कहानी सग्रह -ये रात फ़िर नही आएगी
कहानी संग्रह
अपने-अपने आसमान.

चमत्कारी रात
ये रात फ़िर नहीं आएगी.
ये रात फ़िर न आएगी.
(लोक-कथा पर आधारित- रोचक ढंग में)
शरद पुर्णिमा का दिन था. चांद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था. मौसम बड़ा सुहाना हो गया था. रात के बारह बजे सारा जंगल आराम से सो रहा था. चारों ओर शांति का साम्राज्य था. पॆड़ की एक डाल पर बन्दर और बन्दरिया बैठे जाग रहे थे और दूसरी डाल पर तोता और मैना बैठे हुए थे. यह वह समय था जब पशु-पक्षी एक दूसरे की भाषा समझते थे.
तोता बोला:-“मैना, रात नहीं कट रही है. कोई ऎसी बात सुनाओ कि वक्त भी कट जाए और मनोरंजन भी हो.” मैना मुस्कुराई और बोली:-“ क्या कहूँ आप बीती या जगबीती. आप बीती में भेद खुलते हैं और जगबीती में भेद मिलते हैं”. तोता होशियार था, बोला-“ तुम तो जगबीती सुनाओ”. मैना ने कहा:-“ आज की रात एक चमत्कारी रात है. आज ही के दिन चन्द्रमा से अमृत बरसेगा. अमृत की कुछ बूंदे कमलताल में भी गिरेगी, जिससे इसका पानी चमत्कारी गुणॊं से युक्त हो जाएगा. यदि कोई प्राणी आधी रात को इस कमलताल में कूद जाए तो आदमी बन जाएगा.”. तोता बोला- “:क्या सचमुच में ऎसा हो सकता है”. मैना ने कहा :”जो प्रेम करते हैं, वे सवाल नहीं पूछते, भरोसा करते हैं”.तोते ने मैना से कहा “ तो फ़िर देर किस बात की. चलो हम दोनो तालाब में कूद पड़ते हैं और आदमी बन जाते हैं”. मैना ने कहा,” अरे तोता, हम पंछी ही भले. अभी तू आदमी के फ़ेर में नहीं पड़ा है, इसलिए चहक रहा है. हम अपनी ही जात में बहुत खुश हैं.”
तोता-मैना की बातें बन्दर और बन्दरिया ने सुनी तो चौंक पड़े. अधीर होकर बन्दरिया ने बन्दर से कहा -“ साथी आओ..कूद पड़ें.” बन्दर ने अंगड़ाई लेते हुए कहा- “अरे छॊड़ रे सखी, हम ऎसे ही खुश हैं. एक डाल से दूसरी और दूसरी से तीसरी पर छलांग मारते रहते हैं. पेड़ों पर लगे मीठे-मीठे फ़ल खाकर अपना गुजर-बसर करते हैं. न घर बनाने की झंझट और न ही किसी बात की चिन्ता. हमें क्या दुख है. अपने दिमाक से आदमी बनने का ख्याल निकाल दे”. बन्दरिया आह भर कर बोली-“ ये जीवन भी कोई जीवन है? मैं तो तंग आ गई हूँ इस जीवन से. मुझे यह सब करना अच्छा नहीं लगता. आदमी की योनि में जन्म लेकर मैं दुनियां के सारे सुख उठाना चाहती हूँ . देखो, मैंने अपना मन बना लिया है और मैं अब तालाब में कूदने जा रही हूँ. यदि तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो तो मेरा साथ देना होगा. मैना की बताई घड़ी बीतने वाली है, सोच क्या रहे हो, आओ पकड़ो मेरा हाथ और कूद पड़ो ”. बन्दरिया की बात सुनकर बन्दर हिचकिचाने लगा. बोला-“ तुम भी मैना की बातों में आ गयी. पानी में तो कूद पड़ेगे, लेकिन किसी जहरीले सांप ने काट लिया तो मुफ़्त में जान चली जाएगी”. बन्दरिया समझ गयी कि बन्दर साथ न देगा. घड़ी बीतने ही वाली थी. बन्दरिया चमत्कार देखने के लिए उत्सुक थी, झम्म से कमलताल में कूद पडी. आश्चर्य, बन्दरिया की जगह वह सोलह साल की युवती बन गई थी.
उसके रुप से चांदनी रात जगमगा उठी. डाल पर बैठे बन्दर ने जब उसका अद्भुत रूप देखा तो पागल हो उठा. उसने तत्काल फ़ैसला लिया कि वह भी कमलताल में कूदकर आदमी बन जाएगा. उसने डाल से छलांग लगाया और तालाब में कूद पड़ा, लेकिन वह शुभ घड़ी कभी की बीत चुकी थी. वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा.
दिन निकला. थर-थर कांपती युवती, सूरज की गुनगुनी धूप में अपना बदन गर्माने लगी थी. तभी संयोग से एक राजकुमार उधर से आ निकला. उसने उस रुपवती युवती को देखा तो बस देखता ही रह गया. उसने अपने जीवन में इतनी खूबसूरत युवती इसके पहले कभी नहीं देखा थी. देर तक अपलक देखते रहने के बाद, वह उसके पास पहुँचा और अपना उत्तरीय उतारकर उसके कंधो पर डाल दिया. फ़िर अपना परिचय देते हुए कहा – “-हे सुमुखी...सुलोचनी..मैं इस राज्य का राजकुमार हूँ और शिकार खेलने के लिए इस जंगल में आया हूँ. इससे पहले मैंने तुम्हें यहाँ कभी नहीं देखा. तुम्हें देखकर यह नहीं लगता की तुम इस लोक की वासी हो. हे ! त्रिलोक सुन्दरी बतलाओ, तुम किस लोक से इस धरती पर अवतरित हुई हो और तुम्हारा क्या नाम है ?”.
एक अजनबी और बांके युवक को सामने पाकर वह शर्म से छुईमुई सी हुई जा रही थी. शरीर में रोमांच हो आया था. सोचने –समझने की बुद्धि कुंठित सी हो गई थी. वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि प्रत्युत्तर में क्या कहे.? क्या उसे यह बतलाए कि कुछ समय पूर्व तक वह बन्दरिया थी और अर्धरात्रि में इस कमलताल में कूदने के बाद, एक सुन्दर-सुगढ युवती बन गई है? देर तक नजरें नीचे झुकाए वह मौन ओढ़े खड़ी रही.
राजकुमार ने मौन को तोड़ते हुए कहा:-“ मैं भी कितना मुर्ख हूँ, जो ऎसे-वैसे सवाल पूछ बैठा. मुझे यह सब नहीं पूछना चाहिए था. देवी माफ़ करें. मेरी एक छॊटी सी विनती है, उसे सुन लीजिए. तुम्हारी यह कमनीय काया जंगल में रहने योग्य नहीं है. तुम्हारे ये नाजुक पैर उबड़-खाबड़ और कठोर धरती पर रखने लायक नहीं है. फ़िर जंगल के हिंसक पशु तुम्हें देखते ही चट कर जाएंगे. मैं नहीं चाहता कि तुम उनका शिकार बनो. तुम्हें तो किसी राजमहल में रहना चाहिए. तुम कब तक इस बियाबान जंगल में यहाँ-वहाँ भटकती रहोगी. मेरा कहा मानो और मेरे साथ राजमहल में चली चलो. मैं दुनिया के सारे वैभव, सुख-सुविधाएँ तुम्हारे कदमों में बिछा दूँगा. तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूँगा. पूरे राजमहल में तुम्हारा ही हुक्म चलेगा. देर न करो और चली चलो मेरे साथ”.
“शायद सच कह रहे हैं राजकुमार, अब यह कमनीय काया जंगल में रहने लायक नहीं रह गई है. उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अब वह बन्दरिया नहीं, एक नारी बन गई है और एक नारी को अपना तन ढकने के लिए कपडॆ चाहिए, फ़िर तन सजाने के लिए आभूषण चाहिए. अब वह पॆड पर नहीं रह सकती. उसे रहने को घर चाहिए और भी वह सब कुछ चाहिए,जिसकी सुखद कल्पना एक नारी करती है. यह ठीक है कि उसका मन अब भी अपने प्रिय में रम रहा है, लेकिन वह उसकी आवश्यक्ताऒं की पूर्ति नहीं कर सकता. उसे तो अब चुपचाप राजकुमार का कहा मानकर उसके साथ हो लेना चाहिए इसी में उसकी भलाई है”. यह सोचते हुए उसने राजकुमार के साथ चलने की हामी भर दी थी. घोडॆ पर सवार होने के पहले उसने अपने प्रिय को अश्रुपुरित नेत्रों से देखा और हाथ हिलाकर बिदा मांगी.
बन्दर ने देखा कि उसकी प्राणप्रिया राजकुमार के साथ जा रही है, तो उसने उन दोनो का पीछा किया. कहाँ घोडॆ की रफ़तार और कहाँ बन्दर की दुड़की चाल. भागता भी तो बेचारा कितना भागता.? दम फ़ूलने लगा था. आँखों के सामने अन्धकार नाचने लगा और अब मुँह से फ़ेस भी गिरने लगा था आखिरकार वह बेहोश होकर गिर पड़ा.
संयोग से उधर से एक महात्मा निकल रहे थे. वे त्रिकालदर्शी थे. बन्दर को देखते ही सारा माजरा समझ गए. उन्होंने अपने कमण्डल से पानी लेकर उसके मुँह पर छींटॆ मारे. बन्दर को होश आ गया. होश में आते ही बन्दर फ़बक कर रो पड़ा और उसने महात्माजी से अपना दुखड़ा कह सुनाया. महात्मा ने उसे धीरज बधांते हुए कहा कि तुम्हें अपने साथी पर भरोसा करना चाहिए था. यदि तुम भरोसा करते तो ये दिन न देखने पड़ते. खैर जो होना था, सो हो चुका. अब तुम किसी मदारी के साथ हो लो. कुछ दिन बाद तुम्हें तुम्हारी प्रियतमा मिल जाएगी.
संयोग से उधर से एक मदारी आ निकला. उसने बन्दर को पकड़ लिया. अब वह गाँव-गाँव, शहर-शहर करतबें दिखलाता घूमने लगा. एक दिन वह उस राज्य में जा पहुँचा. नियमानुसार उसे राजमहल जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करना था. रस्सी से बंधे अपने प्रेमी को देखते ही वह खुशी से उछल पड़ी. उसने मदारी को पास बुलाया और मुँहमांगी कीमत देकर खरीद लिया. अब वह दिन भर उसके साथ बना रहता. वह जहाँ-भी जाती, उसे अपने साथ ले जाती. रसीले मीठे-मीठे फ़ल खिलाती. खूब बतियाती. उसे खिला-खिला देखकर राजकुमार की आशा बलवती होने लगी थी कि साल बीतते ही वह उसके साथ शादी रचा लेगी. देखते ही देखते पूरा साल कब बीत गया किसी को पता ही नहीं चल पाया.
पूनम की वह अनोखी रात का दिन भी आ गया. चांद अपने पूरे यौवन के साथ आकाश पटल पर चमचमा रहा था. उस समय कमलिनी अपने प्रेमी बन्दर के साथ अटारी पर बैठी हुई थी. दोनो प्रेमी गले में हाथ डाले उस अद्भुत रात का आनन्द उठा रहे थे. संयोग से तोता-मैना कहीं से उड़ते हुए आए और राजमहल की अटारी पर बैठ गए. तोते ने मैना से कहा:- “कितनी सुहानी रात है. ऎसी रात में भला किसे नींद आती है. तुम कोई ऎसी बात सुनाओ, जिससे समय भी कट जाए और मनोरंजन भी हो”.. मैना बोली:-“ आप सुनाऊँ या जगबीती. आप सुनाने में भेद खुलते है और जगबीती सुनाने में भेद मिलते है” तोता होशियार था बोला:- “तुम तो जगबीती ही सुनाओ”.
मैना बोली:-“ तुम्हें याद है अथवा नहीं, यह तो मैं नहीं जानती. बात पिछले साल की है. ऎसी ही चमत्कारी रात थी. उस दिन एक पेड़ की डाल पर बन्दर और बन्दरिया जाग रहे थे. मनुष्य़ तन पाने के लिए बन्दरिया पानी में कूद पड़ी और देखते ही देखते एक सुन्दर युवती में बदल गयी. बन्दर ने जब यह चमत्कार देखा तो वह भी पानी में कूद पड़ा था,लेकिन वह अद्भुत घड़ी बीत चुकी थी. वह बन्दर का बन्दर ही बना रहा. संयोग से युवती बनी बन्दरिया को उसका पुराना प्रेमी मिल तो गया है लेकिन अलग-अलग योनियों में जन्म लेने से उनका मिलन संभव नहीं हो सका. आज की रात भी अद्भुत रात है. ऎसी अनोखी रात फ़िर कभी नहीं आएगी. यदि कोई आधी रात के समय कमलताल में कूद पड़े, तो मनचाही योनि प्राप्त कर सकते हैं.” इतना कहकर दोनों उड़ गए.
तोता और मैना की बातें सुनकर
बन्दर बहुत खुश हुआ. उसका अपना मनोरथ
शीघ्र ही पूरा होगा, यह सोचकर वह
खुशी के मारे वह उछल-उछलकर नाचने लगा. उसे उछलता-कूदता देख कमलिनी को बेहद आश्चर्य हो
रहा था. उसने पूछा कि आखिर क्या बात है जो इतना उछल-कूद कर रहे हो. बन्दर ने चहकते हुए कहा:- “सुना तुमने, मैना क्या कह
रही थी”.
“क्या कह रही थी मैं भी
तो सुनूं?” कमलिनी ने
पूछा.
´”
कह रही थी कि यदि कोई इस कमलताल में कूद पड़े तो मन चाही योनि प्राप्त कर सकता है.
मैं चाहता हूँ कि तुम कमलताल में कूद पड़ो और फ़िर से बन्दरिया बन जाओ. इस तरह हमारा फ़िर से मिलन हो सकता है.”
बन्दर ने अति उत्साहित होते हुए कहा.
उसकी बात सुनते ही वह खिलखिलाकर हंस पड़ी और तब तक
हंसती रही थी, जब तक बेदम नहीं हो गयी. बन्दर समझ नहीं पा रहा था कि उसके हंसने
के पीछे क्या कारण हो सकता है.
उसने अधीर होकर उसका कारण जानना चाहा.
“तुम्हारी बेवकूफ़ी भरी बातों को सुनकर
केवल हंसा ही जा सकता है और मैंने वही किया है. सच कहा है किसी ने कि बन्दर
बेवकूफ़ होते हैं. उनमें अकल केवल इतनी सी होती है...इतनी सी. उसने अपनी तर्जनी के पोर पर अपना अंगूठा रखते हुए कहा था. तुम मुझे सलाह देने वाले कौन होते हो कि
मैं कमलताल में जाकर कूद जाऊँ और बन्दरिया बन जाऊँ और पेट की भट्टी की आग को
बुझाने के लिए तुम्हारे साथ जंगल-दर-जंगल भटकती रहूँ. आज मेरे पास क्या
नहीं है. धन है, दौलत है, राजमहल है, नौकर-चाकर हैं और इससे
भी बढ़कर मुझ पर अपनी जान छिड़कने वाला वाला राजकुमार है, जो आज नही तो कल इस राज्य का राजा बन
जाएगा और मैं महारानी. अरे बुद्धु....मानव तन बड़ी मुश्किल से मिलता है. मैं इतनी बेवकूफ़
नहीं कि तुम्हारे खातिर,
फ़िर उसी योनि में चली जाऊँ.?
जरा ठंडॆ दिमाक से
सोचो, तुम और मैं साथ तो है, भले ही तुम बन्दर की योनि में हो, इससे क्या फ़र्क पड़ता है अतः मेरी मानो
मेरे साथ बने रहो,
अच्छा खाओ-पियो और ऎश करो और एक कोने में
पड़े रहो.” कमलिनी ने कहा.
कमलिनी की बातें सुनकर उसका माथा चकराने लगा . उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह इस तरह से उसके प्यार को ठुकरा देगी. उसे गुस्सा भी बहुत आ रहा था, लेकिन वह जानता था कि गुस्सा करने से विवेक बोथरा हो जाता है और फ़िर बनता काम भी नहीं बन पाता. यह सच है कि वह अब भी उससे उतना ही प्यार करता है, जितना की वह पहले भी करता आया था और हर हाल में उसका साथ छोड़ना नहीं चाहता था. वह तो अपने खोए हुए प्यार को पुनः प्राप्त करना चाहता है. अब उसका दिमाक काफ़ी तेजी के साथ उस ओर सोचने पर मजबूर हो गया था,जिससे वह कमलिनी को पा सकता है.
काफ़ी सोचने और विचार करने के बाद उसके दिमाक में एक योजना आयी, जिसके बल पर वह सफ़ल हो सकता था.
वह राजकुमार के पास जा पहुँचा और
निवेदन करते हुए कहने लगा:-“राजकुमारजी, मैं जानता हूँ कि आप कमलिनी से बेहद प्यार करते हैं और उससे
शादी भी
करना चाहते हैं. वह भी कुछ ऎसा ही चाहती है, लेकिन उसे आपकी यह सूरत अच्छी
नहीं लगती, इसलिए उसने आपसे
एक साल बाद विवाह करने की बात कह कर, आपके प्रस्ताव को टाल दिया था. मैं एक ऎसा उपाय जानता हूँ, जिससे आप अपना चेहरा सुन्दर बना
सकते हैं.” इतना कहकर वह चुप हो गया था और इस बात का इंतजार करने लगा था कि
उसकी बातॊं ने राजकुमार पर कितना असर डाला है.
राजकुमार को लगा कि बन्दर शायद ठीक ही कह रहा है. उसने अधीर होकर बन्दर से उस उपाय के बारे में विस्तार से जानना चाहा. बन्दर ने एक सांस में सारी योजना कह सुनाई.
दोनो मध्य रात्रि में पहाड की उस चोटी पर जा पहुँचे ,जहाँ से उन्हे कमलताल में छलांग लगानी थी. अब बन्दर ने राजकुमार से कहा:-“ आप अपनी आँखें बंद कर लीजिए और हाथ जोडकर प्रार्थना करते हुए उन वाक्यों को दुहराते जाएं जैसा कि मैं कहता जाऊँ”.
राजकुमार ने अपनी आँखें बंद कर ली और प्रार्थना की मुद्रा में अपने हाथ जोड लिए. बन्दर ने कहना शुरु किया:-“ हे प्रभु ! आपने नारद मुनि को हरि का रुप दिया था, कृपया वही रुप मुझे देने की कृपा करें”.बन्दर के कहे वाक्यों को दुहराते हुए राजकुमार ने ताल में छलांग लगा दिया. अब बन्दर की बारी थी. उसने कमलताल में कूदने से पहले कहा कि वह राजकुमार बनना चाहता है, कहकर कूद पड़ा. आश्चर्य राजकुमार बन्दर बन गया था और वह राजकुमार.
राजकुमार ने जब अपना बदला रुप
देखा तो फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगा. बन्दर से राजकुमार बने युवक ने
कहा:-“ अब रोने धोने से कुछ होने वाला नहीं है. आपने जो रुप
मांगा था, वह आपको मिल गया
है. अब केवल एक ही
उपाय शेष है कि या तो आप मेरे साथ राजमहल चला चलें अथवा जंगल की ओर निकल जाएं.
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छुटकारा पाना संभव नहीं
छुटकारा पाना संभव नहीं.
घड़ी की टिक-टिक के साथ ही वह भी जाग रहा था. रात्रि के ग्यारह बज चुके थे और
मार्ग्रेटा अब तक नहीं लौटी थी. नींद से आँखें बोझिल होने लगी थीं, सिर भारी होने
लगा था, बावजूद इसके वह जाग रहा था. जाते समय वह उसकी गाड़ी लेती गई थी और कह गयी
थी कि जल्दी ही लौट आएगी. लेकिन वह अब तक नहीं लौटी थी. उसे लेकर मन के आंगन में
शंका और कुशंका के जहरीले नाग फ़न उठाये विचरने लगे थे. एक विचार आता. मन कहता,
नहीं...ऎसा नहीं हो सकता. तत्काल दूसरा विचार आ धमकता. उसे भी उसका मन स्वीकर नहीं
कर पाता. फ़िर एक विचार कौंधा....हो सकता है कि
नशे की हालत में कहीं उसकी गाड़ी ठुक तो नहीं गई? मन में ऎसा विचार आते ही
वह असहज हो उठा था.
नये विचारों के साथ, नई दुनियां में उड़ान भरने वाली मार्ग्रेटा ने अपनी एक
अनोखी दुनिया बसा ली है. उसके एक नहीं बल्कि कई-कई दोस्त हैं. उसी तरह उसने कई
क्लब भी ज्वाईन कर रखे हैं उसने. उसे कई बार समझाने की कोशिश की कि कहीं उसके साथ कोई हादसा
न हो जाये, या फ़िर कोई उसकी इज्ज्त न लूट ले, उसे ऎसी जगह नहीं जाना चाहिए. वह एक
कान से सुनती और दूसरे से बाहर निकाल देती. इसके उलट वह उसके उपदेशों को सुनकर उसे
एक जाहिल गवांर या मिसफ़िट होने का लेबल लगाते हुए कहती...दुनियां कहां से कहां
निकल गई है मिस्टर और तुम हो कि अब तक पुरानी जड़ों को पकड़े बैठे हो. रही इज्जत
लूटने की तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह मेरी ओर आंख उठाकर भी देख सके.
जिम में जाते हुए मैंने अपने बचाव के सारे हुनर सीख रखें है. इसलिए मुझे डर नहीं
लगता. एक फ़्रीलांस रिपोर्टर को तो हिम्मतवर होना बहुत जरुरी होता है..फ़िर हम इस
रंगीन दुनिया में आए है तो हमें उसी तरह रंगीनियत में जीना चाहिए, उसका आनन्द
उठाना चाहिए. यहीं नहीं और भी तरह-तरह के तर्क लगा कर वह उसे चुप रहने पर मजबूर कर
देती.
मन में एक बार उठ खड़ी हुई विचारों की आंधी थमने का नाम नहीं ले रही थी. उसने
निर्णय किया कि उसे अब सो जाना चाहिए. जो भी होगा सामने आएगा, तब देखा जाएगा. लाईट
बुझा कर उसने चादर को खींचकर अपने पैरों पर डाला ही था कि गाड़ी की आवाज सुनाई दी.
उसे यकीन हो गया कि वह लौट आयी है. दरवाजा हल्के से बंद था. उसने धक्का देकर खोला
और लड़खड़ाते कदमों से चलते हुए अपने कमरे में समा गई. उसने जानबूझ कर चुप्पी साध ली
थी कि व्यर्थ की बकवास में क्यों पड़ा जाए क्योंकि नशे में धुत्त व्यक्ति कुछ
ज्यादा ही विद्वान हो जाता है. ऎसे समय में बात करना उचित नहीं होता.
नींद के बोझ से पलकें भारी होने लगी थी लेकिन घड़ी की टिक-टिक के साथ ही
विचारों की टिक-टिक भी शुरु हो गई थी, जो थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं. बिस्तर पर
असहाय पड़ा वह अपने आपको कोस रहा था और कोस रहा था उस मनहूस घड़ी को जब उसके जीवन
में मार्ग्रेटा का प्रवेश हुआ था. बीते हुए कल के पन्ने फ़ड़फ़ड़ाने लगे थे और वह
उसमें समाने लगा था.
कम्पनी ने उसे एक पाश कालोनी में तीसरे माले पर एक फ़्लैट दे रखा था जो एक
आयताकार जमीन पर निर्मित किया गया था. आयत के चारों ओर बिल्डिंगे खड़ी की गई थीं और
आयत के भीतर एक खेल परिसर का निर्माण किया गया था जिसमें बच्चे खेल खेल सकें.
पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की के ठीक सामने वाली खिड़की जिस पर मोटा पर्दा डला
रहता, इसी में वह रहा करती थी.
एक शाम. जब वह आफ़िस से घर लौटा तो उसने सहज रुप से अपनी खिड़की को खोला और अपनी
दोनों कुहनियों को टिकाते हुए बच्चों को खेलता देखता रहा था. तभी सामने वाली खिड़की
जो शायद ही कभी खुली हो, खुलती है और उसमें एक युवती प्रकट होती है. वह अपने हाथ
हिला-हिलाकर अभिवादन करती नजर आयी. कुछ देर बाद उसने अपनी हथेली को फ़ैलाया और फ़ूंक
लगाते हुए एक लंबा फ़्लाईंग-किस हवा में उछाल दिया था. शायद वह अपने किसी
ब्वायफ़्रेंड के लिए ऎसा कर रही होगी. वह यह समझ नहीं पाया कि ये सब उसके लिए ही
किया रहा है. प्रतिदिन यह क्रम दोहराया जाता रहा और वह एक मूकदर्शक की तरह देखता
रहा.
एक दिन. शाम को आफ़िस से लौटते हुए जैसे ही अपना दरवाजा खोला, एक लिफ़ाफ़ा पड़ा दिखा.
उस पर पाने वाले का नाम नहीं था. उत्सुकतावश उसने लिफ़ाफ़ा खोला. तह किए गए कागज को
सीधा किया. उसमें लिखा था-“ हेलो जानेमन... बड़े बेरुखे हैं आप !. हम प्रायः रोज ही हाथ हिला-हिलाकर आपका
इस्तकबाल करते रहे हैं, फ़्लाईंग-किस देते रहे हैं लेकिन आपने कोई प्रतुत्तर नहीं दिया.
क्या इतना भी नहीं समझते कि एक लड़की अगर इतना कुछ कर रही है तो क्यों कर रही है?
यह सब आपके लिए ही किया जा रहा था. मैं भी एक नामी-गिरामी प्रेस में काम करती हूँ.
घर आकर कोई काम तो रहता नहीं, सो बोर होते रहती हूँ. अकेली हूँ न!. समय काटे नहीं
कटता. चाहती थी कि आपसे दोस्ती जोड़ी जाए तो समय आराम से काटा जा सकता है. आपकी ओर
से कोई पहल न होते हुए देखकर मैंने खुद चलकर यह लिफ़ाफ़ा आपके दरवाजे से अन्दर सरका
दिया था. नीचे मेरा कांटेक्ट नम्बर नोट है, आप इस पर मुझसे संपर्क कर सकते हैं.
मुझे आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी....... मार्ग्रेटा...
पत्र पढ़कर पूरा हुआ ही थी तभी कालबेल घनघना उठी. उसने वहीं से बैठे-बैठे कहा- “प्लीज कम-इन...दरवाजा खुला हुआ है.” वह तब तक नहीं जान पाया कि आने वाला कौन है? शायद
वह इस भ्रम में भी था कि कोई मित्र मिलने आया होगा. सहसा दरवाजा खुला. अपनी सैंडिले
खटखटाते हुए उसने कमरे में प्रवेश किया. उसके प्रवेश के साथ ही खुशबूदार
लैवेण्डर/परफ़्यूम की मादक गंध से पूरा कमरा गमगमा उठा. नजदीक आते ही उसने हाथ
मिलाने के लिए अपनी हथेली को आगे बढ़ाते हुए कहा-“ हाय हैण्डसम..आई एम मार्ग्रेटा...आपकी पड़ौसी....चौंक गए न मुझे
देखकर...मैंने सोचा...जब दोस्ती करनी ही है तो इस बात का इंतजार ही क्यों किया
जाये कि पहल कौन करेगा?. इधर से गुजर रही थी, सो सोचा कि चलकर मिल ही लिया जाये.
अचानक...इस तरह आकर मैंने आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया?”
अचकचा गया था देवेन्द्र कि उसके सामने एक हुस्न की परी अचानक आकर खड़ी हो गई
है. झीने कपड़ों में से झांकता उसका गदराया यौवन और शरीर सौष्ठव को देखकर कहा जा
सकता है कि विधाता ने उसे किसी खास सांचे में ढालकर बनाया होगा. उसकी पलकें झपकना
भूल गईं थीं और वह फ़टी आँखों से उसके माधुर्य का रसास्वादन करने में खो सा गया था.
वह प्रत्युत्तर में बहुत कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन शब्द जैसे गले में आकर अटककर
रह गए थे.
इस तरह एक कातिल हसीना ने उसके जीवन में प्रवेश किया था. रोज फ़ोन लगते.
गुदगुदी बातें होतीं. मदहोश कर देने वाली खुमारी उस पर तारी होने लगती. कभी वह
चुप्पी साध लेती. जानबूझ कर फ़ोन का स्विच आफ़ कर देती.. वह बार-बार फ़ोन लगाता लेकिन
आउट आफ़ कव्हरेज की ट्युनिंग सुनकर उसकी बेचैनी बढ़ जाती. कभी आ धमकती फ़िर एक लंबा
अन्तराल बना लेती. वह यह सब जानते बूझते कर रही थी. जानती थी वह कि उसने अपने यौवन
के मद में डूबो कर जिस तीर का संधान किया है, वह ठीक निशाने पर पड़ा है. वह यह भी
जानती थी कि जितनी ज्यादा बेचैनी बढ़ेगी, उतना ही वह पास आता जायेगा और फ़िर वह इस
कदर अपने आपको उलझा लेगा कि सिवाय मेरे, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा.
बढ़ती बेचैनी अब व्यग्रता के रुप में ढलने लगी थी. उसकी स्थिति कुछ ऎसी होने
लगी थी उसकी जैसे जल बिन मछली की होती है. न खाने-पीने से मन जुड़ पा रहा था उसका
और न ही आफ़िस के काम को वह उतनी तल्लीनता से ही कर पा रहा था.
एक शाम. उसका रुठा हुआ वसंत लौट आया था. वियोग की तपिश से मुर्झाया चेहरा खिल
उठा था. कामनाएं मचलने लगीं थीं. आकाश पटल पर काले कजरारे मेघों को देखकर जिस तरह
मयूरा नाच उठता है, ठीक उसी तरह उसका मन आनन्दित होकर थिरकने लगा था “ कहाँ गायब हो गईं थी मिस मार्ग्रेटा तुम....तुम्हें
देखने को आँखें तरस गईं....कितनी बार मैंने फ़ोन लगाया, लेकिन कनेक्ट नहीं हो पाया...कहाँ चली गईं थीं
तुम “. बिस्तर से उठते हुए उसने कहा.
“ अभी जैसे-तैसे शाम हुई है और आप हैं कि बिस्तर से चिपके पड़े हैं.....क्या बात
है...तबीयत तो ठीक है न !. उसने नजाकत के साथ कहा.
“ नहीं..कुछ ऎसे ही...थोड़ा सिरदर्द हो रहा था.....”
“ लो... इतनी से बात है...अभी दर्द भगाये देते हैं”.
उसने अपना पर्स खोला. एक बोतल निकाली और उठते हुए किचन से दो ग्लास और फ़्रीज
से कुछ नमकीन और पानी की बोतल उठा लाई. बोतल का कार्क खोला और ग्लास में उडेंलकर
बढ़ाते हुए कहा- “ लीजिए...दो घूंट हलक के नीचे उतारिये.....दर्द अभी छूमंतर हो जायेगा”.
“ ये क्या....शायद शराब है?..मैं शराब नहीं पीता”
“कौन कमबख्त कहता है कि ये शराब है...ये जौ के दानों से बनी बियर है.. गर्मी के
दिनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है....जो दिल और दिमाक को ठंडक पहुंचाती
है..... समझे.”
“वाह कमाल की चीज है....सिर दर्द एकदम से गायब हो गया”. चहका था देवेन्द्र.
“ कितनी भीषण गर्मी पड़ रही है...क्या आपको ऎसा नहीं लग रहा..मुझे तो बेहद गर्मी
लग रही है”. कहते हुए उसने अपनी कुर्ती निकाल कर एक ओर रख दिया था. अब वह केवल ब्रेसरी
में उसके सामने बैठी हुई थी. उसके तराशे हुए संगमरी जिस्म को देखकर देवेन्द्र के जैसे होश ही उड़
गए थे..दिल में खलबली से मचने लगी थी. वासनायें धधकती ज्वाला की तरह प्रज्जवलित हो
उठी थीं. उसने आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया था. मदहोशी के चलते
क्या कुछ हुआ, उसे याद नहीं. लेकिन जब वह सोकर उठा तो बिस्तर खाली था. शायद वह जा
चुकी थी.
इसके बाद वह चार-पांच दिन तक दिखाई दी और न ही उसका फ़ोन आया. देवेन्द्र अपनी
ओर से उसे बार फ़ोन लगाकर संपर्क करने की कोशिश करता, लेकिन “आउट आफ़ रेंज” की ट्युनिंग सुनकर उसे खीज होने लगती. मन में विचार आया कि खुद
चलकर उसके फ़्लैट में जाना चाहिए, लेकिन वह हिम्मत नहीं जुटा पाया था.
एक शाम. फ़ोन की घंटी बजी. उसने यह सोचते हुए लपक कर फ़ोन उठाया कि शायद
मार्ग्रेटा का फ़ोन होना चाहिए. अंदाजा सही निकला. उसने एक ही सांस में न जाने
कितनी ही बातें कह सुनायी. शिकायतें दर्ज कराते हुए अब वह अन्दर से पूरी तरह खाली
हो गया था. उसे अब मार्ग्रेटा के जवाब का इंतजार था.
“ देवेन्द्र.. मुझे नौकरी से टर्मिनेट कर दिया गया है और अल्टिमेटम भी दिया गया
है कि मैं एक सप्ताह के भीतर फ़्लैट खाली कर दूं . अब आप ही बतलायें मैं कहाँ
जाऊँ...क्या इतने कम समय में शहर में दूसरी जगह तलाशी जा सकती है? .फ़िर एक अकेली लड़की
को कोई भी इतनी आसानी से फ़्लैट नहीं देगा...पहले तो तरह-तरह के सवाल पूछे
जाएंगे... कई-कई जानकारियां ली जाएंगी, तगड़ी रकम पगड़ी के रुप में ली जाएगी, तब
कहीं जाकर फ़्लैट मिल पाएगा. आप मेरे दोस्त हैं. ऎसी कठिन परिस्थिति में मुझे आपका
साथ चाहिए. क्या हम एक छत के नीचे रहते हुए अपनी दोस्ती का निर्वहन नहीं कर सकते?
मेरे वहाँ रहते जो भी खर्च आएगा, उसमें मैं आपसे शेयर करुंगी. कुछ दिनों की बात
है, दूसरी नौकरी लगते ही मैं आपका फ़्लैट खाली कर दूंगी. मुझे आपके उत्तर की
बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी.”
प्रत्युत्तर में वह कुछ कह पाता, इसके पहले ही मार्ग्रेटा ने फ़ोन काट दिया था.
अब उसकी बारी थी. उत्तर उसे देना था. हाँ कहे या फ़िर सिरे से इंकार कर दे. वह
गंभीरता से सोचने लगा था. “ उसका वर्तमान तो मैं जानता हूँ कि वह एक रईस बाप की इकलौती संतान है,. रही भविष्य की बात,
तो वह उससे अपना फ़्लैट खाली करने को तो कह ही सकता है, लेकिन उस स्थिति में क्या
होगा जब उसके माता-पिता उससे मिलने न आ धमके. वे चार-छ महिने के अंतराल में आते
हैं. चार-छः दिन रुककर लौट भी जाते हैं. लेकिन आने से पहले सूचित जरुर करते हैं.
यदि ऎसा कुछ हुआ तो उसे किसी होटल में तब तक रुकने को कहा जा सकता है,. फ़िर वह
अपनी ओर से कह भी चुकी है कि दूसरी नौकरी लगते ही शिफ़्ट हो जाएगी”. यह सोचते हुए उसने मार्ग्रेटा को फ़ोन लगाया और कहा
कि जब तक तुम्हारे रहने के लिए दूसरी व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक वह उसके साथ रह सकती है.
यही तो चाहती थी मार्ग्रेटा. अपने मन की मुराद पूरा होते देख वह चहक उठी थी.
उसने तत्काल अपना सामान पैक किया और आ धमकी. फ़्लैट में दो बेडरूम थे. एक पर उसने
कब्जा जमा लिया था.
मार्ग्रेटा का साथ पाकर खुश था देवेन्द्र. प्रेमालाप में मगन रहते हुए उसका
दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चल पाता. हाँ, उसके मन में एक शिकायत जरुर बनी
रहती कि भगवान ने रातों को इतनी छॊटी क्योंकर बनाया होगा?.
एक दिन. किसी काम से वह बाहर गया हुआ था. तभी फ़ोन की घटीं टिनटिना उठी. घंटी
बजती रही थी लगातार, लेकिन मारग्रेटा ने जानबूझकर फ़ोन नहीं उठाया था. वह नहीं
चाहती थी कि किसी को पता चले कि वह धर्मेन्द्र के साथ “लिव-इन-रिलेशन” में रह रही है. आने वाला फ़ोन धर्मेन्द्र के पिताजी
का था. घर से निकलने के पहले वे इतल्ला नहीं दे पाए थे. सो स्टेशन पर से उन्होंने फ़ोन
लगाते हुए सूचित करना जरुरी समझा था. उन्होंने आटॊ लिया और सीधे चले आए थे.
कालबेल की आवाज सुनकर उसने यह सोचते हुए दरवाजा खोला कि देवेन्द्र लौट आया है.
दरवाजा खुलते ही उसकी नजर एक अपरिचित व्यक्ति पर पड़ी. उसने देखा. धोती-कुर्ता पहने
उस व्यक्ति ने सिर पर टोपी पहन रखी है और आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ है तथा हाथ में
छड़ी उठा रखी है. देखते ही समझ गई कि हो न हो देवेन्द्र के पिताजी ही होने चाहिए.
वह कुछ कह पाती, उन्होंने भारी-भरकम आवाज में पूछा-“ तुम कौन हो और देवेन्द्र कहाँ है? ऎसा तो नहीं कि
उसने फ़्लैट बदल लिया है, कहीं मैं गलत पते पर तो नहीं आ गया ?”.
“ जी नहीं आप सही पते पर आए हैं...आइए...अन्दर तो आइए...कहते हुए वह पीछे हट ली
थी. अपने जूते खटखटाते हुए वे अन्दर चले आए थे और एक कुर्सी पर बैठ गए थे. बैठते
ही उन्होंने पूछा-“ बेटी, तुम कौन हो, पहचान नहीं पाया. इससे पहले तो तुम्हें यहाँ नहीं देखा?”.
सिट्टिपिट्टी गुम हो गई थी मारग्रेटा की कि क्या जवाब दे. क्या वह यह कहकर
बतलाए कि वह आपके बेटे की लव्हर है...दोस्त है, या यह बतलाए कि वह एक पेईंग-गेस्ट
की तरह यहाँ रह रही है, या कि वह धर्मेन्द्र के साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रही है?.
किसी तरह उसने अपनी बिखरी हुई हिम्मत को समेटते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन शब्द गले
में आकर अटक कर रह गए थे. वह एक बुत की तरह नीची गर्दन लिए खड़ी रह गई थी. उसे इस
बात का भी भय मन में समाया हुआ था कि उसे अस्त-व्यस्त कपड़ों मे देखकर न जाने
उन्होंने क्या कुछ नहीं सोचा होगा उसके बारे में.
पिता समझ गए. न समझने जैसी कोई बात ही नहीं थी और न ही जवाब-सवाल करने की
जरुरत थी. उन्होंने दुनियां देखी है. दुनियां की रीति-रिवाजों से परिचित थे और
जानते थे कि निपट गांव से चलकर शहर आया आदमी किस तरह शहरों की चकाचौंध में अपने को
झोंक देता है. शहर उसे कितना अपना बना पाता है, ये तो वे नहीं जानते, लेकिन इतना
अवश्य जानते है कि गाँव से निकला नौजवान एक बार शहर आता है तो दुबारा पलटकर गाँव
नहीं लौटता. गाँवों में बचे रहते है अपाहिज, लंगड़े, लूले, बिमार, लाचार बूढ़े लोग,
जो अपना सर्वस्व लुटा कर, आशा भरी नजरों से अपने बेटॊं की राह तकते हुए अपनी आँखें
गवां देते है, लेकिन वे निष्ठुर कभी नहीं लौटते. उन्होंने अपने बेटे का वर्तमान और
खुद के भविष्य का आकलन कर लिया था और वापिस लौटने का मन बना लिया था.
कुर्सी से उठते हुए उन्होंने कमरे का एक चक्कर लगाया. टेबल पर बिखरी शराब की
बोतलें और ग्लास देखकर उनकी आँखें नम हो आयी थी. बाहर निकलने से पहले वे इतना ही
कह पाये थे कि देवेन्द्र को बतला देना कि उसके पिता आए थे लेकिन किसी जरुरी काम की
वजह से रुक नहीं पाए.
थका-हारा देवेन्द्र घर लौटा. अपनी बुझी हुई आवाज में उसने बतलाया कि पिताजी आए
थे और तत्काल ही वापिस लौट गए. यह सुनते ही देवेन्द्र सन्न रह गया था. धड़कने तेज
होने लगी थी और आँखों के सामने अन्धकार नाचने लगा था. सोचने-समझने की बुद्धि
कुंठित होने लगी थी. काफ़ी देर तक अवसन्न स्थिति में बने रहने के बाद वह कुछ
सामान्य स्थिति में आने लगा था.
