 29
जनवरी को जबलपुर से चलने वाली यह स्पेशल ट्रेन
तीन बजे के करीब रवाना होकर इटारसी करीब सात बजे शाम को पहुंचती. इसका दूसरा
स्टापेज हबीबगंज( भोपाल) रखा गया था, ताकि शेष यात्री इस पर सवार हो सकें मेरे अपने अनुमान के अनुसार करीब छः सौ यात्री
इस ट्रेन में सफ़र कर रहे होते हैं.
दिनांक 30 जनवरी 2016 को यह ट्रेन उज्जैन में रुकती है. यात्री उज्जैन में
महाकालेश्वर के दर्शन पाकर कृतार्थ हो उठता है. इनके दर्शन के पश्चात स्पेशल बस
ओमकारेश्वर के लिए रवाना होती है, जहाँ यात्री ओमकारेश्वर और ममलेश्वर
ज्योतिर्लिंग के दर्शन करता है. ( 31 जनवरी) यहाँ
से लौटकर ट्रेन का रात का सफ़र शुरु होता है. पूरी रात चलने के पश्चात यह ट्रेन
द्वारिका में आकर ठहर जाती है.( 1 फ़रवरी 2016) द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों के पश्चात
नागेश्वर ज्योतिलिंग के दिव्य दर्शन यात्री करता है. इस यात्रा के पश्चात पूरी रात
यात्रा का क्रम जारी रहता है. (02-02-2016) गुजरात में अवस्थित सोमनाथ ज्योतिलिंग दर्शनों के
बाद यात्री भेट-द्वारिका के लिए स्टीमर पर सवार होकर भगवान श्रीकृष्णजी के दिव्य
दर्शन कर अपने को बड़भागी मानता है. (03-02-2016) को पूरी रात यात्रा करने के पश्चात ट्रेन नासिक जा
पहुँचती है, जहाँ त्र्यम्बेकेश्वर ज्योतिर्लिग के दर्शन होते हैं. सारी रात चलती
हुए ट्रेन (04-02-2016) अब पुणे जा पहुँचती है. यहाँ से यात्री को करीब एक
सौ पचास किलोमीटर दूर स्थित भीमाशंकर ज्योतिलिंग के लिए बस द्वारा यात्रा करनी
होती है. इसके बाद ट्रेन औरंगाबाद के लिए रवाना होती है. पूरी रात यात्रा करने के
बाद यात्री को औरंगाबाद ( 05-02-2016) में अवस्थित घृष्णेश्वर ज्योतिलिंग के दर्शन
प्राप्त होते हैं. यह यात्रा का समापन बिंदु है. इसके बाद आपकी यह स्पेशल ट्रेन
जबलपुर के लिए लौट पड़ती है. भोपाल से यात्रा करने वाले, तथा छिन्दवाड़ा की ओर रवाना
होने वाले यात्रियों को इटारसी उतरना होता है. शेष यात्री जबलपुर के लिए रवाना हो
जाते हैं.
काफ़ी कम खर्च में,
नौ दिनों की यात्रा के दौरान सात ज्योतिर्लिंगों के दिव्य दर्शनों से लौटकर यात्री
अपने आपको धन्य मानता है.
मित्रों,
निश्चित ही इस यात्रा से उन तमाम
यात्रियों को अपूर्व सुख की प्राप्ति हुई होगी, जो पहली बार इस यात्रा पर रवाना
हुए थे.( इनमें से अनेक ऎसे यात्री भी थे जिन्होंने उपरोक्त ज्योतिर्लिंगों में से
किन्ही एक - दो अथवा तीन ज्योतिर्लिंग के दर्शन पूर्व में कर चुके रहे होंगे). यह
यात्रा अत्यधिक रोमांचक इसलिए भी कही जा सकती है कि यात्री, एक साथ, सात-सात
ज्योतिर्लिंग के दर्शन एक निश्चित समय के
अन्तराल में कर रहे थे.
रेल मैनेजमेन्ट ने तो सारी
सुख-सुविधाएँ देने की भरपूर कोशिश की, जिसकी अपेक्षाएँ यात्रियों को रही होंगी.
लेकिन यात्री इस दिशा में प्रशासन को कितना सहयोग दे पाया, इस पर जरुर ध्यान देने
की जरुरत है ?
(१)हम में से कई यात्री ऎसे भी थी जो अपशिष्ट
पदार्थों को खिड़की से बाहर फ़ेंकते नजर आए, जबकि डस्टबीन की व्यवस्था की गई थी.
रोकटोक का उन पर कोई असर पड़ रहा हो, ऎसा भी देखने में नहीं आया.
(२) यात्रा के दौरान दो बार ऎसा भी समय
आया, जब रेल लगातार लम्बी दूरी तय कर रही थी, बेसब्र लोगो ने लेवोट्री में अथवा
दरवाजे के पास खड़े होकर बड़ी बेशर्मी से स्नान किया. कुछ महिलाएं तो चलती ट्रेन में
अपने कपड़े-लत्ती धोकर खिड़कियों में सुखाने के लिए लटकाती नजर आयीं. फ़लस्वरूप पानी
की टंकी खाली हो गई और अनेक यात्रियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा
.(३) कुछ यात्री इस तरह के भी थे, जो
ब्रश करते समय तथा दाढ़ी बनाते समय पानी को अकारण बहाते नजर आए. कुछ यात्री तो ऎसे
भी देखे गए जो पेपर-सोप का इस्तेमाल करने के बाद बची सामग्री को वाश-बेसिन में ही
फ़ेंकते नजर आए.
(४) ज्योतिर्लिंग.के दर्शनों के लिए बस की उत्तम
व्यवस्था मैनेजमेन्ट ने कर रखी थी. बसें रेल्वे स्टेशन के परिसर के बाहर खड़ी मिलती
थी. जो यात्री हृष्ट-पुष्ट है, जवान है, अथवा तन्दुरुस्त है, वह दौड़कर आगे की
सीटॊं पर कब्जा जमा लेता और अन्त तक वहीं जमा रहता था. जो यात्री वृद्ध है, कुछ
घुटनों की दर्द की वजह से जल्दी नहीं चल पाते थे, उन्हें मजबूरी में पीछे की सीटॊं
पर बैठना पड़ता था. जबकि होना तो यह चाहिए था कि वे अपनी ओर से उन असमर्थ लोगों की
मदद करनी चाहिए थी.
(५) महिलाओं और पुरूषॊ के नहाने की अलग-अलग जगहों की व्यवस्था प्रशासन ने बना रखी
थी, जिसका समुचित उपयोग यात्रियों ने नहीं किया. कुछ तो अपने कपड़ॆ धोने में लग गए,
जिससे पानी का अपव्यय हुआ. कई यात्री तो बिना नहाये ही दर्शनों को निकलना पड़ा.
प्रशासन की कुछ बड़ी विफ़लताएँ रही है, जिस पर उसे ध्यान
दिलाए जाने की आवश्यकता है.
(१) खाना उत्तम कोटि का नहीं रहा. मैनेजर से शिकायत करने
के बाद आशिंक सुधार आया. रेल मैनेजमैन्ट को चाहिए कि वह मैनेजर को इस दिशा में
आवश्यक निर्देश दे. हो सके तो रेल्वे के किसी अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए,
कि वह इस पर बराबर नजर बनाए रखे
(२) इतनी लम्बी यात्रा के दौरान किसी कुशल डाक्टर की
व्यवस्था जरुर करनी चाहिए थी, क्योंकि सफ़र में अनेक आयु वर्ग के लोग सफ़र कर रहे
होते हैं.
(३) बसों की व्यवस्था उत्तम कही जा सकती है, लेकिन इसमें
यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि विकलांग-वृद्धों के आगे बैठने की जगह आराम से मिल सके.
इस समस्या को निपटाने के लिए यह किया जा सकता है कि आयु वर्ग के हिसाब से उन्हें
पहले से ही सीट आवंटित करा दी जाए.
(४) हर कोच में मोबाईल चार्ज करने के उपकरण तो लगे हुए
होते हैं, ( दोनो गेट के पास) लेकिन काम नही कर रहे होते हैं. अतः प्रशासन को
चाहिए कि वह प्रत्येक कूपे में इसकी व्यवस्था कर दे, ताकि यात्री को उठकर अन्यत्र
जाने की जरुरत न पड़े और चलती ट्रेन में झकोरा खाकर गिरने से अपने को बचा सके.
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15,
लमही
टू लुम्बिनी ( नेपाल ) व्हाया बनारस.
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लमही का नाम लेते ही कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी की तस्वीर आँखों से
सामने उभरने लगती है. देश का सबसे चर्चित शहर कहलाए जाने वाले बनारस/काशी से महज तीन-साढ़े तीन किमी.दूर स्थित एक छोटा सा गाँव है “लम्ही” जो
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के कारण देश में ही नहीं, अपितु
पूरे विश्व में चर्चा का केन्द्र बना हुआ है. 31 जुलाई 1880
को इसी छोटे से ग्राम में
जन्मे धनपतराय श्रीवास्तव ( मूल नाम ), कभी नवाब राय तो कभी प्रेमचंद जी के नाम से जाने गए. प्रेमचंद जी ने इसी गाँव में
बैठकर नमक का दरोगा, रानी सारन्धा, सौत, आभूषण, प्रायश्चित, मन्दिर-मस्जिद जैसी
अमर कहानियों के अलावा सेवासदन, प्रेमाश्रय, रंगभूमि, निर्मला, गबन,कर्मभूमि,
गोदान जैसे उपन्यासों को लिखकर, लमही को देश के नक्शे पर ला
दिया. आपके उपन्यासों से प्रभावित होकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद
चट्टोपाध्याय जी ने उन्हें कथा-सम्राट कहकर संबोधित किया. आपने कहानियों और
उपन्यासों की एक ऐसी परम्परा का विकास
किया, जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया. साहित्य की
यथार्थवादी-परम्परा की जो नींव आपने डाली, उसका गहराई से प्रभाव आगामी पीढ़ी पर
पड़ा. उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिन्दी के विकास
का अध्ययन अधूरा ही माना जाएगा. एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा
विद्वान संपादक के रूप में कार्य करते हुए आपने तकनीकी असुविधाओं के बावजूद, प्रगतिशील मूल्यों को
आगे बढ़ाने का काम किया.
अनगिनत कथाकारों/साहित्यकारों के प्रेरणा-स्त्रोत
रहे प्रेमचन्द जी के गाँव लमही, जहाँ आपका जन्म हुआ था, के दर्शनों के लिए भला कौन
नहीं जाना चाहेगा? कौन भला उस माटी के रज-कण को अपने माथे पर नहीं लगाना चाहेगा?
चाहते तो सभी हैं,लेकिन अपने नीजि कारणॊं के चलते नहीं जा पाते. मन में एक निराशा
का भाव,/. एक मलाल जरुर छाया/बना रहता होगा, कि उन्हें यहाँ आने का सौभाग्य कब
प्राप्त होगा?. स्वयं एक कथाकार होने के नाते, मेरे मन में भी निराशा का कुहासा-सा
छाया रहता था, कि मैं अब तक वहाँ नहीं जा पाया. शायद इसे समय की बलिहारी कहें, तो
ज्यादा उपयुक्त होगा.
मेरे अपने जीवन में वह सुनहरा दिन भी आया, जब
मैं मुंशी प्रेमचन्द जी के जन्म-स्थान के दर्शन कर पाया. मैं हार्दिक धन्यवाद देना
चाहता हूँ रायपुर (छ.ग.) के मित्र श्री जयप्रकाश मानस जी को, जिनके सौजन्य से मुझे
वहाँ जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ. अंतराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के उन्नयन और
प्रचार-प्रसार और हिन्दी संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए बहुआयामी साहित्यिक
सांस्कृतिक संस्थान “सृजन सम्मान” तथा “साहित्यिक वेव पत्रिका सृजनगाथा डाट काम”
मंच का गठन किया था. अपने भगीरथ प्रयास और पहल के अनुक्रम में इस मंच ने रायपुर,
मारीशस, पटाया, ताशकंद (उज्बेकिस्तान), संयुक्त अरब अमीरात, कंबोडिया-वियतनाम,
श्री लंका तथा चीन में सफ़लतापूर्वक आयोजन किये हैं. तत्पश्चात आपने दसवें
अंतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन, नेपाल में त्रिभुवन विश्वविद्यालय नेपाल,
शिल्पायन नई दिल्ली प्रकाशन, सदभावना दर्पण, छतीसगढ़-मित्र, सृजन-सम्मान, प्रमोद
वर्मा स्मृति संस्थान, लोक सेवक संस्थान, गुरु घासीराम साहित्य एवं संस्कृति
अकादमी के संयुक्त प्रयास से दिनांक 17 मई से
24 मई 2015 को काठमांडु में समायोजित करने की
घोषणा की. बरसों से इस पवित्र माटी के दर्शनों की अभिलाषा मन में बनी हुई थी, सो
मैंने भी इस मंच के माध्यम से वहाँ जाना उचित समझा और अपनी सहमति प्रकट कर दी. इस
साहित्यिक यात्रा को बड़ा ही मन-भावन नाम दिया गया था-“लमही
से लुम्बिनी”. इस यात्रा संस्मरण को
मुझे बहुत पहले ही लिख देना चाहिए था, लेकिन कंप्युटर से सारे फ़ोटॊग्राफ़्स डिलीट
हो गए थे. फ़ोटॊ के अभाव में लिखने का मानस ही नहीं बन पाया. काफ़ी प्रयास के बाद
कुछ फ़ोटोग्राफ़्स उपलब्ध हुए, और मैं इस यात्रा-संस्मरण को लिख पाया.
मंच पर “लमही” पत्रिका के संपादक श्री विजय राय जी. पास ही
में खड़ी हैं आपकी माताजी श्रीमती शकुन्तला देवी, आपको यह जानकर सुखद आनन्द होगा कि
आप प्रेमचंदजी की भतीजी हैं. ( इन दोनों के मध्य मैं भी खड़ा दिखाई दे रहा हूँ
यह वह समय था जब दिल दहला देने वाले भूकंप के
झटके, नेपाल में लगातार आ रहे थे. भुकंप का केन्द्र-बिंदु काठमांडु बना हुआ था.
देश के तमाम अखबार, बर्बाद होते नेपाल के चित्रों को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहे
थे और टी.व्ही चैनल इन हृद्य-विदारक दृष्यों के लाईव दिखला रहे थे.
सिमेन्ट-कांक्रीट से बनी इमारतें ढह गईं थीं और ईंट-मिट्टी-गारे से बने कच्चे मकान
और झुग्गी-झोपडियाँ जमींदोज हो चुके
थे.
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जन-सामान्य तंबुओं के नीचे जीवन बसर करने के
लिए मजबूर हो चुके थे.
आँखों के सामने बदहाल होते नेपाल के दृष्यों
को देखकर, घर के सभी छोटे-बड़े सदस्यों ने मुझे यात्रा रद्द कर देने का सुझाव दिया.
चुंकि कार्यक्रम काफ़ी पहले घोषित किया जा चुका था. वहाँ की अधिकांश होटेलें आरक्षित
की जा चुकी थी. यात्रा को रद्द भी तो नहीं किया जा सकता था, अंत में यह निर्णय
लिया गया कि काठमांडु से करीब तीन सौ किमी. दूर स्थित “पोखरा” जहाँ भुकंप
की विनाशलीला नहीं के बराबर थी, निर्धारित कार्यक्रम आयोजित किए जाएं. दूर-दराज से
आने वाले यात्रियों के लिए बनारस की एक ग्रांण्ड होटेल में ठहरने की व्यवस्था पहले
से ही बनाई जा चुकी थी.
बनारस की एक सुबह.
बनारस /काशी / वाराणसी जैसे नामों से विख्यात
यह शहर, उत्तरप्रदेश में गंगा जी के किनारे स्थित एक प्रमुख धार्मिक केन्द्र है
तथा सप्तपुरियों मे अपना प्रमुख स्थान रखता है. यहीं पर बारह ज्योतिर्लिंगों में
एक जगप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ जी विराजमान हैं. बनारस को लेकर एक मुहावरा
जगप्रसिद्ध है- “चना-चबैना गंग जल, जो पुजबै करतार- काशी कबहुं न छाड़िये, विश्वनाथ
दरबार” अर्थात- भुख मिटाने के लिए चना और प्यास मिटाने के लिए गंगाजी का जल पीकर
करतार (शिव) की आराधना करते रहें क्योंकि काशी जी में स्वयं भगवान भोलेनाथ विराजते
है. अतः इस पावन भूमि को कदापि न छॊडें. जनसामान्य में इस स्थान के प्रति इतना
लगाव और श्रद्धा है कि वह जब-तक बाबा के दर्शनों के लिए दौड़ा चला आता है.,
रात का सफ़र ट्रेन में ही गुजरा. पौ अभी फ़टी भी
नहीं थी कि हम बनारस जा पहुँचे. यहाँ-वहाँ समय न गवांते हुए मैं और मेरे मित्र
श्री नर्मदा प्रसाद कोरी निर्धारित होटेल में जा पहुँचे. जयपुर के प्रख्यात लेखक
श्री प्रबोध गोविलजी से हमारी पहली मुलाकात यहीं पर हुई थी. वे कुछ समय पहले ही इस
होटेल में पहुँचे थे. अभी और भी सदस्यों का आना बाकी था. सो हमने समय न गंवाते
हुए, गंगा स्नान और बाबा विश्वनाथ जी के दर्शनों का मन बनाया. बनारस की तंग गलियों
मे घूमना, यहाँ की धार्मिक फ़िजाओं में घूमने का अपना ही एक अनोखा आनन्द और आकर्षण
है. सूर्योदय से पहले और बीतती रात के धुधंलके में चलते हुए हमने. गंगा स्नान किया
और बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन किए.
लमही की ओर.
बसें लगाई जा चुकी थीं और हम सब उस पवित्र
स्थान जिसका नाम “लमही” है निकल पड़े. यह स्थान साहित्यकारों के लिए किसी
मक्का-मदीना से कम नहीं है. हमारी इस यात्रा में- जयप्रकाश मानस, डा. सुधीर शर्मा,
श्री गिरीश पंकज, डा.अर्चना अरगड़े, डा. लालित्य ललित, प्रेम जनमेजय, डा.बुद्धिनाथ
मिश्र, डा.हरिसुमन विष्ट, प्रबोध गोविल, डा.अनुसूया अग्रवाल, रामकिशोर उपाध्याय और
मेरी मित्र-मण्डली, जिसमें प्रो.राजेश्वर आनदेव,
डा.विजय चौरसिया, विजय आनदेव, अरूण अनिवाल, नर्मदा प्रसाद कोरी सहित अनेक स्वनाम
धन्य साहित्यकार थे.
हम अपनी खुली आँखों से उस स्थान को श्रद्धा और
लगन के साथ निहार रहे थे, जहाँ बैठकर कभी प्रेमचंदजी ने बेजोड़ कहानियाँ और उपन्यास
लिखकर, हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है. आपके हाथ से लिखी गई पांडुलिपियाँ, उन
दिनों में प्रकाशित होने वाली साहित्य पत्रिकाएँ, जिसमें प्रेमचंद जी की कहानियाँ
आदि प्रकाशित हुई थीं. एक बुक-हैंगर पर सजाकर रखी गई हैं. कुछ दुर्लभ छाया-चित्र,
दीवारों पर करीने से लगाए गए है. इन सबको देखकर आभास होता है कि प्रेमचंदजी
यहीं-कहीं हमारे आसपास मौजूद हैं. कमरों से लगा हुआ एक खुला आँगन है, जिसे बहुत
बड़ा तो नहीं कहा जा सकता, आपकी एक प्रतिमा स्थापित है,
हम सभी मित्रों ने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए.
और फ़ोटोग्राफ़्स लिए. बरसों पहले संजोया गया सपना अब जाकर पूरा हो पाया था.
प्रेमचंद जी के आवास के पास एक विशाल
पुस्तकालय भवन बनाने की तैयारी चल रही है. सुना है, इसमें प्रेमचंदजी के साहित्य के अलावा देश-विदेश के
प्रख्यात साहित्यकारों की पुस्तकें भी शामिल की जाएगी.
मन यहाँ से कहीं जाने को नहीं हो रहा है,लेकिन
जाना पड़ रहा है, क्योंकि आप अपने को समय के बंधन में बांधकर जो चले है. आज यहाँ तो
कल वहाँ...यात्रा का मूल मंत्र यही है. भारी मन लिए हम लमही को पीछे छॊड़ते हुए
सारनाथ की ओर चल निकले थे. यह वही स्थान है जहाँ बोधी (बुद्ध) ने प्रथम बार अपने
शिष्यों को उपदेश दिया था.
सारनाथ
.
वाराणसी से 10
किमी.पूर्वोत्तर में स्थित सारनाथ एक प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल है. ज्ञान प्राप्ति
के ठीक पश्चात भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर अपने शिष्यों को पहली बार उपदेश दिए
थे, जिसे “धर्म चक्र प्रवर्तन” का नाम दिया गया, जो बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार का
आरंभ भी माना गया. अब हम नेपाल की ओर बढ़ चले थे.
नेपाल बार्डर.-सोनाली.
सोनाली नेपाल बार्डर पहुँचते ही शाम घिर आयी
थी. चेक-पोस्ट पर यात्रियों की सूची दे दी गई. आवश्यक जाँच पश्चात हमने नेपाल की सीमा
में प्रवेश किया और रात्रि विश्राम किया. सूचनार्थ यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि
नेपाल के लिए पासपोर्ट की जरुरत नहीं पड़ती. केवल वोटर-आई.डी से ही काम चल जाता है.
यहाँ रात्रि विश्राम करने के बाद हम पोखरा की ओर रवाना हुए.
नेपाल बार्डर
श्री सेवाराम अग्रवालजी बार्डर पर
पोखरा.
यदि आप प्राकृतिक सुषमा को जी भर के निहारना
चाहते हैं तो आप एक बार नेपाल जरुर जाएं. करीब 800
किमी.लम्बी हिमालय पर्वत की श्रॄंखला की सुन्दरता यहाँ देखती ही बनती है. काली नदी
से तिस्ता नदी के बीच फ़ैली इस रेंज को “हिमालयान रेंज” कहा जाता है.
नेपाल, तिब्बत तथा सिक्किम में स्थित इस रेंज
के पूर्व में असम-हिमालय तथा पश्चिम में कुमाऊँ-हिमालय स्थित है, नेपाल-हिमालय
चारों विभाजनों में सबसे बड़ा है. माउंट एवरेस्ट, कंचनजंघा, ल्होत्से, मकालू, चीयु,
मनास्लय, धौलगिरि और अन्नपूर्णा इत्यादी नेपाल-हिमालय की प्रमुख चोटियाँ हैं.
मेची, कोशी, बागमती, गंडक तथा कर्णाली नदियों का उद्गम स्थल भी नेपाल-हिमालय में
ही होता है. यहाँ की काठमांडु घाटी जगप्रसिद्ध है.
एक छॊटे से देश नेपाल की प्रमुख आय का स्त्रोत
पर्यटन ही है. भारतीय करेंसी और नेपाली करेंसी लगभग समान मूल्य की है. यहाँ
लेन-देन में भारत के नोट आसानी से स्वीकार किए जाते रहे हैं. वर्तमान में इसमें
कुछ आशिंक परिवर्तन किए गए हैं. इसका उत्तरी हिस्सा हिमालय की चोटियों से घिरा हुआ
है, दुनियां की दस ऊँची चोटियों में से आठ चोटियाँ अकेले नेपाल में है. दुनियां की
सबसे खूबसूरत और ऊँची चोटी एवरेस्ट नेपाल में ही स्थित है, इसे यहाँ
सागरमाथा कहा जाता है. हिन्दू और बौद्ध धर्म की साझा विरासत नेपाल के कण-कण में
समाई हुई है.
लुम्बिनी.
भगवान बुद्ध का जन्म, दक्षिण नेपाल की तराई
वाले मैदान में स्थित लुंबिनी क्षेत्र में 623 ईसा पूर्व
में हुआ था, इस बात का उल्लेख सम्राट अशोक द्वारा स्थापित शिलालेख पर देखने को
मिलता है. मायादेवी का मन्दिर, एक तालाब के पास स्थित है. इसी स्थान पर बुद्ध का
जन्म हुआ था. यहाँ फ़ोटोग्राफ़ी करने की सक्त मनाही है.
(मायादेवी मन्दिर का भीतरी
कक्ष, जहां बुद्ध ने जन्म लिया था.)
मायादेवी मंदिर के भीतर अवशेष, तीसरी शताब्दी
ईसा पूर्व से लेकर, वर्तमान शताब्दी और ब्राह्मी लिपि में पाली शिलालेख के साथ
बलुआ पत्थर पर, अशोक स्तंभ में एक क्रास-दीवार प्रणाली में ईंट संरचनाओं से युक्त
है.
( भगवान बुद्ध के जन्म से जुड़े पुरातात्विक
अवशेषों को यहाँ संरक्षित करके रखा गया है.)
पोखरा –फ़ेवा झील.
फ़ेवा झील हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं में
अवस्थित है. पहाड़ों के मध्य एक कटोरानुमा स्थान में, मीठे पानी की यह झील दूर-दूर
तक फ़ैली हुई है. झील में पर्वत-श्रृंखलाओं की प्रत्तिछाया, झील के ठहरे पानी में
पड़ कर एक मनोहारी दृष्य पैदा करती है. इस मनोहारी दृष्य को देखकर, आँखें पलकें
झपकाना बंद कर देती है और पर्यटक मंत्रमुग्ध होकर उसमें गोते लगाने लगता है.
उमड़ते-घुमड़ते श्याम-श्वेत बादलों के झुंड, जब हवा की पीठ पर सवार होकर, इस झील के
ऊपर से गुजरते हैं, तो दर्शक इस नयनाभिराम दृष्य को देखकर ठगा-सा रह जाता है.
सर्र-सर्र कर सरसराती हवा के झोंके, जब पर्यटकों के बदन को छूते हुए गुजरती हैं,
तब ऐसा महसूस होता है कि वह भी हवा के संग-संग आसमान में उड़ा चला जा रहा है.
पर्यटक यदि बड़ी सुबह इस झील के पास पहुँच जाए तो उसे और भी मनोहारी दृष्य देखने को
मिल सकते हैं, ऊगते हुए सूर्य का प्रतिबिंब, सोने की तरह चमचमाते पर्वत-शिखर,
लहर-लहर लहरों में पड़ती सूर्य किरणें, नीले-हरे-और गुलाबी रंगों के मिश्रिण से एक
ऐसा अद्भुत वितान खड़ा करती है, जिसकी की कभी हमने कभी कल्पना तक नहीं की होगी.
पोखरा की इसी वादियों में आपको पहाड़ों से गिरते, शोर मचाते झरनें देखने को
मिलेंगे. इन तमाम स्वर्गीय सुखों के आनन्द को उठाने के लिए पर्यटक यहाँ बड़ी संख्या
में पहुँचते है. इस झील में आप नौका विहार भी कर सकते हैं. झील में एक टापु भी है
जिस पर देवी जी का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जिस दंपति को संतान सुख प्राप्त
नहीं हुआ है, देवीजी से मनौती मांगने पर उनकी मनौती पूरी होती है. पुत्र/पुत्री के
जन्म के ठीक बाद, पति-पत्नि अपनी संतान के साथ, इस मन्दिर में दर्शनार्थ आते हैं
और कबूतर का जोड़ा देवी जी को चढ़ाते हैं. वे उसकी बलि नहीं देते .पूजा-पाठ करने के
पश्चात उन्हें जिंदा ही छोड़ दिया जाता है.
फ़ेवा झील नेपाल में एक ताजा पानी की झील है,
जिसे पूर्व में पोखरा घाटी में स्थित बदाल ताल भी कहा जाता था. पोखरा में
डेविसफ़ाल, विंध्यवासिनी देवी मन्दिर, फ़ेवा लेक, माऊंटेन म्युजियम, गोरखा
मेमोरियल,,पीस टेम्प्ल, महोद-केव के अलावा व्यु आफ़ अन्नपूर्णा रेंज देखकर, पर्यटक
एक असीम सुख की अनुभूति प्राप्त करता है. दो-चार दिन में इतने मनोहारी स्थानों का
भ्रमण कर पाना संभव नहीं है. पर्यटक कुछ दिन रहकर इन नैसर्गिक दृष्यों को देख सकता
है. चुंकि हमारे पास यहाँ ठहरने को तीन ही दिन थे. पूरे दो दिन भ्रमण में निकल गए
और तीसरे दिन साहित्यिक और सांस्कृति कार्यक्रमों के लिए दिन निर्धारित था. दूसरे
दिन साहित्यक आयोजन होते रहे. सभी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया.
संस्था की ओर से सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया
नेपाल में हमारा यह अन्तिम दिन था. दूसरे दिन
की शाम को हमें भारत लौट जाना था. सभी के मन में एक कसक थी कि पशुपतिनाथजी के
दर्शन किए बगैर ही लौटना पड़ रहा है. प्रायः सभी इस बात को लेकर चिंतित हो रहे थे.
भुकंप का प्रकोप अब भी बना हुआ था. रह-रह कर भुकंप के झटके आ रहे थे. काठमांडू की
ओर बढ़ा जाए या फ़िर कभी देखा जाएगा, के विचार को लेकर, मन पेण्डुलम की तरह दोलायमान
हो रहा था. एक मन कहता कि चलो चला जाए, देखा जाएगा जो भी होगा. लेकिन तत्काल बाद
ही दूसरा मन इस संकल्प पर पानी फ़ेर देता. खैर जैसे-तैसे सुबह का नया सूरझ ऊगा. हम
पाँच मित्रों ने संकल्प लिया कि बिना पशुपतिनाथ जी के दर्शन किए बगैर नहीं
लौटेंगे. हमने टैक्सी बुक की. देखते ही देखते और भी मित्र हमारे साथ हो लिए.
पशुपतिनाथ मन्दिर.
1.
भक्तपुर प्रवेश-द्वार
पशुपतिनाथ मन्दिर
पशुपतिनाथ
जाने से पूर्व भक्तपुर पड़ता है, लेकिन भुकंप के झटकों ने इसे काफ़ी नुकसान पहुँचाया
है. नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब तीन किलो.मीटर उत्तर-पश्चिम में, बागमती
नदी के किनारे देवपाटन गांव में, पशुपतिनाथजी का विशाल मन्दिर अवस्थित है. यह
मन्दिर यूनेस्को द्वारा “विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल” घोषित किया जा चुका है. एक
किंवदंती के अनुसार भगवान शिव, एक हिरण का रूप धारण कर निद्रा में चले गए. शिवजी
को न पाकर देवताओं ने उनकी तलाश की और उन्हें वापिस वाराणसी लाने का प्रयास करने
लगे. हिरण का रूप धारण किए शिवजी ने, नदी के दूसरे किनारे पर छलांग लगा दी. इस
दौरान उनका सिंग चार टुकड़ों में टूट गया.
जिस स्थान पर सिंग टूटे थे, उसी स्थान पर भगवान चतुर्मुख लिंग के रूप में
प्रकट हुए जो पशुपतिनाथ जी के रुप में विख्यात हुए.
दूसरी
किंवदंती के अनुसार- महाभारत की समाप्ति के बाद, पांचों पाण्डवों ने स्वर्गप्रयाण
के लिए हिमालय के क्षेत्र से यात्रा की. जब वे रास्ते से गुजर रहे थे, तभी उन्हें
शिवजी के दर्शन हुए. लेकिन तत्काल ही उन्होंने भैंसे का रूप धारण किया और धरती में
समाने लगे, महाबलि भीम ने उनकी पूँछ पकड़ ली. जिस जगह पूँछ पकड़ी थी, वहाँ वे
शिवलिंग के रुप में प्रकट हुए. यह स्थान केदारनाथ कहलाया. शिवजी का मुख नेपाल के
जिस स्थान पर निकला, उसे “पशुपतिनाथ” शिवलिंग के रूप में पूजा गया. पुराणो में इस
बात का उल्लेख है कि केदारनाथ जी के दर्शनों के उपरान्त यदि पशुपतिनाथ जी के दर्शन
नहीं किए तो यात्रा अधूरी मानी जाती है.
इस
मन्दिर में केवल हिन्दुओं को ही प्रवेश करने की अनुमति है. गैर हिन्दू आगुंतकों को
बागनदी के किनारे से देखने दिया जाता है. नेपाल स्थित “पशुपतिनाथ मन्दिर” सबसे
पवित्र माना जाता है. 15वीं
शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल के जमाने से शुरु की गई प्रथा के अनुसार मन्दिर में
चार पुजारी (भट्ट) रखे गए थे और मुख्य पुजारी दक्षिण भारत से ही होता था. शायद अब
इस प्रथा को बदल दिया गया है.
इसे
ईश्वर का चमत्कार ही कहा जा सकता है कि विनाशकारी भुकंप के झटकों से जहाँ पूरा
नेपाल तबाह हो चुका था, वहीं शिव जी के इस धाम में वह अपनी विनाशलीला नहीं कर
पाया. हाँ, मन्दिर में कहीं-कहीं आंशिक टूट-फ़ूट जरुर हुई है, जिसे न के बराबर कहा
जा सकता है
.
शिवजी
की इस
अद्भुत
लीला को देखकर हम नतमस्तक थे. इसी रास्ते से लौटते हुए हमने पानी की सतह पर तैरते
श्री विष्णु की विशाल प्रतिमा के दर्शन किए.
पानी की सतह पर तैरते शेषसाही भगवान विष्णु.
नेपाल
के काठमांडू से करीब 9
किमी.दूर, शिवपुरी पहाड़ी में “बुद्धानिलखंड” मन्दिर में पानी की सतह पर तैरती एक
विशालकाय विष्णु प्रतिमा देखी जा सकती है. इसे एक बड़ा चमत्कार ही कहा जाए कि यह
मूर्ति सदियों से पानी की सतह पर तैर रही है. इस स्थान को बड़ा ही पवित्र माना जाता
है. बड़ी संख्या में पर्यटक इस स्थान को देखने के लिए खिंचे चले आते हैं.
यहाँ
से लौटते हुए हमने चितवन नेशनल पार्क का भ्रमण किया.
चितवन नेशनल पार्क.
चितवन नेशनल पार्क
यूं तो नेपाल में कई पार्क हैं लेकिन इसमें चितवन
नेशनल पार्क का अपना विशेष स्थान है. यह 952.63
किमी क्षेत्र में फ़ैला हुआ है. इस नेशनल पार्क में एक सिंग का गैण्डा पाया जाता
है. इस पार्क की स्थापना सन 1973 में हुई थी और 1984 में इसे “विश्व धरोहर स्थल” घोषित किया गया. पर्यटक यहाँ आए और इसका
भ्रमण न करे, तो उसका नेपाल आना व्यर्थ ही समझा जाना चाहिए. इस क्षेत्र के दक्षिण
में वाल्मिकी नेशनल पार्क है, जो बाघों के लिए संरक्षित है. यहाँ बड़ी संख्या में
तेंदुए और भालू भी पाए जाते हैं..चितवन के जंगल में घास के मैदानो में कभी 800 गैंडॊं का घर था. 1957 में देश का पहला संरक्षण
कानून गैंडों और उनके आवास की सुरक्षा के लिए अक्षम था. 1959
में एडवर्ड प्रिचर्ड ने इस क्षेत्र का सर्वे किया और राप्ती नदी के उत्तर –दक्षिण
में वन्य जीव अभ्यारण बनाने की सिफ़ारिश की थी, जिसकी अवधि दस साल के लिए निर्धारित
थी. गैंडों के संरक्षण के लिए गार्ड के पदों में वृद्धि की गई. तब जाकर इनके
अवैद्य शिकार पर रोक लगाई जा सकी थी. राइनों के विलुप्त होने से बचने के लिए चितवन
नेशनल पार्क दिसंबर 1970 को राजपत्रित किया गया था.
पार्क का मुख्यालय कसारा में है. यहाँ कछुए के
संरक्षण और प्रजनन केन्द्रों को स्थापित किया गया है. 2008 में गिद्धो ( ओरिएंटल सफ़ेद गिद्ध और पतले गिद्ध ) की प्रजाति को बचाने के
लिए यहाँ गंभीर प्रयास किए गए,जो नेपाल में लुप्तप्राय होने की कगार पर पहुंच चुके
थे.
नेपाल से भारत की ओर.
नेपाल में रहने की हमारी समय सीमा समाप्त हो
चुकी थी और हम अब अपने देश भारत लौट रहे थे.
गोरखपुर
गोरखपुर मठ-
गुरु
गोरखनाथ जी के नाम पर इस शहर का नाम गोरखपुर पड़ा. नाथ परंपरा के गुरु
मत्स्येंद्रनाथ जी की स्मृति में यहाँ एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया गया है,
मन्दिर के विशाल परिसर मे और भी कई मन्दिर है, जो दर्शनीय हैं. गुरु गोरखनाथजी ने
भारत का व्यापक रूप से यात्रा की थी और नाथ संप्रदाय के सिद्धांत का हिस्सा बनने
वाले कई ग्रंथो को लिखा था. यह मन्दिर शुरु से ही विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक
गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ है.
पांच
वर्ष पूर्व की गई इस यात्रा की चमकीली और सुखद स्मृतियाँ मुझे अब भी चमत्कृत करती
हैं, तो वहीं दूसरी ओर तबाह हुए नेपाल के हृदय-विदारक चित्र, दिल और दिमाक को
अशांत कर जाते हैं. भुकंप की विनाशलीला के चलते, कई आमंत्रित नेपाली लेखक जो अपना
कार्य हिन्दी में कर रहे हैं, कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाए. केवल इस बात को लेकर
एक अफ़सोस मन में अब भी बना हुआ है. देखिए, ये इच्छा कब पूरी होती है?
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16. यात्रा बद्रीनाथ
धाम की
उत्तराखण्ड
के गढवाल अंचल में श्री बद्रीनाथ,केदारनाथ,पतित पावनी गंगा, यमुना,अलकनन्दा,भागीरथी,आदि
दर्जनों नदियों का उद्गमस्थल, पंच प्रयाग, पंचबद्री, पंच
केदार,,उत्तरकाशी,गुप्तकाशी आदि अवस्थित हों,ऐसे विलक्षण क्षेत्र उत्तराखंड का
गढवाल मंडल सही अर्थों में यात्रियों का स्वर्ग है.
यहाँ
पहुंचने से पहले यात्री को हरिद्वार जाना होता है.यहीं से बद्रीनाथ जाने के लिए
बसें-टैक्सी आदि मिल जाती है. हरिद्वार से
यमुनोत्री 246कि.मी, गंगोत्री 273I कि.मी, केदारनाथ 248किमी और बद्रीनाथ 326किमी की दूरी पर अवस्थित है.
मां भगवती गंगा यहाँ पर्वतीय क्षेत्र छोडकर बहती
है. नदी के पावन तट पर मां गंगा का मन्दिर स्थापित है,जहाँ उनकी पूजा-अर्चना अनन्य
भाव से की जाती है. मां गंगा की आरती सुबह-शाम को होती है. हजारों की संख्या में
भक्तगण उपस्थित होकर अपने आप को धन्य मानते हैं. इसे हर की पौढी भी कहते है. गंगा
के तट पर अनेक साधु-महात्मा के दर्शन लाभ भी यात्री को होते हैं. यहाँ अनेक
धर्मशालाएं-होटलें हैं, जो सस्ती दर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं.
कुछ
दूरी पर गायत्री संस्थान है,जिसकी आधारशिला आचार्य श्रीराम शर्माजी ने रखी थी. यह
स्थान गायत्री परिवार वालों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है. हजारों की संख्यां
में लोग यहां आते हैं,और दर्शन लाभ कर पुण्य कमाते है. साधक भी यहां बडी संख्यां
में आकर जप-तप करते आपको मिल जाएंगे. यहां निशुल्क रहने तथा उत्तम भोजन की
व्यवस्था गायत्री संस्थान ने कर रखी है. संस्थान का अपना औषधालय हैं,जहां रोगी
अपना इलाज कुशल वैद्दों से करवाकर उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करते हैं. संस्था का
अपना कई एकडॊं में फ़ैला उद्दान है जहाँ दुर्लभ जडी-बूटियों की पैदावार होती है.
आगे की यात्रा के लिए पर्यटक
को ऋषिकेश रात्री विश्राम करना होता है. सुबह गढ्वाल मंडल की बस से बद्रीनाथ के
लिए बसें जाती हैं. यात्रियों को चाहिए कि वे अपनी सीटॆ आरक्षित करवा लें,अन्यथा
आगे की यात्रा में कठिनाइयां आ सकती हैं. मार्ग काफ़ी संकरा और टेढा-मेढा –घुमावदार
है. पहाडॊं की अगम्य उँचाइयों पर जब बस
अपनी गति से चलती है तो उसमें बैठा यात्री भय से कांप उठता है. हजारों फ़ीट पर आपकी
बस होती है और अलकन्दा अपनी तीव्रतम गति से शोर मचाती,पहाडॊं पर से छलांग
लगाती,उछलती,कूदती आगे बढती है. बस चालक की जरा सी भूल से कभी-कभी भयंकर एक्सीडॆंट
भी हो जाते हैं. अतः जितनी सुबह आप अपनी यात्रा जारी कर सकते हैं,कर देना चाहिए.
ऋषिकेश
में गंगा स्नान,किनारे पर बने भव्य मंदिरों में आप भगवान के दर्शन भी कर सकते है.
गंगाजी का पाट यहां देखते ही बनता है.
(शिवजी की विशाल
मूर्ति तप करते हुए) (लक्षमण
झूला.)
अनेक मन्दिरों,आश्रमों
के अलावा लक्षमण झूलाभी है,जो नदी के दो तटॊं को जोडता है. इस पर से नदी पार करने
पर मन में रोमांच तो होता है साथ ही इसकी कारीगरी को देखकर विस्मय भी होता है.
