Monday, 2 June 2025

 यात्रा (4)

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                                    अद्भुत -अकल्पनीय  किन्नर कैलाश

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दरअसल हम यात्राओं को अपनी व्यस्त जीवन-चर्या का एक अंतराल या छुट्टियाँ बिताने का एक तरीका समझते हैं. ठीक भी है. परन्तु मेरी समझ के अनुसार यात्रा एक तलाश होती है--अपनी और उस अछोर जीवन की, उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है. इसीलिए हर यात्रा से कुछ न कुछ मिलता जरुर है.

यात्राएँ हमें भीतर से समृद्ध करती हैं. हमारे जीवन को गहराई देती है. हमें देना और जीना दोनों सिखाती हैं. किसी भोर का उगता सूरज, कोई बल खाती अल्हड़ नदी के मंत्रमुग्ध कर देने वाले गीत की स्वर-लहरी, दूर-दूर तक फ़ैला कोई मैदान, या चारागाह या फ़िर दूर-दूर तक फ़ैली, नीलगगन को स्पर्ष करती प्रतीत होती पर्वतों की श्रेणियाँ, कोई सिंदुरी शाम, दूर कहीं किसी गाँव से आती ढोल-ढमाके की थाप, तांसे, झांझ-मंजीरों आदि की झंकार या फ़िर शहनाई की कोई मीठी सुरीली धुन, पीछे छूटती दृष्यावलियां, हमारे भीतर रच-बस जाती है. यही तो हम सब के जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर मेंजगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिसकी आभा में हम उस सब को पहचान पाते हैं, जो हमारा अपना जीवन है.

इस विराट प्रकृति की वंदना करते हुए मुझे बरबस ही श्री नरेश मेहता जी कि कविता-"चरैवेती-जन-गरबा"की याद हो आती है. वे लिखते हैं.(एक अंश)

चलते चलो, चलते चलो,

सूरज के संग-संग चलते चलो,

चलते चलो.......

नदियों ने चलकर ही सागर का रूप लिया

मेघों ने चलकर ही धरती को गर्भ दिया

रुकने का मरण नाम

पीछे सब प्रस्तर है

आगे है देवयान,

युग के ही संग-संग चलते चलो

मानव जिस ओर गया नगर बसे

 तीर्थ बने

तुमसे है कौन बड़ा

गगन-सिंधु मित्र बने

भूमा का भोगो सुख,

नदियों का सोम पियो

त्यागो सब जीर्ण वसन

नूतन के संग-संग चलते चलो.

बस, इसी तरह चलते-चलते हम कब 6050 मीटर की ऊँचाई पर स्थित कालपा आ पहुँचे., पता ही नहीं चल पाया. मुझे होटेल में जो कमरा अलाट किया गया था, वह पहली मंजिल पर था, जहाँ से बैठकर मैं किन्नौर कैलाश की अद्भुत छटा को जी भर के निहार रहा था. अद्भुत-अकल्पनीय. एक ऐसा दृष्य, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था. आँखें पलक झपकना ही भूल गई थीं. तभी तो श्रीकृष्ण जी ने हिमालय के बारे में भगवत गीता में कहना पड़ा-"मेरा निवास पर्वतों के राजा हिमालय में है."इसी तरह स्वामी विवेकानंद जी ने हिमालय को महिमा मण्डित करते हुए कहा था-"हिमालय प्रकृति के समीप है. वहाँ अनेक देवी-देवताओं का निवास है. महान हिमालय...देवभूमि."

किन्नर कैलाश हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में तिब्बत सीमा के समीप है. यह स्थान हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है. इस पर्वत की खास विशेषता है कि समुद्र तल से 17200 फ़िट की ऊँचाई पर 79 फ़िट का प्राकृतिक शिवलिंग है, जो दिन में कई बार रंग बदलता है. सूर्योदय से पहले सफ़ेद, दूर्योदय होने पर पीला, मध्यान्ह काल में लाल, फ़िर शाम के समय काला हो जाता है.

ऐसा क्यों होता है? इस रहस्य का पता आज तक कोई नहीं लगा पाया है. ling

 

किन्नौर के निवासी इसको दिव्य शक्ति का चमत्कार मानते हैं. हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये स्फ़टिकीय रचना है. अतः अलग-अलग दिशाओं से पड़ने वाली सूर्य की किरणों के कारण इसका रंग बदलता रहता है.

किन्नर कैलाश का पौराणिक महत्व- किन्नर कैलाश के बारे में बहुत सी मान्यताएं प्रचलित है. ऐसी भी मान्यता है कि इसी पर्वत पर पहली बार शिव और पार्वती का मिलन हुआ था. कुछ विद्वानों का कहना है कि महाभारत काल में किन्नर कैलाश का नाम "इन्द्रकीलपर्वत"था, यहाँ भगवान शिव और अर्जुन का युद्ध हुआ था. साथ ही अर्जुन को पासुपातास्त्रकी प्राप्ति हुई थी. एक मान्यता ये भी है कि पांडवों ने अपने वनवास काल का अंतिम समय इसी जगह पर गुजारा था. किन्नर कैलाश को वाणासुर का कैलाश भी माना जाता है. कुछ विद्वान तो ये भी कहते हैं कि यहाँ भगवान कृष्ण के पोते अनिरुध का विवाह ऊषा से हुआ था.किन्नर कैलाश हिमाचल प्रदेश का बद्रीनाथ भी कहलाता है. बहुत से लोग इसे रॉककैसलके ( Rock Chaslche )के नाम से भी जानते हैं. इस शिवलिंग की परिक्रमा करना बहुत ही जोखिम भरा होता है.

