यात्राओ पर प्रकाशित पुस्तक- पातालकोत जहा धरती बाचती है आसमानी प्रेम पत्र
लेखकय ितवेदन. ------------------------------------------------------- या ा समरण जहाँ धरती बाचती है आसमानी ेमप . ( अतीत म बीते कछ िदन.) ------------------------------------------------------------------------------------------------- िकतना अ त है भारत, सदय से भरा हआ. कित और मानव िनिमत खबसरती का आगार. इसको देखना मानो वय को देखना है. चारो ओर इतनी हरयाली, इतने मौसम, इतना िखलता जीवन. निदय का गँजता वर, पहािड़य का एकात, सम क पछाड़, रेिग तान म दमकता सरज, घने वन, दर-दर तक फ़ैले गाँव म कित का अनठा राग...िफ़र िकतने ही मौसम...िकतने ही रग और प बदलते आसमान के नीचे िकतने ही प म बसता, िखलता भारत का जीवन. हमारे ाचीन महाकाय म जो कित विणत है, वह मा किवय क अितयोि नह, वरन भारत का सच है. कालीदास जी का मेघदत हो या िफ़र ऋतसहार, यास जी का महाभारत हो या िक िफ़र वा मीिक क रामायण, िजस भारत के वन-पवत-बि तय-निदय क महागाथा कहते नह अघाते, वह भारत म आज भी मौजद है, उपि थत है. कित क हर धड़कन म कदरत के रिचयता के गा रक मन क खबसरत अिभयि होती है. िकतने िक म के तो ह उसव,मौसम क रगत भी कछ कम अनठे नह.,. जाड़े म िठठरन, बा रश म भगना, गम म दर त क छाव, सबके सब मौसम कछ न कछ बया करते ह सच ही कहा है िकसी ने--" कित क हर धड़कन म एक अनठे ान क पाठशाला समाई हई है ". बस जरत है इस बात क िक हम कदरत क वभािवक उड़ान को, उसके योगदान को समझ-सराह और पहचान. घर क चारदीवारी से बाहर िनकलकर कित के अनठे, अनछये स दय के दशन करना, िखलिखलाते समय के कधे पर हाथ रखकर उसके साथ िखलिखलाना- मकराना- बात करना, उछलती-कदती, बल- खाती झमती निदय का पहाड़ी गीत-सगीत सनना, पहाड़ के एकात म खो जाना, घने जगल म सरसरा कर बहती अहड़ हवा के झक के सग झमना-इठलाना, िचिड़य का शोर सनना और आकाश म चहचहाते, उड़ान भरते िवहगो को िनहारना, पहाड़ क चोिटय से उछल-कद मचाते, गीत गाते झरन को धरती पर उतरते हए देखना और भी न जाने िकतने ही रग- प बदलते नीलाकाश के नीचे वछदता के साथ िवचरना, दहाड़ते-उफ़नते सागर से बात करना, आसमान से सरसरा कर बरसती अमत-बदो म सराबोर होकर अपने अतरमन को भगोना एक नये अहसास से भर देता है. दरअसल बा रश धरती को िलखा एक ेम-प ही तो है, ऐसे म अपने को भ गोने से डरना कैसा? जीवन म एक समय ऐसा भी आता है, जब जीवन एकाकपन के िघरने लगता है. जीवन से ऊब होने लगती है. मन छटपटाने लगता है, एक अ ात भय मन के आगन म घेरा डालकर बैठ जाता है. ऐसे िवकट और किठन समय म जीवन नीरस जान पड़ने लगता है. जीवन अपना अथ खोने लगता है. जैसे ही आप अपने परिध (रेिडयस) से बाहर िनकलते ह या ा पर, अपने आपको एक नई दिनया म पाते ह. वहाँ का नयापन आपको अपने समोहन के जाल म बाधने लगता है. घर से बाहर िनकलते ही आप वय भी बदलने लगते है. एक नया परवतन अपने आप आने लगता है. नीरस जीवन अपने आप रगीन होने लगता है. अतः ऐसे नीरस जीवन को रसमय बनाने के िलए बहत जरी है "या ा" म िनकल पड़ना. या ा एक छोर से िनकलकर दसरे छोर तक जाना नह है, बि क िनत नतन होते ससार म वेश करना भी होता है. या ा का तापय केवल समय न करना नह होता, बि क एक अपरिचत-अनिचहे ससार को जानना-पहचाना भी होता है. या ाए केवल भौितक ही नह होती, बि क बाहर से अदर क ओर भी होती है. अतरया ा से यि अपनी आमा के बेहद करीब पहँच जाता है. मन क अतल गहराइय के भीतर उतरकर, वह जीवन का वा तिवक अथ खोजने लगता है. अपने आपको पहचाने लगता है और एक िदय काश से नहा उठता है. या ा एक मनोवै ािनक, यवहारक और अया म से जड़ने का एक शि शाली मा यम भी है. जैसे ही हमारा आिधपय, मल कित पर होने लगता है, उसी ण से एक िवल ण सजनामकता का उदय होने लगता है. या ा के दरिमयान जहाँ निदय-झील-नहर और भखड म आईस-पाईस का खेल चल रहा हो, या य कह जल-थल समवेत कोई उसव मना रहे ह, अनत तक पसरा सागर, सतत वाहमयी दिनया, अपने अि तव क मयादा म, परपर समिपत. नदी-सागर क ऐसी जगलबदी िजसम कोई अित मण नह, एक दसरे म आवाजाही िदखती है,वो भी सम पर, न कोई बेसरा, न बेताल. नहरे नदी म, निदया झील म, अनेक सगम एक साथ. जल, थल, कित और वातावरण म आपसी लेन-देन. म तझम समा जाऊँ , तम मझम समा जाओ जैसा एका मकबोध वाली. कित िसफ़ कित नही होती, वह हम भी रचती है. जीवन भी तो एक या ा ही है. एक योिन से दसरी योिन म जाने क या ा. जीवन क हर सास जीवन- या ा ही तो है. बादल के सग त क या ा,माटी सग बीज क या ा. कछ भी नह थमता, हर पल िनज या ा म. जीवन क इस या ा म कोई हमराह होता है, िकसी से राह जदा होती ह. िजदगी के इस सफ़र म यह सब होता रहता है, आिखर सफ़र ही तो है यह. इन अहसासात क अपनी या ा है. वय व भी तो राही ही है. सइय के पाव लगाकर समय हर पल चलता रहता है. यह सबसे परानी या ी है. जैसे कोई साइिकल हो, िजसके पैडल कभी सरज लगाता है, तो कभी चाद. वो भी या ी. सबह-से रात इनके पिहये घमते ही रहते ह.इनक चाल म कोई फ़क नह पड़ता. सब चलते रहते ह अिवराम. चलते रहे ह अिवराम. अथक. यग-यग के या ी ह ये. पीछे छटते टेशन क तरह पड़ाव-दर-पड़ाव गजरते जाते ह, जैसे कोई िफ़म क रील चल रही हो. े म दर-े म िजदगी के अमय पल, चद सेकड म य ही गजर जाते ह. पेड़ से िबछड़कर िगरता प ा भी या ा पर जाने को बा य है. जीवन म िबछड़ते हर पल, भले ही िफ़र हाथ म आ सकते ह, लेिकन अपनी याद छोड़ जाते ह. या ाए अनत है और वपन भी. जीवन, इसान, मितया, अहसास, सजन सब या ा म है. थके मन और िशिथल देह के साथ उलझन से िघरे जीवन म यकायक "या ा" करने का उसाह जब झकत होने लगे तो समिझए- "उसव का अवसर" आ गया है. नैराय पर मनय क िवजय का सबसे बड़ा माण है-" उसव या ा". और यही जीत हािसल करने का उ ोष भी है. पननवा होने के िलए िकए गए अ त यास क बानगी भी है और उलास-अिभ यि क सदर छिव भी. बदलते समय के साथ हम, मौसम से िबधे मन िलए िफ़रते है "या ा" म. हमारी आँख िनहारने लगती ह ऋतओ को और मन उसके मतािबक श द के मोती चन-चनकर हार गथने लगता है. जैसे ऋत- वैसा मन- वैसे वचन. यात सािह यकार भगवतीचरण वमा इसी मौसम से बधकर कह उठते ह- मती से भरके जबिक हवा / सौरभ से बरबस उलझ पड़ी / तब उलझ पड़ा मेरा सपना / कछ नए-नए अरमान से / गदा फ़ला जब बाग म / सरस फ़ली जब खेत म / तब फ़ल उठी सहस उमग / मेरे मरझाए ाण म.// मरझाए ाण को ाणवान बनाने का सबसे सरल और कारगर उपाय है-या ा पर िनकल पड़ना. इस िवराट कित क वदना करते हए मझे बरबस ही ी नरेश मेहता जी क किवता-" चरैवेती-जन गरबा" क याद हो आती है. वे िलखते ह.(एक अश) चलते चलो, चलते चलो,/सरज के सग-सग चलते चलो, चलते चलो / निदय ने चलकर ही सागर का प िलया / मेघ ने चलकर ही धरती को गभ िदया / कने का मरण नाम / पीछे सब तर है / आगे है देवयान, यग के ही सग-सग चलते चलो // मानव िजस ओर गया नगर बसे, तीथ बने/ तमसे है कौन बड़ा गगन-िसध िम बने / भमा का भोगो सख, निदय का सोम िपयो / यागो सब जीण वसन नतन के सग-सग चलते चलो.// कदरत क इस वभािवक उड़ान को समझने के िलए, पहचानने के िलए म िनकल पड़ता हँ कित क गोद म. घर और गाव म रहकर म िजतना खाली हो जाता ह, और जब लौटकर वािपस आता हँ तो उतना ही भरा-भरा महसस करता ह, उतना ही मालामाल हो कर लौटता हँ जैसे कोई राजा-महाराजा. गोवधन यादव. ( अ य / सयोजक मय देश रा भाषा चार सिमित, िजला इकाई िछदवाड़ा ) 103, कावेरी नगर,िछ दवाड़ा (म. .) 480001 सपक-9424356400 E.Mail- goverdhanyadav44@gmail.com --------------------------------------------------------------------------------------------------- नोट ( इडोनेिशया-मलेिशया-बाली तथा थाईलड आलेख काफ़ समय पव िलखे गए थे. म अपने सहयाि य के नाम उस समय नही िलख पाया और न ही टर आपरेटर ने सची ही दी.थी. अतः लबे अतराल के बाद कछ ही िम के नाम याद ह, बािक के नाम मित-पटल पर अिकत नह हो पाए.अतः कछ नाम का उलेख करना मझे उिचत नह लगा. अतः िकसी भी नाम का उलेख न करते हए उनक फ़ोटो को उिचत थान िदया गया है.) ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- या ा समरण जहाँ धरती बाचती है आसमानी ेमप --------------------------------------------------------------------------------------------------- 1. पातालकोट-धरती पर एक अजबा गगनचबी इमारत, सडक पर फ़राटे भरती रग-िबरगी-चमचमाती लजरी कार,मोटरगािडया और न जाने िकतने ही कल-कारखाने, पलक झपकते ही आसमान म उड जाने वाले वाययान, सम क गहराइय म तैरत पनडिबयाँ, बडॆ-बडॆ टीमर,-जहाज आिद को देख कर आपके मन म तिनक भी कौतहल नह होता. होना भी नह चािहए, यिक आप उह रोज देख रहे होते ह,उनमे सफ़र कर रहे होते ह. यिद आपसे यह कहा जाय िक इस धरती ने नीचे भी यिद कोई मानव बती हो,जहाँ के आिदवासीजन हजार-हजार साल से अपनी आिदम सकित और रीित- रवाज को लेकर जी रह रहे ह, जहाँ चार ओर बीहड जगल ह, जहाँ आवागमन के कोई साधन न हो, जहाँ िवषैले जीव जत, िहसक पश खले प म िवचरण कर रहे ह, जहाँ दोपहर होने पर ही सरज क िकरण अदर झाक पाती हो, जहाँ हमेशा धध सी छाई रहती हो, चरती भसॊं को देखने पर ऐसा तीत है,जैसे कोई काला सा धबा चलता-िफ़रता िदखलाई देता हो, सच मािनए ऐसी जगह पर मानव-बती का होना एक गहरा आय पैदा करता है. जी हाँ, भारत का दय कहलाने वाले मय देश के िछदवाडा िजले से 62 िकमी. तथा तािमया िवकास खड से महज 23 िकमी.क दरी पर िथत “पातालकोट” को देखकर ऊपर िलखी सारी बात देखी जा सकती है. सम सतह से 3250 फ़ट ऊँचाई पर तथा भतल से 1200 से 1500 फ़ट गराई म यह कोट यािन “पातालकोट” िथत है. हमारे परा आयान म “पातालकोट” का िज बार-बार आया है.”पाताल” कहते ही हमारे मानस पटल पर ,एक य तेजी से उभरता है. लका नरेश रावण का एक भाई,िजसे अिहरावण के नाम से जाना जाता था, के बारे म पढ चके ह िक वह पाताल म रहता था. राम-रावण य के समय उसने राम और लमण को सोता हआ उठाकर पाताललोक ले गया था,और उनक बिल चढाना चाहता था,तािक य हमेशा-हमेशा के िलए समा हो जाए. इस बात का पता जैसे ही वीर हनमान को लगता है वे पाताललोक जा पहँचते ह. दोन के बीच भयकर य होता है,और अिहरावण मारा जाता है.उसके मारे जाने पर हनमान उह पनः य भिम पर ले आते ह. पाताल अथात अनत गहराई वाला थान. वैसे तो हमारे धरती के नीचे सात तलॊं क कपना क गई है-अतल, िवतल, सतल, रसातल, तलातल, महातल,तथा महातल के नीचे पाताल.. शदकोष म कोट के भी कई अथ िमलते ह=जैसे-दग, गढ, ाचीर, रगमहल और अ ेजी ढग का एक िलबास िजसे हम कोट कहते है. यहाँ कोट का अथ है-च ानी दीवार, दीवारे भी इतनी ऊँछी,क आदमी का दप चर-चर हो जाए. कोट का एक अथ होता है-कनात. यिद आप पहाडी क तलहटी म खडॆ ह,तो लगता है जैसे कनात से िघर गए ह. कनात क मडॆर पर उगे पॆड-पौधे, हवा मे िहचकोले खाती डािलयाँ,,हाथ िहला-िहला कर कहती ह िक हम िकतने ऊपर है. यह कनात कह-कह एक हजार दो सौ फ़ट, कह एक हजार सात सौ पचास फ़ट, तो कह खाइय के अतःथल से तीन हजार सात सौ फ़ट ऊँची है. उ र-पव म बहती नदी क ओर यह कनाट नीची होती चली जाती है. कभी-कभी तो यह गाय के खर क आकित म िदखाई देती है. पातालकोट का अतः े िशखर और वािदय से आवत है. पातालकोट म, कित के इन उपादान ने, इसे अि तीय बना िदया है. दि ण म पवतीय िशखर इतने ऊँचे होते चले गए ह िक इनक ऊँचाई उ र-पि म म फ़ैलकर इसक सीमा बन जाती है. दसरी ओर घािटयाँ इतनी नीची होती चली गई है िक उसम झाककर देखना मिकल होता है. यहाँ का अ त नजारा देखकर ऐसा तीत होता है मानो िशखर और वािदय के बीच होड सी लग गई हो. कौन िकतने गौरव के साथ ऊँचा हो जाता है और कौन िकतनी िवन ता के साथ झकता चला जाता है. इस बात के सा ी ह यहाँ पर ऊगे पेड-पौधे,जो तलहिटय के गभ से, िशखर क फ़निगय तक िबना िकसी भेदभाव के फ़ैले हए ह. पातालकोट क झक हई च ान से िनरतर पानी का रसाव होता रहता है. यह पानी रसता हआ ऊँच-ऊँचे आम के व ॊं के माथे पर टपकता है और िफ़र िछतरते हए बदॊं के प म खोह के आँगन म िगरता रहता है. बारहमासी बरसात म भगकर तन और मन पलिकत हो उठते है. अपने इ , देव के देव महादेव, इनके आरा य देव ह. इनके अलावा और भी कई देव ह जैसे-मढआदेव,हरदललाला, पनघर, ामदेवी, खेडापित, भसासर, चडीमाई, खेडामाई, घरलापाट, भीमसेनी, जोगनी, बाघदेवी, मेठोदेवी आिद को पजते हए अपनी आथा क लौ जलाए रहते ह, वह अपनी आिदम सकित, परपराओ ,रीित- रवाज, तीज- योहार मे गहरी आ था िलए शान से अपना जीवन यापन करते ह. ऐसा नह है िक यहा अभाव नह है. अभाव ही अभाव है,लेिकन वे अपना रोना लेकर िकसी के पास नह जाते और न ही िकसी से िशकवा-िशकायत ही करते ह. िब े भर पेट के गढढे को भरने के िलए वनोपज ही इनका म य आधार होता है. पारपरक खेती कर ये कोदो- कटक, -बाजरा उगा लेते ह. महआ इनका ि य भोजन है .महआ के सीजन म ये उसे बीनकर सखाकर रख लेते ह और इसक बनी रोटी बडॆ चाव से खाते ह. महआ से बनी शराब इह जगल म िटके रहने का जबा बनाए रखती है. यिद िबमार पड गए तो तो भमका पिडहार ही इनका डा टर होता है. यािद कोई बाहरी बाधा है तो गडा-ताबीज बाध कर इलाज हो जाता है. शहरी चकाच ध से कोस दर आज भी वे सादगी के साथ जीवन यापन करते ह. कमर के इद-िगद कपडा लपेटे, िसर पर फ़िडया बाधे, हाथ म कहाडी अथवा दराती िलए. होठॊ पर मद-मद मकान ओढे ये आज भी देखे जा सकते ह. िवकास के नाम पर करोडॊ-अरबॊं का खचा िकया गया, वह रकम कहा से आकर , चली जाती है, इह पता नह चलता और न ही ये िकसी के पास िशकायत-िशकवा लेकर नह जाते. िवकास के नाम पर केवल कोट म उतरने के िलए सीिढया बना दी गयी है,लेिकन आज भी ये इसका उपयोग न करते हए अपने बने –बनाए रा त-पगडिडय पर चलते नजर आते ह. सीिढय पर चलते हए आप थोडी दर ही जा पाएगे,लेिकन ये अपने तरीके से चलते हए सैकडॊं फ़ट नीचे उतर जाते ह. हाट-बाजार के िदन ही ये ऊपर आते ह और इका ा िकया गया वनोपज बेचकर, िम ी का तेल तथा नमक आिद लेना नह भलते. जो चीज जगल म पैदा नह होती, यही उनक यनतम आवयकता है. एक खोज के अनसार पातालकोट क तलहटी म करीब 20 गाँव सास लेते थे, लेिकन ाकितक कोप के चलते वतमान समय म अब केवल 12 गाँव ही शेष बचे ह. एक गाँव म 4-5 अथवा सात-आठ से यादा घर नह होते. िजन बारह गाव म ये रहते ह, उनके नाम इस कार है-रातेड, चमटीपर, गजाडगरी, सहरा, पचगोल, हरिकछार, सखाभाड, घरनीमालनी, िझरनपलानी, गैलडबा, घटिलग, गढीछातरी तथा घाना. सभी गाव के नाम सकित से जडॆ-बसे ह. भारयाओ के शदकोष म इनके अथ धरातलीय सरचना, सामािजक ित ा, उपादन िविशता इ यािद को अपनी सपणता म समेटे हए है. ये आिदवासीजन अपने रहने के िलए िम ी तथा घास-फ़स क झोपिडया बनाते है. िदवार पर खिडया तथा गे से पतीक िचह उके रे जाते ह .हँिसया-कहाडी तथा लाठी इनके पारपरक औजार है. ये िम ी के बतन का ही उपयोग करते ह. ये अपनी धरती को माँ का दजा देते ह. अतः उसके सीने म हल नह चलाते. बीज को िछडककर ही फ़सल उगाई जाती है.. वनोपज ही उनके जीवन का म य आधार होता है. पातालकोय़ म उतरने के और चढने के िलए कई रा ते ह. रातेड-िचमटीपर और कारेआम के रा ते ठीक ह. रातेड का माग सबसे सरलतम माग है, जहाँ आसानी से पहँचा जा सकता है. िफ़र भी सभलकर चलना होता है. जरा-सी भी लापरवाही िकसी बडी दघटना को आमि त कर सकती है. पातालकोट के दशनीय थल म ,रातेड, कारेआम, िचमटीपर, दधी तथा गायनी नदी का उ म थल और राजाखोह मख है. आम के झरमट, पयटकॊं का मन मोह लेती है. आम के झरमट म शोर मचाता- कलकल के वर िननािदत कर बहता सदर सा झरना, कारेआम का खास आकषण है. रातेड के ऊपरी िहसे से कारेआम को देखने पर यह ऊँ ट क कबड सा िदखाई देता है. राजाखोह पातालकोट का सबसे आकषक और दशनीय थल है. िवशाल कटॊरे मे मािनद ,एक िवशाल च ान के नीचे 100 फ़ट लबी तथा 25 फ़ट चौडी कोत(गफ़ा) म कम से कम दो सौ लोग आराम से बैठ सकते ह. िवशाल कोटरनमा च ान, बडॆ-बडॆ गगनचबी आम-बरगद के पेडॊं, जगली लताओ तथा जडी-बिटय से यह ढक हई है. कल-कल के वर िननािदत कर बहते झरन, गायनी नदी का बहता िनमल ,शीतल जल, पि य क चहचाहट, हरा-बेहडा आँवला, आचार-ककई एव छायादार तथा फ़लदार व ॊं क सघनता, धध और हरितमा के बीच धप-छाँव क आँख िमचौनी, राजाखोह क सदरता म चार चाँद लगा देता है. और उसे एक पयटन थल िवशेष का दजा िदलाता ह. नागपर के राजा रघजी ने अँगरेज क दमनकारी नीितय से तग आकर मोचा खोल िदया था, लेिकन िवपरीत प रिथितयाँ देखकर उहने इस गफ़ा को अपनी शरण- थली बनाया था, तभी से इस खोह का नाम “राजाखोह” पडा. राजाखोह के समीप गायनी नदी अपने परे वेग के साथ च ान कॊ काटती हई बहती है. नदी के शीतल तथा िनमल जल म नान कर व तैरकर सैलानी अपनी थकन भल जाते ह. पातालकोट का जलवाह उ र से पव क ओर चलता है. पतालकोट क जीवन-रेखा दधी नदी है, जो रातेड नामक गाँच के दि णी पहाडॊं से िनकलकर घाटी म बहती हई उ र िदशा क ओर वािहत होती हई पनः पव क ओर मड जाती है. तहसील क सीमा से सटकर कछ दर तक बहने के , पनः उ र क ओर बहने लगती है और अत म नरिसहपर िजले म नमदा नदी म िमल जाती है. पातालकोट का आिदम- सदय जो भी एक बार देख लेता है, वह उसे जीवन पयत नह भल सकता. पातालकोट म रहने वाली जनजाित क मानवीय धडकन का अपना एक अ त ससार है,जो उनक आिदम परपराओ, सकित,रीित- रवाज, खान-पान, नय-सगीत, सामायजन के ि याकलापॊं से मेल नह खाते. आज भी वे उसी िनछलता,सरलता तथा सादगी म जी रहे ह. यहाँ ाकितक य क भरमार है.यहाँ क िम ी म एक जादई खशब है, पेड-पौध के अपने िनराले अदाज है, नदी-नाल म िनबाध उमग है, पश-पि य मे िन ता है ,खेत- खिलहान मे म का सगीत है, चारो तरफ़ सगध ही सगध है, ऐसे मनभावन वातावरण म दःख भला कहाँ सालता है?. किठन से किठन परिथितयाँ भी यहाँ आकर नतमतक हो जाती है सरज के काश म नहाता-पननवा होता- िखलिखलाता-मकराता- खशी से झमता- हवा के सग िहचकोले खाता- जगली जानवर क गजना म कापता- कभी अनमना तो कभी झमकर नाचता जगल, खबसरत पेड-पौधे, रग-िबरगे फ़ल से लदी-फ़दी डािलयाँ, शीतलता और ,मद हास िबखेरते, कलकल के गीत सनाते, आकिषत झरने, नदी का िकसी पसी क तरह इठलाकर- बल खाकर, मचलकर चलना देखकर भला कौन मोिहत नह होगा ?. जैसे –जैसे साझ गहराने लगती है,और अधकार अपने पैर फ़ैलाने लगता है, तब अधकार म डबे व िकसी दै य क तरह नजर आने लगते है और वह अपने जगलीपन पर उतर आते ह. िहसक पश-प ी अनी-अपनी माद से िनकल पडते ह, अपने िशकार क तलाश म. सरज क रौशनी म, कभी नीले तो कभी काले कलटे िदखने वाले, अनोखी छटा िबखेरते पहाडॊं क खला, िकसी िवशालकाय रा स से कम िदखलाई नह पडते. खबसरत जगल ,जो अब से ठीक पहले, हमे अपने समोहन म समेट रहा होता था, अब डरावना िदखलायी देने लगता है. एक अ ातभय, मन के िकसी कोने म आकर िसमट जाता है. इस बदलते प रवेश म पयटक, वहाँ रात गजारने क बजाय ,अपनी-अपनी होटल म आकर दबकने लगता है, जबिक जगल म रहने वाली जनजाित के लोग, बेखौफ़ अपनी झोपिडय म रात काटते ह. वे अपने जगल का, जगली जानवर का साथ छॊडकर नही भागते. जगल से बाहर िनकलने क वह सपने म भी सोच नह बना पाते. “जीना यहाँ-मरना यहाँ” क तज पर ये जनजाितया बडॆ सकन के साथ अलमत होकर अपने जगल से खबसरत रते क डोर से बधे रहते ह. अपनी माटी के ित अनय लगाव, और उनके अटट ेम को देखकर एक सि याद हो आती है.” जननी-जमभिम वगादिपगरयसी”= जननी और जम भिम वग से भी महान होती है” को फ़िलताथ और च रताथ होते हए यहाँ देखा जा सकता है. यिद इस अथ क गहराइय तक अगर कोई पहच पाया है, तो वह यहाँ का वह आिदवासी है, िजसे हम केवल जगली कहकर इित ी कर लेते है. लेिकन सच माने म वह “:धरतीप ” है,जो आज भी उपेि त है. पातालकोट के कछ िच . परा परवार ाकितक सदय देखकर नय करते हए. पातालकोट िपकिनक म मेरा परा परवार- दो बेटे-बह, प ी-दामाद सिहत पोते-पोितया, नाती-नाितन --------------------------------------------------------------------------------------------- 2 िशमला ट काजा ( िद िहमालयान को ड डेजट) हाया चडीगढ़ िकतना अ त है भारत, सदय से भरा हआ. कित और मानव िनिमत खबसरती आ आगार. इसको देखना मानो वय को देखना है. चारो ओर इतनी हरयाली, इतने मौसम, इतना िखलता जीवन. निदय का गँजता वर, पहािड़य का एकात, सम क पछाड़, रेिगतान म दमकता सरज, घने वन, दर-दर तक फ़ैले गाँव म कित का अनठा राग...िफ़र िकतने ही मौसम...िकतने ही रग और प बदलते आसमान के नीचे, िकतने ही प म बसता, िखलता भारत का जीवन. हमारे ाचीन महाकाय म जो कित विणत है, वह मा किवय क अितयोि नह, वरन भारत का सच है. कालीदास जी का मेघदत हो या िफ़र ऋतसहार, यास जी का महाभारत हो या िक िफ़र वा मीिक क रामायण, िजस भारत के वन-पवत-बि तय-निदय क महागाथा कहते नह अघाते, वह भारत म आज भी मौजद है, उपिथत है. कित क हर धड़कन म कदरत के रिचयता के गारक मन क खबसरत अिभयि होती है. िकतने िकम के तो ह उसव. मौसम क रगत भी कछ कम अनठी नह. जाड़े म िठठरन, बारश म भगना, गम म दर त क छाव, सबके सब मौसम कछ न कछ बया करते ह. िशमला क बात कर, यहा वसत एक बार आता है, तो िफ़र यह मिहन ठहरा रहता है, जबिक उसी भ-भाग म बसा काजा, बफ़ क चादर ओढ़े, िकसी तपवी क भाित समािध म लीन रहता है. सच ही कहा है िकसी ने- कित क नज म एक अनठे ान क पाठशाला समाई हई है. बस जरत है इस बात क िक हम कदरत क वभािवक उड़ान को, उसके योगदान को समझ-सराह और पहचान. कदरत क इस वभािवक उड़ान को समझने के िलए, पहचानने के िलए म िनकल पड़ता हँ कित क गोद म. घर और गाँव म रहते हए म िजतना खाली हो जाता ह, लेिकन जब लौटकर वािपस आता हँ तो उतना ही भरा-भरा महसस करता ह, उतना ही मालामाल हो कर लौटता हँ जैसे कोई राजा-महाराजा. इस िवराट कित क वदना करते हए मझे बरबस ही ी नरेश मेहता जी िक किवता-" चरैवेती-जन-गरबा" क याद हो आती है. वे िलखते ह. (एक अश) चलते चलो, चलते चलो / सरज के सग-सग चलते चलो, चलते चलो / निदय ने चलकर ही सागर का प िलया / मेघ ने चलकर ही धरती को गभ िदया / कने का मरण नाम / पीछे सब तर है / आगे है देवयान, यग के ही सग-सग चलते चलो // मानव िजस ओर गया नगर बसे, तीथ बने / तमसे है कौन बड़ा गगन-िसध िम बने / भमा का भोगो सख, निदय का सोम िपयो / यागो सब जीण वसन नतन के सग-सग चलते चलो. // मेरी या ा का पहला पड़ाव है चडीगढ़. इस शहर का नामकरण दगा के प म "चिडका" के कारण हआ है. चडीगढ़ से कछ दरी पर है अविथत है माता मनसा देवी का जग िस मिदर. इनका ादभाव मतक से हआ है. इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा. महाभारत के अनसार इनका वा तिवक नाम जर का है. समान नाम वाले पित का नाम महिष जरका तथा प आि तक है. माता रानी के दशन के प ात हम टै सी ारा कालका पहँचते ह और कालका से िमिन टाय े न से िशमला के िलए रवाना होते ह. रोमाचकारी सफ़र-कालका से िशमला तक का पहाड़ क रानी के नाम से जग-िव यात िशमला, वतमान म िहमाचल देश क राजधानी है. िशमला को अपनी खबसरती का ाकितक उपहार आशीवाद के प म िमला है. चार ओर हरे-भरे पहाड़ और िहमा छािदत चोिटय से िघरा हआ. यहाँ क शात वािदया अय पहािड़य से एक अलग ही आभा से जगमगाती है..1864 म िशमला को भारत म ि िटश राज क ीमकालीन राजधानी घोिषत क गई थी. औपिनवेिशक यग के समय क अनेक इमारत, िजसम टयडरबेटन और नव-गािथक वा तकला के साथ-साथ कई मिदर और चच शािमल है. वाइसराय लाज, ाइ ट चच, जाख मिदर, माल रोड और रज इस शहर के आकषण ह. यने क ारा िव िवरासत थल के प म घोिषत "कालका-िशमला रे वे लाइन" भी एक मख पयटक आकषण का के है. कालका-िशमला िमनी टाय े न से सफ़र 2 फ़ट 6 इच चौड़ी पटरी पर छकछक क आवाज िनकालती हई ये े न िशवािलक क पहािड़य पर 919 घमावदार रा ते, 103 सरगे और 869 पल से गजरती है..कभी वह 48 िड ी कोण से घमती हई 2076 मीटर ऊपर बसे िशमला तक जाती है. इस नैरो गेज लेन ने 09 नवबर 1903 को अपना सफ़र श िकया था, जो आज भी अनवरत जारी है 8 जलाई 2008 को, यने को ने कालका-िशमला रेलवे को 'भारत के पवतीय रेलवे िव धरोहर थल ' के प म शािमल िकया. िमिन टाय रेन म सफ़र करना एक रोमाचकारी अनभव था मेरे िलए. इस िमिन े न म सफ़र करते हए म बरबस ही अपने बचपन क भल-भलैया म जा पहँचता ह. म इजन बनता और मेरे नह िम , एक दसरे क शट का िपछला िहसा पकड़कर, डबे के प म जड़कर े न बनाते. शोर मचाते और छकछक क आवाज िनकालते हए एक के पीछे एक चला करते थे. छक-छक क आवाज िनकालती यह िमिन े न 656 मीटर क ऊँचाइय पर चढ़ती जाती है. इसम बैठकर आप सरसराती-/शरारती शीतल हवा के झक को महसस करगे, तो कभी पीछे छटते, सरपट भागते जगल और गाँव को, तो कभी इसे गहरा मोड़ लेकर सरग म वेश करती हई देखकर पयटक रोमाच से भर उठते है. े न क िखड़क से जब आप, पहाड़ से छलाग लगाते झरन को देखते ह तो सहसा कह उठते ह-" वाह ! िकतना रोमाचकारी और अ त है यह सफ़र..इसे तो म कभी नह भल पाऊँगा". आपक सनता के पारावार को बढ़ता देख, आपका ही कोई साथी कह उठता है.- " अरे वाह ! .बचपन म मने भी कभी इस े न म सफ़र करने का सपना देखा था आज उसे म अपनी खली आँख से देख रहा ह". दसरे िदन भी हम िशमला म ही कना था,. समय का सदपयोग करते हए हमने.िशमला से 20 िकमी.क दरी पर अविथत है “खपरी” जाना उिचत समझा कफ़री-. कफ़री अपने एडवचर गे स के िलए िस है. करीब आठ-दस िकली क दगम चढ़ाई के बाद यहाँ पहँचा जा सकता है. िपछली रात म बारश हो चक थी. रा ता कचा और दलदली थी. घोड़े क पीठ पर सवार होकर हमने इस या ा का भरपर आनद उठाया. और दसरे िदन हम िहमाचल देश के सराहन क ओर रवाना हए.िदन भर क या ा के बाद हमने सराहन म राि िव ाम िकया. सराहन- िहमालय से िनकल कर बहती सतलज नदी के िकनारे बसा है सराहन. सराहन अपने ाकितक य के िलए िव यात है. यह पर जग िस भीमाकाली का जग िस मिदर अवि थत है. भीमाकाली मिदर-(मडी)- कहा जाता है िक इस थान पर भगवान ीकण ने बाणासर को मार िगराया था. कण के बाद उनके यादव अनयाियय ने इस मिदर को बनाया. भीमाकाली को रामपर बशहर के राजाओ क आरा या देवी माना जाता है. यास नदी के तट पर िथत मिदर का परसर काफ़ सदर बनाया गया है. एक लबे रै पस से चढ़ते हए तीसरी मिजल पर पहँचकर आपको माँ भीमाकाली के िद य दशन होते ह. सराहन म राि िव ाम के बाद हमारा अगला पड़ाव होता है, 84 िकमी क दरी पर बसा, िहमाचल देश रा य के िकनौर िजले म िथत एक गाँव "सागला".म. सागला क ओर रवाना होते हए हम मनमोहक ाकितक य को िनहारते हए हम जा पहँचे “ बसपा “ नदी के सदर और आकषक तट पर. ऊँचे-ऊँचे पहड़ो को चीरकर रा ता बनालर बहती नदी को देखने का अपना ही आनद होता है. होटेल म ककर भोजन करने के बजाय हमने बसपा के पावान तट पर बैठकर “वन भोजन “ करना यादा उिचत लगा. जी भर के ाकित य को िनहारने के बाद हमने सागला म राि िव ाम िकया. सागला- यहाँ कई मिदर ह. यहाँ के अिधदेवता ह बे रग नाग, माजेन और िपरी नाग, इनके मिदर के अलावा ब ीनाथ जी और िछतकल माता मिदर.भी देखे जा सकते ह. सागला के आिखरी छोर पर बसा है बसपा नदी के तट पर बसा है“ िछतकल” गाँव “िजसे हम भारत का अितम िबद या आिखरी भ-भाग भी कह सकते ह. िछतकल से लगे ऊँचे पहाड़ के उस पार से ितबत क सीमा ारभ हो जाती है. िछतकल- िहमाचल रा य के िकनौर िजले म, भारत ितबत माग पर 3450 मीटर (बारह हजार फ़ट) क उँचाइय पर, वसपा घाटी का अितम गाँव, बसपा नदी के िकनारे अविथत है “िछतकल “. यह भारत का सीमा पर बसा आिखरी गाँव और आिखरी डाकघर भी है. इसी थान पर शा यमिन (Kagyupa) "ब " क अयिधक मयवान परानी छिव है. िछतकल एक तरह से िकनर कैलाश पर मा का अितम िबद है, यिक यहाँ से कोई भी चढ़ाई कर सकता है. िछतकल क रोमािचक या ा कर हम पनः सागला म आकर राि िव ाम करते ह. सागला से क पा क ओर. सागला म राि िव ाम के बाद हम चल पड़ते ह कपा क ओर.कपा क ओर बढ़ते हए हम रा ते म िमलता है “ रेकाग पेओ” ( Reckong Peo) िकनौर का हेडवाटर और ससाईड पाईट (sucide point). ससाइड पाईट-- पहाड़ी सड़क के एक खतरनाक मोड़ पर “ ससाइड पाईट’ को देखा जा सकता है. कित क अ त कारीगरी और नयनािभराम य को देखकर पयटक ममध हो जाता है. इसी जगह पर ककर एक मिहला फ़ोटो ाफ़ करते समय नीचे िगर पड़ी थी, िजसे िफ़र कभी नह खोजा जा सका. अतः बे रकेटस लगा िदए गए ह िक कोई यि धोके से दघटना का िशकार न होने पाए. सागला से क पा- हम अब एक ऐसे थान क ओर बढ़ चले थे, जो िहद धम म आथा रखने वाल के िलए एक िवशेष महव रखता है. इसी कपा से िकनर कैलाश के िद य दशन िकए जा सकते है. "िक नर कैलाश". िहमाचल देश के िकनौर िजले म ितबत सीमा के समीप 6050 मीटर ऊँचाई पर, आकाश से होड़ लगाता, िहमा छािदत पवत, िजस पर िशवजी का िवशाल िशविलग ाकितक प से िव मान है. यह वही िहमालय है जहाँ से पिवतम नदी गगा का उ व गोमख से होता है. "देवताओ क घाटी" के नाम से िव यात कल भी इसी िहमालय क रज म आता है. इस घाटी म 350 से भी यादा मिदर िथत ह. इसके अलावा अमरनाथ और मानसरोवर झील भी िहमालय पर ही िथत है. अनेक एडवचर के िलए िहमालय िव " नोिफ़ड" है, िजसका कल े फ़ल 45,000 िकमी. से भी यादा है. िस है. िहमालय िव का सबसे बड़ा भगवान ीकण जी ने िहमालय के बारे म भगवद गीता म कहा है-" मेरा िनवास पवत के राजा िहमालय म है". उसी तरह वामी िववेकानद ने एक बार कहा था िक " िहमालय कित के काफ़ समीप है. वहाँ अनेक देवी-देवताओ का िनवास है. महान िहमालय....देवभिम". यही कारण है िक भारतवािसय म खासकर िहद समाज म िहमालय को देवव के काफ़ करीब माना जाता है . परातन काल म िलिखत सामि य के अनसार िकनौर के िनवासी को िकनर कहा जाता है, िजसका अथ होता है- आधा िकनर और आधा ई र. गधव और िकनर को सगीत का अछा जानकार माना जाता है. इहने ऐसी सैकड़ विनय को खोजा, जो कित म पहले से िव मान है. उन विनय के आधार पर उहने म क और सहायक यान विनय क रचना क. िकनर इही यान विनय क सहायता से िशवजी क आराधना कर उह सन रखते ह. यहाँ िकनर का िनवास रहने के कारण इसे "िकनर कैलाश" के नाम से जाना जाता है. 19,849 फ़ट क ऊँचाई पर 45 फ़ट उँचा और 16 फ़ट चौड़ा फ़िटक िशविलग िहद और बौ दोन के िलए समान प से पयनीय है. लोग क इसम गहरी आथा है. इस िशविलग के चार ओर पर मा करने क इ छा िलए भारी स या म ाल यहाँ आते ह. िहमालय के गभ म बसा कैलाश भोलेनाथ को अयत ि य है, लेिकन िहमाचल के िकनौर म मौजद िकनर कैलाश िशवजी का शीतकालीन िनवास माना जाता है. िशविलग अपने आप म अ त है. इसे बाणासर का िकनर कैलाश के नाम से भी जाना जाता है. बाणासर ने इसी पवत पर िशवजी क किठन तप या कर उह सन िकया था. ऐसी भी मायता है िक िकनर कैलाश के आगोश म ी कण जी के पोते " जभान" का िववाह हआ था. िकनर कैलाश िदन म कई बार रग बदलता है, सयदय से पव सफ़ेद, सयदय होने पर पीला, मयाह काल म लाल हो जाता है और िफ़र मशः पीला, सफ़ेद होते हए सया काल म काला हो जाता है, जबिक इसके आसपास मौजद पहािड़य का रग एक जैसा ही रहता है .िकनर कैलाश अपनी इह िवशेषताओ के िलए जाना और माना जाता है. कपा म हम राि िव ाम करना था. हम दोपहर को लगभग दो-ढ़ाई बजे के करीब यहाँ पहँच गए थे. कपा के होटेल म मझे कमरा नबर 204 िदया गया था, जो पहली मिजल पर था. कमरे के ठीक सामने िकनर कैलाश अपनी िदय आभा के साथ चमचमा रहा था. कमरे म बैठे-बैठे ही हम उसक िद यता को जी भर के िनहार सकते ह.. कमरे के एक कोने म बैठकर म जी भर के उसे िनहारते रहा. िफ़र आँखे बद कर उसक पावन छिव को अपने मन मि तक क ओर ले गया..मेरा चचल मन धीरे-धीरे िथर होने लगा.था मन के शात होते ही मेरे अदर एक अ त सगीत बजने लगेगा. शायद एक ऐसा सगीत, िजसे िकनर अपने आरा य देव महादेव को सन रखने के िलए बजाया करते ह.( जैसा िक मैने अनभव िकया था). या ा क वापसी म भी मझे यही कमरा िमला. इस तरह मझे दो बार इसके िदय दशन का पय लाभ िमला. िकनर कैलाश जाने का माग काफ़ किठन है जो मिकल दर से होकर गजरता है. पहला लालाित दरा जो 14,501 फ़ट क ऊँचाई पर और दसरा चारग दरा है जो 17,218 फ़ट क ऊँचाई पर िथत है. िकनर कैलाश के िदय दशन के उपरात हमने "रेकाग िपओ"क ओर थान िकया. रकाग िपओ िकनौर िजले का वािणि यक व शासिनक के है, जो सतलज नदी के िकनारे अविथत है. इसके बाद हमने रेकाग िपओ के िनकट " लगी गोफ़ा" लोकि य गोफ़ा, " ह ब लान कार" मोने ी देखा और का पा म िव ाम िकया. का पा से काजा ( िद िहमालयन को ड डेजट)-( 210 KM. ) िहमाचल देश रा य के लाहौल और ि पित िजले म, पीित नदी के िकनारे, िशमला से 425 िकमी क दरी पर, सम तल से 3,650 मीटर ( 11,980 फ़ट) क उँचाई पर िथत काजा, अपने शानदार पहािड़य मठ और ाचीन गाँव और बफ़ले पवत के िलए जाना जाता है. काजा लाहौल पीित िजले का एक महवपण यापा रक क भी है जो चार ओर से बफ़ले पवत से िघरा हआ है. य, बौ काजा अपने रगीन योहार के िलए जाना जाता है. ाचीन "शा य" तायद मठ शहर से 14 िकमी. क दरी पर अविथत है. यहाँ बहत कम या मानसन म बारश होती है. जलवाय शक और फ़ितदायक रहता है. सिदय के दौरान तापमान शय से नीचे चला जाता है, िजसके कारण यहाँ पर औसतन बफ़बारी सात फ़ट तक हो जाती है. यहाँ आकर आपको बरबस ही िशमला क याद ताजा हो आएगी. यहाँ क हरी-भरी वािदया, सघन पेड़ क खलाए और खशगवार मौसम को देखकर म होता है िक वसत यहा एक बार आता है, तो कई-कई मिहने ठहरा रहता है. इस िच ाकषक वािदय म मण करते हए आप रोमाच से भर उठते ह, जबिक काजा म आकर आपको देखने को िमलते है नीली गहरी उदासी ओढ़े हए रग-िबरगे खे-सखे से पहाड़. यहाँ आपको एक भी व देखने को नह िमलेगा. अटबर-नवबर म यहाँ भीषण बफ़बारी होती है. तब बफ़ क मोटी चादर ओढे पहाड़ िकसी तपवी से कम तीत नह होते. िहमाचल देश के एक ही बे ट पर आपको दो अलग-अलग मौसम देखने को िमलगे. एक छोर पर िखलता वसत है तो वह दसरे छोर पर बफ़ का रेिगतान देखकर आ यचिकत होना वाभािवक है. चताल झील चताल झील पयटक और े कर के िलए वग से वग से कम नह है. चताल (चमा क झील) इसके अधच ाकार होने क वजह से पड़ा है. यह झील भारत क दो उच ऊँचाई वाली आभिम के प म से एक है. इस पानी का रग िदन ढलने के साथ लाल से नारगी और नीले से हरे रग म बदलताअ रहता है. यह झील काजा से 55 िकमी क दरी पर है. िक बर गाँव- एक चना पथर च ान के िशखर पर एक सकण घाटी म िकबर,काजा से 17 िकमी क दरी पर, सम तल से 4,328 मीटर क ऊँचाई पर बसा यह गाँव िव भर म सबसे अिधक ऊँचाई पर बसा गाँव है. ठडॆ रेिगतान म िथत अपने सरय गाँव, बजर प र य के िलए जाना जाता है. इसे लघ ित बत भी कहा जाता है. ( KIBBAR VILLAGE.) ताबो मोने ी काजा से 48 िकमी मीटर, सम तल से 3,050 मीटर क ऊँचाइय पर बसा यह गाँव "िहमालय का अजता" कहलाता है. क मठ-(KYE) काजा से 7 िकमी क दरी पर िथत "क मठ" गपा के नाम से जाना जाता है. इस मठ का िनमाण 11 शता दी के दौरान िकया गया था, अपनी आकषक वा त-कला के िलए परे िव भर म िस है. सम तल से 13,504 फ़ट क ऊँचाई पर एक शवाकार च ान पर िनिमत इस मठ को रगछेन सगपो ने बनवाया था. गोफ़ा के भीतर वेश करते ही आपको लगने लगेगा िक आप िकसी अलौिकक जगह म आ गए है. ठीक सामने क दीवार पर िवशालकाय ब क तवीर, सामने पजा-पाठ क सामि याँ और भी अनेकानेक चीज करीने से रखी हई िमलगी, गोपा क कलामक साज-सजा, क के बीच म म य पजारी अपनी पारपरक पोषाक म बैठा िदखाई देगा, वह उसके दोन ओर कतार से बैठे ब के अनयायी म को उचारते िदखाई दगे. यहाँ आकर यिद आपने इस मठ को नह देखा, तो कछ भी नह देखा. लाहौल और पीित िहमाचल देश म सम तल से 10050 फ़ट क ऊँचाई पर ि थत है लाहौल- पीित.पहले लाहौल और पीित अलग अलग रा य थे. इन दोन के िवलयोपरात को िमलाकर एक िजला बना िदया गया है. िवलय के पव लाहौल का म यालय "करदग" और पीित का म यालय "दनकर" था. अयिधक शीत के चलने के कारण यहाँ पेड़-पौधे तक नह पनप पाते. सारा इलाका बजर रहता है कछ कड़ी घास एव झािड़या यहाँ उग पाती ह, वो भी 4000 मीटर के नीचे. अपनी ऊँची पवतमाला के कारण यह शेष दिनया से कटा रहता है. यह थान "को ड डेजट आफ़ िहमालय" के नाम से भी जाना जाता है. या ा करते समय आपको "िहमालयान याक" और "नीली भेड़े" भी देखने को िमलती िमल.. िहि कम गाँव ि पित घाटी म बजर पहाड़ के बीच एक छॊटा-सा गाव है "िहिकम". इसी गाँव म दिनया के सवािधक 14,567 फ़ट क ऊचाईय पर कायरत "िहिकम डाकघर, जो आसपास के कई गाव को बाक दिनया से जोड़ता है. चिक म भी पो टमा टर ( H.S.G.I ) के पद से सेवािनव हआ था. दिनया के सवािधक ऊचाई पर िथत डाकघर को काम करता देख मझे बहत सनता हई, डाकघर जाना और डाकपाल से िमलना मेरे िलए जरी था. म य सड़क से करीब दो सौ फ़ट नीचे ढलान म उतर कर वहा जाना होता है, अयिधक ढलान से िफ़सलने का खतरा बना रहता है. काफ़ सावधानी पवक उतरते हए म वहा जा पहचा. पो टमा टर ी रचेन शे रग से मलाकत करते हए अपना प रचय िदया. परचय पाकर वे बहत खश हए थे. उहने सा ह मझे अदर आने का आह िकया, कस दी, जलपान का आह िकया. लेिकन मेरे पास समय क कमी थी. या ा म और आगे बढ़ना था. मने डाकपाल के साथ फ़ोटो िलया और वािपस हो िलया. गय गाँव ताबो मोने ी से करीब 50 िकमी दर "गय" नाम के गाँव म िमली यह ममी 550 वष लामा सागला क है, जो ितबत से चलकर यहाँ तपया करने आए थे. जब वे तपया म लीन थे, अचानक 1974 म आए भकप से वह दबे रह गए. 1975 म आईटीबीपी के जवान को लामा का शव सड़क बनाते समय खदाई म िमला था. कहते है खदाई के समय कदाल लगने से ममी से खन िनकल आया था.. ात हो िक इस ममी पर अय मिमय क तरह कोई लेप आिद नह लगाया गया है. िबना लेप आिद लगाए इस ममी के बाल और नाखन आज भी बढ़ रहे ह, यह एक आय का िवषय है. लोग इसे िजदा भगवान मानकर पजा करते ह.. काजा हमारी या ा का अितम िबद था. काजा म दो िदन बताने और उसके आसपास फ़ैले रहयमय जगत को देखने और अपने कैमर म दलभ िच और मन म एक नई याद का िपटारा िलए हम लौट पड़ते ह. या ा म यिद आपके साथ सहया ी न ह तो या ा का सही आनद ा नह होता. वे न केवल आपके सहया ी ही नह होते ह बि क जरत पड़ने पर आपक हर सभव सहायता भी करते ह. इनके साथ रहने से आपक या ा का आनद ि गिणत हो जाता है. मेरे सहयोिगय म ो.राजे र आनदेव, ीमती अिनता आनदेव, जयत डोले, ीमती स षमा डोले, नमदा साद कोरी, डा,िवजय चौरिसया, अिमत दबे, ीमती मनमन दबे, वीर दबे सिहत हरीश खडेलवाल सहयोगी सहया ी थे. सच ही कहा है िकसी ने िक हर या ा एक तलाश होती है- अपनी और उस अछोर जीवन क उस िवराट कित क, हमारा अि तव िजसक एक कड़ी है. इसीिलए हर या ा से कछ न कछ िमलता ज र है, िकसी भोर का उगता सरज, कोई बल खाती नदी, दर तक फ़ैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई िसदरी शाम, दर गाव से आती ढोलक क थाप, पीछे छटती याविलया..हमारे भीतर रच-बस जाती ह. यही सब तो जीवन क सपदाए ह. मझे बरबस ही अ ेय जी क किवता याद हो आती है. मिदर से, तीथ से, या ा से हर पग से, हर सास से कछ िमलेगा, अवय िमलेगा, पर उतना ही िजतने का त है अपने भीतर से. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 3.. ल ीप क सरय या ा. भारत के दि ण-पि म िकनारे से लगभग 400 िकमी.क दरी पर अविथत है एक अ त ीप, िजसे ल ीप के नाम से जाना जाता है. यही एकमा ऐसा ीप है िजस पर जाने के िलए पयटक को भारत सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है. परा आइलै ड करीब 32 िकमी के े म फ़ैला हआ है. यहाँ का ाकितक स य, दषणम वातावरण, चार ओर से िघरा शात सम और इसका पारदश-तल पयटक को अपने सदय से ममध कर देता है. सम के नीले पानी के भीतर तैरती अस य रग िबरगी मछिलयाँ, ीप पर आछािदत नारयल और पाम के हरे-भरे व , चादी-सी चमकती,मलायम रेत एक अनोखा य उपिथत होता है. इस ीप-समह म कल िमलाकर 36 ीप ह,िजसम से केवल तीन ीप कलपेनी, अगाती और अमीनी ीप पर ही जाने क इजाजत िमलती है. इजाजत को ची िथत कायालय से ली जा स है. पयटक को अपने थानीय पिलस टेशन से इस आशय का माण-प लेना होता है िक वह अपराधी-िकम का नह है. यिद आप इस सदरतम ीप क या ा करना चाहते ह तो मई से लेकर िसतबर का समय उिचत होगा. शेष समय यहाँ तीखी धप पड़ती है. अगाती ीप क कल िमलाकर आबादी करीब सात हजार है. ये कभी िहद धमावलबी थे, चौदहव सदी म इलाम वीकार कर िलया था.ल ीप भारत का एकमा मँगा ीप है. इन ीप क खला मँहा एटोल है. एटोल मगे के ारा बनाया गई ऐसी रचना है जो सम क सतह पर पानी और हवा िमलने पर बनती है. िसफ़ इह परिथितय म मँगा जीिवत रह सकता है. आज यह ीप पयटन क ि से तेजी से िवकास कर रहा है. पयटक यहाँ आकर जहाँ कित के नैसिगक वातावरण को िनहारकर ममध हो उठता है, वह वह वाटर पोटस यानी कबा डायिवग, कायािकग, नौकायन, लास-बोट, वाटर क इग का जमकर लफ़ उठा सकता है. मलयालम. जेसेरी भाषा यहाँ के िनवािसय क आम-भाषा है. अगाती और बगारम ीप बहत ही खबसरत ीप है. यहाँ बोट हमेशा तैयार िमलती है. नौकायन ही यहाँ का यातायात का म य मा यम है. कावार ी आइलड कवर ी यहाँ क शासिनक राजधानी है। यह सबसे अिधक िवकिसत भी है साथ ही सैलिनय के िलए एक बहत ही लोकि य थल है. यह आइलड परी तरह हरयाली, नीले पानी और बाल से िघरा हआ है, जो पयटक को अपनी ओर आकिषत करता है. परे ीप म 52 मिजद ह, सबसे खबसरत मिजद है उ मिजद. इस ीप म ए वे रयम भी है िजसम सदर मछिलय क जाितयाँ ह. यहाँ काँच क तली वाली नौका म बैठकर आप सम ी दिनया का नजारा ले सकते ह. िमिनकॉय आइलड यह आइलड कवर ी से 200 िकमी दर दि ण म है. मालदीव के करीब होने के कारण यहाँ िभन सकित के दशन होते ह. िमिनकॉय नय परपरा के मामले म बेहद सम है. िवशेष अवसर पर यहाँ लावा नय िकया जाता है. यहाँ खासकर तना मछली का िशकार और नौका क सैर आनददायी है. अँ ेज के ारा 1885 म बनवाया गया काश तभ देखने लायक है, पयटक यहाँ ऊपर तक जा सकते ह. बगारम आइलड यह आइलड बेहद ही शात है यहा क अपार शाित पयटक को खासा पसद आती है. साथ ही यहा ना रयल के व सघन मा ा म ह. कालपेनी आइलड यहाँ तीन ीप ह िजनम आबादी नह है. कदमठ आइलड एक जैसी गहराई और दर अनत तक जाते िकनारे कदमठ को वग बनाते ह. यही एकमा ीप है िजसके पव और पि मी दोन ओर लैगन ह. यहाँ वाटर पोटस क बेहतरीन सिवधाएँ ह. ल ीप जाने से पव हमने कछ जानका रय़ाँ इटनट से ा क थी. ात हआ िक इस ीप पर पहँचने के दो ही साधन है. या तो आपको सफ़र पानी के जहाज से जाना होता है या िफ़र हवाई जहाज से. इस माण-प के आ पर आपको अपनी उपि तिथ दज करवानी होती है. बाद म यह भी ात हआ िक पानी के जहाज अभी नह चल रहे ह और वे रपेयरग के िलए कछ समय तक के िलए रोक िदए गए ह. हमारे पास एक ही िवकप बचा था िक हम हवाई या ा करते हए वहा पहँचे. पयटक को ीप म चार िदन से ऊपर कने नह िदया जाता है. साथ ही यह भी ही हवाई जहाज यहाँ के िलए उड़ान भरता ात हआ िक को ची से स ाह म केवल एक िदन है. यह भी पता चला िक लौटते समय हवाई जहाज को ची क जगह कोिझकोड के िलए उडान भरेगा. ऐसी िवकट परिथित म हमने नागपर के “ वि तक टस एड े वल” ( Swastic Tours and Travels, Plot No. 10, Dandige Lay 0ut, Shankar Nagar (440010). के सचालक ी िननाद आमेलकर जी ( मोबा.9421706506) का सहारा िलया और हमने अपने िहसाब से काय म िनधारत िकए. ी आमेलकर जी ने अपने सहायक ी मोद झाड़े (7620107238) को हमारे साथ या ा पर िभजवाया, तािक हम कोई असिवधा न हो. इस या ा म हम िसफ़ अगि , बगारम और तलापैनी ीप पर ही जाने क इजाजत िमल पायी थी. हमारे साथ इस या ा म अय देश से ी अनत रालेगावकर जी, एन. ीरामन, ीमती पपा ीरामन, स ी वीणा महािडकर जी, स ी शािलनी डोणे जी, ी साकेत केलकरजी, ी सव म केलकरजी, स ी शिमन यटो (Sharmeen Couto), स ी ि मता ीवा तवजी, स ी िच ा पराजपे जी एव दीपक गोखले जी भी शािमल थे. ये सभी अलग-अलग ट से को ची पहँचे थे. (Photo Group-All members) 17/19-01-2020 ( सवण जयित ए स. राि 11.30) 17 तारीख क शाम को हम िछदवाड़ा से नागपर के िलए रवाना हए. सवण जयती ए स.नागपर राि साढ़े यारह बजे पहँचती है. लगातार दो िदन क या ा के प ात हम िदनाक 19 जनवरी क सबह छः-साढे छः बजे के करीब कोि च पहँचे. शहर क यात ी- टार होटेल सारा (SARA) म हम कवाया गया. चिक हमारे पास आज का िदन ही शेष था, अगली सबह हम शी ता से तैयार होकर कोि च एअर-पोट पहँचना था. अगि के िलए लाईट सबह साढ़े नौ बजे क थी. अतः हमने इस अपाविध म को ची शहर के कछ िस बनाया. थल को देखने का मानस इस अपाविध म हमने फ़ोक लोर यिजयम (FOLK CLORE MUSIUM), सट ािसस जेिवयर चच ( SAINT FRANCIS ZAVIER) , साइनेगोग िजज मिदर (यहिदय का ाथना थल) -SYNEGOG JEWS TEMPLE- तथा डच पैलेस ( DUTCH PALACE) देखा और दोपहर को हमने “फ़ोट वीन” होटेल म सवाद भोजन का आनद िलया. ात हो िक पतगाली नािवक वाको डी गामा 8 जलाई 1497 म भारत क खोज म िनकला था. 20 मई 1498 को वह के रल तट के को जीकोड िजले के कालीकट के कपाड ( Kappadu near Kozhikode (Calicut), in Malabar Coast (present day Kerala state of India), on 20 May 1498. पहँचा था. 1502 म वह पनः दसरी बार भारत आया था. लबी िबमारी के बाद उसका िनधन सन 1524 म हआ. उसके मत शरीर को कोि च के सत ािसस चच म दफ़नाया गया था. सन 1539 म पतगाल के इस हीरो के शरीर के अवशोष को िनकालकर पतगाल के िविडगअरा (VIDIGUEIRA ) म दफ़नाया गया. 20-22 जनवरी--अगि . ीप बीस जनवरी क सबह आठ बजे हमने होटेल सारा छोड़ िदया और सीधे एअरपोट पहँचे. सबह साढ़े नौ बजे क इिडयन एअरलाईन क लाईट अगि के िलए थी. को ची (कोचीन) से अग ी तक क उड़ान म महज एक घटा तीस िमनट लगते ह. उड़ते हए हवाई जहाज अगि ीप इस तरह िदखाई देता है. (वाययान से कछ इस तरह िदखता है अगि अगि ीप ीप ) अगि एअरपोट हम िछदवाडा के साथी हवाई अडडे से कछ ही दरी पर सैलािनय के िलए हटस बने हए ह. मील दर-दर तक फ़ैली, चादी-सी चमचमाती मखमली रेत के मय ये हटस बने हए ह. इस मखमली रेत पर चलना एक अलग ही तरीके का अहसास िदलाता है. जगह-जगह ऊगे नारीयल के अस य पेड़ और पास ही लहलहाता-सम आपको िकसी िदय लोक म ले जाने के िलए पया है. इतना अलौिकक य िजसे शद म नह बाधा जा सकता. दर-दर तक फ़ैली नीले पानी क चादर, ि ितज पर रग िबखेरता सरज, सफ़ेद झककास रेत और रग-िबरगी मछिलयाँ अग ी क असली पहचान है. यिद सयोग से उस िदन पिणमा हो तो इस ीप के सदरता को देखकर आप ममध होउठगे. सया त के समय का मनभावन य तलापैनी ीप यहाँ तीन ीप ह िजनम आबादी नह है. इनके चार ओर लैगन क सदरता देखने लायक है. कमेल एक खाड़ी है जहाँ पयटन क परी सिवधाएँ उपलध ह. यहाँ से िप ी और िथलकम नाम के दो ीप को देखा जा सकता है. इस ीप का पानी इतना साफ है िक, आप इस पानी म अदर तैरने वाले जीव को आसानी से देख सकते ह. साथ ही यहाँ आप तैर सकते ह, रीफ पर चल सकते ह, नौका म बैठकर घम सकते ह और कई वाटर पोटस का आनद ले सकते ह. बगारम आइलै ड. अय ीप से यह सबसे खबसरत ीप है. यह बेहद ही शात ीप है. इसक शाित पयटक को अछी खासी पसद आती है. यहाँ नारयल के सघन व आपका मन मोह लेते है. डालिफ़न, कछए, मढक और रग-िबरगी मछिलयाँ यहाँ देखी जा सकती है. मन मोह लेने वाले इस ीप पर हमने बहत सारा समय आनद म िबताया और इसी के िकनारे एक िवशालकाय टट के नीचे बैठकर हम सब पयटक ने सवाद भोजन का आनद िलया. और अगि ीप ीप के िलए रवाना हो गए. चिक हमारे िलए 22 जनवरी क रात हमारे िलए अितम राि थी, अगली सबह हम वािपस लौट जाना था. इस अितम पड़ाव पर हम सब शात सम के िकनारे बैठकर शेर-शायरी और सदर गीत और किवताओ का आनद उठाते रहे और अत म. ल ीप से लौटकर आए हए हम अभी यादा समय नह िबता है. दस िदन के इस रोमाचक सफ़र क मधर मितयाँ आज भी चमकत करती है. चमकत करते ह वे अ त ण, जब हम परब से सरज को िनकलता देख रोमािचत होते थे तो वह उसे अताचल म जाता देख, इस आशा के साथ लौट पड़ते थे िक अगली सबह िफ़र सरज एक नया उजाला, एम नया सदेशा लेकर िफ़र नीलगगन म अवतरत होगा. िखलिखलाता-दहाड़ता सम और सम के बीच कमल सा िखला ीप, िजसक चादी-सी चममचाती मलायम रेत पर िवचरण करना और नारयल के पेड़ के पेड से बधे झले म जी भरके झलना. रह-रह कर याद आते ह वे ण जब हम सब िमलकर ीप पर फ़ैली असीम शाित के बीच सहभोज का आनद उठाते है. याद आते ह वे ण जब हम नौका िवहार करते हए सम के तल म फ़ैली शैवाल के सघन बनावटॊं को देखकर रोमािचत होते थे. 