यात्रा-(9)
आखिर थम ही गए पहिए
लगातार एक सौ ग्यारह
वर्षों तक अहिर्निश सेवाएँ देती रहने वाली छोटी रेल के पहिए आखिर 30 नवम्बर 2015 को इतिहास का हिस्सा बन ही गई. छिन्दवाड़ा से नैनपुर एवं छिन्दवाड़ा से नागपुर
रूट पर चलने वाली दस जोड़ी ट्रेन के पहिए थम गए. नैनपुर से आखरी नेरोगेज ट्रेन
दोपहर 2.40 बजे रवाना होकर रात्रि 8.15 बजे छिन्दवाड़ा
पहुँची, वहीं छिन्दवाड़ा से नैनपुर के लिए आखिरी ट्रेन शाम 5.10 बजे रवाना हुई. छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए आखरी ट्रेन 5.25 बजे रवाना हुई. नागपुर से चलने वाली ट्रेन का सफ़र छिन्दवाड़ा में ही समाप्त हो
गया. शाम 5.25 बजे छिन्दवाड़ा से आखरी नेरोगेज ट्रेन रवाना हुई और इस तरह
गरीबों के लिए वरदान मानी जाने वाली नेरोगेज ट्रेन इतिहास का एक अमिट हिस्सा बन
गई.
ऊँचे-ऊँचे हरे भरे
पहाड़ों की बीच घुमावदार पटरियों पर छुकछुक करती नैरोगेज ट्रेन स्मृतियों का हिस्सा
बन गई. आजादी से पहले और आजादी के बाद के एक सौ ग्यारह साल में नैरोगेज ट्रेन ने
कई उतार-चढ़ाव देखे. नैनपुर से नागपुर तक जिले की पांच पीढ़ियों को अपनी गोद में
लेकर सफ़र कराने वाली छॊटी ट्रेन के पहिए 30 नवम्बर को थम ही गए.
रेल लाइन के किनारे बसे गांवों के लोग और छॊटी ट्रेन में स्फ़र करने वाली यात्री
शायद ही इस ट्रेन को भुला पाएंगे.
नेरोगेज लाइन बंद
होने के साथ भविष्य में तेज रफ़्तार की बड़ी लाइन ट्रेनों से जुड़ने को लेकर
यात्रियों में एक तरफ़ खुशी तो है,लेकिन एक सदी से ज्यादा के सफ़र के इतिहास में
बदलने का दुख भी है. अब जिलेवासी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कि मेगा ब्लाक लगाने के
बाद गेज कन्वर्जन का कार्य तीव्र गति से हो सकेगा जिससे नागपुर, जबलपुर व मंडला से
छिंन्दवाड़ा जल्द से जल्द बड़ी लाइन से जुड़ सकेगे.
बिदाई के वक्त पिता
जानता है कि बेटी का आना-जाना तो बना रहेगा ,लेकिन यह छॊटी ट्रेन फ़िर लौटकर नहीं
आएगी, यह जानकर लोगों की आँखें भर आयी थीं. सोमवार की शाम जैसे ही नैनपुर एवं नागपुर
की ट्रेने अपने अन्तिम सफ़र पर निकालीं, उसे बिदा देने के लिए और अपनी यात्रा को
यादगार-यात्रा बनाने के लिए लगभग दो हजार यात्रियों ने अपनी सीटॆं आरक्षित कर साथ
रवाना हुए थे. उस दिन ट्रेनों को किसी दुल्हन की तरह सजाया-संवारा गया था.
देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति पर लोग झूम-झूम कर नाच उठे थे. फ़ूल बरसाकर उसे बिदाई
दे रहे थे. इस दिन जमकर आतिशबाजी भी की गई थी. विस्मयकारी दृष्य तो उस समय आ
उपस्थित हुआ जब ट्रेन की रवानगी के समय भारी भीड़ के चलते उसे बार-बार रोकना पड़ा.
जैसे ही वह कुकड़ीखापा पहुँची, ग्रामीणॊं ने उसकी आरती उतारी. नागपुर और छिन्दवाड़ा
से चली ट्रेनों का उमरानाला में क्रासिंग हुआ, लोगों ने उनका स्वागत किया. सौंसर
से लगभग 1600 यात्रियों ने सफ़र किया. चौरई से सिहोरा स्टेशन तक कई जगह
लोगों ने एवं रेलवे के अमले ने ट्रेन को बिदा दी.