चुंकि हमारा भ्रमण-कार्यक्रम चण्डीगढ़ से शुरु होकर शिमला, सराहन, सांगला, काल्पा तथा काजा तक का था. अतः जाते समय काल्पा में पूरा दिन. और लौटते समय भी हमें फ़िर से काल्पा में रुकने का सुअवसर मिला और इस तरह हमें दो बार किन्नर कैलाश के दिव्य दर्शनों का पुण्य लाभ मिला. किन्नर कैलाश की परिक्रमा का कोई कार्यक्रम हमारी भ्रंमण-सूची में था भी नहीं.

इसका नाम किन्नर कैलाश कैसे पड़ा?

पुरातन काल में में लिखी सामग्रियों के अनुसार किन्नौर के निवासी को किन्नर कहा जाता है. लोग अक्सर इसका अर्थ यह भी लेते है कि किन्नर माने आधा नर और आधी नारी. जबकि किन्नर एक विशेष प्रकार के (छॊटे) देवता होते हैं, जो संगीत और गायन में विशेष दक्षता रखते हैं और अपने से बड़े देवताओं को गा-बजाकर प्रसन्न रखते हैं.

भारत मेंसंगीत की परंपरा अनादिकाल से ही रही है. हिन्दुओं के प्रायः सभी देवी-देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है. विष्णु के पास शंख है,, शिव के पास डमरू है, नारद मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, वहीं भगवान श्रीकृष्ण के पास बांसुरी है..

चुंकि गंधर्वों और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना जाता है. खजुराहो का मन्दिर हो या फ़िर कोणार्क का सूर्य मन्दिर. इनकी दीवारों पर गंधर्वों और किन्नरों की मूर्तियाँ आवेष्ठित की गई है.

संगीत का विज्ञान- हिन्दू धर्म के अनुसार संगीत मोक्ष प्राप्त करनेका साधन है. संगीत से हमारा मन और मस्तिस्क पूर्णतः शांत और स्वस्थ हो सकता है. भारतीय ऋषियों ने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से ही विद्यमानथीं. उन ध्वनियों के आधार पर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की थी.

हमारे अपने देश की लोक-संस्कृति का मूल स्वर है "उत्सव".और "पर्वों"की परंपरा. पर्व शब्द ही पर्वत से बना है. पहले कम ऊँचीं चोटी, फ़िर उससे ऊँचे, फ़िर उससे ऊँचे पर्वत दिखाई देते हैं, जोसही अर्थों में "पर्व"ही है जो हमारी चेतना को उत्तरोत्तर ऊँचाइयों की ओर ले जाते हैं.

प्रकृति और मनुष्य में गहरा रिश्ता है, अनादि नाता है. उसने जो कुछ भी सीखा प्रकृति से ही सीखा है. चलती हवा ने उसे मस्ती करना सीखाया. बहते झरनों और नदियों की रवानी ने उसे गाना सिखाया. खिलते फ़ूलों ने उसे मुस्कुराना सिखाया. नवस्पतियों से उसे शीतलता का आभास हुआ. याद रखिए, जहाँ वनस्पति है, वृक्ष हैं, हरियाली है, आसमान से बातें करते पर्वत शिखर हैं, वहाँ राग होगा, प्रेम होगा.

किन्नर कैलाश अपनी इन्हीं विशेषताओं के लिए जाना और माना जाता है. आप एक कोने में बैठकर जी भर के उसे निहारें. फ़िर आँखे बंद कर उसकी पावन छवि को अपने मन-मस्तिस्क की ओर ले जाएं. आपका चंचल मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगेगा. मन के शांत होते ही आपके अन्दर एक अद्भुत संगीत बजने लगेगा. एक ऐसा संगीत, जिसे किन्नर अपने आराध्य देव महादेव को प्रसन्न रखने के लिए बजाया करते हैं.( एक अनुभव जो मुझे हुआ)

बिनासंगीत केजीवन राग कैसे बज सकता है? जिनके जीवन में संगीत नहीं हैं, प्रेम नहीं है वे रोजमर्रा के तनाव और दवाबों के चलते लोग खुद से हारने के आदि हो जाते हैं. हारा हुआ आदमी अपने आपको अक्षम, अवश और निःसहाय समझने लगता है. थके हुए मन और शिथिल देह के साथ उलझन से घिरे जीवन में किसी रस की निस्पत्ति नहीं होती. "रस"याने आनन्द. आनंद का न होना, ही आदमी को नैराश्य के भंवर में डूबो देने के लिए पर्याप्त है. अतः नीरस जीवन को रसमय बनाने के लिए "यात्रा"ही एक ऐसा मौका है...अवसर है, जब हम और आप अपने ही बुने जाल से बाहर झांकने की हिम्मत जुटा सकते हैं.

यह सब लिखते हुए मुझे "अज्ञेय" जी की कविता की चंद लाईनें याद आती है      

                        "मंदिर से, तीर्थ से, यात्रा से                                                                                                                         हर पग से, हर सांस से                                                                                                                                कुछ मिलेगा, अवश्य मिलेगा,                                                                                                              पर उतना ही जितने का तू है अपने भीतर से दानी"

                                                ( पार्श्व में किन्नर कैलाश दृष्टव्य है )

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103, कावेरी नगर,छिन्दवाड़ा (.प्र.) 480001                                            गोवर्धन यादव

09424356400

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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