वह गंभीरता से सोचने लगा था कि देवता तुल्य उसके पिताजी गाँव से चलकर उससे
मिलने आए थे और बिना कुछ कहे वापिस लौट गए ?. कैसे क्या बीती होगी उनके मन पर ?.
कितना संताप हुआ होगा उन्हें यहाँ आकर? कितना कुछ सोच रखा होगा उन्होंने मेरे बारे
में? न जाने कितने सपने बुने होंगे उन्होंने मुझ को लेकर और मैं हूँ कि उन सपनों
में रंग नहीं भर पाया?. सोचते-सोचते उसकी रुह कांपने लगी थी और आँखों से आँसू
झरझरा कर बह निकले थे.
मिचमिची आँखों को पोंछते हुए उसने एक बोतल निकाली. कार्क खोला. गिलास में
उंडेला और तब तक पीता रहा, जब तक वह नशे में धुत्त नहीं हो गया था. मारग्रेटा ने
उसे अपनी बाहों का सहारा देते हुए किसी तरह बिस्तर तक लाया और सुला दिया.
मन पर लगे आघातों को शराब के सहारे मिटाया जा सका होता तो न जाने कितने ही
गमॊं से सहज ही में छुटकारा पाया जा सकता है, लेकिन होता है इसके उलट है. नशे की
हालत में आदमी और ज्यादा दार्शनिक हो जाता है...खुद स्वयं से बात करने लगता है और
अक्सर बड़बड़ाने लगता है...चीखने-चिल्लाने लगता है और अजीबो-गरीब हरकतें करने लगता
है.
हड़बड़ा कर उठ बैठा धर्मेन्द्र. वह कितनी देर रात तक नशे की हालत में सोता पड़ा
रहा था, उसे याद नहीं. उसने लाईट आन किया. घड़ी की ओर देखा. रात के पांच बज रहे थे.
उसके ठीक बगल में मारग्रेटा चित पड़ी सो रही थी. लालिमायुक्त उसके होंठों पर मधुर
मुस्कान खेल रही थी. शायद वह कोई हसीन सपना देख रही होगी. अस्त-व्यस्त कपड़ों में
से उसका जोबन बाहर तांक-झांक रहा था. वह इस निश्कर्ष पर पहुंच चुका था कि
मार्ग्रेटा से छुटकारा पाना अब इतना आसान नहीं है. वह उसके बगैर एक पल भी नहीं रह
सकेगा. रही पिताजी से बात करने की,तो वह गाँव जाकर उन्हें सब कुछ बतला देगा. पिता
उदारमना है, मान जायेंगे. मानेंगे कैसे नहीं,..एकलौती संतान जो हूँ मैं उनकी.
उसकी उंगलियां मार्ग्रेटा की उलझी हुई लटॊं से खेलने लगी
थी. देर तक लटॊं से खेलते रहने के बाद अब उसकी हथेली उसकी संगमरमरी देह पर फ़िसलने
लगी थी .
पुष्पा दी.
पुष्पा दी
पुष्पा दीदी का घर बस-
स्टैण्ड से काफ़ी कम दूरी पर है. बस-
स्टैंड से फ़वारा होते हुए निमाडगंज, उसी से लगा है लटकारी का पडाव. यदि कोई रिक्शा
वगैरह न भी लेना चाहे तो बडे आराम से पैदल चलते हुए वहाँ पन्द्रह से बीस मिनट में
आराम से पहुँच सकता है. लेकिन रिक्शा लेना मेरी अपनी मजबूरी थी.
‘ पिछली घटना को मैं आज
तक भूला नहीं पाया हूँ. एक दिन ऐसे ही किसी कार्यक्रम में मुझे दीदी के यहाँ जाने
का अवसर आया.था. बस
से उतरते ही,
मैंने अपना बैग पीठ पर टांगा और यह सोचते हुए पैदल ही चल निकला कि इतनी सी दूरी के लिए क्यों दस_पन्द्रह
रुपया खर्च किया जाएं. गॆट पर पहली मुलाकात दीदी की सास से हुई. मैं शिष्ठाचारवश
हाथ जोडकर नमस्ते कह पाता और उनके चरणॊं में अपना सिर नवा पाता,कि वे बरस पडी;”-कैसे उठाईगिर जैसे चले
आते हैं ?,क्या दस-पांच रुपट्टी का रिक्शा
भी नहीं लिया जाता तुमसे ? पता नहीं कैसे-रिश्तेदारों से पाला पडा है.”कहते हुए उन्होंने अपना
नाक-मुँह सिकोडा था. सुनते ही तन-बदन में आग सी लग गई थी,लेकिन वे दीदी की सास थी,
और पता नहीं बाद में वे उन्हे कितनी खरी-खोटी सुनाती. यह सोच कर मैंने कोई जबाब
देना उचित नही समझा और चुपचाप वहाँ से खिसक जाना ही श्रेयस्कर लगा था मुझे. उस
घटना के बाद से शायद ही कोई ऐसा अवसर आया हो और मैंने रिक्शा न लिया हो.
रिक्शा अपनी गति से भाग रहा था. लगभग उससे दूनी रफ़्तार
से मेरा दिमाक दौड रहा था. रिक्शा मोटर स्टैण्ड से पहला मोड लेते हुए वह उस चौराहे
से गुजरेगा,जहाँ दाहिनी ओर पंकज टाकीज और बायीं तरफ़ कमली वाले बाबा की मजार है.वह
वहाँ से बाय़ीं तरफ़ मुड जाएगा फ़िर दायीं ओर. और तीर की तरह सीधा चलते हुए एक पतली
सी गली में मुडेगा. उसी पतली सी गली में पुष्पा दीदी का ससुराल है,जहाँ वह पिछले
दस साल से कैद है.
पुष्पा दी की शादी के बाद से मेरा वहाँ चौथी बार जाना हो रहा है.
पहली बार तो पिताजी के साथ लिवावट में जाना हुआ था. दूसरी बार जब उसके बेटा पैदा
हुआ था, तब माँ ने पिटारा भर सोंठ- मेथी के लड्डू जिसमें काजू,बादाम और भी न जाने
कितने मेवे डले हुए थे और पांच किलो घी के डिब्बे के साथ मुझे भेजा था. तीसरी बार
दीदी के देवर की शादी थी और चौथी बार मुझे उनकी ननद की शादी मे शरीक होना था. जब-जब
भी मुझे वहाँ जाने का हुक्म हुआ,तब-तब मैंने साफ़ जाने से इनकार कर दिया था. इनकार
करने के पीछे भी अपने ठोस कारण थे. पहला तो यह कि मुझे आने-जाने की टिकिट के अलावा
गिनती के पैसे दिए जाते.और साथ में ढेरों सारी हिदायतें कि मुझे जाते ही सबसे पहले
दीदी के सास-ससुर के पैर छुने हैं और उनके हाथ में कुछ नगद राशि भी भेंट में देना
है. फ़िर हारे हुए जुआरी की तरह उनके सामने बैठे रहना है.जब तक वे यह आदेश न दे दें
कि जा अपनी दीदी से मिल आ, तब तक वहाँ से हिलना मत.और तब तक इधर-उधर तांक-झांक भी मत
करना. माँ और पिताजी मेरी आदत जानते थे कि मैं जरुरत से ज्यादा बतियाने लगता हूँ, सो
यह हिदायत भी घुट्टी की तरह पिला दी गई कि ज्यादा बात मत करना. जितना वे कहें ,केवल उनकी बातों
में हाँ में हाँ मिलाते रहना. अपनी तरफ़ से कुछ भी मत कहना .यदि वे हमारे बारे में
पूछें कि वे क्यों नहीं आए तो कोई भी बहाना बतला देना. कहना माँ की तो बडी इच्छा
थी लेकिन दमे के चलते वे न आ सकीं और बापू के बारे में पूछें तो बतला देना कि वे
किसी जरुरी काम से बाहर गए हुए हैं.
दीदी के यहाँ जब भी जाने
की बात होती है, सब कन्नी काट जाते हैं और मुझे ही बलि का बकरा बना दिया जाता है. मैंने
इस बात के विरोध में अपना मन्तव्य दिया ही था कि पिताजी ने एक जोरदार तमाचा मेरे बाएं गाल पर जड दिया
और उस कमरे से बाहर निकल गए.थे. मुझे इस बात का तनिक भी अंदेशा नहीं था कि मेरे न
कहने पर इतनी बडी सजा मिल सकती है. चांटा पडते ही मेरा दिमाक झनझना गया था और आँखे
बरसने लगी थी .मन में एक चक्रवाती तूफ़ान उठ खडा हुआ था ,जो देर तक सक्रीय बना रहा
था..मेरे अपने जीवन की यह पहली यादगार घटना थी.
मैं सिर नीचे किए देर तक
सुबकता रहा था कि अचानक पीठ पर हल्का सा स्पर्ष पाकर मेरी चेतना लौटी. मैंने पीछे
पलटकर देखा. माँ थीं. देखते ही मैं उनसे लिपट्कर रो पडा. थोडी देर तक चुप रहने के
बाद वे मुझसे मुखातिब हुई और उन्होंने
मुझे समझाते हुए कहा:-“ विजय...तुम इस घर के बडॆ हो, समझदार हो. तुम्हारे अलावा है
भी कौन जिसे भेजा जाए.? यदि इस घर से कोई नहीं गया तो बडा अनर्थ हो जाएगा और वे
लोग पुष्पा को टेच-टेच के लहुलुहान कर देगे. उसे दोहरे आंसू रुलाएंगे. क्या तुम
चाहोगे कि ऎसा हो? नहीं न! फ़िर क्यों तुम जाने से मना कर रहे हो. हम दोनों में से
कोई वहाँ जाने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते हैं ,क्या यह तुम जानना नहीं चाहोगे.?
सुनॊ- घर के हालात तुमसे छिपे नहीं है. केवल एक अकेले तुम्हारे बाबूजी कमाने वाले
हैं और दस लोग बैठ्कर खाने वाले हैं. घर का खर्च किस तरह चलता है यह भी तुम्हें
बतलाने की आवश्यकता नहीं है.फ़िर हमारे पास बाप-दादाओं की जमा पूंजी भी नहीं है. चूंकि
उस घर में हमारी बेटी बिहाई है तो हमें वहाँ के सभी छोटे-बडे कर्यक्रम में जाना
जरुरी हो जाता है और वहाँ के नियमों के तहत उस प्रकार से नेंग-दस्तूर भी करने पडते
हैं. तुम जानते ही हो कि पुष्पा का परिवार करोडपति परिवार है और हमें उनके स्टेट्स
के मुताबिक व्यवहार करना होता है,जिसकी हमारी हैसियत नहीं है. यदि हम में से कोई
वहाँ जाए और ह्ल्का-पतला व्यवहार ले जाए तो भरे समाज में हमारी किरकिरी होती है. कोई
कहे, न कहे ,हम अपनी ही नजरों में गिर जाते हैं. बेटा हममें इतनी हिम्मत नहीं है
कि हम वहाँ थोडी देर भी रुक पाएं. तुम्हारे जाने से उन्हें यह कहने का मौका नहीं
मिलेगा कि हमारे यहाँ से कोई नहीं आया. दूसरे तुम्हारी गिनती लडकॊं में आती है. अतः
कोई तुम्हें उलहाना भी नहीं देगा. समझ रहे हो ना तुम मेरी बात को गहराई से !” माँ इतना कह कर चुप हो
गईं थीं .मैंने नजरे ऊपर उठा कर देखा, उनकी आँखों में आंसू झर रहे थे. लगातार झर
रहे आसुऒं को देखकर मेरा धीरज डोल उठा था. अब कहने सुनने लायक कुछ बचा ही नहीं था .बावजूद
इसके एक प्रश्न लगातार मेरा पीछा कर रहा था. मैंने हिम्मत बटोरकर पूछा:”-माँ..संबंध हमेशा अपने
बराबरी वालों से किया जाता है,फ़िर आपने पुष्पा दीदी का संबंध इतने बडे घराने में
क्यों कर दिया.? “
जवाब देने की बारी अब
माँ की थी. एक लंबी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा:- हाँ..हमें यह सब पता था और पता
था इस बात का भी कि हम अपनी हैसियत से बाहर यह काम करने जा रहे हैं. पुष्पा सयानी
हो चली थी. उसके रूप-गुण की चर्चाएँ यहाँ-वहाँ, जब-तब होती रहती थी जमाना कितना
खराब चल रहा है यह भी तू जानता है..हमें रात-दिन एक ही चिन्ता खाए जा रही थी कि
उसकी शादी किसी अच्छे घराने में हो जाए.और हम चैन की नींद सो सकें. मैंने इस बात
का जिक्र अपने भैया से किया था. उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा “जिज्जी मेरी नजरों मे एक अच्छा
सा लडका है. पढा-दिखा है और देखने-परखने मे नम्बर एक .किसी बैंक-वैंक मे नौकरी कर
रहा है. घर से करोडपति है. उसके माता-पिता को एक निहायत ही खूबसूरत लडकी की तलाश
है. मुझे पक्का यकीन है कि पुष्पा देखते ही पसन्द कर ली जाएगी. मैंने उन्हें तुम
लोगॊ के बारे में विस्तार से बतला दिया है. लडके के पिता का कहना है कि वे दहेज
लेकर शादी नहीं करेगे. यदि उन्हें लडकी पसन्द आ गई तो हम चट मंगनी-पट शादी का
इरादा रखते हैं. संभव है कि वे अगले सप्ताह तुम्हारे यहाँ पहुँचने वाले हैं. मैं
भी साथ रहूँगा,अतः चिन्ता कराने की जरुरत नहीं है.”
जैसा तुम्हारे मामाजी ने
कहा था,वे पुष्पा को देखने चले आए, और उसे देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. हमसे भी
जितना बन पडा,दहेज में हमने सभी आवश्यक चीजें दी .पुष्पा अपने घर में मजे में है .एक
मां-बाप को और क्या चाहिए कि उनकी बेटी राजरानी की तरह रह रही है. चुंकि उनके घर
में किसी प्रकार की कमी नहीं है ,अतः वे दिल खोलकर खर्च करते हैं. पिछली बार जब हम
उनकी बडी बेटी की शादी में गए थे,तो दहेज में उन्होंने पचास तोले सोने के जेवर
अपनी बेटी को दिए थे और साथ में एक मारुति गाडी. टीके मे उन्होंने एक लाख नगद भी
दिया था. अब तुम्हीं बताओ विजय, हम उनकी पासंग में कहाँ बैठते हैं ?”.
माँ की बात जेहन में उतर
गई थी और मैं जाने के लिए तैयार हो गया था.
काफ़ी समय पहले पिताजी ने
प्लाइ का बना सूटकेस खरीदा था, जो वर्षॊं से पडा धूल खा रहा था. मैंने आहिस्ता से
उसे नीचे उतारा. उस पर पडी धूल को साफ़ किया अपने कपडॆ रख ही रहा था, तभी माँ ने
कमरे में प्रवेश किया. उनके हाथ में प्लास्टिक का एक बैग था. बैग मुझे थमाते हुए
उन्होंने कहा कि जाते बराबर इसे पुष्पा को दे देना.और ये दो सौ रुपए हैं,जो आने-जाने
की टिकिट और नेग-दस्तूर के लिए हैं. इसे सोच -समझ कर खर्च करना.
बस से उतरते ही मुझे
रिक्शे वालों ने घेर लिया. तत्काल मुझे पिछली बातें याद हो आयी. रिक्शा न लेने पर
दीदी की सास के द्वारा दिया गया उलहाना किसी टेप की तरह मेरे कानों में बजने लगा.था.
मैंने अब की रिक्शे से न जाकर आटॊ से जाने का मन बनाया. बडॆ मुश्किल से एक आटॊ
वाला बीस रुपए में जाने को तैयार हुआ. मैंने बडी शान से अपना सामान आटॊ में रखा और
वह चल पडा. रास्ता चलते मेरी आँखों के सामने दीदी की सास का चेहरा दिखलाई पडता. मैं
सोचने लगा था कि जाते बराबर ही वे मुझे दरवाजे पर बैठी मिलेगी और मैं उनके सामने
आटो से उतरते दिखुंगा तो उनके कहने के लिए कुछ नहीं बचेगा और न ही वे मुझे जलील कर
पाएगीं.
आटॊ अब उनके दरवाजे के
ठीक सामने जाकर रुका.. मैंने देखा कि दरवाजे पर कोई भी नहीं है. मेरा मन बुझ सा
गया था और एक पछतावा भी होने लगा था कि मैंने नाहक ही इतने सारे पैसे खर्च किए. यदि
मैं पैदल भी चला आता तो यहाँ देखने और कहने वाला कौन था ? खैर, अब जो हो चुका उसके
लिए क्या पछताना. प्रवेश द्वार को पार करते हुए मैं काफ़ी अन्दर तक चला आया था
लेकिन वहाँ भी कोई मौजूद नहीं था. मेरी व्यग्रता बढती जा रही थी कि आखिर सब कहाँ
चले गए, जबकि शादी वाले घर में तो भीड-भाड रहती ही है. मेरी नजरें अब दीदी को
खोजने लगी थीं.
लगभग पूरे घर को लांघते
हुए मैं पिछवाडॆ तक चला आया था. घर के ठीक पीछे बडा सा बाडा था,जो मुख्य सडक से जा
मिलता है. वहाँ जाकर मैंने देखा कि पुष्पा दी के ससुर कुर्सी में विराजमान है. मैंने जाते ही सूटकेस को नीचे रखते हुए उन्हें
प्रणाम किया और उनके चरण स्पर्ष किए. मुझे देखते ही उन्होंने कहा”- अरे विजय..कबे आए ? थूक
से हलक को गीला करते हुए मैंने कहा:-बस, मैं चला ही आ रहा हूँ.” वाक्य समाप्त भी नहीं
हुआ था कि उन्होंने दूसरा प्रश्न उछाल दिया:-काहे..मास्टरजी नहीं आए”. तो मैंने कहा:-बाबूजी
का मन तो इस बार आने का था और उन्होंने छुट्टी भी ले रखी थी लेकिन अचानक स्वास्थ्य
गडबड हो जाने की वजह से नहीं आ पाए. वे और कोई दूसरा प्रश्न दाग पाते ,मैंने आगे
बोलते हुए अम्माजी के न आ सकने का कारण भी कह सुनाया कि उन्हें अस्थमा ने बुरी तरह
से परेशान कर रखा है,अन्यथा उनका इस बार आना तय था.
काफ़ी देर तक चुप्पी साधे
रहने के बाद उन्होंने मौन तोडते हुए कहा:”-विजय...तुम्हारे बाबूजी क्यों
नहीं आए इसका कारण मैं समझ सकता हूँ. पर उन्हें इस बार आना चाहिए था क्योंकि मेरे
घर की यह आखिरी शादी है. इसके बाद जब भी कोई शादी होगी तो वह हमारे पोते की ही
होगी. खैर.” उन्होंने लंबी सांस लेते हुए मुझसे कहा:-“ विजय, मुझे लगता है कि
इस समय घर में कोई नहीं होगा. तुम्हारे जीजाजी और जिज्जी सभी पूजा प्लस में मिलेगे.
बारात शाम को लगेगी,शायद उसी की तैयारी में वे लोग लगे होगें. तुम ऎसा करो, अपना
सामान अपनी जिज्जी के कमरे में रख दो और मुँह-हाथ धोकर फ़्रेश भी हो लो और जब लौटकर
आओ तो साथ बैठकर चाय पीते हैं, फ़िर हम भी वहीं चले चलेगें.”
दादाजी की बाते सुनकर
मैं थोडा सहज हुआ था. दादी होतीं तो पता नहीं कितनी खरी-खोटी सुनाती .इससे पहले भी
मैं यहाँ आया हूँ तो हर बार उन्हीं के साथ बैठकर बाते करता रहा हूँ. वे भी मेरी
तरह ही बडबोले हैं. हमारी बातें सुनकर वे चिढ भी जाती थी और उल्हाना देकर कह उठती
थी कि दोनो मिलकर क्या उलटी-सुलटी बातें करते रहते हो .कभी-कभी तो वे यहाँ तक भी
कह जातीं कि बुढा गए हो लेकिन छोकरों की जैसी बातें करते तुम्हें शर्म नहीं आती. थोडा
उमर का भी तो ख्याल किया करो. दादी कि जली-कटी बातें सुनकर वे तैश में आ जाते और
लगभग डांटते हुए कहते” तुम चुप बैठॊ जी, हमारे और विजय के बीच अपना मुँह मत खोलो.
यदि सुनना अच्छा नहीं लगता है तो किसी दूसरे कमरे में चली जाओ”.
प्रत्युत्तर में केवल”जी” कहता हुआ मैं वहाँ से
सीधे दीदी के कमरे में चला आया.अपना सामान रखते हुए मैंने मुँह-हाथ धोये. सफ़र में
कपडॆ गंदे हो गए थे,सो उन्हें बदला और छैला बाबू बनकर दादाजी के पास आ गया. मुझे
आया देख उन्होंने पास ही पडी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और हांक लगाते हुए अपने नौकर रामू से चाय लाने को
कहा. थोडी ही देर में वह चाय बनाकर ले आया था. हम दोनों ने साथ मिलकर चाय पी. चाय
के समाप्त होते ही उन्होंने अपनी छडी उठाई और बोले “चलो चलते हैं.”
लाँन की साज-सज्जा देखकर
मैं अभिभूत हुआ जा रहा था. स्वागत-द्वार मिट्टी के दो बडे हाथी अपनी सूंड में भारी-भरकम
माला लिए स्वागत की मुद्रा में खडे थे. बाउन्ड्री- वाल के किनारे लगे पेडॊं पर
बल्बों की झालरें लहरा रही थीं,जिनसे रंग-बिरंगी रोशनी झर रही थी. दो स्प्रे मशीने
सुगन्धित इत्र का छिडकाव कर रही थी .गेट से लेकर मंच तक कारपेट बिछा दी गयी थी. अन्दर
लान में दांए-बांए अप्सराओं की आदमकद मूर्तियां बनी थी,जो लान की सुन्दरता मे चार
चांद लगा रही थीं. मण्ढप मे जगह-जगह फ़ानूसें लटक रही थी. लान इस समय किसी राजमहल
से कम दिखाई नहीं दे रहा था. दादाजी के साथ अन्दर प्रवेश करते ही मेरी नजरें
जीजाजी और जिज्जी को खोजने लगी थी. जीजाजी तो मुझे दिखाई दे गए. वे इस समय नौकरों
को आवश्यक दिशा निर्देश दे रहे थे. लेकिन वहाँ जिज्जी नहीं थीं .शायद अन्यत्र कहीं
व्यस्त होगीं. मैंने दादाजी का साथ छोडकर अपने कदम उस ओर बढाए जहाँ जीजाजी खडे थे.
पास पहुँच कर मैंने उनके चरण स्पर्ष किए. गले लगाते हुए उन्होंने मेरी तथा परिवार
की कुशल क्षेम पूछे और मुझसे कहा कि मैं अपनी दीदी से मिल आऊँ,जो इस समय रसोई घर
में वहाँ की व्यवस्था देखने गई हुई हैं.
मैं अपनी दीदी से मिलने
को ललायित था. सो आदेश पाते ही मैंने उस ओर दौड लगा दी. पलक झपकते ही मैं उनके
सामने खडा था. मैने झट उनके चरण स्पर्ष किए. उन्होंने मुझे गले लगा लिया और देर तक
मुझे अपने से लिपटाए रखा. मैं अपनी दीदी से कई बरस बाद जो मिल रहा था. पल-दो पल
बाद जब मैं उनसे अलग हुआ तो देखा कि उनकी आँखों से अश्रु झर रहे थे. दीदी के दिल
पर इस समय क्या बीत रही होगी,इसे मैं समझ सकता हूँ. उन्हें रोता देख मैं भी अपने
आपको रोक नहीं पाया था.और मैं भी रो पडा था. हम अत्यन्त ही पास-पास खडॆ थे,लेकिन
हमारे बीच मौन पसरा पडा था. देर तक अन्यमस्क खडे रहने के बाद उनका मौन मुखर हो उठा.
उन्होंने मेरी पढाई-लिखाई के बारे में ढेरों सारी जानकारियाँ ली और माँ-बाबूजी के
हालचाल पूछे. कई अन्य जानकारियाँ लेने के बावजूद उन्होंने माँ-बाबूजी के न आने के
बारे में कुछ भी नहीं पूछा. शायद वे इसका कारण भली-भांति जानती थी. मैं इस समय उस बोझिल माहौल को और भी बोझिल बनाना
नही चाहता था .सो मैंने उनसे कहा “जिज्जी..फ़िर बाद में बैठकर बाते करेगें. अभी मैं जाकर
जीजाजी की सहायता में लग जाऊँ”. और मैं वहाँ से खिसक लिया था.
अभी दिन के तीन बजे थे
और बारात रात के करीब नौ बजे के आसपास
लगनी थी. जीजाजी और पुष्पादी चारों तरफ़ घूम-धूम कर बारीकी से हर काम का मुआयना कर
रहे थे. ताकि बाद में परेशानी न उठानी पडॆ.
इसी बीच नेग-दस्तूर का
कार्यक्रम शुरु हो गया था. हमें खबर दी गई. मैं,जिज्जी और जीजाजी सभी वहाँ पहुँच
गए थे. महिलाएँ बारी-बारी से आतीं, दादाजी और दादी को हल्दी लगाती और भेंट में लाए
कपडॆ देती और अपनी जगह पर जा बैठतीं. मैं एक कुर्सी पर धंसा यह सब देख रहा था कि
जो भी महिला उस दस्तूर को करने के लिए आगे बढ रही थी, उन्होंने दादी के लिए कीमती
साडी तथा दादाजी के लिए बेहतरीन कपडे लाए थे. तभी मुझे याद आया कि घर से चलते समय
माँ ने जो कपडॊं का गठ्ठर दिया था उसे तो मैं जिज्जी के कमरे में ही छोड आया था. उसमें
कितने कीमती कपडॆ होंगे, यह तो मैं नहीं जानता,लेकिन मुझे इतना मालुम है कि माँ ने
वे सारे कपडॆ फ़ेरी वाले से किस्तों में खरीदे थे और वे कितने उमदा किस्म के होंगे,
यह मैं समझ सकता हूँ. मेरे मन में एक द्वंद उठ खडा हुआ था कि मैं उस गठ्ठर को लेने
जाउँ या नहीं.?
3
छुटकारा पाना संभव नहीं.
घड़ी की टिक-टिक के साथ ही वह भी जाग रहा था. रात्रि के ग्यारह बज चुके थे और
मार्ग्रेटा अब तक नहीं लौटी थी. नींद से आँखें बोझिल होने लगी थीं, सिर भारी होने
लगा था, बावजूद इसके वह जाग रहा था. जाते समय वह उसकी गाड़ी लेती गई थी और कह गयी
थी कि जल्दी ही लौट आएगी. लेकिन वह अब तक नहीं लौटी थी. उसे लेकर मन के आंगन में
शंका और कुशंका के जहरीले नाग फ़न उठाये विचरने लगे थे. एक विचार आता. मन कहता,
नहीं...ऎसा नहीं हो सकता. तत्काल दूसरा विचार आ धमकता. उसे भी उसका मन स्वीकर नहीं
कर पाता. फ़िर एक विचार कौंधा....हो सकता है कि
नशे की हालत में कहीं उसकी गाड़ी ठुक तो नहीं गई? मन में ऎसा विचार आते ही
वह असहज हो उठा था.
नये विचारों के साथ, नई दुनियां में उड़ान भरने वाली मार्ग्रेटा ने अपनी एक
अनोखी दुनिया बसा ली है. उसके एक नहीं बल्कि कई-कई दोस्त हैं. उसी तरह उसने कई
क्लब भी ज्वाईन कर रखे हैं उसने. उसे कई बार समझाने की कोशिश की कि कहीं उसके साथ कोई हादसा
न हो जाये, या फ़िर कोई उसकी इज्ज्त न लूट ले, उसे ऎसी जगह नहीं जाना चाहिए. वह एक
कान से सुनती और दूसरे से बाहर निकाल देती. इसके उलट वह उसके उपदेशों को सुनकर उसे
एक जाहिल गवांर या मिसफ़िट होने का लेबल लगाते हुए कहती...दुनियां कहां से कहां निकल
गई है मिस्टर और तुम हो कि अब तक पुरानी जड़ों को पकड़े बैठे हो. रही इज्जत लूटने की
तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह मेरी ओर आंख उठाकर भी देख सके. जिम में
जाते हुए मैंने अपने बचाव के सारे हुनर सीख रखें है. इसलिए मुझे डर नहीं लगता. एक
फ़्रीलांस रिपोर्टर को तो हिम्मतवर होना बहुत जरुरी होता है..फ़िर हम इस रंगीन
दुनिया में आए है तो हमें उसी तरह रंगीनियत में जीना चाहिए, उसका आनन्द उठाना
चाहिए. यहीं नहीं और भी तरह-तरह के तर्क लगा कर वह उसे चुप रहने पर मजबूर कर देती.
मन में एक बार उठ खड़ी हुई विचारों की आंधी थमने का नाम नहीं ले रही थी. उसने
निर्णय किया कि उसे अब सो जाना चाहिए. जो भी होगा सामने आएगा, तब देखा जाएगा. लाईट
बुझा कर उसने चादर को खींचकर अपने पैरों पर डाला ही था कि गाड़ी की आवाज सुनाई दी.
उसे यकीन हो गया कि वह लौट आयी है. दरवाजा हल्के से बंद था. उसने धक्का देकर खोला
और लड़खड़ाते कदमों से चलते हुए अपने कमरे में समा गई. उसने जानबूझ कर चुप्पी साध ली
थी कि व्यर्थ की बकवास में क्यों पड़ा जाए क्योंकि नशे में धुत्त व्यक्ति कुछ
ज्यादा ही विद्वान हो जाता है. ऎसे समय में बात करना उचित नहीं होता.
नींद के बोझ से पलकें भारी होने लगी थी लेकिन घड़ी की टिक-टिक के साथ ही
विचारों की टिक-टिक भी शुरु हो गई थी, जो थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं. बिस्तर पर
असहाय पड़ा वह अपने आपको कोस रहा था और कोस रहा था उस मनहूस घड़ी को जब उसके जीवन
में मार्ग्रेटा का प्रवेश हुआ था. बीते हुए कल के पन्ने फ़ड़फ़ड़ाने लगे थे और वह
उसमें समाने लगा था.
कम्पनी ने उसे एक पाश कालोनी में तीसरे माले पर एक फ़्लैट दे रखा था जो एक
आयताकार जमीन पर निर्मित किया गया था. आयत के चारों ओर बिल्डिंगे खड़ी की गई थीं और
आयत के भीतर एक खेल परिसर का निर्माण किया गया था जिसमें बच्चे खेल खेल सकें.
पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की के ठीक सामने वाली खिड़की जिस पर मोटा पर्दा डला
रहता, इसी में वह रहा करती थी.
एक शाम. जब वह आफ़िस से घर लौटा तो उसने सहज रुप से अपनी खिड़की को खोला और अपनी
दोनों कुहनियों को टिकाते हुए बच्चों को खेलता देखता रहा था. तभी सामने वाली खिड़की
जो शायद ही कभी खुली हो, खुलती है और उसमें एक युवती प्रकट होती है. वह अपने हाथ
हिला-हिलाकर अभिवादन करती नजर आयी. कुछ देर बाद उसने अपनी हथेली को फ़ैलाया और फ़ूंक
लगाते हुए एक लंबा फ़्लाईंग-किस हवा में उछाल दिया था. शायद वह अपने किसी ब्वायफ़्रेंड
के लिए ऎसा कर रही होगी. वह यह समझ नहीं पाया कि ये सब उसके लिए ही किया रहा है.
प्रतिदिन यह क्रम दोहराया जाता रहा और वह एक मूकदर्शक की तरह देखता रहा.
एक दिन. शाम को आफ़िस से लौटते हुए जैसे ही अपना दरवाजा खोला, एक लिफ़ाफ़ा पड़ा
दिखा. उस पर पाने वाले का नाम नहीं था. उत्सुकतावश उसने लिफ़ाफ़ा खोला. तह किए गए
कागज को सीधा किया. उसमें लिखा था-“ हेलो जानेमन... बड़े बेरुखे हैं आप !. हम प्रायः रोज ही हाथ हिला-हिलाकर आपका
इस्तकबाल करते रहे हैं, फ़्लाईंग-किस देते रहे हैं लेकिन आपने कोई प्रतुत्तर नहीं दिया.
क्या इतना भी नहीं समझते कि एक लड़की अगर इतना कुछ कर रही है तो क्यों कर रही है?
यह सब आपके लिए ही किया जा रहा था. मैं भी एक नामी-गिरामी प्रेस में काम करती हूँ.
घर आकर कोई काम तो रहता नहीं, सो बोर होते रहती हूँ. अकेली हूँ न!. समय काटे नहीं
कटता. चाहती थी कि आपसे दोस्ती जोड़ी जाए तो समय आराम से काटा जा सकता है. आपकी ओर
से कोई पहल न होते हुए देखकर मैंने खुद चलकर यह लिफ़ाफ़ा आपके दरवाजे से अन्दर सरका
दिया था. नीचे मेरा कांटेक्ट नम्बर नोट है, आप इस पर मुझसे संपर्क कर सकते हैं.
मुझे आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी....... मार्ग्रेटा...
पत्र पढ़कर पूरा हुआ ही थी तभी कालबेल घनघना उठी. उसने वहीं से बैठे-बैठे कहा- “प्लीज कम-इन...दरवाजा खुला हुआ है.” वह तब तक नहीं जान पाया कि आने वाला कौन है? शायद
वह इस भ्रम में भी था कि कोई मित्र मिलने आया होगा. सहसा दरवाजा खुला. अपनी सैंडिले
खटखटाते हुए उसने कमरे में प्रवेश किया. उसके प्रवेश के साथ ही खुशबूदार
लैवेण्डर/परफ़्यूम की मादक गंध से पूरा कमरा गमगमा उठा. नजदीक आते ही उसने हाथ
मिलाने के लिए अपनी हथेली को आगे बढ़ाते हुए कहा-“ हाय हैण्डसम..आई एम मार्ग्रेटा...आपकी पड़ौसी....चौंक गए न मुझे
देखकर...मैंने सोचा...जब दोस्ती करनी ही है तो इस बात का इंतजार ही क्यों किया
जाये कि पहल कौन करेगा?. इधर से गुजर रही थी, सो सोचा कि चलकर मिल ही लिया जाये.
अचानक...इस तरह आकर मैंने आपको डिस्टर्ब तो नहीं किया?”
अचकचा गया था देवेन्द्र कि उसके सामने एक हुस्न की परी अचानक आकर खड़ी हो गई
है. झीने कपड़ों में से झांकता उसका गदराया यौवन और शरीर सौष्ठव को देखकर कहा जा
सकता है कि विधाता ने उसे किसी खास सांचे में ढालकर बनाया होगा. उसकी पलकें झपकना
भूल गईं थीं और वह फ़टी आँखों से उसके माधुर्य का रसास्वादन करने में खो सा गया था.
वह प्रत्युत्तर में बहुत कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन शब्द जैसे गले में आकर अटककर
रह गए थे.
इस तरह एक कातिल हसीना ने उसके जीवन में प्रवेश किया था. रोज फ़ोन लगते.
गुदगुदी बातें होतीं. मदहोश कर देने वाली खुमारी उस पर तारी होने लगती. कभी वह
चुप्पी साध लेती. जानबूझ कर फ़ोन का स्विच आफ़ कर देती.. वह बार-बार फ़ोन लगाता लेकिन
आउट आफ़ कव्हरेज की ट्युनिंग सुनकर उसकी बेचैनी बढ़ जाती. कभी आ धमकती फ़िर एक लंबा
अन्तराल बना लेती. वह यह सब जानते बूझते कर रही थी. जानती थी वह कि उसने अपने यौवन
के मद में डूबो कर जिस तीर का संधान किया है, वह ठीक निशाने पर पड़ा है. वह यह भी
जानती थी कि जितनी ज्यादा बेचैनी बढ़ेगी, उतना ही वह पास आता जायेगा और फ़िर वह इस
कदर अपने आपको उलझा लेगा कि सिवाय मेरे, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ेगा.
बढ़ती बेचैनी अब व्यग्रता के रुप में ढलने लगी थी. उसकी स्थिति कुछ ऎसी होने
लगी थी उसकी जैसे जल बिन मछली की होती है. न खाने-पीने से मन जुड़ पा रहा था उसका
और न ही आफ़िस के काम को वह उतनी तल्लीनता से ही कर पा रहा था.
एक शाम. उसका रुठा हुआ वसंत लौट आया था. वियोग की तपिश से मुर्झाया चेहरा खिल
उठा था. कामनाएं मचलने लगीं थीं. आकाश पटल पर काले कजरारे मेघों को देखकर जिस तरह
मयूरा नाच उठता है, ठीक उसी तरह उसका मन आनन्दित होकर थिरकने लगा था “ कहाँ गायब हो गईं थी मिस मार्ग्रेटा तुम....तुम्हें
देखने को आँखें तरस गईं....कितनी बार मैंने फ़ोन लगाया, लेकिन कनेक्ट नहीं हो पाया...कहाँ चली गईं थीं
तुम “. बिस्तर से उठते हुए उसने कहा.
“ अभी जैसे-तैसे शाम हुई है और आप हैं कि बिस्तर से चिपके पड़े हैं.....क्या बात
है...तबीयत तो ठीक है न !. उसने नजाकत के साथ कहा.
“ नहीं..कुछ ऎसे ही...थोड़ा सिरदर्द हो रहा था.....”
“ लो... इतनी से बात है...अभी दर्द भगाये देते हैं”.
उसने अपना पर्स खोला. एक बोतल निकाली और उठते हुए किचन से दो ग्लास और फ़्रीज
से कुछ नमकीन और पानी की बोतल उठा लाई. बोतल का कार्क खोला और ग्लास में उडेंलकर
बढ़ाते हुए कहा- “ लीजिए...दो घूंट हलक के नीचे उतारिये.....दर्द अभी छूमंतर हो जायेगा”.
“ ये क्या....शायद शराब है?..मैं शराब नहीं पीता”
“कौन कमबख्त कहता है कि ये शराब है...ये जौ के दानों से बनी बियर है.. गर्मी के
दिनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है....जो दिल और दिमाक को ठंडक पहुंचाती
है..... समझे.”
“वाह कमाल की चीज है....सिर दर्द एकदम से गायब हो गया”. चहका था देवेन्द्र.
“ कितनी भीषण गर्मी पड़ रही है...क्या आपको ऎसा नहीं लग रहा..मुझे तो बेहद गर्मी
लग रही है”. कहते हुए उसने अपनी कुर्ती निकाल कर एक ओर रख दिया था. अब वह केवल ब्रेसरी
में उसके सामने बैठी हुई थी. उसके तराशे हुए संगमरी जिस्म को देखकर देवेन्द्र के जैसे होश ही उड़
गए थे..दिल में खलबली से मचने लगी थी. वासनायें धधकती ज्वाला की तरह प्रज्जवलित हो
उठी थीं. उसने आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया था. मदहोशी के चलते
क्या कुछ हुआ, उसे याद नहीं. लेकिन जब वह सोकर उठा तो बिस्तर खाली था. शायद वह जा
चुकी थी.
इसके बाद वह चार-पांच दिन तक दिखाई दी और न ही उसका फ़ोन आया. देवेन्द्र अपनी
ओर से उसे बार फ़ोन लगाकर संपर्क करने की कोशिश करता, लेकिन “आउट आफ़ रेंज” की ट्युनिंग सुनकर उसे खीज होने लगती. मन में विचार आया कि खुद
चलकर उसके फ़्लैट में जाना चाहिए, लेकिन वह हिम्मत नहीं जुटा पाया था.
एक शाम. फ़ोन की घंटी बजी. उसने यह सोचते हुए लपक कर फ़ोन उठाया कि शायद
मार्ग्रेटा का फ़ोन होना चाहिए. अंदाजा सही निकला. उसने एक ही सांस में न जाने
कितनी ही बातें कह सुनायी. शिकायतें दर्ज कराते हुए अब वह अन्दर से पूरी तरह खाली
हो गया था. उसे अब मार्ग्रेटा के जवाब का इंतजार था.
“ देवेन्द्र.. मुझे नौकरी से टर्मिनेट कर दिया गया है और अल्टिमेटम भी दिया गया
है कि मैं एक सप्ताह के भीतर फ़्लैट खाली कर दूं . अब आप ही बतलायें मैं कहाँ
जाऊँ...क्या इतने कम समय में शहर में दूसरी जगह तलाशी जा सकती है? .फ़िर एक अकेली लड़की
को कोई भी इतनी आसानी से फ़्लैट नहीं देगा...पहले तो तरह-तरह के सवाल पूछे
जाएंगे... कई-कई जानकारियां ली जाएंगी, तगड़ी रकम पगड़ी के रुप में ली जाएगी, तब
कहीं जाकर फ़्लैट मिल पाएगा. आप मेरे दोस्त हैं. ऎसी कठिन परिस्थिति में मुझे आपका
साथ चाहिए. क्या हम एक छत के नीचे रहते हुए अपनी दोस्ती का निर्वहन नहीं कर सकते?