नैनपुर रूट पर रवाना
होने वाली आखरी नेरोगेज ट्रेन क्रमांक 58855, जिसका लोको पायलट
श्री बालाजी बापू, सहायक ड्रायवर श्री पी.के.यादव एवं गार्ड श्री दौलत जुम्मन थे.
वहीं नागपुर रूट पर रवाना हुई नेरोगेज ट्रेन क्रमांक 58836 को लोको पायलट श्री वकील खान एवं
असिस्टेंट पायलट श्री यू.आर.पांडॆ चला रहे थे. इसके गार्ड श्री डी.डी.मेश्राम थे.
इससे पहले दोपहर में नैनपुर की ओर रवाना हुई नेरोगेज ट्रेन के लोको पायलट श्री भवानी
पटेल एवं लोको पायलट श्री अभिषेक पैसाडेली थे.
आखरी दिन छिन्दवाड़ा
रेल्वे स्टेशन से नेरोगेज की यात्रा के लिए 2070 टिकटॆं बिकीं. 4325 यात्रियों के लिए टिकटॆं जारी की गई. वहीं टिकटॊं की बिक्री से रेल्वे को 109311 रुपयों की आय हुई. रोजाना की तुलना में सोमवार को चार गुना टिकटॊं की बिक्री
हुई. अधिकांश यात्रियों ने छिन्दवाड़ा से शिकारपुर, लिंगा, उमरिया ईसरा, चौरई जैसे
आसपास के स्टेशनों की यात्रा के लिए टिकिट लिए. यात्रियों की बड़ी संख्या के कारण
लिंगा स्टेशन में रिकटॊं की कमी पड़ गई. श्री ओपी डागा नेरोगेज ट्रेन का आखरी टिकट
लेने नागपुर से छिन्दवाड़ा आए थे. उन्हें टिकट क्रमांक 513939971 जारी किया गया थ
कुछ ऐतिहासिक झलकियाँ
· गवर्मेंट आफ़ इण्डिया ने वर्ष 1897-98 में बंगाल नागपुर रेल्वे के अंतर्गत गोंदिया से नैनपुर होते हुए जबलपुर रेल
लाइन का सर्वे कराया. इसमें ब्रांच लाइन के तरह छिन्दवाड़ा एवं नागपुर तक विस्तार
का प्रावधान था. इसकी विस्तृत रिपोर्ट 1898-99 एवं 1899-1900 में तैयार कराई गई
थी.
· 23 जनवरी 1902 को गोंदिया-जबलपुर लाइन एवं नैनपुर-छिन्दवाड़ा तथा नैनपुर-मंडला लाइन का
कांट्रेक्ट साइन हुआ. निर्माण कार्य भी वर्ष 1902 में ही प्रारंभ हो
गया. वर्ष 1904 में नैनपुर- छिन्दवाड़ा रेल लाइन को यातायात के लिए खोल
दिया गया. जिले में पहली ट्रेन 27 जुलाई 1904 को सिवनी से चौरई तक चली. सितंबर 1904 में इसे छिन्दवाड़ा
तक बढ़ा दिया गया. छिन्दवाड़ा से पेंचवेली कोलफ़ील्ड तक रेल लाइन बिछाने का कार्य 1906-07 में पूरा हुआ. सन 1906-1907 में छिन्दवाड़ा से परासिया तक रेल पटरी बिछाई
गई. छिन्दवाड़ा से नागपुर रेल लाइन का काम 1911 में पूरा हुआ. इस
रुट पर पर प्रारंभिक तौर पर लोधीखेड़ा और सौंसर तक ट्रेने चलीं.वर्ष 1913 में नागपुर से छिन्दवाड़ा तक ट्रेन दौड़ने लगीं.
· वर्ष 1898-99 और 1899-1900 में तैयार सर्वे रिपोर्ट में 252.67 मील नैरोगेज रेललाइन के निर्माण पर 81.33 लाख रुपए लागत का
अनुमान लगाया गया था. इसमें गोंदिया से जबलपुर की बीच 143.43 मील की मेन लाइन के साथ ही ब्रांचलाइन नागपुर-मंडला 21.75 मील, नैनपुर-सिवनी 47.13. सिवनी-छिन्दवाड़ा 40.36 मील शामिल थे.