ऋषिकेश से बद्रीनाथ
की यात्रा के दौरान रास्ते में नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग,तथा देवप्रयाग
नामक स्थान भी मिलते हैं. इनका अपना ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है. गंगा अपने
उद्गम के बाद 12 धाराओं में विभक्त होकर आलग-अल्ग दिशाओं
में बहती है. इन स्थानों पर वे या तो बहकर निकलती है या फ़िर यहां दो नद्दियों का
संगम होता है. प्रत्येक स्थान को पास से देखने में समय लगता है, यात्री यहाँ न
रुकते हुए सीधे आगे बढ जाता है,क्योंकि उसमे मन में बदरीनाथजी के दर्शन करने की
उत्कंठा ज्यादा तीव्र होती है
इन सभी स्थानों का
अपना पौराणिक महत्व है. इन्हीं स्थानों पर रामायण ,महाभारत की रचनाएं की गयी थी.
राजा युधिष्ठिर अपने भाईयों व द्रौपदी के साथ इन्हीं स्थानों से होकर गुजरे थे और
हिमालय की अगम्य चोटी पर जाकर अपने प्राणॊं का त्याग किया था
बद्रीनाथ, केदारनाथ,
गंगोत्री, यमुनोत्री के मन्दिर केवल छः माह (मई से अक्टूबर) तक खुले रहते हैं.शेष
छः मास तक भीषण ठंड पडने,के कारण बंद रहते है. अकटूबर माह में बद्रीविशाल की
पूजा-अर्चना करने के उपपरांत घी का विशाल दीप प्रज्जवलित कर बन्द कर दिया जाता है.
छः मास बाद जब मन्दिर के पट खोले जाते हैं तो वहाँ पर ताजे पुष्प और दिव्य दीपक
जलता हुआ मिलता है. ऐसी मान्यता है कि इस अवधि में नारद मुनि जो विष्णु के परम भक्त हैं,यहाँ रहकर
अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा के ताजे पुष्प का मिलना, इस बात का
प्रमाण है कि वहाँ पूजा-अर्चना होती रही है. इससे बडा प्रमाण और क्या चाहिए. पर्यटक,
सुबह जितनी जल्दी ऋषिकेश से रवाना हो जाए,उतना ही फ़ायदा उसे होता है. शाम का कुहरा
गहरा जाने से पूर्व वह बद्रीनाथ जा पहुँचता है. वहां पहुंचकर उसे अपने लिए
धर्मशाला-होटल भी तो लेना होता है. इस बीच ठंड भी बढ चुकी होती है.
बद्रीनाथ धाम.
(बद्रीनाथजी का भव्य मन्दिर)
(मंदिर के प्रांगण मे
लेखक अपनी पत्नि श्रीमती शकुन्तला के साथ)
बद्रीनाथ का मन्दिर
अलकनंदा नदी के उस पार अवस्थित है. पुल पारकर आप मन्दिर में दर्शनों के लिए जा
सकते हैं. नदी से इसी पार पर धर्मशालाएं,होटले आदि उपलब्ध हो जाती हैं. मन्दिर के
पास ही गरम पानी का कुण्ड है,जिसमे यात्री नहा सकता है. इस कुण्ड से जुडी एक कथा
है.जब भगवान बद्रीनाथजी इस स्थान पर अवस्थित हो गए तो भगवती लक्ष्मी ने कहा कि
आपके भक्त गण कितनी कठिन यात्रा कर केवल आपके दर्शनार्थ आते है, और उन्हें स्नान
कर आपकी पूजा-अर्चना करना होता है. लेकिन इस स्थान पर तो बर्फ़ की परत बिछी रहती है
और भीषण ठंड भी पडती है. यदि उनके नहाने के लिए कोई व्यवस्था हो जाती तो कितना
अच्छा रहता. बद्रीनाथजी ने तत्काल मन्दिर के समीप अपनी बांसुरी को जमीन पर छुलाया, एक गर्म पानी का कुण्ड वहाँ बन
गया. सभी यात्री यहाँ बडे अनन्य भाव से नहाकर अपने आपको तरोताजा कर,पूजा अर्चना
करता है. बद्रीनाथजी की मुर्ति शालग्रामशिला की बनी हुई है. यह चतुर्भुजमुर्ति
,ध्यानमुद्रा में है. एक कथा के अनुसार इस मूर्ति को नारदकुंड से निकालकर स्थापित
की गई थी. तब बौद्धमत अपने चरम पर था. इस मुर्ति को भगवान बुद्ध की मुर्ति मानकर
पूजा होती रही,. जब शंकराचार्य इस जगह पर
हिन्दू धर्म के प्रचारार्थ पहुंचे तो तिब्बत की ओर भागते हुए बौद्ध इसे नदी में
फ़ेंक गए. उन्होने इसे वहां से निकालकर पुनः स्थापित किया. तीसरी बार इसे
रामानुजाचार्य ने स्थापित किया .
पौराणिक मान्यता के
अनुसार गंगाजी अपने अवतरण के बाद 12 धाराओं में
विभक्त हो जाती है.. अलकनन्दा के नाम से विख्यात नदी के तट श्रीविष्णु को भा गए और
वे यहां अवस्थित हो गए..
लोक कथा के
अनुसार,नीलकण्ठ पर्वत के समीप श्री विष्णु बालरुप में अवतरित हुए. यह जगह पहले से
ही केदारभूमि के नाम से विख्यात थी. श्री विष्णु,तप करने के लिए कोई उपयुक्त स्थान
की तलाश में थे. अलकनन्दा के समीप की यह भूमि उन्हें अच्छी लगी और वे यहां तप करने
लगे. यह स्थान बद्रीनाथ के नाम से जाना गया.
बद्रीनाथ की कथा के
अनुसार भगवान विष्णु योगमुद्रा मे तपस्या कर रहे थे. तब इतना हिमपात हुआ कि सब तरफ़
बर्फ़ जमने लगी. बर्फ़ तपस्यारत विष्णु को भी अपने आगोश में लेने लगी तब माता
लक्ष्मी ने बद्री- वृक्ष बनकर भगवानजी के ऊपर छाया करने लगी और उन्हें बर्फ़ से
बचाती हुई स्वयं बर्फ़ में ढंक गयीं. भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उन्हें वर दिया
कि वे भी उन्हीं के साथ रहेगी. यह वही स्थान है जहां स्वयं लक्ष्मी बदरी( बेर) का
वृक्ष बन कर अवतरित हुईं, बद्रीनाथ के नाम से जगविख्यात हुआ.
मुर्ति के दाहिनि ओर
कुबेर, उनके साथ में उद्द्वजी तथा उत्सवमुर्ति है. उत्सवमुर्ति शीतकाल में बर्फ़
जमने पर जोशीमठ ले जायी जातीहै. उद्दवजी के पास ही भगवान की चरणपादुका है. बायीं
ओर नर-नारायण की मुर्ति है और इसी के समीप श्रीदेवी और भूदेवी विराजमान है.
चरणपादुका को लेकर एक
पौराणिक कथा है कि द्वापर में जब भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीलाओं को समेट रहे थे, तब
उनके अनन्य भक्त नारदमुनि ने बडे ही अनन्यभाव से प्रार्थणा करते हुए पूछा था कि
भगवन ,अब आपसे अगली भॆंट कब, कहां और किस रुप में होगी?. तो भक्तवत्सल प्रभु ने
मुस्कुराते हुए अपनी चरण पादुका उतारकर नारदजी को देते हुए बतलाया कि अमुक स्थान
पर मेरी चरणपादुका को स्थापित करते हुए पूजा-अर्चना करते रहें, वे समय आने पर
बद्रीनाथ के नाम से धरती पर अवतरित होंगे. श्रीविग्रह के पास रखी चरणपादुका का
मिलना और जब मन्दिर के कपाट खोले जाते हैं,तब ताजे खिले हुए सुगंधित पुष्पों का
मिलना ,इस बात की पुष्टि करते हैं कि नारद अपने ईष्ट की पूजा-अर्चना आज भी करते
हैं. वे किस रुप में वहां आते हैं,यह आज तक कोई नही जान पाया है,लेकिन वे आते जरुर
हैं.
बद्रीनाथजी के मन्दिर
के पृष्टभुमि पर आपको आकाश से बात करता जो पर्वत शिखर दिखालायी देता है,उसकी ऊँचाई
7.138 मीटर है,जिस पर हमेशा बर्फ़ जमी रहती है. बर्फ़ से चमचमाते पर्वत शिखर को
देखकर यात्री रोमांचित हो उठता है. वैसे तो यहां धुंध सी छायी रहती है. यदि आसमान
साफ़ रहा तो सूर्य की किरणें परावर्तित होकररंगबिरंगी छटा बिखेरती है.
अन्य स्थानॊं की
अपेक्षा यहां चढौतरी को लेकर किसी किस्म की परेशानी नहीं होती और भगवान के दर्शन
लाभ भी बडी आसानी से हो जाते हैं. कुछ पर्यटक पण्डॊं के चक्कर में न पडते हुए
पूजा_पाठ करते पाए जाते हैं.जबकि यहां के पण्डॆ, आपसे न तो जिद करते हैं और न ही
कोई मोल भाव. आप अपनी श्रद्धा से जो भी दे दें, स्वीकार कर लेते हैं. अपने जजमान
के खाने-पीने-पूजा-पाठ के लिए वे विशेष ध्यान भी देते है,साथ ही गाईड की भी भुमिका
निभाते है. वे आपका नाम-पता आदि अपनी बही मे दर्ज कर लेते हैं और जब मन्दिर के
कपाट बंद हो जाते हैं,उस अवधि में वे अपने जजमान के यहाँ बद्रीनाथ का
प्रसाद-गंगाजल आदि लेकर पहुँचते हैं और प्राप्त धन से अपना जीवनोपार्जन करते हैं.
हजारों फ़ीट की ऊँचाई पर खडा व्यक्ति ,जब मन्दिर
के प्रांगन से, चारों ओर अपनी नजरें घुमाता है, तो प्रकृति का अद्भुत नजारा, उसे अपने सम्मोहन में
बांध लेता है. कल्पनातीत दृष्य देखकर वह रोमांचित हो उठता है.
नर-नारायण के विग्रह-
बद्रीनाथजी की पूजा में मुख्यरुप से वनतुलसी की माला, चने की दाल, नारीयल का गोला
तथा मिश्री चढाई जाती है,जो उन्हें अत्यन्त ही प्रिय है.
बद्रीविशाल के मन्दिर
से कुछ दूरी पर एक और ऊँचा शिखर दिखलायी देता है,जिसे नीलकंठ के नाम से जाना जाता
है. इसकी भव्यता और सुन्दरता को देखते हुए इसे “क्विन आफ़ गढवाल” भी कहा जाता है.
माणागांव भारत का अन्तिम गाँव है, कुछ पर्यटक इस गांव तक भी जाते हैं. करीब 8किमी दूर एक पुल है जिसे भीमपुल भी कहते है ,इस स्थान पर अष्ट वसुओं ने
तपस्या की थी. लक्ष्मीवन भी पास ही है. यहीं से एक रास्ता जिसे “सतोपंथ” के नाम से
जाना जाता है. इसी मार्ग से आगे बढते हुए राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और भार्या
साहित अपनी इहलीला समाप्त की थी. सरस्वती नदी को माणागांव में देखा जा सकता है.
भगवान विष्णु की जंघा से उत्पन्न अप्सरा उर्वशी का मन्दिर “बामनी” गांव में मौजूद
है.
आप किसी
लोककथा-पौराणिक कथा और स्थानीयता के आधार पर बनी दंतकथाओं पर विश्वास करें या न
करें,लेकिन जीवन में एक बार इन पवित्र और दिव्य स्थानों के दर्शनार्थ समय निकाल कर
अवश्य जाएं. प्रकृति की बेमिसाल सुन्दरता, ऊँची-ऊँची पर्वत मालाएँ, सघन वन,और
चारों ओर छाई हरियाली आपकॊ अपने सम्मोहन में बांध लेगी. प्रकृति का यह सम्मोहित स्वरुप आपमें एक नया जोश, एक नया उत्साह
भर देगी. इसी बहाने आप अपने देश, भारत की अन्तिम सीमाऒं पर पहुँच कर आत्मगौरव से
भर उठेंगे. शायद इन्हीं विचारों से ओतप्रोत होकर आदिशंकराचार्य ने भारत की चारों
दिशाऒं में पीठॊं की स्थापना की थी. ऐसा उल्लेख हमें अपने पौराणिक ग्रंथॊं मे पढने
को मिल जाता है कि भगवान जब भी मनुष्य रुप में इस धरती पर अवतरित होना चाहते हैं
तो वे भारतभूमि में ही अवतार लेना पसंद करते है.
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17
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा आयोजित”
अमृत महोत्सव
किसी
भी तीर्थस्थल अथवा भारत के किसी भूभाग की यात्रा पर जाने का जब तक संयोग नहीं
बनता, लाख चाहने के बावजूद भी आदमी वहाँ नहीं जा पाता. ऎसा मेरा अपना मानना है.
इसे संयोग ही कहें कि “राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,वर्धा का “अमृत महोत्सव”राजघाट के
निकट “सत्याग्रह मंडप,गांधी दर्शन के विशाल सभा मंडप में 16--17 मार्च 2013 को भव्य आयोजन के साथ संपन्न हुआ. महात्मा
गांधी द्वारा स्थापित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने हिन्दी सेवा के गौरवशाली
75 वर्ष पूर्ण कर लिए थे. इस उपलक्ष में संस्था द्वारा दो
दिवसीय विमर्श को “भारतीय भाषाओं के बीच संवाद” और हिन्दी के समक्ष उपस्थित
चुनौतियो” पर केन्द्रीत किया गया था. इन दो दिवसीय सत्र का उद्घाटन भारत के
तत्कालीन गृहमंत्री माननीय श्री सुशीलकुमार शिंदे ने दिन शनिवार दिनांक 16 मार्च को प्रातः 11 बजे किया.तथा 17 मार्च को अपरान्ह 3 बजे समापन-सत्र को तत्कालीन
लोकसभा में विपक्ष की नेता माननीया श्रीमती सुषमा स्वराज ने संबोधित किया.
इस
भव्य कार्यक्रम की परिकल्पना म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल के
मंत्री-संचालक मान.श्री कैलाशचन्द्र पंतजी ने की थी. अपनी अस्वस्था के बावजूद वे
इस कार्यक्रम की सफ़लता के लिए प्राणपन से समर्पित रहते हुए अथक परिश्रम करते रहे
.श्री अनन्तराम त्रिपाठी (प्रधानमंत्री), सुश्री मणिमाला (निदेशक, गांधी स्मृति दर्शन समिति), श्री नारायण कुमार (संयोजक दिल्ली राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,एवं समिति
के राष्ट्रीय अध्यक्ष मान.न्यायमूर्ति श्री चन्द्रशेखर धर्माधिकारीजी ने अपनी
गरीमामय उपस्थिति से इस कार्यक्रम को भव्यता प्रदान की.
उद्घाटन सत्र= 16 मार्च,2013 : समय 10.00बजे
मान.न्यायमूर्ति
चन्द्रशेखर धर्माधिकारीजी की अध्यक्षता में, मुख्य अतिथि मान.श्री सुशील कुमार शिंदे(तत्कालीन गृह
मंत्री) की गरिमामय उपस्थिति में श्री अंनतराम त्रिपाठीजी ने स्वागत भाषण
दिया. श्री कैलाशचन्द्र पंतजी ने
कार्यक्रम की प्रस्तावना. एवं श्री नारायणकुमार ने इस सत्र का संचालन किया.
प्रथम
विमर्श सत्र- भारतीय भाषाओं का अन्तरसंवाद समय: 12:00
से 2:00 बजे अध्यक्ष:
श्री विश्वनाथ त्रिपाठी बीज
वक्तव्य: डा..विमलेश कान्ति वर्मा वक्ता: श्री जाबिर हुसैन,
डा.शेषारत्नम, सुश्री मणिमाला संचालन:-
श्रीमती अलका सिन्हा.
( भोजन 2.00 बजे से 3.00 दोपहर)
द्वितीय
विमर्श:-भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का हस्तक्षेप समय:
शाम 3.: से 5 बजे अध्यक्ष:-श्री
टी.एन.चतुर्वेदी (पूर्व राज्यपाल) बीज
वक्तव्य:-श्री राहुल देव वक्ता:-डा. ललिताम्बा,प्रो.हरीश
त्रिवेदी, श्री शशि शेखर, भारतीय
भाषाओं के लेखाकों के बीच सारस्वत संवाद ब्रजेन्द्र त्रिपाठी,,सुनिता
शर्मा,डा.सुरेश,सुश्री ऊषाराजे सक्सेना, विनोद लव्केश,हरजेन्द्र
चौधरी,डा.पन्नालाल पांचाल,डा.बल्देव वंशी,प्रेमलाल शर्मा,(सचिव रेल्वे)श्री
पांचाल((UPSC)
संचालन;-डा. जवाहर कर्नावट
तृतीय
सत्र:-भारतीय भाषाएं और भूमण्डलीकरण दिनांक;-17 मार्च 2013 समय; 10.30 बजे से
12.00 बजे तक
अध्यक्ष:-
श्री मदनलाल मधु बीज
वक्तव्य:- ड. चित्रा मुदगल वक्ता:-डा.
कमलकुमार, डा.कुमुद शर्मा, डा राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा संचालन:-डा.मीनाक्षी जोशी
चतुर्थ
विमर्श:-हिन्दी संस्थाएं और भावी दिशाएं दिनांक:-17 मार्च 2013,
समय 12:15 से 2.00 बजे तक अध्यक्ष:-डा. रत्नाकर पांडॆ, पूर्व
सांसद बीज
वक्तव्य:- डा. अमरनाथ, ड. वेदप्रताप वैदिक,डा.केशरीलाल वर्मा संचालन:- प्रसून लतांत
(भोजन 2.00 - 3.00 तक)
समापन
सत्र.—समय 300 से 5 बजे शाम मुख्य
अतिथि:- श्रीमती सुषमा स्वराज, नेता प्रतिपक्ष,लोकसभा अध्यक्ष:- न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर
धर्माधिकारी स्वागत भाषण:- श्री कैलाशचन्द्र
पंत वक्तव्य:- डा.प्रभाकर श्रोत्रीय
आभार:- श्री नारायण कुमार. संचालन:- श्री अनिल जोशी
अमृत
महोत्सव में निम्नलिखित भारतीय भाषाओं के विद्वानों को सम्मानीत किया गया
डा.
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (हिन्दी.) श्री
रघुवीर चौधरी (गुजराती) डा. राधा वल्लभ त्रिपाठी (संस्कृत) श्री अख्तरुल वासे
(उर्दू) डा.एच.बालसुब्रमण्यम(तमिल) श्री ब्रजनाथ बेताब(कश्मीरी)
डा.
एस.शेषारत्नम (तेलुगू) श्री
मोहनसिंह (डोगरी) श्री
एषुमट्टटोर राजराज वर्मा (मलयालम) डा.श्री
विनोद असुदानी( स्सिन्धी)
सुश्री
प्रतिभानंद कुमार( कन्नड) श्री
रमेश वेलुस्कर (कोंकणी) श्री रा.ग. जाधव(मराठी) श्री
सतीशकुमार वर्मा (पंजाबी) सुश्री नवनीता राय
(उडिया) श्री रजेन्द्र
मिश्र (उडिया-हिन्दी) सुश्री अरूप
बरूआ(असमी) श्री रामशंकर
द्विवेदी (बंगला-हिन्दी)
दिल्ली
में रहते हुए हमें शाम का वक्त मिलता. इस समय का हम भरपूर उपयोग करते. पास ही
स्थित गांधी-समाधी जाते और पुज्य बापू के चरणॊं में अपना शीश झुका कर अपना
अहोभाग्य समझते. गांधीजी को हम देख तो नहीं आए थे,क्योंकि उस समय मेरी उम्र छः साल
की थी,लेकिन बाद में उनके साहित्य को पढकर गांधीजी को थोडा बहुत समझ पाए. एक ऎसे
संत की समाधी के पास कुछ समय तक बैठकर उनकी स्मृतियों में तल्लीन हो जाते. ऎसा
करते हुए महान वैज्ञानिक आईंस्टीन ने कभी बापू के बारे में कहा था कि लोग विश्वास
नहीं करेंगे कि एक हाड-मांस के व्यक्ति ने बिना रक्त बहाए देश को आजादी दिला
दी.[ कृपया संशोधित करें.) महात्मा गांधी के बारे में उन्होंने यह भी कहा था:-
I believe that Gandhi’s views were the
most enlightened of all the political men of our time. We should strive to do
things in his spirit: not to use violence in fighting for our cause, but by
non-participation in anything you believ
e is evil.
.
गांधी-समाधी (बाएं
से दांए=गोवर्धन यादव,डी.पी.चौरसिया,नर्मदाप्रसाद
कोरॊ एवं मंगरुलकरजी
चित्र-1 बाएं से दाएं=श्री श्रोत्रीयजी, धर्माधिकारीजी
एवं कैलाशचन्द्र पंतजी
न्यायमूर्ति दादा धर्माधिकारी जी से भेंट करते
हुए यादव. (दादा का मुलताई से गहरा संबंध रहा है.)
दिल्ली के साहित्यकार मित्र
श्री विनोद बब्बर जी से मिलते हुए
( मान.न्यायमूर्ति धर्माधिकारीजी,
डा.श्री.विश्वनाथ त्रिपाठीजी के साथ फ़ोटॊग्रुप.)
राष्ट्रभाषा प्रचार
समिति,वर्धा के युवा कर्मठ साथी श्री नरेन्द्रकुमार दण्ढारेजी ने इस कार्यक्रम को
सफ़ल बनाने के लिए अथक परिश्रम किया.निश्चित रुप से वे धन्यवाद के पात्र हैं.
गांधीजी
की तस्वीर के समीप काली जैकेट में खडॆ श्री दण्ढारेजी
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18
भारतीय कला, प्रज्ञा और चिंतन का बेजोड संगम अक्षरधाम- स्वामीनारायण
मंदिर.
स्वामीनारायण
अक्षरधाम
स्वामीनारायण अक्षरधाम एक नूतन-अद्वितीय संस्कृति-तीर्थ है. भारतीय कला, प्रज्ञा और चिंतन का बेजोड संगम यहाँ देखा जा सकता है.
भारतीय संस्कृति के पुरोधा, स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक श्री घनश्याम
पाण्डॆ या सहजानन्दजी ( 1781-1830) की पुण्य स्मृतियों को
समर्पित स्वामीनारायण अक्षरधाम के आकर्षण से प्रभावित होकर जन-सैलाब खिंचा चला आता
है..और स्वामी के दर्शन कर अपने को अहोभागी मानता है. धर्म और संस्कृति को समर्पित
इस महामानव ने अपने आपको तप की भट्टी में तपाया, ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित किया,
और संचित पुण्यों को जनसाधारण के बीच समर्पित कर दिया.
एक दिव्य महापुरुष योगीजी महाराज ने आशीर्वाद दिया था कि यमुना के पावन तट
पर एक भव्य आध्यात्मिक महालय की स्थापना होगी, जिसकी ख्याति दिग-दिगन्त में होगी.
गुणातीत गुरुपरंपरा के पांचवे गुरु/ संतशिरोमणी/ दिव्य व्यक्तित्व के धनी
विश्ववंदनीय प्रमुखस्वामी महाराजजी ने अपने गुरु के
.
उस परिकल्पना को पृथ्वी- तल पर साकार कर
दिखाया.
स्वामिनारायण अक्षरधाम के निर्माण और संवहन का उत्तरदायित्व
बी.ए.पी.एस.स्वामिनारायण संस्था ने पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन किया. संयुक्त
राष्ट्र संघ द्वारा मान्यता प्राप्त यह संस्था एक अंतराष्ट्रीय सामाजिक-आध्यात्मिक
संस्था है, जो विगत एक शताब्दी से मानव-सेवा मे रत है. 3700 सत्संग केन्द्रों, 15,700 सत्संग सभाओं, 850 नवयुवा सुशिक्षित संतो,,
55,000 स्वयंसेवकों द्वारा सेवित और लाखों अनुयायियों के द्वारा यह
संस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों
में अपनी प्रमुख भूमिका निर्वहन बडी लगन-श्रद्धा और समर्पण के साथ कर रही है.
यमुना
के किनारे लगभग एक सौ एकड जमीन पर उस परिकल्पना को साकारित किया गया है. इस भव्य
स्मारक की डिजाइन श्री महेशभाई देसाई तथा श्री बी.पी.चौधरी ने उकेरी तथा सिकन्दरा
(राज) के चालीस गाँवों के लगभग सात हजार कारीगरों ने इसे तराशा-संवारा, उन्हें
क्रमसंख्या दी और फ़िर ट्रकों के माध्यम से निर्माण-स्थली
पर भिजवाया. अंकोरवाट, अजन्ता, सोमनाथ, कोणार्क के सूर्य मन्दिर सहित देश-विदेश के
कई मन्दिरों के स्थापत्य के गहन अध्ययन-मनन और वेद, उपनिषद तथा भारतीय शिल्प की कई
पुस्तकों के गहन अध्ययन से प्राप्त जानकारियों के आधार पर इसका निर्माण किया गया.
विशाल भव्यता लिए इस इमारत को बनने में जहाँ चालीस साल लग सकते थे, उसे महज पांच
वर्षों में पूरा कर दिखाया. यह किसी आश्चर्य से कम प्रतीत नहीं होता. छः नवम्बर दो
हजार पांच में इसकी विधिवत इसकी नींव रखी
गई थी जो दो हजार दस में बनकर पूरी हुई.
घनश्याम
पाण्डॆ उर्फ़ स्वामीनारायण उर्फ़ सहजानन्द स्वामीजी हिन्दू धर्म के स्वामीनारायण
संप्रदाय के संस्थापक पुरुष थे. आपका जन्म 03-04-1781 अर्थात
चैत्र शुक्ल 9 वि.संवत 1837 में भगवान
श्रीराम की जन्मस्थलि “अयोध्या” के पास स्थित ग्राम छपिया में हुआ था. आपके
पिताश्री का नाम श्री हरिप्रसाद तथा माताश्री का नाम भक्तिदेवी था. सद्ध प्रसूत
बालक घनश्याम के हाथ में पद्म, पैर में बज्र, तथा कमल-चिन्ह देखे गए. इन दैवीय
अलंकरों से युक्त इस बालक ने महज पांच वर्ष की आयु में अक्षर ज्ञान प्राप्त किया
था. आठ वर्ष की उम्र में आपका जनेऊ संस्कार किया गया. आपने कई शात्रों का गहनता से
अध्ययन किया. ग्यारह वर्ष की आयु आते ही आपके माता-पिता का देहावसान हो गया. किसी
कारण से आपका अपने बडॆ भाई के साथ विवाद हो गया. उसी समय आपने अपना घरबार छॊड
दिया. अगले सात साल तक आप भारत में भ्रमण करते रहे. लोग उन्हें नीलकण्ठवर्णी कहने
लगे. उन्होंने अष्टांगयोग श्री गोपाल योगीजी से सीखा. उत्तर में उत्तुंग हिमालय,
दक्षिण में कांचीपुरम, श्रीरंगपुर, रामेश्वर होते हुए पंढरपुर और नासिक होते हुए
आप गुजरात आ गए. मांगरूल के समीप “लोज” गाँव में निवास कर रहे स्वामी मुक्तानन्दजी
से परिचय हुआ, जो स्वामी रामानदजी के शिष्य थे. वे उन्हीं के साथ रहने लगे.
स्वामी
रामानन्दजी ने संप्रदाय की परम्परा के अनुसार नीलकण्ठवर्णी को “पीपलाणा” गाँव में
दीक्षा दी और नया नाम दिया सहजानन्द. एक साल बाद स्वामीजी ने “जेतपुर” में
सहजानन्दजी को अपने संप्रदाय का “आचार्य” पद दे दिया. कुछ समय बाद रामानंदजी का
देहावसान हो गया. उसके बाद वे देश भर में घूम-घूमकर ईश्वर के गुणानुवाद करते और
धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए लोगों को स्वामीनारायण मंत्र का जाप करने की सीख
देते रहे. तन-मन से ईश्वर को समर्पित सहजानन्दजी ने 1830 ई. में अपनी देह छोड दी.
स्वामीनारायन के नाम से विख्यात हुए इस महान
संत का स्मारक गांधीनगर (गुजरात) मे’अक्षरधाम” स्थापत्यकला का उत्कृष्टतम नमूना
है. इसी तर्ज पर दिल्ली में यमुना के पावन तट पर भव्य स्मारक बनाया गया है,जिसकी
विशालता, भव्यता देखते ही दर्शानार्थी को किसी दिव्य लोक में ले जाती है. .
दिव्य द्वार- दसों दिशाओं के प्रतीक हैं, जो
वैदिक शुभकामनाओं को प्रतिबिंबित करते हैं
भक्ति
द्वार- परंपरागत भारतीय शैली का
अनोखा प्रवेश द्वार मयूर द्वार=स्वागत द्वार में परस्पर गूंथे हुए
मयूरतोरण
अक्षरधाम मन्दिर=गुलाबी पत्थरों और श्वेत संगमरमर के संयोजन से 234 कलामंडित स्तम्भ,, 9 कलायुक्त घुमट-मण्डपम, 20 चतुष्कोणी शिखर और 20,000 से भी अधिक कलात्मक
शिल्प, इसकी ऊँचाई 141फ़ीट,चौडाई 316 फ़ीट और लंबाई 356 फ़ीट
है
श्रीहरि चरणारविंद=सोलह मांगलिक चिन्हों से
अंकित श्री हरिचरणारविंद
मूर्ति= पंचधातु से निर्मित स्वर्णमंडित 11 फ़ीट ऊँची नयनाभिराम मूर्ति. कलामंडल. सिंहासनों पर विराजमान क्रमशः भगवान
लक्ष्मीनारायण, श्रीरामजी-सीताजी, श्रीकृष्ण-राधाजी, और श्री महादेव-पार्वती जी की
संगमरमर की दर्शनीय मूर्तियां
कलात्मक छत
मंडोवर= अर्थात बाह्य दीवार. कुल लंबाई 611 फ़ीट, ऊँचाई 25 फ़ीट. 4287
पत्थरों से निर्मित यह मंडोवर भारतीय नागरिक शैली के स्थापत्यों में सबसे बडा है.
गजेन्द्र पीठ= अक्षरधाम का यह भव्य महालय 1070 फ़ीट लम्बी गजेन्द्रपीठ पर स्थित है, 3000 टन
पत्थरों से निर्मित है.,जो विश्व का एक मौलिक एवं अद्वितीय शैल्पमाल है. 148 हाथियों की यह कलात्मक गाथा, प्राणीसृष्टि के प्रति विनम्र भावांजलि है. भारतीय बोधकथाओं, लोककथाओं,
पौराणिक आख्यानों इत्यादि से 80 दृष्य़ तराशे गए हैं.
देखना
न भूलें---विशेष= बाहरी दीवारों पर चारों ओर स्थापित भारतीय संस्कृति के महान
ज्योतिर्धर संतों, भक्तों, आचार्यों, विभूतियों
के 248 मूर्ति-शिल्प, भव्य प्रवेश
मंडपम की अद्वितीय स्तंभ कलाकृति, छत में सरस्वती, लक्षमी,पार्वती आदि देवियों और
गोपी-कृष्ण रास के अद्भुत शिल्प, नारायणपीठ में भगवान
स्वामिनारायण के दिव्य चरित्रों के कुल 180 फ़ीट लंबे कलात्मक
धातुशिल्प
प्रत्येक हाथी के साथ बदलती कलात्मक
हाथी-मुद्राएं. “ हाथी और प्रकृति विभाग” में पंचतंत्र की कथाओं के प्रकृति की गोद में क्रीडा करते हाथियों की
महमोहक मुद्राएं. “हाथी और मानव” विभाग में समाज जीवन से समरस हाथियों की कथाएं.
“हाथी और दिव्य तत्त्व” विभाग में धर्म-परम्पराओं में हाथी की गाथाएं
खण्ड-1= सहजानंद
दर्शन/प्रेरणादायक अनुभूति =रोबोटिक्स- एनिमेट्रोनिक्स, ध्वनि-प्रकाश, सराउण्ड
डायोरामा आदि आधुनिक तकनिकों के माध्यम से श्रद्धा, अहिंसा, करुणा, शान्ति, आद्दि
सनातन मूल्यों की अद्भुत प्रस्तुति भगवान स्वामिनारायणजी के जीवन-प्रसंगों के
द्वारा.
खण्ड-२=नीलकण्ठ दर्शन= महाकाव्य सी फ़िल्म जो
बालयोगी नीलकंठ की, जिन्होंने सात वर्ष तक नंगे पैर 12,ooo कि.मी. भारत की पदयात्रा की. 85 x 65 फ़ीट चित्रपट
सत्य घटना पर आधारित,
खण्ड-३=संस्कृति विहार= दस हजार वर्ष पुरानी
भारतीय संस्कृति की अद्भुत झांकी. नौकाविहार द्वारा 800 पुतलों एवं कई
संशोधनापूर्ण प्रमाणभूत रचनाएं. विश्व की सर्वप्रथम युनिवर्सिटी तक्षशिला,
नागार्जुन की रसायनशाला देखकर भारत के भव्य इतिहास की झांकी देखी जा सकती है.
यज्ञपुरुष कुण्ड एवं संगीतमय फ़व्वारे= लाल
पत्थरों से निर्मित 300 x 300 फ़ुट लम्बा प्राचीन कुण्ड परम्परा का नमुना, कुण्ड के भीतर कमलाकार
जलकुंड में संगीतमय फ़ुवारा. जल,ज्योति और जीवनचक्र का अद्भुत संयोजन. 27 फ़ीट ऊँचा बालयोगी नीलकंठ ब्रह्मचरी की प्रतिमा
नारायण सरोवर= मन्दिर के तीनो ओर प्राचीन
जलतीर्थॊं की महिमापूर्ण परंपरा को
समर्पित नारायण सरोवर की स्थापना की गई है. 151 तीर्थों
और नदियों के पवित्र जालसिंचन से यह सरोवर परम तीर्थ बना है.
अभिषेक मण्डपम= शुभकामनाओं और प्रार्थनाओं के साथ नीलकण्ठ
ब्रह्मचारी की मूर्ति पर गंगाजल से विधिपूर्वक अभिषेक.
योगी हृदय कमल=हरी घास की भव्य कालीन पर एक
विशाल अष्टदश कमल.
प्रेमवती आहारगृह=अजंता की अद्भुत कलासृष्टि
के आल्हादक वातावरण में शुद्द ताजा भोजन, मधुर जलपान की सुविधा.
सांस्कृतिक उद्दान=22 एकड में फ़ैले उपवन में पुष्प-पौधों का कलात्मक अभियोजन. 8 फ़ुट ऊँचे 65 कांस्यशिल्प.
सूर्यप्रकाश के सात रंगों के प्रतीकरुप सात
अश्वों का अनुपम सूर्यरथ, सोलह चन्द्र कलाओं के प्रतीकात्मक 16 हिरनो का अद्भुत चन्द्ररथ, भारतीय वीररत्न, महान स्त्रीरत्न, प्रतिभावंत
भारतीय बालरत्न, एवं राष्ट्र के निर्माण में योगदान देने वाले महान राष्ट्ररत्नो
के अभूतपूर्व कांस्यशिल्प.
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सिंहस्थ
मेला-उज्जैन
सिंहस्थ-२०१६. ( २२ अप्रैल से २१ मई २०१६)
कुम्भपर्व
एक महत्त्वपूर्ण और सार्वभौम महापर्व माना जाता है, जिसमें देश-विदेश के लाखों
श्रद्धालु एकत्र होते हैं. इसे यदि विराट मेला कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.
विश्व में शायद ही ऎसे विराट मेले का आयोजन कहीं भी नहीं होता, यही तो इसकी विशेषता
है. “कुम्भ” का शाब्दिक अर्थ है घट या घड़ा. कुम्भ के एक अर्थ विश्वब्रह्माण्ड भी
है. जहाँ पर विश्व भर के धर्म, जाति, भाषा तथा संस्कृति आदि का एकत्र समावेश हो
वही कुम्भमेला है. कुम्भ मेले का प्रारंभ कब से हुआ इसका ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन
है. परन्तु कुम्भपर्व के विषय में पुराणॊं में एक प्रसंग ऎसा आया हुआ है, जिसके
आधार पर कहा जा सकता है कि कुम्भ मेले का प्रारंभ बहुत प्राचीन काल में ही हो चुका
था. आज केवल उसकी आवृत्तिमात्र होती है.
कुम्भ
पर्व को लेकर एक बड़ा ही रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलता है –
किसी
समय भगवान विष्णु के निर्देशानुसार देवों और दानवों ने मिलकर समुद्र-मंथन किया.
मंदराचल पर्वत को मन्थनदण्ड और वासुकि नाग को नेती (मन्थन-रज्जु) बनाकर
समुद्र-मंथन किया. मंथन करने से चौदह रत्न निकले, जो इस प्रकार हैं (१) ऎरावत
हाथी.(२) कल्पवृक्ष (३) कौस्तुभमणि (४) उच्चैःश्रवा (५) चन्द्रमा (६) धनुष (७) धेनु (कामधेनु), (८) रम्भा (९) लक्ष्मी (१०)
वारुणी (११) विष (१२) शंख (१३) धन्वन्तरि और (१४) अमृत.
धन्वन्तरि
अमृतकुम्भ लेकर निकले ही थे कि देवों के संकेत से देवराज इन्द्र के पुत्र जयन्त
अमृत-कुम्भ को लेकर वहाँ से भाग निकले. दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार
दैत्यों ने अमृत-कलश छीनने के लिए जयन्त का पीछा किया. जयन्त और अमृत-कलश की रक्षा
के लिए देवगण भी दौड़ पड़े. आकाशमार्ग में ही दैत्यों ने जयन्त को जाकर घेर लिया. तब
तक देवगण भी वहाँ पहुँच चुके थे. फ़िर क्या था, देखते ही देखते दोनों में युद्ध छिड़
गया जो बारह दिन तक चलता रहा. दोनों दलों के संघर्ष-काल में अमृतकलश से पृथ्वी पर
चार स्थानों पर अमृत की बूंदें छलककर गिर गयी. उस समय सूर्य आदि देवता जयन्त और
अमृतकलश की रक्षा के लिए सहायता कर रहे थे. देवों तथा असुरों के कलह को शांत करने
के लिए भगवान विष्णु मोहिनीरूप धारणकर प्रकट हुए तो युद्ध तत्काल थम गया और दोनों
पक्षों ने तय कि अमृत पिलाने का भार इन्हीं पर छॊड़ दिया जाए. तब मोहिनीरूपधारी
विष्णु ने दैत्यों को अमृत का भाग न देकर देवताओं को पिला दिया. इसलिए देवगण अमर
हो गए.
अमृत प्राप्ति के लिए बारह
दिनों तक देवों और दानवों में युद्ध हुआ था. देवों के बारह दिन मनुष्यों के लिए
बारह वर्ष के बराबर होते हैं. इस कारण कुम्भ मेला भी बारह वर्ष के बाद एक स्थान पर
होता आया है. जिन स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थी वे स्थान हैं (१) हरिद्वार
(२) प्रयागराज (३) नासिक और (४) उज्जैन. इसीलिए इन चार स्थानों में बारह वर्षों के
बाद कुम्भ मेला लगता है, जो ढाई महिने तक चलता है. इसे पूर्ण कुम्भ कहा जाता है.
हरिद्वार और प्रयाग में छः साल के पश्चात अर्धकुम्भ का मेला भी आयोजित होता है.
हरिद्वार के अर्धकुम्भ के अवसर पर नासिक का कुम्भ मेला होता है और प्रयाग के
अर्धकुम्भ के समय उज्जैन का कुम्भ होता है.
(१) हरिद्वार-
कुम्भराशि पर बृहस्पति का और मेष-राशि पर सूर्य का योग होने पर हरिद्वार में पूर्ण
कुम्भ का अयोजन होता है.
(२) प्रयाग-
वृषराशि पर बृहस्पति का योग होने पर प्रयाग में पूर्णकुम्भ मेले का आयोजन होता है.
(३) उज्जैन-
सिंहराशि पर बृहस्पति का और मेष राशि पर सूर्य का योग होने पर उज्जैन में
पूर्णकुम्भ मेले का आयोजन होता है.
(४) सिंहस्थ
महापर्व दस महायोगों के उपस्थित होने पर मनाया जाता है. जिन दस महायोगों का उल्लेख
शास्त्रों में उल्लेखित किये गए हैं वे इस प्रकार हैं-(१) सिंह राशि में बृहस्पति,
(२) मेष राशि में सूर्य (३) तुला राशि में चन्द्र (४) स्वाती नक्षत्र (५) वैशाख
मास (६) शुक्ल पक्ष (७) पूर्णिमा तिथि (८) व्यातिपात योग (९) सोमवार और (१०)
अवंतीपुरी( उज्जैन.). नासिक- वृश्चिकराशि पर बृहस्पति का योग होने पर नासिक में
पूर्ण कुम्भ का योग होता है, जहाँ कुम्भ का मेला लगता है.
इस प्रकार चारों स्थानों में बारह वर्ष
के पश्चात एक महाकुम्भ पर्व होता है. कुम्भ मेलों का महत्व बतलाते हुए कहा गया है.
अश्वमेघसहस्त्राणि वाजपेयशतानि
च * लाक्षं प्रदक्षिणा भूमेः कुम्भस्नाने तत्फ़लम
अर्थात- हजार अश्वमेघयज्ञ करने से और
लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फ़ल मिलता है, वही फ़ल कुम्भस्नान से
प्राप्त हो जाता है.
कुम्भपर्व में जाति, धर्म, सम्प्रदाय,
भाषा, राज्य, संस्कृति, साहित्य, दर्शन, वेषभूषा आदि सभी संदर्भों में अनेकता में
एकता के दर्शन होते हैं. साधु-संत, धनी, विद्वान, कर्मकांडी, योगी, ज्ञानी, कथा
वाचक, तत्वदर्शी, सिद्धपुरुष, सेठ-साहूकार, भिखारी, व्यापारी, गृहस्थ, सन्यासी,
ब्रह्मचारी, कल्पवासी, अधिकारी, बूढ़े, जवान, आबालवृद्धवनिता सभी का वहाँ समागम
होता है. विभिन्न धर्म, संस्कृति तथा सम्प्रदायों का संगम इन कुम्भ मेलें में होता
है, जो सहज आकर्षण का केन्द्र होता है. यही कारण है कि उत्तरभारत के लोग दक्षिण
भारत में तिरुपति, रामेश्वर तथा कन्याकुमारी आदि तीर्थस्थानों पर जाकर अपने को
कृतार्थ मानते हैं और दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ,
गंगोत्री, यमुनोत्री, जगन्नाथपुरी, काशी तथा प्रयाग आदि तीर्थस्थानों की यात्रा कर
अपने को धन्य मानते हैं.