मेरे वहाँ रहते जो भी खर्च आएगा, उसमें मैं आपसे शेयर करुंगी. कुछ दिनों की बात
है, दूसरी नौकरी लगते ही मैं आपका फ़्लैट खाली कर दूंगी. मुझे आपके उत्तर की
बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी.”
प्रत्युत्तर में वह कुछ कह पाता, इसके पहले ही मार्ग्रेटा ने फ़ोन काट दिया था.
अब उसकी बारी थी. उत्तर उसे देना था. हाँ कहे या फ़िर सिरे से इंकार कर दे. वह
गंभीरता से सोचने लगा था. “ उसका वर्तमान तो मैं जानता हूँ कि वह एक रईस बाप की इकलौती संतान है,. रही भविष्य की बात,
तो वह उससे अपना फ़्लैट खाली करने को तो कह ही सकता है, लेकिन उस स्थिति में क्या
होगा जब उसके माता-पिता उससे मिलने न आ धमके. वे चार-छ महिने के अंतराल में आते
हैं. चार-छः दिन रुककर लौट भी जाते हैं. लेकिन आने से पहले सूचित जरुर करते हैं.
यदि ऎसा कुछ हुआ तो उसे किसी होटल में तब तक रुकने को कहा जा सकता है,. फ़िर वह
अपनी ओर से कह भी चुकी है कि दूसरी नौकरी लगते ही शिफ़्ट हो जाएगी”. यह सोचते हुए उसने मार्ग्रेटा को फ़ोन लगाया और कहा
कि जब तक तुम्हारे रहने के लिए दूसरी व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक वह उसके साथ रह सकती है.
यही तो चाहती थी मार्ग्रेटा. अपने मन की मुराद पूरा होते देख वह चहक उठी थी.
उसने तत्काल अपना सामान पैक किया और आ धमकी. फ़्लैट में दो बेडरूम थे. एक पर उसने
कब्जा जमा लिया था.
मार्ग्रेटा का साथ पाकर खुश था देवेन्द्र. प्रेमालाप में मगन रहते हुए उसका
दिन कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चल पाता. हाँ, उसके मन में एक शिकायत जरुर बनी
रहती कि भगवान ने रातों को इतनी छॊटी क्योंकर बनाया होगा?.
एक दिन. किसी काम से वह बाहर गया हुआ था. तभी फ़ोन की घटीं टिनटिना उठी. घंटी
बजती रही थी लगातार, लेकिन मारग्रेटा ने जानबूझकर फ़ोन नहीं उठाया था. वह नहीं चाहती
थी कि किसी को पता चले कि वह धर्मेन्द्र के साथ “लिव-इन-रिलेशन” में रह रही है. आने वाला फ़ोन धर्मेन्द्र के पिताजी
का था. घर से निकलने के पहले वे इतल्ला नहीं दे पाए थे. सो स्टेशन पर से उन्होंने फ़ोन
लगाते हुए सूचित करना जरुरी समझा था. उन्होंने आटॊ लिया और सीधे चले आए थे.
कालबेल की आवाज सुनकर उसने यह सोचते हुए दरवाजा खोला कि देवेन्द्र लौट आया है.
दरवाजा खुलते ही उसकी नजर एक अपरिचित व्यक्ति पर पड़ी. उसने देखा. धोती-कुर्ता पहने
उस व्यक्ति ने सिर पर टोपी पहन रखी है और आँखों पर चश्मा चढ़ा हुआ है तथा हाथ में
छड़ी उठा रखी है. देखते ही समझ गई कि हो न हो देवेन्द्र के पिताजी ही होने चाहिए.
वह कुछ कह पाती, उन्होंने भारी-भरकम आवाज में पूछा-“ तुम कौन हो और देवेन्द्र कहाँ है? ऎसा तो नहीं कि
उसने फ़्लैट बदल लिया है, कहीं मैं गलत पते पर तो नहीं आ गया ?”.
“ जी नहीं आप सही पते पर आए हैं...आइए...अन्दर तो आइए...कहते हुए वह पीछे हट ली
थी. अपने जूते खटखटाते हुए वे अन्दर चले आए थे और एक कुर्सी पर बैठ गए थे. बैठते
ही उन्होंने पूछा-“ बेटी, तुम कौन हो, पहचान नहीं पाया. इससे पहले तो तुम्हें यहाँ नहीं देखा?”.
सिट्टिपिट्टी गुम हो गई थी मारग्रेटा की कि क्या जवाब दे. क्या वह यह कहकर
बतलाए कि वह आपके बेटे की लव्हर है...दोस्त है, या यह बतलाए कि वह एक पेईंग-गेस्ट
की तरह यहाँ रह रही है, या कि वह धर्मेन्द्र के साथ लिव-इन-रिलेशन में रह रही है?.
किसी तरह उसने अपनी बिखरी हुई हिम्मत को समेटते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन शब्द गले
में आकर अटक कर रह गए थे. वह एक बुत की तरह नीची गर्दन लिए खड़ी रह गई थी. उसे इस
बात का भी भय मन में समाया हुआ था कि उसे अस्त-व्यस्त कपड़ों मे देखकर न जाने
उन्होंने क्या कुछ नहीं सोचा होगा उसके बारे में.
पिता समझ गए. न समझने जैसी कोई बात ही नहीं थी और न ही जवाब-सवाल करने की
जरुरत थी. उन्होंने दुनियां देखी है. दुनियां की रीति-रिवाजों से परिचित थे और
जानते थे कि निपट गांव से चलकर शहर आया आदमी किस तरह शहरों की चकाचौंध में अपने को
झोंक देता है. शहर उसे कितना अपना बना पाता है, ये तो वे नहीं जानते, लेकिन इतना
अवश्य जानते है कि गाँव से निकला नौजवान एक बार शहर आता है तो दुबारा पलटकर गाँव
नहीं लौटता. गाँवों में बचे रहते है अपाहिज, लंगड़े, लूले, बिमार, लाचार बूढ़े लोग,
जो अपना सर्वस्व लुटा कर, आशा भरी नजरों से अपने बेटॊं की राह तकते हुए अपनी आँखें
गवां देते है, लेकिन वे निष्ठुर कभी नहीं लौटते. उन्होंने अपने बेटे का वर्तमान और
खुद के भविष्य का आकलन कर लिया था और वापिस लौटने का मन बना लिया था.
कुर्सी से उठते हुए उन्होंने कमरे का एक चक्कर लगाया. टेबल पर बिखरी शराब की
बोतलें और ग्लास देखकर उनकी आँखें नम हो आयी थी. बाहर निकलने से पहले वे इतना ही
कह पाये थे कि देवेन्द्र को बतला देना कि उसके पिता आए थे लेकिन किसी जरुरी काम की
वजह से रुक नहीं पाए.
थका-हारा देवेन्द्र घर लौटा. अपनी बुझी हुई आवाज में उसने बतलाया कि पिताजी आए
थे और तत्काल ही वापिस लौट गए. यह सुनते ही देवेन्द्र सन्न रह गया था. धड़कने तेज
होने लगी थी और आँखों के सामने अन्धकार नाचने लगा था. सोचने-समझने की बुद्धि
कुंठित होने लगी थी. काफ़ी देर तक अवसन्न स्थिति में बने रहने के बाद वह कुछ
सामान्य स्थिति में आने लगा था.
वह गंभीरता से सोचने लगा था कि देवता तुल्य उसके पिताजी गाँव से चलकर उससे
मिलने आए थे और बिना कुछ कहे वापिस लौट गए ?. कैसे क्या बीती होगी उनके मन पर ?.
कितना संताप हुआ होगा उन्हें यहाँ आकर? कितना कुछ सोच रखा होगा उन्होंने मेरे बारे
में? न जाने कितने सपने बुने होंगे उन्होंने मुझ को लेकर और मैं हूँ कि उन सपनों
में रंग नहीं भर पाया?. सोचते-सोचते उसकी रुह कांपने लगी थी और आँखों से आँसू
झरझरा कर बह निकले थे.
मिचमिची आँखों को पोंछते हुए उसने एक बोतल निकाली. कार्क खोला. गिलास में
उंडेला और तब तक पीता रहा, जब तक वह नशे में धुत्त नहीं हो गया था. मारग्रेटा ने
उसे अपनी बाहों का सहारा देते हुए किसी तरह बिस्तर तक लाया और सुला दिया.
मन पर लगे आघातों को शराब के सहारे मिटाया जा सका होता तो न जाने कितने ही
गमॊं से सहज ही में छुटकारा पाया जा सकता है, लेकिन होता है इसके उलट है. नशे की
हालत में आदमी और ज्यादा दार्शनिक हो जाता है...खुद स्वयं से बात करने लगता है और
अक्सर बड़बड़ाने लगता है...चीखने-चिल्लाने लगता है और अजीबो-गरीब हरकतें करने लगता
है.
हड़बड़ा कर उठ बैठा धर्मेन्द्र. वह कितनी देर रात तक नशे की हालत में सोता पड़ा
रहा था, उसे याद नहीं. उसने लाईट आन किया. घड़ी की ओर देखा. रात के पांच बज रहे थे.
उसके ठीक बगल में मारग्रेटा चित पड़ी सो रही थी. लालिमायुक्त उसके होंठों पर मधुर
मुस्कान खेल रही थी. शायद वह कोई हसीन सपना देख रही होगी. अस्त-व्यस्त कपड़ों में
से उसका जोबन बाहर तांक-झांक रहा था. वह इस निश्कर्ष पर पहुंच चुका था कि
मार्ग्रेटा से छुटकारा पाना अब इतना आसान नहीं है. वह उसके बगैर एक पल भी नहीं रह
सकेगा. रही पिताजी से बात करने की,तो वह गाँव जाकर उन्हें सब कुछ बतला देगा. पिता
उदारमना है, मान जायेंगे. मानेंगे कैसे नहीं,..एकलौती संतान जो हूँ मैं उनकी.
उसकी उंगलियां मार्ग्रेटा की उलझी हुई लटॊं से खेलने लगी
थी. देर तक लटॊं से खेलते रहने के बाद अब उसकी हथेली उसकी संगमरमरी देह पर फ़िसलने
लगी थी .
भीतर का आदमी
भीतर का आदमी.
दुनिया का सबसे जटिल और उबाऊ कोई काम हो सकता है तो वह है किसी का इन्तजार
करना. इन्तजार करता आदमी ठीक उस सुप्त ज्वालामुखी की तरह होता है जिसके अन्दर
विचारों का लावा दहकता रहता है, तरह-तरह की तरंगे-लहरें उठती रहती हैं और जब
सहनशीलता की सारी हदें पार हो जाती है तो अचानक फ़ट पड़ता है.
इन दिनों अमरकांत के मन के अन्दर इन्तजार का एक ज्वालामुखी अन्दर ही अन्दर
सुलग रहा था. वह हैरान और परेशान है कि सुनीता अब तक क्यों नहीं लौटी, जबकि उसे आज
दस बजे घर पहुँच जाना चाहिए था. इस समय दिन के ग्यारह बज रहे हैं. इन्तजार
करते-करते उसकी आँखें पथराने लगी और मन के आंगन में शंका और कुशंकाओं के जहरीले
नाग फ़न उठाए बिलाबिलाने लगे थे. जाने से पूर्व उसने कहा भी था कि एस.एम.टी. की बस
से रवाना होगी, जो ठीक पौने दस बजे यहाँ पहुँच जाती है. कहीं ऎसा तो नहीं कि बस
कैंसिल हो गई या फ़िर उसका टायर पंकचर हो गया. कुछ तो हुआ है, अन्यथा अब तक उसे आ
ही जाना चाहिए था. अधीर होकर उसने फ़ोन घुमाया. वह जानना चाहता था कि उसे आने में
विलम्ब क्यों हो रहा है अथवा उसका अभी लौट आने का मन नहीं हो रहा है?. फ़ोन की घंटी
बज रही थी लगातार. फ़िर फ़ोन पर एक आवाज उभरती है “सब्सक्राइबर इज नॉट
आन्सरिंग”. उसे आश्चर्य हुआ कि आखिर वह फ़ोन क्यों नहीं उठा रही है. फ़ोन रिचार्ज होने लिए स्वीचबोर्ड पर
टंगा है या फ़िर संभव है कि फ़ोन इस समय उसकी पहुँच के बाहर है,या फ़िर वह अपना पर्स
ले जाना भूल गई? शायद इसलिए वह फ़ोन अटैण्ड नहीं कर पा रही होगी. उसने फ़िर से नम्बर
मिलाया और इन्तजार करने लगा. इस बार भी वही रटा-रटाया जवाब सुनने को मिला. उसकी
खीज बढ़ती जा रही थी. उसने अधीर होकर एस.एम.टी के संचालक संतु को फ़ोन लगाया और बस
की लोकेशन जानना चाहा कि बस आई भी अथवा नहीं. फ़ोन पर एक स्वर गूंजा- “भाईसाहब..बस तो अपने निर्धारित समय पर कभी की आ चुकी. क्या
कोई आने वाला था उससे?”. “हाँ भाई हाँ.. मेरी पत्नि उस बस से आने वाली थी और वह अब तक घर नहीं पहुँची, बस उसी का
इन्तजार कर रहा था”. “हो सकता है कि भाभीजी को बस-स्टैण्ड में आने में देर हो
गई हो और बस जा चुकी हो. ( उसने समझाते हुए कहा) हर पन्द्रह मिनट पर एक बस यहाँ के
लिए रवाना होती है, हो सकता है कि वे किसी दूसरी बस से रवाना हो चुकी हों. और थोड़ा
इन्तजार कर लीजिए”. एक सांत्वना देने वाला स्वर गूंजा था उस तरफ़ से.
तभी उसने महसूस किया कि उसके अन्दर बैठा एक अजनबी आदमी उछ्लकर उसके सामने वाली
कुर्सी में आकर धंस गया है. अमरकांत इस समय कपड़े बदलकर जुराब पहनने के लिए झुका
हुआ था. उसे सामने देखकर उसने पूछा- “तुम यहाँ कैसे घुस आए, जबकि दरवाजा अन्दर से बंद है?
अखिर तुम हो
कौन, क्या नाम है तुम्हारा, कहाँ रहते हो और क्या चाहते हो मुझसे?. उसने एक साँस
में कई प्रश्न उछाल दिए थे.
“ मुझे यह जानकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम मुझे
नहीं जानते जबकि मैं तुम्हारा ही अश्क हूँ और तुम्हारे ही भीतर रहता हूँ. मुझे
आने-जाने के लिए कोई रोक नहीं सकता. मैं कहीं से भी तुम्हारे सामने प्रकट हो सकता
हूँ. मेरे भाई,,, सच मानो...मैं तुम्हारा सच्चा हमदर्द हूँ. तुम्हारे बारे में सब
कुछ जानता हूँ. मैं यह भी जानता हूँ कि तुम इस समय अपनी बीबी सुनीता का बेसब्री से
इन्तजार कर रहे हो. ठीक कहा न मैंने”. उसने
अपनी आँखों को गोल-गोल नचाते हुए कहा.
अमरकांत की इच्छा हुई कि उसका टेंटुआ पकड़कर दबा दे ताकि हमेशा-हमेशा के लिए
छुटकारा पा जाए क्योंकि वह किसी कुशल जासूस की तरह पिछले माह से उसका पीछा करता आ
रहा है और उसकी हर छॊटी-बड़ी बातों और हरकतों को जान जाता है. अपने गुस्से पर
नियंत्रण करते हुए उसने अहिस्ता से कहा—“-बंद करो अपनी बकवास और यहाँ से
उड़न-छू हो जाओ. वैसे ही मुझे आफ़िस जाने में विलंब हो गया है. मेरे पास बिल्कुल भी
समय नहीं है कि मैं तुम्हारी बकवास सुनता रहूँ. समझे तुम”. इतना कहकर उसने ताला जड़ दिया. ऎसा करते हुए उसे
प्रसन्नता हो रही थी कि उसने उसे भीतर बंद कर दिया है.
बाहर निकलकर उसने अपनी मोटरसाइकिल निकाली. इस समय घड़ी में दिन के साढ़े ग्यारह
बज चुके थे, जबकि उसका आफ़िस ग्यारह बजे से शुरू होता है. उसने जेब से मोबाईल
निकाला और तत्काल आफ़िस मैनेजर को फ़ोन लगाते कहा कि किसी आवश्यक कार्य के चलते उसे
आफ़िस आने में विलंब हो गया है. वह ठीक बारह बजे से पहले आफ़िस पहुँच जाएगा और आधे
दिन की कैजुअल-लीव के लिए आवेदन दे देगा.
उसकी मोटरसाइकिल आफ़िस की ओर बढ़ रही थी लगातार. तभी उसने महसूस किया कि वही
अजनबी, लगभग हवा मे तैरता हुआ उसके साथ चला आ रहा है. उसे देखकर उसका माथा ठनका.
वह सोचने पर मजबूर हो गया कि जिसे मैंने ताले में बंद कर दिया था, बाहर कैसे निकल
आया?. वह कुछ और सोच पाता कि उस अजनबी ने कहा-“ दोस्त..बुरा मान गए?. इसमें बुरा मानने जैसी कोई
बात ही नहीं थी. मैं अब भी कह रहा हूँ कि इन्तजार-विन्तजार छॊड़ॊ. वह नहीं आने
वाली. मैं तुमसे कब से आगाह कर रहा हूँ कि औरत जात पर विश्वास करना नीरी बेवकूफ़ी है. पिछली बार
भी तो ऎसा ही हुआ था और इस बार भी वही हो रहा है., लेकिन तुम हो कि उसे सती
सावित्री समझे बैठे हो.”
वह सरासर उसकी बीबी पर लांछन मढ़ रहा था. सुनते ही उसके क्रोध का पारा चढ़ने लगा
था. अब वह गुस्से में फ़ट पड़ा था. उसने लगभग चीखते हुए कहा- “बंद करो अपनी बकवास...तुम कौन होते हो मेरी बीबी पर
लांछन मढ़ने वाले?.
“ फ़िर तुम नाराज हो गए. सच्ची बात कहना बुरा है क्या. फ़िर एक हमदर्द झूठ का सहारा भला
क्यों कर लेगा?. वह कहकर गई थी कि तीन दिन बाद लौट आएगी..फ़िर क्यों नहीं लौटी? तुम
बार-बार फ़ोन लगा रहे हो और फ़ोन का हरदम स्वीच ऑफ़ रहना, क्या इस बात का संकेत नहीं
है कि उसे तुम्हारी कोई फ़िक्र नहीं है. फ़िक्र रही होती तो फ़ोन लगाती, बतियाती और
अपने न आने का कारण भी बतलाती. न तो उसने तुम्हारा फ़ोन उठाया और न ही पलट कर फ़ोन
लगाया. मतलब साफ़ है. उसे अपनी नाटक कम्पनी मिल गयी होगी और वह अपने किसी लवर की
बाहों में महारानी बनी झूल रही होगी तभी तो......”
“मैंने कहा न ! अपनी बकवास बंद करो और मेरा पीछा
छोड़ॊ.”
“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी. मेरा काम तो तुम्हें आगह करने
का था, सो मैंने कर दिया. अच्छा तो अब मैं तुमसे बिदा लेता हूँ”. कहकर वह अदृष्य हो
गया.
आफ़िस पहुँचकर उसने टेबल की ड्राज से कोरा कागज निकाला. दरखास्त लिखा और चेंबर
में घुसते हुए उसने आफ़िस मैनेजर को दिया और अपनी सीट पर आकर जम गया.
अजनबी के द्वारा लगाए गए लाछंनो से उसका दिल छलनी-छलनी हो गया था. बार-बार
उसकी नजरों के सामने सुनीता किसी अपराधी की तरह आकर खड़ी हो जाती. उसकी डबडबाई
आँखें देखकर साफ़ जाहिर होता है कि वह अपराधी नहीं है. संभव है कि उसकी फ़ेमिली में
कोई बीमार पड़ गया हो, यह भी तो संभव है कि वह खुद बीमार पड़ गई हो. यह भी संभव है
कि उसका फ़ोन चोरी चला गया हो. निश्चित ही कोई न कोई कारण अवश्य रहा होगा, जिसकी
वजह से वह अपने आने अथवा न आने के कारण नहीं बतला पाई. तरह-तरह के विचार उसे
उद्वेलित कर जाते. उसे इस बात का तनिक भी ध्यान नहीं रहा कि इस समय वह आफ़िस में
बैठा है और उसे अपना काम निपटाना चाहिए.
आफ़िस मैनेजर ने प्यून भेजते हुए उसे तत्काल अपने कैबिन में हाजिर होने की
सूचना भिजवाई. “अभी आता हूँ” कहकर वह अपनी जगह बुत बना बैठा रहा. उसे आता न देख खुद मैनेजर उसके चेंबर में
जा पहुँचा. वह अपने ही बनाए हुए चक्रव्यूह में इतना अधिक उलझा हुआ था कि उसे पता
ही नहीं चल पाया कि मैनेजर साहब ठीक उसके सामने वाली कुर्सी पर विराजमान है.
“क्यों क्या बात है मिस्टर अमरनाथ ! जब काम करना ही नहीं था
तो आफ़िस क्यों चले आए ?. शकल-सूरत देखकर तो
लगता है तुम आज मैंटली डिसटर्ब हो. घर जाओ और किसी डाक्टर से चेकअप करवाओ. जब तक
तुम ठीक नहीं हो जाते, तुम्हें आफ़िस आने की जरुरत नहीं...समझे” डांटते हुए वह उसके केबिन से बाहर निकल गया.
उसका मन किसी काम से जुड़ नहीं पा रहा था. उसने जेब से सिगरेट के पैकेट में से
एक सिगरेट निकाली और माचिस चमकाते हुए उसे सुलगाया. गहरे कश खिंचते हुए उसे कुछ
राहत सी महसूस हुई. यह उसकी पांचवीं सिगरेट थी. अब तक वह चार सिगरेट फ़ूंक चुका था.
किसी तरह समय पास करते हुए वह पांच बजने का इन्तजार करने लगा. पांच बजते ही उसने
अपना केबिन छोड़ा. मोटरसाईकिल निकाली और घर की ओर बढ़ चला.
रास्ता चलते हुए उसने अपनी रिस्टवाच पर नजर डाली. शाम के छः बजे थे. अभी से घर
जाकर क्या करेगा ?,इस सोच के चलते उसने अपनी मोटरसाईकिल का रुख पार्क की ओर मोड़
दिया. गाड़ी एक ओर रखते हुए वह पार्क के भीतर जाकर एक बेंच पर बैठ गया. अभी पार्क
में ज्यादा भीड़ नहीं थी. एक्का-दुक्का बच्चे घसरपट्टी पर खेल रहे थे. चारों तरफ़
हरियाली छाई हुई थी.चारों तरफ़ रंग-बिरंगे फ़ूल खिले हुए थे, जिन पर तितलियाँ मंडरा
रही थी. शीतल हवा बह निकली थी. यहाँ आकर उसे कुछ राहत सी महसूस हुई, बावजूद इसके
अफ़सर की डाँट का असर अब तक कम नहीं हुआ था. मन अब भी कसैला था.
देर तक बैठे रहने के बाद उसने अपने घर की तरफ़ रुख किया. ताला खोला. घर में
प्रवेश किया. अन्दर अन्धकार का साम्राज्य छाया हुआ था. उसने लाईट आन कर दिया. पल
भर में रोशनी चारों तरफ़ फ़ैल गयी. जूतों को एक ओर उतारते हुए वह सीधे ड्राईंग रुम
में जाकर एक कुर्सी में धंस गया. देखता क्या है कि वही अजनबी आदमी सामने वाली
कुर्सी मे बैठा हुआ उसे घूरते हुए मुस्कुरा रहा था. उसे देखते ही वह बमक गया था. “ तुम यहाँ...बंद घर में आखिर तुम घुसे
कैसे..निकलो...निकलो...इसी समय तुम घर के बाहर निकल जाओ...जीना हराम कर रखा है
तुमने मेरा..नहीं निकले तो मैं तुम्हारा गला घोंट दूगां..जान से मार डालूंगा...
समझे”. देखते ही वह लगभग फ़ट सा पड़ा था और वह बेशर्म अब भी
मुस्कुरा रहा था.
“ तुममें इतनी हिम्मत है तो मार डालो मुझे... मैं देखता हूँ
तुम अपने ही वजूद को कैसे मार सकते हो...लो मैं सामने खड़ा होता हूँ...घोंट दो तुम
मेरा गला और मार डालो मुझे.....लेकिन एक बात याद रखना.... मैं मर जाऊँगा लेकिन झूठ
नहीं बोलूंगा. मेरी बात अब भी मान लो, वह नहीं आने वाली.. नहीं आने वाली. तुम्हारी
जरा सी भी फ़िक्र होती तो अब तक आ गई होती....(कुछ देर बाद). क्यों...गला घोंट देने
के लिए तुम्हारे हाथ उठ क्यों नहीं रहे हैं जबकि मैं ठीक तुम्हारे सामने खड़ा
हूँ...मैं जानता हूँ तुममे इतनी हिम्मत ही नहीं है कि तुम मेरा गला घोंट दो..अरे..जिसने
एक चींटी तक नहीं मारी वह किसी इनसान को कैसे मार सकता है....बुजदिल कहीं
के...चलता हूँ सुबह फ़िर मिलूंगा” इतना कहकर वह घर के बाहर निकल गया था.
उस आदमी के चले जाने के बाद उसने राहत की सांस ली.
दिन भर की माथपच्ची के चलते उसका मिजाज अब तक गर्माया हुआ था. सिर में भारीपन
अब तक तारी था. उसने अपने कपड़ॆ उतारे. बाथरूम में जाकर शावर के नीचे जा खड़ा हुआ.
शावर आन किया, शावर से शरीर पर पड़ने वाली शीतल बूंदें उसे अच्छी लग रही थी. देर तक
उसके नीचे खड़े रहने के बाद अब वह तरोताजा महसूस करने लगा था.
नहाने के बाद उसे भूख लग आयी थी. आफ़िस जाने के पहले उसने सुनीता की मनपसंद
शिमलामिर्च की भरवां सब्जी, चार परत वाले पराठें, फ़्राई चांवल, दही और पापड तल कर
रखे थे. उसे पक्का यकीन था कि वह दस बजे तक घर आ जाएगी, सो साथ बैठकर खाना खाएंगे.
इन्तजार करते-करते ग्यारह बज चुके थे और उसके आफ़िस का टाईम भी हो चला था. भूख लगभग
समाप्त सी हो गई थी और वह सीधे आफ़िस चला गया था. सुबह का बनाया हुआ भोजन ठंडा पड़
चुका था. स्टोव्ह में उसने खाना गरम किया. खाने बैठा तो खाया नहीं गया. “परसी हुई थाली का अनादर
नहीं करना चाहिए”, उसे मां के शब्द याद आ गए. भारी मन से उसने किसी तरह दो पराठें हलक के नीचे उतारे और हाथ धो
लिए.
खाना खाकर वह बिस्तर पर आकर पसर गया. बिस्तर पर आते ही सुनीता के साथ बिताए गए
एक-एक पल जीवन्त हो उठे. शरीर में एक उत्तेजना सी फ़ैलने लगी. सांसे फ़ूलने सी लगी.
आँखों में एक नशा सा चढ़ने लगा था. खाली बिस्तर पाकर उसका सारा नशा पल भर में काफ़ूर
हो गया. सब ओर से ध्यान हटाते हुए उसने बिस्तर पर ही पड़े-पड़ॆ टीव्ही. ऑन किया.
बाबी फ़िल्म चल रही थी. अब वह उसमें मजा लेने लगा था. फ़िल्म देखते-देखते कब वह नींद
की आगोश में चला गया, पता ही नहीं चल पाया.
सुबह सोकर उठा तो पूरा शरीर भारी-भारी सा लगा, किसी तरह उसने बिस्तर छॊड़ा.
फ़्रेश होकर नहाया, तब जाकर कुछ अच्छा सा लगा. कुर्सी में धंसते हुए उसने फ़ोन
उठाया. नम्बर डायल किया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी. फ़िर दूसरा एक विचार मन में आया
कि सुनीता के पापा को फ़ोन लगाकर जानकारी ली जाए. “ऎसा करना उचित नहीं होगा” सोचते हुए फ़ोन रख दिया. अब उसने निर्णय ले लिया था
कि वह सुनीता को लेकर ज्यादा कुछ नहीं सोचेगा. उसे जब आना होगा तब आ आएगी.
बाहर खटर-पटर की आवाज सुनकर सहसा उसका ध्यान खिड़की पर गया. वह दूसरा आदमी कांच
में से भीतर तांक-झांक कर रहा था. “शायद डर के चलते अब वह अन्दर आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा होगा” उसने सोचा और वह किसी और अन्य काम में मशगूल हो गया.
अचानक उसके फ़ोन की घंटी टनटना उठी. उसने यह सोचते हुए लपककर फ़ोन उठाया कि
सुनीता का ही फ़ोन होगा. लेकिन दूसरी तरफ़ से आती आवाज किसी मर्द की थी. कुछ कहने से
पहले उन्होंने अपना परिचय देते हुए बतलाया –“ दामादजी...मैं दामोदर बोल रहा हूँ..मंजू का पिता. शायद आप मुझे नहीं
जानते. जानेगें भी कैसे? आपका यहाँ आना काफ़ी कम ही रहा है न ! इसलिए आपसे मेरा
परिचय नहीं हो पाया. मंजू और सुनीता बचपन की सहेलियाँ हैं. आप यह समझ लें की दो जिस्म और एक
जान है वे दोनों. जिस दिन सुनीता जाने की
सोच रही थी, उसी दिन मंजू को डेलेवरी के लिए हास्पिटल में भरती किया गया. डाक्टर
ने बतलाया कि बच्चा उसकी अंतड़ियों में फ़ंस गया है, अतः तत्काल आपरेशन करना होगा,
सुनीता भी उसके साथ ही थी. खैर किसी तरह डिलेवरी हुई. पोता पैदा हुआ लेकिन मंजू की
ब्लिडिंग नहीं रुक पा रही थी. उसकी जान खतरे में थी, उसे तत्काल नागपुर ले जाया
गया. मैं ठहरा एक अपाहिज, चल-फ़िर नहीं सकता. घर में अन्य कोई मेंबर न होने के कारण
सुनीता को उसके साथ जाना पड़ा. करीब सप्ताह भर उसे वहाँ रुकना पड़ा. इतना सुनने के
बाद भी आपके मन में एक प्रश्न जरुर उठ खड़ा हो गया होगा कि सुनीता ने आपको फ़ोन
क्यों नहीं लगाया? मैं भी आपको फ़ोन पर इस बाबत सूचना नहीं दे पाया. हालात ही कुछ
ऎसे बन पड़े थे जिसका बयान मैं नहीं कर सकता. अगर सुनीता न होती तो शायद ही मेरी
बेटी की जान बच पाती ? बेटा...मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ...मुझे माफ़ कर दो. (अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए दामोदर जी फ़बक कर
रो पड़े थे. उनके सिसकने की आवाज फ़ोन पर स्पष्ट रूप से आ रही थी). बेटा...तुम्हें
अकारण इतने दिनों तक कष्ट उठाना पड़ा, मुझे माफ़ कर दो. मेरा विश्वास है कि आप
सुनीता को भी माफ़ कर देगें.”
“ इतनी बड़ी घटना घट गई और आपने मुझे सूचित करना तक उचित नहीं समझा ? काश मुझे
इस बाबत सूचना मिल जाती तो मैं भी वहां चला आता....आपकी मदद करता...आपका सहायक ही
सिद्ध होता”
“आपकी शिकायत उचित है बेटे, लेकिन हालात ही कुछ ऎसे बन पड़े
थे कि हम सबकी सांसे थम सी गई थी. जिन्दगी और मौत के बीच झुलती मेरी बच्ची यदि आज
जीवित है तो उसका सारा श्रेय सुनीता बेटी को जाता है. मेरा आपसे पुनः अनुरोध है कि
आप उसे माफ़ कर देगें”
इसके बाद कहने-सुनने को कुछ बचा ही नहीं था. हफ़्ता-दस दिन के भीतर दिल के आंगन
में जमीं कलुषित भावनाओं की काई पिघलकर, आँखों के रास्ते बहने लगी थी. सुनीता के
प्रति उठे नफ़रत के ज्वारभाट अब तिरोहित होने लगे थे. मन में एक अजीब शांति सी
महसूस होने लगी थी और सुनीता के प्रति प्यार के बादल उमड़-घुमड़कर उसके दिल और दिमाक
पर छाने लगे थे. दूसरे ही पल, उसे उस भीतर के आदमी पर क्रोध आने लगा था. “यह तो अच्छा ही हुआ कि वह उसकी बातों में नहीं आया वरना अनर्थ हो
जाता. शंका की एक छॊटी सी चिंगारी उसके आशियां को जलाकर खाक कर देती” उसने सोचा.
दिल और दिमाक पर छाया बोझ उतर गया था. अब वह अपने आपको तरोताजा सा महसूस करने
लगा था. उसने झट से शेव किया, नहाया और आफ़िस चला गया.
फ़ोन पर सूचना देते हुए सुनीता ने बतलाया कि वह लौट आयी है. बात को आगे बढ़ाते
हुए उसने शाम को जल्दी घर आने का आग्रह भी किया था उसने.
सुनीता के आगमन की बात सुनते ही उसके मन के सूने आंगन में वसन्त उतर आया था,
कोयल कुहकने लगी थी और लाखों फ़ूल एकाएक खिल उठे थे. “जी अच्छा जी” कहते हुए उसने फ़ोन काट दिया था.
पहाड़ सा भारी दिन कैसे कट गया, पता ही नहीं चल पाया. पांच बजते ही वह अपने
केबिन से बाहर निकला. मोटरसाईकिल स्टार्ट की और अब वह किसी फ़िल्मी हीरों की तरह
गीत गुनगुनाता, सीटी बजाता घर की ओर चला जा रहा था.
रास्ता चलते उसने सोचा- सुनीता ने उसे इतने दिनों तक खूब तड़पाया है, इन्तजार
करवाया है, क्यों न थोड़ा विलंब से घर पहुँचा जाय. इस ख्याल के आते ही उसने अपनी
मोटरसाईकिल की दिशा बदल दी. यहाँ-वहाँ के चक्कर लगाने के बाद अब वह पालिका-मार्केट
में जा घुसा. उसने सुनीता के पसन्द की तरह-तरह की मिठाइयाँ खरीदी, मोगरे के फ़ूलों
का गजरा खरीदा, एक बुके लिया और लौट पड़ा.
उसकी चाल में एक विश्व विजेता की सी उछाल थी और मन किसी पंछी की तरह चहचहा रहा
था. घर पहुँचते ही उसकी अंगुली कालबेल पर जा पहुँची. कालबेल के बजते ही जल-तरंग की
स्वर-लहरी तरंगित होने लगी. सुनीता ने दरवाजा खोला. एक मादक मुस्कुराहट बिखेरते
हुए सुनीता ने उसका स्वागत किया. अमरनाथ ने गुलदस्ता देते हुए उसे अपनी बाहों में
कैद कर लिया और ढेरों सारा चुम्बक उसके गालों पर जड़ दिया. बाहों के घेरे में दोनों
देर तक अविचल खड़े रहे.
दामोदर जी से सारी हकीकत जान चुकने के बाद शिकवे-शिकायत की बात छॆड़ना उसे उचित
नहीं लगा. वह जानता था कि ऎसा किए जाने से हसीन रात खराब हो सकती है. किचन से उठकर
दोनों बेडरूम में चले आए.
कमरे में प्रवेश करते ही सबसे पहले उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी. चादर पर सुर्ख लाल
गुलाब की महकती पंखुड़ियाँ बिखरी हुई थी. पूरे कमरे में फ़्रेशनेस का छिड़काव कर दिया
गया था और एक कोने में फ़्रेगनेंट अगरबत्ती सुलग रही थी. मन ही मन वह सुनीता की
तारीफ़ किए बिना न रह सका था. शायद सुनीता जानती थी कि रात को किस तरह खुशनुमा और
रंगीन बनाया जा सकता है. उसने सोचा.
बिना समय गवाएँ उसने उसे अपनी बाहों में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और वह उस
पर झुकने ही वाला था कि उसे भीतर के आदमी की याद हो आयी. अमरकांत नहीं चाहता था कि
वह किसी विलियन की तरह बीच में टपककर कीमती पलों को बर्बाद कर दे. उसने देखा खिड़की
पर पड़ा पर्दा खुला रह गया है, संभव है कि अन्दर तांक-झांक करने लगे. उसका शक सही
निकला. पता नहीं वह कब आ धमका था और पर्दे की ओट से अन्दर झांक रहा था. वह चुपचाप
से उठा. पर्दे को ठीक किया और कमरे में जल रही बत्ती बुझा दिया. अब वह निश्चिंत
होकर
स्वर्गीय
आनन्द ले सकता था.
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अंतिम निर्णय
( कहानी.)
भेड़िया.
( गोवर्धन यादव.)
“तड़ाक”
उसने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया था.
तमाचा जड़ने के साथ ही उसका पूरा शरीर क्रोध में कांप रहा
था. आँखों में अंगारे दहक रहे थे. उसकी आवाज में बिजली-सी कौंध रही थी.
वह किसी भेड़िए की तरह गुर्रा रहा था. अपनी कर्कश आवाज में वह लगातार चीख-चिल्ला
रहा था- “कहाँ है मेरा शेरु.... उसे तुम्हारे हवाले किया था और कहा
था कि उसका ध्यान रखना, उसे समय पर खाना खिलाना...पानी पिलाना और उसे बागीचे में
टहला लाना. बोलो कहा था न !, तुम इतना सा भी काम नहीं कर सकीं? आखिर तुम करती क्या
हो बैठे-बैठे... मलाईदार माल खा-खाकर मुटिया रही हो. बताओ...कहाँ है मेरा
शेरु....और न बतला पाई तो........?
वह “तो” पर आकर अटक गया
था. अटक गई थी उसकी जुबान. वह क्या कुछ नहीं कर सकता है ? कल्पना मात्र से उसके शरीर में कंपकंपी सी होने
लगी थी. वह जानती है कि वह नीचता की सारी हदें पार कर सकता है, वह आदमी से हैवान
हो सकता है... उसकी दुर्गति कर सकता है. आए दिन वह अपनी नीचता पर उतर आता है और
उसकी इतनी जमकर पिटाई कर देता है कि लाख दवा लगाने और सिंकाई करने के बाद भी जिस्म
से दर्द नहीं जा पाता.
“ जी.....मुझे नहीं पता...वह अचानक कहाँ चला गया. खूब ढूंढने
की कोशिश की..लेकिन उसे ढूंढ नहीं पायी”
“ बकवास करती है साली..हरामी....अगर वह नहीं मिला तो समझ
लेना.....मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा”. कहते हुए वह भारी कदमों से चलता हुआ शीघ्रता से बाहर निकल
गया.
वह किसी कटे हुए
वृक्ष की तरह बिस्तर पर गिर पड़ी और देर तक आंसू बहाती रही थी. देर तक रोते रहने के
बाद वह उठ बैठी और वाशरुम में धंस गई और दीवार पर टंगे आईने में अपना चेहरा देखने
लगी. रो-रोकर उसकी आँखें सूज आयी थीं. एक हसीन चेहरे पर विकृति की परछाईयां
साफ़-साफ़ देखी जा सकती थी. गाल पर अब भी पाँचों उंगलियों के निशान मौजूद थे. उसने
नल खोला. शीतल जल के छींटे चेहरे पर डाले. दहकते हुए गालों पर शीतल जल की बूंदों
के पड़ते ही उसे राहत सी मिलने लगी थी. वह देर तक ऎसा करती रही.
वाशरुम से निकलकर वह एक सोफ़े में धंस गई. एक विशाल कक्ष में
वह थी और उसकी तनहाईयाँ थी. सफ़ेद हंस की तरह उजले बीते दिनों की याद आती, तो उसकी
आंखे मुस्कुरा उठती. और वर्तमान में बीत रहे कष्टदायी दिनों की याद करते ही, उसकी आंखों से
पुनः गरमा-गरम आंसू टप-टपाकर झरने लगते. देर तक अनमनी सी बैठी रहने के बाद वह उठ
खड़ी हुई और छत पर निकल आयी.
शीतल
पवन के झंकोरों ने उसे अपने में आलिंगनबद्ध कर लिया. सुखद शीतल हवा के झोंकों में
झूलते हुए उसे अच्छा लगने लगा था. दिन भर का थका-हारा सूरज, पहाड़ी के उस पार उतरकर
अपने घर जाने की तैयारी में था. शाम को छत पर बैठी कांता सूरज को अस्ताचल में जाता
देखती रही थी. ललछौंही किरणॊं से पीपल के पत्ते संवलाने लगे थे. पक्षियों के दल
लौटने लगे थे. वे अपने मुँह में दाना-चुग्गा भर लाई थे, अपने शिशुओं के लिए. दाना-चुगा खिला देने के बाद वे आपस में बतियाने
लगे. दूर-दूर तक उड़ कर जाते, फ़िर वापस लौट आते. शायद वे अपना कौशल दिखा रहे थे.