· छोटी लाइन के ट्रेन के उबाऊ सफ़र को आरामदेह
बनाने के लिए रेल्वे ने छिन्दवाड़ा से नैनपुर तक फ़ास्ट ट्रेन चलाने का निर्णय लिया. वर्ष 2005 तक रेल चलाई गई. इसकी स्पीड अधिकतम 50 किमी प्रति घंटा थी. यह
ट्रेन रात 10 बजे छिन्दवाड़ा से निकलकर रात 1 बजे नैनपुर पहुँचती थी. इसक एकमात्र स्टापेज सिवनी में होता था.
· छिन्दवाड़ा से नैनपुर तक चलने वाली ट्रेन एक बार
हादसे का शिकार हुई. लूट के इरादे से कुछ असामाजिक तत्त्वों ने कान्हीवाड़ा और
पलारी के मध्य लोहे का एक खंबा गाड़ दिया था. 50 किमी.की रफ़्तार से दौड़ रहा
इंजन लोहे के खंबे से ऎसा टकराया कि इंजन की दिशा ही बदल गई. इंजन पलट गया लेकिन
इस हादसे में किसी को चोट नहीं आयी. केवल इंजन के ड्रायवर श्री उमाशंकर चौरसिया और
साथी कर्मचारी को गंभीर चोटॆं आयी थी.
· जून 2002 में मानसून की
दस्तक के साथ मौसम में जबरदस्त बदलाव आया. तेज हवाओं के साथ बारिश से कई पेड़
धराशायी हो गए. मकानों की छतें उड़ गईं. इसी बीच दोपहर में नैनपुर से छिन्दवाड़ा आ
रही ट्रेन गंगाटोला स्टेशन के पास तूफ़ान में फ़ंस गई. बोगी में सवार लोगों हे हवा
से बचने के लिए खिड़की के दरवाजे बंद कर दिए. हवा का कुछ ऎसा दवाब पड़ा कि डिब्बे
हिल उठे और उसके पहिए पटरी से उतर गए. इंजन के ड्रायवर और सहकर्मी जहां बैठते हैं,
उस स्थान की छत उखड़ गई.
· वर्ष 1958 में डकैतों ने एक
ट्रेन को लूटने की धमकी दी थी. इस धमकी से शहर के एक बड़े वर्ग में दहशत फ़ैल गई
लेकिन डकैत अपने मंसूबों को अंजाम नही दे पाए. शहर के नागरिक स्व. हरनारायण जायसवाल
की बेटी विमलादेवी का रिश्ता कलकत्ता में तय हुआ था. बारात नागपुर होते हुए
छिन्दवाड़ा आने वाली थी. इसके लिए ट्रेन बुक कराई गई थी. संभ्रांत परिवार की बारात
में भरपूर नगद राशि और सोने के जेवरात होने की सूचना डकैतों तक पहुंच गई. डकैतों
ने ट्रेन लूटने की धमकी भी दे दी. लेकिन डकैतों का मंसूबा विफ़ल हो गया. 26 अप्रैल 1958 को यह बारात नेरोगेज से नहीं बल्कि ब्राडगेज लाइन से नागपुर आमला होते हुए परासिया
पहुंची. यहां से सभी बाराती जो एक सैकड़ा थे, कारों में सवार होकर छिन्दवाड़ा पहुंचे
थे.
· वर्ष 2005 में रेल मंडल ने
नागपुर से जबलपुर के बीच टूरिस्ट ट्रेन का प्रयोग किया था. यह ट्रेन सप्ताह के एक
बार चलाई जाती थी. ट्रेन के पांच फ़ेरे हुए. पहले और दूसरे फ़ेरे में यात्रियों की
संख्या उत्साहजनक रही लेकिन अंतिम तीन फ़ेरों में ट्रेन में बेहद कम यात्री सवार
हुए थे. इस तरह टूरिस्ट ट्रेन का यह प्रयोग सफ़ल नहीं हो सका.