4 अ त -अकपनीय िक नर कैलाश अ त -अकपनीय िक नर कैलाश ०००००००० दरअसल हम या ाओ को अपनी यत जीवन-चया का एक अतराल या छ याँ िबताने का एक तरीका समझते ह. ठीक भी है. परत मेरी समझ के अनसार या ा एक तलाश होती है--अपनी और उस अछोर जीवन क, उस िवराट कित क, हमारा अि तव िजसक एक कड़ी है. इसीिलए हर या ा से कछ न कछ िमलता जर है. या ाएँ हम भीतर से सम करती ह. हमारे जीवन को गहराई देती है. हम देना और जीना दोन िसखाती ह. िकसी भोर का उगता सरज, कोई बल खाती अहड़ नदी के ममध कर देने वाले गीत क वर-लहरी, दर-दर तक फ़ैला कोई मैदान, या चारागाह या िफ़र दर-दर तक फ़ैली, नीलगगन को पष करती तीत होती पवत क ेिणयाँ, कोई िसदरी शाम, दर कह िकसी गाँव से आती ढोल-ढमाके क थाप, तासे, झाझ-मजीर आिद क झकार या िफ़र शहनाई क कोई मीठी सरीली धन, पीछे छटती याविलया, हमारे भीतर रच-बस जाती है. यही तो हम सब के जीवन क सपदाए ह, हमारे अतर मजगमगाती-कधती रोशिनया ह, िजसक आभा म हम उस सब को पहचान पाते ह, जो हमारा अपना जीवन है. इस िवराट कित क वदना करते हए मझे बरबस ही ी नरेश मेहता जी िक किवता-"चरैवेती-जन-गरबा"क याद हो आती है. वे िलखते ह.(एक अश) चलते चलो, चलते चलो, / सरज के सग-सग चलते चलो, / चलते चलो....../निदय ने चलकर ही सागर का प िलया/ मेघ ने चलकर ही धरती को गभ िदया / कने का मरण नाम / पीछे सब तर है / आगे है देवयान, / यग के ही सग-सग चलते चलो /. मानव िजस ओर गया नगर बसे / तीथ बने /तमसे है कौन बड़ा / गगन-िसध िम बने / भमा का भोगो सख, / निदय का सोम िपयो / यागो सब जीण वसन / नतन के सग-सग चलते चलो. बस, इसी तरह चलते-चलते हम कब 6050 मीटर क ऊँचाई पर िथत कालपा आ पहँचे., पता ही नह चल पाया. मझे होटेल म जो कमरा अलाट िकया गया था, वह पहली मिजल पर था, जहाँ से बैठकर म िकनौर कैलाश क अ त छटा को जी भर के िनहार रहा था. अ त-अकपनीय. एक ऐसा य, िजसे मने पहले कभी नह देखा था. आँख पलक झपकना ही भल गई थ. तभी तो ीकण जी ने िहमालय के बारे म भगवत गीता म कहना पड़ा-"मेरा िनवास पवत के राजा िहमालय म है."इसी तरह वामी िववेकानद जी ने िहमालय को मिहमा मिडत करते हए कहा था "िहमालय कित के समीप है. वहाँ अनेक देवी-देवताओ का िनवास है. महान िहमालय...देवभिम." िकनर कैलाश िहमाचल देश के िकनौर िजले म ितबत सीमा के समीप है. यह थान िहद धम म आथा रखने वाल के िलए िवशेष धािमक महव रखता है. इस पवत क खास िवशेषता है िक सम तल से 17200 िफ़ट क ऊँचाई पर 79 िफ़ट का ाकितक िशविलग है, जो िदन म कई बार रग बदलता है. सयदय से पहले सफ़ेद, दयदय होने पर पीला, मयाह काल म लाल, िफ़र शाम के समय काला हो जाता है. ऐसा य होता है? इस रहय का पता आज तक कोई नह लगा पाया है. िकनौर के िनवासी इसको िद य शि का चमकार मानते ह. हालािक कछ वै ािनक का मानना है िक ये फ़िटकय रचना है. अतः अलग-अलग िदशाओ से पड़ने वाली सय क िकरण के कारण इसका रग बदलता रहता है. िकनर कैलाश का पौरािणक महव- िकनर कैलाश के बारे म बहत सी मायताए चिलत है. ऐसी भी मायता है िक इसी पवत पर पहली बार िशव और पावती का िमलन हआ था. कछ िव ान का कहना है िक महाभारत काल म िकनर कैलाश का नाम "इ कलपवत"था, यहाँ भगवान िशव और अजन का य हआ था. साथ ही अजन को पासपाता क ाि हई थी. एक मायता ये भी है िक पाडव ने अपने वनवास काल का अितम समय इसी जगह पर गजारा था. िकनर कैलाश को वाणासर का कैलाश भी माना जाता है. कछ िव ान तो ये भी कहते ह िक यहाँ भगवान कण के पोते अिनध का िववाह ऊषा से हआ था.िकनर कैलाश िहमाचल देश का ब ीनाथ भी कहलाता है. बहत से लोग इसे रॉककैसलके ( Rock Chaslche )के नाम से भी जानते ह. इस िशविलग क पर मा करना बहत ही जोिखम भरा होता है. चिक हमारा मण-काय म चडीगढ़ से श होकर िशमला, सराहन, सागला, का पा तथा काजा तक का था. अतः जाते समय का पा म परा िदन. और लौटते समय भी हम िफ़र से का पा म कने का सअवसर िमला और इस तरह हम दो बार िकनर कैलाश के िद य दशन का पय लाभ िमला. िकनर कैलाश क प र मा का कोई काय म हमारी मण-सची म था भी नह. इसका नाम िकनर कैलाश कैसे पड़ा? परातन काल म म िलखी सामि य के अनसार िकनौर के िनवासी को िकनर कहा जाता है. लोग असर इसका अथ यह भी लेते है िक िकनर माने आधा नर और आधी नारी. जबिक िकनर एक िवशेष कार के (छॊटे) देवता होते ह, जो सगीत और गायन म िवशेष द ता रखते ह और अपने से बड़े देवताओ को गा-बजाकर सन रखते ह. भारत मसगीत क परपरा अनािदकाल से ही रही है. िहदओ के ायः सभी देवी-देवताओ के पास अपना एक अलग वा य है. िवण के पास शख है,, िशव के पास डम है, नारद मिन और सरवती के पास वीणा है, वह भगवान ीकण के पास बासरी है.. चिक गधव और िकनर को सगीत का अछा जानकार माना जाता है. खजराहो का मिदर हो या िफ़र कोणाक का सय मिदर. इनक दीवार पर गधव और िकनर क मितयाँ आवेि त क गई है. सगीत का िव ान- िहद धम के अनसार सगीत मो ा करनेका साधन है. सगीत से हमारा मन और मि तक पणतः शात और वथ हो सकता है. भारतीय ऋिषय ने ऐसी सैकड़ विनय को खोजा, जो कित म पहले से ही िव मानथ. उन विनय के आधार पर ही उहने म क रचना क थी. हमारे अपने देश क लोक-सकित का मल वर है "उसव".और "पव"क परपरा. पव शद ही पवत से बना है. पहले कम ऊँच चोटी, िफ़र उससे ऊँचे, िफ़र उससे ऊँचे पवत िदखाई देते ह, जोसही अथ म "पव"ही है जो हमारी चेतना को उ रो र ऊँचाइय क ओर ले जाते ह. कित और मनय म गहरा र ता है, अनािद नाता है. उसने जो कछ भी सीखा कित से ही सीखा है. चलती हवा ने उसे मती करना सीखाया. बहते झरन और निदय क रवानी ने उसे गाना िसखाया. िखलते फ़ल ने उसे मकराना िसखाया. नवपितय से उसे शीतलता का आभास हआ. याद रिखए, जहाँ वनपित है, व ह, हरयाली है, आसमान से बात करते पवत िशखर ह, वहाँ राग होगा, ेम होगा. िकनर कैलाश अपनी इह िवशेषताओ के िलए जाना और माना जाता है. आप एक कोने म बैठकर जी भर के उसे िनहार. िफ़र आँखे बद कर उसक पावन छिव को अपने मन-मि तक क ओर ले जाए. आपका चचल मन धीरे-धीरे िथर होने लगेगा. मन के शात होते ही आपके अदर एक अ त सगीत बजने लगेगा. एक ऐसा सगीत, िजसे िकनर अपने आरा य देव महादेव को सन रखने के िलए बजाया करते ह.( एक अनभव जो मझे हआ) िबनासगीत केजीवन राग कैसे बज सकता है? िजनके जीवन म सगीत नह ह, ेम नह है वे रोजमरा के तनाव और दवाब के चलते लोग खद से हारने के आिद हो जाते ह. हारा हआ आदमी अपने आपको अ म, अवश और िनःसहाय समझने लगता है. थके हए मन और िशिथल देह के साथ उलझन से िघरे जीवन म िकसी रस क िनपि नह होती. "रस"याने आनद. आनद का न होना, ही आदमी को नैराय के भवर म डबो देने के िलए पया है. अतः नीरस जीवन को रसमय बनाने के िलए "या ा"ही एक ऐसा मौका है...अवसर है, जब हम और आप अपने ही बने जाल से बाहर झाकने क िह मत जटा सकते ह. यह सब िलखते हए मझे "अ ेय" जी क किवता क चद लाईन याद आती है "मिदर से, तीथ से, या ा से हर पग से, हर सास से कछ िमलेगा, अवय िमलेगा, पर उतना ही िजतने का त है अपने भीतर से दानी" ( पा म िकनर कैलाश य है ) ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 5. 3 बाल सािहय सगो ी के बहाने उ राखड क या ा. इसी माह क तेरह तारीख को म उ राखड से वािपस लौटा ह. उ राखड जाने का काय म अनायास ही नह बना था,बि क यह ायोिजत था. जाखनदेही(अमोडा) के मेरे अपने िम ी उदय िकरोलाजी,जो एक जानदार ैमािसक पि का”बाल-हरी”के सपादक ह,और वष म एक बार रा ीय बाल सगो ी का काय म उ राखड के िकसी खास थान पर आयोिजत करते ह. ऎसा करने के पीछे उनका मकसद होता है िक यादा से यादा स या म बाल-सािहयकार वहाँ आए और अपनी रचनाधिमता के साथ-साथ पयटन का भी आनद उठाए. जन २००९ क तेरह-चौदह तारीख को उहने अपना काय म भीमताल(नैनीताल) म रखा और मझे िनमण-प भेजने के साथ ही फ़ोन पर भी आह िकया िक म वहाँ पहँच. भीलवाडा(राजथान) के मेरे अिभन िम , जो मािसक पि का” बालवािटका” के सपादक है, का फ़ोन आया और उहने भी वहाँ साथ चलने का आह िकया था. इस तरह मझे यह सौभाय ा हआ िक म नैनादेवी के दशन लाभ उठा सका. इस या ा म मेरी धमपिन ीमती शकतला यादव भी साथ थ. सन २००९ के बाद से म नीिज कारणॊं से, िकरोलाजी के काय म म नह जा पाया था. उहने सन 2010 म मसरी, 2011 म जोशीमठ तथा २०१२ म अमोडा जैसे पिव एव जग िस पयटन- थल पर काय म िकए थे. इस वष उहने अपना काय म उ रकाशी म रखा. िनमण-प िभजवाया,साथ ही फ़ोन पर आने का आह भी िकया था. मने अपने कछ िम को साथ चलने को कहा. दो िम ी आर.एम.आनदेव तथा ी डी.पी.चौरिसयाजी जाने को उत हए. काय म क परेखा बनाते समय हमने तय िकया िक यमनो ी-गगो ी- केदारनाथ तथा बदरीनाथजी क भी या ा करगे. इस तरह िछदवाडा से िदली के बीच ितिदन चलने वाली पातालकोट एस ेस से हमने अपनी-अपनी सीट आरि त करवायी. इस बार मने अपने चौदह वषय पोते ी दयत को भी साथ ले जाने का मानस बनाया िक वह पयटन के साथ-साथ काय म म भाग ले सके . या ा म म आिशक परवतन करते हए मने हर ार-देहरादन तथा मसरी को भी जोडा और इस तरह हम िछदवाडा से दो जन को रवाना हए. तीन जन को हम सराय रोिहला टेशन पर सबह आठ बजे पहचे. वहाँ से बस ारा ह र ार शाम छः बजे पहचे. शाम के व ही गगाजी म नान िकया, यिक दसरे िदन सबह हम देहरादन के िलए िनकलना था. गगाजी म इस समय बाढ चल रही थी. थानीय लोग ने बतलाया िक ऊपर खब पानी बरसा है. तयशदा काय म के अनसार ी गगजी भी अपने प रवार के साथ देहरादन पहँचने वाले थे. हम लोग 5 जन को देहरादन से सबह साढे पाच बजे क बस से यमनो ी के िलए िनकले. यमनो ी यहाँ से लगभग 273 िक.मी. क दरी पर अविथत है. पहाडी इलाके से ाय़ः सभी बस इसी समय रवाना होती है, यिक एक तो रा ते का चौडीकरण का काम चल रहा है और दसरा रा ते म अधे मोड भी आते रहते है. रा ता पहाडॊं क ढलान से सटकर चलता है. हजारॊं फ़ट गहरी खाईय़, घने जगल के बीच रगती हमारी बस धीरे-धीरे आगे बढ रही थी. बडकोट से टै सी लेकर हम लोग दो बजे के करीब जानकच ी पहँचे. जानक च ी से से यमनो ी के िलए एकदम सीधी खडी चढाई 5 िकमी.क है. हम चाहते तो उसी िदन माँ यमना के उम थल के दशन कर सकते थे. लेिकन बारश के चलते, हमने उसे अगले िदन के िलए टालना ही उिचत समझा और पास के बने एक मकान को िकराए पर उठाया और राि िव ाम िकया. इसी मकान के पास ी तरपनिसह राणा (मोबाईल नबर 09411363167-09012863957) क होटल है. शाम क चाय और रा ी का भोजन हमने यह िकया. बात ही बात म पता चला िक उसके पास चार खचर है और वह सात सौ पया ित खचर के दे सकता है. यिद इससे यादा खचर चािहए तो वह हम उपलध करवा देगा. एक तो रात भर बारश होती रही.ऎसे समय म रा ता िफ़सलन भरा हो जाता है और िफ़र सीधे खडॆ पहाड पर चढना हम जैसे उ दराज लोग के िलए तो एकदम असभव सा है. चार बजे जगा िदया था,लेिकन नस-नस म आलस भरी हई थी और आँख थी िक खल नह पा रही थी. इसके पीछे म य कारण यह रहा िक हम एक अजनबी जगह पर थे और शाम चार बजे के बाद से कमर म िबजली नह थी. िकसी तरह मोमब ी जलाकर क रे को रोशन करते रहे थे. िफ़र कमरा भी हवादार नह था. िकसी को भी चैन क नद नह आयी थी. िकसी तरह पाच बजे हम तैयार हो पाए और चाय लेकर िनकल भी नह पाए थे िक चार खचर तैयार खडॆ थे. तीन खचर हम लोगो के िलए थे और एक ी गगजी के िलए था. भाभीजी के िलए िप क यावथा क गई थी. शेष सद य ने पैदल चलकर या ा करने का मानस बना िलया था. खचर पर बैठना भी िकसी तपया से कम नह होता. शरीर को उसक चाल के अनसार साध कर रखना होता है और िजस से लगे हक को मजबती से पकड कर रखना होता है. कमर से ऊपर के भाग को सामने क ओर झकाकर बैठना होता है, यिक खचर ऊपर क ओर चढ रहा होता है, ऎसा िकए जाने से सवार को बैठने मे आसानी होती है और सतलन भी बना रहता है. खचर सवार को इस बात का भी यान रखना होता है कोई च ान सर के ऊपर तो नह आ रही है. जरा सी भी असावधानी, िकसी बडी दघटमा को अजाम दे सकती है. अतः यहाँ सावधानी बरतना तथा चौकस रहना अित आवयक है. जैसे-जैसे हम आगे बढते ह, कित के पल-ितपल बदलते अ त सदय को देखकर मन खश हो जाता है. चार तरह आसमान से बात करती पवत ेिणयाँ, रग-िबरगे पेड, कह पहाडॊं क कोख से फ़टकर िनकलता झरना, पहाडी गीत सनाने लगता है. अपने वेग म इठलाती, बलखाती, शोर मचाती, छोटी-बडी च ान से कदती-फ़ादती यमना जी का अ त प देखकर मन, न जाने िकस नयी दिनया क ओर उडा चला जाता है. कई घमावदार –तेढे-मेढे रा त से गजरते हए हम कब यमनो ीजी के करीब पहँच गए थे, पता ही नह चल पाया. एक िनि त दरी पर सारे खचर रोक िदए जाते ह और अब यि य को पैदल चलते हए पल पार करना होता है. रा ते म जगह-जगह साद बेचने वाल क दकाने सजी होती है. या ी पजा क साम ी लेकर आगे बढता है. देवी के दशन से पहले नहाना जरी होता है. ऊपर गरम पानी का कड है,िजसम से भाप िनकलते देखा जा सकता है. शरीर के पोर-पोर म जमी ऎठन और ठडक पानी म उतरते ही रफ़चकर हो जाती है. या ी यहाँ जी भर के अपने शरीर को गरम पानी से गमाता है और िफ़र कपडॆ बदलकर माँ के दशनाथ आगे बढ जाता है. यहाँ पष और मिहलाओ के नहाने क अलग-अलग यवथा बना दी गई है. माँ यमना के दशन कर या ी कताथ हो उठता है. मिदर के समीप ही सयकड है,िजसमे भ गण चावल क पोटली डालकर, उसके पक जाने का इतजार करता है और पके हए चावल को साद के प म हण करता है. यह धाम सम सतह से 10,800 फ़ट क ऊँचाई पर िथत है. आसपास के सभी पवत िशखर िहमा छािदत ह. दगम चढाई के कारण ाल इस उम थल को देखने से विचत रह जाते है. अतः मिदर का िनमाण ऎसी जगह िकया गया है, जहाँ आम आदमी आराम से पहँच सकता है. इसी लेिशयर से माँ यमना िनकलती है और अपने परे वेग से साथ नीचे उतरती ह. गढवाल िहमालय क पि म िदशा म उ रकाशी िजले म िथत यमनो ी चारधाम या ा का पहला पडाव है. यमना नदी का ोत, कािलदी पवत पर है. यमनो ी का वा तिवक ोत बफ़ क जमी हई एक झील और िहमनद चपासर लेिशयर है. यमनो ी मिदर परसर 3235 मी.ऊँचाई पर िथत है. मिदर ागण म एक िवशाल िशला तभ है,िजसे िदयिशला के नाम से जाना जाता है. माह मई से अटबर तक यहा या ा क जा सकती है. शीतकाल म यह थान पणप से िहमा छािदत रहता है. मोटरमाग का अितम िबद हनमान च ी है. हनमान च ी से मिदर तक 14िक.मी.पैदल चलना होता था िकत अब हलके वाहन से जानकच ी तक पहचा जा सकता है,जहाँ से मिदर मा पाच िक.मी.दर रह जाता है. पाँच िक.मी.तक का यह रा ता घमावदार एव सीधी खडी चढाई वाला है, िजसे खचर,िप क सहायता से अथवा पैदल चलते हए जाया जा सकता है. देवी यमनाजी के मिदर का िनमाण िटहरी गढवाल के महाराजा तापशाह ारा िकया गया था.यमना के जल क श ता,एव पिवता के कारण भ जन के मन म इसके ित अगाध ा और भि उमड पडती है. पौरािणक मायता के अनसार अिसत मिन क पणकटी इसी थान पर है. देवी यमना के मिदर तक क चढाई का माग सकरा, दगम और रोमािचत कर देने वाला है. माग के अगल-बगल म िथत गगनचबी, मनोहारी,बफ़ से ढक चोिटयाँ ,घने जगल क हरितमा याि य का मन बरबस ही मोह लेती है. यमनो ी मिदर के आसपास के े म अनेक गमजल के सोते ह. इन सोत म सबसे िस कड “सयकड” है,जो अपने उचतम तापमान के िलए िव यात है. भ गण इस कड म चावल क पोटली,जो साद आिद के साथ सहज म ही उपलध हो जाती है,इसी कड के गरम पानी म डालकर पकाते ह और उसे साद के प म हण करते ह. सयकड के समीप ही एक िदयिशला है. इसे योितिशला भी कहते ह. माँ यमना क पजा से पहले इस िशला क पजा करने का िनयम है. ीमकाल के िदन सहावने और रात काफ़ सद रहती है. यहा का यनतम तापमान 5 िड ी..तथा अिधकतम 20 िड ी.तक रहता है. दशन के बाद या ी होटल म चाय-ना ते के िलए कता है. खचर वाले इस इतजार म रहते ह िक कब उसका सवार वािपस आता है और वह वािपस हो सके . वापसी क या ा यादा खतरनाक हो उठती है, यिक अब खचर को नीचे उतरना होता है. खचर वाले पहले से आगाह कर देते ह िक सवार अपने शरीर को पीछे झकाकर बैठे और पीछे लगे हक को कसकर पकड ले.. यिद सवार असावधान रहा तो उसके िसर के बल िगरने के यादा आसार होते ह, ऊपर चढने वाले खचर का रैला, पैदल चढाई करने वाले याि य के झड और झक हई च ान को भी यान म रखना होता है. कभी-कभी थॊडी सी भल अथवा असावधानी से जाम लग जाता है.,िजससे या ा म घटॊं बरबाद होते ह. अतः यहाँ चौकस और सावधान रहना अयत आवयक होता है. आसमान यहाँ हमेशा बादल से अटा पडा रहता है. कब बारश हो जाए और कब हवा, तफ़ान का ख अ यार कर ले,कहा नह जा सकता. अतः याि य को चािहए िक वह अपने साथ बरसाती अथवा छाता लेकर जर चले. गनीमत थी िक हमारे साथ ऎसा कछ भी नह हआ और हम दोपहर दो बजे के करीब अपने िठकाने पर वािपस आ गए थे. राणा के अथायी होटल म हम आकर बैठे ही थे िक बादल ने अपने रग िदखाने श कर िदए और बदा-बादी होने लगी, तब से लेकर सारी रात, बारश रमिझम के तराने गाती रही. िबजली यहा कभी-कभार ही आती है. साझ ढलते ही काला-कलटा अिधयारा, कडली मारकर चहओर पसर गया था. िदन म बहत ही खबसरत िदखाई देने वाली बफ़ली चोिटयाँ अब डराने से लगी थी. हवा भी चल िनकली थी, अपने साथ बफ़ली ठडक िलए हए. यहाँ आने वाले याि य को चािहए िक वह अपने साथ ऊनी कपडॆ लेकर जर चल राणाजी के चहे के आसपास बैठकर हम अपने शरीर को गरमा रहे थे. भख भी अब जोर से लग आयी थी. राणा को हमने टमाटर क खी-मीठी सजी बनाने को कहा. तवे से उतरती गमा-गरम रोिटया और टमाटर क सजी खाने म बडा मजा आ रहा था. रात काफ़ बीत चक थी. अब हम आराम करने क जरत थी और सबह पाच बजे उठना भी था यिक रा य प रवहन क बस सबह साढे पाच बजे उ रकाशी के िलए रवाना होती है. आगे क या ा परे सात घटॊं क थी. याि य क स या देखकर पहले से िटकट लेकर अपनी सीट आरि त करना जरी लगा था हम, तािक आगे क या ा आराम से कट सके . “सबह जदी उठना है” के च कर म रात बेचैनी म कटी. बारश अब भी अपने परे शबाब पर थी. पहाडी इलाक के चलने वाले बस सबह ही रवाना हो जाती है. यिक रा ता पहाडॊं को काट कर बनाया गया है जो अयिधक ही सकरा होता है और दसरा यह िक रा ते म अनेक घमावदार मोड भी आते ह. अतः दोपहर दो बजे के बाद कोई भी बस यहा से रवाना नह होती. यिद रवाना भी होती है तो बड़कोट पर आकर क जाती है. हाँ, टै सी वाले जर िमल जाते ह ,लेिकन इसम खतरे है, अतः याि य को चािहए िक वह जदबाजी के च कर म न पडॆ,तो बेहतर है.. िदनाक 7 जन -दोपहर दो बजे के लगभग हम उ रकाशी आ पहँचे. हमारे कने क यवथा पजाब-िसध धमशाला म क गई थी. कहने के िलए वह धमशाला थी, लेिकन िकसी ी- टार होटल से कम न थी. उस धमशाला क दीवार, ठीक गगाजी के तट कॊ छती हई थी. कमरे के सामने बचे लगा दी गई थी, जहाँ से बैठकार आप गगाजीके दशन आराम से कर सकते ह. करीब तीन सौ मीटर नदी का पाट रहा होगा. गगा मे इस समय बाढ आयी हई थी,सो उसक गजना क आवाज सनकर भय क तीती होती थी.(फ़ोटॊ-६) शाम चार बजे से काय म श होना था. नहा-धोकर हम काय म म शरीक होने के िलए पहँचे. काय म यिनपल के बडॆ हाल म होना था, जो इस जगह से थॊडी दर पर ही अविथत था. क.गरीमा िकरौला, मज रावत,िजया, खजानिसह एव देवाशीष ने हमारा वागत िकया. हमने अपना पजीकरण कराया और ठीक साढे चार बजे बाल-काय गो ी का दौर श हआ. इसमे करीब तीस बच ने काय-पाठ िकया. डा. ी. रामिनवास मानवजी क अय ता एव डा ी हरशच बोरकर, ी गोिवद भार ाज,एव डा टर ी भलालजी गग क गरीमामय उपिथित म इस काय म क शआत हई,िजसका सचालन वय ी उदय िकरौला ने िकया. “बाल सािहय म बाल पि काओ का योगदान” िवषय पर डा.गगजी ने अपना उ ोधन िदया. दसरे िदन अथात िदनाक 8 जन को सबह नौ बजे पहले स म वागत सबोधन के साथ लाइड शो(अब तक क या ा) के मा यम से बालहरी के िविभन काय म क तित दी गई. दस बजे-बाल सािहय म िव ान लेखन”िवषय पर पैनल ारा खली चचा आयोिजत क गई. ी गवचनिसह क अय ता एव ी राजीव ससेना, डा उमेश चमोला, ी िवणसाद चतवदी क गरीमामय उपिथित म इस काय म क शआत हई. दो बजे “बाल िव ान कहानी िव े षण”पर ी एसपी.सेमवाल, डा.मोहमद अशद,डा.महावीर रवा टा क उपिथित म बाल कहािनय पर िवतार से चचा क गई. इस काय म का सचालन ी मोद पै यली ने सफ़लतापवक िकया. शाम चार बजे” बाल िव ान किवता िव े शन” के अतगत डा परशराम शल, ी रमेश तैलग,रा ेश उ साही क उपिथित म इस िवषय पर ी घमडीलाल अवाल,डा. शेषपाल शेष,अिखलेश िनगम,देश ध शाहजहापरी, ने अपनी किवताओ का वाचन करते हए उसे िव े िषत िकया. शाम पाच बजे डा. मध भारती क अया ता म तथा डा ी अशोक गलशन, ी मरलीधर पाडॆय, ी अि नी पाठक क गरीमाय उपिथित म का यपाठ का आयोजन हआ. इस काय म का सफ़ल सचालन ीमती मज पाडॆ तथा डा.दीपा काडपाल ने िकया. तीसरे िदन अथात िदनाक नौ जन को सबह नौ बजे “ बाल सािहय का िश ण” िवषय पर डा. ीतम अप याण, मनोहर चमोली एव रेखा चमोली क उपिथित म बच ने क ा के अनभव पर खली चचा क. समान एव समापन स म डा. रा बध जी क अय ता म यायिवद ी मरलीधर वै णव , ीमती िवमला भडारी, डा.अमरे िसह, ी खजानिसह क उपिथित म डा. शेषपालिसह शेष, डा.मध भारती, ी गोिवद भार ाज,डा, महावीर रवा टा, डा. ी परशराम शल, डा.िवमला भडारी, डा,मोहमद अरशद खान,, ी आशीष शला, डा.घमडीलाल अवाल, एव ी मनज चतवदी”भारत” का शाल , ीफ़ल एव ,सथा का मित-िचह देकर समानीत िकया गया एव अय िवतजनॊं को मित-िचह दान िकए गए. काय म क समाि के बाद हमारे पास कल देढ िदन का समय बचा था. हमारा वापसी का िटिकट सराय रोिहल(िद ली) से िदनाक 11 जन का था और इस बीच हम गगो ी और केदारनाथ भी जाना था. इतने कम समय म केवल एक थान पर ही जाया जा सकता था. अततः यह तय हआ िक गगो ी क या ा क जा सकती है. केदारनाथ क या ा सभव नह लग रही थी. हमारे पास केवल एक उपाय शेष था िक िकसी तरह िटिकट कसल होकर आगे क ितिथ क हो जाए, तो केदारनाथ भी जाया जा सकता है. अतः हमने आठ तारीख को कले टोरेट जाकर िटिकट िनरत कराने और नया िटिकट तेरह तारीख क जारी करवाने क सोची..सनद रहे िक उ रकाशी म रेललाईन न होने क वजह से वहा कोई िटिकटघर नह है अतः िटिकट जारी नह क जा सकती थी. इस सम या को हल करने के िलए कले टोरेट म अितर यवथा क गई है. लेिकन उस िदन दसरा शिनवार होने के नाते कायालय बद था. अतः हमारी योजना पर पानी िफ़र गया. अब केवल एक चारा बचा था िक हम तकाल ही गगो ी के िलए रवाना हो जाना चािहए. काय म क समाि के बाद हमारे सारे िमगण टै सी लेकर रवाना हो चके थे. टै सी के िलए कम से कम दस सीटॊं क आवयकता होती है. लेिकन हम केवल तीन लोग थे. और हम कम से कम सात लोगो के साथ क जरत थी. सयोग से ीमती मज पाडेजी, के प मे उनके अितर चार मिहलाए और थ,िजह गगो ी जाना था,का साथ िमल गया और इस तरह हम गगो ी के िलए िनकल पडॆ.(फ़ोटॊ-७) उ रकाशी से गगो ी क दरी 172 िकमी.है. भटवारी,झाला, लका और भैरघाटी होते हए गगो ी पहचा जा सकता है. अमनन इस रा ते को पार करने म कम से कम सात घटे का समय लगता है. या ा क शआत से लेकर भागीरथी, हमारे साथ चलती रहती है. कभी आँख से ओझल हो जाती है िफ़र थॊडी देर बाद कट हो जाती है. पहाडॊं क अनवरत खला भी हमारे साथ –साथ चलती रहती है. लेिकन आज वे उदास ह. पहाडॊं का अयतम िम व ही होता है,जो आज िवल होने क कगार पर है. व िवहीन पहाडॊं पर छाई उदासी को देखकर मन म अपार पीडा होती है भीमकाय जेबीसी मशीन उनक छाती को छील रही होती है. जगह-जगह पर पथर-िम ी.के ढेर आवागमन म बाधा बनने का कारण बनते ह. पैसा कमाने क होड म लोगो ने सडक तक अपने मकान को फ़ैला रखा है और तो और उन लोग ने पहाड क ढलान पर से िसमट-का ट के िप लर खडॆ करके अपने सा ा य खडॆ कर िलए ह. िवकास के नाम पर यिद इसी तरह का दच चलता रहा तो एक िदन हम िवनाश को रोके , रोक नह पाएगे. उ राखड का स िस तीथ गगो ी है,जो गगाजी का उमथल है. यहाँ गगो ी म गगा का नाम भागीरथी है. भागीरथ ने यहाँ रहकर गगाजी को सन करने के िलए किठन तप िकया था .इसिलए इस थान से बहने वाली गगाजी का नाम भागीरथी पडा. गगो ी धाम 10,300 फ़ट क ऊँचाई पर िथत है. वा तव म भागीरथी का उम, गगो ी से भी तीस िकमी आगे ऊपर क ओर गोमख म है, जहाँ अयत िवतत िहमनद के नीचे से भागीरथी का जल वािहत होता है. गोमख तक पहच पाना इतना आसान नह है. इसिलए गगाजी का मिदर ऎसे थान पर बनाया गया है जहा आम आदमी आराम से पहँच सकता है. यहा का जल अयिधक वछ होता है गगो ी म ीमती मजजी पाडॆ के परिचत गजी प. ी िदनेश सादजी ने डालिमया मगलम िनकेतन”नामक अपना भवन बना रखा है,िजसमे उनके िशयािद आकर कते ह. उहने राि म िव ाम करने के िलए कमरे खोल िदए. यह हमारा सौभाय ही था िक हम यहा कने क उ म यवथा िमल गयी,अयथा उस िदन क अयिधक भीड के चलते हम इतनी आरामदायक जगह क कपना तक नह कर सकते थे. यह भवन गगाजी के दसरे छोर पर अविथत है,जहा से बैठकर आप मिदर के दशन कर सकते ह. राि म ही हमने मा गगाजी के दशन िकए. वह तट पर बने होटल म िचकर भोजन का आनद िलया. राि म िव ाम िकया और बडी सबह हम उसी टै सी से उतरकाशी के िलए रवाना हो गए. उ रकाशी से गगो ी जाना और वहा से वापसी के िलए हमने पहले से एक टै सी को बक कर रखा था.उ रकाशी आकर कना हम उिचत नह लगा, यिक हमारे पास समय क बेहद कमी थी. यिद हम वहाँ क भी जाते तो िकसी भी कमत पर सराय रोिहला(िदली) नह पहँच पाते. सराय रोिहला से िछदवाडा वापसी क ेन िदन के साढे बारह बजे खलती है. अतः हमारा ऋिषकेश तक पहँचना बहत जरी था. वहाँ से हम िदली क ओर थान करने वाली बस िमल सकती थी. मजजी एव उनक िम मडली उ रकाशी म कते हए यमनो ी के दशनाथ जाना चाहती थ. लेिकन मजजी क तिबयत अचानक खराब होने लगी और उहने अपना काय म िनरत िकया और हमारे साथ ही ऋिषकेश तक चलना उिचत समझा. यहाँ आकर उह ह ानी जाने के िलए बस िमल सकती थ. अतः हमने टै सी वाले से बात क और वह िकसी तरह तीन हजार पाच सौ पय म ऋिषकेश तक चलने के िलए राजी हो पाया था. रात के बारह बजे के करीब हम लोग ऋिषकेश के बस-टै ड पर पहचे. बस से उतरते ही मजजी को ह ानी क ओर जाने वाली बस िमल गई और हम िदली क ओर थान करने वाली बस. सबह पाच बजे हम िदली के बस-थानक पर पहचे. अब हमारे पास पया समय था,जब हम अपनी ेन आराम से पकड सकते थे. तेरह तारीख को दस बजे सबह हम अपने घर पहँच गए थे. िनि त ही यह या ा,अपने आप म एक रोमाचक या ा थी. ेन से ितविनत होती छक-छक क आवाज, टेशनो पर उतरते और सवार होते नए-नए या ी के साथ या ा करना, उनके सख-दख म शािमल होना, कछ अपनी बताने और कछ उनसे सनने क लगन, चाय-और ना ते के िलए गहार लगाते वैडर क आवाज कानॊं म अब भी गज रही थी. ेन से उतरकर बस अतवा टै सी पकडकर आगे क या ा क तैयारी करना, रा ते म अजनबी पहाडॊं से होती मलाकात, िवशालकाय पेडॊं से झरती ठडी-ठडी हवा के झक म सराबोर होते थे हम लोग .इन सब के चलते न जाने िकतना समय बीत गया, ,इसक ओर तिनक भी यान नह गया. एकदम नयी-िनराली दिनया,दिनया म तरह-तरह के लोग, अलग-अलग देश से आए हए लोग,जो सवथा अनजाने होते ह,को देखना-समझना अछा लगता था. िफ़र हमारा प रचय होता है अजनवी शहर से, िजसे हमने इससे पव कभी देखा तक न था. वहाँ के मिदर से और एकदम अपरिचत सडक और गिलय से, काय म म िमलते अपने िचर-परिचत सािहयकार से, इनम कछ एकदम नए भी होते थे ,िजनक रचनाए हमने कभी िकताब-पि काओ म पढा था, एक दसरे से परिचत होते,िमलते, क ा चौथी पाचव म पढते किवता सनाते बचे, इसी म म किवता पढता और वाहवाही बटोरता, मितिचह लेता समािनत होता मेरा अपना यारा पोता दयत, काय म क समाि के बाद िफ़र आता एक िबखराव का दौर. सब अपने-अपने रा ते पर चल िनकलते. इन सबके साथ िबताए गए पल रह-रह कर याद आते रहे. याद आती रही हर ार म उफ़नती-तेज बहाव म बहती पितत पवनी गगाजी,िजसम हम, साझ ढले नान करने पहँचे थे. बहते पानी क गित इतनी तेज थी िक पाव जमीन पर िटक नह पा रहे थे. रौ प िदखाित, जोर से गरजत उफ़नदी गगा शायद अपना दखडा सना रही थी िक उसके साथ, ये दो पैर का आदमी िकतनी तकलीफ़ दे रहा है उसे, शायद हमारे कान सन नह पा रहे थे या हम सन पाने क िथित म नह थे. मन म तब एक ही कपना साकार हो रही थी िक इसके उम का वप कैसा होगा िजसे हमने, इससे पहले कभी देखा था और न ही सना था, िजसे हम िनकट भिव य म देखने जाने वाले थे. िफ़र मलाकात होती है उ रकाशी म िथत पजाब-िसध धमशाला क भय इमारत से सटकर बहती हई गगा से. तब जाकर इसका दख-दद समझ म आया िक गगा हर ार म या कहना चाहती थी. दखडॆ क कहानी यहाँ आकर कती नह है,बि क उ रो र उस ओर बढते हए देखा और जाना िक िकतना अयाचार मचा रहा है, तथाकिथत नयी टे नोलाजी का ाता आज का आदमी. िवकास के नाम पर िवनाश क लीला रचता, पहाडॊं क छाती छोलकर सडक का िनमाण करता, नदी का ख मोडता, बा दी सरगे िबछाता आज का आदमी शायद िवकास के नाम पर िवनाश के बीज बोता आज का आदमी. नदी-पहाडॊं क सनी-अनसनी कर भी द तो उसने अपना सा ा य बढाते हए देवता के मिदर तक अपने पैर जमा िलए ह. समझ म नह आा िक हम मिदर के ागण म ह या िफ़र िसमट-का ट के घने जगल म? िकतने सपने- और न जाने िकतनी ही सकोमल भावनाए लेकर हम वहाँ जा पहँचे थे,जहाँ असीम शाित क जगह, शहर सी कोलाहल थी, भीड थी और मोटर-गािडय का जमावडा था, बडी-बडी अािलक म ऎश-ओ आराम क सख-सिवधाए पयटकॊं को लभाने के िलए जगमगा रही थी. म इस बात पर भी गभीरता से सोचने के िलए िववश हो गया िक जब हम घर से चले थे तो मन म एक सोच थी िक हम देव के देव महादेव क ससराल जा रहे ह, जहाँ जाकर हम असीम सख क तीती होगी, और हम देखने को िमलेगा मा यमना और गगा का अपना मायका, जहाँ वे बडॆ दलार और यार के साथ पली-बढ और पहाडॊं से उतरकर चल पडी मैदानी इलाको क ओर, तािक वे जन-जन क पालनहार बन सक. लेिकन दभाय िक उनक अि मता अपने ही घर के आगन म नच-खरच कर तार-तार कर दी गई. सोच का यह िसलिसला अभी थमा भी नह था िक माह जन क प ह तारीख क सबह, इतनी र और भयानकप से सामने आयी िक गसाई गगा ने रौ प धारण कर िलया और काली क तरह अपना िवकराल प िदखलाते हए सब कछ लीलते जा रही है.- उसने सब कछ मिटया-मेट कर िदया,जो उसके बहाव म अपने पैर गडाए हए थे. उसके इस ोध के चलते न जाने िकतने ही िनद ष भ क भी उसने बिल ले ली. शायद हमारे सबके िलए यह उसक ओर से एक चेतावनी मा थी,िक समय रहते सभल जाओ,अयथा और भी भयकर परणाम के िलए तैयार रहो. अब यह समय, उस आदमीके िलए, सोचने-समझने और िवचार करने का िवषय है तो िवकास के बड़े-बड़े सपने देखते हए मगेरीलाल बना घम रहा है. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 6 ीसगढ का खजराहो- भोरमदेव \ मय देश के उ रीय भाग म पना एव छतरपर के मय िथत “खजराहो”, १० व एव ११ व शता दी म बने िहद मिदर के िलए िव िव यात है. मिदर के दीवाल पर उकण मैथनरत ितमाएँ हमेशा से उसकता के के म रही ह. इह देखने के िलए लाख पयटक यहाँ पहँचते ह. ठीक इसी तज पर कवधा(छ ीसगढ) से लगभग १७ िक.मी.पव क ओर मैकल पवत खला पर िथत ाम छपरी के िनकट चौरागाँव नामक गाँव म िथत है. छ ीसगढ का खजराह कहा जाने वाला “भोरमदेव” मिदर, न केवल छ ीसगढ अिपत समकालीन अय राजवश क कला शैली के इितहास म भी अपना महवपण थान रखता है. भोरमदेव के बारे म काफ़ कछ म सन चका था और उसके बारे म पढ भी चका था, लेिकन कभी इस बात का याल मन म नह आया िक समय िनकालकर इसे देख आऊँ .और न ही कभी सोच पाया था िक भिव य म कभी वहाँ जा भी पाऊँगा. सयोग से मझे वष २००२ म मोशन िमला और म कवधा मख डाकघर म बतौर पो टमा टर (H.S.G.1) के पदथ हआ. मन के कोने-अतरे म दबी लालसा बलवती हो उठी, इस अनपम कित को अपनी आँख से जी भर देखने क. रिववार चिक डाकघर बद रहता है, और इससे अछा मौका और दसरा हो नह सकता था. मने अपने िम ी लमीकात ठाकर से फ़ोन पर सपक साधा और उह कवधा आने का िनमण िदया. वे उस समय दग के धान डाकघर म पो टमा टर के पद पर कायरत थे. इस तरह हमने छ रपर के खजराहो नाम से िव यात” भोरमदेव” के दशन का लाभ उठाया. ११व शता दी के अत म( लगभग १०८९ ई.) िनिमत इस मिदर मे शैव, वै णव एव जैन ितमाएँ भारतीय सकित एव कला क उकता क परचायक है. इन ितमाओ से ऎसा तीत होता है िक धािमक व सिहण राजाओ ने सभी धम के मतावलिबय को उदार य िदया था. िकवदती है को गड जाित के उपा य देव भोरमदेव( जो िक महादेव िशव का एक नाम है) के नाम पर िनिमत कराए जाने पर इसका नाम “भोरमदेव” पड गया और आज भी इसी नाम से िसद है. मिदर क थापय कला शैली मालवा क परमार शैली क ितछाया है. छ ीसगढ के पव मयकाल(राजपत काल) म िनिमत सभी मिदर म “भोरमदेव” सव े है. िनमाण योजना एव िवषय वत म सय मिदर कोणाक एव खजराहो के मिदर के समान होने से इसे छ ीसगढ का खजराहो भी कहा जाता है. इस मिदर का िनमाण, ी लमण देव राय ारा कराया गया था. इसक जानकारी वतमान मढप म रखी हई एक दाढी-मछ वाले योगी क बैठी हई मित, जो ०.८९ से.मी. ऊँची एव ०.६७ से.मी. चौडी है, पर उकण लेख से ा होती है. इसी ितमा पर उकण दसरे लेख म, कलचरन सवत ८४० ितिथ दी हई है. इससे यह जानकारी ा होती है िक यह मिदर छठे फ़िण नागवशी शासक ी गोपालदेव के शासन म िनिमत हआ था. िकत मडवा महल से ा िशलालेख म राजा रामच ारा िनमाण होना बताया गया है. चिक यहाँ फ़िणनाग वश के नागवशी राजाओ ने लबे काल तक रा य िकया, जो कलचरय के अिधस ा को वीकार करते थे. लबी वशावली म सवथम अिहराज राजा से नागवश क शआत हई. िशलालेख से यह प होता है िक अतकन क अनपम सदरी प ी मैिथला का एक नागराज से ेम हआ था और इनसे उपन प अिहराज से वश क शआत हई. पवािभमखी तर िनिमत यह मिदर,नागर शैली का सदर उदाहरण है. मिदर म तीन वेश ार ह- मख ार पव िदशा क ओर, दसरे का मख दि ण क ओर और तीसरा, उ रािभमखी है. इसम तीन अध-मडप, उससे लगे अतराल और अत म गभगह है. अधमडप का ार शाख व लता-बेल से अलकत है. ार शाख पर शैव ारपाल, परचारक,-परचारका दिशत है. मडप के तीन िदशाओ के ार के दोन ओर पा म एक-एक तभ है, िजनक यि अ कोणीय हो गई है. इसक चौक उ ट िवकिसत कमल के समान है, िजस पर कचक बने हए ह, जो छत का भार थामे हए ह. मडप म कल १६ तभ ह, जो अलकरणय ह. मडप क छत का िनमाण तर को जमाकर िकया गया है. छत पर शतदल कमल बना हआ है. मिदर १५३ मीटर ऊँचे अिध ान पर िनिमत है. इसक लबाई १८१३ और चौडाई १२२० मीटर है. गभगह का मँह पव क ओर है तथा धरातल १.५० मीटर गहरा है. इसके ठीक बीच म िशविलग िति त है. छत के ऊपर शतदल कमल बना हआ है. गभगह म पचमखी नाग ितमा, नय गणपित क अ भजी ितमा, यानमन राजपष क प ासन म बैठी हई ितमा, उपासक दपि ितमा िव मान है. मिदर के किटभाग क बा िभि याँ अलकरण य ह. किटभाग म देवी-देवताओ क ितमाए उक ण है,िजसमे िवण, िशव, चामडा, गणेश आिद क सदर ितमाए उ लेखनीय है. मिदर के जघा पर कोणाक के सय मिदर एव खजराह के मिदर क भाित सामािजक एव गहथ जीवन से सबिधत अनेक िमथन य तीन पि य म कलामक अिभ ाय समेत उके रे गए ह, िजसके मा यम से समाज के गहथ जीवन को अिभय करने का यास िकया गया है. िमथन मितय का यहाँ बाहय है. इन ितमाओ म नायक-नाियकाओ, असराओ क ितमाए अलकरण के प म िनिमत क गई ह. दिशत िमथन मितय म कछ सहज मैथन िविधय का िच ण तो हआ है, कछ का पिनक िविधय को भी िदखाने का यास िकया गया है. पष नतक-नारी नतिकय से यह आभास होता है िक दसव- यारव शता दी मे इस े के ी-पष नयकला म िच रखते थे. मजीरा, मदग, ढोल, शहनाई, बासरी एव वीणा आिद वा-उपकरण मितय के ारा बजाए जाते हए दिशत हए ह.मिदर के प रसर म स िहत ितमाओ म िविभन यो ाओ एव सती तभ मख ह. मैथनरत मितय को देखकर ,पयटक काफ़ रस लेकर, तरह-तरह क बात करते देखे जा सकते ह. उह सनते हए लगता है िक वे िबना कछ सोचे-समझे अपने तक-कतक देने म मगल होते ह,जबिक भारतीय मनीषा ने कभी भी काम को सव चता नह दी है, बि क अपनी कलाकित के मा यम से यह समझाने का यास िकया है िक “काम” केवल एक बाहरी उ े ग है, उसके हटते ही आप ई र से अयत ही अपने आपको िनकट पाते ह. शायद यही कारण है िक ये मिदर चाहे खजराहो के ह अथवा भोरमदेव का मिदर, इनके बाहरी बनावट पर इसे आप देख पाते ह,जबिक भीतरी पत म इसका िनशान तक देखने को नह िमलता. भोरमदेव मिदर के उ र क ओर िशवमिदर, दि ण म एक िशवमिदर िजसे मडवा महल के नाम से जाना जाता है,िथत है. पि म क ओर छेरक नामक िशवमिदर है. अगले इतवार को मने कवधा के तकालीन िवधायक ी जोगे रराजिसह से भट क,जो भतपव कवधा रयासत के राजा के बेटॆ ह. यहाँ जाने से पव फ़ोन पर मने अपना परचय देते हए उनसे िमलने क इछा जािहर क थी. उनक वीकित िमलने के बाद मै उस भय राजसाद के प रसर म जा पहँचा,जहाँ उहने आगे बढकर मेरा वागत िकया. महल के भीतरी भाग म घमाया और साथ बैठकर ना ता और चाय का भी आनद उठाया. मलाकात के दौरान उहने कहा था-“ यह पहला मौका है जब कवधा के पो टमा टर मझसे िमलने आए ह” जब-जब भी कवधा क बात होती है, तो मझे वहाँ िबताए गए येक ण क मधर याद ताजा हो उठती है. कवधा का राजमहल ----------------------------------------------------------------------------------------------------7. 7. नाथ ारा (राजथान) म ीनाथजी के िद य दशन 7. झील क नगरी के नाम से जग िस नगर उदयपर से महज 58 िकमी क दरी पर िथत नाथ के नाथ ीनाथजी का भय मिदर अविथत है िजसे बस ारा एक घ टा बाईस िमनट क या ा करते हए पहँचा जा सकता है. 17व शता दी म बनास नदी के भय तट पर इस मिदर को ीभगवान का वेश- ार भी कहा जाता है. उसवि य भ ीनाथजी नाथ ारा म सा ात िवराजमान होकर भ एव गो वामी बालक ारा िनय सेिवत है.. गगसिहता म स िहत एक कथा के आधार पर ीनारदजी राजा बहला को बतलाते ह िक िगरराजजी क गफ़ा के मयभाग म ीहर का वतःिस प कट होगा. भगवान भारत के चार कोन म मशः जगनाथ, ीरगनाथ, ी ारकानाथ, और ीबदरीनाथजी के नाम से पिस ह. नरे र ! भारत के मयभाग म म भी वे गोवधननाथजी के नाम से िव मान ह. इन सबका दशन करने से नर नारायण हो जाता है. नारदजी ने राजा बहला को यह भी बतलाया िक जो िवत पष इस भतल पर चार नाथ के या ा करके मयवत देवदमन ीगोवधननाथजी के दशन नह करता, उसे या ा का फ़ल नह िमलता. जो गोवधन पवत पर ीनाथजी के दशन कर लेता है, उसे पवी पर चार नाथ क या ा का फ़ल सहज म ही ा हो जाता है. जन ित के आधार पर सन 1410 म गोवधन पवत पर ीभगवानजी का बाया हाथ कट हआ, जो ऊपर उठा हआ था, यह इस बात का तीक था िक उहने गोवधन पवत को अपनी ऊगली पर उठा रखा है. िफ़र उनका मख कट हआ. वलभाचायजी का जम 1479 को हआ. इनके जम के प ात ही ीनाथजी क शेष आकित कट हई. इस िदय-आकित के साथ ही दो गाय,एक सप,एक िसह,दो मोर भी कट हए. इन आकितय म एक तोते क भी आकित थी,जो ीजी के मतक पर िवराजमान था. यह वह समय था जब भारतवष पर पजा-पाठ िवरोधी, मित भजक, करपथी औरगजेब शासन कर रहा था. उसक सेना िजस ओर जाती मिदर का िववस करती और मितय को भन करती-िफ़रती. वै णव सदाय के लोग म इस बात को लेकर भय पैदा हो गया था िक िकसी भी समय औरगजेब क सेना का ख इस ओर होगा और वे इस िद य ी का िव ह भग कर दगे. अतः वे इस बात को लेकर िचितत थे िक ीजी को एक ऎसे थान पर ले जाकर थािपत कर द, जहाँ वे सरि त रह सक. भगवान ीकणचदजी ने सपने म दशन देते हए बतलाया िक उनके ीिव ह को बैलगाडी पर मेवाड क ओर ख कर. उहने यह भी बतलाया िक बैलगाडी जहाँ अपने आप क जाएगी, वह उह थािपत कर िदया जाए. इस तरह का सकेत ीिव ह को एक बैलगाडी पर रखते हए उसे प होते ही से ढक िदया गया. ऎसी भी जन ित है िक नटवरनागर ने अपनी भ मीराबाई को वय चलकर मेवाड आने का वादा िकया था. घिसयार होते हए गाडी आगे बढ रही थी िक अचानक बनास नदी पार करते हए बैलगाडी कचड म धस गयी. काफ़ यास करने के बावजद गाडी उस दलदल से नह िनकल पायी. ीजी का आदेश भी था िक गाडी जहाँ से आगे न बढ पाये, उस थान पर उह थािपत कर िदया जाये. ीजी के आदेशानसार मेवाड के तकालीन राजा राणा राजिसहजी ने अपने महल म उह थािपत िकया. ीनाथ ारा म ीजी क आठ पहर पजा-अचना क जाती है,िजसम मगला, गार,राजभोग, उथान,भोग,आरती और शयन आरती क जाती है.लाख क स या म वैणव भ िनय ित आकर आपके िद य दशन कर अपने आपको अहोभागी मानते ह. य तो नाथ रा म ीनाथजी के मिदर म िनय मनोरथ एव उसव होते ह,तथािप उनम से कछ उसव के बारे म सि म जानकारी लेते चल. जमा मी----य तो जमा मी का पव सपण भारतवष म हष लास के मनाया जाता ह.िकत नाथ ारा म बडॆ भारी आनद से यह उसव मनाया जाता है. इस िदन देश-िवदेश से अनेक वै णभ का यहाँ आगमन होता है. ातःकाल मगला-दशन म भ का पचामत होता है,बाद म गार होता है. राि म जागरणदशन होते ह एव मयराि म जम का महोसव होता है. महाभोग म ी भ को छपन भोग लगाया जाता है. जमा मी के दसरे िदन पलना के दशन होते ह. सोने के पलने म ठाकरजी को झलाया जाता है. भ गण वाल-बाल के प म बनकर दध, दही आिद अपणकरते ह. अपार जनसमह इस उसव का दशन कर कतकय होते ह. इसी तरह राधा मी ,नवरा ०-उसव ,दशहरा, शरदपिणमा, दीपावली ,मकरास ाित, वसतपचमी पर अनेकानेक उसव आयोिजत िकए जाते ह. दीपावली म एकादशी से ही ितलकायत के गार आरभ हो जाते ह. धनतेरस को जरी के व ारा भारी गार एव पचौदस को ठाकरजी का अयग होता है. राजभोग म सोने-चाँदी का बगला होता है. दीपावली के िदन सफ़ेद जरी के व एव बहत भारी गार होता है. आज ही के िदन गोशाला से गाय नाथ ारा म वेश करती ह. साय “काह जगाई” होती है एव रतनचौक म नवनीत भ िवराजते ह. अनकट नाथ ारा का सबसे बडा उसव है. दोपहर म गोवधन-पजा होती है. साय अनकट म देढ सौ मन चाँवल का ढेर लगाकर अनकट(िशखर) बनाया जाता है. अनेकानेक कार क साम ी भोग म आती है. काितक क शल ि तीया , गोपा मी पर िवशेष गार होता है. पौष कणनवमी को ीगसाईजी का उसव मनाया जाता है. इस िदन जलेबी िवशेष प से बनाई जाती है. इसे जलेबी-उसव भी कहते ह. फ़ा गन शल पिणमा के िदन ीनाथजी नाथ ारा म पाट पर िवराजते ह. इसी माह क पिणमा को खब गलाल उडाई जाती है. चै कण ितपदा को डॊलोसव का आयोजन होता है. तथा ितपदा के िदन भगवान के पचाग सनाई जाती है. ततीया को गणगौर का उसव तीन िदन चलता है. चै शल नवमी को रामजमोसव मनाया जाता है. बैसाख कण एकादशी को ीमहा भजी का उसव होता है. आज ही के िदन महा भका ा टय च पारय म हआ था. वैशाख शल चतदशी के िदन स या आरती म शाल ामजी को पचामत से नान कराया जाता है. ये शल पचमी को ीजी म नावका मनोरथ होता है. ये शल पिणमा को ठाकरजी को अिभषक करा कर सवा लाख आम का भोग लगाया जाता है. आषाढ शल ि ीया को रथया ा का आयोजन होता है. इस िदन भी सवा लाख आमका भोग लगाया जाता है. वाणमास म परे माह मिदर म िहडोला होते ह. िनय नतन गार होते ह. िवशेषकर हरयाली अमावस, ठकराइन तीज, पिव ा एकादशी एव राखी का भारी उसव होता है. इस िदन ीजी को राखी बाधी जाती है. पषो ममास म परे मिहने ितिथ के अनसार साल भर सभी योहार बडी धमधाम से मनाए जाते ह. सच है. जहाँ िगरवरधारी, नटराज वय उपिथत ह, वहाँ उसव के भयतम आयोजन न हो, ऎसा भला कभी हो सकता है. म वय तो इन तमाम तरह के उसव म भले ही शािमल नह हो पाया, लेिकन पाटो सव के समय मझे ीजी के दशन का पयलाभ जर िमला है. माह फ़रवरी २०१२ मे सािह य-मडल े ागार म आयोिजत काय म म अय सािहियक िम के साथ”िहदी भाषा भषण” समान से समानीत िकया गया था. ितबारा वहाँ जाना तो नह हो पाया,लेिकन मन-पाखी जब-तब ीचरणॊं के दशनाथ जा पहँचता है. उनके िद य दशन ा कर मन म परम सतोष क ाि िमलती है. --------------------------------------------------------------------------------------------------- -8. या ा अमरनाथ क \ आपने अब तक अपने जीवन मे अनिगनत या ाए क होगी,लेिकन िकह कारणवश आप अमरनाथ क या ा नह कर पाए है, तो आपको एक बार बफ़ानी बाबा के दशन के िलए अवय जाना चािहए. दम िनकाल देने वाली खडी चढाइया, आसमान से बात करती, बफ़ क चादर म िलपटी-ढक पवत ेिणया, शोर मचाते झरने, बफ़ क ठडी आग को अपने म दबाये उ ड हवाए,जो आपके िजम को िठठरा देने का मा ा रखती ह,कभी बारश आपका रा ता रोककर खडी हो जाती है,तो कह िनयित निट अपने परे यौवन के साथ आपको समोहन म उलझा कर आपका रा ता िमत कर देती है, वह असय िशव-भ बाबा अमरनाथ के जयघोष के साथ,परे जोश एव उसाह के साथ आगे बढते िदखाई देते ह और आपको अपने साथ भि क चाशनी म सराबोर करते हए आगे,िनरतर आगे बढते रहने का म आपके कान म फ़क देते ह. कछ थोडॆ से लोग जो शारीरक प से अपने आपको इस या ा के िलए अ म पाते ह,घोडॆ क पीठ पर सवार होकर बाबा का जयघोष करते हए खली कित का आनद उठाते हए,अपनी या ाए सपन करते ह. सारी किठनाइय के बावजद न तो वे िहमत हारते ह और न ही िजनका मनोबल िडगता है, आपको िनरतर आगे बढते रहने के िलए े रत करते ह. रा ते म जगह-जगह भडारे वाले आपका रा ता, बडी मनहार के साथ रोकते हए,हाथ जोडकर िवनती करते है िक बाबा क सादी खाकर ही जाईये. भडारे म आपको आपके मन पसद चीज खाने को िमलेग.कह कडाहे म केसर डला दध औट रहा है, तो कह अमरती िसक रही होती है,बरफ़,पॆडा,बदी,कचौिडया,न जाने िकतने ही यजन आपको खाने कॊ िमलेग, वो भी िबना कोई रकम चकाए. ऐसा नह है िक यह नजारा आपकॊ एकाध जगह देखने को िमले,आप अपनी या ा के थम िबद से चलते हए अितम पडाव तक, िशवभ क इस िनकाम सेवा को अपनी आँख से देख सकते है. हमारी बस को जब एक भडारे वाले( अब नाम याद नह आ रहा है) ने रोकते हए हमसे सादी हण करने हेत िवनती क,तो भला हममे इतनी िहमत कहा थी िक हम उनका अनरोध ठकरा सकते थे. काफ़ आितय सतकार एव ससवाद साद हण कर ही हम आगे बढ पाए थे. मन क आदत बात- बात म शका करने क तो होती है. मेरे मन म एक शका बलवती होने लगी थी िक ये भडारे वाले,अगय ऊँचाइय पर जहाँ आदमी का पैदल चलना दभर हो जाता है,या ा के शआत से पहले अपने लोग को साथ लेकर अपने-अपने पडाल तान देते है. रसॊई पकाने म या कछ नह लगता, वे हर छोटी-बडी साम ी ले कर इन ऊँचाइय पर अपने पडाल डाले याि य क राह तकते ह और परी िन ा और ाके साथ सभी क खाितरदारी करते ह. वे इस या ा के दौरान लाख पया खच करते ह,भला इह या हािसल होता होगा? य ये अपना प रवार छोडकर, काम-धधा छोडकर या ा क समाि तक यहाँ कते ह? भगवन भोले नाथ इह भला या देते हगे? मन म उठ रहे का उ र जानना मेरे िलए आवयक था. मने एक भ से इस का उ र जानना चाहा तो वह चपी लगा गया. शायद वह अपने आपको अदर ही अदर तौल रहा था िक या कहे. काफ़ देर तक चप रहने के बाद उसने हौले से मँह खोला और बतलाया िक वह एक अयत ही गरीब परवार से है.रोजॊ-रोटी क तलाश म िदली आ गया. छोटा-मोटा काम श िकया. सफ़लता ठी बैठी रही. समझ म नह आ रहा था िक या िकया जाए? िकसी िशव-भ ने मझसे कहा-भोले भडारी से मागो. वो सभी को मनचाही वत दान करते ह.बस, उसके ित सची लगन और ा होनी चािहए.मने अपने यापार को फ़लने-फ़लने का वरदान मागा और कहा िक उससे होने वाली आय का एक बडा िहसा वह िशव-भ के बीच खच करेगा. बस या था,देखते-देखते मेरी िक मत चमक उठी और म यहा आने लगा.मेरी कोई सतान नह थी.मने िशव जी से ाथना क और आने वाले साल पर मेरी मनोकामना परी हई.इतना बतलाते हए उसके शरीर म रोमाच हो आया था और उसक आँख से अिवरल अधारा बह िनकली थी. इससे ात होता है िक यहाँ आने वाले सभी िशव भ को भोलेभडारी खाली हाथ नह लौटाते. शायद यह एक मख वजह है िक यहाँ ितवष लाख क स या म िशवभ आते है. यह स या िनरतर बढती ही जा रही है. दसरा कारण तो यह भी है िक बफ़ का िशविलग केवल इह िदन बनता है और हर कोई इस अ त िलग के दशन कर अपने जीवन को कताथ करना चाहता है. और तीसरी खास वजह यह भी है िक लोग अपने नगी आँख से कित का अ त सदय देखना चाहते है. जो िशवभ िहम से बने िशविलग के दशन कर अपने जीवन को धय बनाना चाहते ह,उह जम पहँचना होता है. जम रेलमाग-सडकमाग तथा हवाई माग से देश के हर िह से से जडा हआ है. 1-जम से पहलगाम( २९७ िक.