लघुकथाए
लघुकथा संग्रह
छोटी-सी चिड़िया तथा अन्य
लघुकथाएँ.
गोवर्धन यादव.
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(१)
(२)
परिचय
*नाम--गोवर्धन यादव *पिता-.
स्व.श्री.भिक्कुलाल यादव *जन्म स्थान -मुलताई.(जिला) बैतुल.म.प्र. *
जन्म तिथि- 17-7-1944 *शिक्षा -
स्नातक *पांच दशक पूर्व कविताऒं के माध्यम से साहित्य-जगत में
प्रवेश *देश की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन *आकाशवाणी से रचनाओं का प्रकाशन *करीब पैतीस कृतियों पर समीक्षाएं *कृतियाँ * महुआ के
वृक्ष ( कहानी संग्रह ) सतलुज प्रकाशन पंचकुला(हरियाणा) महुआ के वृक्ष (२) तीस
बरस सा ह*तीस बरस घाटी
(कहानी संग्रह,) वैभव प्रकाशन रायपुर (छ,ग.)
पी़डीएफ ईबुक
– गोवर्धन यादव का कहानी संग्रह- महुआ के वृक्ष / पीडीएफ ई बुक// :गोवर्धन यादव का कहानी संग्रह -
तीस बरस घाटी / पी.डी.एफ़. ई बुक- कहानी संग्रह-अपने-अपने आसन / पीडीएफ
ईबुक –
गोवर्धन यादव का कविता
संग्रह -बचे हुए समय में / पीडीएफ ईबुक : गोवर्धन यादव का लघुकथा
संग्रह / कौमुदी महोत्सव - हमारे तीज त्यौहार /पीडीएफ़-देश-विदेश की यात्राएं / पीडीएफ़-समीक्षा-आलेख की ई-बुक्स / पीडीएफ़-दृष्य
की अपेक्षा अदृष्य रहस्यमय होता है/पीडीएफ़-आलेख-मायावी दुनियां/
पीडॆएफ़-अकेले नहीं हैं हम / पीडीएफ़-गरजते-बरसते
सावन के बीच खनकते गीत और फ़िल्मी
दुनियां तथा अन्य आलेख / पीडीएफ़-हिन्दी-देश से परदेश तक तथा अन्य
आलेख /पीडीएफ़-कथा साहित्य में म.प्र. का
योगदान तथा अन्य आलेख / पीडीएफ़-दसवां
विश्व हिन्दी सम्मेलन तथा अन्य आलेख./ पीडीएफ़- पर्यावरण पर केन्दीत विशेष आलेख / पीडीएफ़-कहानी पोस्टकार्ड की एवं अन्य
आलेख./ पीडीएफ़-ऋषि परम्परा के प्रतीक एवं अन्य आलेख.-
*सम्मान * म.प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन
छिंन्दवाडा द्वारा”सारस्वत सम्मान” *राष्ट्रीय राजभाषापीठ इलाहाबाद द्वारा “भारती रत्न “ *साहित्य समिति मुलताई द्वारा” सारस्वत सम्मान” *सृजन सम्मान रायपुर(छ.ग.)द्वारा” लघुकथा गौरव सम्मान” *सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी खण्डवा द्वारा कमल सरोवर दुष्यंतकुमार सम्मान *अखिल भारतीय बालसाहित्य
संगोष्टी भीलवाडा(राज.) द्वारा”सृजन सम्मान” *बालप्रहरी अलमोडा(उत्तरांचल)द्वारा सृजन श्री सम्मान *साहित्यिक-सांस्कृतिक कला संगम अकादमी परियावां(प्रतापगघ्ह)द्वारा
“विद्धावचस्पति स. \*साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा(राज.)द्वारा “हिन्दी भाषा भूषण”सम्मान *राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा(महाराष्ट्र)द्वारा”विशिष्ठ हिन्दी सेवी
सम्मान *शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम होशंगाबाद द्वारा”कथा किरीट”सम्मान “ *तृतीय अंतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बैंकाक(थाईलैण्ड) में “सृजन सम्मान. *पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग(मेघालय) द्वारा”डा.महाराज जैन कृष्ण स्मृति
सम्मान. *
मारीशस यात्रा(23-29 मई 2014) कला एवं
संस्कृति मंत्री श्री मुखेश्वर मुखी द्वारा सम्मानीत * साहित्यकार
सम्मान समारोह बैतूल में सृजन-साक्षी सम्मान * विवेकानन्द
शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीडा संस्थान देवघर(झारखण्ड) द्वारा राष्ट्रीय शिखर
सम्मान. * म.प्र.तुलसी
साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा सम्मानीत- *अब्युदय बहुउद्देशीय
संस्था वर्धा द्वारा मारीशस में सम्मान *पंचरत्न साहित्यिकी
सम्मान, छिन्दवाडा *मुक्तिबोध स्मृति
रचना शिविर, राजनांदगांव द्वारा सम्मानित. *राष्ट्रीय शिखर
सम्मान समारोह देवग्घर(झारखण्ड) द्वारा शिखर सम्मान *सृजन-सम्मान
बहुआयामी सांस्कृति संस्था रायपुर में दसवे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मीलन में
सम्मान
*विशेष
उपलब्धियाँ:-औद्धोगिक नीति और
संवर्धन विभाग के सरकारी कामकाज में हिन्दी के प्रगामी प्रयोग से संबंधित विषयों
तथा गृह मंत्रालय,राजभाषा विभाग द्वारा निर्धारित नीति में सलाह देने के लिए वाणिज्य और उद्धोग
मंत्रालय,उद्धोग भवन नयी दिल्ली में “सदस्य” नामांकित (2)केन्द्रीय
हिन्दी निदेशालय( मानव संसाधन विकास मंत्रालय) नयी दिल्ली द्वारा_कहानी संग्रह”महुआ
के वृक्ष” तथा “तीस बरस घाटी” की खरीद की गई. (३) कई कहानियाँ का उर्दू, मराठी,
राजस्थानी, उडिया, सिंधी भाषाऒं में रुपान्तरित की गईं.
यात्राएं थाईलैण्ड, इण्डॊनेशिया, मलेशिया,
बाली, नेपाल, भुटान तथा मारीशस.
संप्रति १ सेवानिवृत पोस्टमास्टर (एच.एस.जी.1) २ संयोजक राष्ट्र भाषा प्रचार समिति जिला इकाई
छिंन्दवाड़ा (म.प्र.) 480-001 संपर्क- मोबाईल 09424356400
Email= yadav.goverdhan@rediffmail.com (2) goverdhanyadav44@gmail.com
o1. साक्षात्कार. अपनी असफ़लता का स्वाद चख चुके बाकी के प्रतियोगियों ने उसे घेर लिया.
वे सभी इस सफ़लता का राज जानना चाहते थे. आत्मविशवास से भरी उस
युवती ने कहा=" मित्रों...मैंने
अपनी छोटी सी जिन्दगी में कई कड़े इम्तहान दिए है. मैं बहुत
छोटी थी,तब मेरे पिता का साया मेरे सिर पर से उठ गया.
माँ ने मेरी पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा उठाया.
उसने कड़ी मेहनत की. घरॊं-घर जाकर लोगों के जुठे बर्तन साफ़ किए. घरों मे पॊंछा
लगाया. रात जाग-जाग-जाग कर कपड़ों की सिलाई की .इस तरह मेरी आगे की पढाई
चल निकली.लेकिन बू्ढ़ी हड्डियाँ कब तक साथ देतीं. एक दिन वह भी साथ छो्ड़ गयी. पढ़ने की ललक और कुछ बन
दिखाने की जिद के चलते, मुझे भी घरों में जाकर काम करना पड़ा.
इन कठिन परिस्थियों में भी मेरा आत्मविश्वास नहीं डगमगाया. जिस साक्षात्कात की बात आप लोग कर रहे हैं, वह तो एक
मामुली सा साक्षात्कार था.
बोलते हुए उस युवती के चेहरे पर छाया तेज देखने लायक था.
02. प्रतियोगिता.
चित्रकला प्रतियोगिता
चल रही थी .कई चित्रों में से दस चित्रों को अलग छांटकर रख
दिया गया था. इन्हीं दस में से किसी एक चित्र को पुरस्कृत किया
जाना था. इन दस चित्रों में एक चित्र ऎसा था, जो सभी का
ध्यान आकर्षित कर रहा था. उसकी सबसे ज्यादा संभावना थी कि वह
प्रथम घोषित किया जाएगा.
जब परिणाम घोषित हुआ तो उस प्रतियोगी का नाम
लिस्ट से ही गायब था.
03. मरते-मरते लखपति बना गयी.
एक
कांस्टेबल को किसी जुर्म में सस्पेन्ड कर दिया गया. वह दिन
भर जुआं खेलता और शाम को टुन्न होकर घर लौटता. घर पहुँचते ही
मियां-बीबी में तकरार होती .वह घर खर्च
के लिए पैसे मांगती तो टका सा जबाब दे देता कि जेब में फ़ूटी कौडी भी नही है.
बच्चॊं को कई बार भूखे पेट भी सोना पडता था. उसकी
बीबी थी हिम्मत वाली. उसने सब्जी-भाजी
की दुकान, एक पडौसन से कुछ रकम उधार लेकर शुरु की. उसका व्यवहार सभी के साथ अच्छा था. देखते-देखते उसकी दूकान चल निकली. अब वह दो जून कि रोटी
कमाने लायक हो गई थी. लेकिन उसके पति मे कोई सुधार के लक्षण
दिखाई नही दे रहे थे
उसने
कुछ अतिरिक्त पैसे भी जोड लिए थे. तभी उसकी बडी बेटी के लिए
एक रिश्ता आया और उसने धूमधाम से बेटी की शादी भी कर दी. कुछ
दिन बाद वह कांस्टेबल भी बहाल हो गया. नौकरी पर बहाल हो
चुकने के बाद भी उसने अपनी दूकान बंद नहीं की.
कुछ
दिन बाद उसकी बेटी के घर कोई पारिवारिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. उसकॊ वहाँ जाना था. अपने पति और बच्चॊं के साथ वह
रेल्वे स्टेशन पहुँची. ट्रेन के आने में विलम्ब था. ट्रेन के आगमन के साथ ही एक दूसरी ट्रेन भी आ पहुंची. दोनो ट्रेनो का वहाँ क्रासिंग़ था.जल्दबाजी में पूरा
परिवार दूसरी ट्रेन मे सवार हो गया,लेकिन शीघ्र ही उन्हे पता
चल गया कि वे गलत दिशा की ट्रेन मे सवार हो गए है. पता लगने
के ठीक बाद ट्रेन चल निकली थी. ट्रेन की स्पीड अभी धीमी ही
थी ,इस बीच उसके परिवार के सारे सदस्य तो उतर गए लेकिन उतरने
की हडबडी मे उसका पैर उलझ गया और वह गिर पडी. दुर्योग से
उसकी साडी उलझ गयी थी और वह ट्रेन के साथ काफ़ी दूर तक घिसटती चली गई.
पति
चिल्लाता -भागता दूर तक ट्रेन का पीछा करता रहा. पब्लिक का शोर सुनकर ट्रेन के परिचालक ने ट्रेन रोक तो दी लेकिन तब तक तो
उसके प्राण पखेरु उड चुके थे..पुलिस केस दर्ज हुआ. सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद उसका शव परिजनॊं को सौप दिया गया.
वे एक खुशी के कार्यक्रम मे शामिल होने जा रहे थे,लेकिन नही जानते थे कि दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था लगातार.
उसके
मृत्यु को अभी सात-आठ माह ही बीते होंगे कि इसी बीच रेल्वे
से क्लेम की राशि स्वीकृत होकर आ गई.
जेब में रकम आते ही उसने दूसरी शादी कर ली और एक नय़ी इन्डिका खरीद
लाया. अब वह अपनी नई बीबी के साथ कार मे सवार होकर फ़र्राटे
भरने लगा था. पास-पडॊसी कहते"
बीबी मर तो गई लेकिन उसे लखपति बना गई.".
04. बाप की
कमाई.
मेरे एक मित्र है करोड़ीमल.
जैसा नाम उसी के अनुरुप करोड़ोपति भी. उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई बड़ा खर्च कभी किया
हो, ऎसा देखने में नहीं आया. कपडॆ भी एकदम
सीधे-सादे पहनता. कोई तड़क-भड़क नही. उनसे उलट है उनका अपना बेटा .दिल खोलकर खर्च
करता. मंहगे से मंहगे कपड़े पहनता .कार में घूमता. देश-विदेश की यात्रा में निकल
जाता. जब कोई करोड़्री से पूछता कि वह क्यों नहीं शान से रहता? कभी दिल खोलकर खर्च नहीं करता?. बाहर घूमने-फ़िरने
नहीं जाता तो हल्की सी मुस्कुराहट के साथ जवाब देता:-"भाई...उसका बाप करेड़पति
है.इसीलिए वह दिल खोलकर खर्च करता है. महंगी से महंगी गाड़ियों में घूमता है.वह जो
लुटा रहा है,उसके बाप की कमाई है. मैं ठहरा एक गरीब बाप का
बेटा. अतः चाहकर भी मैं कोई खर्च नहीं कर पाता. यदि थोड़ा-सा ज्यादा खर्च हो जाता
है तो मुझे बहुत दुःख होता है.
05. समझौता एक्सप्रेस.
सत्ता का स्वाद चख
चुके नेताओं को पक्का यकीन हो चुका था कि वे इस बार शायद ही चुनकर आएं ,सो उन्होंने एक नया रास्ता खोज निकला .समान विचारधारा वाली पार्टियों को
साथ मिलाकर एक नया दल बनाया और उसे एक नाम दिया गया, और सभी
ने मिलकर साथ चुनाव लडने का ऎलान कर दिया. वे जानते थे कि लोकसभा की सीढियाँ चढने
के लिए दो तिहाई बहुमत का होना जरुरी है.उन्होंने यह भी तयकर रखा था कि जिस दल मे
सदस्यों की संख्या ज्यादा है, उसी में से कोई एक
प्रधानमंत्री बनेगा.
चुनाव हुये और गठजोड
करने वाली पार्टी, चुनावी एक्सप्रेस में सवार होकर चुनाव जीत
गई. जिस दल में संख्या बल ज्यादा था उसका व्यक्ति प्रधान मंत्री की कुर्सी पर आसीन
हो गया और शेष सदस्यॊं ने अपने-अपने दल-बल के आधार पर मंत्री पद हथिया लिए.
बुद्धिबलं
कौशलम
एक
निहायत ही भोला भाला, सीधा-सादा आदमी था. अपनी
मुफ़लिसी के चलते हुए भी वह लोगों की मदद करने में पीछे नहीं हठता था. कई लोग इस
बात को लेकर उसके पीछे पड़ गए कि उसे चुनाव में खड़े हो जाना चाहिए,लेकिन पैसॊं के अभाव के चलते वह कभी इसके लिए राजी नहीं हुआ.जब बहुत सारे
लोगों ने उसका साथ देने का वादा किया तो उसने चुनाव में खड़े होने का मानस बना
लिया. वह जानता कि स्थानीय नेता के चलते वह शायद ही चुनाव जीत पाएगा. उसने अब अपनी
बुद्धिबल का प्रयोग करते हुए, कुछ लोगॊं को साथ लेकर नेताजी
के आवास पर जा पहुँचा और उन्हें आगाह करते हुए कहा- श्रीमानजी, इस बार आप चुनाव न लड़ें तो अच्छा रहेगा क्योंकि इस बार मैं आपके विरुद्ध
चुनाव लड़ने जा रहा हूँ. यदि आपने मेरा कहा न माना तो हो सकता है कि आपको शर्मिन्दा
होना पड़ेगा. एक खरगोश किस्म का आदमी सीधे शेर की मांद में जाकर शेर को ललकार रहा
था. सुनते ही नेताजी का दिमाक सातवें आसमान पर जा पहुँचा. आँखों से क्रोध के
अंगारे बरसने लगे. अनायास ही उनका हाथ कमर में लटकती रिवाल्वर पर जा पहुँचा. वे
उसे बाहर निकाल पाते, इसके पूर्व उन्हें ध्यान आया कि क्रोध
करने से सारा मामला उलटा पड़ सकता है. चुनाव का मौसम है. जरा सी भी असावधानी से
लेने के देने पड़ सकते हैं. इस पिद्दी जैसे आदमी से कभी और भी निपटा जा सकता है.
उन्होंने जैसे-तैसे अपने आप को काबु में किया और अत्यन्त ही विनम्र होकर उससे
कहा:- अच्छा बच्चु, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे
विरुद्ध चुनाव लड़ोगे? चुनाव तो लड़ तो लोगे, लेकिन किस बूते
पर?. न तो तुम्हारे पास अपने खाने-कमाने का ठौर-ठिकाना है और
न ही करोड़ों की जायजाद और न ही बैंक बैलेंस, आखिर किस तरह
तुम मुझसे टक्कर लोगे?.
प्रश्न सुनकर वह न तो
विचलित हुआ था और न ही घबराया था. उनसे नेता जी से कहा कि वे स्वयं इसकी परीक्षा
ले सकते हैं. उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा:- यदि आप मेरी ताकत देखना ही चाहते हैं
तो कृपया मेरे साथ जनता के बीच में चले और देख लें कि वह किस तरह उठकर मेरा
इस्तकबाल करत्ती हैं. नेताजी ने सोचा कि वे यहाँ के दबंग नेता है और जनता पर उनका
पूरा दबदबा है. लेकिन जब यह चैलेन्ज कर ही रहा है तो चलकर देखने में क्या जाता है.
उन्होने कहा कि वे इसके लिए तैयार हैं. उस आदमी ने देखा कि उसकी योजना सफ़ल हो रही
है तो उसने तत्काल एक प्रश्न फ़िर उछाल दिया._श्रीमानजी...चलिए
चल कर स्वयं देख लें. लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है और वह यह कि जनता के बीच जाते
स़मय, आपकॊ मुझसे दो कदम पीछे रहकर चलना होगा और देखना होगा
कि मेरी अपनी क्या हैसियत है. यदि आपको मेरी छोटी सी शर्त मंजूर है तो मैं आपके
साथ चलने को तैयार हूँ. नेताजी ने सोचा कि ऐसा करने में क्या हर्ज है और वे इसके
लिए तैयार हो गये.
ढोल
ढमाके साथ वे दोनो मुहल्ला-मुहल्ला,गली-गली मे जा रहे थे. शर्त के मुताबिक वह चार फ़ुटा सा आदमी, बड़े डील-डौल वाले नेताजी से दो कदम आगे-आगे चल रहा था और नेताजी उसके
पीछे-पीछे चल रहे थे. लोग जब अपने प्रिय नेताजी को आता देखते तो उठकर खड़े हो जाते
और अपने दोनों हाथ उठा-उठाकर उनका अभिवादन करते. जनता को ऐसा करते देख उन्हें
पक्का यकीन हो चला था कि इस अदने से आदमी का जनता पर काफ़ी प्रभाव है, तभी तो लोग उठ-उठकर इसका स्वागत कर रहे हैं और वह भी समझ रहा था कि जनता
किसे नमस्कार कर रही है.
जब उसने देखा कि
नेताजी पर इसका व्यापक असर हो रहा है तो उसने धीरे से नेताजी से
कहा:-श्रीमान...देखा आपने, जनता मुझे कितना मान देती है. अब
इसी मे भलाई है कि आप इस बार चुनाव न लड़ें और मेरा साथ दें. कुर्सी पर मैं बैठा
दिखाई दूँगा लेकिन आदेश आपके ही चलेगें. मेरा आपसे यह पक्का वादा है.
नेताजी उसकी फ़िरकी में आ गए और उन्होंने उसे जितवाकर लोकसभा
में भेजने का मानस बना लिया था.
वापसी का टिकिट
बरसों-बरस
बाद मेरा दिल्ली जाना हो रहा है. मैं अपनी मर्जी से वहाँ नहीं जा रहा हूँ, बल्कि पिताजी के बार-बार टॆचते के बाद मैं किसी तरह वहाँ जाने के लिए राजी
हो पाया.
दरअसल
मेरा दम घुटता है दिल्ली मे. चारों तरफ़ शोर मचाते भागते वाहन,वाहन में लटकते हुए यात्रा करते नौजवान,
कार्बन मोनोआक्साइड-कार्बन डाइआक्साइड जैसे जहरीली गैस फ़ैलाते
आटॊ-रिक्शे,चारों तरह भीड ही भीड़ देखकर मुझे उबकाई सी होने
लगती है, फ़िर घर का माहौल तो उससे भी ज्यादा दमघोंटू था.
इसी
दमघोंटू वातावरण में मेरे भैया एक सरकारी महकमें मे मलाईदार पोस्ट पर कार्यरत हैं.
बार-बार पत्र लिखने और टेलीफ़ोन पर बातें करने के बाद भी जब कोई सकारात्मक जवाब
उन्होंने नहीं दिया तो पिताजी ने आदेश जारी कर दिया कि मैं वहाँ जाकर भाई से आमने-सामने
बात करुं .उसे अपनी घरेलु समस्या से अवगत करवाऊं और कोई हल निकाल लाऊं..
मैंने
पिताजी से कहा कि मैं उनसे उम्र में छोटा पड़ता हूँ, उन्हीं
के दिए पैसों से अपनी पढ़ाई जारी रख पाया हूँ.. मैं भला उनके सामने समस्याओं को
लेकर मुँह कैसे खोल सकता हूँ?. मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा कि यदि आप स्वयं चले
जाएं तो चुटकी बजाते ही सारे समस्याओं को हल निकाला जा सकता है. लेकिन वे जाने के
लिए राजी नहीं हुये.
“‘ अन्तोगत्वा
मुझे ही जाना पड़ा. स्टेशन से बाहर निकलते ही मैंने एक अच्छी सी दूकान से बच्चॊं के
लिए मिठाइयां और एक खारे का पैकेट खरीद लिया था.
.
दरवाजे
पर मुझे देखते ही सभी ने घेर लिया था. मैने अपने झोले में पड़े पैकेट निकालकर
उन्हें दिया और वे हो-हल्ला मचाते हुए अन्दर की ओर भागे और अपनी माँ को सूचित करने
लगे कि चाचाजी आए हैं. सोफ़े पर बैठते ही मेरी नजरे कमरे का मुआयना करने लगी थी.
भैया के ठाठबाट देखकर मैं दंग रह गया था. काफ़ी देर तक यूंही बैठे रहने के बावजूद
भाभीजी अपने कमरे से बाहर नही आ पायी थी. मुझे कोफ़्त सी होने लगी थी. मेरा धैर्य
चुकने लगा था. मैं अपनी सीट से उठ ही पाया था कि वे नमुदार हुईं .मैने आगे बढ़कर
उनके च्ररण स्पर्ष किए.और उन्होंने सोफ़े में धंसते हुए सभी के हालचाल जानने चाहे.
सभी के कुशल क्षेम का समाचार मैंने कह सुनाया.अभी मेरा वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया
था कि उन्होंने पहाड़ जितना भारी एक प्रश्न मेरी ओर उछाल दिया" ये तो सब ठीक
है लाला,! ,लेकिन
तुम्हारा इस तरह, अचानक चले आना, समझ
में नहीं आया वैसे. मैं तुम्हारे आने का उद्देश्य अच्छी तरह
जानती हूँ. तुम निश्चित ही अपने भाई से पैसे ऎंठने के लिए आए होगे? .तुम यदि इसी
इच्छा से आए तो तुम्हें शर्म आनी चाहिए. क्या
हम लोगों ने तुम लोगों का ठेका ले रखा है. तुम पढ़-लिख गए हो, कोई जाब-वाब क्यों नही कर लेते?.