यह
बात स्वयं सिद्ध होती है कि हमारे प्राचीन काल के ऋषि-मुनि नितान्त ही दूरदर्शी
तथा कुशाग्रबुद्धि के थे. उन्होंने भारतवर्ष के प्राचीन वैदिक सनातन धर्म.
संस्कृति, सभ्यता, व्रत, पर्व, त्योहार, साधना तथा उपासना आदि की रक्षा के लिए एवं
इस आर्यावर्त देश की एकता, अखण्डता और गौरव-गरिमा को बनाए रखने के लिए इनकी
स्थापना की थी.
यह
गौरव की बात है कि इस समय महाकुम्भ सिंहस्थ उज्जैन में (२२ अप्रैल से २१ मई २०१६)
विश्व का इतना बड़ा और महत्त्वपूर्ण आयोजन मध्यप्रदेश की धरा पर हो रहा है. यहाँ आए
हुए संतों-सन्यासियों के अखाड़े अपनी साधना और विद्वत्ता से कोटि-कोटि श्र्द्धालुओं
को लाभान्वित कर रहे हैं. साधु-संत अपनी ओजस्वी और दिव्य वाणी से परर्मोधर्म का
पाठ पढ़ा रहे हैं. प्रवचन, कीर्तन, भजन, पूजा-पाठ आदि धर्म से जुड़ा शायद ही ऎसा कोई
धार्मिक कार्य है, जो यहाँ न हो रहा हो.
इस
महाकुंभ तक पहुंचाने के लिए शासन की ओर से बड़े पैमाने पर इंतजामात किए गए हैं. जगह-जगह यात्रियों के ठहरने और मेले तक पहुंचाने
के निःशुल्क बसें उपलब्ध होती है. पीने के लिए शुद्ध जल, शौचालय के लिए, बिमार पड़
जाने की स्थिति में मेडिकल की व्यवस्था,
स्नान घाट पर फ़्लड लाईट की उत्तम
व्यवस्था, सुगंधित जल के छिड़काव ,नदी में शुद्ध जल ही प्रवाहित हो, नदी में
गोताखोरों की टीम, इस पार को उस पार से जोड़ने के लिए फ़ौज द्वारा निर्मित दो पुल,
पुलिस की उत्तम व्यवस्था आदि यहां देखने
को मिलती है. इसके अलावा रेल विभाग ने भी इस व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के
लिए अपनी ओर से व्यवस्थाएं की है.
मित्रों-
उज्जैन
जाने के कई अवसर मुझे मिले लेकिन कुंभ में जाने का यह प्रथम अवसर था. एक दिन यूंहि
मित्रों के बीच कुंभ में जाने की बात चल निकली. सहमति बनते ही मित्र
बी,एल.विश्वकर्मा ने पेंचव्हेली फ़ास्ट पैसेंजर से आरक्षण करवा लिया. इस तरह
छिन्दवाड़ा से श्री अशोक सक्सेना, के.के.डेहरिया, बी.एल.विश्वकर्मा, राकेश चौबे,
एस.एल.पाठेकर, के.एस.माल्या और ए.पी.खंगारे सहित हम १४ मई को उज्जैन के लिए निकले.
ट्रेन का नाम भले ही फ़ास्ट पैसेंजर हो लेकिन वह अपनी ही चाल में चलती है. उसे नाम
के अनुरुप चलना शायद नहीं आता. अपनी सामान्य चाल में चलते हुए ट्रेन मक्सी जंक्शन
दो बजे के करीब पहुंची. अब हमें दूसरी ट्रेन का इन्तजार था. सूरज महाराज के तेवर
काफ़ी गर्म थे. किसी तरह अपने आपको धूप से बचते हुए हम अगली ट्रेन का इन्तजार करने
लगे. काफ़ी इन्तजार के बाद जब ट्रेन नहीं आयी तो हमें प्रायवेट बस से उज्जैन जाने
का निर्णय लिया. किसी तरह उज्जैन पहुंचे. शाम घिर आयी थी और हमें रामघाट के पास
अवस्थित रामानुजकोट पहुंचना था,लेकिन किसी भी वाहन को मेला क्षेत्र में घुसने के
सक्त मनाही थी. किसी तरह एक लाज में रुकने का इन्तजाम किया और रात्रि में ही
क्षिप्रा में स्नान करने का मानस बनाया. रास्ता चलते हम क्षिप्रा के तट पर पहुंचे.
चारों तरह अपार भीड़ को देखने का हमारा यह पहला अवसर था. देश के कोने-कोने से लाखों
श्रद्धालुओं का आगमन आश्चर्य पैदा कर रहा था. आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि
अन्यान्य स्थानों में होने वाले कुंभ का आमंत्रण किसी को नहीं भेजा जाता. इसके
आयोजन की खबर पंचागों के अलावा समाचार-पत्रों में हे पढ़ने को मिलती है. बिना किसी
आमंत्रण के लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं का आना इस बात की पुष्टि के लिए काफ़ी है जो
भारत की विविधता और एकता को दर्शाती है. म.प्र.शासन की ओर से बड़े पैमाने पर किए गए
सुरक्षा के इन्तेजामों को देखकर तारीफ़ की जानी चाहिए. जगह-जगह पुलिसमैन तैनात थे.
व्हिल्सिंग देते हुए वे भीड़ को आगे बढ़ने का संकेत दे रहे थे. आश्चर्य इस बात पर कि
किसी भी पुलिसमैन को हमने तैश में बातचीत करते नहीं देखा. इतनी सज्जनता..नम्रता
आदि देखकर आश्चर्य पैदा करने के लिए काफ़ी है अन्यथा बेचारों को बड़ा ही निर्मम-कठोर
और अत्याचारी ही माना जाता है.
१६
मई को हम रामघाट के समीप स्थित रामानुजकोट जा पहुंचे. विश्वगीता प्रतिष्ठान का यह
पावन केन्द्र समूचे देश के अलावा विश्व में गीता को प्रतिष्ठित करने के लिए भगीरथ
प्रयास कर रहा है. इस केन्द्र में वेदपाठी बच्चों को संस्कारित किया जाता है. इस
संस्थान के प्रमुख हैं स्वामी रंगनाथाचार्यजी. मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़
देखते ही बनती है. भक्तों के लिए आवास तथा निःशुल्क भोजन की उत्तम व्यवस्था भी
यहाँ की जाती है.
\
रामानुजकोट का
प्रवेशद्वार स्वामी रंगनाथाचार्य जी.रामानुजकोट
रामानुजकोट के प्रवेशद्वार पर उपस्थित
छिन्दवाड़ा की मित्र मंडली-(उज्जैन यात्रा)
बांए
से दायें- श्री बी,एल.विश्वकर्मा श्री अशोक सक्सेना, के.के.डेहरिया,
बी.एल.विश्वकर्मा, राकेश चौबे, एस.एल.पाठेकर,
के.एस.माल्या और ए.पी.खंगारे आदि.
कुंभ
मेले में प्रवेश करते ही हमें मुख्य द्वार पर एक विशालकाय सिंह के दर्शन होते हैं
जो सिंहस्थ कुंभ होने का प्रमाण प्रस्तुत कर रहा होता है. इसी स्थान से होते हुए
हम पावन क्षिप्रा के तट पर पहुँचे थे. दो दिन में तीन बार स्नान और महाकाल के
दिव्य दर्शनों का पुण्य-लाभ हमने उठाया.
सिंहस्थ
२०१६ के कुछ विहंगम दृष्य.
आस्था
एव् अध्यात्म का अनूठा संगम
समूची
क्षिप्रा फ़्लड लाईट से जगमगा रही है. साधु-संतों के अस्थायी अखाड़ॊं हों अथवा
मन्दिर, सभी रंग-बिरंगी रोशनी में जगमगा रहे है. लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं
की भीड़ स्नान कर पुण्य लाभ ले रहे हैं. स्नान के लिए पर्याप्त शुद्ध जल उपलब्ध
करवाया जा रहा है. पानी की शुद्धता के स्तर को दिखाने और तापमान को प्रदर्शित करने
के लिए एक डिस्प्ले लगाया गया है, जो निरन्तर आंकड़े दिखला रहा है. स्नान और डुबकी
लगाने के लिए पानी का स्तर चार फ़िट अर्थात १२० से.मी. रखा गया है. कोई श्रद्धालु
पानी में न डूब जाए इसके लिए मोटरबोट और गोताखोर के पर्याप्त इंतजाम घाटॊं पर किए
गए हैं. नदी का किनारों को सजाया-संवारा गया है. क्षिप्रा के बाएं किनारे पर लाल
पुल से लेकर भूखी माता से लेकर दत्त अखाड़े तक एवं दाएं तट पर लाल पुल से लेकर
नृसिंह घाट तक खाली जगहों पर भी घाटॊं का निर्माण किया गया है. इस तराह दोनों ओर
लगभग ८ किमी.लम्बाई में घाट उपलब्ध है. लबालब बहने वाली क्षिप्रा इस समय जलविहीन है.
बिना जल के सिंहस्थ कैसा? जब जल नहीं होगा तो स्नान करना संभव नहीं. शासन ने इस
संकट से निजाद पाने के लिए लगभग १९ किमी.लम्बाई में ग्राम पिपल्याराधौ से निकालकर
खान नदी को पाइप के जरिए कालियादेह महल के आगे क्षिप्रा से जोड़ा दिया है. हजारों
की संख्या में श्रद्धालु पानी में डुबकी लगाकर निकल रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर उतनी
ही संख्या में लोग पानी में उतर रहे हैं. न कोई शोर, न कोई शराबा, सब इस ढंग से हो
रहा मानो आप कोई दिवास्वपन देख रहे हों. है न आश्चर्य पैदा करने वाली बात ! इस माकूल इंतजाम के लिए शासन की जितनी भी तारीफ़
की जाय, कम ही प्रतीत होगी.
सिंहस्थ
बना सामाजिक सरोकारों का महाकुंभ
दुनिया
को मानवीय मूल्यों का संदेश देने के मामले में सिहंस्थ २०१६ अतीत में हुए कुंभों
से, एकदम हट कर अनूठा और नवेला बना. धर्म और अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले जूना
पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंदजी गिरि महाराज, परमार्थ निकेतन के
अध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने उपस्थित जनसमुदाय को
पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण के साथ खुले में शौच
नही करने का संदेश दिया. वहीं दूसरी ओर भारत के प्रधान मंत्री श्री
नरेन्द्र मोदी जी होर्डिंग के जरिए जन-जन में संदेश देते नजर आए. होर्डिंग में
लिखा गया था- कितनी पावन हैं ये नदियां-चाहे गंगा हो या क्षिप्रा, खुले में शौच
न करें. इसके अलावा परमार्थ निकेतन द्वारा संदेश दिया गया कि क्षिप्रा के आंचल
को हरियाली की चादर ओढ़ाने के लिए डेढ़ लाख पौधे रोपे जाएंगे जो पीढ़ियों के लिए
महाप्रसाद बनेंगे. शनि के उपासक दाती महाराज ने बेटियाँ बचाओ का संदेश देते हुए
जनजागरण किया. पूरे सिंहस्थ में बेटियां बचाने के होर्डिग्स लगे हुए थे.
कुंभ
मेला तब से आज तक-
संभवतः
यह पहला कुंभ है जहाँ सिने जगत की प्रसिद्ध कलाकार, विश्व विख्यात नृत्यांगना एवं
सासंद हेमामालिनी ने नाट्य विहार कला केन्द्र मुंबई के कलाकारों के साथ नृत्य
वाटिका राधा रास बिहारी की प्रस्तुति दी तो पूरा माहौल राधा-कृष्ण भक्ति में रम
गया. पांच मई को अचानक आए तूफ़ान में कई पंडाल धराशायी हो गए. मुख्य मंत्री शिवराज
चौहान प्रोटोकाल को न देखते हुए मंगलनाथ जा पहुचे और व्यवस्था बनाने में जुट पड़े.
फ़िर क्या था जन-समुदाय उमड़ पड़ा और सहयोग देने में जुट गया. इसी दिन पेशवाई के बाद
जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्दजी ने नाराज होकर पंडाल छोड़ दिया और वैशाली
नगर स्थित एक यजमान के यहां रुकने पहुंच गए. हादसा गुजर गया..फ़िर नयी सुबह हुई.
उसी उमंग और उत्साह के साथ लगभग दस लाख लोगों ने रामघाट, दत्त अखाड़ा ममंगलनाथ,
त्रिवेणी समेट अन्य घाटॊं पर स्नान कर पुण्य-लाभ उठाया. भाजपा के राष्ट्रीय
अध्यक्ष अमित शाह ने बुधवार को वाल्मिकि घाट पर क्षिप्रा में डुबकी लगाई और
दीनदयालपुरम के संत समागम में शामिल हुए. संतों के पैर छुए और आशीर्वाद लिया.
महाकाल के दर्शन किए और उज्जैन से १५ किमी. दूर ग्राम निनौरा में १२ से १४ तक
अंतरराष्ट्रीय वैचारिक महाकुंभ पहुंचकर तैयारियों का जायजा लिया और राज्य सरकार की
प्रदर्शनी का शुभारंभ किया. ११ मई को तलवार लहराते, सिक्के बांटते किन्नर अखाड़े के
आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी घोड़े पर सवार होकर निकले. एक पालकी
में आद्ध्य शंकराचार्य की तस्वीर और किन्नरों की आराध्य देवी बहुचरा माता की
मूर्ति थी. निनौरा में सिंहस्थ का सार्वभौमिक संदेश तैयार करने के लिए हो रहे
अंतरराष्ट्रीय विचार कुंभ में कुटीर उद्धोगों को प्रोत्साहित करने, जल-जंगल और
जमीन बचाने और मछली पालन, कृषि पद्दति में परिवर्तन करने, नारी-शक्ति को नयी दिशा
देने, स्वच्छता एवं पवित्रता की महत्ता एवं परंपरा को स्थपित करने पर जोर दिया
गया. १४ मई दिन शनिवार को देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उपस्थित
होकर त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय विचार कुंभ के समापन कार्यक्रम में सिंहस्थ के
सर्वमौम संदेश को विश्व के लिए जारी किया. इस दौरान श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री मैत्रीपल
सिरिसेना, लोकसभा अद्ध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, मुख्यमंत्री श्री शिवराज
चौहान, केन्द्रीय इस्पात और खान मंत्री नर्रेद्नसिंह तोमर और सामाजिक न्याय और
अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत के अलावा ८५० से अधिक विदेश के विद्वानों ने सहभागिता का निर्वहन किया. उन्होंने साधु-संतो को आव्हान करते हुए साल में
एक बार सात दिन भक्तों के बीच समाज के मुद्दों पर चर्चा करने, पेड़ और
नदी,प्रकृति-पर्यावरण, बेटी व नारी, धर्म और विज्ञान पर गहनता से चर्चा कर आगे की
रणनीति बनाने पर जोर दिया. उन्होंने मंच से ग्लोबल वार्मिंग, आतंकवाद और
विस्तारवाद को तीन बड़े संकट बताते हुए उसका निदान खोजने की अपील की. इसी के साथ
उन्होंने ५१ सूत्रीय अमृत संदेश जारी किया. १६ मई को भारत साधु समाज अधिवेशन में
धर्म से जुड़े १४ प्रस्ताव परित किए गए जिसमें नदियों को आपस में जोड़ने , पर्यावरण
को बचाने जैसे अहम मुद्दे शामिल थे.
प्रदेश
के मुख्यमंत्री श्री शिवराज चौहान ने प्रदेश के साढ़े सात करोड़ नागरिकों को उज्जैन
पधारने के लिए आमंत्रित करते हुए स्वयंभू महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन,
मोक्षदायिनी क्षिप्रा मे स्नान करने के लिए आमंत्रित किया था. मात्र एक आव्हान पर
करोड़ों लोगं ने पुण्य स्न्नान का लाभ उठाया और अपने को धन्य माना. यह वह स्थान
है जहा देवों के देव महादेव की तड़के चार
बजे भस्म आरती में भस्मी चढ़ाई जाती है तो शाम को ड्रायफ़ुड और भांग की सौम्यता लिए
अनूठा श्रृंगार हर किसी को आकर्षित करता है. अमूमन तीन हजार की भांग और देढ़ हजार
के ड्रायफ़ूड से भोले का श्रृंगार किया जाता हो, लगभग छः हजार साल पुराना कालभैरव
का वाम मार्गी तांत्रिक मन्दिर, जिसमें मांस, मदिरा, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाये
जाते हों, जहाँ स्वयं गढ़कालिका निवास करती हो, जहाँ रिद्धि-सिद्धि गणेश मंदिर अवस्थित
हों, जहाँ हरसिद्धी देवी का भव्य मंदिर हो, जहाँ महान तपस्वी गुरु गोरखनाथ की
तपःस्थलि हो,वहाँ भला कौन नहीं जाना चाहेगा.
निश्चित ही वे जन बड़भागी हैं जिन्होंने इस
महाकुंभ के अवसर पर पधारकर पुण्य-लाभ कमाया है.
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20.
तिलिस्म के कुहासे में घिरा- देवगढ़ किला.( जिला
छिंदवाड़ा)
देवगढ़.का
किला.
छिन्दवाड़ा ज़िले
से लगभग 40 किलोमीटर दूर मोहखेड़ ब्लॉक के देवगढ़ गाँव में देवगढ़ का किला
स्थित है. छिन्दवाड़ा नागपुर
हाइवे पर उमरनाला से एक रास्ता मोहगढ़ लोहँगी
ग्राम होकर देवगढ़ गाँव तक जाता है. गोंडवाना के विशेष क़िलों में से
एक, यह क़िला सतपुडा शृंखला की 650 मीटर
ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और अपने
गौरवशाली इतिहास के लिए जाना जाता है. किले के चारों तरफ गहरी खाई है
और काफ़ी घने जंगल हैं . देवगढ़ गाँव क़िले की
तलहटी में पूर्व की दिशा में स्थित है.
देवगढ़
का किला अपनी वास्तु व्यवस्था के कारण एक समय पूरे भारत में विख्यात था.देवगढ़ के
बारे में इस क्षेत्र के वासियों में तरह-तरह की किंवदंतियां एवं दंत-कथाएं
चंद्रकांता संतति उपन्यास से जुड़ी हुई लगती है. ऐसी जनश्रुति है कि कभी देवगढ़ के
किले की वास्तु व्यवथा अनेक रहस्यों से परिपूर्ण थी. इस किले में सैकड़ों गुप मार्ग
शत्रु सेना से बचाव के तांत्रिक तिलिस्मी इंतजाम थे. इस किले में गुप्त मार्गों की
व्यवस्थाओं के साथ-साथ हैरत में डालने की आश्चर्यचकित करने वाली वास्तु व्यवस्थाओं
का समावेश था.
चंद्रकांता
संतति उपन्यास की आधारशिला "देवगढ़" ही था.
कहा
जाता है कि देवगढ़ किले की इस रहस्यमयी व्यवस्थाओं में साहित्यकार बाबू देवकीनंदन
खत्री ने अपनी लेखनी से उभारकर उपन्यास में चमत्कारी घटनाओं से एक अमरगाथा लिखी.
यदि सूक्ष्मता से इसका अवलोकन करें तो देवगढ़ के गौरवशाली इतिहास, देवगढ़ किले की
वास्तु व्यवस्था और चंद्रकांत संतति उपन्यासों में एक साम्य-सा मिलता है.चंद्रकांत
संतति उपन्यास उपन्यासों की श्रृँखला में रहस्यलोक में विचरण कराने वाली गाथा में
नवगढ़, विजयगढ़, साम्राज्यों का उल्लेख आता है.
यह
एक संयोग ही है कि छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ विकासखंड में स्थित देवगढ़ के समीप आज
भी विजयगढ़ नाम का गांव है. देवगढ़ किले के अन्य रहस्यों से भरे स्थापत्य भवन और
स्थलों के प्रमाण भग्नावेशों के रूपों में आज भी मिलते हैं. क्षेत्रवासियों के
अनुसार पहले देवगढ़ से नागपुर की ओर एक गुप्त मार्ग जाता था. इस गुप्त सुरंग के
बारे में भी पहले से अनेक किंवदंतियां प्रचलित रही हैं. आठ सौ कुँए, नौ सौ
बावलियों वाले देवगढ़ में चोर बावली, बादल महल, किसवन महल जैसी इमारतों के विषय में
भी कई किंवदंतियां जुड़ी हैं.
देवगढ़
में था शीश महल
स्थानीय
निवासी बताते हैं कि देवगढ़ के किले में शीश महल भी था. वे यह भी बतलाते हैं कि इस
किले में कहीं -कहीं संगमरमर और लाल पत्थरों की कलाकारी भी थी. ऐसा भी कहा जाता है
कि की किसी समय देवगढ़ के चंदनवनों की प्रसिद्धि पूरे भारतवर्ष में थी. देवगढ़ के
चंदन वनों के सर्वाधिक उपलब्धता के लिए यह जाना जाता था. आज भी यहाँ चंदन के वृक्ष
पाए जाते हैं. चंद्रकांति संतति उपन्यास श्रृंखला में चंदनवनों का उल्लेख मिलता
है.’
मोती
टांके का रहस्य-
अद्भुत
रहस्यो एवं देवगढ़ किले की वास्तु व्यवस्था
एक दूसरे का पर्याय लगते हैं. देवगढ़ से जुडए अनसुलझे रहस्यों में मोती टांके का भी
एक रहस्य है. लगभग ढ़ाई सौ फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित मोती टांका में अथाह जल का होना
भी एक बड़ा आश्चर्य ही है,
पारस
पत्थर का मिथक.
देवगढ़
साम्राज्य के विषय में प्रचलित जनश्रुति में पारस पत्थर का भी मिथक है. भारतीय
इतिहास में पारस का पत्थर का मिथक देवगढ़ के प्रतापी शासक जाटवाअ शाह एवं होशंगशाह
राजा के साथ जुड़ा है.
वैज्ञानिक
खोजों से भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि लोहे से सोना बनाया जा सकता है. इस विधि
को वैज्ञानिक भाषा में कीमियागारी कहते हैं. पारस पत्थर को विज्ञानिकों ने भी एक
मिथक न मानते हुए उसके होनेका विज्ञानिक आधार भी बताया है. लोग बताते हैंकि
जाटवराजा अपनी प्रजा से लगान के रूप में खेतों में उपयोग की गई लोहे की पांस लिया
करते थे. संभवतः वे इन लोहे की बेकार पांसों का उपयोग सोने के निर्माण के लिए करते
थे.
देवगढ़
का वैभवशाली इतिहास.
मध्य भारत
में गोंडवाना साम्राज्य के वैभव और समृद्धि से जुड़े इतिहास आज भी अपनी
गौरवशाली विरासत को बयान कर रहे हैं. इन्ही खूबसूरत विरसतों में से एक है
देवगढ़ का किला। देवगढ़ का गोंड राज्य सोलहवीं शताब्दी के अंत में अस्तित्व
में आया (मिश्र, 2008b) और अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक फला फूला.
देवगढ़, नागपूर और छिंदवाड़ा के प्राचीन गोंड साम्राज्य का मुख्यालय था
और एक समय में यह गढ़ और चांदागढ़ दोनों से ज्यादा प्रसिद्ध हो चुका था (रसेल, 1908). क़रीब
पौने दो सौ साल के अपने गौरवशाली इतिहास में पहले गढ़ा मंडला के अधीन रहा
और फिर महारानी दुर्गावती की मृत्यु के बाद 1564 ईसवी
में मुग़ल बादशाह अकबार के अधीन हो गया. मुग़लों के पतन के बाद कुछ दशकों तक देवगढ़
राज्य की स्थिति अच्छी रही, लेकिन दक्षिण से
मराठों के उदय ने इस राज्य का सूरज मध्यम
कर दिया.
देवगढ़
में गोंड सत्ता के संस्थापक जाटवा थे जो रणसूर और घनसूर को मारकर
गोंडी सत्ता की ध्वजा देवगढ़ क़िले पर लहरायी थी. राजा जाटवा इतने प्रभावशाली और प्रसिद्ध
हो गए थे कि उनसे मिलने स्वयं अकबर महान दिल्ली से चलकर सन 1590 ईसवी में देवगढ़ आया था और बहुत सारे उपहार और सम्मान से
उन्हें नवाज़ा था(क्रेडोक, 1899) लगभग 60 साल
के गौरव शाली प्रशासन के बाद राजा जाटवा का 1602 ईसवी
में निधन हो गया.
राजा
जाटवा ने देवगढ़ किले के अलावा पाटनसावंगी और नागरधन के किले भी बनवाए
थे(रसेल, 1908). राजा जाटवा के नाम का ताँबे का सिक्का जो
नागपुर संग्रहालय में रखा गया है जिस पर
साफ़ साफ़ अक्षरों में “श्री राजा जाटवा प्रतिराज” लिखा
है, देवगढ़ की संपन्नता का गवाह है.आज भी जाटवा द्वारा बसाया गया विजयपुरा गाँव क़िले
की तलहटी में उत्तर पूर्व में देखा जा सकता है. बख़्तबुलंद शाह द्वारा बसाया
गया जयंतपुरा गाँव आज पठानपूरा के नाम से क़िले से दक्षिणी ओर स्थित
है.
आईने
अकबरी में अबुल फज़ल ने जाटबा को डेढ़ दो हज़ार घुड़सवारों, पचास हज़ार पैदल और सौ हाथियों का स्वामी बताया गया है.(मिश्र, 2008a).
देवगढ़
किले के तलहटी में धुरवा राजाओं की समाधियाँ हैं. यहीं पर प्रसिद्ध धुरवा राजा जातबा
की समाधि भी है (गोंडवाना दर्शन, 2013)। आज भी धुर्वे गोत्र (7 देव ) वाले गोंड गढ़
गोंगो के लिए देवगढ़ जाते हैं और अपने देव भीडी
की पूजा अर्चना करते हैं. आज भी देवगढ़ में भव्य किले के खंधर, महलों
के निशान और राजा जाटबा की समाधि दर्शनीय स्थलों में गिने जाते हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार
वेलनकर के अप्रकाशित शोधप्रबंध के अनुसार राजा जाटवा के तीन पुत्र थे दलशाह, दुर्गशाह और कोकशाह जिसमें से ज्येष्ठ पुत्र दलशाह राजा जाटवा की मृत्यु के बाद देवगढ़ की गद्दी पर बैठे और जिनका शासन 1634 ईसवी तक चला. दलशाह की मृत्यु के बाद उनका सबसे छोटा भाई कोकशाह 1634 ईसवी में देवगढ़ का अगला
राजा बना(मिश्र, 2008b).
कोकशाह उर्फ़
कोकिया देवगढ़ क़िले के साथ साथ नागपुर क़िले का भी राजकाज संभालते थे. नागपुर की देख रेख के लिए उन्होंने सूबेदार
देवाजी को नियुक्त किया था. कोकशाह की मृत्यु 1640 ईसवी में हुई और उसके बाद उनके बेटे केशरीशाह सत्तासीन
हुआ. सन 1648 ईसवी में मुग़ल बादशाह शाहनवाज़ खान द्वारा आक्रमण किया
गया फिर औरंगज़ेब के समय 1658 ईसवी में मुग़ल सेनापति मिर्ज़ा खान ने आक्रमण
किया. इस तरह 1660 ईसवी तक केशरीशाह मुग़लों से समझौता करके किसी तरह
शासन पर बने रहे और मुग़लों को भारी लगान चुकाते रहे (रसेल, 1908).
सन
1660 ईसवी में केशरीशाह की मृत्यु के बाद गोरखशाह उत्तराधिकारी बने
और देवगढ़ की बागडोर सम्भाली .गोरखशाह के समय पर लगान न चुका पाने के कारण काफ़ी देनदारी बढ़
गयी थी इसलिए अगस्त 1669 ईसवी में दिलेर खान ने देवगढ़ पर हमला बोल
दिया और पूरे क़िले को तोपों से बर्बाद कर दिया और गोरखशाह को बंदी बना
कर उनके पाँच बेटों में से सबसे छोटे दोनों बेटों को मुस्लिम बना लियाअ.दिलेर
खान ने दोनों बेटों के नाम इस्लामयार खान और दीदारखान रखा।इस तरह
इस्लामखान के नाम पर देवगढ़ को इस्लामगढ़ कहा जाने लगा.
इस्लामयार ने
कुल 10 वर्षों तक देवगढ़ का शासन किया और उनकी मृत्यु के बाद उनके
छोटे भाई दीदार खान ने 1680 ईसवी
में देवगढ़ की गद्दी सम्भाली लेकिन सफल नहीं रहने
के कारण औरंगज़ेब ने उन्हें गद्दी से बेदख़ल करके उनके तीसरे बड़े भाई
महीपत शाह को इस शर्त पर शासन लौटाया की वे इस्लाम क़ुबूल करें. 1686 ईसवी में महीपतशाह इस्लाम
धर्म स्वीकार करके बख़्तबुलंद शाह बन गए.
लेकिन बख़्तबुलंद
शाह मुस्लिम धर्म स्वीकार करने बाद भी गोंडों के प्रति अपना प्रेम और मोह नहीं त्याग पाए और
मुग़लों के ख़िलाफ़ बग़ावती रुख़ अख़्तियार किए रहे जिसका
ख़ामियाज़ा उन्हें देवगढ़ का शासन छोड़कर चुकाना पड़ा. चाँदागढ़
के राजकुमार को मुस्लिम बनाकर (कानसिंह से नेकनाम खान) औरंगज़ेब ने
देवगढ़ का शासन सौंप दिया लेकिन वह बहुत जल्दी ही वह असफल हो गया और औरंगज़ेब मृत्यु के बाद बख़्तबुलंद शाह को अपना साम्राज्य विस्तार का पुनः मौला मिल गया. बाद में बख़्तबुलंद शाह ने देवगढ़ के दक्षिण में नागपुर
शहर बसाया(रसेल, 1908).
बख़्तबुलंदशाह के
बाद उनका बेटा चाँद सुल्तान 1709-1719 ईसवी के मध्य देवगढ़ की गद्दी पर बैठा
और देवगढ़ में ख़ूब ख़ुशहाली और संपन्नता लाया. चाँद सुल्तान के 1737 ईसवी में मरने के पहले तक ये क़िला देवगढ़ राज्य की राजधानी
बना रहा और बाद में वली शाह के सत्ता हथियाने के बाद राजधानी नागपुर
स्थान्तरित हो गयी.मुग़लों के बाद भोंसले और पेशवा ने भी कुछ समय तक इस क़िले
राज किए और अंत अंग्रेज़ों के हाथ में ये टूटा फूटा क़िला आया(मिश्र, 2008b).
पेशवा
और भोंसले राजघरानों ने गोंडवाना को कहीं का नहीं छोड़ा. हजारों की
संख्या में गोंडो का कत्ले आम हुआ और गोंडवाना के किले और महलों को बारूद
से उड़ाया गया जिससे दुबारा गोंड शासक फिर से सिर न उठा सकें. इसी दौरान सन 1742 में पाटन सावंगी के किले में भोंसले मराठाओ द्वारा 12000 गोंडो
का नरसंहार किया गया और इतिहास को कलंकित किया गया(रसेल, 1908).
इतने झंझावतों
के बाद भी देवगढ़ का किला आज भी गोंडवाना के वैभव और वीरता की कहानियां
सुना रहा है. बेहद ख़ूबसूरत जंगलों के बीच,चारों ओर
पहाड़ों से घिरा ये क़िला गोंडवाना के वैभवशाली और सम्पन्न क़िलों में
गिना जाता है.
क़िले
के ऊपर जाने के लिए एक ही रास्ता है .क़िले के मुख्य द्वार से ऊपर सीढ़ियों
से चढ़ने पर दूसरा द्वार मिलता है जिसके अंदर जाने के बाद दाहिने हाथ
पर हाथीखाना, बायें हाथ पर बावड़ी (मोतीटाँका) और सामने नक्कारखाना, कचेहरी, हम्माम, ख़ज़ाना, बादल महल, बुर्ज, मस्जिद, और बहुत सारी इमारतों के खंडहर अपनी
भव्यता की गवाही दे रहे हैं.
मोती
टाका बावड़ी
खजाना.
राजा की बैठक (अब खंडहर में.)
हम्माम. देवी
का स्थान
बुर्ज के ऊपर मंदिर स्थापित है,जिसे स्थानीय
लोग चण्डी देवी का मन्दिर कहते हैं. किले की सुरक्षा के लिए, किले की दिवारों को
को जोड़ते हुए 11 बुर्ज और बनाए गए थे. इन बुर्जियों
से न केवल दूर-दूर तक चारों ओर से चौकसी
की जाती थी., अपितु तोप द्वारा शत्रुओं का सामना भी किया जाता था. किले के चारों
ओर कुछ दुरियों पर चौकियां और उनसे कुछ दूरी पर गढ़ी बनाई गई थीं. इस प्रकार से बने
सुरक्षाअ घेरों से शत्रु की गतिविधियों की सूचना तुरंत राजाअ तक पहुंचा दी जाती
थी.
ग्रुप फ़ोटो- दोनों बेटों,
बेटी-दामाद का परिवार और उनकी मित्र
मण्डली देवगढ़ किले में-
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21. बुद्ध के देश भुटान में
प्रकृति की मनोरम छटा मानव को सदा अपने आगोश
में लेने को तैयार रहती है. सच पूछॊ तो वह एक प्रकार से मनुहार सी करती लगती है.
शायद ही कोई ऎसा अभागा मानव होगा जो प्रकृति के इस मनुहार का लुफ़्त न उठाना चाहे.
हरियाली की चादर ओढ़े, आसमान को छूती सी प्रतीत होतीं पर्वतमालाएं, बरफ़ की पगड़ी
बांधे चमचमाते पर्वत शिखर, पाताल सी गहराइयां लिए घाटिंया, कलकल-छलछल के स्वर
निनादित करती बहती अल्हड़ नदियां, लहर-लहर लहराती धान की फ़सलें जिनके आचार में दूध
पकने को तैयार है, तेढ़े-मेढ़े सर्पीले रास्ते, सेब-फ़लों से लदेफ़दे बागीचे, सुन्दर
नक्काशी में सजे बौद्ध मठ, स्थापत्य शैली में बनी इमारतें, विनीत भाव से स्वागत
करने को उद्दत प्रवेश द्वार, शानदार पुल, होंठों पर मुस्कान ओढ़े, पारंपरिक पोषाकों
में सजी नवयुवतियों को देखकर भ्रम होने लगता है कि हम इंद्र की नगरी अमरावती में चले आये हैं. ये
दिलकश नजारे भूटान की खासियत है. यहां के लोग अपनी विरासत, परम्पराओं और
रीति-रिवाजों पर न केवल गर्व करते हैं बल्कि अपनी शान भी समझते है और यात्रियों का
दिल खोलकर स्वागत करते हैं.
भुटान की यात्रा करने से पहले हमें वहां की
भौगोलिक स्थिति की जानकारी जरुर प्राप्त कर लेनी चाहिए. भुटान शब्द की यदि हम
संधिविग्रह करें तो यह अर्थ प्रतिध्वनित होता है. भू यानि जमीन, उत्थान माने
ऊंचा.= माने एक ऎसा प्रदेश जो ऊँचा हो. आप यहां आकर देखेंगे कि सारी पर्वत
श्रेणियां आकाश को छूती से प्रतीत होती है. हिमालय की तराई में बसे भूटान का कुल
क्षेत्रफ़ 398,390 वर्गकिलोमीटर है. भुटान की मुद्रा
नगूलट्रम है जिसकी विनिमय दर एक भारतीय
रुपए के बराबर है. यहां की राष्ट्रभाषा जोंगखा है, पुरुषॊं की राष्ट्रीय पोषाक
“घो” और महिलाओं की “कीरा” कहलाती है. यह
ब्रजयानी बौद्ध धर्म वाला देश है. भूटान का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पारो में
है. रन-वे काफ़ी छोटा होने के कारण इसे खतरनाक माना गया है. चारों तरफ़ से घिरे
पहाड़ों के कारण हवाई जहाज को उतारने और
उड़ाने में पायलट को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है, अन्यथा प्लेन पहाड़ी से
जाकर टकरा सकता है. तीरंदाजी और फ़ुटबाल यहाँ के लोकप्रिय खेल है. भूटान के वैसे तो
२२ जिले हैं लेकिन थिंपु, पुनाखा और पारो में देखने लायक बहुत कुछ है. सप्ताह-दस
दिन में इन स्थानॊ का भ्रमण किया जा सकता है.
कुछ बातें ऎसी भी है भूटान के बारे में
जिन्हें जानना और समझना आवश्यक है. पहला तो यह कि सन 1947 तक भूटान भारत का हिस्सा था, बाद में सन 1948 में
एक स्वतंत्र देश बना. स्वतंत्रता के बाद से इसमें तेजी से बदलाव आने लगा, पर्यावरण
के क्षेत्र में यह अन्य देशों से प्रथम पायदान पर खड़ा है. तीसरा यह कि सन १९९९ से इस देश में पालिथिन के प्रयोग पर कड़ाई से
प्रतिबंध लगाया. चौथा –यहाँ पहुंचना अब भी एकदम आसान नहीं है. पाँचवा-भूटान का
मुख्य निर्यात बिजली उत्पाद करना है, जिसे वह भारत को पन-बिजली बेचता है. इसके
अलावा लकड़ी, सिमेंट और हस्तशिल्प का भी निर्यात करता है. छटा-भूटान के पास अपनी
सेना जरुर है लेकिन नौसेना और वायुसेना नहीं है. इसका मुख्य कारण है कि यह चारों
तरफ़ ऊंची-ऊंची पहाड़ों से घिरा हुआ है. सात- यहाँ के नागरिकों को पेड़ लगाना पसंद
है. किसी प्रिय के जन्म के समय और किसी के दिवंगत होने पर एक पेड़ लगाने की यहाँ
प्रथा है. यही कारण है कि यहाँ सघन वन देखे जा सकते हैं. सन 2006 में सत्ता ग्रहण करने वाला राजा जिग्मे खेसार नामग्येल वांगचुक ने इस देश
में बड़े बदलाव किये, जिसे प्रत्यक्ष देखा और समझा जा सकता है.
सात सदस्यी भूटान यात्रा के सहयात्री सर्व
श्री राजेश्वर आनदेव(पूर्व प्राचार्य पीजी.कालेज), गोवर्धन यादव
(कवि-लेखक-कहानीकार) अध्यक्ष म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, जिला इकाई छिन्दवाड़ा
एवं पूर्व पोस्टमास्टर (एच.एस.जी-1), श्री नर्मदा प्रसाद कोरी (हेड कैशियर एवं सचिव
म.प्र.रा.भा.प्र.समिति), श्री जी.एस. दुबे (से.नि इंजिनियर),श्री महेश चौरसिया (
होटल व्यवसायी पचमढ़ी), श्री अरूण अनिवाल, (से.नि.सहायक कमिश्नर इनकम टैक्स,
नागपुर), श्री विजय आनदेव (सहायक कमिश्नर, इनकम टैक्स नागपुर) जो अस्वस्थता के
कारण इस ग्रुप में नहीं जा पाए.
ग्यारह नवम्बर को बस द्वारा नागपुर के हम
रवाना हुए. शाम 7.05 बजे मुम्बई-हावड़ा गीतांजलि
एस्कप्रेस से हावड़ा करीब ढाई बजे पहुंचे. चुंकि हमारी अगली यात्रा सियालदा से
रात्रि दस बजे थी. सो हमने एक टैक्सी किराये पर ली और बेल्लुरमठ और दक्षिणेश्वर
महाकाली जी के दर्शनओं का पुण्य लाभ कमाया.
रात 10.30
दिनांक १२/११/२०१७ को दार्जलिंग ट्रेन से सियालदाह से न्युजलपाईगुड़ी सुबह 08.30
पर पहुंचे.. बस स्टैण्ड पर संतोष लामा विनीत भाव के साथ अपनी जाइलो
(WB-7544 ) गाड़ी लिए तैयार मिला. नेपाली-कट, छोटी-छोटी मुस्कुराती आंखे,
चौड़ा माथा, कसरती बदन, गोरा रंग और अच्छी खासी कद-काठी के धनी इस युवक के होंठों
पर खेलती हंसी देखकर हमारा प्रसन्न होना स्वभाविक था. पूरी यात्रा के दौरान वह
हमारे साथ बना रहा. मन में कई सवाल तैरते और वह सबका समाधान करते चलता संतोष, जयगांव का रहने वाला है, जिसकी सीमा
भूटान से लगी हुए है. सामान लादा जा चुका था और अब हम ( PHUENTSHOLING ) फ़ुंस्सोल्लिंग के लिए रवाना हुए.
रात भर का ट्रेन का सफ़र फ़िर करीब चार घण्टे की लंबी सड़क यात्रा के दौरान हमें तिल मात्र भी थकावट महसूस नहीं हुई.
इसका मुख्य कारण यह भी रहा कि हम नित-नूतन होते प्रकृति के बदलाव का आनन्द लेते
हुए तिस्ता नदी के किनारे-किनारे निरन्तर आगे बढ़ रहे थे. रास्ते में पड़ने वाले एक
होटेल जे.के.फ़ेमिली रेस्टारेंट में सुस्वाद भोजन का आनन्द उठाया रास्ते में एक बार
तो हमें गाड़ी भी रुकवानी पड़ी. भूटान-हिमालयान रेंज के अद्भुत दर्शन करने को मिला.
पूरा पर्वत-शिखर बर्फ़ की पगड़ी बांधे सुहाना जो लग रहा था.