सारे पक्षी उसकी बिदाई में सांध्य गीत गा रहे थे. बूढ़े पीपल के देह में झुरझुरी सी
भर आयी थी. वह भी तालियाँ बजा-बजाकर पक्षियों का उत्साहवर्धन कर रहा था..
सूरज अपनी अंतिम
किरणॊं का जाल समेटे पहाड के पीछे छिप गया और आसमान में हल्का-सुरमई अंधियारा
घिरने लगा, जो क्रमशः धीरे-धीरे गहराता जा रहा था. अपने से बेखबर कांता दीवार से
पीठ टिकाए प्रकृति के नित-नूतन बदलते रुप को देख रही थी. पंछियों का सामुहिक गान
और अपने बच्चों के प्रति उमड़ आए स्नेह को देखते ही उसे अपनी दोनों बेटियों प्रभा
एवं प्रिती और एकलौते पुत्र अभिजीत की याद हो आई. कहने को तो वे उसके पुत्र और
पुत्रियां हैं, लेकिन समय की प्रचण्ड गति से चलती आधुनिक हवा उन्हें दूर उड़ा ले गई
है. प्रभा अपने बाय-फ़्रेण्ड के साथ डेटिंग पर चली गई है, बिना बतलाए और सूचना दिए.
प्रिती का कुछ अता-पता नहीं है, शायद वह भी अपने किसी आशिक के साथ रंग-रेलियां
मनाने निकल गई हो और अभिजीत अमेरिका की सड़कों पर गटरमस्ती कर रहा होगा. इन तीनों में से कोई उसके पास होता
तो वह उसके कांधे पर सिर टिकाकर रो तो सकती थी...अपना जी हल्का तो कर सकती थी.
लेकिन समय की प्रचण्ड आंधी ने उसका सब कुछ उजाड़ दिया था. अब करे भी तो क्या करे
कांता....किसे सुनाए अपने दिल का दुखड़ा...किसे दिखाए अपने तन पर लगे जख्मों
को....? किसे बतलाए कि राजेश अब पहले जैसा नहीं रह गया है... और बच्चे उससे छिटककर
दूर जा चुके है और वह निहायत अकेली नारकीय जिन्दगी जी रही है. रेत पर पड़ी मछली की
तरह छटपटाती कांता अपने अतीत के गलियारों में उतरकर चक्कर काटने लगी. यादों के
पखेरु कभी पकड़ाई में आते तो कभी हाथ आते-आते फ़ुर्र से उड़ जाते.
बहुत खुश थी कांता अपनी छोटी सी
दुनिया में. एक पतली सी तंग गली में उसका अपना छोटा सा आशियाना था. वह थी, तीनों
बच्चे थे और संग था राजेश, जो उसके सपनों की दुनिया को नए-नए रंगों से रंगीन बनाता
था, उसे हंसाता, खुद हंसता, गुदगुदाता और रोम-रोम में तरुणाई जगा जाता था. जीवन के
कठोर रास्ते पर चलने के पहले उसने इसी तरह का सपना पाल रखा था कि उसका अपना एक
छोटा सा आशियाना होगा, प्यारे-प्यारे बच्चे होंगे और होगा एक प्यारा सा
राजकुमार,जो उसे अपनी बाहों के हिंडोलों में झुलाता रहेगा.
उसके सारे सपने हकीकत में बदलने
लगे थे. उसे राजेश जैसा आदर्श पति जो मिल गया था. उसे पाकर वह निहाल हो गई थी.
राजेश जंगल विभाग में स्टेनों के पद पर कार्यरत था. एक सीमित आय थी उसकी. बावजूद
इसके उसकी घर-गिरस्थी बड़े आराम से चल रही थी. उसके जीवन में वह क्षण भी आ उपस्थित
हुआ, जब वह मां बनने
जा रही थी. शीघ्र ही वह एक बेटी की मां बन गई. राजेश के अनुपस्थिति में उसका सारा
समय प्रभा के देखरेख और साज-संभार में निकल जाता. फ़िर आई दूसरी बेटी प्रिती. जैसा
नाम वैसे ही सीरत-सूरत. अपनी प्यारी-प्यारी बेटियों के संग वह जी भर के बतियाती,
उन्हें संस्कारित करती और समय-समय पर नेक सीख देना नहीं भूलती. दो-दो बेटियों के
होने के बावजूद उसे लगता कि एक पुत्र और हो जाए, तो वह निहाल हो उठेगी. सपना सच
हुआ और अभिजात का उसके जीवन में पदार्पण हुआ.
इस तरह बहुत खुश थी कांता अपनी इस छोटी सी गिरस्थी में.
राजेश भी व्यस्त रहता अपने
कार्यालयीन कामों में. वह हर काम चुटकी बजाते हल कर ले आता. दिन भर का थका-मांदा
होने के बावजूद भी उसके चेहरे पर हंसी खेलती रहती. कार्यालय के सभी अधिकारी, यहाँ
तक की स्टाफ़ का हर छोटा-बड़ा कर्मचारी उसके व्यवहार से खुश रहता था. यही सब कारण था
कि वह सबका चहेता बना हुआ था. शाम के ठीक छः बजे वह अपना केबिन बंद कर सीधे घर चला
आता. कांता और बच्चों के संग हो लेता. बेहद-बेहद खुश थी कांता अपनी छोटी से दुनिया
में, जिसमें कई-कई इंद्र्धनुष एक साथ ऊग
आए थे. कभी वह एक रंग से खेलती, तो कभी दूसरे से, कभी तीसरे से.
राजेश
का भाग्य करवटें ले रहा था. वह अचानक एक ऎसी तिलिस्मी दुनिया में प्रवेश करने जा
रहा था जिसकी कि उसने कल्पना तक नहीं की थी. उसके इलाके के आदिवासी नेता के
देहावसान के बाद विधायक का पद खाली था. उस स्थान की भरपाई के लिए एक ऎसे योग्य और
होनहार व्यक्ति की तलाश थी, जो पढ़ा-लिखा होने के साथ-साथ वाकपटु हो, मिलनसार हो,
विनम्र हो और हर छोटी-बड़ी समस्याओं को चुटकी बजाते हल कर लेने वाला हो. प्रदेश के
सांसद महोदय भी ऎसे व्यक्ति की तलाश में थे.
एक दिन. जंगल विभाग के बड़े आला
अधिकारियों सहित, प्रदेश के सांसद और वन मंत्री वार्षिक अधिवेशन में भाग ले रहे
थे. बातों ही बातों में कन्जर्वेटर साहब ने अपने कार्यालय में कार्य कर रहे राजेश
के बारे में विस्तार से सांसद महोदय को बतलाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक उस जैसा
कर्मठ कर्मचारी नहीं देखा है. यदि उससे त्याग-पत्र लेकर विधायक के पद पर चुनाव
लड़वा दिया जाए तो आपको एक बेहतर केंडिडेट मिल सकता है. आफ़ीसर की बातों में दम था
और उन्हें एक लंबे समय से ऎसे योग्य उम्मीदवार की तलाश भी थी.
सांसद महोदय ने उसे अपने
कार्यालय में बुलवाकर अपना मंतव्य सुनाया. सुनते ही राजेश सकते में आ गया था. उसने
सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह विधायक भी बन सकता है. सुनते ही उसके शरीर
में रोमांच हो आया था. खुशी के मारे वह अन्दर ही अन्दर उछलने लगा था. मन गदगद हो उठा
था. चाहतें पंख पसार कर उड़ने लगी थीं पूरे वेग से. उसे इसी क्षण निर्णय लेना था.
हां कहने मात्र से वह फ़र्श से अर्श तक जा सकता था और ना कहने पर उसे बाबू का बाबू
ही बने रहना था. काफ़ी सोचने और विचार करने के बाद उसने हामी भर दी थी.
आज वह विधायक ही नहीं अपितु एक
खास विभाग का मंत्री भी बन गया था. बाबू से मंत्री बना राजेश अपने भाग्य पर इतराने
लगा था. जिसके पास कभी दो लोग इकठ्ठा नहीं होते थे, आज उसके इर्द-गिर्द भीड़ जमी
रहती है. फ़टीचर सायकिल में चलने वाले राजेश के पास उसकी अपनी बेशकीमती फ़ोरव्हील
गाड़ी है. अब वह टपरेनुमा कमरे में नहीं रहता. आज उसके पास एक आलीशान बंगला है और
नौकर-चाकरों की भीड़. जब वह सफ़र में होता है तो पांच-दस गाड़ियां उसके आगे-पीछे चलती
है. उसका अपना बाडिगार्ड है. आज क्या नहीं है राजेश के पास? धन-दौलत, रुतबा,
पैसे-धेले, नौकर-चाकर. किसी चीज की कमी नहीं है उसके पास. सफ़लता के नशे में मदहोश
रहने लगा था वह.
बहुत खुश थी कांता भी. उसने कभी
अनुमान तक नहीं लगाया था कि वह आम से खास बन जाएगी. आम से खास बनी कांता नित नूतन
सपने देखती और राजेश उन सपनों में रंग भर देता. टपरा टाईप स्कूल में पढ़ने वाली
उसकी बेटियां और बेटे अब शहर के नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ने जाते है. सभी के पास
अपने-अपने व्हिकल हैं. सबके अपने रौब हैं, रुतबें हैं.
समय कभी एक सी चाल में नहीं चलता. वह सीधी चाल
में चलता हुआ कब उलटी चाल में चलने लगेगा, कोई नहीं जानता. एक मनहूस क्षण, बिल्ली
की सी दबी चाल में चलता हुआ कांता के घर में कब घुस आया, पता ही नहीं चल पाया.
छोटी-बड़ी खुशियों के तिनकों को जोड़कर बनाया घोंसला अब बिल्ली की उछाल में जमीन पर
आ गिरा था और घोंसलें में सिर छिपाए खुशियों के पखेरु, चिंचियाते हुए फ़ुर्र से दूर
जा उड़े थे.
एक दिन की बात है. राजेश अपने
दल-बल के साथ एक बिहड़ में से गुजर रहा था. तभी उसकी नजर एक कुतिया पर पड़ी जो आराम
से सो रही थी और उसका नन्हा पिल्ला दूध चूस रहा था. गाड़ी की आवाज सुनकर कुतिया उठ
खडी हुई और जंगल में समा गई. राजेश के इशारे पर गाड़ी रोक दी गई. नवजात शिशु भाग
नहीं पाया. राजेश ने उस पिल्ले को गौर से देखा. उस पिल्ले को देखते ही उसके मन में
दया आ गई. पिल्ला था भी बड़ा सुन्दर. चमकीला रंग, भूरी-भूरी आंखें और जबड़े से
झांकते नुकिले दांत. उसके मन में आया कि इसे अपने बंगले पर होना चाहिए. इसके रहते
उसका घर सुरक्षित रहेगा, ऎसा विचार करते हुए उसने उसे अपने साथ ले आया.
राजेश के पी.ए. ने बतलाया कि वह
कुतिया का बच्चा नहीं बल्कि भेडिया का बच्चा है. लेकिन राजेश ने उसके तर्क को
बोथरा करते हुए, यह मानने से इनकार कर दिया कि वह भेड़िया का वशंज है.
घर में प्रवेश करते हुए उसने
कांता को बुला भेजा और हिदायत देते हुए कहा कि वह इस नवजात पिल्ले का विशेष ध्यान
रखेगी. उसे समय पर दूध पिलवाया करेगी और उसका समूचित रख-रखाव भी करती रहेगी. कांता
ने उस पिल्ले को गौर से देखा. लम्बा मुँह, झब्बेदार पूँछ, आँखों से टपकती चालाकी.
देखते ही समझ गई कि वह कुतिया का नहीं बल्कि भेड़िया का बच्चा है. उसने अपनी ओर से
राजेश को समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि जैसा वह समझ रहा हैं, वैसा नहीं है. उसने
सलाह देते हुए कहा भी कि उस पिल्ले को फ़िर से जंगल में छुड़वा देना चाहिए. राजेश
किसी भी तरह उसके तर्कों से सहमत नहीं था.
उसका एक ही कहना था कि वह कुतिया का पिल्ला है, अतः उसे वह किसी भी कीमत पर अपने
बंगले पर ही रखेगा.
दिन के शुरुआत भी बड़ी अजीब तरीके
से होती. दिन निकलते ही उसके चमचों की भीड़ बंगले पर जमा हो जाती. चाय-पानी-नाश्ते
के बाद वह अपने क्षेत्र के दौरे पर निकल जाता. वह घर कब लौटेगा, कोई नहीं जानता.
कभी रात के दस, तो कभी बारह बजे वह घर लौटता. उसके लौटने का वह बेसब्री से इन्तजार
करती रहती. इन्तजार करते-करते कभी-कभार उसकी आंख लग जाती, तो वह तूफ़ान उठा लेता और
अर्र-सर्र बकने लगता. उसकी बहकी-बहकी चाल देखकर वह समझ जाती कि श्रीमान महुआ चढ़ाकर
घर लौटे हैं. शराब और कबाब से दूर रहने वाला उसका राजेश अब पूरी तरह बदल गया था.
एक दिन वह भी था जब वह आफ़िस से थका-हारा घर लौटता था. थका-मांदा होने के बावजूद वह
उसे अपनी बाहों के घेरों में कस लेता और जी भर के प्यार-दुलार दिया करता था. लेकिन
अब ऎसा नहीं होता. प्यार के दो शब्दों की जगह अब घिनौनी गालियों ने ले ली थी. वह
समझ नहीं पा रही थी कि इस बदलाव का क्या कारण है?
. पिल्ला अब धीरे-धीरे बड़ा हो
रहा था. जैसे-जैसे वह बढ़ता गया, उसकी खुराक भी बढ़ती चली गई. उसे अब दिन में दो बार
मीट खिलाया जाता. मीट खा-खाकर वह मुटियाने लगा था. उसके शरीर का भूरा-काला रंग और
चटख हो आया था. पूंछ और झबरीली घनी हो गई थी. उसके नूकुले दातॊं को देखकर भय लगता.
कूं..कां करने वाला युवा होता पिल्ला अब गुर्राने लगा था. उसके गले से निकलने वाली
आवाज भी दिल को दहला देने के लिए काफ़ी थी. लेकिन इन सब बातों से बेफ़िकर राजेश उससे
चिपका रहता. ऎसा करते देख उसे घिन होने लगती. वह समझाने की कोशिश करती लेकिन राजेश
की घूरती आंखों को देखकर वह सहमी रह जाती. शब्द गले में अटके रह जाते.
राजेश के इस बदले रूप को देखकर वह सहम जाती. वह समझ रही थी
कि इस तरह का बदलाव अचानक नहीं आया है. यह बदलाव उस भेड़िए के आने के बाद से ही
शुरु हुआ है. नशे में चूर राजेश भेड़िए के साथ खेलता, खुद मीट खाता और उसे भी
खिलाता जाता. खेल-खेल में उसका झूठा खाना भी खा लेता. ऎसा करते हुए देखकर उसे घिन
आने लगती. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, सिवाय देखते रहने के. राजेश के व्यव्हार
में आए परिवर्तन की वजह वह पूरी तरह समझ चुकी थी कि नार्मल रहते हुए वह अचानक
क्यों भड़क उठता है, उसकी आवाज में कर्कशपन क्यों उतर आता है, उसके लक्षणॊं को
देखकर निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि राजेश के शरीर में भेड़िए का प्रवेश हो
चुका है, तभी तो वह इतना आक्रमक हो उठता है.
सुबह से ही घर में काफ़ी चहल-पहल थी. शायद कहीं टूर पर जाने
का प्रोग्राम बन चुका था. राजेश के चमचों की उपस्थिति देखकर तो यही कहा जा सकता
था. बाद में पता चला कि उसे मुख्यमंत्रीजी का बुलावा आया है और वह दो-चार दिन के
लिए शहर से बाहर रहेगा. सारी तामझाम के बाद उसका काफ़िला रवाना हुआ. जाने से पहले
उसने कांता के कमरे में प्रवेश करते हुए कहा कि वह दो-चार दिन के लिए बाहर जा रहा
है. उसकी अनुपस्थिति में शेरु का ध्यान रखना. उसको समय पर खिलाया-पिलाया करना.
उसके रख-रखाव में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहनी चाहिए.
कांता के मन में आया कि पलटकर जवाब देना चाहिए और यह पूछना
चाहिए कि एक हिंसक पशु की इतनी ज्यादा चिंता करने के बजाय उसे अपने बेटा-बेटी की
भी तो सुध लेनी चाहिए. उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं है कि वे कहां है और कब
घर लौटेगें? लेकिन नहीं, केवल उसे तो सिर्फ़ फ़िक्र है बस शेरु की. मन में
उमड़ते-घुमड़ते सवाल होंठॊं तक आकर रुक जाते. वह हिम्मत नहीं जुटा पायी थी कि पलटकर
जवाब दे दे. इससे पहले भी उसने इस बात का जिक्र किया था तो उसने टका सा जवाब देते
हुए कहा था कि बेचारे अभी बच्चे हैं, उम्र के कच्चे हैं. यही तो दिन है उनके
खाने-खेलने के. एक मंत्री के बेटा-बेटी को किस तरह से रहना..घूमना..फ़िरना चाहिए,
तुम देहाती औरत क्या समझोगी. आ जाएंगे,जहां भी गए होंगे, तुम्हें चिन्तित होने की
आवश्यकता नहीं है. उसकी सपाटबयानी सुनकर हक्का-बक्का रह गई थी वह. चुप रहने के
अलावा और कर भी क्या सकती थी बेचारी. एक आंधी सी गुजरने लगी थी उसके भीतर.
शेरु के लिए एक आदमी अलग से तैनात कर रखा था राजेश ने. वह
ही उसे नहलाता-धुलाता, खिलाता-पिलाता और घुमाने ले जाता. घुट्टा शेरु कभी बकरी पर
हमला कर देता तो कभी मुर्गियों के बाड़े में घुस कर दो-चार मुर्गियां चट कर जाता.
उसकी इस हरकतों से परेशान होकर उसके गले में एक मोटी सी जंजीर बांध दी गई थी. जीभ
लपलपता शेरु जब दड़बे से बाहर लाया जाता, तो संभाले नहीं संभलता था. वह उसे खींचकर
संभालने की कोशिश करता, लेकिन शेरु उसे घसीटता हुआ दूर तक चला जाता था. कई बार तो
ऎसा भी हुआ है कि उसने जंजीर तोड़कर भाग जाने की कोशिश भी की थी.
एक सुबह. शेरु के अटैण्डेंट ने उसे बाहर घुमाने के लिए दड़बे
के बाहर निकाला. गुर्राहट के साथ, जीभ लपलपाता शेरु जैसे ही दरवाजे की चौखट से
बाहर निकला, पूरी ताकत के साथ उसने चेन छुड़ा ली और जंगल की ओर भाग खड़ा हुआ.
अटैण्डेंट चिल्लाता रहा, उसे पुकारता रहा लेकिन उसने पलट कर नहीं देखा. जब शेरु उसकी पकड़ से बाहर हो गया तो उसने कांता
से अपना दुखड़ा रोते हुए उसके भाग जाने की सूचना दी. कांता जानती थी कि राजेश लौटने
के बाद पहले शेरु के बारे में ही पूछताछ करेगा. जब उसे यह सुनने को मिलेगा कि उसका
प्रिय पात्र शेरु भाग गया है, तो उस पर कितना जुल्म ढाया जाएगा, जिसकी कल्पना
मात्र से उसके शरीर में सिहरन होने लगी थी. दिल बैठने लगा था. उसने अटैण्डॆंट को
आज्ञा दी कि वह उसकी खोजबीन में तत्काल निकल जाए.
दो दिन की खोज-खबर के बाद भी शेरु पकड़ा नहीं गया था. राजेश
घर लौट रहा है, इस बात की खबर उसे मिल गई थी. यदि इस बीच शेरु पकड़ा नहीं गया तो वह
क्या जवाब देगी? इस चिंता में उसका दिल बैठा जा रहा था. उसने अपने नौकरों को आज्ञा
दी के वे अपने साथ जाल साथ लेकर जायें. साथ ही उसने सक्त हिदायत भी दी कि उसे हर
हाल में पकड़कर ले आना है.
बाहर गेट पर हो-हल्ला सुनकर वह बाहर निकली. उसने देखा.
रस्सी के जाल में बंधा शेरु, जिसे एक लठ्ठ के सहारे दो आदमी टांगकर अन्दर आ रहे है
और उनके पीछे पच्चीसों लोगों की भीड़ भी चली आ रही है. शेरु मिल गया, यह जानकर उसने
राहत की सांस ली. लेकिन अटैण्डॆंट को देखते ही सारा माजरा उसकी समझ में आ गया कि
शेरु ने उस पर भयानक तरीके से हमला किया होगा जिससे उसके कपड़े जगह-जगह से फ़टे हुए
थे और खून रिसकर उसके पूरे कपड़ों में फ़ैल रहा था. वह बुरी तरह से जख्मी हो गया था
और थर-थर कांप भी रहा था. उसे तत्काल मेडिकल ऎड दिए जाने की जरुरत है. अगर समय पर
ऎसा नहीं किया गया तो उस बेचारे की जान भी जा सकती है. उसने आगे बढ़कर मेडिकल कालेज
के डाक्टर को फ़ोन किया और तत्काल एम्बुलेंस भेजने का अनुरोध किया.
जाल में फ़ंसा शेरु पूरी ताकत के साथ जोर लगाकर आजाद होना
चाहता था. पूरी जोर अजमाईश के साथ वह बुरी-बुरी आवाज निकालते हुए जोरों से गुर्रा
रहा था. कोई भी आदमी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. शायद कोई ऎसा
कर पाता तो निश्चित ही वह उसके चीथड़े मचा देता.
कांता के मन में खलबली मची थी कि ऎसी विकट परिस्थिति में
उसे क्या करना चाहिए?. एक मन हुआ कि इसे तत्काल गोली मार दी जानी चाहिए. यदि वह
ऎसा कर सकी तो निश्चित ही एक भेड़िए से छुटकारा पाया जा सकता है, जो उसकी जान का
दुश्मन बना बैठा है. परिणाम से भी वह वाकिफ़ थी कि इसका अन्जाम क्या हो सकता है.
उसका मन घड़ी के पेण्डुलम की तरह दोलायमान हो रहा था. वह निर्णय नहीं ले पा रही थी
कि उसे क्या करना चाहिए.
दोलायमान होते मन को उसने किसी तरह काबु में किया और निर्णय
लिया कि शेरु के अभी तत्काल गोली मार देनी चाहिए.
निर्णय लेने के साथ ही उसने अपने कमरे में टंगी रिवाल्वर
उठा लायी और धड़कते दिल से फ़ायर कर दिया. एक के बाद एक उसने तीन गोलियां उसके जिस्म
में उतार दी. गोली लगने के साथ ही वह जाल सहित काफ़ी ऊपर तक उछला, जोरों से
गुर्राया और निर्जीव होकर धरती पर आ गिरा.
उसके धरती पर गिरने के साथ ही राजेश ने प्रवेश किया. आंगन
में जमा भीड़ देखकर सारा माजरा उसकी समझ में आ गया था कि उसका शेरु मारा गया है.
कभी वह आंखें तरेर कर अपने मरे हुए शेरु को देखता तो कभी साक्षात दुर्गा बनी कांता
को. देर तक घूरते रहने के बाद वह भारी कदमों से चलता हुआ बंगले में घुस गया.
कांता के मन में अपरिमेय संतोष उतर आया था कि उसने अपने
जीवन को नरक बना देने वाले एक भेड़िए को तो मार गिराया है और अब उसे यह देखना है कि
दूसरा भेड़िया उसके साथ किस तरह का व्यवहार करता है ?.
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लाल कामीज बिल्ला न.२४३
लाल कमीज-बिल्ला नम्बर २४३
(
गोवर्धन यादव)
“यात्रीगण कृपया ध्यान
दें. निजामुद्दीन से चलकर हैदराबाद को जाने वाली दक्षिण एक्सप्रेस अपने निर्धारित
समय से एक घण्टा विलम्ब से चल रही है….. यात्रीगण कृपया ध्यान दें”..... उद्घोषिका बार-बार इस
सूचना को प्रसारित कर रही थी.
दक्षिण एक्सप्रेस ही
क्या प्राय़ः सभी गाड़ियां कोहरे की वजह से विलम्ब से चल रही है. पूरा प्लेटफ़ार्म
यात्रियों से खचाखच भरा हुआ है. हर कोई अपने आप में व्यस्त है. कोई मोबाईल पर
चिटचैट करने में लगा है, तो कोई अपना सामान इधर से उधर जमाने में लगा है. कोई सीट पर
कुण्डली मारे बैठा, अनमने मन से अखबार के पन्ने पलट रहा है, तो कोई किसी पत्रिका के. सामान
बेचने वाले वैण्डर अपनी ठिलिया लेकर इधर से उधर चक्कर लगा रहे है. उन्हें उम्मीद
है कि कोई न कोई सामान तो बिक ही जाएगा. चाय बेचने वाले भी कहाँ पीछे रहने वाले
थे. वे भी अपनी केतली उठाए इधर से उधर डोल रहे थे. बड़े-बूढ़े अपने सामान की सुरक्षा
में सतर्क बैठे थे, जबकि युवातुर्क कान में इअर-फ़ोन और आँखों पर सनग्लास चढ़ाए चढ़ाए, एक सिरे से चलते हुए दूर
तक निकल जाते और फ़िर बड़ी शान से, धीरे-धीरे चलते हुए अपनी जगह पर वापिस लौट आते. सफ़ाई कर्मी
मुस्तैदी के साथ प्लेटफ़ार्म की सफ़ाई में लगे हुए थे. सफ़ाई कर्मी, सफ़ाई करते हुए आगे निकलता कि दूसरा यात्री कोई न कोई
अनुपयोगी वस्तु बिखेर देता. इन हरकतों को देख वह अपने दूसरे सफ़ाई कर्मी से शिकायत
भरे शब्दों में कहता- “कब सुधरेंगे हमारे यहाँ के लोग? जगह-जगह डस्टबीन रखे हुए हैं
लेकिन उनमें कचरा न डालकर लोग फ़र्श पर बिखेर देते हैं. शर्म नाम की तो कोई चीज ही
नहीं बची है. समझाओं, तो झगड़ा-फ़साद करने बैठ जाते हैं. कचरा पड़ा देखकर सुपरवाईजर अलग खरी-खोटी
सुनाता है. अपने मन का गुबार निकाल कर फ़िर वह अपने काम में जुट गया था. लाल कुर्ता
पहने कुली इस आशा को लिए इधर से उधर चक्कर काटते दीखते कि कोई न कोई काम तो मिल ही
जाएगा. किसी को सीट चाहिए होती है, तो किसी के पास जरुरत से ज्यादा सामान होता है. उन्हें काम
तो मिल जाता है लेकिन मोल-भाव को लेकर काफ़ी चिकचिक चलती है, तब जाकर कोई सौदा पटता है.
“यात्रीगण कृपया ध्यान
दें....” उद्घोषिका
का स्वर माइक पर गूंजता है. वह अभी पूरा वाक्य भी नहीं बोल पायी थी कि यात्रियों
के कान सजग हो उठते है. मन में खदबदी सी मचने लगती है कि पता नहीं कौन सी ट्रेन
आने वाली है. वाक्य पूरा हो इसके पहले पूरे प्लेटफ़ार्म पर पसरा कोलाहल थम सा जाता
है. वाक्य पूरा होते ही यात्री अपने-अपने सामान समेटने लगता है. कौन सा डिब्बा
कहाँ लगेगा, स्क्रीन पर दिखाया जाने लगता है. लोग इधर से उधर भाग-दौड़ लगाने लगते है. कुछ
युवा तुर्क प्लेटफ़ार्म के एकदम किनारे पर खड़े
होकर, आने वाली ट्रेन को देखने के लिए कभी इधर, तो कभी उधर देखते हैं. इनमें से
कई तो ऎसे भी है, जिनको पता ही नहीं होता कि गाड़ी किस दिशा से आने वाली है.
गाड़ी धीरे-धीरे रेंगते
हुए आकर ठहर जाती है. उतरने वाला यात्री उतर भी नहीं पाता कि चढ़ने वाले किसी तरह
डिब्बे में प्रवेश कर जाना चाहते है. एक अघोषित मल्ल-युद्ध मचने लगता है इस समय.
थोड़ी देर में माहौल शांत होने लगता है. ट्रेन अब अपनी जगह से चलने लगी है. कुछ
मनचले लड़के दौड़कर डिब्बे में सवार होने के लिए रेस लगा रहे थे. ट्रेन ने अब स्पीड
पकड़ ली थी. ट्रेन के गुजर जाने के बाद भी भीड़ में कमी नहीं हुई थी.
एक ट्रेन अभी गुजरी भी
नहीं थी कि दूसरी आकर खड़ी हो गई. ट्रेन के आते ही भगदड़ मच गई. कोई इधर से दौड़
लगाता, कोई
उधर से. उतरने वालों और सवार होने वाले पैसेंजरों के बीच तू..तू...मैं...मैं. मचने
लगी. ट्रेन चुंकि सुपरफ़ास्ट थी, और उपर से विलम्ब से भी चल रही थी, फ़िर स्टापेज भी काफ़ी कम समय के
लिए ही था. इसलिए ये सब तो होना ही था.
दो-ढाई घण्टे में
चार-पांच ट्रेने आयीं और चली गई. किसी दूसरी ट्रेन के आने में अभी विलम्ब था.
सब्जी-पूड़ी की ठिलिया लगाने वाले रामदीन ने बड़े इत्मिनान से माथे पर पर चू रहे
पसीने को अपने गमझे से पोंछा और अब वह नोट गिनने का उपक्रम करने लगा था. इस बीच
उसकी जमकर कमाई हुई थी. नोट गिन लेने के बाद उसने नोटॊं की गड्डी को अपनी पतलून के
जेब में ठूंस कर भरा और लोगों की नजरें बचाते हुए उसने तम्बाखू की डिब्बी निकाली.
जर्दा निकाला और चुने से मलते हुए अपने होंठो के नीचे दबा लिया
.
काम की व्यस्तता के
बावजूद उसकी नजरें कुली कल्लु पर जमी हुई थी. कई ट्रेनों के गुजर जाने के बावजूद
भी वह रेलिंग से पीठ टिकाए बैठा था. अनमना सा. उदास सा. पल भर को भी अपनी जगह से
हिला तक नहीं था. सोच में पड़ गया था रामदीन कि जरुर कोई न कोई दुख साल रहा होगा
उसे, वरना
एक मस्त तबियत का आदमी, कभी इस तरह सूरत लटकाए बैठ सकता है?. उससे अब रहा नहीं गया.
“का बात है कल्लु
भइया....काहे सूरत उतारे बैठे हो? जरुर कोई बात है, वरना तुम कभउ अएसन बैठे नाहीं दिखे. तबियत-वबियत तो
ठीक है ना तुम्हारी ?” रामदीन ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा था.
सहानुभूति में पगे दो शब्दों को सुनकर उसकी आँखे नम हो उठी थीं. किसी तरह छलछला आए
आंसुओं को रोकते हुए उसने कहा-
“अइसी वइसी कोनु बात नई
है रे......बस यूं ही..”
“जरुर, कोई न कोई बात तो है....
वरना तुम इस तरह उदासी ओढ़े कभी बैठे रहे हो भला?. खुश तबियत होती तो अब तक दो-तीन
सौ तो कमा ही लेते. देखो भइया...तुम्हारा हमारा आज का साथ नहीं है. बरसों बरस से
हम एक दूसरे को जानते हैं...एक दूसरे के दुख-सुख के साथी रहे हैं. न तो हमारी कोई
बात तुमसे छिपी है और न ही तुम्हारी बात हमसे छिपी है. तुम्हारी हालत देखकर समझा
जा सकता है कि तुम किसी बात को लेकर दुखी जरुर हो. कहते हैं कि अपना दुख उजागर कर
देने से मन हलका हो जाता है....दुख आधा हो जाता है...बताओ तो आखिर का बात है?
“ आखिर बतलाए भी तो क्या
बतलाए कल्लु कि उसका बेटा जो महानगर में एक बड़ा अफ़सर है, उसे अपने साथ शहर लिवा ले जाने
के लिए तीन दिन से यहाँ डेरा डाले बैठा है. उसका अपना तर्क है कि कि मुझे अपना
पुश्तैनी मकान और खेत-बाड़ी बेच-बाच कर उसके साथ रहना चाहिए. उसका तो यह भी कहना है
कि उसे मेरे स्वास्थ्य आदि को लेकर गहरी चिंता बनी रहती है लेकिन लंबी दूरी रहने
के कारण वह बार-बार नहीं आ सकता. साथ रहेंगे तो
हमें बेफ़िक्री बनी रहेगी. फ़िर चिंटु भी तो आपकी खूब याद करता है. उसे आपका
साथ मिल जाएगा. सच कहता है बेटा कि मुझे साथ चले जाना चाहिए. तभी उसे अपनी बहू
अल्का की याद हो आयी...... याद हो आए वे कड़ुवे पल जब उसकी हरकतों को देखकर उसका
दिल छलनी-छलनी हो गया था. उसे खून के आंसू बहाने पड़े थे. यदि लगातार का साथ बना
रहा तो वह और भी नीच हरकतें कर सकती है. बेटे से शिकायत भी करेगा तो कितनी बार
करेगा? जाहिर
है कि उनके बीच अप्रत्याशित तकरारें बढ़ेगी और संभव है कि उनकी घर-गृहस्थी में दरार
पड़ जाएगी..... घर नर्क बन जाएगा....वह ऎसा होता हुआ वह हरगिज नहीं देख
सकेगा.....वह उन दोनों के बीच खलनायक नहीं बनना चाहेगा. अपने दुखों को मित्रों के
बीच बांटना उचित नहीं है. ऎसा करने से उसकी जग हंसाई ही होगी और उनकी नजरों में
बेटे की साख भी गिर जाएगी....नहीं...नहीं वह अपने दुखों की गठरी किसी पर नहीं
खोलेगा”. वह
कुछ और सोच पाता इसी बीच एनाउन्सर की आवाज गूंजने लगी थी, शायद किसी ट्रेन के आने का वक्त
हो गया था. ट्रेन के आगमन की सूचना पाकर उठ खड़ा हुआ और अपनी ठिलिया सजाने लगा था.
रामदीन के जाते ही कल्लु
फ़िर अपनी विचारों की दुनिया में वापिस लौट आया था. स्मृतियों के पन्ने फ़िर तेजी से
फ़ड़फ़ड़ाने लगे थे और वह अतीत की गहराइयों में उतरकर डूब-चूभ होने लगा था.
उसके पोते का जन्म दिन
था. फ़ोन पर चिंटू था. सबसे पहले उसने ’दादाजी पायलागु” कहा. सुनते ही उसके शरीर में
रोमांच हो आया था. “ दादा जी, परसों मेरा जन्म-दिन है. आपको आना पड़ेगा. आपके बगैर मुझे अच्छा नहीं लगेगा.
मैंने पापा जी से कह दिया है कि अगर आप नहीं आओगे, तो मैं अपना जन्मदिन नहीं
मनाउंगा. आज ही आप टिकिट कटवा लें. कल सुबह तक आप यहाँ पहुँच जाएंगे ”. ना करने का तो कोई
प्रश्न ही नहीं था. उसने हामी भर दी थी और रात की ट्रेन का रिजर्वेशन करवा लिया.
अपने पोते से मिलने को
वह उतावला हुआ जा रहा था. कई दिनों से वह सोच भी रहा था कि एक बार उससे मिल आना
चाहिए. लेकिन चाह कर भी वह नहीं जा सका था. जाने से पहले उसने अपने प्रिय पोते के
लिए एक बड़ा सा खिलौना खरीदा. बनारसी की मिठाई की दुकान से एक किलो का डिब्बा पैक
करवाया और जयराम की दुकान से अपने बेटे के लिए सूट का कपड़ा और बहूरानी के लिए साड़ी
पैक करवायी.
ट्रेन अपने निर्धारित
समय से दो घंटा विलम्ब से चल रही थी. ट्रेन को विलम्ब से चलता देख उसे खीझ होने
लगी थी. मन में बेचैनी बढ़ने लगी थी. वह जल्द से जल्द शहर पहुंच जाना चाहता था,
लेकिन मजबूरी थी.
वह कर भी क्या सकता था ?. वैसे तो अपने जीवन में वह लेट चलने वाली ट्रेनों को देखता
आया है. तब उसके मन में न तो किसी प्रकार का रोष पैदा हुआ था और न ही खीज पैदा हुई
थी. ट्रेन के इन्तजार में बैठा वह सोचने लगा था कि काश यदि उसके पंख होते, तो बिना समय गवांए वह
कभी का वहाँ जा पहुँचता.
आखिर इन्तजार की घड़ियां
समाप्त हुई. ट्रेन छुक-छुक करती प्लेटफ़ार्म पर आकर ठहर गई थी. अपनी निर्धारित सीट
पर बैठते हुए उसने अपने सूटकेस को चेन से कसा और ताला जड़ दिया. अब वह इत्मिनान से
सफ़र कर सकता है.
खिड़की पर उसकी अपनी
मित्र मंडली जमी हुई थी. एक कहता- “भैये..अब जमकर रहना बेटे के पास. हो सके तो वहीं रुक जाने
का मन बना लेना. उसका वाक्य पूरा भी नहीं हो पाता तो दूसरे ने चहक कर कहा-
हाँ..हाँ तुमने पते की बात की है. इन्हें अब बेटे के पास ही रहना चाहिए. बुढ़ाती
देह को किसी न किसी का सहारा तो होना ही चाहिए न !. भाभी होती तो अड़ी समय में
देखभाल करती. पता नहीं रात-बिरात क्या कुछ हो जाए ?. ईश्वर करे ,ऎसा न हो, लेकिन नियति का क्या
ठिकाना, कब
क्या घट जाए?. तीसरे ने कहा- तुम लोग ठीक सलाह दे रहे हो, पर भाई माने तब न. बेटा कितनी
मिन्नते करता रहता है कि साथ रहना चाहिए. पर ये जिद पकड़े बैठे हैं कि यहीं ठीक
हूँ. पता नहीं तीन कमरों के छोटे से मकान का मोह ही नहीं छूट पा रहा है इनका. अब
चौथे की बारी थी-“ इनकी जगह मैं होता न ! तो कभी का बेटे के पास चला जाता. अरे...हम अपने
बेटा-बेटियों को पढ़ाते-लिखाते ही इसलिए हैं कि वे एक दिन बड़ा आदमी बने..एक अफ़सर
बने और हम गर्व के साथ उनके बीच रहकर शेष जीवन काट सके. जितने मुंह उतनी बातें. वह
गम्भीरता से सबकी बातें सुनता रहा था.
सिग्नल दिया जा चुका था.
ट्रेन के छूटने का समय हो चला था. सबकी ओर मुखातिब होते हुए.वह केवल इतना ही कह
पाया था-“ आप सब लोगों ने उचित सलाह ही दी है. मुझे खुशी हुई आप लोगों की बात सुनकर.
लेकिन मैं अब तक इस शहर को छोड़ने का मानस नहीं बना पाया. मन है कि मानता ही नहीं.
अब तुम्हीं बताओ....बचपन से लेकर अब तक मैं इसी शहर में पला-बढ़ा. पूरा जीवन आप
लोगों के बीच रह कर बिताया. आप लोगों के बीच रह कर सुख-दुख दोनों भोगे. मैं आप
लोगों से इतना घुलमिल गया हूं कि दूर चले जाने की कल्पना मात्र से दिल में घबराहट
होने लगती है. वह और कुछ कह पाता की ट्रेन चल निकली. अश्रुपुरित नेत्रों से वह सभी
को हाथ हिला-हिलाकर अभिवादन करता रहा था, जब तक कि वे आंखों से ओझल नहीं हो गए थे.
पूरी रात वह चैन की नींद सो नहीं
पाया था. अपने पोते के साथ बिताए दिनों की याद करते हुए उसके शरीर मे गुदगुदी होने
लगी थी. कभी उसे घोड़ा बनना पड़ता था तो कभी चोर-सिपाही का खेल खेलते हुए उसे चोर
बनना पड़ता. चिंटु हाथ में रस्सी का टुकड़ा लिए मानो वह हथकड़ी हो, उसकी तलाश करता. कभी उसे
पलंग के नीचे तो कभी दरवाजे की ओट में खड़ा रहना पड़ता था. पकड़ा जाने पर पिंटु खूब
शोर मचाता कि उसने एक मुलजिम को गिरफ़्तार कर लिया है. कभी घूमते हुए वे शहर के
बाहर निकल जाते और ऊँची सी टेकड़ी पर बैठकर अपने घर की तलाश करते. दोनों के बीच होड़
लगती कि जो अपने घर को पहचान लेगा, इनाम में उसे सौ रुपये का एक नोट मिलेगा.
बेचारा चिंटु हार मान
लेता. असंख्य मकानों के बीच अपना घर पहचान लेना, कोई आसान काम तो नहीं था उसके
लिए. आखिर वह अपनी हार मान लेता और कहता-“ दादा जी, हम हार गए. पापा से पैसे लेकर मैं आपको दे दूंगा. अब
आप ही बतलाइये कि अपना मकान कौन सा है?. वह उंगली से इशारा करते हुए उसे अपना मकान दिखलाता.