भाभी
की बातें सुनकर तन-बदन में आग सी लग गई थी. जवाब में मैं काफ़ी कुछ कह सकता था,लेकिन कुछ भी न कह पाना मेरी अपनी मजबूरी
थी. मैं जानता था कि बात अनावश्यक रुप से तूल पकड़ लेगी. इससे अच्छा है कि मैं चुप
रहूं. उन्हें टालने की गरज से मैंने कहा कि काफ़ी दिनों से मैं आप लोगों के दर्शन
नहीं कर पाया था, सो दर्शन करने चला आया था. उसी क्रम को
जारी रखते हुए मैंने भैया के बारे में जानना चाहा कि वे दिखलाई नहीं दे रहे हैं., तो
पता चला कि वे किसी आवश्यक काम से बाहर गए है और बस थोड़ी ही देर में वापस आ
जाएंगें.
काफ़ी
इन्तजार के बाद भैयाजी से मिलना हुआ. मुझे देखते ही उन्होंने भी वह प्रश्न दागा
जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी" रवि...अचानक कैसे आना हुआ? घर
में सब ठीक-ठाक तो है न ?
मैंने
उनसे कहा "भैया..सब ठीक ही होता तो मैं यहाँ आता ही क्यों .मुझे आपसे ठेरों
सारी बातें करनी है.
" ठीक है, तो हम
लोग ऐसा करते हैं कि किसी होटल में चलकर भॊजन करते हैं और
बैठकर बातें भी कर लेगे. मैं समझ गया कि भैया भाभी की
उपस्थिति मे कोई बात करना नहीं चाहते..,
स्टेशन
के पास ही एक होटल थी. उन्होंने एक थाली का आर्डर दिया और मुझसे मेरे आने का कारण
जानना चाहा. मैंने विस्तार से घर के हालात कह सुनाया और कहा कि जो रकम आप भेज रहे
हैं,उसमें घर का गुजारा चल नहीं पा
रहा है. मेरी बात सुनकर वे देर तक खामोश बैठे रहे फ़िर उन्होंने कहा:"-रवि..इस समय कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ लोगों
ने जंतर-मंतर पर बैठकर अनशन शुरु किया था, उसके बाद से किसी में
इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह किसी से दो पैसे भी ले सके. अब तुमसे क्या छिपाना,मेरे अपने घर का हाल भी बुरा है.
बिना मेहनत किए अलग से जो रकम मिला करती थी उसने सभी की आदतें बिगाड़ दी है. पत्नि
भी अनाप-शनाप खर्च करने की आदी हो गयी है. शायद ही कोई ऎसा दिन नहीं जाता कि उसने अपनी ओर से किटी
पार्टी मे जाने से इन्कार किया हो. उसे अपने स्टेटस सिंबल की चिन्ता ज्यादा रहती
है. रही बच्चॊं की बात तो वे भी अपनी माँ पर गए है. रोज एक नयी फ़रमाइश उनकी ओर से
बनी ही रहती है. कमाई दो पैसे की नहीं है और खर्चा हजारों का है. अब तुम्हीं बताओ
रवि कि मैं ज्यादा पैसे कैसे भेज सकता हूँ.? भविष्य में अब
शायद ही भेज पाऊँगा. यही कारण था कि मैं पिताजी को फ़ोन पर यह
सब बता नहीं पा रहा था.और बतलाता भी तो किस मुँह से.? ये तो
अच्छा हुआ कि तुम चले आए.और तुमसे मैं अपनी मन की बात कह पाया. शायद पिताजी से
कहता तो वे शायद ही इसे बर्दाश्त कर पाते.
भोजन बड़ा ही सुस्वादु बना था लेकिन भैया की
बातें सुनकर स्वाद अब कडुवा-सा लगने लगा था ,जैसे-तैसे मैंने खाना खाया और भैया से कहा " अच्छा मैया, अब मैं चलता हूँ..
उन्होनें जेब में हाथ डाला और पर्स में से एक सौ
का नोट पकडाते हुए मुझसे कहा कि
अपने लिए टिकिट कटवाले. मैंने बड़ी ही विनम्रता से कहा:-
भाईसाहब मैंने वापसी की टिकिट पहले से ही बुक करवा लिया था..वे कुछ और कह पाते, ट्रेन अपनी जगह से चल निकली थी. मैंने दौड़
लगा दी और फ़ुर्ती से कम्पार्ट्मेन्ट में जा चढ़ा था. ट्रेन ने अब स्पीड पकड ली थी.
बारिश.
बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी.
बारिश
से बचने के लिए एक लडके ने दरवाजा खटखटाया
मकान मालिक ने दरवाजे
पर जडे शीशे में से झांक कर देखा और उसे वहाँ से भाग जाने का इशारा किया.
. थोडी
देर बाद बारिश मे भींगती एक नवयुवती ने दरवाजा खटखटाया. मकान मालिक ने झांककर देखा. फ़ौरन
दरवाजा खोला और युवती को खींचकर अन्दर किया और झट से दरवाजा बंद कर लिया.
खजाना
"
तुम पर मैं कई दिनों से नजर रख रहा हूँ. बड़ी सुबह ही तुम समुद्र- तट पर आ जाते हो और देर शाम को घर लौटते हो ?
"
मुझे अच्छा लगता है, यहां आकर."
"
कभी समुद्र की गहराई में उतरे भी हो कि नहीं?"
"
नहीं ..एक बार भी नहीं ?"
"फ़िर
समझ लो तुम्हारी पूरी जिन्दगी बेकार में गई. यदि तुम एक बार भी समुद्र में उतरते,
तो तुम्हारे हाथ नायाब खजाना
लग सकता था. क्या तुम्हारा ध्यान इस ओर कभी नहीं गया .? आखिर तुम करते क्या हो इतनी सुबह- सुबह आकर?"
"
बडी सुबह मैं इसी इरादे से आता हूँ, लेकिन आसपास पड़ा कूड़ा-कचरा देख कर सोचने लगता हूँ कि पहले इसे साफ़ कर दूं ,
फ़िर इतमीनान पानी में उतरूंगा. बस इसी में शाम हो जाती है."
"
आखिर यह सब करने से तुम्हें मिलता क्या है?.
"
कुछ नहीं, बस मन की शांति."
"
बकवास...सब बकवास".
" शांति से बढ़कर और कोई चीज हो सकती है क्या.".उसने इत्मिनान से उत्तर
दिया.
पिता की सीख
सखाराम को वॄद्धाश्रम आये हुये काफ़ी दिन हो गये
थे, लेकिन उसे अपने घर की याद खूब
सताती , क्योंकि उसने अपना पेट काट- काटकर
आलीशान घर जो खड़ा किया था. पत्नि के गुजर जाने के बाद से
जबसे उसने अपने घर की चाभियां अपनी बहू के हाथों में सौंप दी थी, उसी दिन से उसका बुरा हाल होना शुरु हुआ था.
उसने
अपने बेटे से अपने ऊपर होने वाली दुर्दशाओं के बारे में बतलाना भी चाहा तो बेटे ने
दो टूक उत्तर दिया ." पिताजी...समय के साथ चलना
सीखें और समझौता करने की आदत. हमारे पा समय नहीं है कि आप की
तिमारदारी करते फिरे."
बेटे
का उत्तर सुनकर उसने गहरी चुप्पी ओढ़ ली थी. अब वह अंदर ही अंदर गलने लगा था. एक दिन ऎसा भी आया
के उसे वृद्धाश्रम भेज दिया गया,
वृद्धाश्रम के अन्य
लोग उसे ढाढ़स बंधाते , लेकिन उसका धैर्य जबाब दे जाता. धीरे-धीरे अब वह वहाँ रहने का आदी हो गया , लेकिन घर की
यादें उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. जब तक वह घर में था ,अपने पोते के साथ खेलता ,हंसता, बतियाता था. उसे जब- तब उसकी
याद आती. उसे याद आया की परसॊं पोते का जन्मदिन है. वह
उसे बधाइयाँ देना चाहता था. उसने अपने बेटे के नाम एक पत्र
लिखा.
” प्रिय बेटे !
. परसों पप्पू का जन्मदिन
है,. उसे मेरी ओर से बहुत -बहुत प्यार
और अनेकानेक शुभकामनायें देना. शब्दों के अलावा अब मेरे पास
है भी क्या जो मैं उसे दे सकता हूँ ?.. उसे खूब पढा-लिखाकर होशियार बनाना, लेकिन यह बात ध्यान रखना कि
उसे ज्यादा होशियार मत बना देना कि एक दिन
वह तुम्हें भी वृद्धाश्रम का रास्ता बतला देगा."
.
टापलेस
"
नहीं सर...नहीं......मैं
इससे ज्यादा कपड़े नहीं उतार सकती""
"
मेडम....कपड़े तो तुम्हें हर हाल में उतारने
ही पड़ेगें. मैं अपनी ओर से नहीं कह रहा हूँ. यह तो स्टोरी की डिमांड
है"
"
सर ...स्टोरी बदली भी तो जा सकती है."
""
स्टोरी नहीं, हिरोइन बदली जा सकती है.
पहली वाली हिरोइन अभी अपने कपडॆ पूरी तरह से समेट भी नहीं
पायी थी कि एक नई होरोइन ने कमरे में प्रवेश किया जो पूरी तरह से टापलेस थी.
अब
नगर शांत है. एक
संत नगर के ऎतिहासिक मैदान में अपना भाषण दे रहे थे. वे सरकार की विफ़लता एवं
भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे. संत को सुनने के लिए पूरा शहर ही उस मैदान में आ
उपस्थित हुआ था. भाषण शान्तिपूर्वक चल रहा था. लोग ध्यान लगा कर उनकी बातों को
सुन-समझ रहे थे. पूरे मैदान में केवल संत की ही आवाज गूंज रही थी. शहर
की शान्ति भंग न हो जाए इस आशंका के चलते, अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए जिला
मजिस्ट्रेट ने धारा 144 की
घोषणा कर दी. घोषणा होते ही वह मैदान छावनी में बदल गया. पुलिस फ़ोर्स और अन्य
सुरक्षा कर्मियों ने सभा में प्रवेश करते हुए लोगों को खदेडना शुरु कर दिया. देखते
ही देखते पूरा मैदान खाली करवा लिया गया.
अब पूरा शहर शान्ति के आगोश में था. आग.
सेठ धरमदास अपनी पांच मंजिला इमारत की छत पर अपने खास दोस्तों के साथ काकटेल
पार्टी में व्यस्त थे. लोग शराब के नशे
में इठलाते-बलखाते-लडखडाते आते और बार-बार उन्हें नगरपालिका के चुनाव में अध्यक्ष पद
पर भारी बहुमत से जीतने की बधाइयां देते. लेकिन धरमदासजी के मन में आग लगी हुई थी. वे न तो बहुत
प्रसन्नता जाहिर कर रहे थे और न ही उनके मुख-मंडल पर चुनाव जीत जाने की खुशी ही
झलक रही थी.
सेठजी के एक मित्र ने इनकी उदासी के बारे में जानना चाहा,तो उन्होंने अत्यन्त
ही कातर शब्दों में अपने मन की व्यथा-कथा सुनाते हुए अपने आलीशान बंगले के पीछे
लगी झुग्गी-झोपडी के बारे में कह सुनाया. सारी बातें सुन चुकने के बाद उनके मित्र
ने कहा”_ भाई, इतनी छोटी सी बात के लिए क्यों तुम पार्टी का मजा किरकिरा कर रहे
हो. मेरा तुमसे वादा रहा एक हफ़्ते के भीतर ये सारी झुग्गी-झोपडियां यहां से हट
जाएगीं और तुम्हारे कब्जे में सारी जमीन आ जाएगी.
अपने मित्र की सारी बातें सुन चुकने के बाद, उनके भीतर लगी आग की आंच में थोडी
कमी आयी थी.दिन निकलते ही ऐसा लगता जैसे आसमान से आग बरस रही हो. झुग्गी-झोपडी में
अपना जीवन बसर करते मजदूर दिन में अपने काम पर निकल जाते और देर रात घर लौटते और
खाना खाकर बाहर खुले आसमान के नीचे रात काटते. इसी समय का इन्तजात था सेठजी के
मित्र को. उसने किराये के पिट्टुओं को आदेश दिया कि आधी रात बीतते ही सारी
झोपडियों को आग के हवाले कर दिया जाए.
देखते ही देखते सारी बस्ती को आग ने उदरस्थ कर लिया था. गरीब मजदूर
रोने-चिल्लाने-चीखने के अलावा कर भी क्या सकते थे.जब सारा आशियाना ही जलकर राख हो
गया,तो वे वहां रहकर करते भी तो क्या करते.धीरे-धीरे पूरी बस्ती के लोग किसी अन्य
जगह कॊ तलाश कर अपनी-अपनी झोपडियॊं के निर्माण में लग गए.
सेठजी के सीने मे बरसॊं पूर्व लगी आग, अब जाकर ठंडी हो पायी थी. फ़िर तो वही
होना था जो सेठजी चाहते थे. उस जगह पर अब आलिशान कोठियाँ आसमान से बातें करने लगी
थीं.
अपने मखमली गद्दे पर
पड़े हुए सेठजी को लगने लगा था कि वे आसमान में उड़े चले जा रहे हैं.
संवेदनहीन समाज.
करंट
लगने से एक कौवा निष्प्राण होकर नीचे गिर पड़ा. उसे गिरता देख दूसरे कौवे ने
कांव-कांव की आवाज निकालते हुए चिल्लाना शुरु किया. देखते ही देखते ढेर सारे कौवे
वहाँ इक्ठ्ठे हो गए. तभी एक बड़ा सा कौवा आया और उसने उस मरे हुए कौवे को अपनी चोंच
में दबाया और उड़ गया. सारे कौवे उसके पीछे हो लिए.
उसी
समय शहर की मुख्य सडक पर एक एक्सीडेन्ट हो गया. सायकल पर सवार युवक को एक बडी गाड़ी
ने टक्कर मार कर गिरा दिया था. लोग आ जा रहे थे,लेकिन किसी ने भी उस युवक को उठाने की कोशिश नहीं की.. टक्कर खाकर गिरा
युवक काफ़ी समय तक बेहोश पड़ा रहा.किसी सज्जन व्यक्ति ने पुलिस मे फ़ोन किया,तब जाकर उसे वहाँ से उठाकर अस्पताल पहुँचाया गया,जहाँ
उसे मृत घोषित कर दिया गया . यदि कोई तत्काल ही उसे उठाकर अस्पताल पहुँचा देता तो
शायद उसकी जान बचायी जा सकती थी.
.
कीमती
कपडॆ
दो
मित्र थे. रामदयाल और दीनदयाल. रामदयाल काफ़ी गरीब था,जबकि
दीनदयाल करोडपति. दो असमान ध्रुव पर खडे रहकर भी.उनकी आपस में खूब निभती थी.
एक
दिन दीनदयाल ने अपने मित्र रामदयाल से कहा:- मित्र, जब भी
तुम भाषण देने मंच पर जाते हो, वही पुराने फ़टे-पूराने कपडॆ
पहन कर जाते हो, मुझे अच्छा नहीं लगता. मेरे पास एक से बढकर
एक ड्रेसेस है,तुम
पहनकर जाया करो. अपने मित्र की बात सुनकर रामदयाल ने उसका दिल रखने के लिए हामी भर
दी. अब वह, जब भी,जहाँ भी जाता अपने
मित्र के कपडॆ पहनकर जाने लगा.
किसी
एक प्रतिष्ठित मंच पर रामदयाल अपना व्याख्यान दे रहा था और सामने की कुर्सी पर
उसका मित्र बैठा उसे सुन रहा था. श्रोतागण उसकी बात पर जब तब दाद देते और तालियाँ
भी बजाया करते थे.यह यह सब देखकर दीनदयाल को काफ़ी प्रसन्न्ता हो रही थी.. उसने
अपने ठीक बगल में बैठे व्यक्ति से कहा:- मित्र, मंच पर जो
व्यक्ति भाषण दे रहा है,वह उसका घनिष्ट मित्र है और उसने
जो कपडॆ पहन रखे हैं,वह मेरे है. उसकी बात सुनने के बाद भी
उसने अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. उसने अब दूसरी तरफ़ बैठे व्यक्ति से वही बात
दुहरायी,लेकिन इसने भी कोई जबाब नहीं दिया. जबाब न पाकर उसका
मन बैठने लगा था.
अपना
भाषण समाप्त करने के बाद अब उसका मित्र प्रसन्न्ता से लकदक उसकी ओर बढा चला आ रहा
था.लोग अपनी-अपनी सीट से खडे होकर उसका अभिवादन करने लगे थे.दीनदयाल के मन में अब
भी वही खिचडी पक रही थी. उसने अधीर होकर अपने मन की बातें औरो को भी बतलाना शुरु
कर दिया .बातें करते समय उसे इस बात का तनिक भी आभास नहीं हो पाया कि उसका मित्र
काफ़ी करीब आ चुका है और उसने उसकी सारी बाते सुन लिया है. बात सुन चुकने के बाद भी उसने अपनी ओर से कोई
प्रतिक्रिया नहीं दी और आकर अपने मित्र के पास आकर खडा हो गया.अपने मित्र को पास
पाकर दीन्दयाल ने उसे गले से लगाते हुए ढेरों सारी बधाइयां दी.
अगले
किसी कार्यक्रम में रामदयाल पहले की तरह अपना व्याख्यान देने में तल्लीन था. कुछ
देर तक बोलने के बाद उसने मंच पर से उपस्थित श्रोताओं से कहा":-मित्रों..मेरा
भाषण अभी समाप्त नहीं हुआ है.बस दो मिनट बाद मैं अपनी बात जारी रखुंगा.कृपया थोडा
सा इन्तजार कीजिये." इतना कहकर वह परदे के पीछे गया. वहाँ जाकर उसने अपने धनी मित्र के दिए कपडॊं को
उतारकर अपनी पुरानी पोषाख पहनी और मंच पर आकर उसी धाराप्रवाह में अपना भाषण देना
शुरु कर दिया . इस बार उसके चेहरे पर छा रहा तेज देखाने लायक था. वह पूरे जोश और
उत्साह के साथ अपनी वाणी को मुखर कर पा रहा था.
सामने
की सीट पर बैठा उसका मित्र यह सब देख रहा था. जैसे ही भाषण समाप्त हुआ ,वह पूर्व की तरह मुस्कुराता हुआ अपने मित्र
की तरफ़ बढा चला आ रहा था. बीच में ही लोगो ने उसे घेर लिया था और उसे
ढेरों सारी शुभकामनाऎँ तथा बधाइयाँ देने लगे थे. वह बडी ही विनम्रता से सबकी
बधाइयाँ स्वीकारता अपने मित्र के पास आ खडा हुआ. दीनदयाल को अब समझ में आया कि
कीमती कपडॆ पहनना और बात है,और बुद्धिमान होना और बात है.
चुनावी एक्सप्रेस
“कुर्सी पर किस तरह काबिज हुआ जा सकता है” इस सोच ने सभी नेताओं को अपनी जद
में ले लिया था. आखिर, नया रास्ता खोज निकला गया. समान विचारधारा वाली पार्टियों
को साथ मिलाकर एक नया दल बनाया गया और उसे एक नाम दिया गया, वे जानते थे कि लोकसभा की सीढियाँ चढने के लिए दो तिहाई बहुमत
का होना जरुरी है. उन्होंने यह भी तयकर रखा था कि जिस दल मे सदस्यों की संख्या
ज्यादा होगी, उसी में से कोई एक प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा.
चुनाव हुये और गठजोड
करने वाली पार्टी, चुनाव- एक्सप्रेस में सवार होकर चुनाव जीत
गई. जिस दल में संख्या बल ज्यादा था, उसका व्यक्ति प्रधान मंत्री की कुर्सी पर आसीन
हो गया और शेष सदस्यॊं ने अपने-अपने दल-बल के आधार पर मंत्री पद हथिया लिए.
बाप की कमाई
मेरे एक मित्र है करोड़ीमल.
जैसा नाम उसी के अनुरुप करोड़ोंपति भी. उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई बडा खर्च कभी किया
हो,ऎसा देखने में नहीं आया. कप्ड़े भी एकदम सीधे-सादे
पहनता. कोई तड़क-भड़क नही. उनसे उलट है उनका अपना बेटा .दिल खोलकर खर्च करता. मंहगे
से मंहगे कपड़े पहनता .कार में घूमता. देश-विदेश की यात्रा में निकल जाता. जब कोई
करोडी से पूछता कि वह क्यों नहीं शान से रहता? कभी दिल खोलकर
खर्च नहीं करता?. बाहर घूमने-फ़िरने नहीं जाता तो हल्की सी
मुस्कुराहट के साथ जवाब देता:-"भाई...उसका बाप करोड़पति है. इसीलिए वह दिल
खोलकर खर्च करता है. महंगी से महंगी गाड़ियों में घूमता है. वह जो लुटा रहा है, उसके बाप की कमाई है. मैं ठहरा एक गरीब बाप का बेटा.अतः चाहकर भी मैं कोई
खर्च नहीं कर पाता.यदि थोड़ा-सा ज्यादा खर्च हो जाता है तो मुझे दुःख होता है.
न्याय
"द्रौपदी
इस साम्राज्य की महारानी है और एक महारानी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी ही
प्रजा की झोपडियों में आग लगाए. उन्होंने एक अक्ष्म्य अपराध किया है. उन्हें इसके
लिए कडी से कडी सजा दी जानी चाहिए. मैं महाराज युधिष्टर, कानुन को धर्मसम्मत मानते हुए उन्हें एक
साल की सजा दिए जाने की घोषणा करता हूँ." खचाखच भरे दरबार में महाराह
युधष्ठिर ने अपना फ़ैसला सुना दिया था.
महाराज
का फ़ैसला सुनते ही राजदरबार में सन्नाटा सा छा गया .चारों तरफ़ इस फ़ैसले पर
कानाफ़ूसी होने लगी ,लेकिन महाराज के खिलाफ़ बोलने की
हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था.
फ़ैसला
सुन चुकने के बाद भीम से रहा नही गया. अपनी जगह से उठकर उन्होंने आपत्ति दर्ज
की"-महाराज फ़ैसला देने के पूर्व आपको यह तो सोचना चाहिए था कि वे एक महारानी
होने के साथ-साथ वह हम सबकी धर्मपत्नि भी
है. यदि उन्होंने ऎसा किया है तो जरुर उसके पीछे कोई बडा कारण रहा होगा. उन्होंने
जानबूझ कर तो ये सब नहीं किया होगा. अगर झोपडियां जल भी गयी है तो इससे क्या फ़र्क
पडता है.हम उन्हें नयी झोपडियां बनाने के लिए बांस-बल्लियां मुहैया कर सकते हैं.
"
भीम...ये तुम कह रहे हो. एक जवाबदार आदमी इस तरह की बात कैसे कह सकता है .मैंने
उन्हें सजा देने का आदेश जारी कर दिया है. उन्हें एक साल तक कारावास में रहना
होगा. अब इस फ़ैसले में कोई सुधार की गुंजाइश नहीं है."
" महाराज...यदि
महारानी ने अपराध किया ही है तो उसकी सजा आप हम भाइयों को कैसे दे सकते हैं ?."
"
भीम ...आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ?".
" महाराज..एक
वर्ष में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं. यदि इसमें पांच का भाग दिया जाये तो तिहत्तर
दिन आते है. जैसा कि माँ का आदेश भी है कि उस पर सभी भाइयों का समान अधिकार रहेगा
.मतलब साफ़ है कि वे बारी-बारी से तिहत्तर दिन हम प्रत्येक के बीच गुजारेगीं. एक
वर्ष की सजा का मतलब है कि हमारे तिहत्तर दिन भी उसमें शामिल होंगे और हमें यह
मंजूर नहीं कि हम उस अवधि की सजा अकारण ही पाएं. यह कैसा न्याय है आपका ?".
भीम की बातों में दम
था और वे जो कुछ भी कह रहे थे उसे झुठलाया नहीं जा सकता था. अब सोचने की बारी
महाराज युधिष्ठर की थी. काफ़ी गंभीरता से सोचते हुए उन्होंने इस समस्या का हल खोज
निकाला. उन्होंने कहा:-" चूंकि महारानी ने एक अक्षम्य अपराध किया है,और उन्हें इसकी सजा हर हाल में मिलेगी..सजा की अवधि, उनके अपने स्वयं की
अवधि के बराबर रहेगी.