मी ) _ पहलगाम जम से पहला पडाव पहलगाम है. या ी टै सी ारा नगरोटा-दोमल-उधमपर-कद-पटनीटाप-बटॊट-रामबन-बिनहाल तीथर-तथा जवाहर सरग होते हए पहलगाम पहँच है. पहलगाम ननवन के नाम से भी जाना जाता है. यह एक अतयत सदर –रमणीय थान है. जन ित के अनसार भगवाअन िशव ने माँ पारवती को अमरकथा का रहय सनाने के िलए एक ऐसे थान का चयन करना चाहते थे,जहाँ अय कोई ाणी उसे न सन सके . ऐसे थान क तलाश करते-करते ि सव पहलगाम पहँचे थे. यह वह थान है,जहाँ उहने अपने वाहन दी का परयाग िकया था. इस थान ाचीन नाम बैलगाम था,जो े ीय भाषा म बदलकर पहलगाम हो गया. या ी यहाँ भडारे म भोजन कर रा ी िव ाम करते ह 2-पहलगाम से चदनवाडी-(16िक.मी.) चदनवाडी या ी सबह चाय-पानी का टै सी ारा चदनवाडी पहँचता है. चदनवाडी के बारे म मायता है िक भोलेनाथ ने अपने माथे का चदन यहा छोडा था. यहाँ से कछ दर पर कित ारा िनिमत 100मीटर लबा पल है,जो िलर नदी के ऊपर बना है. पवत खलाए यहा अपना प-रग बदलती जाती है.आगे क या ा थोडी किठन है,िजसे घोडॆ ारा तय क जा सकती है. चदनवाडी से शेषनाग-(13िक.मी.) शेषनाग झील चदनवाडी से शे षनाग के िलए यह रा ता काफ़ किठन तथा सीधी चढाई वाला है. िपस घाटी होते हए िलर नदी के िकनारे-िकनारे मनोहर य को िनहरते हए या ी शेषनाग पहँचता है. यह थल झेलम नदी का उदगम थल है,िजसे शेषनाग सरोवर भी कहते ह. पहली झलक म य तीत होता है िक कोई िवशाल फ़णीधर(शेषनाग) कडली मारे बैठा हो. झील के पा म खडी ा-िवण-महेश नाम क तीम चोिटया कित का एक महान चमकार ही है.इस झील का पानी नीला है. ऐसी मायता है िक भगवान िशव ने अपने गले का शेषनाग का यहा प रयाग िकया था. इसी कारण इसका नाम शेषनाग झील पडा. चार ओर बफ़ से ढक पहािडयॊं को िनहार कर या ी धय हो जाता है.झील से थोडा आगे याि य को राि िव ाम करना होता है.यहा जगह-जगह भडारे लगे होते ह,जहा या ी अपनी पसद के सवाद भोजन से त हो जाता है. 4- शेशनाग से पचतरणी-(12.6िक.मी.)- पचतरणी सबह होते ही या ी चाय-पानी-ना ता कर पचतरणी क ओर थान करता है. माग म महागनस पवत है िजसक ऊँचाई 14500फ़ट है. महागनस पवत अपने आप म एक आय है. हरे-भरे,कभी-कभी िसदरी रग म िदखाई देने वाले इस िवशाल पवत तथा उस पर जमी बफ़ क परत से सरज क िकरणे परावितत होकर लौटती है तो यह िकसी बडॆ हीरे क तरह जगमगाता िखता है. ऊँचाई पर होने क वजह से आसीजन क मा ा मे कमी होने लगती है,िजससे या ी को सास लेने म किठनाई होती है.एक कदम आगे बढाना भी दवार सा लगाने लगता है. अतः या ी को चािहए िक वह यहा बैठकर थोडा सता ले और अपने आप को सामाय िथित म ले आए. कपर क डली भी उसे पास म रखनी चािहए. उसे सधने म राहत िमलती है.यहा जोर आजमाइश करने क जरत नह है. भगवान भोलेनाथ ने यहा अपने प ी गणेश को छोड िदया था.तभी से इसका नाम महागणेश जो कालातर म महगनस हो गया.थोडा आगे चलने पर पचतरणी नामक थान आता है. आइसा कहा जाता है िक जब िशव मा पावती को अमरकथा सनाअने के िलए यहा से गजर रहे थे,तब उहने नटराज का प धारण कर नय िकया था. नय करते समय उनक जटा खल गई थी िजसाम से गगा वािहत होते हए पाच िदशाओ म बह िनकली. ऐसी मायता है िक भोले ने यहा पच महाभत का यहा प रयाग कर िदया था या ी यहा रा ी िव ाम करता है तथा जगह-जगह लगे भडार मे भोजन करता है 5-पचतरणी से पिव गफ़ा( 6 िक.मी) पिव गफ़ा पचतरणी से 3िक.मी सपाकार पहाडीया चढकर 3िक.मी बरफ़ली च ानॊं पर चलकर या ी बफ़ से अठखेिलया करता, उसाह के के साथ आगे बढता है, योिक यह से वह िद य गफ़ा के दशन होने लगते है. गफ़ा को देखते ही या ी क अब तक क सारी थकान काफ़र हो जाती है. सम सतह से 12730 फ़ट क ऊँचाई पर 60फ़ट चौडी,25फ़ट लबी तथा15फ़ट ऊँची गफ़ा म या ी क आँख कित ारा िनिमत िशविलग को िनहारकर धय हो उठती ह. यह िहम से िनिमत मा पारवती के भी दशन होते ह.गफ़ा के ऊपर रामकड है,िजसका अमत समान जल गफ़ा मे वेश करने वाले याि य पर बद-बद टपकता है. हजार फ़ट ऊपर से कित का अ त नजारा देखकर काफ़ सनता का अनभव होता है.गफ़ा के पास ही हैलीपैड भी बना हआ है,जहा से आप हेिलकाटर को पास से उ रता तथा आसमान म उडान भरते देख सकते ह.वे या ी िजनके पास समय कम है अथवा वे शारीरक प से कमजोर ह,इस सेवा का लाभ उठा सकते ह. आपक या ा के शआती िबद से लेकर या ा के अितम पडाव तक भारतीय फ़ौज के जवान िदन-रात आपक सर ा म तलीन रहते ह. कभी-कभॊ घसपैिठये इस या ा म िवन उतपन करने से बाज नह आते.फ़ौज के रहने से आपको िचता करने क तिनक भी आवयकता नह है. भगवान अमरनाथ के दशन-पजा-पाठ आिद के बाद या ी अपनी या ा से वािपस लौटने लगता है. यहाँ से एक छोटा रा ता नीचे उतरने के िलए बालटाल होकर भी जाता है.यिद आप इस काफ़ उतार वाअले रा ते का चयन करते ह तो आपको रा ते मलेह-लाख-कारिगल-सोनमग-गलमग होते हए ीनगर आया जा सकता है.यहा आकर आप िशकारे का आनद उठा सकते ह. कमीर का यह िपछला िहसा सदय से भरपर है. कित नटी का अनपम नजारा आपको यहा देखने को िमलता है. अमरनाथ क या ा य िप किठन अवय है,लेिकन मन म यिद उसाह और उमग है तो िनःसदेह इसमे आपको भरपर मजा आएगा. यिद आपने कित के इस अ त नजारे तो नह देखा तो सब बेकार है. अतः एकबार पका मन बनाइये और बफ़ानी बाबा के दशन का लाभ उठाइये. या ा करने से पहले हम या- या करना चािहए और कौन-कौन सी सावधािनया बरतनी चािहए,उस पर थोडा यान िदए जाने क जरत है. 1-या ी अपना नाम-पता-टेलीफ़ोन नबर-मोबाइल नबर आिद को अपनी जेब म अवय रख और साथ ही अपने सािथय के नाम पते भी रखे,जो जरत पडने पर बडा काम आएगा.(2) अपने साथ सखे मेवे,नमक न अथवा भने चने तथा गड अवय रख ल.(3) सद हवा से चेहरे को बचाने के िलए वेसलीन,मफ़लर,ऊनी दा ताने,बरसाती,मोजे,को ड म साथ रख , योिक यहा कभी भी बारश अथवा बफ़ पड सकती है.खला आसमान और खली धरती के बीच आपको यहा रहना होता है.िफ़र यहा टटॊं के अलावा कोई शैड-वैड आपको देखने को भी नही िमलेगे ( 4) यिद आप िप या घोडॆ वाले को साथ लेते ह तो उनका रिज े शन -काड अपने पास रख ल और या ा क वापसी म लौटा द.(5) रा ता उबड-खाबड अथवा िफ़सलन भरा िमलेगा ही, अतः जते वाटर फ़ तथा ि प वाले ही पहने.(6) चढाई करते समय थक जाए तो बीच-बीच मे आराम करते चले.अपने आपको यादा थका देने का यास न कर.(7) आवयक दवाए अपने पास रख. हालािक यहा पर परी यवथा सरकार बना कर चलती है,िफ़र भी अपने पास दवाओ का िकट रख ल.(8) मझे यह कहने मे तिनक भी सकोश नही हो रहा है िक हम भारितय मे यहा-वहा कचरा फ़क देने क बरी आदत है.कपया इससे बच. अपनी खाली लाि टक क बोतल अथवा लाि टक क थैिलया यहा –वहा न फ़ेके . जब गाव-शहर म ही समिचत सफ़ाई क यवथा हम नही बना पाते तो पहाडॊं के दगम थान पर कौन सफ़ाई करने क िहमत जटा पाएगा. कई सजन लोग बोतल को आधी भरकर उसे नदी मे बहा देते ह. पता नह, अनजाने म ही हम पयावरण का िकतना नकसान कर बैठते ह.(9) मेिडकल िफ़टनेस का सिटिफ़केट या ा से पव अवय बनवा ल.((10) भारत सरकार ने चपे-चपे पर सर ा के कडॆ बदोबत िकए ह.इसके अलावा आपक िनगरानी के िलए हेलीकाटर से भी नजर रखी जाती है. अतः सैिनक के ारा िदए गए िनदश का कड़ाई से पालन करे. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 9. िच-िविच मेला -गोटमार मेला यह देश िविवधताओ से भरा हआ देश है. तीन अलग-अलग मौसम म,आदमी कभी बारश म भगता, तो कभी ठड म िठठरता, तो कभी िचलिचलाती धप म हलाकान–परेशान हो उठता है, लेिकन हर मौसम म पडते तीज- योहार और परपराओ म िनमन होते हए वह, उन पल को बडी आमीयता के साथ, अपने आपको जोडते हए, अपने को डबो देता है,.िजससे उसे आमीय खशी िमलती है. इस आ मीक खशी को हम चाह तो आनद कह ल या िफ़र परमानद अथवा ानद. आदमी क इसी िजजीिवषा का ही प रणाम है िक वह दैिहक-दैिवक और भौितक ताप क जलन से अपनी आमा को लहलहान होने से बचा पाता है. ऐसा नह है िक केवल भारत म ही यह सब कछ होता है, परी दिनया म इसी तरह क ज ोजहद चलती रहती है. अभी बारश का मौसम चल रहा है. बारश के इस मौसम म भीगते हए अभी हमने र ाबधन का पिव पव मनाया. तो इसी म म तीज-छट का योहार और ीकण जमा मी का पव भी बडी धमधाम से मनाया. इसी कडी म िछदवाडा िजले के पाढणा तहसील म जाम नदी के तट पर एक अजीबो-गरीब परपरा म िलपटे हए गोटमार मेले का आनद भी उठाया. पाढणा के इस मेले म जमकर पथर बरसते ह. लोग जमी होते ह. अग-भग होता है और कभी-कभी तो जान से भी हाथ धोना पडता है. है न ! अजीबो-गरीब परपरा. इसे मा कोरी गप न मान, यिद मन न माने इस बात पर िव ास करने को, तो इस िदन यहाँ आकर अपनी आँख से इसे होता हआ देख सकते ह.. माह अगत क अठारह तारीख को सपन हआ,यह अजीबॊ-गरीब िव िस मेला िजसे गोटमार के नाम से जाना जाता है, मनाया गया. पाढणा मराठीभाषा का े है. गोट का अथ प थर होता है. इस िदन यहाँ जमकर पथरबाजी का खेल खेला जाता है. (नदी के दोनो तरफ़ बडी सया म उमडा जनसैलाब) िकवदती के अनसार करीब तीन सौ साल पहले, पाढणा के एक यवक को सावरगाव म रहने वाली एक यवती से े म हो गया. दोनो प के लोग इस िववाह के प म नह थे. यवक जब अपनी ेयसी को सावरगाव से लेकर पाढणा लाने लगा. यहा आने के िलए बीच म जाम नदी पडती है,िजसे पार करते हए इस पार आया जा सकता है. दोनो बीच नदी म पहचे ही थे िक गाव वाल ने पथराव श कर िदया. सावरगाव के लोगो ारा पथरबाजी के जवाब म पाढणा वाल ने भी पथराव श कर िदया. इस पथरबाजी म कइय को चोटॆ आय, कई िसर फ़टे, कछ क जाने भी गई. अतः वह यवक, यवती को लाने म सफ़ल हआ. भाद मास के कण प म ,अमावया को पोले के योहार के ठीक दसरे िदन, जाम नदी के मय म शमी व के पेड क टहनी गाडी जाती है और उस पर झडा लगाया जाता है. पाढणा के लोग इस झडॆ कॊ लाने का परा यास करते ह और सावरगाव के लोग प थर बरसा कर उह रोकने का यास करते ह. इस तरह दोनो तरफ़ से प थर क अनवरत बरसात होती है,िजसमे कई यवक गभीर प से जमी हो जाते है. खन क निदया बह िनकलती है,लेिकन जाबाज लोग, बगैर जम क परवाह िकए िनरतर आगे बढते ह और झडॆ कॊ लाने का उप म करते ह. िपछली साल पजा-वदना के साथ शिनवार यािन 18 अगत को िव िस गॊटमार मेला श हआ. सबह से श हई पथरबाजी दोपहर बाद तक चलती रही. लोग ने एक दसरे पर जमकर प थर बरसाए. थानीय समाचार-प के अनसार पाढणा प के 175 और सावरगाव के 160 लोग घायल हए. बरी तरह से जमी 33 लोग को थानीय सामदाियक वा य के म भत करवाया गया. पाच क िथित अयत ही नाजक हो चली थी,िजह तकाल नागपर रेफ़र कर िदया गया. इस तरह गोटमार शाम के छः बजे तक चलती रही. कोई िनणय न होता देख, थानीय लोग,अिधकारय एव जन ितिनिधय ने आपसी सहमित बनाकर पथरबाजी कवाई. त प ात चडी माता मिदर म झडॆ क पजा-अचना क गई. इस तरह इस िविच िकत सय मेले का समापन हआ. इस िव िस गोटमार मेले म यवथाए बनाने आला शासिनक अिधकारय ने पाढणा और सावरगाव म यवथाए सभाल ली थी. उहने गोटमार मेले को रोकने के िलए िविभन आयोजन भी आयोिजत िकए ,बावजद इसके वे इसे रोक पाने म असफ़ल हए. इस मेले म 73 एस आई, 95 हेड का टेबल, 454 आर क सिहत 645 पिलसकम तैनात कर िदए गए थे,जो मेले क सर ा यवथा सभाल रहे थे.इसके अलावा िजला िसवनी और नरिसहपर से भी पिलस बल बलाया गया था. इस िच-िविच मेले को साकार प म दिनया को िदखाने के िलए इसका िफ़ माकन भी करवाया गया था. सभी ने इसे हैरत के साथ देखा और सना. यह िच-िविच गोटमार मेला पनः इस धरती पर भा पदी 14 अथात िदनाक 24-08-2014 को खेला जाएगा. कोई नह जानता िकतने लोग प थर से घायल हगे िकतने लहलहान होगे और िकतने लोग गभीर प से घायल हगे? हालािक सरकार क तरफ़ से परे बदोब त िकए जाएगे, कई आला अफ़सर यहाँ तैनात िकए जाएगे. डा टर क फ़ौज भी यहाँ डॆरा डले हए रहेगी. ऎबलेस क गािडया तैयार रहेगी, बडी सया म पिलस बल उपिथत होगा, इन सबके रहते हए यह खतरनाक खेल अबाध गित से चलता रहेगा. इससे पव इस अजीबो-गरीब खेल को रोकने के कडॆ उपाय भी िकए गए, लेिकन असफ़लता ही हाथ लगी. इस बार एक नयी पहल क गई है िक पथर को उपयोग म लाने के बजाए टमाटर से इस खेल को खेला जाए. पहल तो अ छी िदखाई देती है,लेिकन इसम िकतनी सफ़लता िमलती है, यह भिव य़ के गत म िछपा है. (िछदवाडा भाकर-27-0802014) इस साल गोटमार मेले म पाढरना के िखलाडी झडा तोडने म असमथ रहे.खेलथल पर असय पथर और सकड िखलािडय के बावजद पाढना प असफ़ल रहा. रत करीब सवा आठ बजे दोनो प क सहमित से झडा मा चिडका के मिदर म लाया गया और पजा अचना के बाद मेले का समापन िकया गया. सबह आठ बजे मेले क शआत हई.दोपहर एक बजे तक धीमी गित से चलता रहा. शाम होते-होते घायलो क स या सात सौ से अिधक (पाढना से 275 और सावरगाव से 230 लोग के घायल होने क पि क है.) --------------------------------------------------------------------------------------------- 10. धरती पर उतर आया वग- उनाकोिट ``धरती पर वग-उनाकोिट अगर म कहँ िक धरती पर वग उतर आया है तो आप सहसा िव ास नह करगे. नह भी करना चािहए, लेिकन जब आपका इस थान पर पदापण होगा, तब आप वय कह उठगे िक हाँ यह सच है. तप ात आप सोचने पर िववश हो जाएँगे िक आिखर वह कौन िशपकार था, िजसने मा एक छेनी और एक हथौड़ी के बल पर कठोर पथर पर, एक करोड़ से एक कम िच उके रे ? वह भी एक रात म. आप यह जानकर हैरान होने लगगे िक िकसी अनाम िशपकार ने, मा छेनी-हथौड़ी क सहायता से, िवशालकाय तथा कठोर पथर पर, एक नह बि क एक करोड़ म एक कम यािन िनयाबे लाख, िनयानबे हजार, नौ सौ िनयानबे िच बना डाले, वह भी केवल एक रात म ?. इस बात पर आप सहसा िव ास नह करगे िक यह ऐसे कैसे सभव हो सकता है िक एक अकेले कलाकार ने एक रात म इतने सारे िच प थरॊं पर कैसे उके र पाया होगा?. बात गले से नीचे नह उतरती.लेिकन ऐसा हआ है. अिव ास करते हए भी हम िव ास करना पड़ता है. हाँ िम ो ! हाँ, भारत म एक नह बि क अनेक ऐसी जगह ह, िजनके सीने म िछपे राज को आज तक कोई नह जाना पाया. ि परा क राजधानी अगरतला से लगभग 150 िकमी.दर एक ऐसा थान है िजसे "उनाकोटी" के नाम से जाना जाता है. यही वह जगह है जहाँ िकसी अनाम िश पी ने एक रात म िनयाबे लाख, िनयाबे हजार, नौ सौ िनयानबे िच पहाड़ क िवशाल और कठोर छाित पर, केवल अपनी एक छेनी और एक हथौड़ी क सहायता से उके र डाला. इस रहय को आज तक कोई भी सलझा नह पाया है. जैसे िक- ये मितयाँ िकसने बनाई, कब बनाई और य बनाई और सबसे जरी िक एक करोड़ म एक कम ही य? हालािक इन रहयमयी पहेिलय के पीछे कई कहािनयाँ चिलत ह, जो आपको हैरानी म डाल देने वाली ह. "उनाकोटी" एक ऐसा थान है, जो चार ओर से ऊँची-नीची पहािड़य और घने जगल से िघरा हआ है. एक ऐसे िनजन थान म लाख मितय का िनमाण कैसे िकया गया होगा? इतनी िवशाल स या म िच उके रने म जहाँ कई-कई बरस लग जाएगे, एक रात म बना पाना कैसे सभव हआ होगा, जबिक इस थान म कोई बसाहट नह है. इस आयजनक थान के रहय को जानने समझने म बि भी चकराने लगती है. आज भी यह लबे समय से शोध का िवषय बना हआ है. इन रहयमय मितय के कारण ही इस जगह का नाम उनाकोटी पड़ा है, िजसका अथ होता है करोड़ म एक कम. इस जगह को पव र भारत के सबसे बड़े रहय म से एक माना जाता है. कई साल तक तो इस जगह के बारे म िकसी को पता ही नह था. हालािक अभी भी बहत कम लोग ही इसके बारे म जानते ह. इन रहयमयी मितयो के िनमाण को लेकर एक पौरािणक कथा बहत चिलत है. मायता है िक एक बार देव के देव महादेव जी के समेत एक करोड़ देवी-देवता कह जा रहे थे. अनवरत या ा के दौरान राि िघर आयी. अधकार िघरता देख समत देवी-देवताओ ने महादेव जी से इसी थान म ककर िव ाम करने क ाथना क, िजसे उहने वीकार कर िलया. िनवेदन वीकार करने से पव उहने समत देवी-देवताओ से कहा िक सयदय होने से पहले आप सभी इस थान को छोड़ दगे. िशवजी अकेले जागते रहे थे, जबिक सम त देवी-देवता आँख म गहरी िन ा आजे सो रहे थे. सयदय होने का समय हो आया था, लेिकन कोई भी देवी-देवता इससे पव नह जाग पाए. यह देखकर िशवजी ोिधत हो उठे और उहए ाप देकर सभी को प थर बना िदया. यही वह कारण था िक इस थान म 99 लाख, 99 हजार, 999 मितयाँ ह.( एक करोड़ म एक कम भगवान िशवजी को छोड़कर.) एक और अय कथा चलन म है. कहते ह िक कोई काल नाम का एक िशपकार था, जो भगवान िशव और माता पावती जी के साथ कैलाश जाना चाहता था. ऐसी मायता है िक कैलाश पवत पर केवल और केवल िशव परवार ही रहता है. लेिकन भ क िजद थी िक वह वहाँ जाना चाहता था. भ क बात भगवान भोले नाथ कैसे ठकरा सकते थे?. उह तो हर हाल म अपने भ क इछा का समान करना था. उहने अपने भ के सामने एक िविच शत रखी िक यिद वह एक रात म एक करोड़ देवी-देवताओ क मितयाँ बना देगा तो वे उसे अपने साथ कैलाश ले जाएगे. भ जानता था िक एक रात म वह एक करोड़ मितया नह बना पाएगा, लेिकन कैलाश जाने और अपने आरा य के सग रहने क लालसा के चलते, उसने िशव जी क शत मजर कर ली और बड़े जोर-शोर के साथ प थर पर मितय का िनमाण करने म जट गया. उसने परी रात मितय का िनमाण िकया,लेिकन तभी दभाय से रात बीत गयी. सबह जब मितय क िगनती क गई, तो पता चला िक उसम एक मित कम है. भ िशवजी के मशा के अनप एक करोड़ मितय का िनमाण नह कर पाया, यही वह कारण था िक िशवजी अपने साथ उसे कैलाश नह ले जा पाए. एक करोड़ म एक कम होने के कारण इस थान का नाम "उनाकोटी" पड़ा. यहाँ के पहाड़ इतने ऊँचे ह िक आसमान से होड़ ले रहे होते तीत होते है. गहराइयाँ भी इतनी अिधक है िक यहाँ बनी सीिढ़य से नीचे उतरना िजतना आसान है, उतना ही किठन होता है, ऊपर चढ़कर आना. चढ़ाई चढ़ते समय यि को भगवान क याद आने लगते है. हालािक दर-दर तक फ़ैले सघन वन से झर कर आती शीतल हवा के झकोरे उसे कछ राहत दान करते ह. वह अहड़ बहती नदी का शोर भी पयटक के आनद को ि गिणत कर देता है. ऐसा अ त अकपनीय "उनाकोटी" पव र भारत का सबसे बड़ा रहय और अ त सदय को अपने म समेटे हए है, जो काफ़ साल तक अ ात बना रहा. आज भी लोग इस थान का नाम कम ही जानते है. घने जगल के बीच शैल-िच और मितय के जो अ य भडार उतने ही अ त और िदलचप है. उनाकोटी म दो तरह क मितयाँ िमलती ह. एक-" पथर को काट कर बनाई गई मितया". दसरी- "पथर पर उके री गई मितया". ायः सभी मितयाँ िहद धम से जड़ी हई ितमाए है, िजनमे िशव जी, देवी दगा जी, भगवान िवण, गणेश आिद क मितयाँ उके री गई ह. भगवान िशव क तीस फ़ट क एक ऊँची ितमा बनी हई है, िजसे "उनाकोटे र" के नाम से जाना जाता है. इसी िवशाल ितमा के पास िशव के वाहन नदी क मित भी देखने को िमलती ह. भगवान ी गणेश जी क एक अ त मित ऐसी भी है, िजनक चार भजाए और बाहर क तरफ़ िनकले तीन दात को दशाया गया है. इसके अलावा ी गणेश क एक मित ऐसी भी है िजसम उनके चार दात, आठ भजाए िदखाई देती ह. लोग यहाँ ा के साथ आकर पजा-पाठ करते ह. हर साल अ ैल महीने के दौरान यहा मेले का आयोजन भी िकया जाता है, िजसमे शािमल होने के िलए बड़ी सया म ाल यहाँ आते ह. उनाकोटी, अगरतला से टै सी ारा लगभग एक सौ पचास िकमी. क दरी पर अविथत है. टै सी ारा 4-5 घटे म आप यहाँ पहँच जाते है. अगरतला से उनाकोटी रेलमाग ारा भी पहँचा जा सकता है. धमनगर रे वे टेशन से अथवा कमारघाट रे वे टेशन से पैदल रा ते से आप उनाकोटी पहँच सकते ह. धमनगर से उनाकोटी सड़कमाग से दरी 11.7 िकमी है. लगभग इतनी ही दरी धमनगर रे वे टेशन से तय करने के बाद आप उनाकोटी पहँच सकते ह. तब हम यह नह जानते थे िक े न से सफ़र करने के प ात धमनगर अथवा कमारघाट रे वे टेशन पहचने के बाद, यारह िकमी, क दरी तय करने के िलए कोई वाहन िमलेगा भी अथवा नह. चिक हमारे पास समय क कमी थी. अतः हम टै सी ारा या ा करना सिवधाजनक लगा था. उनाकोटी क या ा को सगम बनाने के िलए हम आभारी है िवकासखड अिधकारी मान. ी शात च वत जी के , िजहने न केवल अगरतला म हमारे िलए होटेल बक क और उनाकोटी के िलए टै सी क यवथा भी क. इतना ही नह, हम िवमानतल तक पहँचाने के िलए उह ने टै सी क यवथा भी क थी. यततम समय म से समय िनकालकर वे होटेल तक जर आते और हालचाल जानते. मा एक अप प रचय म इतना सहयोग देना, उनक दय क िवशालता का परचायक है. िनः सदेह हम उनके बहत आभारी ह. साउथ एिशया े टेिनटी ारा तीन िदवसीय का स मिणपर क राजधानी इफ़ाल म रखी गई थी. हम इस िशिवर म भाग लेने जाना था. िछदवाड़ा से नागपर क 110 िकमी क या ा कर हम नागपर के िवमानतल डा. बाबासहेब आबेडकर अतररा ीय िवमानतल पर पहँचे. नागपर से सीधे इ फ़ाल के िलए कोई उड़ान नह है. नागपर से िदली, िफ़र िद ली से होते हए इफ़ाल के िलए हवाई सेवा थी. तीन िदन िशिवर म भाग लेकर अब हम चल पड़ते ह इफ़ाल से गवहाटी होते हए अगरतला क ओर हवाई माग ारा. चिक हमारा म य उ े य था आय से भरे "उनाकोटी" क िदयता और भयता को जी भर के देखना और िनहारना था. िनहारना था उन सघन वन को, िजनम सरज क िकरण बड़ी मिकल से भीतर वेश कर पाती है. यहाँ के जगल बारह माह हरयाली क चादर ओढ़े रहते है. ऊपर खलता नीला आसमान, सघन व ो के झरमट के बीच से चलकर सरसराकर बहती शीतल हवा के झोक और ऊँचे नीचे पहाड़ के बीच से होते हए या ा करना कौन नह चाहेगा?. जब भी आपका मन बने, एक बार उनाकोटी जाने का काय म ज र बनाए. इफ़ाल, मिणपर, अगरतला म मण करते हए हमने वहाँ के दशनीय थल को देखा, िजसका उलेख िफ़र िकसी अय आलेख म िकया जाना उिचत होगा. चिक हमारा उ े य "उनाकोटी" जाना और वहा क अि तीय सदरता और उसके गभ म समाए अनेक रहय से परिचत होना था. अतः बात केवल उनाकोटी क ही क जाना मझे उिचत जान पड़ा है. "उनाकोटी" ि परा रा य के उनाकोटी िजले के कैलाश शहर उपखड म िथत एक ऐितहािसक व परातािवक िहद तीथ थल है. यहाँ भगवान भोलेनाथ को समिपत मितयाँ और थाप य, िजनका िनमाण 7 व-9 व शताबदी ईसवी या उससे भी पहले बगाल व पड़ौसी े के पाल वश के राजकाल म हआ था. इस रोमाचक या ा के सधार थे हमारे िम (से.िन.) ो. राजे र आनदेव. सहया ी थे ीमती अिनता आनदेव, डा. ममता आनदेव, ी जयत डोले, ीमती स षमा ढोले, ी हरश खडेलवाल, ी सिनल ीवा तव.और वय म. (हमारी यह या ा 8 नवबर से 19 नवबर तक िनधारत थी.)_ उनाकोटी िव का एकमा ऐसा थान है जहाँ एक नही, दो नह, बि क 99 लाख, 99 हजार,999 देवी-देवताओ का िनवास- थान है. दसरे शद म कह िक वग यह है., तो कोई अितयोि नह होगी.. अगर आपने ऐसा थान नह देखा, तो सच मािनए, आपने कछ नह देखा. उनाकोटी के जादई आकषण म बधकर और उससे िलपटे रहय को जानकर हम लौट पड़ते ह अपने-अपने-अपने घर क ओर. ------------------------------------------------------------------------------------------- 11 शौय और परा म क भिम िच ौड़गढ़ सपण राजथान अपने शौय, देशभि एव बिलदान के जग िस है. यहाँ के अस य राजपत वीर ने अपने देश तथा धम क र ा के िलए अपने ाणॊं का उसग िकया. वह राजपत िवरागनाओ ने अनेकानेक अवसर पर अपने बच सिहत जौहर क अिन म वेशकर एक आदश थािपत िकया. यही कारण है िक सपण राजथान न केवल भारत के िलए बि क परे िव म एक ेरणा का ोत बन चका है. िच ौड़गढ़ का अपना एक सनहरा इितहास है. यहाँ के रणबाकर ने आमणकारी मगल से जमकर लोहा िलया और अपने जीिवत रहते हए न तो उनक गलामी वीकार क और न ही हार मानी, भले ही उह िकतनी क क दायक िथित से य न गजरना पड़ा हो. महाराना सागा से लेकर महाराणा ताप क शरवीरता के अनेक िक से बचपन म पढ़ने और सनने को िमले, िजह सनते हए मन गव से भर जाता था. महाराणा ताप और अकबर के बीच ह दीघाटी म हए य , और हार के बाद जगल म प रवार सिहत रहते हए ती ा क थी िक जब तक मेवाड़ को पनः ा नह कर लेता, तब तक भिम पर ही सोउगा. एक व ऎसा भी आया जब उनके बच को घास के बीज क रोटी खाने पर िववश होना पड़ा था. एक िकसा तो ऎसा भी पढ़ने को िमला िक एक िबलाव उनके ब च क रोटी चरा कर भाग गया और उह भख का सामना करना पड़ा. इस घटना को सनकर िदल दहल गया था. आँख से आँस झरझरा कर बह िनकले थे. इतना सब कछ होते हए भी उहने अकबर के सामने घटने नह टेके . देशभ महाराणा क इस भिम को देखने क इछा बलवती हो उठी थी. कालातर म वह अवसर भी आया, जब म शरवीर क भिम के दशन ा कर सका था. मेरे सािहियक अवदान को देखते हए वष 2008 म आिखल भारतीय बालसािह य सगो ी एव समान समारोह मच भीलवाड़ा (राज) ने मझे समानीत करने का मानस बनाया और आमण-प ेिषत िकया. अनेकानेक सािहयकार/गणमाय नागरक क गरीमामय उपिथित म राजथान सािहय अकादमी क तकालीन िनदेशक ीमती अजीत ग ाजी के हते समान-ा िकया. 1.बालसािहय सगो ी के सयोजक/ बालवािटका पि का के सपादक, राजथान सािहय अकादमी क तकालीन िनदेशक ीमती अजीत ग ा जी से समान हण करते हए 2. राजथान सािहय अकादमी क िनदेशन मा. ीमती अजीत ग ाजी से समािनत होते हए. इस भ य और रगारग काय म के दसरे िदन डा. ी भलाल गग जी से मने िनवेदन िकया िक मेरा मन राजथान के उस भभाग को िजसे शरवीर क धरती िच ौड़गढ़ के नाम से जाना जाता है, देखने क बल इछा है. दो िदवसीय काय म के समापन के बाद वैसे ही वे थकान से चर थे, बावजद इसके उहने अपनी टेशन-वैगन िनकाली और इस तरह म गािजयाबाद के िम ी महेश ससेना, डा.मध ससेना के साथ िच ौड़गढ़ के िलए रवाना हए. अजमेर से खडवा जाने वाली े न के ारा रा ते के बीच िथत िच ौड़गढ़ जशन से करीब दो िकमी. उ र-पव क ओर एक अलग पहाड़ी पर भारत का गौरव, राजपताने का स िस िच ौड़गढ़ का िकला बना हआ है. सम सतह से १३३८ फ़ट ऊँची भिम पर िथत ५०० फ़ट ऊँची एक पहाड़ी पर िनिमत यह दग लगभग ३ मील लबा और आधा मील तक चौड़ा है. पहाड़ी का घेरा ८ मील है. यह िकला लगभग ६०९ एकड़ भिम पर बसा है. इस िवशाल िकले के अदर पि नी महल, कािलका माता मिदर, गोमख, सिम े र महादेव मिदर, कित तभ,मीरा का मिदर, गोमख के अलावा एक-दो महल को छॊड़कर शेष खडहर म तदील हो चके ह. पि नी महल.. एक झील के िकनारे रावल रनिसह क रानी पि नी के महल बने हए ह. एक छॊटा महल जलाशय के बीच म बना हआ है जो जनाना महल के नाम से जाना जाता है, व िकनारे के महल मरदाने महल कहलाता है. मरदाना महल के एक कमरे म एक िवशाल दपण इस तरह से लगा है िक यहाँ से झील के मय बने जनाना महल क सीिढ़य पर खड़े िकसी भी यि का प ितिबब दपण म नजर आता है. परत पीछे मड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े यि को नह देखा जा सकता. सभवतः अलाउ ीन िखलजी ने यह खए होकर रानी पि नी का ितबब देखा था. काली माता का मिदर- पि नी महल के उ र म बाई ओर कािलका माता का सदर िवशाल मिदर है. मल प से यह सय मिदर था. गभगह के बाहरी दीवर के ताक (आल) म थािपत सय क मितयाँ इसका माण है. मसलमान के आमण के दौरान इसे तोड़ िदया गया था. बरस सना पड़ा रहने के बाद इसम कािलका क मित थािपत क गई. तभी से यह कािलका मिदर के नाम से जाना जाता है. किततभ गमहाराणा कभा ने मालवा के सतान महमद शाह िखलाजी को १९४० ई. म थम बार परा त कर उसक याद म अपने इ देव ी िवण के िनिम यह क रतभ बनवाया था. तभ अपनी वा तकला क ि से अपने आप मिजल पर झरोखा होने से इसके भीतर काश बना रहता है.इसम िवण के िविभन प जैसे जनादन, अनत आिद, उनके अवतार तथा हा, िशव, िभन-िभन देवी-देवताओ, अधनारी र (आधा शरीर पावती तथा आधा िशव का), उमामहे र, लमीनारायण, हासािव ी, हरहर (आधा शरीर िवण और आधा िशव का), हरहर िपतामह ( हा, िवण तथा महेश तीन एक ही मित म) ॠत, आयध (श ), िदपाल तथा रामायण तथा महाभारत के पा क सैकड़ मितयाँ खदी ह। येक मित के ऊपर या नीचे उनका नाम भी खदा हआ है। इस कार ाचीन मितय के िविभन भिगमाओ का िव े षण के िलए यह भवन एक अपव साधन है। कछ िच म देश क भौगोिलक िविचताओ को भी उ कण िकया गया है। किततभ के ऊपरी मिजल से दग एव िनकटवत े का िवहगम य िदखता है। िबजली िगरने से एक बार इसके ऊपर क छ ी टट गई थी, िजसक महाराणा वप िसह ने मरमन करायी थी. कई शौकन िच कार यहाँ िच कारी करते हए देखे जा सकते ह. मीराबाई का मिदर मीराबाई का मिदर मीरा मिदर म ी िवण मगलकर, गोवधन यादव डा.भलाल गग अपने पोते के साथ. ी कण क दीवानी भ मीरा बाई का भय मिदर देखने लायक है. इसक नकाशी भाविवभोर कर देती है. कहते ह िक राणा क मय के प ात मीरा राजभवन छॊड़कर इसी थान पर रहकर अपने आरा य ीकणजी क भि म लीन रहती थी. पहले गभगह म कोई मित नह थी, बाद म िकसी ने ीकणजी के आदमकद तवीर यहाँ रख दी है. इसी मिदर के सामने मीराजी के ग सत रैदास जी का एक छॊटा सा मिदर थािपत है. इस मिदर म मीरा के ग रैदासजी के चरणिचह अिकत ह. गौमख कड. महासती थल के पास ही गौमख कड है। यहाँ एक च ान के बने गौमख से ाकितक भिमगत जल िनरतर एक झरने के प म िशविलग पर िगरती रहती है। थम दालान के ार के सामने िवण क एक िवशाल मित खड़ी है। कड क धािमक मह ा है। लोग इसे पिव तीथ के प म मानते ह। कड के िनकट ही उ री िकनारे पर महाराणा रायमल के समय का बना एक छोटा सा पा जैन मिदर है, िजसक मित पर कनड़ िलिप म लेख है। यह सभवतः दि ण भारत से लाई गई होगी। कहा जाता है िक यहाँ से एक सरग कभा के महल तक जाती है। गौमख कड से कछ दर दो ताल हाथी कड तथा खातण बावड़ी है। . सिमदे र का मिदर िवजय तभ के दि ण म सिम दे ार महादेव का एक ाचीन मिदर है िजसके िनज-मिदर म िशविलग के पीछे दीवार पर िशव क ि मित है जो सत ( सयता), रज ( वैभव) व तम ( ोध) के ोतक है. इस मिदर का िनमाण मालवा के राझा भोज के करवाया था. सन 1427 ई.म िचतौड़ के महाराणा मोकल ने इसका जीणॊ दार करवाया था. ऎसे दो िशलालेख ा हए है. कालीका का मिदर. जयमल-प ा के महल के दि ण म सड़क के पि मी िकनारे पर काली जी का सदर, िवशाल और ऊँची कस पर बना बहत ाचीन मिदर है. मिदर के खब, छत मिदर के ार पर खदाई का काम बहत ही ाचीन तीत होता है. मिदर के ार पर खदी सय-मित तथा गभ-गह के बाहर पा के अनेक भाग म थािपत सय क मितय को देखने पर ात होता है िक यह सय मिदर ही रहा होगा. मगल के आमण के समय सय क मित तोड़ दी गई थी तथा बाद म उसक जगह काली जी क मित क थापना कर दी गई हो. इनके अलावा महाराणा कभा का महल, फ़तहकाश महल, महासती- थल, जयमल प ा के महल, खाती रानी का महल, गोरा-बादल के महल आिद अब जीण अवथा म है, िजह देखकर उस समय के वैभव को जाना जा सकता है. िच 1 एव 2 म समािनत होते हए गोव न यादव िच 3 एव 4 म ह दीघाटी के ागण म यादव िच 5 म िम ी िवण मगलकर. िच 6 म चेतक क समाधी. िच 7 म अकादमी के सम िम मडली. िच 8 उदयपर क नवकित मच से यादव का समान ------------------------------------------------------------------------------------------------- 12. अिवमरणीय या ा अडमान-िनकोबार क. घर क चारदीवारी से बाहर िनकलकर कित के अनठे, अनछये सदय के दशन करना, िखलिखलाते समय के कधे पर हाथ रखकर उसके साथ िखलिखलाना- मकराना- बात करना, उछलती-कदती, बल- खाती झमती निदय का पहाड़ी गीत-सगीत सनना, पहाड़ के एकात म खो जाना, घने जगल म सरसरा -कर बहती अहड़ हवा के झक के सग झमना-इठलाना, िचिड़य का शोर सनना और आकाश म चहचहाते, उड़ान भरते िवहगो को िनहारना, पहाड़ क चोिटय से उछल-कद मचाते, गीत गाते झरन को धरती पर उतरते हए देखना और भी न जाने िकतने ही रग- प बदलते नीलाकाश के नीचे वछदता के साथ िवचरना, दहाड़ते-उफ़नते सागर से बात करना ही तो या ा के पयाय है. जीवन म एक समय ऐसा भी आता है, जब जीवन एकाकपन के िघरने लगता है. जीवन से ऊब होने लगती है. मन छटपटाने लगता है, एक अ ात भय मन के आगन म घेरा डालकर बैठ जाता है. ऐसे िवकट और किठन समय म जीवन नीरस जान पड़ने लगता है. जीवन अपना अथ खोने लगता है. जैसे ही आप अपने परिध (रेिडयस) से बाहर िनकलते ह या ा पर, अपने आपको एक नई दिनया म पाते ह. वहाँ का नयापन आपको अपने समोहन के जाल म बाधने लगता है. घर से बाहर िनकलते ही आप वय भी बदलने लगते है. एक नया प रवतन अपने आप आने लगता है. नीरस जीवन अपने आप रगीन होने लगता है. अतः ऐसे नीरस जीवन को रसमय बनाने के िलए बहत जरी है "या ा" म िनकल पड़ना. या ा एक छोर से िनकलकर दसरे छोर तक जाना नह है, बि क िनत नतन होते ससार म वेश करना भी होता है. या ा का तापय केवल समय न करना नह होता, बि क एक अपरिचत-अनिचहे ससार को जानना-पहचाना भी होता है. या ाए केवल भौितक ही नह होती, बि क बाहर से अदर क ओर भी होती है. अतरया ा से यि अपनी आमा के बेहद करीब पहँच जाता है. मन क अतल गहराइय के भीतर उतरकर, वह जीवन का वा तिवक अथ खोजने लगता है. अपने आपको पहचाने लगता है और एक िद य काश से नहा उठता है. या ा एक मनोवै ािनक, यवहारक और अया म से जड़ने का एक शि शाली मा यम भी है. जैसे ही हमारा आिधपय, मल कित पर होने लगता है, उसी ण से एक िवल ण सजनामकता का उदय भी हमारे भीतर होने लगता है. थके मन और िशिथल देह के साथ उलझन से िघरे जीवन म यकायक "या ा" करने का उसाह जब झकत होने लगे तो समिझए- "उसव का अवसर" आ गया है. नैराय पर मनय क िवजय का सबसे बड़ा माण है-" उसव या ा". और यही जीत हािसल करने का उ ोष भी है. पननव के िलए िकए गए अ त यास क बानगी भी है और उलास अिभ यि क सदर छिव भी. बदलते समय के साथ हम, मौसम से िबधे मन िलए िफ़रते है "या ा" म. हमारी आँख िनहारने लगती ह ऋतओ को और मन उसके मतािबक शद के मोती चन-चनकर हार गथने लगता है. जैसे ऋत- वैसा मन- वैसे वचन. यात सािहयकार भगवतीचरण वमा इसी मौसम से बधकर कह उठते ह- मती से भरके जबिक हवा / सौरभ से बरबस उलझ पड़ी / तब उलझ पड़ा मेरा सपना / कछ नए-नए अरमान से / गदा फ़ला जब बाग म / सरस फ़ली जब खेत म / तब फ़ल उठी सहस उमग / मेरे मरझाए ाण म.// मरझाए ाण को ाणवान बनाने का सबसे सरल और कारगर उपाय है-या ा पर िनकल पड़ना. िपछली बार क या ा म हम एक ऐसे भ-भाग म जा पहँचे थे, जहाँ धरती के एक छोर पर वसत क लािलमा िछटक हई थी, तो वह दसरे अितम छोर पर खे-सखे नगे पहाड़ का सजाल था. जहाँ हरयाली नाम मा को भी नह थी. जी हाँ, म बात कर रहा ह- "िशमला ट काजा ( िद िहमालयन को ड डेजट) हाया चडीगढ़ क. अब क बार हमारी या ा थी-"हावड़ा से अडमान-िनकोबार हाया नागपर".हावड़ा म जहाँ भीड़-ही-भीड़ है, इसान का सम जहाँ ठाठे मार रहा होता है, वह अडमान चार ओर से लहलहाते, िमल लबे सम से िघरे हए तथा नारीयल और सपाड़ी के घने जगलओ के बीच मकराता है. बतलाते ह िक केवल 32 ीप पर ही आवक-जावक है, बाक के ीप सरकार क िनगरानी म उनक देखरेख होती है. पयटक को केवल तीन ीप पर सैर करने क अनमित है. तीन ही ीप अपनी नैसिगक छटा से पयटक का मन मोह लेते ह. अडमान ीप समह म छोटे-बड़े 572 ीप समािहत ह. अडमान और िनकोबार ीप समह का सपण े फ़ल 8249 (sqr) िकलोनीटर है, यह ीप सडल पीक (532 मीटर), माउट है रयेट (365.मीटर), माउट थओिलयर (642 मीटर) जैसी ऊँची-ऊँची पहािड़या से िघरा हआ है. तथा इसक चे नई से (पोटलेयर) क दरी 1190 िकमी, कोलकाता से 1255 िकमी. िवशाखापम से 1200 िकमी.दर है. एक अकेले अडमान े क लबाई 467 िकलोमीटर तथा चौड़ाई 52 िकलोमीटर है. िनकोबार ीप समह क लबाई 259 िकलोमीटर तथा चौड़ाई 58 िकलोमीटर है. ये सभी ीप, चार ओर से भयकर शोर मचाते, दहाड़ते सम (बगाल क खाड़ी) से िघरा हआ है. अडमान एव िनकोबार ीपसमह क एक मख जनजाित है "जारवा". वतमान समय म इनक स या 250 से लेकर 400 तक अनमािनत है जो िक अयत कम है. जारवा लोग क वचा का रग एकदम काला होता है और कद छोटा होता है. करीब 1990 तक जारवा जनजाित िकसी क नज़र म नह आई थी और एक अलग तरह का जीवन जी रही थी. अगर कोई बाहरी आदमी इनके दायरे म वेश करता था, तो ये लोग उसे देखते ही मार देते थे. जारवा जनजाित अब भी तीर-धनष से अपने िलए िशकार करती है. इनक आबादी ितवष घटती देखी गई है, एक अनमान के अनसार वतमान म इनक आबादी 250 से 400 के बीच है. 15-09-2022. हावड़ा ट पोटलेयर हाया नागपर. 15 िसतबर 2022 क अलसबह हम जा पहँचे कोलकाता के " नेताजी सभाषच बोस इटरने ल एअरपोट" पर. टाटा क एअरलाईन सिवस " िवतारा- 747" ने 09.00 पर उड़ान भरी और लबी उड़ान भरते हए हम िदन के 11.20 बजे जा पहँचे "पोटलेयर". वहाँ पहँचकर हमने होटेल म भोजन िकया और कछ समय िव ाम िकया. "पोटलेयर" "अडमान-िनकोबार क राजधानी " पोटलेयर" है. यहाँ आपको ऐितहािसल सेललर जेल, कोरबाइस कोव बीच, रोज आईलै ड, वाईपर आईलै ड, ि िटश कालोनी आिद देखने को िमलती ह.. इस शहर को माट सीटी के तौर पर िवकिसत िकया गया है. उतार-चढ़ाव वाली सड़क पर फ़राटे भरते वाहन, जब सपाड़ी और पाम के सघन व क हरयाली के बीच से होकर गजरते है, तो या ी यहाँ के नजारे देखकर ममध हो जाता है.- सबसे पहले हमने "सेललर जेल" जाकर उन ात-अ ात वतता स ाम सेनािनय को, िजहने भारत माता क आजादी के िलए शारीरक और मानिसक आघात / यातनाओ को सहकर हसते-हसते फ़ासी के फ़दे पर झल गए लेिकन अ ेजी दासता को कभी वीकार नह क. हम सव थम इस ऐितहािसक थल पर जाकर अपने अिपत करना चाहते थे. सेललर जेल अथात कालापानी कालापानी- ( आतिकत होने के िलए नाम ही काफ़ है. ासमन ( सेललर जेल के सम बाए से दाए- ी राजे र आनदेव, हरीश खडेलवाल, सयनारायण अवाल,गोवधन यादव, ( इस लेख के लेखक.) िवनोद शमा,सनील ीवा तव, दीपक बते, सधीर शेकदार, िवजय कर ,कहैयाराम रघवशी, हषद घाटोले, याम ह ार, काश इगले, सतीष िसगोर) ---------------------------------------------------------------------------------------------------- ायः सभी ीप, चार ओर से भयकर शोर मचाते, दहाड़ते सम (बगाल क खाड़ी) से िघरा हए है, ऐसे दगम थान पर "सेललर जेल" का िनमाण िकया जाना और उसम सैकड़ वीर सेनािनय को..... उन ाितकारय को, िजह ि तािनया सरकार अपने िलए बड़ा खतरा मानकर चलती थी, यहाँ लाकर कैद म रखा जाता था. यिद कोई कैदी, सैिनक क र िनगाह से बचकर यहाँ से भागना भी चाहे, तो मील फ़ैले सम को तैर कर पार कर पाना उसके िलए लगभग असभव ही था. "कालापानी" के नाम से कयात इस ीप समह को "कालापानी " के नाम से जाना गया. इसके पीछे दो तय उभरकर सामने आते ह, पहला तो यह िक अडमान सम का नीला गहरा पानी, जो देखने पर काला तीत होता है, इस कारण इसका नाम "कालापानी" पड़ा और दसरा यह िक अ ेज ारा जो खँखार कै िदय और ितकारय को सजा सनाई जाती थी, सजा के प म इसे "कालापानी" से सबोिधत िकया गया. जब हम अपने देश के वतता सेनािनय को याद करते ह, तो हम उस "कालापानी" क याद हो आती है, जो अ ेज क बबरता को बतलाने के िलए काफ़ है. कालापानी क सजा का याल आते ही शरीर के रॊंगटे खड़े हो जाते ह. हालािक अब देश म "सजा-ए-कालापानी" का कोई अि तव नह रह गया है, िफ़र भी लोग को उसके बारे म जानने क िदलचपी लगातार बनी हई है. कालापानी शद अडमान के बदी उपिनवेश के िलए देश िनकाला देने का पयाय है.कालापानी का साकितक भाव काल से बना है िजसका अथ होता है- मय जल या मय के थान से है, जहाँ से कोई वापस नह आ पाता. देश िनकाल के िलए कालापानी का अथ तो यह भी है िक बचे जीवन के िलए कठोर और अमानवीय यातनाए सहना.एक अय अथ म कालापानी यािन वतता सेनािनय को अनकही यातनाओ और तकलीफ़ का सामना करने के िलए जीिवत नरक म भेजना, जो मौत क सजा से भी बदतर था. कालापानी क सजा माने बदी को अपन से दर भेजना, एक ऐसा अ य लोक, िजसके बारे म कोई कछ नह जानता. भारतीय कैदी जेल से भाग िनकलते थे, बावजद इसके ि िटश सरकार ने कालापानी के बनाई गई जेल क चार दीवारी बहत छोटी बनवाई थी, यिक इस जेल का िनमाण िजस जगह हआ था, वह थान चार ओर से सम के गहरे पानी म िघरा हआ था. ऐसे म िकसी भी कैदी का भाग पाना नाममिकन था. 238 कै िदय ने एक साथ अ े ज को चकमा देकर वहा से भाग िनकलने क कोिशश क लेिकन कामयाब नह हए और पकड़ िलए गए. िफ़र होना या था?. उह अ ेज के कहर का सामना करना पड़ा. यातना सहन नह कर सकने क दशा म एक कैदी ने आमहया तक कर ली थी, िजससे नाराज होकर जेल अधी क वाकर ने 87 लोग को फ़ासी पर लटकाने का आदेश दे िदया. िनममता से जम सहने के बावजद हमारे वतता वीर सेनािनय ने "भारत माता क जय" बोलने से कभी पीछे नह हटे. सेसलर जेल के िनमाण के म य कारक जानने के िलए हम सन 1857 क ओर लौटना होगा. 10 मई 1857 को भारतीय ने अ ेज शासन के िखलाफ़ िव ोह िकया था. इस िव ोह के 200 ाितकारय को िपनल सेटलमट के तहत कालापानी अथात अडमान लाया गया था. अ ेज सरकार ने 20 नवबर 1857 को अडमान कमेटी का िनमाण िकया, िजसम डा. े डरक जान मोट सजन बगाल आम क अय ता म सिमित ने काय करना श िकया. िजसम प प से कहा गया िक खाड़ी ीप के तटॊं का बारक से िनरी ण करे एव उपय थान का चनाव करते हए वहाँ जेल का िनमाण िकया जा सके . सिमित के िनणय के ठीक प ह िदन प ात अडमान म िपनल सेटलमट श िकया गया. कैपटन हेनरी मान को शासन क ओर से यह आदेश िदया गया िक वह इस बड़े भभाग पर ि िटश यिनयन जैक फ़हराए और उसे अपने अधीन कर ले. इस तरह 22 जनवरी 1858 ई.को यिनयन जैक पताका को फ़हराया गया और इसी के साथ वह अ ेज का शासन श हो गया. रास ीप के जगल को साफ़ करके उसे राजधानी के प म िवकिसत िकया गया. िपनल सेटलमट के तहत 1857 के सैिनक, पजाब के गदर और बहावी िव ोिहय, मणीपर के िव ोही और अय ात से लाए गए भारतीय देश भ ने किठन पर म के बल पर जगल साफ़ करके , रास ीप को अ ेज शासन क राजधानी का प िदया गया. उस समय इन लाए गए देश भ को "कालापानी" सजा के प म अडमान म भयकर कपण ददनाक सजा काटनी पड़ती थी. अडमान से भारत क म य भिम क ओर लौटना लगभग असभव था. उन वातवीर को िमलने वाले क को यिद एक पल भर के िलए भी याद िकया जाए, तो शरीर म िसहरन होने लगती है. मन म एक अ ात भय समाने लगता है. 1858 को कालापानी सजा के प म पहला जथा 200 िसपािहय और उसके प ात लगातार सैकड़ भारतीय ाितकारय को यहाँ लाया गया, िजनका लेखे-जोखे का आज तक कोई अता-पता नह िमलता. वे सैकड़ ाितकारी, अपने देश क आजादी के िलए इस "कालापानी" धरती म सदा-सदा के िलए समा गए. भारतीय थम वतता स ाम के प ात अ े ज सरकार ने ाितकारय को कालापानी याने अडमान भेजना श िकया िक उह खतरनाक ाितकारय से सदा-सदा के िलए मि िमल सके . सेललर जेल-के नाम से कयात इस जेल का िनमाण अटलाटा पाईट क ऊँचाइय पर िथत है. इसका िनमाण 1896 1906 ईसव के बीच हआ. सन ी िकनारे पर एक पहरेदार के समान यह आज भी खड़ा है. जेल शहर के उ रीय पव िदशा म है. इस जेल क एक-एक ईट म ाितकारय के खन-पसीने का इितहास िछपा हआ है. यह जेल सात कतार म खड़ा है. हर कतार म तीन मिजल और सात ही कतार मिजले, एक टावर से जड़ी हई है. दर से देखने पर यह " टार िफ़श" क तरह या साइिकल के च के से जड़े पो स क तरह नजर आता है. जेल के मय भाग म िथत टावर से इस जेल क सात भजाओ को एक साथ देखा जा सकता है. जेल का िनमाण काय 1896 म श हआ था और 1910 म सपन हआ. यह इमारत एक गहरे भरे लाल रग क ईटॊं से बनी हई है. सेललर जेल म बनी 698 एकात कोठ रया 13.5 फ़ट लबी तथा सात फ़ट चौडी तथा दस फ़ट ऊँची है. कोठरी का लोहे का दरवाजा तीन फ़ट क लोहे क राड के साथ बद होता है. अधकारमय इन कोठरय का दरवाजा खोलना इतना आसान नह होता िक कोई भी जब चाहे दरवाजा खोल ले. येक कोठरी म 3(x)1 का विटलेटर बनाया गया है. इन कोठरय क बनावट इस कार से क गई है िक कोई भी ाितकारी न तो अपने साथी का चेहरा ही देख पाता था और न ही कोई ग िवचार कट कर सकता था. सारी क सारी कोठरया एक कतार म बनी है. दालान चार फ़ट चौड़ा है, जो कठोर लोहे से िघरा है. ये सभी दालान मय टावर से िमलते ह. जेल म वेश पाना और बाहर िनकलने के िलए एक ही रा ता है. सभी तीन गिलयारे, मय टावर सभी गिलयारे से जड़े हए ह. इन तीन गिलयार म एक वाडर, उप-गिलयारा म दसरा वाडर और मय गािलयारे म तीसरा वाडर, इस कार 21 वाडस गत डयटी म तैनात होते थे और ाितकारय क सभी गितिविधय पर नजर रखते थे. 12 घटे के राि काल म कै िदय को पेशाब के िलए एक िम ी का पा िदया जाता था, जो िक एक समय के पेशाब के िलए काफ़ था. अगर ट ी करने क बात आती तो उसके िलए अपने आप को काब म रखना होता था. जमादार क इजाजत के बगैर कोई भी कैदी को छॊड़ा नह जाता था. यिद कोई कैदी बीमार पड़ जाता तो उसक डा टरी जाच नह होती थी. उसे जेल के खखार जेलर बैरी के सामने हािजर होना पड़ता था. उसे अपताल भेजना या न भेजना, जेलर क मज पर िनभर होता था. या िफ़र उसे भगवान के सहारे पर िजदा रहना होता था. जेल के कठोर िनयम म एक िनयम यह भी था िक येक कैदी को एक िनि त मा ा म ना रयल का तेल या िफ़र सरस का तेल िनकालना होता था. यिद िकसी कारणवश कोटा परा नह होता था, तो ोधी जेलर पीट-पीट कर उसके शरीर क चमढ़ी तक उधेड़ देता था. कै िदय को बचे हए नारीयल को छीलकर ( जटा-जट ) रसी बनवाई जाती थी. उह तेल िनकालने क घानी म बैल क तरह को ह खचना पड़ता था. खाना भी पया मा ा म नह िदया जाता था. खाना अपने आपम इतना दिषत और िवषैला होता थी िक एक अछे -प इसान को बीमार बना दे. जली अधजली, कची-पक रोिटया, दाल ( िजसम पानी क भरमार यादा होती थी) और सजी परोसी जाती थी, िजनम कड़े-मकौड़ का पाया जाना आम बात थी. भोजन म नमक तो केवल नाम मा को ही होता था. सेललर जेल के िनमाण होने के पहले यह वाइपर ीप क जेल थी, िजसे ि िटश शासन ारा देश क आजादी क लड़ाई लड़ने वाल को तािड़त िकया जाता था. इस कयात जेल को नाम िदया गया था-" वाइपर चेन गईग जेल" ि िटश स ा को चनौती देने वाल के पैर को जजीर से जकड़ िदया जाता था. सेललर जेल क वा तकला " पैसे लेिनया" णाली या एकात णाली के िस ात पर आधारत थी, िजसम अय कै िदय से परी तरह अलग रखने के िलए येक कैदी को अलग-अलग रखने के िलए अलग-अलग कारावास देने का िनयम था. एक ही िवग या अलग िवगो म कै िदय के बीच िकसी भी कार का सचार सभव नह था. िपसाई करने वाली च क पर , बागवानी करने, गरी सखाने, रसी बनाने, नारयल क जटा तैयार करने, कालीन बनाने, तौिलया बनने आिद का काम करते समय कै िदय के हाथ म हथकड़ी जकड़ी हई रहती थी.. एकात कोठरी म कैद रहने, कई कई िदन तक भखा रखने क सजा इतनी भयावह और असहनीय होती थी िजसक कपना मा से शरीर म िसहरन होने लगती है. देश का यह सेललर जेल ाितकारय के िलए आजादी का ोत रहा है, यिक ि िटश शासन खतरनाक ाितकारय को इस जेल म भेजते थे. अयाचार के िव जब वे भख हड़ताल करने को मजबर हो जाते तो उन पर बेरहमी से लािठया भाजी जाती थी. कै िदय को प िलखने या पि काए पढ़ने क स त मनाही थी. साल म कै िदय को एक बार अपने घर प िलखने क इजाजत थी. उनक िलखी िचि य क बारक से जाच-पड़ताल होती थी. अ ेज के जम और अयाचार का मकाबला कछ ही कैदी कर पाते थे. बहतेर को अपनी जान तक गवानी पड़ी थी. कछ तो पागलपन का िशकार होकर काल-कविलत हो गए. सन 1908 म बने अडमान तथा िनकोबार गजेटीयर के अनसार िजन कै िदय को छः साल क सजा होती थी, उह जेल के कड़े अनशासन म रहना पड़ता था. िजह देढ़ साल क सजा दी जाती, उह किठन काम िदया जाता था. िजस कै िदय को तीन वष क सजा होती थी, उह बैरे स म रहना पड़ता था और जेल के अिधकारय के कठोर देखरेख म काम करना पड़ता था. काम के बदले कछ पैसा भी उह िमलता था. आगे चलकर कैदी अगले पाच साल के िलए मजदर कैदी के प म अपना जीवनयापन करता था. उसे छोटी िजमेदारी दी जाती थी. िजनक सजा क अविध दस साल क हो जाती थी, उसे खली आजादी का िटिकट िमल जाता था, वह अपनी शेष िजदगी िकसी गाव म खेती और जानवर पालकर िबताता था. उसे शादी करने का अिधकार ा होता था. अपनी आय का कछ िहसा प रवार को भेज सकता था,लेिकन कैदी अपने आप म वत नह होता था. वह सेटलमट के बाहर नह माना जाता था,लेिकन जो कैदी बीस-पचीस वष सेटलमट जीवन परा कर लेता था, उसे सेटलमट से छ ी दे दी जाती थी. दसरे महाय के दौरान अडमान तथा िनकोबार म जापानी हमला हआ, इस तरह इसका शासन जापान सरकार के अधीन हो गया. इस जापानी शासन के दौरान इन ीपवािसय को अनेक किठनाइय का सामना करना पड़ा. जैसे ख ान क भारी कमी, आम चीज का अभाव आिद. जापानी सैिनक थानीय लोग के घर म जबरन घस कर कोई भी चीज उठा लेते थे. इसका िवरोध करने का साहस करना किठन था. आए िदन जापानी महवपण िठकान पर ि िटश हवाई हमले होते थे. इससे खा ान भडार, अ-श का भारी नकसान होता था. जापािनय को शक था िक यहा के थानीय लोग अ ेज से िमलकर जाससी का काम करते ह. इसिलए जापानी सेना ने पढ़े-िलखे भारतीय क धरपकड़ श कर उह जेल म डाल िदया. कछ लोग को जासस होने का करार देकर उह जबरदती नाव म िबठाकर हैवलाक के सम म झक देते थे. इतना ही नह उनके ऊपर बोट तक घमा दी जाती थी, तािक वे जीिवत न बच पाए. थानीय लोग को मार-मारकर उनसे सड़क बनवाना, सरकारी मकान आिद बनवाने के काम पर लगाया जाता था. 