वह सब महज इसलिए भी इस खेल को खेल रहा था कि बड़ा होने पर उसे अपनेपन का अहसास तो
बना रहेगा..... अपने घर के प्रति मोह तो बना रहेगा. वैसे वह जानता है कि पढ़-लिख कर
कोई एक बार महानगर में पैर रख लेता है, वह दुबारा लौट कर घर नहीं आता. पिंटु ही की क्या,
उसका अपना बेटा भी
तो शहर का ही होकर रह गया है. वह शायद ही वापिस लौटे. जब वह लौट नहीं सकेगा तो इस
नन्हें बालक से क्या उम्मीद की जा सकती है?.
पिंटु की बात सुनकर मन
खुश हो जाता और वह उसे अपने सीने से चिपका लेता. उसे सीने से लगाते हुए उसके
रोम-रोम में प्रसन्नता की लहरें हिलोरे लेने लगतीं. फ़िर वह उसके कहता-“ पिंटु सौ रुपये उधार
रहे. मुझे अभी इसकी आवश्यक्ता नहीं है. जब तुम बड़े होगे. लिख-पढ़कर जब तुम एक अफ़सर
बनोगे ! तब लौटा देना” कहते हुए उसकी कोर भींग उठती. वह जानता है कि जब तक वह इस
संसार में ही नहीं रहेगा.
पिंटु कभी किसी पेड़ की
शाख पकड़कर झूलता तो कभी किसी रंग-बिरंगी तितली का पीछा करते हुए उसे पकड़ने के लिए
दौड़ लगाता. सर्र-सर्र करती बहती हवा के झोंकों में उसे लगता कि वह भी किसी पखेरु
की तरह हवा में उड़ा जा रहा है. तरह-तरह के खेलों को खेलते हुए शाम घिर आती. सूरज
के लाल-लाल बड़े से गोले की ओर उंगली उठाकर वह कहता-“ पिंटु सूरज देवता अब अपने घर जा
रहे हैं. कल सुबह फ़िर वे एक नया सबेरा लेकर आएंगे. बस, थोड़ी ही देर में अन्धकार गहराने
लगेगा. अब हमें इस पहाड़ी पर से उतर जाना चाहिए, वर्ना अंधकार में उतरने में
परेशानी हो सकती है. मगन मन चिंटु हामी भरता और वे पहाड़ी उतरने लगते.
घर लौटने से पहले वह उसे
चाकलेट-टाफ़ी वगैरह दिलवाता और इस तरह वे घर लौट आते.
हंसते-खेलते दिन पर दिन
कैसे बीतते चले गए, पता ही नहीं चल पाया. अब उसे वापिस होना था. उसके स्कूल जो खुलने वाले थे.
पिंटु के जाने के बाद से उसका दिल गहरी उदासी से भर गया था. न खाने-पीने में मन
लगता और न ही उसे नींद आती थी. धीरे-धीरे सब सामान्य हो चला था. बीते दिनों को याद
करते हुए वह खुश हो लेता. शायद ही कोई ऎसा दिन रहा होगा, जिस दिन पिंटु की ओर से फ़ोन न
आया हो. फ़ोन की घंटी बजते ही वह लपक कर उठाता और देर तक उससे बातें करते रहता.
विचारों की श्रृंखला
टूटने का नाम नहीं ले रही थीं. उसमें गहरे गोते लगाते हुए वह कब नींद की आगोश में
चला गया, पता
ही नहीं चल पाया. शोरगुल सुनकर उसकी नींद खुली. खिड़की से झांककर देखा. ट्रेन वीटी
पर खड़ी थी और उतरने वालों की लंबी लाईन लगी थी. उसने जेब से चाभी निकाली. चेन से
बंधे सूटकेस को खोला और अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ. स्टेशन से बाहर निकलकर उसने
टैक्सी ली और घर की ओर चल पड़ा. ट्रेन की लेट-लतीफ़ी की वजह से उसने बेटे को स्टेशन
न आने की सलाह देते हुए कह दिया था कि वह सीधे घर पहुँच जाएगा.
दरवाजा अन्दर से बंद था.
उसने काल-बेल का स्वीच दबाया और किसी के आने का इन्तजार करने लगा. दरवाजा खोलने वाला
और कोई नहीं बल्कि उसका चहेता पिंटु ही था. उसे सामने पाकर उसने सूटकेस को एक तरफ़
रखते हुए उसे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया. चिंटु से गले लगते हुए उसे अपार
प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था. घर के अन्दर प्रवेश करते ही चिंटु ने अपनी मम्मी को
तेज आवाज लगाते हुए कहा-“ मम्मी..मम्मी....देखो तो सही.....मेरे प्यारे दादाजी आए हैं”.
सोफ़े में धंसते हुए
दादा-पोते बतियाने लगे. बातें करते हुए उसे ध्यान ही नहीं आया कि चिंटु को तोहफ़ा
देना तो वह भूल ही गया है. अपनी भूल को सुधारते हुए उसने एक बड़ा सा पैकेट देते हुए
कहा-“ पिंटु..ये
रहा भाई तुम्हारा तोहफ़ा...इसे खोलकर देखो तो सही कि दादाजी तुम्हारे लिए क्या लाए
है?. पिंटु
ने पैकेट हाथ में लेते हुए कहा..” दादाजी ..आपने जो भी लाया होगा, वह सुन्दर ही होगा...इसे कल सबके
सामने खोलूंगा और अपने दोस्तों को बतलाउंगा”. कहते हुए उसने उसे एक ओर रख दिया
था.
इसी बीच बहू ने आकर उसके
चरण स्पर्ष किए. कुशल-क्षेम पूछा और यह कहकर वापस हो ली कि वह जल्दी ही नाश्ता और
चाय-पानी लेकर आएगी.
चिंटु ने अपने पिता को
दादाजी के आगमन की सूचना फ़ोन पर दे दी थी. “ बेटे..मुझे आने में थोड़ा समय लग
जाएगा. तब तक आप अपने दादाजी के साथ गप्प-सड़ाका लगाओ. हो सके तो उन्हें पार्क घुमा
लाओ. आफ़िस से लौटते समय मैं पूजा प्लस होता हुआ आउंगा. मैनेजर ने पूरी व्यवस्था कर
रखी है या नहीं...देखता आउंगा.”
चाय-नाश्ते के बाद दोनों
पार्क की ओर निकल गए. रास्ता चलते हुए उसने देखा कि कई बच्चे संकरी गली में
क्रिकेट खेलने में निमग्न हैं. यह देखते हुए वह सोच में पड़ गया था उसका पोता भी
इन्हें गलियों में अपने मित्रों के साथ खेलता होगा. महानगरों में इतनी जगह ही कहाँ
बची है कि बच्चे खेल खेल सकें, जबकि उसके अपने छॊटे से शहर में बड़े-बड़े खेल के मैदान है.
लंबे-चौड़े पार्क भी हैं जहाँ वे अपना मनोरंजन कर सकते हैं.
देर रात बीते उसे अपने
बेटे से मिलने का मौका मिला. सभी ने साथ बैठकर खाना खाया. यहाँ-वहाँ की बातों के
बाद अब वे सोने चले गए थे, ताकि अगली सुबह बची-खुची तैयारियाँ की जा सके.
पूजा प्लस जाने से पहले
बेटे ने दो बड़े से पैकेट अपने पिता को देते हुए कहा-“ पापाजी...इसमें आपके लिए कुछ
कपड़े हैं, मेरी इच्छा है कि आप इन्हें पहन लें. बस थोड़ी ही देर में हम सब यहाँ से निकल
चलेंगे”. पैकेट
देकर वह लौटने ही वाला था कि कल्लु ने उसे रोकते हुए कहा..” जरा एक मिनट के लिए रुको तो
सही...मैं इसे तुम्हारे ही सामने खोलना चाहूंगा”.
“जी ..पापाजी..कहते हुए
वह एक कुर्सी में धंस गया था.
कल्लु ने पैकेट खोला.
उसमें एक बंद गले का कोट-पैंट और शर्ट थी. दूसरे पैकेट में चमचमाते जूते थे. कल्लु
को यह सब देखकर आश्चर्य होने लगा था. उसने कहा;- “ बेटे तू तो जानता है कि मेरी
अपनी पहचान लाल कमीज और बिल्ला नम्बर २४३ की रही है. मैंने अपने पूरे जीवन में कभी
भी कोट-पैंट नहीं पहने और न ही इस तरह के जूते. बजाए इसके, तुम मेरे लिए कुर्ता-पाजामा लाए
होते तो अच्छा होता”.
सुनकर वह सोच में पड़ गया
था. बात सच भी थी. वह दुविधा में पड़ गया था. और सोचने लगा था कि बर्थ-डे पार्टी में चिंटु उनका साथ नहीं
छोड़ेगा. अगर वे मामूली कपड़ों में होंगे, तो आने वाले अफ़सर उन्हें हिकारत भरी नजरों से
देखेंगे...अगर ऎसा हुआ तो वह सहन नहीं कर पाएगा और पार्टी का मजा किराकिरा हो
जाएगा. यही सोचकर उसने उनके नाप का सूट और जूते ले आया था. पुराने जमाने के अपने
पिता को वह कैसे और क्या कहकर मनाए, समझ में नहीं आ रहा था. तभी उसके मन में एक आइडिया
आया कि चिंटु का हवाला देते हुए उन्हें मनाया जा सकता है. अगर पिंटु एक बार उनसे
कह दे तो वे इनकार नहीं कर पाएंगे.
“ पापाजी...मैं आपकी
भावनाओं को समझ सकता हूँ लेकिन चिंटु को भला कौन समझाए. जिद कर बैठा कि मेरे दद्दु
के लिए सूट ही खरीदना है. वे मेरी पसंद का सूट अवश्य पहनेंगे. अब आप जाने और आपका
लाड़ला चिटु”. मुझे बीच में मत डालिए”. कहते हुए उसने याचना भरी
नजरों से देखा. होशियार था चिंटु. समझ गया कि अब उसे क्या करना और कहना चाहिए.
“दादाजी....आपको सूट पहनना ही पड़ेगा. मैंने इन्हें आपके लिए ही पसंद किया है. अब उठिए और जल्दी से तैयार हो जाइए”. चिटु की बात सुनकर उसका हृदय भर आया था और नेत्रों से आंसू झरझराकर बह निकाले थे. कहते हैं न कि मूल से सूद ज्यादा प्यारा होता है. बड़े-बूढ़े एक बार भले ही अपनी सगी औलाद की बात सुनी-अनसुनी कर दें, लेकिन अपने पोते की बात को किसी भी कीमत पर टाल सकने की स्थिति में नहीं रहते.
ना-नुकुर करने की स्थिति में
नहीं था कल्लु. उसे हर हाल में अपने पोते की बात माननी ही पड़ेगी.
कपड़े पहन कर वह आईने के
सामने जा खड़ा हुआ. अपने बदले हुए अंदाज देखकर वह खुद पर भरोसा नहीं कर पा रहा था
कि क्या यह वही कल्लु कुली है जिसकी देह पर चौबीसों घंटे लाल शर्ट और कमर में
पाजामा बंधा रहता है. वह कुछ और सोच पाता कि बहू ने कमरे में प्रवेश करते हुए उसे
सोने की चेन देते हुए कहा. .”बाबूजी..इसे जरुर पहन
लेना”. इतना
कहकर वह वापिस हो ली थी.
पूजा प्लस को दुल्हन की
तरह सजाया गया था. बेटा और बहू अपने मित्रों का मुस्कुराते हुए स्वागत करने में
निमग्न थे. वह अपने पोते के साथ बैठा उस घड़ी का इन्तजार कर रहा था, जब उसके माथे पर
तिलक-रोली लगायी जाएगी. फ़िर वह केक काटेगा और इसी के साथ जश्न शुरु हो जाएगा.
झिलमिल रोशनी के बीच
आर्केस्टा वाले फ़िल्मी गीत गा रहे थे.
डांसिग फ़्लोर पर कुछ बच्चे नाच-गा रहे थे. पूरा हाल मेहमानों से खचाखच भरा था. सभी
को उस घड़ी का इन्तजार था, जब चिंटु मंचासीन होकर केक काटेगा. तभी बेटे ने मंच से
मुखातिब होते हुए सभी को उस स्थान पर आने के लिए आमंत्रित किया, जहाँ केक काटने की
व्यवस्था की गई थी.
चिंटु इस वक्त किसी हीरो से कम नहीं लग रहा था. सबकी नजरें उस पर टिकी थी. बहू ने आगे बढ़कर मोमबत्तियां सुलगाई. चिंटु ने केक काटा और जलती हुई मोमबत्तियों को एक फ़ूंक में बुझा दिया. पूरा हाल तालियों की गूंज और हेप्पी बर्थडे टू चिंटू की शोर में नहा गया. जलती मोमबत्तियों को बुझाता देख वह ऎसा करने से मना करने वाला ही था, लेकिन यह सोचते हुए चुप्पी साध गया कि उसे जाहिल-गवांर समझा जाएगा. यदि ऎसा हुआ तो बेटे की किरकिरी हो जाएगी. लोग उसके बारे में पता नहीं कैसी-कैसी धारणाएं बना लेंगे. वह गंभीरता से सोचने लगा था कि हमारी संस्कृति में दीप जलाकर, अन्धकार को दूर करने की परम्परा रही है. क्या सारे हिन्दुस्थानी अपनी पुरातन संस्कृति को..अपनी पावन परम्परा को भूल गए है ?. हमारे यहाँ जलते हुए दीपक को कभी बुझाया नहीं जाता है. ऎसा करना अपशगुन माना जाता है, लेकिन यहाँ क्या, सभी जगह उलटी रीत जो चल निकली है.
केक कटने के साथ ही लोग उसे तोहफ़े देने लगे थे. चिंटु लेता जाता. मुस्कुरा कर उनका अभिवादन करता. थैंक्स कहता और दादाजी को देता जाता. वह भी उन्हें यथास्थान रखता जाता. अब कुछ युवा तुर्क डांसिंग फ़्लोर की ओर बढ़ चले थे. किसी इंग्लिश फ़िल्म का गाना बज रहा था. कुछ युवक-युवतियां एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरक रहे थे. कुछ स्वादिष्ट भोजन का आनन्द ले रहे थे. बड़े-बूढ़े भी भला पीछे कैसे रहते. वे भी अपनी बुढ़ियाओं को लेकर डानिंस फ़्लोर पर पहुंच गए थे और अपने बीते दिनों की सुनहरी यादों को ताजा करते हुए थिरकने लगे थे. शम्मीकपूर की तरह थिरकते हुए एक महानुभाव ने आगे बढ़ते हुए कल्लु से नाचने का आग्रह किया. वह भी इसी फ़िराक में था कि उससे एक बार कोई तो कहे. मन की मुराद पूरी हुई और वह भी डासिंग-फ़्लोर पर जा पहुँचा. आरकेस्ट्रा वालों से कभी वह अपने जमाने की पसंदीदा फ़िल्मी गीतों को गाने-बजाने को कहता, तो कभी गोंडी गानों की धुन बजाने को कहता. तरह-तरह की स्टाईल में वह नाचता और साथ ही अभिनय भी करता जाता था. डसिंग-फ़्लोर से सभी नाचने और थिरकने वालों ने अपने नाच बंद कर दिए थे और एक बड़ा सा घेरा बनाए, उसे नृत्य करता देखने लगे थे. बिना रुके वह घंटॊं नाचता रहा था. उसे नाचता देख कोई युवा-तुर्क सीटी बजा-बज कर उसका उत्साहवर्धन करता और बाकी के लोग तालियां बजा-बजा कर. कभी वह अपने पोते को लेकर नृत्य करता तो कभी हमउम्र के किसी साथी को पकड़कर नाचता. हर आदमी उसकी भाव-भंगिमा को, उसकी थिरकन को लेकर कहता...देखो तो सही....इस उम्र में भी बूढ़ा कैसे-कैसे जलवे दिखा रहा है.
देर रात तक जश्न का
माहौल बना रहा था. जब वे घर वापिस लौटे तो रात के तीन बज रहे थे.
अपने परिवार के साथ रहते
हुए एक सप्ताह कैसे बीत गया, पता ही नहीं चल पाया. उसे अब बोरियत सी होने लगी थी. दिन भर
दौड़-धूप करने वाला आदमी भला एक कमरे में अकेला कितनी देर बैठा रह सकता था?.
चिंटू सुबह स्कूल
चला जाता है और तीन बजे के करीब लौटता है. बेटा भी साढ़े नौ बजे अपनी नौकरी के लिए
निकल जाता है. बहूरानी से बात करने का सवाल ही पैदा नहीं होता. बचा रहता है वह
अकेला अपने कमरे में. न तो उसके लिए कोई काम ही बचता है और न ही वह पढ़ना-लिखना ही
जानता है. टीव्ही भी देखेगा तो कितनी देर तक देख सकता है? खाना खाकर सिवाय पलंग तोड़ने के
वह कर भी क्या सकता है. फ़िर आदमी दिन भर सोता भी कैसे रह सकता है?.
एक दिन. उसने अपने पड़ौसी
से बात करना चाहा. पहले तो उसने उसे गौर से देखा और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गया था.
महानगरों का माहौल ही कुछ ऐसा बन गया है कि एक पड़ौसी अपने दूसरे पड़ौसी को पहचानता
तक नहीं है. ऎसे माहौल में भला वह कितने दिन रह सकता है?. वह यह भी नहीं भूला था कि घर में
खाना पकाने वाली बाई उसकी थाली में प्रचुर मात्रा में खाना परोसकर उसके कमरे में
रख जाती थी. धीरे-धीरे उसकी मात्रा में कमी आने लगी थी. कभी तो उसे भूखा भी रहना
पड़ जाता था. शिकायत करें भी किससे करे...क्या ऎसा किया जाना उसे शोभा देगा?
क्या यह उचित होगा?
यही सोचकर वह
चुप्पी साध जाता. एक दिन की बात हो तो सहा जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक भूखे कैसे रहा
जा सकता है. शिकायत करे भी तो किससे करे? बेटे से कहता है तो निश्चित ही घर में तूफ़ान उठ खड़ा
होगा. अतः चुप रहना ही श्रेयस्कर लगा था उसे.
उसे अब अपनी
मित्र-मण्डली की याद भी आने लगी थी. भले ही वह मेहनत-मजूरी का काम करता था,
लेकिन अपने लोगों
के बीच घिरा तो रहता था. यहाँ न तो कोई बोलने वाला था और न ही बताने वाला. उसने तय
कर लिया था कि अब उसे लौट जाना चाहिए. इसी में उसकी भलाई है.
एक दिन सकुचाते हुए उसने
अपने बेटे से कहा कि अब वह घर लौट जाना चाहता है. बेटे की मंशा थी कि वह अब साथ
में ही रहे. “ऎसी भी क्या जल्दी है पापाजी....मैं चाहता हूं कि अब आप हमारे ही साथ रहें”.
बेटे ने कहा था. “
चाहता तो मैं भी
हूँ कि साथ में रहूँ....लेकिन मेरी मजबूरी तुम समझ नहीं पा रहे हो. दिन भर अकेला
बैठे रहना मेरे बस का नहीं है. अगर इसी तरह मैं बैठा रहा तो पागल हो जाउँगा. अब
मुझे चले जाना चाहिए. वहाँ मेरी अपनी मित्र-मण्डली है. सुख-दुख के हम साथी रहे हैं,
फ़िर बरसों का साथ
भी रहा है. दिन और रात कैसे हँसते-हँसाते कट जाते हैं पता ही नहीं चल पाता”.
चिंटू ने सुना तो रुआंसा
होकर बोला..” दादाजी. अब आप कहीं नहीं जाएंगे...हमारे साथ ही रहेंगे...”
अपने पोते की बात सुनकर उसकी आँखे छलछला आयी थीं. भर्राये स्वर में वह इतना ही बोल पाया था कि अगले साल तुम्हारे जन्म-दिन पर फ़िर चला आउँगा” कहते हुए वह फ़बक कर रो पड़ा था और उसने उसे अपने सीने से चिपका लिया था.
चिंटु अपने स्कूल गया हुआ था और
बेटा नौकरी पर. उसकी गाड़ी दोपहर दो बजे की थी. उसने अपना सामान समेटा और बहू से
बोला-“ अच्छा
बेटी...हम अब चलते हैं”.
“ठीक है, जैसी आपकी
मर्जी....लेकिन जाने से पहले आप सोने की चेन वापिस देते जाइएगा....वहाँ, कहाँ संभालते फ़िरेंगे आप
?. दिन भर
तो आप घर में रहते नहीं हैं...फ़िर किसी ने चुरा ली तो...लाखों का नुकसान हो जाएगा.
हाँ...सूट भी वापिस करते जाइएगा....पूरे दिन तो आप कुलियों वाली लाल शर्ट ही पहने
रहते हैं...सूट भला क्या पहन पाएंगे...पेटी में पड़े-पड़े कीड़े भी लग सकते है”.
वह केवल इतना ही
बोल पायी थी. ज्यादा कुछ न बोलते हुए भी इसने
काफ़ी कुछ बोल दिया था.
बहू की बातें सुनकर सन्न
रह गया था वह. उसे इस बात की तनिक भी उम्मीद नहीं थी कि बहू ऎसा कुछ कहेगी. “
हाँ..हाँ...क्यों
नहीं.. पहले से ही मैंने उन चीजों को अलग रख दिया था ताकि जाते समय लौटा सकूं...सच
कहती हो बहू तुम...मेरे लिए ये भला, हैं भी किस काम के”. कहते हुए उसने जेब से चेन
निकालकर उसकी हथेली पर रखते हुए, सूट का पैकेट टेबल पर रख दिया और अब वह सीढ़ियां उतरने लगा
था.
कल्लु अब धीरे-धीरे अपने
अतीत की खोल से बाहर निकल रहा था. स्टेशन पर वही चिर-परिचित शोरगुल मचा हुआ था.
लोग-बाग अपना सामान इधर से उधर ले जा रहे थे, तो कोई उधर से इधर आ रहा था.
रामदीन ने भजिया तल लिया था और अब पूरियाँ निकाल रहा था. शायद कोई ट्रेन आने वाली
थी. उसका शरीर अब भी उसी रेलिंग से सटकर बैठा हुआ था. इंजिन की चीखती आवाज और
हार्न सुनकर वह अपनी अतीत की गहराइयों से वापिस लौटने लगा था.
अब वह पूरी तरह से बाहर
निकल आया था. चैतन्य होते हुए वह उठ खड़ा हुआ. नल पर जाकर उसने मुँह पर पानी की
छींटें मारे और कांधे पर टंगे गमछे से मुँह पोछा.
अतीत के अपने कड़ुवे
अनुभवों को याद करते हुए उसका मुँह कड़ुवा हो आया था. गला खंगारते हुए उसने आक थू
कहते हुए, थूक एक ओर उछाल दिया और अब वह रामदीन की ठिलिया के पास चला आया था. “ अरे ओ रामदीन
भइया....जरा एक कड़क-मीठी चाय तो बनइयो....बहुत देर हो गई ससुरा, हम चाय नहीं पी पाए”
कड़क मीठी चाय को गले से
नीचे उतारते हुए उसने निर्णय कर लिया था कि वह अपने बेटे से साफ़-साफ़ कह देगा कि वह
उसे अपने साथ ले जाने की जिद छोड़ दे और वापिस लौट जाए. वह किसी भी कीमत पर उसके
साथ नहीं जा पाएगा. वह जैसा भी है, जहाँ भी है सुखी है.
अपराधी
पलायन
सूरज के उगते ही माहौल गरमाने लगता और दोपहर
होते-होते आसमान से आग के गोले बरसने लगते. सड़कें सूनी हो जातीं. लोग-बाग
अपने-अपने घरों में दुबक जाते. पशु किसी पेड़ की छाया में जाकर छिपने की नाकाम
कोशिश करते नजर आते. लू के थपेड़े किसी छुट्टॆ सांड की तरह सिर उठाये गली-चौराहों
पर धमाचौकड़ी मचाते हुए सरपट दौड़ लगाने लगते. कभी किसी के दरवाजे पर अपने नुकिले
सिंग घुसेड़ कर उखाड़ डालने का प्रयास करते. लोग घरों में दुबक जाते और कूलर का
सहारा लेने पर मजबूर हो जाते, लेकिन इस इस बार की पड़ने वाली भीषण गर्मी ने
अच्छे-अच्छे कूलरों की औकात ही बता दी थी. वे सब नाकारा सिद्ध होने लगे थे. जिन
घरों में कूलर नहीं होते, वे बांस का बना पंखा झलते हुए कुछ राहत पाने की कोशिश
करते अथवा अंगोछे को हिला-हिला कर शरीर पर बहते पसीने को सूखाने का असफ़ल प्रयास
करते. बड़े घर के लोग खिड़की-दरवाजों को बंद कर मोटा पर्दा डाल देते और एसी. चलाकर
शीतल हवा का आनन्द लूटते.
अब ऎसी कठिन परिस्थिति में निर्मल करे भी तो क्या
करे? वह जिस होस्टल में रहकर पढ़ाई करने के लिए अपना गाँव छोड़कर, आया है, का बुरा
हाल है. उसके दड़बेनुमा कमरे में दो मित्र और रहते हैं. उसमें कूलर लगा तो है लेकिन
पानी की समस्या के चलते किसी काम का नहीं हैं. वार्डन की भी अपनी विवशता है. वह
पानी की व्यवस्था करे भी भी तो कहाँ से? कैम्पस में लगा हैण्डपंप पानी की जगह हवा
उगलता है. नल में दिन में एक बार पानी आता है, वह भी नाम मात्र को. क्या नहाये और
क्या निचोड़े वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही थी. कमरे में हवा आने के लिए एकमात्र
खिड़की ही बचती है. उसे खुला रखे तो भी गर्म हवा के झोंके अन्दर प्रवेश कर जाते
हैं, और न खोले तो उमस के मारे और भी बुरा हाल होने लगता है. बिजली भी अपनी मर्जी
की मालिक है. आयी तो आयी, नहीं आयी तो नहीं आयी. किसी तरह राम-राम रटते हुए दिन
काटना होता है. इसके सिवाय और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचता उसके पास.
कई बार उसने
हास्टल बदलने का मन भी मनाया लेकिन उसे मन-मसोस कर रह जाना पड़ा था. शहर में कई
नामी-गिरामी हास्टल तो हैं, जिनमें एसी. वगैरह की उत्तम व्यवस्था है, लेकिन उनका
खर्च उठा पाना, उसके बूते की बाहर की बात थी. पिताजी की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत
नहीं थी कि वे उसे एक निश्चित रकम से ज्यादा की पूर्ति कर सके. राम-राम रटते हुए
पहाड़ जैसा दिन तो कट जाता और दिन ढलते ही वह पास वाले बागीचे की शरण में चला जाता
है. उसकी बगल में कुछ पुस्तकें, नोटबुक, पेन-पेंसिलें आदि दबी होतीं. सघन पेड़ों के
ठीक नीचे वाली बेंच उसकी शरण-स्थली बनी हुई थी. बेंच के एक कोने में पुस्तक-कापी
रखने के बाद, बाकी के बचे हुए स्थान पर एक चादर को तह करके बिछा देने के बाद ही वह
उस पर बैठ पाता है. दिन भर धूप में तपती सिमेन्ट की बेंच पर बैठ पाना कोई आसान काम
थोड़े ही है.
किताब खोलने के पहले वह मुनिसिपल कार्पोरेशन को
धन्यवाद देना नहीं भूलता. बेंच के नजदीक ही लैम्प-पोस्ट है जिस पर नियान लाईट
सफ़ेद-झक रोशनी फ़ेंकते हुए बागीचे की शान को बढ़ा रहा होता है. इसकी रोशनी में उसकी
पढ़ाई होती है. बागीचे में आने वाला वह एकमात्र सदस्य नहीं है, बल्कि गर्मी से
त्रस्त शहर की कई नामी-गिरामी हस्तियां भी यहाँ आकर बागीचे की शान में बढ़ौतरी करते
हैं. जाहिर है कि उनके बीच बातचीत का दौर भी चलता हैं. हर किसी के पास अपने-अपने
किस्से हैं, अपने-अपने दुख-दर्द हैं,जिन्हें वे आपस में बांटकर हलका होने का सायास
प्रयास करते हैं. ऎसा भी नहीं है कि आने वाले सभी बौडम किस्म के लोग हैं. उसे पढ़ता
देख, लोग दूरी बनाकर बैठने लगे हैं. वे नहीं चाहते कि उनकी वजह से उसका कैरियर
खराब हो जाए. दिन भर का गर्माया माहौल अब धीरे-धीरे सामान्य होने लगता है और ठंडी
हवा के झोंके चलने लगते हैं, जो जलते बदन को राहत देने के लिए काफ़ी होते हैं. किसी
सिद्ध योगी की तरह वह अपना ध्यान केन्द्रीत करते हुए पढ़ाई में तल्लीन हो जाता है.
देर रात तक पढ़ने के बाद ही वह हास्टल वापिस लौटता है.
कमरा अब भी गर्मा रहा होता है. वह बाथरुम में जा
घुसता है और शावर आन कर देता है. कुनकुने पानी के छींटे शरीर पर पड़ते ही कुछ राहत
मिलती है. देर तक शावर के नीचे खड़े रहने के बाद वह बिस्तर पर पसर जाता है. निद्रा
देवी की उस पर बड़ी कृपा है. बिस्तर पर पसरते ही वह गहरी नींद के आगोश में चला जाता
है.
चौथे पहर उठ बैठता है निर्मल. इस समय उसके
रुम-पार्टनर गहरे खुर्राटे भर रहे होते हैं. नित्य क्रिया-कर्म से फ़ुर्सद पाकर वह
कुछ निश्चित किताबों का बण्डल उठाकर बागीचे में जा पहुँचता है. उसकी वह बेंच उसका
इन्तजार करती सी लगती है. इस समय बागीचे में उसके सिवाय कोई नहीं होता. एक गहरा सन्नाटा
पसरा रहता है चारों तरफ़. जैसे ही दिन निकलने को होता है, हवाखोरों की चहल-पहल बढ़ने
लगती है. कोई तेज चाल में चलता हुआ अपने फ़ेंफ़ड़ों में अधिक से अधिक आक्सीजन भरने का
उपक्रम करता है, तो कोई हाथों को सीने से चिपकाये पंजे के बल दौड़ लगाते हुए बागीचे
का चक्कर लगता है. जिन लोगों को जीवन में कभी ठहाके मारकर हंसने का सौभाग्य
प्राप्त नहीं हुआ, उन्होंने लाफ़िंग-क्लब ज्वाईन कर रखा है और एक निश्चित समय पर वे
यहाँ आकर हंसने-हंसाने का सायास प्रयास करते हैं. शेष दिन में वे कितना हंस पाते
हैं, कोई नहीं जान पाता. वह तो केवल इतना भर जान पाया है कि लाफ़िंग-कल्ब वाले उससे
एक लंबी दूरी बना कर हंसते-हंसाते है. उसे डिस्टर्ब नहीं करते हैं. निर्मल इन सभी
महानुभावों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का मौका हाथ से नहीं जाने देता.
एक सुबह. किताबों का बण्डल उठाए वह बागीचे में जा
पहुँचा. इतनी रात गए उसके अलावा कोई यहाँ आता-जाता नहीं है. बागीचे में चारों ओर
सन्नाटा पसरा पड़ा था. हाँ, कभी-कभार किसी पखेरु के पंख फ़ड़फ़ड़ाने की आवाज सुनाई दे
जाती अथवा झिंगुर की टिर्र-टिर्र. बाकी का माहौल एकदम शांत बना रहता. बेफ़िक्री से
चलता हुआ वह अपने निर्धारित स्थान की ओर बढ़ता है एक अपरिचित-अनजान खूबसूरत युवती
को पास वाली बेंच पर बैठा देखकर ठगा सा रह जाता है. युवती के शारीरिक शौष्ठव को
देखकर उसने सहज ही अनुमान लगा लिया कि उसकी उम्र कोई बीस-बाईस के बीच रही होगी.
इससे पहले उसने उस युवती को यहाँ आते-जाते कभी नहीं देखा था. निश्चित तौर पर तो वह
यह नहीं कह सकता कि युवती इसी इलाके की रहने वाली है या किसी अन्य इलाके की है.
बेफ़िक्री के आलम में डूबी युवती ने बेंच की बेक से सिर टिकाते हुए अपनी आँखे बंद
कर रखी थी, संभव है वह प्राणायाम की मुद्रा में बैठी थी अथवा किसी गहरे सोच में डूबी
हुई थी, यह तो वह नहीं जान पाया. हाँ, केवल इतना जान पाया था कि एक सर्वथा
अनजान-अपरिचित युवती के पास बैठना और वह भी सुनसान जगह में, कितना अनर्थकारी सिद्ध
हो सकता है. यह भी हो सकता है कि वह किसी मुर्गे को फ़ांसने के लिए जाल बिछाये बैठी
हो और मुर्गे के फ़ंसते ही चीख-चिल्लाकर एक नया वितण्डा खड़ा कर देगी. उसके मन में
पता नहीं क्या भरा पड़ा है, यह तो वह नहीं जानता. हाँ, इतना जरुर जानता है कि इस
तरह की असामान्य घटनाएँ शहरों में अक्सर घटते ही रहती हैं.
उहापोह की स्थिति से निकलकर उसने निर्णय लिया कि समय
खराब न करते हुए उसे अपना अभ्यास प्रारंभ कर देना चाहिए. देर-सबेर जब वह अपनी आँखे
खोलेगी तो उसे पास बैठा पाकर, बातें करेगी. अपना परिचय देगी. तभी उसके बारे
में कुछ जाना जा सकता है. फ़िर उसके मन में
कोई खोट-कपट नहीं है, और न ही तृष्णा. फ़िर डरने जैसी कोई बात नहीं है. यह सोचते
हुए वह अपनी निर्धारित बेंच पर बैठ गया और किताब में डूबने का प्रयास करने लगा.
उसका शरीर बेंच से तो चिपका था लेकिन मन साथ नहीं दे
रहा था. उसकी नजरें बार-बार उस युवती के नूरानी चेहरे पर जाकर ठहर जाती और वह उसे
जी भर के निहारने लगता. तभी उसे अपनी भूल का अहसास होता. नजरें पीछे हट जाती. बंद
किताब फ़िर खुल जाती और वह अक्षरों के चक्रव्यूह में उलझने लगता. लेकिन मन था कि
बार-बार उचककर उस युवती के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगता.
बागीचे में उन दो के अलावा तीसरा और कोई नहीं था.
उसने एक बार फ़िर गौर से उसके शरीर पर नजरें केन्द्रीत करते हुए मुआयना करना शुरु
किया. वह अब भी निश्छल मुद्रा में आँखें बंद किए हुए बैठी हुई थी. उसे इस बात पर
आश्चर्य हो रहा था कि स्त्री जात, अपने आस-पास किसी अजनबी की उपस्थिति जानकर/पाकर
अथवा उसकी छाया मात्र को देखते ही भांप जाती हैं कि सामने वाले के मन के कोई खोट
तो नहीं है. ईश्वर ने वरदान स्वरुप स्त्री जात को एक अतिरिक्त छटी इंद्रीय दे रखी
है कि वे पराये पुरुष को देखते ही उसके मन की बातों को सहजता से जान जाती हैं और
सतर्क हो जाती हैं. शायद कुछ अनोखे किस्म की युवती थी वह जो पास में बैठे युवक की
उपस्थिति से बिलकुल ही अनजान बनी हुई थी.
रात की
कालिमा का धुधंलका धीरे-धीरे छंटने लगा था. सहसा उसके मन में विचार कौंधा कि उसे
जगा देना चाहिए. वह अपने स्थान से उठकर खड़ा हुआ ही था कि युवती के पर्स में रखा
मोबाईल घनघना उठा. उसके उठते कदम वहीं रुक गए. मोबाईल की घंटी लगातार बजती रही थी.
उसे पक्का यकीन हो गया था कि फ़ोन की घंटी की आवाज सुनकर वह खुद जाग जाएगी. लेकिन
उसके शरीर में किसी भी प्रकार की कोई हरकत नहीं हुई. यह देखकर वह सोचने पर मजबूर
हो गया था कि कहीं वह नाटक तो नहीं कर रही है? कपट-जाल बिछाकर किसी को फ़ांसने के लिए
षड़यंत्र तो नहीं रचा होगा इसने?. समाचार पत्रों में इस तरह की अनेकानेक घटनाऒं के
बारे में वह पहले भी पढ़ चुका था. दूसरा मन कहता कि देखने-परखने में वह उठाईगिर तो
बिल्कुल भी नहीं लगती. फ़िर उसने जो कपड़े पहन रखे हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा
सकता है कि वह किसी सभ्य घराने से ताल्लुक रखती है
आखिरकार उसने निर्णय कर लिया था कि उसे अब जगा देना
चाहिए. अपनी हथेली को आहिस्था से बढ़ाते हुए उसने उसके कंधे पर रखा और हलके
से झझकोरा. स्पर्ष मात्र से ही उसका शरीर एक तरफ़ लुढ़क कर नीचे गिरने को हुआ. गिरने
से बचाने के लिए सहज रूप से उसका बाय़ां हाथ आगे बढ़ा और दांया हाथ उसकी पीठ पर चला
गया. पीठ पर हाथ पहुंचते ही उसने गीलापन महसूस किया. अपनी हथेली को परे हटाते हुए
उसने देखा कि उसकी हथेली खून से लथपथ हो गई है. अपनी हथेली को खून से सनी पाकर
उसके होश उड़ गए. सोचने –समझने की बुद्धि कुंठित होने लगी. शरीर बुरी तरह से थरथर
कांपने लगा और आँखों के सामने अंधकार ताण्डव करने लगा. उसने किसी तरह अपने को
संभाला और तत्काल उसे उसी स्थिति में बेंच की बेक से टिका दिया.
उसका अस्थिर मन घड़ी के पेन्डुलम की तरह फ़िर दोलायमान
होने लगा था. कभी इधर तो कभी उधर. एक विचार मन में आया कि उसे चुपचाप यहाँ से खिसक
जाना चाहिए. देर-सबेर पुलिस को पता तो चल जाएगा कि बागीचे में किसी महिला का लाश
पड़ी हुई है. वह तफ़्तीश करेगी और अपराधी को ढूँढ निकालेगी. फ़िर मन में एक विचार
कौंधा कि एक पढ़े-लिखे और जागरुक नागरिक का कर्तव्य है कि अपराध की जानकारी रहते
उसे पुलिस को सूचित करना चाहिए. लेकिन पुलिस हमेशा से ही सूचना देने वाले को अपने
शक के घेरे में लपेट लेती है और उसी से उलटे-सीधे जवाब करती है, जबकि अपराधी कोई
और होता है. यदि उसे अपराधी मान लिया गया तो तत्काल ही उसे जेल में डाल दिया जाएगा.
मुकदमा भी चलाया जाएगा, जब तक यह सिद्ध नहीं हो जाता कि अपराध उसने नहीं बल्कि और
किसी ने किया है,तब तक उसे जेल में सड़ना होगा. सच को सच साबित करने में दिन-दो दिन
नहीं, बल्कि सालों भी लग सकते हैं. यदि ऎसा हुआ तो उसका कैरियर ही समाप्त हो
जाएगा. वह कहीं का नहीं रहेगा. उचित होगा कि उसे यहाँ से खिसक ही जाना चाहिए. ऎसा
सोचते हुए उसने अपनी किताबों को समेटा और वहाँ से भाग खड़ा हुआ.
बागीचे के गेट के पास पहुँचते ही उसके पैरों में
जैसे ब्रेक ही लग आए थे. उसने अपनी किताबों के बण्डल की बारीकी से जाँच की. सारी
किताबों को तो वह बटोर सका था लेकिन घबराहट में डायरी वहीं छूट गई थी. एक पेड़ की
आड़ में खड़ा होकर वह सोचने लगा था –“ भले ही मैं वहाँ से भाग निकला, लेकिन मेरी डायरी तो इस बात की गवाही देगी कि मैं वहाँ उपस्थित था.
फ़िर डायरी में मेरा नाम-पता, फ़ोन नम्बर आदि सभी कुछ तो नोट है. संभव है कि डायरी
पर खून से सनी हथेली के निशान न पड़ गए हों?. हाल-फ़िलहाल वह पुलिस के चंगुल से बच
तो जाएगा लेकिन सबूतों के आधार पर उसे जल्दी ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. बाद में
पता नहीं उसकी कैसे गत बनेगी?”. दुर्गति की कल्पना मात्र से वह सिहर उठा था.
घबराहट में फ़िर कोई बड़ी भूल न हो जाए, यह सोचते हुए
उसने किताबों का बण्डल एक पेड़ की कोटर में जतन से रख दिया और सरपट दौड़ते हुए वह
उसी स्थान पर जा पहुँचा. युवती का शरीर उसे उसी स्थिति में मिला, जैसा कि वह छॊड़
आया था. बेंच के ठीक पास डायरी पड़ी हुई थी. बिना देर लगाये उसने डायरी उठाई और भाग
खड़ा हुआ. वह तब तक भागता रहा था, जब तक गेट नहीं आ गया. उसने फ़ौरन पेड़ की कोटर से
किताबें निकाली और बागीचे के बाहर आ गया. उसे इस बात पर पूरी आश्वस्ति हो रही थी
कि किसी ने, न तो उसे अन्दर जाते देखा था और न ही बाहर निकलते देखा था. उसे इस बात
पर भी संतोष हुआ कि संयोग से उस समय चौकीदार भी वहाँ उपस्थित नहीं था.