खबर
शहर के बाहर एक नया
मोहल्ला आबाद हो रहा था,जिसका नाम फ़ोकटनगर रखा गया था. उसमें कई गरीब-बेसहारा
लोगों ने अपनी-अपनी झोपड़ियां बना ली थी. इसी फ़ोकटनगर में एक गरीब आदमी ने भी अपनी
झोपड़ी बना ली . वह और उसकी जवान बेटी शहर में जाते और जो भी काम मिलता,खुशी-खुशी
करते और किसी तरह अपना जीवन यापन करते
एक दिन अखबार में यह खबर प्रकाशित हुई कि उस आदमी ने अपनी
जवान बेटी को किसी शहर में जाकर बेच दिया है. अखबार पढकर लोग उसकी झोपड़ी पर इकठ्ठा
होने लगे और इस कृत्य के लिए उसे भला-बुरा कहने लगे
सारे लोगों की जली-कटी बातें सुन चुकने के बाद उसने हाथ जेड़कर
कहा-“ अगर मैं अपनी बेटी को न बेचता तो तीन छोटे-छोटॆ बच्चे भूख में तड़प-तड़प कर मर
जाते. भाइयों- हमारी गिनती नीच जाति में आती है, यह जानने के बाद कोई न तो हमें काम
देता है और न ही देहरी पर खड़े होने देता है. भगवान ने हमे हाथ तो दे रखा है लेकिन
हाथॊं के लिए हमारे पास कोई काम नहीं है. जब काम नहीं है तो पैसा कहाँ से आएगा और
जब पैसा नहीं है तो अनाज कहाँ से आएगा.?.जब अनाज नही होगा तो पेट में धधक रही
अग्नि को कैसे शांत कर सकेंगे?. फ़ूल सी सुकुमार बच्ची को बेच देने का दुःख तो मुझे
भी है,लेकिन इसके अलावा और कोई चारा भी तो मेरे पास नहीं था.”
इतना कह कर वह फ़बक कर रो पड़ा और प्रश्न दागने वाले लोग,
अपने-अपने घरों में जाकर दुबक गए थे. गाना
मेरे एक मित्र बडॆ गपाड़िया
हैं. यहां-वहां की फ़ाकने में उन्हें बहुत मजा आता है. कुछ ही बातें सच के करीब
होती,और बाकी की बातों का तो कोई आधार ही नहीं होता. या यह कहें, बगैर सर-पैर के
बातें करने में वे अभ्यस्त है. अतः लोग केवल मजा लेने के लिए उन्हें सुनना पसंद
करते थे.
एक बार की बात है. एक
महफ़िल सजी हुई थी और लोगों का आग्रह था कि वे एक गाना सुनाएं. बात गप्प मारने की
होती तो उन्हें कहना नहीं पडता कि कुछ सुनाओ,लेकिन गाना गाना उन्हें आता ही नहीं
था. वे बार-बार अपनी ओर से सफ़ाई दे रहे थे कि गाना गाना उन्हें सचमुच में नहीं
आता,लेकिन लोगों ने जिद पकडली थी कि उसे गाना ही होगा.
उसने अब दिलेरी दिखाते
हुए कहा कि वह केवल एक ही गाना, गाना जानता है और अब उसे सुनाने जा रहा हूँ. वह
अपनी सीट पर से उठ खडा हुआ और सावधान की मुद्रा मे खडा होकर” राष्ट्र गान” गाने
लगा. जैसे ही राष्ट-गान का पहला पद लोगों ने सुना तो हाल में बैठे सभी लोग
अपनी-अपनी सीट से उठकर खडे हो गए और उसने साथ आगे की पंक्तियां गाने लगे.
“राष्ट्र-गान” समाप्त
होते ही उसने ’भारत माता की जय’ का जयकारा लगाया और अपनी सीट पर बैठ गया..
लोगों ने तालियां पीटते हुए उससे कहा-”वाह भाई वाह, तुम तो अच्छा गा लेते हो.”
तत्काल ही उसने अपनी
शर्ट की कालर को ऊँचा उठाते हुए कहा-“भाई अपना ऐसा ही है,जब गाने को उठ खडा होता
हूँ तो अच्छे-अच्छे लोग अपनी सीट से उठकर खडॆ हो जाते हैं.”
दावत
“घूडन आज बहुत खुश था. आज उसके बेटे की शादी जो हो रही
थी. उसने एक दिन पहले, संचार कालोनी जाकर सभी घरों में निमन्त्रण बांट आया था. और सभी से शादी मे आने की कह भी आया
था. वह यह भी कहना नहीं भुला था कि उसी शाम को उसने दावत का भी इन्तजाम किया है.
शहर के नामी-गिरामी आचार्य भोजन पकाने के लिए लगाए गये हैं. अतः सभी को आने का
आग्रह भी वह कर आया था और सभी ने उसे आश्वस्त किया था कि वे उसके बेटे की शादी मे
जरुर आएंगे.
साल भर पहले
तक घूडन उसी कालोनी मे सफ़ाई का काम किया करता था. जबसे उसके बेटे की सरकारी नौकरी
लगी है, उसने सफ़ाई का काम बंद कर दिया था ,बावजूद इसके वह प्रतिदिन कालोनी जा
पहुँचता. लोगो से मिलता-जुलता . उनकी समस्या सुनता है और उसे तत्काल दूर करने का
प्रयास करता है. उसके इस व्यवहार से कालोनी ले लोग उससे खुश रहते थे कभी कोई चाय
पिला देता है तो कभी कॊई नाश्ता करवा देता . दीपावली-दशहारा पर उसका सभी को इंतजार
रहता .इस् समय उसे ढेरॊं सारी बख्शिश भी मिल जाया करती थी..
दूसरे शहर बारात ले जाने की अपेक्षा उसने लडकी पक्षवालों
को यहीं बुलवा लिया था और अपनी ओर से उसने
सारे प्रबंध भी करवा दिए थे ताकि उन्हें कोई परेशानी न उठानी पडे.शादी का शुभ
मुहुर्त शाम का था, अतः सुबह होते ही वह कालोनी जा पहुँचा और सभी को याद दिला आया
था.सभी ने वहाँ पहुँचने की हामी कर दी थी.
बारात लग चुकी थी. उसके बाद के सारे नेग-दस्तूर निपटाए जा रहे थे,,लेकिन घूडन
की नजरे गेट पर लगी हुई थी. वह बेसब्री से साहब लोगॊ के आने का इन्तजार कर रहा था.
धीरे_धीरे लोगो का आना शुरू हुआ, घूडन हाथ जोडकर उन सभी का अभिवादन करता और भोजन
करने के लिए आग्रह करता.किसी ने कहा कि आज उसके पेट में दर्द है तो किसी ने ब्रत
रखे जाने का बहाना बतलाकर भॊजन करने में अपनी असहमती जतलायी. घूडन रसोई-घर मे जाकर
ब्राह्मण को भोजन पकाते हुए देख आने की कहता. लेकिन आगुन्तकॊं के बहाने अपनी जगह
पर कायम थे.
लोग स्टेज पर जाकर वर-वधु को आशीर्वाद देते. जेब से निकाल कर बंद लिफ़ाफ़े देते
और वापिस हो लेते.वह उनके जाने से पहले एक डिब्बा वह लोगो को देता जाता जिसमे
शुद्द खोये की मिठाइयां रखी गई थी.लोग उसे धन्यवाद देते हुए लौट रहे थे. घूडण इस
बात पर खुश हो रहा था कि लोगो ने उसकी भेंट स्वीकार तो की.
दूसरा दिन तो मेहमान नवाजी मे कैसे बीत गया पता ही नहीं
चल पाया.अगले दिन सुबह जब वह कालोनी के निवासियो को धन्यवाद देने गया तो उसने
कूड़ाघर में उन्हीं डिब्बॊं को पड़ा पाया,जो उसने एक दिन पहले लोगों के बीच बांटे
थे. वहाँ कूड़ाघर मे आवारा पशुओं तथा कुत्तॊं की भीड़ मची हुई थी जो मिठाइयों की
दावत उड़ा रहे थे. घूडन से यह सब देखा नहीं गया और वह उलटे पैर वापिस लौट आया था.
उस दिन के बाद से उसने उस कालोनी मे जाना बंद कर दिया,
भैस के आगे बीन
बजाना
कमलकांत
और श्रीकांत गहरे मित्र थे. कमलकांत कालेज में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत थे,जबकि
श्रीकांत अपने पिता की विरासत को आगे बढाते हुए परचून की दुकान चलाता था.
दोनों के बेटॊं के बीच भी गहरी मित्रता थी. दोनो साथ ही पढते भी थे.
कमलकांत का बेटा क्लास मे हमेशा प्रथम श्रेणी मे पास होता जबकि श्रीकांत का बेटा
फ़िस्स्डी रहता.
फ़ुर्सद के क्षणॊं में दोनो मित्र बैठे चाय सुडक रहे थे. कमलकांत ने पहल
करते हुए कहा:-“श्रीकांत बुरा न मानो तो एक बात कहूँ. तुम जिन्दगी भर पुडिया
बांधते रहे. क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारा बेटा भी आगे चल कर पुडिया बांधता रहे.
वह पढाई मे काफ़ी कमजोर है. उस पर थोडा ध्यान दिया करो.”
इस बात पर श्रीकांत को गुस्सा आया. उसने अपने मित्र को पलटकर जबाब देते
हुए कहा-” मित्र..बुरा न मानना. तुम्हारा बेटा पढ-लिख कर ज्यादा से ज्यादा कलेक्टर
बन सकता है. मैं अपने बेटे को राजनीति में उतारुंगा. राजनीति में अकल की कोई जरुरत
नहीं होती. उसे तो केवल वाकपटु होना
चाहिए. देखना दस-पांच साल में वह कितनी तरक्की करता है. एक दिन ऐसा भी आएगा कि वह
प्रदेश का दमदार मंत्री बन जाएगा और तुम्हारा कलेक्टर बना बेटा उसके सामने खडे
होकर उसके आदेश की प्रतीक्षा करेगा. ऐसा
भी हो सकता है कि उसे उसके जूते के तसमें न बांधना पडॆ.”
अपने मित्र की बात सुनकर कमलकांत की हालत देखने लायक थी. उसे इस बात प़र
गहरा क्षॊभ हो रहा था कि उसे भैंस के आगे बीन बजाना ही नहीं चाहिए था.
जंगल
में लोकतन्त्र.
जंगल का राजा शेर अब बूढ़ा हो चुका था. शरीर में इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि
वह अपने बल पर शिकार कर सके. न तो वह दौड़-भाग कर सकता था और न ही ऊँची छ्लांग लगा
सकता था. उसे ऐसा लगने लगा था कि अब भूखॊं मरना पड़ेगा. एक शेर होने के नाते वह
खुदकुशी भी तो नहीं कर सकता था.?. अब क्या किया जाए?, इसी उधेड़बुन में बैठा वह
गंभीरता से विचार कर रहा था कि जिन्दा कैसे रहा जा सकता है?,
काफ़ी सोचने-विचारने के बाद उसके दिमाक में एक विचार आया. क्यों न किसी जानवर
को पटाकर अपना असिस्टेंट बना लिया जाए, जो उसके भॊजन-पानी की व्यवस्था करता
रहेगा.. इसी क्षण उसे अपने दिवंगत पिता की याद हो आयी और यह भी याद हो आया कि किस
तरह एक छोटे से प्राणी खरगोश ने उसे बुद्धु बना कर कुएँ में छलांग लगाने के उकसाया
था. काफ़ी सोच विचार करने के बाद उसने एक भेड़िए को पटाने की सोची.
भेड़िए को खबर भेज कर बुलाने के बाद उसने उससे कहा कि वह उसे इस जंगल का भावी
राजा घोषित कर सकता है, बशर्ते कि वह उसके लिए रोज शिकार का प्रबन्ध करे.
भेड़िया भी घाघ किस्म का था. वह इस शर्त पर राजी हुआ कि शिकार में से उसका
पच्चीस प्रतिशत हिस्सा रहेगा.
शेर अब निश्चिन्त हो कर अपनी गुफ़ा में आराम से
दिन काटने लगा.
जहरीला आदमी
एक खूबसूरत युवती ने जहरीले साँपॊं
के बीच रहकर विश्व रिकार्ड तोड्ने की ठानी.
देश-विदेश से तरह-तरह के जहरीले साँप बुलवाये गये और
एक कांच का कमरा तैयार करवाया गया.
एक निश्चित दिन, उस काँच के कमरे मे उन सभी जहरीले
साँपों को छोड दिया गया और उस सुन्दर युवती ने प्रवेश किया. खलबली-सी मच गई थी साँपों के परिवार में.
जहरीले साँपों के बीच रहकर वह तरह
के करतब दिखलाती. कभी किसी को उठा कर
गले से लपेट लेती तो कभी अपनी कमर में. .कभी एक साथ ढेरों सारे सापों को उठाकर अपने शरीर मे जगह-जगह लपेट लेती, तरह-तरह के करतब वह दिखलाती. उसके कारनामों को देखने के लिये
पूरा गाँव उमड पडा था.
स्थानीय समाचार पत्रों में उसके
सचित्र समाचार प्रकाशित हो रहे थे. टीवी वाले भी भला पीछे कहाँ रहने वाले थे. वे अपने चैनलों के माध्यम से उसका
लाइव. प्रसारण कर रहे थे. अब पास- पडोस के लोगों के अलावा पडोसी जिले
से भी लोग आने लगे थे .फ़लस्वरुप वहाँ बेहद भीड जमा होने लगी
थी. जिला कलेक्टर ने तथा पुलिस अधीक्षक
ने उसकी पूरी सुरक्षा के व्यापक प्रबंध कर रखे थे.
उस कांच के कक्ष के बाहर श्रध्दालु लोग पूजा-पाठ करने के लिये जुटने लगे थे. नारियल बेचने वाले,तथा फ़ूल बेचने वालों ने दुकाने खोल
लिये थे. दर्शनार्थीयों में कोई उसे असाधारण
साहस की धनी, तो कोई काली माँ का अवतार,तो कोई दुर्गा का अवतार कह रहा था.
आख्रिर अडतालिस घण्टे जहरीले
सांपों के बीच रहकर उसने पुराना विश्व रिकार्ड तोडते हुये नया रिकार्ड
बना ही डाला.
कमरे से बाहर निकलते ही उस बला की
खूबसूरत युवती को भीड ने घेर लिया. हर कोई उसके गले मे फ़ूलमाला् डालने
तो बेताब नजर आ रहा था ,विशेषकर युवातुर्क.
यह पहले से तयकर दिया गया था कि उसके बाहर आने के बाद उसका
नागरिक अभिनन्दन किया जायेगा. एक बडा विशाल मंच तैयार कर लिया गया था .उसे ससम्मान जयकारे कि साथ मंच पर
लाया गया. मंच पर अनेक गणमान्य नागरिकों के
अलावा एक अधिकार संपन्न नेताजी भी आमंत्रित थे.
उसके मंच पर आते ही भाषणों का दौर
शुरु हुआ. भाषण पर भाषण चलते रहे. भाषणों के बीच, उस नेता ने उसे अपने आवास पर भोजन
के लिये आंमंत्रित किया. पोर-पोर में ऎंठन और दर्द के चलते उसका मन वहाँ
जाने के लिये तैयार नही हो रहा था, बावजूद इसके वह मना नहीं कर पायी.
देर रात तक भोजन का दौर चलता रहा. नींद के बोझ के चलते उसकी पलकें कब मूंद गई ,उसे पता ही नहीं चल पाया. अब वह पूरी तरह से नींद के आगोश
में चली गई थी.
गहरी नींद के बावजूद उसने महसूस
किया कि कोई उसके शरीर को कोई बुरी तरह से रौंद रहा है. चेतना में आते ही पूरी बात उसकी
समझ में आ गई थी .वह उठकर भाग जाना
चाहती थी, लेकिन शरीर पर वस्त्र न होने की
वजह से वह चाहकर भी भाग नहीं पायी थी और वहीं बिस्तर पर पडी-पडी आँसू बहाती रही थी और दरिंदा
अपना खेल ,खेलता रहा था.
इस दुर्घटना के बाद से वह एकदम से
गुमसुम -गुमसुम सी रहने लगी थी. बात-बात में खिलखिलाकर हंसने वाली वह शोख चंचल हसीन अब मुस्कुराना भी भूल चुकी थी
और वह अब आदमियों के बीच जाने से भी घबराने लगी थी ,क्योंकि उसे पता चल चुका था कि
वहाँ केवल सांपों के मुँह मे जहर होता है, जबकी, जबकी आदमी पूरा की पूरा जहरीला.
तेल
की चोरी
दीपावली की रात सेठ गोविन्ददास की
आलीशान कोठी जगमगा रही थी. सेठजी इस समय देवी लक्षमीजी की पूजा में व्यस्त थे. चौकीदार मुस्तैदी के साथ अपनी
ड्यूटी निभा रहा था. तभी एक १२-१४ साल का लडका दबे पांव आया और एक
पात्र में दियों में से तेल निकालने लगा.चौकीदार के पैनी निगाहों से वह बच नहीं पाया. लडके को ललकारते हुये उस चौकीदार
ने उसे पकडने के लिये दौड़ लगा दी. अपने पीछे उसे आता देखकर लडके ने भी दौड़ लगा दी.लेकिन पैर उलझ जाने से वह गिर पड़ा
और और उसके हाथ का पात्र भी दूर जा गिरा.
अब वह चौकीदार की पकड में था. रौबदार कड़क आवाज में उसने लगभग
डांटते हुये उस लड़के से तेल चुराये जाने का कारण जानना चाहा ,तो उस लड़के ने रोते हुये बतलाया" भैयाजी, माँ तीन दिन से बीमार पड़ी है.उसका बदन तवे जैसा तप रहा है. मैने उसके लिये खिचडी बनायी और माँ
को खाने को दिया तो उसने मुझसे कहा कि यदि खिचडी को थोड़े से तेल में छौंक देगा तो
शायद उसे खाने में कुछ अच्छा लगेगा. घर में तेल की एक बूँद भी नहीं थी, तो मैने सोचा कि यदि मैं दियों से
थोड़ा-सा तेल निकाल लूं तो काम बन जायेगा.इसी सोच के चलते मैंने तेल चुराने का मन बनाया था."
लड़के की बात सुनकर चौकीदार का कलेजा भर आया. उसने अपनी जेब से पचास रुपये का
नोट उस लडके की तरफ़ बढ़ाते हुये कहा" ले ये कुछ पैसे हैं.किसी किराने की दुकान से खाने का
मीठा तेल खरीद लेना और खिचड़ी फ़्राई कर अपनी माँ को खिला देना और बचे पैसॊं से दवा
आदि खरीद लेना. जानते हो जिस तेल को चुराकर तुम
भाग रहे थे,वह तेल करंजी का कड़ुवा तेल था.यदि तुम उस तेल से खिचड़ी फ़्राई
करते, तो उसको न तो तुम्हारी माँ खा पाती और न ही तुम".
इतना
कह कर वह वापिस लौट पड़ा. मुठ्ठी में नोट दबाये वह लड़का, तब तक वहीं खड़ा रहा था, जब तक कि चौकीदार उसकी आँखों के
सामने से ओझल नहीं हो गया.
दस्तूर
विकराल बाढ़ के हस्ताक्षर अभी पूरी तरह सूख भी नहीं पाये थे
कि सूखे ने आदमी के गाल पर दनादन चाटें जड़ दिए.
जिधर भी नजर जाती विरानी ही विरानी नजर आती .पानी को लेकर त्राहि-त्रहि
सी मच गई थी .इस आपदा से निपटने के लिये कई सरकारी योजनाऒं
की घोषणाएं की गईं,.लेकिन तत्काल कोई कारगर व्यवस्था नहीं बन
पायी.
एक ज्योतिषी ने अपना पोथा खोलते हुए बतलाया कि पुराने जमाने
में राजा-महाराजा किसान बन कर हल चलाया
करते थे,.तब जाकर वर्षा का योग बनता था. अब राजा महाराजाओं का जमाना तो रहा नहीं ,यदि कोई
शिर्षस्थ नेता हल चला कर यह दस्तूर करे तो निःसन्देह बरिश हो सकती है.
एक नियत समय पर एक नेता को हल चलाकर दस्तूर करना था .खेत के चारों ओर लोग खड़े होकर अपने नेता को
हल चलते हुए देखना चाहते थे. जयघोष के साथ नेताजी का प्रवेश
हुआ और उन्होंने आगे बढ्कर हल की मूठ पकड़्कर बैलों को आगे बढ्ने का इशारा किया.
हल की फ़ाल जैसे ही जमीन में दबी पड़ी हड्डी से टकराई. एक आवाज आयी"" कौन है कम्बखत, जो हमें मरने के बाद भी चैन से सोने नहीं दे रहा है."
\
धर्मपरिवर्तन _
एक दिन
समाजवाद मंच पर खडा होकर गरीबॊं
का पक्ष लेकर भाषण पर भाषण झाड़ रहा था. शायद वह रामराज्य
लाने के चक्कर में था. .जनता ने उसे खूब उछाला, गले से लगाया. यहाँ तक उसके पैर भी पड़े.
दूसरे दिन
एक दमदार नेता ने उसे दावत पर बुलाया. स्काच पिलाया और मुर्गमुस्सलम भी खिलाया.और अपनी पार्टी का महामंत्री भी बना दिया.
तीसरे दिन
देश के सभी समाचार
पत्रों में यह खबर मोटे-मोटे अक्षरों मे प्रकाशित हुई
कि समाजवाद ने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है.
मीठे सपने. \
नेताजी इस समय परेशानी के
दौर से गुजर रहे थे. परेशानी का कारण यह नही था कि उनकी कुर्सी खतरे में थी अथवा
किसी आतंवादी ने उन्हे धमकी दे रखी थी .परेशानी कुछ ऐसी थी कि वे न तो किसी को बता
सकते थे और न ही किसी की सलाह ही ले सकते थे.परेशानी के मूल मे थे वे भयानक सपने ,जो उन्हे हर रात दिखलाई पडते थे.
नींद की आगोश मे जाते ही
उन्हें दिखलाई पडता कि वे किसी अज्ञात स्थान पर जा पहुँचे हैं, जहाँ चारो तरफ़ धुआं ही धुआं फ़ैला हुआ है. फ़िर उसमे एक धुधंली
सी आकृति दिखती. धीरे-धीरे वह आकृति स्पष्ट होने लगती. आकृति स्वयं उनकी होती.
थॊडी देर बाद वह किसी सूअर की योनि मे बदल जाती. सुअर अपने नथूने से विचित्र आवाज
निकालता हुआ गंदगी के ढेर में जा घुसता और बदबुदार कीचड में लोट-पोट होने लगता.
अजीबॊ-गरीब हरकते दिखकर
उनकी नींद खुल जाती.वे बिस्तर पर उठ बैठते और पाते की उनकी समूची देह पसीने लथपथ
हो गई है और शरीर से बदबू उठ रही है. वे सीधे बाथरुम में जा समाते और शावर खोल कर
उसके नीचे खडे हो जाते. बदबू अब भी पीछा नहीं छोड रही है. वे किसी खुशबुदार साबुन
से घिस-घिस कर नहाते,तब जाकर वे बदबू से निजात पाते.
कभी सपने में वे गिद्द बन
जाते और उडते हुए किसी मरे हुए जानवर पर जा बैठते और उसका मांस-पिंड नोच-नोचकर
खा्ने लगते.जानवर के जिस्म के फ़टते ही चारॊं तरफ़ खून की नदिया बहने लगतीं. नेताजी
की नींद खुल जाती और वे हडबडाकर उठ बैठते.और देखते कि कमरे मे खून बिखरा पडा है.