26 िदसबर सन 2004 को ेट िनकोबार और िलिटल अडमान म 8.9 क ती ता वाला भकप आया, िजसम सम क लहर बेकाब हो गई और देखते ही देखते उस े के सम ी िकनारे पानी से भर गए और जनजीवन तहस-नहस हो गया.आदमी, औरत, बचे पागल क तरह ऊँचाई वाली जगह पर भागने लगे, हजार जानवर जहाँ क तहाँ अपनी जान गवा बैठे. नारीयल और सपाड़ी और मसाल के बागीचे परी तरह तहस-नहस और बरबाद हो गए. इस सनामी क शआत इडोनेिशया देश के समा ा ीप से हई. इस िवनाशकारी सनामी ने समा ा, ीलका, थाईलै ड और भारत के तािमलाड और िनकोबार एव अडमान ीप को बरी तरह से भािवत िकया. इतना ही नह सनामी के प ात यहाँ का मख वालामखी ीप "बैरन" जविलत हो उठा. इस सनामी के कोप से सेललर जेल भी बरी तरह से भािवत हआ. उसके कई िहसे सनामी क भट चढ़ गए. कमार घोष, अ ेज ने बहत सारे लोग को कालापानी क सजा सनाई थी, िजसम अिधकाश वतता सेनानी थे. िवनायक दामोदर सावरकर, सावरकर के भाई बाबराम सावरकर, डा दीवान िसह, योगे शला, होतीलाल वमा, बाबा भानिसह, वार ाितवीर बटके र द , िफ़ड माशल सपादक लाराम, मौलाना अहमदौ ला, मौलवी अदल रहीम सािदकपरी, भाई परमानद, मौलाना फ़जल-ए-हक खैराबादी, शदलच चटज, सोहन िसह, बबन जोशी, नद गोपाल, महावीर िसह आिद को कालापानी का दश झेलना पड़ा था. अ ेज क रता इतनी बढ़ चक थी िक अब वह सहनशि के बाहर ही बात थी. भगतिसह के दो त महावीर िसह जेल म भख हड़ताल पर बैठ गए. जब अ ेज को इसक सचना िमली तो उहने और जम ढाना श कर िदया, लेिकन वे उनक भख हड़ताल को रोक नह आए. अत म उह दध म जहर िमलाकर जबरन िपलाया गया, िजससे उनक मौत हो गई. उनका दाह-सकार न करते हए र अ ेज ने उसके शव को पथर म बाधकर सम म फ़क िदया, तािक िकसी को उसके बारे म कोई खबर न लगे, लेिकन खबर ही कछ इस कार क थी, िजसके फ़ैलते ही जेल के सारे कैदी भख हड़ताल पर चले गए. बाद म महामा गाधी जी के हत ेप के चलते 1937 38 म कै िदय को वािपस भारत भेज िदया गया. 1932 से लेकर 1937 के दौरान िवशेष प से सामिहक भख हड़ताल का सहारा िलया गया. अितम भख हड़ताल जो जलाई 1937 से श हई थी, यह 45 िदन तक जारी रही थी. अततः सरकार को दडामक उपिनवेश को बद करने का फ़ैसला लेना पड़ा और सेललर जेल के सभी राजनीितक कै िदय को जनवरी 1938 तक भारत क म य भिम पर अपने-अपने रा य म वािपस भेज िदया गया. सन 1941 म सभाषच बोस मौलवी बनकर पेशावर, काबल होते हए बिलन जा पहँचे थे. वहाँ वे िहटलर से िमले और अत म िसगापर आकर ाितकारी नेता रासिबहारी बोस क सहायता से भारतीय िसपािहय को एकजट करके "आजाद िहद फ़ौज" क थापना क. जापान सरकार ने नेताजी को परा समथन िदया. उनक सेना म डा.कै टन लमी सहगल मिहला बटािलयन क मख थ. 29 िदसबर 1943 को सभाषच बोस ने आजाद िहद सरकार ारा ीप पर राजनीितक िनयण करने का मसौदा तैयार िकया. उसे पारत िकया और भारतीय रा ीय सेना का ितरगा फ़हराने के िलए पोटलेयर का दौरा िकया. और 30 िदसबर 1943 को ितरगा फ़हराकर भारत क आजादी का शखनाद िकया था. आज न तो उन कालकोठरय म कोई कैदी है और न ही कोई वतता स ाम सेनानी है, लेिकन वे सभी कालकोठरया उन तमाम वततावीर क दा तान कह सनाती है, िजसे सनने और अनभव करने के िलए उन िदन को याद करना होगा. सेललर जेल क एक -एक ईट आज उन तमाम महान देशभ और वतता सेनािनय के आमानवीय क ॊं को और पीड़ाओ को देखने-समझने वाला मक दशक के प म खड़ा है. यहाँ क एक-एक ईट, बि क यहाँ का जरा-जरा उस ददनाक कहानी को सना रहा है अपनी मक वाणी म. उन सभी ाितवीर को हमारा शत शत नमन. भारत के यशवी धानम ी मान. ी नरे मोदी जी ने 30 िदसबर 2018 िदन रिववार को अडमान-िनकोबार ीप समह पहँचे और उहने तीन ीप को नया नाम िदया. अपने कायकाल म पहली बार यहाँ पहँचे मोदीजी ने नेताजी सभाषच बोस के यहाँ ितरगा फहराने क 75व सालिगरह पर रोस आइलड का नामकरण उनके नाम पर करने क घोषणा क-"अब इसे "नेताजी सभाषच बोस ीप" के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा नील आइलड को "शहीद ीप" और हेवलॉक आइलड को " वराज ीप" के नाम से पहचान िमली. ात हो िक ि तीय िव य म अडमान-िनकोबार पर जापानी सेना के कजे के बाद 30 िदसबर, 1943 को यहाँ पहचे नेताजी सभाषच बोस ने ही अडमान-िनकोबार का नाम बदलकर शहीद और वराज ीप करने क सलाह दी थी. अपना सबोधन श करने से पहले धानम ी ने उपिथत जनता से अपने मोबाइल क लैश लाइट जलाकर नेताजी और आजाद िहद फौज के शहीद को ाजिल देने का आह िकया. इस पर हजार मोबाइल क लाइट से टेिडयम तकाल ही जगमगा गया. इससे पहले धानम ी मरीना पाक पहचे और यहाँ 150 फट ऊचे रा ीय वज को फहराया. साथ ही नेता जी क ितमा पर पप चढ़ाकर उह ाजिल अिपत क. धानम ी ने इस िवशेष िदन पर नेताजी के यहा ितरगा फहराने क मित म मारक डाक िटकट और 75 पये का िसका भी जारी िकया. धानम ी ने से यलर जेल का भी दौरान िकया और उन शहीद व वतता सेनािनय को ाजिल दी, िजह अ ेज शािसत भारत से यहाँ राजनीितक बदी के तौर पर "सजा-ए-काला" पानी देकर िनवािसत िकया जाता था या फासी पर लटका िदया जाता था. वष 1896 म श होकर 1906 म परी हई इस जेल म बहत सारे नामी वतता सेनािनय को बद रखकर यणाए दी गई थ. धानम ी जेल परसर म उस बैरक म भी पहचे, िजसम िहदव िवचारक वीर सावरकर को रखा गया था. बैरक म पहँचने पर सावरकर के फोटो के सामने मोदी फश पर बैठ गए और कछ समय के िलए अपनी आख बद करते हए हाथ जोड़कर यान जैसी म ा बना ली. बैरक से िनकलकर वह क ीय टॉवर म गए, जहा उहने सगमरमर पर िलखे गए यहा कैद रहे लोग के नाम पढ़े. उहने कहा-" वीर सावरकर, बाबा भान िसह, इदभषण राय जैसे शहीद क बैरक िकसी मिदर से कम नह मानी जा सकती. उहने फासीघर भी देखा, जहा एकसाथ तीन लोग को फासी देने क यवथा थी और िफर यिजयम म जाकर िविजटर- बक म हता र भी िकए. आज यह कयात सेललर जेल िनःश द खड़ा है. उसके पास अपनी दासता सनाने के िलए बहत कछ है. लेिकन मन म इतना दद छपाए हए है िक बतलाना भी चाहे, तो बतला नह पाएगा. िकस-िकस का दद सनाएगा वह?, िकस-िकस क क ण कहानी सना पाएगा वह?. िवि अव था म रहते हए कछ भी नह सना पाने का दद मन म समाए हए उसने मौन रहना ही ेयकर समझा. केवल बावरी हवा उन क के च कर लगाकर लौट आती है गमसम-गमसम- सी...िबना कछ बोले चपचाप लौट जाती है. अगर इसक बेजान दीवार कछ बोलना भी चाहे, तो कछ नह बोल-बता पाएगी, यिक उनम मन म ि तािनया हकमत का खौफ़ भीतर गहराई तक घर कर गया है. ठीक है. आज उसके भीतर न तो कोई ाितकारी है और न ही कोई राजनीितक कैदी. सारे क सने पड़े ह, जो अपना दद बया करते नजर आते ह. िकसी तरह साहस बटोरकर हम जा पहँचे उस ऐितहािसक क म, िजसम वीर सावरकरजी को कैद करके रखा गया था. सावरलरजी को इसी क म दस साल तक कैद करके रखा गया था. इस क म वेश करने से पव दाई ओर एक बद कमरा सा िदखाई देता है. उससे सटा एक दरवाजा भी है जो िक बाहर सम क तरफ़ खलता है. यह फ़ासी सेल है, यह दो िह स म बटा हआ है. ऊपर के िहसे म तीन फ़दे है और नीचले िहसे म साफ़ फ़श.ऊपरी िहसे म फ़ासी िदए जाने के बाद फ़ ॆ हटते ही शव नीचे चला जाता था. िफ़र वहा से शव को िनकालकार िकती के जरए सम के बीच म बहा िदया जाता था. फ़ासी िदए जाने का का िणक य सावरकरजी क कोठी से साफ़-साफ़ देखा जा सकता है. ि तािनया हकमत चाहती थी िक सावरकर इसे अपनी आख से देखे और मानिसक प से टटकर अ ेजी हकमत के सामने झक जाए. बावजद इसके वे नह टटे और न ही झके . आज आपका नाम भारत के इितहास म वणा र म िलखा गया है. उस क म हमने वेश िकया और नम आख से उह अपनी भाव-समन अिपत िकए और एक गहरी चपी और उदासी िलए लौट आए. यहाँ से लौटकर हमने "कोरबाइस कोव बीच" पर आकर वहाँ के नैसिगक याविलय को जी भर िनहारा. "कोरबाइस कोव बीच" पोटलेयर से लगभग छः िकमी क दरी पर यह बीच सघन ना रयल व और पाम व से िघरा हआ है, यह बीच सैलािनय के िलए वाटरपोटस के िलए िस है. यहाँ होटेल, बार तथा रे टारट आिद चर मा ा म उपलध है. बीच म वेश करने से पव आपको यहाँ जापानी बकर भी देखने को िमलता है. ि तािनया सेना क बमबारी से बचने के िलए जापािनय से यहाँ बकर बनाया था. 16-09-2022 सबह चाय-पानी के प ात हमारा अगला पड़ाव था-रोज आईलड और नोथ-बे (कोरल आईलड) क ओर. रोस आईलै ड (Ross island) (नेताजी सभा षच ीप) रोज आइलड रोज ीप अडमान और िनकोबार ीप समह का एक ीप है , जो पोटलेयर से 2 िकमी. दरी पर अविथत है. शासिनक प से दि ण अडमान िजले के अतगत आता है और यह पोटलेयर से 40 िकमी.पव र म िथत है. इटािलयन इजीिनयर िजआिजव रोसा ने सन 1968 को इस ीप को बसाया था. यहाँ पर िटबर जैसी लकिड़याँ चर मा ा म पायी जाती है, यहाँ क ह रयाली पयटक का मन मोह लेती ह. सम का पानी देखने म नीला दीखता है. बगाल क इस खाड़ी के जल े म अनत लैगन, रग िबरगी मछिलया अठखेिलया करती िमलेग. यहाँ पर सेललर जेल मानव िवकास के इितहास को िचि त करता सहालय , सम सहालय. लघ उ ोग सहालय आिद देखने को िमलते ह. यह नील ीप के प म भी जाना जाता है.कभी यह शासिनक म यालय था, लेिकन वतमान म यह िनजन ीप है. इसक ाकितक सदरता मन मोह लेती है. 1941 म आए भकप के प ात अ ेज ने इस आईलड को छोड़ िदया था. घने जगल के बीच से गजरते हए आप एक चच, एक टोर म, एक टेिनस कोट, अपताल. कि तान, ि िटग ेस सिहत सिचवालय भी देख सकते ह. ये काफ़ पराने समय के ह और आज खडहर के प म खड़े हए ह. कोरल आईलड पोटलेयर-( north bay (coral iland). इस ीप के दो म य आकषण है. पहला-सम के गहरे पानी म खबसरत कोरल देखने को िमलते ह और दसरा यहाँ का लाईटहाउस देखने लायक है. नोट-बीस पए के नोट के पभाग पर छप इस लाईटहाउस क तवीर देखी जा सकती है. घने जगल के बीच बनी करीब चार सौ सीिढ़य से नीचे उतरकर आप इस "लाईटहाउस" तक पहँच सकते ह. यहाँ का नजारा देखकर पयटक ममध हो उठता है. यहाँ से लौटकर हमने होटेल म राि का भोजन और िव ाम िकया. 17-09-2022 सबह होटेल छोड़ने से पव हमने हका जलपान िकया और "हैवलाक ीप" ( वराज ीप) क ओर थान िकया वराज ीप पहचने से पहले आपको "मैक लोिजि टस ( ा.िलिम.) क जे ी िजसका िकराया 1155.00 पया ित यि है ,सवार होकर, गरजते-उफ़नते महासागर का सीना चीरते हए आगे बढ़ते है. वराज ीप (हैवलाक ीप) पोटलेयर से 41 िकमी.पव र म िथत है. वराज ीप के कई िनवासी बालादेश वाधीनता य के दौरान आए शरनाथ और उनके वशज ह, िजह भारत सरकार ने यहा बसाया था. यहा पाच गाव ह- गोिवदनगर, िवजयनगर, यामनगर ,कणनगर और राधानगर. 55 िकमी. क दरी पर प मी तट पर बसे राधानगर को एिशया का सव म तट घोिषत िकया गया है. इस बीच पर आप सफ़ेद रेत, सम का नीला पानी देखने को िमलेगा. यहा आप लजीज सीफ़ड का मजा ले सकते ह. इसके अलावा यहाँ एिलफ़ट बीच, िवजय बीच, नगर बीच और कालापथर बीच भी देखने को िमलते है. सफ़ेद बाल वाला हैवलाक ीप ( वराज ीप) आइलड मग क च ान और हरे-भरे जगल से िघरा हआ है, जो इसक सदरता म चार चाद लगा देता है. यहा आप वाटर- पोटस का मजा ले सकते है. इसके अलावा आप कबा डाईिवग, नोकिलग, े िकग, िफ़िशग और सी लाक जैसी वाटर एडवचर का आनद ले सकते ह. हैवलाक ीप क रोमाचक सैर के बाद हमने होटेल म भोजन और िव ाम करने के बाद एलीफ़ईटा बीच, राधानगर बीच क सैर क और राि म यह िव ाम िकया. 18-09-2022 हमारा अगला पड़ाव था- नील आइलड-( शहीद ीप) नील ीप अडमान ीपमह के कई खबसरत ीप म से एक है. यह ीप पोटलेयर से लगभग 37 िकमी दर िथत है. " मैक लोिजि टक ा.िल. के जहाज पर, िजसका िकराया ित यि 1155.00 पया है, सवार होकर इस खबसरत ीप पर उतरे. (भारत के यशवी धानम ी ी नरे मोदीजी ने 30 िदसबर 2018 को इस ीप का नाम बदलकर "शहीद ीप" रखा था.) यहा के तटॊं पर गजब क शाित और दर-दर तक फ़ैले सम म उठती लहर को उठता देख, आपका आनद ि गिणत हो उठता है. अडमान के दि ण म 37 वायर िकमी. म फ़ैला छोटा लेिकन बहत ही खबसरत ीप है यह. कोरल रीफ़ और बेहतरीन बायोडायविसटी के िलए जाना जाता है. यहा िदसबर के अत और जनवरी मिहने के ारभ म " बाब सभाषच बोस जी" क पावन मितय को सजोने के िलए मेले का आयोजन िदया जाता है. यह मेला बोस जी क जयती का तीक है. नील आईलड के आसपास ल मणपर, भरतपर, और सीतापर बीच भी ह, जो रामायण के पौरािणक िकरदार से े रत है. बेहतरीन रजाटस आप यहाँ देख सकते ह. अयत ही खबसरत इन ीप का नैसिगक आनद उठाने के बाद हमने नील ीप म राि िव ाम िकया. 19-09-2022 सबह चाय-ना ता से िनव होकर हम नील ीप से पी.एम.बी.जे ी पर सवार होकर पोटलेयर आए. पोटलेयर क होटल म भोजन आिद से िनव होकर हमने नेवी का यिजयम "सम ीका", मानव िव ान यिजयम, मछलीपालन यिजयम देखा. और राि म उसी होटेल म िव ाम िकया. 20-09-2022 स वालामखी -"बैरन" एव चना पथर क गफ़ाए. िबना चाय-पानी के बड़ी सबह हमने होटेल से िनकलकर जे ी पर सवार होकर "बाराटग" क ओर थान िकया. इस थान पर "चना पथर क गफ़ाए" और "स वालामखी- बैरन" को देखा जा सकता है. चना पथर क गफ़ाए देखने के िलए एक नौका पर सवार होकर एक िनि त थान तक (लगभग दो िकमी.) पैदल चलना होता है. और स वालामखी देखने के िलए एक जीप पर सवार होकर कछ दर जाने के बाद आपको एक खास ऊँचाई पर जाकर इस वालामखी को देखा जा सकता है. बैरन (यह अडमान िनकोबार ीप समह वालामखी- क राजधानी पोट लेयर खाडी से लगभग 138 िकलोमीटर उ र पव म बगाल क म िथत है). "बैरन वालामखी" ीप अडमान ीप म सबसे पव ीप है. यह भारत ही नह अिपत दि ण एिशया का एक मा सि य वालामखी है. वालामखी हर िकसी पहाड़ से नह िनकलते ह; यह यादातर वहा पाये जाते है जहाँ टेकटोिनक लाट म तनाव हो या िफर पवी का भीतरी भाग बहत गम हो. यह ीप भारतीय व बम टेकटोिनक लाट के िकनारे एक वालामखी खला के मय िथत है. तीन िकलोमीटर म फैले इस ीप का वालामखी का पहला रकॉड सन 1787 का है. तब से अब तक यहाँ दस बार वालामखी फ़ट चके है. आज भी यहाँ धआ िनकलता देख जा सकता है. 'बैरन' शद का मतलब होता है - बजर, जहाँ कोई रहता नह हो. यह ीप अपने नाम पर गया है, यहाँ कोई मनय नह रहता. कछ बकरया, चहे और प ी ही यहाँ िदखाई दे जाते ह. चना पथर क गफ़ाए एव बैरन स वालामखी देखने के बाद हम अपनी होटेल म लौट आए और 21-09-2022 क सबह हमने अपनी या ा समा कर पोटलेयर के वीर सावरकर हवाई अडडॆ के िलए थान िकया, जहाँ हमारा टाटा प का यान " िवतारा-UK778 कोलकाता के सभाषच बोस अतररा ीय के िलए उडान भरने को तैयार खड़ा था. इस यान ने 11.55 पर उड़ान भरी और कोलकाता 14.20 बजे पहँच गया. चिक हमारी े न कोलकाता के शालीमार टेशन से राि के साढ़े आठ बजे क थी,लेिकन िकही अप रहाय कारणॊं से सारी े ने र कर दी गई थ.. इस तरह हम िफ़र से अय होटेल क तलाश कर राि िव ाम करना पड़ा. चिक सभी े ने परचालन के िलए र कर दी गई थ अतः वे कब श होगी, कब नह. कहा नह जा सकता था. अतः हमने कोलकाता से नागपर के िलए इिडगो क लाइट 6E 291 बक क जो दसरे िदन राि के 20.55 पर थी. इस तरह हम नागपर राि के लगभग 11.30 बजे पहचे और वहा से टै सी से राि के दो बजे के लगभग हम अपने घर िछदवाड़ा लौट आए. या ा से लौटकर आए हए करीब दस िदन बीत चके ह, लेिकन मितय म अडमान म िबताए रोमाचक ण क याद बरबस ही पलट-पलट कर याद आती ह. याद आता है- गरजता- उफ़नता महासागर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ क अिवरअल खलाए, कभी मद तो कभी तेज गित से वहमान होती सम ी हवाए, पाम और सपाड़ी के मकराते घने जगल, और सेललर जेल क भयावह मितया, उन ात और अ ात ाितकारी वीर क मितया िजह ने भारत माता को गलामी क बेिड़य से म कराने के िलए अपना सवव योछावर कर िदया. उनक मितय को याद करते हए िसर ा से झक जाता है और दोन हाथ आपस म जड़ जाते ह. उन तमाम ाितकारी वीर को हमारा नमन.बारबार नमन िजनके ाितकारी अिभयान के चलते आजादी क अलख जगायी गयी थी. भारत के वततावीर को हमारा नमन. बारबार नमन. --------------------------------------------------------------------------------------------------- ( अखबार पि का-24-01-2023) अडमान-िनकोबार के 21 ीप को िमला नाम, शरवीर को स मान -------------------------------------------------------------- धान म ी ी नरे मोदीजी ने सोमवार को िविडयो का िसग के मा यम से अडमान-िनकोबार ीप-समह के 21 ीप का नामकरण 21परमवीर च िवजेताओ के नाम करते हए कहा िक पहले इन ीप पर गलामी क छाया थी. परा मा िदवस के प म मनाई जा रही नेताजी सभाषच बोस क जयती पर अडमान-िनकोबार ीप समह म नए नामकरण से नया इितहास िलखा जा रहा है. 21 परमवीर च परकार िवजेताओ के नाम वाले ीप क सची: ---------------------------------------------------------------------------------------------------- • लेि टनट कनल (तकालीन मेजर) धन िसह थापा के नाम पर धन िसह ीप •लेि टनट कनल अदिशर बजरजी तारापोर के नाम पर तारापर ीप • लास नायक करम िसह के नाम पर करम िसह ीप • नायब सबेदार बाना िसह के नाम पर बाना ीप • लास नायक अबट एका के नाम पर एका ीप • सेकड लेि टनट अण खे पाल के नाम पर खे पाल ीप •लेि टनट मनोज कमार पाडेय के नाम पर पाडे ीप • मेजर होिशयार िसह के नाम पर होिशयार ीप • मेजर शैतान िसह के नाम पर शैतान ीप • नायक जदनाथ िसह के नाम पर जदनाथ ीप • सबेदार मेजर योग िसह यादव के बाद योग ीप • कपनी वाटरमा टर हवलदार (CQMH) अदल हमीद के नाम पर हािमद ीप • सेकड लेि टनट रामा राघोबा राणे के नाम पर राणे ीप • मेजर रामा वामी परमे रन के नाम पर रामा वामी ीप • कै टन िव म ब ा के नाम पर ब ा ीप • सबेदार जोिगदर िसह के नाम पर जोिगदर ीप • कै टन जीएस सलारया के नाम पर सलारया ीप • कपनी हवलदार मेजर पी िसह के नाम पर पी ीप • मेजर सोमनाथ शमा के नाम पर सोमनाथ ीप • लाइग ऑिफसर िनमलजीत िसह सेख के नाम पर सेख ीप • सबेदार मेजर (तकालीन रायफल मैन) सजय कमार के नाम पर सजय ीप। ------------------------------------------------------------------------------------------------- The 21 Param Vir Chakra awardees, after whom the islands will be named are as follows, Major Somnath Sharma; Subedar and Hony Captain (then Lance Naik) Karam Singh, MM; 2nd Lt. Rama Raghoba Rane; Nayak Jadunath Singh; Company Havildar Major Piru Singh; Capt GS Salaria; Lieutenant Colonel (then Major) Dhan Singh Thapa; Subedar Joginder Singh; Major Shaitan Singh; CQMH. Abdul Hamid; Lt Col Ardeshir Burzorji Tarapore; Lance Naik Albert Ekka; Major Hoshiar Singh; 2nd Lt. Arun Khetrapal; Flying Officer Nirmaljit Singh Sekhon; Major Ramaswamy Parameswaran; Naib Subedar Bana Singh; Captain Vikram Batra; Lt Manoj Kumar Pandey; Subedar Major (then RifleMan) Sanjay Kumar; and Subedar Major Retd (Hony Captain) Grenadier Yogendra Singh Yadav. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 13, कित क अनपम देन--फ़ल क घाटी फ़ल क घाटी (उ राखड) यॊं तो रग-िबरगे पप सव पाए जाते ह, पर नदन वन के ाकितक पपो ान क छटा ही िनराली है. इस उ ान को लेकर महाभारत म एक सग आता है. एक बार अजन ने ोपदी को कछ देने क कामना क. कछ न कछ लेने के िलए, जब अजन िजद करने लगे, तो ोपदी ने कहा-“ यिद आप कछ लाकर देने क िजद ही कर रहे ह तो मझे नदन-वन से पारजात का पप ला द, जो जल म नह, पथर म पैदा होते ह, िजनक सगध कतरी-मग से भी मादक होती है, िजसका सदय िद य सदय क अनभित करा देता है.” अजन चले और नदन वन जा पहचे. वहा के र क से उह य लड़ना पड़ा, तब कह एक फ़ल दौपदी के िलए ला सके . महाभारत क यह कथा सभवतः कपना अिधक, तय कम जान पड़ता हो, िकत यह कपना नह, आयजनक रहय है िक ऎसा नदन वन आज भी इसी भारतभिम म वैसे ही िवयमान है जैसी महाभारत म कथा आती है. सम सतह से 13,200 फ़ट ऊँचा यह िहमालय क गोदी म िथत आज भी “फ़ल क घाटी” के नाम से िव िव यात है. ितवष हजार देशी-िवदेशी पयटक यहाँ पहँचते और जहाँ, वहाँ क मादक छटा को देखकर मध होते ह, वह यह आय भी है िक 10-15 मील े म ाकितक तौर पर उगते आ रहे, इन हजार कार के िच-िविच पप को िकसने रपा ?. सारे ससार म ऎसा कोई भी थान नह जहाँ ाकितक तौर पर इतने अिधक, इतने सदर, इतने वणॊ के पप िखलते ह. िवशेष का अनमान है िक यह फ़ल कित क उतनी देन नह है िजतना इस बात क सभावना िक यह पौधे अतीत काल म सिनयोिजत तरीके से िवकिसत िकए गए ह. सभव है यह जो राजो ान रहा हो. यह भी सभव है िक यहाँ कभी िकसी महिष का तपोवन रहा हो. जो भी हो- महाभारत काल के बाद, यह थान उन सकड़ रहय क तरह छपा ही रहा, िजसके िलए ितवष देश-िवदेश के सैकड़ पवतारोही आते और िहमालय के आय खोजने का यन करते ह. जहाँ अनेक धािमक यि य का यह िव ास है िक िहमालय म राजाओ ारा िछपाए हए खजाने ह, य के बहमय पा , आभषण और अ ह, वहाँ पवतारोिहय का यह कथन है िक िहमालय क येक वनपित औषिध है. जहाँ धािमक अि नयाँ थािपत ह, ऎसे-ऎसे ग आम ह, जहाँ अध-सह आय के सत-महामा समािधथ ह, वहाँ पवतरोिहय ने िहममानव क कपना ही िहमालय म नह क, उनके पदिचह भी देखे ह. आिद साधना भिम होने के कारण यह िव ास है िक िहमालय म अयाम-िव ान क वह अ य तरगे, वह ान अब भी िवयमान है िजसे ा कर. इस भौितक यग क सपण जड़वादी मायताओ, परपराओ, िस ात को बाल क दीवार क तरह बदला जा सकता है. “पप घाटी” ऎसे-ऎसे रहय क ही पि का एक माण है. इस थान क खोज सबसे पहले ि िटशकालीन भारतीय सेना के एक क ान ने क थी. उसने यहाँ के सैकड़ कार के फ़ल के बीज एक कर इलै ड भेजे. एक पतक भी लदन म कािशत क गई, िजसम इस फ़ल क घाटी को कित का अ त चमकार कहकर पकारा गया. तब से अनेक िवदेशी खोजी आते रहे और भटक-भटक कर लौटते रहे. पर इलै ड क ीमती जान लेग को दबारा यह थान िफ़र िमल गया. उहने यहाँ से लगभग 500 फ़ल के बीज इक े कर लदन भेजे. अब तो वहाँ पहचने के क तमाम सिवधाए हो गई ह इसिलए कोई भी वहाँ जा सकता है, पर अभी हमारे िहमालय म ऎसा बहत कछ है जहाँ तक हम जा सकते. वहाँ जा सके होते और उसके अनत रहय म से कछ का भी पता लगा सके होते, तो देखते िक िजन वतओ के िलए हम िवदेश के आि त ह, दसर का मँह ताकते है, वह और उनसे े वतएँ हम अपने ही भीतर से िनकाल सकते ह. तीथ-या ा और आमक याण के िलए साधनाओ क ि से अब िहमालय ही एक पय़ थान बचा है. वहाँ िच ाकषक शाित है, अतिलत ाण और सदय भरा है. उसम जो एक बार इस पप घाटी को देख आता है, उसे िहमालय का सदय भलता नह. पप घाटी तक पहँचने के िलए जोशीमठ पहँचना होता है. वहाँ से ब ीनाथ को जाने वाली सड़क पर मय म गोिवद घाट पर उतरना पड़ता है. यहाँ से पैदल चढ़ाई है और आगे घाघरया तक क सात मील क दरी को पार करने के िलए परा एक िदन लग जाता है. घाघ रया से कल एक घटे म म य घाटी पहँच जाते ह. उसक दािहनी ओर “कबेर भडार” पवत और आगे “कामेट चोटी” है. बाई ओर स ा ाग पवत क चोिटयाँ ह. कामेट झरना सामने ही बहता हआ िमल जाता है. यडर ाम पर पहँचते ही यह “पप घाटी” िमल जाती है और अनेक कार के गलाब, कमिदनी, गलदाऊदी, िसलपाड़ा, जगली गलाब, च पा, बेला, जही और कछ फ़ल तो ऎसे ह िजनके नाम वैिदक सािहय म ह पर अब उनक सही जानकारी करना किठन है. अ ेज ने इनके नाम “बड आफ़ पमडाइज, लाडेओली, िहमालयन, आरिकड िहिबटकम आिद रख िलए ह. कथीड के सफ़ेद व बगनी फ़ल के गछे बड़े मोहक लगते ह. बरास फ़ल तो गलाब के सदय को भी मात कर देता है. जब यह बरास परी तरह अपनी ऋत म फ़लता है तो यह वन नदन वन या वग से भी सहावना तीत होता है. िकतना ही देखो-- न तो आँख थकती ह और न ही वहाँ से हटने का ही जी करता है. वष भर इसी तरह िकसी न िकसी फ़ल क शोभा बनी ही रहती है. 3000 से अिधक िविभन फ़ल िविभन समय म फ़लते रहते है. ( कमल) कमल भी यह पाया जाता है. कमल जल म ही हो सकता है पर कित के ससार म या बधन ?. उसने यहाँ प थर म कमल उगाकर िदखा िदया है िक उसक स ा सवशि मान है. यह कमल ेत रग का होता है, इसक सगध ऎसी जाद भरी होती है िक हक-सी महक से ही अनत सख और शाित का आभास होता है. इसिलए इसका नाम -कमल पड़ा है. इसे पाकर ही ोपदी क इछा पण हई थी. फ़ल कह भी हो, वह तो कित का उम सदय है. जो लोग अपने घर के आस-पास थोड़े-से भी फ़ल के पौधे लगा देते ह तो वह थान इतना अछा और आकषक लगने लगता है िक बार-बार वहाँ जाने का मन करता है, िफ़र एक ऎसे देश म पहँचकर जहाँ 10 इच से लेकर 28 इच ऊँचाई के पौधे केवल फ़ल से ही आछािदत ह, उस थान के सदय का वणन ही या िकया जा सकता है. यह थान तो ई र या उस िदय आमा के समान है, िजसके इस सदय और आनद क अनभित तो हो सकती है, अिभ यि नह. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 14. महगा नह है सौदा. ( सात योितलगो के िदय दशन ) ( मा या ा 29 जनवरी से 6 फ़रवरी 2016 ) 7465/- (सात हजार चार सौ पैसठ पये) म सात योितिलग के दशन करना महगा सौदा नह है. आई.आर.सी.टी.सी. हािलडे टर पैकेज के अतगत चलने वाली “भारत दशन” पेशल े न देश के िविभन अचल से चलाई जा रही है, म या ा करना महगा नह पड़ता. एक िनधारत टेशन से यह या ा श होकर उसी थान पर आकर ठहर जाती है. इसक कछ खािसयत है, जो इसे आरामदायक बनाती है.(1) इस े न म वही या ी सफ़र कर सकते ह,िजहने अपना रजवशन बक करवा िलया है.(2) सामाय या ी इसम सफ़र नह कर सकते.(3) आपक अपनी सीट िनधारत कर दी जाती है,िजसम आप आराम से सो-बैठ सकते ह (4) दशन के िलए जाते समय आपको अपना सामान उठाकर कह नह ले जाना पड़ता (5) सर ा गाड क िनयि क जाती है,िजससे आपका सामान सरि त रहता है.(6) दशन के िलए जाते समय आपको अपनी कमती वतएँ जैसे सोने-चादी के जेवरात, मोबाईल सेट आिद अपने पास रखना होता है.(7) सबह के पाच बजते ही आपको अपनी सीट पर गरमा-गरम चाय सव क जाती है. सामायतः इस समय िमलने वाली चाय उन याि य के िलए होती है, जो सगर क िबमारी से िसत होते ह. ठीक पाच-दस िमनट बाद मीठी चाय, और काफ़ का आनद या ी ले सकता है.(8) िदन के यारह बजते ही आपको गरम-गरम खाना सव िकया जाता है. इसी तरह रात के आठ बजते ही आपको खाना िखला िदया जाता है.(9) येक या ी को एक टील के थाली दे दी जाती है, िजसक समिचत सफ़ाई या ी को खद करनी होती है. खाना परोसने के पहले थाली के आकार क लाि टक क पनी हर या ी को दी जाती है. या ी उसे अपनी थाली म करीने से जमा लेता है. उस पर खाना परोसा जाता है. खाना खाने के बाद पनी एक डटबीन म डालना होता है. इस ि या से पानी क काफ़ बचत तो होती ही है, साथ ही थाली साफ़-सथरी बनी रहती है...(10) हर कोच म एक बड़ा कटेनर रखा होता है,िजसमे कचरा डालना होता है.(11) अपने िनधारत टेशन के अलावा यह कह नह कती है. अतः या ा म उबाऊपन महसस नह होता. इस नौ िदवसीय या ा म शािमल होने के िलए हमने काफ़ समय पव ही अपना रजवशन करवा िलया था. िछदवाड़ा से रवाना होने वाली े न “पातालकोट एस ेस” से हमारा परवार इटारसी रे वे टेशन के िलए रवाना हआ. िदनाक 29 जनवरी को जबलपर से चलने वाली यह पेशल े न तीन बजे के करीब रवाना होकर इटारसी करीब सात बजे शाम को पहचती. इसका दसरा टापेज हबीबगज( भोपाल) रखा गया था, तािक शेष या ी इस पर सवार हो सक मेरे अपने अनमान के अनसार करीब छः सौ या ी इस े न म सफ़र कर रहे होते ह. िदनाक 30 जनवरी 2016 को यह े न उजैन म कती है. या ी उजैन म महाकाले र के दशन पाकर कताथ हो उठता है. इनके दशन के प ात पेशल बस ओमकारे र के िलए रवाना होती है, जहाँ या ी ओमकारे र और ममले र योितिलग के दशन करता है. ( 31 जनवरी) यहाँ से लौटकर े न का रात का सफ़र श होता है. परी रात चलने के प ात यह े न ारका म आकर ठहर जाती है.( 1 फ़रवरी 2016) ारकाधीश भगवान ी कण के दशन के प ात नागे र योितिलग के िद य दशन या ी करता है. इस या ा के प ात परी रात या ा का म जारी रहता है. (02-02 2016) गजरात म अविथत सोमनाथ योितिलग दशन के बाद या ी भेट- ारका के िलए टीमर पर सवार होकर भगवान ीकणजी के िद य दशन कर अपने को बड़भागी मानता है. (03-02-2016) को परी रात या ा करने के प ात े न नािसक जा पहँचती है, जहाँ यबेके र योितिलग के दशन होते ह. सारी रात चलती हए े न (04-02 2016) अब पणे जा पहँचती है. यहाँ से या ी को करीब एक सौ पचास िकलोमीटर दर िथत भीमाशकर योितिलग के िलए बस ारा या ा करनी होती है. इसके बाद े न औरगाबाद के िलए रवाना होती है. परी रात या ा करने के बाद या ी को औरगाबाद ( 05-02-2016) म अविथत घणे र योितिलग के दशन ा होते ह. यह या ा का समापन िबद है. इसके बाद आपक यह पेशल ेन जबलपर के िलए लौट पड़ती है. भोपाल से या ा करने वाले, तथा िछदवाड़ा क ओर रवाना होने वाले याि य को इटारसी उतरना होता है. शेष या ी जबलपर के िलए रवाना हो जाते ह. काफ़ कम खच म, नौ िदन क या ा के दौरान सात योितिलग के िदय दशन से लौटकर या ी अपने आपको धय मानता है. िम , िनि त ही इस या ा से उन तमाम याि य को अपव सख क ाि हई होगी, जो पहली बार इस या ा पर रवाना हए थे.( इनम से अनेक ऎसे या ी भी थे िजहने उपरो योितिलग म से िकही एक - दो अथवा तीन योितिलग के दशन पव म कर चके रहे हगे). यह या ा अयिधक रोमाचक इसिलए भी कही जा सकती है िक या ी, एक साथ, सात-सात योितिलग के दशन एक िनि त समय के अतराल म कर रहे थे. रेल मैनेजमे ट ने तो सारी सख-सिवधाएँ देने क भरपर कोिशश क, िजसक अपे ाएँ याि य को रही हगी. लेिकन या ी इस िदशा म शासन को िकतना सहयोग दे पाया, इस पर जर यान देने क जरत है ? (१)हम म से कई या ी ऎसे भी थी जो अपिश पदाथ को िखड़क से बाहर फ़कते नजर आए, जबिक डटबीन क यवथा क गई थी. रोकटोक का उन पर कोई असर पड़ रहा हो, ऎसा भी देखने म नह आया. (२) या ा के दौरान दो बार ऎसा भी समय आया, जब रेल लगातार लबी दरी तय कर रही थी, बेस लोगो ने लेवो ी म अथवा दरवाजे के पास खड़े होकर बड़ी बेशम से नान िकया. कछ मिहलाए तो चलती ेन म अपने कपड़े ल ी धोकर िखड़िकय म सखाने के िलए लटकाती नजर आय. फ़लव प पानी क टक खाली हो गई और अनेक याि य को इसका खािमयाजा भगतना पड़ा .(३) कछ या ी इस तरह के भी थे, जो श करते समय तथा दाढ़ी बनाते समय पानी को अकारण बहाते नजर आए. कछ या ी तो ऎसे भी देखे गए जो पेपर-सोप का इतेमाल करने के बाद बची साम ी को वाश-बेिसन म ही फ़कते नजर आए. (४) योितिलग.के दशन के िलए बस क उ म यवथा मैनेजमे ट ने कर रखी थी. बस रे वे टेशन के परसर के बाहर खड़ी िमलती थी. जो या ी -प है, जवान है, अथवा तद त है, वह दौड़कर आगे क सीटॊं पर कजा जमा लेता और अत तक वह जमा रहता था. जो या ी व है, कछ घटन क दद क वजह से जदी नह चल पाते थे, उह मजबरी म पीछे क सीटॊं पर बैठना पड़ता था. जबिक होना तो यह चािहए था िक वे अपनी ओर से उन असमथ लोग क मदद करनी चािहए थी. (५) मिहलाओ और प षॊ के नहाने क अलग-अलग जगह क यवथा शासन ने बना रखी थी, िजसका समिचत उपयोग याि य ने नह िकया. कछ तो अपने कपड़ॆ धोने म लग गए, िजससे पानी का अपयय हआ. कई या ी तो िबना नहाये ही दशन को िनकलना पड़ा. शासन क कछ बड़ी िवफ़लताएँ रही है, िजस पर उसे यान िदलाए जाने क आवयकता है. (१) खाना उ म कोिट का नह रहा. मैनेजर से िशकायत करने के बाद आिशक सधार आया. रेल मैनेजमै ट को चािहए िक वह मैनेजर को इस िदशा म आवयक िनदश दे. हो सके तो रे वे के िकसी अिधकारी क िनयि क जानी चािहए, िक वह इस पर बराबर नजर बनाए रखे (२) इतनी लबी या ा के दौरान िकसी कशल डा टर क यवथा जर करनी चािहए थी, यिक सफ़र म अनेक आय वग के लोग सफ़र कर रहे होते ह. (३) बस क यवथा उ म कही जा सकती है, लेिकन इसम यह यान रखा जाना चािहए िक िवकलाग-व के आगे बैठने क जगह आराम से िमल सके . इस सम या को िनपटाने के िलए यह िकया जा सकता है िक आय वग के िहसाब से उह पहले से ही सीट आविटत करा दी जाए. (४) हर कोच म मोबाईल चाज करने के उपकरण तो लगे हए होते ह, ( दोनो गेट के पास) लेिकन काम नही कर रहे होते ह. अतः शासन को चािहए िक वह येक कपे म इसक यवथा कर दे, तािक या ी को उठकर अय जाने क जरत न पड़े और चलती े न म झकोरा खाकर िगरने से अपने को बचा सके . ------------------------------------------------------------------------------------------------- 15, लमही ट लिबनी ( नेपाल ) हाया बनारस. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- लमही का नाम लेते ही कथा-स ाट मशी ेमचद जी क त वीर आँख से सामने उभरने लगती है. देश का सबसे चिचत शहर कहलाए जाने वाले बनारस/काशी से महज तीन-साढ़े तीन िकमी.दर िथत एक छोटा सा गाँव है “लही” जो कथा स ाट मशी ेमचद के कारण देश म ही नह, अिपत परे िव म चचा का के बना हआ है. 31 जलाई 1880 को इसी छोटे से ाम म जमे धनपतराय ीवा तव ( मल नाम ), कभी नवाब राय तो कभी ेमचद जी के नाम से जाने गए. ेमचद जी ने इसी गाँव म बैठकर नमक का दरोगा, रानी सारधा, सौत, आभषण, ायि त, मिदर-मिजद जैसी अमर कहािनय के अलावा सेवासदन, ेमा य, रगभिम, िनमला, गबन,कमभिम, गोदान जैसे उपयास को िलखकर, लमही को देश के नशे पर ला िदया. आपके उपयास से भािवत होकर बगाल के िव यात उपयासकार शरतचद च ोपा याय जी ने उह कथा-स ाट कहकर सबोिधत िकया. आपने कहािनय और उपयास क एक ऐसी परपरा का िवकास िकया, िजसने परी सदी के सािहय का मागदशन िकया. सािहय क यथाथवादी परपरा क जो नव आपने डाली, उसका गहराई से भाव आगामी पीढ़ी पर पड़ा. उनका लेखन िहदी सािहय क एक ऐसी िवरासत है, िजसके िबना िहदी के िवकास का अययन अधरा ही माना जाएगा. एक सवेदनशील लेखक, सचेत नागरक, कशल व ा तथा िव ान सपादक के प म काय करते हए आपने तकनीक असिवधाओ के बावजद, गितशील मय को आगे बढ़ाने का काम िकया. अनिगनत कथाकार/सािहयकार के ेरणा- ोत रहे ेमचद जी के गाँव लमही, जहाँ आपका जम हआ था, के दशन के िलए भला कौन नह जाना चाहेगा? कौन भला उस माटी के रज-कण को अपने माथे पर नह लगाना चाहेगा? चाहते तो सभी ह,लेिकन अपने नीिज कारणॊं के चलते नह जा पाते. मन म एक िनराशा का भाव,/. एक मलाल जर छाया/बना रहता होगा, िक उह यहाँ आने का सौभाय कब ा होगा?. वय एक कथाकार होने के नाते, मेरे मन म भी िनराशा का कहासा-सा छाया रहता था, िक म अब तक वहाँ नह जा पाया. शायद इसे समय क बिलहारी कह, तो यादा उपय होगा. मेरे अपने जीवन म वह सनहरा िदन भी आया, जब म मशी ेमचद जी के जम- थान के दशन कर पाया. म हािदक धयवाद देना चाहता हँ रायपर (छ.ग.) के िम ी जयकाश मानस जी को, िजनके सौजय से मझे वहाँ जाने का सअवसर ा हआ. अतरा ीय तर पर िहदी के उनयन और चार-सार और िहदी सकित को िति त करने के िलए बहआयामी सािहियक साकितक सथान “सजन समान” तथा “सािहियक वेव पि का सजनगाथा डाट काम” मच का गठन िकया था. अपने भगीरथ यास और पहल के अन म म इस मच ने रायपर, मारीशस, पटाया, ताशकद (उबेिकतान), सय अरब अमीरात, कबोिडया-िवयतनाम, ी लका तथा चीन म सफ़लतापवक आयोजन िकये ह. तप ात आपने दसव अतरा ीय िहदी समेलन का आयोजन, नेपाल म ि भवन िव िव ालय नेपाल, िशपायन नई िद ली काशन, सदभावना दपण, छतीसगढ़-िम , सजन-समान, मोद वमा मित सथान, लोक सेवक सथान, ग घासीराम सािहय एव सकित अकादमी के सय यास से िदनाक 17 मई से 24 मई 2015 को काठमाड म समायोिजत करने क घोषणा क. बरस से इस पिव माटी के दशन क अिभलाषा मन म बनी हई थी, सो मने भी इस मच के मा यम से वहाँ जाना उिचत समझा और अपनी सहमित कट कर दी. इस सािहियक या ा को बड़ा ही मन-भावन नाम िदया गया था-“लमही से लिबनी”. इस या ा समरण को मझे बहत पहले ही िलख देना चािहए था, लेिकन कयटर से सारे फ़ोटॊ ा स िडलीट हो गए थे. फ़ोटॊ के अभाव म िलखने का मानस ही नह बन पाया. काफ़ यास के बाद कछ फ़ोटो ा स उपलध हए, और म इस या ा-समरण को िलख पाया. मच पर “लमही” पि का के सपादक ी िवजय राय जी. पास ही म खड़ी ह आपक माताजी ीमती शकतला देवी, आपको यह जानकर सखद आनद होगा िक आप ेमचदजी क भतीजी ह. ( इन दोन के म य म भी खड़ा िदखाई दे रहा ह यह वह समय था जब िदल दहला देने वाले भकप के झटके , नेपाल म लगातार आ रहे थे. भकप का के-िबद काठमाड बना हआ था. देश के तमाम अखबार, बबाद होते नेपाल के िच को मखता से कािशत कर रहे थे और टी. ही चैनल इन -िवदारक य के लाईव िदखला रहे थे. िसमे ट-का ट से बनी इमारत ढह गई थ और ईट िम ी-गारे से बने कचे मकान और झगी-झोपिडयाँ जम दोज हो चके थे. जन-सामाय तबओ के नीचे जीवन बसर करने के िलए मजबर हो चके थे. आँख के सामने बदहाल होते नेपाल के य को देखकर, घर के सभी छोटे-बड़े सद य ने मझे या ा र कर देने का सझाव िदया. चिक काय म काफ़ पहले घोिषत िकया जा चका था. वहाँ क अिधकाश होटेल आरि त क जा चक थी. या ा को र भी तो नह िकया जा सकता था, अत म यह िनणय िलया गया िक काठमाड से करीब तीन सौ िकमी. दर िथत “पोखरा” जहाँ भकप क िवनाशलीला नह के बराबर थी, िनधारत काय म आयोिजत िकए जाए. दर दराज से आने वाले याि य के िलए बनारस क एक ाड होटेल म ठहरने क यवथा पहले से ही बनाई जा चक थी. बनारस क एक सबह. बनारस /काशी / वाराणसी जैसे नाम से िव यात यह शहर, उ र देश म गगा जी के िकनारे िथत एक मख धािमक के है तथा सपरय मे अपना मख थान रखता है. यह पर बारह योितिलग म एक जग िस योितिलग िव नाथ जी िवराजमान ह. बनारस को लेकर एक महावरा जग िस है- “चना-चबैना गग जल, जो पजबै करतार- काशी कबह न छािड़ये, िव नाथ दरबार” अथात- भख िमटाने के िलए चना और यास िमटाने के िलए गगाजी का जल पीकर करतार (िशव) क आराधना करते रह यिक काशी जी म वय भगवान भोलेनाथ िवराजते है. अतः इस पावन भिम को कदािप न छॊड. जनसामाय म इस थान के ित इतना लगाव और ा है िक वह जब-तक बाबा के दशन के िलए दौड़ा चला आता है., रात का सफ़र े न म ही गजरा. पौ अभी फ़टी भी नह थी िक हम बनारस जा पहँचे. यहाँ-वहाँ समय न गवाते हए म और मेरे िम ी नमदा साद कोरी िनधारत होटेल म जा पहँचे. जयपर के यात लेखक ी बोध गोिवलजी से हमारी पहली मलाकात यह पर हई थी. वे कछ समय पहले ही इस होटेल म पहँचे थे. अभी और भी सदय का आना बाक था. सो हमने समय न गवाते हए, गगा नान और बाबा िव नाथ जी के दशन का मन बनाया. बनारस क तग गिलय मे घमना, यहाँ क धािमक िफ़जाओ म घमने का अपना ही एक अनोखा आनद और आकषण है. सयदय से पहले और बीतती रात के धधलके म चलते हए हमने. गगा नान िकया और बाबा िव नाथ जी के दशन िकए. लमही क ओर . बस लगाई जा चक थ और हम सब उस पिव थान िजसका नाम “लमही” है िनकल पड़े. यह थान सािहयकार के िलए िकसी मका-मदीना से कम नह है. हमारी इस या ा म- जयकाश मानस, डा. सधीर शमा, ी िगरीश पकज, डा.अचना अरगड़े, डा. लािलय लिलत, ेम जनमेजय, डा.बि नाथ िम , डा.हरसमन िव , बोध गोिवल, डा.अनसया अवाल, रामिकशोर उपा याय और मेरी िम-मडली, िजसम ो.राजे र आनदेव, डा.िवजय चौरिसया, िवजय आनदेव, अ ण अिनवाल, नमदा साद कोरी सिहत अनेक वनाम धय सािहयकार थे. हम अपनी खली आँख से उस थान को ा और लगन के साथ िनहार रहे थे, जहाँ बैठकर कभी ेमचदजी ने बेजोड़ कहािनयाँ और उपयास िलखकर, िहदी सािहय को सम िकया है. आपके हाथ से िलखी गई पाडिलिपयाँ, उन िदन म कािशत होने वाली सािहय पि काएँ, िजसम ेमचद जी क कहािनयाँ आिद कािशत हई थ. एक बक-हगर पर सजाकर रखी गई ह. कछ दलभ छाया-िच , दीवार पर करीने से लगाए गए है. इन सबको देखकर आभास होता है िक ेमचदजी यह-कह हमारे आसपास मौजद ह. कमर से लगा हआ एक खला आँगन है, िजसे बहत बड़ा तो नह कहा जा सकता, आपक एक ितमा थािपत है, ा-समन अिपत िकए. और फ़ोटो ा स िलए. बरस पहले सजोया गया सपना अब जाकर परा हो हम सभी िम ने पाया था. ेमचद जी के आवास के पास एक िवशाल पतकालय भवन बनाने क तैयारी चल रही है. सना है, इसम ेमचदजी के सािहय के अलावा देश-िवदेश के यात सािहयकार क पतक भी शािमल क जाएगी. मन यहाँ से कह जाने को नह हो रहा है,लेिकन जाना पड़ रहा है, यिक आप अपने को समय के बधन म बाधकर जो चले है. आज यहाँ तो कल वहाँ...या ा का मल म यही है. भारी मन िलए हम लमही को पीछे छॊड़ते हए सारनाथ क ओर चल िनकले थे. यह वही थान है जहाँ बोधी (ब ) ने थम बार अपने िशय को उपदेश िदया था. सारनाथ . वाराणसी से 10 िकमी.पव र म िथत सारनाथ एक मख बौ तीथथल है. ान ाि के ठीक प ात भगवान ब ने इसी थान पर अपने िशय को पहली बार उपदेश िदए थे, िजसे “धम च वतन” का नाम िदया गया, जो बौ मत के चार-सार का आरभ भी माना गया. अब हम नेपाल क ओर बढ़ चले थे. नेपाल बाडर.-सोनाली. सोनाली नेपाल बाडर पहँचते ही शाम िघर आयी थी. चेक-पो ट पर याि य क सची दे दी गई. आवयक जाँच प ात हमने नेपाल क सीमा म वेश िकया और राि िव ाम िकया. सचनाथ यहाँ यह बतलाना आवयक है िक नेपाल के िलए पासपोट क जरत नह पड़ती. केवल वोटर-आई.डी से ही काम चल जाता है. यहाँ राि िव ाम करने के बाद हम पोखरा क ओर रवाना हए. नेपाल बाडर पोखरा. ी सेवाराम अवालजी बाडर पर यिद आप ाकितक सषमा को जी भर के िनहारना चाहते ह तो आप एक बार नेपाल जर जाए. करीब 800 िकमी.लबी िहमालय पवत क खला क सदरता यहाँ देखती ही बनती है. काली नदी से ितता नदी के बीच फ़ैली इस रज को “िहमालयान रज” कहा जाता है. नेपाल, ितबत तथा िसिकम म िथत इस रज के पव म असम-िहमालय तथा पि म म कमाऊँ-िहमालय िथत है, नेपाल-िहमालय चार िवभाजन म सबसे बड़ा है. माउट एवरे ट, कचनजघा, होसे, मकाल, चीय, मनालय, धौलिगर और अनपणा इयादी नेपाल-िहमालय क मख चोिटयाँ ह. मेची, कोशी, बागमती, गडक तथा कणाली निदय का उम थल भी नेपाल-िहमालय म ही होता है. यहाँ क काठमाड घाटी जग िस है. एक छॊटे से देश नेपाल क मख आय का ोत पयटन ही है. भारतीय करसी और नेपाली करसी लगभग समान मय क है. यहाँ लेन-देन म भारत के नोट आसानी से वीकार िकए जाते रहे ह. वतमान म इसम कछ आिशक प रवतन िकए गए ह. इसका उ री िहसा िहमालय क चोिटय से िघरा हआ है, दिनया क दस ऊँची चोिटय म से आठ चोिटयाँ अकेले नेपाल म है. दिनया क सबसे खबसरत और ऊँची चोटी एवरे ट नेपाल म ही िथत है, इसे यहाँ सागरमाथा कहा जाता है. िहद और बौ धम क साझा िवरासत नेपाल के कण-कण म समाई हई है. लिबनी. भगवान ब का जम, दि ण नेपाल क तराई वाले मैदान म िथत लिबनी े म 623 ईसा पव म हआ था, इस बात का उलेख स ाट अशोक ारा थािपत िशलालेख पर देखने को िमलता है. मायादेवी का मिदर, एक तालाब के पास िथत है. इसी थान पर ब का जम हआ था. यहाँ फ़ोटो ाफ़ करने क स मनाही है. (मायादेवी मिदर का भीतरी क , जहा ब ने जम िलया था.) मायादेवी मिदर के भीतर अवशेष, तीसरी शता दी ईसा पव से लेकर, वतमान शता दी और ा ी िलिप म पाली िशलालेख के साथ बलआ पथर पर, अशोक तभ म एक ास-दीवार णाली म ईट सरचनाओ से य है. ( भगवान ब के जम से जड़े परातािवक अवशेष को यहाँ सरि त करके रखा गया है.) पोखरा –फ़ेवा झील. फ़ेवा झील िहमा छािदत पवत खलाओ म अविथत है. पहाड़ के मय एक कटोरानमा थान म, मीठे पानी क यह झील दर-दर तक फ़ैली हई है. झील म पवत-खलाओ क ि छाया, झील के ठहरे पानी म पड़ कर एक मनोहारी य पैदा करती है. इस मनोहारी य को देखकर, आँख पलक झपकाना बद कर देती है और पयटक ममध होकर उसम गोते लगाने लगता है. उमड़ते-घमड़ते याम- ेत बादल के झड, जब हवा क पीठ पर सवार होकर, इस झील के ऊपर से गजरते ह, तो दशक इस नयनािभराम य को देखकर ठगा-सा रह जाता है. सर-सर कर सरसराती हवा के झके , जब पयटक के बदन को छते हए गजरती ह, तब ऐसा महसस होता है िक वह भी हवा के सग-सग आसमान म उड़ा चला जा रहा है. पयटक यिद बड़ी सबह इस झील के पास पहँच जाए तो उसे और भी मनोहारी य देखने को िमल सकते ह, ऊगते हए सय का ितिबब, सोने क तरह चमचमाते पवत-िशखर, लहर-लहर लहर म पड़ती सय िकरण, नीले-हरे-और गलाबी रग के िमि ण से एक ऐसा अ त िवतान खड़ा करती है, िजसक क कभी हमने कभी कपना तक नह क होगी. पोखरा क इसी वािदय म आपको पहाड़ से िगरते, शोर मचाते झरन देखने को िमलगे. इन तमाम वगय सख के आनद को उठाने के िलए पयटक यहाँ बड़ी सया म पहँचते है. इस झील म आप नौका िवहार भी कर सकते ह. झील म एक टाप भी है िजस पर देवी जी का मिदर है. ऐसी मायता है िक िजस दपित को सतान सख ा नह हआ है, देवीजी से मनौती मागने पर उनक मनौती परी होती है. प /प ी के जम के ठीक बाद, पित-पिन अपनी सतान के साथ, इस मिदर म दशनाथ आते ह और कबतर का जोड़ा देवी जी को चढ़ाते ह. वे उसक बिल नह देते .पजा-पाठ करने के प ात उह िजदा ही छोड़ िदया जाता है. फ़ेवा झील नेपाल म एक ताजा पानी क झील है, िजसे पव म पोखरा घाटी म िथत बदाल ताल भी कहा जाता था. पोखरा म डेिवसफ़ाल, िवयवािसनी देवी मिदर, फ़ेवा लेक, माऊटेन यिजयम, गोरखा मेमोरयल,,पीस टे ल, महोद केव के अलावा य आफ़ अनपणा रज देखकर, पयटक एक असीम सख क अनभित ा करता है. दो-चार िदन म इतने मनोहारी थान का मण कर पाना सभव नह है. पयटक कछ िदन रहकर इन नैसिगक य को देख सकता है. चिक हमारे पास यहाँ ठहरने को तीन ही िदन थे. परे दो िदन मण म िनकल गए और तीसरे िदन सािहियक और साकित काय म के िलए िदन िनधारत था. दसरे िदन सािहयक आयोजन होते रहे. सभी सािहयकार ने अपनी रचनाओ का पाठ िकया. सथा क ओर से सभी ितभािगय को समािनत िकया गया नेपाल म हमारा यह अितम िदन था. दसरे िदन क शाम को हम भारत लौट जाना था. सभी के मन म एक कसक थी िक पशपितनाथजी के दशन िकए बगैर ही लौटना पड़ रहा है. ायः सभी इस बात को लेकर िचितत हो रहे थे. भकप का कोप अब भी बना हआ था. रह-रह कर भकप के झटके आ रहे थे. काठमाड क ओर बढ़ा जाए या िफ़र कभी देखा जाएगा, के िवचार को लेकर, मन पे डलम क तरह दोलायमान हो रहा था. एक मन कहता िक चलो चला जाए, देखा जाएगा जो भी होगा. लेिकन तकाल बाद ही दसरा मन इस सकप पर पानी फ़े र देता. खैर जैसे-तैसे सबह का नया सरझ ऊगा. हम पाँच िम ने सकप िलया िक िबना पशपितनाथ जी के दशन िकए बगैर नह लौटगे. हमने टै सी बक क. देखते ही देखते और भी िम हमारे साथ हो िलए. पशपितनाथ मिदर. 1 . भ पर वेश- ार पशपितनाथ मिदर पशपितनाथ जाने से पव भ पर पड़ता है, लेिकन भकप के झटक ने इसे काफ़ नकसान पहँचाया है. नेपाल क राजधानी काठमाड से करीब तीन िकलो.मीटर उ र-पि म म, बागमती नदी के िकनारे देवपाटन गाव म, पशपितनाथजी का िवशाल मिदर अविथत है. यह मिदर यने को ारा “िव साकितक िवरासत थल” घोिषत िकया जा चका है. एक िकवदती के अनसार भगवान िशव, एक िहरण का प धारण कर िन ा म चले गए. िशवजी को न पाकर देवताओ ने उनक तलाश क और उह वािपस वाराणसी लाने का यास करने लगे. िहरण का प धारण िकए िशवजी ने, नदी के दसरे िकनारे पर छलाग लगा दी. इस दौरान उनका िसग चार टकड़ म टट गया. िजस थान पर िसग टटे थे, उसी थान पर भगवान चतमख िलग के प म कट हए जो पशपितनाथ जी के प म िव यात हए. दसरी िकवदती के अनसार- महाभारत क समाि के बाद, पाच पाडव ने वगयाण के िलए िहमालय के े से या ा क. जब वे रा ते से गजर रहे थे, तभी उह िशवजी के दशन हए. लेिकन तकाल ही उहने भसे का प धारण िकया और धरती म समाने लगे, महाबिल भीम ने उनक पँछ पकड़ ली. िजस जगह पँछ पकड़ी थी, वहाँ वे िशविलग के प म कट हए. यह थान केदारनाथ कहलाया. िशवजी का मख नेपाल के िजस थान पर िनकला, उसे “पशपितनाथ” िशविलग के प म पजा गया. पराणो म इस बात का उलेख है िक केदारनाथ जी के दशन के उपरात यिद पशपितनाथ जी के दशन नह िकए तो या ा अधरी मानी जाती है. इस मिदर म केवल िहदओ को ही वेश करने क अनमित है. गैर िहद आगतक को बागनदी के िकनारे से देखने िदया जाता है. नेपाल िथत “पशपितनाथ मिदर” सबसे पिव माना जाता है. 