· टूरिस्ट ट्रेन में यात्रियों को गर्मी से राहत
दिलाने के लिए एअर कंडीशनर के बजाए खिड़कियों पर छॊटॆ कूलर लगाने का प्रयोग किया
गया जो असफ़ल रहा. इन यात्रियों को कुकड़खापा, छिन्दवाड़ा में आदिवासी संग्रहालय,
कान्हा पार्क और जबलपुर में भेड़ाघाट के अलावा अन्य ऎतिहासिक स्थान दिखाए गए.
· जब नागपुर से पहला कोयला इंजन ट्रायल पर
छिन्दवाड़ा के लिए निकला. विशालकाय इंजन को देखकर कई गांव के लोग भाग खड़े हुए.
· सिल्लेवानी की पहाड़ी पर इंजान को धक्का देकर
चढ़ाना पड़ा था.
· छिन्दवाड़ा से नागपुर तक चलने वाली पैसेन्जर
ट्रेन के ड्रायवर तंसरा रेल्वे क्रासिंग के बाद से एक्सीलेटर का उपयोग किए बिना
ट्रेन चलाते थे.
· देवी तक पहाड़ी ढलान के कारण बोगियों को खींचने
के लिए इंजान की ताकत का उपयोग नहीं किया जाता था. रामाकोना से उमरानाला की दूरी 37 किमी है. उमरानाला समुद्र सतह से 640 मीटर की ऊँचाई पर
है तो वहीं रामाकोना 355 मीटर पर है. यानी 37 किलो मीटर के सफ़र में यात्री समुद्र तल से 285 मीटर ऊँचाई पर
पहुँच जाते हैं.
· अंग्रेजी हुकूमत के दौरान नागपुर से नैनपुर
रेल्वे लाइन पर 36 स्टेशन तय किए गए. स्टेशन पर प्लेटफ़ार्म के
दोनो ओर लगभग दो मीटर लंबे और एक मीटर चौड़ॆ सीमेंट के बोर्ड पर स्टेशनों के नाम
लिखे गए. अंग्रेजी से हिन्दी रुपांतरण करने में गांव का नाम बदल गया. अंग्रेजी
हुकूमत की यह त्रुटि आजादी के बाद भी सुधर नहीं पायी. पर्यटन केंद्र से विकसित
कुकड़ीखापा रेल्वे स्टेशन के बोर्ड में आज भी कुक्ड़ाखापा लिखा है तो वहीं
भिमालगोंदी के बोर्ड पर भीमालगोंदी लिखा है. ऎसी अनेक गलतियां नागपुर से नैनपुर तक
कई स्थानों पर देखी जा सकती है.
· तकनीकी दुनिया में जहां लोग 240 किमी प्रति घंटॆ से अधिक की रफ़तार से चलने वाली बुलेट ट्रेन का सफ़र कर रहे
हैं, वहीं सतपुड़ा अंचल के लोग 9 किलो मीटर से 40 किमी प्रति घंटॆ की रफ़्तार
वाली छुकछुक ट्रेन का आनंद लेते रहे. कई स्थानों पर लोग अपने घर के पास से गुजरने
वाली ट्रेन में दौड़कर चढ़ जाते थे..नागपुर से नैनपुर का 287 किमी का सफ़र 13 घंटॆ 35 मिनट में तय होता था.
सालों पुरानी रेल लाइन पर सुरक्षा की दृष्टि से इंजन की अधिकतम स्पीड 40 किमी. प्रति घंटॆ तक की गई थी. इस स्पीड के लांघते ही इंजन का सायरन अपने आप
बज उठता था. सायरन बजते ही ड्रायवर ब्रेक के सहारे इसकी स्पीड कंट्रोल कर लेते थे.
· जिले का सबसे पुराना रेल्वे स्टेशन काराबोह अब
वीरान हो चुका है. वर्ष 1904 में सिवनी जिले से यहां तक ट्रेन का संचालन
शुरु हुआ था. यहां रेल्वे ने वर्ष 1908 में हाथ से खींचने वाला सिग्नल लगाया था. 107 साल बीत जाने के बाद भी यह सिग्नल काम कर रहा है. देश का सबसे पुराना
हस्तचलित सिग्नल यहां देखा जा सकता है.
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103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा(म.प्र.) 480-001 गोवर्धन यादव. 94243-56400
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