काफ़ी सोचने-विचार करने के
बाद वे इस निर्णय पर जा पहुँचे कि ये सब किसी दिलजले विरोधी दल के नेता की करतूत
है.उसने निश्चय ही किसी तांत्रिक की मदद से अथवा किसी अघोरी से मिलकर इस षडयंत्र
को रचा है और इसका कोई न कॊई तोड निकलवाना चाहिए.
उन्होने अपने पी.ए.को
बुला भेजा और आदेश दिया कि वह किसी सिद्ध तान्त्रिक को लेकर आए.
एक बंद कमरे में उन्होंने
अपाने दुख की गठरी उस तान्त्रिक के सामने खोलकर रख दी और कहा कि जितनी जल्दी हो
सके उन्हे इस यंत्रणा से बाहर निकाअले.उन्होनें यह भी कहा कि चाहे जितना भी पैसा
खर्च हो जाए उसकि फ़िक्र न की जाए.
तान्त्रिक भी घाघ किस्म
का था.वह समझ गय कि इस समस्य जितनी भी चांदी वह काट सकता है,काट लेनी चाहिए. ऎसा स्वर्णीम अवसर बार-बर नहीं आ सकता.
दो-ढाई माह तक चाले अनुष्टान
में लाखॊ का खर्च आया. अनुष्ठान के पुरा होते ही नेताजी को अब बुरे सपने आने बंद
हो गए थे.
उन्होने सारे खर्चॊं को सरकारी मद में डाल दिया था
.अब नेताजी निश्चिंत होकर अपनी टांगे
पसारकर सोते. बुरे सपनों के बजाय अब उन्हें मीठे-मीठे सपने गुदगुदाया करते थे.
सपनॊं में अब शोख चंचल हसीनाओं का मेला सा लगने लगा था.
पुरस्कार.
एक
पहलवान को अपने भाई के आपरेशन के लिए पन्द्रह हजार रुपयों की सक्त आवश्यक्ता थी. इसी बीच एक ईनामी दंगल की
घोषणा हुई, जिसमें जीतने वाले पहलवान को पुरस्कार स्वरुप
पच्चीस हजार और हारने वाले को मात्र पांच हजार रुपय दिए जाने की घोषणा की गई थी.
वह इस
हाथ आए मौके को वह गंवाना नहीं चाहता था, साथ ही वह यह भी
जानता था कि वह सामने वाले पहलवान से जीत नहीं पाएगा. ज्यादा रकम प्राप्त करने के
लिए उसने एक योजना बनाई और वह उस पहलवान के घर जा पहुँचा.
" पहलवानजी..नमस्ते. "
" नमस्ते भाईजी..आप कौन हैं. शायद इससे पहले आप से मुलाकात नही हुई".
" ठीक कह रहे हैं आप. शायद आपने
पटियाला वाले पहलवान बजरंगी का नाम तो सुन ही होगा,जो अब तक
किसी से नहीं हारा है."
"
हाँ शायद सुना है, शायद नहीं भी. तुम उसे कैसे जानते हो."
"पहलवानजी
मैं ही बजरंगी हूँ. मैंने सोचा कि अखाडे में हाथ मिलाने के पहले मैं आपसे घर पर ही
हाथ मिला लूँ.
" हाँ हाँ, क्यों
नहीं...आओ बैठॊ.."
" देखिए पहलवानजी, यह तो तय है कि आप मुझसे अखाडे में
जीत नहीं सकते.चूंकि आप इसी शहर के रहने वाले हैं. हार जाने के बाद आपकी बदनामी
होगी सो अ़लग. हर कोई आपको हारा हुआ कहेगे,जिसे आप बर्दाश्त
नहीं कर पाएँगे. मैं ठहरा बाहर का आदमी. क्या जीता और क्या हारा,कौन याद रखेगा.?.भलाई इसी में है कि जैसा मैं कहता
हूँ,आप मान जाइये."
स्थानीय
पहलवान से सोचा" बात तो ठीक कह रहा है ये, फ़िर अखाडे मे
किसका दांव लग जाए, किस का नहीं, नहीं
कह जा सकता.यदि सचमुच मे मैं हार गया तो बदनामी होगी"काफ़ी सोचने-विचारने के
बाद उसने सामने वाले पहलवान के मन का हाल जानना चाहा.
" आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ? उसने प्रश्न किया.
" बात सीधी सी है जी,मुझे जीतने पर पच्चीस हजार और
आपको पांच हजार मिलेगे. कुल राशि होती है तीस हजार. यदि आप आधे-आधे पर मान जाते
हैं ,तो आपको दस हजार का फ़ायदा होगा अलग से. और जीत भी आपके
ही हिस्से में आयेगी. आप विजेता कहलाएगे. अब बतलाइये आप क्या करना चाहेगें.?.
स्थानीय
पहलवान ने सोचा" रुपया तो हाथ का मैल है. आज नहीं तो कल इसे कमाया जा सकता है
,लेकिन हार का ठीकरा वह् कब तक ढोता फ़िरेगा. अतः इसकी बात
मान लेने मे ही फ़ायदा है. उसने कहा" तुम ठीक कहते हो मेरे भाई.चलिए यह सौदा
हमें मंजूर है" कहते हुए उसने तपाक से हाथ मिला लिया.
दूसरे
दिन दोनों अखाडे में मिले. थोडी देर तक जोर-आजमाइश होती रही. कभी पहला भारी पडता
तो कभी दूसरा..दर्शकदीर्घा से तालियाँ जब- तब बजती रही. अंत में वही होना था,जो पहले से तय किया गया था. स्थानीय पहलवान की जीत हुई और वह हार गया.
आयोजकॊं ने दोनो को निर्धारित राशियां पुरस्कार स्वरुप भेंट में दी. और घर आकर
दोनों ने रकम का बंटवारा कर लिया.
वह इस
बात पर खुश था कि उसे आपरेशन में लगने वाली रकम प्राप्त हो गई थी और दूसरा इसलिए
खुश हो रहा था कि वह जीत गया है.
बजट
महंगाई की मार झेल रहे एक बडॆ सरकारी अधिकारी की पत्नि ने
अपने पति से कहा-“इस डायन महंगाई ने इस माह का पूरा बजट ही खराब कर दिया. समझ में
नहीं आता कि घर का खर्च कैसे चलेगा ?”
पति इस समय अखबार में
अपनी नजरे गडाए हुए थे. पत्नि की बात सुनकर उसनेधीरे से कहा-“ बडॆ घर की और
अधिकारियों के घर की महिलाएं बजट बनाती हैं या फ़िर हमारी सरकार. एक गरीब क्या करता
होगा जो केवल अडतीस रुपया प्रतिदिन कमाता है. सरकार उसे गरीबी रेखा के नीचे नहीं
मानती, वह तो कभी बजट बनाने के चक्कर में नहीं पडता.
गुमशुदा
तालाब-बड़ी खबर
लोकमत समाचार ने एक सनसनीखेज खबर प्रकाशित की. खबर इस
प्रकार थी.
“जनसुविधा को नद्देनजर रखते हुए सरकार ने मानेगांव में
एक तालाब का निर्माण करवाया.लेकिन वह अचानक गायब हो गया."
खबर प्रकाशित होते ही पूरे शहर में, गुमशुदा तालाब की बात
हर जुबान पर तैर रही थी. लेकिन जल्दी ही वह चर्चा जिस तेजी से फ़ैली थी,उसी तेजी के
साथ बंद भी हो गई. क्योंकि कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब कोई उससे बडी खबर अखबार में
स्थान न पाती हो. कोई भी नयी खबर एक दो दिन तक चर्चा मे बनी रहतीहै फ़िर कोई उससे
बडी खबर के प्रकाशन के साथ आदमी के दिमाक में भरी पुरानी खबर की जगह नई फ़ाइल स्थान
ले लेती है.फ़िर आदमी उसे ध्यान में रखे भी तो क्यों? दरअसल गांव के सरपंच ने गांव में तालाब खुदवाने के लिए जनता की ओर
से आवेदन प्रस्तुत किया भी और समय रहते उस
पर दयालु विधायक महोदस्य ने अपने फ़ंड में से दो लाख रुपया तत्काल मंजूर भी कर दिया
था.समय-समय पर अखबाअर में तालाब खोदे जाने का कार्य शुरु हो चुका है कि खबरें
प्रकाशित होती रहीं.बाद मे किसी अखबार में बारिक अक्षरों में खब्र प्रकाशित की गयी
कि जनता के विरोध के चलते उस तालाब को पाट दिया गया.
इस तरह न तो तालाब खुदा और न ही पाटा गया,लेकिन एक बड़ी रकम
चंद लोगों की जेब में समा गयी.
चिन्ता की मकडी
आदमी
जिन्दगी में तीन काम बमुश्किल कर पाता है. बच्चों की पढाई-लिखाई, उनकी शादियाँ और
एकाध छोटा सा मकान. यह सब करते-करते वह या तो दुनिया से कूच कर जाता है या फ़िर
उसकी जेब पूरी तरह से खाली हो जाती है. यदि वह जीवित रहा तो केवल उसके पास शेष रह
जाती है भूली-बिसरी बातें जिनके सहारे वह वह अपना एकाकी जीवन
काटता है.
रामलालजी के परिवार में
दो बेटे त्तथा एक बेटी है. उन्होंने नौकरी में रहते हुए अपना एक आशियाना बनवा लिया
था. सभी की उचित परवरिश करते हुए उन्हें उच्च शिक्षा दिलवाई थी. दोनो बेटों की
शादी वे कर चुके थे., आज दोनो बेटे तथा बहूएं सरकारी मुलाजिम है. अच्छा खासा कमाते
भी हैं. सेवानिवृति से पूर्व वे अपनी बेटी की शादी नहीं करवा पाए थे,बस इसी बात का
दुख उन्हें सालता है.
काफ़ी प्रयास के बाद एक
रिश्ता आया. लडका देखने में स्मार्ट था और वह एक इंजिनियर के पद पर कार्यरत थी. लड़का
दहेज लेने के पक्ष में नहीं था लेकिन पिता को मोटी रकम दहेज में चाहिए था. उनका अपना
कहना था कि लाखॊं खर्च करके लड्ड़के को पढाया-लिखाया है ,सो अपना घाटा इस तरह पूरा
करना चाहते हैं. खैर बात आगे बढ़ी. रामलालजी को उम्मीद थी कि वे रकम का इंतजाम कर
लेगें.
घर के
पूरे सदस्य बैठकर इस पर विचार-विमर्श कर रहा थे. उन्होंने अपनी व्यथा उजागर करते
हुए कहा कि अब उनके पास पेन्शन के अलवा कुछ भी देने को बचा नहीं है. और शादी में
लगभग दस लाख खर्च होने है. यदि आप सभी इसमें सहभागी बनते हैं तो बात बन सकती है.
सहमति
अथवा असहमति देने की बारी दोनो बेटॊं और बहूऒं की थी. सभी ने मौन ओढ रखा था. सब एक
दूसरे का चेहरा देख रहे थे कि पहल कौन करता है.
आखिर
बडॆ बेटे ने मुँह खोला. पिताजी……….,पिछली
साल अम्माजी के बिमारी के चलते मेरे लगभग एक लाख रुपया खर्च हो गया. फ़िर मुझे अपने
बेटा-बेटियों को भी तो आगे पढाना-लिखाना है. मैं बडी रकम तो नहीं दे पाऊँगा, हाँ
एकाध लाख फ़िर भी जुटा लूंगा. दूसरे ने कहा- अभी हम लोगों की इतनी सेलेरी नहीं है,
फ़िर भी पच्चीस-पचास का इन्तजाम तो मैं कर ही दूँगा. बहूऒं ने अपनी ओर से मुँह नही
खोला. खैर.उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी.
अपनी-अपनी बात कहकर सब,
एक के बाद एक उठकर चले गए थे. हाल में बचे रह गए थे केवल रामलालजी ,जो विचारों के
भंवर में डूब-चूभ रहे थे और चिंता की मकडी उनके चेहरे पर घना जाला बुनने लगी थी.
चौकीदार.
राकेश ने शहर में एक शानदार बंगला बनाया था. शीला और
बच्चे बहुत खुश थे अपने आलीशान बंगले में उन्होंने एक अलसेशियन
कुत्ता भी पाल रखा था ताकि चोरी-चकारी न हो सके. बावजूद इसके एक बार चोरों ने अपनी
हुनर दिखला ही दिया. इन सब बातों को लेकर वह परेशान रहने लगी थी.
एक बार उसकी सहेली राधा
उससे मिलने आयी. उसने अपनी सहेली की सारी व्यथा-कथा सुनने के बाद सलाह देते हुए
कहा:-“ तुम गाँव से अपने सास-ससुर को बुलवा लो. सारी समस्या चुटकी बजाते ही हल हो
जाएगी”.
उसने आश्चर्य में भरते
हुए कहा:- “ वो कैसे ?.
“ सीधी सी बात है. तेरी
सास चौका-बर्तन सभांल लेगी और ससुर चौकीदार का काम.इससे तुझे भरपूर आराम करने को
भी मिल जाएगा. जब घर में जब दोनो बने रहेगे तो किस चोर में हिम्मत है कि नजर उठाकर
भी देख सके. फ़िर बच्चों की भी तुझे चिंता करने की जरुरत नहीं पडेगी. इस तरह
तुम्हारी काफ़ी बचत भी हो जाएगी. हाँ, इसमें एक काम बडी सावधानी से करना. उन्हें इस
बात का आभास तक न होने देना कि तुम उनका फ़ायदा
उठा रहे हो,अन्यथा संबंधों मे खटास आने मे एक सेकेन्ड भी नहीं लगेगा.”
छोटी सी चिडिया. (गोवर्धन यादव) “ रामदीन...जरा बड़े बाबू को मेरे कमरे में भिजवाना”. बड़े
साहब ने चपरासी को हुक्म बजा लाने को कहा.
“ मे
आई कम इन सर”. बडॆ बाबू ने कमरे में प्रवेश करने के पहले कहा.
“ हाँ, तुम अन्दर आ सकते
हो”. साहब ने कहा.
“
देखो, मुझे बार घुमा-फ़िराकर कहने की आदत नहीं है. एक हफ़्ते के अन्दर मुझे पचास
हजार रुपये चाहिए. इसका इन्तजाम कैसे हो
सकता है,वह तुम जानो.”
. “ बिल्कुल हो जाएगा सर. अप चिन्ता न करे.” “ बडा बाबु अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया. उसने अपने टेबल की
ड्राज से कोरे कागज निकाले. टाईपराईटर में फ़ंसाया और एक लेटर टाईप किया. और साहब
के कमरे में जा पहुँचा. “ ये क्या है ?” साहब ने कहा. “ कुछ नहीं हुजूर..... यह एक छोटा सा कागज का पुर्जा है. “ बड़े बाबू, तुम्हारा दिमाक खराब तो नहीं है. तुम जानते हो
कि बीच सेशन में किसी का ट्रान्सफ़र नहीं किया जा सकता.” “ हुजूर जानता हूँ. प्यारेलाल इसी शहर में कई बरस से
कुण्डली मारे बैठा है. फ़िर उसकी बीवी भी सरकारी नौकरी में है. फ़िर हमने उसका
ट्रान्सफ़र थोड़े ही किया है. उसे तो हमने प्रमोशन दिया है. मैं जानता हूँ वह इतनी
दूर नहीं जाएगा. आर्डर मिलते ही वह सिर पर पैर रखकर दौड़ा चला आएगा. और हमें मनचाही
रकम दे जाएगा. बस आप इस कागज पर अपनी छोटी सी चिड़िया बिठा दीजिए और देखिये ये चिड़िया
क्या कमाल दिखाती है”.
“ समझ गया. तुम बहुत ही
होशियार आदमी हो”.
“सर, ऐसी बात नहीं है. मैं तो आपका सेवक हूँ. और आपकी सेवा
करना ही मेरा धर्म है”.
जोरू का गुलाम सुरेश ठीक एक साल बाद घर आया है. उसके हाथ में एक बडा सा
सूटकेस है. घर के अंदर प्रवेश करते ही
उसने अपने पिता और माँ के चरण सपर्ष किए और अपना सूटकेस खोलकर कपडॆ निकालने लगा.
उसने सबसे पहले एक बेहतरीन सी साडी निकालकर अपने माँ को देते हुए कहा:- “अम्माजी
यह आपके लिए” फ़िर उसने धोती-कुर्ता निकालकर अपने पिता को देते हुए कहा:_ “पिताजी
यह आपके लिए.” उसने एक के बाद कपडॆ निकालते हुए घर के सभी सदस्यों को दिए. बच्चे
अपने मनपसंद कपडॆ और खिलौने पाकर बेहर उत्साहित थे. माँ तो जैसे निहाल ही हो गई
थी. वे बार-बार उसे आशीषती और कहती रही कि कितना ध्यान रखता है सुरेश घर के सभी
सदस्यों का. पिता
कुर्सी में धंसे उसको यह सब करता देख,सोच रहे थे,” कितना कुशल खिलाडी है सुरेश,कुछ
कपडॆ और रकम देकर वाहवाही लूट रहा है. कहाँ था उस समय जब उसकी माँ सक्त बिमार पडी
थी. बार-बार टॆलीग्राम देने के बाद भी वह घडी भर की फ़ुर्सद नहीं निकाल पाया और न
ही उसने फ़ोन करके उसके हाल-चाल ही जानना चाहा. अगर घर में रमेश नहीं होता,तो
भाग-दौड कौन करता?. उसने उसे समय पर अस्पताल ले गया और चार दिन तक वहीं डटा रहा,जब
तक वह ठीक नहीं हो गई. उन्होंने देखा कि वह एक ओर खडा अपने भाई की जादुगरी देख रहा
था,लेकिन चुप्पी साधे हुए था. तभी उनकी नजर अपनी छडी पर गई. उन्हें वह दिन याद हो आया जब
वे एक दिन बाथरुम में फ़िसलकर गिर पडॆ थे, तब भी सुरेश को खबर दी गई थी,लेकिन काम
की अधिकता बतलाते हुए उसने बाद में आऊँगा,कहकर इतिश्री कर ली थी. हांलाकि पैर में
फ़ैक्चर था, संयोग से तब भी रमेश घर पर ही था. उसने तत्काल उनका डाक्टरी परीक्षण
करवाया था और बाद में एक छडी ले आया था. जिसके सहारे वे चल-फ़िर सके थे. घंटॆ-आध घंटॆ में यह सब निपट गया तो पिता ने पहल करते हुए
पूछा_ सुरेश, बहू और बच्चों को भी साथ ले आते तो ये बूढी आँखें निहाल हो जाती.
उन्हें देखने को हम कब से तरस रहे हैं” वे आगे कुछ और कह पाते कि सुरेश ने
कहा_बाबूजी, आशा साथ आने वाली तो थी,लेकिन इस समय कापियाँ जांचने में उसकी ड्युटी
लगी है.फ़िर कभी आ जाएगी. बाबूजी जानते थे कि आशा इस समय अपने मायके में होगी. वह
यह भी जानते थे कि उसे गांव से एलर्जी है. उसका दम घुटता है गांव में. असल बात एक
तो यह भी है कि वह हम लोगॊं के बीच रहना ही नहीं चाहती. सब कुछ जानता है सुरेश,
बावजूद इसके, वह केवल बहाने गढ रहा है.” जोरू का गुलाम” बुदबुदाते हुए वे अपनी
कुर्सी से उठे और अपने कमरे में चले गए,.
डकैती.
डाकुओं का पीछा करते हुए
इन्स्पेक्टर की जीप नदी में जा फ़ंसी. पीछे उसकी मोटरसाइकिल लेकर एक हवलदार आ रहा
था. उसने उसे रोकते हुए सभी को अपने पीछे आने को कहा और उसने अपनी गाडी उस डाकू के
पीछे दौडा दी. दोनों के बीच काफ़ी कम फ़ासला बचा था. उसने अपनी रिवाल्वर तानते हुए
गोलियाँ बरसाना शुरु कर दिया. संयोग से एक भी गोली उस डाकू को नहीं लगी,लेकिन अपनी
जान संकट में जान, उसने पैसॊं से भरी बोरी फ़ेंक दी और भाग खडा हुआ.
इन्स्पेक्टर ने अपनी
मोटरसाइकिल को रास्ते में पडी बोरी के पास रोका. उसे खोलकर देखा. वह नोटॊं से भरी
थी. इतने सारे नोट एक साथ देखकर उसकी आँखे चुंधियाने लगी. मन में एक लोभ जाग उठा.
वह सोचने लगा था कि यदि इतनी सारी रकम को वह किसी तरह हथिया सका तो उसकी शेष
जिन्दगी आराम से कट जाएगी. पुलिस विभाग से उसे अब तक मिला भी क्या है?
चोर-लुटेरे-गिरहकट को उसने सदैव समाज का दुश्मन मान कर जमकर पीटा,बदले में उसे
क्या मिला? समाज के पहरुओं ने उसे कोर्ट में घसीटा और उस पर विभाग ने कडी
कार्रवाही की. यदि उसने नरमी बरती है तो कहा गया कि पुलिस निकम्मी है,और उसे फ़िर
जलील किया गया. रोज-रोज की किलकिल से निजात पाने काअ एक आसान मौका उसके हाथ अचानक
लग आया था. उसने एक गढ्ढे की तलाश थी. उसे एक जगह आखिर मिल ही गयी. उसने उस बोरी
को दबाकर मिट्टी से ढंक दिया और एक निशान बना दिया.स
इतना कर चुकने के बाद
उसने अपनी ही रिवाल्वर से अपने पैर पर गोली दाग दी और कराहते हुए एक ओर गिर पडा.वह
जानता था कि पीछे उसका पुलिस-दल आ रहा है.
कुछ समय पश्चात उसके सारे जवान पास आ चुके थे. उन्होंने उसे
उठाया और अपनी गाडी में लाद कर शहर की ओर बढ चले थे. असहनीय दर्द के वह मन ही मह
प्रसन्न हो रहा था.
तकाजा.
“तुम कुछ करते क्यों
नहीं? कब
से कह रही हूँ कि एकाध बार गाँव हो आओ. पर तुम हो कि जगह से हिलने का नाम ही नहीं
लेते.”
“
क्यों पीछे पडी रहती हो हर हमेशा. कह तो दिया न, कभी चला जाऊँगा.”
“ ऐसा
कहते-कहते तो बरसों हो गए,पता नहीं कब जाओगे? गाँव में अपना एक खानदानी मकान है.
थोडी बहुत जमीन भी है. क्या कुछ नहीं होता होगा उसमें?. बरसों हो गए, एक दाना भी
तुम्हारे भाई ने नहीं भेजा. मैं तो कहती हूँ कि जाकर हिस्सा बंटवारा करवा लो. अगर
इसी तरह देर की तो तुम्हारा भाई उस जायजाद पर कुण्डली मार कर बैठ जाएगा और
तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा. हिस्सा- बंटवारा हो जाएगा तो हम अपनी जमीन बेच कर एक
अच्छा सा मकान तो बना सकेगें. कब तक किराए के मकान में सडते रहेगें.”
रोज-रोज
की टिकटिक से बचने के लिए वह एक दिन गाँव जा पहुँचा. जाने से पहले उसने
भतीजे-भतीजियों के लिए एक किलो मिठाई का डिब्बा अपने सूटकेस में भर लिया था.
मुख्य
सडक से चार-पांच किलोमीटर दूर है उसका गाँव. बस से उतरकर वह एक पेड के नीचे यह
सोचकर खडा हो गया था कि कोई न कोई आटॊ-रिक्शा मिल जाएगा. उसने एक व्यक्ति से
जानकारी लेनी चाही तो उसने पलटकर जवाब दिया कि इस गाँव के लिए कोई आटॊ-वाटॊ नहीं
चलते. बात करते समय उसे ऐसा लगा कि यह आदमी तो अपनी जान पहचान का सा लगता है. उसने
अपना परिचय देते हुए कहा कि वह भी
इसी गाँव का रहने वाला है. बरसों से शहर में रह
रहा हूँ, काम की अधिकता की वजह से गाँव कुछ आना-जाना कम ही हो पाता है. वह जिससे बात कर
रहा था, वह संयोग से उसका सहपाठी निकला. वह भी गाँव ही जा रहा था. रास्ता चलते हुए
उसने उसके घर के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बतलाया कि उसकी माँ कई
दिनों
से बिमार पडी है. वह जब-तब तुम्हारा नाम लेकर कहती है,कि कई बरस हो गए अपने राम को
देख हुए. पता नहीं कब आएगा?. बस तेरा ही नाम रटते रहती है. तुम्हें कभी अपनी माँ
की याद तक नहीं आयी? पता नहीं कब बेचारी की आँख मूंद जाए. पिछले साल तुम्हारे दो
बैल मर गए. रामू काम
भी काफ़ी पिछड गया है. बडी मुश्किल से तुम्हारा भाई अपनी घर-गिरस्ती चला पा रहा है.