15व शता दी के राजा ताप मल के जमाने से श क गई था के अनसार मिदर म चार पजारी (भ ) रखे गए थे और म य पजारी दि ण भारत से ही होता था. शायद अब इस था को बदल िदया गया है. इसे ई र का चमकार ही कहा जा सकता है िक िवनाशकारी भकप के झटक से जहाँ परा नेपाल तबाह हो चका था, वह िशव जी के इस धाम म वह अपनी िवनाशलीला नह कर पाया. हाँ, मिदर म कह-कह आिशक टट-फ़ट जर हई है, िजसे न के बराबर कहा जा सकता है . िशवजी क इस अ त लीला को देखकर हम नतमतक थे. इसी रा ते से लौटते हए हमने पानी क सतह पर तैरते ी िवण क िवशाल ितमा के दशन िकए. पानी क सतह पर तैरते शेषसाही भगवान िवण. नेपाल के काठमाड से करीब 9 िकमी.दर, िशवपरी पहाड़ी म “ब ािनलखड” मिदर म पानी क सतह पर तैरती एक िवशालकाय िवण ितमा देखी जा सकती है. इसे एक बड़ा चमकार ही कहा जाए िक यह मित सिदय से पानी क सतह पर तैर रही है. इस थान को बड़ा ही पिव माना जाता है. बड़ी सया म पयटक इस थान को देखने के िलए िखचे चले आते ह. यहाँ से लौटते हए हमने िचतवन नेशनल पाक का मण िकया. िचतवन नेशनल पाक. िचतवन नेशनल पाक य तो नेपाल म कई पाक ह लेिकन इसम िचतवन नेशनल पाक का अपना िवशेष थान है. यह 952.63 िकमी े म फ़ैला हआ है. इस नेशनल पाक म एक िसग का गै डा पाया जाता है. इस पाक क थापना सन 1973 म हई थी और 1984 म इसे “िव धरोहर थल” घोिषत िकया गया. पयटक यहाँ आए और इसका मण न करे, तो उसका नेपाल आना यथ ही समझा जाना चािहए. इस े के दि ण म वाि मक नेशनल पाक है, जो बाघ के िलए सरि त है. यहाँ बड़ी सया म तदए और भाल भी पाए जाते ह..िचतवन के जगल म घास के मैदानो म कभी 800 गडॊं का घर था. 1957 म देश का पहला सर ण कानन गड और उनके आवास क सर ा के िलए अ म था. 1959 म एडवड ि चड ने इस े का सव िकया और रा ी नदी के उ र –दि ण म वय जीव अ यारण बनाने क िसफ़ारश क थी, िजसक अविध दस साल के िलए िनधारत थी. गड के सर ण के िलए गाड के पद म वि क गई. तब जाकर इनके अवै िशकार पर रोक लगाई जा सक थी. राइन के िवल होने से बचने के िलए िचतवन नेशनल पाक िदसबर 1970 को राजपि त िकया गया था. पाक का म यालय कसारा म है. यहाँ कछए के सर ण और जनन के को थािपत िकया गया है. 2008 म िग ो ( ओरएटल सफ़ेद िग और पतले िग ) क जाित को बचाने के िलए यहाँ गभीर यास िकए गए,जो नेपाल म ल ाय होने क कगार पर पहच चके थे. नेपाल से भारत क ओर. नेपाल म रहने क हमारी समय सीमा समा हो चक थी और हम अब अपने देश भारत लौट रहे थे. गोरखपर गोरखपर मठ ग गोरखनाथ जी के नाम पर इस शहर का नाम गोरखपर पड़ा. नाथ परपरा के ग म यनाथ जी क मित म यहाँ एक भय मिदर का िनमाण िकया गया है, मिदर के िवशाल परसर मे और भी कई मिदर है, जो दशनीय ह. ग गोरखनाथजी ने भारत का यापक प से या ा क थी और नाथ सदाय के िस ात का िह सा बनने वाले कई थो को िलखा था. यह मिदर श से ही िविभन साकितक और सामािजक गितिविधय का के बना हआ है. पाच वष पव क गई इस या ा क चमकली और सखद मितयाँ मझे अब भी चमकत करती ह, तो वह दसरी ओर तबाह हए नेपाल के दय-िवदारक िच , िदल और िदमाक को अशात कर जाते ह. भकप क िवनाशलीला के चलते, कई आमि त नेपाली लेखक जो अपना काय िहदी म कर रहे ह, काय म म नह पहँच पाए. केवल इस बात को लेकर एक अफ़सोस मन म अब भी बना हआ है. देिखए, ये इछा कब परी होती है? ------------------------------------------------------------------------------------------------ 16. या ा ब ीनाथ धाम क उ राखड के गढवाल अचल म ी ब ीनाथ,केदारनाथ,पितत पावनी गगा, यमना,अलकनदा,भागीरथी,आिद दजन निदय का उमथल, पच याग, पचब ी, पच केदार,,उ रकाशी,गकाशी आिद अविथत ह,ऐसे िवल ण े उ राखड का गढवाल मडल सही अथ म याि य का वग है. यहाँ पहचने से पहले या ी को हर ार जाना होता है.यह से ब ीनाथ जाने के िलए बस-टै सी आिद िमल जाती है. हर ार से यमनो ी 246िक.मी, गगो ी 273I िक.मी, केदारनाथ 248िकमी और ब ीनाथ 326िकमी क दरी पर अविथत है. मा भगवती गगा यहाँ पवतीय े छोडकर बहती है. नदी के पावन तट पर मा गगा का मिदर थािपत है,जहाँ उनक पजा-अचना अनय भाव से क जाती है. मा गगा क आरती सबह-शाम को होती है. हजार क स या म भ गण उपिथत होकर अपने आप को धय मानते ह. इसे हर क पौढी भी कहते है. गगा के तट पर अनेक साध महामा के दशन लाभ भी या ी को होते ह. यहाँ अनेक धमशालाए-होटल ह, जो सती दर पर आसानी से उपलध हो जाती ह. कछ दरी पर गाय ी सथान है,िजसक आधारिशला आचाय ीराम शमाजी ने रखी थी. यह थान गाय ी परवार वाल के िलए िकसी वग से कम नह है. हजार क स या म लोग यहा आते ह,और दशन लाभ कर पय कमाते है. साधक भी यहा बडी स या म आकर जप-तप करते आपको िमल जाएगे. यहा िनशक रहने तथा उ म भोजन क यवथा गाय ी सथान ने कर रखी है. सथान का अपना औषधालय ह,जहा रोगी अपना इलाज कशल वै से करवाकर उ म वा य ा करते ह. सथा का अपना कई एकडॊं म फ़ैला उ ान है जहाँ दलभ जडी-बिटय क पैदावार होती है. आगे क या ा के िलए पयटक को ऋिषकेश रा ी िव ाम करना होता है. सबह गढवाल मडल क बस से ब ीनाथ के िलए बस जाती ह. याि य को चािहए िक वे अपनी सीटॆ आरि त करवा ल,अयथा आगे क या ा म किठनाइया आ सकती ह. माग काफ़ सकरा और टेढा-मेढा –घमावदार है. पहाडॊं क अगय उँचाइय पर जब बस अपनी गित से चलती है तो उसम बैठा या ी भय से काप उठता है. हजार फ़ट पर आपक बस होती है और अलकदा अपनी ती तम गित से शोर मचाती,पहाडॊं पर से छलाग लगाती,उछलती,कदती आगे बढती है. बस चालक क जरा सी भल से कभी-कभी भयकर एसीडॆट भी हो जाते ह. अतः िजतनी सबह आप अपनी या ा जारी कर सकते ह,कर देना चािहए. ऋिषकेश म गगा नान,िकनारे पर बने भय मिदर म आप भगवान के दशन भी कर सकते है. गगाजी का पाट यहा देखते ही बनता है. (िशवजी क िवशाल मित तप करते हए) (ल मण झला.) अनेक मिदर,आम के अलावा ल मण झलाभी है,जो नदी के दो तटॊं को जोडता है. इस पर से नदी पार करने पर मन म रोमाच तो होता है साथ ही इसक कारीगरी को देखकर िवमय भी होता है. ऋिषकेश से ब ीनाथ क या ा के दौरान रा ते म नद याग, कणयाग, याग,तथा देवयाग नामक थान भी िमलते ह. इनका अपना ऐितहािसक और पौरािणक महव है. गगा अपने उम के बाद 12 धाराओ म िवभ होकर आलग-अग िदशाओ म बहती है. इन थान पर वे या तो बहकर िनकलती है या िफ़र यहा दो नि य का सगम होता है. येक थान को पास से देखने म समय लगता है, या ी यहाँ न कते हए सीधे आगे बढ जाता है, यिक उसमे मन म बदरीनाथजी के दशन करने क उकठा यादा ती होती है इन सभी थान का अपना पौरािणक महव है. इह थान पर रामायण ,महाभारत क रचनाए क गयी थी. राजा यिधि र अपने भाईय व ौपदी के साथ इह थान से होकर गजरे थे और िहमालय क अगय चोटी पर जाकर अपने ाणॊं का याग िकया था ब ीनाथ, केदारनाथ, गगो ी, यमनो ी के मिदर केवल छः माह (मई से अटबर) तक खले रहते ह.शेष छः मास तक भीषण ठड पडने,के कारण बद रहते है. अकटबर माह म ब ीिवशाल क पजा-अचना करने के उपपरात घी का िवशाल दीप जविलत कर बद कर िदया जाता है. छः मास बाद जब मिदर के पट खोले जाते ह तो वहाँ पर ताजे पप और िद य दीपक जलता हआ िमलता है. ऐसी मायता है िक इस अविध म नारद मिन जो िवण के परम भ ह,यहाँ रहकर अपने आरा य क पजा-अचना करते ह. पजा के ताजे पप का िमलना, इस बात का माण है िक वहाँ पजा-अचना होती रही है. इससे बडा माण और या चािहए. पयटक, सबह िजतनी जदी ऋिषकेश से रवाना हो जाए,उतना ही फ़ायदा उसे होता है. शाम का कहरा गहरा जाने से पव वह ब ीनाथ जा पहँचता है. वहा पहचकर उसे अपने िलए धमशाला-होटल भी तो लेना होता है. इस बीच ठड भी बढ चक होती है. ब नाथ धाम. (ब ीनाथजी का भय मिदर) (मिदर के ागण मे लेखक अपनी पिन ीमती शकतला के साथ) ब ीनाथ का मिदर अलकनदा नदी के उस पार अविथत है. पल पारकर आप मिदर म दशन के िलए जा सकते ह. नदी से इसी पार पर धमशालाए,होटले आिद उपल ध हो जाती ह. मिदर के पास ही गरम पानी का कड है,िजसमे या ी नहा सकता है. इस कड से जडी एक कथा है.जब भगवान ब ीनाथजी इस थान पर अविथत हो गए तो भगवती लमी ने कहा िक आपके भ गण िकतनी किठन या ा कर केवल आपके दशनाथ आते है, और उह नान कर आपक पजा-अचना करना होता है. लेिकन इस थान पर तो बफ़ क परत िबछी रहती है और भीषण ठड भी पडती है. यिद उनके नहाने के िलए कोई यवथा हो जाती तो िकतना अछा रहता. ब ीनाथजी ने त काल मिदर के समीप अपनी बासरी को जमीन पर छलाया, एक गम पानी का कड वहाँ बन गया. सभी या ी यहाँ बडे अनय भाव से नहाकर अपने आपको तरोताजा कर,पजा अचना करता है. ब ीनाथजी क मित शाल ामिशला क बनी हई है. यह चतभजमित , यानम ा म है. एक कथा के अनसार इस मित को नारदकड से िनकालकर थािपत क गई थी. तब बौ मत अपने चरम पर था. इस मित को भगवान ब क मित मानकर पजा होती रही,. जब शकराचाय इस जगह पर िहद धम के चाराथ पहचे तो ितबत क ओर भागते हए बौ इसे नदी म फ़क गए. उहोने इसे वहा से िनकालकर पनः थािपत िकया. तीसरी बार इसे रामानजाचाय ने थािपत िकया . पौरािणक मायता के अनसार गगाजी अपने अवतरण के बाद 12 धाराओ म िवभ हो जाती है.. अलकनदा के नाम से िव यात नदी के तट ीिवण को भा गए और वे यहा अविथत हो गए.. लोक कथा के अनसार,नीलक ठ पवत के समीप ी िवण बालप म अवतरत हए. यह जगह पहले से ही केदारभिम के नाम से िव यात थी. ी िवण,तप करने के िलए कोई उपय थान क तलाश म थे. अलकनदा के समीप क यह भिम उह अछी लगी और वे यहा तप करने लगे. यह थान ब ीनाथ के नाम से जाना गया. ब ीनाथ क कथा के अनसार भगवान िवण योगम ा मे तपया कर रहे थे. तब इतना िहमपात हआ िक सब तरफ़ बफ़ जमने लगी. बफ़ तप यारत िवण को भी अपने आगोश म लेने लगी तब माता ल मी ने ब ी- व बनकर भगवानजी के ऊपर छाया करने लगी और उह बफ़ से बचाती हई वय बफ़ म ढक गय. भगवान िवण ने सन होकर उह वर िदया िक वे भी उह के साथ रहेगी. यह वही थान है जहा वय लमी बदरी( बेर) का व बन कर अवत रत हई, ब ीनाथ के नाम से जगिव यात हआ. मित के दािहिन ओर कबेर, उनके साथ म उदजी तथा उ सवमित है. उसवमित शीतकाल म बफ़ जमने पर जोशीमठ ले जायी जातीहै. उवजी के पास ही भगवान क चरणपादका है. बाय ओर नर-नारायण क मित है और इसी के समीप ीदेवी और भदेवी िवराजमान है. चरणपादका को लेकर एक पौरािणक कथा है िक ापर म जब भगवान ीकण अपनी लीलाओ को समेट रहे थे, तब उनके अनय भ नारदमिन ने बडे ही अनयभाव से ाथणा करते हए पछा था िक भगवन ,अब आपसे अगली भॆट कब, कहा और िकस प म होगी?. तो भ वसल भ ने मकराते हए अपनी चरण पादका उतारकर नारदजी को देते हए बतलाया िक अमक थान पर मेरी चरणपादका को थािपत करते हए पजा-अचना करते रह, वे समय आने पर ब ीनाथ के नाम से धरती पर अवतरत हगे. ीिव ह के पास रखी चरणपादका का िमलना और जब मिदर के कपाट खोले जाते ह,तब ताजे िखले हए सगिधत पप का िमलना ,इस बात क पि करते ह िक नारद अपने ई क पजा-अचना आज भी करते ह. वे िकस प म वहा आते ह,यह आज तक कोई नही जान पाया है,लेिकन वे आते जर ह. ब ीनाथजी के मिदर के पभिम पर आपको आकाश से बात करता जो पवत िशखर िदखालायी देता है,उसक ऊँचाई 7.138 मीटर है,िजस पर हमेशा बफ़ जमी रहती है. बफ़ से चमचमाते पवत िशखर को देखकर या ी रोमािचत हो उठता है. वैसे तो यहा धध सी छायी रहती है. यिद आसमान साफ़ रहा तो सय क िकरण परावितत होकररगिबरगी छटा िबखेरती है. अय थानॊं क अपे ा यहा चढौतरी को लेकर िकसी िकम क परेशानी नह होती और भगवान के दशन लाभ भी बडी आसानी से हो जाते ह. कछ पयटक प डॊं के चकर म न पडते हए पजा_पाठ करते पाए जाते ह.जबिक यहा के प डॆ, आपसे न तो िजद करते ह और न ही कोई मोल भाव. आप अपनी ा से जो भी दे द, वीकार कर लेते ह. अपने जजमान के खाने-पीने-पजा-पाठ के िलए वे िवशेष यान भी देते है,साथ ही गाईड क भी भिमका िनभाते है. वे आपका नाम-पता आिद अपनी बही मे दज कर लेते ह और जब मिदर के कपाट बद हो जाते ह,उस अविध म वे अपने जजमान के यहाँ ब ीनाथ का साद-गगाजल आिद लेकर पहँचते ह और ा धन से अपना जीवनोपाजन करते ह. हजार फ़ट क ऊँचाई पर खडा यि ,जब मिदर के ागन से, चार ओर अपनी नजर घमाता है, तो कित का अ त नजारा, उसे अपने समोहन म बाध लेता है. कपनातीत य देखकर वह रोमािचत हो उठता है. नर-नारायण के िव ह- ब ीनाथजी क पजा म म यप से वनतलसी क माला, चने क दाल, नारीयल का गोला तथा िम ी चढाई जाती है,जो उह अयत ही ि य है. ब ीिवशाल के मिदर से कछ दरी पर एक और ऊँचा िशखर िदखलायी देता है,िजसे नीलकठ के नाम से जाना जाता है. इसक भयता और सदरता को देखते हए इसे “ि वन आफ़ गढवाल” भी कहा जाता है. माणागाव भारत का अितम गाँव है, कछ पयटक इस गाव तक भी जाते ह. करीब 8िकमी दर एक पल है िजसे भीमपल भी कहते है ,इस थान पर अ वसओ ने तपया क थी. लमीवन भी पास ही है. यह से एक रा ता िजसे “सतोपथ” के नाम से जाना जाता है. इसी माग से आगे बढते हए राजा यिधि र ने अपने भाइय और भाया सािहत अपनी इहलीला समा क थी. सरवती नदी को माणागाव म देखा जा सकता है. भगवान िव ण क जघा से उ पन असरा उवशी का मिदर “बामनी” गाव म मौजद है. आप िकसी लोककथा-पौरािणक कथा और थानीयता के आधार पर बनी दतकथाओ पर िव ास कर या न कर,लेिकन जीवन म एक बार इन पिव और िद य थान के दशनाथ समय िनकाल कर अवय जाए. कित क बेिमसाल सदरता, ऊँची-ऊँची पवत मालाएँ, सघन वन,और चार ओर छाई हरयाली आपकॊ अपने समोहन म बाध लेगी. कित का यह समोिहत वप आपम एक नया जोश, एक नया उसाह भर देगी. इसी बहाने आप अपने देश, भारत क अितम सीमाऒ पर पहँच कर आमगौरव से भर उठगे. शायद इह िवचार से ओत ोत होकर आिदशकराचाय ने भारत क चार िदशाऒ म पीठॊं क थापना क थी. ऐसा उलेख हम अपने पौरािणक थॊं मे पढने को िमल जाता है िक भगवान जब भी मनय प म इस धरती पर अवत रत होना चाहते ह तो वे भारतभिम म ही अवतार लेना पसद करते है. ----------------------------------------------------------------------------- 17 रा भाषा चार सिमित, वधा ारा आयोिजत” अमत महोसव िकसी भी तीथथल अथवा भारत के िकसी भभाग क या ा पर जाने का जब तक सयोग नह बनता, लाख चाहने के बावजद भी आदमी वहाँ नह जा पाता. ऎसा मेरा अपना मानना है. इसे सयोग ही कह िक “रा भाषा चार सिमित,वधा का “अमत महोसव”राजघाट के िनकट “सया ह मडप,गाधी दशन के िवशाल सभा मडप म 16--17 माच 2013 को भय आयोजन के साथ सपन हआ. महामा गाधी ारा थािपत रा भाषा चार सिमित, वधा ने िहदी सेवा के गौरवशाली 75 वष पण कर िलए थे. इस उपल म सथा ारा दो िदवसीय िवमश को “भारतीय भाषाओ के बीच सवाद” और िहदी के सम उपिथत चनौितयो” पर के ीत िकया गया था. इन दो िदवसीय स का उ ाटन भारत के तकालीन गहम ी माननीय ी सशीलकमार िशदे ने िदन शिनवार िदनाक 16 माच को ातः 11 बजे िकया.तथा 17 माच को अपराह 3 बजे समापन-स को तकालीन लोकसभा म िवप क नेता माननीया ीमती सषमा वराज ने सबोिधत िकया. इस भ य काय म क परकपना म. .रा भाषा चार सिमित भोपाल के म ी-सचालक मान. ी कैलाशच पतजी ने क थी. अपनी अव था के बावजद वे इस काय म क सफ़लता के िलए ाणपन से समिपत रहते हए अथक पर म करते रहे . ी अनतराम ि पाठी ( धानम ी), स ी मिणमाला (िनदेशक, गाधी मित दशन सिमित), ी नारायण कमार (सयोजक िद ली रा भाषा चार सिमित,एव सिमित के रा ीय अय मान.यायमित ी च शेखर धमािधकारीजी ने अपनी गरीमामय उपिथित से इस काय म को भयता दान क. उ ाटन स= 16 माच,2013 : समय 10.00बजे मान.यायमित च शेखर धमािधकारीजी क अय ता म, म य अितिथ मान. ी सशील कमार िशदे(त कालीन गह म ी) क गरमामय उपिथित म ी अनतराम ि पाठीजी ने वागत भाषण िदया. ी कैलाशच पतजी ने काय म क तावना. एव ी नारायणकमार ने इस स का सचालन िकया. थम िवमश स- भारतीय भाषाओ का अतरसवाद समय: 12:00 से 2:00 बजे अय : ी िव नाथ ि पाठी बीज व य: डा..िवमलेश काित वमा व ा: ी जािबर हसैन, डा.शेषारनम, स ी मिणमाला सचालन:- ीमती अलका िसहा. ( भोजन 2.00 बजे से 3.00 दोपहर) ि तीय िवमश:-भारतीय भाषाओ पर अ े जी का हत े प समय: शाम 3.: से 5 बजे अय :- ी टी.एन.चतवदी (पव रा यपाल) बीज व य:-ी राहल देव व ा:-डा. लिलताबा, ो.हरीश ि वेदी, ी शिश शेखर, भारतीय भाषाओ के लेखाक के बीच सारवत सवाद जे ि पाठी,,सिनता शमा,डा.सरेश,स ी ऊषाराजे ससेना, िवनोद लकेश,हरजे चौधरी,डा.पनालाल पाचाल,डा.बदेव वशी, ेमलाल शमा,(सिचव रे वे) ी पाचाल((UPSC) सचालन;-डा. जवाहर कनावट ततीय स :-भारतीय भाषाए और भमडलीकरण िदनाक;-17 माच 2013 समय; 10.30 बजे से 12.00 बजे तक अय :- ी मदनलाल मध बीज व य:- ड. िच ा मदगल व ा:-डा. कमलकमार, डा.कमद शमा, डा राजे साद िम ा सचालन:-डा.मीना ी जोशी चतथ िवमश:-िहदी सथाए और भावी िदशाए िदनाक:-17 माच 2013, समय 12:15 से 2.00 बजे तक अय :-डा. रनाकर पाडॆ, पव सासद बीज व य:- डा. अमरनाथ, ड. वेद ताप वैिदक,डा.केशरीलाल वमा सचालन:- सन लतात (भोजन 2.00 - 3.00 तक) समापन स .—समय 300 से 5 बजे शाम म य अितिथ:- ीमती सषमा वराज, नेता ितप ,लोकसभा अय :- यायमित च शेखर धमािधकारी वागत भाषण:- ी कैलाशच पत व य:- डा. भाकर ो ीय आभार:- ी नारायण कमार. सचालन:- ी अिनल जोशी अमत महोसव म िननिलिखत भारतीय भाषाओ के िव ान को समानीत िकया गया डा. िव नाथ साद ितवारी (िहदी.) डा. राधा वलभ ि पाठी (सकत) डा.एच.बालसमयम(तिमल) डा. एस.शेषारनम (तेलग) ी एषमटोर राजराज वमा (मलयालम) स ी ितभानद कमार( कनड) ी रा.ग. जाधव(मराठी) स ी नवनीता राय (उिडया) स ी अ प बआ(असमी) ी रघवीर चौधरी (गजराती) ी अतल वासे (उद) ी जनाथ बेताब(कमीरी) ी मोहनिसह (डोगरी) डा. ी िवनोद असदानी( िसधी) ी रमेश वेलकर (ककणी) ी सतीशकमार वमा (पजाबी) ी रजे िम (उिडया-िहदी) ी रामशकर ि वेदी (बगला-िहदी) िदली म रहते हए हम शाम का व िमलता. इस समय का हम भरपर उपयोग करते. पास ही िथत गाधी-समाधी जाते और पय बाप के चरणॊं म अपना शीश झका कर अपना अहोभाय समझते. गाधीजी को हम देख तो नह आए थे, यिक उस समय मेरी उ छः साल क थी,लेिकन बाद म उनके सािह य को पढकर गाधीजी को थोडा बहत समझ पाए. एक ऎसे सत क समाधी के पास कछ समय तक बैठकर उनक मितय म त लीन हो जाते. ऎसा करते हए महान वै ािनक आईटीन ने कभी बाप के बारे म कहा था िक लोग िव ास नह करगे िक एक हाड मास के यि ने िबना र बहाए देश को आजादी िदला दी.[ कपया सशोिधत कर.) महामा गाधी के बारे म उहने यह भी कहा था:- I believe that Gandhi’s views were the most enlightened of all the political men of our time. We should strive to do things in his spirit: not to use violence in fighting for our cause, but by non-participation in anything you believe is evil. . गाधी-समाधी (बाए से दाए=गोवधन यादव,डी.पी.चौरिसया,नमदा साद कोरॊ एव मगलकरजी िच-1 बाए से दाए= ी ो ीयजी, धमािधकारीजी एव कैलाशच पतजी यायमित दादा धमािधकारी जी से भट करते हए यादव. (दादा का मलताई से गहरा सबध रहा है.) िदली के सािहयकार िम ी िवनोद बबर जी से िमलते हए ( मान.यायमित धमािधकारीजी, डा. ी.िव नाथ ि पाठीजी के साथ फ़ोटॊ प.) रा भाषा चार सिमित,वधा के यवा कमठ साथी ी नरे कमार दढारेजी ने इस काय म को सफ़ल बनाने के िलए अथक पर म िकया.िनि त प से वे धयवाद के पा ह. गाधीजी क तवीर के समीप काली जैकेट म खडॆ ी द ढारेजी ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 18 भारतीय कला, ा और िचतन का बेजोड सगम अ रधाम- वामीनारायण मिदर. वामीनारायण अ रधाम वामीनारायण अ रधाम एक नतन-अि तीय सकित-तीथ है. भारतीय कला, ा और िचतन का बेजोड सगम यहाँ देखा जा सकता है. भारतीय सकित के परोधा, वामीनारायण सदाय के सथापक ी घनयाम पा डॆ या सहजानदजी ( 1781-1830) क पय मितय को समिपत वामीनारायण अ रधाम के आकषण से भािवत होकर जन-सैलाब िखचा चला आता है..और वामी के दशन कर अपने को अहोभागी मानता है. धम और सकित को समिपत इस महामानव ने अपने आपको तप क भ ी म तपाया, ान क लौ को जविलत िकया, और सिचत पय को जनसाधारण के बीच समिपत कर िदया. एक िद य महापष योगीजी महाराज ने आशीवाद िदया था िक यमना के पावन तट पर एक भ य आयािमक महालय क थापना होगी, िजसक याित िदग-िदगत म होगी. गणातीत गपरपरा के पाचवे ग / सतिशरोमणी/ िदय यि व के धनी िव वदनीय मखवामी महाराजजी ने अपने ग के . उस प रकपना को पवी- तल पर साकार कर िदखाया. वािमनारायण अ रधाम के िनमाण और सवहन का उ रदाियव बी.ए.पी.एस. वािमनारायण सथा ने परी िन ा के साथ िनवहन िकया. सय रा सघ ारा मायता ा यह सथा एक अतरा ीय सामािजक-आयािमक सथा है, जो िवगत एक शता दी से मानव-सेवा मे रत है. 3700 ससग के , 15,700 ससग सभाओ, 850 नवयवा सिशि त सतो,, 55,000 वयसेवक ारा सेिवत और लाख अनयाियय के ारा यह सथा िश ा, वा य, पयावरण, सामािजक, नैितक, साकितक आिद े समपण के साथ कर रही है. म अपनी मख भिमका िनवहन बडी लगन-ा और यमना के िकनारे लगभग एक सौ एकड जमीन पर उस प रक पना को साकारत िकया गया है. इस भ य मारक क िडजाइन ी महेशभाई देसाई तथा ी बी.पी.चौधरी ने उके री तथा िसकदरा (राज) के चालीस गाँव के लगभग सात हजार कारीगर ने इसे तराशा-सवारा, उह मस या दी और िफ़र क के मा यम से िनमाण- थली पर िभजवाया. अकोरवाट, अजता, सोमनाथ, कोणाक के सय मिदर सिहत देश-िवदेश के कई मिदर के थाप य के गहन अययन-मनन और वेद, उपिनषद तथा भारतीय िश प क कई पतक के गहन अययन से ा जानकारय के आधार पर इसका िनमाण िकया गया. िवशाल भयता िलए इस इमारत को बनने म जहाँ चालीस साल लग सकते थे, उसे महज पाच वष म परा कर िदखाया. यह िकसी आय से कम तीत नह होता. छः नव बर दो हजार पाच म इसक िविधवत इसक नव रखी गई थी जो दो हजार दस म बनकर परी हई. घनयाम पाडॆ उफ़ वामीनारायण उफ़ सहजानद वामीजी िहद धम के वामीनारायण सदाय के सथापक पष थे. आपका जम 03-04-1781 अथात चै शल 9 िव.सवत 1837 म भगवान ीराम क जमथिल “अयो या” के पास िथत ाम छिपया म हआ था. आपके िपता ी का नाम ी हर साद तथा माता ी का नाम भि देवी था. स सत बालक घनयाम के हाथ म प , पैर म ब , तथा कमल-िचह देखे गए. इन दैवीय अलकर से य इस बालक ने महज पाच वष क आय म अ र ान ा िकया था. आठ वष क उ म आपका जनेऊ सकार िकया गया. आपने कई शा का गहनता से अययन िकया. यारह वष क आय आते ही आपके माता-िपता का देहावसान हो गया. िकसी कारण से आपका अपने बडॆ भाई के साथ िववाद हो गया. उसी समय आपने अपना घरबार छॊड िदया. अगले सात साल तक आप भारत म मण करते रहे. लोग उह नीलकठवण कहने लगे. उहने अागयोग ी गोपाल योगीजी से सीखा. उ र म उ ग िहमालय, दि ण म काचीपरम, ीरगपर, रामे र होते हए पढरपर और नािसक होते हए आप गजरात आ गए. माग ल के समीप “लोज” गाँव म िनवास कर रहे वामी म ानदजी से परचय हआ, जो वामी रामानदजी के िशय थे. वे उह के साथ रहने लगे. वामी रामानदजी ने सदाय क परपरा के अनसार नीलकठवण को “पीपलाणा” गाँव म दी ा दी और नया नाम िदया सहजानद. एक साल बाद वामीजी ने “जेतपर” म सहजानदजी को अपने सदाय का “आचाय” पद दे िदया. कछ समय बाद रामानदजी का देहावसान हो गया. उसके बाद वे देश भर म घम-घमकर ई र के गणानवाद करते और धम का चार-सार करते हए लोग को वामीनारायण म का जाप करने क सीख देते रहे. तन-मन से ई र को समिपत सहजानदजी ने 1830 ई. म अपनी देह छोड दी. वामीनारायन के नाम से िव यात हए इस महान सत का मारक गाधीनगर (गजरात) मे’अ रधाम” थापयकला का उकतम नमना है. इसी तज पर िद ली म यमना के पावन तट पर भय मारक बनाया गया है,िजसक िवशालता, भयता देखते ही दशानाथ को िकसी िद य लोक म ले जाती है. . िदय ार- दस िदशाओ के तीक ह, जो वैिदक शभकामनाओ को ितिबिबत करते ह भि ार- परपरागत भारतीय शैली का अनोखा वेश ार मयर ार= वागत ार म परपर गथे हए मयरतोरण अ रधाम मिदर=गलाबी पथर और ेत सगमरमर के सयोजन से 234 कलामिडत तभ,, 9 कलाय घमट-मडपम, 20 चतकोणी िशखर और 20,000 से भी अिधक कलामक िशप, इसक ऊँचाई 141फ़ट,चौडाई 316 फ़ट और लबाई 356 फ़ट है ीहर चरणारिवद=सोलह मागिलक िचह से अिकत ी हरचरणारिवद मित= पचधात से िनिमत वणमिडत 11 फ़ट ऊँची नयनािभराम मित. कलामडल. िसहासन पर िवराजमान मशः भगवान लमीनारायण, ीरामजी-सीताजी, ीकण-राधाजी, और ी महादेव-पावती जी क सगमरमर क दशनीय मितया कलामक छत मडोवर= अथात बा दीवार. कल लबाई 611 फ़ट, ऊँचाई 25 फ़ट. 4287 पथर से िनिमत यह मडोवर भारतीय नागरक शैली के थाप य म सबसे बडा है. गजे पीठ= अ रधाम का यह भय महालय 1070 फ़ट लबी गजे पीठ पर िथत है, 3000 टन पथर से िनिमत है.,जो िव का एक मौिलक एव अि तीय शै पमाल है. 148 हािथय क यह कलामक गाथा, ाणीसि के ित िवन भावाजिल है. भारतीय बोधकथाओ, लोककथाओ, पौरािणक आयान इयािद से 80 य़ तराशे गए ह. देखना न भल---िवशेष= बाहरी दीवार पर चार ओर थािपत भारतीय सकित के महान योितधर सत, भ , आचाय, िवभितय के 248 मित-िशप, भय वेश मडपम क अि तीय तभ कलाकित, छत म सरवती, ल मी,पावती आिद देिवय और गोपी-कण रास के अ त िशप, नारायणपीठ म भगवान वािमनारायण के िद य च र के कल 180 फ़ट लबे कलामक धातिशप येक हाथी के साथ बदलती कलामक हाथी-म ाए. “ हाथी और कित िवभाग” म पचत क कथाओ के कित क गोद म डा करते हािथय क महमोहक म ाए. “हाथी और मानव” िवभाग म समाज जीवन से समरस हािथय क कथाए. “हाथी और िद य तव” िवभाग म धम-परपराओ म हाथी क गाथाए खड-1= सहजानद दशन/ ेरणादायक अनभित =रोबोिट स- एिनमे ोिन स, विन-काश, सराउड डायोरामा आिद आधिनक तकिनक के मा यम से ा, अिहसा, कणा, शाित, आि सनातन मय क अ त तित भगवान वािमनारायणजी के जीवन-सग के ारा. खड-२=नीलकठ दशन= महाकाय सी िफ़म जो बालयोगी नीलकठ क, िजहने सात वष तक नगे पैर 12,ooo िक.मी. भारत क पदया ा क. 85 x 65 फ़ट िच पट सय घटना पर आधारत, खड-३=सकित िवहार= दस हजार वष परानी भारतीय सकित क अ त झाक. नौकािवहार ारा 800 पतल एव कई सशोधनापण माणभत रचनाए. िव क सवथम यिनविसटी त िशला, नागाजन क रसायनशाला देखकर भारत के भय इितहास क झाक देखी जा सकती है. य पष कड एव सगीतमय फ़वारे= लाल पथर से िनिमत 300 x 300 फ़ट लबा ाचीन कड पर परा का नमना, कड के भीतर कमलाकार जलकड म सगीतमय फ़वारा. जल, योित और जीवनच का अ त सयोजन. 27 फ़ट ऊँचा बालयोगी नीलकठ चरी क ितमा नारायण सरोवर= मिदर के तीनो ओर ाचीन जलतीथॊ क मिहमापण परपरा को समिपत नारायण सरोवर क थापना क गई है. 151 तीथ और निदय के पिव जालिसचन से यह सरोवर परम तीथ बना है. अिभषेक मडपम= शभकामनाओ और ाथनाओ के साथ नीलकठ चारी क मित पर गगाजल से िविधपवक अिभषेक. योगी दय कमल=हरी घास क भय कालीन पर एक िवशाल अदश कमल. ेमवती आहारगह=अजता क अ त कलासि के आहादक वातावरण म श ताजा भोजन, मधर जलपान क सिवधा. साकितक उ ान=22 एकड म फ़ैले उपवन म पप-पौध का कलामक अिभयोजन. 8 फ़ट ऊँचे 65 का यिशप. सयकाश के सात रग के तीकप सात अ का अनपम सयरथ, सोलह च कलाओ के तीकामक 16 िहरनो का अ त च रथ, भारतीय वीररन, महान ीरन, ितभावत भारतीय बालर न, एव रा के िनमाण म योगदान देने वाले महान रा रनो के अभतपव का यिशप. ```````````````````````````````````````````````````````````````````````````````````````````````````` 19 िसहथ मेला-उजैन िसहथ-२०१६. ( २२ अ ै ल से २१ मई २०१६) कभपव एक महवपण और सावभौम महापव माना जाता है, िजसम देश-िवदेश के लाख ाल एक होते ह. इसे यिद िवराट मेला कहा जाय तो अितयोि नह होगी. िव म शायद ही ऎसे िवराट मेले का आयोजन कह भी नह होता, यही तो इसक िवशेषता है. “कभ” का शाि दक अथ है घट या घड़ा. कभ के एक अथ िव ाड भी है. जहाँ पर िव भर के धम, जाित, भाषा तथा सकित आिद का एक समावेश हो वही कभमेला है. कभ मेले का ारभ कब से हआ इसका ठीक-ठीक िनणय करना किठन है. परत कभपव के िवषय म पराणॊं म एक सग ऎसा आया हआ है, िजसके आधार पर कहा जा सकता है िक कभ मेले का ारभ बहत ाचीन काल म ही हो चका था. आज केवल उसक आवि मा होती है. कभ पव को लेकर एक बड़ा ही रोचक सग पढ़ने को िमलता है – िकसी समय भगवान िवण के िनदशानसार देव और दानव ने िमलकर सम-मथन िकया. मदराचल पवत को मथनद ड और वासिक नाग को नेती (मथन-रज) बनाकर सम-मथन िकया. मथन करने से चौदह रन िनकले, जो इस कार ह (१) ऎरावत हाथी.(२) कपव (३) कौ तभमिण (४) उचैः वा (५) च मा (६) धनष (७) धेन (कामधेन), (८) रभा (९) ल मी (१०) वा णी (११) िवष (१२) शख (१३) ध वतर और (१४) अमत. धवतर अमतकभ लेकर िनकले ही थे िक देव के सकेत से देवराज इ के प जयत अमत-कभ को लेकर वहाँ से भाग िनकले. दै यग श ाचाय के आदेशानसार दै य ने अमत-कलश छीनने के िलए जयत का पीछा िकया. जयत और अमत-कलश क र ा के िलए देवगण भी दौड़ पड़े. आकाशमाग म ही दै य ने जयत को जाकर घेर िलया. तब तक देवगण भी वहाँ पहँच चके थे. िफ़र या था, देखते ही देखते दोन म य िछड़ गया जो बारह िदन तक चलता रहा. दोन दल के सघष-काल म अमतकलश से पवी पर चार थान पर अमत क बद छलककर िगर गयी. उस समय सय आिद देवता जयत और अमतकलश क र ा के िलए सहायता कर रहे थे. देव तथा असर के कलह को शात करने के िलए भगवान िवण मोिहनी प धारणकर कट हए तो य तकाल थम गया और दोन प ने तय िक अमत िपलाने का भार इह पर छॊड़ िदया जाए. तब मोिहनी पधारी िवण ने दै य को अमत का भाग न देकर देवताओ को िपला िदया. इसिलए देवगण अमर हो गए. अमत ाि के िलए बारह िदन तक देव और दानव म य हआ था. देव के बारह िदन मनय के िलए बारह वष के बराबर होते ह. इस कारण कभ मेला भी बारह वष के बाद एक थान पर होता आया है. िजन थान पर अमत क बद िगरी थी वे थान ह (१) हर ार (२) यागराज (३) नािसक और (४) उजैन. इसीिलए इन चार थान म बारह वष के बाद कभ मेला लगता है, जो ढाई मिहने तक चलता है. इसे पण कभ कहा जाता है. हर ार और याग म छः साल के प ात अधकभ का मेला भी आयोिजत होता है. हर ार के अधकभ के अवसर पर नािसक का कभ मेला होता है और याग के अधकभ के समय उजैन का कभ होता है. (१) हर ार- कभरािश पर बहपित का और मेष-रािश पर सय का योग होने पर हर ार म पण कभ का अयोजन होता है. (२) याग- वषरािश पर बहपित का योग होने पर याग म पणकभ मेले का आयोजन होता है. (३) उजैन- िसहरािश पर बहपित का और मेष रािश पर सय का योग होने पर उजैन म पणकभ मेले का आयोजन होता है. (४) िसहथ महापव दस महायोग के उपिथत होने पर मनाया जाता है. िजन दस महायोग का उ लेख शा उलेिखत िकये गए ह वे इस कार ह-(१) िसह रािश म बहपित, (२) मेष रािश म सय (३) तला रािश म च (४) वाती न म (५) वैशाख मास (६) शल प (७) पिणमा ितिथ (८) याितपात योग (९) सोमवार और (१०) अवतीपरी( उजैन.). नािसक- वि करािश पर बहपित का योग होने पर नािसक म पण कभ का योग होता है, जहाँ कभ का मेला लगता है. इस कार चार थान म बारह वष के प ात एक महाकभ पव होता है. कभ मेल का महव बतलाते हए कहा गया है. अमेघसह ािण वाजपेयशतािन च * ला दि णा भमेः कभ नाने त फ़लम अथात- हजार अमेघय करने से और लाख बार पवी क दि णा करने से जो फ़ल िमलता है, वही फ़ल कभनान से ा हो जाता है. कभपव म जाित, धम, स दाय, भाषा, रा य, सकित, सािहय, दशन, वेषभषा आिद सभी सदभ म अनेकता म एकता के दशन होते ह. साध-सत, धनी, िव ान, कमकाडी, योगी, ानी, कथा वाचक, तवदश, िस पष, सेठ-साहकार, िभखारी, यापारी, गहथ, सयासी, चारी, कपवासी, अिधकारी, बढ़े, जवान, आबालव विनता सभी का वहाँ समागम होता है. िविभन धम, सकित तथा स दाय का सगम इन कभ मेल म होता है, जो सहज आकषण का के होता है. यही कारण है िक उ रभारत के लोग दि ण भारत म ितपित, रामे र तथा कयाकमारी आिद तीथथान पर जाकर अपने को कताथ मानते ह और दि ण भारत के लोग उ र भारत िथत ब ीनाथ, केदारनाथ, गगो ी, यमनो ी, जगनाथपरी, काशी तथा याग आिद तीथथान क या ा कर अपने को धय मानते ह. यह बात वय िस होती है िक हमारे ाचीन काल के ऋिष-मिन िनतात ही दरदश तथा कशा बि के थे. उहने भारतवष के ाचीन वैिदक सनातन धम. सकित, सयता, त, पव, योहार, साधना तथा उपासना आिद क र ा के िलए एव इस आयावत देश क एकता, अख डता और गौरव-गरमा को बनाए रखने के िलए इनक थापना क थी. यह गौरव क बात है िक इस समय महाकभ िसहथ उजैन म (२२ अ ैल से २१ मई २०१६) िव का इतना बड़ा और महवपण आयोजन मय देश क धरा पर हो रहा है. यहाँ आए हए सत-सयािसय के अखाड़े अपनी साधना और िव ा से कोिट-कोिट ालओ को लाभािवत कर रहे ह. साध-सत अपनी ओजवी और िदय वाणी से परमधम का पाठ पढ़ा रहे ह. वचन, कतन, भजन, पजा-पाठ आिद धम से जड़ा शायद ही ऎसा कोई धािमक काय है, जो यहाँ न हो रहा हो. इस महाकभ तक पहचाने के िलए शासन क ओर से बड़े पैमाने पर इतजामात िकए गए ह. जगह-जगह याि य के ठहरने और मेले तक पहचाने के िनःशक बस उपलध होती है. पीने के िलए श जल, शौचालय के िलए, िबमार पड़ जाने क िथित म मेिडकल क यवथा, नान घाट पर लड लाईट क उ म यवथा, सगिधत जल के िछड़काव ,नदी म श जल ही वािहत हो, नदी म गोताखोर क टीम, इस पार को उस पार से जोड़ने के िलए फ़ौज ारा िनिमत दो पल, पिलस क उ म यवथा आिद यहा देखने को िमलती है. इसके अलावा रेल िवभाग ने भी इस यवथा को सचा प से चलाने के िलए अपनी ओर से यवथाए क है. िम- उजैन जाने के कई अवसर मझे िमले लेिकन कभ म जाने का यह थम अवसर था. एक िदन यिह िम के बीच कभ म जाने क बात चल िनकली. सहमित बनते ही िम बी,एल.िवकमा ने पच हेली फ़ा ट पैसजर से आर ण करवा िलया. इस तरह िछदवाड़ा से ी अशोक ससेना, के .के .डेहरया, बी.एल.िवकमा, राकेश चौबे, एस.एल.पाठेकर, के .एस.मा या और ए.पी.खगारे सिहत हम १४ मई को उजैन के िलए िनकले. े न का नाम भले ही फ़ा ट पैसजर हो लेिकन वह अपनी ही चाल म चलती है. उसे नाम के अनप चलना शायद नह आता. अपनी सामाय चाल म चलते हए े न मसी जशन दो बजे के करीब पहची. अब हम दसरी े न का इतजार था. सरज महाराज के तेवर काफ़ गम थे. िकसी तरह अपने आपको धप से बचते हए हम अगली े न का इतजार करने लगे. काफ़ इतजार के बाद जब े न नह आयी तो हम ायवेट बस से उजैन जाने का िनणय िलया. िकसी तरह उजैन पहचे. शाम िघर आयी थी और हम रामघाट के पास अविथत रामानजकोट पहचना था,लेिकन िकसी भी वाहन को मेला े म घसने के स मनाही थी. िकसी तरह एक लाज म कने का इतजाम िकया और राि म ही ि ा म नान करने का मानस बनाया. रा ता चलते हम ि ा के तट पर पहचे. चार तरह अपार भीड़ को देखने का हमारा यह पहला अवसर था. देश के कोने-कोने से लाख ालओ का आगमन आय पैदा कर रहा था. आय तो इस बात पर भी होता है िक अयाय थान म होने वाले कभ का आमण िकसी को नह भेजा जाता. इसके आयोजन क खबर पचाग के अलावा समाचार-प म हे पढ़ने को िमलती है. िबना िकसी आमण के लाख-करोड़ ालओ का आना इस बात क पि के िलए काफ़ है जो भारत क िविवधता और एकता को दशाती है. म. .शासन क ओर से बड़े पैमाने पर िकए गए सर ा के इतेजाम को देखकर तारीफ़ क जानी चािहए. जगह-जगह पिलसमैन तैनात थे. िहि सग देते हए वे भीड़ को आगे बढ़ने का सकेत दे रहे थे. आय इस बात पर िक िकसी भी पिलसमैन को हमने तैश म बातचीत करते नह देखा. इतनी सजनता..न ता आिद देखकर आय पैदा करने के िलए काफ़ है अयथा बेचार को बड़ा ही िनमम-कठोर और अयाचारी ही माना जाता है. १६ मई को हम रामघाट के समीप िथत रामानजकोट जा पहचे. िव गीता ित ान का यह पावन के समचे देश के अलावा िव म गीता को िति त करने के िलए भगीरथ यास कर रहा है. इस के म वेदपाठी बच को सकारत िकया जाता है. इस सथान के मख ह वामी रगनाथाचायजी. मिदर परसर म भ क भीड़ देखते ही बनती है. भ के िलए आवास तथा िनःशक भोजन क उ म यवथा भी यहाँ क जाती है. रामानजकोट का वेश ार \ वामी रगनाथाचाय जी.रामानजकोट रामानजकोट के वेश ार पर उपिथत िछदवाड़ा क िम मडली-(उजैन या ा) बाए से दाय- ी बी,एल.िव कमा ी अशोक ससेना, के .के .डेहरया, बी.एल.िवकमा, राकेश चौबे, एस.एल.पाठेकर, के .एस.मा या और ए.पी.खगारे आिद. कभ मेले म वेश करते ही हम म य ार पर एक िवशालकाय िसह के दशन होते ह जो िसहथ कभ होने का माण तत कर रहा होता है. इसी थान से होते हए हम पावन ि ा के तट पर पहँचे थे. दो िदन म तीन बार नान और महाकाल के िद य दशन का पय-लाभ हमने उठाया. िसहथ २०१६ के कछ िवहगम य. आथा एव अया म का अनठा सगम समची ि ा लड लाईट से जगमगा रही है. साध-सत के अथायी अखाड़ॊं ह अथवा मिदर, सभी रग-िबरगी रोशनी म जगमगा रहे है. लाख क सया म ालओ क भीड़ नान कर पय लाभ ले रहे ह. नान के िलए पया श जल उपलध करवाया जा रहा है. पानी क श ता के तर को िदखाने और तापमान को दिशत करने के िलए एक िड ले लगाया गया है, जो िनरतर आकड़े िदखला रहा है. नान और डबक लगाने के िलए पानी का तर चार िफ़ट अथात १२० से.मी. रखा गया है. कोई ाल पानी म न डब जाए इसके िलए मोटरबोट और गोताखोर के पया इतजाम घाटॊं पर िकए गए ह. नदी का िकनार को सजाया-सवारा गया है. ि ा के बाए िकनारे पर लाल पल से लेकर भखी माता से लेकर द अखाड़े तक एव दाए तट पर लाल पल से लेकर निसह घाट तक खाली जगह पर भी घाटॊं का िनमाण िकया गया है. इस तराह दोन ओर लगभग ८ िकमी.लबाई म घाट उपलध है. लबालब बहने वाली ि ा इस समय जलिवहीन है. िबना जल के िसहथ कैसा? जब जल नह होगा तो नान करना सभव नह. शासन ने इस सकट से िनजाद पाने के िलए लगभग १९ िकमी.लबाई म ाम िपपयाराधौ से िनकालकर खान नदी को पाइप के जरए कािलयादेह महल के आगे ि ा से जोड़ा िदया है. हजार क स या म ाल पानी म डबक लगाकर िनकल रहे ह तो वह दसरी ओर उतनी ही सया म लोग पानी म उतर रहे ह. न कोई शोर, न कोई शराबा, सब इस ढग से हो रहा मानो आप कोई िदवा वपन देख रहे ह. है न आय पैदा करने वाली बात ! इस माकल इतजाम के िलए शासन क िजतनी भी तारीफ़ क जाय, कम ही तीत होगी. िसहथ बना सामािजक सरोकार का महाकभ दिनया को मानवीय मय का सदेश देने के मामले म िसहथ २०१६ अतीत म हए कभ से, एकदम हट कर अनठा और नवेला बना. धम और अनशासन का पाठ पढ़ाने वाले जना पीठाधी र आचाय महामडले र अवधेशानदजी िगर महाराज, परमाथ िनकेतन के अय और आयािमक ग वामी िचदानद सरवती ने उपिथत जनसमदाय को पयावरण और कित सर ण के साथ खले म शौच नही करने का सदेश िदया. वह दसरी ओर भारत के धान म ी ी नरे मोदी जी होिडग के जरए जन-जन म सदेश देते नजर आए. होिडग म िलखा गया था- िकतनी पावन ह ये निदया-चाहे गगा हो या ि ा, खले म शौच न कर. इसके अलावा परमाथ िनकेतन ारा सदेश िदया गया िक ि ा के आचल को हरयाली क चादर ओढ़ाने के िलए डेढ़ लाख पौधे रोपे जाएगे जो पीिढ़य के िलए महा साद बनगे. शिन के उपासक दाती महाराज ने बेिटयाँ बचाओ का सदेश देते हए जनजागरण िकया. परे िसहथ म बेिटया बचाने के होिडस लगे हए थे. कभ मेला तब से आज तक सभवतः यह पहला कभ है जहाँ िसने जगत क िस कलाकार, िव िव यात नयागना एव सासद हेमामािलनी ने नाटय िवहार कला के मबई के कलाकार के साथ नय वािटका राधा रास िबहारी क तित दी तो परा माहौल राधा-कण भि म रम गया. पाच मई को अचानक आए तफ़ान म कई पडाल धराशायी हो गए. म य म ी िशवराज चौहान ोटोकाल को न देखते हए मगलनाथ जा पहचे और यवथा बनाने म जट पड़े. िफ़र या था जन-समदाय उमड़ पड़ा और सहयोग देने म जट गया. इसी िदन पेशवाई के बाद जगतग शकराचाय वामी व पानदजी ने नाराज होकर पडाल छोड़ िदया और वैशाली नगर िथत एक यजमान के यहा कने पहच गए. हादसा गजर गया..िफ़र नयी सबह हई. उसी उमग और उसाह के साथ लगभग दस लाख लोग ने रामघाट, द अखाड़ा ममगलनाथ, ि वेणी समेट अय घाटॊं पर नान कर पय-लाभ उठाया. भाजपा के रा ीय अय अिमत शाह ने बधवार को वाि मिक घाट पर ि ा म डबक लगाई और दीनदयालपरम के सत समागम म शािमल हए. सत के पैर छए और आशीवाद िलया. महाकाल के दशन िकए और उजैन से १५ िकमी. दर ाम िननौरा म १२ से १४ तक अतररा ीय वैचारक महाकभ पहचकर तैयारय का जायजा िलया और रा य सरकार क दशनी का शभारभ िकया. ११ मई को तलवार लहराते, िसके बाटते िकनर अखाड़े के आचाय महामडले र लमीनारायण ि पाठी घोड़े पर सवार होकर िनकले. एक पालक म आदय शकराचाय क तवीर और िकनर क आरा य देवी बहचरा माता क मित थी. िननौरा म िसहथ का सावभौिमक सदेश तैयार करने के िलए हो रहे अतररा ीय िवचार कभ म कटीर उ ोग को ोसािहत करने, जल जगल और जमीन बचाने और मछली पालन, किष प ित म प रवतन करने, नारी-शि को नयी िदशा देने, वछता एव पिवता क मह ा एव परपरा को थिपत करने पर जोर िदया गया. १४ मई िदन शिनवार को देश के धान म ी ी नरे मोदी ने उपिथत होकर ि िदवसीय अतररा ीय िवचार कभ के समापन काय म म िसहथ के सवमौम सदेश को िव के िलए जारी िकया. इस दौरान ीलका के रा पित ी मै ीपल िसरसेना, लोकसभा अदय ीमती सिम ा महाजन, म यम ी ी िशवराज चौहान, के ीय इपात और खान म ी नर िसह तोमर और सामािजक याय और अिधका रता म ी थावरचद गहलोत के अलावा ८५० से अिधक िवदेश के िव ान ने सहभािगता का िनवहन िकया. उहने साध-सतो को आहान करते हए साल म एक बार सात िदन भ के बीच समाज के म पर चचा करने, पेड़ और नदी, कित-पयावरण, बेटी व नारी, धम और िव ान पर गहनता से चचा कर आगे क रणनीित बनाने पर जोर िदया. उहने मच से लोबल वािमग, आतकवाद और िवतारवाद को तीन बड़े सकट बताते हए उसका िनदान खोजने क अपील क. इसी के साथ उहने ५१ स ीय अमत सदेश जारी िकया. १६ मई को भारत साध समाज अिधवेशन म धम से जड़े १४ ताव परत िकए गए िजसम निदय को आपस म जोड़ने , पयावरण को बचाने जैसे अहम म े शािमल थे. देश के म यम ी ी िशवराज चौहान ने देश के साढ़े सात करोड़ नागरक को उजैन पधारने के िलए आमि त करते हए वयभ महाकाले र योितिलग के दशन, मो दाियनी ि ा मे नान करने के िलए आमि त िकया था. मा एक आहान पर करोड़ लोग ने पय नान का लाभ उठाया और अपने को धय माना. यह वह थान है जहा देव के देव महादेव क तड़के चार बजे भम आरती म भमी चढ़ाई जाती है तो शाम को ायफ़ड और भाग क सौयता िलए अनठा गार हर िकसी को आकिषत करता है. अममन तीन हजार क भाग और देढ़ हजार के ायफ़ड से भोले का गार िकया जाता हो, लगभग छः हजार साल पराना कालभैरव का वाम माग ताि क मिदर, िजसम मास, मिदरा, म ा जैसे साद चढ़ाये जाते ह, जहाँ वय गढ़कािलका िनवास करती हो, जहाँ रि-िसि गणेश मिदर अविथत ह, जहाँ हरिस ी देवी का भय मिदर हो, जहाँ महान तप वी ग गोरखनाथ क तपःथिल हो,वहाँ भला कौन नह जाना चाहेगा. िनि त ही वे जन बड़भागी ह िजहने इस महाकभ के अवसर पर पधारकर पय-लाभ कमाया है. --------------------------------------------------------------------------------------------------- 20. ितिलम के कहासे म िघरा- देवगढ़ िकला.( िजला िछदवाड़ा) देवगढ़.का िकला. िछदवाड़ा िज़ले से लगभग 40 िकलोमीटर दर मोहखेड़ लॉक के देवगढ़ गाँव म देवगढ़ का िकला िथत है. िछदवाड़ा नागपर हाइवे पर उमरनाला से एक रा ता मोहगढ़ लोहँगी ाम होकर देवगढ़ गाँव तक जाता है. गडवाना के िवशेष िक़ल म से एक, यह िक़ला सतपडा शखला क 650 मीटर ऊची पहाड़ी पर िथत है और अपने गौरवशाली इितहास के िलए जाना जाता है. िकले के चार तरफ गहरी खाई है और काफ़ घने जगल ह . देवगढ़ गाँव िक़ले क तलहटी म पव क िदशा म िथत है. देवगढ़ का िकला अपनी वा त यवथा के कारण एक समय परे भारत म िव यात था.देवगढ़ के बारे म इस े के वािसय म तरह-तरह क िकवदितया एव दत-कथाए चकाता सतित उपयास से जड़ी हई लगती है. ऐसी जन ित है िक कभी देवगढ़ के िकले क वा त यवथा अनेक रहय से परपण थी. इस िकले म सैकड़ गप माग श सेना से बचाव के ताि क ितिलमी इतजाम थे. इस िकले म ग माग क यवथाओ के साथ-साथ हैरत म डालने क आयचिकत करने वाली वा त यवथाओ का समावेश था. चकाता सतित उप यास क आधारिशला "देवगढ़" ही था. कहा जाता है िक देवगढ़ िकले क इस रहयमयी यवथाओ म सािह यकार बाब देवक नदन खी ने अपनी लेखनी से उभारकर उपयास म चमकारी घटनाओ से एक अमरगाथा िलखी. यिद समता से इसका अवलोकन कर तो देवगढ़ के गौरवशाली इितहास, देवगढ़ िकले क वा त यवथा और चकात सतित उपयास म एक साय-सा िमलता है.चकात सतित उपयास उपयास क ँखला म रहयलोक म िवचरण कराने वाली गाथा म नवगढ़, िवजयगढ़, सा ा य का उलेख आता है. यह एक सयोग ही है िक िछदवाड़ा िजले के मोहखेड़ िवकासखड म िथत देवगढ़ के समीप आज भी िवजयगढ़ नाम का गाव है. देवगढ़ िकले के अय रहय से भरे थापय भवन और थल के माण भ नावेश के प म आज भी िमलते ह. े वािसय के अनसार पहले देवगढ़ से नागपर क ओर एक ग माग जाता था. इस ग सरग के बारे म भी पहले से अनेक िकवदितया चिलत रही ह. आठ सौ कँए, नौ सौ बाविलय वाले देवगढ़ म चोर बावली, बादल महल, िकसवन महल जैसी इमारत के िवषय म भी कई िकवदितया जड़ी ह. देवगढ़ म था शीश महल थानीय िनवासी बताते ह िक देवगढ़ के िकले म शीश महल भी था. वे यह भी बतलाते ह िक इस िकले म कह -कह सगमरमर और लाल पथर क कलाकारी भी थी. ऐसा भी कहा जाता है िक क िकसी समय देवगढ़ के चदनवन क िसि परे भारतवष म थी. देवगढ़ के चदन वन के सवािधक उपलधता के िलए यह जाना जाता था. आज भी यहाँ चदन के व पाए जाते ह. चकाित सतित उपयास खला म चदनवन का उलेख िमलता है.’ मोती टाके का रहय अ त रहयो एव देवगढ़ िकले क वा त यवथा एक दसरे का पयाय लगते ह. देवगढ़ से जडए अनसलझे रहय म मोती टाके का भी एक रहय है. लगभग ढ़ाई सौ फ़ट क ऊँचाई पर िथत मोती टाका म अथाह जल का होना भी एक बड़ा आय ही है, पारस पथर का िमथक. देवगढ़ सा ा य के िवषय म चिलत जन ित म पारस पथर का भी िमथक है. भारतीय इितहास म पारस का पथर का िमथक देवगढ़ के तापी शासक जाटवाअ शाह एव होशगशाह राजा के साथ जड़ा है. वै ािनक खोज से भी इस बात का माण िमलता है िक लोहे से सोना बनाया जा सकता है. इस िविध को वै ािनक भाषा म किमयागारी कहते ह. पारस पथर को िव ािनक ने भी एक िमथक न मानते हए उसके होनेका िव ािनक आधार भी बताया है. लोग बताते हिक जाटवराजा अपनी जा से लगान के प म खेत म उपयोग क गई लोहे क पास िलया करते थे. सभवतः वे इन लोहे क बेकार पास का उपयोग सोने के िनमाण के िलए करते थे. देवगढ़ का वैभवशाली इितहास. मय भारत म गडवाना सा ा य के वैभव और समि से जड़े इितहास आज भी अपनी गौरवशाली िवरासत को बयान कर रहे ह. इही खबसरत िवरसत म से एक है देवगढ़ का िकला। देवगढ़ का गड रा य सोलहव शता दी के अत म अि तव म आया (िम , 2008b) और अठारहव शता दी के मय तक फला फला. देवगढ़, नागपर और िछदवाड़ा के ाचीन गड सा ा य का म यालय था और एक समय म यह गढ़ और चादागढ़ दोन से यादा िस हो चका था (रसेल, 1908). क़रीब पौने दो सौ साल के अपने गौरवशाली इितहास म पहले गढ़ा मडला के अधीन रहा और िफर महारानी दगावती क मय के बाद 1564 ईसवी म मग़ल बादशाह अकबार के अधीन हो गया. मग़ल के पतन के बाद कछ दशक तक देवगढ़ रा य क िथित अछी रही, लेिकन दि ण से मराठ के उदय ने इस रा य का सरज मयम कर िदया. देवगढ़ म गड स ा के सथापक जाटवा थे जो रणसर और घनसर को मारकर गडी स ा क वजा देवगढ़ िक़ले पर लहरायी थी. राजा जाटवा इतने भावशाली और िस हो गए थे िक उनसे िमलने वय अकबर महान िद ली से चलकर सन 1590 ईसवी म देवगढ़ आया था और बहत सारे उपहार और समान से उह नवाज़ा था( े डोक, 1899) लगभग 60 साल के गौरव शाली शासन के बाद राजा जाटवा का 1602 ईसवी म िनधन हो गया. राजा जाटवा ने देवगढ़ िकले के अलावा पाटनसावगी और नागरधन के िकले भी बनवाए थे(रसेल, 1908). राजा जाटवा के नाम का ताँबे का िसका जो नागपर सहालय म रखा गया है िजस पर साफ़ साफ़ अ र म “ ी राजा जाटवा ितराज” िलखा है, देवगढ़ क सपनता का गवाह है.आज भी जाटवा ारा बसाया गया िवजयपरा गाँव िक़ले क तलहटी म उ र पव म देखा जा सकता है. ब तबलद शाह ारा बसाया गया जयतपरा गाँव आज पठानपरा के नाम से िक़ले से दि णी ओर िथत है. आईने अकबरी म अबल फज़ल ने जाटबा को डेढ़ दो हज़ार घड़सवार, पचास हज़ार पैदल और सौ हािथय का वामी बताया गया है.(िम , 2008a). देवगढ़ िकले के तलहटी म धरवा राजाओ क समािधयाँ ह. यह पर िस धरवा राजा जातबा क समािध भी है (गडवाना दशन, 2013)। आज भी धव गो (7 देव ) वाले गड गढ़ गगो के िलए देवगढ़ जाते ह और अपने देव भीडी क पजा अचना करते ह. आज भी देवगढ़ म भय िकले के खधर, महल के िनशान और राजा जाटबा क समािध दशनीय थल म िगने जाते ह. िस इितहासकार वेलनकर के अकािशत शोधबध के अनसार राजा जाटवा के तीन प थे दलशाह, दगशाह और कोकशाह िजसम से ये प दलशाह राजा जाटवा क मय के बाद देवगढ़ क ग ी पर बैठे और िजनका शासन 1634 ईसवी तक चला. दलशाह क मय के बाद उनका सबसे छोटा भाई कोकशाह 1634 ईसवी म देवगढ़ का अगला राजा बना(िम , 2008b). कोकशाह उफ़ कोिकया देवगढ़ िक़ले के साथ साथ नागपर िक़ले का भी राजकाज सभालते थे. नागपर क देख रेख के िलए उहने सबेदार देवाजी को िनय िकया था. कोकशाह क मय 1640 ईसवी म हई और उसके बाद उनके बेटे केशरीशाह स ासीन हआ. सन 1648 ईसवी म मग़ल बादशाह शाहनवाज़ खान ारा आमण िकया गया िफर औरगज़ेब के समय 1658 ईसवी म मग़ल सेनापित िमज़ा खान ने आमण िकया. इस तरह 1660 ईसवी तक केशरीशाह मग़ल से समझौता करके िकसी तरह शासन पर बने रहे और मग़ल को भारी लगान चकाते रहे (रसेल, 1908). सन 1660 ईसवी म केशरीशाह क मय के बाद गोरखशाह उ रािधकारी बने और देवगढ़ क बागडोर सभाली .