तेज कदमों से चलते हुए वह अपने हास्टल पहुँचा. उसके
रूम-पार्टनर अब तक सोए पड़े थे. यह एक अच्छा संयोग था उसके लिए. बाथरूम में घुसते
हुए उसने डायरी पर खून के पड़े निशानों को करीने से साफ़ किया. कपड़े पहिने ही पहिने
उसने शावर आन कर दिया था ताकि खून के निशान यदि कहीं पड़ भी गए हों तो वे भी धुल
जाएंगे. देर तक शावर के नीच खड़े रहने के बाद वह कुछ नार्मल हो पाया था, बावजूद
इसके, दिमाक अब भी बिजली के मीटर के तरह तेजी से घूम रहा था.
बाथरूम से निकलकर वह किसी कटे हुए लठ्ठे की तरह आकर
बिस्तर गिर पड़ा था. मन था कि स्थिर ही नहीं हो पा रहा था. पल भर को एक विचार
कौंधता तो दूसरा तत्काल उपस्थित हो जाता. वह गम्भीरता से सोचने लगा था कि एक मृत
शरीर चलकर बागीचे तक तो आ नहीं सकता?. फ़िर उसका डील-डौल देखकर सहज ही अनुमान लगाया
जा सकता है कि उसका वजन चालीस-पैतालिस किलो से किसी भी प्रकार कम नहीं होगा. फ़िर
एक मृत शरीर को उठाकर लाना एक आदमी के बस की बात नहीं है. निश्चित ही इस काम को
चार-पांच लोगों ने मिलकर अंजाम दिया होगा. दूसरा सवाल यह उठता है कि आखिर उस युवती
की हत्या क्यों की गई?. इसका सीधा सा उत्तर है कि युवती किसी काम से घर से निकली
होगी और मनचलों ने उसे अगवा कर लिया होगा और सूनी जगह पाकर उसके साथ बारी-बारी से
बलात्कार किया होगा. चुंगल से छूट कर युवती पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत न कर दे, इस
डर के चलते उन्होंने उसका मुँह बंद कर देना ही उचित समझा होगा और उसका मर्डर कर
दिया. फ़िर शव को बागीचे में लाकर पटक
दिया.
बागीचे में आने वाले लोग अक्सर शाम के समय आते हैं,
कुछ देर रुकते है और रात के गहराने के साथ ही अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं.
नौ-दस बजते ही बागीचा सुनसान हो जाता है और चौकीदार गेट पर ताला जड़कर आराम से सो
जाता है. इसी का फ़ायदा उठाते हुए दरिन्दों ने बागीचे की नीची दीवर को फ़ांदा होगा
और उसके शरीर को बेंच के हवाले करते हुए भाग खड़े हुए होंगे.
मन के आंगन में उठ खड़ा हुआ तूफ़ान अभी तक शांत नहीं
हो पाया था. एक विचार आता, उसे अशांत कर जाता. फ़िर दूसरा उठ खड़ा होता. विचारों के
श्रृंखला थमने का नाम नहीं ले रही थी. उसने गहरी सांसे लीं. भटकते हुए मन को किसी
तरह शांत किया और अब वह गंभीरता से सोचने लगा था- “पता नहीं, इस देश में आखिर इस तरह की घटिया मानसिकता अमरबेल की
तरह क्यों फ़ल-फ़ूल रही है? युवती तो युवती, प्रौढ़ स्त्रियों सहित नाबालिक बच्चियों
के साथ भी रेप किया जा रहा है और बाद में उनकी निर्मम हत्या कर दी जाती है. यदि
युवती इन मनचलों का विरोध करती है तो उन पर एसिड फ़ेंककर उनका चेहरा विकृत कर दिया
जाता हैं. कभी दहेज के नाम पर उनका शोषण होता है तो गर्भ में ही उन्हें मार डाला
जाता है. महिलाओं को अपने सगे-संबंधियो पर पूरा भरोसा रहता है और वे उनके संरक्षण
में अपने आपको सर्वथा सुरक्षित महसूस करती हैं. उन्हें पूरा विश्वास रहता है कि वह
उसके साथ कोई गलत हरकत नहीं करेगा और इसी भरोसे की आड़ में वे शिकार हो जाती हैं. “भरोसा” शब्द भी अब विकृत मानसिकता की श्रेणी में गिना जाने लगा है. उसका अपना तर्क
है कि इन्टरनेट और एनड्राईड फ़ोनों के फ़ैलते मकड़जाल भी सेक्स परोसने में अहम भूमिका
निभा रहे
हैं. बस एक क्लिक करने भर की जरुरत है कि सारे अश्लील दृष्य़ देखे जा सकते है. इस
सहज और सुलभ माध्यम का फ़ायदा उठाकर ये शैतान किसी युवती को फ़ंसाने के लिए व्हीडियो
बनाकर अपलोड करते है, और एक चेहरे पर उस युवती का चेहरा चस्पा करके उसे सार्वजिक
कर देने की धमकी देकर उनका शोषण करते है. समाज में बदनामी न हो इस भय के चलते वे
इस दलदल में उतरने के लिए राजी हो जाती हैं.
पता नहीं क्या हो गया है इस देश के लोगों को, इनकी
सोच को, जो समाज में विकृति फ़ैलाने में आमादा हो गए है? वह जानता है कि भारत ही
विश्व का एक मात्र ऎसा देश है जो अनादि काल से नारियों का सम्मान करता आया है. कभी
काली के रुप में तो कभी दुर्गा के रूप में नारियों को पूजा गया है.... उन्हें
सम्मान दिया गया है.
नारियों को सम्मान देने, उन्हें देवी का दर्जा देकर
पूजने वाले इस देश की सोच अचानक कैसे बदल गई?. यह एक विचारनीय प्रश्न है और इस पर
हम सभी को गम्भीरता से सोचने-विचारने की जरुरत है. केन्द्र की सरकार हो या फ़िर
राज्य की, सभी इस बिमारी की रोकथाम के लिए कड़े से कड़े रूख अपना रही है. उन्हें
फ़ांसी पर चढ़ाया जा रहा है, जेलों की सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, बावजूद इसके,
रेपिस्ट बेखौफ़ होकर इस कुकृत्य को अंजाम दे रहे हैं.
उसने कभी इसे व्यथा-कथा को लेकर चंद लाईनें लिखी
थीं, याद हो आयीं-“ सड़कों पर परिरंभन हो और चौराहों पर हो चीर हरण, शैशव के तेरे ये दिन है तो
भरी जवानी में क्या होगा?. यह सच है कि देश
अभी-अभी अपना शैशवकाल छॊड़ कर जवानी में कदम रखने जा रहा है. अभी पूरा जवान भी
नहीं हुआ है. यदि शैशल काल में ही ऎसे बुरे खौफ़नाक मंजर देखने पड़ रहे हैं, तो उस
समय क्या होगा जब वह पूरा जवान हो उठेगा?”.
दिल और दीमाक में उठा चक्रवात अब धीरे-धीरे शांत
होने लगा था. सोचने-समझने की बुद्धि वापिस लौट आयी थी. अब वह अपने आपको एकदम
तरोताजा सा महसूस करने लगा था. बिस्तर से उठकर वह कमरे की उस खिड़की पर जा खड़ा हुआ
जो पूरब की तरफ़ खुलती थी. उसने उगले हुए सूरज को प्रणाम किया और मन ही मन निर्णय
लिया कि वह किसी अज्ञात डर के चलते पलायन नहीं करेगा और पुलिस स्टेशन जाकर इस घटना
की जानकारी देगा और रिपोर्ट दर्ज कराएगा. निर्णय लेने के साथ ही वह अपने कमरे के
बाहर निकला. उसके साथी अब भी खुर्राटे भरते हुए गहरी नींद के आगोश में सो रहे थे.
अब उसके कदम तेजी से पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ चले थे.
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अपराधी
अपराधी.
गर्भवास का पिंड छुड़ाकर अभी-अभी तो वह बाहर आया है और आते
से ही बेहोश हो गया था. उसे नहीं मालुम कि वह कितने घंटे बेहोश पड़ा रहा. इस समय वह
खुद एक चादर में लिपटा हुआ था. आंख खुलते ही उसने अपनी नजरें चारों तरफ़ घुमाते हुए
कमरे का निरीक्षण किया. कमरे में उसके सिवाय और कोई नहीं था. वह समझ नहीं पा रहा
था कि इस कमरे में कैसे आया या लाया गया. उसने गौर से देखा, चादर पर चाय के दाग
जैसा मटमैला रंग, लिपस्टिक के सुर्ख लाल रंग और खून के धब्बे साफ़-साफ़ दिखलाई दे
रहे थे जो किसी अनहोनी के होने की गवाही दे रहे थे. उसने यह भी महसूस किया कि उसका
शरीर किसी चिपचिपी झिल्ली में लिपटा हुआ है. तभी एक तेज दुर्गंध का झोंका उसके
नथुनों से आ टकराया. थोड़ी देर तक तो वह इस बदबू को किसी तरह सहता रहा, लेकिन अब
उसकी सहनशक्ति बर्दाश्त से बाहर होने लगी
थी. इस दमघोंटू बदबू के चलते उसका दिमाक भिनभिनाने लगा था. उसने हाथ-पैर चलाते हुए
अपने आपको चादर से मुक्त करना चाहा. मुक्त होते ही उसने चादर के एक सूखे छोर से
अपने शरीर को मलते हुए लिसलिसी झिल्ली को साफ़ किया और उठ खड़ा हुआ.
०००
कमरें में टंगे आईने में उसे अपना अक्श दिखाई दिया. वह एकदम
नंग-धड़ंग पड़ा था. अपने को नंगा देखकर उसे थोड़ी से शर्म तो आयी, लेकिन वह कर भी
क्या सकता था. पलंग पर
से उछलकर वह नीचे फ़र्श पर आ गया. सूने पड़े कमरे का उसने शुक्ष्मता से निरीक्षण
किया. कोने में टेबुल पर कुछ किताबें पड़ी थीं स्थानीय कालेज के फ़ायनल ईअर की थीं,
जिस पर उस युवती के हस्थाक्षर थे, जिसके साथ
कुछ देर पहले उसने इसी कमरे में प्रवेश किया था. इतना याद आते ही उसके
दिमाक की स्क्रीन पर उस युवती का चेहरा उभरने लगा. वह सोचने लगा था कि क्या,यही वह खूबसूरत युवती है जिसने उसे पिछले
नौ माह तक अपने गर्भ में रखा और उसके बाहर आते ही उसे अपने शरीर का हिस्सा मानने
से इनकार कर उसे अपने हाल पर छॊड़कर चलती बनी. खूबसूरत जिस्म में बदसूरत विचार कैसे
पनप पाया होगा यह उसकी सोच से बहुत दूर की बात थी. एक - दो दिन नहीं पूरे नौ माह
तक वह उस युवती के जिस्म का हिस्सा रहा है, उसी की सांस से सांस लेता रहा है और
उसी के आहार से आहार लेता रहा है. वो जो सपने देखती रही है, उन्हीं सपनों को
देख-देखकर वह क्रमशः बड़ा होता चला गया था. अतः उसकी सारी सोच और गतिविधियों का वह
चशमदीद गवाह रहा है. उसे अपना अतीत याद आने लगा था. कालेज के अपने कक्ष में बैठी
वह प्रोफ़ेसर का लेक्चर ध्यान से सुन रही थी, तभी उसके पेट में कुछ हलचल हुई. अपनी
धीमी आवाज में वह उससे कुछ कहना चाह रहा था, कि अब वह ज्यादा समय तक उसके गर्भ में
ठहर नहीं पाउंगा. लेकिन वह लेक्चर सुनने में इतनी मगन थी कि उसे मेरी आवाज तक सुनाई
नहीं दी. यह तो प्रकृति का नियम है, जिसे चाह कर भी कोई उसकी अवहेलना नहीं कर
सक्ता. उसे फ़िर एक मर्मान्तक पीड़ा होना शुरु हुई. अब वह एक पल भी सीट पर बैठ नहीं
सकती थी. बिना शोर किए वह अपनी सीट से उठ खड़ी हुई. किताबों को बगल में दबाया और
बाहर निकल आयी. समय कम था, कभी भी कुछ भी हो सकता था. कालेज परिसर से बाहर निकलकर
उसने एक रिक्शे वाले को हास्पिटल चलने को कहा और बैठने से पहले ही उसने रिक्शे
वाले के हाथ में एक सौ रुपये का नोट थमा दिया. वह दबी आवाज में केवल इतना ही बोल
पायी थी कि जितनी जल्दी हो सके मुझे हास्पिटल पहुंचा दे.
दोपहर के लगभग दो बज रहे थे, हास्पिटल के परिसर में सन्नाटा
पसरा पड़ा था. इक्का-दुक्का कोई आता-जाता दिखाई दे जाता था. काउन्टर पर कोई
कर्मचारी नहीं था. डाक्टरों के कक्ष भी खाली पड़े थे. हो सकता है कि लंच टाईम में
सभी खाना खाने के लिए जा चुके थे. गैलेरी से गुजरते हुए उसने एक खाली कमरे को
देखा. उसने उस कमरे में प्रवेश किया, दरवाजे की कुंडी चढ़ा दी, अपनी साड़ी और
पेटीकोट को उतारकर कोने में पड़े एक टेबुल पर उछाल दिया और पलंग पर आकर पसर गई.
कुछ देर बाद उसके पेट का दर्द नीचे
जांघों की ओर खिसकने लगा था और फ़िर उसे लगा कि दर्द का एक दहकता हुआ गोला, जो उसके
अन्दर घूमते हुए उसकी रगों और मांस को झुलसा रहा था, एकाएक बाहर आ गया है. तब उसने
उस व्यक्ति की तरह महसूस किया था जो टनो वजनी दरख्त के नीचे दबा पड़ा हो और अचानक
उसे एक झटके में दूर फ़ेंक कर उठ खड़ा हुआ हो. कुछ देर तक तो वह पलंग पर खामोशी के
साथ पड़ी रही. गहरी सांस लेते हुए अपने को राहत पहुंचाने लगी थी. अपने आपको अब
सामान्य स्थिति में पाकर वह झटके के साथ पलंग से उठ खड़ी हुई. शीघ्रता से उसने पलंग
पर बिछी चादर से अपने अंगों को साफ़ किया. शरीर पर जहां-तहां खून के छींटे लगे थे,
उन्हें साफ़ किया. नवजात को उसी चादर में
अच्छी तरह से लपेट दिया. वाशरुम मे जाकर उसने मुंह-हाथ धोए और दीवार पर टंगे आईने
में अपने निस्तेज हुए चेहरे को निहारा, बालों में कंघी फ़ेरी, बाहर निकली और झट से
दरवाजा बंद कर अपनी सैंडिले खटखटाते हुए अस्पताल से बाहर निकल आयी. यह सब कुछ इतनी
जल्दी में हुआ कि वह अपने नवजात शिशु का चेहरा भी ढंग से नहीं देख पायी.
हास्पिटल के परिसर से बाहर निकलकर
उसने एक रिक्शा तय किया और अपने घर की ओर चल पड़ी. रिक्शे में बैठते ही उए लगा कि
वह बड़े बोझ से छुटकारा पा चुकी, जिसे वह नौ महिने से उठाए हुए थी. उसे उम्मीद नहीं
थी कि इतने सस्ते में निपट जाएगी. उसने
ऊपर वाले को शुक्रिया अदा की और मन ही मन उसे लाख-लाख धन्यवाद देते हुए बुदबुदाई
कि अच्छा ही हुआ कि उसे किसी ने आते-जाते नहीं देखा और न ही देख पाया कि उस सूने
कमरे में वह क्या कुछ कर आयी है. अगर कोई देख लेता तो बवाल मच जाता. पुलिस बुलाई
जाती. और उसे अरेस्ट कर लिया जाता. तरह-तरह के प्रश्न पूछे जाते और पूछे जाते
मां-बाप के नाम और यह भी तो पूछा जाता कि किसके साथ उसके अवैद्य संबंध रहे हैं.
अखबार वाले कब पीछे रहते? वे भी इस खबर को बढ़ा-चढ़ा कर प्रकाशित करते. चन्द घंटों
मे यह मनहूस खबर लोगों के जुबान पर चढ़ जाती. पास-पड़ौस के लोग नाम-मुंह सिकोड़ने
लगते. कानाफ़ूसी शुरु हो जाती. लोग भले ही सामने आकर इस बात को नहीं कह पाते,लेकिन
आपस में कहा-सुनी शुरु हो जाती. कभी मां को दोषी ठहराते कि क्या बुढ़िया अंधी हो गई
थी जो अपनी बेटी की काली करतूत नहीं देख पायी. पिता को कहा जाता कि बुढऊ करता क्या
है दिन भर, कि वह अपनी बेटी पर नजर नहीं रख सका. जितने मुंह उतनी बातें बनाई
जातीं. उसकी स्वंय की क्या दुर्गत होगी ? उसकी कल्पना मात्र से रुह कांपने लगी थी.
वह कहीं की नहीं रहती. घर से बाहर निकला दूभर हो जाता. सहनशक्ति जवाब दे जाती.
हृदयविदारक बातों को वह भला कब तक सुन पाती और एक दिन किसी नदी में डूबकर
आत्महत्या कर लेती अथवा रेल की पांत पर जाकर अपनी ईहलीला समाप्त कर लेती. बात केवल
यहीं तक आकर नहीं रुकती. अखबार वाले इस खबर को नमक-मीर्च लगाकर मुखपृष्ठ पर
प्रकाशित करते. मोटे-मोटे अक्षरों में खबरें प्रकाशित होतीं कि कोई निर्मम मां
अपने सध्यप्रसूत संतान को छोड़कर भाग गई. पुलिस केस तो बनेगा ही. इसकी घटना की
खोज-खबर भी होगी, लेकिन उसका अपना कोई नाम इसमें नहीं जुड़ पाएगा. यह सोचते हुए उसने
गहरी सांस ली और एक बार फ़िर ऊपर वाले को शुक्रिया कहा.
०००
गर्भ में नौ माह तक बने रह कर उसने
उसका घर-बार देखा है, बाप का घर भी देखा है, लेकिन बदली हुई परिस्थिति में अब वह
यह दावा नहीं कर सकता कि इस बेतरतीब बसे शहर में वह उन जगहों तक पहुंच ही जाएगा. फ़िर
उसने निश्चय किया कि वह अब कहीं नहीं जाएगा. न ही जन्म देने वाली उस मां के बारे
में जानकारी ही उठाएगा, जो समाज के डर से उसे यतीम कर भाग निकली. अगर वह सचमुच में
उसे अपना समझती होती तो इस तरह उसे अनाथ न कर जाती. इस तरह छॊड़कर जाने के पहले
उसने तनिक भी नहीं सोचा कि मैं अब किसके सहारे जीवित रहूंगा. बिना मां के कोई
बच्चा जीवित रहने की भला कैसे सोच सकता है? हो सकता है कि मैं मर ही जाऊं.
नहीं...नहीं...मैं अब न तो उस नवयुवती के घर जाऊंगा और न ही उसे मां कहकर
पुकारुंगा, क्योंकि एक मां होने का दर्जा उसने स्वयं छोड़ दिया है.
खून के रिश्ते का ध्यान आते ही उसकी
आंख के सामने उस युवक का चेहरा डोलने लगा जिसके साथ वह नवयुवती अकसर आती–जाती रही
है, जो उसके साथ कालेज में पढ़ता है. वह उस युवक के घर की स्थिति जानता है, जहां वह रहता है.
वह इसी शहर के सिविल लाइन में एक कमरा किराये पर लेकर रह रहा है. उसके गर्भ में
आते ही वह युवती उस युवक के कमरे में घबराई हुई सी पहुंची थी. कमरा अन्दर से बंद
था. हल्की सी थाप से कमरा खुला. अपनी दिलरुबा को सामने पाकर वह खिल सा गया था. “ आओ..अन्दर आ
जाओ...काफ़ी दिन बाद आ रही हो? सब ठीक-ठाक तो है न !.मैं अभी फ़ोन लगाने ही वाला था”. उसने धीरे से
उसका हाथ पकड़कर बिस्तर पर बैठा लिया और गले में हाथ डालते हुए उसने एक भरपूर चुंबन
लिया और आंखे नचाते हुए कहने लगा... तुम्हारी यादें हमें चैन से सोने नहीं
देतीं..रात-रात भर जागकर केवल और केवल तुम्हारे ही बारे में सोचते रहता हूं. फ़िर
कान में फ़ुसफ़ुसाते हुए कहने लगा....बहुत दिन हो गए...कुछ हुआ नहीं” कहते हुए उसने उसे अपनी बाहों के घेरे में कस
लिया था.
वह किसी हिमशिला सी जड़वत बैठी थी और
उसकी आंखों से आंसू झरने लगे थे. आंखों में आसूं देखकर वह युवक दहल सा गया था. एक
अज्ञात भय ने उसे अपनी लपेट में ले लिया था. लगभग भरभराई आवाज में उसने धीरे से
पूछा-“ क्या बात है? आखिर तुम रो क्यों रही हो? कुछ तो बोलो..मेरा
दिल जोरों से घबराने लगा है. बोलो...बोलो..आखिर क्या बात है, तुम्हें इस तरह निराश
और हताश देखकर मेरा दिल बैठा जा रहा है. बोलो डार्लिंग कुछ तो बोले ?
“ पन्द्रह दिन से ऊपर हो गए हैं ?” “ मैं समझा नही” “ हर माह की दस
तारीख को बैठती हूं..आज तीस हो गई. मुझे तो डर लगा रहा है कि कहीं मैं..... ?”
युवक ने युवती के चेहरे को गौर से
देखा. चेहरा देखकर उसने अन्दाजा लगाया. लगा कि वह सही बोल रही है“ तो इसमे
घबराने वाली कौन सी बात है?.
युवती को लगा कि शायद वह इस बात को
गंभीरता से नहीं ले रहा है.
“ यह मजाक का वक्त नहीं है. सचमुच में
मुझे डर लग रहा है. कुछ गड़बड़ी तो निश्चित रुप से हुई है. मैंने तुम्हें मना भी
किया था कि जल्दबाजी अच्छी नहीं, लेकिन तुम माने नहीं.”
“ ओफ़ ओ...तुम भी न..!..इतनी छोटी सी
बात में घबरा गईं. मैं हूं न !. फ़िर डाक्टरी पढ़ रहा हूं. कल ही मैं तुम्हारे लिए
टेबलेट्स लेता आउंगा. देखना...सब ठीक हो जाएगा.” चलो...अब थोड़ा
सा मुस्कुरा भी दो .”कहते हुए उसने उसके बहते हुए आंसूओं को अपनी हथेली
से पोंछ डाला.
] उसके चेहरे पर
एक हल्की सी हंसी की किरण फ़ूटी और तत्काल बुझ भी गई.
“लो तुम फ़िर सीरियस हो गईं. अरे
भई...माडर्न युग की बाला हो, माडर्न जैसी रहो. यही तो खाने और खेलने के दिन है. एक
बार चक्की-चूल्हे से लग गए तो फ़िर किसे सिर उठाने की फ़ुर्सद
मिलेगी?. उसके शरीर पर दबाव बनाते हुए उसने उसे बिस्तर पर लिटाना चाहा लेकिन वह
बुत बनी बैठी रही.
“ हम क्या,
सभी जानते हैं, औरत और मर्द के मिलन से क्या होता है? क्या तुम इतना भी नहीं
जानतीं? फ़िर इसमें डरने और घबराने वाली जैसी बात नहीं है. कल ही तुम टैबलेट ले
लेना. सब ठीक हो जाएगा.
’मीठी-मीठी बातें करके फ़ंसाना तो तुम
अच्छी तरह जानते हो. मुझ पर अभी क्या बीत रही है, इसकी कुछ परवाह है तुम्हें ?
टेबलेट-वेबलेट से कुछ नहीं हुआ तो मुफ़्त में मैं मारी जाउंगी”
“ऎसा भी कहीं होता है कि दवा अपना असर
नहीं बतलाएगी. अगर टेब्लेट से काम नहीं बना तो फ़िर एक इंजेक्शन काफ़ी
है इस बला को टालने के लिए. तुम बिल्कुल भी फ़िक्र मत करो. मेरा कहा मानो और
निश्चिंत हो जाओ. कल की चिंता से मुक्त होकर उन्मुक्त जीवन जिओ. कुछ नहीं होगा,
मैं कह रहा हूं न !. अब तैयार भी हो जाओ.”
बातों ने अपना असर दिखलाना शुरु कर दिया था.
दोनो के जिस्मों में एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था. तेज गति से चलने वाले तूफ़ान ने मन के
संयम को तिनके की तरह उड़ा दिया था. ०००
परीक्षाएं दस दिन बाद शुरु होने वाली
थी. युवती अपनी सहेली के यहां पढ़ने जाने के बहाने से घर से निकली और सीधे उस युवक
के घर जा पहुंची. कांपते हाथों से उसने कालबेल पर अंगुली रखी. एक घनघनाहट के साथ
घंटी बज उठी. युवक ने दरवाजा खोला. दौड़कर वह उसके सीने से चिपक गई और फ़बक कर रोने
लगी. युवक इस अप्रत्याशित घटना से अनजान था. घबरा उठा. फ़िर उसके बालों में उंगलिया
फ़ेरते हुए, उसे सांत्वना देने लगा -“रोओ मत.....थोड़ा धीरज से काम लो...मैं हूं न तुम्हारे
साथ...” .युवक ने हमदर्दी भरे शब्दों में कहा.
“धीरज....धीरज...कैसा धीरज...तुम तो
निश्चिंत होकर बैठे हो और यहां जान पर बन आयी है”
युवक खामोश खड़ा रहा. उसका रोना अब
सिसकियों में बदल गया था.
“तुम तो
कहते थे सब ठीक हो जाएगा...क्या ठीक हुआ...तुम्हारी गोलियां और इंजेक्शन भी कुछ
नहीं कर पाए.... अब तो छः महिने हो गए. पेट भी काफ़ी निकल आया है. ढीली ड्रेस भी कब
तक लोगों की पारखी नजरों से कैसे बचा पाएगी... मां की नजरें मेरा पीछा करती रहती
हैं लगातार. शायद उन्हें इस बात की आशंका भी हो गई हो. उन्होंने अभी कुछ कहा तो
नहीं है, लेकिन उनका घूर-घूर कर देखना, इस बात का प्रमाण है कि हमारी चोरी पकड़ी गई
है. आज नहीं ओ कल बात निकलेगी ही...क्या जवाब दे पाउंगी मैं...” . सिसकते हुए
उसने कहा.
“ इस शहर में प्रायः हमारे सभी परिचित
हैं..बात खुल जाएगी. ऎसा करो...किसी बहाने तुम दो दिन के लिए बाहर जाने के लिए
मां की परमिशन ले लो. किसी बड़े शहर में चलकर रफ़ा-दफ़ा करके चले आएंगे..किसी को
कानों काम खबर नहीं होगी” उस युवक ने कहा.
“ अब कुछ नहीं हो पाएगा....कुछ भी
नहीं. मेरी सलाह मानों तो हम किसी मंदिर में अथवा चर्च में चलकर शादी कर लेते
हैं.....एक बार शादी का ठप्पा लग जाएगा, फ़िर कोई क्या बोल पाएगा...तुम भी फ़्री और
मैं भी”...भर्राए हुए शब्दों ने उसने प्रस्ताव रखा.
“ शादी...यू मीन मैरिज...कैसे संभव है
डार्लिंग... हम तो खैर कर लेगें....लेकिन मेरे डैडी और मम्मी इसके लिए कभी भी
सहमत नहीं होगें. फ़िर मैं अपना धर्म नहीं बदल सकता.. तुम्हारे माता-पिता भी तो
किसी और धर्म के लड़के से शादी की स्वीकृति नहीं देगें. बड़ी उलझन में डाल दिया
तुमने....” युवक ने कहा.
“बड़े बुजदिल और कायर इन्सान हो तुम....
ऎसा कैसे कह सकते हो तुम.....मुझे अपने जाल में फ़ंसाने के पहले तुम्हें अपना
दीन-धर्म याद नहीं आया और अब ऎसी बात कह रहे हो?
“थोड़ा धैर्य तो रखो
डार्लिंग...मुझे सोचने के लिए दो-चार दिन की मोहलत तो दो” रिरियाते हुए
उस युवक ने कहा.“
अब सोचने विचारने की कौनसी बात रह गई
...जो भी करना है, जल्दी करो...शादी के अलावा अब कोई विकल्प बचा भी नहीं है हमारे
पास. यदि तुम इनकार करते हो तो केवल और केवल एक ही रास्ता मेरे लिए बचता है कि मैं
आत्महत्या कर लूं. क्या तुम ऎसा होते देख पाओगे?..कहते हुए वह फ़बक कर रो पड़ी
०००
कमरा अन्दर से बंद था, लेकिन बाहर की
आवाज छनकर अन्दर आ रही थी जिसके आधार पर वह अन्दर बैठा बाहर की गतिविधियों का आकलन
तो कर सकता था. पर अब तक वह किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया था. बित्ते भर के उस
भ्रून के दिमाक में उथल-पुथल मची हुई थी कि अब उसे क्या करना चाहिए ?. यदि वह वहीं
पड़ा रहता है तो निश्चित ही हास्पिटक की नर्स की नजर में पड़ जाएगा. फ़िर वह उसकी मां
की तलाश में जमीन-आसमान एक कर देगी. कमरे की बात पूरे परिसर में फ़ैल जाएगी. पुलिस
आ धमकेगी. केस दर्ज किया जाएगा . फ़िर उस युवती का अता-पता की तलाश की जाएगी. अगर
वह पकड़ी गई तो उसके घर वालों का जीना दूभर हो जाएगा. और न पकड़ी गई तो उसे लावारिश
समझ कर किसी बच्चा पालु संस्था के सुपर्द कर दिया जाएगा, जहां उसे जीवन तो मिल
जाएगा,लेकिन वह अंत तक बिन मां-बाप का बच्चा अर्थात लबरा ही कहलाएगा. यदि इसी तरह
वह कमरे में पड़ा रहा और दुर्भाग्य से कोई उस कमरे में नहीं आया तो हो सकता है कि
बिना आहार के उसकी जान ही चली जाएगी.
तभी उसके दिमाक में एक विचार आया कि
क्यों न वह अपने पिता के घर चला जाना चाहिए. तभी किसी नारी कण्ठ की आवाज सुनकर वह
चौकन्ना हो गया. नर्स शायद इसी ओर आ रही थी, उसने अनुमान लगाया. आवाज सुनते ही वह
बेंच पर से उचककर दरवाजे की ओट में जाकर खड़ा हो गया.
चूं...चा..चर्र.चर्क की आवाज के साथ
दरवाजा खुला. सबकी नजरों से बचता हुआ वह फ़ुर्ती से बाहर निकल आया.
अंधेरी रात होने के कारण उसने अपने को
सुरक्षित महसूस किया. सड़क पर चलते हुए वह उस रास्ते पर आहिस्था से अपने कदमों को
रखता हुआ उस दिशा की ओर बढ़ने लगा था, जहां उसके पिता का घर था. अंधेरा होने के
बावजूद उसने घर पहचान लिया था. दरवाजा अन्दर से बंद था. भीतर युवक और युवती आपस
में बातें कर रहे थे. दरवाजा बंद होने के बावजूद अन्दर की आवाज उचककर बाहर तक आ
रही थी. वह दरवाजे से सटकर खड़ा हो बातें सुनने लगा.
“
तुमको न तो किसी ने अन्दर जाते देखा और न ही बाहर.निकलते देखा.
सबकी नजरों से बचते हुए तुमने बड़ी होशियारी से वह सब कर दिखाया,जिसकी मुझे उम्मीद
भी नहीं थी. गुड...वेरी गुड ”
“ सबकी
नजरों को हम धोका तो दे सकते हैं लेकिन ऊपर वाले के नजरों से कैसे बच सकते हैं?
हमने छिपकर जो पाप किया उसे कोई नहीं जान पाया,लेकिन उसकी नजरों में हम चोर ही हुए
न !.”
“ ये पाप..पुण्य की बात मत करो...इसके
चक्कर में हम रहते तो जानती हो कितना क्या कुछ झेलना पड़ता इसका अन्दाजा है
तुम्हें. चलो, अच्छा ही हुआ कि सस्ते में निपटे.”
“ सो तो है...लेकिन बच्चा बहुत
प्यारा था. गोल मटोल, गोरा-गोरा, बड़ी-बड़ी प्यारी-प्यारी सी
आंखे, लरजते होंठ, वजन भी उसका कम से कम दस-बारह पौण्ड से
कम न रहा होगा. इतने प्यारे बच्चे से जुदा होने को मन ही नहीं कर कर रहा था. फ़िर
जल्दबाजी में मैं उसे दूध पिलाना भी भूल गई. ऎसा न हो कि बेचारा भूख के मारे दम ही
तोड़ दे”.
“छोड़ो भी अब इन सब बातों को...”
” तुम
पुरुष हो न ! नहीं समझोगे इन बातों को और न ही जान पाओगे कि ममता क्या होती है.
मैं समझ सकती हूं क्योंकि मैंने उसे जनमा है...उसे अपनी कोख में पाला है. बस ईश्वर
से एक ही प्रार्थना करती हूं कि बेचारा बच जाए. नहीं जानती वह किस यतीमखाने में
परवरिश पाएगा ?. क्या तुम कुछ नहीं कर सकते उसके लिए?”.
“ देखो...मैं तुम्हारी भावनाओं को समझ
रहा हूं. समझ रहा हूं कि तुम
पर कैसी क्या बीत रही है, लेकिन हम भावनाओं में बह गए तो मुसिबत बन जाएगा वह हमारे
लिए.? क्या तुम आने वाली मुसिबतों का सामना कर पाओगी...? नहीं न !”
“ अच्छा तो अब मैं चलती हूं ”.
दरवाजा खुलने की आवाज सुनते ही वह दीवार
से चिपक गया. नवयुवक युवती को छोड़ने कुछ दूर तक गया. इसी का फ़ायदा उठाते हुए वह
चुपके से कमरे में प्रवेश करते हुए सोफ़े पर जाकर बैठ गया. युवक ने जैसे ही कमरे
में प्रवेश किया उसने वहीं से बैठे-बैठे कहा- “गुड मार्निंग
डैड...वेरी गुड मार्निंग. पहली बार मिल रहे हैं न हम ! अतः गुड मार्निंग कहना
जरुरी था.”
इस अप्रत्याशित घटना से युवक बुरी तरह
चौंक गया था. वह समझ नहीं पा रहा था कि बंद कमरे में कौन अन्दर घुस आया है? कमरे
में नाईट बल्ब अपनी सीमा और सामर्थ के अनुसार उजाला फ़ेंक रहा था. उसने आंखे
मिचमिचाते हुए उसने कमरे का निरेक्षण शुरु किया. दस-बारह इंच का हाड़ के पुतले को
वह नहीं देख पाया था. तभी उसने एक बार अपने शब्दों को दुहराया-“वेर गुड
मार्निंग डैड...मैं
यहां सोफ़े पर बैठा हूं.”
“ गुड मार्निंग...लेकिन तुम हो कौन
और मेरे कमरे में कैसे घुस आए? झल्लाते हुए उसने कहा.
“ लो अब आप अपने ही खून को नहीं पहचान पाए ? मैं आपका
बेटा......जिसे कठोर दिल वाली मेरी मां ने मुझे जनमते ही अस्पताल में छोड़ दिया और
भाग निकली. फ़िर पलटकर तक नहीं देखा कि मैं किस हाल में हूं”.
“ तुम यहां आए कैसे ?
“वेरी
सिम्पल...चलकर आया और कैसे. अरे..आप तो बच्चों की सी बातें करने लगे. एक बेटा अपने
पिता के यहां नहीं जाएगा तो फ़िर कहां जाएगा?
“ मेरा कोई बच्चा-वच्चा नहीं है.
चलो...भागो यहां से”.
“ फ़िर कहां जाउं?”
“जहन्नुम में और कहां”
“वैसे तो
आप दोनों ने मुझे जहन्नुम भेजने के लिए कितने ही प्रयास किए..क्या सफ़ल हो पाए?
नहीं न !. फ़िर वहीं भेजना चाहते हैं?”
“ तुम भागते हो की नहीं......नहीं
तो तुम्हें पकड़ कर बाहर फ़ेंके दिए देता हूं”. कहकर युवक उसके पीछे दौड़ा. वह कभी
बिस्तर के नीचे, तो कभी सोफ़े के पीछे, तो कभी बुक सेल्फ़ के पीछे छिपते
हुए उसे छकाते रहा. इस भाग-दौड़ में उसका दम फ़ूलने लगा था. एक नन्ही सी जान, आखिर
भागता भी तो कितना ?. उसे इस बात का भी डर सताने लगा था कि कहीं वह उसके हाथ लग
गया तो संभव है कि गर्दन न मरोड़ दे. दरवाजा अधखुला था. भाग निकलने का एक ही उपाय
था. उसने दौड़ लगा दी और सड़क पर आ गया. बाहर छाए अन्धकार का उसे फ़ायदा मिल गया. वह
एक बड़े से पत्थर की आड़ में जा छिपा. युवक ने उसे यहां वहां ढूंढा, लेकिन इसे खोज
नहीं पाया और उलटे पैर वापिस लौट आया.
पत्थर की ओट में देर तक सुस्ताते रहने
के बाद उसे भूख भी लग आयी थी. उसकी भूख
केवल मां के दूध से ही शांत हो सकती थी.
तभी उसे युवक और युवती के बीच चल रही बात का एक सिरा पकड़ में आया. वह कह रही थी कि
उसे दूध पिलाना भूल गयी. इतका मतलब साफ़ है कि उसे मेरी चिंता है. अब केवल एक ही
रास्ता बचता है कि युवती के यहां जाना चाहिए. उसने फ़ूर्ती से कदम बढ़ाए और उस ओर चल
पड़ा, जिस ओर वह रहती थी.
अन्धकार होने के बावजूद उसने घर
पहिचान लिया था.
दरवाजा अधखुला था. बिना कोई शोरगुल
किए उसने कमरे में प्रवेश किया. अन्दर तीखी बहस चल रही थी. एक सोफ़े पर एक उसके
नानी बैठे हुए थे. हाथ बांधे दो नवयुवक खडे थे, जो रिश्ते में उसके मामा थे, दो
नवयुवतियां कड़ी थी, जो रिश्ते में उसकी मौसियां थी और दीवार से सिर टिकाए वह युवती
थी, जिसके गर्भ में वह नो माह तक रहा था. एक ओर दुबककर खड़ा होकर वह बातें सुनने
लगा.
“ये कुल्छ्छनी है पिताजी...इसका गला घोंट
देना चाहिए”. बेटा बोल रहा था.
“ इसने तो हम सब की नाक काट कर रख दी.
इसे इतनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए कि कई जनमों तक याद रहे”. दूसरा बेटा
बोला.
“ अब हम दो बहने घर
से बाहर कैसे निकल पाएंगी पिताजी ? हर कोई हम पर उंगली उठाएगा कि ये तो उसकी बहने
है, निश्चित ही ये भी वैसी होगी जैसे की इनकी बड़ी बहन है. लोग हमको बुरी नजरों से
देखेगें और हमारी इज्जत पर हाथ डालने से नहीं चूकेगें. इसे फ़ौरन अपने घर से निकाल
दीजिए”. एक बहन बोली थी.
पिता अवाक थे. क्या बोले, क्या न
बोले, क्या निर्णय करें, कैसे निर्णय करे. उनके इंसान के तराजू के पल्ले ऊपर-नीचे
हो रहे थे....वे किमकर्त्व्यविमूढ़ बैठे हुए थे. आंखों से आंसू झरझराकर बह रहे थे.
मां ने अपना सिर पल्लु में ढंक लिया था. शायद वे सोच रही होगी कि किस मनहूस घड़ी
में मैंने इसे जना था. कुछ भी कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थी.
किसी अपराधी की तरह दीवार से सिर
टिकाए युवती खड़ी थी. उसने उसे पहचान लिया था. पहचानता कैसे नहीं? गर्भ में जो पूरे
नौ माह रहा था. बित्ता भर के होने के नाते किसी की भी नजर उस पर अब तक नहीं पड़ी
थी. देर तक खड़े रहने से उसकी टांगों में दर्द होने लगा था. भूख भी जोरों से लग आयी
थी. हलक सूखने लगा था. “और देर तक यूंहि खड़ा रहा तो संभव है जान भी चली जाएगी.