सभी ने गाड़ी से उतरकर इस विहंगम और नयनाभिराम
दृष्य को जी भर के निहारा और फ़ोटोग्राफ़्स भी उतारे. (
PHUENTSHOLING ) फ़ुंस्सोल्लिंग से महज पच्चीस-तीस मील की दूरी पर थे, तभी टूर-आपरेटर सुश्री कला गुरुंग जी ने संतोष को आदेश दिया कि वह सभी पर्यटकों के
वोटरकार्डों की छायापरति वाट्साप पर भिजवा दे, वे चाहती थीं कि जब हम यहाँ प्रवेश
करें,उससे पूर्व सभी आवश्यक दस्तावेज इमिग्रेशन आफ़िस पहुंच जाये ताकि परमिट बनाने
में लगने वाले समय को बचाया जा सके. जब हम शाम छः बजे हम टूर आपरेटर सुश्री कला
ऊर्फ़ दीक्षिका गुरुंग के आफ़िस में थे. उन्होंने मुस्कुराते हुए हम सबका भावभीना
स्वागत किया. औपचारिक चर्चाएं जिसमें भूटान टुरिस्म का विकास, लोगों का खान-पान,
फ़सलें, वेशभूषा, कुटीर उद्धोग, आर्गेनिक खेती पर सार्थक वार्तालाप हुआ और साथ ही
गरमा-गरम चाय का लुफ़्त भी हम उठाते रहे.
भारत, बांगलादेश और मालदीव के पर्यटकों को
भूटान में प्रवेश करने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं है लेकिन पासपोर्ट या मतदाता
पहचान पत्र जैसे पहचान का सबूत दिखाना पड़ता है. भूटान में प्रवेश करने के लिए
फ़ुंस्सोल्लिंग में परमिट के लिए टूरिस्ट
परमिट लेना आवश्यक है. पर्यटकों के पास-पोर्ट या मतदाता परिचय पत्र के साथ २
पासपोर्ट साइज के फ़ोटो होना अनिवार्य है. टुरिस्ट परमिट निंशुल्क जारी किए जाते
हैं. मतदाता परिचय के साथ फ़ोटोग्राफ़्स हम पहले ही भेज चुके थे. सुश्री गुरुंग ने अपनी
सहायिका कु. तुलासा को पहले से ही इस काम के लिए नियुक्त कर रखा था, कुछ ही समय
में हमारा परमिट बनकर तैयार हो गया. परमिट प्राप्त करने के पश्चात हम रात्रि
विश्राम के लिए स्थानीय थ्री स्टार होटेल “दि आर्चेड होटल” जो पहले से ही आरक्षित
की जा चुकी थी, पहुंचकर हमने रात्रि विश्राम किया.
13 नवम्बर 2017- “दि आर्चिड होटेल” में रात्रि विश्राम.
सुबह नाश्ते के बाद हमारी
मुलाकात इस होटेल के मैनेजर श्री डेटू से मुलाकात की. हिन्दी बोलने-समझने वाले
श्री डॆटू से भूटान की कई जानकारियां प्राप्त की. इसी समय हमारी मुलाकत कार्यालय
में कार्यरत सुश्री नामगे हामो .आप बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेती है. हमने जानकारी
पाप्त करनी चाही कि बोलने के अलावा वे हिन्दी लिखना-पढ़ना भी जानती हैं कि नहीं?
उन्होंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि वे हिन्दी में लिख और बोल सकती है. श्री
कोरी और मैंने उनके साथ फ़ोटॊ शेयर की और हिन्दी भवन भोपाल से प्रकाशित “अक्षरा” की
और कोरी का कहानी संग्रह” मैं कहता आंखन देखी” भेंट में दी. चुंकि संतोष के आगमन में देरी थी, अतः हमने स्कूल जा रहे छात्रओं से हिन्दी
में बातें कीं . वे साफ़-साफ़ हिन्दी में बातें कर रहे थे. जब हमने हिन्दी में लिखने
की और पढ़ने की बात की तो उन्होंने बड़ी सहजता से बतलाया कि उनके अबिभावक हिन्दी
जानते हैं, बोलते हैं तो उन्हें भी आती है. चुंकि स्कूलों में हिन्दी नहीं सिखाई
जाती, अतः वे लिखना और पढ़ना नहीं जानते. हमने उन्हें हिन्दी लिखना सीखने और-पढ़ने
के लिए आग्रह किया. सभी बच्चे-बच्चियां अपनी भूटानी वेशभूषा में नजर आ रहे थे. भूटान
की राष्ट्रभाषा झोंगखा है. इसके अलावा वहाँ अंग्रेजी, हिन्दी और नेपाली भी बोली
जाती है. अच्छी तरह हिन्दी जानने के बावजूद भी यहां के लोग हिन्दी लिखना-पढ़ना नहीं
जानते. हमने बच्चों को हिन्दी सीखने-लिखने के लिए प्रेरित किया. बच्चे हमसे मिलकर
बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहे थे. उन्होंने अपनी भाषा में अपना नाम स्वयं अपने
हाथों से लिखकर हमें दिया और हमारे साथ फ़ोटोग्रुप भी लिया. बच्चों के नाम श्री
नामगे दोरजी, सागर,तनदीन नाम्ग्याल, केवेल्वांग नामग्याल भिनते, किनले दोरजी आदि
थे.
शाम छः बजे के करीब (14-11-2017) हम भूटान की राजधानी थिंपू पहुंच गए.
हमें होटल समभाव चुबाचु के ठहराया गया. हम समुद्र सतह से लगभग 13,000 फ़ीट की ऊंचाई पर थे. जाहिर है कि यहां का तापमान चार-पांच डिग्री के लगभग
था. रात होते ही पारा लुढ़कर (-) माइनस डिग्री पर पहुंच चुका था. कमरे में लगा हीटर
भी नाकारा सिद्ध हो रहा था. गाम कपड़े और मोटी रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड लग रही थी.
सुबह जब हमने मैनेजर से पूछा कि ऎसे मौसम में कौन भला यहां आना चाहेगा. उसने
बतलाया कि न्यु-कपल्स इस सीजन में ज्यादा आते हैं,.
१४-११-२०१७
थिंफ़ू चोरटेन
थिंफ़ू चोरटेन
शहर के
दक्षिण-मध्य भाग में स्थापित मेमोरियल स्तूप जिसे थिम्फ़ू चोर्टेन के रुप में भी
जाना जाता है, डुक ग्यालपो, जिग्मे दोरोजी वांगचुक को सम्मानित करने के लिए इसकी
स्थापना १९७४ में तत्कालीन राजमाता के द्वारा निर्मित किया गया था. चंगनखा टेम्पल,
झिलुखा नुनेरी तथा ताशीछॊडोंग महल और मंत्रियों के आवासों को निहारते कब शाम ढल
आयी, पता ही नहीं चल पाया. शाम के घिरते ही हम
अपनी होटेल “संभाववा” लौट आए.
पुनाखा-
3900 फ़ीट की
ऊंचाई पर स्थित है पुनाखा. यहां दो नदियां बहती है जिनके नाम है क्रमशः पोचू और
माचू. इन्हीं नदियों की ऊंची-नीची घाटियों में चावल की खेती की जाती है. लाल और
सफ़ेद किस्म का चांवल यहां बहुतायत में होता है. भिक्षुओं के आवास के साथ ही यह
धार्मिक केन्द्र भी है. भूटान के संस्थापक शबदरुंग नगवांग नामग्याल के समय यह
भूटान की राजधानी रही है. आपका पार्थिव शरीर यहाँ एक कक्ष में रखा हुआ है. यहां
ऎतिहासिक इमारते देखी जा सकती हैं. बागानों मे जैविक सब्जियों के साथ ही संतरा,
पपिता और सेव जैसे फ़लों वाले पौधे होते हैं.
(khamsum
yulley namgyal chorten)
खामसम
यूलली नामग्याल चोंने
खामसुम यूलली नामग्याल Chorten Punakha घाटी
के ऊपर एक सुंदर रिज पर बाहर खड़ा है . इस 4 मंजिला मंदिर के निर्माण के लिए इंजीनियरी मैनुअल से सलाह लेने के बजाय 9
सालों का निर्माण और पवित्र ग्रंथों को लेकर विचार किया गया। यह भूटानी वास्तुकला और कलात्मक परंपराओं का एक बढ़िया उदाहरण है। यह मंदिर राज्य के उत्थान, उसके लोगों और सभी
संवेदनशील प्राणियों के लिए समर्पित किया गया है। भूटान
देश की बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से इस स्तूप का निर्माण क्वीन मदर असी
तशेरिंग यंगडोन ने सन २००४ में बनवाया था. इसका बाहरी भाग स्तूप की तरह एक शिवालय
के रुप में होता है. बर्ट्सम लामा कुनज़ांग वांगडी , जिसे एचएम डुडोजोम रिनपोछे केएक करीबी शिष्य लमा निंगकुला के रूप में जाना
जाता था, इस चोंने के निर्माण के प्रभारी थे। यहाँ से खड़े
होकर आप भूटान-हिमालयान रेंज के दर्शन कर सकते हैं. नीले पहाड़ों की श्रृंखला जिनका
शिखर बर्फ़ से ढंका देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो उठता है.
सितमोका झोंग (' ड्जोंग ' का अर्थ "महल-मठ")
भी संगक जब्धन फोड्रांग (
भूटानी भाषा अर्थ: "गुप्त मंत्रों का गहरा
अर्थ का पैलेस") एक छोटा झांग है । यह 1629 में ज़बदुरंग न्वांग नामग्याल द्वारा बनाया गया था, जो भूटान एकीकृत था। यह भूटान में निर्मित अपनी तरह का पहला है एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारक और पूर्व बौद्ध मठ,
आज यह एक प्रमुख झोंगखा भाषा शिक्षण
संस्थानों में से एक है। यह हाल ही में
पुनर्निर्माण किया गया
सिततोंखा
झोंग
सितमोंखा झोंग का अर्थ
होता है “महल मठ”. और एक अर्थ में गुप्त मंत्रों का पैलेस है. बुद्ध के छवि जिसे
शाक्यमुनि के नाम से जाना जाता है. इसमें आठ बोधिसत्व है. यहां स्थापित हैं. यह
भूटान का सबसे पुराना मठ है. इसका निर्माण 1627 में हुआ था. इसे अब एक स्कूल में परिवर्तित कर दिया गया जहां छात्र को
धर्म आधारित ज्ञान दिया जाता है.
राष्ट्रीय संग्रहालय- टा
झोंग(Ta Dzong)
पश्चिमी
भूटान में पारों शहर में एक सांस्कृति संग्रहालय है. १९६८ में पुनर्निर्मित भवन
महामहिम जिग्मे दोरजी वांगचूक के समय के भूटानी परंपरा कला के बेहतरीन नमूने,
कास्य मूर्तियां, सुन्दरतम मुखौटे,सुन्दर पेंटिग, डाक-टिकटें आदि संग्रहित की गई
हैं. ऊंचाई पर होने के कारण इसका उपयोग बाच-टावर ( 1627) के रुप में होता था. अब इसे बदलकर संग्रहालय बना दिया गया है. आज राष्ट्रीय संग्रहालय
ने भूटानी कला के 3,000 से
अधिक कामों के अपने कब्जे में है, जो कि भूटान की सांस्कृतिक
विरासत के 1500 से अधिक वर्षों तक शामिल है। विभिन्न रचनात्मक परंपराओं और
विषयों की इसकी स्मृद्ध धारण वर्तमन के साथ अतीत की एक उल्लेखनीय मिश्रण का
प्रतिनिधित्व करती है और स्थानीय और विदेशी पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण का केन्द्र
है.
सुबह का लंच. नौ बजे के करीब
”थिंफ़ु” (THIMPHU) के लिए रवाना हुए.
थिंफ़ू
१९६१ में भूटान की राजधानी बनाई गई थी जो विश्व की तीसरी सर्वाधिक ऊँचाई पर बसी
राजधानी थिंपू ( २,२४८ मीटर-२,६४८ मीटर) है. पर्यटक सड़क मार्ग से अथवा हवाई मार्ग
से यहाँ पहुंच सकता है. वांगछू नदी के किनारे बसे इस शहर के केन्द्र में चार
समानान्तर सड़कें हैं. पारम्परिक विकास और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाये हुए थिंपू
की इन्हीं सड़कों पर मुख्य बाजार, रेस्तरां, शासकीय कार्यालय, स्टेडियम, बागीचे तथा
कई दर्शनीय स्थल हैं. रिहायशी इलाका घाटी में दूर-दूर तक फ़ैला है. आधुनिकता की दौड़
में शामिल इस शहर में बहुमंजिला इमारतें, एवं अपार्टमेन्ट्स काफ़ी तादात में बन रहे
हैं. पुरुष एवं महिलायें अपनी पारम्परिक
पोषाक में नजर आते हैं. अपनी राष्ट्रभाषा जोंगखा के अलावा इन्हें हिन्दी में महारत
हासिल है. जहाँ वे एक तरफ़ हिन्दी बोलते-बतियाते तो हैं लेकिन लिखना और पढ़ना इन्हें
नहीं आता. शहर से ५४ किमी दूर पारो हवाई अड्डा है, जो चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ
है. ऊपर से देखने पर यह एक कटोरे की भांति प्रतीत होता है. रन-वे भी काफ़ी छोटा है
अतः पायलट हो हवाई जहाज उतारते समय अतिरिक्त सावधानियां बरतनी पड़ती है. जरा सी भी
लापरवाही से जहाज सामने खड़े पहाड़ से टकरा भी सकता है.
शाम 6.30 बजे के करीब हम भूटान की राजधानी थिंपु पहुंचे.
यहाँ हमारे लिए “होटेल समभाव” में रुकने-ठहरने की व्यवस्था की गई थी. अब हम समुद्र
सतह से 13,000 फ़ुट की ऊंचाई पार थे. मौसम खुश्क था और पारा 2 डिग्री शेलशियस बतला रहा था. चार-पांच गरम कपड़ों को पहिनने के बाद भी ठंड
अपना प्रभाव बतला रही थी. रात के लगभग यहाँ का तापमान (-) माइनस डिग्री पर था.
होटेल मैनेजर ने बतलाया कि इस भीषण ठंड में केवल यंग कपल्स ज्यादा आते हैं, वैसे
यह समय आफ़-सीजन का चल रहा है. माह अप्रैल के आते ही यहाँ सैलानियों की भीड उमड़ने
लगती है. बड़ी संख्या में भारत से लोग यहाँ पहुंचते हैं.
थिंपू शहर लगभग 13,000 फ़ीट की उंचाई पर बसा हुआ है, रास्ते में हमें केन्दीय विध्यालय देखने को
मिला. इस स्कूल में लड़के, लड़कियां पढ़ती हैं. इतनी अगम्य उंचाई पर आकर पढ़ाई के
प्रति समर्पण का भाव इन बच्चों में देखकर आश्चर्यचकित हो जाना स्वभाविक ही था.
हमनें गाड़ी रोककर बच्चों से बाते कीं. उनके सिलेबस पर चर्चाएं कीं. सभी बच्चे
हिन्दी तो अच्छी खासी बोल लेते हैं लेकिन लेखना-पढ़ना नहीं जानते. सुह्री पूजा,
पूर्णिमा,ईशे, सरिता, निलमय, मीरा आदि बच्चिंयो के साथ फ़ोटोग्रुप भी लिये.
फ़ुस्सोलिंग से थिंपू के रास्ते में पाइन के
सघन वन देखकर मन प्रसन्नता से झूम उठा. ये पाइन के वृक्ष
8,000 फ़ीट की ऊंचाइयों पर ही पाए जाते हैं.
साथ ही डेंटाफ़ वाटरफ़ाल देखने को मिला. यहाँ पर
बन्दरों की अच्छी खासी भीड़ भी देखने को मिली.
शाम छः बजे के करीब (14-11-2017) हम भूटान की राजधानी थिंपू पहुंच गए.
हमें होटल समभाव चुबाचु के ठहराया गया. हम समुद्र सतह से लगभग 13,000 फ़ीट की ऊंचाई पर थे. जाहिर है कि यहां का तापमान चार-पांच डिग्री के लगभग
था. रात होते ही पारा लुढ़कर (-) माइनस डिग्री पर पहुंच चुका था. कमरे में लगा हीटर
भी नाकारा सिद्ध हो रहा था. गाम कपड़े और मोटी रजाई ओढ़ने के बाद भी ठंड लग रही थी.
सुबह जब हमने मैनेजर से पूछा कि ऎसे मौसम में कौन भला यहां आना चाहेगा. उसने
बतलाया कि न्यु-कपल्स इस सीजन में ज्यादा आते हैं,.
.
15-11-2017- सुबह गरमा-गरम
नाश्ता करने के बाद हम टेक्सटाईल म्युजियम, 1972 में रायल
स्वीन मदर के द्वारा तृतीय किंग की याद में बनाया गया मेमोरियल देखा. थिंपु शहर के
पास ही हमने बुद्धा टेम्प्ल देखा.
टेक्सटाईल म्युजियम
बुनाई की कला को जीवित रखने और संरक्षित करने के लिए इस म्युजियम की स्थापना की गई थी.
यह हर महास्त्री आस्थी संगे गंगचुक के रंरक्षण के तहत, यह गैर सरकारी, गैर लाभकारी
संस्थ है, जो भूटानी बुनाई में व्यक्तियों को प्रशिक्षण के लिए एक शैक्षणिक
केन्द्र के रुप में स्थापैत है. संग्रहालय में भूटान के आकर्षक एतिहासिक प्रदर्शन,
विभिन्न क्षेत्रों से महिलाओं की किररा और मैन्स घोस प्रदान करता है. खूबसूरत
भूटानी व्स्त्रों का भी यहां प्रदर्शित किया गया है
बुद्धा पाईंट
बुद्धा पाईंट- थिंपू शहर के निकट
दक्षिणी भाग में एक ऊंची पहाड़ी पर बुद्ध की 51.5 मीटर अर्थात 169 फ़ीट ऊंची विशालकाय धातु प्रतिमा एक
ऊंचें अधिष्ठान पर स्थापित है. यहाँ के शिंपूम शहर की खूबसूरती देखते ही बनती है.
भुटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक की साठवीं वर्षगांठ पर बुद्ध (
शाकमुनी) की भव्य प्रतिमा 169 फ़ुट यानी 52मीटर, 1000,000 इंच ऊँचाई और 25,000.12
इंच लंबी मुर्ति की स्थापना की गई. इसका निर्माण 2006 में शुरु हुआ और 2010 में
बनकर तैयार हुआ. सोने के पालिश में बुद्ध की विशाल प्रतिमा, विशाल प्रांगण में चारों तरह सोने के पालिश से
सुन्दर नारी प्रतिमाएं और अपनी पारंपरिक परिकल्पना में बना भव्य पूजा-गृह देखकर आनन्द
द्विगुणित हो उठता है. इस प्रतिमा के निर्माण की कुल लागत S-
47 मिलियन की लगत से चीन के नानाजिंग के.एयरोसुन कारपोरेशन
के द्वारा किया गया था,जबकि परियोजना कुल लगत 100 मिलियन
अमेरिकी डालर की आंकी गई थी. प्रायोजकों के नाम ध्यान हाल में प्रदर्शित किए गए है
जो इस बुद्ध की प्रतिमा आदि के निर्माण में सहयोगी थे. विशाल कुएंसेल फ़ादरांग नामक
प्रकृति पार्क जो करीब 943.4 एकड़ वन क्षेत्र में फ़ैला हुआ
है.
चांग मानेस्ट्री-
इस बौद्ध मठ की स्थापना 12 वीं शताब्दी में एक ऊंची पहाड़ी पर लामा फ़ाजो रुजौम
शिगपो द्वरा की गई थी. मंदिर परिसर से शिंपू शहर का विहंगम दृष्य दिखाई देता है.
मन्दिर के चारों ओर 108 मंत्रोंसे सुसज्जित हाथ से घुमाने
वाले चकरी देखने को मिली. ऎसी मान्यता है कि इसे घुमाने से सारे पापों का अंत हो
जाता है. इसी मन्दिर के परिसर में हमारी मुलाकात एक भूटानी महिला सुश्री तिला रूपा
छेत्री जी से हुई. आपने हिन्दी में भूतान की बहुत सारी बातों को बतलाया और हमारी
डायरी में शुभकामनां संदेश लिखकर दिया.
मोतीथंग- रायल ताकिन संरक्षित वन
मोतीथंग- रायल ताकिन संरक्षित वन क्षेत्र- 15 वीं शताब्दी में ताकिन को भूटान
का राष्ट्रीय पशु घोषित किया था. ताकिन के अलावा यहां पर हिरण, बारहसिंघे देखे जा
सकते है. पूरा वन क्षेत्र मिनिस्ट्री आफ़ एग्रीकल्चर-फ़ारेस्ट के अन्तरगत आता है.
फ़ोक हेरिटेज म्युजियम.
फ़ोक हेरिटेज म्युजियम-
28 जुलाई २००१ में इस संग्रहालय
की स्थापना की गई थी. इसमें भूटान की ग्रामीण संस्कृति और जीवन जीने के तरीके
संबंधी अनेकानेक सामग्रियों को प्रदर्शित किया है. प्रदर्शनी में घरों की
कलाकृतियां, उपकरण तथा अनेकानेक वस्तुएं
संग्रहित की गई हैं. यहाँ कार्यरत महिलाकर्मियो-सुश्री अंजल, सनम और संगी से कई
विषयों पर जानकारियां प्राप्त हुई. 19वीं शताब्दी के एक तीन
मंजिला घर को उस मूल स्वरुप में ही संरक्षित किया गया है. यह घर मिट्टी एवं लकड़ी
से बना है.
नेशनल स्टेडियम थिंपु
शाम घिरने को थी और हम नेशनल
स्टेडियम के सामने खड़े थे. तीरंदाजी और फ़ुटबाल खेल के लिए इसमें युवा खिलाड़ियों की
अच्छी खासी भीड होती है. इनका उत्साह देखते ही बनता है. इसी बीच हमारी मुलाकात
सेक्युरिटी अफ़सर श्री मणिकुमार जी से भेंट हुई. मिलकर प्रसन्नता हुई और वे हमें
गेट बंद होने के बवजूद खेल मैदान में ले गए जहाँ तीरंदाजी में प्रवीण खिलाड़ियों के
मध्य 150 मीटर की दूरी पर लगे पाईण्ट पर निशाना साधने का
उपक्रम कर रहे थे. देर तक इस रोचक खेल को देखने के बाद हम अपनी होटेल “संभाव” के
लिए रवाना हुए.
16-11-2017 दोचुला पास
दोचुला
-रात्रि विश्राम के बाद सुबह का
नाश्ता-चाय लेने के बाद हम 10.25 बजे
पुनाखा शहर के लिए रवाना हुए जो यहाँ से 82 किमी की दूरी पर
अवस्थित है. पुनाखा के रास्ते में दोचुला पास पर बने, समुद्र सतह से 3020 मीटर पर बने बौद्ध मन्दिर और 108 कलात्मक स्तूपों
जो उल्फ़ा उग्रवादियों से लड़ाई करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए भूटानी सैनिकों की
याद में बनाए गए थे. एक तरफ़ यह विशालकाय निर्माण तो दूसरी ओर भूटान-हिमालयान रेंज
की बर्फ़ीली चोटियों को देखकर सारी थकावट दूर हो जाती है.
लोवेसी वेली-
रास्ते में लोवेसी-पुनाखा में
प्लेट्स खेती (टेरेस फ़ार्मिंग) के भव्य नजारे देखने को मिले . किस तरह यहाँ के
किसान पहाड़ों को काटकर प्लेट्स बनाकर खेती करते हैं. सभी खेतों में चावल बोया गया
था. इसी तरह की खेती पुनाखा और पारो में भी होती है. इन विहंग्रम दृष्यों को
निहारते हुए अब हम पहाड़ के उस निचले हिस्से (तल) में उतर रहे थे,जहाँ मोचू नदी
अपनी तेज गति लिए हुए पहाड़ों से उतरकर बहती है.
मोचू में 14 किमी की राफ़्टिंग.
भूटान-हिमालयान रेंज से निकलने
वाली दो नदियों माचू और पोचू अलग-अलग दिशाओं में बहती हुए डिस्ट्रिक आफ़िस से कुछ
दूरी पर जाकर आपस में मिल जाती है. मोचू नदी में हमने करीब चौदह किमी.लंबे
राफ़्टिंग का आनन्द उठया. निश्चित रुप से यह खेल हम लोगों के लिए जीवन में पहला
रोमंचकारी -जोखिम भरा उपक्रम था. नदी के बर्फ़िले और तेज गति से बहती नदी की जलधारा
में कभी भींगते तो कभी गहरी गहराई में उछलकर आगे बढ़ना और शौटिंग करते हुए आनन्दित
होते रहे. शाम घिर आयी थी और हम लौट चले थे अपनी होटेल पुनाखा रेसिडेंसी की ओर.
रास्ते में कुछ समय रुकते हुए
हमने भुटानी पोषाक पहनकर फ़ोटॊ शूट किये.
\
(बाएं से दाएं-
श्री अरुण अनिवाल, गिरजाशंकर दुबे, नर्मदा प्रसाद कोरी, गोवर्धन यादव, राजेश्वर
अनादेव,एवं चौरसिया.)
फ़ोटो शूंटिंग के बाद हम लौट पड़ते
हैं अपनी होटेल पुनाखा रेसिडेंस की ओर. भोजन आदि से निवृत्त होकर यहाँ विश्राम
किया.
अचानक सुबह मेरी नींद खुल गई.
मैंने अपने कमरे की बालकनी से सुबह का अद्भुत नजारा देखा. आसमान से बादल जमीन पर
उतर आए थे और उन्होंने समूचे पहाड़ों को और सूरज के गोले को अपनी बांहों में भर
लिया था. हलका-हलका, लाल-गुलाबी चमाचमाते सूरज के गोले को देखकर मन खुश हो गया.
kharbandi
goempa (खारबांडी गूंफ़ा) डैम
खारबांडी मठ- 1
967 में अही चुडॆरान द्वारा स्थापित और चार सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस
सुन्दर मठ में बुद्ध के जीवन, शाबुदंग न्वांग नाम्गयांल और गुरु रिनपोछे की
मूर्तिया स्थापित हैं, डैम तथा थिंफ़ू के विहंगम दृष्यों को जी भर के निहारने के
बाद हम होटेल लौट आए थे.
Rinpung Dzong (रिनपोंग मठ )
रिंगपोंग जोंग का अर्थ है गहने के ढेर का गढ़. १५
वीं शताब्दी में इसका निर्माण किया गया था. १६ वी-१७ वीं शताब्दी मे दौरान उत्तर
दिशा से होने वाले आक्रमणॊं के खिलाफ़ एक गढ़ के रुप में इसका इस्तेमाल होता था.
रिनफ़ुंग जोंग पारो जिले का मुख्यालय है. १६४४ में इसका निर्माण किया गया था.
हा घाटी.
उत्तर से दक्षिण की
ओर फ़ैली इस घाटी का नाम “हा” है. जिसे ह ह भी कहा जाता है. इस घाटी में चांवल के
अलावा गेंहू,जौ,आलू,चेली और सेब की फ़लस बोई जाती है. प्रत्येक घर में याक और
मवेशी, मूर्गियां, सुअरें और घोड़े पाए जाते हैं. सघन वन संपदायहां की अर्थव्यवस्था
को सुदृढ़ बनाती है. पूरी घाटी में पाईन के वृक्ष बहुतायत में देखे जा सकते हैं.
घुमावदार सड़कों के साथ-साथ सघन वनों को निहारकर पर्यटक एक विशेष आनन्द का अनुभव
करता है.
Kyichu Lhakhang ( कैचु हाथांग)
पारो के बाहर भूटान
का सबसे पुराना मन्दिर है. एक किंवदंती है कि हिमालय के इस क्षेत्र में एक विशाल
राक्षस रहता था, जो बौद्ध धर्म के प्रचार को रोल रहा था. इस विपदा को दूर कने के
लिए तिब्बत के राजा सोंगस्टेन गम्पो द्वारा ७ वीं शताब्दी में १०८ मन्दिरों का
निर्माण कराया. इसे भूटान का पवित्र गहना माना जाता है. यह भी कहा जाता है इनका
निर्मान एक रात में हुआ था. यहाँ से खड़े होकर आप बर्फ़ से ढंके भूटान-हिमालयान रेंज
को अपनी खुली नजरों से देख सकते हैं. प्रकृति का सुन्दर और भव्य स्वरुप देखकर
पर्यटक मंत्रमुग्ध हो उठता है.
पहाड़ी के पास ही एक
बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें हिमालय की विभिन्न चोटियों कितनी-कितनी ऊंचाइयों पर
है, जो बर्फ़ की चादर ओढ़े हुए है, दर्शाया गया है.
फ़ुस्सोलिंग से थिंपू के रास्ते में पाइन के
सघन वन देखकर मन प्रसन्नता से झूम उठा. ये पाइन के वृक्ष
8,000 फ़ीट की ऊंचाइयों पर ही पाए जाते हैं.
साथ ही डेंटाफ़ वाटरफ़ाल देखने को मिला. यहाँ पर
बन्दरों की अच्छी खासी भीड़ भी देखने को मिली.
थिंफ़ू चोरटेन
शहर के दक्षिण-मध्य
भाग में स्थापित मेमोरियल स्तूप जिसे थिम्फ़ू चोर्टेन के रुप में भी जाना जाता है,
डुक ग्यालपो, जिग्मे दोरोजी वांगचुक को सम्मानित करने के लिए इसकी स्थापना १९७४
में तत्कालीन राजमाता के द्वारा निर्मित किया गया था. चंगनखा टेम्पल, झिलुखा
नुनेरी तथा ताशीछॊडोंग महल और मंत्रियों के आवासों को निहारते कब शाम ढल आयी, पता
ही नहीं चल पाया. शाम के घिरते ही हम अपनी
होटेल “संभाववा” लौट आए.
15-11-2017-
सुबह गरमा-गरम नाश्ता
करने के बाद हम टेक्सटाईल म्युजियम देखा.
वस्त्र संग्रहालय
थिंपू भुटान- एक राष्ट्रीय कपड़ा संग्रहालय है जो कि भूटान के राष्ट्रीय पुस्तकालय
के पास स्थित है. राष्ट्रीय मामलों के राष्ट्रीय आयोग द्वारा संचालित होता है. 2001 में इसकी स्थापना के बाद संग्रहालय ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पह्चान
बनायी है. प्राचीन कपड़ा कलाकृतियों को इसमें सहज कर रखा गया है. इसका उद्देश्य
कपड़ा कला कलाकृतियों को बढ़ावा देने, अनुसंधान करने और अध्ययन का केन्द्र बन चुके
इस संग्रहालय में बड़ी संख्या में भूटानी पारंगत हो रहे है.
थिंपू
चोर्टेन
(२) 1972 में रायल क्वीन मदर के द्वारा तृतीय किंग की याद में बनाया गया मेमोरियल
देखा.
मेमोरियल
स्तूप जिसे थिम्फ़ू चोर्टेन के रुप में भी जाना जाता है. भूटान में मुख्य स्तम्भ और
भारतीय सैन्य अस्पताल के निकट शहर के दक्षिणी-मध्य भाग में स्थित दूबूम लैम पर
स्थित एक स्तूप ( झोंगखा चोंने , चेटेन ) है. 1974 में तीसरा ड्रुक ग्यालपो , जिग्मेदोरोजी वांगचुक (1 928-19 72) को सम्मानित करने के लिए बनाया गया स्तूप शहर में अपनी स्वर्ण (spiers)
और घंटी के साथ एक प्रमुख मील का पत्थर है.] 2008
में, यह व्यापक पुनर्निर्माण किया गया.
यह लोकप्रिय रूप से
"भूटान में सर्वाधिक दृश्यमान धार्मिक मील का पत्थर" के रूप में जाना
जाता है. यह डूडजम जिग्रादल यहेह डोर्जे द्वारा पवित्र किया गया था.
बुद्धा पाईंट
थिंपु शहर के पास ही हमने बुद्ध को समर्पित
मन्दिर देखा
.
बुद्धा पाईंट-
थिंपू शहर के निकट दक्षिणी भाग में एक ऊंची
पहाड़ी पर बुद्ध की 51.5 मीटर अर्थात 169 फ़ीट ऊंची विशालकाय धातु प्रतिमा एक ऊंचें अधिष्ठान पर स्थापित है. यहाँ के
शिंपूम शहर की खूबसूरती देखते ही बनती है. भुटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये
वांगचुक की साठवीं वर्षगांठ पर बुद्ध ( शाकमुनी) की भव्य प्रतिमा 169 फ़ुट यानी 52मीटर, 1000,000 इंच
ऊँचाई और 25,000.12 इंच लंबी मुर्ति की स्थापना की गई. इसका निर्माण 2006 में शुरु हुआ और 2010 में बनकर तैयार हुआ. सोने के पालिश में बुद्ध की विशाल प्रतिमा, विशाल प्रांगण में चारों तरह सोने के पालिश से
सुन्दर नारी प्रतिमाएं और अपनी पारंपरिक परिकल्पना में बना भव्य पूजा-गृह देखकर
आनन्द द्विगुणित हो उठता है. इस प्रतिमा के निर्माण की कुल लागत S- 47 मिलियन की लगत से चीन के नानाजिंग के.एयरोसुन
कारपोरेशन के द्वारा किया गया था,जबकि परियोजना कुल लगत 100
मिलियन अमेरिकी डालर की आंकी गई थी. प्रायोजकों के नाम ध्यान हाल में प्रदर्शित
किए गए है जो इस बुद्ध की प्रतिमा आदि के निर्माण में सहयोगी थे. विशाल कुएंसेल
फ़ादरांग नामक प्रकृति पार्क जो करीब 943.4 एकड़ वन क्षेत्र
में फ़ैला है.
चांग
मानेस्ट्री-
इस बौद्ध मठ की स्थापना 12 वीं शताब्दी में एक ऊंची पहाड़ी पर लामा फ़ाजो रुजौम शिगपो द्वरा की गई थी.
मंदिर परिसर से शिंपू शहर का विहंगम दृष्य दिखाई देता है. मन्दिर के चारों ओर 108 मंत्रोंसे सुसज्जित हाथ से घुमाने वाले चकरी देखने को मिली. ऎसी मान्यता
है कि इसे घुमाने से सारे पापों का अंत हो जाता है. इसी मन्दिर के परिसर में हमारी
मुलाकात एक भूटानी महिला सुश्री तिला रूपा छेत्री जी से हुई. आपने हिन्दी में
भूतान की बहुत सारी बातों को बतलाया और हमारी डायरी में शुभकामनां संदेश लिखकर
दिया.
मोतीथंग- रायल
ताकिन संरक्षित वन
मोतीथंग-
रायल ताकिन संरक्षित वन क्षेत्र- 15 वीं शताब्दी में ताकिन को भूटान का राष्ट्रीय
पशु घोषित किया था. ताकिन के अलावा यहां पर हिरण, बारहसिंघे देखे जा सकते है. पूरा
वन क्षेत्र मिनिस्ट्री आफ़ एग्रीकल्चर-फ़ारेस्ट के अन्तरगत आता है.
]
फ़ोक
हेरिटेज म्युजियम.
28 जुलाई २००१ में इस संग्रहालय की स्थापना
की गई थी. इसमें भूटान की ग्रामीण संस्कृति और जीवन जीने के तरीके संबंधी अनेकानेक
सामग्रियों को प्रदर्शित किया है. प्रदर्शनी में घरों की कलाकृतियां, उपकरण तथा
अनेकानेक वस्तुएं संग्रहित की गई हैं. यहाँ
कार्यरत महिलाकर्मियो-सुश्री अंजल, सनम और संगी से कई विषयों पर जानकारियां
प्राप्त हुई. 19वीं शताब्दी के एक तीन मंजिला घर को उस मूल
स्वरुप में ही संरक्षित किया गया है. यह घर मिट्टी एवं लकड़ी से बना है.
नेशनल स्टेडियम थिंपु
शाम घिरने को थी और हम नेशनल स्टेडियम के
सामने खड़े थे. तीरंदाजी और फ़ुटबाल खेल के लिए इसमें युवा खिलाड़ियों की अच्छी खासी
भीड होती है. इनका उत्साह देखते ही बनता है. इसी बीच हमारी मुलाकात सेक्युरिटी
अफ़सर श्री मणिकुमार जी से भेंट हुई. मिलकर प्रसन्नता हुई और वे हमें गेट बंद होने
के बवजूद खेल मैदान में ले गए जहाँ तीरंदाजी में प्रवीण खिलाड़ियों के मध्य 150 मीटर की दूरी पर लगे पाईण्ट पर निशाना साधने का उपक्रम कर रहे थे. देर तक
इस रोचक खेल को देखने के बाद हम अपनी होटेल “संभाव” के लिए रवाना हुए.
16-11-2017 दोचुला पास
दोचुला --
रात्रि विश्राम के बाद सुबह का नाश्ता-चाय
लेने के बाद हम 10.25 बजे पुनाखा शहर के लिए
रवाना हुए जो यहाँ से 82 किमी की दूरी पर अवस्थित है. पुनाखा
के रास्ते में दोचुला पास पर बने, समुद्र सतर्ह से 3020 मीटर
पर बने बौद्ध मन्दिर और 108 कलात्मक स्तूपों जो उल्फ़ा
उग्रवादियों से लड़ाई करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए भूटानी सैनिकों की याद में
बनाए गए थे. एक तरफ़ यह विशालकाय निर्माण तो दूसरी ओर भूटान-हिमालयान रेंज की
बर्फ़ीली चोटियों को देखकर सारी थकावट दूर हो जाती है.
लोवेसी वेली-
रास्ते में लोवेसी-पुनाखा में प्लेट्स खेती
(टेरेस फ़ार्मिंग) के भव्य नजारे देखने को मिले . किस तरह यहाँ के किसान पहाड़ों को
काटकर प्लेट्स बनाकर खेती करते हैं. सभी खेतों में चावल बोया गया था. इसी तरह की
खेती पुनाखा और पारो में भी होती है. इन विहंग्रम दृष्यों को निहारते हुए अब हम
पहाड़ के उस निचले हिस्से (तल) में उतर रहे थे,जहाँ मोचू नदी अपनी तेज गति लिए हुए
पहाड़ों से उतरकर बहती है.
मोचू में 14 किमी की राफ़्टिंग.-
भूटान-हिमालयान रेंज से मोचू
नदी अपनी तीव्र गति से बहती हुए आती है. इस नदी में हमने करीब चौदह किमी. की
राफ़्टिंग की. जीवन में यह पहला अवसर था जब हमने राफ़्टिंग की. सभी मित्रों में गजब
का उत्साह था. शुरु में थोड़ा
डर सा लगा लेकिन नाव पर सवार होते ही डर उड़छू हो गया. अब भय की जगह आनन्द ने ले ली
थी. रास्ते में हमने पारो से आयी नदी माचो
औय्र थिंपू से आयी वांचू नदी का संगम ( chuson) भी देखा. यहां पर नेपाली, भूटानी और तिब्बत शैली के बने हुए स्तूप देखे.
17-11-2017.
शाम घिर आई थी और हम अपने
होटेल ’पुनाखा रेजिडेन्सी” में लौट रहे थे. शाम का सुस्वादु भोजन करने के बाद हमने
रात्रि विश्राम किया. सुबह उठकर हमनें अपनी बालकनी से बाहर का अद्भुत नजारा देखा.
बादल जमीन पर उतरते हुए आगे बढ़ रहे थे. समूचा शहर धुंधलके में नहा रहा था. सुबह का
नाश्ता-चाय-पानी लेकर अब हमें अपने अगले पड़ाव पारो की ओर बढ़ना था. भूटान की
राजधानी पारो यहाँ से 135 किमी.की
दूरी पर है. सुबह के साढ़े दस बज रहे थे और हमारा सामान लादा जा चुका था. जैसे ही
यहां के स्टाफ़ के लोगों को हमारे जाने की खबर लगी. सरा स्टाफ़ हमें मुस्कुराता हुआ
बिदा देने के लिए तैयार खड़ा था.
.यहाँ का स्टाफ़ काफ़ी सुसंस्कृत-हंसमुख और
मिलनसार है. उन्होंने हमसे साथ में फ़ोटोग्रुप लेने का अनुरोध किया.जिए हमने शर्ष
स्वीकार किया और तस्वीरें लीं.
पारो-
पारो
नगर एक ऐसा स्थान है जहां पर्यटक सदैव आते रहते हैं। यहाँ की सांस्कृतिक छवि
पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहाँ भूटानी लोगों का रहन सहन का स्तर उच्च है
क्योंकि यहां पर्यटको के आवागमन के कारण डॉलरों में लोगों की कमाई होती है। पारो
जिले का मुख्य बाजार भी है, अतः यहाँ काफ़ी चहल-पहल भी देखी जा सकती है. भूटान का
राष्ट्रीय संग्रहालय होने के कारण पर्यटक यहां भूटान की संस्कृति का अध्ययन करने
आते हैं।
पारो एअरपोर्ट-
,
चारों तरफ़ से घिरे ऊँचे-ऊंचे
पहाड़ों के तलहटी में बना एअरपोर्ट विश्व का सबसे खतरनाक माना गया है. जरा सी भी
भूल से वयुयान किसी भी पहाड़ से टकरा सकता है,सैंकड़ों की जाने भी जा सकती है..इस
पोर्ट का रन-वे काफ़ी छोटा है, अतः पायलट जो काफ़ी सूझ-बूझ से काम लेना होता है हमने
रन-वे पर उतरते और और उड़ते हुए वायुयान को देखा.
18-11-2017 चेलेला पास.