गोरखशाह के समय पर लगान न चका पाने के कारण काफ़ देनदारी बढ़ गयी थी इसिलए अगत 1669 ईसवी म िदलेर खान ने देवगढ़ पर हमला बोल िदया और परे िक़ले को तोप से बबाद कर िदया और गोरखशाह को बदी बना कर उनके पाँच बेट म से सबसे छोटे दोन बेट को मिलम बना िलयाअ.िदलेर खान ने दोन बेट के नाम इलामयार खान और दीदारखान रखा।इस तरह इलामखान के नाम पर देवगढ़ को इलामगढ़ कहा जाने लगा. इलामयार ने कल 10 वष तक देवगढ़ का शासन िकया और उनक मय के बाद उनके छोटे भाई दीदार खान ने 1680 ईसवी म देवगढ़ क ग ी सभाली लेिकन सफल नह रहने के कारण औरगज़ेब ने उह ग ी से बेदख़ल करके उनके तीसरे बड़े भाई महीपत शाह को इस शत पर शासन लौटाया क वे इलाम क़बल कर. 1686 ईसवी म महीपतशाह इलाम धम वीकार करके ब तबलद शाह बन गए. लेिकन ब तबलद शाह मिलम धम वीकार करने बाद भी गड के ित अपना ेम और मोह नह याग पाए और मग़ल के िख़लाफ़ बग़ावती ख़ अि तयार िकए रहे िजसका ख़ािमयाज़ा उह देवगढ़ का शासन छोड़कर चकाना पड़ा. चाँदागढ़ के राजकमार को मिलम बनाकर (कानिसह से नेकनाम खान) औरगज़ेब ने देवगढ़ का शासन सप िदया लेिकन वह बहत जदी ही वह असफल हो गया और औरगज़ेब मय के बाद ब तबलद शाह को अपना सा ा य िवतार का पनः मौला िमल गया. बाद म ब तबलद शाह ने देवगढ़ के दि ण म नागपर शहर बसाया(रसेल, 1908). ब तबलदशाह के बाद उनका बेटा चाँद सतान 1709-1719 ईसवी के मय देवगढ़ क ग ी पर बैठा और देवगढ़ म ख़ब ख़शहाली और सपनता लाया. चाँद सतान के 1737 ईसवी म मरने के पहले तक ये िक़ला देवगढ़ रा य क राजधानी बना रहा और बाद म वली शाह के स ा हिथयाने के बाद राजधानी नागपर थातरत हो गयी.मग़ल के बाद भसले और पेशवा ने भी कछ समय तक इस िक़ले राज िकए और अत अ ेज़ के हाथ म ये टटा फटा िक़ला आया(िम , 2008b). पेशवा और भसले राजघरान ने गडवाना को कह का नह छोड़ा. हजार क सया म गडो का कले आम हआ और गडवाना के िकले और महल को बा द से उड़ाया गया िजससे दबारा गड शासक िफर से िसर न उठा सक. इसी दौरान सन 1742 म पाटन सावगी के िकले म भसले मराठाओ ारा 12000 गडो का नरसहार िकया गया और इितहास को कलिकत िकया गया(रसेल, 1908). इतने झझावत के बाद भी देवगढ़ का िकला आज भी गडवाना के वैभव और वीरता क कहािनया सना रहा है. बेहद ख़बसरत जगल के बीच,चार ओर पहाड़ से िघरा ये िक़ला गडवाना के वैभवशाली और सपन िक़ल म िगना जाता है. िक़ले के ऊपर जाने के िलए एक ही रा ता है .िक़ले के म य ार से ऊपर सीिढ़य से चढ़ने पर दसरा ार िमलता है िजसके अदर जाने के बाद दािहने हाथ पर हाथीखाना, बाय हाथ पर बावड़ी (मोतीटाँका) और सामने नकारखाना, कचेहरी, हमाम, ख़ज़ाना, बादल महल, बज, मिजद, और बहत सारी इमारत के खडहर अपनी भयता क गवाही दे रहे ह. मोती टाका बावड़ी खजाना. राजा क बैठक (अब खडहर म.) हमाम. देवी का थान बज के ऊपर मिदर थािपत है,िजसे थानीय लोग च डी देवी का मिदर कहते ह. िकले क सर ा के िलए, िकले क िदवार को को जोड़ते हए 11 बज और बनाए गए थे. इन बिजय से न केवल दर-दर तक चार ओर से चौकसी क जाती थी., अिपत तोप ारा शओ का सामना भी िकया जाता था. िकले के चार ओर कछ दरय पर चौिकया और उनसे कछ दरी पर गढ़ी बनाई गई थ. इस कार से बने सर ाअ घेर से श क गितिविधय क सचना तरत राजाअ तक पहचा दी जाती थी. प फ़ोटो- दोन बेट, बेटी-दामाद का परवार और उनक िम मडली देवगढ़ िकले म- ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 21. ब के देश भटान म कित क मनोरम छटा मानव को सदा अपने आगोश म लेने को तैयार रहती है. सच पछॊ तो वह एक कार से मनहार सी करती लगती है. शायद ही कोई ऎसा अभागा मानव होगा जो कित के इस मनहार का लत न उठाना चाहे. हरयाली क चादर ओढ़े, आसमान को छती सी तीत होत पवतमालाए, बरफ़ क पगड़ी बाधे चमचमाते पवत िशखर, पाताल सी गहराइया िलए घािटया, कलकल-छलछल के वर िननािदत करती बहती अहड़ निदया, लहर लहर लहराती धान क फ़सल िजनके आचार म दध पकने को तैयार है, तेढ़े-मेढ़े सपले रा ते, सेब-फ़ल से लदेफ़दे बागीचे, सदर नकाशी म सजे बौ मठ, थापय शैली म बनी इमारत, िवनीत भाव से वागत करने को उत वेश ार, शानदार पल, हठ पर मकान ओढ़े, पारपरक पोषाक म सजी नवयवितय को देखकर म होने लगता है िक हम इ क नगरी अमरावती म चले आये ह. ये िदलकश नजारे भटान क खािसयत है. यहा के लोग अपनी िवरासत, परपराओ और रीित- रवाज पर न केवल गव करते ह बि क अपनी शान भी समझते है और याि य का िदल खोलकर वागत करते ह. भटान क या ा करने से पहले हम वहा क भौगोिलक िथित क जानकारी जर ा कर लेनी चािहए. भटान शद क यिद हम सिधिव ह कर तो यह अथ ितविनत होता है. भ यािन जमीन, उथान माने ऊचा.= माने एक ऎसा देश जो ऊँचा हो. आप यहा आकर देखगे िक सारी पवत ेिणया आकाश को छती से तीत होती है. िहमालय क तराई म बसे भटान का कल े फ़ 398,390 वगिकलोमीटर है. भटान क म ा नगलम है िजसक िविनमय दर एक भारतीय पए के बराबर है. यहा क रा भाषा जगखा है, पषॊं क रा ीय पोषाक “घो” और मिहलाओ क “करा” कहलाती है. यह जयानी बौ धम वाला देश है. भटान का अतरा ीय हवाई अडडा पारो म है. रन-वे काफ़ छोटा होने के कारण इसे खतरनाक माना गया है. चार तरफ़ से िघरे पहाड़ के कारण हवाई जहाज को उतारने और उड़ाने म पायलट को अितर सतकता बरतनी पड़ती है, अयथा लेन पहाड़ी से जाकर टकरा सकता है. तीरदाजी और फ़टबाल यहाँ के लोकि य खेल है. भटान के वैसे तो २२ िजले ह लेिकन िथप, पनाखा और पारो म देखने लायक बहत कछ है. स ाह-दस िदन म इन थानॊ का मण िकया जा सकता है. कछ बात ऎसी भी है भटान के बारे म िजह जानना और समझना आवयक है. पहला तो यह िक सन 1947 तक भटान भारत का िहसा था, बाद म सन 1948 म एक वत देश बना. वतता के बाद से इसम तेजी से बदलाव आने लगा, पयावरण के े म यह अय देश से थम पायदान पर खड़ा है. तीसरा यह िक सन १९९९ से इस देश म पािलिथन के योग पर कड़ाई से ितबध लगाया. चौथा –यहाँ पहचना अब भी एकदम आसान नह है. पाँचवा-भटान का म य िनयात िबजली उपाद करना है, िजसे वह भारत को पन-िबजली बेचता है. इसके अलावा लकड़ी, िसमट और हतिशप का भी िनयात करता है. छटा-भटान के पास अपनी सेना जर है लेिकन नौसेना और वायसेना नह है. इसका म य कारण है िक यह चार तरफ़ ऊची-ऊची पहाड़ से िघरा हआ है. सात- यहाँ के नागरक को पेड़ लगाना पसद है. िकसी ि य के जम के समय और िकसी के िदवगत होने पर एक पेड़ लगाने क यहाँ था है. यही कारण है िक यहाँ सघन वन देखे जा सकते ह. सन 2006 म स ा हण करने वाला राजा िज मे खेसार नामयेल वागचक ने इस देश म बड़े बदलाव िकये, िजसे य देखा और समझा जा सकता है. सात सद यी भटान या ा के सहया ी सव ी राजे र आनदेव(पव ाचाय पीजी.कालेज), गोवधन यादव (किव लेखक-कहानीकार) अय म. .रा भाषा चार सिमित, िजला इकाई िछदवाड़ा एव पव पो टमा टर (एच.एस.जी 1), ी नमदा साद कोरी (हेड कै िशयर एव सिचव म. .रा.भा. .सिमित), ी जी.एस. दबे (से.िन इिजिनयर), ी महेश चौरिसया ( होटल यवसायी पचमढ़ी), ी अण अिनवाल, (से.िन.सहायक किम र इनकम टै स, नागपर), ी िवजय आनदेव (सहायक किम र, इनकम टै स नागपर) जो अवथता के कारण इस प म नह जा पाए. यारह नवबर को बस ारा नागपर के हम रवाना हए. शाम 7.05 बजे मबई-हावड़ा गीताजिल एक ेस से हावड़ा करीब ढाई बजे पहचे. चिक हमारी अगली या ा िसयालदा से राि दस बजे थी. सो हमने एक टै सी िकराये पर ली और बे लरमठ और दि णे र महाकाली जी के दशनओ का पय लाभ कमाया. रात 10.30 िदनाक १२/११/२०१७ को दाजिलग े न से िसयालदाह से यजलपाईगड़ी सबह 08.30 पर पहचे.. बस टै ड पर सतोष लामा िवनीत भाव के साथ अपनी जाइलो (WB-7544 ) गाड़ी िलए तैयार िमला. नेपाली-कट, छोटी-छोटी मकराती आखे, चौड़ा माथा, कसरती बदन, गोरा रग और अछी खासी कद-काठी के धनी इस यवक के हठ पर खेलती हसी देखकर हमारा सन होना वभािवक था. परी या ा के दौरान वह हमारे साथ बना रहा. मन म कई सवाल तैरते और वह सबका समाधान करते चलता सतोष, जयगाव का रहने वाला है, िजसक सीमा भटान से लगी हए है. सामान लादा जा चका था और अब हम ( PHUENTSHOLING ) फ़सोि लग के िलए रवाना हए. रात भर का े न का सफ़र िफ़र करीब चार घ टे क लबी सड़क या ा के दौरान हम ितल मा भी थकावट महसस नह हई. इसका म य कारण यह भी रहा िक हम िनत-नतन होते कित के बदलाव का आनद लेते हए ित ता नदी के िकनारे-िकनारे िनरतर आगे बढ़ रहे थे. रा ते म पड़ने वाले एक होटेल जे.के .फ़े िमली रे टारट म सवाद भोजन का आनद उठाया रा ते म एक बार तो हम गाड़ी भी कवानी पड़ी. भटान-िहमालयान रज के अ त दशन करने को िमला. परा पवत िशखर बफ़ क पगड़ी बाधे सहाना जो लग रहा था. सभी ने गाड़ी से उतरकर इस िवहगम और नयनािभराम य को जी भर के िनहारा और फ़ोटो ा स भी उतारे. ( PHUENTSHOLING ) फ़सोि लग से महज पचीस-तीस मील क दरी पर थे, तभी टर-आपरेटर स ी कला गग जी ने सतोष को आदेश िदया िक वह सभी पयटक के वोटरकाड क छायापरित वाटसाप पर िभजवा दे, वे चाहती थ िक जब हम यहाँ वेश कर,उससे पव सभी आवयक द तावेज इिम े शन आिफ़स पहच जाये तािक परिमट बनाने म लगने वाले समय को बचाया जा सके . जब हम शाम छः बजे हम टर आपरेटर स ी कला ऊफ़ दीि का गग के आिफ़स म थे. उहने मकराते हए हम सबका भावभीना वागत िकया. औपचारक चचाए िजसम भटान टरम का िवकास, लोग का खान-पान, फ़सल, वेशभषा, कटीर उ ोग, आगिनक खेती पर साथक वातालाप हआ और साथ ही गरमा-गरम चाय का लत भी हम उठाते रहे. भारत, बागलादेश और मालदीव के पयटक को भटान म वेश करने के िलए वीजा क आवयकता नह है लेिकन पासपोट या मतदाता पहचान प जैसे पहचान का सबत िदखाना पड़ता है. भटान म वेश करने के िलए फ़सोि लग म परिमट के िलए टर ट परिमट लेना आवयक है. पयटक के पास-पोट या मतदाता परचय प के साथ २ पासपोट साइज के फ़ोटो होना अिनवाय है. टर ट परिमट िनशक जारी िकए जाते ह. मतदाता परचय के साथ फ़ोटो ा स हम पहले ही भेज चके थे. स ी गग ने अपनी सहाियका क. तलासा को पहले से ही इस काम के िलए िनय कर रखा था, कछ ही समय म हमारा परिमट बनकर तैयार हो गया. परिमट ा करने के प ात हम राि िव ाम के िलए थानीय ी टार होटेल “िद आचड होटल” जो पहले से ही आरि त क जा चक थी, पहचकर हमने राि िव ाम िकया. 13 नवबर 2017- “िद आिचड होटेल” म राि िव ाम. सबह ना ते के बाद हमारी मलाकात इस होटेल के मैनेजर ी डेट से मलाकात क. िहदी बोलने-समझने वाले ी डॆट से भटान क कई जानका रया ा क. इसी समय हमारी मलाकत कायालय म कायरत स ी नामगे हामो .आप बहत अछी िहदी बोल लेती है. हमने जानकारी पा करनी चाही िक बोलने के अलावा वे िहदी िलखना-पढ़ना भी जानती ह िक नह? उहने मकराते हए उ र िदया िक वे िहदी म िलख और बोल सकती है. ी कोरी और मने उनके साथ फ़ोटॊ शेयर क और िहदी भवन भोपाल से कािशत “अ रा” क और कोरी का कहानी सह” म कहता आखन देखी” भट म दी. चिक सतोष के आगमन म देरी थी, अतः हमने कल जा रहे छाओ से िहदी म बात क . वे साफ़-साफ़ िहदी म बात कर रहे थे. जब हमने िहदी म िलखने क और पढ़ने क बात क तो उहने बड़ी सहजता से बतलाया िक उनके अिबभावक िहदी जानते ह, बोलते ह तो उह भी आती है. चिक कल म िहदी नह िसखाई जाती, अतः वे िलखना और पढ़ना नह जानते. हमने उह िहदी िलखना सीखने और-पढ़ने के िलए आह िकया. सभी बचे-बि चया अपनी भटानी वेशभषा म नजर आ रहे थे. भटान क रा भाषा झगखा है. इसके अलावा वहाँ अ ेजी, िहदी और नेपाली भी बोली जाती है. अछी तरह िहदी जानने के बावजद भी यहा के लोग िहदी िलखना पढ़ना नह जानते. हमने बच को िहदी सीखने-िलखने के िलए े रत िकया. बचे हमसे िमलकर बहत सनता का अनभव कर रहे थे. उहने अपनी भाषा म अपना नाम वय अपने हाथ से िलखकर हम िदया और हमारे साथ फ़ोटो प भी िलया. बच के नाम ी नामगे दोरजी, सागर,तनदीन ना याल, केवे वाग नामयाल िभनते, िकनले दोरजी आिद थे. शाम छः बजे के करीब (14-11-2017) हम भटान क राजधानी िथप पहच गए. हम होटल समभाव चबाच के ठहराया गया. हम सम सतह से लगभग 13,000 फ़ट क ऊचाई पर थे. जािहर है िक यहा का तापमान चार-पाच िड ी के लगभग था. रात होते ही पारा लढ़कर (-) माइनस िड ी पर पहच चका था. कमरे म लगा हीटर भी नाकारा िस हो रहा था. गाम कपड़े और मोटी रजाई ओढ़ने के बाद भी ठड लग रही थी. सबह जब हमने मैनेजर से पछा िक ऎसे मौसम म कौन भला यहा आना चाहेगा. उसने बतलाया िक य-कपस इस सीजन म यादा आते ह,. १४-११-२०१७ िथफ़ चोरटेन िथफ़ चोरटेन शहर के दि ण-मय भाग म थािपत मेमोरयल तप िजसे िथफ़ चोटन के प म भी जाना जाता है, डक यालपो, िजमे दोरोजी वागचक को स मािनत करने के िलए इसक थापना १९७४ म त कालीन राजमाता के ारा िनिमत िकया गया था. चगनखा टे पल, िझलखा ननेरी तथा ताशीछॊडग महल और मि य के आवास को िनहारते कब शाम ढल आयी, पता ही नह चल पाया. शाम के िघरते ही हम अपनी होटेल “सभाववा” लौट आए. पनाखा- 3900 फ़ट क ऊचाई पर िथत है पनाखा. यहा दो निदया बहती है िजनके नाम है मशः पोच और माच. इह निदय क ऊची-नीची घािटय म चावल क खेती क जाती है. लाल और सफ़ेद िकम का चावल यहा बहतायत म होता है. िभओ के आवास के साथ ही यह धािमक के भी है. भटान के सथापक शबदग नगवाग नामयाल के समय यह भटान क राजधानी रही है. आपका पािथव शरीर यहाँ एक क म रखा हआ है. यहा ऎितहािसक इमारते देखी जा सकती ह. बागान मे जैिवक सिजय के साथ ही सतरा, पिपता और सेव जैसे फ़ल वाले पौधे होते ह. (khamsum yulley namgyal chorten) खामसम यलली नामयाल चने खामसम यलली नाम याल Chorten Punakha घाटी के ऊपर एक सदर रज पर बाहर खड़ा है . इस 4 मिजला मिदर के िनमाण के िलए इजीिनयरी मैनअल से सलाह लेने के बजाय 9 साल का िनमाण और पिव थ को लेकर िवचार िकया गया। यह भटानी वा तकला और कलामक परपराओ का एक बिढ़या उदाहरण है। यह मिदर रा य के उथान, उसके लोग और सभी सवेदनशील ािणय के िलए समिपत िकया गया है। भटान देश क बाधाओ को दर करने के उ े य से इस तप का िनमाण वीन मदर असी तशे रग यगडोन ने सन २००४ म बनवाया था. इसका बाहरी भाग तप क तरह एक िशवालय के प म होता है. बटसम लामा कनज़ाग वागडी , िजसे एचएम डडोजोम के एक करीबी िशय लमा िनगकला के रनपोछे प म जाना जाता था, इस चने के िनमाण के भारी थे। यहाँ से खड़े होकर आप भटान-िहमालयान रज के दशन कर सकते ह. नीले पहाड़ क खला िजनका िशखर बफ़ से ढका देखकर पयटक ममध हो उठता है. िसतमोका झग (' डजग ' का अथ भी ("मठ-महल" सगक जधन फो ाग ( भटानी भाषा अथ एक छोटा ("ग म का गहरा अथ का पैलेस" : झाग है । यह 1629 म ज़बदरग वाग नामयाल ारा बनाया गया था, जो भटान एककत था। यह भटान म िनिमत अपनी तरह का पहला है एक महवपण ऐितहािसक मारक और पव बौ मठ, आज यह एक मख झगखा भाषा िश ण सथान म से एक है। यह हाल ही म पनिनमाण िकया गया िसतत खा झग िसतमखा झग का अथ होता है “महल मठ”. और एक अथ म ग म का पैलेस है. ब के छिव िजसे शा यमिन के नाम से जाना जाता है. इसम आठ बोिधसव है. यहा थािपत ह. यह भटान का सबसे पराना मठ है. इसका िनमाण 1627 म हआ था. इसे अब एक कल म प रवितत कर िदया गया जहा छा को धम आधा रत ान िदया जाता है. रा ीय स हालय- टा झग(Ta Dzong) पि मी भटान म पार शहर म एक साकित सहालय है. १९६८ म पनिनिमत भवन महामिहम िजमे दोरजी वागचक के समय के भटानी परपरा कला के बेहतरीन नमने, का य मितया, सदरतम मखौटे,सदर पिटग, डाक-िटकट आिद स िहत क गई ह. ऊचाई पर होने के कारण इसका उपयोग बाच-टावर ( 1627) के प म होता था. अब इसे बदलकर सहालय बना िदया गया है. आज रा ीय सहालय ने भटानी कला के 3,000 से अिधक काम के अपने कजे म है, जो िक भटान क साकितक िवरासत के 1500 से अिधक वष तक शािमल है। िविभन रचनामक परपराओ और िवषय क इसक म धारण वतमन के साथ अतीत क एक उलेखनीय िम ण का ितिनिधव करती है और थानीय और िवदेशी पयटक के िलए बड़ा आकषण का के है. सबह का लच. नौ बजे के करीब ”िथफ़” (THIMPHU) के िलए रवाना हए. िथफ़ १९६१ म भटान क राजधानी बनाई गई थी जो िव क तीसरी सवािधक ऊँचाई पर बसी राजधानी िथप ( २,२४८ मीटर-२,६४८ मीटर) है. पयटक सड़क माग से अथवा हवाई माग से यहाँ पहच सकता है. वागछ नदी के िकनारे बसे इस शहर के के म चार समानातर सड़क ह. पारप रक िवकास और आधिनकता के बीच सतलन बनाये हए िथप क इह सड़क पर म य बाजार, रे तरा, शासकय कायालय, टेिडयम, बागीचे तथा कई दशनीय थल ह. रहायशी इलाका घाटी म दर-दर तक फ़ैला है. आधिनकता क दौड़ म शािमल इस शहर म बहमिजला इमारत, एव अपाटमे टस काफ़ तादात म बन रहे ह. पष एव मिहलाय अपनी पार प रक पोषाक म नजर आते ह. अपनी रा भाषा जगखा के अलावा इह िहदी म महारत हािसल है. जहाँ वे एक तरफ़ िहदी बोलते-बितयाते तो ह लेिकन िलखना और पढ़ना इह नह आता. शहर से ५४ िकमी दर पारो हवाई अडडा है, जो चार ओर पहाड़ से िघरा हआ है. ऊपर से देखने पर यह एक कटोरे क भाित तीत होता है. रन-वे भी काफ़ छोटा है अतः पायलट हो हवाई जहाज उतारते समय अित र सावधािनया बरतनी पड़ती है. जरा सी भी लापरवाही से जहाज सामने खड़े पहाड़ से टकरा भी सकता है. शाम 6.30 बजे के करीब हम भटान क राजधानी िथप पहचे. यहाँ हमारे िलए “होटेल समभाव” म कने-ठहरने क यवथा क गई थी. अब हम सम सतह से 13,000 फ़ट क ऊचाई पार थे. मौसम खक था और पारा 2 िड ी शेलिशयस बतला रहा था. चार-पाच गरम कपड़ को पिहनने के बाद भी ठड अपना भाव बतला रही थी. रात के लगभग यहाँ का तापमान (-) माइनस िड ी पर था. होटेल मैनेजर ने बतलाया िक इस भीषण ठड म केवल यग कप स यादा आते ह, वैसे यह समय आफ़-सीजन का चल रहा है. माह अ ैल के आते ही यहाँ सैलािनय क भीड उमड़ने लगती है. बड़ी स या म भारत से लोग यहाँ पहचते ह. िथप शहर लगभग 13,000 फ़ट क उचाई पर बसा हआ है, रा ते म हम के दीय िवयालय देखने को िमला. इस कल म लड़के , लड़िकया पढ़ती ह. इतनी अगय उचाई पर आकर पढ़ाई के ित समपण का भाव इन बच म देखकर आयचिकत हो जाना वभािवक ही था. हमन गाड़ी रोककर बच से बाते क. उनके िसलेबस पर चचाए क. सभी बचे िहदी तो अछी खासी बोल लेते ह लेिकन लेखना-पढ़ना नह जानते. स ी पजा, पिणमा,ईशे, सरता, िनलमय, मीरा आिद बि चयो के साथ फ़ोटो प भी िलये. फ़सोिलग से िथप के रा ते म पाइन के सघन वन देखकर मन सनता से झम उठा. ये पाइन के व 8,000 फ़ट क ऊचाइय पर ही पाए जाते ह. साथ ही डटाफ़ वाटरफ़ाल देखने को िमला. यहाँ पर बदर क अछी खासी भीड़ भी देखने को िमली. शाम छः बजे के करीब (14-11-2017) हम भटान क राजधानी िथप पहच गए. हम होटल समभाव चबाच के ठहराया गया. हम सम सतह से लगभग 13,000 फ़ट क ऊचाई पर थे. जािहर है िक यहा का तापमान चार-पाच िड ी के लगभग था. रात होते ही पारा लढ़कर (-) माइनस िड ी पर पहच चका था. कमरे म लगा हीटर भी नाकारा िस हो रहा था. गाम कपड़े और मोटी रजाई ओढ़ने के बाद भी ठड लग रही थी. सबह जब हमने मैनेजर से पछा िक ऎसे मौसम म कौन भला यहा आना चाहेगा. उसने बतलाया िक य-कपस इस सीजन म यादा आते ह,. . 15-11-2017- सबह गरमा-गरम ना ता करने के बाद हम टे सटाईल यिजयम, 1972 म रायल वीन मदर के ारा ततीय िकग क याद म बनाया गया मेमोरयल देखा. िथप शहर के पास ही हमने ब ा टे ल देखा. टे सटाईल यिजयम बनाई क कला को जीिवत रखने और सरि त करने के िलए इस यिजयम क थापना क गई थी. यह हर महा ी आथी सगे गगचक के रर ण के तहत, यह गैर सरकारी, गैर लाभकारी सथ है, जो भटानी बनाई म यि य को िश ण के िलए एक शै िणक के के प म थापैत है. सहालय म भटान के आकषक एितहािसक दशन, िविभन े से मिहलाओ क िकररा और मैस घोस दान करता है. खबसरत भटानी िकया गया है ब ा पाईट का भी यहा दिशत ब ा पाईट- िथप शहर के िनकट दि णी भाग म एक ऊची पहाड़ी पर ब क 51.5 मीटर अथात 169 फ़ट ऊची िवशालकाय धात ितमा एक ऊच अिध ान पर थािपत है. यहाँ के िशपम शहर क खबसरती देखते ही बनती है. भटान के चौथे राजा िजमे िसये वागचक क साठव वषगाठ पर ब ( शाकमनी) क भय ितमा 169 फ़ट यानी 52मीटर, 1000,000 इच ऊँचाई और 25,000.12 इच लबी मित क थापना क गई. इसका िनमाण 2006 म श हआ और 2010 म बनकर तैयार हआ. सोने के पािलश म ब क िवशाल ितमा, िवशाल ागण म चार तरह सोने के पािलश से सदर नारी ितमाए और अपनी पारपरक प रक पना म बना भय पजा-गह देखकर आनद ि गिणत हो उठता है. इस ितमा के िनमाण क कल लागत S- 47 िमिलयन क लगत से चीन के नानािजग के .एयरोसन कारपोरेशन के ारा िकया गया था,जबिक परयोजना कल लगत 100 िमिलयन अमे रक डालर क आक गई थी. ायोजक के नाम यान हाल म दिशत िकए गए है जो इस ब क ितमा आिद के िनमाण म सहयोगी थे. िवशाल कएसेल फ़ादराग नामक कित पाक जो करीब 943.4 एकड़ वन े म फ़ैला हआ है. चाग माने ी इस बौ मठ क थापना 12 व शता दी म एक ऊची पहाड़ी पर लामा फ़ाजो जौम िशगपो रा क गई थी. मिदर परसर से िशप शहर का िवहगम य िदखाई देता है. मिदर के चार ओर 108 म से ससि जत हाथ से घमाने वाले चकरी देखने को िमली. ऎसी मायता है िक इसे घमाने से सारे पाप का अत हो जाता है. इसी मिदर के प रसर म हमारी मलाकात एक भटानी मिहला स ी ितला पा छे ी जी से हई. आपने िहदी म भतान क बहत सारी बात को बतलाया और हमारी डायरी म शभकामना सदेश िलखकर िदया. मोतीथग- रायल तािकन सरि त वन मोतीथग- रायल तािकन सरि त वन े- 15 व शता दी म तािकन को भटान का रा ीय पश घोिषत िकया था. तािकन के अलावा यहा पर िहरण, बारहिसघे देखे जा सकते है. परा वन े िमिन ी आफ़ ए ीकचर-फ़ारे ट के अतरगत आता है. फ़ोक हे रटेज यिजयम. फ़ोक हे रटेज यिजयम 28 जलाई २००१ म इस सहालय क थापना क गई थी. इसम भटान क ामीण सकित और जीवन जीने के तरीके सबधी अनेकानेक सामि य को दिशत िकया है. दशनी म घर क कलाकितया, उपकरण तथा अनेकानेक वतए स िहत क गई ह. यहाँ कायरत मिहलाकिमयो-स ी अजल, सनम और सगी से कई िवषय पर जानकारया ा हई. 19व शता दी के एक तीन मिजला घर को उस मल वप म ही सरि त िकया गया है. यह घर िम ी एव लकड़ी से बना है. नेशनल टेिडयम िथप शाम िघरने को थी और हम नेशनल टेिडयम के सामने खड़े थे. तीरदाजी और फ़टबाल खेल के िलए इसम यवा िखलािड़य क अछी खासी भीड होती है. इनका उ साह देखते ही बनता है. इसी बीच हमारी मलाकात से यरटी अफ़सर ी मिणकमार जी से भट हई. िमलकर सनता हई और वे हम गेट बद होने के बवजद खेल मैदान म ले गए जहाँ तीरदाजी म वीण िखलािड़य के मय 150 मीटर क दरी पर लगे पाईट पर िनशाना साधने का उप म कर रहे थे. देर तक इस रोचक खेल को देखने के बाद हम अपनी होटेल “सभाव” के िलए रवाना हए. 16-11-2017 दोचला पास दोचला -राि िव ाम के बाद सबह का ना ता-चाय लेने के बाद हम 10.25 बजे पनाखा शहर के िलए रवाना हए जो यहाँ से 82 िकमी क दरी पर अविथत है. पनाखा के रा ते म दोचला पास पर बने, सम सतह से 3020 मीटर पर बने बौ मिदर और 108 कलामक तप जो उफ़ा उ वािदय से लड़ाई करते हए वीर गित को ा हए भटानी सैिनक क याद म बनाए गए थे. एक तरफ़ यह िवशालकाय िनमाण तो दसरी ओर भटान-िहमालयान रज क बफ़ली चोिटय को देखकर सारी थकावट दर हो जाती है. लोवेसी वेली रा ते म लोवेसी-पनाखा म लेटस खेती (टेरेस फ़ािमग) के भ य नजारे देखने को िमले . िकस तरह यहाँ के िकसान पहाड़ को काटकर लेटस बनाकर खेती करते ह. सभी खेत म चावल बोया गया था. इसी तरह क खेती पनाखा और पारो म भी होती है. इन िवह म य को िनहारते हए अब हम पहाड़ के उस िनचले िहसे (तल) म उतर रहे थे,जहाँ मोच नदी अपनी तेज गित िलए हए पहाड़ से उतरकर बहती है. मोच म 14 िकमी क राि टग. भटान-िहमालयान रज से िनकलने वाली दो निदय माच और पोच अलग-अलग िदशाओ म बहती हए िडि क आिफ़स से कछ दरी पर जाकर आपस म िमल जाती है. मोच नदी म हमने करीब चौदह िकमी.लबे राि टग का आनद उठया. िनि त प से यह खेल हम लोग के िलए जीवन म पहला रोमचकारी -जोिखम भरा उप म था. नदी के बिफ़ले और तेज गित से बहती नदी क जलधारा म कभी भगते तो कभी गहरी गहराई म उछलकर आगे बढ़ना और शौिटग करते हए आनिदत होते रहे. शाम िघर आयी थी और हम लौट चले थे अपनी होटेल पनाखा रेिसडसी क ओर. रा ते म कछ समय कते हए हमने भटानी पोषाक पहनकर फ़ोटॊ शट िकये. \ (बाए से दाए- ी अण अिनवाल, िगरजाशकर दबे, नमदा साद कोरी, गोवधन यादव, राजे र अनादेव,एव चौरिसया.) फ़ोटो शिटग के बाद हम लौट पड़ते ह अपनी होटेल पनाखा रेिसडस क ओर. भोजन आिद से िनव होकर यहाँ िव ाम िकया. अचानक सबह मेरी नद खल गई. मने अपने कमरे क बालकनी से सबह का अ त नजारा देखा. आसमान से बादल जमीन पर उतर आए थे और उहने समचे पहाड़ को और सरज के गोले को अपनी बाह म भर िलया था. हलका हलका, लाल-गलाबी चमाचमाते सरज के गोले को देखकर मन खश हो गया. kharbandi goempa (खारबाडी गफ़ा) डैम खारबाडी मठ- 1 967 म अही चडॆरान ारा थािपत और चार सौ मीटर क ऊँचाई पर िथत इस सदर मठ म ब के जीवन, शाबदग वाग नागयाल और ग रनपोछे क मितया थािपत ह, डैम तथा िथफ़ के िवहगम य को जी भर के िनहारने के बाद हम होटेल लौट आए थे. Rinpung Dzong ( रनपग मठ ) रगपग जग का अथ है गहने के ढेर का गढ़. १५ व शता दी म इसका िनमाण िकया गया था. १६ वी-१७ व शता दी मे दौरान उ र िदशा से होने वाले आ मणॊं के िखलाफ़ एक गढ़ के प म इसका इतेमाल होता था. रनफ़ग जग पारो िजले का म यालय है. १६४४ म इसका िनमाण िकया गया था. हा घाटी. उ र से दि ण क ओर फ़ैली इस घाटी का नाम “हा” है. िजसे ह ह भी कहा जाता है. इस घाटी म चावल के अलावा गह,जौ,आल,चेली और सेब क फ़लस बोई जाती है. येक घर म याक और मवेशी, मिगया, सअर और घोड़े पाए जाते ह. सघन वन सपदायहा क अथयवथा को सढ़ बनाती है. परी घाटी म पाईन के व बहतायत म देखे जा सकते ह. घमावदार सड़क के साथ-साथ सघन वन को िनहारकर पयटक एक िवशेष आनद का अनभव करता है. Kyichu Lhakhang ( कैच हाथाग) पारो के बाहर भटान का सबसे पराना मिदर है. एक िकवदती है िक िहमालय के इस े था, जो बौ म एक िवशाल रा स रहता धम के चार को रोल रहा था. इस िवपदा को दर कने के िलए ितबत के राजा सगटेन गपो ारा ७ व शता दी म १०८ मिदर का िनमाण कराया. इसे भटान का पिव गहना माना जाता है. यह भी कहा जाता है इनका िनमान एक रात म हआ था. यहाँ से खड़े होकर आप बफ़ से ढके भटान-िहमालयान रज को अपनी खली नजर से देख सकते ह. कित का सदर और भय वप देखकर पयटक ममध हो उठता है. पहाड़ी के पास ही एक बोड भी लगाया गया है, िजसम िहमालय क िविभन चोिटय िकतनी-िकतनी ऊचाइय पर है, जो बफ़ क चादर ओढ़े हए है, दशाया गया है. फ़सोिलग से िथप के रा ते म पाइन के सघन वन देखकर मन सनता से झम उठा. ये पाइन के व 8,000 फ़ट क ऊचाइय पर ही पाए जाते ह. साथ ही डटाफ़ वाटरफ़ाल देखने को िमला. यहाँ पर बदर क अछी खासी भीड़ भी देखने को िमली. िथफ़ चोरटेन शहर के दि ण-मय भाग म थािपत मेमोरयल तप िजसे िथफ़ चोटन के प म भी जाना जाता है, डक यालपो, िजमे दोरोजी वागचक को स मािनत करने के िलए इसक थापना १९७४ म त कालीन राजमाता के ारा िनिमत िकया गया था. चगनखा टे पल, िझलखा ननेरी तथा ताशीछॊडग महल और मि य के आवास को िनहारते कब शाम ढल आयी, पता ही नह चल पाया. शाम के िघरते ही हम अपनी होटेल “सभाववा” लौट आए. 15-11-2017 सबह गरमा-गरम ना ता करने के बाद हम टे सटाईल यिजयम देखा. व रा सहालय िथप भटान- एक रा ीय कपड़ा सहालय है जो िक भटान के रा ीय पतकालय के पास िथत है. ीय मामल के रा ीय आयोग ारा सचािलत होता है. 2001 म इसक थापना के बाद सहालय ने रा ीय और अतरा ीय पचान बनायी है. ाचीन कपड़ा कलाकितय को इसम सहज कर रखा गया है. इसका उ े य कपड़ा कला कलाकितय को बढ़ावा देने, अनसधान करने और अययन का के बन चके इस सहालय म बड़ी स या म भटानी पारगत हो रहे है. िथप चोटन (२) 1972 म रायल वीन मदर के ारा ततीय िकग क याद म बनाया गया मेमोरयल देखा. मेमोरयल तप िजसे िथफ़ चोटन के प म भी जाना जाता है. भटान म म य तभ और भारतीय सै य अपताल के िनकट शहर के दि णी-मय भाग म िथत दबम लैम पर िथत एक तप ( झगखा चने , चेटेन ) है. 1974 म तीसरा क यालपो , िजमेदोरोजी वागचक (1 928-19 72) को समािनत करने के िलए बनाया गया तप शहर म अपनी वण (spiers) और घटी के साथ एक मख मील का पथर है.] 2008 म, यह यापक पनिनमाण िकया गया. यह लोकि य प से "भटान म सवािधक यमान धािमक मील का पथर" के प म जाना जाता है. यह डडजम िज ादल यहेह डोज ारा पिव िकया गया था. ब ा पाईट िथप शहर के पास ही हमने ब को समिपत मिदर देखा . ब ा पाईट िथप शहर के िनकट दि णी भाग म एक ऊची पहाड़ी पर ब क 51.5 मीटर अथात 169 फ़ट ऊची िवशालकाय धात ितमा एक ऊच अिध ान पर थािपत है. यहाँ के िशपम शहर क खबसरती देखते ही बनती है. भटान के चौथे राजा िजमे िसये वागचक क साठव वषगाठ पर ब ( शाकमनी) क भय ितमा 169 फ़ट यानी 52मीटर, 1000,000 इच ऊँचाई और 25,000.12 इच लबी मित क थापना क गई. इसका िनमाण 2006 म श हआ और 2010 म बनकर तैयार हआ. सोने के पािलश म ब क िवशाल ितमा, िवशाल ागण म चार तरह सोने के पािलश से सदर नारी ितमाए और अपनी पारपरक प रकपना म बना भय पजा-गह देखकर आनद ि गिणत हो उठता है. इस ितमा के िनमाण क कल लागत S- 47 िमिलयन क लगत से चीन के नानािजग के .एयरोसन कारपोरेशन के ारा िकया गया था,जबिक परयोजना कल लगत 100 िमिलयन अमे रक डालर क आक गई थी. ायोजक के नाम यान हाल म दिशत िकए गए है जो इस ब क ितमा आिद के िनमाण म सहयोगी थे. िवशाल कएसेल फ़ादराग नामक कित पाक जो करीब 943.4 एकड़ वन े म फ़ैला है. चाग माने ी- इस बौ मठ क थापना 12 व शता दी म एक ऊची पहाड़ी पर लामा फ़ाजो जौम िशगपो रा क गई थी. मिदर परसर से िशप शहर का िवहगम य िदखाई देता है. मिदर के चार ओर 108 म से ससि जत हाथ से घमाने वाले चकरी देखने को िमली. ऎसी मायता है िक इसे घमाने से सारे पाप का अत हो जाता है. इसी मिदर के प रसर म हमारी मलाकात एक भटानी मिहला स ी ितला पा छे ी जी से हई. आपने िहदी म भतान क बहत सारी बात को बतलाया और हमारी डायरी म शभकामना सदेश िलखकर िदया. मोतीथग- रायल तािकन सरि त वन मोतीथग- रायल तािकन सरि त वन े- 15 व शता दी म तािकन को भटान का रा ीय पश घोिषत िकया था. तािकन के अलावा यहा पर िहरण, बारहिसघे देखे जा सकते है. परा वन े िमिन ी आफ़ ए ीकचर-फ़ारे ट के अतरगत आता है. फ़ोक हे रटेज यिजयम. ] 28 जलाई २००१ म इस सहालय क थापना क गई थी. इसम भटान क ामीण सकित और जीवन जीने के तरीके सबधी अनेकानेक सामि य को दिशत िकया है. दशनी म घर क कलाकितया, उपकरण तथा अनेकानेक वतए स िहत क गई ह. यहाँ कायरत मिहलाकिमयो-स ी अजल, सनम और सगी से कई िवषय पर जानकारया ा हई. 19व शता दी के एक तीन मिजला घर को उस मल वप म ही सरि त िकया गया है. यह घर िम ी एव लकड़ी से बना है. नेशनल टेिडयम िथप शाम िघरने को थी और हम नेशनल टेिडयम के सामने खड़े थे. तीरदाजी और फ़टबाल खेल के िलए इसम यवा िखलािड़य क अछी खासी भीड होती है. इनका उ साह देखते ही बनता है. इसी बीच हमारी मलाकात से यरटी अफ़सर ी मिणकमार जी से भट हई. िमलकर सनता हई और वे हम गेट बद होने के बवजद खेल मैदान म ले गए जहाँ तीरदाजी म वीण िखलािड़य के मय 150 मीटर क दरी पर लगे पाईट पर िनशाना साधने का उप म कर रहे थे. देर तक इस रोचक खेल को देखने के बाद हम अपनी होटेल “सभाव” के िलए रवाना हए. 16-11-2017 दोचला पास दोचला -- राि िव ाम के बाद सबह का ना ता-चाय लेने के बाद हम 10.25 बजे पनाखा शहर के िलए रवाना हए जो यहाँ से 82 िकमी क दरी पर अविथत है. पनाखा के रा ते म दोचला पास पर बने, सम सतह से 3020 मीटर पर बने बौ मिदर और 108 कलामक तप जो उ फ़ा उ वािदय से लड़ाई करते हए वीर गित को ा हए भटानी सैिनक क याद म बनाए गए थे. एक तरफ़ यह िवशालकाय िनमाण तो दसरी ओर भटान-िहमालयान रज क बफ़ली चोिटय को देखकर सारी थकावट दर हो जाती है. लोवेसी वेली रा ते म लोवेसी-पनाखा म लेटस खेती (टेरेस फ़ािमग) के भ य नजारे देखने को िमले . िकस तरह यहाँ के िकसान पहाड़ को काटकर लेटस बनाकर खेती करते ह. सभी खेत म चावल बोया गया था. इसी तरह क खेती पनाखा और पारो म भी होती है. इन िवह म य को िनहारते हए अब हम पहाड़ के उस िनचले िहसे (तल) म उतर रहे थे,जहाँ मोच नदी अपनी तेज गित िलए हए पहाड़ से उतरकर बहती है. मोच म 14 िकमी क राि टग.- भटान-िहमालयान रज से मोच नदी अपनी ती गित से बहती हए आती है. इस नदी म हमने करीब चौदह िकमी. क राि टग क. जीवन म यह पहला अवसर था जब हमने राि टग क. सभी िम म गजब का उसाह था. श म थोड़ा डर सा लगा लेिकन नाव पर सवार होते ही डर उड़छ हो गया. अब भय क जगह आनद ने ले ली थी. रा ते म हमने पारो से आयी नदी माचो औ िथप से आयी वाच नदी का सगम ( chuson) भी देखा. यहा पर नेपाली, भटानी और ितबत शैली के बने हए तप देखे. 17-11-2017. शाम िघर आई थी और हम अपने होटेल ’पनाखा रेिजडे सी” म लौट रहे थे. शाम का सवाद भोजन करने के बाद हमने राि िव ाम िकया. सबह उठकर हमन अपनी बालकनी से बाहर का अ त नजारा देखा. बादल जमीन पर उतरते हए आगे बढ़ रहे थे. समचा शहर धधलके म नहा रहा था. सबह का ना ता-चाय-पानी लेकर अब हम अपने अगले पड़ाव पारो क ओर बढ़ना था. भटान क राजधानी पारो यहाँ से 135 िकमी.क दरी पर है. सबह के साढ़े दस बज रहे थे और हमारा सामान लादा जा चका था. जैसे ही यहा के टाफ़ के लोग को हमारे जाने क खबर लगी. सरा टाफ़ हम मकराता हआ िबदा देने के िलए तैयार खड़ा था. .यहाँ का टाफ़ काफ़ ससकत-हसमख और िमलनसार है. उहने हमसे साथ म फ़ोटो प लेने का अनरोध िकया.िजए हमने शष वीकार िकया और तवीर ल. पारो पारो नगर एक ऐसा थान है जहा पयटक सदैव आते रहते ह। यहाँ क साकितक छिव पयटक को आकिषत करती है। यहाँ भटानी लोग का रहन सहन का तर उच है यिक यहा पयटको के आवागमन के कारण डॉलर म लोग क कमाई होती है। पारो िजले का म य बाजार भी है, अतः यहाँ काफ़ चहल-पहल भी देखी जा सकती है. भटान का रा ीय सहालय होने के कारण पयटक यहा भटान क सकित का अययन करने आते ह। पारो एअरपोट- , चार तरफ़ से िघरे ऊँचे-ऊचे पहाड़ के तलहटी म बना एअरपोट िव का सबसे खतरनाक माना गया है. जरा सी भी भल से वययान िकसी भी पहाड़ से टकरा सकता है,सकड़ क जाने भी जा सकती है..इस पोट का रन-वे काफ़ छोटा है, अतः पायलट जो काफ़ सझ-बझ से काम लेना होता है हमने रन-वे पर उतरते और और उड़ते हए वाययान को देखा. 18-11-2017 चेलेला पास. पारो से हा जाते समय पारो से लगभग 45 िकमी. क दरी पर चेलेला-पास है. सम सतह से इसक ऊचाई 4,200 मीटर है.चेलेला पास से गजरता सड़क माग भटान का सबसे यादा ऊचाई वाला सड़क माग है. यहाँ हा ी एव चार ओर के िवहगम य के पयटक खशी से झम उठता है. शीतल-ठडी-बफ़ली हवा के झके पयटक का िदल खोलकर वागत करते है और शरीर म िठठरन-िसहरन होने लगती है. यहाँ पहािड़य म रग-िबरगी पताकाए इस जगह क खबसरती म चार चाद लगा देती है. जानकारी लेने पर पता चला िक भटानी अपने सगे-सबधी के देहावसान के बाद उसक मित म इन पताकाओ को फ़हराते है. इन पताकाओ म लगने वाले कपड़े का रग धप और पानी म उतर जाता है, लेिकन भटानी भाषा म िलखे अ र प प से देखे जा सकते ह. चेलेला पाईट पर से जमाऐली लहरी माउटेन बफ़ से ढका िदखाई देता है. इिडयन आम बेस भटान और चीन क सीमा पर रायल भटान आम. तैनात रहती है. देश क अखडता और सभता बनाए रखने के िलए िजमेदारी भटान क सश सेना क जवाबदारी है. चीफ़ आफ़ आम भटान नरेश ह. रायल आम फ़ोस सीमा क सर ा के साथ ही शाही प रवार और अय वी.आई.पी क सर ा के िलए भी िजमेदार होती है. भारत और भटान के मय हई सधी के अनसार भारतीय सेना सेके ड लाईन का उ रदाियव का िनवहन करती है. हमने यहा तैनात वीर सैिनक का अिभवादन िकया और साथ ही फ़ोटो प भी िलया. इस सखद मलाकात के बाद अब हम वापाइस हो रहे थे और 3000 िफ़ट क ऊचाइय पर चढ़ रहे थे. 18-11-017. होटल दोरिजिलग दोपहर तीन बजे के करीब हम लोग पारो िथत “होटल दोरिजिलग” पहचे. पारो का मण िकया. राि नौ बजे हमने सवाद भोजन का आनद उठाया. रात म पारा लढ़क कर काफ़ नीचे आ चका था. उस िदन तापमान दो िड ी के लगभग था. 19-11-2017 टाकसाग मोने ी ( टाइगर ने ट) टाकसाग मोने ी ( टाइगर ने ट) भटान के पारो शहर के पास िहमालय क 10 हजार फट ऊचाई पर बसा है टाइगर ने ट बौ मठ। गफा म बना यह मठ 300 साल से भी यादा पराना है। िहमालय क पहािड़य पर बने टाइगर ने ट मोनी ी पहाड़ के बीच बनी इस गफा तक पैदल ही जाया जा सकता है। जो लोग े िकग अ छी करते ह, उह कम से कम दो से तीन घटे बौ मठ तक चढ़ने म लगते ह, लेिकन जैसे ही बौ मठ पर पहचते ह, सारी थकान दर हो जाती है। वहा िमलने वाला आयािमक माहौल और वहा से िदखने वाली िहमालय क वािदया एक अलग ही आनद देती ह। इस बौ मठ से भी ऊपर एक और बौ मठ है, जो बच का गकल है। कहा जाता है िक 1692 म टाइगर ने ट बौ मठ का िनमाण हआ था। इससे पहले 8व शता दी म यहा क गफा म बौ ग प सभवा ने तीन साल तीन महीने तीन हते तीन िदन और तीन घटे तक यान िकया था। यह भी कहा जाता है िक प सभवा (ग रपोचे) इस गफा तक टाइगर क पीठ पर बैठकर उड़ते हए आए थे। यहाँ घोड़े वाले भी अिधक स या म देखे जा सकते ह. महज आठ सौ पए म ये पयटक को केवल आधी ऊचाई तक ही लेकर जाते ह. आगे का रा ता और भी किठन होने के कारण पायटक को पैदल ही चढ़ना होता है. िफ़र घोड़े वाले उह वािपत लौटाकर नह लाते. इसका म य कारण है अयिधक िनचाई. एकदम ढलवा उतराई के चलते पयटक के िगर जाने का खतरा होता है. सारी जानकारी लेने के बाद हमने ऊपर न जाने का फ़ैसला िकया और पास ही बनी दकान से पसद क चीज खरीद. पयटक तब और आय म पड़ जाता है िक इतनी अगय ऊचाइय पर इसे कैसे बनाया गया होगा. उस समय न तो मशीन का यग था और न ही कोई अय साधन. टायगर ने ट देखने. kharbandi goempa (खारबाडी गफ़ा) खारबाडी मठ- 1 डैम 967 म अही चडॆरान ारा थािपत और चार सौ मीटर क ऊँचाई पर िथत इस सदर मठ म ब के जीवन, शाबदग वाग नागयाल और ग रनपोछे क मितया थािपत ह, डैम तथा िथफ़ के िवहगम य को जी भर के िनहारने के बाद हम होटेल लौट आए थे. रा ीय स हालय- टा झग(Ta Dzong) पि मी भटान म पार शहर म एक साकित सहालय है. 1968 म पनिनिमत भवन महामिहम िजमे दोरजी वागचक के समय के भटानी परपरा कला के बेहतरीन नमने, का य मितया, सदरतम मखौटे,सदर पिटग, डाक-िटकट आिद स िहत क गई ह. ऊचाई पर होने के कारण इसका उपयोग बाच-टावर ( 1627) के प म होता था. अब इसे बदलकर सहालय बना िदया गया है. आज रा ीय सहालय ने भटानी कला के 3,000 से अिधक काम के अपने कजे म है, जो िक भटान क साकितक िवरासत के 1500 से अिधक वष तक शािमल है। िविभन रचनामक परपराओ और िवषय क इसक म धारण वतमान के साथ अतीत क एक उलेखनीय िम ण का ितिनिधव करती है और थानीय और िवदेशी पयटक के िलए बड़ा आकषण का के है. इस नेशनल यिजयम का िनमाण हमारी भारत क सरकार ने इसके िनमाण म िव ीय सहायता दान क है. लौटते समय हमने पारो िथत िडि क आिफ़स को देखा. भटानी शैली बने इस कायालय को देखकर उन कलाकार क याद हो आयी,िजहने कभी इस अ त इमारत का िनमाण िकया होगा. राि म हम िफ़र एक बार िफ़र हम िडि क आिफ़स देखने पहचे. रग-िबरगी म नहाते/चमचमाते इस इमारत को देखकर तबीयत खश हो गई. अपने आिफ़स को िकस तरह रखा जाए, यह यहा आकर सीखा जा सकता है. इस इमारत के पास िगट आइटम क दकान थी, िजसम कछ आइटम क खरीद क गई.भख लग आयी थी और अब हम अपनी होटेल दोरजीिलग वािपस लौट रहे थे.राि म सवाद भोजन करने के बाद हमने राि िव ाम िकया. हमारी या ा का यह अितम पड़ाव था और अगली सबह हम वािपस लौट जाना था. 20-11-2017 पारो िथत होटेल दोरजीिलग म सबह का ना ता-चाय-पानी के प ात हम फ़सोिलग के रवाना होना था. लौटने का िवचार मन म आते ही उदासी घेरने लगी थी. मन िकसी भी कमत पर लौटने का नह हो रहा था. एक बार कोई यिद भटान आ जाये और वह यहा क रय वािदय म घम ले और यहाँ के लोग से गहरी आमीयता हो जाए, िफ़र उह छॊड़ने को भला कैसे मन गवाही दे सकता है?.मन पर िकसी तरह िनयण करने के बाद हमने अपना सामान पैक िकया. गाड़ी पर लादा और भारी मन से िबदा हए. होटेल म कायरत सभी कमचारय ने भारी मन से हम िबदा िकया. शाम िघर आयी थी और हम भटान ै वल वड क मैनेिजग डायरे टर स ी कला/दीि का जी के आिफ़स पहँचे. उहने हमारा आ मीय वागत िकया. शाम क चाय आफ़र क और जानना चाहा िक टर के दौरान हम कोई तकलीफ़ तो नह हई. िनि त प से हम इस या ा से गदगद थे. इतने कम पैस म नौ िदन िकसी िवदेशी शहर म क पाना आसान काम नह होता. वैसे भी हमने जी भर के इस या ा का आनद उठाया था. मन यहाँ कछ यादा ही रम गया था. बारी-बारी से वह येक यि याद आता िजनके बीच रहकर हमने नौ िदन िबताए थे. उनका अपना यहार िमलनसारता और नैसिगक मकान का जाद अब तक हम पर तारी थी. िदल हटान छोड़नेको तैयार नह हो रहा था, लेिकन समय सीमा क भी अपनी मजबरी होती है. िकसी तरह िदल को मनाते हए अब हम अपने देश भारत क ओर लौट रहे थे. याद को और परजोर बनाने के िलए हमने कला जी के आिफ़स के कमचारय के साथ फ़ोटो प िलया.सारे लोग ने हम मकराते हए िबदा दी. ि प आगनाईजर- स ी कला गरग. . भटान क सीमा को छॊड़ते हए भारत क सीमा म वेश िकया. राि के करीब नौ बजे हम पि म बगाल के जयगाव िजले म िथत लाटागरी रजव फ़ारे ट के नजदीक ीन टच टअस इको रसोट पहचे. ीन च टअस इको रसोट.-लातागरी --उ र बगाल के जलपाईगड़ी िजले म ीन टच टअस इको रजाट बागडोगरा हवाई अडडे से 90 िकमी.,एनजीपी से 80 िकमी है. यह एक िवकिसत पयटन थल है. लाटगरी म हमारे होटल के आसपास िहमालय पवत के गोद से कित क सदरता को देखते हए, लाउड के सरज और सफ के साथ, ाचीन ीन वैली और असबेड सील जगल ने इस थल को लतागरी म रहने वाले पयटक क तलाश म लोकि य बना िदया, यह लतागरी म सबसे सदर पारिथितक रसॉटस म से एक है। ी सरकार जो बड़द ा के नाम से िस ह, ने हमारा आमीय वागत िकया. साथ म राि का भोजन िकया और अगली सबह चार बजे तैयार होने को कहा तािक हम रजव फ़ारे ट म घमने और जगली जानवर को देखने के िलए पास बनवा ल. ी आनदेव और बड़द ा ने राि चर बजे उठे और परिमट बनाने के िलए रवाना हो गए. सबह छः बजे हम सफ़ारी के िलए िनकल पड़े. इस अयारण म एिशयन रैनो माने एक सीग का गे डा देखने को िमलता है. इसके अलावा जगली हाथी, जगली भैसा, िहरण, मोर और रग-िबरगे प ी देखे जा सकते है. 21-11-2017-सबह क चाय और ना ता करने के बाद हम यजलपाईगड़ी के िलए रवाना हए और िसयालदह होते हए नागपर और टै सी ारा िछदवाड़ा पहँचे. भटान से आए हए दो स ाह बीत चके ह लेिकन भटान क छिव अब तक मन-मि तक पर छाई हई है. वहाँ का रहन सहन-िमलनसारता-नयनािधराम याविलया और ममध कर देने वाली मकराहट भलाए नह भलती. एक िदन मेरे एक िम ने उ सकतावश एक पछा िक “मने सना है िक भटान एक गरीब देश है.” म नह जानता िक उसने भटान के बारे म जानने क कभी कोिशश भी क है या वह िकसी अय से सनी-सनाई बात को दोहरा रहा था. अब मेरी बारी थी िक उसे आँख देखा हाल सनाऊँ . मने कहा- “िम ..िजस देश म ब जैसे महान यि को पजा जाता हो, जहाँ चहँ ओर शाित का वातावरण हो, वह गरीब कैसे हो सकता है. िफ़र िजसके पास अकत वन-सपदा हो, वह गरीब कैसे हो सकता है? भटानी अपनी पारपरक वेश-भषा म रहते ह और उस पर गव करते ह ,वह गरीब कैसे हो सकता है? िजसक वाणी म न ता हो, होठ पर िनछल मकराहट िथरकती रहती हो, वह गरीब कैसे हो सकता है. पयावरण को श बनाए रखने के िलए िजस देश म काफ़ समय से पोिलिथन पर ितबध लगा िदया हो और जहाँ कचरा ढढने पर भी न िदखाई देता हो, वह भला गरीब कैसे हो सकता है? िजस देश म फ़ाईव टार होटल का जाल सा िबछा हो और िव के अनेकानेक देश से लोग उसक छिव देखने के िलए आते ह, वह भला गरीब कैसे हो सकता है?.िजस देश म फ़ोर- हीलर अिधकािधक प से योग म लाई जा रही हो और ट- हीलर हीकल ढढने पर भी न िदखाई देती हो, या वह देश गरीब कैसे हो सकता है?. जहाँ एक भी झोपड़-प ी न िदखाई देती हो, जहाँ एक भी िभखारी भीख मागते िदखाई नह देता, वह गरीब कैसे हो सकता है? िजस देश म एक से बढ़कर एक अ ािलकाए अपनी िवरासत को सजोए हए खड़ी ह, वह गरीब कैसे हो सकता है. उहोने वह सब बचा कर रखा है, और अपने जीवन म उतार रखा है, िजसक क आज जरत है, वरना और भी देश ह जहाँ धन क निदया बहती ह, िव म िजनक तती बोलती है. वे आज उतने ही कगाल है यिक वे हसना तो छोिड़ये, मकराना भी भल चके ह. न तो वे सख पवक जी पा रहे ह और न ही तनदत रह पा रहे ह. कल िमलाकर यह कहा जा सकता है भरपर धनाढय होने के बावजद उहने टशन पाल िलया है, िजसक कोई दवा न तो लकमान के पास थी और न ही िकसी के पास हो सकती है. यिद सहज और सरल जीवन जीना हो, श वातावरण म जीना हो, मकराते हए जीना हो, तो उसे भटान के रा ते पर चलना होगा. --------------------------------------------------------------------------------------------------- अब हम भटान या ा के आिखरी पड़ाव क ओर बढ़ते ह. यह आिखरी पड़ाव है लातागरी रजव फ़ोरे ट ( Lataguri) जो अपने एक िसग के गडॆ के िलए जाना जाता है. गडॊं अलावा जगली हाथी, िहरण, जगली भसा आिद बहतायत म देखे जा सकते ह. ------------------------------------------------------------------------------------------------ 22. थाईलड म सम मथन सम मथन क कहानी मझे बचपन म माँ ने कह सनायी थी. उनके कहने का ढग बड़ा रोचक होता था. जो भी वे बतलाती जाती,उसका का पिनक िच आँख के सामने सजीव हो उठता था. उस कहानी म एक सम था िजसका ओर-छोर िदखाई नह देता था, मथानी के प म मदराचल पवत को उपयोग म लाया गया था और उस पवत से वासक नाग को नेित िक तरह लपेटकर खचा गया था. मथन से चौदह रन िनकले थे िजसे देव और दानव के मय बाट िदया गया था. बाद म िकसी िफ़म म इसे पाियत होते हए देखने को िमला था. अपनी उ के सढ़सठव ( 67 ) पड़ाव पर मझे ततीय अतररा ीय िहदी समेलन म एक ितिनधी के प म भाग लेने का सौभा य ा हआ .अपनी या ा के अितम पड़ाव पर वहाँ से लौटते हए थाईलड के हवाई अडडे पर िजसका नाम सकत म “सवण भिम” रखा गया है, पर करीब बावन फ़ट लबी, तथा प ह फ़ट ऊँची ितमा जो सम मथन को लेकर बनाई गई है, देखने को िमली. उसे देखते हए मझे आय इस बात पर हो रहा था िक सम मथन क कहानी जो भारतीय मनीषा को लेकर िलखी गई थी, िवदेशी धरती पर देखने को िमल रही है. इितहास को खगालने पर ात हआ िक कभी भारत क सीमाए ईरान, अफ़गान, िसगापर, मलेिशया, थाईलड िजसे यामभिम के नाम से जाना जाता था, तक फ़ैली हई थी. िफ़र यापार अथवा नौकरी करने के िलए जो भारतीय यहाँ पहँचे, उहने अपनी साकितक पहचान को थायी प देने के िलए इस ितमा क थापना करवाई. उस आदमकद ितमा को देखते हए मझे चार लाइन यादे हो आयी िजसम सम मथन से ा हए उन चौदह रन िक या या क गई है, वे इस कार है. ी,/ मिण/,रभा/,वा िण/ अमीय/, शख,/गजराज/धनवतर/ धन/ ,धेन,/शिश/,हलाहल,/ बाज”/कपव सम मथन म सबसे पहले “हलाहल”(जहर) िनकला, िजसे न तो देव हण करना चाहते थे और न ही दानव. असमजस क िथित देख, देव के देव महादेव ने उसे वीकार करते हए अपने कठ म धारण कर िलया. जहर के गले म उतरते ही उनका कठ नीला पड़ गया. इस तरह इनका एक नाम “नीलकठ” पडा. दसरे म म”कामधेन” गाय िनकली, िजसे ऋिषय ने ले िलया. तीसरे म म “उ चै ैवा” नामक घोड़ा िनकला, िजसे दानव के राजा बिल ने रख िलया. चौथे म पर “ ऎरावत” हाथी िनकला, िजसे इ ने अपने काननवन म भेज िदया. पाचव म म “कौ तभमिण” मिण िनकला, िजसे भगवान िवण ने हण कर िलया. िफ़र छटे म पर कपव ´ िनकला, िजसे इ ने अपने उ ान मे रप िदया. इसके बाद“रभा” नामक असरा िनकली, िजसे भी इ ने अपने दरबार म भेज िदया. इसके बाद “लमी” का काटय हआ.