इन्हें लड़ना झगड़ना है तो झगड़ते रहें, इससे उसे क्या...उसे तो तत्काल दूध
चाहिए भूख मिटाने के लिए”
उसने तत्काल निर्णय लिया और तन कर
सबके जाकर खड़ा हो गया. विनम्रता से उसने बारी-बारी से सबको प्रणाम करते हुए बोला. “ नानाजी-
नानीजी, आप दोनों को प्रणाम, मैं आपका नाती.... दोनो मामाऒं को प्रणाम...मैं आपका
भांजा और दोनों मौसियों को प्रणाम..मैं
आपका भतीजा.....मैं सबके सामने खड़ा हुआ हूं. आप आपस में खूब
लड़िए..झगड़िए...इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं. मुझे तो सबसे पहले अपनी मां से मिलना
है, जो जल्दबाजी में मुझे अनाथ कर भूखा छोड़ आयी थी” कहते हुए उसने
दौड़ लगाई और अपनी मां के पैरों से जा चिपका. युवती ने फ़ौरन उसे उठाकर अपने
सीने से चिपका लिया फ़िर सरपट दौड़ लगाते हुए कमरे में जा समाई और फ़ौरन दरवाजे की
कुंडी चढ़ा दी.
बिस्तर पर लेटते हुए उसने ब्लाउज के
हुक खोल दिए और अपने बेटे का मुंह स्तनों ले लगा दिया.. ऎसा करते हुए उसे अपार सुख
की प्राप्ति हो रही थी और वह वह चुकुर-चुकुर करते हुए दूध पीने लगा था.
वह यह नहीं जानता और न ही जानना चाहता
है कि उसकी मां कुलछ्छनी है या अपराधी. वह तो केवल इतना जानता और समझता है कि वह
उसकी मां है और कुछ नहीं.
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आठ मार्च
आठ मार्च
“आदमी अपना काम समय पर पूरा करे अथवा न भी करे, तो कोई फ़र्क
नहीं पड़ता, लेकिन प्रकृति अपना काम समय पर करती है. यदि वह अपने काम में थोड़ी सी
भी ढील दे दे तो सारा चक्र गड़बड़ा जाएगा और पृथ्वी पर तरह-तरह के संकट मंडराने
लगेंगे.”
आकाश में मंडराते बादलों को देखकर रोहित सोचने लगा था. अभी कुछ समय पहले तक
आकाश एकदम साफ़ था, किसी कोरी स्लेट की तरह. और देखते ही देखते समुचे आकाश पटल पर
बादलों के धमाचौकड़ी शुरु हो गई थी. वह अपने घर से आफ़िस जाने के लिए तैयार ही बैठा
था. सुबह के साढ़े आठ बज चुके थे. आराम से मोटर साईकिल चलाते हुए उसे दफ़्तर पहुंचने
में लगभग एक से सवा घंटा लग जाता है. यदि वह इस समय तक नहीं निकला तो आफ़िस समय से
नहीं पहुंच सकता. फ़िर दिल्ली के सड़कों पर मोटर साईकिल चलाना कोई आसान काम भी तो है
नहीं. पता नहीं कहां जाम लग जाए ? पता नहीं कब कोई आकर भिड़ जाए, और आपको स्वर्गलोग
की टिकिट थमा दे... कुछ भी नहीं कहा नहीं जा सकता.
बारिश होने के अभी कोई चांस नहीं थे, फ़िर भी उसने अपनी मोटर साईकिल में बरसाती
रख लिया था. बस उसे इन्तजार था अपनी पत्नि का कि कब वह टिफ़िन लेकर रसोई घर से बाहर
निकलती है. उसे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा. वह कुछ और सोचे इससे पहले वह
मुस्कुराती हुई बाहर आयी और उसने टिफ़िन उसके हाथ में थमा दिया.
रोहित ने अपनी मोटर साईकिल स्टार्ट कि
और चल पड़ा. मोटर साईकिल के शीशे में उसने पत्नि को देखा जो हाथ हिला रही थी. घर से
निकलते समय सुनन्दा उसे मुस्कुराते हुए बिदा करती है. कभी-कभी बच्चों अथवा माताजी की अनुपस्थिति में वह उसके
गाल पर चुम्बक भी जड़ देती है. पूरा दिन कब गौरैया की तरह फ़ुर्र से उड़ जाता है, पता
ही नहीं चलता. शाम तो घर लौटने पर भी वह उसी तरह मुस्कुरा कर उसका स्वागत करती है.
रोहित अपने घर की गली से मुड़ गया था. आगे बस स्टाप था. इस समय तक वह खाली था.
शायद कुछ देर पहले बस सवारियों को भर कर ले गई थी.
वह कुछ आगे ही बढ़ पाया था कि रेड सिगनल देखकर उसे अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी. कुछ
देर इन्तजार करने के बाद ग्रीन लाईट होते ही वह आगे बढ़ने वाला ही था, तभी एक
बदहवास सी औरत उसके पास आयी और बोली-“ प्लीज
एक्सक्य़ूज मी ....मेरी बस निकल गई है. क्या आप मुझे ग्रीन पार्क तक लिफ़्ट दें सकेंगे?.
रोहित की खोजी नजरों ने कुछ ही पलों में उसके सिर से लेकर पांव तक का मुआयना
कर लिया था. गजब की खूबसूरत थी वह महिला. लगता है कि विधाता ने उसे फ़ुर्सद के
क्षणॊं में बनाया होगा. मांग में सिन्दूर और माथे पर मैरुन रंग की बिंदिया देखकर
सहज ही अन्दाजा हो जाता है कि वह शादी शुदा है. फ़िर उसके कपड़े पहिनने का ढंग और
बोलचाल से ही साफ़ पता चल जाता है कि वह किसी संभ्रात परिवार से ताल्लुक रखती है.
उसने सोचा.
“ बैठिए” कहते हुए उसने मोटर साईकिल आगे बढ़ा दी थी.
“ आपको
कैसे पता कि मैं उधर ही जा रहा हूँ “ उसने विस्मय से कहा.
“ मैने आपको कई बार उधर ही जाता देखा है” वह औरत बोली.
“ अच्छा तो आप आते-जाते लोगों पर नजर रखती हैं तभी
तो ! लेकिन मुझे इस बात पर ताज्जुब हो रहा है कि आपको केवल और केवल मेरी ही सूरत
याद रही जबकि इस रास्ते न जाने कितने ही लोग गुजरते होंगे?
“ जी नहीं....आपका यह कहना सरासर गलत है कि मैं आते-जाते मर्दों पर नजर रखती
हूँ. इस
भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में भला किसको इतनी फ़ुर्सद है कि वह किसी पर नजर रख सके और
उसे याद भी रखे”.
“मान गया कि आप सच कह रही हैं,लेकिन हजार सूरतों मे केवल मेरी ही सूरत आपको याद
रही. यह कैसे हो सकता है?”
“ इसका
उत्तर एकदम सीधा-सादा सा है. आफ़िस से निकल कर इसी जगह पर खड़े रहकर मुझे बस का
इन्तजार करना पड़ता है और इसी जगह पर मैंने आपको प्रतिदिन पान के खोके पर सिगरेट
पीते देखा है. आप जिस मस्ती के साथ सिगरेट के धुएं के छल्ले बना कर उड़ाते हैं, उसे
देखते रहना मुझे अच्छा लगा था. शायद यही कारण था कि आपकी सूरत मुझे याद रह गई,
वरना कौन किसको याद रखता है”. उसने कहा.
“ चलिए...किसी खास अंदाज की वजह से आपको मेरी सूरत याद रही.
इसके लिए धन्यवाद. फ़िर भी मैं आपसे जानना चाहता हूँ एक अंजान और अपरिचित व्यक्ति
के लिफ़्ट मांगते समय आपको डर नहीं लगा? आपने कैसे अंदाज लगा लिया कि मैं निहायत ही
शरीफ़ आदमी हूँ ?”.
“ किसी पराए मर्द के साथ मोटरसाइकिल पर जाने के लिए बड़ा दिल चाहिए. मैं एक औरत हूँ और कोई औरत
पराए मर्द के साथ बैठे, बड़ा हिम्मत का काम है. शायद आप जानते ही होंगे कि ईश्वर ने
औरत जात को एक छटी इंद्रिय भी दी है जो आदमी के देखने मात्र से समझ जाती हैं कि
उसके मन में किस तरह की उथल-पुथल हो रही है. इस बीच वह अपने बचाव का रास्ता तलाश
लेती हैं”
“ मान गए आपको और आपकी पारखी नजरों को. खैर जो भी हो ..मुझे इस बात को जानकर खुशी हुई
कि मैं एक शरीफ़ आदमी हूँ तभी तो एक अपरिचित महिला ने मुझ पर विश्वास किया. लेकिन
आपने अब तक नहीं बताया कि आप ग्रीन पार्क क्यों जाना चाहती हैं. क्या वहाँ आपका
फ़्लैट है अथवा कोई सगा-सम्बन्धी वहां रहता है? उसने पूछा.
“ नहीं...नहीं
ऎसा-वैसा कुछ नहीं है. दरअसल मैं वहाँ एक गारमेन्ट फ़ैक्टरी में सुपरवाईजर हूँ.”
“जानकर खुशी हुई. अब कृपया अपना नाम भी बतला दें ?(कुछ हंसते हुए)..वैसे मैंने ही कब आपको
अपना नाम बतला दिया. ?. जी..मेरा नाम रोहित है और मैं महरौली में एक ऎड कम्पनी में
सी.ई.ओ के पद पर काम करता हूँ”..
“ जी... तीन अक्षरों का मेरा छॊटा सा
नाम है माधुरी”. अपना नाम बतलाने के ठीक बाद उसने सहमते हुए कहा-“ थोड़ा धीरे चलाईए न गाड़ी... तेज रफ़्तार से मुझे डर लगता है.”
“ थोड़ा आसमान के तरफ़ भी देखिए...बादल गरजने लगे हैं..यदि
बारिश शुरु हो गई तो हमारे पास बचने का कोई साधन नहीं है”.
“ ठीक कह रहे हैं आप, लेकिन सड़क का हाल भी तो
देखिए...जगह-जगह गड्ढे हैं..कहीं बैलेंस गड़बड़ा गया तो हाथ पैर टूटना तय है. मैं
रोज ही एक्सीडेन्ट के केसों को देखती आ रही हूँ ...स्पीड के चक्कर में लोग
दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं और चार छः महिने के लिए बिस्तर से लग जाते हैं .
कितना कष्टप्रद होता है बिस्तर पर पडे रहना. शायद आपने इसकी कल्पना तक नहीं की
होगी “?.
“ बिलकुल ठीक कहा आपने... हार्दिक धन्यवाद आपका” कहते हुए उसने स्पीड कम
कर दी थी.
“ आपने अपने पति के बारे में कुछ नहीं बताया”.
“ जी...वे एक अच्छे आर्टिस्ट के साथ फ़ोटोग्राफ़र भी है. उनका अपना स्टुडियो भी
है.”
“ तब तो उन्होंने आपके पोट्रेट भी खूब बनाये होंगे”.
“ सीधी सी बात है. जब बीबी हसीन हो तो उसे ड्राईंग शीट पर उतारना कौन नहीं चाहेगा.
कभी घर तशरीफ़ लाइयेगा. आप स्वयं जब अपनी आंखों से देखेगें तो देखते रह जाएंगे”.
“जरुर... अब तो मुलाकात हो ही गई है, कभी भी आ धमकूंगा.”
“ अच्छी खासी आमदनी भी हो जाया करती होगी उनकी”.”
“हाँ...इतना तो वो कमा ही लेते कि घर-गृहस्थी आराम से चल जाती है”.
“ फ़िर तो आपको नौकरी करने की जरुरत ही नहीं होनी चाहिए”
“ आपने ठीक फ़र्माया. लेकिन वे इन दिनों बिमार चल रहे हैं. स्टुडियो भी बंद पड़ा
है. आमदनी नहीं के बराबर है. ऎसे में घर खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था. यह अच्छा
ही हुआ कि शादी से पहले मैंने ड्रेस डिजाईनर का कोर्स कर लिया था जो आज काम आ रहा
है.
“ यह सुनकर बड़ा दुख हुआ. मैं आपके किसी काम आ सकूं तो कृपया मुझे बतलाइयेगा अवश्य. जितना भी
संभव हो सकेगा मैं आपकी सच्चे मन से मदद करुंगा”. (कुछ देर तक खामोश ओढ़े रहने के बाद उसने कहा) पति
बिमार पड़े हैं और आप उनको अकेला छोड़कर नौकरी पर निकल जाती हैं तो उनकी देखभाल कौन
करता होगा? बच्चे भी तो होंगे आपके?”.
“ जी
हाँ..एक बेटा और एक बेटी है. मयंक ऎट्थ में है और ऋचा सिक्स्थ में. दोनों बच्चे
बड़े समझदार हैं. उन्हें कुछ बतलाने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती....अपना काम खुद कर
लेते हैं. सुबह मैं उनके लिए टिफ़िन तैयार कर देती हूँ. स्कूल की बस आ जाती है, वे
उससे निकल जाते हैं. दोनों शाम को घर लौटते हैं. रही उनकी बात..उनकी. तो आफ़िस से
निकलने से पहले मैं उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर देती हूँ. वे अब इस लायक तो
हो ही गए हैं कि छोटा-मोटा काम वे खुद कर लेते हैं. मेरे एबसेन्ट में टीव्ही उनका
साथ देती है, किसी तरह उनका समय पास हो जाता है....
“ जिसकी बीबी इतनी खूबसूरत हो और वह एक लंबे समय तक घर से
बाहर रहे तो पति के मन में शंका-कुशंका के बीज भी तो पनपते ही होंगे कि कहीं वह
किसी के साथ फ़्लर्ट तो नहीं कर रहीं ?.”
“ संभव है, ऎसा भी हो सकता है....और नहीं भी हो सकता है.... शरीर से बिमार आदमी
मन-मस्तिस्क से भी बिमार हो, यह जरुरी नहीं, फ़िर भी सच तो यही है कि आदम जात ने आज
तक अपनी जीवन संगनी पर भरोसा ही कब किया है? वह खुद चाहे जितना गिरा हुआ क्यों न
हो, लेकिन वह अपनी बीबी को लेकर शंका-कुशंकाओं को अपने मन में पाले रहता है.
खैर... मैं इसकी चिंता नहीं करती..और मुझे करनी भी नहीं चाहिए. जब एक औरत घर से
निकलती है तो यह जरुरी नहीं कि उसका सामना किसी दरिंदे से ही होगा.. उसे अच्छे-भले
लोग भी तो मिलते हैं, जैसे की आप.”
“ एक बात बतलाईए....आपकी छुट्टी कब होती है?
“ छुट्टी
तो छः बजे होती है,लेकिन निकलते-निकलते साढ़े छः तो बज ही जाते है. आखिर ये सब
क्यों पूछ रहे हैं आप?
“ बस यूंहि...इसी समय तक मेरी भी ड्यूटी हाफ़ हो जाती है. अगर आप चाहें तो इसी जगह पर
मेरा इन्तजार कर सकती हैं. मुझे अच्छा लगेगा कि आप मेरे साथ ही लौटें”.
“ मुझे ऎसा लगता है कि आप मुझमें कुछ ज्यादा ही इंट्रेस्ट
लेने लगे हैं.” उसने कहा.
“ नहीं...नहीं.
ऎसा कुछ भी नहीं है शायद आपने मेरे कहने का गलत मतलब निकाल लिया है. मेरा आशय और
कुछ नहीं था, दरअसल मैं नहीं चाहता कि आप बस से सफ़र करें.. यह वह वक्त होता है जब
सारे कार्यालय बंद होने को होते हैं. सभी जल्दी ही घर लौटना चाहते हैं और यही कारण
है कि शाम के वक्त बसों में कुछ ज्यादा ही भीड़ हो जाती है. कुछ मजनू टाईप के लोग
भी इसमें सफ़र कर रहे होते हैं. किसी खूबसूरत युवती के जिस्म से चिपकने का इससे
अच्छा मौका कब मिल पाता है उन्हें. मैं नहीं चाहता कि आप भी उस भीड़ का हिस्सा बनें.
बात अभी पूरी भी नहीं हो पायी थे कब ग्रीन पार्क आ गया, पता ही नहीं चल पाया.
“जी बस यहीं रुक जाइये” उसने अजीजी से कहा.
मोटर साईकिल से उतरकर वह सामने आ गई. होंठॊं पर मुस्कान ओढ़ते हुए उसने कहा “आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. शाम को फ़िर मिलते हैं. मैं
आपका इसी जगह पर इन्तजार करुंगी.”. उसके
इस अंदाज में यकीन और अपनापन साफ़ झलक रहा था.
“ जी बहुत अच्छा. अब मैं चलता हूँ”. उसने अपनी मोटर साइकिल आगे बढ़ाते हुए हाथ हिलाते हुए कहा.
मोटर साइकिल के शीशे में उसका अक्स दिख रहा था. वह अब भी हाथ हिलाकर उसका
अभिवादन कर रही थी.
रोहित के जेहन में दिन भर माधुरी की मदहोश कर देने वाली सूरत तैरती रही.
दिन कैसे कट गया, पता ही नहीं चल पाया. आफ़िस से निकलकर वह उस स्थान पर जाकर
खड़ा हो गया, जहां उसने उसे सुबह के समय छोड़ा था. उसे ज्यादा देत तक इन्तजार करने
की जौरत नहीं पड़ी. वह ठीक छ पच्चीस पर वहां पहुंच गई थी. उसने आगे बढ़कर रोहित का मुस्कुरा कर अभिवादन किया और
मोटरसाइकिल पर सवार हो गई. मोटरसाइकिल स्टार्ट करने से पहले उसने अपना विजिटिंग
कार्ड थमाते हुए कहा- “इसे रख लीजिए, कभी जरुरत पड़ सकती है”.
उस दिन के बाद से वह ठीक समय पर उस जगह पर खड़ी मिलती, जहां रोहित से वह पहली
बार मिली थी. इसी तरह शाम को भी वह उसी जगह पर खड़ी रहकर उसकी प्रतिक्षा करती रहती.
काफ़ी दिनों तक यह क्रम चलता रहा.
रोहित अपने घर से निकला. गली के उस छोर पर वह नहीं मिली. बस स्टाप या तो खाली
होता या फ़िर 9 बजे जाने वाली बस के इंतजार में
4-6 लोग खड़े दिखाई देते. वह सोचता,
शायद उसे कोई दूसरा लिफ़्ट देने वाला मिल जाता हो और वह उसके साथ निकल जाती हो.फ़िर
वह सोचता, “ऎसा नहीं हो सकता”.
एक-एक करके काफ़ी दिन बीत गए, पर वह नही मिली. बावजूद इसके वह छोर वाले बस
स्टाप के पास अपनी गाड़ी धीमी कर लेता कि शायद वह खड़ी हो. शाम को भी यही क्रम
दोहराता, लेकिन निराशा ही हाथ लगती.
मोटरसाइकिल चलाते समय उसके जेहन में माधुरी की मधुर स्मृतियां तैरती रहती.
कभी-कभी तो वह उससे बातें भी करने लगता था लेकिन जल्दी ही उसे इस बात का भान हो
जाता कि वह अब उसके साथ नहीं है. अक्सर माधुरी की कही बातें उसके कानों में गूंजने
लगती-“ किसी पराए मर्द के साथ मोटरसाइकिल पर जाने के लिए बड़ा दिल चाहिए. मैं एक औरत हूँ और कोई औरत
पराए मर्द के साथ बैठे, बड़ा हिम्मत का काम है”. “ ईश्वर ने हम औरतों को अलग से छटी इंद्री दी है जो आदमी को देखते ही समझ जाती
हैं कि उसके मन में क्या पाप पल रहा है”. कभी-कभार जब उसकी गाड़ी की स्पीड ज्यादा हो जाती तो
वे सारे शब्द उसके कानों में गूंजने लगते-“मुझे स्पीड से डर लगता है, थोड़ा धीरे चलाएं” और वह अपनी स्पीड कम कर लेता था.
दिन पर दिन गुजरते चले गए,लेकिन वह दुबारा नहीं मिली. इस बीच यमुना से काफ़ी
पानी बह चुका था. समय भी कब किसके लिए रुका है जो उसके लिए रुकता. अब वह सेवानिवृत
हो चुका था. जिस रास्ते पर चलते हुए उसने अपने जीवन के सैतीस साल गुजार दिए थे, उस
रास्ते पर फ़िर कभी उसका जाना न हो सका,लेकिन माधुरी की याद उसके मन में जस की तस
बनी रही.
उसके बेटे ने फ़ोर व्हीलर खरीद ली थी, जिसके लिए गैराज में कुछ ज्यादा जगह की
आवश्यकता पड़ती थी. उसने एक दिन अपने पापा को सलाह देते हुए कहा कि अब उन्हें
मोटरसाइकिल बेच देनी चाहिए, लेकिन उसने ऎसा करने से साफ़ मना कर दिया था. वह किसी
भी कीमत पर उसे बेचने को तैयार नहीं था, क्योंकि उस मोटरसाइकिल से माधुरी की यादें
जुड़ी हुई थी.
टेलीफ़ोन की घंटी बज रही थी लगातार, जिसे उसके पोते ने उठाया, जो उस समय पास ही
खेल रहा था. एक आवाज उभरी-“ क्या रोहितजी घर पर हैं, जरा उनसे बात करवाइये”. उसने वहीं से अपने दादाजी को आवाज देते हुए कहा-“ दद्दुजी..आपका फ़ोन”.
“ कौन हो सकता है इस समय.”..सोचते हुए उसने क्रैडल उठाया. एक सुरमई आवाज सुनकर वह चौंक
पड़ा था. वह आवाज माधुरी की थी. सुनते ही अवाक रह गया था वह.” इतने दिनों बाद.....कहां थीं अब तक...मैं बरसों तक
तुम्हारे आने का इंतजार करते रहा..लेकिन तुम न जाने कहां खो गई थीं... वह कुछ और
कह पाता कि दूसरी ओर से आवाज उभरी-“ सारे शिकवे-शिकायत बाद में सुनूंगी.. पहले ये सुनिए कि कल ठीक ग्यारह बजे आप प्रगति
मैदान पहुंच जाएं, देश के महामहिम राष्ट्रपति जी मुझे सम्मानित करेगें. आपकी
उपस्थिति प्रार्थनीय है. यदि आप नहीं पहुंचे तो शायद ही मैं सम्मान ग्रहण कर
पाउंगी. मैंने रिसेप्शन काउन्टर पर आपके लिए गेटपास का इन्तजाम करवा दिया है.
फ़्रंट वाली सीट नम्बर आठ आपके लिए आरक्षित है. सीट नम्बर आठ...ध्यान रखियेगा”. इतना कहकर उसने टेलीफ़ोन काट दिया.
रोहित के बूढ़े शरीर में एक नया जोश, एक नयी उमंग का संचार होने लगा था. इस
अतिरेक आनन्द से वह सराबोर हुआ जा रहा था. उसकी समझ में नहीं आ रहा थी कि कल ऎसा
कौनसा विशेष दिन है, जब वह राष्ट्रपतिजी के हाथों सम्मानित होगी. उसने कैलेण्डर को
ध्यान से देखा. कल आठ मार्च है. समझ गया कल “अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस” है. यह वह दिन होता है जब किसी विशिष्ट कार्य के
संपादित किए जाने पर उस महिला का सम्मान किया जाता है.
उसके जेहन में केवल प्रश्नों की भरमार थी,जिसके उत्तर वह खोजने का असफ़ल प्रयास
करता रहा था, लेकिन किसी नतीजे पर पहुंच नहीं पाया था.
दूसरे दिन वह समय से पहले ही घर से निकल गया था. काउन्टर पर पहुंचते ही उसे
गेटपास दे दिया गया था. इस समय पूरा हाल खचाखच भरा हुआ था. चारों तरफ़ भीड़ ही भीड़
थी. भीड़ को चीरता हुआ वह अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. अब उसे इन्तजार था उस क्षण
का, जब वह अपनी आंखों से माधुरी को सम्मानित होते हुए देखेगा. प्रसन्नता की लहरें
उसके मन में हिलोरे ले रही थीं.
महामहिम पधार चुके थे. उनके स्वागत-सत्कार के बाद सम्मान देने का कार्यक्रम
शुरु हुआ. हर उस महिला के नाम की घोषणा होती,जिन्हें सम्मानित किया जाना था. तीसरे
क्रम में माधुरी के नाम की घोषणा हुई. मंच पर वह किसी चमकदार हीरे की तरह अपनी चमक
बिखेरते हुए आयी. आगे बढकर उसने महामहिम से सम्मान प्राप्त किया और प्रसन्न बदन
उपस्थित जन समुदाय का झुककर अभिवादन किया.
कार्यक्रम की समाप्ति के बाद उसकी भेंट माधुरी से हुई. मिलते ही उसने उसे धन्यवाद
दिया और बरसों से मन के आंगन में फ़न फ़ैला कर बिलबिलाते नागों का पिटारा खोल दिया.
माधुरी ने उसे ध्यान पूर्वक सुना और विनम्रता पूर्वक कहा-“ रोहितजी...अतीत में जाकर क्या करेगें? अतीत को अतीत
ही रहने दें, तो अच्छा है.
वह और कुछ आगे बोल पाती कि मयंक और ऋचा भी आ पहुंचे. उसने रोहित से परिचित
करवाया. दोनों ने उसके चरण स्पर्ष किए.
“ अच्छा अब तो अब हम चलते है” कहते हुए माधुरी आगे बढ़ गई. वह निर्मिशेष आंखों से उन
तीनों को जाता देखता रहा, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए थे.
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कहानी तीसरी मंजिल
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FksA
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rqeus mUgsa gkWLVy esa Mky fn;k vkSj mUgsa fons'k Hkh Hkst fn;kA fuf'pr gh
rqEgkjh viuh ;kstuk jgh gksxh fd eSa rqEgkjs fo;ksx esa rM+ius ds lkFk&lkFk
viuh csfV;ksa ds fcNksg esa Hkh rM+iwA irk ugha&rqe mUgsa fdl lkWaps esa
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ls vesfjdu&jax esa jax pqdh gSA rqEgsa irk pyk&;k ugha] ugha tkurh---
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esa fdruk dqN lh[k pqdh gSa rqEgkjh csfV;kWaA irk ugha--- D;ksa fp<+ gSa
rqEgsa Hkkjrh;ksa ls--- Hkkjrh; laLd`fr lsA
fdruk uhp--- fdruk dehuk--- fdruk [kqnxtZ
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nSfgd&'kks"k.k dj lds--- viuh vkneHkw[k feVk lds--- vkSjrksa dks cnys
esa Hkyk pkfg, Hkh D;k! nks twu dh jksVh--- VwVh&QwVh >ksiM+h--- vnuk lk
edku--- ;k fQj dksbZ vkfy'kku caxyk--- os fugky gks mBrh gSA ru ltkus dks
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mlds [kwWaVs ls--- ejrs ne rd ds fy,A
dqN vkSjrksa dh ckr gVdj gSA os vius vki
dks LoPNan--- Lora=--- Lokoyach eglwlrh gSa--- D;k os vius vkidks fi'kkph
nfjUnksa ds iatksa ls f'kdkj gksus ls cpk ikrh gS\ cnyrs ;qx esa vc cykRdkj Hkh
lkewfgd gks pys gSaA os vius feydj >iV~Vk ekjrs gSaA tc os okluk dk [ksy
[ksy jgs gksrs gSa] rc og vius gkFk&iSj pykdj vius dks cpkus dk iz;kl Hkj
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fdl&fdl dk uke ;kn j[k ikrh gksxhA 'kjhj fupqM+ tkus ds ckn] mlesa bruk
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mldh rks ckr gh vyx gS] tks [kqn gksdj
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diM+s mrkjdj uaxh gks tkrh gSA ekuk---- ,slk djus ij mUgsa eqWag&ekaxh
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gksrh gSA tc vkRek gh ej xbZ rks eqnkZ 'kjhj dks uaxk j[kks ;k <kWaddj gh]
D;k QdZ iM+rk gSA
rjg&rjg ds uqdhys fopkj mldh vkRek
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mlus eglwl fd;k fd nnZ ds lkFk&lkFk vkyl Hkh 'kjhj esa jsax jgk gSA fcLrj
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vius ftLe dks rkSfy;s ls yiVrs gq, og
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iM+k gSA vk'p;Z ls mlds vksaB xksy gksus yxsA dqlhZ ij cSBrs gq, mlus xhys
gkFkksa ls vkea=.k&i= mBk;kA i= mBkrs gh ysos.Mj dh Hkhuh&Hkhuh [kq'kcw
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myV&iyV dj ns[kkA ikjn'khZ IykfLVd Vsi ls fpidk;k x;k FkkA i= Hkstus okyk
dksbZ n;k'kadj FkkA izksQslj n;k'kadjA i= Hkstus okys ds rkSj&rjhds ls og
csgn izHkkfor gqbZ FkhA eu gh eu og lkspus yxh Fkh "dkSu gS n;k’kadj\ mls
dgkWa ns[kk Fkk\ ns[kk gqvk rks ugha yxrk] dgkWa HksaV gqbZ Fkh\ dgkWa feyh
Fkh\ lgikBh gS ;k utnhd dk fj’rsnkj\" mlus vius Le`fr ds ?kksM+ksa dks
nwj&nwj rd nkSM+k;k HkhA ij dksbZ Li"V rLohj n;k'kadj dh cu ugha ikbZA
mlus vkfgLrk ls Vsi mrkjk] i= [kksyk vkSj ,d
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t:j&t:j vkukA rqe ds uhps xgjh L;kgh ls js[kkafdr fd;k x;k FkkA rqe ds uhps
[khaph xbZ js[kk mls fdlh fryLeh [ktkus dh dqath&lh yxhA vc og fryLe dh
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fj'rsnkj gh] ;k mlus lc tku&cw>dj fd;k gS\ n;k'kadj mls vc ,d fnypLi
tknwxj Hkh yxus yxk FkkA og bl tknw ds lEeksgu esa f?kjrh pyh tk jgh FkhA mlus
rRdky fu.kZ; fy;k fd bl 'kknh esa og t:j tk,xh vkSj fryLeh jgL; dks mtkxj djds
jgsxhA mls vc ml fnu] ml ?kM+h dk cslczh ls bartkj jgus yxk FkkA
fu;r le; ij mlus ,d egWaxk lk fxQ~V vkbVe
iSd djk;kA viuk lwVdsl rS;kj fd;kA Mªk;oj dks funsZ'k fn;k fd og xkM+h fudky
yk;sA
'kgj dks ihNs NksM+rs gqbZ mldh xkM+h vc
taxy ds chp ls gksdj xqtj jgh FkhA
maph&uhph igkfM+;kWa---
Vs<+s&es<+s ?kqekonkj jk'rs] vkdk'k dks Nwrs] ckr djrs isM+ksa dh
drkjsaA igkM+ dh pksVh ls mrjrs--- eqLdqjkrs--- gok esa ljxe fc[ksjrs >jusA
dqWaykaps Hkjrs e`x&'kkodA <ksj&Maxj pjkrs pjokgsA pyfp= ds ekfuan
iy&iy cnyrs n`'; ns[k og vfHkHkwr gqbZ tk jgh FkhA Hkhxh&Hkhxh gok ds
vyeLr >kSads] mlds xksjs cnu ls vkdj fyiV&fyiV tkrs FksA mls ,slk Hkh
yxus yxk Fkk fd og fdlh vU; x`gksa ij mM+h pyh tk jgh gS vkSj ,d u;k thou thus
yxh gSA foLQkfjr utjksa ls og izd`fr dk eueksgd :i ns[krh jghA
dqN nsj rd rks mldk eu izd`fr ds lkFk
rknkRE; esa cuk;s j[krkA fQj 'kadk&dq'kadkvksa dh dVhyh >kfM+;ksa esa tk
my>rkA dHkh mls bl ckr ij iNrkok gksus yxrk fd og ukgd gh pyh vkbZ gSA ?kj
cSBs Hkh rks HksaV Lo:i jkf'k Hksth tk ldrh Fkh vFkok Mkd?kj ls iklZy }kjk HkhA
dHkh yxrk] mldk vkuk t:jh Fkk vkSj n;k ls feydj ml jgL; ij ls inkZ Hkh mBkuk
Fkk fd og mlds vrhr ds ckjs esa D;k dqN tkurk gSA
xkM+h dh lhV ls flj fVdkdj og dqN u dqN
lksprh vo'; pyrhA vc og dYiuk&yksd esa fopjus yxh FkhA yxk fd og 'kknh?kj
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dM+d v/ksM+ Hknz iq:"k vkrk fn[kkA mldh pky esa phrs dh lh piyrk FkhA vc
og djhc vk igqWapk FkkA mlus lwV&VkbZ igu j[kh Fkh rFkk flj ij xqykch lkQk
ckWa/ks gqvk FkkA xqykch ixM+h fuf'pr rkSj ij mls HkhM+ ls loZFkk vyx dj jgh
FkhA ";g gh n;k'kadj gksxkA" mlus vuqeku yxk;k Fkk ikl vkrs gh mldh
utjsa mlds psgjs ls tk fpidhA lqxfBr nsg;f"V] jkscnkj psgjk] psgjs ij
?kuh&pkSM+h ewWaNsa] vksBksa ij fLuX/k eqLdku] p'es ds Qzse ls
>kaWdrh&gWalrh fcYykSjh vkWa[ksa ns[k og izHkkfor gqbZ fcuk u jg ldh
FkhA
ikl vkrs gh og fdlh 'kjkjrh cPps dh rjg
pgdus yxk FkkA vkb;s--- 'kf'k th! vkidk fnyh Lokxr gSA dgrs gq, mlds nksuksa
gkFk vkil esa tqM+ vk;s FksA 'kf'k dh utjsa vc Hkh mldh eksgd eqLdku ns[k
Fke&lh xbZ FkhA og ckj&ckj vfHkoknu dj jgk FkkA ckj&ckj ds vkxzg ds
ckn mldh psruk okfil ykSV vkbZ Fkh vkSj mls viuh Hkwy ij i'pkrki lk Hkh gksus
yxk FkkA vius >sai feVkrs gq, og dsoy izR;qRrj esa ueLrs Hkh dg ikbZ FkhA
vc og mlds ihNs gks yh FkhA dne ls dne
feykrs gq, vkxs c<+ pyh FkhA txg&txg izkS<+&izkS<+kvksa]
;qod&;qofr;ksa us vius&vius ?ksjs cuk fy;s Fks vkSj f[kyf[kykdj
gWalrs𝔠krs tk jgs FksA pyrs gq, og chp esa :d Hkh tkrk vkSj mldk ifjp;
Hkh djokrk pyrkA n;k ds cksyus&pkyus dk <ax] vkWa[ksa eVeVkdj ns[kus dk
vankt xys dh ek/kq;Zrk ns[k&lqu mls ,slk Hkh yxus yxk Fkk fd
<sj&lkjs ?kqWa?k: ,d lkFk >u>uk mBs gksaA
HkhM+ dks phjrk gq, og Mk;l dh vksj
c<+ pyk FkkA Mk;l ij oj&o/kw eap dh 'kksHkk c<+k jgs FksA ,d ugha
cfYd vusdksa dSejs viuh&viuh Q~yS'kksa ls pded&pded izdk'k mxy jgs FksA
QksVksxzkQksa dks rfud :d tkus dk ladsr nsrs gq, og eap ij tk [kM+k gqvk FkkA
og Hkh mldk vuqlj.k djrh gqbZ eap ij tk p<+h FkhA eap ij igqWaprs gh mlus
viuh csVh izHkk dk mlls ifjp; djok;kA fQj oj ls ifjp; djokrs gq, og
QksVksxzkQjksa dh vksj eq[kkfrc gksrs gq, QksVks ysus ds fy, dgus yxkA dejs
fDyd gks blds iwoZ mlus viuh yach cfy"B ckWagsa mlds dej ds bnZ&fxnZ
yisV yha FkhA dbZ&dbZ dSejs ,d lkFk ped mBs FksA
,d
vifjfpr&vtuch vkneh mldh dej esa ,Sls&dSls gkFk Mky ldrk gS\ mldh ;s
etky! mldk psgjk rerekus yxk FkkA vkWa[kksa esa dzks/k mrj vk;k FkkA eqfV~B;kWa
ehpus yxh FkhaA bPNk bqbZ fd dldj pkWaVk tM+ ns ij ,d vutku 'kgj esa
vifjfpr&vuphus yksxksa ds chp og ,slk dSls dj ik,xhA og lkspus yxh FkhA
fdlh rjg vius Øks/k dks nckrs gq, mlus mlds gkFkksa dks >Vd fn;k vkSj LVst
ij ls mrj vkbZA
gks'k esa ykSVrs gq, mlus eglwl fd;k fd
mldk LFkwy 'kjhj vc Hkh viuh lhV ij iljk iM+k gSA xkM+h viuh xfr ls ljiV Hkkxh
tk jgh gSA mlus viuh gFksyh ls ekFks dks NqvkA iwjk psgjk ilhus ls rjcrj gks
vk;k FkkA ilZ esa ls :eky fudkyrs gq, mlus psgjs dks lkQ fd;kA f[kM+dh dk
'kh'kk uhps mrkjkA B.Mh gok ds >ksadksa ds vanj vkrs gh mlus dqN jkgr&lh
eglwl dhA ,d dYiuk ek= us lpeqp mls cqjh rjg ls Mjk gh fn;k FkkA vc og ,dne
ukeZy&lk eglwl djus yxh FkhA
og dqN vkSj lksp ikrh] mldh xkM+h ,d
>Vds ds lkFk] ,d e.Mi ds ikl vkdj :d x;h FkhA mlus f[kM+dh esa ls >kWaddj
ns[kkA gw&c&gw ogh e.Mi lkeus pepek jgk Fkk tSlk fd mlus dqN le; iwoZ
dYiuk yksd esa fopjrs gq, ns[kk FkkA xkM+h ds :drs gh ,d Hknz iq:"k mlds
rjQ vkrs fn[kkbZ fn;kA
vkxUrqd dh pky&<ky esa phrs dh lh
piyrk FkhA vc og xkM+h ds dkQh utnhd rd vk igqWapk FkkA mldh utjsa vifjfpr
O;fDr ds psgjs ls ekuks fpid lh xbZ FkhA ogh jkscnkj psgjkA ?kuh&pkSM+h
ewWaNsaA xzs dyj dh VkbZA vksaBksa ij fFkjdrh eqLdkuA lqugjs p'es ls >kWadrh
fcYykSjh vkWa[ksA f'k"Vrk ls mlus vius nksuksa gkFk tksM+ fy;s Fks vkSj
Lokxr dgrs gq, mls xkM+h ls uhps mrjus izkFkZuk djus yxk FkkA
'kf'k dk ekFkk pdjkus yxk FkkA og eu gh
eu lkspus ij foo'k gks xbZ Fkh&",sls dSls gks ldrk gS\" tSlk dqN
lksp j[kk Fkk oSlk gh og viuh [kqyh vkWa[kksa ls ns[k jgh FkhA mls rks ,slk Hkh
yxus yxk Fkk fd og lpeqp esa fryLe ds ml eqgkus ij vkdj [kM+h gks xbZ gS] tgkWa
ls mls vanj izos'k djuk gSA
"vkb;s--- 'kf'k th vanj pyrs gSa]
dgrk gqvk og vkxs c<+ pyk FkkA og Hkh fdlh ea=eqX/k fgjuh dh rjg mlds dneksa
ls dne feykrs gq, ihNs&ihNs pyus yxh FkhA HkhM+ dks yxHkx ihNs phjrs og
fujarj vkxs c<+ jgk FkkA chp&chp eas :drs gq, og esgekuksa&Lotuksa
ls cfr;krk&iwNrk py jgk Fkk fd mUgsa dksbZ vlqfo/kk rks ugha gks jgh gSA
grizHk Fkh 'kf'k fd mlus mldk ifjp; fdlh
ls Hkh ugha djok;kA vc og LVst dh vksj c<+us yxk FkkA LVst ij igqWaprs gh
mlus 'kf'k dk ifjp; viuh iq=h izHkk ls djok;kA fQj gksus okys nkekn lsA ifjp;
djokus ds ckn og QksVksxzkQjksa dks rLohj ysus dh dgus yxk FkkA ,d Kkr Hk; fQj
eu ds fdlh dksus ls ckgj fudy vk;k FkkA og lkspus yxh Fkh fd QksVks ysrs le; og
mlds dej esa gkFk Mky nsxkA ij mlus ,slh&oSlh gjdrsa fcydqy Hkh ugha dh
FkhA mldh dYiuk nwljh ckj Hkh fuewZy fl) gqbZ FkhA
NksVs&eksVs usx&nLrwj] ojekyk
fQj HkkWaojs fuiVkrs&fuiVkrs iwjh jkr dSls chr xbZ] irk gh ugha py ik;kA
ckjkr vc fcnk gksus dks FkhA fcnkbZ dh lkjh j'esa iwjh dh tk pqdh FkhA
fcnkbZ ds Hkkoqd {k.kksa esa izHkk vius
fiz; ikik dks xys yxdj tkj&tkj jksbZ tkus yxh FkhA 'kf'k dk dystk tSls cSBk
tk jgk FkkA mldh vkWa[kkksa ls Hkh vkWalw NyNyk iM+s FksA vc og 'kf'k ls fyiVdj
jks iM+h FkhA izHkk dks xys yxkrs gq, mls viuh csVh xzq'kk dh ;kn gks vkbZA
dk'k! og ikl gksrhA laHko gS] mldh Hkh vc rd 'kknh gks pqdh gksxhA izHkk ds
gemez rks og gksxh ghA og lkspus yxh Fkh fcnkbZ ds thoar ,oa Hkkoqd {k.kksa ds
chp cgrs gq, ,d eekZUrd ihM+k dk igyh ckj vuqHko dj jgh FkhA
ckjkr ds fcnk gks tkus ds ckn n;k dh
gkyr ns[kdj og flgj mBh FkhA n;k dh gkyr dqN ,slh cu xbZ Fkh fd tSls fdlh
ef.k/kkjd liZ ls mldk ef.k Nhu fy;k x;k gksA T;knk nsj rd mldh utjsa n;k ds
psgjs ij fVdh ugha jg ikbZ FkhA
n;k us vius vkidks ,d dejs esa dSn dj
fy;k FkkA vius dejs esa tkus ds iwoZ mlus mls ;s dejk fn[kkrs gq, dgk Fkk fd og
Hkh iwjh jkr tkxrh jgh gSA vr% mls Hkh FkksM+h nsj lks ysuk pkfg,A jgh
<sjksa lkjh ckrsa djus dh rks os ckn esa Hkh dh tk ldrha gSaA
'kf'k us Li"V :i ls eglwl fd;k Fkk
fd bl le; okLro esa n;k dks vkjke djus dh l[r vko';drk gSA og Lo;a Hkh iz'uksa
dks NsM+dj mls vkSj Hkh O;fFkr ugha djuk pkgrh FkhA
dejs dh HkO;rk ,oa lkt&lTtk ns[kdj
'kf'k dkQh izHkkfor gqbZ FkhA Muyi ds fcLrjksa dks ns[k mldk Hkh eu dqN nsj lks
tkus ds fy, epyus yxk FkkA vc og fcLrj ij tkdj ilj xbZ FkhA
mlds iksj&iksj esa nnZ jsax jgk Fkk
vkSj og lpeqp esa lks tkuk pkgrh Fkh] ij mldk eu ls rky&esy ugha cSB ik jgk
FkkA jg&jgdj u, [;ky vkSj frjksfgr gks tk;k djrs FksA
dkQh nsj rd fcLrj ij iM+s jgus ds ckn
og mB cSBhA mlus f[kM+dh ls >kWaddj ns[kkA n;k dk dejk vc Hkh can iM+k FkkA
vc og fQj fcLrj ij vkdj ilj xbZA FkksM+h&FkksM+h nsj ckn mBrh] f[kM+dh ls
>kWadrh] njoktk can ikdj fQj ykSV vkrhA
fcLrj ij iM+s&iMs+ mls mdrkbZ lh
gksus yxh FkhA njoktk [kksydj og dkjhMksj esa fudy vkbZA ckgj vkdj dqN vPNk lk
yxus yxk Fkk mlsA
ikWap&lkr fefuV gh [kM+h jg ikbZ
gksxh fd mlus rhljs dejs ls ,d efgyk dks ckgj fudyrs ns[kkA 'kdy&lwjr ls og
n;k dh cgu tku iM+rh FkhA og dqN vkSj lksp ikrh fd og efgyk Bhd mlds lkeus vkdj
[kM+h gks xbZA efgyk ds gkFk esa iwtk dh Fkkyh FkhA Fkkyh esa nhi ty jgk FkkA
'kk;n og eafnj tkus dh rS;kjh esa FkhA og dqN dguk pkg jgh Fkh fd efgyk pgd
mBhA
"nsf[k;s cgu th--- ge vkidks u rks
tkurs gSa vkSj u gh igpkurs gSaA cl bruk t:j tkurs gSa fd n;k HkS;k us vkidks
vius fo'ks"k d{k esa Bgjk;k gS] tkfgj gS fd vki gekjs [kkl esgeku gSaA ge
vdsys gh j?kqukFk eafnj tk jgs gSa n'kZuksa ds fy,A vki lkFk pyuk pkgsa rks py
ldrs gSaA ge tc Hkh dHkh ;gkWa vkrs gSa] j?kqukFk eafnj tkuk dHkh ugha HkwyrsA
cM+h 'kkafr feyrh gS ogkWa tkdjA"
'kf'k ns[k&lqu jgh FkhA
vkxUrqd efgyk yxkrkj cksys tk jgh FkhA dqN yksxksa dks T;knk gh cksyus dh vknr
gksrh gSA cksyrs le; os vkxs&ihNs dqN Hkh ugha ns[krs vkSj ckrksa gh ckrksa
esa vius eu dh ckr mxydj j[k nsrs gSaA os bl ckr ls Hkh vufHkK jgrs gSa fd
dksbZ mudh ckrksa ls uktk;t Qk;nk Hkh mBk ldrk gSA ckrksa ds nkSjku mlus lgt :i
ls viuk ifjp; [kqn gh ns fn;k Fkk fd og n;k dh cgu gSA n;k dh cgu gS ;kfu n;k
ds ckjs esa lc dqN tkurh gSA ml jgL;e; fryLe dh xbjkbZ esa mrjus ds fy, ;g
efgyk lh<+h dk dke c[kwch dj ldrh gSA og eu gh eu lksp jgh Fkh] mlus rRdky
fu.kZ; ys fy;k fd og eafnj vo'; tk,xhA
xkM+h HkhM+HkkM+ okys bykds ds chp ls
gksdj xqtj jgh Fkh] og mls ckrksa esa my>k;s j[krhA njvly /khjs&/khjs og
vius edln dh vksj c<+uk pkg jgh FkhA ckrksa ds nkSjku og nqdkuks&edkuksa
ds lkbu&cksMZ Hkh i<+rs pyrhA mlus 'kf'kizHkk fefMy Ldwy dk cksMZ ns[kkA
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तलाश एक सूरज की
तलाश एक
सूरज की.