-
पारो से हा जाते समय पारो से लगभग 45 किमी. की दूरी पर चेलेला-पास है. समुद्र सतह से इसकी ऊंचाई 4,200 मीटर है.चेलेला पास से गुजरता सड़क मार्ग भूटान का सबसे ज्यादा ऊंचाई वाला
सड़क मार्ग है. यहाँ हा व्ह्ली एवं चारों ओर के विहंगम दृष्यों के पर्यटक खुशी से
झूम उठता है. शीतल-ठंडी-बर्फ़ीली हवा के झोंके पर्यटकों का दिल खोलकर स्वागत करते
है और शरीर में ठिठुरन-सिहरन होने लगती है. यहाँ पहाड़ियों में रंग-बिरंगी पताकाएं
इस जगह की खूबसूरती में चार चांद लगा देती है. जानकारी लेने पर पता चला कि भूटानी
अपने सगे-संबंधी के देहावसान के बाद उसकी स्मृति में इन पताकाओं को फ़हराते है. इन
पताकाओं में लगने वाले कपड़े का रंग धूप और पानी में उतर जाता है, लेकिन भूटानी
भाषा में लिखे अक्षर स्पष्ट रुप से देखे जा सकते हैं. चेलेला पाईंट पर से जुमाऐली
लहरी मांउटेन बर्फ़ से ढंका दिखाई देता है.
इंडियन आर्मी बेस
भुटान और चीन की सीमा पर रायल भुटान आर्मी.
तैनात रहती है. देश की अंखण्डता और संप्रभुता बनाए रखने के लिए जिम्मेदारी भुटान
की सशत्र सेना की जवाबदारी है. चीफ़ आफ़ आर्मी भुटान नरेश हैं. रायल आर्मी फ़ोर्स
सीमा की सुरक्षा के साथ ही शाही परिवार और अन्य वी.आई.पी की सुरक्षा के लिए भी
जिम्मेदार होती है. भारत और भूटान के मध्य हुई संधी के अनुसार भारतीय सेना सेकेण्ड
लाईन का उत्तरदायित्व का निर्वहन करती है. हमने यहां तैनात वीर सैनिकों का अभिवादन
किया और साथ ही फ़ोटोग्रुप भी लिया. इस सुखद
मुलाकात के बाद अब हम वापाइस हो रहे थे और 3000 फ़िट की ऊंचाइयों पर चढ़ रहे थे.
18-11-017.
होटल दोरजिलिंग
दोपहर तीन बजे के करीब हम लोग पारो स्थित
“होटल दोरजिलिंग” पहुंचे. पारो का भ्रमण किया. रात्रि नौ बजे हमने सुस्वादु भोजन
का आनन्द उठाया. रात में पारा लुढ़क कर काफ़ी नीचे आ चुका था. उस दिन तापमान दो
डिग्री के लगभग था.
19-11-2017 टाकसांग मोनेस्ट्री (
टाइगर नेस्ट)-
टाकसांग मोनेस्ट्री ( टाइगर नेस्ट)-
भूटान के पारो शहर के पास हिमालय की 10 हजार
फीट ऊंचाई पर बसा है टाइगर नेस्ट बौद्ध मठ। गुफा में बना यह मठ 300 साल से भी ज्यादा पुराना है। हिमालय की पहाड़ियों पर बने टाइगर नेस्ट
मोनीस्ट्री पहाड़ों के बीच बनी इस गुफा तक पैदल ही जाया जा सकता है। जो लोग
ट्रेकिंग अच्छी करते हैं, उन्हें कम से कम दो से तीन घंटे
बौद्ध मठ तक चढ़ने में लगते हैं, लेकिन जैसे ही बौद्ध मठ पर
पहुंचते हैं, सारी थकान दूर हो जाती है। वहां मिलने वाला
आध्यात्मिक माहौल और वहां से दिखने वाली हिमालय की वादियां एक अलग ही आनन्द देती
हैं। इस बौद्ध मठ से भी ऊपर एक और बौद्ध मठ है, जो बच्चों का
गुरुकुल है। कहा जाता है कि 1692 में टाइगर नेस्ट बौद्ध मठ
का निर्माण हुआ था। इससे पहले 8वीं शताब्दी में यहां की गुफा
में बौद्ध गुरु पद्मसंभवा ने तीन साल तीन महीने तीन हफ्ते तीन दिन और तीन घंटे तक
ध्यान किया था। यह भी कहा जाता है कि पद्मसंभवा (गुरु रिम्पोचे) इस गुफा तक टाइगर
की पीठ पर बैठकर उड़ते हुए आए थे। यहाँ घोड़े वाले भी अधिक संख्या में देखे जा सकते
हैं. महज आठ सौ रुपए में ये पर्यटक को केवल आधी ऊंचाई तक ही लेकर जाते हैं. आगे का
रास्ता और भी कठिन होने के कारण पार्यटक को पैदल ही चढ़ना होता है. फ़िर घोड़े वाले
उन्हें वापित लौटाकर नहीं लाते. इसका मुख्य कारण है अत्यधिक निचाई. एकदम ढलवा
उतराई के चलते पर्यटक के गिर जाने का खतरा होता है. सारी जानकारी लेने के बाद हमने
ऊपर न जाने का फ़ैसला किया और पास ही बनी दुकानों से पसंद की चीजें खरीदीं. पर्यटक
तब और आश्चर्य में पड़ जाता है कि इतनी अगम्य ऊंचाइयों पर इसे कैसे बनाया गया होगा.
उस समय न तो मशीनों का युग था और न ही कोई अन्य साधन. टायगर नेस्ट देखने.
kharbandi
goempa (खारबांडी गूंफ़ा) डैम
खारबांडी मठ- 1
967 में अही चुडॆरान द्वारा स्थापित और चार सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस
सुन्दर मठ में बुद्ध के जीवन, शाबुदंग न्वांग नाम्गयांल और गुरु रिनपोछे की
मूर्तिया स्थापित हैं, डैम तथा थिंफ़ू के विहंगम दृष्यों को जी भर के निहारने के
बाद हम होटेल लौट आए थे.
राष्ट्रीय
संग्रहालय- टा झोंग(Ta
Dzong)
पश्चिमी भूटान में
पारों शहर में एक सांस्कृति संग्रहालय है. 1968 में
पुनर्निर्मित भवन महामहिम जिग्मे दोरजी वांगचूक के समय के भूटानी परंपरा कला के
बेहतरीन नमूने, कास्य मूर्तियां, सुन्दरतम मुखौटे,सुन्दर पेंटिग, डाक-टिकटें आदि
संग्रहित की गई हैं. ऊंचाई पर होने के कारण इसका उपयोग बाच-टावर ( 1627) के रुप में होता था. अब इसे बदलकर संग्रहालय बना दिया गया है. आज
राष्ट्रीय संग्रहालय ने भूटानी कला के 3,000 से अधिक कामों के अपने कब्जे में है,
जो कि भूटान की सांस्कृतिक विरासत के 1500 से
अधिक वर्षों तक शामिल है। विभिन्न रचनात्मक परंपराओं और विषयों की
इसकी स्मृद्ध धारण वर्तमान के साथ अतीत की एक उल्लेखनीय मिश्रण का प्रतिनिधित्व
करती है और स्थानीय और विदेशी पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण का केन्द्र है. इस नेशनल म्युजियम का निर्माण हमारी भारत की
सरकार ने इसके निर्माण में वित्तीय सहायता प्रदान की है. लौटते समय हमने पारो
स्थित डिस्ट्रिक आफ़िस को देखा. भूटानी शैली बने इस कार्यालय को देखकर उन कलाकारों
की याद हो आयी,जिन्होंने कभी इस अद्भुत इमारत का निर्माण किया होगा.
रात्रि में हम फ़िर एक बार फ़िर हम डिस्ट्रिक आफ़िस देखने पहुंचे.
रंग-बिरंगी में नहाते/चमचमाते इस इमारत को देखकर तबीयत खुश हो गई. अपने आफ़िस को
किस तरह रखा जाए, यह यहां आकर सीखा जा सकता है. इस इमारत के पास गिफ़्ट आइटमों की
दूकान थी, जिसमें कुछ आइटम की खरीद की गई.भूख लग आयी थी और अब हम अपनी होटेल
दोरजीलिंग वापिस लौट रहे थे.रात्रि में सुस्वादु भोजन करने के बाद हमने रात्रि
विश्राम किया. हमारी यात्रा का यह अन्तिम पड़ाव था और अगली सुबह हमें वापिस लौट
जाना था.
20-11-2017
पारो स्थित होटेल दोरजीलिंग में सुबह का नाश्ता-चाय-पानी के
पश्चात हमें फ़ुस्सोलिंग के रवाना होना था. लौटने का विचार मन में आते ही उदासी
घेरने लगी थी. मन किसी भी कीमत पर लौटने का नहीं हो रहा था. एक बार कोई यदि भूटान
आ जाये और वह यहां की रम्य वादियों में घूम ले और यहाँ के लोगों से गहरी आत्मीयता
हो जाए, फ़िर उन्हें छॊड़ने को भला कैसे मन गवाही दे सकता है?.मन पर किसी तरह
नियंत्रण करने के बाद हमने अपना सामान पैक किया. गाड़ी पर लादा और भारी मन से बिदा
हुए. होटेल में कार्यरत सभी कर्मचारियों ने भारी मन से हमें बिदा किया.
शाम घिर आयी थी और हम भूटान ट्रैवल वर्ल्ड की मैनेजिंग
डायरेक्टर सुश्री कला/दीक्षिका जी के आफ़िस पहुँचे. उन्होंने हमारा आत्मीय स्वागत
किया. शाम की चाय आफ़र की और जानना चाहा कि टूर के दौरान हमें कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई. निश्चित रुप से हम इस यात्रा से
गदगद थे. इतने कम पैसों में नौ दिन किसी विदेशी शहर में रुक पाना आसान काम नहीं
होता. वैसे भी हमने जी भर के इस यात्रा का आनन्द उठाया था. मन यहाँ कुछ ज्यादा ही
रम गया था. बारी-बारी से वह प्रत्येक व्यक्ति याद आता जिनके बीच रहकर हमने नौ दिन
बिताए थे. उनका अपना व्यव्हार-मिलनसारिता और नैसर्गिक मुस्कान का जादू अब तक हम पर
तारी थी. दिल व्हूटान छोड़नेको तैयार नहीं हो रहा था, लेकिन समय सीमा की भी अपनी
मजबूरी होती है. किसी तरह दिल को मनाते हुए अब हम अपने देश भारत की ओर लौट रहे थे.
यादों को और पुरजोर बनाने के लिए हमने कला जी के आफ़िस के कर्मचारियों के साथ
फ़ोटोग्रुप लिया.सारे लोगों ने हमें मुस्कुराते हुए बिदा दी.
.
ट्रिप आर्गेनाईजर- सुश्री कला गुरंग.
भुटान की सीमा को छॊड़ते हुए भारत की सीमा में प्रवेश किया.
रात्रि के करीब नौ बजे हम पश्चिम बंगाल के जयगांव जिले में स्थित लाटागुरी रिजर्व
फ़ारेस्ट के नजदीक ग्रीन टच टूअर्स इको रिसोर्ट पहुंचे.
ग्रीन ट़च टूअर्स इको रिसोर्ट.-लातागुरी --उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले
में ग्रीन टच टूअर्स इको रिजार्ट बागडोगरा हवाई अड्डे से 90
किमी.,एनजीपी से 80 किमी है. यह एक विकसित पर्यटन स्थल है. लाटगुरी में
हमारे होटल के आसपास हिमालय पर्वत के गोद से प्रकृति की सुंदरता को देखते हुए, क्लाउड
के सूरज और सर्फ के साथ, प्राचीन ग्रीन वैली और असंबेड सील
जंगल ने इस स्थल को लतागुरी में रहने वाले पर्यटकों की तलाश में लोकप्रिय बना दिया,
यह लतागुरी में सबसे सुंदर पारिस्थितिकी रिसॉर्ट्स में से एक है। श्री सरकार जो बड़दद्दा के नाम से प्रसिद्ध हैं, ने हमारा आत्मीय स्वागत
किया. साथ में रात्रि का भोजन किया और अगली सुबह चार बजे तैयार होने को कहा ताकि
हम रिजर्व फ़ारेश्ट में घूमने और जंगली जानवरों को देखने के लिए पास बनवा लें. श्री
आनदेव और बड़दद्दा ने रात्रि चर बजे उठे और परमिट बनाने के लिए रवाना हो गए. सुबह
छः बजे हम सफ़ारी के लिए निकल पड़े.
इस अभ्यारण में एशियन रैनो माने एक सीग का
गेण्डा देखने को मिलता है. इसके अलावा जंगली हाथी, जंगली भैसा, हिरण, मोर और
रंग-बिरंगे पक्षी देखे जा सकते है.
21-11-2017-सुबह की चाय और नाश्ता करने के बाद हम
न्युजलपाईगुड़ी के लिए रवाना हुए और सियालदह होते हुए नागपुर और टैक्सी द्वारा
छिन्दवाड़ा पहुँचे.
भूटान से आए हुए दो सप्ताह बीत चुके हैं लेकिन भूटान की छवि अब
तक मन-मस्तिक पर छाई हुई है. वहाँ का रहन-सहन-मिलनसारिता-नयनाधिराम दृष्यावलियां
और मंत्रमुग्ध कर देने वाली मुस्कुराहट भुलाए नहीं भूलती. एक दिन मेरे एक मित्र ने
उत्सुकतावश एक प्रश्न पूछा कि “मैंने सुना है कि भूटान एक गरीब देश है.” मैं नहीं
जानता कि उसने भूटान के बारे में जानने की कभी कोशिश भी की है या वह किसी अन्य से
सुनी-सुनाई बातों को दोहरा रहा था. अब मेरी बारी थी कि उसे आँखों देखा हाल सुनाऊँ.
मैंने कहा- “मित्र..जिस देश में बुद्ध जैसे महान व्यक्ति को पूजा जाता हो, जहाँ
चहुँ ओर शांति का वातावरण हो, वह गरीब कैसे हो सकता है. फ़िर जिसके पास अकूत
वन-संपदा हो, वह गरीब कैसे हो सकता है? भूटानी अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में रहते
हों और उस पर गर्व करते हों ,वह गरीब कैसे हो सकता है? जिसकी वाणी में नम्रता हो,
होठों पर निश्छल मुस्कुराहट थिरकती रहती हो, वह गरीब कैसे हो सकता है. पर्यावरण को
शुद्ध बनाए रखने के लिए जिस देश में काफ़ी समय से पोलिथिन पर प्रतिबंध लगा दिया हो
और जहाँ कचरा ढूंढने पर भी न दिखाई देता हो, वह भला गरीब कैसे हो सकता है? जिस देश में फ़ाईव स्टार होटलों का जाल सा बिछा
हो और विश्व के अनेकानेक देशों से लोग उसकी छवि देखने के लिए आते हों, वह भला गरीब
कैसे हो सकता है?.जिस देश में फ़ोर-व्हीलर अधिकाधिक रुप से प्रयोग में लाई जा रही
हो और टू-व्हीलर व्हीकल ढूंढने पर भी न दिखाई देती हो, क्या वह देश गरीब कैसे हो
सकता है?. जहाँ एक भी झोपड़-पट्टी न दिखाई देती हो, जहाँ एक भी भिखारी भीख मांगते
दिखाई नहीं देता, वह गरीब कैसे हो सकता है? जिस देश में एक से बढ़कर एक अट्टालिकाएं
अपनी विरासत को संजोए हुए खड़ी हों, वह गरीब कैसे हो सकता है. उन्होने वह सब बचा कर
रखा है, और अपने जीवन में उतार रखा है, जिसकी की आज जरुरत है, वरना और भी देश हैं
जहाँ धन की नदियां बहती हैं, विश्व में जिनकी तूती बोलती है. वे आज उतने ही कंगाल
है क्योंकि वे हंसना तो छोड़िये, मुस्कुराना भी भूल चुके हैं. न तो वे सुख पूर्वक
जी पा रहे हैं और न ही तनदुस्त रह पा रहे हैं. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है भरपूर
धनाढ्य होने के बावजूद उन्होंने टेंशन पाल लिया है, जिसकी कोई दवा न तो लुकमान के
पास थी और न ही किसी के पास हो सकती है. यदि सहज और सरल जीवन जीना हो, शुद्ध
वातावरण में जीना हो, मुस्कुराते हुए जीना हो, तो उसे भूटान के रास्ते पर चलना
होगा.
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अब हम भूटान यात्रा
के आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ते हैं. यह आखिरी पड़ाव है लातागुरी रिजर्व फ़ोरेस्ट ( Lataguri) जो अपने एक सिंग के गैंडॆ के लिए जाना जाता है. गैंडॊं अलावा जंगली हाथी,
हिरण, जंगली भैंसा आदि बहुतायत में देखे जा सकते हैं.
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22.
थाईलैंड
में समुद्र मंथन
समुद्र
मंथन की कहानी मुझे बचपन में माँ ने कह सुनायी थी. उनके कहने का ढंग बड़ा रोचक होता
था. जो भी वे बतलाती जाती,उसका काल्पनिक चित्र आँखों के सामने सजीव हो उठता था. उस
कहानी में एक समुद्र था जिसका ओर-छोर दिखाई नहीं देता था, मथानी के रुप में
मन्दरांचल पर्वत को उपयोग में लाया गया था और उस पर्वत से वासुकी नाग को नेति कि
तरह लपेटकर खींचा गया था. मंथन से चौदह रत्न निकले थे जिसे देव और दानवों के मध्य
बांट दिया गया था. बाद में किसी फ़िल्म में इसे रुपायित होते हुए देखने को मिला था.
अपनी उम्र के सढ़सठवें ( 67 ) पड़ाव पर मुझे तृतीय
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में एक प्रतिनिधी के रुप में भाग लेने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ .अपनी यात्रा के अन्तिम पड़ाव पर वहाँ से लौटते हुए थाईलैंड के हवाई
अड्डे पर जिसका नाम संस्कृत में “सुवर्ण भूमि”
रखा गया है, पर करीब बावन फ़ीट लंबी, तथा पंद्रह फ़ीट ऊँची प्रतिमा जो समुद्र मंथन
को लेकर बनाई गई है, देखने को मिली. उसे देखते हुए मुझे आश्चर्य इस बात पर हो रहा
था कि समुद्र मंथन की कहानी जो भारतीय मनीषा को लेकर लिखी गई थी, विदेशी धरती पर
देखने को मिल रही है. इतिहास को खंगालने पर ज्ञात हुआ कि कभी भारत की सीमाएं ईरान,
अफ़गान, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड जिसे श्यामभूमि के नाम से जाना जाता था, तक
फ़ैली हुई थी. फ़िर व्यापार अथवा नौकरी करने के लिए जो भारतीय यहाँ पहुँचे, उन्होंने
अपनी सांस्कृतिक पहचान को स्थायी रुप देने के लिए इस प्रतिमा की स्थापना करवाई.
उस
आदमकद प्रतिमा को देखते हुए मुझे चार लाइनें यादे हो आयी जिसमें समुद्र मंथन से
प्राप्त हुए उन चौदह रत्नों कि व्याख्या की गई है, वे इस प्रकार है.
श्री,/ मणि/,रंभा/,वारुणि/ अमीय/, शंख,/गजराज/धनवन्तरि/ धन/ ,धेनु,/शशि/,हलाहल,/
बाज”/कल्पवृक्ष
समुद्र
मंथन में सबसे पहले “हलाहल”(जहर) निकला, जिसे न तो देव ग्रहण करना चाहते थे और न
ही दानव. असमंजस की स्थिति देख, देवों के देव महादेव ने उसे स्वीकार करते हुए अपने
कंठ में धारण कर लिया. जहर के गले में उतरते ही उनका कंठ नीला पड़ गया. इस तरह इनका
एक नाम “नीलकंठ” पडा. दूसरे क्रम में”कामधेनु” गाय निकली, जिसे ऋषियों ने ले लिया.
तीसरे क्रम में “उच्चैश्रैवा” नामक घोड़ा निकला, जिसे दानवों के राजा बलि ने रख
लिया. चौथे क्रम पर “ ऎरावत” हाथी निकला, जिसे इंद्र ने अपने काननवन में भेज दिया.
पांचवें क्रम में “कौस्तुभमणि” मणि निकला, जिसे भगवान विष्णु ने ग्रहण कर लिया.
फ़िर छटे क्रम पर कल्पवृक्ष´ निकला, जिसे इंद्र ने अपने उद्यान मे रौंप दिया. इसके
बाद“रंभा” नामक अप्सरा निकली, जिसे भी इंद्र ने अपने दरबार में भेज दिया. इसके बाद
“लक्ष्मी” का प्रकाट्य हुआ.जिसे भगवान विष्णु ने अपनी भार्या बना लिया. इसके बाद”
वारुणि”( शराब )निकली, जिसे दानवों ने अपने कब्जे में कर लिया. इसके बाद
“चन्द्रमा” जिसे देवों के देव महदेव ने अपनी जटा में धारण कर लिया. फ़िर” पारिजात”
नामक एक वृक्ष निकला, जिसे पुनः इंद्र ने अपने काननवन में लगा दिया. इसके बाद
“शंख” निकला, जिसे विष्णु ने अपने अधिकार में ले लिया. इसके बाद “ धन्वन्तरि” नामक
वैद्ध निकले, जो देवों के चिकित्सक बने. सबसे अंत मे” अमृत” निकला. अमृत के निकलते
ही देव और दानवों मे संग्राम छिड़ गया क्योंकि दोनों ही पक्ष इसे पीकर अमर हो जाना
चाहते थे. जब मामला शांत होता दिखायी नहीं दिखायी दिया तो भगवान विष्णु ने
“मोहिनी” का रुप धारण कर, प्राप्त अमृत को एक बड़े पात्र में भर कर देव और दानवों
से कहा कि वे पंक्तिबद्ध होकर बैठ जाएं, सभी को बारी-बारी से अमृतपान करवाया
जाएगा. भगवान विष्णु जानते थे कि अगर अमृत दानवों को पिला दिया गया तो वे अमर हो
जाएंगे और देवों को परेशान करते रहेगे. अतः चालाकी से उन्होने उस पात्र को दो
हिस्सों में बांट दिया. एक में अमृत और दूसरे में मदिरा भर दी गई. जब देवों को
अमृत पिलाते तो अमृत भरा हिस्सा देवों की तरफ़ कर देते. जब दानवों की बारी आती तो
उसे पलट देते थे. दानव जानते थे कि विष्णु देवताओं का पक्ष लेकर उनके साथ छलावा करते
रहे हैं. अतः एक दानव ने देवता का रुप धारण कर उस पंक्ति मे जा बैठा जहाँ देवगण
बैठे हुए थे. विष्णु ने उसे देव समझकर जैसे ही अमृत के पात्र को उड़ेला, पास बैठे
सूर्य और चन्द्रमा ने श्री विष्णु से शिकायत कर दी. पता लगते ही. विष्णु ने अपने
चक्र से उसकी गर्दन उड़ा दी. तब तक तो काफ़ी देर हो चुकी थी. अमृत की कुछ बूंदे गले
से नीचे उतर चुकी थी. गर्दन कटने के बाद भी वह दानव अमृत के प्रभाव से मर नहीं
सका. दो टुकड़ों में बंटॆ दानव का एक हिस्सा राहू और दूसरा केतु कहलाया. हिन्दु
मान्यता के अनुसार राहू और केतु बारी-बारी से सूर्य और चन्द्रमा को ग्रसते है. इसी
के कारण सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होता है, जैसी बातों को बल मिलता है.
पौराणिक
मान्यता के अनुसार ऋषि दुर्वासा के श्राप से सभी देगगण अपने राजा इंद्र सहित बलहीन
हो गए थे. उस समय दानवों का राजा बलि हुआ करता था. शुक्राचार्य दानवों के गुरु थे.
वे जब-तब राजा बलि को इंद्र के खिलाफ़ बरगलाते थे और वे देवों पर आक्रामण कर उनकी
संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लेते थे. घर से बेघर हुए देवताऒं ने अपने राजा इंद्र
को अपनी व्यथा-कथा कह सुनायी,पर वह तो स्वयं निस्तेज था, मदद नहीं कर पाया. इस तरह
सभी देवताओं ने ब्रह्मा को अपना दुखड़ा कह सुनाया. ब्रह्मा ने उन्हें श्री विष्णु
के पास भिजवाया. विष्णु ने सारी बतें सुन चुकने के बाद समुद्र मंथन की योजना बनाई.
वे जानते थे कि दानवों को बलहीन करने के लिए शक्ति चाहिए और वह समुद्रमंथन के जरिए
ही हासिल की जा सकती है. उन्हीं की योजना के अनुसार उन्होंने वासुकि नाग को नेति,
मन्दराचल पर्वत को मथानी और स्वयं कच्छप बनकर मथानी का आधार बनने का आश्वासन दिया.
इस तरह समुद्र मंथन का अभियान चलाया गया और वहाँ से प्राप्त शक्तियों को अपने
अधिकार में लेते हुए उन्होने दानवों को फ़िर एक बार पाताल की ओर लौटने पर मजबूर कर
दिया था.
.
थाईलैंड में बुद्ध धर्म अपने शिखर पर है. सभी
बौद्ध मंदिरों में आपको भगवान बुद्ध की सोने से पालिश की गई भव्य प्रतिमाएं देखने
को मिलती है. इसके साथ ही वहाँ हिन्दु धर्म का भी अच्छा खासा प्रभाव देखने को
मिलता है. वहाँ एक से बढ़कर एक हिन्दु देवी-देवताओं के मंदिर हैं, धर्म के नाम पर
यहाँ झगड़ा-फ़साद कभी नहीं होता और न ही कोई किसी पर जबरदस्ती अपना प्रभाव ही डालता
है. हिन्दु-बौद्ध और मुस्लिम सभी पक्ष के लोग यहाँ बड़े ही सौहार्दता के साथ अपना
जीवन बसर करते हैं.
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23 शेरों के बीच एक दिन.
(थाईलैंड)
-
शेरों के बीच एक दिन
बचपन में बिताए गए हर पल मुझे अब भी याद
हैं. सोने से पहले मैं माँ से कोई कहानी सुनाने को कहता और वे बड़े चाव से कहानी
सुनाने लगती थीं. उसमें कभी राजा-रानी होते, तो कभी
जंगल के कोई पशु-पक्षी. शेरों को लेकर न जाने कितनी ही कहानियां उन्होंने सुनायी
थीं. छुट्टियों में जब कभी अपने ननिहाल(नागपुर) जाना होता, नानी
भी एक से बढकर एक कहानियां सुनाया करती थीं. उनकी भी कहानियों में वही
शेर-भालू-चीते होते, राजा-रानी होते तो कभी कोई जादूगर
आदि-आदि. नानी ने ही बतलाया था कि यहाँ महाराजबाग में शेर तथा अन्य जानवरों के
बाड़े हैं. एक दिन मैंने जिद पकड़ी कि मुझे शेर देखना है. दिन ढलते ही उन्होंने
मुझे महाराजबाग दिखाने अपने साथ ले लिया. यह बाग एक विशाल परिसर में फ़ैला हुआ है.
यहां लोहे के जंगलों में शेर-भालू-चीते, बारहसिंघे-हिरण,
सांभर और भी न जाने कितने ही पशु-पक्षी बंद हैं, जिन्हें अपनी आँखों से देखना अपने आप में एक कौतूहल का विषय था.
एक बार किसी गर्मी की छुट्टी में मैं अपने
ननिहाल में था. उस समय एक सर्कस आया हुआ था जिसका नाम शायद “कमला
सर्कस” था, मुझे देखने को मिला. लोग
कहा करते थे कि वह सर्कस एशिया का सबसे बड़ा सर्कस था. लोहे के बड़े-बड़े पिंजरों
में शेरों को रिंग मे उतारा जाता था और रिंगमास्टर अपने कोड़े और एक लकड़ी की छडी
के बल पर उनसे कभी बड़े से स्टूल पर बैठने का इशारा करता तो कभी कुछ और. तरह-तरह
के करतब शेरों के मुझे देखने को मिले. उसके बाद तो अनेकों सर्कसें मैं देख चुका
था. बाद में पता चला कि किसी विदेश यात्रा के दौरान कमला सर्कस समुद्र के गर्भ में
समा गया. उसके बाद न जाने कितनी ही सर्कस मैं देख चुका था. शेर-चीते, हाथी, घोड़े, दरियाई घोड़े आदि
सब सर्कस की जान होते. बगैर इनके बगैर सर्कस की कल्पना तक नहीं की जा सकती. नागपुर
में ही एक अजायबघर है, जिसमें मरे हुए जंगली जानवरों की
खालों में भूसा-बुरादा वगैरह भर कर, बडी ही शालीन तरीके से
उन्हें कांच के कमरों में रखा गया है, जिसे देखकर आप वन्य
जीवों के बारे में जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं. चूंकि मुझे शुरु से घूमने का
शौक है, और इस शौक के चलते, मैंने
पूर्व से पश्चिम, तथा उत्तर से दक्षिण तक की यात्राएं की है.
यात्राएं कभी निजी तौर पर, तो कभी साहित्यिक आयोजनों के चलते
हुईं थी. इसी बीच अभ्यारण्य भी देखे, लेकिन उनमें सभी जानवर
बतौर एक कैदी के हैसियत से देखने को मिले. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी
जिन्दा शेरों के बीच पूरा दिन बिताने को मिलेगा.
मेरे साहित्यिक मित्र श्री जयप्रकाश”मानस”
ने मुझसे फ़ोन पर आग्रहपूर्वक कहा कि मैं जल्दी ही अपना पासपोर्ट
बनवा लूं. उन्होंने बात आगे बढाते हुए कहा कि हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार को
ध्यान में रखते हुए उन्होंने माह फ़रवरी 2011में थाईलैंड में
तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित करने का मन बनाया है और उसमें मुझे
चलना है. मैं उनकी बात टाल न सका और दो माह में पासपोर्ट बन गया. मैं चाहता था कि
अपना एक स्थानीय मित्र भी साथ हो ले तो ज्यादा मजा आएगा. मैंने अपने साहित्यिक
मित्र श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव को अपना मन्तव्य कह सुनाया और वे उसके लिए तैयार
हो गए. इस तरह एक विदेश यात्रा का संयोग बना. 1 फ़रवरी 2011
को 3 बजे, नेताजी सुभाष
एअरपोर्ट कोलकता से किंगफ़िशर के हवाईजहाज आईटी-२१ से हमने थाईलैण्ड के लिए उड़ान
भरी. यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी. हवाईजहाजों को अब तक सिर्फ़ आसमान में उड़ते
देखा था. अब उसमें बैठकर सफ़र कर रहा था. मेरी सीट खिड़की के पास थी. कांच में से
बाहर का दृष्य देखकर मुझे एक अलग ही किस्म का रोमांच हो आया था.
डेढ़ घंटे की उड़ान के बाद हम थाईलैंड के “स्वर्णभूमि”
एअरपोर्ट पर थे. सनद रहे कि इस एअरपोर्ट का नाम भारतीय संस्कॄति के
आधार पर “ स्वर्णभूमि” रखा गया है. हम
वहां से सीधे “पटाया” के लिए रवाना हुए
जहाँ ठहरने के लिए “मिरक्कल स्वीट्स” पहले
से ही बुक करवा लिया गया था. 2 फ़रवरी को को कोरल आईलैंड,
टिफ़्फ़नी शो ,3 फ़रवरी को फ़्लोटिंग मार्केट,
जेम्स गैलेरी, सी-बीच का भ्रमण किया और अगले
दिन यानि तारीख 4 को बैंकाक के लिए रवाना हुए,जहाँ होटल फ़ुरामा सीलोम में ठहरने की व्यवस्था थी. बैंकाक के प्रसिद्ध
विष्णु मंदिर में,वहाँ के भारतीय मित्रों के आग्रह पर
साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन संपन्न हुआ, जबकि यह कार्यक्रम
उसी होटल के भव्य कक्ष में आयोजित होना तय किया गया था. इस कार्यक्रम में अनेक
भरतवंशियों ने उत्साहपूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई. मंदिर समिति ने सभी का
भावभीना स्वागत-सत्कार किया और सुस्वादु भोजन भी करवाया.
]
पाँचवा दिन यानि 5 फ़रवरी का
वह दिन भी आया, जब हम कंचनापुरी होते हुए टाइगर टेम्पल जा
पहुँचे, जहाँ जिन्दा शेरों के साथ घूमने का रोमांचकारी आनन्द
उठाना था
जैसे-जैसे मेरे कदम आगे बढ़ रहे थे, मस्तिष्क
में एक नहीं बल्कि अनेक काल्पनिक चित्र बनते जा रहे थे. मैं सोच रहा था कि अब तक
तो मैंने शेरों को काफ़ी दूरी से देखा था, आज उन्हें खुले हुए
रुप में और वह भी अपने से काफ़ी नजदीक से देखूंगा तो कैसा लगेगा. कहीं अगर वह
आक्रामक हो जाएगा तो क्या स्थिति बनेगी? कदम अपनी गति से आगे
बढ़ रहे थे और दिमाग अपनी गति से. आखिर वह क्षण आ ही गया, जब
हम प्रवेश-द्वार पर खडे थे. वहाँ से सभी को एक-एक पर्ची थमा दी गई कि उसे भरकर जमा
करना है. नाम-पता आदि भर देने के बाद उसमें एक लाइन थी, जिसने
शरीर में एक अज्ञात भय भर दिया. उसमें लिखा था कि हम अपनी जवाबदारी पर अन्दर जा
रहे हैं, यदि किसी जानवर के साथ कोई अप्रिय घटना घट जाए तो
हम स्वयं जवाबदार होंगे. खैर मैंने यह सोचकर पर्ची भर दी कि आगे जो भी होगा देखा
जाएगा.
गेट पर एक चुलबुली सी आकर्षक मैना, जो
इधर-उधर उछल-कूद करती फ़िर अपनी जगह आकर बैठ जाया करती थी, सभी
का ध्यान आकर्षित किए हुए थी.
अन्दर एक सीमेन्ट की नकली गुफ़ा सरीखी बनी
हुई थीं, जिसमें सभी को रुकने को कहा गया. वहाँ दर्जनों
विदेशी सैलानी भी अपनी बारी का इन्तजार करते पाए गए. बाहर का दृष्य एक दम साफ़ था.
एक बड़े भूभाग में दर्जनों शेर आराम फ़रमा रहे थे. उन पर सूर्य की किरणें न पड़े,
इसे ध्यान में रखते हुए, बड़े-बड़े छाते उन पर
तने हुए थे. कुछ समय पश्चात वहाँ के एक कर्मचारी ने हमें बाहर लाइन लगाकर खड़े होने
को कहा. अब आगे क्या होता है, प्रायः यह सवाल सभी के माथे को
मथ रहा था.
तभी दो-तीन बौद्ध-साधु, जिनके
हाथ में चोटी- छोटी लाठियां थी, ने आगे बढकर शेरों को उठाया
और आगे बढने लगे. मामूली से बेल्ट अथवा लोहे की चेन में बंधे वनराज उनके पीछे हो
लिए थे. तभी एक कर्मचारी ने सभी को पंक्तिबद्ध होकर उस साधु के पीछे-पीछे चलने को
कहा और यह भी बतलाया कि आप निश्चिंतता के साथ शेर की पीठ पर हाथ रखकर चल सकते हैं.
यदि कोई उस दृष्य को कैमरे में कैद करना चाहता है तो साथ चल रहे कर्मचारियों के
पास अपने कैमरे दे दें, वह आपकी फ़ोटो खींचता चलेगा. उसने यह
भी बतलाया कि शेर की पीठ के आधे हिस्से तक ही आप उसे छू सकते हैं.
लोगों ने अपने-अपने कैमरे कर्मचारियों के
हवाले कर दिए थे. वे शेर के साथ फ़ोटो खिंचवाते और फ़िर लाइन से हट जाते. फ़िर दूसरा
सैलानी आगे बढता, शेर के साथ फ़ोटो खिंचवा कर
लाइन से हट जाता. इस तरह हर व्यक्ति जंगल के राजा को छूते हुए उसके साथ अपने को
जोडते हुए गर्व महसूस कर रहा था.
अब मेरी बारी थी. मन के एक कोने में भय तो
समाया हुआ ही था. मैं उस जंगल के बादशाह को छूने जा रहा था, जिसका
नाम लेते ही तन में कंपकंपी होने लगती है, अगर सामने पड़ जाए
तो मुँह से चीख निकल जाती है और जिसकी दहाड़ सुनते ही अच्छे-अच्छे सूरमाओं की
घिग्गी बंध जाती है, फ़िर उसे छूना तो दूर की बात है.
शेर के पुठ्ठे पर हथेली रखते ही मेरी हथेली
एक बार कांपी जरुर थी, लेकिन तत्क्षण ही मैं
नार्मल भी हो गया था और अब मैं भयरहित होकर जंगल के राजाजी के साथ फ़ोटू खिंचवा रहा
था.
करीब आधा-पौन किलोमीटर का यह सफ़र शेरों के
साथ गुजरा. उसके बाद जहाँ दो ओर से लाल-सिन्दूरी रंग में रंगी पहाडियाँ
अर्धचन्द्राकार आकार बनाती है, वहां बड़े-बडे छाते तने हुए
थे, के नीचे शेरों को आराम की मुद्रा में बैठा दिया गया. पास
ही एक टिनशैड था जिसमे पर्यटकों के बैठने की समुचित व्यवस्था थी. अब बौद्ध मांक
ठंड़े पानी की बोतलों से शेरों के ऊपर बौझार कर रहे थे. मतलब तो आप समझ ही गए
होंगे कि वे ऐसा क्यों कर रहे थे ?.आप जानते ही हैं कि शेर
ठंड़े स्थान में रहना पसंद करते हैं. उन्हें तेज धूप नहीं सुहाती. फ़िर वह एक लंबा
चक्कर धूप में चलते हुए आया जाहिर है कि उसकी त्वचा गर्मा गयी होगी..
दर्शकदीर्घा में बैठे हुए हम, एक
नहीं-दो नहीं, बल्कि दर्जनों शेरों को एक साथ बैठा हुआ देख
रहे थे. कुछ के गलों में लोहे की चेन बंधीं थी, जाहिर है कि
वे कभी भी आक्रमक हो सकते थे. कुछ के गलों में कपड़े का बेल्ट बंधा हुआ था,
शायद इसलिए कि वे कम गुस्सैल होगें. कुछ तो बिना चेन के भी थे,
मतलब साफ़ था कि या तो वे बूढ़े हो चुके होंगे या फ़िर एकदम शांत
स्वभाव के होगें. बौद्ध साधुओं का इशारा पाते ही उनके सहायक आगे बढे. सभी की नीले
रंग की पोशाकें थी. एक ने आकर कहा कि आप सभी, जिनके पास अपने
कैमरे हैं, लाइन बना कर खड़े हो जाएं. इशारा पाते ही लोग
पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गए. सभी को इस बात का इन्तजार था कि आगे क्या होता है. एक
सहायक के साथ एक पर्यटक हो लिया. कैमरा अब उस सहायक के हाथ में था. वह उस पर्यटक
को शेर के पास ले जाता और विभिन्न मुद्रा में बिठाते हुए, फ़ोटो
खींचता. इस तरह वह बारी-बारी से अन्य शेरों के पास पर्यटक को ले जाता, फ़ोटो खींचता और अन्त में पर्यटक को दर्शकदीर्घा तक छोड आता.
संभवतः टाईगर टेम्पल विश्व का एकमात्र ऐसा
अभ्यारण्य है जहाँ इन्सान निडर होकर शेरों के बीच रह सकता है. शायद यही वजह है कि
विश्व के कोने-कोने से पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं. टेम्पल का शुद्ध शाब्दिक अर्थ
मंदिर होता है. जाहिर है कि मंदिर में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होती. ऐसी मेरी
अपनी सोच है. कुछ लोग तो यह भी कहते हुए सुने गए कि शेरों के दांत तोड दिए गए हैं, इसीलिए
वे आक्रमण नहीं करते. यह बात गले से नहीं उतरती. उतरना भी नहीं चाहिए ,क्योंकि शेर के दांत हों, अथवा न हो, लेकिन शेर तो आखिर शेर ही होता है. यदि वह हिंसक नहीं होगा तो वह भूखों मर
जाएगा. वह दाल-रोटी खाकर तो गुजारा नहीं कर सकता. उसे हर हाल में मांस चाहिए ही
चाहिए. बौद्ध साधु तो उसका जबड़ा खोलकर भी बतलाते हैं. कुछ का यह मानना है कि साधु
वशीकरण-मंत्र जानते हैं, इसीलिए वह आक्रमण नहीं करता.
मंत्रों में शक्ति होती है और हो सकता है कि वे उन पर इसका प्रयोग करते होंगें. इस
पर मेरी अपनी निजी राय है कि यदि जंगली जानवरों को भी मनुष्यों के बीच रहने दिया
जाए तो वे भी एक अच्छे मित्र हो सकते हैं और यही संदेश जिसे भगवान बुद्ध का संदेश
ही मान लें,यहाँ उसे फ़लित होते हम देख सकते हैं. इससे एक
संदेश यह भी जाता है कि पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने में जितना मनुष्य अपना रोल
निभाता है, उतना ही एक जंगली जानवर भी. शेर अपनी सीमा में
रहकर पर्यावरण को कभी नुकसान नहीं पहुँचाता, जितना की एक
आदमी. अतः उसे चाहिए कि वह अपनी सीमा का अतिक्रमण न करे, तो
यह पर्यावरण को शुद्ध बनाने की दिशा में एक कारगर कदम होगा और यदि ऐसा होता है तो
इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
----------------------------------------------------------------------------------------------- 24.