िजसे भगवान िव ण ने अपनी भाया बना िलया. इसके बाद” वा िण”( शराब )िनकली, िजसे दानव ने अपने कजे म कर िलया. इसके बाद “च मा” िजसे देव के देव महदेव ने अपनी जटा म धारण कर िलया. िफ़र” पारजात” नामक एक व िनकला, िजसे पनः इ ने अपने काननवन म लगा िदया. इसके बाद “शख” िनकला, िजसे िवण ने अपने अिधकार म ले िलया. इसके बाद “ धवतर” नामक वै िनकले, जो देव के िचिकसक बने. सबसे अत मे” अमत” िनकला. अमत के िनकलते ही देव और दानव मे स ाम िछड़ गया यिक दोन ही प इसे पीकर अमर हो जाना चाहते थे. जब मामला शात होता िदखायी नह िदखायी िदया तो भगवान िव ण ने “मोिहनी” का प धारण कर, ा अमत को एक बड़े पा म भर कर देव और दानव से कहा िक वे पि ब होकर बैठ जाए, सभी को बारी-बारी से अमतपान करवाया जाएगा. भगवान िवण जानते थे िक अगर अमत दानव को िपला िदया गया तो वे अमर हो जाएगे और देव को परेशान करते रहेगे. अतः चालाक से उहोने उस पा को दो िहस म बाट िदया. एक म अमत और दसरे म मिदरा भर दी गई. जब देव को अमत िपलाते तो अमत भरा िहसा देव क तरफ़ कर देते. जब दानव क बारी आती तो उसे पलट देते थे. दानव जानते थे िक िवण देवताओ का प लेकर उनके साथ छलावा करते रहे ह. अतः एक दानव ने देवता का प धारण कर उस पि मे जा बैठा जहाँ देवगण बैठे हए थे. िवण ने उसे देव समझकर जैसे ही अमत के पा को उड़ेला, पास बैठे सय और च मा ने ी िवण से िशकायत कर दी. पता लगते ही. िवण ने अपने च से उसक गदन उड़ा दी. तब तक तो काफ़ देर हो चक थी. अमत क कछ बदे गले से नीचे उतर चक थी. गदन कटने के बाद भी वह दानव अमत के भाव से मर नह सका. दो टकड़ म बटॆ दानव का एक िहसा राह और दसरा केत कहलाया. िहद मायता के अनसार राह और केत बारी-बारी से सय और च मा को सते है. इसी के कारण सय हण और च हण होता है, जैसी बात को बल िमलता है. पौरािणक मायता के अनसार ऋिष दवासा के ाप से सभी देगगण अपने राजा इ सिहत बलहीन हो गए थे. उस समय दानव का राजा बिल हआ करता था. श ाचाय दानव के ग थे. वे जब-तब राजा बिल को इ के िखलाफ़ बरगलाते थे और वे देव पर आ ामण कर उनक सपि पर अपना अिधकार जमा लेते थे. घर से बेघर हए देवताऒ ने अपने राजा इ को अपनी यथा-कथा कह सनायी,पर वह तो वय िनतेज था, मदद नह कर पाया. इस तरह सभी देवताओ ने ा को अपना दखड़ा कह सनाया. ा ने उह ी िवण के पास िभजवाया. िवण ने सारी बत सन चकने के बाद सम मथन क योजना बनाई. वे जानते थे िक दानव को बलहीन करने के िलए शि चािहए और वह सममथन के जरए ही हािसल क जा सकती है. उह क योजना के अनसार उहने वासिक नाग को नेित, मदराचल पवत को मथानी और वय कछप बनकर मथानी का आधार बनने का आासन िदया. इस तरह सम मथन का अिभयान चलाया गया और वहाँ से ा शि य को अपने अिधकार म लेते हए उहोने दानव को िफ़र एक बार पाताल क ओर लौटने पर मजबर कर िदया था. . थाईलड म ब धम अपने िशखर पर है. सभी बौ मिदर म आपको भगवान ब क सोने से पािलश क गई भय ितमाए देखने को िमलती है. इसके साथ ही वहाँ िहद धम का भी अछा खासा भाव देखने को िमलता है. वहाँ एक से बढ़कर एक िहद देवी-देवताओ के मिदर ह, धम के नाम पर यहाँ झगड़ा-फ़साद कभी नह होता और न ही कोई िकसी पर जबरदती अपना भाव ही डालता है. िहद-बौ और मिलम सभी प के लोग यहाँ बड़े ही सौहादता के साथ अपना जीवन बसर करते ह. ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------- 23 शेर के बीच एक िदन. (थाईलड) - शेर के बीच एक िदन बचपन म िबताए गए हर पल मझे अब भी याद ह. सोने से पहले म माँ से कोई कहानी सनाने को कहता और वे बड़े चाव से कहानी सनाने लगती थ. उसम कभी राजा-रानी होते, तो कभी जगल के कोई पश-प ी. शेर को लेकर न जाने िकतनी ही कहािनया उहने सनायी थ. छ य म जब कभी अपने निनहाल(नागपर) जाना होता, नानी भी एक से बढकर एक कहािनया सनाया करती थ. उनक भी कहािनय म वही शेर भाल-चीते होते, राजा-रानी होते तो कभी कोई जादगर आिद-आिद. नानी ने ही बतलाया था िक यहाँ महाराजबाग म शेर तथा अय जानवर के बाड़े ह. एक िदन मने िजद पकड़ी िक मझे शेर देखना है. िदन ढलते ही उहने मझे महाराजबाग िदखाने अपने साथ ले िलया. यह बाग एक िवशाल परसर म फ़ैला हआ है. यहा लोहे के जगल म शेर-भाल-चीते, बारहिसघे-िहरण, साभर और भी न जाने िकतने ही पश-प ी बद ह, िजह अपनी आँख से देखना अपने आप म एक कौतहल का िवषय था. एक बार िकसी गम क छ ी म म अपने निनहाल म था. उस समय एक सकस आया हआ था िजसका नाम शायद “कमला सकस” था, मझे देखने को िमला. लोग कहा करते थे िक वह सकस एिशया का सबसे बड़ा सकस था. लोहे के बड़े-बड़े िपजर म शेर को रग मे उतारा जाता था और रगमा टर अपने कोड़े और एक लकड़ी क छडी के बल पर उनसे कभी बड़े से टल पर बैठने का इशारा करता तो कभी कछ और. तरह-तरह के करतब शेर के मझे देखने को िमले. उसके बाद तो अनेक सकस म देख चका था. बाद म पता चला िक िकसी िवदेश या ा के दौरान कमला सकस सम के गभ म समा गया. उसके बाद न जाने िकतनी ही सकस म देख चका था. शेर-चीते, हाथी, घोड़े, दरयाई घोड़े आिद सब सकस क जान होते. बगैर इनके बगैर सकस क कपना तक नह क जा सकती. नागपर म ही एक अजायबघर है, िजसम मरे हए जगली जानवर क खाल म भसा-बरादा वगैरह भर कर, बडी ही शालीन तरीके से उह काच के कमर म रखा गया है, िजसे देखकर आप वय जीव के बारे म जानकारया ा कर सकते ह. चिक मझे श से घमने का शौक है, और इस शौक के चलते, मने पव से पि म, तथा उ र से दि ण तक क या ाए क है. या ाए कभी िनजी तौर पर, तो कभी सािहियक आयोजन के चलते हई थी. इसी बीच अयारय भी देखे, लेिकन उनम सभी जानवर बतौर एक कैदी के हैिसयत से देखने को िमले. मने सपने म भी नह सोचा था िक कभी िजदा शेर के बीच परा िदन िबताने को िमलेगा. मेरे सािहियक िम ी जयकाश”मानस” ने मझसे फ़ोन पर आहपवक कहा िक म जदी ही अपना पासपोट बनवा ल. उह ने बात आगे बढाते हए कहा िक िहदी के चार एव सार को यान म रखते हए उह ने माह फ़रवरी 2011म थाईलड म ततीय अतररा ीय िहदी स मेलन आयोिजत करने का मन बनाया है और उसम मझे चलना है. म उनक बात टाल न सका और दो माह म पासपोट बन गया. म चाहता था िक अपना एक थानीय िम भी साथ हो ले तो यादा मजा आएगा. मने अपने सािहियक िम ी भदयाल ीवा तव को अपना म तय कह सनाया और वे उसके िलए तैयार हो गए. इस तरह एक िवदेश या ा का सयोग बना. 1 फ़रवरी 2011 को 3 बजे, नेताजी सभाष एअरपोट कोलकता से िकगिफ़शर के हवाईजहाज आईटी-२१ से हमने थाईलै ड के िलए उड़ान भरी. यह मेरी पहली िवदेश या ा थी. हवाईजहाज को अब तक िसफ़ आसमान म उड़ते देखा था. अब उसम बैठकर सफ़र कर रहा था. मेरी सीट िखड़क के पास थी. काच म से बाहर का य देखकर मझे एक अलग ही िकम का रोमाच हो आया था. डेढ़ घटे क उड़ान के बाद हम थाईलड के “ वणभिम” एअरपोट पर थे. सनद रहे िक इस एअरपोट का नाम भारतीय सकित के आधार पर “ वणभिम” रखा गया है. हम वहा से सीधे “पटाया” के िलए रवाना हए जहाँ ठहरने के िलए “िमरकल वीटस” पहले से ही बक करवा िलया गया था. 2 फ़रवरी को को कोरल आईलड, िटफ़नी शो ,3 फ़रवरी को लोिटग माकट, जे स गैलेरी, सी-बीच का मण िकया और अगले िदन यािन तारीख 4 को बकाक के िलए रवाना हए,जहाँ होटल फ़रामा सीलोम म ठहरने क यवथा थी. बकाक के िस िवण मिदर म,वहाँ के भारतीय िम के आह पर सािहियक काय म का आयोजन सपन हआ, जबिक यह काय म उसी होटल के भ य क म आयोिजत होना तय िकया गया था. इस काय म म अनेक भरतविशय ने उसाहपवक अपनी उपिथित दज करवाई. मिदर सिमित ने सभी का भावभीना वागत-स कार िकया और सवाद भोजन भी करवाया. ] पाँचवा िदन यािन 5 फ़रवरी का वह िदन भी आया, जब हम कचनापरी होते हए टाइगर टे पल जा पहँचे, जहाँ िजदा शेर के साथ घमने का रोमाचकारी आनद उठाना था जैसे-जैसे मेरे कदम आगे बढ़ रहे थे, मि तक म एक नह बिक अनेक का पिनक िच बनते जा रहे थे. म सोच रहा था िक अब तक तो मने शेर को काफ़ दरी से देखा था, आज उह खले हए प म और वह भी अपने से काफ़ नजदीक से देखगा तो कैसा लगेगा. कह अगर वह आ ामक हो जाएगा तो या िथित बनेगी? कदम अपनी गित से आगे बढ़ रहे थे और िदमाग अपनी गित से. आिखर वह ण आ ही गया, जब हम वेश- ार पर खडे थे. वहाँ से सभी को एक-एक पच थमा दी गई िक उसे भरकर जमा करना है. नाम पता आिद भर देने के बाद उसम एक लाइन थी, िजसने शरीर म एक अ ात भय भर िदया. उसम िलखा था िक हम अपनी जवाबदारी पर अ दर जा रहे ह, यिद िकसी जानवर के साथ कोई अि य घटना घट जाए तो हम वय जवाबदार हगे. खैर मने यह सोचकर पच भर दी िक आगे जो भी होगा देखा जाएगा. गेट पर एक चलबली सी आकषक मैना, जो इधर-उधर उछल-कद करती िफ़र अपनी जगह आकर बैठ जाया करती थी, सभी का यान आकिषत िकए हए थी. अदर एक सीमे ट क नकली गफ़ा सरीखी बनी हई थ, िजसम सभी को कने को कहा गया. वहाँ दजन िवदेशी सैलानी भी अपनी बारी का इतजार करते पाए गए. बाहर का य एक दम साफ़ था. एक बड़े भभाग म दजन शेर आराम फ़रमा रहे थे. उन पर सय क िकरण न पड़े, इसे यान म रखते हए, बड़े-बड़े छाते उन पर तने हए थे. कछ समय प ात वहाँ के एक कमचारी ने हम बाहर लाइन लगाकर खड़े होने को कहा. अब आगे या होता है, ायः यह सवाल सभी के माथे को मथ रहा था. तभी दो-तीन बौ-साध, िजनके हाथ म चोटी- छोटी लािठया थी, ने आगे बढकर शेर को उठाया और आगे बढने लगे. मामली से बे ट अथवा लोहे क चेन म बधे वनराज उनके पीछे हो िलए थे. तभी एक कमचारी ने सभी को पि ब होकर उस साध के पीछे-पीछे चलने को कहा और यह भी बतलाया िक आप िनि तता के साथ शेर क पीठ पर हाथ रखकर चल सकते ह. यिद कोई उस य को कैमरे म कैद करना चाहता है तो साथ चल रहे कमचारय के पास अपने कैमरे दे द, वह आपक फ़ोटो खचता चलेगा. उसने यह भी बतलाया िक शेर क पीठ के आधे िहसे तक ही आप उसे छ सकते ह. लोग ने अपने-अपने कैमरे कमचारय के हवाले कर िदए थे. वे शेर के साथ फ़ोटो िखचवाते और िफ़र लाइन से हट जाते. िफ़र दसरा सैलानी आगे बढता, शेर के साथ फ़ोटो िखचवा कर लाइन से हट जाता. इस तरह हर यि जगल के राजा को छते हए उसके साथ अपने को जोडते हए गव महसस कर रहा था. अब मेरी बारी थी. मन के एक कोने म भय तो समाया हआ ही था. म उस जगल के बादशाह को छने जा रहा था, िजसका नाम लेते ही तन म कपकपी होने लगती है, अगर सामने पड़ जाए तो मँह से चीख िनकल जाती है और िजसक दहाड़ सनते ही अछे-अछे सरमाओ क िघगी बध जाती है, िफ़र उसे छना तो दर क बात है. शेर के प े पर हथेली रखते ही मेरी हथेली एक बार कापी ज र थी, लेिकन त ण ही म नामल भी हो गया था और अब म भयरिहत होकर जगल के राजाजी के साथ फ़ोट िखचवा रहा था. करीब आधा-पौन िकलोमीटर का यह सफ़र शेर के साथ गजरा. उसके बाद जहाँ दो ओर से लाल-िसदरी रग म रगी पहािडयाँ अधच ाकार आकार बनाती है, वहा बड़े-बडे छाते तने हए थे, के नीचे शेर को आराम क म ा म बैठा िदया गया. पास ही एक िटनशैड था िजसमे पयटक के बैठने क समिचत यवथा थी. अब बौ माक ठड़े पानी क बोतल से शेर के ऊपर बौझार कर रहे थे. मतलब तो आप समझ ही गए हगे िक वे ऐसा य कर रहे थे ?.आप जानते ही ह िक शेर ठड़े थान म रहना पसद करते ह. उह तेज धप नह सहाती. िफ़र वह एक लबा चकर धप म चलते हए आया जािहर है िक उसक वचा गमा गयी होगी.. दशकदीघा म बैठे हए हम, एक नह-दो नह, बिक दजन शेर को एक साथ बैठा हआ देख रहे थे. कछ के गल म लोहे क चेन बध थी, जािहर है िक वे कभी भी आमक हो सकते थे. कछ के गल म कपड़े का बे ट बधा हआ था, शायद इसिलए िक वे कम गसैल होग. कछ तो िबना चेन के भी थे, मतलब साफ़ था िक या तो वे बढ़े हो चके हगे या िफ़र एकदम शात वभाव के होग. बौ साधओ का इशारा पाते ही उनके सहायक आगे बढे. सभी क नीले रग क पोशाक थी. एक ने आकर कहा िक आप सभी, िजनके पास अपने कैमरे ह, लाइन बना कर खड़े हो जाए. इशारा पाते ही लोग पि ब होकर खड़े हो गए. सभी को इस बात का इतजार था िक आगे या होता है. एक सहायक के साथ एक पयटक हो िलया. कैमरा अब उस सहायक के हाथ म था. वह उस पयटक को शेर के पास ले जाता और िविभन म ा म िबठाते हए, फ़ोटो खचता. इस तरह वह बारी-बारी से अय शेर के पास पयटक को ले जाता, फ़ोटो खचता और अत म पयटक को दशकदीघा तक छोड आता. सभवतः टाईगर टे पल िव का एकमा ऐसा अयारय है जहाँ इसान िनडर होकर शेर के बीच रह सकता है. शायद यही वजह है िक िव के कोने-कोने से पयटक यहाँ पहँचते ह. टे पल का श शाि दक अथ मिदर होता है. जािहर है िक मिदर म िहसा के िलए कोई जगह नह होती. ऐसी मेरी अपनी सोच है. कछ लोग तो यह भी कहते हए सने गए िक शेर के दात तोड िदए गए ह, इसीिलए वे आमण नह करते. यह बात गले से नह उतरती. उतरना भी नह चािहए , यिक शेर के दात ह, अथवा न हो, लेिकन शेर तो आिखर शेर ही होता है. यिद वह िहसक नह होगा तो वह भख मर जाएगा. वह दाल-रोटी खाकर तो गजारा नह कर सकता. उसे हर हाल म मास चािहए ही चािहए. बौ साध तो उसका जबड़ा खोलकर भी बतलाते ह. कछ का यह मानना है िक साध वशीकरण-म जानते ह, इसीिलए वह आमण नह करता. म म शि होती है और हो सकता है िक वे उन पर इसका योग करते हग. इस पर मेरी अपनी िनजी राय है िक यिद जगली जानवर को भी मनय के बीच रहने िदया जाए तो वे भी एक अछे िम हो सकते ह और यही सदेश िजसे भगवान ब का सदेश ही मान ल,यहाँ उसे फ़िलत होते हम देख सकते ह. इससे एक सदेश यह भी जाता है िक पयावरण को वथ बनाए रखने म िजतना मनय अपना रोल िनभाता है, उतना ही एक जगली जानवर भी. शेर अपनी सीमा म रहकर पयावरण को कभी नकसान नह पहँचाता, िजतना क एक आदमी. अतः उसे चािहए िक वह अपनी सीमा का अित मण न करे, तो यह पयावरण को श बनाने क िदशा म एक कारगर कदम होगा और यिद ऐसा होता है तो इसका वागत िकया जाना चािहए. ----------------------------------------------------------------------------------------------- 24. मारीशस अथात िमिन भारत क या ा मेरे अपने जीवन म यह दसरा अवसर है जब मझे भारत से बाहर मारीशस जाने का सअवसर ा हआ. पहली बार म थाईलै ड क या ा पर सन 2011 म गया था. थाईलै ड क या ा पर जाने का अवसर अनायास ही ा नह हआ था, बि क सायास ा हआ था इस या ा के बारे म बडा िदलचप वा या है. एक िदन मझे रायपर (छ.ग.) के मेरे िम ी जयकाश मानसजी का फ़ोन आया. फ़ोन पर उह ने मझसे बकाक-या ा पर चलने का आह िकया और साथ ही उह ने मेल के जरए उस काय म क परेखा भी उपलध करवा दी. अतररा ीय तर पर िहदी और िहदी सकित को िति त करने के िलए बहआयामी सािहियक-साकितक सथा “सजन-समान एव सािहियक वेव पि का “सजनगाथा डाट काम”रायपर का यह सात िदवसीय अनठा यास था. इस सािहियक या ा म देश के चयिनत/अिधकारक िव ान, अयापक, लेखक, भाषािवद, शोधाथ, सपादक, पकार, सगीतकार, बि जीवी एव िहदी सेवा सथाओ के सद य, िहदी चारक, लागस,तथा टे नो े ट भाग ले रहे थे. मन म इछा बलवती हो उठी िक मझे इसम जाना चािहए लेिकन उस व तक मेरा पासपोट नह बना था सो चाहते हए भी म इस या ा म शािमल नह हो सका. उहोने आह करते हए मझसे कहा िक आने वाले समय म मझे अय देश क या ा के िलए तैयार रहना है और अपना पासपोट भी समय रहते बनवा लेना है. श से ही मेरी कित घमकड िकम क रही है. डाक िवभाग म कायरत रहने से चार वष मे िमलने वाली एल.टी.सी का मने तीन बार फ़ायदा उठाया. पहली बार मने सप रवार सपण दि त-भारत क या ा क. दसरी बात जम-कमीर और तीसरी बात गोवा क या ा क. उसके बाद यह क म सरकार ारा बद करा दी गई. सेवा िनवि के बाद मने मय देश रा भाषा चार सिमित,िहदी भवन भोपाल क सदयता हण क. लेखन कम अपनी गित से चल ही रहा था. बचॊं के िलए भी म िलखने लगा. इस बीच मेरी मलाकात सािहि यक एव साकितक सकार क मािसक “बालवािटका” के सपादक डा. ी भै ँ लाल गगजी से हई और इस तरह म उनक सथा से जड गया. यह म अभी का नह था. दसरी कडी म म बालसािह य शोध एव सवधन सािमित के सचालक ी उदय िकरोलाजी, अलमोडा(उ राखड) से जडा और इस तरह कई सथाओ से जडता चला गया और इनम होने वाले काय म म बराबर जाता रहा और समानीत भी होता रहा. नए-नए देश म जाना और याितलध सािहयकारॊ से िमलने म मझे अयिधक आनद ा होता है. इस तरह ायः सभी देश के बहतेरे िम क टोली जडती चली गई. परमिपता परमे र क िवशेष कपा मझ पर सदा बनी रही और यह उह का आशीवाद है िक मझे देश और देश के बाहर जाने के सअवसर ा होते रहे. जैसा क मने वीकार िकया भी है िक मझे या ा करने म काफ़ आनद ा होता है. सो मने िछदवाडा िथत “वसधरा ै वल” के सचालक ी बकल पडयाजी से सपक िकया और अपना पासपोट तैयार करने के िलए आवयक दतावेज जटाना श कर िदए. माननीय वरदमित िम जी उस समय एस.डी.एम के पद पर कायरत थे. आपने दो बार मय देश रा भाषा चार सिमित,िजला इकाई िछदवाडा ारा आयोिजत ितभा ोसाहन ितयोिगताओ म म य अितिथ के तौर पर सिमित को अपना हािदक सहयोग िदया और समय-समय पर वे मागदशक के प म अपनी भागीदारी का िनवहन करते रहे ह. मने उनसे अपना तकाल -पासपोट बनवाने के िलए िनधारत प म हता र करने के िलए िनवेदन िकया. उहने िबना समय गवाए उस पर अपने हता र कर िदए.. लेिकन इस बीच पिन क तबीयत िबगड जाने और उस पर लगने वाले खच को देखते हए मने इस ि या को रोकते हए ी बकलजी से कहा िक वे सामाय तरीके से इसे बनने दे. लगभग तीन माह बाद पासपोट मेरे हाथ म था और म अब देश से बाहर जाने के िलए अिधकत था. ी मानसजी से मेरा सपक बराबर बना हआ था. सयोग से वे वष 2011 म सात िदवसीय ( 1 से 7 फ़रवरी) काय म तय कर चके थे,िजसक सचना उहने ईमेल के जरए तथा फ़ोन पर दे दी थी. इस तरह यह पहला मौका था जब म भारत के बाहर िकसी अजनवी धरती पर अपना कदम रख रहा था. सारे काय म अपने िनधारत समय के अनसार सानद सपन होते रहे. एक लबा अरसा बीत गया है,लेिकन वे सारी याद अब भी मन-मि तक पर जस क तस अिकत ह. इस आयोजन के बाद आपक सथा ने ताशकद, सय अरब अमीरात, कबोिडया-िवयतनाम आिद देश क या ाए क और िहदी के चार-सार और उनयन के िलए अनठे काय म िकए. हालािक म इन देश क या ा भले ही नह कर पाया लेिकन मेरे दो अिभन िम ी आर.एम.आनदेवजी और डी.पी.चौरिसयाजी ने बराबर इसम भाग लेकर िजले क शान बढाई है. आधारिशला के सपादक-िम ी दीवाकर भ जी थाईलै ड या ा म मेरे सहया ी रहे ह. आपने भी िहदी के उनयन और सवधन म अनेक देशॊं क या ाएँ क ह, मझसे लगातार साथ चलने का आह करते रहे ह और समय समय पर फ़ोन से ईमेल के जरए काय म क परेखा भेजते रहे ह,लेिकन या ा म लगने वाली बडी रािश का जटाना एक सेवािनव कमचारी के िलए असभव सा तीत होता रहा. इस बीच “अयदय बहउ ेशीय सथा, वधा िजसके सर ाक ी वैदयनाथ अयरजी तथा सथा के महासिचव-सयोजक ी नरे दढारेजी का प ा हआ. ी दढारेजी वतमान समय म रा भाषा चार सिमित,वधा म कायरत ह और समय-समय पर आपसे वधा म होने वाले काय म म तथा िहदी भवन भोपाल म भट होती रही है, ने दरभाष पर मझसे चलने बाबद अनरोध िकया. थम आह म ही मने उनसे प सकेत दे िदए थे िक खच क अिधकता को देखते हए मेरा जाना सभव नह है. ी दढारेजी के फ़ोन लगातार आते रहे. एक िदन मने उस प क एक फ़ोटॊ-ित िहदी भवन भोपाल भेजते हए सथा के म ी-सचालक मान. ी कैलाशच पतजी से िनवेदन िकया िक हम अपने तर पर िहदी के चार-सार म काय तो कर ही रहे ह लेिकन हम इतने स म नह ह िक मारीशस जैसे सदर देश क या ा कर सक. िनवेदन म यह भी मने जोडा िक यिद िहदी भवन इसम हम कछ आिथक सहायता दान करती है, तो बाक क रकम का हम इतजाम कर लगे. इस समय मारीशस या ा के िलए िछय र हजार पय का खच बतलाया गया था. िहदी भवन भोपाल का एक प आया, िजसम देश के सभी सयोजक से यह पछा गया िक या वे पासपोट धारक ह? इसका जवाब मने िलख भेजा और अपने सािथय के नाम िलख भेजे ,िजनके पास अपने पासपोट उपलध थे. माह माच क इकस तारीख को मझे भोपाल म आयोिजत िमिटग म जाना था .िमिटग म मने अय ताव के साथ इस ताव को भी रखा, जो बाद म इस आशय के साथ वीकत हआ िक वतमान म िहदी भवन ट देश के पाँच सयोजक को प चीस-पचीस हजार पया बतौर अनदान देगी. इतनी बडी रकम अनदान म वीकत हो जाने के बाद मने मारीशस जाने का मानस बनाया और ी गोपाल दढारेजी के खाते म तीस हजार पया जमा करवा िदए, जो बतौर रिज े शन के िदए जाने थे. शेष रकम तीस जनवरी 2014 तक जमा करना था. म यहाँ प बतला दँ िक यिद िहदी भवन टट मझे यह रािश वीकत नह करता तो शायद ही म वहाँ जा पाता. म आभारी हँ मान. ी पतजी का और िहदी भवन टट का,िजनके िवशेष सहयोग से म यह या ा कर पाया. ी दढारेजी ने अपने परप म प कर िदया था िक सभी यि य को मबई तक अपने वय के खच पर आना-जाना होगा. समय पया था, सो मने दरतॊ से अपनी जाने और आने क सीट आरि त करवाली थी. ात हो िक दरतॊ नानटाप े न है, जो नागपर से छपित िशवाजी टिमनल तक ितिदन राि के आठ बजे रवाना होती है और मबई से नागपर के िलए राि आठ बजे खलती है. सथा सिचव ी नमदा साद कोरीजी ने मेरी तैयारी को देखते हए अपना मानस बनाया िक वे भी इस या ा म शािमल हो सकते है. इस समय तक आपके पास अपना कोई पासपोट नह था. पनः हम ी बकल पडयाजी के पास थे और आवयक दतावे ज के साथ पासपोट बनाने के िलए आन लाइन आवेदन तत कर रहे थे. पासपोट कायालय भोपाल म ी कोरीजी के माह मई क िकसी तारीख को उपिथत होना था, जो हमारे अपने समय सारणी से मेल नह खाता था.. सो उह ने एस.डी.एम से सपक साधने क कोिशश क. यह समय लोकसभा के चवान का समय था और ऎसे समय म िकसी शासकय अिधकारी से िमल पाना सभव भी नह था. सयोग से मने इटरनेट के जरए िनयम क जानकारी ा क िक िकसी मेजर अथवा कायालय मख के हता र से तकाल पासपोट बनवाया जा सकता है. सयोग िक ी कोरीजी के दामाद मेजर के पद पर कायरत ह, सो उह ने तकाल आवयक दतावेज हता रत कर भेज िदए और बक मैनेजर ने भी हता र कर िदए, आन लाइन आवेदन भेज िदया गया. पासपोट कायालय ने कोरीजी को आवेदन क ितिथ से दो िदन बाद उपिथत होने एव आवयक द तावेज लाने का िनदश िदया. कोरीजी वहाँ उपिथत हए और वे घर भी नह पहँच पाए थे िक पासपोट अिधकारी ने पासपोट बनाकर रिज ी डाक से भेजने बाबद मैसेज उनके मोबाईल पर दे दी. इस तरह ी कोरीजी इस अिभयान म मेरे सहया ी बने. इस रोमाचक या ा को सपन कराने का िजमा मिह ा े वल, मबई ने िलया था. नागपर म इस े वल क एक शाखा काम कर रही है. या ा सचा प से सपन हो, इस आशा और िव ास के साथ नागपर के ी वपिनल वा केजी एव स ी नीतिसह भी इस या ा के सहभागी बने. मारीशस के हवाई जहाज क लाइट एम.के .747, थान ितिथ 23-05-2014 क सबह 0645 तथा वापसी 29-05-2014 लाइट एम.के .748 रात के 2120 बजे क थी, िटकट भेज दी गई. ात हो िक मारीशस समय और भारतीय समय म एक घटा ब ीस िमनट का फ़क रहता है. यिद भारत म िदन के आठ बजे ह तो मारीशस म सबह के 06.28 बज रहे होते ह. दरतो िहचकौले खाती हई अपनी िनधारत गित से भागी जा रही थी. नद देर रात तक आँख से आँखिमचौनी खेलती रही और िफ़र चपके से, न जाने कब, आकर समा गई, पता ही नह चल पाया. मेरा और कोरीजी के कोच अलग-अलग थे यिक उहने अपनी बथ का आर ण िकसी अय ितिथ म िकया था. बडी सबह आकर उहने ने मझे जगाया और कहा िक हम मबई के करीब पहँच चके ह. कछ समय बाद हम छपित िशवाजी टिमनल टेशन पर जा पहँचे. दरतो ( नानटाप)नागपर से रवाना होकर सीधे मबई सीएसटी पहँचती है. यहाँ उतरने के बाद ी कोरी िटिकटघर पहँचे. वहाँ से उहने दादर का िटिकट िलया और अब हम उस ओर बढने लगे .दादर टेशन पर पहँचने के बाद हमे बडी बेस ी से ी सतोष प रहार का इतजार था,जो िकसी अय े न से बरहानपर से आ रहे थे. कछ इतजारी के बाद उनसे भट हई. हमने सबने चाय पी और दादर म एक कमरा बक करवाया. नहाने के बाद कोरीजी और म “एिलफ़ै टा केव” देखने के िलए िनकल पडॆ. परहारजी ने इसम अपनी असहमित जताते हए सचना दी िक वे हमारे साथ नह जा पाएगे, यिक परी रात वे ढग से सो नह पाए थे. दादर टेशन से हम पनः सी.एस.टी. पर थे. कभी यह इमारत िवटोरया टिमनल के नाम से जानी जाती थी. बाद म सन 1996 म इसका नाम बदलकर सीएसटी याने छपित िशवाजी टिमनल कर िदया गया. सन 1887 म ि िटश वा तकार े डरक िविलयम टेवस म इस भय इमारत का िनमाण करवाया था. वहाँ से बाहर िनकलते ही हम रा य परवहन क बस िमल गयी जो गेट-वे-आफ़-इिडया जा रही थी. गेट-वे-आफ़-इिडया यहाँ से करीब 2.5िकमी क दरी पर है. सागर के तट पर इस भय इमारत का िनमाण जाज पचम तथा ि वन थम आगमन माच 1911 क याद म बनाया गया था. इसक सन 1914 म श हआ और यह सन 1919 म बनकर तैयार हो यहाँ से करीब दस िकमी क दरी पर “एिलफ़ै टा केव” िथत है, सहायता से जाया जा सकता है. पाचवी से आठव शता दी के मय पहाड को छेनी-हतौडी अथवा अरब मेरी के िनमाण गयी. बोट क अय उपकरणॊं क सहायता से इसे अनाम यि य ने बनाया, इसे देखकर सहज ही अदाजा हो जाता है िक इसका िनमाणकता िनि त ही भ-गम वै ािनक रहा होगा, िजसने पहाड के मय एक ठोस च ान को ढँढ िनकाला और अपनी कला को दिशत कर सका. यहाँ िहद धम से सबि त अनेक िशव मितय को िविभन म ाओ म देखा जा सकता है. इह धारापरी ची लेणी के नाम से भी जाना जाता है..यह कभी कोकण मौय क ीप राजधानी हआ करती थी. बाद म आमणकारय ने इन शानदार मितय को बडी बेरहमी से तॊड-फ़ोड डाला. अपने समय म ये मितयाँ िकतनी सदर और वैभवशाली रही हगी,इसका अदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. शाम ढलने से पहले हम लौट आए थे. राि का खाना खाकर हम टै सी ारा छपित िशवाजी अतररा ीय हवाई अडडा जा रहे थे. िव का अडतािलसवाँ एव ,यारह हजार साठ हे टेयर म फ़ैले इस िवशाल इटरनेशनल एअरपोट का पराना नाम इटरनेशनल एअरपोट था, िजसे बदलकर छपित िशवाजी अतररा ीय हवाई अडडा कर िदया गया. अपनी भयता और सदरता के िलए यह एअरपोट िव का तीसरा एअरपोट है. इसक आधारिशला सन 2006 म रखी गई थी, 2013 म बनकर तैयार हआ .िकसी नाचते हए मोर क आकित म बना यह हवाई-अडडा सहज ही म आपका यान आकिषत कर लेता है. मय राि तक अलग-अलग देश से आने वाले लोग यहाँ पहँच चके थे. िवमान म सवार होने के पहले काफ़ कछ िकया जाना होता है. मसलन आपके सामान का वजन, याि य के सीट का िनधारण आिद िनपटाते-िनपटाते काफ़ समय लग जाता है. अब सारे या ी अदर लाउज म बैठकर उस घडी के अतजार म रहते ह,जब उह िवमान म सवार होना होता है. सबह के पाच बजने वाले होते ह. राि का गहन अधकार अब िपघलने लगता है और बाहर का िदलच प नजारा िदखाई देने लगता है. इस ओर से उस छोर तक कई िवमान पि ब खडॆ िदखाई देने लगते है. वह समय भी शी आ पहँचा जब हम िवमान म सवार होने जा रहे थे. मारीशस के िवमान माक MK-748 म मझे 15 G वाली सीट िमली.ठीक मेरी बगल म ी कोरीजी क सीट थी, जहाँ लगी िखडक से बाहर का नजारा देखा जा सकता था. कोरीजी िक यह पहली िवमान या ा थी. अतः वे काफ़ फ़ि लत नजर आ रहे थे. तभी पायलट क आवाज गजती है और सभी से कहा जाता है िक वे अपनी-अपनी सीट-बे ट बाध ले. वह समय भी आ पहँचा,जब िवमान चलते हए अपने रन-वे क ओर बढ रहा था. अपने थान पर पहँचने के बाद उसके सारे इिजन अपनी परी र तार के साथ चलायमान होते ह..थॊडी देर तक रनवे पर दौडते रहने के बाद िवमान आकाश म उड रहा था. श-श म नीचे के य िदखलाई पडते ह,बाद म केवल और केवल नीला आकाश नजर आता है. िखडक से िवमान का डैना (पख) भर िदखाई देता है. हवाईजहाज करीब पचीस हजार फ़ट क उँचाई पर उड रहा था. नीचे तैरते काले-कलसीले बादलॊं क परत िदखलाई देती और िदखलाई देती दर-दर तक फ़ैली दो नीली प याँ के बीच बनती एक गहरी नीली प ी जो सम और आकाश के बीच के िमलन के गाढ सबध को दशाती है. ऊपर से कछ ऐसा िदखाई देता है मारीशस मारीशस का नशा----- इस बीच एअर हो टेज सभी याि य को बारी-बारी से भोजन, पानी क बोतल आिद सव करती ह. जैसे-जैसे राि का पहर आगे बढता है, कछ हक सी ठड भी लगने लगती है. सभी याि य क सीट पर हका कबल होता है, िजसका वह इतेमाल कर सकता है. हवा के झको पर तैरता िवमान छः घटॆ क लबी उडान के बाद मरीशस एअर-पोट पर उतरता है. मारीशस समय के अनसार िदन के यारह बज रहे होते ह. िवमान से बाहर आने पर याि य को एअरपोट क सारी औपचरकता परी करनी होती है,जो काफ़ लबे समय तक चलती रहती है. या ी अब एअरपोट के लबे रा ते को पार करता हआ बाहर आता है. अब उसे अपने सामान क िचता सताती है. च के आकार म घमते बे ट पर या ी का सामान जा पहँचता है. बाहर एक या ी बस हमारे इतजार म खडी थी. बस म सवार होकर अब हम अपने िनधारत होटल कालोडाईन सर मेर क ओर रवाना होते ह, जो यहाँ से 73.1 िकमी क दरी पर है. िदन के करीब तीन बज रहे थे और सभी को जमकर भख लग आयी थी. रा ते म पडने वाले “डे ही ताज” होटल म हमने वािद भोजन का आनद िलया. मोका और मारीशस क राजधानी पोट-लई से गजरती हई हमारी बस कालोडाईन सर मेर होटल के ागण म आकर क जाती है. इस या ा मे करीब देढ घटे का समय लग जाता है. सभी याि य के अपने-अपने कमरे िनधारत कर िदए गए थे. होटल डे ही ताज के सामने ी सतोष पारहार,शरद जैन और यादव (२)कोलाडाईन सर मेर होटल शरीर म आलस और थकान के ल ण प देखे जा सकते थे. ायोजक ने पहले से ही तय कर रखा था िक इस िदन केवल आराम िकया जाना है..अतः(23-05-2014) को सभी ने िव ाम िकया. मारीशस म गने क खेती बडॆ पैमाने पर होती है. चार तरफ़ छाई हरयाली देखकर मन सनता से झम उठता है. आय का म य ोत गना ही है. होटल कालोडाईन सर मेर (calodyne Sure Mer) म वेश करते ही तबीयत खश हो जाती है. चार तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पॆड, सघन हरयाली,,और इन सब के बीच चौरासी सटस, हर सट के सामने बागीचा,और इन सबके मय म एक तरणताल. पास ही लहराता-बलखाता सम , िनरतर बहती शीतल हवा के झके आपके शरीर िलपट-िलपट जाते ह. सारे कमरे एसीय . येक सट म तीन शयन-क , एक हाल, हाल से लगा िकचन. पाँच लोगो का परवार एक सट म क सकता है. रात को को सभी ने लजीज खाने का आनद उठाया और अपने-अपने कमर म समा गए.सोने से पहले सभी को सिचत कर िदया गया था िक सबह सभी आठ बजे के पहले तैयार होकर चाय-ना ता करने के बाद “आस सस”(Aux Cerfs) माने एक टाप पर जाने वाले है. हम इस टाप पर जाने से पहले मारीशस के बारे म सि जानकारयाँ लेते चल तो अछा होगा. गणरा य अ क महा ीप के तट के दि ण-पव म लगभग 900 िकलोमीटर क दरी पर िहदमहासागर म और मेडागा कर के पव म िथत एक ीपीय देश है. मारीशस ीप के अितर इस गणरा य म सट ै डन,राडीगाज और अगालेगा ीप भी शािमल है. दि ण-पि म म 200 िकमी पर िथत फ़ासीसी रीयिनयन ीप और 570 िकमी उ र-पव म िथत राडीगज ीप के साथ मारीशस म कारेने ीप समह का िहसा है. मारीशस क िमि त सकित है.,िजसका कारण पहले इसका ास के अिधन होना तथा बाद म ि िटश वािमव म आना है. पतगाली नािवक पहले पहल यहाँ 1507 म आए. बसे और छोड कर चले गए. 1598 म हालड के तीन पोत जो मसाला ीप क या ा पर िनकले थे, एक च वात म फ़सकर यहाँ पहँचे. उहने इस ीप का नाम नासाओ के यवरात “मा रस” के नाम पर इस ीप का नाम “मारीशस “रखा सन 1668 म डच लोगो ने थायी बि तयाँ बसाई.और िफ़र कछ समय के अतराल म इस ीप को छॊड िदया. फ़ास िजसका पहले से ही इसके पडौस “आइल बोरबोन” ीप पर िनयण था, ने 1715 म िफ़र से मारीशस पर कजा कर िलया. इस तरह यह ीप एक सम अथयवथा के प म िवकिसत हआ जो चीनी उपाद पर आधारत थी. मा रशस ने 1968 म वतता ा क और सन 1992 म एक गणत बना .मारीशस एक ससदीय लोकत है,िजसक सरचना ि टेन क ससदीय णाली पर आधारत है. यहाँ िथर लोकत है. चनाव पाच साल म िनयिमत और वत होते ह यह नौ िजल म िवभािजत है. सन 1834 म भारत से 70 याि य का जथा यहाँ िगिमिटया मजदर के प म पहँचा. 1834-1930 तक यहाँ चार लाख पचास हजार भारतीय मल के लोग पहँचे, िजसम 52 ितशत िहद,15 ितशत मसलमान तथा 25 ितशत ईसाई तथा अय जाितके लोग आए. सन 1886 तक इन भारतीय़ॊं का लोकताि क चनाव म भाग लेना विजत था. बाद म सन 1901 म महा मा गाधीजी का यहाँ आगमन होता है. वे नौशेरा जहाज पर सपरवार यहाँ कछ िदन के थे. उसके बाद से भारतीय का राजनीित म वेश हआ और इस तरह 1948 म25 म से 19 भारतीय िनवािचत हए. यहाँ िक अिधका रक भाषा अ े जी है. िमिडया क भाषा फ़ासीसी है.लेिकन थानीय़ बोली “ े योल”(CREOLE) म जनसाधारण लोग बात करते ह. चिक यहाँ के लोग मलप से भारतीय ह,अतः वे आपस म िहदी ही बोलते है. सारे लोगो के नाम भी भारतीय प ित से रखे जाते ह. यहाँ पर िस “गगा तालाब” और अनेक मिदर, मिजद,पगोडा आिद देखे जा सकते ह. यात लेखक ी िगरराज जी ने िगरिमिटया मजदर पर एक उपयास िलखा िजसका नाम “पहला िगरिमिटया” है,िजसम भारतीय मल के लोग पर िलखा गया िस उपयास है.इस उपयास के कछ अश पढने के बाद मन म एक िज ासा जागती है और म इस मौके के तलाश म बना रहा िक देर-सबेर ही सही, म इस ीप क या ा जर कँ गा. “ “आस सस”(Aux Cerfs) यह िव का सबसे सदरतम ीप है िजसे “धरती पर वग” के नाम से जाना जाता है. मारीशस के पव तट पर यह ीप “flacq िजले म िथत करीब 100 हे टयर म फ़ैला हआ है. “पने” के स य िदखाई देने वाले इस ीप के िछछले रेतीले िकनारे, वछ िनमल जल, िजसम गहराई तक देखा जा सकता है, िकनार पर मगे के स य चमक ले पथर, कह कह एकदम काले प थर के बीच लहलहाते सागर का प देखते ही बन पडता है. इसके तट पर अनेक रे टारट देखे जा सकते ह. यहाँ 18 गो फ़ कोस के मैदान देखे जा सकते है.इसके िकनारे पर अनेक देश के लोग सैर करने के िलए आते ह. यहाँ पानी म खेले जाने वाले अनेक गेम खेले जाते ह. यह ीप सम-तट से यह करीब 4-5िकमी क दरी पर है. यहाँ पहँचने के िलए आपको बॊट का सहारा लेना पडता है. रा ते म िछटॆ-छोटे िनजन ीप, सघन जगल से आ छािदत िदखलाई देते ह. आ य तो उस समय होता है जब हम लबे सैर-सपाटे के बाद सम तट पर पहँचे तो हमने िछ दवाडा के याितलध वकल ी िसरपरकरजी से हमारी भट हो जाती है. वे भी अपने पारवरक िम के साथ यहाँ आए हए थे. एक अजनबी टाप पर जब अपने िकसी थानीय यि को देखते ह तो सनता का पारावार बढ जाता है. ( िच माक 4 म वे हमारे बीच उपिथत ह) सबह के आठ बज चके ह. हाटेल कालोडाईन सर मेर के ागण म तीन बस लगाई जा चक ह. गाईड स ी ेताजी सभी को बस म बैठ जाने का आह करती ह. बारी-बारी से लोग आते जाते ह और अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाते ह. एक बस म ेताजी, दसरी म स ी नीतिसह,और तीसरी म ी वपिनल बतौर गाईड के सवार हो जाते ह. दर-दर तक फ़ैले गने के खेत के बीच म से बस, अपने गतय माने मारीशस क राजधानी लोट-लइस क तरह बढने लगती है. बेहतरीन सडक,भय आलीशान इमारत,के बीच से गजरती हई हमारी बस िनरतर आगे बढती है. (राजधानी पोट लइस का िवहगम य) उ र-पव म िथत “पोट लइस” मारीशस क राजधानी है. यह आिथक, साकितक तथा राजनीित का मख के है. यहाँ का शासन मिनिसपल काउिसल के ारा सचािलत होता है. उस समय के तकालीन गवनर बड कोइस माहे िद ला बोडनाइस( Bertrand Francois Mahe de la Bourdonnais) ने तकालीन शासक लइस XV क मित म सन 1735 म इस शहर क आधारिशला रखी थी .एक आकडॆ के मतािबक यहाँ क जनसया 148001 है. Place d’ Arms म य सडक के दोनो ओर पाम व देखे जा सकते है. यह सडक काफ़ सकरी है.अतः यहाँ काफ़ भीड देखी जा सकती है. यहाँ के म य बदरगाह के िकनारे तमाम सरकारी कायालय, Ministry of Tertiary Education, Science, Research and Technology Ministry of Education, Culture and Human Resources Human Resource, Knowledge and Arts Development Fund Human Resource Development Council Mauritius Qualifications Authority, दतावास तथा च कालोिनयाँ है.. चिक सारे सरकारी द तर यहाँ पर है, अतः िदन म आने के िलए सल माकट या कै प िद मास(champ de Mars)के पास िथत रेसकोस से आना होता है. राि म यह सवसाधारण के खला रहता है. सिचवालय हो अय सरकारी इमारत हो, उसके ागण म आप आराम से घम-िफ़र सकते ह. न कोई रोकटोक करने वाला होता है और न ही कोई मशीनगन वाला यहाँ िदखाई देता है .सब लोग शाित के साथ यहाँ से आना-जाना करते ह. सडक ह या िफ़र समचा शहर कचरा कडे के ढेर आपको िदखाई तक नह देते. समचे शहर मे वाहन क गित धीमी रहती है. एक खास बात यह िक इस राजधानी क सडक म चाहे भीड रहे अथवा नह रहे हान बजाने पर स मनाही है. सब लोग शाित के साथ िबना िकसी कार क हजत िकए आराम से अपने वाहन चलाते हए आगे बढ जाते ह. दसरी आय क बात यह िक यहाँ न तो चौराहे पर कोई पिलस कम िदखाई देता है और न ही सडक के िकनारे. मारीशस क आिधकारक भाषा अ े जी है, इसिलए सरकार का सारा शासिनक कामकाज अ े जी म होता है. िश ा णाली म अ ेजी के साथ ासीसी का भी इतेमाल िकया जाता है. ासीसी भाषा हालािक मीिडया क मख भाषा है चाहे सारण हो या मण इसके अलावा यापार और उ ोग जगत के माममॊं म भी म यतः ासीसी ही योग म आती है. सबसे यापक प म देश म मारीिशयन “ े योल” भाषा बोली जाती है. िहदी भी एक बडॆ वग ारा बोली व समझी जाती है. मारीशस म िविभन धम के लोग रहते ह, िजनमे िहदॊ धम 52%, ईसाई धम 27% और इलाम 14.4. एक बडी स या नाि तक लोगो क भी है. Caudan waterfront= िवशाल सम के तट पर िथत यह भीड-भाड वाला इलाका है. यहाँ तरह-तरह क दकान, कै िसनो, िसनेमाघर,रे टारट, कैश-एसचज करने के िलए अनेक दकाने देखी जा सकती ह. म य सडक पर एक दकान “abbey royal finance ltd के डायरे टर ी एस.नागवाह से मेरी मलाकात होती है. िलन-शेव, मकराती आँखे देखकर मझे लगा िक इनक दकान से मारीशस के छोटे नोट तथा कछ िच लर िमल सकती है. यह मा एक अदाज था. मने उनसे नमकार करते हए पछा िक या वे िहदी जानते ह? उहने तपाक से हाथ िमलाया और अपना प रचय देते हए कहा िक उनके पवज िहदथानी ही थे, उनक आमीयता देखकर मझे बडी स ता हई. मेरे िलए यह पहला अवसर था िक म वहाँ के िकसी थानीय यि से बात बात कर रहा था. उहने न िसफ़ हम अदर बलाया, बि क ऊपर बने छ जे पर भी ले गए. दकान छॊटी ीनागवाहजी के साथ होने क वजह से ऊपर भी जगह कम थी,लेिकन उस जगह म अलमा रयाँ भी रखी थ,िजनमे िहदी क किकताब भरी पडी थी. एक छोटे से टेबल पर कयटर भी रखा हआ था. बैठ चकने के बाद उहने पानी िपलाया और चचा का दौर चल पडा. कयटर खोलकर मने rachanakar.org “रचनाकार” म कािशत मेरी कहािनयाँ, आलेख और किवताएँ िदखलाया. यह सब देखकर उह अयत स ता हई. िदनाक 27 मई 2014 िदन मगलवार 26 मई 2014 म हमने टामारड जलपात(Tamarind waterfall), - ाऊ आस सस(Trou aux cerfs)तथा चामरेल कलड अथ(chamarel coloured earth) का मण िकया था, िजसके मोहक स मोहन से अभी हम उभर भी नह पाए थे िक राि के लगभग आठ बजे ी राजनारायण ग ीजी ( कला एव साकितक म ालय म सलाहकार), ीमती अलका धनपतजी (वर ा यापक महा.गाधी सथान) का आगमन होता है. रा पित भवन के स से ा जानकारी देते हए आपने बतलाया िक मारीशस के रा पित महामिहम मान. ी कैलाश यागजी ने मलाकात के िलए दोपहर एक बजे का समय िनधारत िकया है. िनि त ही यह खबर पाकर हम फ़ि लत थे और अपने आपको गौरवािवत महसस कर रहे थे िक हम देश के थम पष से मलाकात करने का सअवसर ा होने जा रहा है. .काय म क परेखा बनाई जाने लगी. इसम यह तय िकया गया िक हम सबह शी तैयार होकर पहले महामा गाधी सथान (मोका) जाएगे और सथा क िनदेशक डा ीमती ही.डी.कजलजी से तथा वहाँ कायरत सभी ा यापक से मलाकात करगे. इस काय म क परेखा ीमती अलका धनपतजी ने पहले से बना रखी थी. सबह आठ बजे हम सबने चाय और ना ते का लत उठाया. होटेल के ागण म बस लगाई जा चक थी. हम ठीक नौ बजे मोका के िलए थान करते ह. हरी- भरी वािदय के बीच से सरपट दौडती हमारी बस महामा गाधी सथान के ागण म वेश करती है. महामा गाधी सथान क आधारिशला भारत क तकालीन धान म ी ीमती इिदरा गाधीजी तथा मारीशस के तकालीन धानम ी ी िशवसागर रामगलामजी ने 3 जन 1970 म रखी थी. .इसी के साथ ही िव किव ी रवी नाथ टैगोर सथान क भी थापना क गई थी िजसम भारतीय कला, सकित, सगीत,नयकला आिद का समावेश िकया गया था. इस सथा म सभी भारतीय भाषाओ के पाठय म श िकए गए ह,जो हम सभी के िलए गौरव का िवषय है. कछ चिनदा िम को साथ लेकर ीमती अलका धनपतजी ने सथा क िनदेशक डा. ीमती कजलजी से मलाकात करवाई. ( बाए से दाए=गोवधन यादव,सतोष प रहार, ी अयरजी,,डा.गधारे जी , ीमती कजल(िनदेशक),बदेलेजी.कोरीजीएव ी मफ़तलालजी ) इस मलाकत के दौरान मने अपना कहानी सह “महआ के व ”, तथा ,तीस बरस घाटी, ी कैलाश पतजी ( म ी सचालक िहदी भवन भोपाल)क िकताब सकार,सकित और समाज, ीयत कणकमार यादवजी( िनदेशक “डाक” इलाहाबाद) क पतक सोलह आने सोलह लोग, अिभलाषा(काय सह) जगल म ि केट तथा ीमती आका ा यादव क चाद पर पानी (दोनो बालगीत) इस िनवेदन के साथ दी िक वे कपया इन िकताब को अपने सथान के वाचनालय म थान दगी.. ी सतोष प रहारजी ने भी अपना उपयास “रगरेजवा” क एक ित दी. उहने आासन िदया िक सारी िकताब वाचनालय म रखी जाएगी जो मारीशस के लोगो को आपसे जोडॆ रखने के िलए “सेत” का काय करग एक बडॆ हाल म मोका के सभी ा यापकगणॊं से हमारी मलाकात करवाई गई. एक के बाद एक ा यापक सामने आता और अपना परचय देता .सभी के मन म एक अजीब सा उसाह था. उसाह इस बात को लेकर िक उनके पवज भारत से ही यहाँ आए थे. इसी म म मण-दल का एक-एक यि सामने आता और अपना परचय देता. अपना परचय देते, हए अत म मने रा भाषा चार सिमित, िहदी भवन भोपाल के म ी-सचालक ी कैलाशच पतजी तथा वधा सिमित से इस या ा के सयोजक ी नरे डढारेजी के ित आभार य िकया और कहा िक आपके अथक यास से यह या ा सभव हो पाई है. म आभारी हँ डा. अलका धनपत का, िजहने इस मलाकात के काय म क परेखा बनाय. मझे अयिधक सनता इस बात को लेकर भी हो रही है िक म अपने िहदथानी भाईयो और बहनो से िमल रहा ह, जो िहदी के उनयन और चार-सार म अपना योगदान दे रहे ह. आप लोगो क िमलनसारता, सदयता, सहजता और सरलता देखकर मझे यह कभी महसस नह हआ िक म भारत से बाहर मारीशस म रह रहा ह” काय म के समापन के प ात वहाँ वपाहार तथा चाय क यवथा क गई थी. सभी ने साथ िमलकर (१) रा पित भवन के म य क म िशमडल (२) क म बाए से दाए ी िवकास काले,सतोष प रहार,गोवधन यादव, ाचाय पडॊडॆजी आिद (३) ी शरद जैन (दाय ओर) चाय और ना ते का आनद िलया. समय अपने पख फ़ैलाए तगित से उडा चला जा रहा था. िदन के साढे बारह कैसे बज गए, पता ही नह चल पाया. अब हम रा पित भवन क ओर रवाना होना था. वहाँ पहँचने के बाद हमसे कहा गया िक अदर जाने से पहले अपने-अपने मोबाईल तथा कैमरे बाहर रख द. ऎसा करने के बाद हमने एक आलीशान-ससि जत हाल म वेश िकया. दोनो ओर करीने से किसयाँ लगी हई थ. सभी के मन म अपार स ता के साथ उसकता भी थी िक उनक मलाकात मारीशस के रा पित महामिहम ी कैलाश यागजी से होने जा रही है. माननीय महोदय के आने से पव हाल म उपिथत यात सािहयकार एव रा पितजी के सलाकार ी राज हीरामनजी िदशा िनदश दे रहे थे. आपके अलावा हाल म पिलस के दो उच अिधकारी तथा एक गनमैन उपिथत था. मझे ही नह, ायः सभी के मन म यह जर तैर रहा होगा िक काश वे भारत के रा पितजी से िमलने जाते तो वहाँ का नजारा कछ और ही होता. बडॆ-बडॆ आला-अफ़सर, सगीनो से लैस पिलस के अिधकारी वहाँ तैनात होते और बारी-बारी से सभी क गहन तलाशी ली जाती. तब कह जाकर वे हाल म वेश कर पाते. लेिकन यहाँ का नजारा कछ और ही था. वेश- ार पर न तो िकसी क तलाशी ली गई और न ही उह सदेह भरी ि से देखा गया. बस इतना जर कहा गया िक वे अपने कैमरे और मोबाईल एक टेबल पर रख द, और हाल म शाित के साथ बैठ जाएँ. सभी क िनगाह उस िवशाल दरवाजे पर िटक हई थ, जहाँ से माननीय महोदयजी का आगमन होना था. ठीक एक बजे वह दरवाजा खलता है. महामिहम उससे िनकलकर अपने िनधारत थान क ओर बढते ह.आपके आगमन के साथ ही हाल म उपिथत सभी अिभवादन क म ा म हाथ जोडकर खडॆ हो जाते ह. वे मकराते हए आगे बढ जाते ह और सभी का अिभवादन कर अपनी कस पर िवरािजत हो जाते ह. उनका सौ य यि व और चेहरे पर छाई सनता का उ े ग देखकर मन गदगद हो उठता है. ी राज हीरामनजी, महामिहमजी को सबोिधत करते हए, हम लोगो के आगमन और योजन के बारे म बतलाते ह. और अयत ही िवन ता के साथ िनवेिदत करते हए कहते ह िक भारतीय िश मडल आपका वागत करना चाहता है. आपक वीकित पाकर अयदय बहउ े शीय सथा, वधा के अय ी वै यनाथ अयरजी महामिहम को शाळ ओढाकर ीफ़ल भट म देते ह. उसके बाद सथा के महासिचव-सयोजक ी नरे द ढारेजी महामिहम को पप-माला पहनाकर अिभनदन करते ह. इसी म म ी सतोष प रहारजी अपनी एक कित महामिहम को समिपत करते ह इस अिभनदन समारोह के प ात ी हीरामनजी महामिहमजी से िनवेदन करते हए अननय करते ह िक वे िशमडल को सबोिधत कर. महामिहमजी ने िश मडल का वागत करते हए भोजपरी म अपना सि उदबोधन देते हए िहदी के उनयन और चार-सार के िलए िनरतर यास करते रहने के िलए आह िकया. आपके ओजवी उ ोधन के प ात ी हीरामनजी ने आपसे अनरोध करते हए कहा िक िशमडल आपके साथ फ़ोटो प लेना चाहता है. आपने िकतनी सहजता के साथ वीकित दान कर क, यह बात हमारे सबके मन को फ़ि लत कर गई. महामिहम रा पितजी के साथ िश मडल आज मगलवार है. िनि त ही आज का िदन हम सबके िलए मगलकारी िस हआ िक हमारी मलाकात मारीशस के रा पित महामिहम ी कैलाश यागजी के साथ हई. इससे पव हमारी मलाकात उन िहदी सेिवय से हई जो महा मा गाधी सथान से जडकर गौरवगाथा िलख रहे ह. रा पित भवन के ागण के य पोट लईस के कछ िच ( १ से ९ ) सकरे रा ते म िथत एक होटल म ( अब नाम याद नह) हमने खाना खाया,( िच-१) िजसके वेश- ार पर छतरयाँ तनी हई थी. सडक के बाए तरफ़ सगीतकार क एक टोली अपने म मगन, वा-य पर सरगम छेड रही थे.(िच-२) अपने चेहरे पर रगिबरगी आकित और कपडॊं पर भी आकित काढे यह अनाम यिक ने मेरे लाख यास करने के बावजद अपनी तवीर नह उतारने दी. जब भी म उसक ओर अपना कैमरा करता, वह मकराते हए अपना चेहरा दसरी ओर मोड लेता था. जब वह पास से गजर रहा था, तब भी उसने वही हरकत क. जब वह थोडा आगे बढा तो मने उसक यह तवीर अपने कैमरे म कैद कर िलया (मारीशस के यशवी लेखक ी रामदेव धरधरजी ने बतलाया िक इनको “कओल”कहते ह इन लोगो को अ का से मजदरी करवाने के िलए यहाँ क तकालीन सरकार ने लाया था,लेिकन ये कामचोर िनकले.(िच-३) पास ही म मारीशस के यशवी धानम ी व. ी िशवसागर रामगलाम क आदमकद ितमा थािपत क गई है.(िच-४) बदरगाह पर अनेक छोटे-छोटे जहाज लगर डाले हए थे. हमने इह अपने कैमरे म कैद िकया ( िच-५) . पास ही म बदरगाह पर िथत वह जगह है, िजसे “अवासी घाट” के नाम से जाना जाता है,जहाँ कभी भारतीय को ठेके पर अथवा बदी बनाकर खेती करवाने के िलए लाया जाता था. ये िगरिमिटया मजदर कहलाए. जहाज से उतारकर उह (िच-६) इस रा ते से अदर लाया जाता था. (िच -७) यहाँ पर अ ेज रहा करते थे,तथा उनके घोडॆ को रखने के िलए एक अ तबल भी बना हआ है. येक मजदर को एक नबर अलाट िकया जाता,था और उस नबर को दीवार पर िलख िदया जाता था( िच-८). बाद क कायवाही म उस नबर के आधार पर उसक फ़ाइल बनाई जाती थी,िजसमे उसका नाम, थान का नाम, परवार के लोग के नाम आिद दज िकए जाते थे.( इन तमाम द तावेजॊं को मारीशस के सहालय म सरि त रखा गया है.).यह वह थान है जहाँ मजदर को रखा जाता था(िच-९) इस थान को देख लेने के प ात अब हम यिजयम क ओर थान करते ह. हमारे साथ होती ह डा. ीमती अलका धनपतजी, जो महामा गाधी सथान म िहदी क वर ा यािपका ह. वे उस सथान का कोना-कोना िदखलाती ह. इस यिजयम म उन तमाम चीज को बडॆ जतन के साथ सरि त रखा गया ह,िजह मजदर अपने साथ यहाँ लाए थे. काच के बने अलग-अलग को म खाना पकाने के बतन, कपडॆ-ल े , कछ मखौटे, म करते मजदर क झाक, गैती-फ़ावडा, गीता-रामायण, सखसागर कछ वा-य ,आिद करीने से सजाकर रखे ह. कछ को ॊं म उनके रहन सहन को दशाया गया है, और कछ म उनके किठन प र म क झाक तत क गई है. इह ाउड- लोर पर कडी मेहनत के साथ यविथत रखा गया है. इन साब चीझॊं को देखकर लगता है िक . िक िकतनी कडी मेहनत करते हए उहने अपने िदन बेबसी और लाचारी म गजारे थे. अ का मल के भी मजदर यहाँ लाए गए थे,लेिकन वे उतनी कडी मेहनत नह कर पाए. भारतीय मजदर जो यहाँ आकर “िगरिमिटया” कहलाए, उहने मारीशस को वग क तरह बना िदया है. सीिढयाँ चढते हए हम अब ऊपर के क क ओर बढते ह.