(
गोवर्धन यादव )
उसने
स्पष्ट रूप से महसूस किया कि मन के आँगन के किसी कोने से मस्ती का एक सोता फूट
निकला है. अब धीरे-धीरे वह शिराओं में आकर बहने लगा
है. शरीर में परिवर्तन होने लगे हैं. उसके गाल चटक लाल, ओंठ गुलाबी व लजीले हो आए हैं.
आँखें नशीली होने लगी हैं. सांस-प्रस्वांस में मलयाचल प्रवाहित होने लगा है. कानों
में हजारों-हजार नूपुर एक साथ झंकृत होने लगे है. देह चन्दन-सी सुवासित होने लगी है और मन किसी रेशमी रूमाल की तरह हवा में
लहराने लगा है.. अब वह अपने प्रिय का समीप्य पाने के लिए अधीर हो उठी थी.
आदमकद आईने के सामने विवस्त्र
बैठी राधा, अपने शरीर में अचानक आए परिवर्तनों का
सुक्षमता से निरीक्षण कर रही थी. अपने आप में गुम थी राधा तभी उसके कानों से कुछ
कर्कश स्वर आकर टकराने लगे. उसने सहजता से ही अन्दाजा लगा लिया था कि टेरने वाला
और कोई नहीं बल्कि बुआ जी थीं.
बुआ उर्फ गंगा देवी, ठाकुर दौलत
सिंह जी के स्वर्गवासी पिता की मुँह बोली बहन. हवेली में आने जाने की इन्हें मनाही
नहीं है. वे कभी भी, किसी भी वक्त, बिना रोकटोक के आ-जा सकती हैं. पारिवारिक
मामलों में दखलंदाजी भी कर सकती हैं. अपनी सलाह के साथ हुक्म भी दे सकती हैं. इस
घर में किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं है कि वह
इनकी आज्ञा टाल सके. विशेषकर, जब ठाकुर साहब घर पर नहीं होते
हैं, तब इनकी चौकसी और भी बढ़ जाया करती है.
वह थोड़ा संभल ही पाई थी कि बुआ जी तूफान की चाल चलते हुए सोफे में
आकर समा गई और बिना समय गंवाये कहना शुरू कर दिया- " हमउं ने तो हवेली को कोना-कोना छान मारो, अउर महारानी
है कि हइयाँ बइठी हुईं हैं. सुनो...बिहारी की अम्मा आइ रहन, न्योता डार गइ है, आजे
संझा को वाकी बहू की गोद भराई हय. तुम तइयार रहिओ..हमउ चार-पांच बजे की बिरिआ
आवेंगीं तुमाय को लिवा लाने.के वास्ते....समझीं.
प्रत्युत्तर
में वह कुछ कहना चाह रही थी. उसके होंठ फडफ़ड़ाए भी थे, तब तक तो वे कमरे के बाहर जा
चुकी थीं.
राधा ने गौर से देखा उनकी
सांसें फूली हुई थीं और वे बराबर हांफ भी रही थीं, तिस पर भी वे कितना कुछ बोल
चुकी थीं. एक तूफान के गुजर जाने के बाद की शांति, अब चारों ओर पसरने लगी थी.
उसने तन पर जैसे-तैसे साड़ी
लपेटी. टेबल पर पड़ी कुंकूम की डिब्बी उठाई. माथे पर एक बड़ा-सा सूरज उगाते हुए, मांग भरने जा ही रही थी कि आईने में बनने वाला उसका अक्स बोल उठा—
" राधा,.... बिहारी की शादी हुए एक साल ही
बीता है और वह बाप बनने जा रहा है. तेरी शादी हुए तो तीन साल बीत गए. तू कब माँ
बनेगी ?
तेरी कोख
कब हरी होगी? "
प्रश्न सुनते ही लगा, जैसे
उसने धोखे से बिजली का नंगा तार छू लिया हो. पूरा बदन झनझना उठा था. उसकी आँखों के
सामने अंधियारा-सा छाने लगा था. देह थर-थर कांपने लगी थी. माथे पर पसीने की
मोटी-मोटी बूंदें छलछला आईं थीं. हलक गहरे तक सूख आया था. लगा कि मिट्टी की कच्ची
दीवार की तरह भरभरा कर गिर ही पड़ेगी.
उसने अपनी बिखरी हुई शक्तियों
को समेटने का उसने पुरजोर प्रयास किया, पर लगा कि वह उसके बूते की बात नहीं रह गई
है. जैसे तैसे उसने अपने आपको संभाला और लडख़ड़ाते कदमों से चलते हुए बरामदे में
पड़े झूले पर आकर पसर गई. झूले से जुड़ी लोहे की कडिय़ों से निरन्तर
चर्र-मर्र-चर्र-मर्र की आवाज उत्पन्न होने
लगी, जो उसकी दहशत को बढ़ा रही थीं. ज्ञात डर को और गहरा कर जाती थीं.
उसकी विस्फ़ारित नजरें अब भी छत
की दीवार से चिपकी थीं. अब वह अपने आपसे ही पूछने लगी थी. " क्या दर्पण भी कभी झूठ बोलता
है? सच ही तो है कि उसकी शादी को हुए तीन साल बीत गए,
अब तक उसके गर्भ
नहीं ठहरा है. वह तो पूरे प्राणपन से माँ बनने को तैयार बैठी है. कितने ही
देवी-देवताओं को वह अब तक नवस चुकी थी, तिस पर भी अगर वह माँ नहीं बन पा रही है तो
उसमें उसका क्या दोष है?
वर्तमान की त्रासदी और भविष्य
की भयावहता की परिकल्पना से वह सिहर-सिहर उठती. भयानक गर्त में डूब जाने के डर से,
वह अपने पर बचाने का प्रयास करते हुए, कोई समाधानकारक हल खोजने का प्रयास करती. पर
मन की अथाह गहराईयों तक समा चुका डर, अब रूप बदल बदलकर, सामने खड़ा होकर, उसले डर को और गहरा कर
जाता. वह डरावने सच के खूनी पंजों से बचने के लिए पैंतरें बदलती, फिर भी खरोंच के निशान उभर आते और देह से खून टिपटिपा कर बह निकलता.
वह सोचती. इन तीन सालों में
कितना कुछ बदल गया है. यह सच है कि उसने कभी महलों का ख्वाब देखा था. अकूत धन-दौलत
की कामना की थी. आज सब कुछ है उसके पास. जैसा जो भी कुछ चाहा था उसने, उसे भरपूर
मिला है. हाँ, उसने उस समय माँ बनने की कल्पना तक नहीं की थी. बच्चों की माँ
बनेगी, ऐसा ख्याल कभी मन में भी नहीं आया था. माँ बनने की तब वह सोच भी कैसे सकती
?. बस केवल और केवल धन की लालसा ही उसके मन में हिलोरें ले रहीं थी उस समय. उसने
गरीबी देखी है,काफ़ी करीब से. विपन्नता में जीवन जीना कितना कठिन होता है, उससे
बढ़कर और भला कौन जान सकता था. काश बापू धन्ना सेठ होते तो शायद ही वह धन-दौलत की
कामना करती".
सपनों के अनुरूप हवेली भी मिल
गई थी. नौकर-चाकर भी मिल गए थे. पर पास में जो संतोष धन का अमूल्य खजाना था, वह
कहीं खो गया था. बात-बात पर खिल-खिलाकर हंस देने वाली राधा आज पाषाणी प्रतिमा
बनकर, दिन भर उदासी ओढे बैठी रहती है. अब तो वह दूसरों की बजाय स्वयं से ही बातें
ज्यादा करने लगी है. महिलाओं की टोली से बचने का प्रयास करने लगी है. जानती है वह कि वे उससे कौन-सा प्रश्न पूछेगी. क्या वह जवाब
दे पायेगी?
सच है,
उसके पास कोई जवाब नहों था. वह अपने आपसे प्रश्न पूछती और
खुद ही उसका उत्तर खुद को देती रहती. प्रश्न तो बहुतेरे हैं उसके पास, पर उनके
उत्तर उसे नहीं मालूम. जब वह स्वयं ही उत्तर नहीं जानती, तो भला किसी के पूछे जाने
पर क्या जवाब देगी?
उसे लगने लगा था कि वह
प्रश्नों के जलते रेगिस्तान में खड़ी है. दूर कहीं दूर, उसे आशा की एक किरण दिखलाई
देती. वह हांफती-दौड़ती. उस तक पहुँचती, तब तक रोशनी अचानक गायब हो जाती. इस अकारण
की दौड़-धूप में उसके तलवों में गहरे जख्मों ने जगह बना ली थी. जख्मों से अब मवाद
रिस-रिस कर बहने लगा था. वह लगातार चलते रहना चाहती है, पर जानती है कि पैर उठाये
उठ नहीं रहे हैं. वह धम्म से नीचे बैठ जाती. जानती है वह कि जलते रेगिस्तान से कभी
भी आंधी उठ खड़ी होगी और उसका सारा वजूद, सारा वर्चस्व, गर्म रेत के नीचे दब
जायेगा..... दफन हो जायेगा... सदा-सदा के
लिए,....हमेशा के लिए. उसका मन अब बरगद की शीतल ठंडी छाँह तले
बैठकर आराम करना चाहने लगा था. तभी मन के किसी कोने से एक झीनी सी आवाज सुनाई दे
जाती कि राधा बरगद की ठंडी छाँव तो तुझे तब ही नसीब होगी, जब तेरी कोख में बीज का
अंकुरण होगा, जब तू बच्चे की माँ बनेगी.
हँसते-मुस्कुराते, हाथ पाँव
चलाते, चपल-चंचल बच्चे की तस्वीर उसकी आँखों के सामने नाचने लगती. बच्चे की कल्पना
मात्र से लगता कि बसंत लौट आया है. चारों ओर हरियाली छाने लगती है. हजारों-हजार
रंग-बिरंगी तितलियाँ हवा में फुदकने लगती हैं. बस यही तो वह सब कुछ चाहती है.
इन्हीं सपनों के साकार होने की प्रतीक्षा में उसके मन-प्राण विकल और बेचैन होते
रहे हैं.
कल्पनाओं के गहरे सागर में
उतरकर वह डूबती-उतराती रही थी. तभी एक बवण्डर-सा उठ खड़ा हुआ. जोरदार धमाके के साथ
उसके सपनों का रंग महल, तिनका-तिनका होकर बिखर गया. कल्पनाओं के कल्पतरू धराशायी
हो गए. अंदर अब सब कुछ क्षत-विक्षत था. चारों ओर सिर्फ़ गहरा काला अंधियारा, और धूल
मिट्टी के गुबार के अलावा कुछ भी नहीं बचा था.
सब कुछ शांत होने के बाद, एक
आशा की एक किरण फ़िर झिलमिलाती-सी दिखलाई देती. आशाएँ फ़िर बलवती होने लगतीं. मन में
एक उत्साह का संचरण होने लगता. सलोने सपने फिर सजने लगते.
आशा और निराशा की लहरों पर
हिचकोले खाते हुए वह देर तक डूबती-उतराती रही. तभी नींद का एक हलका-सा झोंका आया.
उसने उसे कब अपने आगोश में ले लिया, पता ही नहीं चल पाया.
नींद खुली. उसने महसूस किया कि
उसके पोर-पोर में ऐंठन के साथ, एक विचित्र किस्म का आलस भी रेंग रहा है. एक लंबी
अंगड़ाई लेते हुए उसने दूर-दूर तक अपनी नजरें दौड़ाईं. देखा. दीवार की ओट से हरिया अंदर
तांक-झांक कर रहा है. आखिर वह क्या देख रहा होगा? अंदर आने की हिम्मत वह कैसे कर सकता है? तरह-तरह के प्रश्न उसके दिमाक
को मथने लगे थे. वह उसे डांट कर भगा देने वाली थी, तभी एक ख्याल कौंधा कि आखिर पता तो लगाया जाए कि आखिर वह इस
तरह छिप-छिपकर तांक-झांक क्यों कर रहा है?. उसने झूले पर पड़े-पड़े ही चारों ओर
नजरें दौड़ाई. ऐसा तो कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है. वह स्वयं से कह उठी थी. तभी
उसकी नजरें अपने जिस्म पर पड़ी. उसकी विवस्त्र देह झूले पर झूल रही थी. ब्लाउज के
बटन भी खुले हुए थे और उरोज उचक कर बाहर निकलकर तांक-झांक कर रहे थे. बात समझ में
आई. उसे स्वयं ही अपनी संगमरमरी देह को देखकर शर्म-सी महसूस होने लगी थी. वह इस
स्थिति में भी नहीं थी कि झट से साड़ी लपेट पाती.
नारी की अनावृत देह देखकर ऋषि
मुनि भी विचलित हो जाते हैं. तपस्वियों के तप भंग हो जाते हैं, तो भला हरिया हाड-मांस का एक जीता जागता इंसान है. उसमें भी एक दिल
धड़कता है. नारी के अनावृत्त देह के सौंदर्य को देखकर वह अगर विचलित हो ही गया हो
तो, इसमें उस गरीब का क्या दोष? उसने अपने आपसे प्रश्न किया. अगर वह उसकी जगह होती
तो?. संभव है.....सारी मर्यादाओं को तोड़कर वह कभी की कुछ न कुछ कर बैठती. संसर्ग
की कल्पना मात्र से उसका हृदय धड़कने लगा था. साँसें तेज चलने लगी थीं. आँखों में
रंगीन सपने झिलमिलाने लगे थे. शरीर का पोर-पोर झंकृत हो उठा था.
हरिया को डांटकर भगा देने का
ख्याल अब उसके मन से तिरोहित हो गया था. लापरवाही से उठते हुए उसने अपनी साड़ी
समेटने की कोशिश की. अब वह कुछ इस तरह का अभिनय करने लगी थी, जैसे उसने कुछ देखा
ही न था.
तन
पर साड़ी लपेटते हुए वह अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी थी. चलते समय उसने पलटकर यह भी
देखने का प्रयास किया कि क्या हरिया अब भी वहाँ खड़ा है या भाग खड़ा हुआ है. उसकी
नजरे बराबर हरिया को खोज रही थीं. उसे वह कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ा. शायद उसे
जागता देख वह दीवार की ओट में दुबक गया होगा या फ़िर भागकर अपनी खोली में जा छिपा
होगा.
हवेली से काफी दूर हटकर,
नौकरों के लिए अलग-अलग खोलियां बनी हुई थीं। इन्हीं एक खोली में हरिया भी रहता है.
एकदम शांत सीधा-सादा हरिया, अपने काम में दिन भर रमा रहता. सुबह-शाम गाय-भैंसें
दुहता. चारा-पानी देता और उसके निर्देशों का तत्परता से पालन करता. लकडिय़ाँ फाड़ते
हुए उसने उसे कई बार देखा है. गठी हुई देह यष्टि, चौड़ा सीना, कसी हुई भुजाएँ. जब वह कुल्हाड़ी का भरपूर वार
लकड़ी के लठ्ठे पर करता है तो, सैकड़ों मछलियाँ उसकी भुजाओं में उछलने लगती हैं.
साड़ी लपेट लेने के बाद भी उसे
ऐसा लगने लगा था कि समूची देह पर हरिया की आँखें चिपकी हुई हैं और वे उसे लगातार
घूरे जा रही हैं. शर्म से वह दोहरी हुई जा रही थी.
उसका बदन गर्म तवे सा तप रहा था. उसने नहा
लेने का मन बनाया. सीधे वह बाथरूम में पहुँची. मल-मल कर शरीर धोया. शरीर को अच्छी
तरह सुखाकर पाउडर छिड़का. बार्डर वाली नीली चमचमाती-सी साड़ी लपेटी और बाहर आकर
बुआ का इंतजार करने लगी.
बुआ का अब तक कहीं अता-पता
नहीं था. बैठे-बैठे उसे कोफ्त-सी होने लगी थे. ऊँची-ऊँची दीवारों को लांघकर
ढोल-मंजीरों और महिलाओं के मिश्रित स्वर अंदर तक आ रहे थे. शायद कार्यक्रम शुरु हो
चुका था. बुआ के इंतजार में वह अधीर हुई जा रही थी. उससे अब और नहीं बैठा गया.
नौकरानी को आवश्यक निर्देश देकर वह घर से निकल पड़ी. एकबारगी मन हुआ, कार निकाल ले, पर मन ने मना कर दिया. आम
औरतें शायद यह न सोचने लगें कि अमीरी का ठस्का दिखाने के लिए वह गाड़ी पर चढ़ कर
आई है. वह पैदल ही हो ली.
बिहारी की माँ ने उसका भरपूर
स्वागत किया और बिराजने को कहा. उसे आया देखकर ढोल-मंजीरे बजने अचानक बजने बंद हो
गए. उसने देखा. लगभग सारी औरतें उसे घूर-घूरकर देख रही थीं. उसके बैठते ही
ढोल-ढमाका फिर शुरू हो गया. पूरी मस्ती के साथ औरतें गाने-बजाने लगी. बीच-बीच में
वे उसकी तरफ देखते हुए कुटिल मुस्कान बिखेरतीं. कभी एक दूसरे के कानों में
खुसुर-पुसुर भी करती जातीं थीं..
एक बड़ा सा चौक पूरकर पटा बिछा
दिया गया. पानी से भरे लोटे को कलश बनाकर उस पर दीप भी जला दिया गया था. बिहारी की
बहू को पटे पर लाकर बिठा दिया गया. औरतें बारी-बारी से गोद भराई करतीं.. आशीशें
देतीं और फ़िर अपनी जगह पर आकर बैठ जाया करतीं थीं. ढोलक की थाप पर महिलाएं अब पूरे
जोश के साथ गाने-बजाने लगी थीं.
राधा को अब अपनी बारी का
इंतजार था. उसने गौर से बहू की ओर देखा. डील-डौल-काठी में वह उसके ही जैसी तो
दिखती है. संभव है, उसके ही हमउम्र रही होगी या साल दो साल छोटी होगी. उसकी कोख
में एक बच्चा पल रहा है और वह अब तक इस सुख से वंचित है. एक ईर्ष्या का भाव मन के
किसी कोने में अंगड़ाई लेने लगा था. धड़कते दिल के साथ उसे एक बात और उद्वेलित कर
रही थी कि क्या वह आशीर्वचनों के साथ पूतो फलो-दूधो नहाओ का आशीर्वाद देने का
अधिकार रखती है, जबकि उसकी स्वयं की कोख अब तक खाली है. वह मन ही मन, अपने से ही
बात कर ही रही थी. तभी एक अधेड़ औरत ने जुमला उछालते हुए पूछ ही डाला- ''काहे बिन्ना-... अपनो नंबर कबे आन वारो है ? का हम लोग यहीं से उठकर
सीधी हवेली चला चलें".... बात सीधी-सादी थी, पर उसने
उसके पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया था.
जिस बात को लेकर वह भरी-भरी सी
थी..... डरी-डरी सी थी, वही बात सामने आकर खड़ी हो गई
थी. उसे कोई उत्तर सूझ नहीं पड़ रहा था. आँखें डबडबा आईं थीं. उसे अब मितली-सी भी
होने लथी थी. लगा कै हो जायेगी. वह तमतमाकर
उठ खड़ी हुई और औरतों के झुण्ड को लगभग लांघते हुए, बहू के पास पहुँची. एक सौ का
एक नोट उसके आँचल में डाला और बिना कुछ कहे, मुँह पर हाथ रखकर, कमरे के बाहर निकल गई.
तेज गति से चलते हुए उसे लगा कि
औरतों के कहकहे... फूहड़ हंसी और तीखे नुकीले
व्यंग्य उसका पीछा कर रहे हैं. तेज चाल चलते हुए वह पसीना-पसीना हुई जा रही थी.
रास्ता चलते हुए उसने सोचा
-" मेरी एक सौतन दमयन्ती भी तो यहीं पास में रहती है, चलकर मिल आने में क्या हर्ज है? उससे मिलकर वह केवल इतना भर जानना
चाहती है कि पाँच साल तक ठाकुर की पत्नि बनकर, ठाठ से महलों में रहने के बाद भी वह
एक बच्चा तक नहीं जन पाई?. आखिर वह कौन-सी वजह थी कि जिसके चलते वह माँ नहीं बन
पायी? और उसे किस बात से नाराज होकर ठाकुर साहब ने धक्के देकर महल के बाहर कर दिया
था?
दरवाजा अंदर से बंद था. उसने कालबेल की बटन दबाया. थोड़ी देर में
दरवाजा खुला. उसने देखा. एक कृष्काय महिला सामने खड़ी है. देखने में तो वह बड़ी उम्र
की नहीं लगती, लेकिन उसके चेहरे पर झुर्रियों ने जाला बुन दिया था. केश असमय ही
सफ़ेद हो गये थे. आँखों के नीचे गहरी कालिमा घिर आई थी. एक परित्यक्ता महिला किस
तरह घुट-घुट कर जीती रही होगी, किस तरह वह तिल-तिल कर अन्दंर ही अंदर जलती रही
होगी. और किस तरह अपने दुख की गठरी के भार को ढोती रही होगी?. उसने सहज में ही इस
बात का अंदाजा लगा लिया था. उसने इस बात का भी सहज ही अंदाजा लगा लिया था कि थी
अपनी भरपूर जवानी के दिनों में वह कितनी सुन्दर रही होगी. सुंदर न होती तो शायद ही
ठाकुर साहब की पत्नि होती.
उसने शिष्ठाचारवश हाथ जोडकर प्रणाम किया और
अपना परिचय दिया. परिचय पाकर दमयन्ती के सूखें होंठों पर एक हल्की सी मुस्कुराहट
की किरण चमकी.
"आओ राधा...आओ...तुम्हारा स्वागत है.
मुझे पक्का यकीन था कि तुम एक न एक दिन जरुर आओगी मेरे पास...आओ बैठो"
" आपने कैसे यकीन कर लिया था कि मैं
आपके पास आऊंगी ही".
"बड़ी भोली हो राधा तुम....इत्ती-सी
बात भी तुम्हारी समझ में नही आई. यदि तुम हवेली में खुश रहतीं, तुम्हारे बाल-बच्चे
हुए होते तो तुम उनके साथ व्यस्त रहतीं. जीवन के ऐश्वर्य के सुखों का उपभोग करतीं.
यदि यह सब होता तो फ़िर तुम कहाँ समय निकाल पातीं मेरी चौखट पर आने की. मैंने कुछ
गलत तो नहीं कहा न !." दमयन्ती ने उसकी दुखती रगो को छॆड़ दिया था.
अपने कड़वे यथार्थ को सुनते ही राधा को लगा
कि बर्र मक्खियों ने अचानक उस पर हमला बोल दिया है और उनके दंश के निशान शरीर पर
उभर आए हैं. जिस्म थर-थर कांपने लगा था. आँखें डबडबा आई थीं और घना अंधकार आँखों
के सामने ताण्डव करने लगा था. उसने यह भी महसूस किया कि अब कलेजा ही फ़ट जायेगा.
देर तक स्तब्ध बैठी रही राधा अब धीरे-धीरे
होश में आने लगी थी. थरथराते शब्दों में वह इतना ही कह पाई थी-" आपको कैसे
मालुम कि मेरे कोई औलाद नहीं हुई?"
"औलाद हो ही नहीं सकती, इतना तो मैं
जानती हूँ"
इतना सुनते ही धक्क से रह गई थी राधा. उसका
हलक सूखने लगा था. शब्द जैसे गले में आकर अटक गए थे. फ़िर भी किसी तरह हिम्मत
बटोरते हुए उसने पूछा-" औलाद नहीं हो सकती, ऐसे कैसे कह सकती हैं आप?."
"सचमुच तुम बहुत भोली हो राधा और
अनजान भी. अरे, पांच साल गुजारे है मैंने तुम्हारी हवेली में....तुम्हारे पति के
साथ...कितनी ही रातें मैंने मछली की तरह तड़प-तड़प कर काटी हैं...क्या-क्या जतन नहीं
किए मैंने माँ बनने के लिए...कितने ही देवी-देवताओं की मन्नतें मांगी थी
मैने...बावजूद इसके मैं माँ नहीं बन पाई. जब माँ नहीं बन पाई तो मुझ पर बांझ होने
का ठप्पा लगाकर, तुम्हारे पति ने मुझे अपनी जिन्दगी से बाहर निकाल फ़ेंका.
इतना सुनते ही राधा फ़बक-फ़बक कर रोने लगी
थी. देर तक सिसक-सिसक कर रोने के बाद उसने पूछा-"आप माँ क्यों नहीं बन पाईं,
इस पर आपने कुछ बतलाया नहीं?.
" सुनना ही चाहती हो तो कलेजा पक्का
करके सुनो...है इतनी हिम्मत..तुममें..?.
" अंधेरे में भटकते रहने और दीवारों
से सर टकराने से तो बेहतर है कि हकीकत से रुबरु हो लिया जाए, यही ज्यादा श्रेयस्कर
होगा मेरे लिए"- राधा ने सोचा. फ़िर धीरे से कहा-"..कहिए...मैं जरुर उस
रहस्य को जानना चाहूंगी....आप निश्चिंत होकर मुझसे कहें."
"तो सुनो.......एक करोड़पति बाप की
बिगड़ैल औलाद को तुम विगत तीन सालों में कितना जान पाई हो, मैं नहीं जानती. लेकिन
जितना मैं जान पाई हूँ, तुम्हें बतलाती हूँ. तुम्हारे ठाकुर साहब को शराब और शबाब
से गहरा लगाव है. रातों को रंगीन बनाने के चक्कर में वे अक्सर ऐसे क्लबों में जाते
हैं जहाँ जिस्म का खुल कर सौदा होता है. इसके लिए वे अक्सर शहर से बाहर ही होते
हैं. बाहर रहकर वे पानी की तरह पैसा बहाते हैं उनका दिल जब भर जाता है, तब जाकर वे
घर की ओर लौटते थे. अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत में मैंने उन्हें यह सोचकर कभी
नहीं टोका कि ऐसे शौक तो अक्सर रईस लोगों के होते ही है. मर्दों के लिए ऐसा किया
जाना स्टेट्स सिंबल भी माना जाता है.
एक बार घर से निकलते तो फ़िर कब लौटेंगे,
कोई नहीं जानता. हाँ, जब लौटने को होते तो फ़ोन जरुर करते. मैं पलक पाँवड़े बिछाकर
उनके आने का इन्तजार करती. अपने को खूब सजाती-संवारती. फ़िर वो रात भी आती, जिसका
मैं अधीरता से इंतजार करती रहती थी. नशे में धुत्त, वे मेरे जिस्म से जी भर के
खेलते. यह क्रम दो-तीन दिन चलता, फ़िर वे किसी बाज की तरह फ़ुर्र से उड़ जाते किसी नए
आशियाने की तलाश में.
एक दिन की बात है. बड़ी सुबह हम चाय के टेबल
पर थे. बुआ जी भी साथ थी. गर्मा-गरम चाय का घूंट भरते हुए बुआ जी ने इन्हें टॊंका-
"काहे राजा बाबू.....अबइ से फ़ेमिली प्लानिंग करन चाहत हो का? एक-दो बाल-बच्चा
तो हो जान देते...फ़िर प्लानिंग के बारे में सोचते. हम आस लगाए बइठे हैं कि अपने
पोतहू-पोतियों के संगे जी भर के खेलेंगे..कूदेंगे...इसी आसा में हमरे पांच साल तो
बितई गए... का हमरे मरने के बाद बच्चा पइदा करोगे का?". बुआ जी की बात ने
मुझे शर्मसार कर दिया था और वे उठकर बाहर निकल गए थे. इसके बाद से अक्सर हमारे बीच
नोंक-झोंक होती. वे कहते-" मैं तो पूरी कोशिश कर रहा हूँ, शायद तुममें ही कोई
कमी होगी. इतना बड़ा इल्जाम भला एक औरत कैसे सह सकती थी?.मैंने पलटकर जवाब
दिया-" सुनो....मैं मां बनने की पूरी क्षमता रखती हूँ. दरअसल तुम मर्द होकर
भी मर्द नहीं हो. कारण जानना चाहते हो तो सुनो....."तुम्हारे वीर्य में
स्पर्मों की कमी है, जो बच्चा पैदा करने में सक्षम होते हैं. बजाय बहस-मुबाहिसों
के हमें किसी योग्य डाक्टर से अपना परीक्षण करवा लेना चाहिए. डिफ़ेक्ट कहाँ है पता
चल जाएगा".
बस मैं इतना ही कह पाई थी कि उनके क्रोध का
पारावार बढ़ गया और उन्होंने लगभग चीखते हुए कहा-"बंद करो तुम्हारी
बकवास...खबरदार...जो एक शब्द भी आगे कहा तो.तुम्हारी खैर नहीं....तुम मेरे पैरों
की जूती हो, जूती ही बनी रहो...सिर पर चढ़ने की कोशिश कभी मत करना, नहीं तो बड़ा
मंहगा पड़ेगा तुम्हें.....और लगे मुझे लात-घूंसों से पीटने. मुझ पर अचानक, इतना बड़ा
पाश्विक हमला हो सकता है, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी.
" राधा......क्या औरत महज मर्दो के
पैर की जूती
होती है?
और कुछ नहीं" इस एक शब्द ने मुझे मेरी औकात.बतला दी थी कि मैं इस बिगड़ैल रईस
की नजरों में सिर्फ़ एक जूती हूँ और कुछ नहीं हूँ" एक स्त्री जाति का इतना बड़ा
अपमान? भला मैं कैसे सह सकती थी. मैंने भी तत्काल पलटकर कहा-" औरत की इज्जत
करना सीखो ठाकुर साहब. मैं कोई उठाईगिर नहीं, तुम्हारी पत्नि हूँ. पत्नियाँ कभी
पति के पैरों की जूती नहीं होतीं, वह उसकी अर्धांगिनी कहलाती हैं. जिन स्त्रियों
का उनके घर में सम्मान न हो, उन्हें तत्काल उस घर को छोड़ देना चाहिए. मैंने अपनी
अंजुली मे पानी लिया और कहा-" मैं दमयन्ती .....ईश्वर को साक्षी मानकर अभी और
इसी समय तुम्हें पति मानने से इन्कार करती हूँ और तुम्हें अपने दिए गए वचनों के
बंधनों से भी मुक्त करती हूँ". मैं अभी और इसी समय तुम्हारी हवेली छोड़कर जा
रही हूँ. मुझे तुम्हारी दौलत में से एक छदाम भी नहीं चाहिए.
"राधा....हवेली छोड़ देने के बाद,
मैंने उसी स्कूल में आकर अध्यापन करना शुरु कर दिया,जिसे मैंने अपने विवाह के
पश्चात छॊड़ दिया था. चुंकि मैं पढ़ी-लिखी थी, अपने पैरों पर खड़ी थी, इसलिए मैं अपने
आपको को संभाल पायी. तुम तो पढ़ी-लिखी भी ज्यादा नहीं हो और न ही तुम्हारा कोई
मजबूत आधार है. तुम शायद ही इतना बड़ा फ़ैसला ले सकोगी. तुम जीवन भर उसी हवेली में
रहना चाहती हो तो तुम ठाकुर साहब को एक संतान दे दो, फ़िर शेष जिन्दगी आराम से
गुजारती रहो. तुम्हें नियोग का सहारा लेना होगा. अब यह तुम्हारे ऊपर है. तुम किस
भद्र पुरुष का चुनाव करना चाहत्ती हो. यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है. सुनो.. महाभारत
काल में भी इस विधि का प्रयोग किया गया था. मैं नहीं समझती कि जीवन बचाने के लिए
इससे अच्छा और सरल तरीका तुम्हारे लिए और कोई नहीं हो सकता है. जब जीवन संकट ही
में हो पाप-पुण्य की बात करना बेमानी होगी, फ़िर तुम खुद समझदार हो’.
उसे जीवन जीने का एक सूत्र मिल गया था.
उसने दमयन्ती के चरण छुए और घर की ओर लौट पडी.
रास्ते में सन्नाटे के साथ अंधियारा भी
चारों तरफ पसरा पड़ा था. हवेली के बल्ब फ्यूज हो गए थे अथवा नौकरानी ने जलाए ही
नहीं, यह वह नहीं जानती और न ही उसने लाईट जलाने के लिए स्विच बोर्ड की तरफ हाथ ही
बढ़ाया. अंधेरे में कुर्सी टटोलते हुए वह उस पर जा बैठी. आहट पाकर जैकी भूंका जरूर
था.
विचारों की श्रृंखला अब भी
उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. प्रश्न अपने आपको दुहराने लगता. वह अपने आप से पूछती—
''क्या वह ठाकुर साहब को सन्तान दे पायेगी? अगर ऐसा न हुआ तो क्या वह भी अपने माथे पर बांझ होने का ठप्पा लगवाना
पसंद करेगी?
माँ न बन पाने की व्यथा औरत को
तिल-तिल करके जलाती तो है ही, समाज भी यदि उसे बांझ कहकर पुकारने लगे, तो व्यथा और भी
बढ़ जाती है. उसका समूचा अस्तित्व ही अब धू-धू करके जलने लगा था.. वह सोचने लगी
थी-"क्या वह इस धधकती अग्नि में अपने-आपको झोंक पायेगी"? तरह-तरह के प्रश्नों के जहरीले
नाग उसके बदन को कसने लगे थे. लगा कि शरीर की सारी हड्डियां चरमराकर चूर-चूर हो
जायेंगी.
भावविह्वल होते हुए दमयंती
दीदी ने उसके सामने वह सच भी उगल दिया था कि ठाकुर की पहली दो पत्नियों ने भी इसी
गम को अपने गले से लगा लिया था, और तिल-तिल गलते हुए दुनिया से
रुखसत हो गई थीं. तीसरी बारी उनकी अपनी थी., जब उसे घर से निकाला गया था, तब उनकी आत्मा मर गई थी और शेष रह
गया था शरीर
मरने के
लिए. दीदी ने तो यह भी बतलाया था
ठाकुर साहब जैसे रईसजादों के बिस्तर पर जवान औरतों को चादर की तरह बिछाया जाता है
और जब चादर मैली-कुचली हो जाती है तो उन्हें फेंककर नई चादर बिछा दी जाती है.
उसकी समझ में आ चुका था कि
ठाकुर दौलतसिंह जी यानी उसके पति, जिसकी नजरों में औरत की कीमत एक जूती के बराबर
होती है. वह कभी भी जूती बनना कभी पसंद नहीं करेगी. ठाकुर साहब को आखिर चाहिए
क्या.... सिर्फ एक औलाद....एक वारिस ?
उसके जब औलाद पैदा होगी, तभी वह संपूर्णता के साथ जी सकेगी. मन का आकाश खुशियों से झूम
उठेगा. उसका नन्हा, राजदुलारा जब तुतलाती मीठी जुबान में बोलेगा— माँ कहकर
पुकारेगा तो उसके साथ दसों दिशाएं एक साथ खिल उठेंगी. उसका रोम-रोम मीठे-मीठे गीत
गाने लगेगा. उसके सारे संताप-सारे दु:खदर्द, सारी कुंठाएं उसकी मीठी बोली की चाशनी
में घुल जाएंगी.
घड़ी ने रात के बारह बजे का
ठोंका लगाया. ढोल-मंजीरों के स्वर अब भी हवा में तैर रहे थे. वह उठ खड़ी हुई.
पैरों में चप्पलें डालीं और बाहर निकल पड़ी.
सन्नाटे से भरे अंधियारे पथ
में, उसके कदम हरिया की खोली के तरफ
बढ़ चले थे. शायद एक सूरज की तलाश में जो उसका जग आलोकित कर सके.
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