उसकी दो बेटियां भी जवान हो चुकी है. बेटियों के हाथ किसी तरह पीले हो जाए, इसी
सोच में तुम्हारा भाई सूख कर कांटा हो गया है. पहले कितना हट्टा-कट्टा था वह.
.यह सब सुनकर उसे ऐसा लगने लगा था कि वह अभी
गश्त खा कर गिर पडॆगा. उसकी आँखॊं के सामने अंधेरा सा छाने लगा था. हलक सूख आया
था. किसी तरह वह गाँव जा पहुँचा लेकिन उसकी हिम्मत घर के अंदर घुसने की नहीं हो
रही थी.
संयोग से उसी समय एक लडकी बाहर निकली. देखने में लगता है
जैसे बरसों से उसने कंघी-चोटी नहीं की हो. कपडॆ भी उसमे तार-तार हो आए थे. एक नजर
में तो वह उसे पहचान नहीं पाया था.लेकिन उसे देखते ही लडकी ने अपनी माँ को आवाज
लगाते हुए” माँ, देखो-देखो तो, चाचा आए हैं, कहते हुए वह भाव-विभोर हो गई थी. बस
एक आवाज में पूरा घर बाहर निकल आया था. सभी के चेहरे पर छाई उदासी देखकर उसकी आँखे भर आयी थीं. बडी
मुश्किल से उसने अपने आपको संभाला और उस ओर बढ चला था जिस कमरे में उसकी माँ के
कराहने की आवाज आ रही थी.
दोस्त. दो घनिष्ट मित्र आपस में चर्चा कर रहे थे. “ रमेश, अब तुम्हारे पिताजी की तबीयत कैसी है?.” “ यार मैं तो तंग आ गया हूँ. उन्हें
तो अब होश ही नहीं रहता. आए दिन बिस्तर गीला कर देते हैं. कभी तो कपडॆ भी गंदे हो
जाते हैं. अब मैं अपने काम-धाम करुँ,आफ़िस जाऊँ या दिन भर घर में बैठा रहूँ. सच
कहूँ, अब यह सब नहीं सहा जाता. कभी-कभी
सोचता हूँ कि उन्हें
वृद्धाश्रम में शिफ़्ट कर दूँ.” “वाह बेटॆ वाह, तुम एक अच्छे-होनहार बेटॆ होने का फ़र्ज निभा रहे हो. कभी अपने
बचपन को याद करो. जब तुम बित्ता भर के थे तो इसी पिता ने तुम्हें ऊँगली पकड कर
चलना सिखाया. तुम्हें नाम दिया और समाज में एक सम्मान दिलाया. कभी तुमने भी तो
कपडॆ खराब किए होंगे,तब इन्ही पिता ने तुम्हारी गंदगी साफ़ की होगी. तुम्हें
पढा-लिखा कर एक मुकम्मल आदमी बनाया. पर जब आज पिता असक्त हो गए तो बजाय उनकी मदद
करने के तुम उनसे घृणा करने लगे. अगर इसी प्रकार की घॄणा तुम्हारे पिता तुमसे करते
तो ! कभी इस बात पर तुमने गंभीरता से सोचा!. यार बुरा नहीं मानना, एक बात कहूँ, जब
तुम अपने पिता के नहीं हो सके तो फ़िर किसी के नहीं हो सकते. अब तुम दोस्त कहलाने
लायक नहीं रहे.” इतना कहने के बाद वह उठकर चला गया था.
प्रकृति
:- एक पाठशाला.
“
अकंलजी...अकंलजी..आप बडी अच्छी कविताएँ लिखते हैं,कृपया मुझे भी कविता लिखना
सिखाइये न !” एक प्यारी सी नन्ही लडकी ने चहकते हुए शहर के ख्यातनाम कवि से अपनी
तुतलाती भाषा में कहा. कवि
को सुनते ही बडा सोच हुआ कि कवि तो जन्मजात होता है.किसी को कवि बनाना इतना आसान
काम तो नहीं है. लेकिन लडकी की जिद के आगे ्वे विवश हो गये अर उन्होंने उस लडकी से
कहा: बेटा तुम बस्डि होकस्र एक बडी कवियित्री बन सकती हो,लेकिन तुम्हे थोडा धीरज रखन होगा,और जैसा मैं
कहूँ,उसे पूरा करना होगा.उस नन्ही बालिका ने उनकी शज़्र्त मान ली. दूसरे दिन उस कवि ने
एक पौधा खरीदकर लाया और उसे रौंपते हुए कहा कि इसे रोज पानी पिलाना आउर इसकी अच्छे
से देख-भाल भी करती रहना. पौधा जैसे-जैसे बडा होता जाएगा,तुममें कवि के गुण आते
चले जाएंगे और तुम सचमुच मे एक कवियित्री बन जाओगी. जैसा
उन्होने कहा था ,वह लडकी रोज प्राणपन से उस पौधे की जडॊं में पानी डालती और
उसकी देखरेख कर्ती रहती. जैसे –जैसे लडकी बडी होती गई ,वैसे-वैसे पौधा भी आकाश की
ओर बढता रहा. कुछ दिन बाद कई पक्षियों ने उस पेड की डाली पर अपने घोंसले बनाने
शुरु किए. एक अच्छा खासा पक्षियों का परिवार वह बस गया था. वे तरह-तरह की बोलियां
बोलते. लडकी पर इस माहौल का प्रभाव अपना रंग दिखाअने लगा था और वह भावुक भी होती
चली जा रही थी.और उसकी सोच का दायरा भी बढ्ता चल जा रहा था, अब वह कुछ लिखने भी
लगी थी. प्रकृति की संगत में रहकर कोई भी व्यक्ति कवि तो बन ही सकता है. यह निर्विवाद सत्य है.,क्योंकि प्रकृति एक पाठशाला
भी तो होती है.
बकरी
का पिल्ला.. किसी
आवश्यक काम से बोधन को बाहर गांव जाना पडा. वहां से लौटते समय उसने बहुत ही कम
कीमत पर एक बकरी का पिल्ला.यह सोच कर खरीद लिया था कि इतनी कम कीमत में तो मुर्गी
का पिल्ला भी नहीं मिल सकता. खरीद करते समय
उसे यह भी याद था कि आने वाले साल पर उसे अपने बेटॆ की नवस उतारना है.
उसने उस बकरी के पिल्ले को अपने कांधे पर टांगा और घर लौट
आया. बाहर आंगन
में उसका चार साल का बेटा खेल रहा था. अपने कांधे पर से पिल्ले को उतारते हुए उसने
अपने बेटे को उसे दिखाते हुए कहा”देखो मैं तुम्हारे वास्ते क्या खरीद लाया हूँ.”.
पिल्ले को पाकर वह बेहद हॊ खुश हुआ था. अब वह सुबह-शाम उस पिल्ले के साथ
खेलता-कूदता. उसे अपने हाथॊं से हरी-हरी पत्तियां खिलाता और पानी पिलाता. वह जहां भी जाता बकरी का बच्चा
मिमियाता उसके पीछे दौडता चला आता .रात जब वह सोता तो उस पिल्ले को अपनी खाट के
पास बांध देता. देखते ही देखते वह बकरी का पिल्ला अब उसका गहरा दोस्त बन चुका था.
एकसाल कैसे क्या बीत गया पता ही नही चल पाया. वह दिन भी
नजदीक ही चला आया जिस दिन उस बकरी के पिल्ले की बलि दी जानी थी. सारी आवश्यक
तैयारी के बाद उसके गले में फ़ूलों की माला डाल कर उसके माथे पर बडा सा तिलक लगा
दिया गया था. वह अबोध बालक यह सब बडी कौतुहल के साथ देख रहा था. वह यह समझ नहीं पा
रहा था कि आखिर यह सब क्यों किया जा रहा है. उसने उत्सुकतावश अपने पिता से इस बाबत
जानकारी लेना चाहा तो उसके पिता ने समझाते हुए सब कुछ बतला दिया. पिता की बातें
सुन चुकने के बाद उस लडके ने उस पिल्ले को अपनी गोद मे उठा लिया और लगभग गरजते हुए
कहा:”यदि किसी ने इस पिल्ले की गर्दन पर छुरी चलाया तो वह भी अपनी गर्दन पर छुरी
चला लेगा. वह किसी भी कीमत पर अपने दोस्त को मरने नहीं देगा. पिल्ले को गोद में
उठाए वह अपनी मां के के पास आया और कहा “मां किसी जानवर की बलि चढाए जाने से उमर
लंबी होती तो आदमी कभी मरता ही नहीं. वह अपने बचने के लिए रोज पशु बलि चढाते ही
रहता. मैं कितनी उमर जिउंगा यह तो मुझे भी नहीं मालुम. फ़िर एक मूक जानवर की बलि
चढा कर लंबी उमर की कामना कैसे की जा सकती है.” अब वह फ़बक कर रो पडा था. केवल उसकी
ही आंखें नहीं भीगी थी बल्कि वहाँ उपस्थित सभी जनसमुदाय की आंखें भर आयी थी.
बड़े
रसूख वाले लोग. किसनी की बेटी के जवान होने की खबर मुहल्ले में ही
नहीं,पूरे गांव में फ़ैल गई थी .
खबर लगते ही शोहदों की बन आयी थी. वे उसके घर के चक्कर इस आशा के साथ लगाते कि
देर-सबेर ही सही,एक बार उसके दीदार हो जाए. किसनी अपने भाग्य को कोसती कि कहां उसके घर इतनी खूबसूरत
बेटी पैदा हो गई, उसे तो किसी बडॆ घर में पैदा होना चाहिए था.. पर होनी को कौन टाल
सकता था. बनी-मजुरी के लिए उसे घर छोडना ही होता था. घर में वह बैठे
भी कैसे रह सकती थी..बित्ता भर पेट के गड्ढे को भरने के लिए अगर वह काम पर न जाए
और घर से बाहर न निकले,यह संभव भी नहीं था. घर छोडने के पहले वह अपनी बेटी को
समझाती कि कोई वह घर से बाहर न निकले. यदि कोई अपरिचित दरवाजे की कुण्डी खटखटाए तो
दरवाजा न खोलना. आदि-आदि. बडी सुबह वह घर से निकल जाती और देर शाम तक लौटती. बाहर
रहते हुए उसे केवल एक ही चिन्ता सताये रहती कि उसकी बेटी सुरक्षित तो है?.मन ही मन
वह अपनी बेटी कि सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थणा करती रहती. एक दिन, शाम को जब वह घर लौटी तो बेटी गायब थी. उसने
चीख-पुकार कर मोहल्ले वालों से अपनी बेटी को ढूंढ लाने की गुहार लगायी, पर उसकी
सुनने वाला कोई न था. आखिर एक बूढे ने आगे बढते हुए उससे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज
करवा आने की सलाह दी. वह थाना पहुँची,लेकिन उसकी रपट यह कहकर दर्ज नहीं की गई कि
हो सकता है वह मोहल्ले में कहीं गई होगी या अपनी किसी सहेली के घर-वर में होगी,
देर-सबेर लौट आएगी. चार दिन बाद पुलिस ने एक लाश बरामद की, वह उसकी बेटी की ही
लाश थी. बुढिया ने चीख_चीख कर आसमान सर पर उठा लिया था. पडौस में रहने वाले लोग
घेरा बनाए मूक दर्शक बने यह सब देख रहे थे. पर किसी ने भी आगे बढकर उसे ढाढस
बंधाने की हिम्मत नहीं जताई.
बुढिया ने उन सबको धिक्कारते हुए कहा:-ऐसी घटना यहां पहली
बार नहीं हो रही है. हर बार लोग हमारी जवान बहू-बेटियों को उठाकर ले जाते रहे हैं
और तुम लोग हमेशा की तरह मुँह लटकाए खडे रहते हो. कब खून खौलेगा तुम्हारा, कायर की
औलादो ? कब अपना मुँह खोलोगे तुम लोग ?.
एक
आदमी ने आगे आते हुए कहा_” अम्मा...हम कायर नहीं ,गरीब हैं. हम जिन घरों में
गुलामों की तरह काम करते हैं, उनके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोल सकते. हम जानते हैं
कि उनके खिलाफ़ बोलने की हमें कितनी बडी कीमत चुकानी पड सकती है?. वे हमारे घरों
में आग लगवा देगें, एक-एक दाने के लिए हमें और हमारे बच्चों को तरसा-तरसा कर मार
डालेगें, हो सकता है कि पूरे परिवार के लोगों की हत्या ही करवा दें ? अम्मा, उन
बडॆ रसूखदारों की ताकत का अन्दाजा नहीं है तुम्हें.! हम एक बेटी के खातिर पूरे
परिवार को संकट मे नहीं डाल सकते. फ़िर हमारे पास सबूत भी क्या है कि चंदा को किसने
अगवा किया था और किस-किसने उसके साथ बलात्कार किया था? बोलो, किस आधार पर
तुम हमें उनके खिलाफ़ बोलने को उकसा रही हो ? चलो-उठॊ और रोना-धोना बंद करो
.रोने-धोने से कुछ होने वाला नहीं है. अब हमें उसके अंतिम संस्कार की तैयारी करना
चाहिए. बहू का सुख. हमारे ही मुहल्ले में रह्ती है जशोदा. बडी ही विनम्र, बडी
ही मेहनती. जाति से वह रजक समाज में आती है. एक दो घरों में काम करने के अलावा वह
घर पर ही एक छॊटी सी लाण्ड्री चलाती है. उसके दो बच्चे हैं जो अब जवानी के देहलीज
पर कदम रख चुके हैं,उसकी मदद करते रहते हैं. पति ड्रायवर है. शराब का शौकीन है. आए
दिन धुत्त होकर पडा रहता है. कभी काम पर गया,कभी नहीं गया,इससे उसे कुछ फ़र्क नहीं
पडता. खाने- पीने में मनपसंद चीजे जो मिल जाया करती थी. कभी किसी से उलझकर आया तो
उसका गुस्सा अपनी पत्नि पर जरुर निकालता था. पत्नि समझाती कि बच्चे बडॆ हो गए हैं,
शराब पीकर घर न आया करें,तो वह उखड जाता फ़िर उसे संभालना मुश्किल हो जाता.
एक सेठ ने उसे अपनी गाडी चलाने के लिए नौकरी पर रख लिया. कुछ दिन तक तो ठीक
रहा. एक दिन उसने सेठ से दो हजार रुपया कोई बहाना बनाकर ले लिया और उस दिन से न तो
वह काम पर गया और न ही उसके पैसे ही लौटाया.
पता नहीं किस बात का उसने टेंशन ले लिया और एक दिन फ़ांसी लगाकर अपनी जान दे
दी. उस समय घर पर कोई नहीं था. जशोदा पर जैसे पहाड ही टूट पडा था.
समय बडॆ-बडॆ जख्म भर देता है. जशोदा भी अब पिछली बातों को भुला-बिसरा कर अपने
काम पर लौट पडी. उसे अब ऐसा भी लगने लगा था कि राजू की शादी कर देनी चाहिए. सो
उसने एक सुन्दर सी लडकी देखकर उसकी शादी कर दी. लडकी का पिता किसी मिनिस्टर के घर
पर काम करता है..जशोदा की सोच कुछ इस तरह बनी कि शायद वह उसके पढे-लिखे लडके की
नौकरी लगवा देगा. यह जरुरी नहीं कि आदमी जो कुछ भी सोचे उसके अनुरुप उसके काम होते
चले जाएंगे. जशोदा के साथ भी यही हुआ. जो कुछ उसने सोचा ठीक उससे उलट हो रहा था.
बहू अपनी मर्जी चलाती. जब कोई काम उसे बतलाया जाता
तो वह कहती कि उसके पिता के यहाँ तो उसने यह काम किया ही नहीं है. जब उसने आपने
बेटे से इसकी शिकायत करना चाहा तो उसके बेटे ने पलटकर कह दिया कि माँ तू उसके पीछे क्यों पडी रहती है. एक बार जब बात
बिगड जाती है तो फ़िर सुधारे नहीं सुधरती. एक दिन तो बहू ने करारा जवाब देते हुए
उससे कहा कि अब की कुछ कहा तो अपने बाप से कहकर पूरे परिवार को जेल की हवा खिलवा
कर चक्की पिसवाऊँगी.
समय अपने हिसाब से चल रहा है और जशोदा भी. अब चुप रहने के अलावा कोई चारा भी
नहीं बचा है उसके पास .वह दिन भर काम में खटती रहती है और अपने आपको जिलाए रखने के
लिए रोटियां सेंकती है.कभी- कभी सोचती है कि काश उसने राजू की शादी न की होती तो
यह दिन देखने को नहीं मिलते.
भगवान के नाम एक
सरकारी कार्यालय में काम कर रहे बडे बाबू ने अपनी नौकरी के दस साल में लाखों का
बैंक बैलैंस,शहर में तीन आलीशान बंगले,मोटर गाडियां आदि का जखीरा इकठ्ठा लर लिया
था. किसी दिलजले ने उसकी शिकायत विजिलेंस में कर दी.इन्क्वारी हुई. जांचकर्ता
अधिकारी ने उससे इतनी बेशुमार दौलत कैसे इकठ्ठा की,यह जानना चाहा तो उसने बडे
इतमिनान से जबाब देते हुए कहा- सर...मैंने अपने जीवन में कभी किसी भी मुवक्किल से
एक नया पैसा भी नहीं मांगा. एक बडी सी पेटी जिसमे ताला जड़ा हुआ है जिस पर
देवी-देवता का चित्र चस्पा किया गया था दिखाते हुए कहा-मैं हर मुवक्किल से कहता कि
,जो भी आपकी श्रद्धा हो इस पेटी में डाल दो. इससे जो भी रकम इकठ्ठा होगी,उससे एक
विशाल मंदिर का निर्माण होगा. लोग दस-बीस-पच्चीस-पचास के नोट डाल जाते. इस तरह
मैंने जमीनें खरीदी और आलिशान भवन का निर्माण करवाया. जो कुछ भी (सम्पत्ति) आप देख
रहे हैं,वह सब भगवान के नाम हैं. मेरा इसमें कुछ भी नहीं है. मैं तो केवल भगवान का
भक्त हूँ, बस उन्हीं की सेवा करता हूँ और उन्हीं के आश्रय में रहता हूँ”. बडॆ
बाबू की बात सुनकर जांच अधिकारी ने अपनी फ़ाईल बांधी और उलटे पैर लौट गए थे. जब
चिडिया चुग गई.खेत. . "रामप्रसाद...एक बात कहूँ....बुरा तो नहीं मानोगे".
?. "
अरे यार...तू ही तो मेरा सच्चा दोस्त है....तुम जो भी कहोगे,मेरे भले के लिए ही तो कहोगे...बोल क्या बात है?". "
तुमने मकान अपने बेटे के नाम बनवा दिया,जबकि
यह तुम्हारे अपने नाम होना चाहिए था".
" मकान
मेरे नाम बने या बेटे के नाम..क्या फ़र्क पडता है " "
फ़र्क पडता है मेरे दोस्त...यदि मकान तुम्हारे
नाम रहता ,तो बेटे और बहू तुम्हारी पूछ-परख ज्यादा करते.मकान मालिक होना और मकान मालिक होने
का भ्रम बना रहना..दोनो अलग-अलग बात है".. " भाई किसन...मेरा एक ही तो बेटा है...बडा ही सुशील,नेक,आज्ञाकारी...मुझे उस पर पूरा भरोसा है कि वह मेरे साथ कभी भी ऊँचा-नीचा व्यव्हार नहीं करेगा."
"
ईश्वर करे ऎसा ही हो
कुछ दिन तक तो सब ठीक-ठाक चलता
रहा. समय के बदलने में देर नहीं लगती.पूरे
घर की चाभियां हाथ मे आते ही बहू ने अपना
असर दिखलाना शुरु कर दिया. स्थितियां यहाँ तक बदतर
होती चली गई कि उसे अपना मकान छोडकर वृद्धास्श्रम की शरण लेने में मजबुर
होना पडा.
" काफ़ी दिनों
बाद उसका मित्र किसन उससे मिलने उसके घर पहुँचा तो पता चला कि वह तो काफ़ी समय
पूर्व ही मकान छोडकर वृद्धाश्रम जा चुका है. अब वह उससे
मिलने वहाँ पहुँचा. अपने
मित्र को आया देख रामप्रसाद को बेहद खुशी तो हुई लेकिन मिलते ही गले लगकर जार-जार रोते हुए उसने कहा:- किसन तुम ठीक कहते थे,लेकिन मेरी अकल पर पत्थर पडे थे.मकान यदि मेरे नाम
पर होता तो वे इतनी हिम्मत कदापि नहीं करते.आँख मूंदकर आदमी
को भरोसा कभी नहीं करना चाहिये. अब पछ्ताए का होत है ,जब चिडिया चुग गई.खेत.
मीरा.
एक छोटे से रियासत की राजकुमारी थी मीरा. गाने का
उसे बेहद शौक था.
एक दिन राणाजी ने उसका गाना सुना .गाना
सुनते ही उन पर मदहोशी का आलम छाने लगा. उन्होनें अपने
कारिन्दों के जरिये अपने महल में आने का निमंत्रण भिजवाया. एक
दिन मीरा अपने साजिंदों के साथ महल में पधारीं. उनका वहाँ
भरपूर स्वागत-सत्कार किया गया. सारी
औपचारिकताओं के पूरा हो जाने के, राणा ने उन्हें कुछ सुनाने
का आग्रह किया. साजिंदॊं ने अपने वाद्ध यंत्रों को साधा और
एक स्वरलहरी वातायण को झंकृत करने लगी.मीरा ने आलाप ली और
पूरा राजमहल थिरक उठा.राणा को लगा कि वे किसी तीसरी दुनियां
में जा पहुँचे हैं.
वाद्ध कभी के शांत हो चुके थे,लेकिन
राणा अभी तक उस स्वरों की रहस्यमयी दुनियां में ही विचर रहे थे. काफ़ी देर बाद उन्हें होश आया .होश में आते ही राणा
ने अपने गले में पडे हीरा-मोती-पन्ना -पुखराज से जडा नौलखा हार मीरा की ओर बढा दिया. मीरा
ने कोर्निश लेते हुये,हाथ बढाकर उसे कुबूल किया और धन्यवाद
दिया.
राणा की मुलाकातें जब- तब मीरा से होती रही. अपने धडकते दिल पर काबु रखते हुये राणाजी ने मीरा के समक्ष शादी का
प्रस्ताव रखा. मीरा ने देर न करते हुये,राणा के प्रस्ताव पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी.