जहाँ ाचीन थ,लेख आिद को बडॆ मनोयोग से सभालकर रखा गया है. ऊँच कद-काठी के ी देव काहलेसरजी ( Dev Cahoolessur ) जो इस क के मख ह, मकराते हए हम सब का वागत करते है. वे एक-एक चीज पर गहराई से काश डालते हए हम इितहास के उस काल-खड क ओर ले जाते ह, जब भारतीय मजदर एक सौ असी साल पहले गलाम अथवा बधआ मजदर के प म यहाँ लाए गए थे, अपने साथ गीता, रामायण,सखसागर भी लाए थे और कठोर म करने के बाद, मन को तसली देने के िलए इनका पाठ करते और वा य को योग म लाते थे. उन तमाम थॊं को एक बडॆ काच के पेटीनमा क (िच-६) म सभाल कर रखा गया है. दसरे क म मजदर के माई ेशन सिटिफ़केट, रिजटर आिद रखे गए ह और काच के एक कमरानमा क म उस समय का सारा लेखा-जोखा (िच-४) सरि त रखा गया है, िजसम हर यि क बारक से बारक जानकारयाँ उपलध ह. हाटॆल कालोडाइन सर मेर के मािलक ह, मैनेजर ह, या िफ़र वहाँ काम कर रहे अय शाखा-शाखा के कमचारी ह, जब आप उनसे मखाितब होते ह तो उनके चेहरे पर एक सनता का थायी भाव प िखाई देता है. आप जो भी उनसे पछना-अथवा जानना चाह, वे बडी ही िवन ता के साथ आपके साथ वातालाप करते ह और आपक समयाओ को तकाल दर करने का उप म करते ह. और जब आप उनके अतीत के बारे म जानना चाहते ह तो बडी ही आमीयता के साथ बतलाते ह िक उनके पवज भारतीय थे, जो िबहार म रहा करते थे. इस समय उनके गवि के साथ ही उनके मन म िवथापन क जो पीडा रही है, प ही परलि त होती है.इसी कार जब आप ससि जत मेस म पहँचते ह, वहाँ का भी कमचारी आपसे मकराते हए आपका वागत कराता है और खाना खाने के प ात आपसे यह पछना नह भलता िक आपको आज का खाना पसद आया अथवा कोई कमी रह गयी. हर यि िक िवन ता शालीनता और यवहार कशलता िजसमेम कह भी बनावटीपन िदखाई नह देता, देखकर, आप यह महसस ही नह कर पाते िक आप अपने देश से बाहर रह रहे ह. िदनाक 28 मई 2014 मारीशस या ा पर आए हए 120 घटॆ,= 7200 िमनट,= 432000 सेकड कैसे बीत गए पता ही नह चल पाया. हर िदन एक नया िदन और एक नयी रात होती. आँख म मीठे हसीन सपने पल रहे होते. रोज कित के िनत-नतन गार को खली आँख से देख फ़ि लत हो उठता. मन म कई िवचार अगडाइयाँ लेने लगते. साथ या ा कर रहे लोग,पहले तो अजनवी से िमले, िफ़र इतने घलिमल गए, मानो बरस क पहचान रही हो. यह बात अलग है िक या ा क समाि के बाद लोग एक दसरे को िकतना याद रख पाते ह, िकतना नह. लेिकन कल िमलाकर एक परा परवार सा बन चका था. लोग अपनी सनाते, दसर क सनते और इस तरह िदन पर िदन कैसे पख लगाकर उडते चले गए, पता ही नह चल पाया. आज या ा का यह छटवा िदन है. यह खास िदन था हम सबके िलए. आज का िदन भाषणॊं का िदन था, किवता पाठ करने का िदन था. सब अपनी-अपनी तैयारी के साथ आए थे. सभी ने कछ न कछ िलख रखा था सनाने के िलए. इसके साथ ही एक खास बात यह भी जड गई थी िक मारीशस के नामी/िगरामी सािह यकर से मलाकात जो होने जा रही थी. या ा सयोजक ी नरे दढारेजी ने काफ़ समय पव उह ईमेल/प /फ़ोन ारा इस काय म म शरीक होने के िलए आमण दे रखा था. ीमती अलका धनपतजी ( वर ा यािपका ), ी रामदेव धरधरजी ( याितलध सिहयकार), ी राज हीरामनजी ( वसत -तथा रमिझम पि का के वर सहा. सपादक तथा प कार),तथा ी राजनारायणजी ग ी (कला एव सकित म ालय म सलाहकार) से जब-तब मलाकात हो जाया करती थी. वे अपनी उपिथित से काय म क परेखा बनाते और उसम अथक सहयोग दान करते. िदन का यारह बज रहा है. अब हम इतजार था अितिथय के आगमन का. एक के बाद एक आते रहे. नरे भाई उनका भाव-भीना वागत करते. िफ़र अय लोग से िमलते बितयाते और अपने िनधारत थान पर जा बैठते. ठीक यारह बजे काय म. ी वैधनाथ अयर क अय ता म एव ी राज हीरामनजी के म य आितय म श हआ. डा. ीमती वदना दीि त ने मच का कशलतापवक सचालन िकया. वे बारी-बारी से व ाओ को बलाती, वे अपना व य देते ह. चिक व ाओ क सची काफ़ लबी थी और दोपहर के दो बजने वाले थे, भोजन का भी समय हो चला था. अतः ी हीरामनजी के उ ोधन के प ात इस स का समापन करना पडा. ी हीरामनजी ने अपने व य म िहदी क मह ा को रेखािकत करते हए कहा;-“ वे िहदी म बोलते ह,िहदी म अपना सािहय रचते है,िहदी का समान करते ह और िहदी से ही समानीत होते ह. िहदी उनक शान है, सकित का आधार है, हमारी पहचान है. महामा गाधी पर बोलते हए उहने कहा िक बाप हमारे देश म केवल एक बार सन 1901 म कछ िदन के िलए आए थे. उनके आगमन के साथ ही हमारी सोच म यापक प रवतन आया. हमने अपना वप पहचाना. हमने गाधी को अपने दय म थान िदया, जबिक वे भारत से थे, उह वहाँ केवल सरकारी नोट म थान िदया गया.” अपनी घनीभत होती पीडाओ को शद का जामा पहनाते हए उहने एक लबा व य िदया. ी नरे द ढारेजी ने िवषय का चयन बडी सझ-बझ से िकया था, वे इस कार थे..... (१) िवदेश म भारत (२) िहदी के िवकास म िवदेशी/ वासी लेखक क भिमका (३) वै ीकरण क िहदी सार म भिमका (४) मोरीशस म िहदी िश ा म यवाओ का योगदान (५) यवा पीढी म िहदी बोध (६) जनभाषा और िहदी (सहोदर सबध) भोजन के प ात दसरे स का आगाज हआ. मारीशस के कला एव सकित म ी मान. ी मखे र चनीजी के िविश आितय , ी डा. ीमती ही. डी.कजल( िनदेशक महामा गाधी सथान, मारीशस. के म य आितय एव ीवै यनाथ अयर क अदय ता म काय म का शभारभ हआ. ीमती काले एव.डा.स ी भैरवी काले ने भारतीय परपरा का िनवहन करते हए वागत गीत गाया. मच पर बाए से दाए (१) ीराजनारायण ग ी( कला एव सकित म ालय म सलाहकार (२) डा. ीमती ही.डी.कजल (िनदेशक, महा.गाधी सथान) (३) ी गगाधरिसह सकलाल “गलशन”(िडपटी से े टरी जनरल,िव िहदी सिचवालय. (४) मान. ी मखे र मखीजी( कला एव सकित म ी) (५) ी वै यनाथ अयर ( अय अयदय सथा, वधा (५) ी नरे दढारे ( महासिचव-सयोजक,वधा) कछ ितभागी अपना व य देने म शेष रह गए थे, उहने अपने आलेख का वाचन िकया. इस म म म. .रा भाषा चार सिमित के सयोजक ी गोवधन यादव ने अपना आलेख “िहदी-देश से परदेश तक”, सथा सिचव ी नमदा साद कोरी, बरहानपर के ी सतोष प रहार, खडवा के ी शरदच जैन ने अपने-अपने आलेख का वाचन िकया. यादव अपने आलेख का वाचन करते हए(२) ी कोरी वाचन करते हए (३) ी मफ़तलाल पटेल वाचन करते हए ---------------------------------------------------------------------------------------------------- मेरे परम िम ी रामदेव जी धुरंधर. सभागार के कछ य िच माक (३) तीन म ी मफ़तलालजी पटेल( एम.ए.पीएचडी, सपादक “अचला”पि का इस या ा म सहभागी रहे. यहाँ यह बात िवशेष उ लेखनीय थी िक आपक प नी ीमती आनदी बेन गजरात के म य म ी पद क शपथ ले रही थी,जब िक वे हमारे साथ थे. वे अहमदाबाद से अपनी भािजय को लेकर बीस मई को ही रवाना हो चके थे, तब वे यह नह जानते थे िक उनक प नी म य म ी बनायी जाने वाली ह. मचासीन सभी िवतजन के सभाषण के प ात िविश अितिथ मान. ी मखे र मखी (कला एव सकित म ी मारीशस) के हते सभी िवतजनो/पकारो/सािहयकार/ब ीजीिवय का समानीत िकया गया. समानीत होने वाल के नाम इस कार ह:-ी अतल पाठक(सरत)/ डा. वदना दीि त (नागपर),/ डा. अनतकमार नाथ(तेजपर-आसाम)/डा. मफ़तलाल पटेल(अहमदाबाद)/डा. उषा ीवा तव( बगल)/ डा.पी.सी.कोिकला (चै नई)/डा. मधलता यास (नागपर)/डा. वामन गधारे( अमरावती)/ डा. शकर बदेले(अमरावती)/ गोवधन यादव (िछदवाडा)/ शरदच जैन (खडवा)/ ीमती सजाता सलकर(गोवा.)/ ीमती वासथी अयर(नागपर)/सतोष परहार(बरहानपर)/पाडरग भालशकर( वधा)/नमदा सादकोरी(िछदवाडा)/िवकास काले (वधा)/स ी हीना शाह(अहमदाबाद) (२)अयदय बहउ े शीय सथा, वधा ारा मारीशस के सािहयकार का समान िकया गया. उनके नाम इस कार ह मान. ी मखे र चनीजी( कला एव सकित म ी मारीशस) (२) ी राजनारायण गित( अय िहदी ि पिकग यिनयन,) (३) डा.अलका धनपत ( महा.गाधी सथान) (४) ी धनपत राज हीरामन (महा.गाधी सथान) (५) ी हाद रामशरण (पोटलई) (६) ी रामदेव धरधर(पोटलई) (७) ी इ देव भोला (पोटलई) (८) डा. ीमती ही.डी.कजल( िनदेशक महा.गाधी सथान) (९) ी धनराज शभ (पोटलई) (१०) डा ीमती.िवनोदबाला अण( पोटलई),(११) ी सयदेव िसबोरत(पोटलई) (१२) डा. ीमती रेशमी रामधोनी( पोटलई) (१३) डा.हेमराज सदर (पोटलई) एव ीमती उषा बासगीत(पोटलई) हमारे टर या ा के सयोजक िम िकया. ी नरे दढारे जी. काय म के समापन के बाद गोवधन यादव क अय ता म ी सतोष प रहार ने काय-मच का सचालन िकया,जो देर रात तक चलता रहा. किव-गो ी के समापन पर ी नमदा साद कोरी ने सभी उपिथत िव तजनॊं के ित आभार य दसरे स क शआत के समय डा. अलका धनपतजी, आकाशवाणी मारीशस के काय म अिधकारी को साथ लेकर आय. उहने मझे सभा ह से बलाकर इस बात क सचना दी िक आपका सा ाकार रकाड िकया जाना है. मेरे अलावा रकािडग ी द ढारेजी, एव सतोष प रहार िक क जानी थी,लेिकन प रहार का नाम उसी ण मच पर आलेख वाचन के िलए पकारा गया. शायद इसी वजह से उनका सा ाकार रकाड नह हो सका. पास ही के एक हाल का चनाव िकया गया,जहाँ शोरगल िबकल भी न था. मेरे सा ाकार के बाद उहने मझे बधाइया देते हए कहा िक आपका सा ाकार बहत ही जानदार रहा है और इसका सारण 7 जन 2014 को होगा. चिक हम 29 मई को मारीशस से रवाना हो जाना था. अतःमने उनसे िनवेदन िकया था िक यिद काय म अिधकारी इसक रकािडग क एक ित मझे भेज दगे, तो उ म रहेगा.जैसा क उहने बतलाया भी था िक इसे आप अपने कयटर पर भी सन सकते ह,लेिकन मेरी इसम इतनी द ता नह थी िक उसे सन सक आप सभी जानते ही ह िक सरकारी िनयम के अधीन ऎसा िकया जाना सभव नह है. बाद म ईमेल के जरए डा. धनपत ने मझे उसके सारत हो जाने बाबद सचना ेिषत क. मने उह दय से धयवाद देते हए आभार माना िक उहने कम समय म मेरे िलए इतना प र म िकया. ( ईमेल क ित सलग है) ---------------------------------------------------------------------------------------------------- Translate message Turn off for: Hindi नमकार जी आपका काय म टेलीका ट हो चका है .भेजना मिकल है. 29 मई 2014 अलका मन क िथित बडी िविच होती है. वह कब फ़ि लत होकर िततली बन कर आसमान म जा उडेगा और कब उदासी का चादर ओढकर गमसम सा रहने लगेगा,कोई नह जान पाता. समझ म नह आता िक अ सर ऎसा य होता है हम सबके साथ ? इस पर यिद गभीरता से िवचार कर तो काफ़ हद तक समझ म आने लगता है. यह िथित मेरे िलए ही नह बन पडी थी,बि क हम सबके साथ कछ ऎसा ही हो रहा था. मने अपने िम से इसका कारण जानना चाहा तो िसफ़ इतना कहा िक आज मन कछ उदास-उदास सा है..बस. ऎसा य है, म समझ नह पा रहा ह. दरअसल इस उदासी का म य कारण यह था िक हम िवगत छः िदन से मारीशस म रहते हए मौज-मती कर रहे थे. सबह जदी उठ जाते. सारे िनय ि या-कलाप से िनजाद पाकर ना ते के टेबल पर जा पहँचते. और ना ते के बाद किटन म बनी “रामयारी” का घँट हलक के नीचे उतारते और बीच-बीच म बितयाते जाते. चाय तो आिखर चाय ही होती है,लेिकन “रामयारी चाय” का अपना वाद है और पीने पर िमलने वाला आनद ही कछ और है. चाय हलक के नीचे उतर भी नह पाती है िक ेताजी( गाइड) क आवाज गजने लगती है. वे सभी से िनवेदन करती ह िक जदी से बस म जाकर बैठ जाइए. आज हम फ़ला-फ़ला थान पर जाना है, और हम सब शी ता से वहाँ से रवाना हो जाते. और िफ़र पहँच जाते िकसी सरय वािदय क गोद म. आज इन सब पर िवराम लगने वाला है. आज दोपहर बाद हम होटेल कालोडाईन सर मेर को अलिवदा कह देना है. अलिवदा कह देना है इितयाज को, मनोज को, िवनय को,नीलेश को, आनद को और राजे को, जो बडॆ मनहार से ना ता करवाते और रामयारी िपलवाते. अलिवदा कहना होगा ेताजी को,जो हमारे साथ िवगत छः िदन से बनी रहती थ. जब वे िकसी दसरी बस म जा बैठती तो लोग उनसे मनहार करते िक वे कपया हमारी बस म आकर बैठ. ेताजी एक ह और हर यि चाहता है िक वे उनक बस म बठ. कैसे सभव है िक एक यि हर जगह कैसे उपिथत रह सकता है. इतने कम िदन म इतना अनराग.! अब आप ही बतलाए िक कैसे हम अपने मँह से उह अलिवदा कहगे ? (बाए से दाए= ेतािसह, वपािनल तथा नीतिसह,) शायद अब समझ म आया होगा आपको िक मन क िथित आज य डावाडॊल है? इतने कम समय म वे हमारे अपने से हो गए थे. उनका िश ाचार के साथ िमलना, बितयाना, उनका सेवाभाव देखकर मन से सहजप से उह परवार का एक सद य बना िलया था. आज उन सबसे दर चले जाना है. यह तो सभी जानते थे िक िवजा क अविध समा हो जाने के बाद, उह जाना ही होगा,लेिकन कम समय म िकसी को अपना बना लेना या बन जाना,िकतना सहज होता है और जब िबछडने क बात आती है तो वाभािवक है िक मन उदासी म िघरने लगता है. यह भी उतना ही सच है िक एक लबे अतराल के बाद अपना प रवार याद आने लगता था. याद आने लगते थे अपने प रजन, भाई बहन,पिन, बचे, नाती-पोते. वे भी तो हमारी याद कर रहे होते ह. आिखर उनके पास भी तो लौटना होगा हम. सारे ि याकलाप के िलए पहले से समय का िनधारण कर िलया गया था िक कब और िकतने बजे हम होटल छोडना है, दोपहर का खाना कहाँ खाना है और िकतने बजे हम सर िशवसागर रामगलाम एअर-पोट पर पहँच जाना है. कब हमारा िवमान ऊडान भरेगा और कब हम छ पित िशवाजी अतरा ीय हवाई अडडॆ पर पहँचना है. मबई के िकस टेशन से हमारी े न रवाना होगी.आिद-आिद म इस या ा का समापन इस कार करने के प म िबकल भी नह था,बि क यह कह िब कल भी नह ह. यिक मने सोच रखा था िक म आपको इस अयाय के बद कर देने से पहले उन थान पर ले जाना चाहँगा जहाँ जाकर मने अ त आनद क अनभित ा क थी. इन जगह का उलेख पहले भी िकया जा सकता था,लेिकन आलेख के साथ वहाँ के छायािच को लगा देने से आलेख यादा िवतार लेने लगा था. अतः म इस िनणय पर पहँचा िक इनका उलेख बाद म भी िकया जा सकता है. यिद इसका उलेख अभी नह हआ तो िफ़र बाद म होना सभव भी नह लग रहा था. ------------------------------------------------------------------------------------------------------- फ़ोट आफ़ एडलेट Fort Adelaide Of Citadel ( फ़ोट एडेलेड आफ़ िसटाडेल) --सन 1814 म नेपोिलयन क हार के बाद ास और ि िटश सरकार के बीच हई सिध के अनसार सीमा का िनधारण िकया गया और उस समय के तकािलन ि िटश गवनर सर िविलयम एम.िनकोले ने इगलै ड के राजा िविलयम IV क पिन “एडेलेड” के नाम पर मारीशस म िथत पवत िजसे (Pitite Moutagne) के नाम से जाना जाता है,बनाया गया.,िजसे बाद म मारीशस को सप िदया गया था. इसक आधारिशला 1830 म रखी गई थी, जो दस वष म बनकर तैयार हआ. इस िकले के िनमाण म भारतीय़ वा तकारो के अलावा कई मजदर काम पर लगाए गए थे. यह िकला सम सतह से 240 फ़ट क उँचाई पर िथत है. कहा जाता है िक इस िकले से बदरगाह तक जाने के िलए सरग बनाई गई थी, तािक िकले म रसद तथा हिथयार क आपित बनायी जा सके . इस िकले क बज पर जाकर आप शहर का िवहगम य देख सकते है. Belle Mare beach (बेले मरे बीच) Belle Mare beach (बेले मारे बीच) ----मारीशस के दि ण म िथत यह सम ी तट अपने म नीलापन िलए हए दर दर तक फ़ैला हआ है. इसके तट पर व ॊं का फ़ैलाव आप देख सकते ह. िकसी ने मझे बतलाया िक इसके तटॊं पर मारीशसवासी अपने पवज के नाम पर या िफ़र िकसी बचे के जम िदन पर, या िफ़र शादी क वषगाठ पर व ारोपण करते ह. यह परपरा काफ़ समय से चली आ रही है, हवा के झक पर नाचते व ॊ को देखकर तथा यहाँ छाई हरयाली आपका मन मोह लेती है. सफ़ेद रेत दर-दर तक फ़ैली नजर आती है. अकसर यहाँ भीड कम नजर आती है, लेिकन छ य के िदन बडी स या म लोग यहाँ पहँचते ह. बोट क सवारी करते ह और बेलन के जरए ( Parasailing ) आकाश म जा उडते ह. यिद आप आकाश म उडना ही चाहते ह, तो आपको उडने के पख िकराए पर िमल जाएगे. जैसे ही आप इस बीच म वेश करते ह, एक काउटर बना हआ है. यहाँ दो कार क यवथा क गई है. पहला बैलन के मा यम से हवा म सैर करने के िलए आपको नौ सौ पया (मारीिशयन पया) का िटिकट कटवाना होता है. आप दो लोग एक साथ उडना चाहते ह तो इसके िलए आपको प ह सौ पय का िटिकट लेना होता है. दसरा- आप सम म उतरकर कोरल, मछिलयाँ या अय सम ी जीव देखना चाहते ह तो आपको बारह सौ पय का िटिकट खरीदना होता है.और आप यिद सम ी-जीव के साथ फ़ोटॊ िखचवाना चाहते ह तो आपको दो हजार पया (मारीिशयन) चकाना होता है. ह. इस रोमाचक या ा म यिद वधा िनवासी ी के .बी.पडौडेजी क चचा न क जाए, तो शायद बात अधरी रहेगी. वे ाचाय होकर सेवाम हए ह. एकदम वथ ह,लेिकन उह पैर के तकलीफ़ ह, अतः छडी के सहारे चलना होता है उनक उ लगभग 72-75 के करीब है,लेिकन उनका जोश देखने लायक होता था. जब कोई उह सहारा देने के िलए हाथ बढाता तो मकरा कर कहते- भैया कब तक साथ दोगे मेरा,? और वे आगे बढ जाते. बैलन के सहारे आकाश म उडने क िजद, तो कभी सम क गहाइय म उतरने क िजद करते. कहते या म बढा हो गया ह,? म य नह उतर सकता सम म और य नह उड सकता बैलन ( PARASAILING) के साथ? शायद वे यह नह जानते थे िक उ के इस पडाव पर मनचाहा करना उनके िलए उिचत नह होगा. काफ़ समझाने-बझाने के बाद आिखर वे मान जाते ह. उहने तो अपनी िटिकट भी कटवा ली थी. बाद म उह रकम वािपस दे दी गई. (28 th जन) -शाम को खाना खाने के साथ ही हम सिचत कर िदया गया था िक कल सबह दस बजे हम होटल छॊड देना है. बस हमारा इतजार कर रह थ. अब हम उस होटल “ताज होटल” क तरफ़ बढ रहे थे, जहाँ हमने पहली बार खाना खाया था. खाना खा चकने के बाद हमारे पास काफ़ समय बच रहा था. उसका हमने भरपर फ़ायद उठाया. हमारी बस अब BLUE BAYMARINE क तरफ़ रवाना हो रही थी. Glass Water Boat trip in Blue Bay Marine Park यह सम ी पाक Mehebourg के समीप दि ण-पव म POINTE JEROME के करीब 353 मीटर म फ़ैला हआ है. सदर और आकषक सम के तट देखते ही बनते ह. दर-दर तक सफ़ेद रेत क चादर िबछी हई है. इस मलायम रेत क चादर पर से चलते हए आप बोट तक पहँचते ह. चार-पाच बोट हमने ले ली थी. इन बोटॊं के तले काँच के बने हए थे. बोट जब सम क सतह पर आगे बढती है तो नािवक उसे उन थान पर रोकते हए धीरे-धीरे आगे बढता है, जहाँ से आप सम तल म समाए कोरल और िक म-िकम क वनपितय को देखकर दग रह जाते ह. इन वनपितय के बीच रग-िबरगी मछिलय, तथा कछओ को तैरता हआ देखा जा सकता ह. बोट एक थान से चलकर दसरे थान पर आकर थम सी जाती है. हर बार नजारा कछ और होता है. इससे पहले हमने-आपने कई सम देख हगे लेिकन कभी उसके गभ म िछपे अनमोल खजाने को नह देख पाए हगे, इह देख कर आय होना वाभािवक है. (बोट के तल म लगे काच से आप सम के गभ म िछपी िविभन वनपितयाँ-कोरल देख सकते ह) सम के इस रोमाचक तट पर सैर करते हए कब पाँच बज गए, पता ही नह चल पाया. अब हम सर िशवसागर रामगलाम अतररा ीय हवाई अडडॆ क तरफ़ बढ चले थे. स ी ेताजी अब भी हमारे साथ ही चल रही थी. एअरपोट पहँचने के बाद वे सब से िमल रही थ, वे सभी से िफ़र कभी आने का िनमण देती ह ,लेिकन उनक आँख से अिवरल आँस बह रहे होते ह. उनक लाई देखकर सभी के मन भारी हो चले थे. मा एक स ाह क मलाकात,थी हमारी उनसे लेिकन कब वह अपनव म ढल जाती है, आपको पता ही नह चल पाता. शायद यही कारण था िक उनक आँख भर आयी थी. .अपना सामान तलवाने तथा अय औपचारकताओ को परा करने म लगभग दो घटे से अिधक समय लग जाता है. सारी ि या परी होने के बाद हम ती ालय म बैठना होता है. रात के यारह बजे हमारी लाइट है. समय धीरे-धीरे रगते रहता है. रौशनी म जगमगाता हआ हवाई अडडा, सभी का मन मोह लेता है. तरह-तरह क सजी हई दकाने पयटक को अपने समोहन म बाध लेती ह,लेिकन दाम इतना अिधक होता है,िक आप चाहकर भी वतओ को खरीद नह पाते. इसके पीछे केवल एक तक यह होता है िक िजतनी भी चीज आप वहाँ देख रहे होते ह सारी क सारी चीजे भारत से िनयात क गई होती ह. अतः या ी खरीद करने म तिनक भी िदलचपी नह िदखलाता. राि के यारह बजने वाले ह. सारे लोग अब िवमान पर सवार होने के िलए चल पडते ह. अपनी िनधारत सीट पर आकर बैठ जाते ह. ठीक यारह बजे हमारा िवमान रन-वे पर दौडने लगता है और पल भर म आकाश से बात करने लगता है. परे छः घटे क उडान के बाद वह छपित िशवाजी अतररा ीय हवाई अडडॆ पर जा उतरता है. इस तरह इस या ा का समापन होता है. इस अ त और रोमाचकारी या ा को सपन करवाने के िलए म पनः आभार कट करता हँ रा भाषा चार सिमित भोपाल के म ी-सचालक मान. ी कैलाशच पतजी के ित, िजहने न िसफ़ हम आिथक सबल दान करवाया बि क हमारा हौसला बढाया और िहदी के उनयन और चार-सार के एक शभ-अवसर दान करवाया. म आभारी हँ ी नरे द ढारेजी के ित,िजहने इस या ा के काय म क कसी हई परेखा बनाई, उहने न िसफ़ अपने िजले को जोडा बि क अय ातो के लोगो को भी अपने साथ जोडा और इस तरह एक सफ़ल आयोजन वे देश के बाहर कर सके . म आभारी हँ मारीशस (मोका) क डा. ीमती अलका धनपतजी का, िजहोने आकाशवाणी मारीशस के िलए मेरा सा ाकार िलया. म आभारी हँ यात सािह यकार ी राज हीरामनजी का िजहने महामिहम रा पितजी से भट करवाने म अहम भिमका का िनवहन िकया. तथा अपना सा ाकर रकाड करवाने म आपने सहज ही अनमित दान क. म आभारी हँ मान. ी रामदेव धरधरजी का (िजनकॊ म पढ रहा था) साथ ही उन तमाम सािहयकार का िजनका प रचय मच के ारा मझे ा हआ. म आभारी हँ ी वपिनल तथा नीतिसह का जो हमारे साथ छाया क तरह बने रहे. िनःसदेह जब म यहाँ से रवाना हआ था,उस समय तक मेरे हाथ रीते थे,लेिकन वहाँ से लौटा तो म मालदार हो चका था. मझे न िसफ़ अपरिमत सतोष क ाि हई है बि क उन तमाम लोग से िमलकर एक परवारक इकाई का सदय बन जाने का भी गौरव ा हआ है. उन तमाम लोगो क मितयाँ सदा मेरा पथ आलोिकत करते रहेगी,ऎसा मेरा िव ास है. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 25 रोमाचक या ा- इडोनेिशया, मलेिशया, बाली. क . वैि क सािहय-सकित सथान ारा अतररा ीय तर पर भाषा, सािहय और भारतीय सकित का समान बढ़ाने तथा कला एव सामािजक िव ान िवषय म वैि क िवमश के िलए वैि क सािहय-सकित सथान ारा सहयोगी सगठन अतररा ीय रसच जनल शोध-कप, सािहियक पि का स ावना दपण, छ ीसगढ िम , छ ीसगढ लोक सािहय सथान तथा अय िम सगठन के सय यास से भाषा, सािहय, सकित, पका रता, सगीत, कला, समाजिव ान आिद े के खर िव ान, ा यापक, पकार, कलाकार तथा शोधछा के समिवत योगदान को अतरा ीय तर पर समान, मच एव याित िदलाना वैि क सािहय-सकित सथान का म य येय था इस म म ि तीय अतरा ीय सेमीनार एव समलेन दो देश ,मलेिशया और बाली-इडोनेिशया म 8 िदसबर से 14 िदसबर 2016 तक सथान ारा समय समाज और सािह य िवषय पर आधारत अतररा ीय सेमीनार एव समेलन का आयोजन िकया गया. बाली के बारे म कछ बात जानना आवयक है- बाली एक पयटन थल है. बाली इडोनेिशया का एक ीप ात है और सदा ीप समह का सबसे पि मी िहसा है. यह जावा के पव और लोबोक के पि म म िथत है, इस ात म बाली ीप और कछ छोटे पड़ोसी ीप शािमल ह, िवशेष प से दि ण पव म नसा पेिनडा, नसा ले बगन और नसा सेिनगन। बाली ात क राजधानी देनपसार है. देनपसार यह सदा ीप समह म सबसे अिधक आबादी वाला शहर है और पव इडोनेिशया म मकासर के बाद दसरा सबसे बड़ा शहर है. उबद (Ubud), इडोनेिशया के बाली ीप के उबद िजले का एक नगर है. इस नगर का िवकास कला और सकित के के के प म क गयी है तथा यह िव के पयटक के आकषण का बहत बड़ा के बनकर उभरा है.पयटन से सबिधत यवसाय इसक अथयवथा का 80% िहसा बनाता है. बाली इडोनेिशया म एकमा िहद-बहसयक ात है, िजसक 86.9% आबादी बािलनी िहद धम का पालन करती है. यह पारपरक और आधिनक नय, मितकला, पिटग, चमड़ा, धात और सगीत सिहत अपनी अयिधक िवकिसत कलाओ के िलए िस है. इडोनेिशयाई अतरा ीय िफ म महोसव हर साल बाली म आयोिजत िकया जाता है. बाली यने को क िव धरोहर थल, सबक िसचाई णाली का घर है. यह 10 पारपरक शाही बािलनी घर से बने रा य के एककत सघ का भी घर है, येक घर एक िविश भौगोिलक े पर शासन करता है. परसघ बाली सा ा य का उ रािधकारी है. इडोनेिशया म आज भी रामायण का इतना गहरा भाव है िक देश के कई िहसे म रामायण के अवशे ष और पथर पर तक क नकाशी पर रामकथा के िच आसानी से िमल जाते ह. भारत और इडोनेिशया क रामायण म थोड़ा अतर है, भारत म राम क नगरी जहाँ "अयो या "है, वह इडोनेिशया म वह "योया" के नाम से िथत है. इडोनेिशया म हर जगह िहद सकित के दशन होते ह. 09-10 व शता दी तक ये देश िहद और बौ देश था, हालािक यहा के लोग ने मिलम धम वीकार तो कर िलया लेिकन उनक मायताए कभी नह बदली. वो आज भी िहद सकित पर गव भी करते है और इसे याद भी रखते ह. दि ण पव एिसया म िथत इडोनेिशया क आबादी तकरीबन 23 करोड़ है, यह दिनया का चौथा सबसे अिधक आबादी वाला देश है और साथ ही सबसे बड़ा मिलम आबादी वाला देश भी है. साल 1973 म यहा सरकार ने अतररा ीय रामायण समेलन का आयोजन भी िकया था. ये अपने आप म काफ़ अनठा आयोजन था, यिक घो िषत प से कोई मिलम रा , पहली बार िकसी अय धम के धमथ के समान म इस तरह का कोई आयोजन कर रहा था. इडोनेिशया म आज भी रामायण का इतना गहरा भाव है िक देश के कई इलाक म रामायण के अवशे ष और प थर तक नकाशी पर रामकथा के िच आसानी से िमल जाते ह. यहा रामकथा को "काकनीय-रामायण" नाम से जाना जाता है. भारतीय ाचीन साकितक रामायण के रिचयता आिदकिव ऋ िष वाि मक है, तो वह इडोनेिशया म इसके रचियता किव " योगे र " ह. इडोनेिशया क रामायण 26 अयाय का एक िवशाल थ है. इस रामायण म ाचीन लोकि य च र दशरथ जी को " िव रजन " कहा गया है, जबिक उसम उह एक शैव भी माना गया है, यानी क वे िशव के आराधक है. इडोनेिशया क रामायण का आरभ भगवान राम के जम के साथ होता है, जबिक िव ािम के साथ राम और लमण के थान म समत ऋ िषगण क ओर से मगलाचरण िकया जाता है और दशरथ के घर इस ये प के जम के साथ िहदेिशया का वा य "गामलान" बजने लगता है. इडोनेिशया क रामायण म नौसेना के अय को " लमण " कहा जाता है, जबिक सीताजी को " िसता " कहते है. हनमान तो इडोनेिशया के सवािधक लोकि य पा ह, हनमान क लोकि यता का अदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है िक आज भी हर साल इस मिलम आबादी वाले देश के आजादी के ज यानी क 27 िदसबर को बड़ी तादात म राजधानी जकाता क सड़क पर यवा हनमान का वेश धारण कर सरकारी परेड म शािमल होते ह. बता द- िक हनमान को इडोनेिशया म " अनोमान" कहा जाता है. इस देश क करसी का नाम इडोनेिशयाई िपया है. यहा एक भारतीय पये क कमत 188.11 इडोनेिशयाई िपया है. यानी अगर आपके पास भारतीय करसी के 100 पए ह तो यह इडोनेिशयाई िपया के लगभग 18,811 के बराबर है. इडोनेिशया के २०,००० के नोट पर भगवान ी गणेश क ितमा छापी गयी थी, लेिकन 2008- म इसे चलन से बाहर कर िदया गया. इस भ य और आकषक आयोजन को सफ़ल और यादगार बनाने के िलए याि य का दल ने हैदराबाद के अतररा ीय िवमान तल से बाली के िलए उड़ान भरी. बाली पहँचने के बाद हम अपने िनधारत होटेल म पहँचे और भारतीय रे टारट म भोजन िकया और बाली का मण िकया. थम िदवस- उबद ( ubud ) उबद को ीप क साकितक राजधानी माना जाता है. यह ीप सबसे महवपण सहालय का घर है, िजसम उबद के कला सहालय और इसके यापक सह शािमल ह िजनम बाली पिटग भी ह. उबद म हर िदन सगीत और नय काय म होते ह. अब यहा केवल मिदर के अवशेष बचे ह . उसके वणम कालखड का इितहास बोड म िलख कर रखा गया है. तीसरे िच म आपको जड़ को देख सकते है, िजसने मिदर को वत करने म अपनी िनणायक भिमका का िनवहन िकया है. 2. तनाह लोट तनाह लोट बाली के सबसे िस िहद मिदर म से एक है. यह लबे समय से बािलनी पौरािणक कथाओ का एक अिभन अग रहा है. यह सात सम ी मिदर म से एक है, सभी एक दसरे क ि म, खला बनाने के िलए जो बाली के पि म म तट के साथ चलती है. इस अनजानी-अनिचही जगह पर आकर हम आयचिकत हो उठते है. होते तो हम िवदेश क धरती पर,लेिकन इस जगह को देखकर आपको सहज ही यह महसस होने लगता है िक यह वह थान होना चािहए,जहाँ रामकथा एक पा बािल रहा करता होगा. यहाँ पर बड़ी सया म पयटक आते ह. यहाँ चार ओर फ़ैले नैसिगग सदय के समोहन म बधकर या ी ठगा-सा से खड़ा रह जाता ह. इस थान पर सबह-से लेकर शाम ढलने तक भी बैठे रहने के बाद आपका मन अय जाने से मना कर देगा. उलवात मिदर- उलवात मिदर िहदमहासागर म एक िवशाल च ान पर िथत है. सम क िवशालकाय लहर जब इसके तट से आकर टकरा कर एक िवहगम य क रचना करती है. यिद सय ठीक हमारे सामने हो तो हम अपनी खली आँख से इ धनष को बनता हआ देख सकते ह. यहाँ का सया त िव िस है. अताचलगामी होते सरज को देखना बहत अहादकारी होता है. सरज का लाल लाल दहकता गोला, धीरे-धीरे सम क गहराई म डबता दीखता है और कछ ही समय प ात परा गोला सम म समा जाता है. गोले के डबते ही एक हका-सा अिधयारा छाने लगता है. सया त के बाद और राि के आगमन क इस सिध-बेला के इस मनमोहक य को देखकर पयटक ममध हो जाता है. यहाँ पर बदर बहतायत से देखे जा सकते है. अतः पयटक को सावधान रहने क आवयकता है. उलवात मिदर के दशन करने के बाद "तानजग बीच (TANJUNG BEACH) तथा िकतामणी वालामखी (KINTAMANI VOLCANO) देखना हमारे शेडल म था,लेिकन उलवात के आकषण म बधे रहने के कारण नह जा सके थे. सेिमयाक | Seminyak य िप सेिमयाक एक छोटा सा शहर है. इसके बावजद यह सबसे शानदार पयटन थल म से एक है. यहा पर पाच िसतारा भोजनालय, शानदार पा और होटल ह, यह शहर दिनया भर के याि य के िलए आकषण का क है. बेसकह मिदर हजार वष से यह मिदर बाली ीप का "मदर टे पल" के नाम से जाना जाता है. यह माउट अगग के दि ण-पि म ढलान पर 1000 मीटर ऊपर ि थत है. यह बाली म धम का सबसे महवपण मिदर है. एक िवशाल परसर म कम से कम 86 मिदर शािमल ह. यहा पर आकर आप वा तिवक आयािमकता का अनभव करगे. चौथे िदन का सािहियक काय म तथा समान समारोह अित यत रहा. इसम सािहयकार ने अपने पच का वाचन िकया और समािनत हए. समेलन म "भारत भाकर" अवाड,. सदभावना-समान तथा सािहय वैभव कला-सकित समान म तत मेरे कहानी सह-तीस बरस घाटी" को नगद दस हजार पया समान व प िदया गया. वतमान समय म भारत का एक पया 183.1816 के बराबर होता है. यिद म इसे इडोनेिशया करसी म गणना क तो वह 183,0000 होता है. मतलब मेरे हाथ म एक लाख ि यासी हजार पया था. तीन सथाओ को बहत-बहत धयवाद.आभार. आयोजन के कछ िच-यहाँ य ह.- या ा के पाचवे पड़ाव को पार कर हम बाली से वालामपर के िलए रवाना हए. और होटेल-3 टार िडलस पहँचे और चकाच ध से भरे वालामपर िसटी का मण िकया. वालामपर शहर- " कआला लपर ", िजसे स ेप म "के एल" भी कहा जाता है, मलेिशया क सघीय राजधानी व सबसे अिधक जनस या वाला नगर है. इस नगर का े फल 243 िक॰मी2 (94 वग मील) है तथा अनमािनत जनसँ या 20 लाख से अिधक है. वह र कआला लपर, िजसे " लाँग घाटी " के नाम से भी जाना जाता है. मलेिशया क ही नई दसरी राजधानी " पजय " भी है. "पजय" (Putrajaya ) ( मलेिशयन उचारण: [putraˈdʒaja, putrəˈdʒajə] ), आिधकारक तौर पर Putrajaya का सघीय े ( मलय : Wilayah Persekutuan Putrajaya ), एक िनयोिजत शहर और मलेिशयाई राजधानी का सघीय शासिनक क है . सघीय सरकार क सीट को 1999 म कआलालपर से पव म भीड़भाड़ और भीड़ के कारण " पतराजय " म थानातरत कर िदया गया था . कआलालपर सिवधान के अनसार मलेिशया क रा ीय राजधानी के प म बना हआ है और अभी भी मलेिशया के राजा और ससद क सीट है, साथ ही देश का वािणि यक और िव ीय क होने के नाते. पजय क थापना तकालीन धान म ी महािथर मोहमद का िवचार था . 1974 म कआलालपर और 1984 म लाबआन के बाद यह मलेिशया का तीसरा सघीय े बन गया. मलेिशया के पहले धान म ी , टक अदल रहमान प अल-हज के नाम पर , यह े परी तरह से सेलागोर रा य के सेपाग िजले के भीतर िघरा हआ है . (Putrajaya MSC) मलेिशया का भी एक िहसा है , एक िवशेष आिथक े जो लाग (Klang) घाटी को कवर करता है. म सकत , "प " (प ) और "जया" (जया) का अथ है "सफलता" या "जीत" का अथ है. पजय का िवकास 1990 के दशक क शआत म श हआ था. ---------------------------------------------------------------------------------------------------- पजय म हम लोग ने रा पित भवन से लेकर ायः सभी म ालय को देखा, बात िसटी वालामपर म हमने सदर इमारत और वहाँ चौराहे-चौराहे पर बनाई गय कलामक आदमकद ितमाए देख जो महाभारत के पा को लेकर बनायी गई है. इसके साथ ही पवत को काटकर भगवान िवण क भय और आकषक ितमा भी हम देखने को िमली. या ा से आए हए हम छः वष बीत चके ह, लेिकन इस रोमाचकारी या ा क याद मन-मि तक म य-िक- य सरि त ह. मन का पछी कभी एक जगह ठहरना नह चाहता. या ाए तो अनवरत जारी ह. िफ़र भी मन होता है िक एक बार पनः इस अ त देश क या ा क जा सके . ---------------------------------------------------------------------------------------------------- 26 िकसी िवदेशी धरती पर पहला कदम थाईलड क सरय या ा. सन 2011 को मेरी पहली िवदेश या ा-थाईलड क ही थी. इस या ा के पीछे एक िदलच प िकसा है. रायपर के िम ी जयकाश रथ "मानस" से मेरा नया-नया परचय हआ था. परचय का आधार मा मेरी अपनी कहािनयाँ थ,िजसके मा यम से िम ता थािपत हई. यह वह समय था जब मेरी कहािनयाँ िविभन प-पि काओ म कािशत हो रही थ. जयकाश जी क अपनी िवशेष खािसयत रही है िक जो रचनाए उह सवािधक ि य लगती थी, उह वे अपनी इ जाल पि का " सजन गाथा डाट काम" पर उह थान िदया करते थे. पता नह यह म कब से चल रहा होगा, म नह जानता,लेिकन वे मेरी कहािनय को अपनी पि का म थान देते रहे. रायपर म उहने अतररा ीय लघकथा समेलन का आयोजन िकया और मझे आमि त करते हए समािनत करने बाबत प भेजा. म प पाकर जहाँ एक ओर सन हो रहा था, दसरी ओर मझे घोर आय हो रहा था,िक म इस यि को िबलकल भी नह जानता. इस रहय को जानने के िलए मने आपसे सपक िकया. मने अपनी ओर से कछ िकये, तो उनका एक लाईन का जवाब था िक अपने बेटे रजनीश से कह िक वह "सजन गाथा डाट काम" खोल. इसके बाद हम बात करगे. शायद इस समय वे कार ाईव कर रहे थे. खैर, "सजन गाथा डाट काम" पर मने देखा िक इस पि का म मेरी कई कहािनयाँ कािशत हो चक ह. बस यह से िमता क थापना हई और उह के आह पर थाईलड जाने का अवसर ा हआ. मने अपने कछ आलेख म इस बात का िज करना जरी समझा िक काश अगर म इस या ा पर नह जाता तो सभव है िक म कयटर चलाना नह सीख पाता, जबिक मेरे घर पर उस समय प चीस से अिधक कयटर उपलध थे. या ा के समय ायः हर िम के पास लैपटाप था. वे मझे अपनी रचनाए इसी के मा यम से सनाते थे, जबिक मझे डायरी के पने पलटने पड़ते थे. मझे इस बात पर पछतावा हो रहा था िक घर म सब कछ उपलध है िफ़र भी मने कभी सीखने क कोिशश नह क. अब मने कयटर सीखने का मानस बनाया. मेरे सहया ी थे ी भदयाल ीवा तव जी. वे भी कयटर चलाना नह जानते थे. लौटकर आने के बाद हमने कछ इि टटयट से सपक भी िकया िक वे हम कयटर आपरेट करना सीखा द. तय हआ िक कल से हम सीखने जाएगे, लेिकन िवचार, िवचार ही बना रहा. अपनी आय को देखते हए हमने िनि त िकया िक घर पर ही बैठकर इसे सीख. धीरे-धीरे कयटर महाशय से अछी खासी दो ती हो गयी. परणाम यह रहा िक हमारी रचनाए िलक करते ही देश-िवदेश क पि काओ म मेल के मा यम से पलक झपकते ही पहँचने लग. इससे पहले कोरे िलफ़ाफ़ और डाक िटकट को खरीद कर रखना होता था. िफ़र डाकघर तक जाने के िलए समय िनकालना होता था.तब जाकर कोई रचना हता-दस िदन म अपने गतय पर पहँचती थ. काश,मझे थाईलड जाने का अवसर न िमला होता, तो शायद ही म कयटर पर काम कर पाता और न ही मेरी रचनाएँ देश क मख प-पि काओ म थान पात. सीख कह से भी िमले, उसे हण करना आना चािहए. इसका सारा ेय म ी जयकाश रथ"मानस" को जाता है. उह लाख-लाख धयवाद. थाईलड से सबिधत कछ जानकारयाँ- ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------- थाई लोग अपनी जातीय िवशेषताओ म चीिनय के िनकट ह. इन लोग ने चीन के दि ण भाग म नान चाऊ नामक एक शि शाली रा य थािपत िकया था. िकत उ री चीिनय और ितबितय के दबाव तथा 1253 म कबलई खाँ के आमण के कारण थाई लोग को दि णी पव एिशया क ओर हटना पड़ा. चाओ ाया (Chao Phraya) नदी क घाटी म पहँच कर उहने वहाँ के िनवािसय को कबोिडया क ओर भगा िदया और थाईलड नामक देश बसाया. 17व शता दी तक थाईलड म सामतत थािपत रहा. इह िदन उसने डच, पतगािलय, ासीिसय और अ े ज से यापार सबध भी जोड़ िलए थे. 19व शता दी म माकट (Mongkut) (1851-68) और उसके प चलालगकान (Chulalongkorn) (1868 1910) के शासनकाल म सामतवाद क यवथा शनै: शनै: समा हई और थाईलड का वतमान ससार म आगमन हआ. समितदाताओ क एक सिमित गिठत हई तथा ि टेन (1855) सय रा य अमरीका और ास (1856) से यापार सिधयाँ हई. पराने सामत के अिधकार सीिमत कर िदए गए और दास था िबकल उठा दी गई. 1932 म र हीन ाित ारा सवैधािनक रा यत क थापना हई। िकत उसके बाद से भी थाईलै ड क राजनीित म िथरता नह आई. ि तीय िव य के आरभ म थाईले ड ने जापान से सिध क और ि टेन और अमरीका के िव य ठाना। लेिकन य के बाद उसने सय रा य अमरीका से सिध क. 1962 म लाओस क ओर से सायवादी सकट से थाईलड क र ा के िलये सय रा य क सैिनक टकिड़याँ भी वहाँ रह. दो त जैसा क आप यह भली भाित जानते ह क थाईलड-या ा दिनया भर म काफ लोकि य है िजसका मख कारण वहा का sex tourism या देह यापार है. थाईलड म घमने के िलए तो बहत सारी चीज ह- जैसे खबसरत सम ी तट, मिदर, पराने ऐितहािसक मारक वगैरह. थाईलड- एक ऐसा देश जो आम भारतीय के पसदीदा िवदेशी िठकान क सची म ज र कह न कह शािमल रहता ही है. कारण प है- भारत से कम दरी के कारण सती हवाई या ा का उपलध होना, आसान वीजा ि या और सता बजट! दि ण-पव एिशया म बसा यह छोटा सा देश आज दिनया भर म पयटन का पयाय बन चका है और पयटक को आकिषत करने के मामले म पि मी देश को मात भी दे रहा है. वैसे आकड़े तो हर साल बदलते रहते ह िफर भी थाईलड क राजधानी बकाक आज दिनया का वह शहर (Most Visited City of the World) बन गया है जहाँ सबसे अिधक िवदेशी पयटक आते ह, परत िकसी खास शहर के बजाय सबसे अिधक िवदेशी पयटक खचने वाले परे देश (Most Visited Country of the World) क बात क जाय तो शायद ास पहले नबर पर है 7 करोड़ से कछ यादा आबादी वाले थाईलड म बौ 95 फसदी से यादा है जबिक िहद 0.1 फसदी कल स या 80,000 ह थाईलड म दो थाई ा ण समदाय ह- ा लआग (रॉयल ा ण) और ण धम से बौ ह, लेिकन ये िहद देवताओ क पजा करते ह. चाओ बान (लोक ा ण). सभी थाई लआग (रॉयल ा ण) म य प से थाई राजा के शाही समारोह करते ह, िजसम राजा का रा यािभषेक भी शािमल होता है. इनक जड़ भारत के तिमलनाड से जड़ती ह.. वह, चाओ बान वे ा ण समदाय ह, जो पजा पाठ नह करते ह... थाईलड के सवणभिम हवाईअडडे (Suvarnabhumi Airport In Thailand) पर आपको पाचजय शख (Panchjanya Shankh) और सम मथन (Samudra Manthan) क आकित िदखाई देती है... थाईलड म राजा को राम क पदवी िमलती है (The king gets the title of Rama in Thailand) थाईलड म राजा को राम क पदवी के नाम से जाना जाता है, रामायण यहा रामकेन (Ramakien in Thailand) के प म रा ीय थ है. कई थाई पिटस म रामायण के रग िदखाई देते ह. पेिटग म हनमान को लका के ऊपर उड़ते िदखाया गया है. लबे सघष के बाद इसे 9 अगत 1965 को एक अलग देश घोिषत कर िदया गया.: थाईलड भी पहले मलय का ही िहसा था. हालािक ाचीनकाल म यह भारत के अतगत आता था. ाचीनकाल म थाईलड को यामदेश के प म जाना जाता था. थाईलड म िहद धम क थापना- थाईलड म िहद धम अपस यक धम है, िजसके बाद 2018 तक इसक आबादी का 0.02% है. बौ बहल रा होने के बावजद, थाईलड म बहत मजबत िहद भाव है. लोकि य थाई महाकाय रामिकयन बौ दशरथ जातक पर आधारत है, जो िहद महाकाय रामायण का थाई सकरण है. जब तक थाईलड म खमेर सा ा य स ा म था, तब तक वहा िहद धम मख धम बना रहा. पर, जैसे ही जयवमन VII (शासनकाल 1181-1218) इस े के राजा बन, िथितया बदलने लगी. खमेर सा ा य अपने साथ िहद धम लेकर आया और थाईलड ने तेजी से इस समिवत िव ास को अपनाया. ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मबई से उड़ान भरते हए हम थाईलड के एअरपोट "सवणभिम एअरपोट " पर उतरे. यहाँ से हम पटाया जाना था. बस लगाई जा चक थी. लबी या ा करने के प ात हम अपनी िनधारत होटेल सटारा पहँचे और राि िव ाम िकया. पटाया शहर. बकॉक क पटाया िसटी एक खबसरत सम तट रसॉट है जो थाईलड क खाड़ी के पव तट पर िथत है और अपने आकषक सम तट, वाटर पाक, ाकितक सदय और धािमक मिदर िलए िस है. पटाया िसटी अपनी नाईट लाइफ क वजह से दिनया भर म सबसे यादा घमी जाने वाली जगह म से एक है. जो भी पयटक एक बार पटाया िसटी क या ा कर लेता है तो वह अपनी या ा के शानदार अनभव को कभी नह भल पाता है. पटाया शहर अपने िचिड़याघर, थीम पाक, वनपित उ ान, मिदर, बाजार, नाईट लाइफ और वाटर पोटस क वजह से दिनया का एक मख पयटन थल है. पटाया िसटी तीन भाग म िवभािजत है उ र, मय और दि ण जो एक दसरे से थोड़ा अलग है। यह शहर अपने ाकितक सदय का आनद लेने के िलए हर साल बड़ी स या म पयटक को अपनी तरफ आकिषत करता है। बकॉक के बाद दसरा मख पयटन थल पटाया है. यह बकॉक से करीब 165 िकलोमीटर दर है. बकॉक से पटाया तक पहचने म करीब आधा िदन लग जाता है. कहते ह िक पटाया कभी न सोने वाला एक शहर है, यहा रातभर चकाच ध रहती है, गािड़या का रातभर सड़क पर दौड़ना, रातभर होटल के रसेशन काउटर का खला रहना, िडको पाट और सम तट पर बसे होने के िलए पटाया को जाना जाता है. यह जगह घमने-िफरने लायक सबसे बेहतर जगह है, जो सैलािनय को अपनी ओर आकिषत करती है. पटाया नीले सम क उठती लहर के बीच हरयाली के मदमत नजार क सौगात देता है, िजससे म और अय सैलानी यहा िखचे चले आते ह. पटाया म अि तीय सम ी तट, ीप और पाक ह. यहा का िस ीप " कोह लन ीप" है, िजसे बोलचाल म कोरल ीप कहते ह. यहा आप बहत से वॉटर पोटस का आनद ले सकते ह. घमने के िलए यहा पर कटी िकराए पर िमलती है. पटाया मनोरजन के शहर के नाम से भी मशहर है और यहा पर वॉिकग ीट है. इसके दोन िकनार पर काफ इमारत और नाइट लब जैसे गोगो बार, िपयर िडको लब, हवाई लब, आयरन लब और एस जोन आिद ह. यहाँ रहते हए हमने पटाया बीच, लोिटग माकट,कोहलाण, अडरवाटर वड देखा,इसके प ात वािकग ीट का आनद िलया और अलगकण शो देखा. पटाया नाइटलाइफ़ थल पटाया का ये 1 ( एक) िकमी लबा वॉिकग ीट आपको कछ ही ण म रग-िबरगी दिनया क सैर करा देगी. कतार से लगे िटम-िटमाते लब आपको अपनी तरफ आकिषत करे िबना मानगे नह. अगर आप पाट करने के इछक नह ह तो आप ह. यहाँ का सगीत आपको पैर िथरकाने पर मजबर कर देगा और आप पाट के परदे बन जाएगे. माहौल म परी तरह कैसे रमा जा सकता है, ये आपको यहाँ आकर ज़ र पता चल जाएगा. आप अपना परा हता यहाँ िबताना चाह तो िबना िकसी िनराशा के िबता पाएगे, परा हता कैसे कट गया, पता ही नह चल पाएगा. लोिटग माकट पटाया. ी भदयाल ीवा तव गोवधन यादाव ( लोिटग माकट के पास बने हाथी क ितकित के साथ िलए गए िच .) पटाया म शाम को बेहातारीन बनाने के िलए एक सदर िवकप है िक पयटक यहाँ के बने िथयेटर को अवय देखे. एक शो क िटिकट एक हजार पया है. एक शो का हजार पया देना, पहले पहल आपको एक हजार पये का िटिकट खरीद करने म महगा सौदा लगेगा,लेिकन शो देखकर आपक तबीयत खश हो जाती है. भारतीय िफ़म के गाने के साथ चलने वाले बेहतरीन नय देखकर आप वाह कह उठगे. िफ़र दसरे िकसी गाने पर, दसरा बैक- ाऊड. टेज तो वही रहता है लेिकन बैक- ाऊड बदलता जाता है. 2 घटे का यह शो आपको मनोरजन से भर देगा. इस शो म चमचमाती पोशाक म कलाकार का डास करते हए कहानी कहने का बहत ही उदा दशन होता है. शाम को बेहतरीन बनाने का ये बहत ही शानदार िवक प है. पटाया म दो िदन कैसे बीत गए,पता ही नह चल पाया. अब हमारा अगला पड़ाव था बकाक क ओर. बकाक क सतरह मिजला होटेल फ़रामा म हम लोग के िलए आरि त िकया गया था. बकाक थाईलड क राजधानी और सबसे अिधक आबादी वाला शहर है. इस शहर का का थाई नाम ग थेप महा नखोन (Krung Thep Maha Nakhon) है. ये शहर अपने ीट लाईट और साकितक चीज के िलए बहौत जाना जाता है यह शहर अपने पय़टन थल क वजह से दिनया के सबसे अिधक देखा जाना वाला शहर है. बकाक म िलए गए कछ यादगार िच . घर के सामने थािपत मिदर पिलस कमी र / सािहयकार ी राय.के साथ लेखक. बकाक म िलए गए कछ िच- (1) लोग अपने घर के सामने अपने ई देवता को थािपत करते ह तािक बरी आमा का वेश नह हो सके . (2) बाए से ी ( व) िदवाकर भ (सपादक-आधारिशला ) गोवधन यादव (इस लेख के लेखक) ी जयकाश रथ "मानस" एव ी भदयाल ीवा तव. बाए से दाए- ( ी पी याल ीवा तव, ी जयकाश मानम गोवधन यादव, ी िवभित नारायण राय (पिलस कमी र) सधीर , ी अशोक ) वाट अण वाट अण बकॉक के सबसे आयजनक बौ मठ म से एक है. इस वाट अण का िडजाइन थाईलड म िथत अय मिदर और मठ से काफ अलग िदखता है. इस मिदर क सबसे खास बात यह है िक यह पानी के ऊपर खड़ा हआ है. यह वाट वण चायो ाय नदी के पि मी तट पर िथत है. इस मिदर को एक और नाम वाट चग के प म भी जाना जाता है. यह मिदर देखने म काफ यादा खबसरत एव आकषक िदखता है. ये सारे िच अण वाट के ही ह. (अण वाट क िदवार पर सविणम िच क रामकथा पर आधारत िच क खला देखी जी सकती है). ००००० तीसरे िदन हम बकाक क ओर रवाना हए और हमने अपनी िनधारत होटेल " फ़रामा " म िशट हए. वहाँ रहते हए हमने बकाक िसटी का भमण िकया. दसरे िदन सबह सात बजे हम "टाइगर टपल" के िलए रवाना होना था, जो यहा से करीब दो सौ िकमी.दर था. .जगल सफ़ारी के साथ ही हमने कचनाबरी का यिजयम भी देखा.तथा इसी से लगा हआ बौ मठ म ब क िश ा हण करते नह बालक को. यहाँ बड़ी सया म भारातीय िनवास करते ह. आप सभी ने िमलकर एक देवी मिदर क थापना क है. सारे भारतीय ित रिववार इस मिदर म िबना िकसी नागा के उपिथत होते ह सामिहक पजा-पाठ करते ह और साथ िमल बैठकर भोजन करते ह. जब यह बात उह पता चली िक भारतीय का एक दल मण करने के िलए थाईलड आया है. उहने हम आमि त िकया. सभी को समािनत िकया और काय म मिदर के हाल म ही सपन करने क ाथना क. थाईलड म बसे अपने भारतीय भाइय के बीच हमने काफ़ समय िबताया. ००००० थाईलड क या ा से आए काफ़ समय बीत चका है, लेिकन उसक सनहरी याद आज भी चमकत करती ह. ------------------------------------------------------------------------------------------------------------- बालसा हय संगो ी के संयोजक/बालवा टका के संपादक डा. ी.भलाल गगजी यहाँ भू-गिभत जल चटान म लगे गोमुख से िशविलंग पर िनरतर झरने के प म िगरता रहता है. यह थल तीथ- थान माना जाता है तथा लोग इस कु ड म ायः नान करने आते है. थाम दालान के ार के सामने व णु क एक वशाल मूित खड़ है. कु ड क धािमक मह ा है. कु ड के नीकट ह माहाराणा रायमल के समय का बना एक छॊटा सा जैन म दर है., जस पर कनड़ भाषा म िलखा लेख है. संभवतः इसे द ण भारत से लाया गया होगा. गोमुख-कु ड म अनेक कार क मछिलयां ह जो चने डलने पर ऊपर जा जाती ह. इस वशाल कले म राणाओं के साथ फ़ौज भी रहा करती थी. पानी क समया को यान म रखकर शायद इसका िनमाण कया गया था. यहाँ के सु दर य को देखकर या ी ठगा सा रह जाता है. गोमुख-कु ड देखकर बाहर आपने पर कुछ दर क दर पर द ण क ओर जाने वाली सड़क के दोन ओर दो जलाशय दखाई देते है. सड़क के प म क ओर का जलाशय हाथी-कु ड के नाम से जाना जाता है, जहाँ कभी हाथी पानी पया करते थे. सड़क के पूव क ओर का जलाशय “खातण बाव (खातण बावड़) के प म िस है. सिमदे म दर....... वजय तंभ के द ण म सिम े र महादेव का एक ाचीन म दर थत है. म दर के दवार के पीछे वशालकाय िशव क मूित है. िशव के तीन मुख “सत” ( स यता), र” रज “ (वैभव) व “तम” ोध) का तीक है..कहते ह इस म दर का िनमाण मालवा के राज भोज के करवाया था. इसी म दर के ागंण म एक िशलालेख ११५० ई. का है. महासती- थल- वजय- तभ व सिम े र म दर के बीच एक खुला समतल भाग महाराणाऒं व रा य-परवार का मशान- थल है, जहाँ अनेक ाणय ने अपने पित क िचता म जलकर सती- था का पालन कया था. इन महवापूण थलओं के अलावा ृ ं गार चंवर, महाराणा कुंभा के महल, फ़तहकाश महल, सतवीस देवरम जयमल पता के महल, नौगजा पीर क क , खातन रानी का महल, भा सी, च ंघ बीका खोह राजटला, मृगवन, िच ौड़-बुज , मोहर मगर, गोरा-बादल के मकानॊं के गु बज आ द देखे जा सकते ह. . .
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