मारीशस
अर्थात मिनि भारत की यात्रा
गोवर्धन
यादव
मेरे अपने जीवन में यह दूसरा अवसर है जब
मुझे भारत से बाहर मारीशस जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ. पहली बार मैं थाईलैण्ड की
यात्रा पर सन 2011 में गया था. थाईलैण्ड की यात्रा पर
जाने का अवसर अनायास ही प्राप्त नहीं हुआ था, बल्कि सायास प्राप्त हुआ था इस
यात्रा के बारे में बडा दिलचस्प वाक्या है. एक दिन मुझे रायपुर (छ.ग.) के मेरे
मित्र श्री जयप्रकाश मानसजी का फ़ोन आया. फ़ोन पर उन्होंने मुझसे बैंकाक-यात्रा पर
चलने का आग्रह किया और साथ ही उन्होंने मेल के जरिए उस कार्यक्रम की रुपरेखा भी
उपलब्ध करवा दी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी और हिन्दी-संस्कृति को प्रतिष्ठित
करने के लिए बहुआयामी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था “सृजन-सम्मान एवं साहित्यिक वेव-पत्रिका
“सृजनगाथा डाट काम”रायपुर का यह सात दिवसीय अनुठा प्रयास था. इस साहित्यिक यात्रा
में देश के चयनित/अधिकारिक विद्वान, अध्यापक, लेखक, भाषाविद, शोधार्थी, संपादक,
पत्रकार, संगीतकार, बुद्धिजीवी एवं हिन्दी सेवा संस्थाओं के सदस्य, हिन्दी
प्रचारक, ब्लागर्स,तथा टेक्नोक्रेट भाग ले रहे थे. मन में इच्छा बलवती हो उठी कि
मुझे इसमें जाना चाहिए लेकिन उस वक्त तक मेरा पासपोर्ट नहीं बना था सो चाहते हुए
भी मैं इस यात्रा में शामिल नहीं हो सका. उन्होने आग्रह करते हुए मुझसे कहा कि आने
वाले समय में मुझे अन्य देश की यात्रा के लिए तैयार रहना है और अपना पासपोर्ट भी
समय रहते बनवा लेना है.
शुरु से ही मेरी प्रकृति घुम्मकड किस्म
की रही है. डाक विभाग में कार्यरत रहने से चार वर्ष मे मिलने वाली एल.टी.सी का
मैंने तीन बार फ़ायदा उठाया. पहली बार मैंने सपरिवार संपूर्ण दक्षित-भारत की यात्रा
की. दूसरी बात जम्मु-कश्मीर और तीसरी बात गोवा की यात्रा की. उसके बाद यह स्कीम
सरकार द्वारा बंद करा दी गई. सेवा निवृत्ति के बाद मैंने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति,हिन्दी भवन भोपाल की सदयता ग्रहण की. लेखन कर्म अपनी गति से चल ही
रहा था. बच्चॊं के लिए भी मैं लिखने लगा. इस बीच मेरी मुलाकात साहित्यिक एवं
सांस्कृतिक संस्कार की मासिकी “बालवाटिका” के संपादक डा. श्री भैरुँलाल गर्गजी से
हुई और इस तरह मैं उनकी संस्था से जुड गया. यह क्रम अभी रुका नहीं था. दूसरी कडी
में मैं बालसाहित्य शोध एवं संवर्धन सामिति के संचालक श्री उदय किरोलाजी,
अलमोडा(उत्तराखण्ड) से जुडा और इस तरह कई संस्थाओं से जुडता चला गया और इनमें होने
वाले कार्यक्रमों में बराबर जाता रहा और सम्मानीत भी होता रहा. नए-नए प्रदेशों में
जाना और ख्यातिलब्ध साहित्यकारॊ से मिलने में मुझे अत्यधिक आनन्द प्राप्त होता है.
इस तरह प्रायः सभी प्रदेशों के बहुतेरे मित्रों की टोली जुडती चली गई. परमपिता
परमेश्वर की विशेष कृपा मुझ पर सदा बनी रही और यह उन्हीं का आशीर्वाद है कि मुझे
देश और देश के बाहर जाने के सुअवसर प्राप्त होते रहे.
जैसा की मैंने स्वीकार किया भी है कि
मुझे यात्रा करने में काफ़ी आनन्द प्राप्त होता है. सो मैंने छिन्दवाडा स्थित
“वसुन्धरा ट्रैवल” के संचालक श्री बकुल पंड्याजी से संपर्क किया और अपना पासपोर्ट
तैयार करने के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटाना शुरु कर दिए. माननीय वरदमूर्ति मिश्रजी
उस समय एस.डी.एम के पद पर कार्यरत थे. आपने दो बार मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार
समिति,जिला इकाई छिन्दवाडा द्वारा आयोजित प्रतिभा प्रोत्साहन प्रतियोगिताओं में
मुख्य अतिथि के तौर पर समिति को अपना हार्दिक सहयोग दिया और समय-समय पर वे
मार्गदर्शक के रुप में अपनी भागीदारी का निर्वहन करते रहे हैं. मैंने उनसे अपना
तत्काल -पासपोर्ट बनवाने के लिए निर्धारित प्रपत्र में हस्ताक्षर करने के लिए
निवेदन किया. उन्होंने बिना समय गवांए उस पर अपने हस्ताक्षर कर दिए.. लेकिन इस बीच
पत्नि की तबीयत बिगड जाने और उस पर लगने वाले खर्चों को देखते हुए मैंने इस
प्रक्रिया को रोकते हुए श्री बकुलजी से कहा कि वे सामान्य तरीके से इसे बनने दे.
लगभग तीन माह बाद पासपोर्ट मेरे हाथ में था और मैं अब देश से बाहर जाने के लिए
अधिकृत था.
श्री मानसजी से मेरा संपर्क बराबर बना
हुआ था. संयोग से वे वर्ष 2011 में सात दिवसीय ( 1 से 7 फ़रवरी) कार्यक्रम तय कर चुके थे,जिसकी सूचना उन्होंने
ईमेल के जरिए तथा फ़ोन पर दे दी थी. इस तरह यह पहला मौका था जब मैं भारत के बाहर
किसी अजनवी धरती पर अपना कदम रख रहा था. सारे कार्यक्रम अपने निर्धारित समय के
अनुसार सान्नद संपन्न होते रहे. एक लंबा अरसा बीत गया है,लेकिन वे सारी यादें अब
भी मन-मस्तिस्क पर जस की तस अंकित हैं.
इस आयोजन के बाद आपकी संस्था ने ताशकंद,
संयुक्त अरब अमीरात, कंबोडिया-वियतनाम आदि देशों की यात्राएं की और हिन्दी के
प्रचार-प्रसार और उन्नयन के लिए अनूठे कार्यक्रम किए. हालांकि मैं इन देशों की
यात्रा भले ही नहीं कर पाया लेकिन मेरे दो अभिन्न मित्र श्री आर.एम.आनदेवजी और
डी.पी.चौरसियाजी ने बराबर इसमें भाग लेकर जिले की शान बढाई है.
आधारशिला के संपादक-मित्र श्री दीवाकर
भट्टजी थाईलैण्ड यात्रा में मेरे सहयात्री रहे हैं. आपने भी हिन्दी के उन्नयन और
संवर्धन में अनेकों देशॊं की यात्राएँ की हैं, मुझसे लगातार साथ चलने का आग्रह
करते रहे हैं और समय-समय पर फ़ोन से ईमेल के जरिए कार्यक्रम की रुपरेखा भेजते रहे
हैं,लेकिन यात्रा में लगने वाली बडी राशि का जुटाना एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के
लिए असंभव सा प्रतीत होता रहा. इस बीच “अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा जिसके
संरक्षाक श्री वैद्ध्यनाथ अय्यरजी तथा संस्था के महासचिव-संयोजक श्री नरेन्द्र
दन्ढारेजी का पत्र प्राप्त हुआ. श्री दन्ढारेजी वर्तमान समय में राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति,वर्धा में कार्यरत हैं और समय-समय पर आपसे वर्धा में होने वाले
कार्यक्रमों में तथा हिन्दी भवन भोपाल में भेंट होती रही है, ने दूरभाष पर मुझसे
चलने बाबद अनुरोध किया. प्रथम आग्रह में ही मैंने उनसे स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि
खर्च की अधिकता को देखते हुए मेरा जाना संभव नहीं है.
श्री दण्ढारेजी के फ़ोन लगातार आते रहे.
एक दिन मैंने उस पत्र की एक फ़ोटॊ-प्रति हिन्दी भवन भोपाल भेजते हुए संस्था के
मंत्री-संचालक मान.श्री कैलाशचन्द्र पंतजी से निवेदन किया कि हम अपने स्तर पर
हिन्दी के प्रचार-प्रसार में कार्य तो कर ही रहे हैं लेकिन हम इतने सक्षम नहीं हैं
कि मारीशस जैसे सुदूर देश की यात्रा कर सकें. निवेदन में यह भी मैंने जोडा कि यदि
हिन्दी भवन इसमें हमें कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करती है, तो बाकी की रकम का हम
इंतजाम कर लेंगे. इस समय मारीशस यात्रा के लिए छियत्तर हजार रुपयों का खर्च बतलाया
गया था.
हिन्दी भवन भोपाल का एक पत्र आया,
जिसमें प्रदेश के सभी संयोजकों से यह पूछा गया कि क्या वे पासपोर्ट धारक हैं? इसका
जवाब मैंने लिख भेजा और अपने साथियों के नाम लिख भेजे ,जिनके पास अपने पासपोर्ट
उपलब्ध थे. माह मार्च की इक्कीस तारीख को मुझे भोपाल में आयोजित मिटिंग में जाना
था .मिटिंग में मैंने अन्य प्रस्तावों के साथ इस प्रस्ताव को भी रखा, जो बाद में
इस आशय के साथ स्वीकृत हुआ कि वर्तमान में हिन्दी भवन ट्रूस्ट प्रदेश के पाँच
संयोजकों को पच्चीस-पच्चीस हजार रुपया बतौर अनुदान देगी. इतनी बडी रकम अनुदान में
स्वीकृत हो जाने के बाद मैंने मारीशस जाने का मानस बनाया और श्री गोपाल दण्ढारेजी के खाते में तीस हजार
रुपया जमा करवा दिए, जो बतौर रजिस्ट्रेशन के दिए जाने थे. शेष रकम तीस जनवरी 2014
तक जमा करना था. मैं यहाँ स्पष्ट बतला दूँ कि यदि हिन्दी भवन टृस्ट मुझे यह राशि
स्वीकृत नहीं करता तो शायद ही मैं वहाँ जा पाता. मैं आभारी हूँ मान.श्री पंतजी का
और हिन्दी भवन टृस्ट का,जिनके विशेष सहयोग से मैं यह यात्रा कर पाया.
श्री दण्ढारेजी ने अपने परिपत्र में
स्पष्ट कर दिया था कि सभी व्यक्तियों को मुंबई तक अपने स्वयं के खर्च पर आना-जाना
होगा. समय पर्याप्त था, सो मैंने दुरंतॊ से अपनी जाने और आने की सीट आरक्षित
करवाली थी. ज्ञात हो कि दुरंतॊ नानस्टाप ट्रेन है, जो नागपुर से छत्रपति शिवाजी
टर्मिनल तक प्रतिदिन रात्रि के आठ बजे रवाना होती है और मुंबई से नागपुर के लिए रात्रि
आठ बजे खुलती है.
संस्था सचिव श्री नर्मदा प्रसाद कोरीजी
ने मेरी तैयारी को देखते हुए अपना मानस बनाया कि वे भी इस यात्रा में शामिल हो
सकते है. इस समय तक आपके पास अपना कोई पासपोर्ट नहीं था. पुनः हम श्री बकुल
पण्ड्याजी के पास थे और आवश्यक दस्तावेक्जों के साथ पासपोर्ट बनाने के लिए आन लाइन
आवेदन प्रस्तुत कर रहे थे. पासपोर्ट
कार्यालय भोपाल में श्री कोरीजी के माह मई की किसी तारीख को उपस्थित होना था, जो
हमारे अपने समय सारिणी से मेल नहीं खाता था.. सो उन्होंने एस.डी.एम से संपर्क
साधने की कोशिश की. यह समय लोकसभा के चुवान का समय था और ऎसे समय में किसी शासकीय
अधिकारी से मिल पाना संभव भी नहीं था. संयोग से मैंने इन्टरनेट के जरिए नियमों की
जानकारी प्राप्त की कि किसी मेजर अथवा कार्यालय प्रमुख के हस्ताक्षर से तत्काल
पासपोर्ट बनवाया जा सकता है. संयोग कि श्री कोरीजी के दामाद मेजर के पद पर कार्यरत
हैं, सो उन्होंने तत्काल आवश्यक दस्तावेज हस्ताक्षरित कर भेज दिए और बैंक मैनेजर
ने भी हस्ताक्षर कर दिए, आन लाइन आवेदन भेज दिया गया. पासपोर्ट कार्यालय ने कोरीजी
को आवेदन की तिथि से दो दिन बाद उपस्थित होने एवं आवश्यक दस्तावेज लाने का निर्देश
दिया. कोरीजी वहाँ उपस्थित हुए और वे घर भी नहीं पहुँच पाए थे कि पासपोर्ट अधिकारी
ने पासपोर्ट बनाकर रजिस्ट्री डाक से भेजने बाबद मैसेज उनके मोबाईल पर दे दी. इस
तरह श्री कोरीजी इस अभियान में मेरे सहयात्री बने.
इस रोमांचक यात्रा को संपन्न कराने का
जिम्मा महिन्द्रा ट्रेवल, मुंबई ने लिया था. नागपुर में इस ट्रेवल की एक शाखा काम
कर रही है. यात्रा सुचारुरुप से संपन्न हो, इस आशा और विश्वास के साथ नागपुर के
श्री स्वपनिल वाल्केजी एवं सुश्री नीतूसिंह भी इस यात्रा के सहभागी बने. मारीशस के
हवाई जहाज की फ़्लाइट एम.के.747,प्रस्थान तिथि 23-05-2014 की सुबह 0645 तथा वापसी
29-05-2014 फ़्लाइट एम.के.748 रात के 2120 बजे की थी, टिकटें भेज दी गईं. ज्ञात हो
कि मारीशस समय और भारतीय समय में एक घंटा बत्तीस मिनट का फ़र्क रहता है. यदि भारत
में दिन के आठ बजे हैं तो मारीशस में सुबह के 06.28 बज रहे होते हैं.
दुरन्तो
हिचकौले खाती हुई अपनी निर्धारित गति से भागी जा रही थी. नींद देर रात तक आँखों से
आँखमिचौनी खेलती रही और फ़िर चुपके से, न जाने कब, आकर समा गई, पता ही नहीं चल
पाया. मेरा और कोरीजी के कोच अलग-अलग थे क्योंकि उन्होंने अपनी बर्थ का आरक्षण
किसी अन्य तिथि में किया था. बडी सुबह आकर उन्होंने ने मुझे जगाया और कहा कि हम
मुंबई के करीब पहुँच चुके हैं. कुछ समय बाद हम छत्रपति शिवाजी टर्मिनल स्टेशन पर
जा पहुँचे. दुरन्तो ( नानस्टाप)नागपुर से रवाना होकर सीधे मुंबई सीएसटी पहुँचती
है.
यहाँ
उतरने के बाद श्री कोरी टिकिटघर पहुँचे. वहाँ से उन्होंने दादर का टिकिट लिया और
अब हम उस ओर बढने लगे .दादर स्टेशन पर पहुँचने के बाद हमे बडी बेसब्री से श्री
संतोष परिहार का इंतजार था,जो किसी अन्य ट्रेन से बुरहानपुर से आ रहे थे. कुछ
इन्तजारी के बाद उनसे भेंट हुई. हमने सबने चाय पी और दादर में एक कमरा बुक करवाया.
नहाने के बाद कोरीजी और मैं “एलिफ़ैण्टा केव” देखने के लिए निकल पडॆ. परिहारजी ने
इसमें अपनी असहमति जताते हुए सूचना दी कि वे हमारे साथ नहीं जा पाएंगे,क्योंकि
पूरी रात वे ढंग से सो नहीं पाए थे.
दादर
स्टेशन से हम पुनः सी.एस.टी. पर थे. कभी यह इमारत विक्टोरिया टर्मिनल के नाम से
जानी जाती थी. बाद में सन 1996 में इसका नाम बदलकर सीएसटी
याने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल कर दिया गया. सन 1887 में
ब्रिटिश वास्तुकार फ़्रेडरिक विलियम स्टेवन्स में इस भव्य इमारत का निर्माण करवाया
था. वहाँ से बाहर निकलते ही हमें राज्य परिवहन की बस मिल गयी जो गेट-वे-आफ़-इण्डिया
जा रही थी. गेट-वे-आफ़-इण्डिया यहाँ से करीब 2.5किमी की दूरी
पर है.
अरब सागर के तट पर इस भव्य इमारत का निर्माण
जार्ज पंचम तथा क्विन मेरी के प्रथम आगमन मार्च 1911
की याद में बनाया गया था. इसकी निर्माण सन 1914 में शुरु हुआ
और यह सन 1919 में बनकर तैयार हो गयी. यहाँ से करीब दस किमी
की दूरी पर “एलिफ़ैण्टा केव” स्थित है, बोट की सहायता से जाया जा सकता है.
पांचवी से आठवीं शताब्दी के मध्य पहाड को
छेनी-हतौडी अथवा अन्य उपकरणॊं की सहायता से इसे अनाम व्यक्तियों ने बनाया, इसे
देखकर सहज ही अंदाजा हो जाता है कि इसका निर्माणकर्ता निश्चित ही भू-गर्म
वैज्ञानिक रहा होगा, जिसने पहाड के मध्य एक ठोस चट्टान को ढूँढ निकाला और अपनी कला
को प्रदर्शित कर सका. यहाँ हिन्दू धर्म से संबंद्धित अनेक शिव मूर्तियों को
विभिन्न मुद्राओं में देखा जा सकता है. इन्हें धारापुरी ची लेणी के नाम से भी जाना
जाता है..यह कभी कोकणीं मौर्य की द्वीप राजधानी हुआ करती थी. बाद में
आक्रमणकारियों ने इन शानदार मुर्तियों को बडी बेरहमी से तॊड-फ़ोड डाला. अपने समय
में ये मुर्तियाँ कितनी सुन्दर और वैभवशाली रही होंगी,इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा
सकता है.
शाम ढलने से पहले हम लौट आए थे. रात्रि का
खाना खाकर हम टैक्सी द्वारा छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जा रहे थे.
विश्व का अडतालिसवाँ एवं ,ग्यारह हजार साठ
हेक्टेयर में फ़ैले इस विशाल इंटरनेशनल एअरपोर्ट का पुराना नाम इंटरनेशनल एअरपोर्ट
था, जिसे बदलकर छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा कर दिया गया. अपनी भव्यता
और सुन्दरता के लिए यह एअरपोर्ट विश्व का तीसरा एअरपोर्ट है. इसकी आधारशिला सन 2006
में रखी गई थी, 2013 में बनकर तैयार हुआ .किसी
नाचते हुए मोर की आकृति में बना यह हवाई-अड्डा सहज ही में आपका ध्यान आकर्षित कर
लेता है.
मध्य रात्रि तक अलग-अलग प्रदेशों से आने वाले
लोग यहाँ पहुँच चुके थे. विमान में सवार होने के पहले काफ़ी कुछ किया जाना होता है.
मसलन आपके सामान का वजन, यात्रियों के सीट का निर्धारण आदि निपटाते-निपटाते काफ़ी
समय लग जाता है. अब सारे यात्री अंदर लाउंज में बैठकर उस घडी के अन्तजार में रहते
हैं,जब उन्हें विमान में सवार होना होता है. सुबह के पांच बजने वाले होते हैं.
रात्रि का गहन अन्धकार अब पिघलने लगता है और बाहर का दिलचस्प नजारा दिखाई देने
लगता है. इस ओर से उस छोर तक कई विमान पंक्तिबद्ध खडॆ दिखाई देने लगते है. वह समय
भी शीघ्र आ पहुँचा जब हम विमान में सवार होने जा रहे थे. मारीशस के विमान क्रमांक
MK-748 में मुझे 15-G वाली सीट मिली.ठीक मेरी
बगल में श्री कोरीजी की सीट थी, जहाँ लगी खिडकी से बाहर का नजारा देखा जा सकता था.
कोरीजी
कि यह पहली विमान
यात्रा थी. अतः वे काफ़ी प्रफ़ुल्लित नजर आ रहे थे. तभी पायलट की आवाज गूंजती है और
सभी से कहा जाता है कि वे अपनी-अपनी सीट-बेल्ट बांध ले. वह समय भी आ पहुँचा,जब
विमान चलते हुए अपने रन-वे की ओर बढ रहा था. अपने स्थान पर पहुँचने के बाद उसके
सारे इंजिन अपनी पूरी रफ़्तार के साथ चलायमान होते हैं..थॊडी देर तक रनवे पर दौडते
रहने के बाद विमान आकाश में उड रहा था. शुरु-शुरु में नीचे के दृष्य दिखलाई पडते
हैं,बाद में केवल और केवल नीला आकाश नजर आता है. खिडकी से विमान का डैना (पंख) भर
दिखाई देता है. हवाईजहाज करीब पच्चीस हजार फ़ीट की उँचाई पर उड रहा था. नीचे तैरते
काले-कलसीले बादलॊं की परत दिखलाई देती और दिखलाई देती दूर-दूर तक फ़ैली दो नीली
पट्टियाँ के बीच बनती एक गहरी नीली पट्टी जो समुद्र और आकाश के बीच के मिलन के
प्रगाढ संबंध को दर्शाती है.
ऊपर से कुछ ऐसा दिखाई देता है मारीशस मारीशस का
नक्शा-----
इस बीच एअर होस्टेज
सभी यात्रियों को बारी-बारी से भोजन, पानी की बोतल आदि सर्व करती हैं. जैसे-जैसे
रात्रि का पहर आगे बढता है, कुछ हल्की सी ठंड भी लगने लगती है. सभी यात्रियों की
सीट पर हल्का कंबल होता है, जिसका वह इस्तेमाल कर सकता है. हवा के झोंको पर तैरता
विमान छः घंटॆ की लम्बी उडान के बाद मरीशस एअर-पोर्ट पर उतरता है. मारीशस समय के
अनुसार दिन के ग्यारह बज रहे होते हैं. विमान से बाहर आने पर यात्रियों को
एअरपोर्ट की सारी औपचरिकता पूरी करनी होती है,जो काफ़ी लंबे समय तक चलती रहती है.
यात्री अब एअरपोर्ट के लंबे रास्ते को पार करता हुआ बाहर आता है. अब उसे अपने
सामान की चिंता सताती है. चक्र के आकार में घुमते बेल्ट पर यात्री का सामान जा
पहुँचता है.
बाहर एक यात्री बस
हमारे इन्तजार में खडी थी. बस में सवार होकर अब हम अपने निर्धारित होटल कालोडाईन
सूर मेर की ओर रवाना होते हैं, जो यहाँ से 73.1 किमी की
दूरी पर है. दिन के करीब तीन बज रहे थे और सभी को जमकर भूख लग आयी थी.
रास्ते में पडने वाले
“डेल्ही ताज” होटल में हमने स्वादिष्ट भोजन का आनन्द लिया. मोका और मारीशस की
राजधानी पोर्ट-लुई से गुजरती हुई हमारी बस कालोडाईन सूर मेर होटल के प्रांगण में
आकर रुक जाती है. इस यात्रा मे करीब देढ घंटे का समय लग जाता है. सभी यात्रियों के
अपने-अपने कमरे निर्धारित कर दिए गए थे.
होटल डेल्ही ताज के
सामने श्री संतोष पारिहार,शरद जैन और यादव (२)कोलाडाईन सूर मेर होटल
शरीर में आलस और थकान के लक्षण स्पष्ट देखे जा सकते थे. प्रायोजक ने पहले
से ही तय कर रखा था कि इस दिन केवल आराम किया जाना है..अतः(23-05-2014) को सभी ने विश्राम किया.
मारीशस
में गन्ने की खेती बडॆ पैमाने पर होती है. चारों तरफ़ छाई हरियाली देखकर मन
प्रसन्नता से झूम उठता है. आय का मुख्य स्त्रोत गन्ना ही है.
होटल
कालोडाईन सूर मेर (calodyne Sure Mer) में प्रवेश
करते ही तबीयत खुश हो जाती है. चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पॆड, सघन हरियाली,,और इन सब के
बीच चौरासी सूट्स, हर सूट के सामने बागीचा,और इन सबके मध्य में एक तरणताल. पास ही
लहराता-बलखाता समुद्र, निरन्तर बहती शीतल हवा के झोंके आपके शरीर लिपट-लिपट जाते
हैं. सारे कमरे एसीयुक्त. प्रत्येक सूट में तीन शयन-कक्ष, एक हाल, हाल से लगा
किचन. पाँच लोगो का परिवार एक सूट में रुक सकता है.
रात को को सभी ने लजीज खाने का
आनन्द उठाया और अपने-अपने कमरों में समा गए.सोने से पहले सभी को सूचित कर दिया गया
था कि सुबह सभी आठ बजे के पहले तैयार होकर चाय-नाश्ता करने के बाद “आक्स सर्फ़्स”(Aux
Cerfs) माने एक टापू पर जाने वाले है.
हम
इस टापू पर जाने से पहले मारीशस के बारे में संक्षिप्त जानकारियाँ लेते चलें तो
अच्छा होगा.
गणराज्य
अफ़्रीकी महाद्वीप के तट के दक्षिण-पूर्व में लगभग 900
किलोमीटर की दूरी पर हिंदमहासागर में और मेडागास्कर के पूर्व में स्थित एक द्वीपीय
देश है. मारीशस द्वीप के अतिरिक्त इस गणराज्य में सेंट ब्रैडन,राडीगाज और अगालेगा
द्वीप भी शामिल है. दक्षिण-पश्चिम में 200 किमी पर स्थित
फ़ांसीसी रीयूनियन द्वीप और 570 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित
राडीगज द्वीप के साथ मारीशस मस्कारेने द्वीप समूह का हिस्सा है. मारीशस की मिश्रित
संस्कृति है.,जिसका कारण पहले इसका फ़्रांस के अधिन होना तथा बाद में ब्रिटिश
स्वामित्व में आना है. पुर्तगाली नाविक पहले पहल यहाँ 1507
में आए. बसे और छोड कर चले गए. 1598 में हालेंड के तीन पोत
जो मसाला द्वीप की यात्रा पर निकले थे, एक चक्रवात में फ़ंसकर यहाँ पहुँचे.
उन्होंने इस द्वीप का नाम नासाओं के युवरात “मारिस” के नाम पर इस द्वीप का नाम
“मारीशस “रखा सन 1668 में डच लोगो ने स्थायी बस्तियाँ
बसाई.और फ़िर कुछ समय के अन्तराल में इस द्वीप को छॊड दिया. फ़ांस जिसका पहले से ही
इसके पडौस “आइल बोरबोन” द्वीप पर नियंत्रण था, ने 1715 में
फ़िर से मारीशस पर कब्जा कर लिया. इस तरह यह द्वीप एक समृद्ध अर्थव्यवस्था के रुप
में विकसित हुआ जो चीनी उत्पाद पर आधारित थी.
मारिशस ने 1968
में स्वतंत्रता प्राप्त की और सन 1992 में एक गणतंत्र बना
.मारीशस एक संसदीय लोकतंत्र है,जिसकी संरचना ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित
है. यहाँ स्थिर लोकतंत्र है. चुनाव पांच साल में नियमित और स्वतंत्र होते हैं यह
नौ जिलों में विभाजित है.
सन 1834 में
भारत से 70 यात्रियों का जत्था यहाँ गिर्मिटिया मजदूर के रुप
में पहुँचा. 1834-1930 तक यहाँ चार लाख पचास हजार भारतीय मूल
के लोग पहुँचे, जिसमें 52 प्रतिशत हिन्दू,15 प्रतिशत मुसलमान तथा 25 प्रतिशत ईसाई तथा अन्य
जातिके लोग आए. सन 1886 तक इन भारतीय़ॊं का लोकतांत्रिक चुनाव
में भाग लेना वर्जित था. बाद में सन 1901 में महात्मा
गांधीजी का यहाँ आगमन होता है. वे नौशेरा जहाज पर सपरिवार यहाँ कुछ दिन रुके थे.
उसके बाद से भारतीयों का राजनीति में प्रवेश हुआ और इस तरह 1948 में25 में से 19 भारतीय
निर्वाचित हुए. यहाँ कि अधिकारिक भाषा अंग्रेजी है. मिडिया की भाषा फ़ांसीसी है.लेकिन स्थानीय़ बोली
“क्रेयोल”(CREOLE) में जनसाधारण लोग बात करते हैं. चुंकि
यहाँ के लोग मूलरुप से भारतीय हैं,अतः वे आपस में हिन्दी ही बोलते है. सारे लोगो के नाम भी भारतीय पद्दति से रखे जाते
हैं. यहाँ पर प्रसिद्ध “गंगा तालाब” और अनेक मंदिर, मस्जिद,पगोडा आदि देखे जा सकते
हैं. प्रख्यात लेखक श्री गिरिराज जी ने गिरमिटिया मजदूरों पर एक उपन्यास लिखा
जिसका नाम “पहला गिरमिटिया” है,जिसमें भारतीय मूल के लोगों पर लिखा गया प्रसिद्ध
उपन्यास है.इस उपन्यास के कुछ अंश पढने के बाद
मन में एक जिज्ञासा जागती है और मैं इस मौके के तलाश में बना रहा कि देर-सबेर ही
सही, मैं इस द्वीप की यात्रा जरुर करुँगा.
“
“आक्स
सर्फ़्स”(Aux
Cerfs)
यह विश्व का सबसे
सुदरतम द्वीप है जिसे “धरती पर स्वर्ग” के नाम से जाना जाता है. मारीशस के पूर्वी
तट पर यह द्वीप “flacq जिले में स्थित करीब 100 हेक्टयर में फ़ैला हुआ है. “पन्ने” के सदृष्य दिखाई देने वाले इस द्वीप के
छिछले रेतीले किनारे, स्वच्छ-निर्मल जल, जिसमें गहराई तक देखा जा सकता है, किनारों
पर मूंगे के सदृष्य चमकीले पत्थर, कहीं कहीं एकदम काले पत्थरों के बीच लहलहाते
सागर का रुप देखते ही बन पडता है. इसके तट पर अनेक रेस्टारेंट देखे जा सकते हैं.
यहाँ 18 गोल्फ़ कोर्स के मैदान देखे जा सकते है.इसके किनारे
पर अनेक देशों के लोग सैर करने के लिए आते हैं. यहाँ पानी में खेले जाने वाले
अनेकों गेम खेले जाते हैं. यह द्वीप समुद्र-तट से यह करीब 4-5किमी की दूरी पर है. यहाँ पहुँचने के लिए आपको बॊट का सहारा लेना पडता है.
रास्ते में छिटॆ-छोटे निर्जन द्वीप, सघन जंगल से आच्छादित दिखलाई देते हैं.
आश्चर्य तो उस समय होता है जब हम लंबे सैर-सपाटे के बाद समुद्र तट पर पहुँचे तो
हमने छिन्दवाडा के ख्यातिलब्ध वकील श्री सिरपुरकरजी से हमारी भेंट हो जाती है. वे
भी अपने पारिवरिक-मित्रों के साथ यहाँ आए हुए थे. एक अजनबी टापू पर जब अपने किसी
स्थानीय व्यक्ति को देखते हैं तो प्रसन्नता का पारावार बढ जाता है. ( चित्र
क्रमांक 4 में वे हमारे बीच उपस्थित हैं)
सुबह
के आठ बज चुके हैं. हाटेल कालोडाईन सूर मेर के प्रांगण में तीन बसें लगाई जा चुकी
हैं. गाईड सुश्री श्वेताजी सभी को बस में बैठ जाने का आग्रह करती हैं. बारी-बारी
से लोग आते जाते हैं और अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाते हैं. एक बस में श्वेताजी, दूसरी
में सुश्री नीतूसिंह,और तीसरी में श्री स्वपनिल बतौर गाईड के सवार हो जाते हैं.
दूर-दूर तक फ़ैले गन्ने के खेतों के बीच में से बसें, अपने गन्तव्य माने मारीशस की
राजधानी लोर्ट-लुइस की तरह बढने लगती है. बेहतरीन सडकें,भव्य आलीशान इमारतों,के
बीच से गुजरती हुई हमारी बस निरन्तर आगे बढती है.
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· (राजधानी पोर्ट लुइस का विहंगम दृष्य)
· उत्तर-पूर्व में स्थित “पोर्ट लुइस” मारीशस की राजधानी है. यह
आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीति का प्रमुख केन्द्र है. यहाँ का प्रशासन मुनिसिपल
काउंसिल के द्वारा संचालित होता है. उस समय के तत्कालीन गवर्नर बर्ट्रेंड
फ़्रैंकोइस माहे दि ला बोर्डोनाइस(
Bertrand Francois Mahe de la Bourdonnais) ने तत्कालीन शासक लुइस XV
की स्मृति में सन 1735 में इस शहर की आधारशिला
रखी थी .एक आंकडॆ के मुताबिक यहाँ की जनसंख्या 148001 है. Place d’ Arms मुख्य सडक के दोनो
ओर पाम वृक्ष देखे जा सकते है. यह सडक काफ़ी सकरी है.अतः यहाँ काफ़ी भीड देखी जा
सकती है. यहाँ के मुख्य बंदरगाह के किनारे तमाम सरकारी कार्यालय,
· Ministry of Tertiary Education, Science, Research and
Technology
· Ministry of Education, Culture and Human Resources
· Human
Resource, Knowledge and Arts Development Fund
· Human
Resource Development Council
· Mauritius Qualifications Authority, दूतावास तथा फ़्रेंच कालोनियाँ है.. चुंकि सारे सरकारी
दफ़्तर यहाँ पर है, अतः दिन में आने के लिए सेंट्रल मार्केट या कैम्प दि मार्स(champ de Mars)के पास स्थित रेसकोर्स से आना होता है. रात्रि में यह सर्वसाधारण के खुला
रहता है. सचिवालय हो अन्य सरकारी इमारत हो, उसके प्रांगण में आप आराम से घूम-फ़िर
सकते हैं. न कोई रोकटोक करने वाला होता है और न ही कोई मशीनगन वाला यहाँ दिखाई
देता है .सब लोग शांति के साथ यहाँ से आना-जाना करते हैं. सडकें हों या फ़िर समूचा
शहर कचरा-कूडे के ढेर आपको दिखाई तक नहीं देते. समूचे शहर मे वाहनों की गति धीमी
रहती है. एक खास बात यह कि इस राजधानी की सडकों में चाहे भीड रहे अथवा नहीं रहे
हार्न बजाने पर सक्त मनाही है. सब लोग शांति के साथ बिना किसी प्रकार की हुज्जत
किए आराम से अपने वाहन चलाते हुए आगे बढ जाते हैं. दूसरी आश्चर्य की बात यह कि
यहाँ न तो चौराहे पर कोई पुलिस कर्मी दिखाई देता है और न ही सडक के किनारे. मारीशस
की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है, इसलिए सरकार का सारा प्रशासनिक कामकाज अंग्रेजी में
होता है. शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी के साथ फ़्रांसीसी का भी इस्तेमाल किया जाता
है. फ़्रांसीसी भाषा हांलाकि मीडिया की मुख भाषा है चाहे प्रसारण हो या मुद्रण इसके
अलावा व्यापार और उद्धोग जगत के माममॊं में भी मुख्यतः फ़्रांसीसी ही प्रयोग में
आती है. सबसे व्यापक रुप में देश में मारीशियन “क्रेयोल” भाषा बोली जाती है.
हिन्दी भी एक बडॆ वर्ग द्वारा बोली व समझी जाती है. मारीशस में विभिन्न धर्मों के
लोग रहते हैं, जिनमे हिन्दॊ धर्म 52%, ईसाई धर्म 27% और इस्लाम 14.4. एक बडी संख्या नास्तिक लोगो की भी
है.
Caudan
waterfront= विशाल समुद्र
के तट पर स्थित यह भीड-भाड वाला इलाका है. यहाँ तरह-तरह की
दूकानें, कैसिनो, सिनेमाघर,रेस्टारेंट, कैश-एक्सचैंज करने के लिए अनेक दुकाने देखी
जा सकती हैं. मुख्य सडक पर एक दुकान “abbey royal finance ltd के डायरेक्टर श्री एस.नागवाह से मेरी मुलाकात होती है. क्लिन-शेव,
मुस्कुराती आँखे देखकर मुझे लगा कि इनकी दुकान से मारीशस के छोटे नोट तथा कुछ
चिल्लर मिल सकती है. यह मात्र एक अंदाज था. मैंने उनसे नमस्कार करते हुए पूछा कि
क्या वे हिन्दी जानते हैं? उन्होंने तपाक से हाथ मिलाया और अपना परिचय देते हुए
कहा कि उनके पूर्वज हिन्दुस्थानी ही थे, उनकी आत्मीयता देखकर मुझे बडी प्रसन्न्ता
हुई. मेरे लिए यह पहला अवसर था कि मैं वहाँ के किसी स्थानीय व्यक्ति
से
बात बात कर रहा था. उन्होंने न सिर्फ़
हमें अन्दर बुलाया, बल्कि ऊपर बने छज्जे पर भी ले गए. दुकान छॊटी श्रीनागवाहजी के साथ होने की वजह से ऊपर भी जगह
कम थी,लेकिन उस जगह में अलमारियाँ भी रखी थीं,जिनमे हिन्दी की कीकिताबें भरी पडी
थी. एक छोटे से टेबल पर कंप्युटर भी रखा हुआ था. बैठ चुकने के बाद उन्होंने पानी पिलाया
और चर्चा का दौर चल पडा. कंप्युटर खोलकर मैंने rachanakar.org “रचनाकार” में प्रकाशित मेरी कहानियाँ, आलेख और कविताएँ दिखलाया. यह सब
देखकर उन्हें अत्यंत प्रसन्न्ता हुई.
दिनांक
27 मई 2014
दिन मंगलवार
26 मई 2014 में हमने टामारिन्ड जलप्रपात(Tamarind waterfall), -ट्राऊ आक्स सर्फ़्स(Trou aux cerfs)तथा चामरेल कलर्ड
अर्थ(chamarel coloured earth) का भ्रमण किया था, जिसके मोहक
सम्मोहन से अभी हम उभर भी नहीं पाए थे कि रात्रि के लगभग आठ बजे श्री राजनारायण
गुट्टीजी ( कला एवं सांस्कृतिक मंत्रालय में सलाहकार), श्रीमती अलका धनपतजी
(वरिष्ठ प्राध्यापक महा.गांधी संस्थान) का आगमन होता है. राष्ट्रपति भवन के
सूत्रों से प्राप्त जानकारी देते हुए आपने बतलाया कि मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम
मान.श्री कैलाश प्रयागजी ने मुलाकात के लिए दोपहर एक बजे का समय निर्धारित किया
है. निश्चित ही यह खबर पाकर हम प्रफ़ुल्लित थे और अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर
रहे थे कि हमें देश के प्रथम पुरुष से मुलाकात करने का सुअवसर प्राप्त होने जा रहा
है.
.कार्यक्रम की
रुपरेखा बनाई जाने लगी. इसमें यह तय किया गया कि हम सुबह शीघ्र तैयार होकर पहले महात्मा
गांधी संस्थान (मोका) जाएंगे और संस्था की निदेशक डा श्रीमती व्ही.डी.कुंजलजी से
तथा वहाँ कार्यरत सभी प्राध्यापकों से मुलाकात करेंगे. इस कार्यक्रम की रुपरेखा
श्रीमती अलका धनपतजी ने पहले से बना रखी थी. सुबह आठ बजे हम सबने चाय और नाश्ते का
लुफ़्त उठाया. होटेल के प्रांगण में बसें
लगाई जा चुकी थी. हम
ठीक नौ बजे मोका के लिए प्रस्थान करते हैं. हरी- भरी वादियों के बीच से
सरपट दौडती हमारी बस महात्मा गांधी संस्थान के प्रागंण में प्रवेश करती है.
महात्मा गांधी संस्थान की आधारशिला भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा
गांधीजी तथा मारीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलामजी ने 3
जून 1970 में रखी थी. .इसी के साथ ही विश्व
कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान की भी स्थापना की गई थी जिसमें भारतीय कला,
संस्कृति, संगीत,नृत्यकला आदि का समावेश किया गया था. इस संस्था में सभी भारतीय
भाषाओं के पाठ्यक्रम शुरु किए गए हैं,जो हम सभी के लिए गौरव का विषय है.
कुछ चुनिंदा मित्रों
को साथ लेकर श्रीमती अलका धनपतजी ने संस्था की निदेशक डा.श्रीमती कुंजलजी से
मुलाकात करवाई.
( बाएं से दांए=गोवर्धन यादव,संतोष परिहार,श्री
अय्यरजी,,डा.गंधारे जी ,श्रीमती कुंजल(निदेशक),बुंदेलेजी.कोरीजीएवं
श्री मफ़तलालजी )
इस मुलाकत के दौरान
मैंने अपना कहानी संग्रह “महुआ के वृक्ष”, तथा ,तीस बरस घाटी, श्री कैलाश पंतजी (
मंत्री-संचालक हिन्दी भवन भोपाल)की किताब संस्कार,संस्कृति और समाज, श्रीयुत
कॄष्णकुमार यादवजी( निदेशक “डाक” इलाहाबाद) की पुस्तकें सोलह आने सोलह लोग,
अभिलाषा(काव्य संग्रह) जंगल में क्रिकेट तथा श्रीमती आकांक्षा यादव की चांद पर
पानी (दोनो बालगीत) इस निवेदन के साथ दी कि वे कृपया इन किताबों को अपने संस्थान
के वाचनालय में स्थान देंगी..श्री संतोष परिहारजी ने भी अपना उपन्यास “रंगरेजवा”
की एक प्रति दी. उन्होंने आश्वासन दिया कि सारी किताबें वाचनालय में रखी जाएगी जो
मारीशस के लोगो को आपसे जोडॆ रखने के लिए “सेतु” का कार्य करेंगीं
एक बडॆ हाल में मोका के सभी प्राध्यापकगणॊं से
हमारी मुलाकात करवाई गई. एक के बाद एक प्राध्यापक सामने आता और अपना परिचय देता
.सभी के मन में एक अजीब सा उत्साह था. उत्साह इस बात को लेकर कि उनके पूर्वज भारत
से ही यहाँ आए थे. इसी क्रम में भ्रमण-दल का एक-एक व्यक्ति सामने आता और अपना
परिचय देता. अपना परिचय देते, हुए अन्त में मैंने राष्ट्र भाषा प्रचार समिति,
हिन्दी भवन भोपाल के मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पंतजी तथा वर्धा समिति से इस
यात्रा के संयोजक श्री नरेन्द्र डंढारेजी के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि
आपके अथक प्रयासों से यह यात्रा संभव हो पाई है. मैं आभारी हूँ डा. अलका धनपत का,
जिन्होंने इस मुलाकात के कार्यक्रम की रुपरेखा बनायीं. मुझे अत्यधिक प्रसन्नता इस
बात को लेकर भी हो रही है कि मैं अपने हिन्दुस्थानी भाईयो और बहनो से मिल रहा हूँ,
जो हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दे रहे हैं. आप लोगो की
मिलनसारिता, सहृदयता, सहजता और सरलता देखकर मुझे यह कभी महसूस नहीं हुआ कि मैं
भारत से बाहर मारीशस में रह रहा हूँ”
कार्यक्रम के समापन
के पश्चात वहाँ स्वल्पाहार तथा चाय की व्यवस्था की गई थी. सभी ने साथ मिलकर
(१) राष्ट्रपति भवन
के मुख्य कक्ष में शिष्ठमंडल (२) कक्ष में बाएं से दाएं श्री विकास काले,संतोष
परिहार,गोवर्धन यादव,प्राचार्य पडॊडॆजी आदि
(३) श्री शरद जैन (दायीं ओर)
चाय और नाश्ते का
आनन्द लिया. समय अपने पंख फ़ैलाए द्रुतगति से उडा चला जा रहा था. दिन के साढे बारह
कैसे बज गए, पता ही नहीं चल पाया. अब हमें राष्ट्रपति भवन की ओर रवाना होना था.