दो संगीतप्रेमी अपनी ही बनाई हुई दुनिया में मस्त रहाने लगे. बडे-बडे राजे-रजवाडॊं
से भी मीरा आमंत्रण आते.रणा इस पर एतराज करते,लेकिन मीरा को यह नागवार लगता. शादी से पहले उसने यह
शर्त रख दी थी कि उसे बाहर के कार्यक्रमॊं में जाने की छूट रहेगी,जिसे राणा ने स्वीकार भी किया था.राणा को लगता क
भरोसा. एक दिन मुझे आवश्यक
काम से बाहर जाना था, बिना पेट्रोल चेक किए मैंने अपनी मोटरसाइकल उठाया और चल
दिया.. लौटते
समय तक सांझ घिर आयी थी और मुसलाधार बारिश भी होने लगी थी, घर से जब चला था,तब
आकाश एकदम साफ़ था. पानी में भींगते हुए भी मैं गाडी बमुश्किल चला पा रहा था. थोडी
दूर ही जा पाया था कि मोटरसाइकिल बंद पड गयी. पेट्रोल टंकी खोलकर देखा. खाली पडी
थी. अब सिवाय उसे घसीटने के कोई विकल्प नहीं था. चलती गाडी में हवा से बात करना
कितना आसान होता है,लेकिन बंद गाडी कॊ घसीटना सबसे मुश्किल काम होता है. सांस फ़ूलने लगी थी. थोडी
देर रुका रहता,फ़िर चल पडता, किसी तरह गाडी घसीटता रहा. मैं जानता था कि कुछ दूरी
पर पेट्रोल-पंप है. बस, उस तक पहुँचने भर की देरी थी. सामने पेट्रॊलपंप देखकर राहत
महसूस हुई.
वहाँ पहुँचकर मैंने अटैण्डेन्ट से दो सौ रुपये का पेट्रोल
डालने को कहा और जेब से पर्स निकालने के लिए जैसे ही जेब में हाथ डाला, वह नदारत
था. अब क्या किया जाए?,यह मैं सोच ही रहा था. शायद उसने मेरी मनोदशा पढ ली थी. मैं
कुछ बोल पाऊँ, उस लडके ने पहल करते हुए मुझसे कहा :-दादा, ऐसा लगता है कि आप पर्स
जेब मे डालना भूल गए. ऐसा कई बार हो जाता है. आप बिलकुल भी परेशान मत होइये. आराम
से घर जाइये और कल सुबह मुझे रकम लाकर दे दें, या किसी से भिजवा दें. हिसाब-किताब
मुझे सुबह देना होता है. मुझे
आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि उस लडके से मेरा कभी वास्ता नहीं पडा और न ही कभी
उससे मुलाकात ही हुई थी, मुझ अनजान पर वह इतना भरोसा कर रहा है.
मैंने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की. एक किलोमीटर आगे मेरी
जान पहचान वाले एक व्यक्ति की किराना दूकान थी, वहाँ से दो सौ रुपये लिए और उस
पेट्रोल पंप पर पहुँचकर उसे रकम लौटाते हुए उसे धन्यवाद देना चाहा तो उस लडके ने
कहा”-दादाजी, अब तक मैंने जिस पर भी भरोसा किया,उनसे मैंने कभी धोका नहीं खाया है.
रकम तो कल भी आ सकती थी, आप तुरन्त ही लौट आए. जब
भी मैं उस रास्ते से गुजरता हूँ, तो मुझे उस लडके की बराबर याद आ जाती है. हालांकि
उसने बाद में वहाँ से नौकरी छोड दी थी .
भले ही वह वहां नहीं है,लेकिन उसकी स्मृति जेहन में उतर ही जाती है.
शर्म
नहीं आती ?
.""क्यों भाई...अच्छॆ खासे हट्ट- कट्टे नौजवान हो, कोई काम- धंधा क्यों नही करते.,भीख माँगते हुये तुम्हें शर्म आनी चाहिये."
"शर्म तो बहुत आती है साहब ,मगर कोई काम देता ही नहीं. चलिये आप ही मुझे कोई
छोटा-मोटा काम दिला दीजिये. मैं आपको
विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे पूरी इमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ पूरा करुँगा."
" अच्छा ये तो बतलाओ कि घर और कौन कौन
हैं ?"
"
एक बूढ़ी अपाहिज मां है,जो काफ़ी लंबे समय से
बिमार पडी है. अभी वह तवे सी तप रही है,"
"तो उसका इलाज क्यों नहीं कराते. उसे अस्पताल-
वस्पताल ले जाओ ,मुफ़्त में इलाज हो जायेगा और उसे
दवा भी मिल जायेगी."
" साहबजी, ठीक कहा
आपने कि उसे अस्पताल ले जाऊँ तो वह ठीक हो
जायेगी,लेकिन उसका इलाज कराने से भी कोई फ़ायदा नहीं है.
अगर वह ठीक हो भी गई तो भूख
में नाहक ही तड़पेगी. जब मैं स्वयं का पेट नहीं भर पाता तो उसे क्या खिलाउँगा.
उसका मर जाना ही ठीक रहेगा.
बडी ही बेबाकी एवं निष्ठुरता के साथ उसने अपने मन की बात कह
दी थी ,ऎसा कहते हुए न तो उसे कोई
ग्लानि हो रही थी और न ही कोई शिकन उसके चेहरे पर दिख रही थी
भूख.
पूरी बस्ती में इस खबर
को फ़ैलने में देर नहीं लगी कि ददुआ की जवान छोरी कल रात अपने आशिक के साथ भाग गई
है. एक अखबार मे नए-नए काम पर लगे संवाददाता ने सोचा कि इस खबर को हाई-लाइट किया जा
सकता है. उसने अपना कैमरा उठाया,जेब में डायरी डाली,पेन को जेब के हवाले किया और
वहां जा पहुंचा.
उसे ददुआ के मकान को खोज
निकालने में देर नही लगी. उसने ताबडतोब कई प्रश्न उसके सामने उछाल दिए.
कुछ देर तक तो वह चुप्पी
साधे बैठा रहा फ़िर उसने किसी तरह थूक से गले को गीला करते हुए जबाव दिया ”बाबू
साहब, आज मुझ गरीब की लडकी भागी है, कल किसी और की भाग जाएगी. कब तक इनके भागने की
खबरें छापते रहोगे. लडकियां तो आए दिन भाग रही है. यदि मिल भी जाएगी तो कुछ दिन
बाद फ़िर भाग जाएगी. इसका कारण नहीं जानना चाहोगे?.सुनो-मैं बतलाता हूँ इसका कारण.
एक गरीब बाप उसे भरपेट खाना नहीं खिला सका. शायद तुम जानते होगे कि पेट की भट्टी
में जब भूख की ज्वाला प्रज्जवलित होती है, तो आदमी को कुछ सुझाई नहीं देता और
उन्हें जब कोई रोटी खिलाने की बात कह देता है,तो वे सहर्ष उनके पीछे हो लेती
है. लडकियां जानती है कि इसकी कीमत तो उसे
चुकानी पडेगी,और वे चुका भी रहीं है. अखबार में खबर छाप देने से कुछ नहीं होगा.
खबर के बदले उन्हें रोटियां दिला सकते हो कुछ हद तक इनके भागने पर रोक लगाई जा
सकती है.
भूल
“ पुष्पा ये क्या पागलपन मचा रखा
है.? इतनी छोटी सी बात पर, क्या कोई घर छॊड कर जाता है ?.” “ आप इसको छोटी सी बात कह रहीं है ? मैंने सपने में भी नहीं
सोचा था कि इतनी बडी घटना मेरे साथ घट सकती है. “
पुष्पा, जो कुछ भी हुआ है,इसका मुझे खेद है. चल यार, मैं तेरे जीजाजी की ओर से
माफ़ी मांगे लेती हूँ. उनसे जो भी भूल हुई है, वह अनजाने
में हुई है. उस समय वे नशे में थे. उन्हें यह ध्यान नहीं रहा और वे तेरे कमरे में चले आए.” “ आप इतनी बडी बात
को केवल भूल कहकर टालने की कोशिश न करें. उस कमरे में मेरे अलावा अम्माजी भी
तो सो रही थीं. उन्हीं के बिस्तर के पास मोना बिटिया भी तो सो रही थी वे उनके बिस्तर
में न घुस कर, मेरे ही बिस्तर में क्यों घुसे ? और लगे मेरे साथ
बदतमीजी करने? नहीं... मैं
अब यहाँ एक पल भी रहना नहीं चाहती.
मैं अभी और इसी समय ये घर छॊड कर जा रही हूँ, कृष्णा ने सुबकते हुए अपना सूटकेस पैक किया.और सीढीयां
उतरने लगी थी.
करनी और कथनी
सरला रंग में धुली हुई चांदनी की तरह, तो रुप में वह खिले
हुए कमल के भांति थी. जितनी सुंदर वह थी, उतनी ही कुशाग्र बुध्धि की स्वामिनी भी थी.
उसने बी.ए. में संपूर्ण प्रदेश में टाप पोजिशन बनायी थी. सुंदरता और बुध्दि के
संजोग को लेकर वह समाज में चर्चा का विषय बन चुकी थी
उसके लिए अब रिश्ते आने लगे थे. पिता ने एक स्वस्थ सुंदर
युवक जो एक अधिकारी भी था, के साथ उसका रिश्ता तय कर दिया. इस तरह वह अपने ससुराल
आ पहुंची. सास-ससुर उससे अत्यधिक ही स्नेह रखते थे. अच्छा ससुराल और योग्य पति पाकर वह निहाल हो गई थी. जल्दी ही वह एक बच्चे को
जन्म देने वाली थी. इस खबर को सुनकर उसके मायके और ससुराल वाले की खुशियां देखते
ही बनती थी. लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था. एक दिन वह अपने पति अजय के साथ अपनी गाडी में सवार होकर
किसी खास परिचित के पुत्र के विवाह में शरीक होने के लिए गई हुई थी. घर लौटते समय
एक ट्रक की टक्कर से बचने के लिए अजय ने अपनी गाडी कॊ जैसे-तैसे बचा तो लिया
,लेकिन सामने एक गहरा नाला था,जिसके बारे में वह अनभिज्ञ था,जा समाया. भीषण
एक्सीडेंट के चलते उसका प्राणान्त हो गया. सरला बुरी तरह घायल हो गई
थी. उसे बेहोशी के आलम में अस्पताल में भरती करवाया गया. वहां उसकी सर्जरी की गई.
वह तो किसी तरह बच गई,लेकिन बच्चे को नहीं बचाया जा सका था. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इस अवस्था में से
होकर भी गुजरना पड सकता है. एक ओर अजय का, अचानक इस तरह चले जाना और बच्चे के
विछोह ने उसे बुरी तरह झझकोर कर रख दिया था. पिता समझाते, मां समझाती, ससुर उसे
सांत्वना देते,लेकिन उसका दुख कम होने का नाम नहीं ले रहा था. एक दिन उसके पिता उसे लिवा लाने के लिए आ पहुँचे. उनकी सोच
थी कि जब तक वह अपने ससुराल में रहेगी, अजय की याद वह भुला नहीं पाएगी और बच्चे के
न रहने का गम उसे सदा सालते रहेगा. यदि वह अपने मायके आ जाएगी तो संभव है,वह सब
कुछ भूलकर एक नया जीवन जी सकेगी.उनकी यह भी सोच थी कि अब वह अपने ससुराल वालों से
उतना सम्मान और प्यार भी नहीं पा सकेगी. अपने मन की पीडा उजागर करते हुए जब उसके पिता ने, अपने समधी
के सामने उसे लिवा ले जाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने पलटकर कहा:- प्रभुदयालजी, माना
कि सरला आपकी बेटी है. जिस दिन आपने उसका कन्यादान मेरे बेटॆ से कर दिया उस दिन से
वह मेरी बेटी हो गई. अब उसके बारे में अच्छा-बुरा जो भी सोचना है,वह मैं सोचुंगा. मैंने सोच रखा है कि सरला, अब अपनी आगे की पढाई करेगी और
उसी पोस्ट पर बैठेगी, जिसे अजय खाली कर गया है. अतः आपसे मेरी प्रार्थणा है कि मन
से गलत विचार निकाल दीजिए कि हम उसे बोझ समझ रहे हैं. एक बेटी अपने पिता का बोझ
कैसे हो सकती है?. सुनते ही प्रभुदयालजी की आँखॊं में छाया कुहासा, अश्रु बन
कर झर रहा था.
मीठे
सपने.
नेताजी इस
समय परेशानी के दौर से गुजर रहे थे. परेशानी का कारण यह नही था कि उनकी कुर्सी
खतरे में थी अथवा किसी आतंवादी ने उन्हे धमकी दे रखी थी .परेशानी कुछ ऐसी थी कि वे
न तो किसी को बता सकते थे और न ही किसी की सलाह ही ले सकते थे.परेशानी के मूल मे
थे वे भयानक सपने ,जो उन्हे हर रात दिखलाई पडते थे.
नींद की आगोश
मे जाते ही उन्हें दिखलाई पडता कि वे किसी अग्यात स्थान पर जापहुँचे हैं, जहाँ चारो तरफ़ धुआं ही धुआं फ़ैला हुआ है. फ़िर उसमे एक धुधंली
सी आकृति दिखती. धीरे-धीरे वह आकृति स्पष्ट होने लगती. आकृति स्वयं उनकी होती.
थॊडी देर बाद वह किसी सूअर की योनि मे बदल जाती. सुअर अपने नथूने से विचित्र आवाज
निकालता हुआ गंदगी के ढेर में जा घुसता और बदबुदार कीचड में लोट-पोट होने लगता.
अजीबॊ-गरीब
हरकते दिखकर उनकी नींद खुल जाती.वे बिस्तर पर उठ बैठते और पाते की उनकी समूची देह
पसीने लथपथ हो गई है और शरीर से बदबू उठ रही है. वे सीधे बाथरुम में जा समाते और
शावर खोल कर उसके नीचे खडे हो जाते. बदबू अब भी पीछा नहीं छोड रही है. वे किसी
खुशबुदार साबुन से घिस-घिस कर नहाते,तब जाकर
वे बदबू से निजात पाते.
कभी सपने
में वे गिद्द बन जाते और उडते हुए किसी मरे हुए जानवर पर जा बैठते और उसका मांस-पिंड
नोच-नोचकर खा्ने लगते.जानवर के जिस्म के फ़टते ही चारॊं तरफ़ खून की नदिया बहने
लगतीं. नेताजी की नींद खुल जाती और वे हडबडाकर उठ बैठते.और देखते कि कमरे मे खून
बिखरा पडा है.
काफ़ी
सोचने-विचार करने के बाद वे इस निर्णय पर जा पहुँचे कि ये सब किसी दिलजले विरोधी
दल के नेता की करतूत है.उसने निश्चय ही किसी तांत्रिक की मदद से अथवा किसी अघोरी
से मिलकर इस षडयंत्र को रचा है और इसका कोई न कॊई तोड निकलवाना चाहिए.
उन्होणे
अपने पी.ए.को बुला भेजा और आदेश दिया कि वह किसी सिद्ध तान्त्रिक को लेकर आए.
एक बंद
कमरे में उन्होंने अपाने दुख की गठरी उस तान्त्रिक के सामने खोलकर रख दी और कहा कि
जितनी जल्दी हो सके उन्हे इस यंत्रणा से बाहर निकाअले.उन्होनें यह भी कहा कि चाहे
जितना भी पैसा खर्च हो जाए उसकि फ़िक्र न की जाए.
तान्त्रिक
भी घाघ किस्म का था.वह समझ गय कि इस समस्य जितनी भी चांदी वह काट सकता है,काट लेनी चाहिए. ऎसा स्वर्णीम अवसर बार-बर नहीं आ सकता.
दो-ढाई
माह तक चाले अनुष्टान में लाखॊ का खर्च आया. अनुष्ठान के पुरा होते ही नेताजी को
अब बुरे सपने आने बंद हो गए थे.
उन्होने सारे खर्चॊं को सरकारी मद में डाल दिया था
.अब नेताजी निश्चिंत होकर अपनी टांगे
पसारकर सोते. बुरे सपनों के बजाय अब उन्हें मीठे-मीठे सपने गुदगुदाया करते थे.
सपनॊं में अब शोख चंचल हसीनाओं का मेला सा लगने लगा था.
लाचारी. शहर
में आए दिन चोरी हो रही थी. कभी किसी मोहल्ले में तो कभी किसी मोहल्ले में. एक दिन
तो चोरों ने गजब ढाया. शहर के सबसे व्यस्ततम इलाके में जहाँ बडी-बडी दुकाने लगी
हुई थी, चार दुकानॊं के शटर तोडकर करोडॊं का सामान साफ़ कर दिया. पब्लिक का गुस्सा
फ़ूट पडा और उन्होंने थाने का घेराव करते हुए और पुलिस के खिलाफ़ जमकर अपनी भडास
निकालते हुए अपशब्दों का प्रयोग करना शुरु कर दिया. कोई उन्हें कुत्ते की उपाधि दे
रहा था,तो कॊई पुलिस की चोरों से मिली-भगत की बात कर रहा था. भीड कब क्या न कर
बैठे इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता. देखते ही देखते थाने पर पत्थर बरसाये जाने
लगे. जब इस बात की सूचना
पुलिस अधीक्षक को मिली तो वे फ़ौरन चले आए और उन्होंने भीड को शांत करने के लिए
हवाई फ़ायर किया. गोली की आवाज सुनकर भीड सहम सी गई थी. फ़िर उन्होंने भीड की ओर
मुखातिब होकर कहा-“भाईयॊं, यह सच है कि शहर में आए दिन चोरी के वारदार बढते जा रहे
हैं.हम उन्हें रोकने का भरसक प्रयास भी कर रहे हैं.लेकिन जब तक आप लोगों का सहयोग
नहीं मिलेगा,पुलिस कर भी क्या सकती है. आप लोगों को भी चाहिए कि अपनी सुरक्षा खुद
करने का प्रयास करें. जब आप लापरवह होते हैं तो अपराधी का सर उठाना आसान होता है.
सबसे बडी बात तो यह कि आप शायद जानते नहीं है कि शहर की आबादी दो लाख है और पुलिस
बल में तैनात केवल सात सौ पुलिस कर्मी. अब आप ही बतलाइये कि क्या सात सौ जवानों से
पूरे शहर की सुरक्षा कर पाना संभव है? वे कुछ और कह पाते कि तभी डाग-स्काड आ
पहुँचा. इन्स्पेक्टर की ग्रेड का वह श्वान
भीड में जा घुसा और यहाँ-वहाँ सूंघते हुए घूमने लगा. तभी उसने भीड में खडॆ एक आदमी
का पैजामा पकड लिया और उसे बुरी तरह से घसीटने लगा. वहां तैनात पुलिस कर्मियों ने
उसे जा घेरा. कडी पूछताझ के बाद उस आदमी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.
जब अपराधी
पकड लिया गया तो पुलिस अधीक्षक ने पुनः जमा भीड को सम्बोधित करते हुए कहा-“ अभी
इसी भीड में कोई सज्जन, पुलिस को कुत्ता कह रहा था. वह यह समझ ले कि पुलिस के लोग
भी ठीक उसी की तरह इनसान होते है,जिस तरह का वह है. हाँ! पुलिस बल में कुत्ते भी
होते हैं जो कि कडी मेहनत और प्रशिक्षण के बल पर जुर्म पकडने में प्रवीण बनाये
जाते हैं.और इन्हें भी हमारी ही तरह ग्रेड भी दिया जाता है. अगर किसी ने भूल से
कुत्ते को कुत्ता कह दिया तो इससे कुत्ता जाति कॊ कोई फ़र्क नहीं पडता लेकिन
जानवरॊं के प्रति,जबकि वह समाज की सेवा में तत्पर हो तो ऐसा कहने वाला उससे भी नीचे
की पायदान पर खडा है,यह उसकी समझ में आ जाना चाहिए.
शिष्टाचार
एक राजा था. वह बडा ही नेक,न्यायप्रिय,तथा
प्रजापालक था. अपनी प्रजा की भलाई के लिये वह नयी-नयी योजनायें बनाता रहता था. बडे अपराधों के लिये वह
तत्काल तथा उचित सजा देता था. इतना सब कुछ होने के बावजूद
उसे चिन्ता खाये जा रही थी ,वह यह कि आय के समस्त स्त्रोतों
के बावजूद राजकीय घाटा बढता ही जा रहा था.
उसने अपने प्रधानमंत्री को अपनी चिन्ता से अवगत कराते हुये
तत्काल प्रभाव से कोई ठोस उपाय खोजने तथा अमल मे लाने को कहा.
प्रधानमंत्री ने एक बडे अधिकारी की नियुक्ति कर सभी
कर्मचारियों पर कडी नजर रखने का आदेश दिया. इतना होने के बाद भी भ्रष्टाचार के मामलों मे कमी नहीं आयी .उसने एक और बडे शक्तिसंपन्न अधिकारी
को नियुक्त किया. फिर भी स्थिति जस की तस थी .इस तरह वह अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करता रहा, लेकिन
बात नहीं बनी.
राजा ने प्रधानमंत्री को तलब किया और कारण जानना चाहा, तो उसने जबाब दिया;- महाराज-भ्रष्टाचार अब इस समय का शिष्टाचार बन गया है, अतः
व्यर्थ की चिन्ता करना बंद कर दें., जो कुछ हो रहा है ,ठीक ही हो रहा है.
संबंधो का दोहन “शीला....ये क्या हाल बना रखा है?. तू खुश तो है न राकेश के
साथ?”. “खुश तो हूँ, लेकिन मुझे अभी तक ढंग से खाना बनाना नहीं
आया, और राकेश है कि रोज नयी-नयी फ़रमाईशें करता रहता है. मैं कोशिश तो अपनी तरफ़ से
करती हूँ,फ़िर भी सब गडबड हो ही जाता है. शुरु-शुरु में तो सब ठीक-ठाक रहा.
गुलझर्रे उडाते रहे और होटल में खाते रहे.लेकिन रोज-रोज तो होटल नहीं जाया जा सकता
है न ! . समझ में नहीं आता कि क्या करुँ”. “ तेरे पास अकल-वकल नाम की कोई चीज है भी कि नहीं ?. “अकल तो है लेकिन.......” “ सुन... मैं तुझको बतलाती हूँ. एक तीर से कितने शिकार किए
जा सकते हैं. तू अपनी सास को बुलवाले अपने
पास. उनके पास तो अनुभवों का पिटारा है.
वे लजीज खाना पकाना जानती है. बस थोडी सी उनकी तारीफ़ बीच-बीच में कर दिया करना .
वाह मांजी.. वाह, क्या कहने ,आपके हाथों में तो जादू है वगैरह-वगैरह. बस समझो तेरा
काम बन गया. शीला की सहेली ने उसे समझाते हुए कहा.
समझौता. एक
लेखक बडे ही घाघ किस्म के थे. वे जलजले के नाम से विख्यात थे. उनकी कलम आग उगलती
थी.यही कारण था कि बडॆ-बडॆ नेता उससे भय खाते थे. एक
दिन एक बडे नेताजी ने उसे दावत पर बुलाया और बिना भुमिका बनाए ही उन्होंने उस लेखक
को एक बडी कंपनी में सीइओ बना दिया और एक नया मकान,जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजुद थी.सौजन्य भेंट में दे दिया.काफ़ी
ना-नुकुर करने के बाद उसने भेंट स्वीकार कर ही लिया.
एक
टूटी खाट पर बैठकर लिखने वाले लेखक ने नेताजी से समझौता कर लिया था.
समय का सदुपयोग पंद्रह वर्ष पूर्व सेवानिवृत हुए शिक्षक रामदयालजी से एक
अखबार के संवाददाता ने उनके सुखी जीवन,स्वस्थ शरीर और दिर्घायु होने का कारण जानना
चाहा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जबाव दिया:-भाई, मैंने कभी भी इस विचार को मन में
हावी नहीं होने दिया कि मैं सेवानिवृत हो गया हूँ और खाली समय का सदुपयोग करते हुए
पास-पडौस के गरीब बच्चों को निशुल्क पढाता हूँ. पता ही नहीं चलता कि इसमें कितना समय बीत गया है. शायद यही रहस्य है,जो आज
मैं निरोग और प्रसन्नचित्त हूँ.”
समस्या पानी की समस्या ने विक्राल रुप धारण कर लिया था. सरकारी नल दो-चार दिन में
घण्टा-आधा घण्टा के लिये तो आते परन्तु कम दबाव के चलते समुचित पानी नहीं मिल पाता
था. घरों में लगी पानी की टोटियां मुहं चिडाती सी लगती थी. इतना सुब कुछः होने के
बावजूद पानी की बर्बादी और दुरुपयॊग रोके नहीं रुक रहा था. एक दिन ऐसा भी
आआ कि कुल्ला करने तक को पानी नहीं बचा. हम पानी की समस्या को लेकर दो- चार हो ही रहे थे ,तभी
गांव मे रहने वाला हमारा एक परिचित व्यक्ति आ पहुंचा . मैने उससे पूछा * रामू-
यहां तो पानी को लेकर बुरा हाल है. हम शहर वाले पानी को लेकर कितना कश्ट ऊटा रहे
हैं. तुम्हारे गांवं के क्या हाल है. रामू ने मुस्कुराते
हुये जबाब दिया- भइयाजी, हमारे यहां तो कोई समस्या नहीं है. गावं
के पास ही एक नदी बहती है, हालाकिं उसमें पानी की कमी जरुर
है.हम गांव वाले पूरे परिवर के साथ वहां जाकर नहा-धो लेते हैं, अपने कपडे भी धो आते हैं और लौट्ते समय एक घडा पानी पीने को
भी ले आते है. दिशा-मैदानसे तो हम वहीं फ़ारिग हो लेते हैं. हमारे घरों में
फ़्लेश लेत्रिन भी तो नहीं है जि्समें ज्यादा
पानी लगताहै. और न ही हमारे यहां शावर ही है. निपट देहात में रहने वालो ने अपनी सूझबूझ से पानी की समस्या पर नियन्त्रन
पा लिया था. पता नहीं हम शहर वालों को कब अकल आयेगी ? रोटी का मूल्य
एक दिन
मैं अपनी स्कुटर सुधरवाने के लिये एक गैराज में बैठा था. वहाँ आठ-दस साल का एक
लडका हेल्पर के रुप मे काम कर रहा था. शायद वह नया-नया लगा था. मैकेनिक ने बगैर उसकी तरफ़ देखे १९-२० का पाना माँगा. लड्के ने एक पाना उठाया और उसके
हाथ में पकडा दिया. वह पाना उस नम्बर का ना होकर कोई दूसरे
ही नम्बर का था . सही पाना न पाकर उस मैकेनिक को क्रोध आ गया
और उसने गंदी गालियाँ बकते हुये उसके गाल पर कस कर एक झापड मार दिया. लडके की आँख छलछला आयी.
थोडी
देर बाद वह मिस्त्री किसी आवश्यक कार्य से
बाहर गया. मैने जिग्यासावश उस लड्के से
पूछा:- मिस्त्री तुम्हारा कौन लगता है.और
कितनी तन्खाह देता है?.
लडका
थोडी देर तो चुप रहा ,फ़िर हलक को थूक से गिला करते
हुये उसने कहा:-रिश्ते में तॊ कोई लगता नहीं है. खाने को दो जून की रोटियाँ देता है..
मैने
आश्च्रर्य से पूछा ’- केवल रोटियाँ,और कुछ नहीं ?.
उस
लडके ने बडी मासुमियत से जबाब दिया" साहबजी....जिंदा रहने के लिये रोटियाँ ही काफ़ी है.
छोटी
सी उम्र में उस लडके ने श्रम के मुल्य को समझ लिया था.
समाज के ठेकेदार.
समाज के दो तथाकथित
ठेकेदार, अपने-अपने घर निकलकर,आंगन में खडे होकर, एक दूसरे पर,मुंह की तोपें चला
रहे थे. बहस करते हुए वे अमर्यादित बातें भी कह जाते थे.
एक ने दूसरे से कहा:-
कुछ थोडी बहुत शर्म-वर्म बची है कि सब बेच खाए ?
दूसरे ने कहा:-साफ़-साफ़
कहो, आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ?
पहला:-
ज्यादा मत्र बनो .तुम समझ रहे हो कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ.
दूसरा:- अरे भाई, जब तक तुम अपने मन की बाते नहीं
बतलाओगे,कोई भला क्या समझ पाएगा. जो भी कहना है जल्दी कहो.मुझे और भी काम है.
दूसरा अपनी लौंढिया पर कंट्रोल रखो. क्या
उटपटांग कपडे पहनती है. उसका पूरा शरीर कपडॊं में से बाहर झांकता है.दूसरी बात यह
कि वह आवारा लडकों के बीच घूमती-फ़िरती है.यदि आप लोगों को यहां रहना है तो समाज के
बनाए कानुन के मुताबिक चलना होगा. यदि नहीं तो कोई दूसरा मोहल्ला ढूंढ लो.
पहला:- बडा आया समाज का ठेकेदार. पहले अपने गिरहबान
में झांककर देख. तेरा बडा बेटा रेप केस में जेल में सड रहा है. दूसरा जेबकतरा है
और तीसरा ठर्रा पीकर नाली में पडा रहता
है.पहले अपना घर ठीक कर, फ़िर दूसरों पर ऊंगली उठाना. रही मेरी बेटी की बात, तो
सुन, वह फ़िल्मों में काम कर रही है.उसे कैसे रहना है, कैसे कपडॆ पहनना है,किस-किस
के बीच उठना-बैठना है, वह भली-भांति जानती है. फ़िर मैंने अपनी बेटी को लडकों की
तरह पाला-पोसा है. यदि वह लडकों के जैसे रहती है तो इसमे तुझे क्या आपत्ति है.
पहले वाले के पास अब कहने-सुनने
के लिए कुछ बचा नहीं था. “ इन फ़िल्म वालों ने पूरी दुनिया को बिगाड कर रख दिया
है”.कहते हुए वह अपने दडबे में घुस गया था.
सहारा. एक आदमी चौराहे पर
अपने ठेले में बैठा भुट्टॆ भून रहा था. भुट्टॆ भूनने के पश्चात वह उसे करीने से
जमाता जाता था. उसे अब ग्राहकों का इन्तजार था. पास ही दस-बारह साल का लडका खडा था, जिसे दो दिन से खाना
नसीब नहीं हुआ था. भुट्टॊं से उठती खुशबू ने उसकी भूख को दस गुणा बढा दिया था.
उसने एक सरपट दौड लगाई और चार-पांच भुट्टॆ उठाकर भाग खडा हुआ. दुकानदार इस
अप्रत्याशित घटना से अनभिज्ञ था. जैसे ही उसने उस लडके को भुट्टॆ चुराकर भागते
देखा,चिल्लाया_ “चोर-चोर...पकडॊ-पकडॊ.”उसकी आवाज सुनते ही लोगों ने उसे पकड लिया
और उसकी पिटाई करने लगे. तब तक तो दुकानदार भी पास आ चुका था. उसने आगे बढते हुए
उसे पिटने से बचाया और उसका हाथ पकडकर अपने ठेले पर ले आया. भुट्टॆ अब भी उस बालक
के हाथ में थे. उसने उसे स्टूल पर बैठने का इशारा किया और कहा :-
बेटा...चोरी करने के बजाय यदि तू मुझसे मांग लेता तो मैं तुझे भुट्टॆ दे देता. खैर
...इसमे तेरी गलती नहीं है .ये पापी पेट, बडॊ-बडॊं से अपराध करवा लेता है, तू तो
अभी बच्चा ही है. खा...जितने भुट्टॆ तू खा सकता है,खा ले.
इशारा पाते ही बालक भुट्टॊं पर पिल पडा था. एक के बाद दूसरा ,फ़िर तीसरा. इस
तरह उसने पांच भुट्टॊं को उदरस्थ कर लिया था. जब वह पेट भर भुट्टॆ खा चुका तो उस
आदमी ने बडॆ स्नेह से बच्चे से उसके माता-पिता के बारे में जानना चाहा. बात सुनते
ही बालक गमगीन हो उठा था. उसकी आखँ भर आयी थीं. अब वह फ़बक कर रो उठा था. रोते-रोते
उसने बतलाया कि बचपन में ही वह अपने मां और पिता को खो चुका है और अब वह अनाथों की
तरह रह रहा है. उस बालक की व्यथा-कथा सुन चुकने के बाद उस आदमी ने सोचा कि वह भी
तो इस दुनिया में अकेला ही है. यदि बालक उसके साथ रहने को तैयार होता है,तो वह
उसकी परवरिश तो करेगा ही,साथ ही उसकी शेष जिन्दगी आराम से कट जाएगी. उसने बालक का
मन टटोलते हुए अपनी बात कही. बालक सहर्ष उसके साथ रहने को तैयार हो गया. बालक का साथ पाकर अब वह दूने उत्साह के साथ अपने काम-धंधे में जुट गया था.
साक्षात्कार. अपनी असफ़लता का स्वाद चख चुके बाकी के प्रतियोगियों ने उसे घेर लिया.
वे सभी इस सफ़लता का राज जानना चाहते थे.
आत्मविशवास से भरी उस युवती ने कहा=" मित्रों...मैंने अपनी छोटी सी जिन्दगी में कई कडे इम्तहान दिए है. मैं बहुत छोटी थी,तब मेरे पिता का साया मेरे सिर पर
से उठ गया. माँ ने मेरी पढाई-लिखाई का
जिम्मा उठाया. उसने कडी मेहनत की. घरॊं-घर जाकर लोगों के जुठे बर्तन साफ़ किए. घरों मे पॊंछा
लगाया. रात जाग-जाग-जाग कर कपडॊं की सिलाई की.इस तरह मेरी आगे की पढाई
चल निकली.लेकिन बूढी हड्डियाँ कब तक साथ देतीं. एक दिन वह भी साथ छोड गयी. पढने की ललक और कुछ बन
दिखाने की जिद के चलते, मुझे भी घरों में जाकर काम करना पडा.
इन कठिन परिस्थियों में भी मेरा आत्मविश्वास नहीं डगमगाया. जिस साक्षात्कात की बात आप लोग कर रहे हैं, वह तो एक
मामुली सा साक्षात्कार था.
बोलते हुए उस युवती के चेहरे पर छाया तेज देखने लायक था.
सौतन
मंजु अपने छोटे से मकान में बेहद खुश है. उसके दो सलोने
बच्चे है. बडी बेटी चौथी कक्षा में और मोनू दूसरी में पढ रहा है. पति उसका पूरा
ध्यान रखते हैं. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वह परिवार एक सुखी परिवार है.
पर यह खुशी ज्यादा दिन तक कायम न रह सकी, अंजु को साईटिका
ने आ घेरा. कमर से लेकर पैर के अंगूठे मे भीषण दर्द होता. वह ढंग से खडी भी नहीं
रह पाती थी. तरह-तरह का इलाज करवाया गया. कई नामी-गिरामी डाक्टरों के दिखाया गया
लेकिन आराम उसे पूरी तरह से नहीं मिल पाया था, जिसकी वजह से घर-गिरस्थी के काम पर
असर पडने लगा था. काफ़ी सोच विचार के बाद उसने अपनी छोटी बहन पूजा को बुला लिया. इस
समय वह एम.ए फ़ाइनल का इम्तहान दे रही थी.
पूजा घर के सारे काम आदि
निपटाकर अपनी पढाई के भी समय निकाल ही लेती थी और आवश्यकता पडने पर अपने जीजाजी के
साथ किराना आदि की खरीद के लिए भी जाने लगी थी. इन सब के लिए उसकी अपनी सहमति भी
होती थी.
पूजा निहायत ही
खूबसूरती की मालकिन थी. स्थिति कुछ ऐसी बन पडी थी कि अब उसके जीजाजी भी उसमें रुचि
लेने लगे थे. बच्चे भी उससे काफ़ी हिलमिल गए थे. कभी-कभी तो वे अपनी माँ से यह भी
कह जाते कि तुमसे अच्छी तो उनकी मौसी है,जो उनका पूरा ध्यान रखती है. अपाहिज बनी
मंजु सब देख-सुन रही थी लेकिन मजबूर थी. कभी उसे तो ऐसा भी लगने लगा था कि उसकी
अपनी छॊटी बहन ही उसकी सौतन बनने जा रही है. उसने उसे रोकना-टोकना चाहा,पर वह ऐसा
नहीं कर पायी थी. जानती थी कि बात अब बहुत आगे बढ चुकी है और ऐसे समय में कुछ भी
बोलना उसके लिए मुसिबतें खडी कर सकता है. अतः चुप रहना ही श्रेयस्कर लगा था उसे. एक
छोटे से सोच ने उसकी दिशा ही बदल दी थी. “यदि पूजा न होती तो उसकी जगह कोई और होती
और यह जरुरी तो नहीं कि वह उसकी देखभाल अच्छी तरह करती. पूजा उसकी छॊटी बहन है. एक
बहन होने का अहसास तो उसे है और वह पूरे प्राणपन से उसकी देखरेख तो कर रही है.
बच्चे भी फ़िर उसे चाहने लगे है.” पूजा अब सौत नहीं बल्कि उसे उसकी सहेली सी लगने
लगी थी.
केवल सोच का चश्मा बदलते ही सब कुछ अच्छा लगने लगा था
वर्षा. रात्रि के तीसरे पहर तक घनघोर बारिश होती रही थी और वह अपनी खिडकी में खडी
होकर नजारा देखती रही थी.
रोज की तरह उसने अपना बिस्तर छः बजे छोड दिया था और अब
घूमने निकल गई थी. घर से थोडी दूर पर एक विशाल पार्क है,जिसके चार चक्कर लगाना
उसकी दिनचर्या में आ गया था. पार्क में घुसते ही उसने गहरी शीतलता का अनुभव किया
था. चार महिने की भीषण गर्मी से झुलसते पेडॊं और धरती ने जी भर के अपने आपको भिगोया था उस रात. पेडॊ पर
खूब फ़ूल खिले थे और रंग-बिरंगी तितलियों के झुण्ड उन पर मंडरा रहे थे. भीगा-भीगा
सुहाना मौसम देखकर वह भी कोई सुहाना सा गीत गुनगुनाने लगी थी.
फ़ुर्ती से अपने कदम बढाते हुए उसने पार्क के दो चक्कर लगा
लिए थे और जैसे ही कुछ थोडा आगे बढी,तभी उसने किसी नन्हे बालक के सिसकने की आवाज
सुनी. बढते कदम वहीं रुक गए थे और अब वह
एकाग्रचित्त होकर उस स्थान का शुक्ष्मता से निरक्षण करने लगी थी. उसकी नजर, कपडॊं
में लिपटॆ, एक नवजात शिशु पर पडी. उसे देखते ही उसने मन ही मन अनुमान लगा लिया था
कि किसी कुंवारी लडकी ने बदनामी के डर के चलते उसे यहां फ़िंकवा दिया होगा. देर तक
खडी वह यह सोचती रही कि उसे उठाए अथवा नहीं? कभी मन होता कि चलकर पुलिस में
रिपोर्ट दर्ज करवा देना चाहिए. तरह-तरह के ख्याल उसके मन में उमडते-घुमडते रहे.
अन्त में उसने निर्णय लिया कि पुलिस स्टेशन जाकर
रिपोर्ट लिखवा दिया जाना चाहिए. उसने अपने कदम बढाए ही थे कि वह शिशु रुदन करने लगा. मन में
बरसों से सोई ममता जाग उठी और उसने अब बिना किसी भय के,लपक कर उस शिशु को उठा
लिया. उसे लेकर वह अब सीधे बाल कल्याण केन्द्र की ओर बढ चली थी. शिशु को गोद में
लेकर चलते हुए उसने अब यह निर्णय ले लिया था कि वह वहां जाकर सारी फ़ार्मेल्टी पूरी
करेगी और उसे गोद ले लेगी. ईश्वर की असीम कृपा से उसके पास किसी भौतिक चीजों की
कमी नहीं है. अच्छे खासे पद पर वह और उसके पति पदस्थ हैं,कमी केवल इस बात की है कि
उनके कोई संतान नहीं है. उसने अपने पति से कई बार कहा भी था कि उन्हें अब किसी को
गोद ले लेना चाहिए,लेकिन व्यस्तता के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए थे.
सारी औपचारिकताओं को पूरा कर,वह उस नन्ही बालिका को अपने घर
ले आयी थी. मुराद.
रोज की तरह ,उसने सुबह के ठीक छः बजे अपनी शैय्या का त्याग कर दिया था. बिस्तर
छोडने से पहले उसने ईश्वर का गुणानुवाद किया, फ़िर धरती पर पैर रखने के पहले,उसने
झुककर धरती मां को प्रणाम किया और उठ बैठी.
सुबह के दैनिक नित्यक्रिया कर्म से निजात पाकर उसने कपड़े
बदले और घूमने निकल गयी. घर से कुछ दूरी पर एक विशाल पार्क है,जिसके चार चक्कर
लगाना उसकी दिनच्रर्या बन गई थी. बागीचे मे प्रवेश करते ही उसकी नजर पेड़ों पर खिले
रंग-बिरंगे फ़ूलों पर पडी. फ़ूलों पर मंडराते भौरों की गुनगुन सुन और शीतल सुगन्धित
बहती मन्द-मन्द पवन के झकोरों ने उसके मन को और भी रोमांटिक बना दिया था. वह भी
कोई फ़िल्मी गीत गुनगुनाने लगी थी.
तेजी से कदम बढ़ाते हुए उसने अब तक दो चक्कर लगा लिए थे. वह
कुछ थॊड़ा आगे बढ़ ही पायी थी कि किसी शिशु के कराहने की आवाज सुनकर उसके कदम वहीं
रुक गए. उसकी आँखे अब शुक्ष्मता से अपने चारों ओर का मुआयना करने लगी थी. कुछ भी न
पाकर,उसने जैसे ही अपने कदम आगे बढना चाहा कि शिशु अपनी पूरी ताकत के साथ रोने लगा.
मन में विचारों का एक चक्रवात सा उठ खडा हुआ था. दिल तेजी से धड़कने लगा था. उसने
अब तेजी से उस ओर कदम बढ़ाए,जिस ओर से उसने रुदन की आवाज सुनी थी. पास ही एक बड़ा-सा
गड्ढा था,जिसमे किसी ने बड़ी ही बेरहमी के साथ उसे फ़ेंक दिया था. नवजात शिशु को
चिथड़ों में लिपटा देख उसके मुँह से चीख निकलते-निकलते बची. उसने अपने चारों ओर
दृष्टि दौडाई, अभी तक कोई भी घुमक्कड वहां नहीं पहुंचा था. उसने हिम्मत करके गड्ढे
में उतरने का प्रयास किया और वह उसमें सफ़ल भी हो पायी. शिशु को जैसे-तैसे संभालते
हुए वह ऊपर आयी. किसी स्त्री का स्पर्श पाकर बच्चा चुप हो गया था. दिमाक का मीटर
अभी भी तेज गति से घूम रहा था. वह एक अनिर्णयात्मक द्वंद में वह बुरी तरह से फ़ंस
गयी थी. क्या उसे चलकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाहिए या फ़िर पहले बाल
कल्याण निकेतन पहुँच कर बच्चे को आगे की परवरिश के लिए छोड आना चाहिए ?.उसने
निर्णय लिया कि बाल कल्याण केन्द्र जाना ही उचित होगा. वहां से भी वे पुलिस को
सूचना दे ही देंगे.
एक अबोध शिशु को अपने सीने से चिपकाए हुए वह आगे बढ़ रही थी.
बच्चे के सीने से लगते ही उसकी ममता जाग उठी थी और अब वह सोचने लगी थी-“ बडी
निष्ठुर होगी इस बच्चे की मां,? तभी तो उसने उसके पैदा होते ही उसे अपने से अलग कर
लिया. यह भी संभव है कि किसी कुवांरी लड़की ने समाज और परिवार के भय से ऐसा किया
होगा. समाज में आए दिन ऐसी घटनाओं का होना आम बात हो गयी है. प्रेम करने वाले
जवानी के जोश में उलटी-सीधी हरकते करते है. ऐसा करते हुए उन्हें तब न तो समाज का
भय होता है और न ही परिवार वालों का. एक अंधे प्रेम के चलते, जिसका मतलब शायद वे
तब नहीं लगा पाते और शारीरिक संबंध बना लेते हैं. जब गर्भ ठहर जाता है,तब नाम बदनाम न हो जाए ,इसकी चिन्ता लगनी शुरु हो
जाती है. फ़िर परिवार वाले भी अपनी बदनामी न हो,इसके लिए डाक्टरों को भी पैसों के
लोभ में फ़ंसा कर गर्भपात करवा लेते है,और मुक्ति पा जाते हैं. जब गर्भ गिराना
मुश्किल हो जाता है तो लड़की बाहर किसी अपरिचित स्थान पर तब तक छिपाकर रखते हैं,जब
तक डिलिवरी न हो जाए. मन अब भी विचारों के चक्रवात सक्रीय था
तभी एक विचार यह भी उठ खड़ा हुआ कि उसकी शादी हुए एक अरसा हो गया और वह अब तक
मां नहीं बन पायी. कितना अच्छा हो कि वह उस शिशु को अपने पास ही रख ले. उसे गोद ले
ले और उसकी परवरिश करे. उसे पढाए-लिखाए और समाज मे जीने का हक दे. फ़िर क्या कमी है
उसके पास ?. संसार की सारी भौतिक चीजें तो है उसके पास. फ़िर वह और उसके पति सरकारी
महकमें में ऊचें पद पर प्रतिष्ठित हैं. एक अनाथ बच्चे को गोद लेकर उसे अपना नाम
देने में आपत्ति ही क्या है.? उसे मां का प्यार मिल जाएगा जो उसके लिए आज जरुरी
है. वैसे भी वे काफ़ी दिनों से एक बच्चे को गोद लेने की सोच ही रहे थे. वह तो ईश्वर
की असीम कृपा का फ़ल है कि उसकी मुराद आज अनायास ही पूरी होने जा रही है.
उसने तत्काल ही निर्णय
ले लिया था कि वह बच्चे को गोद ले लेगी. उसके कदम शीघ्रता से बाल कल्याण केन्द्र
की ओर बढ चले थे. अतीत
माँ अपनी बेटी के साथ
लौट रही है. ट्रेन ने अब स्पीड पकड ली है. ट्रेन द्रुत गति से भागी जा रही है.मां
को इस बात संतोष हो रहा है कि उसने एक बड़ी झंझट से मुक्ति पा ली है और अब वह
भविष्य में अपनी बेटी की शादी किसी अच्छे खाते-पीते घर में कर सकेगी. उसने बडॆ
इत्मिनान से गहरी सांस ली और अब उसे नींद घेरने लगी थी. उसे याद नहीं आ रहा है कि
उसने कभी इस बीच गहरी नींद ले पायी थी.कारण ही इतना संगीन था कि वह चाह कर भी नींद
नहीं ले पायी थी. अब वह निश्चिंत होकर सो सकती है.
लड़की गहरी उदासी में
डूबी खिड़की से बाहर झांक रही है. पल-पल बदलते दृष्य देखकर और कम्पार्टमेंट के
अन्दर उठते शोर से वह अविचलित है. वह कहीं और खोई हुए है. उसका डरावना अतीत
बार-बार उसकी आंखों के सामने झूल जाता है.
वह सोचने लगी थी-“ पता
नहीं वह कौनसा मनहूस दिन था,जब उसकी जिन्दगी में हरीश का आगमन हुआ था.. आगमन
अप्रत्याशित था. वह अपने लेपटाप में कुछ खोज रही थी. तभी चैटिंग के लिए वह आ
उपस्थित हुआ. स्क्रीन पर उभरते अक्षरों के साथ वह रंगीन दुनिया में खोते चली गयी
थी. बात यहां रुकी नहीं थी. मेल-मुलाकातें
भी होने लगी थी और एक अज्ञात युवक अचानक उसके दिल की धड़कन बन गया था. और एक
दिन ऐसा भी आया कि सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए उसने उसके साथ शारीरिक संबंध भी
बना लिए थे. दरअसल जिस खेल को वह अतिरेक आनन्द के साथ खेल रही थी,प्यार का ही अंग
समझ रही थी,जब कि वह केवल वासना का गंदा खेल था.प्यार और वासना के बीच कितना फ़र्क
होता है,वह उस समय समझ ही नहीं पाई थी.