वहाँ पहुँचने के बाद
हमसे कहा गया कि अन्दर जाने से पहले अपने-अपने मोबाईल तथा कैमरे बाहर रख दें. ऎसा
करने के बाद हमने एक आलीशान-सुसज्जित हाल में प्रवेश किया. दोनो ओर करीने से
कुर्सियाँ लगी हुई थीं. सभी के मन में अपार प्रसन्न्ता के साथ उत्सुकता भी थी कि
उनकी मुलाकात मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री कैलाश प्रयागजी से होने जा रही
है. माननीय महोदय के आने से पूर्व हाल में उपस्थित प्रख्यात साहित्यकार एवं
राष्ट्रपतिजी के सलाह्कार श्री राज हीरामनजी दिशा निर्देश दे रहे थे. आपके अलावा
हाल में पुलिस के दो उच्च अधिकारी तथा एक गनमैन उपस्थित था. मुझे ही नहीं, प्रायः
सभी के मन में यह प्रश्न जरुर तैर रहा होगा कि काश वे भारत के राष्ट्रपतिजी से
मिलने जाते तो वहाँ का नजारा कुछ और ही होता. बडॆ-बडॆ आला-अफ़सर, संगीनो से लैस
पुलिस के अधिकारी वहाँ तैनात होते और बारी-बारी से सभी की गहन तलाशी ली जाती. तब
कहीं जाकर वे हाल में प्रवेश कर पाते. लेकिन यहाँ का नजारा कुछ और ही था. प्रवेश-द्वार
पर न तो किसी की तलाशी ली गई और न ही उन्हें संदेह भरी दृष्टि से देखा गया. बस
इतना जरुर कहा गया कि वे अपने कैमरे और मोबाईल एक टेबुल पर रख दें, और हाल में
शांति के साथ बैठ जाएँ. सभी की निगाहें उस विशाल दरवाजे पर टिकी हुईं थीं, जहाँ से
माननीय महोदयजी का आगमन होना था.
ठीक एक बजे वह दरवाजा
खुलता है. महामहिम उससे निकलकर अपने निर्धारित स्थान की ओर बढते हैं.आपके आगमन के
साथ ही हाल में उपस्थित सभी अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोडकर खडॆ हो जाते हैं. वे
मुस्कुराते हुए आगे बढ जाते हैं और सभी का अभिवादन कर अपनी कुर्सी पर विराजित हो
जाते हैं. उनका सौम्य व्यक्तित्व और चेहरे पर छाई प्रसन्नता का उद्वेग देखकर मन
गदगद हो उठता है.
श्री राज हीरामनजी,
महामहिमजी को संबोधित करते हुए, हम लोगो के आगमन और प्रयोजन के बारे में बतलाते
हैं. और अत्यंत ही विनम्रता के साथ निवेदित करते हुए कहते हैं कि भारतीय शिष्ट
मंडल आपका स्वागत करना चाहता है. आपकी स्वीकृति पाकर अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था,
वर्धा के अध्यक्ष श्री वैध्यनाथ अय्यरजी महामहिम को शाळ ओढाकर श्रीफ़ल भेंट में
देते हैं. उसके बाद संस्था के महासचिव-संयोजक श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी महामहिम को
पुष्प-माला पहनाकर अभिनन्दन करते हैं. इसी क्रम में श्री संतोष परिहारजी अपनी एक
कृति महामहिम को समर्पित करते हैं
इस अभिनन्दन समारोह
के पश्चात श्री हीरामनजी महामहिमजी से निवेदन करते हुए अनुनय करते हैं कि वे
शिष्ठमंडल को संबोधित करें. महामहिमजी ने शिष्ट मंडल का स्वागत करते हुए भोजपुरी
में अपना संक्षिप्त उदबोधन देते हुए हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार के लिए
निरन्तर प्रयास करते रहने के लिए आग्रह किया. आपके ओजस्वी उद्बोधन के पश्चात श्री
हीरामनजी ने आपसे अनुरोध करते हुए कहा कि शिष्टमंडल आपके साथ फ़ोटोग्रुप लेना चाहता
है. आपने कितनी सहजता के साथ स्वीकृति प्रदान कर की, यह बात हमारे सबके मन को
प्रफ़ुल्लित कर गई.
महामहिम राष्ट्रपतिजी के साथ शिष्ठ मंडल
आज मंगलवार है. निश्चित ही आज का दिन हम सबके
लिए मंगलकारी सिद्ध हुआ कि हमारी मुलाकात मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री कैलाश
प्रयागजी के साथ हुई. इससे पूर्व हमारी मुलाकात उन हिन्दी सेवियों से हुई जो
महात्मा गांधी संस्थान से जुडकर गौरवगाथा लिख रहे हैं.
राष्ट्रपति भवन के प्रांगण के दृष्य
पोर्ट
लुईस के कुछ चित्र( १ से ९ )
संकरे
रास्ते में स्थित एक होटल में ( अब नाम याद नहीं) हमने खाना खाया,( चित्र-१) जिसके प्रवेश-द्वार पर छतरियाँ तनी हुई थी. सडक के बाएं तरफ़
संगीतकारों की एक टोली अपने में मगन, वाद्ध-यंत्रों पर सरगम छेड रही थे.(चित्र-२)
अपने चेहरे पर रंगबिरंगी आकृति और कपडॊं पर भी आकृति काढे यह अनाम व्यकि ने
मेरे लाख प्रयास करने के बावजूद अपनी
तस्वीर नहीं उतारने दी. जब भी मैं उसकी ओर अपना कैमरा करता, वह मुस्कुराते हुए
अपना चेहरा दूसरी ओर मोड लेता था. जब वह पास से गुजर रहा था, तब भी उसने वही
हरकतें की. जब वह थोडा आगे बढा तो मैंने उसकी यह तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर
लिया (मारीशस के यशस्वी लेखक श्री रामदेव धुरंधरजी ने बतलाया कि इनको “कृओल”कहते
हैं इन लोगो को अफ़्रीका से मजदूरी करवाने के लिए यहाँ की तत्कालीन सरकार ने लाया
था,लेकिन ये कामचोर निकले.(चित्र-३) पास ही में मारीशस के यशस्वी प्रधानमंत्री
स्व.श्री शिवसागर रामगुलाम की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है.(चित्र-४) बंदरगाह
पर अनेक छोटे-छोटे जहाज लंगर डाले हुए थे. हमने इन्हें अपने कैमरे में कैद किया (
चित्र-५) . पास ही में बंदरगाह पर स्थित वह जगह है, जिसे “अप्रवासी घाट” के नाम से
जाना जाता है,जहाँ कभी भारतीयों को ठेके पर अथवा बंदी बनाकर खेती करवाने के लिए
लाया जाता था. ये गिरमिटिया मजदूर कहलाए. जहाज से उतारकर उन्हें (चित्र-६) इस रास्ते से अन्दर लाया जाता था. (चित्र -७) यहाँ पर अंग्रेज रहा करते
थे,तथा उनके घोडॆ को रखने के लिए एक अस्तबल भी बना हुआ है. प्रत्येक मजदूरों को एक
नम्बर अलाट किया जाता,था और उस नम्बर को दीवार पर लिख दिया जाता था( चित्र-८). बाद
की कार्यवाही में उस नम्बर के आधार पर उसकी फ़ाइल बनाई जाती थी,जिसमे उसका नाम,
स्थान का नाम, परिवार के लोगों के नाम आदि दर्ज किए जाते थे.( इन तमाम दस्तावेजॊं
को मारीशस के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है.).यह वह स्थान है जहाँ मजदूरों को
रखा जाता था(चित्र-९)
इस
स्थान को देख लेने के पश्चात अब हम म्युजियम की ओर प्रस्थान करते हैं. हमारे साथ
होती हैं डा.श्रीमती अलका धनपतजी, जो महात्मा गांधी संस्थान में हिन्दी की वरिष्ठ
प्राध्यापिका हैं. वे उस संस्थान का कोना-कोना दिखलाती हैं. इस म्युजियम में उन
तमाम चीजों को बडॆ जतन के साथ सुरक्षित रखा गया हैं,जिन्हें मजदूर अपने साथ यहाँ
लाए थे. कांच के बने अलग-अलग प्रकोष्ठों में खाना पकाने के बर्तन, कपडॆ-लत्ते, कुछ
मुखौटे, श्रम करते मजदूर की झांकी, गैती-फ़ावडा, गीता-रामायण, सुखसागर कुछ
वाद्ध-यंत्र,आदि करीने से सजाकर रखे हैं. कुछ प्रकोष्ठॊं में उनके रहन-सहन को
दर्शाया गया है, और कुछ में उनके कठिन परिश्रम की झांकी प्रस्तुत की गई है. इन्हें
ग्राउण्ड-फ़्लोर पर कडी मेहनत के साथ व्यवस्थित रखा गया है. इन साब चीझॊं को देखकर
लगता है कि
.
कि
कितनी कडी मेहनत करते हुए उन्होंने अपने दिन बेबसी और लाचारी में गुजारे थे.
अफ़्रीका मूल के भी मजदूर यहाँ लाए गए थे,लेकिन वे उतनी कडी मेहनत नहीं कर पाए.
भारतीय मजदूर जो यहाँ आकर “गिरमिटिया” कहलाए, उन्होंने मारीशस को स्वर्ग की तरह
बना दिया है.
सीढियाँ
चढते हुए हम अब ऊपर के कक्ष की ओर बढते हैं.जहाँ प्राचीन ग्रंथ,लेख आदि को बडॆ
मनोयोग से संभालकर रखा गया है. ऊँचें कद-काठी के श्री देव काहुलेसुरजी ( Dev
Cahoolessur ) जो इस कक्ष के प्रमुख हैं, मुस्कुराते हुए हम सब का
स्वागत करते है. वे एक-एक चीज पर गहराई से प्रकाश डालते हुए
हमें इतिहास के उस काल-खण्ड की ओर ले जाते हैं, जब भारतीय मजदूर एक सौ अस्सी साल
पहले गुलाम अथवा बंधुआ मजदूर के रुप में यहाँ लाए गए थे, अपने साथ गीता,
रामायण,सुखसागर भी लाए थे और कठोर श्रम करने के बाद, मन को तसल्ली देने के लिए
इनका पाठ करते और वाद्दयंत्रों को प्रयोग में लाते थे. उन तमाम ग्रंथॊं को एक बडॆ
कांच के पेटीनुमा कक्ष (चित्र-६) में सम्भाल कर रखा गया है. दूसरे कक्ष में
मजदूरों के माईग्रेशन सर्टिफ़िकेट, रजिस्टर आदि रखे गए हैं और कांच के एक कमरानुमा
कक्ष में उस समय का सारा लेखा-जोखा (चित्र-४) सुरक्षित रखा गया है, जिसमें हर व्यक्ति
की बारिक से बारिक जानकारियाँ उपलब्ध हैं.
हाटॆल
कालोडाइन सूर मेर के मालिक हों, मैनेजर हों, या फ़िर वहाँ काम कर रहे अन्य
शाखा-प्रशाखा के कर्मचारी हों, जब आप उनसे मुखातिब होते हैं तो उनके चेहरे पर एक
प्रसन्नता का स्थायी भाव स्पष्ट द्दिखाई देता है. आप जो भी उनसे पूछना-अथवा जानना
चाहें, वे बडी ही विनम्रता के साथ आपके साथ वार्तालाप करते हैं और आपकी समस्याओं
को तत्काल दूर करने का उपक्रम करते हैं. और जब आप उनके अतीत के बारे में जानना
चाहते हैं तो बडी ही आत्मीयता के साथ बतलाते हैं कि उनके पूर्वज भारतीय थे, जो बिहार
में रहा करते थे. इस समय उनके गर्वोक्ति के साथ ही उनके मन में विस्थापन की जो
पीडा रही है, स्पष्ट ही परिलक्षित होती है.इसी प्रकार जब आप सुसज्जित मेस में
पहुँचते हैं, वहाँ का भी कर्मचारी आपसे मुस्कुराते हुए आपका स्वागत कराता है और
खाना खाने के पश्चात आपसे यह पूछना नहीं भूलता कि आपको आज का खाना पसंद आया अथवा
कोई कमी रह गयी. हर व्यक्ति कि विनम्रता-शालीनता और व्यवहार कुशलता जिसमेम कहीं भी
बनावटीपन दिखाई नहीं देता, देखकर, आप यह महसूस ही नहीं कर पाते कि आप अपने देश से
बाहर रह रहे हैं.
दिनांक 28 मई 2014
मारीशस यात्रा पर आए हुए 120 घंटॆ,= 7200 मिनट,= 432000 सेकंड कैसे बीत गए पता ही नहीं चल पाया. हर दिन एक
नया दिन और एक नयी रात होती. आँखों में मीठे हसीन सपने पल रहे होते. रोज प्रकृति
के नित-नूतन श्रॄंगार को खुली आँखों से देख प्रफ़ुल्लित हो उठता. मन में कई विचार
अंगडाइयाँ लेने लगते. साथ यात्रा कर रहे लोग,पहले तो अजनवी से मिले, फ़िर इतने घुलमिल गए, मानो बरसों की पहचान रही हो. यह बात अलग है कि यात्रा की समाप्ति के
बाद लोग एक दूसरे को कितना याद रख पाते हैं, कितना नहीं. लेकिन कुल मिलाकर एक पूरा परिवार सा बन चुका था. लोग अपनी
सुनाते, दूसरों की सुनते और इस तरह दिन पर दिन कैसे पंख
लगाकर उडते चले गए, पता ही नहीं चल पाया.
आज यात्रा का यह छटवां
दिन है. यह खास दिन था हम सबके लिए. आज का दिन भाषणॊं का दिन था, कविता पाठ करने का दिन था. सब अपनी-अपनी तैयारी के
साथ आए थे. सभी ने कुछ न कुछ लिख रखा था सुनाने के लिए. इसके साथ ही एक खास बात यह
भी जुड गई थी कि मारीशस के नामी/गिरामी साहित्यकरों से मुलाकात जो होने जा रही थी.
यात्रा संयोजक श्री नरेन्द्र दंढारेजी ने काफ़ी समय पूर्व उन्हें ईमेल/पत्र/फ़ोन
द्वारा इस कार्यक्रम में शरीक होने के लिए आमंत्रण दे रखा था. श्रीमती अलका धनपतजी
( वरिष्ठ प्राध्यापिका ),श्री रामदेव धुरंधरजी (ख्यातिलब्ध सहित्यकार), श्री राज हीरामनजी ( वसंत -तथा रिमझिम पत्रिका के
वरिष्ठ सहा. संपादक तथा पत्रकार),तथा
श्री राजनारायणजी गुट्टी (कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार) से जब-तब
मुलाकातें हो जाया करती थी. वे अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की रुपरेखा बनाते और
उसमें अथक सहयोग प्रदान करते.
दिन का ग्यारह बज रहा है.
अब हमें इन्तजार था अतिथियों के आगमन का. एक के बाद एक आते रहे. नरेन्द्र भाई उनका
भाव-भीना स्वागत करते. फ़िर अन्य लोगों से मिलते
-
बतियाते और अपने
निर्धारित
स्थान पर जा बैठते. ठीक
ग्यारह बजे कार्यक्रम. श्री वैधनाथ अय्यर की अध्यक्षता में एवं श्री राज हीरामनजी
के मुख्य आतिथ्य में शुरु हुआ. डा.श्रीमती वंदना दीक्षित ने मंच का कुशलतापूर्वक
संचालन किया. वे बारी-बारी से वक्ताओं को बुलाती, वे अपना वक्तव्य देते हैं. चुंकि वक्ताओं की सूची काफ़ी लंबी थी और
दोपहर के दो बजने वाले थे, भोजन का भी समय हो चला था. अतः श्री हीरामनजी के
उद्भोधन के पश्चात इस सत्र का समापन करना पडा.
श्री हीरामनजी ने अपने
वक्तव्य में हिन्दी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा;-“ वे हिन्दी में बोलते हैं,हिन्दी में अपना साहित्य रचते है,हिन्दी का सम्मान करते हैं और हिन्दी से ही
सम्मानीत होते हैं. हिन्दी उनकी शान है, संस्कृति का आधार है, हमारी पहचान है. महात्मा गांधी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि बापू
हमारे देश में केवल एक बार सन 1901 में कुछ दिन के लिए आए थे. उनके आगमन के साथ ही हमारी सोच में व्यापक
परिवर्तन आया. हमने अपना स्वरुप पहचाना. हमने गांधी को अपने हृदय में स्थान दिया, जबकि वे भारत से थे, उन्हें वहाँ केवल सरकारी नोट में स्थान दिया गया.” अपनी घनीभूत होती पीडाओं को शब्दों का जामा पहनाते
हुए उन्होंने एक लंबा वक्तव्य दिया.
श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी
ने विषयों का चयन बडी सूझ-बूझ से किया था, वे इस प्रकार थे.....
(१) विदेश में भारत (२) हिन्दी के विकास में
विदेशी/प्रवासी लेखकों की भूमिका (३) वैश्वीकरण की हिन्दी प्रसार में भूमिका (४)
मोरीशस में हिन्दी शिक्षा में युवाओं का योगदान (५) युवा पीढी में हिन्दी बोध (६)
जनभाषा और हिन्दी (सहोदर संबंध)
भोजन के पश्चात दूसरे
सत्र का आगाज हुआ. मारीशस के कला एवं संस्कृति मंत्री मान.श्री मुखेश्वर चुनीजी के
विशिष्ठ आतिथ्य ,श्री डा.श्रीमती व्ही. डी.कुंजल( निदेशक महात्मा
गांधी संस्थान, मारीशस. के मुख्य आतिथ्य एवं श्रीवैध्यनाथ अय्यर
की अद्ध्यक्षता में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ. श्रीमती काले एवं.डा.सुश्री भैरवी
काले ने भारतीय परम्परा का निर्वहन करते हुए स्वागत गीत गाया.
मंच पर बांए से दांए (१)
श्रीराजनारायण गुट्टी( कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सलाहकार (२) डा.श्रीमती
व्ही.डी.कुंजल (निदेशक, महा.गांधी संस्थान) (३) श्री गंगाधरसिंह सुकलाल “गुलशन”(डिपटी सेक्रेटरी जनरल,विश्व हिन्दी सचिवालय. (४) मान.श्री मुखेश्वर मुखीजी( कला एवं
संस्कृति मंत्री) (५)श्री वैध्यनाथ अय्यर ( अध्यक्ष अभ्युदय संस्था, वर्धा (५) श्री नरेन्द्र दण्ढारे ( महासचिव-संयोजक,वर्धा)
कुछ प्रतिभागी अपना
वक्तव्य देने में शेष रह गए थे, उन्होंने अपने आलेखों का वाचन किया. इस क्रम में म.प्र.राष्ट्रभाषा
प्रचार समिति के संयोजक श्री गोवर्धन यादव ने अपना आलेख “हिन्दी-देश से परदेश तक”, संस्था सचिव श्री नर्मदा प्रसाद कोरी, बुरहानपुर के श्री संतोष परिहार, खण्डवा के श्री शरदचन्द्र जैन ने अपने-अपने आलेखों
का वाचन किया.
यादव अपने आलेख का वाचन
करते हुए(२)श्री कोरी वाचन करते हुए (३) श्री मफ़तलाल पटेल वाचन करते हुए
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मेरे परम मित्र श्री रामदेव जी
धुरंधर.
सभागार के कुछ दृष्य
चित्र क्रमांक (३) तीन
में श्री मफ़तलालजी पटेल( एम.ए.पीएचडी, संपादक “अचला”पत्रिका इस यात्रा में सहभागी रहे. यहाँ यह बात विशेष उल्लेखनीय थी
कि आपकी पत्नी श्रीमती आनन्दी बेन गुजरात के मुख्य मंत्री पद की शपथ ले रही थी,जब कि वे हमारे साथ थे. वे अहमदाबाद से अपनी
भांजियों को लेकर बीस मई को ही रवाना हो चुके थे, तब वे यह नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी मुख्य मंत्री बनायी जाने वाली
हैं.
मंचासीन सभी विद्वतजनों
के संभाषण के पश्चात विशिष्ठ अतिथि मान.श्री मुखेश्वर मुखी (कला एवं संस्कृति
मंत्री-मारीशस) के हस्ते सभी विद्वतजनो/पत्रकारो/साहित्यकारों/बुद्धीजीवियों का
सम्मानीत किया गया.
सम्मानीत होने वालों के
नाम इस प्रकार हैं:- श्री अतुल पाठक(सुरत)/ डा. वन्दना दीक्षित
(नागपुर),/ डा. अनन्तकुमार नाथ(तेजपूर-आसाम)/डा. मफ़तलाल
पटेल(अहमदाबाद)/डा. उषा श्रीवास्तव( बंगलूरु)/ डा.पी.सी.कोकिला (चैन्नई)/डा.
मधुलता व्यास (नागपुर)/डा. वामन गंधारे( अमरावती)/ डा. शंकर बुंदेले(अमरावती)/
गोवर्धन यादव (छिन्दवाडा)/ शरदचन्द्र जैन (खंडवा)/श्रीमती सुजाता सुर्लेकर(गोवा.)/श्रीमती
वासंथी अय्यर(नागपुर)/संतोष परिहार(बुरहानपुर)/पाण्डुरंग भालशंकर(
वर्धा)/नर्मदाप्रसादकोरी(छिन्दवाडा)/विकास काले (वर्धा)/सुश्री हीना शाह(अहमदाबाद)
(२)अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा द्वारा मारीशस के साहित्यकारों का सम्मान
किया गया. उनके नाम इस प्रकार हैं
मान.श्री मुखेश्वर
चुनीजी( कला एवं संस्कृति मंत्री मारीशस) (२) श्री राजनारायण गति( अध्यक्ष हिन्दी
स्पिकिंग युनियन,)
(३) डा.अलका धनपत (
महा.गांधी संस्थान) (४) श्री धनपत राज हीरामन (महा.गांधी संस्थान) (५) श्री
प्रल्हाद रामशरण (पोर्ट्लुई) (६) श्री रामदेव धुरंधर(पोर्टलुई) (७) श्री इन्द्रदेव
भोला (पोर्टलुई) (८) डा.श्रीमती व्ही.डी.कुंजल( निदेशक महा.गांधी संस्थान) (९)
श्री धनराज शंभु (पोर्टलुई) (१०) डा श्रीमती.विनोदबाला अरुण( पोर्टलुई),(११) श्री सूर्यदेव सिबोरत(पोर्टलुई) (१२)
डा.श्रीमती रेशमी रामधोनी( पोर्टलुई) (१३) डा.हेमराज सुन्दर (पोर्टलुई) एवं
श्रीमती उषा बासगीत(पोर्टलुई)
हमारे टूर यात्रा के संयोजक मित्र श्री
नरेन्द्र दंढारे जी.
कार्यक्रम के समापन के
बाद गोवर्धन यादव की अध्यक्षता में श्री संतोष परिहार ने काव्य-मंच का संचालन किया,जो देर रात तक चलता रहा. कवि-गोष्ठी के समापन पर
श्री नर्मदा प्रसाद कोरी ने सभी उपस्थित विद्वतजनॊं के प्रति आभार व्यक्त किया.
दूसरे सत्र की शुरुआत के
समय डा. अलका धनपतजी, आकाशवाणी मारीशस के कार्यक्रम अधिकारी को साथ लेकर
आयीं. उन्होंने मुझे सभाग्रह से बुलाकर इस बात की सूचना दी कि आपका साक्षात्कार
रिकार्ड किया जाना है. मेरे अलावा रिकार्डिंग श्री दण्ढारेजी, एवं संतोष परिहार कि की जानी थी,लेकिन परिहार का नाम उसी क्षण मंच पर आलेख वाचन के
लिए पुकारा गया. शायद इसी वजह से उनका साक्षात्कार रिकार्ड नहीं हो सका. पास ही के
एक हाल का चुनाव किया गया,जहाँ शोरगुल बिल्कुल भी न था. मेरे साक्षात्कार के
बाद उन्होंने मुझे बधाइयां देते हुए कहा कि आपका साक्षात्कार बहुत ही जानदार रहा
है और इसका प्रसारण 7 जून 2014 को होगा. चुंकि हमें 29 मई को मारीशस से रवाना हो जाना था. अतःमैंने उनसे निवेदन किया था कि
यदि कार्यक्रम अधिकारी इसकी रिकार्डिंग की एक प्रति मुझे भेज देंगे, तो उत्तम रहेगा.जैसा की उन्होंने बतलाया भी था कि
इसे आप अपने कंप्युटर पर भी सुन सकते हैं,लेकिन मेरी इसमें इतनी दक्षता नहीं थी कि उसे सुन सकूं आप सभी जानते
ही हैं कि सरकारी नियमों के अधीन ऎसा किया जाना संभव नहीं है. बाद में ईमेल के
जरिए डा. धनपत ने मुझे उसके प्रसारित हो जाने बाबद सूचना प्रेषित की. मैंने उन्हें
हृदय से धन्यवाद देते हुए आभार माना कि उन्होंने कम समय में मेरे लिए इतना परिश्रम
किया. ( ईमेल की प्रति संलन्ग है)
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नमस्कार जी
आपका कार्यक्रम टेलीकास्ट
हो चुका है .भेजना मुश्किल है.
अलका
29 मई 2014
मन की स्थिति बडी विचित्र
होती है. वह कब प्रफ़ुल्लित होकर तितली बन कर आसमान में जा उडेगा और कब उदासी का
चादर ओढकर गुमसुम सा रहने लगेगा,कोई
नहीं जान पाता. समझ में नहीं आता कि अक्सर ऎसा क्यों होता है हम सबके साथ ? इस पर यदि गंभीरता से विचार करें तो काफ़ी हद तक
समझ में आने लगता है. यह स्थिति मेरे लिए ही नहीं बन पडी थी,बल्कि हम सबके साथ कुछ ऎसा ही हो रहा था. मैंने
अपने मित्र से इसका कारण जानना चाहा तो सिर्फ़ इतना कहा कि आज मन कुछ उदास-उदास सा
है..बस. ऎसा क्यों है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ.
दरअसल इस उदासी का मुख्य
कारण यह था कि हम विगत छः दिनों से मारीशस में रहते हुए मौज-मस्ती कर रहे थे. सुबह
जल्दी उठ जाते. सारे नित्य क्रिया-कलाप से निजाद पाकर नाश्ते के टेबल पर जा
पहुँचते. और नाश्ते के बाद कैंटिन में बनी “रामप्यारी” का घूँट हलक के नीचे उतारते और बीच-बीच में
बतियाते जाते. चाय तो आखिर चाय ही होती है,लेकिन “रामप्यारी चाय” का अपना स्वाद है और पीने पर मिलने वाला आनन्द ही कुछ और है. चाय हलक
के नीचे उतर भी नहीं पाती है कि श्वेताजी( गाइड) की आवाज गूंजने लगती है. वे सभी
से निवेदन करती हैं कि जल्दी से बस में जाकर बैठ जाइए. आज हमें फ़लां-फ़लां स्थान पर
जाना है, और हम सब शीघ्रता से वहाँ से रवाना हो जाते. और
फ़िर पहुँच जाते किसी सुरम्य वादियों की गोद में. आज इन सब पर विराम लगने वाला है.
आज दोपहर बाद हमें होटेल कालोडाईन सूर मेर को अलविदा कह देना है. अलविदा कह देना
है इम्तियाज को, मनोज को, विनय को,नीलेश को, आनन्द को और राजेन्द्र को, जो बडॆ मनुहार से नाश्ता करवाते और रामप्यारी पिलवाते. अलविदा कहना
होगा श्वेताजी को,जो हमारे साथ विगत छः दिनों से बनी रहती थीं. जब
वे किसी दूसरी बस में जा बैठती तो लोग उनसे मनुहार करते कि वे कृपया हमारी बस में
आकर बैठें. श्वेताजी एक हैं और हर व्यक्ति चाहता है कि वे उनकी बस में बैंठें.
कैसे संभव है कि एक व्यक्ति हर जगह कैसे उपस्थित रह सकता है. इतने कम दिनों में
इतना अनुराग.! अब आप ही बतलाएं कि कैसे हम अपने मुँह से उन्हें अलविदा कहेंगे ?
(बाएं से दाएं=श्वेतासिंह,स्वपानिल तथा नीतूसिंह,)
शायद अब समझ में आया होगा
आपको कि मन की स्थिति आज क्यों डांवाडॊल है? इतने कम समय में वे हमारे अपने से हो गए थे. उनका शिष्ठाचार के साथ
मिलना, बतियाना, उनका सेवाभाव देखकर मन से सहजरुप से उन्हें परिवार का एक सदस्य बना
लिया था. आज उन सबसे दूर चले जाना है. यह तो सभी जानते थे कि विजा की अवधि समाप्त
हो जाने के बाद, उन्हें जाना ही होगा,लेकिन कम समय में किसी को अपना बना लेना या बन
जाना,कितना सहज होता है और जब बिछुडने की बात आती है तो
स्वाभाविक है कि मन उदासी में घिरने लगता है. यह भी उतना ही सच है कि एक लंबे
अंतराल के बाद अपना परिवार याद आने लगता था. याद आने लगते थे अपने परिजन, भाई-बहन,पत्नि, बच्चे, नाती-पोते. वे भी तो हमारी याद कर रहे होते हैं. आखिर उनके पास भी तो
लौटना होगा हमें. सारे क्रियाकलापों के लिए पहले से समय का निर्धारण कर लिया गया
था कि कब और कितने बजे हमें होटल छोडना है, दोपहर का खाना कहाँ खाना है और कितने बजे हमें सर शिवसागर रामगुलाम
एअर-पोर्ट पर पहुँच जाना है. कब हमारा विमान ऊडान भरेगा और कब हमें छत्रपति शिवाजी
अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर पहुँचना है. मुंबई के किस स्टेशन से हमारी ट्रेन
रवाना होगी.आदि-आदि
मैं इस यात्रा का समापन
इस प्रकार करने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं था,बल्कि यह कहें बिल्कुल भी नहीं हूँ. क्योंकि मैंने सोच रखा था कि मैं
आपको इस अध्याय के बंद कर देने से पहले उन स्थान पर ले जाना चाहूँगा जहाँ जाकर
मैंने अद्भुत आनन्द की अनुभूति प्राप्त की थी. इन जगहों का उल्लेख पहले भी किया जा
सकता था,लेकिन आलेख के साथ वहाँ के छायाचित्रों को लगा
देने से आलेख ज्यादा विस्तार लेने लगा था. अतः मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि इनका
उल्लेख बाद में भी किया जा सकता है. यदि इसका उल्लेख अभी नहीं हुआ तो फ़िर बाद में
होना संभव भी नहीं लग रहा था.
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फ़ोर्ट आफ़ एडलेट
Fort
Adelaide Of Citadel ( फ़ोर्ट
एडेलेड आफ़ सिटाडेल) --सन 1814
में नेपोलियन की हार के
बाद फ़्रांस और ब्रिटिश सरकारों के बीच हुई संधि के अनुसार सीमा का निर्धारण किया
गया और उस समय के तत्कालिन ब्रिटिश गवर्नर सर विलियम एम.निकोले ने इंगलैण्ड के
राजा विलियम IV की पत्नि “एडेलेड” के नाम पर मारीशस में स्थित पर्वत जिसे (Pitite Moutagne) के नाम से जाना जाता है,बनाया गया.,जिसे बाद में मारीशस को सौंप दिया गया था. इसकी आधारशिला 1830 में रखी गई थी, जो दस वर्षों में बनकर तैयार हुआ. इस किले के निर्माण में भारतीय़
वास्तुकारो के अलावा कई मजदूर काम पर लगाए गए थे. यह किला समुद्र सतह से 240 फ़ीट की उँचाई पर स्थित है. कहा जाता है कि इस किले
से बंदरगाह तक जाने के लिए सुरंग बनाई गई थी, ताकि किले
में रसद तथा हथियारों की
आपूर्ति बनायी जा सके. इस किले की बुर्ज पर जाकर आप शहर का विहंगम दृष्य देख सकते
है.
Belle
Mare beach (बेले
मरे बीच)
Belle
Mare beach (बेले मारे बीच)
----मारीशस के दक्षिण में स्थित यह समुद्री तट अपने में नीलापन लिए हुए दूर-दूर तक
फ़ैला हुआ है. इसके तट पर वृक्षॊं का फ़ैलाव आप देख सकते हैं. किसी ने मुझे बतलाया कि इसके तटॊं पर
मारीशसवासी अपने पूर्वजों के नाम पर या फ़िर किसी बच्चे के जन्म दिन पर, या फ़िर शादी की वर्षगांठ पर वृक्षारोपण करते हैं.
यह परम्परा काफ़ी समय से चली आ रही है, हवा के झोंकों पर नाचते वृक्षॊ को देखकर तथा यहाँ छाई हरियाली आपका
मन मोह लेती है. सफ़ेद रेत दूर-दूर तक फ़ैली नजर आती है. अकसर यहाँ भीड कम नजर आती
है, लेकिन छुट्टियों के दिन बडी संख्या में लोग यहाँ
पहुँचते हैं. बोट की सवारी करते हैं और बेलून के जरिए ( Parasailing ) आकाश में जा उडते हैं.
यदि आप आकाश में उडना ही
चाहते हैं, तो आपको उडने के पंख किराए पर मिल जाएंगे. जैसे ही
आप इस बीच में प्रवेश करते हैं, एक काउण्टर बना हुआ है. यहाँ दो प्रकार की व्यवस्था की गई है. पहला
बैलून के माध्यम से हवा में सैर करने के लिए आपको नौ सौ रुपया (मारीशियन रुपया) का
टिकिट कटवाना होता है. आप दो लोग एक साथ उडना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पन्द्रह
सौ रुपयों का टिकिट लेना होता है. दूसरा- आप समुद्र में उतरकर कोरल, मछलियाँ या अन्य समुद्री जीव देखना चाहते हैं तो
आपको बारह सौ रुपयों का टिकिट खरीदना होता है.और आप यदि समुद्री-जीवों के साथ फ़ोटॊ
खिंचवाना चाहते हैं तो आपको दो हजार रुपया (मारीशियन) चुकाना होता है.
हैं.
इस रोमांचक यात्रा में
यदि वर्धा निवासी श्री के.बी.पडौडेजी की चर्चा न की जाए, तो शायद बात अधुरी रहेगी. वे प्राचार्य होकर
सेवामुक्त हुए हैं. एकदम स्वस्थ हैं,लेकिन उन्हें पैरों के तकलीफ़ हैं, अतः छडी के सहारे चलना होता है उनकी उम्र लगभग 72-75 के करीब है,लेकिन उनका जोश देखने लायक होता था. जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए
हाथ बढाता तो मुस्कुरा कर कहते- भैया कब तक साथ दोगे मेरा,? और वे आगे बढ जाते. बैलून के सहारे आकाश में उडने
की जिद, तो कभी समुद्र की गहाइयों में उतरने की जिद करते.
कहते क्या मैं बूढा हो गया हूँ,? मैं क्यों नहीं उतर सकता समुद्र में और क्यों नहीं उड सकता बैलून ( PARASAILING) के साथ? शायद वे यह नहीं जानते थे कि उम्र के इस पडाव पर मनचाहा करना उनके
लिए उचित नहीं होगा. काफ़ी समझाने-बुझाने के बाद आखिर वे मान जाते हैं. उन्होंने तो
अपनी टिकिट भी कटवा ली थी. बाद में उन्हें रकम वापिस दे दी गई.
(28
th जून) -शाम को खाना खाने
के साथ ही हमें सूचित कर दिया गया था कि कल सुबह दस बजे हमें होटल छॊड देना है.
बसें हमारा इन्तजार कर रहीं थीं. अब हम उस होटल “ताज होटल” की तरफ़ बढ रहे थे, जहाँ हमने पहली बार खाना खाया था. खाना खा चुकने
के बाद हमारे पास काफ़ी समय बच रहा था. उसका हमने भरपूर फ़ायद उठाया. हमारी बस अब BLUE
BAYMARINE की
तरफ़ रवाना हो रही थी.
Glass
Water Boat trip in Blue Bay Marine Park
यह समुद्री पार्क Mehebourg के समीप दक्षिण-पूर्व में POINTE JEROME के करीब 353 मीटर में फ़ैला हुआ है. सुन्दर और आकर्षक समुद्र के तट देखते ही बनते
हैं. दूर-दूर तक सफ़ेद रेत की चादर बिछी हुई है. इस मुलायम रेत की चादर पर से चलते
हुए आप बोट तक पहुँचते हैं. चार-पांच बोट हमने ले ली थी. इन बोटॊं के तले काँच के
बने हुए थे. बोट जब समुद्र की सतह पर आगे बढती है तो नाविक उसे उन स्थानों पर
रोकते हुए धीरे-धीरे आगे बढता है, जहाँ से आप समुद्र तल में समाए कोरल और किस्म-किस्म की वनस्पतियों को
देखकर दंग रह जाते हैं. इन वनस्पतियों के बीच रंग-बिरंगी मछलियों, तथा कछुओं को तैरता हुआ देखा जा सकता हैं. बोट एक
स्थान से चलकर दूसरे स्थान पर आकर थम सी जाती है. हर बार नजारा कुछ और होता है.
इससे पहले हमने-आपने कई समुद्र देखें होंगे लेकिन कभी उसके गर्भ में
छिपे अनमोल खजाने को नहीं
देख पाए होंगे, इन्हें देख कर आश्चर्य होना स्वाभाविक है.
(बोट के तल में लगे कांच से आप समुद्र के गर्भ में
छिपी विभिन्न वनस्पतियाँ-कोरल देख सकते हैं)
समुद्र के इस रोमांचक तट
पर सैर करते हुए कब पाँच बज गए, पता ही नहीं चल पाया. अब हम सर शिवसागर रामगुलाम अंतरराष्ट्रीय हवाई
अड्डॆ की तरफ़ बढ चले थे. सुश्री श्वेताजी अब भी हमारे साथ ही चल रही थी.
एअरपोर्ट पहुँचने के बाद वे सब से मिल रही थीं, वे सभी से फ़िर कभी आने का निमंत्रण देती हैं ,लेकिन उनकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे होते हैं.
उनकी रुलाई देखकर सभी के मन भारी हो चले थे. मात्र एक सप्ताह की मुलाकात,थी हमारी उनसे लेकिन कब वह अपनत्व में ढल जाती है, आपको पता ही नहीं चल पाता. शायद यही कारण था कि
उनकी आँखें भर आयी थी.
.अपना सामान तुलवाने तथा अन्य औपचारिकताओं को पूरा
करने में लगभग दो घंटे से अधिक समय लग जाता है. सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद
हमें प्रतीक्षालय में बैठना होता है. रात के ग्यारह बजे हमारी फ़्लाइट है. समय
धीरे-धीरे रेंगते रहता है. रौशनी में जगमगाता हुआ हवाई अड्डा, सभी का मन मोह लेता है. तरह-तरह की सजी हुई दुकाने
पर्यटक को अपने सम्मोहन में बांध लेती हैं,लेकिन दाम इतना अधिक होता है,कि आप चाहकर भी वस्तुओं को खरीद नहीं पाते. इसके पीछे केवल एक तर्क
यह होता है कि जितनी भी चीजें आप वहाँ देख रहे होते हैं सारी की सारी चीजे भारत से
निर्यात की गई होती हैं. अतः यात्री खरीद करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखलाता.
रात्रि के ग्यारह बजने
वाले हैं. सारे लोग अब विमान पर सवार होने के लिए चल पडते हैं. अपनी निर्धारित सीट
पर आकर बैठ जाते हैं. ठीक ग्यारह बजे हमारा विमान रन-वे पर दौडने लगता है और पल भर
में आकाश से बातें करने लगता है. पूरे छः घंटे की उडान के बाद वह छत्रपति शिवाजी
अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर जा उतरता है. इस तरह इस यात्रा का समापन होता है.
इस अद्भुत और रोमांचकारी
यात्रा को संपन्न करवाने के लिए मैं पुनः आभार प्रकट करता हूँ राष्ट्रभाषा प्रचार
समिति भोपाल के मंत्री-संचालक मान.श्री कैलाशचन्द्र पंतजी के प्रति, जिन्होंने न सिर्फ़ हमें आर्थिक संबल प्रदान करवाया
बल्कि हमारा हौसला बढाया और हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार के एक शुभ-अवसर
प्रदान करवाया. मैं आभारी हूँ श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी के प्रति,जिन्होंने इस यात्रा के कार्यक्रम की कसी हुई
रुपरेखा बनाई, उन्होंने न सिर्फ़ अपने जिले को जोडा बल्कि अन्य
प्रांतो के लोगो को भी अपने साथ जोडा और इस तरह एक सफ़ल आयोजन वे देश के बाहर कर
सके. मैं आभारी हूँ मारीशस (मोका) की डा. श्रीमती अलका धनपतजी का, जिन्होने आकाशवाणी मारीशस के लिए मेरा साक्षात्कार
लिया. मैं आभारी हूँ प्रख्यात साहित्यकार श्री राज हीरामनजी का जिन्होंने महामहिम
राष्ट्रपतिजी से भेंट करवाने में अहम भूमिका का निर्वहन किया. तथा अपना साक्षात्कर
रिकार्ड करवाने में आपने सहज ही अनुमति प्रदान की. मैं आभारी हूँ मान.श्री रामदेव
धुंरधरजी का (जिनकॊ मैं पढ रहा था) साथ ही उन तमाम साहित्यकारों का जिनका परिचय
मंच के द्वारा मुझे प्राप्त हुआ. मैं आभारी हूँ श्री स्वपनिल तथा नीतूसिंह का जो
हमारे साथ छाया की तरह बने रहे.