होश तो उसे तब आया,जब एक
नया जीव उसके गर्भ में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका था. उसने कई बार हरीश को आगाह
किया और शादी के बन्धन में बंध जाने की बात कही तो उसने दॊ टूक जवाब देते हुए कहा
कि प्यार में ऐसा होना कोई नई बात नहीं है. और अभी उसका मन शादी जैसे घटीया बंधन
में बंध जाने का नहीं है.
हरीश की दलील सुनकर उसे
लगा कि किसी ने हिमालय की सी ऊँचाई से उसे नीचे ढकेल दिया है. अब सिवाय रोने के,
पश्चाताप करने के अलावा कॊई विकल्प नहीं बचा था,. उसका दिन का चैन और रातों की
नींद हराम हो गई थी. मन में आता कि छत से झलांग लगा कर आत्महत्या कर ले अथवा जहर
पीकर इहलीला समाप्त कर ले.
मां की नजरों से यह बात
ज्यादा देर तक छुप नहीं सकी थी. एक अज्ञात भय ने पूरे परिवार को अपनी जकड़ में ले
लिया था. अब एक और केवल एक ही रास्ता बचा था और वह था एबार्शन करवाने का. मां ने
अपने किसी रिश्तेदार की मदद से अच्छी खासी मोटी रकम डाक्टर को देते हुए एक भयावह
और नारकीय जीवन से छुटकारा पा लिया था.
मां अपनी सीट पर बैठी
ख्रुर्राटे भर रही थी और वह अब तक जाग रही थी. पीछे छूट चुका अतीत अब भी भूत बनकर
उसकी आंखों के सामने खड़ा अट्टहास कर रहा था.
नौकर
दादाजी....आप छॊटॆ-बडॆ हर काम श्याम से ही क्यॊं करवाते हैं?.कभी मुझे भी कोई काम करने का मौका तो दिया करें.”
“ सुनो राजु...मैंने तुम्हें कितनी बार बतलाया है कि वह हमारा नौकर है. क्या
इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में नहीं उतरती.अरे हम ठहरे खानादानी रईस..हमारे हर काम
को बजा लाना हमारे नौकरों का फ़र्ज बनता है. फ़िर हम उन्हें इस बात की तन्खाह भीतो
देते हैं.”
“ दादाजी..ठीक है,वह हमारा नौकर है. पर अभी उसकी उम्र ही कितनी है.? दादाजी कुछ बोल पाते इसके पूर्व श्याम ने कहा:- भाईजी, इतनी
छोटी सी बात के लिए दादाजी से शिकायत नहीं करते. वे जो भी आदेश देते हैं, मुझे उसे
पूरा करने में गर्व ही महसूस होता है. फ़िर हम ठहरे नौकर...नौकर का काम ही है कि वह
अपने मालिक की मर्जी के अनुसार काम करे. काम के बदले वे मुझे रुपये भी तो देते है.
यदि मैं कोई काम नहीं करुंगा,तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा श्याम दिन भर वहां रहकर कडी मेहनत करता और घर आकर अपनी
किताबों की दुनियां में खो जाता.प्रायवेट परीक्षा देकर उसने मट्रिक की परीक्षा
प्रथम श्रेणी में पास किया. उसके बाद उसने पीछे मुडकर नहीं देखा और एम.काम.की
परीक्षा उत्तीर्ण कर उसने यू.पी.पी.एस.सी की परीक्षा प्राप्त कर एक काबिल अफ़सर बन
गया था.
आज वह अपनी मेहनत और लगन के बल पर
अच्छा सुखी जीवन जी रहा है. क्या
फ़ायदा
“सुनीता.....तुम कितना पढ़ी-लिखी हो”? मकान मालकिन ने घर में बर्तन साफ़ करने
वाली बाई से पूछा“ मैंने तो स्कूल का मुंह
तक नहीं देखा मेमसाहब” “ अरे...कुछ पढ़-लिया
होता तो तुझे घरों में जुठे बर्तन तो नहीं मांजना पड़ता”
“ अपुन बिना पढ़े-लिखे ही ठीक है मेम साहब. बिना पढे-लिखे अपुन दस-पन्द्रह हजार
रुपया कमा लेते हैं और क्या चाहिए?. घर-गिरस्ती आराम से चल जाती है”
“ यदि तुम चाहो तो अब भी पढ़ सकती हो. मैं पढ़ा दिया करुंगी.”
“ पढ़-लिख कर क्या फ़ायदा मेमसाहब. अब अपने ही तरुण कुमार को देख लो. कितना
पैसा खर्च करके आपने उसे पढ़ाया-लिखाया.एम.ए./ एम.एड कराया. बेचारे दस हजार रुपया
में केवल संविदा शिक्षक बन पाए ! उससे तो अपुन ठीक. बिना पढे-लिखे दस-पंद्रह हजार
कमा लेते हैं. जब पैसा ही कमाना हो तो इतना पढ़ने-लिखने की क्या जरुरत?. यदि मैं
पढ-लिख भी जाउंगी तो मुझे कौनसी नौकरी मिल जाएगी ?
मेम साहब की सूरत देखने लायक थी जवाब सुनकर.
दल-दल
में नेता जी
अनेकानेक दल में रह चुके दलबदलु नेताजी से एक व्यक्ति ने पूछा-“ सर..इस बार आप
किस दल में रहना पसंद करेगें?
“चुपकर बेवकूफ़.....ये दल-दल क्या मचा रखा है. मैं किसी भी दल में रहूं, मंत्री
पद पर ही बना रहूंगा. एक बात बता, आज जितने भी दल तू देख रहा है, उनके सबके नाम
भले ही अलग-अलग हैं, लेकिन सबके चाल-चलन और उद्देश्य तो एक ही है न ! सबको कुर्सी
चाहिए. फ़िर कुर्सी के लिए मैं चाहे जिस दल में रहूं, क्या फ़र्क पड़ता है. दुबारा
ऎसे घटिया सवाल मुझसे कभी मत पूछना....समझे “. नेताजी ने गुस्से में जवाब दिया.
रिवाज
लंबे समय तक सत्ता का स्वाद चख चुके एक नेताजी को मजबूरी में रिक्शा की सवारी
करनी पड़ी. उन्होंने रिक्शा चालक से यूंहि पूछ लिया-“ तुम्हारे कितने बेटे हैं “?
“जी....चार.”
क्या करते हैं ? उनको पढ़ाया-लिखाया या बस”
“ बेचारे पढ-लिख नहीं आए. रिक्शा चलाते हैं हुजूर”. रिक्शा चालक ने अपनी
लाचारी प्रकट करते हुए कहा.
“ पढ़ा-लिखा लेना था उनको. कुछ बन जाते.”
“साहब...पढ़ लिख जाते तब भी रिक्शा ही चलाते”.
“ ऎसे कैसे हो सकता है. कुछ न कुछ तो अच्छा काम उन्हें मिल ही जाता”
“ अपने देश में ऎसा ही रिवाज है साहब कि डाक्टर का बेटा डाक्टर बनता है, नेता
का बेटा नेटा बनता है. ठेकेदार का बेटा ठेकेदार बनता है. प्रोफ़ेसर का बेटा
प्रोफ़ेसर ही बनता है. मैं ठहरा रिक्शा चालक, तो जाहिर है कि मेरा बेटा भी रिक्शा
ही चलाएगा. यदि कोई और कुछ बनना चाहे तो भी लोग उसे बनने कहां देते हैं?..
“ गलत कहते हो तुम. यह तुम्हारा कोरा भ्रम है. ऎसा वैसा कुछ नहीं होता” नेताजी
ने कहा.
“ एक बात कहूं अगर आप बुरा न माने तो”. रिक्शे का पैडल मारते हुए रिक्शे वाले
ने कहा
“ कहो...तुम क्या कहना चाहते हो?.”
“एक चाय बेचने वाला इस देश का प्रधान मंत्री क्या बन गया,.सारे विरोधी दल के
नेता एक ही सुर में चिल्ला रहे हैं कि ऎसे कैसे हो गया?. जो इस देश का दस्तूर था
वो अचानक कैसे बदल गया.?.जब उसका पिता चाय बेचा करता था तो उसे भी चाय ही बेचते
रहना चाहिए था. ये बात लोगो के पेट में हजम नहीं पा रही है. इसी तरह मेरा बेटा कुछ
और बनने की भी सोचता भी तो लोग ऎसा होने नहीं देते.”
“ रोक...रिक्शा रोक.....साला रिक्शा ही तो चलाता है लेकिन बातें बड़ी-बड़ी करता
है”. तमतमाते हुए नेताजी ने रिक्शा रुकवाया. उसके हाथ में बीस का एक फ़टा हुआ नोट
पकड़ाया और कदमताल करते हुए एक माल में घुस गए.
.
किडनी..
शादी के तीन दिन ही बाद बहू ने घोषणा कर दी थी कि वह अपनी
सास के साथ नहीं रहेगी. वह नहीं चाहती थी कि उसका अफ़सर पति अब भी अपनी मां का
पल्लु पकड़ कर पीछॆ-पीछे डोलता फ़िरे. वह यह भी नहीं चाहती थी कि उसका पति मां की
बातों में रीझ की तरह नाचता रहे. वह तो यह भी नहीं चाहती थी कि उसका पति ईंट-गारे
से बने कच्चे मकान में रहे. वह तो यह चाहती थी कि उसे अपने स्टेटस के अनुरुप किसी
बड़े बंगले में रहना चाहिए. एक लक्जरी गाड़ी में उसे घूमना चाहिए और नौकर चाकर की एक
बड़ी फ़ौज रहनी चाहिए.
मां ने लाख समझाने की
कोशिश की लेकिन बेटे की चुप्पी देखकर उसने मौन धारण कर लेना ही उचित समझा. बेटा और
बहू एक आलीशन बंगले में रहने चले गए थे.
.काम की व्यस्तता के
चलते न तो बेटे को फ़ुर्सद मिली कि अपनी मां से मिल आए और न ही बहू को ही समय मिल
पाया. इसी तरह दिन पर दिन कटते रहे.
एक दिन ऎसा भी आया कि
बेटे की एक किडनी खराब हो गई. अपने अफ़सर पति को बचाना उसकी प्राथमिकता थी. सो एक
दिन सास के घर जा पहुंची और गिड़गिड़ाते हुए कहा –“ मांजी...बचा लीजिए अपने बेटे को.
उसकी एक किडनी फ़ेल हो गई है. यदि समय रहते उन्हें किडनी नहीं मिल पायी, तो अनर्थ
होते देर नहीं लगेगी”.
“अरे इसमें घबराने की
क्या बात है, तुम अपनी किडनी दे दो. जब तुम सुख में उसके साथ सहभागी बनी रहीं तो
दुख में साथ तो तुम्हें ही देना चाहिए.” सास बोली.
“मांजी....मैं जल्दी
मरना नहीं चाहती. मैं अभी जवान हूँ... मुझे तो और भी जीना है. आपका क्या..... खूब
जी चुकीं आप... अगर अपने बेटे को अपनी किडनी दे दोगी तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा. जान
तो आपके बेटे की ही बचेगी न !.”
दरअसल वह अपनी मौकापरस्त
बहू की नीयत परखना चाहती थी. दुनिया में भला ऎसी कौन सी मां होगी तो अपने
बेटे-बेटियों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगाने में पीछे हटी हों. आगे कुछ न कहते
हुए उसने अपनी बहू से कहा-“ चल... देर मत कर. बता कौन से अस्पताल में मेरा बेटा
भर्ती है”. कहते हुए वह आगे बढ़ गई.
“औरत”
(शब्द की परिभाषा)
चार-छः बुद्धिजीवी
दार्शनिक अंदाज में बहस कर रहे थे. अचानक एक मित्र ने दूसरे से पूछा- “यार..तुम तो
बड़े ज्ञानी-ध्यानी बने फ़िरते हो. एक लाईन में “ औरत” शब्द की परिभाषा करके बतला
सको तो जानूं.”
“केवल एक लाईन में
...असंभव...अरे भगवानजी ने जब एक औरत जात को बनाया तो वह खुद आज दिन तक उसे
समझ नहीं पाया, तो फ़िर हम जैसे लोग उसकी
व्याख्या कैसे कर सकते हैं. असंभव...बिल्कुल ही असंभव” दूसरे ने अपनी असमर्थता
जाहिर करते हुए कहा.
वह हर किसी से यही
प्रश्न दोहराता, लेकिन उसे समुचित उत्तर नहीं मिल पाया.
एक दिन उसकी मुलाकात एक
ठेठ देहाती किस्म के आदमी से हुई. उसने सोचा, शायद यह उत्तर दे सकता है. उसने
कहा-“ दाऊ....क्या तुम “औरत” शब्द की परिभाषा एक शब्द में बतला सकते हो?”
“हाँ...हाँ...क्यों
नहीं...इसमें कौन-सी बड़ी बात है. मैं अपने मुँह से एक शब्द भी नहीं बोलूंगा और
परिभाषा हो जायेगी”
“अच्छा ...बिना कुछ बोले
तुम व्याख्या कर सकते हो....असंभव........नहीं ..नहीं मैं नहीं मान सकता” उसने
आश्चर्य में भरते हुए कहा.
उस ठेठ देहाती से दिखने
वाले आदमी ने उसे घर के अन्दर बुलाया. दरवाजा बंद कर दिया. अब कमरे में चारों ओर
अंधियारा-सा छा गया था. उसने एक मोमत्ती जलाते हुए उस तथाकथित बुद्धिजीवी से कहा.”
अब आप इस जलती हुई मोमबत्ती को ध्यान से देखो. बिना कुछ बोले तुम्हें “औरत” शब्द की
परिभाषा समझ में आ जाएगी”.
“ देख रहा हूँ केवल
मोमत्ती जल रही है...और क्या”
“ मैंने इतना ही निवेदित
किया है कि आप मोमबत्ती को ध्यान से देखिए......आया कुछ समझ में”
“नही....मैं कुछ भी समझ
नहीं पा रहा हूँ”
’ आपने ध्यान से देखा ही
नहीं श्रीमन...ध्यान से देखिए.... जलती हुई मोमबत्ती खुद को धीरे-धीरे मिटा रही है
और मिटते हुए भी पूरा कमरा रौशन किए हुए है. यही औरत जात की परिभाषा है.” उस
देहाती ने कहा.
छॊटी-सी बात
मैं अपने मित्र की
प्रतीक्षा में बहुत देर से खड़ा था. उसके न आने से मेरी खीज लगातार बढ़ती जा रही थी.
उसे दो-तीन बार फ़ोन लगाया,लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी. बड़ी देर तक कोशिश करते
रहने के बाद मुश्किल से संपर्क हो पाया. उसने बतलाया के भीड़ ने रोड जाम कर रखा है,
अतः उसे आने में कठिनाई हो रही है. जैसी ही स्थिति सामान्य होती है, मैं पहुँच
जाऊँगा, तुम चिंता मत करो.
मन में कई बार विचार आया
कि पैदल ही निकल जाना चाहिए, लेकिन मुझे जहाँ जाना था, वह स्थान दस किमी दूर था.
जाम के चलते इधर टैक्सी वाले भी नहीं आ पा रहे थे.
उसे आता हुआ देखकर मन का
बोझ कुछ कम हुआ. उसने मोटरसाइकिल रोका और मुझे बैठ जाने का ईशारा किया. मेरे बैठते
ही उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी.
“ ऐसा क्या हुआ था कि
लोगों ने सड़क जाम कर दिया? मैंने कारण जानना चाहा.
“ नहीं...नहीं ऐसी कोई
विशेष बात नहीं थी. तुम जो जानते हो यार, आजकल लोग-बाग छोटी-छोटी बातों को लेकर
तैश में आ जाते हैं और जब चाहें जाम लगा देते हैं. जाम की वजह से को दूसरों की
कितनी परेशानियाँ झेलनी पड़ती है. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता. जाम लगाकर
ऐसे बैठ जाते हैं जैसे सड़क उनके बाप की हो. यहाँ तक कि वे एम्बुलेंस को भी निकल
जाने का रास्ता तक नहीं देते”.
“ सो तो ठीक है, लेकिन ये बताओ
आखिर माजर क्या था. लोग यूंहि जाम लगाकर नहीं बैठते” मैं अपनी जिज्ञासा नहीं दबा
पा रहा था.
“ यार...बात
बहुत छोटी सी थी. किसी बदमाश ने अंधेरी रात का फ़ायदा उठाकर एक जवान लड़की से बलात्कार
किया और फ़िर उसकी हत्या करके भाग खड़ा हुआ. लोगों ने उसकी लाश बीच सड़क में रखकर जाम
लगा दिया. अब ऐसे लोगों को क्या समझाया जाए कि ऐसी घटनाएँ तो आए दिन होती ही रहती
है. इसमें जाम लगाने की क्या जरुरत थी?. पुलिस को सूचना दे देते. उसे जो आवश्यक
कार्यवाही करना होता, वे अपने स्तर पर करते”.
उसकी इस
घटिया सोच पर मुझे कोफ़्त होने लगी थी. मैंने उससे कहा-“ अभी और इसी समय मोटरसाइकिल
रोक दो”.
उसने ब्रेक
लगाते हुए पूछा-“ क्यों क्या हुआ. तुम्हें तो अभी बहुत दूर जाना है. कोई विशेष
बात?
“
हाँ.....विशेष बात है. जिस आदमी के लिए एक जवान लड़की पर हुआ बलात्कार और फ़िर उसकी
जघन्य हत्या महज एक छॊटी-सी बात हो, मेरी नजरों में वह आदमी भी बलात्कारी और
हत्यारा जैसा ही होता है. ऐसे आदमी के साथ मोटरसाइकिल पर सवारी करने की बजाय, मैं
पैदल यात्रा करना ज्यादा पसंद करूँगा.´ ऐसा कहते हुए मैं मोटर साइकिल से उतरकर
पैदल चल पड़ा.
लातों
के भूत.
सड़क के एक
ओर कन्या महाविद्यालय तो दूसरी ओर पीजी कालेज था. दोनों के गेट सड़क पर खुलते थे.
सीनियर छात्र अक्सर गेट के सामने खड़े रहते और जब लड़कियों की छुट्टी होती, उन पर
फ़ब्तियाँ कसते, सीटियाँ बजाते. भद्दे-भद्दे शब्द उछालते. बेचारी लड़कियों को गर्दन
झुकाकर चुपचाप निकल जाना ही श्रेयस्कर लगता. इसके अलवा और कोई चारा भी तो नहीं था
उनके पास. उनकी बेबसी देखकर वे मिलकर ठहाके लगाते.
गाँव की एक
दबंग छात्रा ने कालेज में दाखिला लिया. यह उसका प्रथम वर्ष था. उसने लड़कों की ओछी
हरकतों को देखा और अन्य छात्राओं की ओर मुखतिब होकर कहा-“ पता नहीं, आप सभी इनकी
गंदी हरकतों को कैसे बरदाश्त कर लेती हो. इन्हें समय रहते उचित सबक सीखा दिया गया
होता, तो आपको सड़क से शर्मसार होकर नहीं गुजरना पड़ता. उसने अन्य छात्राओं को
परामर्श देते हुए एक योजना बनाई.
अगले दिन.
वह जानबूझकर लड़कियों के ग्रुप से अलग होकर लड़कों के समीप से गुजरने लगी. उसे अपने
समीप पा, लड़कों ने तरह-तरह के अश्लील फ़िकरे कसने शुरु कर दिए. उसने एक फ़्लाईकिस
दिया और मस्तानी चाल चलते हुए आगे बढ़ने लगी. लड़कों का हौसका बढ़ा और वे उसके बिलकुल
ही पास तक आ गए. खुद को हीरो समझने वाले एक शोहदे ने उसकी बाँह पकड ली.
वह अचानक
नीचे की ओर झुकी, जैसे जमीन पर गिरी हुई कोई वस्तु उठा रही हो. हीरो कुछ समझ पाता,
उसने फ़ूर्ती के साथ अपने पैर में से
सेंडिल निकाली और बिजली की-सी तेजी के साथ उसके सिर पर बरसाने लगी. इस नजारे को
देखते ही अन्य लड़कियां का हौसला बढ़ा और वे भी अन्य लड़कों पर अपनी जूतियां बरसाने
लगीं. छात्रों में भगदड़-सी मच गई थी इस समय. कुछ सड़क पर सरपट दौड़ लगाने लगे, तो
कुछ कालेज के गेट की तरफ़ भाग खड़े हुए.
उस दबंग
छात्रा का साहस और लाजवाब इलाज देखकर लड़कियों का झुंड पहली बार खुल कर हँसा था.
......................................................................................................................................
टैग लाईन- सुप्रसिद्ध कहानीकार
श्री कमलचन्द वर्मा स्मृति राष्ट्रीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता.
प्रतियोगिता क्रमांक-35. // शीर्षक- भाई का पवित्र प्यार. //
घोषणा- लघुकथा मौलिक/आप्रकाशित/अप्रसारित है.
नाम- गोवर्धन यादव.103 कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001 Mob- 9424356400
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भाई का पवित्र प्यार.
.....मुझे दो दिन का अवकाश चाह आवेदन-पत्र प्रस्तुत करते
हुए कहा.
फ़ाईल देखने के बाद- "सारी मेडम...मैं आपको छुटी नहीं दे सकता. आपकी केजुअल लीव तो बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है. कोई बहुत जरुरी काम है क्या?". अफ़सर ने जानना चाहा.
"
जी हाँ सर....मुझे अपने भाई को राखी बांधने गाँव जाना है."
"
राखी डाक से भी तो भेजी जा सकती है."
"
नहीं सर.. मेरा गांव इतने इंटिरियर में है कि राखी शायद ही समय पर
पहुंच पाएगी?".
"
ठीक है. अब तो बस
एक ही रास्ता बचता है कि आपको दो दिन की विदाउट-पे लीव दी जा सकती है."
"
ठीक है सर." कहती हुए वह साहब के कार्यालय से बाहर निकलने लगी.
"
सुनो मेडम "
"जी सर. आपने मुझे बुलाया."
लौटकर उसने जानना चाहा.
"
जानती हो दो दिन की
कितनी सेलेरी बनती है? इससे तो अच्छा होगा कि आप अपने भाई को यहीं बुला लो". सलाह देते हुए अफ़सर
ने कहा.
"
सर.....मेरा भाई एक साधारण-सा किसान है. फ़िर उसका परिवार भी बहुत बड़ा है, उसकी आमदनी भी काफ़ी कम है. यदि मैं समय से नहीं पहुँची तो संभवतः वह किसी से कर्ज लेकर दौड़ा चला आएगा. मैं नहीं चाहती कि मेरा भाई किसी से कर्ज लेकर आए. रही बात मेरी सेलेरी की,
तो वह भाई के पवित्र प्यार के आगे उसकी कोई कीमत नहीं है."
कहती हुई वह आफ़िस से बाहर निकल गयी.
oooo---- 09.03-2023.
बंटवारा-
बंटवारा-
समुद्र-मंथन वाली कहानी कुछ परिवर्तन
के साथ कलियुग में फ़िर दुहरायी जाने वाली थी. विष्णु
को मोहिनी रूप धारण करके देव-दानवों में बीच अमृत नहीं, बल्कि पंचामृत
बांटना था.
सारे देव पंक्तिबद्ध
होकर बैठे थे. अपनी
आदत के अनुसार पक्षपाती विष्णु ने दोमुहीं सुराही के एक ओर पंचामृत भरा और दूसरी ओर
मठा. उन्होंने अपने प्रिय पात्रों को पंचामृत और जिन्हें वे पसंद
नहीं थे, उनके
पात्रों में मठा उड़ेल दिया. पात्रों में भरे जाने वाले द्रव्यों का रंग सफ़ेद था.
चुंकि पात्र काँच के बने
थे .अतः कोई नहीं जान पाया कि किसे पंचामृत और किसे मठा परोस दिया गया है. चुस्की लेते मुस्कुराते
और मुँह सिकोड़ते देवताओं के चेहरों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि
किन्हें पंचामृत और किसे मठा परोसा गया था.
"
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