निःसंदेह जब मैं यहाँ से
रवाना हुआ था,उस समय तक मेरे हाथ रीते थे,लेकिन वहाँ से लौटा तो मैं मालदार हो चुका था.
मुझे न सिर्फ़ अपरिमित संतोष की प्राप्ति हुई है बल्कि उन तमाम लोगों से मिलकर एक
परिवारिक इकाई का सदस्य बन जाने का भी गौरव प्राप्त हुआ है. उन तमाम लोगो की
स्मृतियाँ सदा मेरा पथ आलोकित करते रहेगी,ऎसा मेरा विश्वास है.
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25
रोमांचक यात्रा- इण्डोनेशिया, मलेशिया,
बाली. की.
वैश्विक साहित्य-संस्कृति
संस्थान द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति का सम्मान बढ़ाने तथा कला एवं सामाजिक विज्ञान
विषयों में वैश्विक विमर्श के लिए वैश्विक साहित्य-संस्कृति संस्थान द्वारा सहयोगी
संगठनों अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल शोध-प्रकल्प, साहित्यिक
पत्रिका सद्भावना दर्पण, छत्तीसगढ मित्र, छत्तीसगढ लोक साहित्य संस्थान तथा अन्य मित्र संगठनों के संयुक्त प्रयास
से भाषा, साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता, संगीत, कला,
समाजविज्ञान आदि क्षेत्र के प्रखर विद्वानों, प्राध्यापकों,
पत्रकारों, कलाकारों तथा शोधछात्रों के
समन्वित योगदान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान, मंच एवं
ख्याति दिलाना वैश्विक साहित्य-संस्कृति संस्थान का मुख्य ध्येय था
इस क्रम में द्वितीय
अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनार एवं सम्मलेन दो देशों ,मलेशिया और बाली-इंडोनेशिया में 8 दिसंबर से 14 दिसंबर 2016
तक संस्थान द्वारा समय समाज और साहित्य विषय पर आधारित
अंतरराष्ट्रीय सेमीनार एवं सम्मेलन का आयोजन किया गया.
बाली के बारे में कुछ बातें जानना आवश्यक है-
बाली एक पर्यटन स्थल है.
बाली इंडोनेशिया का एक द्वीप प्रांत है और सुंदा द्वीप समूह का सबसे पश्चिमी हिस्सा
है. यह जावा
के पूर्व और लोम्बोक
के पश्चिम में स्थित है, इस प्रांत में बाली
द्वीप और कुछ छोटे पड़ोसी द्वीप शामिल हैं, विशेष रूप से
दक्षिण पूर्व में नुसा पेनिडा, नुसा लेम्बोंगन और नुसा
सेनिंगन। बाली प्रांत की राजधानी देनपसार है. देनपसार
यह सुंदा द्वीप समूह में सबसे अधिक आबादी वाला
शहर है और पूर्वी इंडोनेशिया में मकासर के बाद दूसरा सबसे बड़ा शहर है.
उबुद
(Ubud), इण्डोनेशिया के बाली द्वीप के उबुद जिले का एक नगर है. इस
नगर का विकास कला और संस्कृति के केन्द्र के रूप में की गयी है तथा यह विश्व के पर्यटकों
के
आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र बनकर उभरा है.पर्यटन से संबंधित व्यवसाय इसकी
अर्थव्यवस्था का 80%
हिस्सा बनाता है.
बाली
इंडोनेशिया में एकमात्र हिंदू-बहुसंख्यक प्रांत है,
जिसकी 86.9% आबादी बालिनी हिंदू धर्म का पालन
करती है. यह पारंपरिक और आधुनिक नृत्य,
मूर्तिकला, पेंटिंग, चमड़ा,
धातु और संगीत सहित अपनी अत्यधिक विकसित कलाओं के लिए प्रसिद्ध है.
इंडोनेशियाई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव हर साल बाली में आयोजित किया जाता है.
बाली यूनेस्को
की विश्व
धरोहर स्थल, सुबक सिंचाई प्रणाली का घर है. यह 10
पारंपरिक शाही बालिनी घरों से बने राज्यों के एकीकृत संघ का भी घर है,
प्रत्येक घर एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र पर शासन करता है. परिसंघ
बाली साम्राज्य का उत्तराधिकारी है.
इंडोनेशिया
में आज भी रामायण का इतना गहरा प्रभाव है कि देश के कई हिस्से में रामायण के अवशेष
और पत्थरों पर तक की नक्काशी पर रामकथा के चित्र आसानी से मिल जाते हैं. भारत और
इंडोनेशिया की रामायण में थोड़ा अंतर है, भारत में राम की नगरी जहाँ "अयोध्या "है,
वहीं इंडोनेशिया में वह "योग्या" के नाम से स्थित है. इंडोनेशिया में हर
जगह हिंदु संस्कृति के दर्शन होते हैं.
09-10 वीं शताब्दी तक ये देश हिंदु और बौद्ध देश था, हालांकि यहां के लोगों ने
मुस्लिम धर्म स्वीकार तो कर लिया लेकिन
उनकी मान्यताएं कभी नहीं बदली. वो आज भी हिंदू संस्कृति पर गर्व भी करते है और इसे
याद भी रखते हैं.
दक्षिण
पूर्व एसिया में स्थित इंडोनेशिया की आबादी तकरीबन 23
करोड़ है, यह दुनियां का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश है और साथ ही सबसे बड़ा
मुस्लिम आबादी वाला देश भी है.
साल
1973 में यहां सरकार ने अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का आयोजन भी किया था.
ये अपने आप में काफ़ी अनूठा आयोजन था,क्योंकि घोषित रूप से कोई मुस्लिम राष्ट्र,
पहली बार किसी अन्य धर्म के धर्मग्रंथ के सम्मान में इस तरह का कोई आयोजन कर रहा
था. इंडोनेशिया में आज भी रामायण का इतना गहरा प्रभाव है कि देश के कई इलाकों में
रामायण के अवशेष और पत्थरों तक नक्काशी पर रामकथा के चित्र आसानी से मिल जाते
हैं.
यहां
रामकथा को "काकनीय-रामायण" नाम से जाना जाता है. भारतीय प्राचीन
सांस्कृतिक रामायण के रचियता आदिकवि ऋषि वाल्मिकी है, तो वहीं इंडोनेशिया में इसके रचयिता कवि "
योगेश्वर " हैं.
इंडोनेशिया
की रामायण 26 अध्यायों का एक विशाल ग्रंथ है. इस
रामायण में प्राचीन लोकप्रिय चरित्र दशरथ जी को " विश्वरंजन " कहा गया
है, जबकि उसमें उन्हें एक शैव भी माना गया है, यानी की वे शिव के आराधक है.
इंडोनेशिया की रामायण का आरम्भ भगवान राम के जन्म के साथ होता है, जबकि
विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण के प्रस्थान में समस्त ऋषिगणों की ओर से
मंगलाचरण किया जाता है और दशरथ के घर इस ज्येष्ठ पुत्र के जन्म के साथ हिंदेशिया
का वाद्य यंत्र "गामलान" बजने लगता है.
इंडोनेशिया
की रामायण में नौसेना के अध्यक्ष को " लक्ष्मण " कहा जाता है, जबकि
सीताजी को " सिता " कहते है. हनुमान तो इंडोनेशिया के सर्वाधिक लोकप्रिय
पात्र हैं, हनुमान की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी
हर साल इस मुस्लिम आबादी वाले देश के आजादी के जश्न यानी की 27 दिसंबर को बड़ी तादात में राजधानी जकार्ता की सड़कों पर युवा हनुमान का वेश
धारण कर सरकारी परेड में शामिल होते हैं. बता दें- कि हनुमान को इंडोनेशिया में
" अनोमान" कहा जाता है.
इस देश की करेंसी का नाम
इंडोनेशियाई रुपिया है. यहां एक भारतीय रुपये की कीमत 188.11 इंडोनेशियाई रुपिया
है. यानी अगर आपके पास भारतीय करेंसी के 100 रुपए हैं तो यह इंडोनेशियाई रुपिया के
लगभग 18,811 के बराबर
है. इंडोनेशिया के २०,००० के नोट पर भगवान श्री
गणेश की प्रतिमा छापी गयी थी, लेकिन 2008- में इसे
चलन से बाहर कर दिया गया.
इस भव्य और आकर्षक आयोजन को सफ़ल
और यादगार बनाने के लिए यात्रियों का दल ने हैदराबाद के अंतरराष्ट्रीय विमान तल से
बाली के लिए उड़ान भरी. बाली पहुँचने के बाद हम अपने निर्धारित होटेल में पहुँचे और
भारतीय रेस्टारेंट में भोजन किया और बाली का भ्रमण किया.
प्रथम दिवस-
उबुद
( ubud )
उबुद
को द्वीप की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है. यह द्वीप सबसे महत्वपूर्ण
संग्रहालयों का घर है,
जिसमें उबुद के कला संग्रहालय और इसके व्यापक संग्रह शामिल हैं
जिनमें बाली पेंटिंग भी हैं. उबुद में हर दिन संगीत और नृत्य कार्यक्रम होते हैं.
अब यहां
केवल मंदिर के अवशेष बचे हैं . उसके स्वर्णीम कालखंड का इतिहास बोर्ड में लिख कर
रखा गया है. तीसरे चित्र में आपको जड़ों को देख सकते है, जिसने मंदिर को ध्वस्त
करने में अपनी निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया है.
2. तनाह लोट
तनाह
लोट बाली के सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है. यह लंबे समय से बालिनी
पौराणिक कथाओं का एक अभिन्न अंग रहा है. यह सात समुद्री मंदिरों में से एक है, सभी
एक दूसरे की दृष्टि में, श्रृंखला बनाने के लिए जो बाली के पश्चिम
में तट के साथ चलती है.
इस
अनजानी-अनचिन्ही जगह पर आकर हम आश्चर्यचकित हो उठते है. होते तो हम विदेश की धरती
पर,लेकिन इस जगह को देखकर आपको सहज ही यह महसूस होने लगता है कि यह वह स्थान होना
चाहिए,जहाँ रामकथा एक पात्र बालि रहा करता होगा.
यहाँ
पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं. यहाँ चारों ओर फ़ैले नैसर्गिग सौंदर्य के
सम्मोहन में बंधकर यात्री ठगा-सा से खड़ा रह जाता हैं. इस स्थान पर सुबह-से लेकर
शाम ढलने तक भी बैठे रहने के बाद आपका मन अन्यत्र जाने से मना कर देगा.
उलुवातु मंदिर-
उलुवातु मंदिर हिन्दमहासागर में एक विशाल
चट्टान पर स्थित है. समुद्र की विशालकाय लहरें जब इसके तट से आकर टकरा कर एक विहंगम
दृष्य की रचना करती है. यदि सूर्य ठीक हमारे सामने हो तो हम अपनी खुली आँखों से
इन्द्रधनुष को बनता हुआ देख सकते हैं.
यहाँ का सूर्यास्त विश्व प्रसिद्ध है.
अस्ताचलगामी होते सूरज को देखना बहुत अल्हादकारी होता है. सूरज का लाल-लाल दहकता
गोला, धीरे-धीरे समुद्र की गहराई में डूबता दीखता है और कुछ ही समय पश्चात पूरा
गोला समुद्र में समा जाता है. गोले के डूबते ही एक हल्का-सा अंधियारा छाने लगता
है. सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आगमन की इस संधि-बेला के इस मनमोहक दृष्य को
देखकर पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाता है.
यहाँ पर बन्दर बहुतायत से देखे जा सकते है.
अतः पर्यटक को सावधान रहने की आवश्यकता है.
उलुवातु मंदिर के दर्शन करने के बाद
"तानंजंग बीच (TANJUNG BEACH)
तथा किंतामणी ज्वालामुखी (KINTAMANI
VOLCANO) देखना हमारे शेडुल में था,लेकिन उलुवातु के आकर्षण में
बंधे रहने के कारण नहीं जा सके थे.
सेमिन्याक
| Seminyak
यद्यपि
सेमिन्याक एक छोटा सा शहर है. इसके बावजूद यह सबसे शानदार पर्यटन स्थलों में से एक
है. यहां पर पांच सितारा भोजनालय, शानदार स्पा और होटल हैं, यह शहर दुनिया भर के यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र है.
बेसकीह मंदिर
हजारों
वर्षों से यह मंदिर बाली द्वीप का "मदर टेम्पल" के नाम से जाना जाता है.
यह माउंट अगुंग के दक्षिण-पश्चिम ढलान पर 1000 मीटर ऊपर स्थित है. यह
बाली में धर्म का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है. एक विशाल परिसर में कम से कम 86
मंदिर शामिल हैं. यहां पर आकर आप वास्तविक आध्यात्मिकता का अनुभव
करेंगे.
चौथे दिन का साहित्यिक कार्यक्रम तथा सम्मान
समारोह अति व्यस्त रहा. इसमें साहित्यकारों ने अपने पर्चों का वाचन किया और
सम्मानित हुए. सम्मेलन में "भारत भास्कर" अवार्ड,. सदभावना-सम्मान तथा
साहित्य वैभव कला-संस्कृति सम्मान में प्रस्तुत मेरे कहानी संग्रह-तीस बरस
घाटी" को नगद दस हजार रुपया सम्मान स्वरूप दिया गया. वर्तमान समय में भारत का
एक रुपया 183.1816 के बराबर होता है. यदि मैं इसे इंडोनेशिया करेंसी में गणना करुं तो वह 183,0000 होता है. मतलब
मेरे हाथ में एक लाख त्रियासी हजार रुपया था. तीनों संस्थाओं को बहुत-बहुत
धन्यवाद.आभार.
आयोजन के कुछ चित्र-यहाँ दृष्ट्व्य हैं.-
यात्रा के पांचवे
पड़ाव को पार कर हम बाली से क्वालामपुर के लिए रवाना हुए. और होटेल-3 स्टार डिलक्स पहुँचे और चकाचौंध से भरे क्वालामपुर सिटी का भ्रमण किया.
क्वालामपुर शहर- " कुआला लम्पुर ", जिसे संक्षेप में "के एल" भी कहा जाता है, मलेशिया की संघीय राजधानी व सबसे अधिक
जनसंख्या वाला नगर है. इस नगर का क्षेत्रफल 243 कि॰मी2 (94 वर्ग मील) है तथा
अनुमानित जनसँख्या 20 लाख से अधिक है. वृहत्तर कुआला लम्पुर,
जिसे " क्लाँग घाटी " के नाम से भी जाना जाता है. मलेशिया की ही नई दूसरी
राजधानी " पुत्रजय " भी है.
"पुत्रजय"
(Putrajaya ) ( मलेशियन उच्चारण: [putraˈdʒaja,
putrəˈdʒajə]
), आधिकारिक तौर पर Putrajaya का संघीय
क्षेत्र ( मलय : Wilayah Persekutuan Putrajaya ), एक नियोजित
शहर और मलेशियाई
राजधानी का संघीय प्रशासनिक केंद्र है . संघीय सरकार की
सीट को 1999 में कुआलालंपुर
से पूर्व में भीड़भाड़ और भीड़ के कारण " पुतराजय " में
स्थानांतरित कर दिया गया था . कुआलालंपुर संविधान के अनुसार मलेशिया की
राष्ट्रीय राजधानी के रूप में बना हुआ है और अभी भी मलेशिया के राजा और संसद की सीट
है, साथ ही देश का वाणिज्यिक और वित्तीय केंद्र होने के नाते.
पुत्रजय की स्थापना तत्कालीन प्रधान मंत्री महाथिर
मोहम्मद का विचार था . 1974
में कुआलालंपुर और 1984 में लाबुआन के
बाद यह मलेशिया का तीसरा संघीय क्षेत्र बन गया.
मलेशिया
के पहले प्रधान मंत्री , टुंकू अब्दुल रहमान पुत्र
अल-हज के नाम पर , यह क्षेत्र पूरी तरह से सेलांगोर राज्य के
सेपांग जिले के भीतर घिरा हुआ है . (Putrajaya MSC) मलेशिया
का भी एक हिस्सा है , एक विशेष आर्थिक क्षेत्र जो क्लांग (Klang)
घाटी को कवर करता है. में संस्कृत , "पुत्र"
(पुत्र) और "जया" (जया) का अर्थ है "सफलता" या "जीत" का अर्थ है.
पुत्रजय का विकास 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ था.
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पुत्रजय
में हम लोगों ने राष्ट्रपति भवन से लेकर प्रायः सभी मंत्रालयों को देखा,
बातु
सिटी क्वालामपुर में हमने सुन्दर इमारतों और वहाँ चौराहे-चौराहे पर बनाई गयीं
कलात्मक आदमकद प्रतिमाएं देखीं जो महाभारत के पात्रों को लेकर बनायी गईं है. इसके
साथ ही पर्वत को काटकर भगवान विष्णु की भव्य और आकर्षक प्रतिमा भी हमें देखने को
मिली.
यात्रा
से आए हुए हमें छः वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इस रोमांचकारी यात्रा की यादें मन-मस्तिस्क
में ज्यों-कि-त्यों सुरक्षित हैं. मन का पंछी कभी एक जगह ठहरना नहीं चाहता.
यात्राएं तो अनवरत जारी हैं. फ़िर भी मन होता है कि एक बार पुनः इस अद्भुत देश की
यात्रा की जा सके.
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26 किसी
विदेशी धरती पर पहला कदम
थाईलैंड की सुरम्य यात्रा.
सन 2011 को मेरी पहली विदेश यात्रा-थाईलैंड की ही थी. इस
यात्रा के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है. रायपुर के मित्र श्री जयप्रकाश रथ
"मानस" से मेरा नया-नया परिचय हुआ था. परिचय का आधार मात्र मेरी अपनी
कहानियाँ थीं,जिसके माध्यम से मित्रता स्थापित हुई. यह वह समय था जब मेरी कहानियाँ
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थीं. जयप्रकाश जी की अपनी विशेष
खासियत रही है कि जो रचनाएं उन्हें सर्वाधिक प्रिय लगती थी, उन्हें वे अपनी इन्द्रजाल
पत्रिका " सृजन गाथा डाट काम" पर उन्हें स्थान दिया करते थे. पता नहीं
यह क्रम कब से चल रहा होगा, मैं नहीं जानता,लेकिन वे मेरी कहानियों को अपनी
पत्रिका में स्थान देते रहे.
रायपुर में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन का आयोजन किया और
मुझे आमंत्रित करते हुए सम्मानित करने
बाबत पत्र भेजा. मैं पत्र पाकर जहाँ एक ओर प्रसन्न हो रहा था, दूसरी ओर मुझे घोर
आश्चर्य हो रहा था,कि मैं इस व्यक्ति को बिलकुल भी नहीं जानता. इस रहस्य को जानने
के लिए मैंने आपसे संपर्क किया. मैंने अपनी ओर से कुछ प्रश्न किये, तो उनका एक
लाईन का जवाब था कि अपने बेटे रजनीश से कहें कि वह "सृजन गाथा डाट काम"
खोलें. इसके बाद हम बात करेंगे. शायद इस समय वे कार ड्राईव कर रहे थे.
खैर, "सृजन गाथा डाट काम" पर मैंने देखा कि इस पत्रिका में
मेरी कई कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं. बस यहीं से मित्रता की स्थापना हुई और
उन्हीं के आग्रह पर थाईलैंड जाने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने अपने कुछ आलेखों में
इस बात का जिक्र करना जरुरी समझा कि काश अगर मैं इस यात्रा पर नहीं जाता तो संभव
है कि मैं कंप्युटर चलाना नहीं सीख पाता, जबकि मेरे घर पर उस समय पच्चीस से अधिक
कंप्युटर उपलब्ध थे. यात्रा के समय प्रायः हर मित्र के पास लैपटाप था. वे मुझे
अपनी रचनाएं इसी के माध्यम से सुनाते थे, जबकि मुझे डायरी के पन्ने पलटने पड़ते थे.
मुझे इस बात पर पछतावा हो रहा था कि घर में सब कुछ उपलब्ध है फ़िर भी
मैंने कभी सीखने की कोशिश नहीं की. अब मैंने कंप्युटर सीखने का मानस बनाया. मेरे
सहयात्री थे श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी. वे भी कंप्युटर चलाना नहीं जानते थे.
लौटकर आने के बाद हमने कुछ इंस्टिट्युट से संपर्क भी किया कि वे हमें कंप्युटर
आपरेट करना सीखा दें. तय हुआ कि कल से हम सीखने जाएंगे, लेकिन विचार, विचार ही बना
रहा. अपनी आयु को देखते हुए हमने निश्चित किया कि घर पर ही बैठकर इसे सीखें.
धीरे-धीरे कंप्युटर महाशय से अच्छी खासी दोस्ती हो गयी. परिणाम यह रहा कि हमारी
रचनाएं क्लिक करते ही देश-विदेश की पत्रिकाओं में मेल के माध्यम से पलक झपकते ही
पहुँचने लगीं. इससे पहले कोरे लिफ़ाफ़ों और डाक टिकटों को खरीद कर रखना होता था. फ़िर
डाकघर तक जाने के लिए समय निकालना होता
था.तब जाकर कोई रचना हफ़्ता-दस दिन में अपने गंतव्य पर पहुँचती थीं.
काश,मुझे थाईलैंड जाने का अवसर न मिला होता, तो शायद ही मैं कंफ्युटर
पर काम कर पाता और न ही मेरी रचनाएँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में स्थान
पातीं. सीख कहीं से भी मिले, उसे ग्रहण
करना आना चाहिए. इसका सारा श्रेय मैं श्री जयप्रकाश रथ"मानस" को जाता
है. उन्हें लाख-लाख धन्यवाद.
थाईलैंड से संबंधित कुछ जानकारियाँ-
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थाई लोग अपनी जातीय विशेषताओं में चीनियों के निकट हैं. इन लोगों
ने चीन के दक्षिण भाग में नान चाऊ नामक
एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया था. किंतु उत्तरी चीनियों
और तिब्बतियों के दबाव तथा 1253 में कुबलई खाँ के आक्रमणों के कारण थाई लोगों को दक्षिणी पूर्वी एशिया की ओर हटना पड़ा.
चाओ फ्राया (Chao Phraya)
नदी की घाटी में पहुँच कर उन्होंने वहाँ के निवासियों को कम्बोडिया की ओर भगा दिया और थाईलैंड नामक देश बसाया. 17वीं शताब्दी तक थाईलैंड में सामंततंत्र स्थापित रहा. इन्हीं दिनों उसने डचों, पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों से व्यापार संबंध भी जोड़ लिए थे.
19वीं शताब्दी में मांकूट (Mongkut) (1851-68) और उसके
पुत्र चूलालोंगकार्न (Chulalongkorn) (1868-1910) के शासनकाल
में सामंतवाद की व्यवस्था शनै: शनै: समाप्त हुई और थाईलैंड का वर्तमान संसार में
आगमन हुआ. सम्मतिदाताओं की एक समिति गठित हुई तथा ब्रिटेन (1855) संयुक्त राज्य अमरीका और फ्रांस (1856) से व्यापार संधियाँ हुई. पुराने सामंतों के अधिकार सीमित कर दिए गए और दास प्रथा बिल्कुल
उठा दी गई.
1932
में रक्तहीन क्रांति द्वारा संवैधानिक राज्यतंत्र की स्थापना हुई।
किंतु उसके बाद से भी थाईलैण्ड की राजनीति में स्थिरता नहीं आई.
द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ में थाईलेण्ड ने जापान से संधि की और ब्रिटेन और अमरीका के विरुद्ध
युद्ध ठाना। लेकिन युद्ध के बाद उसने संयुक्तराज्य अमरीका से संधि की. 1962 में लाओस की ओर से साम्यवादी संकट से थाईलैंड की रक्षा
के लिये संयुक्तराज्य की सैनिक टुकड़ियाँ भी वहाँ रहीं.
दोस्तों जैसा की आप यह भली भांति
जानते हैं की थाईलैंड-यात्रा दुनिया भर में
काफी लोकप्रिय है जिसका प्रमुख कारण वहां का sex tourism या
देह व्यापार है. थाईलैंड में घूमने के लिए तो बहुत सारी चीजें हैं- जैसे खूबसूरत
समुद्री तट, मंदिर, पुराने ऐतिहासिक
स्मारक वगैरह.
थाईलैंड- एक ऐसा देश जो आम
भारतीयों के पसंदीदा विदेशी ठिकानों की सूची में जरूर
कहीं न कहीं शामिल रहता ही है. कारण स्पष्ट है- भारत से कम दूरी के कारण सस्ती
हवाई यात्रा का उपलब्ध होना, आसान वीजा प्रक्रिया और सस्ता बजट! दक्षिण-पूर्व एशिया में बसा यह छोटा सा देश आज
दुनिया भर में पर्यटन का पर्याय बन चुका है और पर्यटकों को आकर्षित करने के मामले
में पश्चिमी देशों को मात भी दे रहा है. वैसे आंकड़े तो हर साल बदलते रहते हैं फिर
भी थाईलैंड की राजधानी बैंकाक आज दुनिया का वह शहर (Most Visited City of
the World) बन गया है जहाँ सबसे अधिक विदेशी पर्यटक आते हैं,
परन्तु किसी खास शहर के बजाय सबसे अधिक
विदेशी पर्यटक खींचने वाले पूरे देश (Most
Visited Country of the World) की बात की जाय तो शायद फ्रांस
पहले नंबर पर है
7 करोड़ से कुछ ज्यादा
आबादी वाले थाईलैंड में बौद्ध 95 फीसदी से ज्यादा है जबकि हिंदू 0.1 फीसदी कुल
संख्या 80,000 हैं
थाईलैंड में दो थाई
ब्राह्मण समुदाय हैं- ब्रह्म लुआंग (रॉयल ब्राह्मण) और ब्रह्म चाओ
बान (लोक ब्राह्मण). सभी थाई
ब्राह्मण धर्मों से बौद्ध हैं, लेकिन ये हिंदू देवताओं की पूजा करते हैं. ब्रह्म लुआंग (रॉयल ब्राह्मण) मुख्य रूप से
थाई राजा के शाही समारोह करते
हैं, जिसमें राजा का राज्याभिषेक भी शामिल होता है.
इनकी जड़ें भारत के तमिलनाडु से जुड़ती हैं.. वहीं, ब्रह्म चाओ बान वे ब्राह्मण समुदाय हैं, जो पूजा पाठ नहीं करते हैं...
थाईलैंड के सुवर्णभूमि
हवाईअड्डे
(Suvarnabhumi Airport In Thailand) पर आपको पांचजन्य शंख (Panchjanya Shankh) और समुद्र मंथन (Samudra Manthan) की आकृति दिखाई देती है...
थाईलैंड में राजा को राम की पदवी मिलती है (The king gets the title of
Rama in Thailand)
थाईलैंड में राजा को राम
की पदवी के नाम से जाना जाता है, रामायण यहां रामकेन (Ramakien in Thailand) के रूप में राष्ट्रीय ग्रंथ है. कई थाई पेंटिंग्स
में रामायण के रंग दिखाई देते
हैं. पेटिंग में हनुमान को लंका के ऊपर उड़ते दिखाया गया है.
लंबे संघर्ष के बाद इसे 9 अगस्त
1965 को एक अलग देश घोषित कर दिया गया.: थाईलैंड भी पहले मलय का ही हिस्सा था.
हालांकि प्राचीनकाल में यह भारत के अंतर्गत आता था. प्राचीनकाल में थाईलैंड को
श्यामदेश के रूप में जाना जाता था.
थाईलैंड में हिंदू धर्म की
स्थापना-
थाईलैंड में हिन्दू धर्म अल्पसंख्यक धर्म है,
जिसके बाद 2018 तक इसकी आबादी का 0.02%
है. बौद्ध बहुल राष्ट्र होने के बावजूद,
थाईलैंड में बहुत मजबूत हिंदू
प्रभाव है. लोकप्रिय थाई महाकाव्य रामकियन बौद्ध दशरथ
जातक पर आधारित है, जो हिंदू महाकाव्य रामायण का थाई संस्करण
है.
जब तक थाईलैंड में खमेर
साम्राज्य सत्ता में था, तब
तक वहां हिंदू धर्म प्रमुख धर्म बना रहा. पर, जैसे ही जयवर्मन VII (शासनकाल 1181-1218) इस क्षेत्र
के राजा बनें, स्थितियां बदलने लगी.
खमेर साम्राज्य अपने साथ हिंदू धर्म लेकर आया और थाईलैंड ने तेजी से इस समन्वित
विश्वास को अपनाया.
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मुंबई से उड़ान भरते हुए हम थाईलैंड के
एअरपोर्ट "सुवर्णभूमि एअरपोर्ट
" पर उतरे. यहाँ से हमें पटाया जाना था. बसें लगाई जा चुकी थी. लंबी यात्रा
करने के पश्चात हम अपनी निर्धारित होटेल सेंटारा पहुँचे और रात्रि विश्राम किया.
- पटाया शहर.
बैंकॉक की पटाया सिटी एक खूबसूरत समुद्र तट
रिसॉर्ट है जो थाईलैंड की खाड़ी के पूर्वी तट पर स्थित है और अपने आकर्षक समुद्र
तटों,
वाटर पार्कों, प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक
मंदिरों लिए प्रसिद्ध है. पटाया सिटी अपनी नाईट लाइफ की वजह से दुनिया भर में सबसे
ज्यादा घूमी जाने वाली जगहों में से एक है. जो भी पर्यटक एक बार पटाया सिटी की
यात्रा कर लेता है तो वह अपनी यात्रा के शानदार अनुभव को कभी नहीं भूल पाता है.
पटाया शहर अपने चिड़ियाघर, थीम पार्क, वनस्पति
उद्यान, मंदिरों, बाजारों, नाईट लाइफ और वाटरस्पोर्ट्स की वजह से दुनिया का एक प्रमुख पर्यटन स्थल
है. पटाया सिटी तीन भागों में विभाजित है उत्तर, मध्य और दक्षिण
जो एक दूसरे से थोड़ा अलग है। यह शहर अपने प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए
हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है।
बैंकॉक के बाद
दूसरा प्रमुख पर्यटन स्थल पटाया है. यह बैंकॉक से करीब 165 किलोमीटर
दूर है. बैंकॉक से पटाया
तक पहुंचने में करीब आधा दिन लग जाता है. कहते हैं कि पटाया कभी न सोने वाला एक
शहर है, यहां रातभर चकाचौंध रहती है, गाड़ियां
का रातभर सड़कों पर दौड़ना, रातभर होटलों के रिसेप्शन काउंटर का
खुला रहना, डिस्को पार्टी और समुद्र तट पर
बसे होने के लिए पटाया को जाना जाता है. यह जगह घूमने-फिरने लायक सबसे
बेहतर जगह है, जो सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती है. पटाया नीले समुद्र की उठती
लहरों के बीच हरियाली के मदमस्त नजारों की सौगात देता है, जिससे मैं और अन्य सैलानी
यहां खिंचे चले आते हैं. पटाया में अद्वितीय
समुद्री तट, द्वीप और पार्क हैं. यहां का प्रसिद्ध द्वीप " कोह लर्न द्वीप" है, जिसे बोलचाल में कोरल द्वीप कहते
हैं. यहां आप बहुत से वॉटर स्पोर्ट्स का आनंद ले सकते हैं.
घूमने के लिए यहां पर स्कूटी किराए पर मिलती है. पटाया
मनोरंजन के शहर के नाम से भी मशहूर है और यहां पर वॉकिंग स्ट्रीट है. इसके दोनों किनारों पर काफी इमारतें और नाइट क्लब जैसे गोगो बार, पियर डिस्को क्लब, हवाई क्लब, आयरन
क्लब और एक्स जोन आदि हैं.
यहाँ रहते हुए हमने पटाया बीच, फ़्लोटिंग मार्केट,कोहलार्ण, अंडरवाटर वर्ल्ड देखा,इसके पश्चात
वाकिंग स्ट्रीट का आनंद लिया और अलंगकर्ण शो देखा.
पटाया
नाइटलाइफ़ स्थल
पटाया का ये 1
( एक) किमी लंबा वॉकिंग स्ट्रीट आपको कुछ
ही क्षणों में रंग-बिरंगी दुनिया की सैर करा देगी. कतारों से लगे टिम-टिमाते क्लब
आपको अपनी तरफ आकर्षित करे बिना
मानेंगे नहीं. अगर आप पार्टी करने के इच्छुक नहीं हैं तो आप हैं. यहाँ का संगीत आपको पैर थिरकाने पर मजबूर कर देगा
और आप पार्टी के परिंदे बन
जाएंगे. माहौल में पूरी तरह कैसे रमा जा सकता है, ये आपको यहाँ आकर ज़रूर पता चल जाएगा. आप अपना पूरा हफ्ता यहाँ बिताना
चाहें तो बिना किसी निराशा के बिता पाएंगे, पूरा हफ़्ता कैसे कट गया, पता ही नहीं चल पाएगा.
फ़्लोटिंग मार्केट
पटाया.
श्री प्रभुदयाल श्रीवास्तव गोवर्धन
यादाव
(फ़्लोटिंग मार्केट के पास बने हाथी
की प्रतिकृति के साथ लिए गए चित्र.)
पटाया में शाम को
बेहातारीन बनाने के लिए एक सुंदर विकल्प है कि पर्यटक यहाँ के बने थियेटर को अवश्य
देखे. एक शो की टिकिट एक हजार रुपया है. एक शो का हजार रुपया देना, पहले पहल आपको
एक हजार रुपये का टिकिट खरीद करने में मंहगा सौदा लगेगा,लेकिन शो देखकर आपकी तबीयत
खुश हो जाती है. भारतीय फ़िल्मों के गाने के साथ चलने वाले बेहतरीन नृत्य देखकर आप
वाह कह उठेंगे. फ़िर दूसरे किसी गाने पर, दूसरा बैक-ग्राऊण्ड. स्टेज तो वही रहता है
लेकिन बैक-ग्राऊण्ड बदलता जाता है. 2 घंटे का यह शो आपको मनोरंजन से भर देगा. इस शो में चमचमाती पोशाक में कलाकारों का डांस करते हुए कहानी कहने का बहुत ही उम्दा
प्रर्दशन होता है. शाम को बेहतरीन बनाने का ये बहुत ही शानदार विकल्प है.
पटाया में दो दिन कैसे बीत गए,पता ही
नहीं चल पाया. अब हमारा अगला पड़ाव था बैंकाक की ओर.
बैंकाक की सतरह मंजिला होटेल फ़ुरामा में
हम लोगों के लिए आरक्षित किया गया था.
बैंकाक थाईलैंड की राजधानी और सबसे अधिक
आबादी वाला शहर है. इस शहर का का थाई नाम क्रुंग थेप महा नखोन (Krung Thep Maha Nakhon) है. ये शहर अपने
स्ट्रीट लाईट और सांस्कृतिक चीजों के लिए बहौत जाना जाता है यह शहर अपने पर्य़टन
स्थलों की वजह से दुनिया के सबसे अधिक देखा जाना वाला शहर है.
बैंकाक में लिए गए कुछ यादगार चित्र.
घरों
के सामने स्थापित मंदिर पुलिस
कमीश्नर / साहित्यकार श्री राय.के साथ लेखक.
बैंकाक में लिए गए कुछ चित्र- (1) लोग अपने घरों के सामने अपने ईष्ट देवता
को स्थापित करते हैं ताकि बुरी आत्मा का प्रवेश नहीं हो सके. (2) बांए से श्री (स्व) दिवाकर भट्ट (संपादक-आधारशिला )
गोवधन यादव (इस लेख के लेखक) श्री जयप्रकाश रथ "मानस" एवं श्री
प्रभुदयाल श्रीवास्तव.
बाएं से दाएं- (श्री पीद्दयाल
श्रीवास्तव, श्री जयप्रकाश मानस्म गोवर्धन यादव, श्री विभुति नारायण राय (पुलिस
कमीश्नर) सुधीर , श्री अशोक )
वाट अरुण
वाट अरुण
बैंकॉक के सबसे आश्चर्यजनक बौद्ध मठों
में से एक है. इस वाट अरुण का डिजाइन थाईलैंड में स्थित अन्य
मंदिरों और मठों से काफी अलग दिखता है. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह पानी के ऊपर खड़ा
हुआ है. यह वाट वरुण चायो फ्राय नदी के पश्चिमी तट पर
स्थित है. इस मंदिर को एक और नाम
वाट चेंग के रूप में
भी जाना जाता है. यह मंदिर देखने में
काफी ज्यादा खूबसूरत एवं आकर्षक दिखता है.
ये सारे चित्र अरूण वाट के ही हैं.
(अरुण वाट की दिवारों पर सुवर्णिम
चित्रों की रामकथा पर आधारित चित्रों की श्रृंखला देखी जी सकती है).
०००००
तीसरे दिन हम बैंकाक की ओर रवाना हुए और
हमने अपनी निर्धारित होटेल " फ़ुरामा " में शिफ़्ट हुए. वहाँ रहते हुए
हमने बैंकाक सिटी का भमण किया. दूसरे दिन सुबह सात बजे हमें "टाइगर
टेंपल" के लिए रवाना होना था, जो यहां से करीब दो सौ किमी.दूर था.
.जंगल सफ़ारी के साथ ही हमने कंचनाबुरी
का म्युजियम भी देखा.तथा इसी से लगा हुआ बौद्ध मठ में बुद्ध की शिक्षा ग्रहण करते
नन्हें बालकों को.
यहाँ बड़ी संख्या में भारातीय निवास करते
हैं. आप सभी ने मिलकर एक देवी मंदिर की स्थापना की है. सारे भारतीय प्रति रविवार
इस मंदिर में बिना किसी नागा के उपस्थित होते हैं सामुहिक पूजा-पाठ करते हैं और
साथ मिल बैठकर भोजन करते हैं. जब यह बात उन्हें पता चली कि भारतीयों का एक दल
भ्रमण करने के लिए थाईलैंड आया है. उन्होंने हमें आमंत्रित किया. सभी को सम्मानित
किया और कार्यक्रम मंदिर के हाल में ही संपन्न करने की प्रार्थना की. थाईलैंड में
बसे अपने भारतीय भाइयों के बीच हमने काफ़ी समय बिताया.
०००००
थाईलैंड की यात्रा से आए काफ़ी समय बीत
चुका है, लेकिन उसकी सुनहरी यादें आज भी चमत्कृत करती हैं.
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बालसाहित्य संगोष्ठी के संयोजक/बालवाटिका के संपादक
डा.श्री.भैंरुलाल गर्गजी
यहाँ
भू-गर्भित जल चट्टान में लगे गोमुख से शिवलिंग पर निरन्तर झरने के रूप में गिरता
रहता है. यह स्थल तीर्थ-स्थान माना जाता है तथा लोग इस कुण्ड में प्रायः स्नान
करने आते है. प्रथाम दालान के द्वार के
सामने विष्णु की एक विशाल मूर्ति खड़ी है. कुण्ड की धार्मिक महत्ता है. कुण्ड के
नीकट ही माहाराणा रायमल के समय का बना एक छॊटा सा जैन मन्दिर है., जिस पर कन्नड़
भाषा में लिखा लेख है. संभवतः इसे दक्षिण भारत से लाया गया होगा. गोमुख-कुण्ड में
अनेकों प्रकार की मछलियां हैं जो चने डलने पर ऊपर जा जाती हैं. इस विशाल किले में
राणाओं के साथ फ़ौज भी रहा करती थी. पानी की समस्या को ध्यान में रखकर शायद इसका
निर्माण किया गया था. यहाँ के सुन्दर दृष्य को देखकर यात्री ठगा सा रह जाता है.
गोमुख-कुण्ड देखकर बाहर आपने पर कुछ दूर की दूरी पर दक्षिण की ओर जाने वाली सड़क के
दोनों ओर दो जलाशय दिखाई देते है. सड़क के पश्चिम की ओर का जलाशय हाथी-कुण्ड के नाम
से जाना जाता है, जहाँ कभी हाथी पानी पिया करते थे. सड़क के पूर्व की ओर का जलाशय
“खातण बाव (खातण बावड़ी) के रूप में प्रसिद्ध है.
समिध्देश्वर्मन्दिर....... विजय स्तंभ के दक्षिण में
समिद्धेश्वर महादेव का एक प्राचीन मन्दिर स्थित है. मन्दिर के दीवार के पीछे
विशालकाय शिव की त्रिमूर्ति है. शिव के तीन मुख “सत” ( सत्यता), र” रज “ (वैभव) व
“तम” क्रोध) का प्रतीक है..कहते हैं इस मन्दिर का निर्माण मालवा के राज भोज के
करवाया था. इसी मन्दिर के प्रागंण में एक शिलालेख ११५० ई. का है.
महासती-स्थल-
विजय-स्तम्भ व समिद्धेश्वर मन्दिर के बीच एक खुला समतल भाग महाराणाऒं व
राज्य-परिवार का श्मशान-स्थल है, जहाँ अनेक क्षत्राणियों ने अपने पति की चिता में
जलकर सती-प्रथा का पालन किया था. इन महत्वापूर्ण स्थलओं के अलावा श्रृंगार चंवरी,
महाराणा कुंभा के महल, फ़तहप्रकाश महल, सतवीस देवरीम जयमल पता के महल, नौगजा पीर की
कब्र, खातन रानी का महल, भाक्सी, चत्रंघ बीका खोह राजटीला, मृगवन, चित्तौड़ी-बुर्ज
, मोहर मगरी, गोरा-बादल के मकानॊं के गुम्बज आदि देखे जा सकते हैं.
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